Category Archives: Uncategorized

वर्णों में जातियों की गणना नहीं-डॉ सुरेन्द्र कुमार

मनु की कर्मणा वर्णव्यवस्था का साधक एक बहुत बड़ा प्रमाण यह है कि मनु ने केवल चार वर्णों का उल्लेख किया है और वर्णों के अन्तर्गत किन्हीं जातियों का परिगणन नहीं किया है। इससे दो तथ्य स्पष्ट होते हैं- एक, मनु के समय जन्मना कोई जाति नहीं थी। दो, जन्म का वर्णव्यवस्था में कोई महत्त्व नहीं था और न उसके आधार पर वर्ण की प्राप्ति होती थी। यदि मनु के समय जातियां होतीं और जन्म के आधार पर वर्ण का निर्धारण होता तो वे उन जातियों का परिगणन अवश्य करते और बतलाते कि अमुक जातियां ब्राह्मण हैं, अमुक क्षत्रिय हैं, अमुक वैश्य हैं और अमुक शूद्र हैं। मनु ने प्रथम अध्याय (1.31, 87-92) में जब वर्णों की उत्पत्ति बतलायी है, तब केवल चार वर्णों-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण का उल्लेख किया है। वहां किसी भी जाति की उत्पत्ति का वर्णन या उल्लेख न होना यह सिद्ध करता है कि मनुस्मृति की व्यवस्था से जन्मना जातियों का कोई सबन्ध नहीं था। दशम अध्याय में कुछ जातियों का अप्रासंगिक वर्णन है जो स्पष्टतः बाद में मिलाया गया प्रक्षिप्त प्रसंग है। यदि वह मनुकृत मौलिक होता तो वह प्रथम अध्याय के वर्णोत्पत्ति प्रसंग (1.31, 87-91) में ही वर्णित मिलता।

    निष्कर्ष-मनु का समय अति प्राचीन है। यद्यपि उन्होंने मनुस्मृति में जो आदर्श जीवनमूल्य, मर्यादाएं और धर्म का स्वरूप प्रस्तुत किया है, वह सार्वभौम एवं सार्वकालिक है, किन्तु जो देश-काल-परिस्थितियों पर आधारित व्यवस्थाएं हैं, वे तदनुसार परिवर्तनीय हैं। मनु ने अपने समय जिस सामाजिक व्यवस्था को ग्रहण किया वह उस समय की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था थी। यही कारण है वह व्यवस्था अत्यन्त व्यापक प्रभाव वाली रही और हजारों वर्षों तक वह विश्व के अधिकांश भाग में प्रचलित रहती रही है। इस कालचक्र में कुछ व्यवस्थाएं अपने मूल स्वरूप को खोकर विकृत हो गयीं। आज राजनैतिक और सामाजिक परिस्थितियां बदलीं, हम राजतन्त्र से प्रजातन्त्र में आ गये। समयानुसार अनेक सामाजिक व्यवस्थाओं में भी परिवर्तन हुआ। किन्तु इसका अभिप्राय यह नहीं है कि प्राचीनता हमारे लिए पूर्णतः अग्राह्य और अपमान की वस्तु बन गयी। यदि हमारी यही सोच उभरती है तो प्राचीन गौरव से जुड़ी प्रत्येक वस्तु जैसे-महापुरुष, वीर पुरुष, कवि, लेखक, नगर, तीर्थ, भवन, साहित्य, इतिहास सभी कुछ निन्दा की चपेट में आ जायेगा। अपने अतीत से कट जाने वाले समुदाय गौरव के साथ आगे नहीं बढ़ सकते। अतीत की उपेक्षा का अर्थ है भविष्य की उपेक्षा। ‘इतिहास’ नामक विषय के अध्ययन का जिन कारणों से महत्त्व है, वही महत्त्व वर्णव्यवस्था के अध्ययन का है। हमें केवल विरोध के लिए ही अतीत का मूल्यांकन नहीं करना चाहिए, अपितु किसी भी व्यवस्था, वस्तु, व्यक्ति का मूल्यांकन तत्कालीन परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में ही किया जाना चाहिए। वही सही मूल्यांकन माना जा सकता है और वह मूल्यांकन यह है कि मनु की वर्णव्यवस्था कर्म पर आधारित थी जन्म पर नहीं। अतः मनु पर जातिवादी होने का आरोप नितान्त निराधार एवं मिथ्या है।

मनु और मनुस्मृति पर आक्षेप: एक विचार: डॉ0 रामकृष्ण आर्य (वरुणमुनि वानप्रस्थी)

राजर्षि मनु वेदों के बाद सर्वप्रथम धर्म प्रवक्ता, मानव मात्र के पूर्वज राजधर्म और विधि (कानून) के सर्वप्रथम प्रणेता थे। उनके द्वारा रचित धर्मशास्त्र संसार का सर्वप्रथम और सर्वश्रेष्ठ धर्मशास्त्र है, जिसे मनुस्मृति के नाम से जाना जाता है। इस मनुस्मृति में बिना किसी पक्षपात के मानवमात्र को उन्नति के समान अवसर प्रदान करनेवाली एक उत्तम वैज्ञानिक और अद्वितीय समाज-व्यवस्था का प्रतिपादन किया गया है, जिसे वर्ण-व्यवस्था कहा जाता है। जोकि मनुष्य मात्र के गुण, कर्म और स्वभाव पर आधारित है। मनु की यह सबसे बड़ी विशेषता है कि वे जन्म के आधार पर किसी मनुष्य को उच्च या नीच नहीं मानते।

मनुस्मृति का वर्तमान स्वरूप

स्वायम्भुव मनु मनुस्मृति के प्रवक्ता हैं। प्रवक्ता इसलिए कि मनुस्मृति मूलतः प्रवचन है, जिसे मनु के प्रारम्भिक शिष्यों ने संकलित कर एक विधिवत् शास्त्र या ग्रन्थ का रूप दिया। मनुस्मृति में कुल 12 अध्याय और 2685 श्लोक हैं। मनुस्मृति सहित प्राचीन ग्रन्थों का आज जो वैज्ञानिक अध्ययन हो रहा है, उसके अनुसार मनुस्मृति में 1214 श्लोक मौलिक और 1471 श्लोक प्रक्षिप्त सिद्ध होते हैं।

भारत और विदेशों में मनुस्मृति की प्रतिष्ठा

वेद के बाद यदि किसी ग्रन्थ की भारत और भारत से बाहर विदेशों में सर्वत्र अत्यधिक प्रतिष्ठा है, तो वह ग्रन्थ मनुस्मृति है। विस्तारभय से हम उसका वर्णन करने में असमर्थ हैं। ऐसे विश्वप्रसिद्ध ’लागिवर‘ एवं समाज-व्यवस्था प्रणेता पर पता नहीं किस स्वार्थ के वशीभूत होकर आक्षेप और आरोप लगाये जा रहे हैं, जो चिन्तनीय हैं।

मनु और मनुस्मृति पर आक्षेप

मनु और मनुस्मृति पर आक्षेप तीन प्रकार से लगाये जा रहे हैं। (क) मनु ने जन्म पर आधारित जात-पाँत व्यवस्था का निर्माण किया। (ख) उस व्यवस्था में मनु ने शूद्रों, अर्थात् दलितों के लिए अमानवीय और पक्षपातपूर्ण विधान किये, जबकि सवर्णों, विशेष रूप से ब्राह्मणों को विशेषाधिकार दिये गये। इस प्रकार मनु शूद्र विरोधी थे। (ग) मनु नारी जाति के विरोधी थे। उन्होंने नारी को पुरुष के समान अधिकार ही नहीं दिये, अपितु नारी जाति की घोर निन्दा भी की है।

 

आक्षेपों पर विचार

(क) मनु ने जन्माधारित जात पाँत व्यवस्था का निर्माण नहीं किया, अपितु गुण-कर्म स्वभाव आधारित वर्ण-व्यवस्था का निर्माण किया जिसका मूल ऋ0 10/90/11-12, यजुः0 31/10-11 और अथर्व0 19/6/5-6 में पाया जाता है। मनु वेद को परम प्रमाण मानते हैं। इस वर्ण-व्यवस्था को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार समुदायों में व्यवस्थित किया गया है। ब्राह्मण-ज्ञान का आदान-प्रदान करनेवाला प्रधान व्यक्ति और उसका समुदाय। क्षत्रिय – समाज की रक्षा का भार उठानेवाला, वीरता, गुण, प्रधान व्यक्ति और उसका समुदाय। वैश्य – कृषि, उद्योग, व्यापार, अर्थ, धन, सम्पत्ति का अर्जन, वितरण करनेवाला प्रधान गुणवाला व्यक्ति और उसका समुदाय। शूद्र – जो पढ़ने लिखाने से भी पढ़-लिख नहीं सके ऐसा शारीरिक श्रम करनेवाला प्रधान व्यक्ति और उसका समुदाय मिलकर वर्ण व्यवस्था की संरचना करते हैं। (मनुस्मृति-1/31, 87-91, 10-45)। मनु ने अपनी मनुस्मृति के वर्णों के अतिरिक्त जन्माधारित जातियों, गोत्रों आदि का कहीं भी उल्लेख नहीं किया है। इतना ही नहीं मनु ने तो भोजनार्थ समय कुल, गोत्र पूछने और बतानेवाले को ’वमन करके खानेवाल‘ इस निंदित विशेषण से विशेषित किया है। (मनु0 3/109)।

 

जति-व्यवस्था वर्ण-व्यवस्था से उल्टी

जति-व्यवस्था में जन्म से ऊँचे-नीचे को महत्व दिया है, गुण-कर्म और योग्यता को नहीं। ब्राह्मणादि के घर जन्म लेनेवाला ब्राह्मणादि ही कहलाता है चाहे उसमें ब्राह्मणादि के गुण, कर्म, और योग्यता न हो तथा शूद्र के घर जन्म लेनेवाला शूद्र ही कहलाता है चाहे उसमें सम्पूर्ण गुण, कर्म, योग्यता ब्राह्मणादि के क्यों न हों।

मनु शूद्र अर्थात् दलित विरोधी नहीं थे

(ख) मनु शूद्र अर्थात् दलित विरोधी नहीं थे। विचार करें कि मनुस्मृति में शूद्रों की क्या स्थिति है ?

आजकल की दलित पिछड़ी और जनजाति कही जानेवाली जातियों को मनु ने शूद्र नहीं कहा है, अपितु जो पढ़ने-पढ़ाने का पूर्ण अवसर देने के बाद भी न पढ़ सके और केवल शारीरिक श्रम से ही समाज की सेवा करे, वह शूद्र है। (मनु0 1/90)।

मनु प्रत्येक मनुष्य को समान शिक्षाध्ययन करने का समान अवसर देते हैं। जो अज्ञान, अन्याय, अभाव में से किसी एक भी विद्या को सीख लेता है, वही मनु का द्विज अर्थात् विद्या का द्वितीय जन्मवाला है। परन्तु जो अवसर मिलने के बाद भी शिक्षा ग्रहण न कर सके, अर्थात् द्विज न बन सके वह एक जाति जन्म (मनुष्य जाति का जन्म) में रहनेवाला शूद्र है। दीक्षित होकर अपने वर्णों के निर्धारित कर्मों को जो नहीं करता, वह शूद्र हो जाता है, और शूद्र कभी भी शिक्षा ग्रहण कर ब्राह्मणादि के गुण, कर्म, योग्यता प्राप्त कर लेता है, वह ब्राह्मणादि का वर्ण प्राप्त कर लेता है। प्रत्येक व्यक्ति जन्म से शूद्र होता है। संस्कार में दीक्षित होकर ही द्विज बनता है (स्कन्दपुराण)। इस प्रकार मनुकृत शूद्रों की परिभाषा वर्तमान शूद्रों और दलितों पर लागू नहीं होती। (10/4, 65 आदि)।

(2) शूद्र अस्पृश्य नहीं-मनु ने शूद्रों के लिए उत्तम, उत्कृष्ट और शुचि जैसे विशेषणों का प्रयोग किया है, अतः मनु की दृष्टि में शूद्र अस्पृश्य नहीं है। (मनु0 9/335) शूद्रों को द्विजाति वर्णों के घरों पर भोजन आदि कार्य करने का निर्देश दिया है। (मनु0 1/91, 9/334-335)। शूद्र, अतिथि और भृत्य (शूद्र) को पहले भोजन कराया जाए। (मनु0 3/112, 116)। क्या आज के वर्णरहित समाज में शूद्र नौकर को पहले भोजन कराया जाता है ? इस प्रकार मनु शूद्र को निन्दित अथवा घृणित नहीं मानते थे।

(3) शूद्र को सम्मान व्यवस्था में छूट-मनु की सम्मान व्यवस्था में सम्मान गुण, योग्यता के अनुसार होकर विद्यमान अधिक सम्मानीय होता है। पर वृद्ध शूद्र को सर्व˗प्रथम सम्मान देने का निर्देश दिया गया है। (मनु0 2/111, 112, 130, 137)।

(4) शूद्र को धर्म पालन की स्वतन्त्रता – मनु ने शूद्रों को धार्मिक कार्य करने की पूरी स्वतन्त्रता दी है। (मनु0 10/126) इतना ही नहीं यह भी कहा है कि शूद्र से भी उत्तम धर्म को ग्रहण कर लेना चाहिए।

(5) दण्ड-व्यवस्था में शूद्र को सबसे कम दण्ड-मनु ने शूद्र को सबसे कम दण्ड, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण को उत्तरोत्तर अधिक दण्ड, परन्तु राजा को सबसे अधिक दण्ड देने का विधान किया है। (मनु0 8/337-338, 338, 347)।

(6) शूद्र दास नहीं-शूद्र दास, गुलाम अर्थात् बन्धुआ मजदूर नहीं है। सेवकों/भृत्यों को पूरा वेतन देने का आदेश दिया है और उनका अनावश्यक वेतन न काटा जाए, ऐसा निर्देश है। (7/125, 126, 8/216)।

(7) शूद्र सवर्ण हैं-मनु ने शूद्र सहित चारों वर्णों को सवर्ण माना है। चारों वर्णों से भिन्न असवर्ण हैं। (मनु0 10/4, 45) पर बाद का समाज शूद्र को असवर्ण कहने लग गया। उसी प्रकार मनु ने शिल्पी-कारीगर को वैश्य वर्ण में माना है, पर बाद में समाज इन्हें भी शूद्र कहने लगा (मनु0 3/64, 9/329, 10/99, 120)। इस प्रकार मनु की व्यवस्थाएँ न्यायपूर्ण हैं। उन्होंने न शूद्र और न किसी और के साथ अन्याय और पक्षपात किया है।

(8) मनु और डॉ0 बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर-आधुनिक संविधान निर्माता और राष्ट्र निर्माता तथा भूतपूर्व महामहिम राष्ट्रपति श्री वेंकटरमण के शब्दों में ’आधुनिक मनु‘ डॉ0 भीमराव अम्बेडकर द्वारा मनुस्मृति का विरोध और उसे दलितों पर अत्याचार कराने की जिम्मेवार तथा जात-पाँत व्यवस्था को जननी मानने का सवाल है। जन्मना जात-पाँत, ऊँच-नीच, छुआछूत जैसी कुप्रथाओं के कारण अपने जीवन में उन्होंने जिन उपेक्षाओं, असमानताओं यातनाओं और अन्यायों को भोगा था, उस स्थिति में कोई भी स्वाभिमानी शिक्षित वही करता जो उन्होंने किया। क्योंकि यह सत्य है कि उस समय तक मनुस्मृति का शोधपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन होकर उसमें समय-समय पर किये गये प्रक्षेपों पर कोई शोध कार्य नहीं हुआ था। जिससे उन्हें प्रक्षिप्त और मौलिक श्लोकों में भेद करने का कोई स्रोत नहीं मिला, फिर भी उन्होंने मनु द्वारा प्रतिपादित गुण-कर्म-योग्यता आधारित वर्ण व्यवस्था और महर्षि दयानन्द और अन्यों के द्वारा उसकी की गई व्याख्या की प्रशंसा की है।

(ग) क्या मनु नारी जाति के विरोधी थे ? मनुस्मृति के स्वयं के प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि मनु नारी जाति के विरोधी नहीं थे। कतिपय प्रमाण प्रस्तुत हैं-जिस परिवार में नारियों का सत्कार होता है, वहाँ देवता-दिव्य गुण, दिव्य सन्तान आदि प्राप्त होते हैं। जहाँ ऐसा नहीं होता, वहाँ सभी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। (मनु0 3/56)। नारियाँ घर का सौभाग्य, आदरणीया, घर का प्रकाश, घर की शोभा, लक्ष्मी, संचालिका, मालकिन, स्वर्ग और संसार यात्रा का आधार हैं। (मनु0 9/11, 26, 28, 5/150) स्त्रियों के आधीन सबका सुख है। उनके शोकाकुल रहने से कुल क्षय हो जाता है। (3/55, 62)। पति से पत्नी और पत्नी से पति सन्तुष्ट होने पर ही कल्याण संभव है। (9/101-102)। सन्तान उत्पत्ति के द्वारा घर का भाग्योदय करनेवाली गृह की आभा होती है। शोभा-लक्ष्मी और नारी में कोई अन्तर नहीं है। (9/26) मनु सम्पूर्ण सृष्टि में वेद के बाद पहले संविधान निर्माता हैं। जिन्होंने पुत्र और पुत्री की समानता घोषित कर उसे वैधानिक रूप दिया। (9/130)। पुत्र-पुत्री को पैतृक सम्पत्ति में समान अधिकार प्रदान किया। (9/131)। यदि कोई स्त्रियों के धन पर कब्जा कर लेता है तो वे चाहे बन्धु-बान्धव ही क्यों न हों, उन्हें चोर के सदृश दण्ड देने का विधान किया गया है। (9/212, 3/52, 8/2, 29)। स्त्री के प्रति किये गये अपराधों में कठोरतम दण्ड का प्रावधान मनु ने किया है। (8/323, 9/232, 8/352, 4/180, 8/275, 9/4)। कन्याओं को अपना योग्य पति चुनने की स्वतन्त्रता, विधवा को पुनर्विवाह करने का अधिकार दिया है। साथ में दहेज निषेध करते हुए कहा गया है कि कन्याएँ भले ही ब्रह्मचारिणी रहकर कुँवारी रह जाएँ, परन्तु गुणहीन दुष्ट पुरुष से विवाह न करें। (9/90-91, 176, 56-63, 3/51-54, 9/89)। मनु ने नारियों को पुरुषों के पारिवारिक, धार्मिक, सामाजिक और राष्ट्रीय कार्यों में सहभाग माना है। (9/11, 28, 96, /4, 3/28)। मनु ने सभी को यह निर्देश दिया है कि नारियों के लिए पहले रास्ता छोड़ दें, नव विवाहिता, कुमारी, रोगिणी, गर्भिणी, वृद्धा आदि स्त्रियों को पहले भोजन कराकर पति-पत्नी को साथ भोजन करना चाहिए। (2/138, 3/114, 116)। मनु नारियों को अमर्यादित स्वतन्त्रता देने के पक्षधर नहीं हैं तथा उनकी सुरक्षा करना पुरुषों का कत्र्तव्य मानते हैं (5/149, 9/5-6)। उपर्युक्त विश्लेषपूर्वक प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि मनु स्त्री और शूद्र विरोधी नहीं है। वे न्यायपूर्ण हैं और पक्षपात रहित हैं।

मनुस्मृति में प्रक्षेप

मनु के वैदिक वर्ण-व्यवस्था गुण, कर्म, योग्यता के सिद्धान्त पर आधारित श्लोक मौलिक और जन्माधारित जात-पाँत, पक्षपात विधायक सभी श्लोक ˗प्रक्षिप्त हैं। मनु के समय जातियाँ नहीं बनी थीं। इसलिए उन्होंने जातियों की गिनती नहीं दर्शाई। यही कारण है कि वर्ण संस्कारों (वर्ण संकरों) से सम्बन्धित श्लोक ˗प्रक्षिप्त सिद्ध होते हैं। मनु की दण्ड-व्यवस्था एक जनरल कानून है, मौलिक है, इसके विरुद्ध पक्षपातपूर्ण कठोर दण्ड-व्यवस्था विधायक श्लोक प्रक्षिप्त हैं। वर्ण-व्यवस्था के अन्तर्गत शूद्र विषयक श्लोक मौलिक, शेष जन्मना शूद्र निर्धारक छुआछूत, ऊँच-नीच अधिकारों का हरण और शोषण विधायक श्लोक प्रक्षिप्त हैं। नारियों के सम्मान, समानता, स्वतन्त्रता और शिक्षा विषयक श्लोक मौलिक हैं, इसके विपरीत प्रक्षिप्त हैं।

उपसंहार

यह सत्य है कि आम लोग और अनेक परम्परावादी विद्वान, सन्त, महात्मा आदि उसी प्रक्षिप्त श्लोकों सहित मनुस्मृति को आज भी प्रामाणिक मानकर जन्माधारित जाति-व्यवस्था ईश्वर द्वारा प्रदत्त स्वीकार कर उससे ग्रसित हैं। आज भी वे स्त्री और शूद्र को अपने बराबरी का दिल से अधिकार नहीं देना चाहते, परन्तु आर्यसमाज जो जन्माधारित जाति-प्रथा में तनिक भी विश्वास नहीं करता और प्रारम्भ से ही दलितों का सच्चा हितैषी रहा है-प्रक्षिप्त श्लोकों रहित मनुस्मृति को ही प्रामाणिक मानता है और गुण, कर्म, योग्यता आधारित वर्ण-व्यवस्था का समर्थक है। यह बात पृथक् है कि आज वर्ण-व्यवस्था की पुनः स्थापना असम्भव-सी प्रतीत होती है, क्योंकि जात-पाँत के रहते वर्ण-व्यवस्था लागू नहीं हो सकती, इसलिए भले ही वर्णव्यवस्था को पुनः स्थापना न हो, परन्तु जात-पाँत टूटकर जात-पाँत रहित समाज बनना चाहिए। ताकि फिर किसी को वह गैर बराबरी और छुआछूत की यातना न भोगनी पड़े, जो इस देश के आधुनिक संविधान निर्माता और आधुनिक मनु, डॉ0 अम्बेडकर और तथाकथित शूद्रातिशूद्रों और दलितों को भोगनी पड़ी थीं।

अन्त में हमारा निवेदन है कि प्रक्षिप्त श्लोकों के आधार पर मनु और मनुस्मृति पर भ्रमवश मनमाने आरोप-प्रत्यारोप लगाना अनुचित है। प्राचीन और विशुद्ध मनुस्मृति ग्रन्थ स्वाध्याय करने योग्य हैं। पक्षपात और पूर्वाग्रह रहित होकर शोधपूर्वक मनुस्मृति का अध्ययन करेंगे, तो यह भ्रान्ति मिट जाएगी कि मनु जात-पाँत के जन्मदाता और दलित तथा नारी विरोधी थे। मनु और मनुस्मृति के विरोध में लड़ाई बन्द होनी चाहिए, क्योंकि वास्तव में हम सब मानवतावादी हैं।

डॉ. अम्बेडकरजी की लाला लाजपतराय जी को श्रद्धांजली

यह तथ्य अंकित करते हुए हमें बहुत ही दुःख हो रहा है कि देशभक्त लाला लाजपतराय का विगत मास की 17 तारीख को अचानक हृदय क्रिया बन्द हो जाने से देहान्त हो गया। साइमन कमीशन के लाहौर आने पर उसे वापिस जाने के लिए कहनेवालों का जुलूस स्टेशन पर था, उसके अग्रिम भाग पर लाला जी उपस्थित थे। भीड़ को पीछे हटाने का प्रयत्न करते समय एक पुलिस अधिकारी ने लालाजी की छाती पर लाठी का वार किया। डॉक्टरों का यह मत है कि लाठी का वार ही लालाजी की हृदय क्रिया बन्द पड़ने का कारण सिद्ध हुआ। यदि यह सही है तो ऐसे उन्मत्त और राक्षसी वृत्ति के पुलिस अधिकारी की जितनी भी निन्दा की जाए, वह कम ही होगी।

खैर, वह कुछ भी हो, इसमें कोई सन्देह नहीं कि लालाजी की मौत के कारण देश का एक कर्मठ कार्य कुशल नेता नामशेष हो गया। भारतवर्ष में राजनीतिक नेताओं की कभी भी कमी नहीं रही, पर लालाजी जैसे प्रामाणिक वृत्ति के स्वार्थ त्यागी तथा कृतसंकल्प कार्य के लिए तन-मन-धन अर्पित करनेवाले नेता अत्यन्त ही कम थे। नेतागिरी के लिए ललचाए और उसके लिए अपनी सदसद् विवके बुद्धि शैतान या आसुरी प्रवृत्तियों को बेचनेवाले बहुत अधिक थे। इन नेताओं की कथनी-करनी की विसंगति लोगों के ध्यान में आती, तो ये उसे ’मेंटल रिजर्वेशन‘ की बात कहकर उससे छुटकारा पा लेते थे, पर लालाजी के जीवनक्रम में इस प्रकार की स्थिति नजर नहीं आती। श्री नरसिंह चिन्तामणि केलकर जैसे दोहरे व्यक्तित्ववाले तथा श्री आयंगर छाप जैसे नेताओं की अभद्रता से लालाजी कोसों दूर थे। उनकी कार्यक्षमता अप्रतिम और महान् थी। लालाजी के चरित्र की विशेषता इस बात में है कि वे अधिक बड़बड़ और गड़बड़ न करते हुए बहुत ही सोच-विचारपूर्वक धैर्य से स्वीकार किये हुए कार्य को सम्पन्न करते थे।

लालाजी का जन्म सन् 1865 में पंजाब प्रान्त के एक निर्धन वैश्य कुल में हुआ। उनके पिता आर्यसमाजी थे। इसलिए उन्हें प्रारम्भ से ही उदारमतवाद की घुट्टी पिलायी गई थी। आज आर्यसमाज को सनातन धर्म ने निगल लिया है, पर उस समय आर्यसमाज और सनातन धर्म का हमेशा का वैर या जानी दुश्मनी थी, क्योंकि इस युग में आर्यसमाज मुसलमानों के आक्रमणों की अपेक्षा हिन्दू समाज के अन्तर्गत जातिभेदादि दोषों की ओर ही ज्यादा ध्यान देता था। इसलिए वह रूढ़िबद्ध पौराणिक लोगों को स्वाभाविक रूप से ही अप्रिय था।

पुराणमतवाद और आर्यसमाज के इस समर में लालाजी ने आर्यसमाज का पक्ष लिया था और उस समाज के सिद्धान्तों को सुदृढ़ और व्यावहारिक रूप देने के लिए उन्होंने कुछ मित्रों के सहयोग से सन् 1886 में ’दयानन्द एंग्लो वैदिक कॉलेज (डी0 ए0 वी0)‘ की स्थापना की थी। उनके सार्वजनिक जीवन का प्रारम्भ इसी घटना के साथ शुरु हुआ था। इस संस्था को शक्तिशाली बनाने के लिए उन्होंने अनथक मेहनत की थी और पुष्कल मात्रा में स्वार्थ त्याग भी किया था। आज पंजाब में इस संस्था की गणना एक प्रमुख शिक्षण संस्था के रूप में की जाती है।

इसके बाद वे राजनीतिक आन्दोलनों में भाग लेने लगे, पर उन्होंने अन्य राजनीतिक आन्दोलनों के नेताओं की तरह राजनीतिक और सामाजिक कार्यों के इतेरतराश्रित आपसी सम्बन्धों का विच्छेद कर अपने अपंगत्व का प्रदर्शन कभी भी नहीं किया। दोनों भी दृष्टियों से वे क्रान्तिकारी थे। यह बात ध्यान में रखने लायक है कि राजनीतिक आन्दोलन में कदम रखने के कारण सरकार ने जब उन्हें अण्डमान की जेल में भेजा, तब बहुत से पुराणमतवादी लोगों को हर्ष हुआ था। इस प्रकार ब्रिटिश सरकार और पौराणिक इन दोनों के विरोध को सहन करते हुए लालाजी ने अपना सार्वजनिक कार्यक्रम संचालित किया था। पंजाब के कुछ स्पृश्यवर्गीय नेताओं द्वारा चलाये गये अस्पृश्यों के स्पृश्यीकरण (दलितोद्धार) के आन्दोलन में वे अन्तःकरण पूर्वक सहभागी होते थे। स्पृश्यवर्गीय लोगों द्वारा संचालित ’अस्पृश्योद्धार‘ के आन्दोलन से यदि हमें पूर्णतया सन्तोष न भी प्रतीत होता हो, फिर भी हमें इस बात में सन्देह नहीं कि लालाजी की सहानुभूति प्रामाणिकता से ओत-˗प्रोत थी। हमारी दृष्टि से वह परिपूर्ण न भी हों, फिर भी अविश्वसनीय तो बिलकुल भी नहीं थी।

लालाजी उत्तम लेखक भी थे। सामाजिक और राजनीतिक विषयों से सम्बद्ध उन्होंने अनेक ग्रन्थ लिखे हैं। ’दी पीपल‘ नामक अंग्रेजी पत्र भी वे निकालते थे। दयानन्द एंग्लोवैदिक कॉलेज के अतिरिक्त उनके द्वारा स्थापित दूसरी संस्था का नाम ’सर्वेंटस् ऑफ इण्डिया‘ है। ’सोसाइटी‘ की तरह इस संस्था की नियमावली बनाने के बावजूद इन दोनों में अंतरंग दृष्टि से महत्वपूर्ण अन्तर है। मुम्बई की ’सोसाइटी‘ ’नरम दल‘ के कब्जे में होने के कारण उनके समस्त कार्यक्रम शांत एवं मंदगति से चालू हैं। राजनीतिक विषय में भी मंदगति और सामाजिक विषय में भी मंथर गति। एक कदम आगे बढ़ाने से पहले उस पर दस घण्टे तक विचार-विमर्श। कुछ इसी प्रकार का इस संस्था का कार्यक्रम है। इस संस्था के कतिपय सभासद व्यक्तिगत रूप से ’गरम‘, ’अग्रगामी‘ और ’प्रगतिशील‘ होंगे, पर सामूहिक रूप से उन्हें नरम दल की चैखट में ही घुटन महसूस करते हुए रहना अनिवार्य है। उसके विपरीत लाहौर की सोसाइटी को लालाजी जैसा तड़पदार-तेजस्वी नेतृत्त्व मिलने के कारण उसे सर्वांगीण प्रगतिपरक स्वरूप प्राप्त हुआ है। यह सोसाइटी सामाजिक और राजनीतिक विषय में एक जैसे प्रगतिशील कार्यकत्र्ता निर्माण करने का कार्य उत्साह और साहस के साथ कर रही है। इस संस्था के विकास के लिए उन्होंने काफी कष्ट सहन किये हैं। इस प्रकार लाला लाजपतरायजी का चरित्र विविधांगी है। सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक आदि समस्त क्षेत्रों में वे अपना अनमोल योगदान दे गये हैं और उनके कालवश हो जाने के उपरांत भी उनके बहुमुखी रचनात्मक कार्य उनके सचेतन स्मारक के रूप में चिरस्थायी एवं अमर रहेंगे।

सन्दर्भ: (1) डॉ0 बाबासाहब अम्बेडकर चरित्र, खण्ड-2, पृष्ठ-197 लेखक-चांगदेव भवानाव खैरमोडे-द्वितीय आवृत्ति-14 अक्टूबर 1991, मूल्य-90.00, प्रकाशक-सुगावा प्रकाशन-पुणे-महाराष्ट्र।

(2) बहिष्कृत भारत (मराठी साप्ताहिक): सम्पादक: डॉ0 भीमराव अम्बेडकर, दिनांक: 7 दिसम्बर 1928।

(3) अनुवाद-कुशलदेव शास्त्री।

ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं

  ऒ३म्

ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये व्यवहार नहीं
धरा ठिठुरती है सर्दी से
आकाश में कोहरा गहरा है
बाग़ बाज़ारों की सरहद पर
सर्द हवा का पहरा है
सूना है प्रकृति का आँगन
कुछ रंग नहीं , उमंग नहीं
हर कोई है घर में दुबका हुआ
नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं
चंद मास अभी इंतज़ार करो
निज मन में तनिक विचार करो
नये साल नया कुछ हो तो सही
क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही
उल्लास मंद है जन -मन का
आयी है अभी बहार नहीं
ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
ये धुंध कुहासा छंटने दो
रातों का राज्य सिमटने दो
प्रकृति का रूप निखरने  दो
फागुन का रंग बिखरने दो
प्रकृति दुल्हन का रूप धार
जब स्नेह – सुधा बरसायेगी
शस्य – श्यामला धरती माता
घर -घर खुशहाली लायेगी
तब चैत्र  शुक्ल  की प्रथम तिथि
नव वर्ष मनाया जायेगा
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर
जय गान सुनाया जायेगा
युक्ति – प्रमाण से स्वयंसिद्ध
नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध
आर्यों की कीर्ति सदा -सदा
नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
अनमोल विरासत के धनिकों को
चाहिये कोई उधार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये व्यवहार नहीं …………

प्रेषक –  रविन्द्र आर्य
( किसी कवि की रचना है )
~ अज्ञात

ग़जल

ग़जल

– डॉ. रामवीर

मस्रुफ़१ खुशामद में क्यों हैं

मुल्क के सब आला अदीब२।

जो रहे कभी रहबरे क़ौम

क्यों हुए हुकूमत के नक़ीब३।

इस बदली हुई फ़ज़ा में अब

हैरान उसूलों के अक़ीब४।

यह वक्त नहीं है ग़फ़लत का

हालात हुए बेहद महीब५।

नाम जम्हूरियत है लेकिन

काबिज हैं हाकिमों के असीब६।

लाचार रिआया के चेहरे

हो चुके हैं मानिंदे ज़बीब७।

इस दौरे मल्टिनेशनल में

रोजी को तरसता है ग़रीब।

कब छटेंगे गर्दिश के ग़ुबार

क ब जगेगा बेबस का नसीब।

१. व्यस्त २. साहित्यकार ३. चोबदार ४. अनुयायी ५. भयानक ६. सन्तान ७. मुनक्काड्ड

– ८६, सैक्टर- ४६, फरीदाबाद-१२१०१०

हम उत्तम बुद्धि व ज्ञान की वाणियों का सेवन करें

ओ३म
हम उत्तम बुद्धि व ज्ञान की वाणियों का सेवन करें
डा. अशोक आर्य
मानव जीवन में प्राणायाम का विशेष मह्त्व है । इसलिए इसे पुरुदंसस कहा गया है । यह प्राणायाम ही हमें उत्तम बुद्धि देने वाला है , हमें उत्तम बुद्धि रुपि धन का भण्डारी बनाता है , इस धन से हमें सम्पन्न करता है। उत्तम बुद्धि का भण्डारी बनाकर प्राणायाम के ही कारण ग्यान की वणियों अर्थात वेद के आदेश का सेवन करने वाला यह हमें बनाता है । प्राणायाम के ही कारण हम ग्यान की वाणियों का सेवन कर पाते हैं । इस बात का परिचय इस मन्त्र के स्वाध्याय से हमें इस प्रकार मिलता है : –
अश्विना पुरुदंससा नरा श्वीरया धिया ।
धिष्ण्या वनतं गिर: ॥ ऋग्वेद १.३.२ ॥
इस मन्त्र मे चार बातों पर प्रकाश डाला गया है :-
१. प्राण अपाण गतिशील रहें
मन्त्र कह रहा है कि हे प्राण तथा अपाणों ! आप हमारे पालक बनो । आप ही हमारे पूरक कर्मों को करने वाले बनो । इस तथ्य से यह स्पष्ट होता है कि हमारे प्राण तथा अपान अर्थात हम जिस श्वास के लेने व छोड्ने की क्रिया करते हैं , वह क्रिया ही हमारी पालक है, हमारा पालन करने वालई है, हमें जीवित रखने वाली है । हमारे जीवन को सुख पूर्वक चलाने वाली है । हम इस के आधार पर ही जीवित हैं । जब शवास की यह क्रिया रुक जाती है तो हम जीवन से रहित होकर केवल मिट्टी के टेले के समान बन जाते हैं । गत मन्त्र में भी लगभग इस तथ्य पर ही प्रकाश डालते हुए कहा गया था कि हमारे प्राण व आपान क्रियाशील हैं । यह क्रिया ही मानव का ही नही अपितु प्रत्येक जीव का , प्रत्येक प्राणी का पालन करने वाली हों । भाव यह कि हमारे प्राण ( श्वास लेने की क्रिया ) तथा अपान ( श्वास छोडने की क्रिया) निरन्तर चलती रहे , कार्यशील बनी रहे । हम जानते ही हैं कि यह प्राण अपान ही हमारे अन्दर जीवनीय शक्ति भरते हैं । इसके बिना हम एक पल भी जीवित नहीं रह सकते । इसके बिना हम क्रियाहीन होकर मृतक कहलाते हैं ।
२. गतिमान व क्रियाशील बनें
इस प्रकार हमारे शरीर में प्राण व अपान क्रियाशील रहते हैं तो हम भी जीवित कहलाते हैं , क्रियाशील रहते हुए अपने जीवन को निरन्तर आगे लेजाने का यत्न करते हैं । अनेक प्रकार की उपलब्धियां पाने का यत्न करते हैं । सदा उन्नति के पथ पर ही अग्रसर रहने का प्रयास करते रहते हैं । यदि प्राण – अपान हमारे शरीर में गतीमान नहीं होते तो हम क्रिया विहीन हो जाते हैं , जिसे मृतक की संज्ञा दी जाती है । इस लिए मन्त्र जो दूसरी बात हमें समझाने का यत्न कर रहा है , वह है कि हमारे प्राण व अपान इस प्रकार सदा कर्म शील रहते हुए हमें आगे तथा ओर आगे ले जाने वाले बनें तथा हमारी उन्नति का कारण बनें । स्पष्ट है कि हम जीवन में जो कुछ भी पाते हैं , यहां तक कि उस प्रभु क जो हम स्मरण भी हम करते हैं तो वह भी प्राण ओर अपान के ही कारण ही लेते हैं । इसलिए हम पिता को प्रार्थना करते हैं कि हे पिता ! हमारे प्राण व आपान को सदा गतिमान, सदा क्रियाशील बनाए रखे ।
२. स्वाध्याय द्वारा सोम कण सुरक्षित करें
मन्त्र के तृतीय भाग में कहा गया है कि जब शरीर में प्राण व अपान गतिमान होते हैं तो हम भी गतिमान होते हैं , क्रियाशील होते हैं । क्रियाशील होने के कारण ही हम मे स्वाध्याय की शक्ति आती है । स्वाध्याय कर ही हम वह शक्ति पा सकते है , जिसमें जीवन है । जिसमें जीवन ही नहीं है , मात्र एक मृतक शरीरवत , लाश मात्र है वह क्या कुछ करेगा , वह तो क्रियाविहीन होता है । इस कारण किसी भी क्रिया को करने की उससे कल्पना भी नहीं की जाती । इस लिए शरीर में प्राण व अपान का निरन्तर चलते रहना आवश्यक है । जब प्राण व अपान क्रियाशील रहते हैं तो शरीर क्रिया शील रहता है तथा क्रियाशील शरीर ही कुछ करने की क्षमता रखता है । एसे शरीर में ही स्वाध्याय की शक्ति होती है तथा हम स्वाध्याय के माध्यम से अनेक प्रकार के ज्ञान का भण्डार ग्रहण करने के लिए सशक्त होते हैं । इस तथ्य पर ही मन्त्र के इस भाग मे उपदेश किया गया है कि यह हमारे प्राण तथा अपान हमें उत्तम बुद्धि देने वाले हों । जब हम प्राण तथा अपान को संचालित करते हैं तो इस की साधना से हमारे शरीर में सोम कण सुरक्षित होते हैं तथा हमारी बुद्धि को यह कण तीव्र करने का कारण बनते हैं ।
४. हमारी बुद्धि तीव्र हो
मन्त्र कहता है कि प्राण व अपान के सुसंचालन से हमारे शरीर मे बुद्धि को तीव्र करने वाले जो सोम कण पैदा होते हैं , उनसे हमारी बुद्धि तीव्र होती है । यह तीव्र बुद्धि ही होती है जो मानव को कभी कुण्ठित नही होने देती। जिस प्रकार कुण्ठित तलवार से किसी को काटा नहीं जा सकता, कुण्ठित चाकू से सब्जी को भी टीक से काटा नहीं जा सकता , टीक इस प्रकार ही कुण्ठित बुद्धि से उत्तम ज्ञान भी प्राप्त नहीं किया जा सकता । इस प्रकार ही जिन की बुद्धि कुण्ठित नहीं होती , जिन की बुद्धि तीव्र होती है , वह बुद्धि किसी भी विषय को ग्रहण करने में कुण्ठित नहीं होती , किसी भी विषय को बडी सरलता से ग्रहण कर लेती है । इस प्रकार मन्त्र कहता है कि अपनी इस तीव्र बुद्धि से हम ज्ञान की वाणियों का अर्थात वेद के मन्त्रों का सेवन करें , इन का स्वाध्याय करें , इन का चिन्तन करें , इनका मनन करें , इनको अपने जीवन में धारण करें ।
मन्त्र का भाव है कि हम अपने जीवन में प्राणायाम के द्वारा प्राणसाधना करें । इस प्राण साधना से ही हम तीव्र बुद्धि वाले बनें । तीव्र बुद्धि वाले बन कर हम अपनी इस बुद्धि से ज्ञान की वाणियों के समीप बैठ कर इन का उपासन करे , भाव यह कि हम वेद का स्वाध्याय करें । हम बुद्धि को व्यर्थ के विचारों में प्रयोग न कर इसे निर्माणात्मक कार्यों में लगावें ।

डा. अशोक आर्य

गतः सुहृत् सः प्रियधर्मवीरः

गतः सुहृत् सः प्रियधर्मवीरः

– सुभाष वेदालंकार

वाचा वरीयान् मनसा महीयान् विचक्षणो वेदविदां वरेण्यः,

यः कर्मवीरो धृतिमान् तपस्वी, गतः सुहृत् सः प्रियधर्मवीरः।।

यो भारतीति प्रस्थितो बुधेन्द्रैः, वेदप्रचारे सततं रतोऽभूत,

देशे तदर्थं विचचार नित्यं, गतः सुहृत् सः प्रियधर्मवीरः।।

परोपकारी सः परोपकारी-संपादको लेखकवर्य आसीत्,

कृते सभायाः कृतवान् प्रयत्नान्, गतः सुहृत् सः प्रियधर्मवीरः।।

सभां समुन्नेतुमहो प्रयत्नान् चकार यान् तान्नहि को नु वेद,

स्वजीवनं येन समर्पितं च, गतः सुहृत् सः प्रियधर्मवीरः।।

जाता क्षतिर्देशसमाजयोर्या पूर्तिं न सा यास्यति तूर्णमेव,

जगाम दूरं परिवारतो नो, गतः सुहृत् सः प्रियधर्मवीरः।।

– अजमेर