मन में बार-बार एक प्रश्न आता है कि क्या हम वेद मन्त्रों के अलावा श्लोक, सूत्र आदि से भी आहुति दे सकते हैं? यदि नहीं तो स्वामी जी ने गृहसूत्रों से भी आहुतियाँ दिलायी हैं, जैसे-अयं त इध्म (आश्व.गृ.) अग्नये स्वाहा, सोमाय स्वाहा (गो.गृ.) भूर्भुवः स्वरग्नि.. (तैत्तिरीय आ.) आपोज्योतिः…(तैत्तिरीय आ.) यदस्य कर्मणो…(आश्व.गृ.) ये तो शतं वरुण.. (कात्या.श्रो.) अयाश्चाग्ने….(कात्या.श्रो.)। तो क्या इसी प्रकार अन्य गृह सूत्रों के मन्त्रों से भी आहुतियाँ दे सकते हैं? जैसे वैदिक छन्दों को मन्त्र कहा जाता है, वैसे ही गृह सूत्रों स्मृतियों के श्लोकादि को भी मन्त्र कहा जा सकता है। यदि मन्त्र नाम विचार का है तो श्लोकादि में भी विचार हैं।

– आचार्य सोमदेव

आदरणीय सम्पादक जी, सादर नमस्ते!

मन में बार-बार एक प्रश्न आता है कि क्या हम वेद मन्त्रों के अलावा श्लोक, सूत्र आदि से भी आहुति दे सकते हैं? यदि नहीं तो स्वामी जी ने गृहसूत्रों से भी आहुतियाँ दिलायी हैं, जैसे-अयं त इध्म (आश्व.गृ.) अग्नये स्वाहा, सोमाय स्वाहा (गो.गृ.) भूर्भुवः स्वरग्नि.. (तैत्तिरीय आ.) आपोज्योतिः…(तैत्तिरीय आ.) यदस्य कर्मणो…(आश्व.गृ.) ये तो शतं वरुण.. (कात्या.श्रो.) अयाश्चाग्ने….(कात्या.श्रो.)। तो क्या इसी प्रकार अन्य गृह सूत्रों के मन्त्रों से भी आहुतियाँ दे सकते हैं? जैसे वैदिक छन्दों को मन्त्र कहा जाता है, वैसे ही गृह सूत्रों स्मृतियों के श्लोकादि को भी मन्त्र कहा जा सकता है। यदि मन्त्र नाम विचार का है तो श्लोकादि में भी विचार हैं। – विश्वेन्द्रार्य

समाधानः- यज्ञकर्म कर्मकाण्ड है। इस कर्मकाण्ड को ऋषियों ने धर्म के साथ जोड़ दिया है और इसको मनुष्य के कर्त्तव्य कर्मों में अनिवार्य कर दिया। वैदिक युग अर्थात् आज के मत-मतान्तरों से पूर्व के काल में यह कर्म ऋषियों की विशुद्ध परिपाटी से होता था। प्रायः प्रत्येक गृहस्थ पञ्च यज्ञों का अनुष्ठान किया करता था। महाभारत के बाद ऋषि-महर्षियों के अभाव में ब्राह्मण वर्ग ने अपनी मनमर्जी चलाकर कर्मकाण्ड का रूप ही बदल डाला। जो कर्मकाण्ड पवित्र था, जिसके प्रति श्रद्धा थी, उस कर्मकाण्ड को तथाकथित पण्डितों ने अपवित्र कर दिया, अर्थात् ऐसे कर्म उसके साथ युक्त कर दिये जो  मनुष्य के लिए निन्दित थे। इसी कारण जिस कर्म के प्रति श्रद्धा थी, उसके प्रति अश्रद्धा व घृणा पैदा हो गई। परिणाम यह हुआ कि इस पवित्र यज्ञ कर्म से विमुख हो अनेक मत-सम्प्रदाय बनते चले गये और देश समाज का पतन होता चला गया। मनुष्य के नैतिक मूल्य गिर गये, मनुष्य या तो धर्म-कर्म से इतना स्वच्छन्द हुआ कि अपनी मर्यादा को तोड़ बैठा अथवा धर्म-कर्म में इतना बँध गया कि कोई भी कार्य पण्डित से पूछे बिना कर नहीं सकता। वेद, शास्त्र की बात गौण हो गई, तथाकथित पण्डित की बात सर्वोपरि होती चली गई। ऐसा होने से या तो लोग नास्तिक होते चले गये या फिर धर्मभीरु होते गये।

इस नास्तिकता ने और धर्मभीरुता ने मनुष्य समाज को पतन की ओर उन्मुख कर दिया। परमेश्वर की दया हम लोगों पर हुई कि महर्षि दयानन्द का इन सब बातों पर ध्यान गया और इस दूषित वातावरण को उन्होंने दूर किया। महर्षि ने अपने जीवन में ईश्वर और वेद को सर्वोपरि आदर्श माना है। वेद के आधार पर जो भी सुधार हो सकता था, वह महर्षि ने किया और अपने जीवन काल में सुधार करते रहे।

यज्ञ को महर्षि ने जगत् के उपकार के लिए महान् कर्म माना है। यज्ञ कर्म हम ठीक से करें-इसके लिए महर्षि दयानन्द ने पंचमहायज्ञविधि व संस्कार विधि नामक दो पुस्तकें लिखी हैं। इनमें भी संस्कार विधि पुस्तक बाद की है। इसमें महर्षि ने यज्ञ की ठीक-ठीक विधि को दे दिया है। आपने पूछा है कि वेद के मन्त्र के अतिरिक्त किसी श्लोक-सूत्र आदि की आहुति भी दे सकते हैं? इसमें हमारा कहना है कि यदि किसी श्लोक, सूत्र का विनियोग महर्षि अथवा किसी प्रामाणिक विद्वान् ने कर रखा है तो दे सकते हैं, अपनी मनमर्जी से नहीं देना चाहिए। यदि ऐसे ही अपनी मनमर्जी से देने लग गये तो पूर्व की भाँति अर्थात् महाभारत के बाद और महर्षि दयानन्द से पहले जो कर्मकाण्ड का विकृत रूप था, वह होता चला जायेगा, इसलिए जिनका विनियोग महर्षि दयानन्द ने किया है, उन मन्त्र-सूत्रों से आहुति देते रहें। इसमें महर्षि का भी मत है कि जो और अधिक  आहुति देना हो तो – विश्वानि देव सवितर्दुरितानि……इस मन्त्र और पूर्वोक्त गायत्री मन्त्र से आहुति देवें। स.प्र.३

‘‘अधिक होम करने की जहाँ तक इच्छा हो, वहाँ तक स्वाहा अन्त में पढ़कर गायत्री मन्त्र से होम करें।’’ पञ्च महायज्ञविधि। यह विधान महर्षि दयानन्द ने किया है।

आपने कहा कि महर्षि ने गृह सूत्रों आदि से आहुति का विधान किया है, इसमें हमारा कथन है कि वह आर्ष=ऋषिकृत विधि होने से ठीक है। जहाँ जिस प्रसंग के मन्त्र-सूत्रों का विनियोग जिस संस्कार आदि में आवश्यक था, महर्षि ने वह किया है। उनका वह विनियोग उचित है। महर्षि के इस विनियोग को देखकर भी जो कोई किसी अन्य सूत्र, श्लोक से आहुति दिलावे वा देवे सो ठीक नहीं। ऐसी मनमर्जी करने से यज्ञ का विशुद्ध स्वरूप ही बिगड़ जायेगा। मन्त्र मुख्य रूप से मूल वेद संहिताओं का नाम है, वेद में आये कथन को मन्त्र कहते हैं। इसमें यह रूढ़-सा हो गया है। ऐसा होने पर भी ऋषियों के व्यवहार से ज्ञात हो रहा है कि वेद से इतर शास्त्र वचनों को भी मन्त्र नाम से कहा है। जैसे कि आपने भी ‘‘अयं त इध्म……’’ को उद्धृत किया है।

महर्षि ने मन्त्र विचार को कहा है, सो ठीक है। मन्त्र शब्द मन्त्र गुप्त परिभाषणे धातु से सम्पन्न है, जिसका अर्थ ही गुप्त कथन = रहस्य रूप कथन है। इस मन्त्र शब्द से मन्त्री शब्द बना है, मन्त्री अर्थात् मन्त्रणा करने वाला, विचार करने वाला, राजा को विशेष विचार देने वाला अथवा राजा से विशेष मन्त्रणा करने वाला।

मन्त्र नाम विचार का है, इस हेतु को लेकर हम किसी भी श्लोक सूत्र को बोलकर आहुति देने लग जायें सो ठीक नहीं है, क्योंकि विचार केवल सूत्र श्लोक ही नहीं है, विचार तो कुरान की आयतें भी हैं, बाइबल की आयतें भी हैं। उपन्यास और नावेल में लिखी हुई बातें भी विचार ही हैं। चलचित्रों में कहे गये संवाद विचार हैं, तो क्या इनको बोलकर भी यज्ञ में आहुति देने लग जायें? इसको आप भी स्वीकार नहीं करेंगे और न ही कोई अन्य यज्ञप्रेमी स्वीकार करेगा।

इसलिए श्लोक सूत्रादि विचार होते हुए भी हर किसी श्लोक सूत्रादि से आहुति इसलिए नहीं देनी चाहिए, क्योंकि ऋषियों अथवा अन्य प्रामाणिक विद्वानों द्वारा उनका विनियोग हमें प्राप्त नहीं है। हाँ, यदि ऋषियों या किसी प्रामाणिक विद्वान् ने किसी मन्त्र श्लोक सूत्र का यज्ञ में प्रसंग के अनुसार विनियोग कर रखा हो तो उससे आहुति दे सकते हैं, दी जा सकती है।

– ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर।

অর্জুনের রথের ধ্বজায় কি হনুমানজী বিদ্যমান ছিলেন?

কিছু কিছু পৌরাণিক পন্ডিত দাবী করে অর্জুনের রথের ধ্বজায়(পতাকায়) নাকি স্বয়ং হনুমানজী ( ত্রেতা যুগের ) বিদ্যমান ছিলেন।
অর্জুনের রথের পতাকায় স্বয়ং হনুমানজী ছিলেন একথা মহাভারতে কোথাও বলা নেই।
যেমন আজকের অত্যাধুনিক মিসাইল, যুদ্ধবিমান ইত্যাদিতে পরিচয় বোধক বিভিন্ন চিহ্ন ব্যবহার করা হয়। রাষ্টের ধ্বজা সেনাদের সমন্ধ বিভাগ করে। তাই সেনাদের চিহ্নিত করার জন্য বিভিন্ন প্রতীক ব্যবহার করা হয়। (কেউ কেউ সেনাদের পোশাক ভিন্নতা করে নিজ সৈন্য চিহ্নিত করার জন্য)
এই প্রকারে অর্জুনের রথে অনেক অনেক মহাপুরুষ, বীর যোদ্ধা, আর শ্রদ্ধেয় পুরুষদের ছবি অংকিত ছিলো। এগুলো ছিলো সম্মান আর সাহসের প্রতীক।
যারা বলে থাকে অর্জুনের রথে কেবল হনুমানজীর মূর্ত্তি ছিলো তারা যেন দয়া করে মহাভারতের
( উদ্যোগপর্বান্তর্গত যানসন্ধি পর্বের অধ্যায় ৫৬ এর ৭এবং ৮ সংখ্যক শ্লোক পরে দেখেন।)
সঞ্জয় উবাচ – প্রজানাথ! বিশ্বকর্মা ত্বষ্টা তথা প্রজাপতি ইন্দ্রের সাথে মিলে অর্জুনের রথের ধ্বজায় অনেক প্রকার রূপ তৈরী করেছেন। ৭
সেই তিন জন দেবমায়ার দ্বারা সেই ধ্বজা মধ্যে ছোট বড় অনেক প্রকার বহুমূল্য এবং দিব্য মূর্তিকে নির্মাণ করেছেন। ৮
এই শ্লোকেই স্পষ্ট প্রমান দেয় অর্জুনের ধ্বজার বর্ণন। এখানে কেবল হনুমানের কথা বলা হয় নি। ওখানে অনেক রাজা, বীর,মহাপুরুষ দের ছবিও ছিলো। একথা সত্য যে তার মধ্যে হনুমানজীর ছবিও অংকিত ছিলো।
কিন্তু কিছু পৌরাণিক বন্ধুগণ ধু সেখানে কেবল হনুমানজীকেই দেখতে পান। তারা মনেহয় এটা জানত না যে, সেখানে যোগেশ্বর স্বয়ং উপস্থিত ছিলেন। শ্রীকৃষ্ণ যেমন মহাবীর,বুদ্ধিমান আর জ্ঞানগম্ভীর চিন্তাধারার ছিলেন তেমনি ছিলেন পক্ষপাত শুন্য ব্যক্তি। তিনি কিকরে সেখানে কেবল হনুমানজীর ছবি দিতে দিতেন। এতে বাকি বীর মহাপুরুষ দের অপমান করা হতো না? তাছাড়া মহাভারতে তো বলাই আছে সেখানে অনেকের ছবি অংকিত ছিলো।
এক শ্রেণীর পৌরাণিক দের দাবী হনুমানজী নাকি সর্বদাই প্রভু শ্রী রামচন্দের চরণে সেবা করতেন,
আর এক শ্রেণীরর দাবি শ্রীরামচন্দ্র নাকি শ্রীকৃষ্ণ হয়ে জন্ম নিয়েছেন।
ফির সন্দেহের বিষয় যদি তাই হতো তাহলে যে ভক্ত তার প্রভূর চরণ ছাড়া বুঝত না সে কি করে প্রভুর মাথার উপরে উঠবে। এতে প্রভুর অপমান হবে না কি?
পৌরাণিক দের এই তর্ক কি করে শেষ হবে।
আসা করি এই পোষ্ট প্রকৃত সত্য জানতে সাহায্য করবে।

মনুস্মৃতি ও দন্ডব্যবস্থা।

মনুস্মৃতি ন্যায় ব্যবস্থার সবচেয়ে বড় একটি পুস্তক। একটি রাজ্য শাসন এবং পরিচালনা করার জন্য কতগুলো নির্দিষ্ট আইন থাকে। তন্মধ্যে একটি হচ্ছে অন্যায়কারীদের উপযুক্ত দন্ড প্রদান করা। মহর্ষি মনু মহারাজ তার বচনে সমাজ ব্যবস্থা এবং অপরাধীদের শিক্ষা দেবার জন্য কিছু দন্ড বিধান প্রণয়ন করেছেন। বিদ্যা, জ্ঞান ও সংস্কার দ্বারা দ্বিতীয় জন্ম প্রাপ্ত হওয়া দ্বিজ অথবা ব্রাহ্মণ কে মনু অধিক সম্মান প্রদান করেছেন।
[ এখানে উল্লেখ্য যে, জন্মগত ভাবে কেউ ব্রাহ্মণ বা দ্বিজ হয় না। ইহা সংস্কার এবং শিক্ষা সাপেক্ষ]
এরূপ উচ্চজ্ঞানসম্পন্ন বিদ্বান লোক অধিক সামর্থবান হয় এবং সমাজের কল্যাণ আনয়ন করে। অতঃপর সেও যদি নিজ দায়িত্ব পালন না করে এবং স্বধর্ম হতে বিচ্যুত হয় তবে অবশ্যই সেও দন্ডভাগী হবে।
নিম্নে এরূপ কিছু শ্লোক প্রস্তুত করা হয়েছে-
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=>> স্বধর্ম হতে বিচ্যুত মাতা, পিতা, আচার্য্য আদি সবাই রাজা কর্তৃক দন্ডনীয় হবে-
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পিতাচার্য্য সুহৃন্মাতা ভার্য্যা পুত্রঃ পুরোহিতঃ।
নাদন্ড্যো নাম রাজোহস্তি যঃ স্বধর্মে ন তিষ্ঠতি।।৩৩৫
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পদার্থঃ (পিতা আচার্য সুহৃত মাতা ভার্যা পুত্রঃ পুরোহিত) পিতা, আচার্য, স্ত্রী, মাতা পুত্র এবং পুরোহিত কেউ হোক না কেন (যঃ স্বধর্ম ন তিষ্ঠতি) যে স্বধর্মে স্থিত নয় (রাজঃ অদন্ডমঃ নাম ন) রাজা তাদের যথোচিত দন্ড প্রদান করবেন।
(বিশুদ্ধ মনুস্মৃতি ৮।৩৩৫, ডঃ সুরেন্দ্রকুমার)
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=>> অপরাধী রাজা সাধারনের চেয়ে অধিক সহস্রগুন দন্ড প্রাপ্ত হবে-
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কার্ষপনং ভবেদ্দন্ড্যো যত্রান্যঃ প্রাকৃতো জনঃ।
তত্র রাজা ভবেদ্দন্ডঃ সহস্রমিতি ধারনা।।৩৩৬
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পদার্থঃ (যত্র) যেই অপরাধে (অন্যঃ প্রাকৃতঃ জন) সাধারন মানুষের উপর (কার্ষপনং দন্ডদ্য, ভবেত) এক পণ দন্ড দেওয়া হয় (তত্র) সেই অপরাধে (রাজা, সহস্রং দন্ডদ্য, ভবেত) রাজা সহস্র পণ দন্ড প্রাপ্ত হবে।
(বিশুদ্ধ মনুস্মৃতি ৮।৩৩৬, ডঃ সুরেন্দ্রকুমার)
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=>>উচ্চবর্ণের ব্যক্তি বর্গ অধিক দন্ড প্রাপ্ত হবে-
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অষ্টাপদ্যন্ত শুদ্রস্য স্তেয়ে ভবতি কিল্বিষম্।
ষোড়শৈব তু বৈশ্যেষ্য দ্বাত্রিংশৎ ক্ষতিয়স্য চ।।৩৩৭
ব্রাহ্মণস্য চতুঃষষ্টিঃ পূর্ণং ব্যাপি শতং ভবেৎ।
দ্বিগুনা বা চতুঃষষ্টিস্তদ্দোষগুনবিদ্ধি সঃ।।৩৩৮
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পদার্থঃ এভাবে (তত দোষগুণাবিত হি সঃ) যে কিছু বিবেকী হয়েও (স্তেয়ে) চুরি করে (শুদ্রস্য তু অষ্টাপাদ্যম) শুদ্রকে সেই চুরির কারনে আট গুন (বৈশ্যস্য তু ষোড়শ+এব) বৈশকে যোল গুন (ক্ষত্রিয়স্য দ্বাত্রিংশত) ক্ষত্রিয়কে বত্রিশ গুন (ব্রাহ্মণস্য চতুঃষষ্টি) ব্রাহ্মণকে চৌষষ্টি গুন (অপি বা শতম) বা শত গুন (বা) অথবা (দ্বিগুন চতুঃষষ্টি) একশত আটাইষ গুন (কিত্বিবর্ষং ভবতি) দন্ড হওয়া উচিত। অর্থাৎ যার যেমন জ্ঞান এবং যার প্রতিষ্ঠা অধিক, সেই অপরাধে সেইরূপ অধিক দন্ড প্রাপ্ত হবে।
(বিশুদ্ধ মনুস্মৃতি ৮।৩৩৭-৩৩৮, ডঃ সুরেন্দ্রকুমার)
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=>> উপযুক্ত দন্ড প্রদান করে রাজা যশ এবং সুখ লাভ করবে-
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অনেন বিধিনা রাজা কুর্ব্বাণঃ স্তেননিগ্রহম্।
যশোহস্মিন পাপ্তয়াল্লোকে প্রেত্য চানুত্তমংসুখম।।৩৪৩
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পদার্থঃ (রাজা) রাজা (অনেন বিধিনা) উপরক্ত বিধি দ্বারা (স্তেননিগ্রহং কুর্বণিঃ) চোরকে নিয়ন্ত্রিত এবং দন্ডিত করে (অস্মিন্ লোকে যশঃ) এই জন্মে বা লোকমধ্যে যশ (চ) এবং (প্রেত্য) পরজন্মে (অনুত্তমং সুখম) উত্তম কে (প্রাপ্তুযাত) সুখ কে প্রাপ্ত করে।
(বিশুদ্ধ মনুস্মৃতি ৮।৩৪৩, ডঃ সুরেন্দ্রকুমার)
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অতএব মহর্ষি মনুর বচন অনুযায়ী অপরাধীর পদ অনুসারে তার দন্ড নির্ধারিত হবে। মনু মহারাজ ব্রাহ্মণকে এবং উচ্চ শাসক কে কঠোরতম দন্ডের ব্যবস্থা করে দিয়েছেন। কিন্তু সমাজে দেখা যায় তার উল্টো। উচ্চ প্রভাবশালী বর্ণ যদি আপন কর্তব্যবিমুঢ হয় এবং নিন্দনীয় কার্যও করেন তবুও তার দন্ড অতন্ত্য লঘু হয়।
মনুঃ ৭।১৭-২০ এ স্পষ্ট বলা আছে, দন্ডই ন্যায়ের প্রচারক এবং দন্ডই অনুশাসনকর্তা। চার বর্ণ এবং জীবনের চার আশ্রমের রক্ষক। ইহা রাষ্ট্রকে জাগৃত রাখে। এইজন্য বিদ্বানরা দন্ডকে ধর্ম বলেন।

মনুস্মৃতি ও বর্ণ ব্যবস্থা

মনুস্মৃতি কে সৃষ্টি মধ্যে নীতি এবং ধর্মের (কানুন) নির্ধারন কারী সবচেয়ে প্রথম গ্রন্থ মানা হয়। এবং সেই সময় জন্মগত জাতিব্যবস্থার প্রথা ছিলো না। মহর্ষি মনুও জন্মগত ভাবে সিদ্ধ জাতিব্যবস্থার সমর্থন করে নি।মনু মহারাজ মানুষের গুন কর্ম স্বভাবের উপর আধারিত সমাজ ব্যবস্থা রচনা করার জন্য উপদেশ করেছে। এবং ইহাই সঠিক বর্ণ ব্যবস্থা। বর্ণ শব্দটি “বৃঞ” ধাতু থেকে এসেছে। যার অর্থ চয়ন বা নির্ধারন করা। এবং কর্ম এবং গুন দ্বারা বর্ণ নির্ধারিত হবে ইহাই ছিলো মনুর বিধান। কিন্তু বর্তমানে জন্মগত ভাবে বর্ণপ্রথা চালু রয়েছে। যা মনু কখনোই স্বীকার করে নি। উচ্চ বংশে জন্মগ্রহনকারীরা সব সময় নিম্ম বর্ণের মনুষ্যকে উপেক্ষিত করে চলে।এবং জন্মগত পরিচয়ে নিজেকে অনেক বড় বলে মনে করেন।
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মনুস্মৃতি ৩।১০৯ – এ স্পষ্ট বলা হয়েছে যে, ব্রাহ্মণ ভোজনের জন্য স্বীয় কুল গোত্রের পরিচয় প্রদান করিবেন না। ভোজনের জন্য কুল ও গোত্রের পরিচয় করিয়া ভোজন করিলে তাকে উদগীর্ণভোজী বলে।
অতএব মনুস্মৃতি অনুসারে, যে ব্রাহ্মণ বা উচু জাতি নিজ গোত্র বা বংশের পরিচয় দিয়ে নিজেকে বড় বলেন। এবং মার সম্মানের অপেক্ষা রাখে, অবশ্যই সে তিরস্কার যোগ্য।
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মনুস্মৃতি ২।১৩৬ – ন্যায়সঞ্চিত ধন, পিতৃব্যাদি সমন্ধ্য, বয়োধিকতা, শ্রেষ্ঠ কর্ম, বেদার্থতত্বজ্ঞান রূপ বিদ্যা এই পঞ্চ সম্মানের উত্তরোত্তর মানদন্ড।
এই শ্লোকে কোন কুল, জাতি বা বংশ কে সম্মানের মানদন্ড মানা হয় নি।
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=>বর্ণের পরিবর্তন –
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মনুস্মৃতি ১০।৬৫ – ব্রাহ্মণ ও শুদ্র হতে পারে এবং শুদ্রও ব্রাহ্মণ হতে পারে। এই প্রকার ক্ষত্রিয় ও বৈশ্যও নিজ নিজ বর্ণ পরিবর্তন করতে পারে।
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মনুস্মৃতি ৯।৩৩৫ – শরীর এবং মন দ্বারা শুদ্ধ – পবিত্র এবং উৎকৃষ্ট লোকের সান্নিধ্যে স্থিত। মিষ্টিভাষী, অহংকার রহিত, নিজ থেকে উৎকৃষ্ট বর্ণের সেবাকারী শুদ্রও উত্তম ব্রহ্ম জন্ম বা দ্বিজ বর্ণকে প্রাপ্ত করতে পারে।
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মনুস্মৃতি মধ্যে অনেক শ্লোক রয়েছে যেখানে বলা হয়েছে, উচ্চ বর্ণের ব্যক্তিও যদি শ্রেষ্ঠ কর্ম না করে তবে সে শুদ্র (অশিক্ষিত) বলে গন্য হবে।যেমন-
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মনুস্মৃতি ২।১০৩ – যে মনুষ্য নিত্য প্রাত এবং সন্ধ্যায় ঈশ্বরের আরাধনা করে না তাহাকে শুদ্র বলে জানবে।
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মনুস্মৃতি ২।১৭২ – যে ব্যক্তি বেদের শিক্ষাই দীক্ষিত হয় নি সে শুদ্র তুল্য।
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মনুস্মৃতি ২।১৬৮ – যে ব্রাহ্মণ বেদের অধ্যয়ন বা পালন ছেড়ে অন্য বিষয়ে প্রযত্ন করেন সে শুদ্রত্ব প্রাপ্ত হয়।
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মনুস্মৃতি ৪।২৪৫ – ব্রাহ্মণ বর্নস্থ ব্যক্তি শ্রেষ্ঠ অতিশ্রেষ্ঠ ব্যক্তি সঙ্গ করে এবং নিচ থেকে নিচতর ব্যক্তির সঙ্গ ছেড়ে অধিক শ্রেষ্ঠ হয়। ইহার বিপরীত আচরনে পতিত হয়ে সে শুদ্রত্ব প্রাপ্ত হয়।
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অতঃএব ইহা স্পষ্ট যে, ব্রাহ্মণ উত্তম কর্ম কারী বিদ্বান কে বলে। এবং শুদ্রের অর্থ অশিক্ষিত ব্যক্তি। ইহা কোন জন্মগত সমন্ধ্য নয়।
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মনুস্মৃতি ২।১২৬ – এমনকি কেন ব্রাহ্মণ হোক, কিন্তু যদি সে অভিবাদনের উত্তর শিষ্টতার সহিত দিতে না জানে, তবে সে শুদ্র।
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অর্থাৎ মনু জন্মসিদ্ধ বর্ণ প্রথার সমর্থন করে নি। মনুস্মৃতি অনুসারে মাতা পিতা তার সন্তানদের বাল্যকালে তার রূচি এবং প্রকৃতি জেনে ব্রাহ্মণ, ক্ষত্রিয় বা বৈশ্যের বর্ণের জ্ঞান এবং প্রশিক্ষণ প্রাপ্ত করার জন্য উপদেশ প্রদান করবেন। কোন ব্রাহ্মণ পিতা মাতা যদি তার সন্তান কে ব্রাহ্মণ তৈরী করতে চায় তবে অবশ্যই তার মধ্যে ব্রাহ্মণোচিত গুণ,কর্ম, স্বভাব জাগিয়ে তুলবেন।
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মনুস্মৃতি ২।১৫৭ – যেমন কাষ্ঠনির্মিত হস্তি ও চর্ম্মনির্মিত মৃগ কোন কার্যকারক নহে। তদ্রুপ যে ব্রাহ্মণ বেদাধ্যয়ন না করে তিনিও কোন কার্যক্ষম নহে। কেবল ব্রাহ্মণের নাম মাত্র ধারন করেন।
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=>>শিক্ষাই বাস্তবিক জন্ম –
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মহর্ষি মনুর মতে মানুষের বাস্তবিক জন্ম বিদ্যাপ্রাপ্তিতেই ঘটে। জন্মত প্রত্যেক মানুষই শুদ্র অর্থাৎ অশিক্ষিত। এবং সংস্কার দ্বারা সে পরিশুদ্ধ হয়ে তার দ্বিতীয় জন্ম হয়। আর একেই দ্বিজ বলে। সংস্কারে অসমর্থ ব্যক্তি শুদ্রই রয়ে যায়।
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মনুস্মৃতি ২।১৪৮ – সমস্ত বেদশাস্ত্রের পারদর্শী আচার্য্য অভিজাত বালকের যথাবিধিনুসারে গায়ত্রী উপদেশ করিয়া যে যথার্থ জন্ম উৎপাদন করেন, সে জন্মই ব্রহ্মপ্রাপ্তির কারন বলিয়া অজর ও অমর রূপে গণ্য হয়।
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মনুস্মৃতি ২।১৪৬ – জন্মদাতা পিতা থেকে জ্ঞান দাতা আচার্য্য অধিক বড় এবং মাননীয়। আচার্য্য দ্বারা প্রদান করা জ্ঞান মুক্তি প্রদান করে। পিতা দ্বারা প্রদত্ত শরীর তো এই জন্মের সাথেই নষ্ট হয়।
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=>> শুদ্রের প্রতি ভালো ব্যবহার
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মনু পরম মানবীয় ছিলেন। তিনি জানতেন যে, কোন শুদ্র ইচ্ছাকৃত ভাবে শিক্ষাকে উপেক্ষা করতে পারবে না। তারা কোন কারন বশত জীবনের প্রথম ধাপে জ্ঞান এবং শিক্ষা থেকে বঞ্চিত হয়েছে। এ জন্য মহর্ষি মনু শুদ্রদের জন্য সমাজে উচিত সম্মানের বিধান করেছেন। তিনি শুদ্রদের প্রতি কখনো অপমান সূচক শব্দ ব্যবহার করেন নি। মনুর দৃষ্টিতে জ্ঞান ও শিক্ষার অভাবে শুদ্র সমাজের মধ্যে সবচেয়ে অসহায়। যা পরিস্থিতির বশ। সে জন্য মনু সমাজে তাদের প্রতি অধিক সহৃদয়তা এবং সহনাভূতি দেখাতে বলেছেন –
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মনুস্মৃতি ৩।১১২ – শুদ্র বা বৈশ্য অতিথি রূপে আসলে ব্রাহ্মণ তাকে সম্মানের সহিত ভোজন করাবেন।
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মনৃস্মৃতি ৩।১১৬ – আপন সেবক (শুদ্র) কে প্রথম ভোজন করানোর পর দম্পতি ভোজন করবেন।
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=>> মনুস্মৃতি বেদের উপর আধারিত
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বেদ ঈশ্বরীয় জ্ঞান এবং সমস্ত বিদ্যা বেদ থেকেই নির্গত হয়। এবং বেদ কে মেনেই ঋষিরা অন্য সব গ্রন্থ রচনা করেছেন।বেদের স্থান এবং প্রামানিকতা সবার উপরে। এবং অন্যান্য স্মৃতি শাস্ত্রও মান্য যদি সেগুলো বেদানুকুল হয়। এবং বেদ যে ধর্মের মূলে মনু ইহা দৃঢতার সহিত মান্য করতেন।
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মনুস্মৃতি ২।৮ – শাস্ত্র সকল জ্ঞানচক্ষু দ্বারা বিশেষরূপে পর্যালোচনা করিয়া বিদ্বানরা বেদমূলক কর্তব্যকর্ম্ম অবগত হইয়া তাহার অনুষ্ঠান করিবেন।
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মনুস্মৃতি ২।১৩ – ধর্ম্ম জিজ্ঞাসু ব্যক্তির নিকট প্রকৃষ্ট প্রমাণ বেদ। যেহেতু বেদ ও স্মৃতির অনৈক্যে বেদের মতই গ্রাহ্য হয়।
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এখানে ইহা স্পষ্ট যে, মনুর বিচার এবং মূল রচনা বেদানুকুল। তিনি বেদের আধারেই উপদেশ করেছেন। কিন্তু যদি মনুস্মৃতিতে বেদ বিরুদ্ধ কোন উপদেশ পাওয়া যায় , অবশ্যই তাহা প্রক্ষিপ্ত জানবে। কারন মনু বেদের বাহিরে গিয়ে কোন উপদেশ করেন নি। কিছু স্বর্থান্বেষী তাদের স্বার্থ সিদ্ধির জন্য তাদের মনগড়া শ্লোক সংযোজন করেছেন। যা সম্পূর্ণই ভ্রান্ত এবং বেদ বিরুদ্ধ।
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অতএব মহর্ষি মনুর মত অনুসারে, বর্ণব্যবস্থা জন্মগত নয়। ইহা গুন, কর্ম এবং স্বভাব জাত। নিম্ন জাত বলে কাউকো হেয় করা নয়। বরং তাদেরকে সম্মান করা। বাস্তবিক ইহাই তো ধর্ম। মহর্ষি মনুর তো ইহাই চরম সিদ্ধান্ত। তাই তো তিনি বলেছেন-
যাহাতে ধর্ম রক্ষা হয়, এমত যত্ন করিবে। জগতে ধর্ম হতে শ্রেষ্ঠ আর কিছু নাই। (মনুঃ ৮।১৭)

पुस्तक – परिचय पुस्तक का नाम- व्याख्यान शतक

पुस्तक – परिचय

पुस्तक का नाम व्याख्यान शतक

लेखक स्वामी देवव्रत सरस्वती

प्रकाशकआर्य प्रतिनिधि सभा दिल्ली, १५, हनुमान रोड़, नई दिल्ली-१

पृष्ठ ५५८      मूल्य- ३५० रु. मात्र

मानव का ज्ञानवर्धन देखकर, सुनकर और पढ़कर होता है। जो व्यक्ति जितना वैदिक विचार धारा को सुनता और पढ़ता है उसका ज्ञान अधिक परिमार्जित होता है। ऐसा परिमार्जित ज्ञान वाला यदि उपदेशक बन जाता है, तो वह समाज का अधिक भला करता है। आज वर्तमान में हजारों उपदेशक हैं, उन उपदेशकों में से वैदिक ज्ञान परम्परा वालों को छोड़कर जितने उपदेशक हैं, वे समाज के अविद्या अन्धकार दूर करने की अपेक्षा बढ़ा रहे हैं। हजारों की संख्या में कथाकार कथाएँ कर रहे हैं, इन कथाकारों का सिद्धान्त निष्ठ न होने से समाज में अन्धविश्वास और पाखण्ड बढ़ रहा है। हाँ, जो वैदिक सिद्धान्त को ठीक से जानते हैं, वे समाज की अविद्या पाखण्ड को दूर कर पुण्य के भागी बन रहे हैं।

समाज में यदि उपदेशक ठीक है और उपदेश सुनने वाले ठीक हैं तो समाज की व्यवस्था भी ठीक होती है और यदि उपदेशक ठीक नहीं व उपदेश सुनने वाले ठीक नहीं तो सामाजिक व्यवस्था भी बिगड़ जाती है।

आजकल का उपदेशक वर्ग प्रायः स्वाध्याय कम करता है, कर रहा है। वह किसी अन्य उपदेशक द्वारा सुनी हुई बात को इधर से उधर करता है या वही अपनी पुरानी बातें दोहरा देता है, जिससे उसके उपदेशों में रोचकता का अभाव होता जाता है। हाँ, जो उपदेशक निरन्तर स्वाध्यायशील रहते हैं, उनके उपदेश भी नवीन व रोचक होते हैं।

जो उपदेशक विभिन्न प्रकार के व्याख्यान देने में निपुण होते हैं, वे अधिक लोकप्रिय होते हैं। विभिन्न विषयों पर उपदेशक व्याख्यान दे सके, उनकी सरलता के लिए आर्य जगत् के मूर्धन्य संन्यासी, शस्त्र व शास्त्र के ज्ञाता, विद्या के धनी स्वामी देवव्रत जी ने ‘‘व्याख्यान शतक’’ नामक पुस्तक लिखी है। इस पुस्तक में वेद, योग, धर्म, सिद्धान्त, आर्यसमाज, आर्यवीर, युवक, महापुरुष आदि विषयों पर एक सौ एक व्याख्यान लिपिबद्ध किये हैं। वेद विषय पर १५, योग विषय पर १५, धर्म विषय पर १२, सिद्धान्त विषय पर ११, आर्यसमाज विषय पर १७, आर्यवीर विषय पर ७, युवक विषय पर ११, महापुरुष विषय पर ५ और विविध विषयों पर ८ व्याख्यान लिखे हैं। प्रत्येक व्याख्यान प्रमाणों, युक्ति तर्कों से युक्त अपने आपमें पूर्णता लिए हुए हैं। व्याख्यानों में वेद, ब्राह्मण ग्रन्थ, उपनिषद्, गीता, महाभारत, बाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस, मनुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति, कौटिल्य अर्थशास्त्र, चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, योगदर्शन, सांख्य दर्शन, सत्यार्थ प्रकाश, नीतिशतक, योगवाशिष्ठ, विदुर नीति, हठयोग प्रदीपिका, धेरण्ड संहिता, गोरक्ष संहिता, चाणक्य नीति, नारद भक्ति सूत्र व हरिहर चतुंग आदि ग्रन्थों के प्रमाण दिये गये हैं। यदि उपदेशक वर्ग इस पुस्तक के व्याख्यानों को पढ़कर व्याख्यान देगा तो उसका व्याख्यान विद्वत्तापूर्ण तो होगा ही, साथ में लोगों का ज्ञानवर्धन करने वाला व रोचकता युक्त भी होगा।

पुस्तक में विद्वान् लेखक ने अपने मनोभाव प्रकट किये हैं-‘‘अज्ञान मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। ज्ञान के अभाव में मनुष्य कर्त्तव्याकर्त्तव्य का निर्णय नहीं कर पाता, जिसके कारण ‘‘अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः’’ जैसे एक अन्धे के पीछे जाने वाले दूसरे अन्धे व्यक्तियों की गड्ढ़े में गिरने की पूरी सम्भावना रहती है, वैसी ही अवस्था अविद्याग्रस्त लोगों की होती है। अविद्या की पृष्ठभूमि में ही अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश के बीज पनपते हैं। सीधे, भोले और अज्ञानी लोगों को कोई भी अपने वाग्जाल में फँसाकर दिग्भ्रमित बहुत सरलता से कर सकता है, इसलिए विद्याध्ययन की समाप्ति पर समावर्तन संस्कार के समय आचार्य स्नातकों को प्रेरणा देते हुए कहता था, ‘‘स्वाध्याय प्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्’’ स्वाध्याय और प्रवचन में कभी प्रमाद नहीं करना। स्वाध्याय और प्रवचन सबसे बड़ा तप है, जो प्रतिदिन एक वेदमन्त्र या उसका आधा अथवा चतुर्थ भाग का स्वाध्याय करता है, मानो उसने नख से शिख तक तप कर लिया।’’

इस ‘‘व्याख्यान शतक’’ पुस्तक लिखने की प्रेरणा के विषय में लेखक लिखते हैं-‘‘व्याख्यान शतक’’ लिखने की प्रेरणा आर्यसमाज की दो विभूतियों से मिली। पं. लेखराम जी की अन्तिम इच्छा थी कि आर्यसमाज से तकरीर (व्याख्यान) और तहरीर (लेखन) कभी बंद नहीं होने चाहिए। एक दिन शास्त्रार्थ महारथी पं. गणपति शर्मा चूरु (राजस्थान) का लेख किसी आर्यसमाज के पुस्तकालय में देखने को मिला। आदरणीय पण्डित जी ने उस जैसे एक सौ लेखों की व्याख्यान शतक पुस्तक लिखने की इच्छा प्रकट की थी। इन दोनों दिग्गज पण्डितों ने पौराणिकों व अन्य मतानुयायियों के साथ शास्त्रार्थ कर आर्य समाज की विजय दुन्दुभी बजाई थी।……………मैं श्रद्धा से उनको नमन करता हूँ।

विशेष महापुरुषों से प्रेरित होकर लिखी गई यह पुस्तक आर्य जगत् के उपदेशक वर्ग व अन्यों के लिए महत्त्वपूर्ण है। गुरुकुलों के छात्र यदि इन व्याख्यानों को पढ़ समझकर व्याख्यान देने का अभ्यास करेंगे तो वे आगे चलकर उच्चकोटि के वक्ता बन जायेंगे।

दृढ़ जिल्द, सुन्दर आवरण, कागज व छपाई से युक्त यह पुस्तक स्वाध्याय प्रेमी व उपदेशक वर्ग को हर्ष देने वाली होगी। स्वाध्यायशील व वक्ता लोग इस पुस्तक को प्राप्त कर लेखक व प्रकाशक के श्रम को सफल करेंगे, इस आशा के साथ –आचार्य सोमदेव ऋषि उद्यान, अजमेर

যজ্ঞাদি কর্ম অধ্বর অর্থ্যাৎ অহিংসা কর্ম।

মহাভারত কালে এই বৃত্তান্ত এসেছে যে,
“যজ্ঞে হিংসার নিন্দা এবং অহিংসার প্রশংসা”
এই বৃত্তান্ত মহাভারতের শান্তিপর্বের অন্তর্গত ২৭২ অধ্যায়ে এসেছে। এখানে বলা হয়েছে যে, যদি কেউ যজ্ঞের মধ্যে পশু বধ করে, তবে নিশ্চয় তার সমস্ত তপ নষ্ট হয়ে যাবে।
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তস্য তেনানুভাবেন মৃগহিংসাত্মনস্তদা।
তপো মহৎ সমুচ্ছিন্ন তস্মাদহিংসা ন যজ্ঞিয়া।।
অহিংসা সকলো ধর্মাহিংসা ধর্মস্তথাবিধঃ।
সত্যংতেহং প্রবক্ষামি, যো ধর্মঃ সত্যবাদিনাম।।
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এই প্রকরেন মহারাজ যুধিষ্ঠির পিতামহ ভীষ্ম কে জিজ্ঞেস করছেন যে,
ধর্ম তথা সুখের জন্য যজ্ঞ কিভাবে করা উচিত?
ইহার উত্তরে পিতামহ এক তপস্বী ব্রাহ্মন ব্রাহ্মণী দম্পতির বৃত্তান্ত দিয়ে বললেন যে,
সেই তপস্বী ব্রাহ্মণের মহান তপ যজ্ঞের মধ্যে পশুবলি দেবার জন্য এক বণ্য মৃগ বধ করার ইচ্ছা মাত্র সমস্ত বিনষ্ট হয়ে গিয়েছিলো।
এইজন্য যজ্ঞের মধ্যে কখনো হিংসা করা উচিৎ নয়। অহিংসা সার্বত্রিক এবং সর্বকালীন নিত্য ধর্ম।
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এই প্রমাণ দ্বারা জানা যায় যে, মহাভারত কালে পশু হিংসার বিধান ছিলো না।
এমনকি এর পূর্বেও পবিত্র বেদে এ প্রকরন এসেছে-
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রাজসুয়ং বাজপেয়মগ্নিষ্টোমস্ত­দধ্বরঃ।
অকাশ্বমেধাবৃচ্ছিষ্টে জীব বর্হিমমন্দিতমঃ।।
(অথর্ববেদ ১১।৭।৭)
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রাজসূয়, বাজপেয়,অগ্নিষ্টোম, অশ্বমেধ আদি সব যজ্ঞ অধ্বরঃ অর্থাৎ হিংসা রহিত যজ্ঞ। যাহা প্রাণীমাত্রকে বৃদ্ধি এবং সুখ শান্তি দাতা।
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এই মন্ত্রে রাজসূয় আদি সব যজ্ঞকে অধ্বরঃ বলে গিয়েছেন। যার একমাত্র সর্ব্বসম্মত অর্থ হিংসা রহিত যজ্ঞ।
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তাহলে ইহা স্পষ্ট যে, বেদের মধ্যে কোন যজ্ঞে পশুবধের আজ্ঞা নেই। তবুও বেদের নাম নিয়ে যজ্ঞে পশু বধ করা মানে নিজেকে ধোকা দেওয়া এবং নিজের অজ্ঞানতাকে প্রকাশ করা।
আবার ইহা দেখ যে, পশু বধ করে প্রাণীমাত্রের কিরকম বৃদ্ধি হচ্ছে? এবং মানুষ কি রকম সুখ প্রাপ্ত হচ্ছে?
পরন্ত প্রাণীহত্যা করার সময় তার ঘোর যাতনা প্রাপ্ত হয় এবং তার জীবনের সমাপ্তি ঘটে।
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তাহলে দেখা যাচ্ছে যে, ইতিহাসও পশুবলির সমর্থন করে নি। এমন কি বেদও। কিন্তু কিছু মূর্খ যাজ্ঞিক( পৌরাণিক) লোক ” বৈদিকী হিংসা হিংসা ন ভবতি” এর ঢোল পিটিয়ে যজ্ঞে পশুবধ কে অহিংসার সঙ্গা দিয়ে স্বর্গের মার্গ কে প্রশস্ত করার জন্য আপ্রাণ চেষ্টা করে।
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এদের বিচার দেখে মনে যে,নিশ্চয় এরা তাদের বুদ্ধি ঘাসক্ষেতে রেখে এসেছিলেন। নতুবা এরকম অর্থ তারা করতো না।
” বৈদিকী হিংসা হিংসা ন ভবতি” এর অর্থে মনু মহারাজ কি বলেছেন দেখুন-
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যা বেদবিহিতা হিংসা নিয়তাস্মিংশ্চরাচরে।
অহিংসামেব তাং বিদ্যাদ্বেদাদ ধর্মো হি নির্ব্বভৌ।।
যো হিংসকানি ভুতানি হিনস্ত্যান্তসুখেচ্ছয়া।
স জীবংশ্চ মৃতশ্চৈব, নকশ্চিক সুখমেধতে।।
(মনুস্মৃতি ৫।৪৪- ৪৫)
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অর্থাৎ বেদে বিশ্ব সংসার মধ্যে দুষ্ট আততায়ী, ক্রুর পাপীকে দন্ড দান রূপ হিংসা বিহিত আছে তাহা অহিংসাই জানবে। কারন বেদ দ্বারাই যথার্থ ধর্মের প্রকাশ হয়।
কিন্তু ইহার বিপরীতে যে নিরপরাধ,অহিংস প্রাণীকে নিজ সুখ প্রাপ্তির জন্য হত্যা করে সে জীবিত অথবা মৃত এই দুই অবস্থায় কখনোই সুখ পায় না।
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দুষ্টকে দন্ড প্রদান করা হিংসা নয় পরন্ত অহিংসারূপ পূণ্য তাহা মনুস্মৃতি ৮।৩৫১ এ স্পষ্ট আছে-
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” নাততায়িবধে দোষো হন্তুর্ভবতি কশ্চন”
অর্থাৎ আততায়ি ( যে ব্যক্তি বধ উদ্যত) তাহাকে বধ করিলে কোন দোষ নেই।

তাহলে উপরিউক্ত আলোচনা থেকে স্পষ্ট হয় যে যজ্ঞে পশু বধ নিষিদ্ধ। যে বেদ পশু পালনের সুস্পষ্ট নির্দেশ দেয়। সে বেদ পশু হত্যার বিধান কি করে দিতে পারে?

আধ্যাত্মবাদ

আত্মা কি? পরমাত্মা কি? এই দুইয়ের মাঝে সমন্ধ কি? এই বিষয়ের নাম আধ্যাত্মাবাদ।
আত্মা ও পরমাত্মা এই দুই বস্তু কোন ভৌতিক পদার্থ নয়। ইহা চর্ম চক্ষু দ্বারা দর্শন করা যায় না,কর্ণ দ্বারা শ্রবন করা যায় না, ইহা নাসিকার ঘ্রান থেকে মুক্ত,জিহ্বাগ্র দ্বারা আস্বাদন নেওয়া যায় না। ইহা ধরা ছোঁয়ার বাহিরে।
পরমাত্মা এক তিনি একাধিক নন। ব্রহ্মা, বিষ্ণু, মহেশ একই পরমাত্মার বিভিন্ন নাম।
(একং সদ্ বিপ্রা বহুধা বদন্তি)ঋগ্বেদ ১/১৬৪/৪৬ অথ্যাৎ একই পরমাত্মাকে বিদ্বান ব্যাক্তিগন বিভিন্ন নামে ডেকে থাকেন।
সংসারে জীবধারী প্রাণী অনন্ত। সেজন্য জীবাত্মা ও অনন্ত।

ন্যায়দর্শন অনুসারে জ্ঞান,প্রযত্ন, ইচ্ছা,দ্বেষ,সুখ,দু:খ এই ছয় গুন আত্মার মধ্যে অবস্তিত। জ্ঞান আর প্রযত্ন আত্মার স্বাভাবিক গুন, বাকি চার গুন আত্মা শরীর ধারণে লাভ করে। আত্মার উপস্থিতির কারণে এই শরীর প্রকাশিত। আত্মা ত্যাগ করতে সেই শরীর অপবিত্র,ও অপ্রকাশিত। এই সংসারও পরমাত্ম প্রাপ্তির সেই বিশেষ জ্ঞানের জন্য প্রকাশিত। আত্মা ও পরমাত্মা এই দুই বস্তুই অজন্মা,অনাদি অনন্ত। ইহা কখনো জন্মগ্রহণ করেন না, মৃতও হন না। আত্মকে কেউ সৃষ্টি করতে পারে না, আত্মা পরমাত্মার অংশ নয়। আত্মা ও পরমাত্মা ইহা দুইটি আলাদা ও সতন্ত্র সত্তা। আত্মা অনু স্বরুপ সুতরাং অনেক ছোট, আর পরমাত্মা সর্ব্ব্যপক। আত্মার জ্ঞান সীমিত, আর পরমাত্মা সর্বজ্ঞ। তিনি সবকিছুর জানতা, সব বিষয়ে তিনি জ্ঞাত। তিনি অন্তর্যামী তাই সকলের মনের অবস্থা জানেন। আত্মার শক্তি সীমিত পরন্তু পরমাত্মা সর্বশক্তিমান। সৃষ্টি, স্থিতি, প্রলয় সবকিছু পরমাত্মার ইচ্ছানুসারে হয়। পীর,পৈগম্বর,অবতার, এজেন্ট, দালাল ইত্যাদি তিনি রাখেন না, রাখার প্রয়োজন নেই,কারণ তিনি সর্বশক্তিমান। তার কার্য সম্পাদনের জন্য অবতার বা দালালের প্রয়োজন নেই। তিনি সব কাজ নিজ অন্তর থেকে সমাধান করেন। তার বাহিরে কিছু নেই। ঈশ্বর যা কিছু করেন না কেন তাহা হাত, পা দিয়ে করেন না,কারণ তিনি লিঙ্গশরীর মুক্ত,অশরীরি।
তিনি ইচ্ছা মাত্র সব কিছু করেন। ঈশ্বর আনন্দ স্বরুপ, তিনি রাগ,দ্বেষ থেকে মুক্ত। কাম,ক্রোধ,লোভ,মোহ, অহংকার তাকে লিপ্ত করতে পারে না। জ্ঞানিগন আনন্দস্বরুপ ঈশ্বরের উপাসনা করে আনন্দ প্রাপ্ত হন। ঈশ্বর সাকার নিরাকার এর অতীত কোন বস্তু। শুদ্ধ মন দ্বারা তাকে জানা সম্ভব। যেমনি ভাবে আমরা সুখ,দুঃখ মন দিয়ে অনুভব করি।
আত্মা যখন শরীর প্রাপ্ত হয় তখন সে সতন্ত্র ভাবে কার্য করে।দেহান্তে সেই কর্ম অনুসারে পরমাত্মা তাকে সুখ,দুঃখ তথা অন্য জন্ম প্রদান করে। পরবর্তী জন্মে সে স্বভাব অনুযায়ী কর্ম করে। যদি সে শরীর অবস্থায় আত্মা মন্দ কর্ম করে থাকে তাহলে সে নিম্ন যোনী প্রাপ্ত হয়। তখন তার মাঝে ভালো মন্দের বিচার থাকে না। নিম্ন যোনী প্রাপ্ত জীব ভোগ বিলাসে মত্ত থাকে।
কিন্তু মানব যোনীতে ভোগ আর কর্ম দুটোরেই মিশ্রন। । এই যোনীতে ভালো মন্দের বিচার সম্ভব এবং ঈশ্বর ভজনার উত্তম স্থান।
আমি আত্মা, শরীর নই। এই শরীর রুপ সংসার থেকে আত্মা ঈশ্বর ভজন করে ও সুখ দুঃখাদি ভোগ করে।

জীবাত্মা নয় স্ত্রী, নয় পুরুষ আর নয় নপুংসক। ইহা পূর্বজন্মে যেমন যেমন কর্ম করে, তেমন শরীর প্রাপ্ত হয় পরবর্তী জন্মে। (শ্বেতাশ্বতর উপনিষদ্)
বর্তমানে মানুষ যেভাবে ধুপ,ধুনা, গন্ধ,খাবার,পশুবলি ইত্যাদি দিয়ে পূজা করেন সেটাকে পূজা বলা যায় না।
প্রকৃত পূজা হলো নিজ আত্মাকে পূর্ণ রুপে জাগরন করা। ঈশ্বরে আজ্ঞা পালন করা আর সত্য ও ন্যায়ের আচরন করা ইহাই ঈশ্বরের পূজা।

উপনিষদে মানুষের শরীর কে রথের সাথে তুলনা করা হয়েছে। আত্মা হচ্ছে সেই রথের মালিক, বুদ্ধি সারথি, মন লাগাম,ইন্দ্রিয় গুলো হলো অশ্বসমুহ। রথের সারথি যদি উত্তম না হন ঠিক ভাবে যদি লাগাম না ধরেন তাহলে অশ্বসমুহ বিপথে ধাবিত হয়। ঠিক তেমনি মনরুপ লাগাম সংযত না হলে ইন্দ্রিয় সমুহ বিপথে ধাবিত হয়,ঈশ্বর কে জানতে পারে না। তাই শুদ্ধ মনে ঈশ্বরের উপাসনা করতে হয়।
পরমাত্মা আমাদের মাতা,পিতা,মিত্র। তাই তার কাছে আমরা প্রার্থনা করব তিনি সকল প্রাণী কে সৎমার্গে প্রেরণ করুক।
ওম্ শান্তিঃ শান্তিঃ শান্তিঃ।
কৃষ্ণচন্দ্রগর্গজীর হিন্দি আর্টিকেল থেকে বাংলা অনুবাদ by বিকাশ মজুমদার