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ब्रह्मा : इब्राहीम : कुरान : बाइबिल: – पं. शान्तिप्रकाश

विधर्मियों की ओर से आर्य हिन्दू जाति को भ्रमित करने के लिये नया-नया साहित्य छप रहा है। पुस्तक मेला दिल्ली में भी एक पुस्तिका के प्रचार की सभा को सूचना मिली है। सभा से उत्तर देने की माँग हो रही है। ‘ज्ञान घोटाला’ पुस्तक के साथ ही श्रद्धेय पं. शान्तिप्रकाश जी का यह विचारोत्तेजक लेख भी प्रकाशित कर दिया जायेगा। पाठक प्रतिक्षा करें। पण्डित जी के इस लेख को प्रकाशित करते हुए सभा गौरवान्वित हो रही है। – राजेन्द्र ‘जिज्ञासु’

हमारे शास्त्र ब्रह्मा को संसार का प्रथम गुरु मानते हैं। जैसा कि उपनिषदों में लिखा है कि

यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै।

परमात्मा ब्रह्मा को पूर्ण बनाता और उसके लिये (चार ऋषियों द्वारा) वेदों का ज्ञान देता है। अन्यत्र शतपथादि में भी अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा पर ऋग्यजु: साम और अथर्व का आना लिखा है। सायण ने अपने ‘ऋग्वेदोपोद्घात’ में इन चार ऋषियों पर उन्हीं चार वेदों का आना स्वीकार किया है। वेदों में वेदों को किसी एक व्यक्ति पर प्रकट होना स्वीकार नहीं किया। देखिये-

यज्ञेन वाच: पदवीयमायन्तामन्वविन्दनृषिषु प्रविष्टाम्।

– ऋ. मण्डल १०

इस मन्त्र में ‘वाच:’ वेदवाणियों के लिये बहुवचन है तथा ‘ऋषिषु प्रविष्टाम्’ ऋषियों के लिये भी बहुवचन आया है।

चार वेद और चार ऋषि- ‘चत्वारि वाक् परिमिता पदानि’ चार वेद वाणियाँ हंै, जिनके अक्षर पदादि नपे-तुले हैं। अत: उनमें परिवर्तन हो सकना असम्भव है, क्योंकि यह ईश्वर की रचना है।

देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति।

– अथर्व. १०

परमेश्वर देव के काव्य को देख, जो न मरता है और पुराना होता है। सनातन ईश्वर का ज्ञान भी सनातन है। शाश्वत है।

अपूर्वेणेषिता वाचस्ता वदन्ति यथायथम्।

– अथर्व. १०-७-१४

संसार में प्रथम उत्पन्न हुए ऋषि लोग ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद तथा पृथ्वी के वैज्ञानिक रहस्यों को प्रकट करने में समर्थ अथर्ववेद का प्रकाश ईश प्रेरणा से करते हैं।

प्रेणा तदेषां निहितं गुहावि:।। – ऋ. १०-७१-१

इन ऋषियों की आत्म बुद्धि रूपी गुहा में निहित वेद-ज्ञान-राशि ईश प्रेरणा से प्रकट होती है। इस प्रसिद्ध मन्त्र में भी ऋषियों के लिए ‘एषां’ का प्रयोग बहुवचनान्त है।

अत: उपनिषद् के प्रथम प्रमाण का अभिप्राय यह हुआ कि ब्रह्मा के लिये वेदों का ज्ञान ऋषियों द्वारा प्राप्त हुआ, वह स्पष्ट है।

अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा ने चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान जिन ऋषियों को दिया, उसमें ब्रह्मा ने सबसे प्रथम मनुष्यों में वेद-धर्म का प्रचार किया और धर्म की व्यवस्था तथा यज्ञों का प्रचलन किया। अत: ब्रह्माजी संसार के सबसे पहले संस्थापक गुरु माने जाने लगे। क्योंकि वेद में ही लिखा है कि-

ब्रह्मा देवानां पदवी:। – ऋग्वेद ९-९६-६

-ब्रह्मा विद्वानों की पदवी है। बड़े-बड़े यज्ञों में चार विद्वान् मन्त्र-प्रसारण का कार्य करते हैं। उनमें होता, उद्गाता, अध्वर्यु और ब्रह्मा अपने-अपने वेदों का पाठ करते हुए ब्रह्मा की व्यवस्था में ही कार्य करते हैं, यह प्राचीन आर्य मर्यादा इस मन्त्र के आधार पर है-

ऋचां त्व: पोषमास्ते पुपुष्वान्

गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु।

ब्रह्मा त्वो वदति जातिवद्यां

यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उत्व:। – ऋग्. १०-७१-११

ऋग्वेद की ऋचाओं की पुष्टि होता, सामकी, शक्तिदात्री ऋचाओं की स्तुति उद्गाता, यजु मन्त्रों द्वारा यज्ञमात्रा का अवधारण अध्वर्यु द्वारा होता है और यज्ञ की सारी व्यवस्था तथा यज्ञ कराने वाले होतादि पर नियन्त्रण ब्रह्मा करता है।

मनु-धर्मशास्त्र में तो स्पष्ट वर्णन है-

अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम्।

दुदोह यज्ञ सिद्धयर्थमृग्यजु: सामलक्षणम्।

-मनु. १/२३

-ब्रह्माजी ने अग्नि, वायु, आदित्य ऋषियों से यज्ञ सिद्धि के लिये ऋग्यजु:साम का दोहन किया।

मनु के इस प्रमाण में अथर्ववेद का उल्लेख इसलिये नहीं किया गया कि यज्ञ सिद्धि में अथर्ववेद तो ब्रह्मा जी का अपना वेद है।

वेदत्रयी क्यों- जहाँ-जहाँ यज्ञ का वर्णन होगा, वहाँ-वहाँ तीन वेदों का वर्णन होगा तथा चारों वेदों का विभाजन छन्दों की दृष्टि से भी ऋग्यजुसाम के नाम से पद्यात्मक, गद्यात्मक और गीतात्मक किया गया है। अत: ज्ञानकर्मोपासना-विज्ञान की दृष्टि से वेद चार और छन्दों की दृष्टि से वेद-त्रयी का दो प्रकार का विभाजन है। कुछ भी हो वेद, शास्त्र, उपनिषद् तथा इतिहास के ग्रन्थों में ब्रह्मा को प्रथम वेद-प्रचारक, संसार का अगुवा या पेशवा के नाम से प्रख्यात माना गया है।

यहूदी, ईसाई और मुसलमान संस्कार-वशात् मानते चले आए हैं, जैसा कि उनकी पुस्तकों से प्रकट है।

कुर्बानी का अर्थ- ब्रह्मा यज्ञ का नेता अगुआ या पेशवा है। यज्ञ सबका महोपकारक होने से देवपूजा, संगतिकरण दानार्थक प्रसिद्ध है। इसी को सबसे बड़ा त्याग और कुर्बानी माना गया है। किन्तु वाममार्ग प्रचलित होने पर महाभारत युद्ध के पश्चात् पशु-यज्ञों का प्रचलन भी अधिक-से-अधिक होता चला गया। इससे पूर्व न कोई मांस खाता और न यज्ञों के नाम से कुर्बानी होती थी।

बाईबल के अनुसार भी हजरत नूह से पूर्व मांस खाने का प्रचलन नहीं था, जैसा कि वाचटावर बाईबल एण्ड टे्रक्स सोसायटी ऑफ न्यूयार्क की पुस्तक ‘दी ट्रुथ वेट सीड्स ईटनैल लाईक’ में लिखा है।

यहूदियों और ईसाईयों के अनुसार मांस की कुर्बानी खूदा के नाम से नूह के तूफान के साथ शुरु हुई है। तब इसको हजरत इब्राहीम के नाम से शुरू किया गया कि इब्राहीम ने खुदा के लिये अपने लडक़े की कुर्बानी की, किन्तु खुदा ने लडक़े के स्थान पर स्वर्ग से दुम्बा भेजा, जिसकी कुर्बानी दी गई। स्वर्ग से दुम्बा लाने की बात कमसुलम्बिया में लिखी है।

यहूदी कहते हैं कि हजरत इब्राहीम ने इसहाक की कुर्बानी की थी, जो मुसलमानों के विचार से हजरत इब्राहीम की पत्नी एरा से उत्पन्न हुआ था। किन्तु मुसलमानों का विश्वास है कि हजरत इब्राहीम की दासी हाजरा से उत्पन्न हुए हजरत इस्माईल की कुर्बानी दी गयी थी, जिसके बदले में जिब्राइल ने बहिश्त से दुम्बा लाकर कुर्बानी की रस्म पूरी कराई।

इसलिये मुसलमान भी हजरत इब्राहीम की स्मृति में पशुओं की कुर्बानी देना अपना धार्मिक कत्र्तव्य समझते हैं। परन्तु भूमि के पशुओं की कुर्बानी की आवश्यकता खुदा को होती तो बहिश्त से दुम्बा भेजने की आवश्यकता न पड़ती। दुम्बा तो यहीं धरती पर मिल जाता।

बाईबल के अनुसार तो पशुबलि की प्रथा हजरत इब्राहीम के बहुत पहले नूह के युग में आरम्भ हुई है। जैसा कि पीछे ‘वाच एण्ट टावर’ का प्रमाण दिया जा चुका है। किन्तु वास्तव में ब्रह्मा मनु से पूर्व हुए हैं। मनु को ही नूह माना जाता है।

ब्रह्मा ही इब्राहीम- हाफिज अताउल्ला साहब बरेलवी अनुसार हजरत इब्राहीम तो ब्रह्मा जी का ही नाम है, क्योंकि वेदों में ब्रह्मा और सरस्वती, बाईबिल में इब्राहम हैं और सर: तथा इस्लाम में इब्राहीम सर: यह वैयक्तिक नाम हैं, जो समय पाकर रूपान्तरित हो गये। सर: सरस्वती का संक्षेप है। आर्य-जाति में वती बोलना, न बोलना अपनी इच्छा पर निर्भर है जैसा कि पद्मावती की पद्मा और सरस्वती को सर: (य सरस) बोला जाता है, जो शुद्ध में संस्कृत का शब्द है। सरस्वती शब्द वेदों में कई बार आया है। जैसे-

चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनां।

यज्ञं दधे सरस्वती। – ऋ. १-३-११

सत्य-वक्ता, धर्मात्मा-द्विज, ज्ञानयुक्त लोगों को धर्म की प्रेरणा करती हुई, परोक्ष पर विश्वास रखने वाले सुमतिमान् लोगों को शुभ मार्ग बताती हुई, सरस्वती-वेद वाणी यज्ञो (पंच महायज्ञादि) प्रस्थापना करती है।

अत: स्पष्ट है कि सरस्वती वेद-वाणी को कहते हैं और ब्रह्मा चार वेद का वक्ता होने से ही पौराणिकों में चतुर्मुख प्रसिद्ध हो गया है।

चत्वारो वेदा मुखे यस्येति चतुर्मुख:।

लुप्त बहुब्रीहि समास का यह एक अच्छा उदाहरण है। चारों वेद जिसके मुख में अर्थात् कण्ठस्थ हंै। चारों वेदों में निपुण विद्वान् का नाम ही ब्रह्मा है। ब्रह्मा विद्वानों की एक उच्च पदवी है जो सृष्टि के आरम्भ से अब तक चली आ रही है और जब तक संसार है, यह पदवी मानी जाती रहेगी। अनेकानेक ब्रह्मा संसार में हुए हैं और होंगे।

अब भी यज्ञ का प्रबन्धक ब्रह्मा कहलाता है। ब्रह्मा का वेदपाठ और यज्ञ के साथ विशेष सम्बन्ध है। वेदवाणी को सरस्वती कहा गया है।

यहूदी, ईसाई और मुसलिम मतों में सरस्वती का सर: और ब्रह्मा का इब्राम बन इब्राहीम हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है।

काबा-यज्ञस्थली- ब्रह्मा यज्ञ का आदि प्रवर्तक है। वेद, कुरान और बाईबल इसमें एक मत है। यज्ञशाला चौकोर बनाई जाती है। इसीलिये मक्का में काबा भी चौकोर है, जो इब्राहीम ने बनवाया था। यह यज्ञीय स्थान है। यज्ञ में एक वस्त्र जो सिला न हो, पहनने की प्राचीन प्रथा है। मुसलमानों ने मक्का के हज्ज में इस प्रथा को स्थिर रखा हुआ है। यज्ञ को वेद में अध्वर कहा गया है।

ध्वरति हिंसाकर्म तत्प्रतिषेध:।

अध्वर का अर्थ है, जिसमें हिंसा न की जाय। इसलिये मुसलमान हाजी हज्ज के लिये एहराम बांध लेने के पश्चात् हिंसा करना महापाप मानते हैं।

वैदिक धर्मियों में वाममार्ग युग में हिंसा का प्रचलन हुआ। वाममार्ग के पश्चात् ही वैदिक-धर्म का ह्रास होकर बौद्ध, जैन, यहूदी, ईसाई, इस्लाम आदि मतों का प्रचलन हुआ है। यज्ञों में पशु हत्या और कुर्बानी में पशु बलि की प्रथा भी वाममार्ग=उल्टा मार्ग- ही माना गया है, जो वास्तव में सच्चे यज्ञों अथवा सच्ची कुर्बानी का मार्ग नहीं है।

नमस्=नमाज- आर्यों के पाँच यज्ञों में नमस्कार का प्रयोग हुआ, नमाज नमस् का रूपान्तर है। पाँच नमाज तथा पाँच इस्लाम के अकान पंचयज्ञों के स्थानापन्न हंै:-

कुरान में पंचयज्ञ- १. ब्रह्म यज्ञ- दो समय सन्ध्या- नमाज तथा रोजा कुरान के हाशिया पर लिखा है कि पहिले दो समय नमाज का प्रचलन था। देखो फुर्कान आयत ५

२. देव यज्ञ- हज्ज तथा जकात या दान पुण्य।

३. बलिवैश्वदेवयज्ञ- कुर्बानी पशुओं की नहीं, किन्तु पशु-पक्षी, दरिद्रादि को बलि अर्थात् भेंट देना ही सच्ची कुर्बानी है। धर्म के लिये जीवन दान महाबलिदान है।

४-५. पितृ यज्ञ तथा अतिथि यज्ञ- इस प्रकार आर्यों के पंच यज्ञ और इस्लाम के पाँच अरकानों का कुछ तो मेल है ही। इस्लाम के पाँच अरकार नमाज, जकात, रोजा, हज्ज और कुर्बानी हैं।

कुर्बानी शब्द कुर्व से निकला, जिसके अर्थ समीप होना अर्थात् ईश्वरीय गुणों को धारण कर ईश्वर का सान्निध्य प्राप्त करना है, इन अर्थों में पशु हत्या तो हिन्दुओं के पशुयज्ञ की भाँति विकृति का परिणाम मात्र है। वेदों में यज्ञ को अध्वर कहा है, जिसका अर्थ है- हिंसारहित शुभकर्म इसी प्रकार कुर्बानी शब्द में भी हिंसा की भावना विद्यमान नहीं।

ब्रह्मा ने वेदों के आधार पर यज्ञों का प्रचलन किया तथा यज्ञों में सबसे बड़े विद्वान् को आर्यों में ब्रह्मा की पदवी से विभूषित किया जाता है। अत: ब्रह्मा शब्द रूढि़वादी नहीं। अनेक ब्रह्मा हुए हैं और होंगे भी। किसी समय फिलस्तीन में ब्रह्मा को इब्राम और अरब देशों में इब्राम का इब्राहीम शब्द रूढ़ हो गया।

वैदिक-ज्ञान को वेद में सरस्वती कहा है, लोक में पद्मावती को केवल पद्मा सरस्वती को केवल सर: कहने की प्रथा का उल्लेख कर चुके हैं। अत: पुराणों में ब्रह्मा और सरस्वती तथा सर: एवं इस्लाम में भी इब्राहीम और सर: शब्दों का प्रचलन होने से सिद्ध होता है कि दोनों शब्द वेदों के अपभ्रंश मात्र होकर इन मतों में विद्यमान हैं।

कुरान शरीफ में लिखा है कि हजरत साहिब फरमाते हैं-

१. लोग कहते हैं कि यहूदी या ईसाई हो जाओ, किन्तु में तो इब्राहीम के धर्म को मानता हूँ, जो एक तरफ का था और मूर्ति-पूजक न था। परमात्मा का सच्चा उपासक था। -सूरा: वकर आयत १३५

२. ईश्वर ने ब्रह्माहीम संसार का इमाम= [धर्म का नेता] बनाया। सूरा बर, आयत १२४

३. ऐ लोगो! इब्राहीम के सम्बन्ध में क्यों झगड़ते हो और इब्राहीम पर तौरेत व इन्जील नहीं उतरी, किन्तु यह तौरेत व इन्जील तो उनके बहुत पीछे की हैं। पर तुम समझदारी क्यों नहीं करते।

इबराहीम न यहूदी था, न ईसाई, किन्तु एक ओर का मुस्लिम था वा मुशरिक मूर्ति-पूजक न था अनेक-ईश्वरवादी भी न था- अल इमरान, आयत ६४.६६

उस इब्राहीम के धर्म को मानो जो एक निराकार का उपासक था और मूर्ति-पूजक न था। -अल, इमरान, आयत ९४

कुरान शरीफ में हिजरत इब्राहीम के यज्ञ मण्डप का नाम काबा शरीफ रखा है। काबा चौकाने यज्ञशाला की भाँति होने से भी प्रमाणित है कि किसी युग में यह अरब के लोगों का यज्ञीय स्थान था, जहाँ हिंसा करना निषिद्ध था, जिसकी परिक्रमा भी होती थी और उपासना करने वालों के लिये उसे हर समय पवित्र रखा जाता था। इसकी आधारशिला इब्राहीम और इस्माईल ने रखी थी। देखो- सूरा बकर, आयत १२५ से १२७

कुरान शरीफ में स्पष्ट लिखा है कि कुर्बानी आग से होती थी। अल इमरान आयत १, २, खूदा की सुन्नत कभी तबदील नहीं होती। सूरा फतह, आयत २४

मूसा को पैगम्बरी आग से मिली। जहाँ जूती पहन के नहीं जाया जाता। सूरा त्वाह, आयत ११-१३

खुदा को कुर्बानी में पशु मांस और रक्त स्वीकार्य नहीं। खुदा तो मनुष्यों से तकवा अर्थात् पशु-जगत् पर दया-परहेजगारी-शुभाचार-सदाचार स्व्ीकारता है। सूरा हज्ज, आयत १७

‘‘हज्ज और अमरा आवश्यक कर लेना एहराम हैं। एहराम यह कि नीयत करे आरम्भ करने की और वाणी से कहे लव्वैक। पुन: जब एहराम में प्रविष्ट हुआ तो स्त्री-पुरुष समागम से पृथक् रहें। पापों और पारस्परिक झगड़ों से पृथक् रहें। बाल उतरवाने, नाखून कटवाने, सुगन्ध लेप तथा शिकार करने से पृथक् रहें। पुरुष शरीर पर सिले वस्त्र न पहिने, सिर न ढके। स्त्री वस्त्र पहिने, सिर ढके, किन्तु मुख पर वस्त्र न डाले। -मौजुहुल्कुरान, सूरा बकर, आयत १९७’’

इस समस्त प्रमाण भाग का ही यही एक अभिप्राय है कि हज्ज में हिंसा की गुंजाइश नहीं। कुर्बानी – कुर्वे खुदा अर्थात् ईश्वरीय सन्निध्य प्राप्ति का नाम हुआ। अत: कुरान-शरीफ में पशुओं की कुर्बानी की मुख्यता नहीं है। ऐसा कहीं नहीं लिखा कि जो पशुहत्या न करे, वह पापी है। हाँ, यह तो लिखा है कि खुदा को पशुओं पर दया करना ही पसन्द है, क्योंकि वह खून का प्यासा नहीं और मांस का भूखा नहीं। -सूरा जारितात, आयत ५६-५८

कुछ स्थानों पर मांस खाने का वर्णन है, किन्तु वह मोहकमात=पक्की आयतें न होकर मुतशावियात=संदिग्ध हैं अथवा उनकी व्याख्या यह है कि आपत्ति काल में केवल जीवन धारण के लिये अत्यन्त अल्प-मात्रा में प्रयुक्त करने का विधान है। देखो-सूरा बकर, आयत १७३

अत: मुस्लिम संसार से प्रार्थना है कि कुरान शरीफ में मांस न खाना पाप नहीं है। खाना सन्दिग्ध कर्म और त्याज्य होने से निरामिष होने में ही भलाई है, यही दीने- इब्राहीम और ब्रह्मा का धर्म है, जिस पर चलने के लिये कुरान शरीफ में बल दिया है।

इसी आधार पर आर्य मुस्लिम एकता तो होगी ही, किन्तु राष्ट्र में हिन्दू मुसलमानों के एक कौम होने का मार्ग भी प्रशस्त हो जायेगा। परमात्मा करे कि ऐसा ही हो।

रक्तसाक्षी पंडित लेखराम “आर्य मुसाफिर”

जन्म– आठ चैत्र विक्रम संवत् १९१५ को ग्राम सैदपुर जिला झेलम पश्चिमी पंजाब |
पिता का प.तारासिंह व माता का नाम भागभरी(भरे भाग्यवाली]) था | १८५० से १८६० ई. एक एक दशाब्दि में भारत मेंकई नर नामी वीर, जननायक नेता व विद्वान पैदा हुए | यहाँ ये बताना हमारा कर्त्तव्य है कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम के हुतात्मा खुशीरामजी का जन्म भी सैदपुर में ही हुआ था | वे भी बड़े दृढ़ आर्यसमाजी थे | आर्यसमाज के विख्यात दानी लाला दीवानचंदजी इसी ग्राम में जन्मे थे | पण्डितजी के दादा का पं.नारायण सिंह था | आप महाराजा रणजीतसिंह की सेना के एक प्रसिद्द योध्या थे |
आर्यसमाज में पण्डितजी का स्थान बहुत ऊँचा है | धर्मरक्षा के लिए इस्लाम के नाम पर एक मिर्जाई की छूरी से वीरगति पाने वाली प्रथम विभूति पं.लेखराम ही थे | आपने मिडिल तक उर्दू फ़ारसी की शिक्षा अपने ग्राम में व पेशावर में प्राप्त की | फ़ारमुग़लकाल के बाद सी के सभी प्रमाणिक साहित्यिक ग्रन्थों को छोटी सी आयु में पढ़ डाला | अपने चाचा पं.गण्डाराम के प्रभाव में पुलिस में भर्ती हो गए | आप मत, पन्थो का अध्ययन करते रहे | प्रसिद्द सुधारक मुंशी कन्हैयालाल जी के पत्र नीतिप्रकाश से महर्षि दयानन्द की जानकारी पाकर ऋषि दर्शन के अजमेर गए | १७ मई १८८१ को अजमेर में ऋषि के प्रथम व अंतिम दर्शन किये, शंका-समाधान किया | उपदेश सुने और सदैव के लिए वैदिक-धर्म के हो गए |

सत्यनिष्ठ धर्मवीर, वीर विप्र लेखरामजी का चरित्र सब मानवों के लिए बड़ा प्रेरणादायी है | इस युग में विधर्मियों की शुद्धि के लिए सबसे अधिक उत्साह दिखाने वाले पं.लेखराम ही थे, इस कार्य के लिए उन्होंने अपना जीवन दे दिया| आज हिन्दू समाज उनके पुनीत कार्य को अपना रहा है | परन्तु खेद की बात है कि आर्यसमाज मन्दिरों के अतिरिक्त किसी हिन्दू के घर या संघठन में पण्डितजी का चित्र नही मिलता | आर्यों की संतान इन हिन्दुओं को नही भूलना चाहिए कि विदेशी शासकों के पोषक व प्रबल समर्थक इन्हीं मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने अपनी एक पुस्तक में हिन्दुओं को “सैदे करीब” लिखा था | इसका अर्थ है कि हिन्दू तो मुसलमानों की पकड़ में शीघ्र आनेवाला शिकार है |

पण्डितजी अडिग ईश्वरविश्वासी, महान मनीषी, स्पष्ट वक्ता, आदर्श धर्म-प्रचारक, त्यागी तपस्वी, लेखक, गवेषक, और बड़े पवित्र आत्मा थे | एक बार पण्डितजी ने आर्यसमाज पेशावर के मंत्री श्री बाबू सुर्जनमल के साथ अफगानिस्तान में ईसाई मत के प्रचारक पादरी जोक्स से पेशावर छावनी में भेंट की | पादरी महोदय ने कहा कि बाइबिल में ईश्वर को पिता कहा गया है | ऐसी उत्तम शिक्षा अन्यत्र किसी ग्रन्थ में नहीं है | पण्डितजी ने कहा “ऐसी बात नही है | वेद और प्राचीन आर्य ऋषियों की बात तो छोड़िये अभी कुछ सौ वर्ष पहले नानकदेव जी महाराज ने भी बाइबिल से बढ़कर शिक्षा दी है| पादरी ने पूछा कहाँ है ?? पण्डितजी ने कहा देखिये—

तुम मात पिता हम बालक तेरे |
तुमरी किरपा सुख घनेरे || “

यहाँ ईश्वर को पिता ही नही माता भी कहा गया है| ये शिक्षा तो बाइबिल की शिक्षा से भी बढ़कर है| माता का प्रेम पिता के प्रेम से कहीं अधिक होता है | इसीलिए ईसा मसीह को युसूफ पुत्र न
कहकर इबने मरियम (मरियम पुत्र) कहा जाता है | ये सुनकर पादरी महोदय ने चुप्पी साध ली | इसी प्रकार अजमेर में पादरी ग्रे(Grey) ने भी इसी प्रकार का प्रश्न उठाया तब पण्डितजी ने यजुर्वेद
मंत्र संख्या ३२/१० का प्रमाण देकर उनकी भी बोलती बंद कर दी थी |

रोपड़ के पादरी पी सी उप्पल ने एक राजपूत युवक को बहला-फुसलाकर ईसाई बना लिया, पण्डितजी को सुचना मिली तो वे रोपड़ पहुंचे, तब तक रोपड़ के दीनबंधु सोमनाथजी ने उसे शुद्ध कर लिया था | पण्डितजी ने रोपड़ पहुंचकर मंडी में लगातार कई दिन तक बाइबिल पर व्याख्यान दिए | पादरी उप्पल को लिखित व मौखिक शास्त्रार्थ के लिए निमंत्रण दिया | उप्पल महोदय ने चुप्पी साध ली | घटना अप्रैल १८९५ की है |

मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने ‘सत बचन’ नाम से एक पुस्तक छापी | उसमें यह सिद्ध करने का यत्न किया कि बाबा नानकदेवजी पक्के मुसलमान थे | इस पुस्तक के छपने पर सिखों मरण बड़ी हलचल
मची | तब प्रतिष्ठित सिखों ने पण्डितजी से निवेदन किया वे इसका उत्तर दें | उस समय पण्डितजी के सिवा दूसरा व्यक्ति इसका उत्तर देने वाला सूझता भी नही था | बलिदान से पूर्व इस विषय पर एक ओजस्वी व खोजपूर्णव्याख्यान देकर मिर्ज़ा साहेब की पुस्तक का युक्ति व प्रमाणों से प्रतिवाद किया| भारी संख्या में सिख उन्हें सुनने आये, सेना के सिख जवान भी बहुत बड़ी संख्या में वहां उपस्थित थे | आपके व्याख्यान के पश्चात् सेना के वीर सिख जवानों ने पण्डितजी को ऐसे उठा लिया जैसे पहलवान को विजयी होने पर उसके शिष्य उठा लेते हों |

पं.लेखरामजी धर्म रक्षा के लिए संकटों, आपत्तियों और विपत्तियों का सामना किया | उनके व्यवहार से ऐसा लगता है कि मानों बड़े से बड़े संकट को भी वो कोई महत्व नही देते थे | उनके पिताजी की मृत्यु हुई तो भी वे घर में न रुक सके | बस गए और चल पड़े | उन्हें भाई की मृत्यु की सूचना प्रचार-यात्रा में ही मिली, फिर भी प्रचार में ही लगे रहे | एक कार्यक्रम के पश्चात् दुसरे और दुसरे के पश्चात् तीसरे में| इकलौते पुत्र की मृत्यु से भी विचलित न हुए | पत्नी को परिवार में छोड़कर फिर चल पड़े | दिन रात एक ही धुन थी कि वैदिक धर्म का प्रचार सर्वत्र करूँ |

पंडित लेखराम तो जैसे साक्षात् मृत्यु को ललकारते थे| कादियां का मिर्ज़ा गुलाम अहमद स्वयं को नबी पैगम्बर घोषित कर रहा था और पण्डितजी को मौत की धमकियाँ दे रहा था | उसने श्रीराम पर
श्रीकृष्ण पर, गौ पर, माता कौशल्या पर, नामधारी गुरु रामसिंह पर, महर्षि दयानन्द, वेद और उपनिषद इत्यादि सब गन्दे-गन्दे प्रहार किये | उसने श्रीकृष्ण महाराज को तो सुअर मारने वाला लिखा |
पर यहाँ पं.लेखराम धर्म पर उसके प्रत्येक वार का उत्तर देते थे | जब पण्डितजी सामने आते तो खुद को शिकारी कहने वाला बिल में छुप जाता | अपने बलिदान से एक वर्ष पूर्व पण्डितजी लाहौर रेलवे स्टेशन के पास एक मस्जिद में पहुंचे, उन्हें पता चला कि मिर्ज़ाजी वहां आये हैं | मिर्ज़ा उनकी हत्या के षड्यंत्रों में लगा था| जाते ही मिर्ज़ा को नमस्ते करके सच और झूठ का निर्णय करने का निमंत्रण दे दिया | विचार करिए जिस व्यक्ति से मृत्यु लुकती-छिपती थी और नर नाहर लेखराम मौत को गली-गली खोजता फिरता था | मौत को ललकारता हुआ लेखराम मिर्ज़ा के घर तक पहुंचा|
कादियां भी मिर्ज़ा के इलहामी कोठे में जाकर उसे ललकारा | आत्मा की अमरता के सिद्धांत को मानकर मौत के दांत खट्टे करने लेखराम जैसे महात्मा विरले होते हैं |

पण्डितजी ने हिन्दू-जाति की रक्षा के लिए क्या नही किया ?? स्यालकोट में सेना के दो सिख जवान मुसलमान बनने लगे | जब सिख विद्वानों के समझाने पर भी वे नही टेल तप सिंघसभा वालों ने
आर्यसमाजियों से कहा पं.लेखराम को शीघ्र बुलाओ | पण्डितजी आये | उन युवकों का शंका-समाधान किया, शास्त्रार्थ हुआ और वे मुसलमान बनने से बचा लिए गए | जम्मू में कोई ठाकुरदास मुसलमान होने लगा तो पण्डितजी ने जाकर उसे बचाया | एल लाला हरजस राय मुसलमान हो गए | ये प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे थे | फारसी, अरबी, अंग्रेजी के बड़े ऊँचे विद्वान थे | हरजस राय का नाम अब मौलाना अब्दुल अज़ीज़ था | वह गुरुदासपुर में Extra Assistant Commisiner रहे थे | यह सबसे बड़ा पद था जो भारतीय तब पा सकते थे | पण्डितजी कृपा से वे शुद्ध होकर पुनः हरजस राय बन गए| एक मौलाना अब्दुल रहमान तो पण्डितजी के प्रभाव से सोमदत्त बने | हैदारबाद के एक योग्य मौलाना हैदर शरीफ पर आपके साहित्य का ऐसा रंग चढ़ा कि हृदय बदल गया | वे वैदिक धर्मी बन गए |
मौलाना शरीफ बहुत बड़े कवि थे |

एक बार पण्डितजी प्रचारयात्रा से लाहौर लौटे तो उन्हें पता चला कि मुसलमान एक अभागी हिन्दू युवती को उठाकर ले गए हैं | पण्डितजी ने कहा मुझे एक सहयोगी युवक चाहिए मैं उसे खोजकर लाऊंगा | पण्डितजी युवक को लेकर मस्जिदों में उसकी खोज में निकले | उन्होंने एक बड़ी मस्जिद में एक लड़की को देखा | भला मस्जिद में स्त्री का क्या काम ? यह आकृति में ही हिन्दू दिखाई दी | पण्डितजी ने उसकी बांह पकड़कर कहा “चलो मेरे साथ |” शूर शिरोमणि लेखराम भीड़ को चीरकर उस अबला को ले आये | आश्चर्य की बात तो यह है कि उस नर नाहर को रोकने टोकने की उन लोगों की हिम्मत ही न हुई |
इसी कारण देवतास्वरूप भाई परमानन्द जी कहा करते थे कि डर वाली नस-नाड़ी यदि मनुष्यों में कोई होती है तो पं.लेखराम में वो तो कत्तई नही थी |

पं.लेखराम जी ने ‘बुराहीने अहमदियों’ के उत्तर में ‘तकजीबे बुराहीने अहमदिया’ ग्रन्थ तीन भागों में प्रकाशित करवाया | इसके छपने के साथ ही धूम मच गयी | ईसाई पत्रिका ‘नूर अफशां’ में भी इसकी समीक्षा करते हुए पण्डितजी की भूरी-भूरी प्रशंसा की | पण्डितजी इस मामले में आर्य समाज में एक परम्परा के जनक भी हैं, विरोधी यदि कविता में आर्य-धर्म पर प्रहार करते थे तो पण्डितजी कविता में ही उत्तर देते थे | जिस छंद में प्रहारकर्ता लिखता, पण्डितजी उसी छंद में लिखते थे |

मिर्ज़ा गुलाम अहमद कादियानी ने पण्डितजी को मौत की धमकियाँ देकर वेद-पथ से विचलित करना चाहा| पण्डितजी ने सदा यही कहा मुझे जला दो, मार दो, काट दो, परन्तु मैं वेद पथ से मुख नही मोड़ सकता | इसी घोष के अनुसार एक छलिया उनके पास शुद्धि का बहाना बनाकर आया | उनका नमक खता रहा | उनका चेला बनने का नाटक किया | पण्डितजी महर्षि दयानन्द का जीवन चरित्र लिखते-लिखते थक गए तो अंगडाई ली | अंगड़ाई लेते हुए अपनी छाती को खोला तो वो नीच वहीँ बैठा था, उसने कम्बल में छुरा छुपा रखा था | क्रूर के सामने शूर का सीना था, पास कोई नही था | उस कायर ने पण्डितजी के पेट में छूरा उतार दिया और भाग निकला | वो तारीख थी ६ मार्च १८९७ |

उपसंहार—धर्मवीर पं.लेखराम की महानता का वर्णन करने में लेखनी असमर्थ है | स्वामी श्रद्धानंद जैसे नेता उनका अदब मानते थे | सनातन धर्म के विद्वान और नेता पं.दीनदयाल व्याख्यान वाचस्पति कहते थे कि पं.लेखराम के होते हुए कोई भी हिन्दू जाति का कुछ नही बिगाड़ सकता | ईसाई पत्रिका का सम्पादक उनकी विद्वत्ता पर मुग्ध था | उनके बलिदान पर अमेरिका की एक पत्रिका ने उनपर लेख छापा था | ‘मुहम्मदिया पाकेट’ के विद्वान लेखक मौलाना अब्दुल्ला ने तो उन्हें ‘कोहे वकार’ अर्थात गौरव-गिरी लिखा है | पर पण्डितजी का बलिदान व्यर्थ नहीं गया, वेदों को जीवन भर पानी पी पीकर कोसने वाला मिर्ज़ा भी मरते वक़्त वेदों को ईश्वरीय ज्ञान लिखकर जाता है | पण्डितजी हम और क्या लिखे ! अपनी बात को महाकवि ‘शंकर’ के शब्दों में समाप्त करते है—–

धर्म के मार्ग में अधर्मी से कभी डरना नही |
चेत कर चलना कुमारग में कदम धरना नही ||
शुद्ध भावों में भयानक भावना भरना नही |
बोधवर्धक लेख लिखने में कमी करना नहीं ||

सुजीत मिश्र

शैतान रात में मोमिनों के नाक में ठहरता है!

इस्लाम में वैज्ञानिकी तथ्यों की कोई कमी नहीं। इसके एक नहीं सहस्त्रों प्रमाण हैं। एक उदाहरण–

सही बुखारी, जिल्द ४, किताब ५४, हदीस ५१६-

अबु हुरैरा से रिवायत है कि मोहम्मद साहब आप फरमाते हैं, “यदि तुम में से कोई नींद से उठता है और मुँह(चेहरा) धोता है, तो उसे अपनी नाक को पानी में डालकर धोना चाहिए और तीन बार छिड़कना चाहिए क्योंकि शैतान पूरा रात नाक के उपरी हिस्से में ठहरता है।”

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यही बातें सही मुस्लिम, किताब २, जिल्द ४६२ में भी है।

वाह जी वाह! क्या बात है? चलो कुछ प्रश्नों का उत्तर दे दो जी।

१. ये शैतान रात में नाक में क्यों आ जाता है? क्या उसे रात में डर लगता है?
२. शैतान दिन में कहाँ चला जाता है? क्या खाता-पीता है?
३. और ये शैतान नाक में घुस कैसे जाता है? घुस कर करता क्या है?
४. शैतानों की संख्या कितनी है? यदि उसकी संख्या बढ़ती-घटती है तो कैसे?
५. इतने सारे शैतानों को पैदा करता कौन है और क्यों?
६. शैतान इतना छोटा है या अपने हाइट को घटा-बढ़ा सकता है?
७. शैतान यदि नाक में घुस जाता है तो वो उस मोमिन को बहका नहीं देता होगा? जो बहक गया वो काफिर हुआ न! अर्थात् रात में सभी सोये हुए मोमिन काफिर हुए? तो जो मोमिन जगे होते होंगे रात में उन्हें इन सोये हुओं का जिहाद कर देना चाहिए?

मुफ्त का सुझाव : यदि शैतान नाक में घुस आता है तो काबे के पत्थर पर क्यों मारते हो? अपने नाक पर ही पत्थर मारो। इससे शैतान मर जाएगा।

इस्लाम समीक्षा : जहाँ शैतान करता है कानों में पेशाब

सूर्योदय के बाद उठने का कारण संभवतः रात्रि में देर से सोना या अधिक थकान हो सकता है। अपितु इस्लाम का विज्ञान तो कुछ और ही कहता है। आइये देखते हैं।

सही बुखारी, जिल्द२, किताब २१, हदीस २४५–

अब्दुल्लाह से रिवायत है कि एक बार मुहम्मद साहब को बताया गया कि एक व्यक्ति सुबह तक अर्थात् सूर्योदय के बाद तक सोया रहा और नमाज के लिए नहीं उठा। मुहम्मद साहब ने कहा कि शैतान ने उसके कानों में पेशाब कर दिया था

वाह जी वाह! क्या विज्ञान है अल्लाह तआला का?
वर्तमान युग में अनेकों व्यक्ति चाहे वो मुस्लिम हैं या मुशरिक हैं, सूर्योदय के पश्चात् निद्रा त्यागने के अभ्यस्त हैं। लेकिन आज तक किसी ने ऐसी शिकायत नहीं की और न ही किसी की शैतान के मूत्र त्यागने के कारण निद्रा ही टूटी है।

इसपर कुछ प्रश्नों को उत्तर भी दे दीजिए-

१. ये शैतान कानों में पेशाब क्यों करता है?

२. क्या ये वही शैतान है जो रात भर नाक में रहता है(पिछले पोस्ट को देखिए)?

३. शैतान पेशाब कब करता है? ठीक सूर्योदय होने के बाद क्या? उसे ऐसे ऐक्युरेट टाइमिंग का पता कैसे चलता है?

४. यदि शैतान कानों में पेशाब करता है तो वो बदबू नहीं देता होगा?

५. कानों में प्रायः पेशाब होने के कारण कान खराब नहीं होते होंगे?

६. कानों के eustechean tube का लिंक सीधे pharynx से होता है। अर्थात् शैतान का पेशाब मुँह में भी चला जाता होगा जो पेट में ही अंततः जाता होगा न? तब भी शैतान का पेशाब हलाल हुआ या हराम?

७. सूर्योदय के बाद उठने पर मोमिनों के बिस्तर या तकया भीगता नहीं है?

मूत्र विसर्जन करते समय यदि मोमिन करवट बदल लेवे तो पेशाब कहाँ जाता होगा?

एक मुफ्त का सुझाव : कानों के लिए डायपर्स, पैंपर्स आदि का उपयोग करें और वैज्ञानिक इसके उपयोग को सरल करें।

यदि किसी भी व्यक्ति से, जिसने सूर्योंदय के बाद निद्रा त्याग किया है, से कहा जाये कि शैतान ने आपके कान में मूत्र त्याग किया है तो वह कहने वाले को मानसिक रोगी ही समझेगा। ऐसे में यह मौलानाओं का दायित्व्य बनता है कि वो इस हदीस की वैज्ञानिकता को सिद्ध करें जिससे सभी को इस हदीस की सत्यता का ज्ञान हो सके।

उत्तर दिया जायः- राजेन्द्र जिज्ञासु

उत्तर दिया जायः-

मिर्जाइयों द्वारा नेट का उपयोग करके पं. लेखराम जी तथा आर्यसमाज के विरुद्ध किये जा रहे दुष्प्रचार का उत्तर देना मैंने उ.प्र. के कुछ आर्य युवकों की प्रबल प्रेरणा से स्वीकार कर लिया। मेज-कुर्सी सजा कर घरों में बैठकर लबे-लबे लेख लिखने वाले तो बहुत हैं, परन्तु जान जोखिम में डालकर विरोधियों के प्रत्येक प्रहार का प्रतिकार करना प्रत्येक व्यक्ति के बस की बात नहीं। वास्तव में इस बारे में नया तो कुछाी नहीं। वही घिसी-पिटी पुरानी कहानियाँ, जिनका उत्तर पूज्य पं. देवप्रकाश जी के ‘दाफआ ओहाम’ खोजपूर्ण पुस्तक तथा मेरे ग्रन्थ ‘रक्तसाक्षी पं. लेखराम’ तथा मेरी अन्य पुस्तकों में भी समय-समय पर दिया जा चुका है।

अब की बार परोपकारी व किसी अन्य पत्रिका में इस विषैले प्रचार का निराकरण नहीं करूँगा। ‘रक्तसाक्षी पं. लेखराम’ ग्रन्थ का संशोधित-परिवर्द्धित संस्करण प्रेस में दिया जा चुका है। मैं जानता हूँ कि विधर्मियों से टकराना जान जोखिम में डालने जैसा काम है। गत 61 वर्ष से इस कार्य को करता चला आ रहा हूँ। अब भी पीछे नहीं हटूँगा। पं. धर्मभिक्षु जी, पं. विष्णुदत्त जी, पं. सन्तरामजी, पं. शान्तिप्रकाश जी, पं. निरञ्जनदेव जी से लेकर इस लेखक तक मिर्जाइयों की कुचालों व अभियोगों का स्वाद चखते रहे हैं। श्री रबे कादियाँ जी (पं. इन्द्रजित्देव के कुल के एक धर्मवीर) पर तो मिर्जाइयों ने इतने अभियोग चलाये कि हमें उनकी ठीक-ठीक गिनती का भी ज्ञान नहीं।

सन् 1996 में स्वामी सपूर्णानन्द जी के आदेश से कादियाँ में दिये गये व्यायान पर जब गिरतारी की तलवार लटकी तो मैंने श्री रोशनलाल जी को कादियाँ लिखा था कि श्री सेठ हरबंसलाल या पंजाब सभा मेरी जमानत दे-यह मुझे कतई स्वीकार नहीं। स्वामी सर्वानन्द जी महाराज या श्री रमेश जीवन जी मेरी जमानत दे सकते हैं। तब श्री स्वामी सपूर्णानन्द जी मेरे साथ जेल जाने को एकदम कमर कसकर तैयार थे। यह सारी कहानी वह बता सकते हैं। हमें फँसाया जाता तो दो-दो वर्ष का कारावास होता। मेरा व्यायान प्रमाणों से परिपूर्ण था सो मिर्जाइयों की दाल न गली।

सिखों में एक सिंध सभा आन्दोलन चला था। सिंध सभा नाम की एक पत्रिका भी खूब चली थी। इसका सपादक पं. लेखराम जी का बड़ा भक्त था। उस निडर सपादक ने मिर्जाई नबी पर खूब लेखनी चलाई। उसका कुछ लुप्त हो चुका साहित्य मैंने खोज लिया है। रक्तसाक्षी पं. लेखराम ग्रन्थ के नये संस्करण में इस निर्भीक सपादक के साहित्य के हृदय स्पर्शी प्रमाण देकर मिर्जाइयत के छक्के छुड़ाऊँगा। जिन्हें मिशन का दर्द है, जाति की पीड़ा है, वे आगे आकर इस ग्रन्थ के प्रसार में प्रकाशक संस्था को सक्रिय सहयोग करें। श्री महेन्द्रसिंह आर्य और अनिल जी ने उत्तर प्रकाशित करने का साहसिक पग उठाया है। श्री प्रेमशंकर जी मौर्य लखनऊ व उनके सब सहयोगी इस कार्य में सब प्रकार की भागदौड़ करने में अनिल जी के साथ हैं।

एक जानकारी देना रुचिकर व आवश्यक होगा कि जब प्राणवीर पं. लेखराम मिर्जा के इल्हामी कोठे पर गये थे, तब सिंध सभा का सपादक भी उनके साथ था। नबी के साथ वहाँ पण्डित जी की संक्षिप्त बातचीत-उस ऐतिहासिक शास्त्रार्थ के प्रत्यक्ष दर्शी साक्षी ने नबी को तब कैसे पिटते व पराजित होते देखा-यह सब वृत्तान्त प्रथम बार इस ग्रन्थ में छपेगा। न जाने पं. लेखराम जी ने तब अपने इस भक्त का अपने ग्रन्थ व लेखों में क्यों उल्लेख नहीं किया? औराी कई नाम छूट गये। पूज्य स्वामी सर्वानन्द जी महाराज की उपस्थिति में सन् 1996 के अपने व्यायान में सपादक जी के साहित्य के आवश्यक अंश मैंने कादियाँ में सुना दिये थे। सभवतः उन्हीं से मिर्जाइयों में हड़कप मचा था।

नारी का नर्क इस्लाम

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नारी किसी भी परिवार या वृहद् रूप में कहें तो समाज कि धुरी है . नारी शक्ति के विचार, संस्कार उनकी संतति को व्यापक रूप से प्रभावित करते हैं उनके निर्माण में गुणों या अवगुणों कि नींव डालते हैं और यही संतति आगे जाके समाज का निर्माण करती है. लेकिन यदि नारी के अधिकारों का हनन कर दिया जाये तो एक सभ्य समाज बनने कि आशंका धूमिल हो जाती है. अरब भूखण्ड में इसके भयंकर प्रभाव सदियों से प्रदर्शित हो रहे हैं जो अत्यंत ही चिंता जनक हैं . इसका प्रमुख कारण नारी जाती पर अत्याचार उनको प्रगति के अवसर न देना और केवल जनन करने के यन्त्र के रूप में देखना ही प्रमुख है.
इस्लाम के पैरोगार इस्लाम को नारी के लिए स्वर्ग बताते रहे हैं चाहे उसमे पाकिस्तान के जनक होने कि भूमिका अदा करने वाले मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी हों या वर्तमान युग में इस्लामिक युवकों के लिए आतंकवादी बनने का प्रेरणा स्त्रोत जाकिर नायक हों . लेकिन वास्तविकता इसके कहीं विपरीत है और विश्व उसका साक्षी है इसके लिए कहने के लिए कुछ शेष ही नहीं है किस तरह इस्लामिक स्टेट्स (ISIS) वर्तमान युग में भी औरतों को मंडियां लगा के बेच रहा है इसके अधिक भयानक क्या हो सकता है जिस सभ्यता में औरत केवल एक हवस पूर्ती का साधन और बच्चे पैदा करने का यन्त्र बन कर रह जाये . ऐसी सभ्यता से मानवता की उम्मीद लगाना ही बेमानी है
औरत की प्रगति से मानवता के गिरने का सिलसिला शुरू होता है:-
मौलाना मौदूदी साहब लिखते हैं कि स्त्री को शैतान का एजेंट बना कर रख दिया है . और उसके उभरने से मानवता के गिरने का सिलसिला शुरू हो जाता है .
औरतों के मेल जोल खतरनाक
औरतों और मर्दों के मेल से बेहयाई कि बाढ़ आ जाती है कामुकता और ऐश परस्ती पूरी कौम के चरित्र को तबाह कर देती है और चरित्र कि गिरावट के साथ बौद्धिक शारीरिक और भौतिक शक्तियों का पतन भी अवश्य होता है . जिसका आखिरी अंजाम हलाकत व बर्बादी के कुछ नहीं है .
औरत जहन्नम का दरवाजा है
“ऐसे लोगों ने समाज में यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि औरत गुनाह कि जननी है . पाप के विकास का स्त्रोत और जहन्नम का दरवाजा है सारी इंसानी मुसीबतों कि शुरुआत इसी से हुयी है.”
मौलाना ने ईसाईयों धर्म गुरुओं के हवाले से लिखा है कि औरत ”
शैतान के आने का दरवाजा है
वह वर्जित वृक्ष कि और ले जाने वाली
खुदा के कानून को तोड़ने वाली
खुदा कि तस्वीर मर्द को गारत करने वाली है
भले ही मौलाना साहब ने ये विचार इसाई लोगों के अपने पुस्तक में दिए हैं लेकिन उनके पूर्वलिखित व्याख्यानों और अरब में जो घटित हो रहा है वो इसी कि पुश्टी करता है.
औरत कभी उच्च कोटि की विद्वान् नहीं हो सकती :
मौलाना साहब और इस्लाम जिसकी वो नुमाइंदगी करते हैं महिलाओं के घर से बाहर और काम करने के कितने खिलाफ हैं ये जानने के लिए काफी है कि वो इसे इंसानी नस्ल के खात्मे की तरह देखते हैं .
मौलाना लिखते हैं :” अतः जो लोग औरतों से मर्दाना काम लेना चाहते हैं , उनका मतलब शायद यही है कि या तो सब औरतों को औरत विहीन बनाकर इंसानी नस्ल का खात्मा कर दिया जाये”
” औरत को मर्दाना कामों के लिए तैयार करना बिलकुल ही प्रकृति के तकाजों और प्रकृति के उसूलों के खिलाफ है और यह चीज न इंसानियत के फायदेमंद और न खुद औरत के लिए ही ”
औरत केवल बच्चे पैदा करने कि मशीन:
मौलाना लिखते हैं कि ” चूँकि जीव विज्ञानं (BIOLOGY) के मुताबिक़ औरत को बच्चे कि पैदाइश और परवरिश के लिए ही बनाया गया है और प्रकृति और भावनाओं के दायरे में भी उसके अन्दर वही क्षमताएं भर दी गयी हैं जो उसकी प्राकृतिक जिम्मेदारी के लिए मुनासिब हैं
जिन्दगी के एक पहलू में औरतें कमजोर हैं और मर्द बढे हुए हैं आप बेचारी औरत को उस पहलू में मर्द के मुकाबले पर लाते हैं जिसमें वो कमजोर हैं इसका अनिवार्य परिणाम यही निकलेगा कि औरतें मर्दों से हमेशा से कमतर रहेंगी
संभव नहीं कि औरत जाती से अरस्तू, कान्त , इब्ने सीना , हेगल , सेक्सपियर , सिकन्दर ,नेपोलियन बिस्मार्क कि टक्कर का एक भी व्यक्ति पैदा हो सके.

औरत शौहर कि गुलाम
मौलाना लिखते हैं कि दाम्पत्य एक इबादत बन जाती है लेकिन तुरंत आगे कि पंक्तियों में उनकी वही सोच प्रदर्शित होती है वो लिखते हैं कि ” अगर औरत अपने शौहर कि जायज इच्छा से बचने के लिए नफ्ल रोजा रख के या नमाज व तिलावत में व्यस्त हो जाये तो वह गुनाह्ग्गर होगी .
इस कथन कि पुष्टि में वह मुहम्मद साहब से हवाले से लिखते हैं कि :
” औरतें अपने शौहर कि मौजूदगी में उसकी इजाजत के बिना नफ्ल रोजा न रखे” ( हदीस : बुखारी )
” जो औरत अपने शौहर से बचकर उससे अलग रात गुजारे उस पर फ़रिश्ते लानत भेजते हैं , जब तक कि वह पलट न आये ” ( हदीश : बुखारी )
“….. रातों को सोता भी हूँ , और औरतों से विवाह भी करता हूँ. यह मेरा तरीका है और जो मेरे तरीके से हेट उसका मुझसे कोई वास्ता नहीं ” ( हदीस बुखारी )
ऊपर दिए मौलाना मौदूदी के कथन और हदीसों से साफ़ जाहिर है कि औरत इस्लाम में केवल अपने शौहर के मर्जी पर जीने वाली है . शौहर कि मर्जी के बगैर या औरत के लिए शौहर कि इच्छा पूर्ति ही सर्वोपरि है उसके न करने पर उसके लिए फरिश्तों की लानत आदि से डराया धमकाया गया है . और मुहमम्द साहब ने यह कह कर कि विवाह करना ही सर्वोपरि है और अन्यथा मुझसे अर्थात इस्लाम्स से कोई वास्ता नहीं सब कुछ स्पस्ट ही कर दिया कि औरत केवल और केवल मर्दकी इच्छा पूर्ति का साधन है .

मर्द औरत का शाषक है :
मौलाना मौदूदी लिखते हैं कि इस्लाम बराबरी का कायल नहीं है जो प्राकृतिक कानून के खिलाफ हो . कर्ता पक्ष होने कि हैसियत से वैयक्तिक श्रेष्ठता मर्द को हासिल है वह उसने ( खुदा ने ) इन्साफ के साथ मर्द को दे रखी है . और इसके लिए वह कुरान कि अति विवादित आयत जो मर्द को औरत से श्रेष्ठ बताती है का हवाला देते हैं :-
” और मर्दों के लिए उन पर एक दर्जा ज्यादा है ( कुरान २: २२८ )
“मर्द अपनी बीवी बच्चों पर हुक्मरां ( शाषक ) है और पाने अधीनों के प्रति अपने अमल पर वह खुदा के सामने जवाबदेह है ( हदीस : बुखारी )
औरत को घर से निकलने के लिए शौहर की इजाजत
“खुदा के पैगम्बर हजरत मुहम्मद ने फरमाया – जब औरत अपने शौहर कि मर्जी के खिलाफ घर से निकलती है तो आसमान का हर फ़रिश्ता उस पर लानत भेजता है और जिन्नों और इंसानों के सिवा हर वह चीज जिस पर से वह गुजरती है फिटकार भेजती है उस वक्त तक कि वह वापस न हो ( हदीस : कश्फुल – गुम्मा )

पति कि बात न मारने पर पिटाई :
हदीस कि किताब इब्ने माजा में है कि नबी ने बीवियों पर जुल्म करने कि आम मनाही कर दी थी . एक बार हजरत उमर ने शिकायत कि कि औरतें बहुत शोख (सरकश ) हो गयी हैं उनको काबू में करने के लिए मारने कि इजाज़त होनी चाहिए और आपने इजाजत दे दी ( पृष्ठ २०२)
” और जिन बीवियों से तुमको सरकशी और नाफ़रमानी का डर हो उनको नसीहत करो ( न मानें ) तो शयन कक्ष (खाब्गाह ) में उनसे ताल्लुक तोड़ लो ( फिर भी न मानें तो ) मारो , फिर भी वे अगर तुम्हारी बात नमान लें तो उन पर ज्यादती करने के लिए कोई बहना न धुन्ड़ो ) (कुरान ४ : ३४ )

औरत का कार्यक्षेत्र केवल घर की चारदीवारी :
इस्लाम में औरतों कोई केवल घर कि चार दीवारी में ही कैद कर दिया गया है , उसके घर से बाहर निकलने पर तरह तरह कि पाबंदियां लगा दी गयी यहीं , शौहर कि आज्ञा लेना अकेले न निकलना इत्यादी इत्यादी और ऐसा न करने पर तरह तरह से डराया गया है पति को मारने के अधिकार , फरिश्तों का डर और न जाने क्या क्या यहाँ तक कि मस्जिद तक में आने को पसंद नहीं किया गया
– उसको महरम ( ऐसा रिश्तेदार जिससे विहाह हराम हो ) के बिना सफर करने कि इजाजत नहीं दी गयी ( हदीस तिर्मजी , अबू दाउद )
– हाँ , कुछ पाबंदियों के साथ मस्जिद में आने कि इजाजत जरुर दी गयी अहि लेकिन इसको पसंद नहीं किया गया
अर्थात हर तरीके से औरत के घर से निकलने को न पसंद किया गया है , इसके लिए पसंदीदा शक्ल यही है कि वह घर में रहे जैसा कि आयत ” अपने घरों में टिककर रहो (कुरान ( ३३:३३) की साफ़ मंशा है .
घर से निकलने पर पाबंदियों :
मर्द अपने इख्तियार से जहाँ चाहे जा सकता अहि लेकिन औरत, चाहे कुंवारी हो या शादी शुदा या विधवा हर हाल में सफ़र में उसके साथ एक मरहम (ऐसा रिश्तेदार जिससे विहाह हराम हो ) जरुर हो
– किसी औरत के लिए , जो अल्लाह और आखिरत के दिन पर ईमान रखती हो , यह हलाल (वैध ) नहीं कि वह तीनदिन या इससे ज्यादा का सफ़र करे बिना इसके कि उसके साथ उसका बाप या भाई या शौहर या बेटा या कोई मरहम (ऐसा रिश्तेदार जिससे विहाह हराम हो मर्द हो ( हदीस)
– और अबू हुरैरह कि रवायत नबी से यह है कि नबी ने फरमाया :”औरत एक दिन रात का सफर न करे जब तक कि उसके साथ कोई मरहम मर्द न हो ( हदीस : तिर्माजी )
और हजरत अबू हुरैरह से यह भी रिवायत है कि नबी ने फरमाया ” किसी मुसलमान औरत के लिए हलाल नहीं है कि एक रात का सफ़र करे उस वक्त तक जब तक उसके साथ एक मरहम मर्द न हो ( हदीस : अबू दाउद )

औरत को अपनी मर्जी से शादी कि इजाजत नहीं:
मौलाना मौदूदी लिखते हैं मर्द को अपने विवाह के मामले में पूरी आजादी हासिल है . मुसलमान या इसाई यहूदी औरतों में से जिसके साथ विवाह कर सकता है लेकिन औरत इस मामले में बिलकुल आजाद नहीं है वह किसी गैर मुस्लिम से विवाह नहीं कर सकती
“न ये उनके लिए हलाल हैं और न वे इनके लिए हलाल ” ( कुरान ६०”१०)
आजाद मुसलमानों में से औरत अपने शौहर का चुनाव कर सकती है लेकिन यहाँ भी उसके लिए बाप दादा भाई और दुसरे सरपरस्तों कि राय का लिहाज रखना मौलाना ने जरुरी फरमाया ही अर्थात पूरी तरह से औरत को विवाह करने के लिए दूसरों कि मर्जी के अधीन कर दिया गया है .
सन्दर्भ : पर्दा लेखक मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी

हदीस: औरत का दोजक्ख में होना क्यूंकि वह अपने शौहर का नाफ़रमानी करती है |

औरत का  दोजक्ख में होना क्यूंकि वह अपने शौहर का नाफ़रमानी करती है |

इस्लाम में यह बोला जाता है की औरत और पुरुष को एक समान अधिकार है | वह  उपभोग की वस्तु नहीं है | खैर यह हमें दिलासा के लिए बोला जाता है की औरत को एक समान अधिकार है | आज हम कुछ पहलु इस्लाम से जाहिर करते हैं जिससे यह मालुम हो जाएगा की औरत को इस्लाम में एक समान अधिकार नहीं बल्कि एक उपभोग की वस्तु है | कुरआन में भी यह बोला गया है की औरत को खेती समझो | चलिए ज्यादा बाते न बनाते हुए औरत की बारे में सहीह बुखारी हदीस से हम प्रमाण रख रहे हैं |

Saheeh bukhaari hadees  volume 1 book 2 : belief  hadees  number 28

Narrated Ibn Abbas :  The Prophet said : “ I was shown the hell-fire and that the majority of its dwellers were woman who were ungrateful.” It was asked. “do they  disbelieve in allah ? “ (or are they  ungrateful to allah ? ) he replied , “ They are ungrateful to their husbands and are ungrateful for the favors  and good (charitable deeds)  done to them . if you have always been good (benevolent)   to one of them and then she sees something  in you (not of her liking), she will say, ‘ I have never received any good from you.”

मुख़्तसर सहीह बुखारी हदीस जिल्द  1 बुक  2 इमान का बयान   हदीस संख्या  27

इब्ने अब्बास रजि. से रिवायत है, उन्होंने कहा , नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया : मैंने दोजक्ख  में ज्यादातर औरतो को देखा (क्यूंकि) वह कुफ्र करती है | लोगो ने कहा : क्या वह अल्लाह का कुफ्र करती है ? आपने फरमाया : “ नहीं बल्कि वह अपने शौहर की नाफ़रमानी करती है  और एहसान फरामोश है , वह यूँ की अगर तू सारी उम्र औरत से अच्छा सलूक करे फिर वह (मामूली सी ना पसंद ) बात  तुझमे देखे तो कहने लगती है की  मुझे तुझ से कभी आराम नहीं मिला | “

 

ऊपर हमने हदीस से इंग्लिश और हिंदी में प्रमाण दिया है |

समीक्षा :  यह बात समझ में  नहीं आई की यदि कोई शौहर गलत काम करे  तो भी  उस औरत को उसकी  शौहर की बात को मानना पड़े  यदि वह  ना माने  तो  वह दोजख  जायेगी | यह कैसा इस्लाम में औरत  को समानता दी गयी है यह बात समझ से परे है | शौहर गलत ही क्यों ना हो उसका विरोध ना करो | शौहर का सब  बात को सही समझो | सभी बात को स्वीकार करो | क्या औरत खिलौना है ? क्या औरत के पास कोई अक्ल  नहीं है ? सब अक्ल पुरुष के पास है ?  यदि शौहर अपनी बीवी की बात ना माने तो वह कहाँ जाएगा ? वह शौहर दोजख क्यों नहीं जाएगा ? यह कैसा समानता औरत पुरुष में ?

 

यदि लेख में किसी तरह की त्रुटी हुयी हो तो आपके सुझाब सादर आमंत्रित हैं  |

धन्यवाद  |

 

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