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मनु और मनुस्मृति पर आक्षेप: एक विचार: डॉ0 रामकृष्ण आर्य (वरुणमुनि वानप्रस्थी)

राजर्षि मनु वेदों के बाद सर्वप्रथम धर्म प्रवक्ता, मानव मात्र के पूर्वज राजधर्म और विधि (कानून) के सर्वप्रथम प्रणेता थे। उनके द्वारा रचित धर्मशास्त्र संसार का सर्वप्रथम और सर्वश्रेष्ठ धर्मशास्त्र है, जिसे मनुस्मृति के नाम से जाना जाता है। इस मनुस्मृति में बिना किसी पक्षपात के मानवमात्र को उन्नति के समान अवसर प्रदान करनेवाली एक उत्तम वैज्ञानिक और अद्वितीय समाज-व्यवस्था का प्रतिपादन किया गया है, जिसे वर्ण-व्यवस्था कहा जाता है। जोकि मनुष्य मात्र के गुण, कर्म और स्वभाव पर आधारित है। मनु की यह सबसे बड़ी विशेषता है कि वे जन्म के आधार पर किसी मनुष्य को उच्च या नीच नहीं मानते।

मनुस्मृति का वर्तमान स्वरूप

स्वायम्भुव मनु मनुस्मृति के प्रवक्ता हैं। प्रवक्ता इसलिए कि मनुस्मृति मूलतः प्रवचन है, जिसे मनु के प्रारम्भिक शिष्यों ने संकलित कर एक विधिवत् शास्त्र या ग्रन्थ का रूप दिया। मनुस्मृति में कुल 12 अध्याय और 2685 श्लोक हैं। मनुस्मृति सहित प्राचीन ग्रन्थों का आज जो वैज्ञानिक अध्ययन हो रहा है, उसके अनुसार मनुस्मृति में 1214 श्लोक मौलिक और 1471 श्लोक प्रक्षिप्त सिद्ध होते हैं।

भारत और विदेशों में मनुस्मृति की प्रतिष्ठा

वेद के बाद यदि किसी ग्रन्थ की भारत और भारत से बाहर विदेशों में सर्वत्र अत्यधिक प्रतिष्ठा है, तो वह ग्रन्थ मनुस्मृति है। विस्तारभय से हम उसका वर्णन करने में असमर्थ हैं। ऐसे विश्वप्रसिद्ध ’लागिवर‘ एवं समाज-व्यवस्था प्रणेता पर पता नहीं किस स्वार्थ के वशीभूत होकर आक्षेप और आरोप लगाये जा रहे हैं, जो चिन्तनीय हैं।

मनु और मनुस्मृति पर आक्षेप

मनु और मनुस्मृति पर आक्षेप तीन प्रकार से लगाये जा रहे हैं। (क) मनु ने जन्म पर आधारित जात-पाँत व्यवस्था का निर्माण किया। (ख) उस व्यवस्था में मनु ने शूद्रों, अर्थात् दलितों के लिए अमानवीय और पक्षपातपूर्ण विधान किये, जबकि सवर्णों, विशेष रूप से ब्राह्मणों को विशेषाधिकार दिये गये। इस प्रकार मनु शूद्र विरोधी थे। (ग) मनु नारी जाति के विरोधी थे। उन्होंने नारी को पुरुष के समान अधिकार ही नहीं दिये, अपितु नारी जाति की घोर निन्दा भी की है।

 

आक्षेपों पर विचार

(क) मनु ने जन्माधारित जात पाँत व्यवस्था का निर्माण नहीं किया, अपितु गुण-कर्म स्वभाव आधारित वर्ण-व्यवस्था का निर्माण किया जिसका मूल ऋ0 10/90/11-12, यजुः0 31/10-11 और अथर्व0 19/6/5-6 में पाया जाता है। मनु वेद को परम प्रमाण मानते हैं। इस वर्ण-व्यवस्था को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार समुदायों में व्यवस्थित किया गया है। ब्राह्मण-ज्ञान का आदान-प्रदान करनेवाला प्रधान व्यक्ति और उसका समुदाय। क्षत्रिय – समाज की रक्षा का भार उठानेवाला, वीरता, गुण, प्रधान व्यक्ति और उसका समुदाय। वैश्य – कृषि, उद्योग, व्यापार, अर्थ, धन, सम्पत्ति का अर्जन, वितरण करनेवाला प्रधान गुणवाला व्यक्ति और उसका समुदाय। शूद्र – जो पढ़ने लिखाने से भी पढ़-लिख नहीं सके ऐसा शारीरिक श्रम करनेवाला प्रधान व्यक्ति और उसका समुदाय मिलकर वर्ण व्यवस्था की संरचना करते हैं। (मनुस्मृति-1/31, 87-91, 10-45)। मनु ने अपनी मनुस्मृति के वर्णों के अतिरिक्त जन्माधारित जातियों, गोत्रों आदि का कहीं भी उल्लेख नहीं किया है। इतना ही नहीं मनु ने तो भोजनार्थ समय कुल, गोत्र पूछने और बतानेवाले को ’वमन करके खानेवाल‘ इस निंदित विशेषण से विशेषित किया है। (मनु0 3/109)।

 

जति-व्यवस्था वर्ण-व्यवस्था से उल्टी

जति-व्यवस्था में जन्म से ऊँचे-नीचे को महत्व दिया है, गुण-कर्म और योग्यता को नहीं। ब्राह्मणादि के घर जन्म लेनेवाला ब्राह्मणादि ही कहलाता है चाहे उसमें ब्राह्मणादि के गुण, कर्म, और योग्यता न हो तथा शूद्र के घर जन्म लेनेवाला शूद्र ही कहलाता है चाहे उसमें सम्पूर्ण गुण, कर्म, योग्यता ब्राह्मणादि के क्यों न हों।

मनु शूद्र अर्थात् दलित विरोधी नहीं थे

(ख) मनु शूद्र अर्थात् दलित विरोधी नहीं थे। विचार करें कि मनुस्मृति में शूद्रों की क्या स्थिति है ?

आजकल की दलित पिछड़ी और जनजाति कही जानेवाली जातियों को मनु ने शूद्र नहीं कहा है, अपितु जो पढ़ने-पढ़ाने का पूर्ण अवसर देने के बाद भी न पढ़ सके और केवल शारीरिक श्रम से ही समाज की सेवा करे, वह शूद्र है। (मनु0 1/90)।

मनु प्रत्येक मनुष्य को समान शिक्षाध्ययन करने का समान अवसर देते हैं। जो अज्ञान, अन्याय, अभाव में से किसी एक भी विद्या को सीख लेता है, वही मनु का द्विज अर्थात् विद्या का द्वितीय जन्मवाला है। परन्तु जो अवसर मिलने के बाद भी शिक्षा ग्रहण न कर सके, अर्थात् द्विज न बन सके वह एक जाति जन्म (मनुष्य जाति का जन्म) में रहनेवाला शूद्र है। दीक्षित होकर अपने वर्णों के निर्धारित कर्मों को जो नहीं करता, वह शूद्र हो जाता है, और शूद्र कभी भी शिक्षा ग्रहण कर ब्राह्मणादि के गुण, कर्म, योग्यता प्राप्त कर लेता है, वह ब्राह्मणादि का वर्ण प्राप्त कर लेता है। प्रत्येक व्यक्ति जन्म से शूद्र होता है। संस्कार में दीक्षित होकर ही द्विज बनता है (स्कन्दपुराण)। इस प्रकार मनुकृत शूद्रों की परिभाषा वर्तमान शूद्रों और दलितों पर लागू नहीं होती। (10/4, 65 आदि)।

(2) शूद्र अस्पृश्य नहीं-मनु ने शूद्रों के लिए उत्तम, उत्कृष्ट और शुचि जैसे विशेषणों का प्रयोग किया है, अतः मनु की दृष्टि में शूद्र अस्पृश्य नहीं है। (मनु0 9/335) शूद्रों को द्विजाति वर्णों के घरों पर भोजन आदि कार्य करने का निर्देश दिया है। (मनु0 1/91, 9/334-335)। शूद्र, अतिथि और भृत्य (शूद्र) को पहले भोजन कराया जाए। (मनु0 3/112, 116)। क्या आज के वर्णरहित समाज में शूद्र नौकर को पहले भोजन कराया जाता है ? इस प्रकार मनु शूद्र को निन्दित अथवा घृणित नहीं मानते थे।

(3) शूद्र को सम्मान व्यवस्था में छूट-मनु की सम्मान व्यवस्था में सम्मान गुण, योग्यता के अनुसार होकर विद्यमान अधिक सम्मानीय होता है। पर वृद्ध शूद्र को सर्व˗प्रथम सम्मान देने का निर्देश दिया गया है। (मनु0 2/111, 112, 130, 137)।

(4) शूद्र को धर्म पालन की स्वतन्त्रता – मनु ने शूद्रों को धार्मिक कार्य करने की पूरी स्वतन्त्रता दी है। (मनु0 10/126) इतना ही नहीं यह भी कहा है कि शूद्र से भी उत्तम धर्म को ग्रहण कर लेना चाहिए।

(5) दण्ड-व्यवस्था में शूद्र को सबसे कम दण्ड-मनु ने शूद्र को सबसे कम दण्ड, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण को उत्तरोत्तर अधिक दण्ड, परन्तु राजा को सबसे अधिक दण्ड देने का विधान किया है। (मनु0 8/337-338, 338, 347)।

(6) शूद्र दास नहीं-शूद्र दास, गुलाम अर्थात् बन्धुआ मजदूर नहीं है। सेवकों/भृत्यों को पूरा वेतन देने का आदेश दिया है और उनका अनावश्यक वेतन न काटा जाए, ऐसा निर्देश है। (7/125, 126, 8/216)।

(7) शूद्र सवर्ण हैं-मनु ने शूद्र सहित चारों वर्णों को सवर्ण माना है। चारों वर्णों से भिन्न असवर्ण हैं। (मनु0 10/4, 45) पर बाद का समाज शूद्र को असवर्ण कहने लग गया। उसी प्रकार मनु ने शिल्पी-कारीगर को वैश्य वर्ण में माना है, पर बाद में समाज इन्हें भी शूद्र कहने लगा (मनु0 3/64, 9/329, 10/99, 120)। इस प्रकार मनु की व्यवस्थाएँ न्यायपूर्ण हैं। उन्होंने न शूद्र और न किसी और के साथ अन्याय और पक्षपात किया है।

(8) मनु और डॉ0 बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर-आधुनिक संविधान निर्माता और राष्ट्र निर्माता तथा भूतपूर्व महामहिम राष्ट्रपति श्री वेंकटरमण के शब्दों में ’आधुनिक मनु‘ डॉ0 भीमराव अम्बेडकर द्वारा मनुस्मृति का विरोध और उसे दलितों पर अत्याचार कराने की जिम्मेवार तथा जात-पाँत व्यवस्था को जननी मानने का सवाल है। जन्मना जात-पाँत, ऊँच-नीच, छुआछूत जैसी कुप्रथाओं के कारण अपने जीवन में उन्होंने जिन उपेक्षाओं, असमानताओं यातनाओं और अन्यायों को भोगा था, उस स्थिति में कोई भी स्वाभिमानी शिक्षित वही करता जो उन्होंने किया। क्योंकि यह सत्य है कि उस समय तक मनुस्मृति का शोधपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन होकर उसमें समय-समय पर किये गये प्रक्षेपों पर कोई शोध कार्य नहीं हुआ था। जिससे उन्हें प्रक्षिप्त और मौलिक श्लोकों में भेद करने का कोई स्रोत नहीं मिला, फिर भी उन्होंने मनु द्वारा प्रतिपादित गुण-कर्म-योग्यता आधारित वर्ण व्यवस्था और महर्षि दयानन्द और अन्यों के द्वारा उसकी की गई व्याख्या की प्रशंसा की है।

(ग) क्या मनु नारी जाति के विरोधी थे ? मनुस्मृति के स्वयं के प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि मनु नारी जाति के विरोधी नहीं थे। कतिपय प्रमाण प्रस्तुत हैं-जिस परिवार में नारियों का सत्कार होता है, वहाँ देवता-दिव्य गुण, दिव्य सन्तान आदि प्राप्त होते हैं। जहाँ ऐसा नहीं होता, वहाँ सभी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। (मनु0 3/56)। नारियाँ घर का सौभाग्य, आदरणीया, घर का प्रकाश, घर की शोभा, लक्ष्मी, संचालिका, मालकिन, स्वर्ग और संसार यात्रा का आधार हैं। (मनु0 9/11, 26, 28, 5/150) स्त्रियों के आधीन सबका सुख है। उनके शोकाकुल रहने से कुल क्षय हो जाता है। (3/55, 62)। पति से पत्नी और पत्नी से पति सन्तुष्ट होने पर ही कल्याण संभव है। (9/101-102)। सन्तान उत्पत्ति के द्वारा घर का भाग्योदय करनेवाली गृह की आभा होती है। शोभा-लक्ष्मी और नारी में कोई अन्तर नहीं है। (9/26) मनु सम्पूर्ण सृष्टि में वेद के बाद पहले संविधान निर्माता हैं। जिन्होंने पुत्र और पुत्री की समानता घोषित कर उसे वैधानिक रूप दिया। (9/130)। पुत्र-पुत्री को पैतृक सम्पत्ति में समान अधिकार प्रदान किया। (9/131)। यदि कोई स्त्रियों के धन पर कब्जा कर लेता है तो वे चाहे बन्धु-बान्धव ही क्यों न हों, उन्हें चोर के सदृश दण्ड देने का विधान किया गया है। (9/212, 3/52, 8/2, 29)। स्त्री के प्रति किये गये अपराधों में कठोरतम दण्ड का प्रावधान मनु ने किया है। (8/323, 9/232, 8/352, 4/180, 8/275, 9/4)। कन्याओं को अपना योग्य पति चुनने की स्वतन्त्रता, विधवा को पुनर्विवाह करने का अधिकार दिया है। साथ में दहेज निषेध करते हुए कहा गया है कि कन्याएँ भले ही ब्रह्मचारिणी रहकर कुँवारी रह जाएँ, परन्तु गुणहीन दुष्ट पुरुष से विवाह न करें। (9/90-91, 176, 56-63, 3/51-54, 9/89)। मनु ने नारियों को पुरुषों के पारिवारिक, धार्मिक, सामाजिक और राष्ट्रीय कार्यों में सहभाग माना है। (9/11, 28, 96, /4, 3/28)। मनु ने सभी को यह निर्देश दिया है कि नारियों के लिए पहले रास्ता छोड़ दें, नव विवाहिता, कुमारी, रोगिणी, गर्भिणी, वृद्धा आदि स्त्रियों को पहले भोजन कराकर पति-पत्नी को साथ भोजन करना चाहिए। (2/138, 3/114, 116)। मनु नारियों को अमर्यादित स्वतन्त्रता देने के पक्षधर नहीं हैं तथा उनकी सुरक्षा करना पुरुषों का कत्र्तव्य मानते हैं (5/149, 9/5-6)। उपर्युक्त विश्लेषपूर्वक प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि मनु स्त्री और शूद्र विरोधी नहीं है। वे न्यायपूर्ण हैं और पक्षपात रहित हैं।

मनुस्मृति में प्रक्षेप

मनु के वैदिक वर्ण-व्यवस्था गुण, कर्म, योग्यता के सिद्धान्त पर आधारित श्लोक मौलिक और जन्माधारित जात-पाँत, पक्षपात विधायक सभी श्लोक ˗प्रक्षिप्त हैं। मनु के समय जातियाँ नहीं बनी थीं। इसलिए उन्होंने जातियों की गिनती नहीं दर्शाई। यही कारण है कि वर्ण संस्कारों (वर्ण संकरों) से सम्बन्धित श्लोक ˗प्रक्षिप्त सिद्ध होते हैं। मनु की दण्ड-व्यवस्था एक जनरल कानून है, मौलिक है, इसके विरुद्ध पक्षपातपूर्ण कठोर दण्ड-व्यवस्था विधायक श्लोक प्रक्षिप्त हैं। वर्ण-व्यवस्था के अन्तर्गत शूद्र विषयक श्लोक मौलिक, शेष जन्मना शूद्र निर्धारक छुआछूत, ऊँच-नीच अधिकारों का हरण और शोषण विधायक श्लोक प्रक्षिप्त हैं। नारियों के सम्मान, समानता, स्वतन्त्रता और शिक्षा विषयक श्लोक मौलिक हैं, इसके विपरीत प्रक्षिप्त हैं।

उपसंहार

यह सत्य है कि आम लोग और अनेक परम्परावादी विद्वान, सन्त, महात्मा आदि उसी प्रक्षिप्त श्लोकों सहित मनुस्मृति को आज भी प्रामाणिक मानकर जन्माधारित जाति-व्यवस्था ईश्वर द्वारा प्रदत्त स्वीकार कर उससे ग्रसित हैं। आज भी वे स्त्री और शूद्र को अपने बराबरी का दिल से अधिकार नहीं देना चाहते, परन्तु आर्यसमाज जो जन्माधारित जाति-प्रथा में तनिक भी विश्वास नहीं करता और प्रारम्भ से ही दलितों का सच्चा हितैषी रहा है-प्रक्षिप्त श्लोकों रहित मनुस्मृति को ही प्रामाणिक मानता है और गुण, कर्म, योग्यता आधारित वर्ण-व्यवस्था का समर्थक है। यह बात पृथक् है कि आज वर्ण-व्यवस्था की पुनः स्थापना असम्भव-सी प्रतीत होती है, क्योंकि जात-पाँत के रहते वर्ण-व्यवस्था लागू नहीं हो सकती, इसलिए भले ही वर्णव्यवस्था को पुनः स्थापना न हो, परन्तु जात-पाँत टूटकर जात-पाँत रहित समाज बनना चाहिए। ताकि फिर किसी को वह गैर बराबरी और छुआछूत की यातना न भोगनी पड़े, जो इस देश के आधुनिक संविधान निर्माता और आधुनिक मनु, डॉ0 अम्बेडकर और तथाकथित शूद्रातिशूद्रों और दलितों को भोगनी पड़ी थीं।

अन्त में हमारा निवेदन है कि प्रक्षिप्त श्लोकों के आधार पर मनु और मनुस्मृति पर भ्रमवश मनमाने आरोप-प्रत्यारोप लगाना अनुचित है। प्राचीन और विशुद्ध मनुस्मृति ग्रन्थ स्वाध्याय करने योग्य हैं। पक्षपात और पूर्वाग्रह रहित होकर शोधपूर्वक मनुस्मृति का अध्ययन करेंगे, तो यह भ्रान्ति मिट जाएगी कि मनु जात-पाँत के जन्मदाता और दलित तथा नारी विरोधी थे। मनु और मनुस्मृति के विरोध में लड़ाई बन्द होनी चाहिए, क्योंकि वास्तव में हम सब मानवतावादी हैं।

डॉ. अम्बेडकरजी की लाला लाजपतराय जी को श्रद्धांजली

यह तथ्य अंकित करते हुए हमें बहुत ही दुःख हो रहा है कि देशभक्त लाला लाजपतराय का विगत मास की 17 तारीख को अचानक हृदय क्रिया बन्द हो जाने से देहान्त हो गया। साइमन कमीशन के लाहौर आने पर उसे वापिस जाने के लिए कहनेवालों का जुलूस स्टेशन पर था, उसके अग्रिम भाग पर लाला जी उपस्थित थे। भीड़ को पीछे हटाने का प्रयत्न करते समय एक पुलिस अधिकारी ने लालाजी की छाती पर लाठी का वार किया। डॉक्टरों का यह मत है कि लाठी का वार ही लालाजी की हृदय क्रिया बन्द पड़ने का कारण सिद्ध हुआ। यदि यह सही है तो ऐसे उन्मत्त और राक्षसी वृत्ति के पुलिस अधिकारी की जितनी भी निन्दा की जाए, वह कम ही होगी।

खैर, वह कुछ भी हो, इसमें कोई सन्देह नहीं कि लालाजी की मौत के कारण देश का एक कर्मठ कार्य कुशल नेता नामशेष हो गया। भारतवर्ष में राजनीतिक नेताओं की कभी भी कमी नहीं रही, पर लालाजी जैसे प्रामाणिक वृत्ति के स्वार्थ त्यागी तथा कृतसंकल्प कार्य के लिए तन-मन-धन अर्पित करनेवाले नेता अत्यन्त ही कम थे। नेतागिरी के लिए ललचाए और उसके लिए अपनी सदसद् विवके बुद्धि शैतान या आसुरी प्रवृत्तियों को बेचनेवाले बहुत अधिक थे। इन नेताओं की कथनी-करनी की विसंगति लोगों के ध्यान में आती, तो ये उसे ’मेंटल रिजर्वेशन‘ की बात कहकर उससे छुटकारा पा लेते थे, पर लालाजी के जीवनक्रम में इस प्रकार की स्थिति नजर नहीं आती। श्री नरसिंह चिन्तामणि केलकर जैसे दोहरे व्यक्तित्ववाले तथा श्री आयंगर छाप जैसे नेताओं की अभद्रता से लालाजी कोसों दूर थे। उनकी कार्यक्षमता अप्रतिम और महान् थी। लालाजी के चरित्र की विशेषता इस बात में है कि वे अधिक बड़बड़ और गड़बड़ न करते हुए बहुत ही सोच-विचारपूर्वक धैर्य से स्वीकार किये हुए कार्य को सम्पन्न करते थे।

लालाजी का जन्म सन् 1865 में पंजाब प्रान्त के एक निर्धन वैश्य कुल में हुआ। उनके पिता आर्यसमाजी थे। इसलिए उन्हें प्रारम्भ से ही उदारमतवाद की घुट्टी पिलायी गई थी। आज आर्यसमाज को सनातन धर्म ने निगल लिया है, पर उस समय आर्यसमाज और सनातन धर्म का हमेशा का वैर या जानी दुश्मनी थी, क्योंकि इस युग में आर्यसमाज मुसलमानों के आक्रमणों की अपेक्षा हिन्दू समाज के अन्तर्गत जातिभेदादि दोषों की ओर ही ज्यादा ध्यान देता था। इसलिए वह रूढ़िबद्ध पौराणिक लोगों को स्वाभाविक रूप से ही अप्रिय था।

पुराणमतवाद और आर्यसमाज के इस समर में लालाजी ने आर्यसमाज का पक्ष लिया था और उस समाज के सिद्धान्तों को सुदृढ़ और व्यावहारिक रूप देने के लिए उन्होंने कुछ मित्रों के सहयोग से सन् 1886 में ’दयानन्द एंग्लो वैदिक कॉलेज (डी0 ए0 वी0)‘ की स्थापना की थी। उनके सार्वजनिक जीवन का प्रारम्भ इसी घटना के साथ शुरु हुआ था। इस संस्था को शक्तिशाली बनाने के लिए उन्होंने अनथक मेहनत की थी और पुष्कल मात्रा में स्वार्थ त्याग भी किया था। आज पंजाब में इस संस्था की गणना एक प्रमुख शिक्षण संस्था के रूप में की जाती है।

इसके बाद वे राजनीतिक आन्दोलनों में भाग लेने लगे, पर उन्होंने अन्य राजनीतिक आन्दोलनों के नेताओं की तरह राजनीतिक और सामाजिक कार्यों के इतेरतराश्रित आपसी सम्बन्धों का विच्छेद कर अपने अपंगत्व का प्रदर्शन कभी भी नहीं किया। दोनों भी दृष्टियों से वे क्रान्तिकारी थे। यह बात ध्यान में रखने लायक है कि राजनीतिक आन्दोलन में कदम रखने के कारण सरकार ने जब उन्हें अण्डमान की जेल में भेजा, तब बहुत से पुराणमतवादी लोगों को हर्ष हुआ था। इस प्रकार ब्रिटिश सरकार और पौराणिक इन दोनों के विरोध को सहन करते हुए लालाजी ने अपना सार्वजनिक कार्यक्रम संचालित किया था। पंजाब के कुछ स्पृश्यवर्गीय नेताओं द्वारा चलाये गये अस्पृश्यों के स्पृश्यीकरण (दलितोद्धार) के आन्दोलन में वे अन्तःकरण पूर्वक सहभागी होते थे। स्पृश्यवर्गीय लोगों द्वारा संचालित ’अस्पृश्योद्धार‘ के आन्दोलन से यदि हमें पूर्णतया सन्तोष न भी प्रतीत होता हो, फिर भी हमें इस बात में सन्देह नहीं कि लालाजी की सहानुभूति प्रामाणिकता से ओत-˗प्रोत थी। हमारी दृष्टि से वह परिपूर्ण न भी हों, फिर भी अविश्वसनीय तो बिलकुल भी नहीं थी।

लालाजी उत्तम लेखक भी थे। सामाजिक और राजनीतिक विषयों से सम्बद्ध उन्होंने अनेक ग्रन्थ लिखे हैं। ’दी पीपल‘ नामक अंग्रेजी पत्र भी वे निकालते थे। दयानन्द एंग्लोवैदिक कॉलेज के अतिरिक्त उनके द्वारा स्थापित दूसरी संस्था का नाम ’सर्वेंटस् ऑफ इण्डिया‘ है। ’सोसाइटी‘ की तरह इस संस्था की नियमावली बनाने के बावजूद इन दोनों में अंतरंग दृष्टि से महत्वपूर्ण अन्तर है। मुम्बई की ’सोसाइटी‘ ’नरम दल‘ के कब्जे में होने के कारण उनके समस्त कार्यक्रम शांत एवं मंदगति से चालू हैं। राजनीतिक विषय में भी मंदगति और सामाजिक विषय में भी मंथर गति। एक कदम आगे बढ़ाने से पहले उस पर दस घण्टे तक विचार-विमर्श। कुछ इसी प्रकार का इस संस्था का कार्यक्रम है। इस संस्था के कतिपय सभासद व्यक्तिगत रूप से ’गरम‘, ’अग्रगामी‘ और ’प्रगतिशील‘ होंगे, पर सामूहिक रूप से उन्हें नरम दल की चैखट में ही घुटन महसूस करते हुए रहना अनिवार्य है। उसके विपरीत लाहौर की सोसाइटी को लालाजी जैसा तड़पदार-तेजस्वी नेतृत्त्व मिलने के कारण उसे सर्वांगीण प्रगतिपरक स्वरूप प्राप्त हुआ है। यह सोसाइटी सामाजिक और राजनीतिक विषय में एक जैसे प्रगतिशील कार्यकत्र्ता निर्माण करने का कार्य उत्साह और साहस के साथ कर रही है। इस संस्था के विकास के लिए उन्होंने काफी कष्ट सहन किये हैं। इस प्रकार लाला लाजपतरायजी का चरित्र विविधांगी है। सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक आदि समस्त क्षेत्रों में वे अपना अनमोल योगदान दे गये हैं और उनके कालवश हो जाने के उपरांत भी उनके बहुमुखी रचनात्मक कार्य उनके सचेतन स्मारक के रूप में चिरस्थायी एवं अमर रहेंगे।

सन्दर्भ: (1) डॉ0 बाबासाहब अम्बेडकर चरित्र, खण्ड-2, पृष्ठ-197 लेखक-चांगदेव भवानाव खैरमोडे-द्वितीय आवृत्ति-14 अक्टूबर 1991, मूल्य-90.00, प्रकाशक-सुगावा प्रकाशन-पुणे-महाराष्ट्र।

(2) बहिष्कृत भारत (मराठी साप्ताहिक): सम्पादक: डॉ0 भीमराव अम्बेडकर, दिनांक: 7 दिसम्बर 1928।

(3) अनुवाद-कुशलदेव शास्त्री।

ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं

  ऒ३म्

ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये व्यवहार नहीं
धरा ठिठुरती है सर्दी से
आकाश में कोहरा गहरा है
बाग़ बाज़ारों की सरहद पर
सर्द हवा का पहरा है
सूना है प्रकृति का आँगन
कुछ रंग नहीं , उमंग नहीं
हर कोई है घर में दुबका हुआ
नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं
चंद मास अभी इंतज़ार करो
निज मन में तनिक विचार करो
नये साल नया कुछ हो तो सही
क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही
उल्लास मंद है जन -मन का
आयी है अभी बहार नहीं
ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
ये धुंध कुहासा छंटने दो
रातों का राज्य सिमटने दो
प्रकृति का रूप निखरने  दो
फागुन का रंग बिखरने दो
प्रकृति दुल्हन का रूप धार
जब स्नेह – सुधा बरसायेगी
शस्य – श्यामला धरती माता
घर -घर खुशहाली लायेगी
तब चैत्र  शुक्ल  की प्रथम तिथि
नव वर्ष मनाया जायेगा
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर
जय गान सुनाया जायेगा
युक्ति – प्रमाण से स्वयंसिद्ध
नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध
आर्यों की कीर्ति सदा -सदा
नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
अनमोल विरासत के धनिकों को
चाहिये कोई उधार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये व्यवहार नहीं …………

प्रेषक –  रविन्द्र आर्य
( किसी कवि की रचना है )
~ अज्ञात

ग़जल

ग़जल

– डॉ. रामवीर

मस्रुफ़१ खुशामद में क्यों हैं

मुल्क के सब आला अदीब२।

जो रहे कभी रहबरे क़ौम

क्यों हुए हुकूमत के नक़ीब३।

इस बदली हुई फ़ज़ा में अब

हैरान उसूलों के अक़ीब४।

यह वक्त नहीं है ग़फ़लत का

हालात हुए बेहद महीब५।

नाम जम्हूरियत है लेकिन

काबिज हैं हाकिमों के असीब६।

लाचार रिआया के चेहरे

हो चुके हैं मानिंदे ज़बीब७।

इस दौरे मल्टिनेशनल में

रोजी को तरसता है ग़रीब।

कब छटेंगे गर्दिश के ग़ुबार

क ब जगेगा बेबस का नसीब।

१. व्यस्त २. साहित्यकार ३. चोबदार ४. अनुयायी ५. भयानक ६. सन्तान ७. मुनक्काड्ड

– ८६, सैक्टर- ४६, फरीदाबाद-१२१०१०

हम उत्तम बुद्धि व ज्ञान की वाणियों का सेवन करें

ओ३म
हम उत्तम बुद्धि व ज्ञान की वाणियों का सेवन करें
डा. अशोक आर्य
मानव जीवन में प्राणायाम का विशेष मह्त्व है । इसलिए इसे पुरुदंसस कहा गया है । यह प्राणायाम ही हमें उत्तम बुद्धि देने वाला है , हमें उत्तम बुद्धि रुपि धन का भण्डारी बनाता है , इस धन से हमें सम्पन्न करता है। उत्तम बुद्धि का भण्डारी बनाकर प्राणायाम के ही कारण ग्यान की वणियों अर्थात वेद के आदेश का सेवन करने वाला यह हमें बनाता है । प्राणायाम के ही कारण हम ग्यान की वाणियों का सेवन कर पाते हैं । इस बात का परिचय इस मन्त्र के स्वाध्याय से हमें इस प्रकार मिलता है : –
अश्विना पुरुदंससा नरा श्वीरया धिया ।
धिष्ण्या वनतं गिर: ॥ ऋग्वेद १.३.२ ॥
इस मन्त्र मे चार बातों पर प्रकाश डाला गया है :-
१. प्राण अपाण गतिशील रहें
मन्त्र कह रहा है कि हे प्राण तथा अपाणों ! आप हमारे पालक बनो । आप ही हमारे पूरक कर्मों को करने वाले बनो । इस तथ्य से यह स्पष्ट होता है कि हमारे प्राण तथा अपान अर्थात हम जिस श्वास के लेने व छोड्ने की क्रिया करते हैं , वह क्रिया ही हमारी पालक है, हमारा पालन करने वालई है, हमें जीवित रखने वाली है । हमारे जीवन को सुख पूर्वक चलाने वाली है । हम इस के आधार पर ही जीवित हैं । जब शवास की यह क्रिया रुक जाती है तो हम जीवन से रहित होकर केवल मिट्टी के टेले के समान बन जाते हैं । गत मन्त्र में भी लगभग इस तथ्य पर ही प्रकाश डालते हुए कहा गया था कि हमारे प्राण व आपान क्रियाशील हैं । यह क्रिया ही मानव का ही नही अपितु प्रत्येक जीव का , प्रत्येक प्राणी का पालन करने वाली हों । भाव यह कि हमारे प्राण ( श्वास लेने की क्रिया ) तथा अपान ( श्वास छोडने की क्रिया) निरन्तर चलती रहे , कार्यशील बनी रहे । हम जानते ही हैं कि यह प्राण अपान ही हमारे अन्दर जीवनीय शक्ति भरते हैं । इसके बिना हम एक पल भी जीवित नहीं रह सकते । इसके बिना हम क्रियाहीन होकर मृतक कहलाते हैं ।
२. गतिमान व क्रियाशील बनें
इस प्रकार हमारे शरीर में प्राण व अपान क्रियाशील रहते हैं तो हम भी जीवित कहलाते हैं , क्रियाशील रहते हुए अपने जीवन को निरन्तर आगे लेजाने का यत्न करते हैं । अनेक प्रकार की उपलब्धियां पाने का यत्न करते हैं । सदा उन्नति के पथ पर ही अग्रसर रहने का प्रयास करते रहते हैं । यदि प्राण – अपान हमारे शरीर में गतीमान नहीं होते तो हम क्रिया विहीन हो जाते हैं , जिसे मृतक की संज्ञा दी जाती है । इस लिए मन्त्र जो दूसरी बात हमें समझाने का यत्न कर रहा है , वह है कि हमारे प्राण व अपान इस प्रकार सदा कर्म शील रहते हुए हमें आगे तथा ओर आगे ले जाने वाले बनें तथा हमारी उन्नति का कारण बनें । स्पष्ट है कि हम जीवन में जो कुछ भी पाते हैं , यहां तक कि उस प्रभु क जो हम स्मरण भी हम करते हैं तो वह भी प्राण ओर अपान के ही कारण ही लेते हैं । इसलिए हम पिता को प्रार्थना करते हैं कि हे पिता ! हमारे प्राण व आपान को सदा गतिमान, सदा क्रियाशील बनाए रखे ।
२. स्वाध्याय द्वारा सोम कण सुरक्षित करें
मन्त्र के तृतीय भाग में कहा गया है कि जब शरीर में प्राण व अपान गतिमान होते हैं तो हम भी गतिमान होते हैं , क्रियाशील होते हैं । क्रियाशील होने के कारण ही हम मे स्वाध्याय की शक्ति आती है । स्वाध्याय कर ही हम वह शक्ति पा सकते है , जिसमें जीवन है । जिसमें जीवन ही नहीं है , मात्र एक मृतक शरीरवत , लाश मात्र है वह क्या कुछ करेगा , वह तो क्रियाविहीन होता है । इस कारण किसी भी क्रिया को करने की उससे कल्पना भी नहीं की जाती । इस लिए शरीर में प्राण व अपान का निरन्तर चलते रहना आवश्यक है । जब प्राण व अपान क्रियाशील रहते हैं तो शरीर क्रिया शील रहता है तथा क्रियाशील शरीर ही कुछ करने की क्षमता रखता है । एसे शरीर में ही स्वाध्याय की शक्ति होती है तथा हम स्वाध्याय के माध्यम से अनेक प्रकार के ज्ञान का भण्डार ग्रहण करने के लिए सशक्त होते हैं । इस तथ्य पर ही मन्त्र के इस भाग मे उपदेश किया गया है कि यह हमारे प्राण तथा अपान हमें उत्तम बुद्धि देने वाले हों । जब हम प्राण तथा अपान को संचालित करते हैं तो इस की साधना से हमारे शरीर में सोम कण सुरक्षित होते हैं तथा हमारी बुद्धि को यह कण तीव्र करने का कारण बनते हैं ।
४. हमारी बुद्धि तीव्र हो
मन्त्र कहता है कि प्राण व अपान के सुसंचालन से हमारे शरीर मे बुद्धि को तीव्र करने वाले जो सोम कण पैदा होते हैं , उनसे हमारी बुद्धि तीव्र होती है । यह तीव्र बुद्धि ही होती है जो मानव को कभी कुण्ठित नही होने देती। जिस प्रकार कुण्ठित तलवार से किसी को काटा नहीं जा सकता, कुण्ठित चाकू से सब्जी को भी टीक से काटा नहीं जा सकता , टीक इस प्रकार ही कुण्ठित बुद्धि से उत्तम ज्ञान भी प्राप्त नहीं किया जा सकता । इस प्रकार ही जिन की बुद्धि कुण्ठित नहीं होती , जिन की बुद्धि तीव्र होती है , वह बुद्धि किसी भी विषय को ग्रहण करने में कुण्ठित नहीं होती , किसी भी विषय को बडी सरलता से ग्रहण कर लेती है । इस प्रकार मन्त्र कहता है कि अपनी इस तीव्र बुद्धि से हम ज्ञान की वाणियों का अर्थात वेद के मन्त्रों का सेवन करें , इन का स्वाध्याय करें , इन का चिन्तन करें , इनका मनन करें , इनको अपने जीवन में धारण करें ।
मन्त्र का भाव है कि हम अपने जीवन में प्राणायाम के द्वारा प्राणसाधना करें । इस प्राण साधना से ही हम तीव्र बुद्धि वाले बनें । तीव्र बुद्धि वाले बन कर हम अपनी इस बुद्धि से ज्ञान की वाणियों के समीप बैठ कर इन का उपासन करे , भाव यह कि हम वेद का स्वाध्याय करें । हम बुद्धि को व्यर्थ के विचारों में प्रयोग न कर इसे निर्माणात्मक कार्यों में लगावें ।

डा. अशोक आर्य

गतः सुहृत् सः प्रियधर्मवीरः

गतः सुहृत् सः प्रियधर्मवीरः

– सुभाष वेदालंकार

वाचा वरीयान् मनसा महीयान् विचक्षणो वेदविदां वरेण्यः,

यः कर्मवीरो धृतिमान् तपस्वी, गतः सुहृत् सः प्रियधर्मवीरः।।

यो भारतीति प्रस्थितो बुधेन्द्रैः, वेदप्रचारे सततं रतोऽभूत,

देशे तदर्थं विचचार नित्यं, गतः सुहृत् सः प्रियधर्मवीरः।।

परोपकारी सः परोपकारी-संपादको लेखकवर्य आसीत्,

कृते सभायाः कृतवान् प्रयत्नान्, गतः सुहृत् सः प्रियधर्मवीरः।।

सभां समुन्नेतुमहो प्रयत्नान् चकार यान् तान्नहि को नु वेद,

स्वजीवनं येन समर्पितं च, गतः सुहृत् सः प्रियधर्मवीरः।।

जाता क्षतिर्देशसमाजयोर्या पूर्तिं न सा यास्यति तूर्णमेव,

जगाम दूरं परिवारतो नो, गतः सुहृत् सः प्रियधर्मवीरः।।

– अजमेर

हे पितृ तुल्य प्रभु ! आप हमें पिता सम उपल्ब्ध हों

औ३म
हे पितृ तुल्य प्रभु ! आप हमें पिता सम उपल्ब्ध हों

डा.अशोक आर्य

ऋग्वेद का आरम्भ इस सूक्त से होता है ! यह इस वेद के प्रथम मण्डल के प्रथम सूक्त के रुप में जाना जाता है । इस सूक्त क मुख्य विषय है कि जीव सदा परमपिता की उपासना चाहता है, समीपता चाहता है, निकटता चाहता है,अपना आसन प्रभु के समीप ही रखना चाहता है । जीव यह भी इच्छा रखता है कि वह पिता उस के लिये प्रतिक्षण उपल्ब्ध रहे तथा वह ठीक उस प्रकार प्रभु से सम्पर्क कर सके , उसके समीप जा सके, जिस प्रकार वह अपने पिता के पास जा सकता है । वह प्रभु से पिता- पुत्र जैसा सम्बन्ध रखना चाहता है । इस सूक्त के ऋषि मधुछन्दा: , देवता अग्नि: ,छन्द गायत्री तथा स्वर:षड्ज्क्रि हैं । आओ इस आलोक में हम इस सूक्त का वाचन मन्त्रों के साथ करें तथा इसे समझने का यत्न करें ।
सबसे बडे दाता प्रभु का हम सदा स्मरण करें
परमपिता परमात्मा ने इस संसार की रचना की है। उस के ही आदेश से यह संसार चल रहा है । उसकी ही प्रेरणा से यह सूर्य , चन्द्र तारे आदि गतिशील होकर सब प्राणियों की रक्षा करने व उन्हें पुष्ट करने का कार्य कर रहे हैं । इस परमपिता परमात्मा के दानों का वर्णन ऋग्वेद के प्रथम मण्ड्ल के प्रथम सुक्त के दस मन्त्रों में बडे ही उतम ढग से वर्णन किया गया है । प्रभु को हम प्रभु क्यों कहते हैं , उस पिता को हम दाता क्यों कहते हैं तथा उस पिता का स्मरण करने के लिये , उस की उपसना करने के लिये हमें उपदेश क्यों किया जाता है ? इस सब तथ्य को इस ऋचा में बडे विस्तार से प्रकाशित किया गया है । रऋचा के प्रथम मन्त्र हमें इस प्रकार उपदेश दे रहा है : –
अग्निमीळे पुरोहितं यग्यस्य देवम्रत्विजम ।
होतारं रत्न्धातमम ॥ रिग्वेद १ .१ .१ ॥
मन्त्र में बताया गया है कि अग्नि रुप यज्ञ के देव , जो होता है तथा विभिन्न प्रकार के रत्नों को देने वाला है ,एसे प्रभु की हम सदा स्तुति किया करें ।
मन्त्र प्राणी मात्र को उपदेश कर रहा है कि वह परमपिता परमात्मा इस जगत को , इस ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने वाला है , इसे गति देकर इसे जगत की श्रेणी में लाने वाला है । वह प्रभु ही सब प्राणियों को उपर उठाने का कार्य भी करता है सब प्राणियों को उन्नत भी करता है , सब प्राणियों को आगे भी बढाता है । एसे साधक , जो हम सब का अग्रणी भी है , की हम सदा उपासना किया करें , उस प्रभु के चरणों में बैठा करें, उस के समीप सदा अपना आसन लागावें तथा उस प्रभु का स्तवन करें , स्तुति रुप प्रार्थना करें ।
हम जिस प्रभु की प्रार्थना करने के लिये इस मन्त्र द्वारा प्रेरित किये गये हैं , उस प्रभु के सम्बन्ध में भी इस मन्त्र में प्रकाश डालते हुये बताया है कि जो पदार्थ कभी बने नहीं अपितु पहले से ही प्रभु ने अपने गर्भ में रखे हुये हैं । इस का भाव यह है कि इस जगत की रचना से पूर्व भी यह सब विद्यमान थे तथा जो स्वयं ही होने वाले थे । दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि उस प्रभु का कभी निर्माण नहीं हुआ । वह प्रभु इस जगत की रचना से पूर्व भी विद्यमान था । स्वयं होने के कारण उसे खुदा भी कहा गया है । इतना ही नहीं वह प्रभु हम प्राणियों के सामने एक आदर्श के रुप में विद्यमान है । उस प्रभु में जो गुण हैं , उन्हें ग्रहण कर हमने स्वयं को भी वैसा ही बनाने का यत्न करना है । उस परम पिता प्ररमात्मा ने हमारे सब कार्यों का , हमारे सब कर्तव्यों का , हमारे सब वांछित क्रिया कलापों का वेद में वर्णन कर दिया है, वेद में आदेशित कर दिया गया है । हमें उन के अनुसार ही अपना जीवन व दिनचर्या बनानी चाहिये ।
उस प्रभु ने ही हमारे कल्याण के लिये हमें वेद वाणी दी है , वेदों के रुप में ज्ञान का अपार भण्डार दिया है । वह प्रभु ही वेद में सब प्रकार के यज्ञों का प्रकाश करने वाले हैं । अर्थात उन्होंने वेद में विभिन्न प्रकार के यज्ञों का प्रकाश कर दिया है , विभिन्न प्रकार से दान करने की प्रेरणा दे दी है । मानव के जितने भी कर्तव्य हैं , उन सब का प्रतिपादन , उन सब का वर्णन उस पिता ने वेद मे कर दिया है ।
हमारा यह परमपिता परमात्मा स्मरण करने के योग्य है , सदा स्मरणीय है । परमात्मा के स्मरण के लिये कहा गया है कि कोई समय एसा नहीं , जब उसे स्मरण न किया जा सके , कोई काल एसा नहीं जब उसे स्मरण न किया जा सके । इतना ही नहीं प्रत्येक ऋतु में ही उसे स्मरण किया जा सकता है तथा किया जाना चहिये । अत: मन्त्र कहता है कि उस दाता को हमें सदा स्मरण करना चाहिये , उस प्रभु को हमें सदा स्मरण करना चाहिये ,जो हमें सदा शक्ति देता है, जिसके स्मरण मात्र से , जिसके समीप बैठने से तथा जिसकी स्तुति करने से हमें अपार शक्ति मिलती है। शक्ति का प्रवाह हमारे शरीर में ओत – प्रोत होता है ।
मानव सदा विभिन्न कार्यो में उलझा रहता है । कभी उसे अपने व्यवसाय के लिये कार्य करना होता है तो कभी उसे अपने परिजनों का ध्यान करना होता है , उनकी देख रेख करनी होती है । परिवार की इन चिन्ताओं के कारण उस के पास समय का अभाव हो जाता है । समय के इस अभाव को वह साधन बना कर प्रभु चिन्तन से दूर होने का यत्न करता है किन्तु मन्त्र ने इस का भी बडा ही सुन्दर समाधान दे दिया है । मन्त्र कह रहा है कि हे मानव ! यह ठीक है कि तेरा जीवन अत्यन्त व्यस्त है । इस मध्य तूं ने अनेक समस्याओं के समाधान में अपना समय लगाना है इस कारण सम्भव है कि दैनिक कार्यों को पूरा करने के कारण तेरे पास प्रभु स्मरण का समय ही न रहे , जब कि प्रतिपल प्रभु को स्मरण करने के लिये कहा गया है, एसी अवस्था मे भी एक समय तेरे पास एसा होता है , जब तुझे किसी प्रकार का कोई काम नहीं होता । इस काल में तूं ने केवल आराम , केवल विश्राम ही करना होता है । इस काल का , इस समय का नाम है रात्रि । यह रात्रि का समय ही तो होता है जब हमें कुछ सोचने , विचारने व स्मरण करने का अवसर देता है । रात्रि काल में जब हम अपने शयन स्थान पर जावें तो कुछ समय स्वाध्याय स्वरुप वेद का अध्ययन करें तथा फ़िर इस स्थान पर ही कुछ काल प्रभु का स्मरण करें । रात्री को सोते समय प्रभु स्मरण से प्रभु हमारा सहयोगी हो जाता है , पथ प्रदर्शक हो जाता है , मित्र हो जाता है । जब प्रभु हमारा सहायक हो जाता है तो रात्रि को जब हम निद्रा अवस्था में होते हैं तो वह प्रभु ही हमारा रक्षक होता है , चौकीदर का काम करता है तथा हमें किसी प्रकार का बुरा, भ्यावह स्वप्न तक भी हमारे पास नहीं आने देता । स्वपन में भी हमें प्रभु ही दिखाई देता है । प्रभु की गोद में रहते हुये इस प्रकार शान्त निद्रा मिलती है , जैसी माता की गोदी में ही मिला करती है । अत; एसी अवस्था में प्रभु के ही स्वप्न आते हैं । स्वपन अवस्था में प्रभु ने जो पाठ हमें दिया होता है , उस उतम पाठ को हम जाग्रत अवस्था में भी कभी न भुलें । यह यत्न ही हमें करना है ।
इस जगत में सबसे बडा दानी प्रभु को ही कहा गया है । हम अपने जीवन में जिन जिन वस्तुओं का उपभोग करते , जिन जिन पदार्थों का सेवन करते हैं ,वह सब उस प्रभु की ही देन है । परमपिता परमात्मा ने हमारे जीवन को उत्तमता से भरकर प्रसन्नता से भर पूर बनाने के लिये यह फ़ल, यह फ़ूल ,यह वन्सपतियां, यह सूर्य, यह चन्द्र , यह वायु, यह जल दिया है । यदि पिता यह सब कुछ न देता तो हमारे जीवन का एक पल भी चल पाना सम्भव नहीं था । यह सब कुछ उस पिता ने दिया है । तब ही तो हम उसे सब से बडा दाता, सबसे बडा दानी कहते हैं । उस प्रभु ने इस संसार के प्राणियों को तो अपने अन्दर समेट ही रखा है किन्तु जब संसार समाप्त हो जाता है, जब प्रलय आ जाती है , तब भी प्रभु ही इस जगत को सम्भालता है । प्रलय के समय इस पूरे बर्ह्माण्ड को हमारा वह परम पिता अपने अन्दर समेट कर इस की रक्षा करता है ।
परमपिता प्रभु ने मानव मात्र के , प्राणी मात्र के हित के लिये जितने भी पदार्थ आवश्यक थे, उन सब की रचना की है । जितनी भी आनन्द देने वाली ,सुख देने वाली, रम्नीक वस्तुएं हैं , उन सब को धारण करने वाले वह सर्वोतम प्रभु हैं तथा यह सब हमें बांटने क कार्य भी कर रहे हैं ।
वह पिता एक अनुभवी कारीगर भी है , एक अनुभवी निर्माता भी है , एक अनुभवी संचालक भी है , जो इस शरीर रुपि कारखाने के अन्दर बडी ही उतम व्यवस्था करता है । इस शरीर में अन्न देता है । अन्न से हमारा यह रक्त बनता है । रक्त से शरीर में मांस बनता है , मोदस बनता है , अस्थि व मज्जा बनते हैं तथा फ़िर इससे ही वीर्य बनता है , जो शरीर को शक्ति देकर बलिष्ट बनाता है । इन सात धातुओं का निर्माण क्रमानुसार इस शरीर में ही करता है । इन सात धातुओं को ही सात रत्न कहा जाता है । जब हम शरीर शास्त्र का अध्ययन करते हैं तो इन सात धातुओं के समबन्ध में तथा इन के महत्व के समबन्ध में हमें ज्ञान होता है । इन सप्त धातुओं ने ही इस शरीर को रमणीक बना दिया है । । बस इस कारण ही इन धातुओं को रत्न का नाम दिया गया है । इस शरीर को उस पिता ने एक निवास का , एक घर क रुप देते हुये इस में ही इन सात रत्नों की स्थापना कर दी है, इनका निवास बना दिया है । एसे दयालु प्रभु का, एसे दाता प्रभु का, एसे सब याचकों की याचना को पूरा करने वाले प्रभु का हमें सदा ध्यान करना चाहिये, उसके पास बैठ कर उसकी स्तुति करनी चाहिये, उसकी प्रार्थना करनी चाहिये ।
ज्ञानी, निरोग, निर्मल, मधुर्भाषी, क्रियाशील व्यक्ति प्रभु का स्मरण कर दिव्यगुण पाता है , ज्ञान प्राप्त करने का अभिलाषी ही पिता का सच्चा उपासक होता है, जो निर्मल रहते हुये निरोग रहता है, जो दूसरों की प्रशंसा करते हुये सदा मधुर ही बोलता है तथा सदैव क्रियमान रहता है । प्रभु के समीप रहने से दिव्यगुणों की वृद्धि होती है । इसे यह मन्त्र इस प्रकार स्पष्ट कर रहा है :-
अग्नि: पूर्वेभिर्रिषिभिरीड्यो नूतनैरुत ।
स देवां एह वक्शति ॥ ऋग्वेद १.१.२ ॥
विगत मन्त्र में बताया गया था कि तत्वदर्शी लोग ही प्रभु की समीपता पाते हैं । तत्वदृष्टा अपनी रक्षा स्वयं करते हैं । स्वयं को किसी प्रकार के रोग से आक्रान्त नहीं होने देते , रोगों का आक्रमण अपने आप पर नहीं होने देते । इस के साथ ही साथ अपने में जो कमियां हैं , जो न्यूनतायें हैं , उन्हें भी वह दूर करते ही रहते हैं । भाव यह है कि वह स्वयं को पूर्ण करने का यत्न सदा ही करते रहते हैं । वह जो भी शब्द बोलते हैं, वह प्रशंसात्मक ही होते हैं , दूसरे को प्रसन्न करने वाले ही होते है , एसे शब्द कभी नहीं बोलते, जिससे दूसरे को दु:ख हो । यह लोग दूसरों की निन्दा करने से सदा दूर रहते हैं , दूसरों की अच्छाईयों का ही वर्णन करते हैं , उनकी कमियों का कभी वर्णन करना नहीं चाहते । यह लोग सदैव गतिशील ही रहते हैं । क्रियमान ही बने रहते हैं । आलस्य , प्रमाद से सदा दूर रहते हैं । इन का जीवन सदा क्रियाशील ही रहता है ।
इस सब का यदि संक्षेप में वर्णन करें तो हम कह सकते हैं कि जो परमपिता परमात्मा का स्तवन करते हैं, उसके उपासक बनकर स्तुति रुप प्रार्थना करते हैं वह सदा :-
( क ) तत्वदृष्टा होते हैं
( ख ) अपने शरीर में रोगों का प्रवेश नहीं होने देते ।
( ग ) अपने अन्दर जो कमियां है, जो न्यूनतायें हैं , जो अभाव हैं , उन्हें दूर करने का यत्न करते हैं ।
( घ ) जो कभी कटू, निन्दक, शब्द न बोल कर सदा प्रशंसा में ही शब्द प्रयोग करते हैं ।
( ड ) जो लोग सदा अपना जीवन गतिमान रखते हैं ,क्रियात्मक रहते हैं ।
एसे लोग ही प्रभू के समीप रहने के, बैठने के अधिकारी होते हैं ।
वह प्रभु एसे लोगों से उपासित हो कर , एसे लोगों की समीपता पा कर , इस मानव जीवन में इस प्रकार के लोगों को दिव्य गुण प्राप्त कराने का कार्य करते हैं । भाव यह है कि प्रभु प्राप्त का सब से मुख्य तथा बडा लाभ यह ही है कि प्रभु की उपासना से, प्रभु के समीप आसन लगाने से, उसकी समीपता पाने से हम में दिव्यगुणों की बडी तेजी से वृद्धि होती है ।
प्रभु उपासक को पोषण को,यशस्वी बनाने को तथा वीरता बढाने वाला धन मिलता है , जो मानव परमपिता के समीप बैठ कर उस प्रभु का स्मरण करता है , प्रभु उसे अनेक प्रकार के धनों को देता है । यह धन पोषण को बनाने वाला होता है , उसको यश दे कर यशस्वी बनाता है तथा उपासक में वीरता का संचार करता है । यह मन्त्र इस तथ्य पर ही प्रकाश डालते हुये उपदेश करता है कि : –
अग्निना रयिमश्रवत पोषमेव दिवे दिवे ।
यशसं विरत्तमम ॥ रिग्वेद १.१.३ ॥
यह मन्त्र अग्नि स्तवन पर बल देते हुये कहता है कि मनुष्य प्रभु की उपासना करने से कभी सांसारिक दृष्टि से असफ़ल नहीं होता । प्रभु स्तवन से ही वह निरन्तर आगे बढता है । वास्तव में प्रभु स्तवन से ही लक्ष्मी के दर्शन होते हैं । स्पष्ट है कि जहां प्रभु स्तवन है, वहां लक्ष्मी तो है ही, तब ही तो कहा जाता है कि मानव अग्नि से धन को प्राप्त करता है अर्थात जो प्रतिदिन यज्ञ करता है, उसे धन एश्वर्य के नियमित रुप से दर्शन होते रहते हैं ।
सामान्यत:; लोग इस बात को जानते हैं कि जिसके पास अपार धन सम्पदा होती है , उसके लिये अवनति का मार्ग खुला रहता है । इस धन की सहायता से वह अपनी इन्द्रियों को सुखी बनाने का यत्न करता है ,शराब, जुआ आदि अनेक प्रकार की बुराइयां उस में आ जाती हैं किन्तु जो धन प्रभु स्मरण से मिलता है,जो धन प्रभु स्तवन से मिलता है, जो धन अग्निहोत्र से मिलता है, जो धन यज्ञ से मिलता है, उस धन की एक विशेषता होती है , इस प्रकार से प्राप्त धन प्रतिदिन हमारे पोषण का कारण होता है । इससे हमारा किसी प्रकार का नाश, किसी प्रकार का ह्रास नहीं होता । इस प्रकार प्राप्त धन हमें कभी विनाश की ओर , मृत्यु की ओर नहीं ले जाता अपितु यह तो हमें वृद्धि की ओर , उन्नति की ओर ले जाता है , जीवन को जीवन्त बनाने व उंचा उठाने की ओर ले जाता है ।
इस प्रकार यज्ञीय विधि से हमें जो धन मिलता है , यह धन हमें यश्स्वी बनाता है, यश से युक्त करता है । इस धन में परोपकार की भावना भरी होने से हम इसे दान में लगाते हैं , दूसरों की सहायता में लगाते हैं । इस कारण हम निरन्तर यशस्वी होते चले जाते हैं । हमारा यश व कीर्ति दूर दूर तक जाती है । मानव अनेक बार अपार धन सम्पदा पा कर इसके अभिमान में मस्त हो जाता है । इस मस्ती में वह अनेक बार एसे कार्य भी कर लेता है , जो उसे अपयश का कारण बनाते हैं । किन्तु यज्ञ आदि में धन का प्रयोग करने से उस का यश व कीर्ति बढते हैं ।
प्रभु उपासना से प्राप्त धन हमें अत्यधिक सशक्त करने वाला होता है, हमारी शक्ति बढाने वाला होता है । जब अत्यधिक धन के अभिमान में व्यक्ति अनेक नोकर – चाकरों को रख कर आलसी बन जाता है , कोइ कार्य नहीं करता, निठला हो जाता है तो स्वाभाविक रूप से शारीरिक कार्य वह स्वयं नहीं करता, इस कारण निर्बल हो जाता है । क्रिया अर्थात मेहनत ही सब प्रकार की शक्तियों का आधार होती है , जो व्यक्ति क्रियाशील रहता है , उसमें शक्ति की सदा वृद्धि होती रहती है, ह्रास नहीं होता । यह क्रिया शीलता ही शक्ति की जन्म दाता होती है । जब क्रिया का क्षय हो जाता है तो शक्ति का नाश होता है । हम अपने शरीर को ही देखे , हमारे दो हाथ हैं , एक दायां तथा दूसरा बायां । प्रत्येक व्यक्ति का बायां हाथ उसके अपने ही दायें हाथ से कमजोर होता है । एसा क्यों , क्योंकि मानव अपना सब काम दायें हाथ से ही करता है, बायें हाथ से वह बहुत कम कार्य करता है । इस कारण बायां हाथ दायें की अपेक्षा कमजोर रह जाता है । यही कारण है कि क्रियाशीलता के बिना तो प्रभु स्मरण भी नहीं होता । अत: प्रभु स्मरण हमें क्रियाशील बना कर बलवान बनाता है । क्रियाशील होने से हमारा शरीर पुष्ट होता है, पुष्टी से हम अधिक कार्य करने में सक्षम होते हैं, धनेश्वर्य के स्वामी बनते हैं। हमें यश व कीर्ति मिलते हैं तथा हम में शक्ति का संचय होता है , जिससे हम वीर बनते हैं ।

डा.अशोक आर्य