Category Archives: Uncategorized

ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं

  ऒ३म्

ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये व्यवहार नहीं
धरा ठिठुरती है सर्दी से
आकाश में कोहरा गहरा है
बाग़ बाज़ारों की सरहद पर
सर्द हवा का पहरा है
सूना है प्रकृति का आँगन
कुछ रंग नहीं , उमंग नहीं
हर कोई है घर में दुबका हुआ
नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं
चंद मास अभी इंतज़ार करो
निज मन में तनिक विचार करो
नये साल नया कुछ हो तो सही
क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही
उल्लास मंद है जन -मन का
आयी है अभी बहार नहीं
ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
ये धुंध कुहासा छंटने दो
रातों का राज्य सिमटने दो
प्रकृति का रूप निखरने  दो
फागुन का रंग बिखरने दो
प्रकृति दुल्हन का रूप धार
जब स्नेह – सुधा बरसायेगी
शस्य – श्यामला धरती माता
घर -घर खुशहाली लायेगी
तब चैत्र  शुक्ल  की प्रथम तिथि
नव वर्ष मनाया जायेगा
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर
जय गान सुनाया जायेगा
युक्ति – प्रमाण से स्वयंसिद्ध
नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध
आर्यों की कीर्ति सदा -सदा
नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
अनमोल विरासत के धनिकों को
चाहिये कोई उधार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये व्यवहार नहीं …………

प्रेषक –  रविन्द्र आर्य
( किसी कवि की रचना है )
~ अज्ञात

ग़जल

ग़जल

– डॉ. रामवीर

मस्रुफ़१ खुशामद में क्यों हैं

मुल्क के सब आला अदीब२।

जो रहे कभी रहबरे क़ौम

क्यों हुए हुकूमत के नक़ीब३।

इस बदली हुई फ़ज़ा में अब

हैरान उसूलों के अक़ीब४।

यह वक्त नहीं है ग़फ़लत का

हालात हुए बेहद महीब५।

नाम जम्हूरियत है लेकिन

काबिज हैं हाकिमों के असीब६।

लाचार रिआया के चेहरे

हो चुके हैं मानिंदे ज़बीब७।

इस दौरे मल्टिनेशनल में

रोजी को तरसता है ग़रीब।

कब छटेंगे गर्दिश के ग़ुबार

क ब जगेगा बेबस का नसीब।

१. व्यस्त २. साहित्यकार ३. चोबदार ४. अनुयायी ५. भयानक ६. सन्तान ७. मुनक्काड्ड

– ८६, सैक्टर- ४६, फरीदाबाद-१२१०१०

हम उत्तम बुद्धि व ज्ञान की वाणियों का सेवन करें

ओ३म
हम उत्तम बुद्धि व ज्ञान की वाणियों का सेवन करें
डा. अशोक आर्य
मानव जीवन में प्राणायाम का विशेष मह्त्व है । इसलिए इसे पुरुदंसस कहा गया है । यह प्राणायाम ही हमें उत्तम बुद्धि देने वाला है , हमें उत्तम बुद्धि रुपि धन का भण्डारी बनाता है , इस धन से हमें सम्पन्न करता है। उत्तम बुद्धि का भण्डारी बनाकर प्राणायाम के ही कारण ग्यान की वणियों अर्थात वेद के आदेश का सेवन करने वाला यह हमें बनाता है । प्राणायाम के ही कारण हम ग्यान की वाणियों का सेवन कर पाते हैं । इस बात का परिचय इस मन्त्र के स्वाध्याय से हमें इस प्रकार मिलता है : –
अश्विना पुरुदंससा नरा श्वीरया धिया ।
धिष्ण्या वनतं गिर: ॥ ऋग्वेद १.३.२ ॥
इस मन्त्र मे चार बातों पर प्रकाश डाला गया है :-
१. प्राण अपाण गतिशील रहें
मन्त्र कह रहा है कि हे प्राण तथा अपाणों ! आप हमारे पालक बनो । आप ही हमारे पूरक कर्मों को करने वाले बनो । इस तथ्य से यह स्पष्ट होता है कि हमारे प्राण तथा अपान अर्थात हम जिस श्वास के लेने व छोड्ने की क्रिया करते हैं , वह क्रिया ही हमारी पालक है, हमारा पालन करने वालई है, हमें जीवित रखने वाली है । हमारे जीवन को सुख पूर्वक चलाने वाली है । हम इस के आधार पर ही जीवित हैं । जब शवास की यह क्रिया रुक जाती है तो हम जीवन से रहित होकर केवल मिट्टी के टेले के समान बन जाते हैं । गत मन्त्र में भी लगभग इस तथ्य पर ही प्रकाश डालते हुए कहा गया था कि हमारे प्राण व आपान क्रियाशील हैं । यह क्रिया ही मानव का ही नही अपितु प्रत्येक जीव का , प्रत्येक प्राणी का पालन करने वाली हों । भाव यह कि हमारे प्राण ( श्वास लेने की क्रिया ) तथा अपान ( श्वास छोडने की क्रिया) निरन्तर चलती रहे , कार्यशील बनी रहे । हम जानते ही हैं कि यह प्राण अपान ही हमारे अन्दर जीवनीय शक्ति भरते हैं । इसके बिना हम एक पल भी जीवित नहीं रह सकते । इसके बिना हम क्रियाहीन होकर मृतक कहलाते हैं ।
२. गतिमान व क्रियाशील बनें
इस प्रकार हमारे शरीर में प्राण व अपान क्रियाशील रहते हैं तो हम भी जीवित कहलाते हैं , क्रियाशील रहते हुए अपने जीवन को निरन्तर आगे लेजाने का यत्न करते हैं । अनेक प्रकार की उपलब्धियां पाने का यत्न करते हैं । सदा उन्नति के पथ पर ही अग्रसर रहने का प्रयास करते रहते हैं । यदि प्राण – अपान हमारे शरीर में गतीमान नहीं होते तो हम क्रिया विहीन हो जाते हैं , जिसे मृतक की संज्ञा दी जाती है । इस लिए मन्त्र जो दूसरी बात हमें समझाने का यत्न कर रहा है , वह है कि हमारे प्राण व अपान इस प्रकार सदा कर्म शील रहते हुए हमें आगे तथा ओर आगे ले जाने वाले बनें तथा हमारी उन्नति का कारण बनें । स्पष्ट है कि हम जीवन में जो कुछ भी पाते हैं , यहां तक कि उस प्रभु क जो हम स्मरण भी हम करते हैं तो वह भी प्राण ओर अपान के ही कारण ही लेते हैं । इसलिए हम पिता को प्रार्थना करते हैं कि हे पिता ! हमारे प्राण व आपान को सदा गतिमान, सदा क्रियाशील बनाए रखे ।
२. स्वाध्याय द्वारा सोम कण सुरक्षित करें
मन्त्र के तृतीय भाग में कहा गया है कि जब शरीर में प्राण व अपान गतिमान होते हैं तो हम भी गतिमान होते हैं , क्रियाशील होते हैं । क्रियाशील होने के कारण ही हम मे स्वाध्याय की शक्ति आती है । स्वाध्याय कर ही हम वह शक्ति पा सकते है , जिसमें जीवन है । जिसमें जीवन ही नहीं है , मात्र एक मृतक शरीरवत , लाश मात्र है वह क्या कुछ करेगा , वह तो क्रियाविहीन होता है । इस कारण किसी भी क्रिया को करने की उससे कल्पना भी नहीं की जाती । इस लिए शरीर में प्राण व अपान का निरन्तर चलते रहना आवश्यक है । जब प्राण व अपान क्रियाशील रहते हैं तो शरीर क्रिया शील रहता है तथा क्रियाशील शरीर ही कुछ करने की क्षमता रखता है । एसे शरीर में ही स्वाध्याय की शक्ति होती है तथा हम स्वाध्याय के माध्यम से अनेक प्रकार के ज्ञान का भण्डार ग्रहण करने के लिए सशक्त होते हैं । इस तथ्य पर ही मन्त्र के इस भाग मे उपदेश किया गया है कि यह हमारे प्राण तथा अपान हमें उत्तम बुद्धि देने वाले हों । जब हम प्राण तथा अपान को संचालित करते हैं तो इस की साधना से हमारे शरीर में सोम कण सुरक्षित होते हैं तथा हमारी बुद्धि को यह कण तीव्र करने का कारण बनते हैं ।
४. हमारी बुद्धि तीव्र हो
मन्त्र कहता है कि प्राण व अपान के सुसंचालन से हमारे शरीर मे बुद्धि को तीव्र करने वाले जो सोम कण पैदा होते हैं , उनसे हमारी बुद्धि तीव्र होती है । यह तीव्र बुद्धि ही होती है जो मानव को कभी कुण्ठित नही होने देती। जिस प्रकार कुण्ठित तलवार से किसी को काटा नहीं जा सकता, कुण्ठित चाकू से सब्जी को भी टीक से काटा नहीं जा सकता , टीक इस प्रकार ही कुण्ठित बुद्धि से उत्तम ज्ञान भी प्राप्त नहीं किया जा सकता । इस प्रकार ही जिन की बुद्धि कुण्ठित नहीं होती , जिन की बुद्धि तीव्र होती है , वह बुद्धि किसी भी विषय को ग्रहण करने में कुण्ठित नहीं होती , किसी भी विषय को बडी सरलता से ग्रहण कर लेती है । इस प्रकार मन्त्र कहता है कि अपनी इस तीव्र बुद्धि से हम ज्ञान की वाणियों का अर्थात वेद के मन्त्रों का सेवन करें , इन का स्वाध्याय करें , इन का चिन्तन करें , इनका मनन करें , इनको अपने जीवन में धारण करें ।
मन्त्र का भाव है कि हम अपने जीवन में प्राणायाम के द्वारा प्राणसाधना करें । इस प्राण साधना से ही हम तीव्र बुद्धि वाले बनें । तीव्र बुद्धि वाले बन कर हम अपनी इस बुद्धि से ज्ञान की वाणियों के समीप बैठ कर इन का उपासन करे , भाव यह कि हम वेद का स्वाध्याय करें । हम बुद्धि को व्यर्थ के विचारों में प्रयोग न कर इसे निर्माणात्मक कार्यों में लगावें ।

डा. अशोक आर्य

गतः सुहृत् सः प्रियधर्मवीरः

गतः सुहृत् सः प्रियधर्मवीरः

– सुभाष वेदालंकार

वाचा वरीयान् मनसा महीयान् विचक्षणो वेदविदां वरेण्यः,

यः कर्मवीरो धृतिमान् तपस्वी, गतः सुहृत् सः प्रियधर्मवीरः।।

यो भारतीति प्रस्थितो बुधेन्द्रैः, वेदप्रचारे सततं रतोऽभूत,

देशे तदर्थं विचचार नित्यं, गतः सुहृत् सः प्रियधर्मवीरः।।

परोपकारी सः परोपकारी-संपादको लेखकवर्य आसीत्,

कृते सभायाः कृतवान् प्रयत्नान्, गतः सुहृत् सः प्रियधर्मवीरः।।

सभां समुन्नेतुमहो प्रयत्नान् चकार यान् तान्नहि को नु वेद,

स्वजीवनं येन समर्पितं च, गतः सुहृत् सः प्रियधर्मवीरः।।

जाता क्षतिर्देशसमाजयोर्या पूर्तिं न सा यास्यति तूर्णमेव,

जगाम दूरं परिवारतो नो, गतः सुहृत् सः प्रियधर्मवीरः।।

– अजमेर

हे पितृ तुल्य प्रभु ! आप हमें पिता सम उपल्ब्ध हों

औ३म
हे पितृ तुल्य प्रभु ! आप हमें पिता सम उपल्ब्ध हों

डा.अशोक आर्य

ऋग्वेद का आरम्भ इस सूक्त से होता है ! यह इस वेद के प्रथम मण्डल के प्रथम सूक्त के रुप में जाना जाता है । इस सूक्त क मुख्य विषय है कि जीव सदा परमपिता की उपासना चाहता है, समीपता चाहता है, निकटता चाहता है,अपना आसन प्रभु के समीप ही रखना चाहता है । जीव यह भी इच्छा रखता है कि वह पिता उस के लिये प्रतिक्षण उपल्ब्ध रहे तथा वह ठीक उस प्रकार प्रभु से सम्पर्क कर सके , उसके समीप जा सके, जिस प्रकार वह अपने पिता के पास जा सकता है । वह प्रभु से पिता- पुत्र जैसा सम्बन्ध रखना चाहता है । इस सूक्त के ऋषि मधुछन्दा: , देवता अग्नि: ,छन्द गायत्री तथा स्वर:षड्ज्क्रि हैं । आओ इस आलोक में हम इस सूक्त का वाचन मन्त्रों के साथ करें तथा इसे समझने का यत्न करें ।
सबसे बडे दाता प्रभु का हम सदा स्मरण करें
परमपिता परमात्मा ने इस संसार की रचना की है। उस के ही आदेश से यह संसार चल रहा है । उसकी ही प्रेरणा से यह सूर्य , चन्द्र तारे आदि गतिशील होकर सब प्राणियों की रक्षा करने व उन्हें पुष्ट करने का कार्य कर रहे हैं । इस परमपिता परमात्मा के दानों का वर्णन ऋग्वेद के प्रथम मण्ड्ल के प्रथम सुक्त के दस मन्त्रों में बडे ही उतम ढग से वर्णन किया गया है । प्रभु को हम प्रभु क्यों कहते हैं , उस पिता को हम दाता क्यों कहते हैं तथा उस पिता का स्मरण करने के लिये , उस की उपसना करने के लिये हमें उपदेश क्यों किया जाता है ? इस सब तथ्य को इस ऋचा में बडे विस्तार से प्रकाशित किया गया है । रऋचा के प्रथम मन्त्र हमें इस प्रकार उपदेश दे रहा है : –
अग्निमीळे पुरोहितं यग्यस्य देवम्रत्विजम ।
होतारं रत्न्धातमम ॥ रिग्वेद १ .१ .१ ॥
मन्त्र में बताया गया है कि अग्नि रुप यज्ञ के देव , जो होता है तथा विभिन्न प्रकार के रत्नों को देने वाला है ,एसे प्रभु की हम सदा स्तुति किया करें ।
मन्त्र प्राणी मात्र को उपदेश कर रहा है कि वह परमपिता परमात्मा इस जगत को , इस ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने वाला है , इसे गति देकर इसे जगत की श्रेणी में लाने वाला है । वह प्रभु ही सब प्राणियों को उपर उठाने का कार्य भी करता है सब प्राणियों को उन्नत भी करता है , सब प्राणियों को आगे भी बढाता है । एसे साधक , जो हम सब का अग्रणी भी है , की हम सदा उपासना किया करें , उस प्रभु के चरणों में बैठा करें, उस के समीप सदा अपना आसन लागावें तथा उस प्रभु का स्तवन करें , स्तुति रुप प्रार्थना करें ।
हम जिस प्रभु की प्रार्थना करने के लिये इस मन्त्र द्वारा प्रेरित किये गये हैं , उस प्रभु के सम्बन्ध में भी इस मन्त्र में प्रकाश डालते हुये बताया है कि जो पदार्थ कभी बने नहीं अपितु पहले से ही प्रभु ने अपने गर्भ में रखे हुये हैं । इस का भाव यह है कि इस जगत की रचना से पूर्व भी यह सब विद्यमान थे तथा जो स्वयं ही होने वाले थे । दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि उस प्रभु का कभी निर्माण नहीं हुआ । वह प्रभु इस जगत की रचना से पूर्व भी विद्यमान था । स्वयं होने के कारण उसे खुदा भी कहा गया है । इतना ही नहीं वह प्रभु हम प्राणियों के सामने एक आदर्श के रुप में विद्यमान है । उस प्रभु में जो गुण हैं , उन्हें ग्रहण कर हमने स्वयं को भी वैसा ही बनाने का यत्न करना है । उस परम पिता प्ररमात्मा ने हमारे सब कार्यों का , हमारे सब कर्तव्यों का , हमारे सब वांछित क्रिया कलापों का वेद में वर्णन कर दिया है, वेद में आदेशित कर दिया गया है । हमें उन के अनुसार ही अपना जीवन व दिनचर्या बनानी चाहिये ।
उस प्रभु ने ही हमारे कल्याण के लिये हमें वेद वाणी दी है , वेदों के रुप में ज्ञान का अपार भण्डार दिया है । वह प्रभु ही वेद में सब प्रकार के यज्ञों का प्रकाश करने वाले हैं । अर्थात उन्होंने वेद में विभिन्न प्रकार के यज्ञों का प्रकाश कर दिया है , विभिन्न प्रकार से दान करने की प्रेरणा दे दी है । मानव के जितने भी कर्तव्य हैं , उन सब का प्रतिपादन , उन सब का वर्णन उस पिता ने वेद मे कर दिया है ।
हमारा यह परमपिता परमात्मा स्मरण करने के योग्य है , सदा स्मरणीय है । परमात्मा के स्मरण के लिये कहा गया है कि कोई समय एसा नहीं , जब उसे स्मरण न किया जा सके , कोई काल एसा नहीं जब उसे स्मरण न किया जा सके । इतना ही नहीं प्रत्येक ऋतु में ही उसे स्मरण किया जा सकता है तथा किया जाना चहिये । अत: मन्त्र कहता है कि उस दाता को हमें सदा स्मरण करना चाहिये , उस प्रभु को हमें सदा स्मरण करना चाहिये ,जो हमें सदा शक्ति देता है, जिसके स्मरण मात्र से , जिसके समीप बैठने से तथा जिसकी स्तुति करने से हमें अपार शक्ति मिलती है। शक्ति का प्रवाह हमारे शरीर में ओत – प्रोत होता है ।
मानव सदा विभिन्न कार्यो में उलझा रहता है । कभी उसे अपने व्यवसाय के लिये कार्य करना होता है तो कभी उसे अपने परिजनों का ध्यान करना होता है , उनकी देख रेख करनी होती है । परिवार की इन चिन्ताओं के कारण उस के पास समय का अभाव हो जाता है । समय के इस अभाव को वह साधन बना कर प्रभु चिन्तन से दूर होने का यत्न करता है किन्तु मन्त्र ने इस का भी बडा ही सुन्दर समाधान दे दिया है । मन्त्र कह रहा है कि हे मानव ! यह ठीक है कि तेरा जीवन अत्यन्त व्यस्त है । इस मध्य तूं ने अनेक समस्याओं के समाधान में अपना समय लगाना है इस कारण सम्भव है कि दैनिक कार्यों को पूरा करने के कारण तेरे पास प्रभु स्मरण का समय ही न रहे , जब कि प्रतिपल प्रभु को स्मरण करने के लिये कहा गया है, एसी अवस्था मे भी एक समय तेरे पास एसा होता है , जब तुझे किसी प्रकार का कोई काम नहीं होता । इस काल में तूं ने केवल आराम , केवल विश्राम ही करना होता है । इस काल का , इस समय का नाम है रात्रि । यह रात्रि का समय ही तो होता है जब हमें कुछ सोचने , विचारने व स्मरण करने का अवसर देता है । रात्रि काल में जब हम अपने शयन स्थान पर जावें तो कुछ समय स्वाध्याय स्वरुप वेद का अध्ययन करें तथा फ़िर इस स्थान पर ही कुछ काल प्रभु का स्मरण करें । रात्री को सोते समय प्रभु स्मरण से प्रभु हमारा सहयोगी हो जाता है , पथ प्रदर्शक हो जाता है , मित्र हो जाता है । जब प्रभु हमारा सहायक हो जाता है तो रात्रि को जब हम निद्रा अवस्था में होते हैं तो वह प्रभु ही हमारा रक्षक होता है , चौकीदर का काम करता है तथा हमें किसी प्रकार का बुरा, भ्यावह स्वप्न तक भी हमारे पास नहीं आने देता । स्वपन में भी हमें प्रभु ही दिखाई देता है । प्रभु की गोद में रहते हुये इस प्रकार शान्त निद्रा मिलती है , जैसी माता की गोदी में ही मिला करती है । अत; एसी अवस्था में प्रभु के ही स्वप्न आते हैं । स्वपन अवस्था में प्रभु ने जो पाठ हमें दिया होता है , उस उतम पाठ को हम जाग्रत अवस्था में भी कभी न भुलें । यह यत्न ही हमें करना है ।
इस जगत में सबसे बडा दानी प्रभु को ही कहा गया है । हम अपने जीवन में जिन जिन वस्तुओं का उपभोग करते , जिन जिन पदार्थों का सेवन करते हैं ,वह सब उस प्रभु की ही देन है । परमपिता परमात्मा ने हमारे जीवन को उत्तमता से भरकर प्रसन्नता से भर पूर बनाने के लिये यह फ़ल, यह फ़ूल ,यह वन्सपतियां, यह सूर्य, यह चन्द्र , यह वायु, यह जल दिया है । यदि पिता यह सब कुछ न देता तो हमारे जीवन का एक पल भी चल पाना सम्भव नहीं था । यह सब कुछ उस पिता ने दिया है । तब ही तो हम उसे सब से बडा दाता, सबसे बडा दानी कहते हैं । उस प्रभु ने इस संसार के प्राणियों को तो अपने अन्दर समेट ही रखा है किन्तु जब संसार समाप्त हो जाता है, जब प्रलय आ जाती है , तब भी प्रभु ही इस जगत को सम्भालता है । प्रलय के समय इस पूरे बर्ह्माण्ड को हमारा वह परम पिता अपने अन्दर समेट कर इस की रक्षा करता है ।
परमपिता प्रभु ने मानव मात्र के , प्राणी मात्र के हित के लिये जितने भी पदार्थ आवश्यक थे, उन सब की रचना की है । जितनी भी आनन्द देने वाली ,सुख देने वाली, रम्नीक वस्तुएं हैं , उन सब को धारण करने वाले वह सर्वोतम प्रभु हैं तथा यह सब हमें बांटने क कार्य भी कर रहे हैं ।
वह पिता एक अनुभवी कारीगर भी है , एक अनुभवी निर्माता भी है , एक अनुभवी संचालक भी है , जो इस शरीर रुपि कारखाने के अन्दर बडी ही उतम व्यवस्था करता है । इस शरीर में अन्न देता है । अन्न से हमारा यह रक्त बनता है । रक्त से शरीर में मांस बनता है , मोदस बनता है , अस्थि व मज्जा बनते हैं तथा फ़िर इससे ही वीर्य बनता है , जो शरीर को शक्ति देकर बलिष्ट बनाता है । इन सात धातुओं का निर्माण क्रमानुसार इस शरीर में ही करता है । इन सात धातुओं को ही सात रत्न कहा जाता है । जब हम शरीर शास्त्र का अध्ययन करते हैं तो इन सात धातुओं के समबन्ध में तथा इन के महत्व के समबन्ध में हमें ज्ञान होता है । इन सप्त धातुओं ने ही इस शरीर को रमणीक बना दिया है । । बस इस कारण ही इन धातुओं को रत्न का नाम दिया गया है । इस शरीर को उस पिता ने एक निवास का , एक घर क रुप देते हुये इस में ही इन सात रत्नों की स्थापना कर दी है, इनका निवास बना दिया है । एसे दयालु प्रभु का, एसे दाता प्रभु का, एसे सब याचकों की याचना को पूरा करने वाले प्रभु का हमें सदा ध्यान करना चाहिये, उसके पास बैठ कर उसकी स्तुति करनी चाहिये, उसकी प्रार्थना करनी चाहिये ।
ज्ञानी, निरोग, निर्मल, मधुर्भाषी, क्रियाशील व्यक्ति प्रभु का स्मरण कर दिव्यगुण पाता है , ज्ञान प्राप्त करने का अभिलाषी ही पिता का सच्चा उपासक होता है, जो निर्मल रहते हुये निरोग रहता है, जो दूसरों की प्रशंसा करते हुये सदा मधुर ही बोलता है तथा सदैव क्रियमान रहता है । प्रभु के समीप रहने से दिव्यगुणों की वृद्धि होती है । इसे यह मन्त्र इस प्रकार स्पष्ट कर रहा है :-
अग्नि: पूर्वेभिर्रिषिभिरीड्यो नूतनैरुत ।
स देवां एह वक्शति ॥ ऋग्वेद १.१.२ ॥
विगत मन्त्र में बताया गया था कि तत्वदर्शी लोग ही प्रभु की समीपता पाते हैं । तत्वदृष्टा अपनी रक्षा स्वयं करते हैं । स्वयं को किसी प्रकार के रोग से आक्रान्त नहीं होने देते , रोगों का आक्रमण अपने आप पर नहीं होने देते । इस के साथ ही साथ अपने में जो कमियां हैं , जो न्यूनतायें हैं , उन्हें भी वह दूर करते ही रहते हैं । भाव यह है कि वह स्वयं को पूर्ण करने का यत्न सदा ही करते रहते हैं । वह जो भी शब्द बोलते हैं, वह प्रशंसात्मक ही होते हैं , दूसरे को प्रसन्न करने वाले ही होते है , एसे शब्द कभी नहीं बोलते, जिससे दूसरे को दु:ख हो । यह लोग दूसरों की निन्दा करने से सदा दूर रहते हैं , दूसरों की अच्छाईयों का ही वर्णन करते हैं , उनकी कमियों का कभी वर्णन करना नहीं चाहते । यह लोग सदैव गतिशील ही रहते हैं । क्रियमान ही बने रहते हैं । आलस्य , प्रमाद से सदा दूर रहते हैं । इन का जीवन सदा क्रियाशील ही रहता है ।
इस सब का यदि संक्षेप में वर्णन करें तो हम कह सकते हैं कि जो परमपिता परमात्मा का स्तवन करते हैं, उसके उपासक बनकर स्तुति रुप प्रार्थना करते हैं वह सदा :-
( क ) तत्वदृष्टा होते हैं
( ख ) अपने शरीर में रोगों का प्रवेश नहीं होने देते ।
( ग ) अपने अन्दर जो कमियां है, जो न्यूनतायें हैं , जो अभाव हैं , उन्हें दूर करने का यत्न करते हैं ।
( घ ) जो कभी कटू, निन्दक, शब्द न बोल कर सदा प्रशंसा में ही शब्द प्रयोग करते हैं ।
( ड ) जो लोग सदा अपना जीवन गतिमान रखते हैं ,क्रियात्मक रहते हैं ।
एसे लोग ही प्रभू के समीप रहने के, बैठने के अधिकारी होते हैं ।
वह प्रभु एसे लोगों से उपासित हो कर , एसे लोगों की समीपता पा कर , इस मानव जीवन में इस प्रकार के लोगों को दिव्य गुण प्राप्त कराने का कार्य करते हैं । भाव यह है कि प्रभु प्राप्त का सब से मुख्य तथा बडा लाभ यह ही है कि प्रभु की उपासना से, प्रभु के समीप आसन लगाने से, उसकी समीपता पाने से हम में दिव्यगुणों की बडी तेजी से वृद्धि होती है ।
प्रभु उपासक को पोषण को,यशस्वी बनाने को तथा वीरता बढाने वाला धन मिलता है , जो मानव परमपिता के समीप बैठ कर उस प्रभु का स्मरण करता है , प्रभु उसे अनेक प्रकार के धनों को देता है । यह धन पोषण को बनाने वाला होता है , उसको यश दे कर यशस्वी बनाता है तथा उपासक में वीरता का संचार करता है । यह मन्त्र इस तथ्य पर ही प्रकाश डालते हुये उपदेश करता है कि : –
अग्निना रयिमश्रवत पोषमेव दिवे दिवे ।
यशसं विरत्तमम ॥ रिग्वेद १.१.३ ॥
यह मन्त्र अग्नि स्तवन पर बल देते हुये कहता है कि मनुष्य प्रभु की उपासना करने से कभी सांसारिक दृष्टि से असफ़ल नहीं होता । प्रभु स्तवन से ही वह निरन्तर आगे बढता है । वास्तव में प्रभु स्तवन से ही लक्ष्मी के दर्शन होते हैं । स्पष्ट है कि जहां प्रभु स्तवन है, वहां लक्ष्मी तो है ही, तब ही तो कहा जाता है कि मानव अग्नि से धन को प्राप्त करता है अर्थात जो प्रतिदिन यज्ञ करता है, उसे धन एश्वर्य के नियमित रुप से दर्शन होते रहते हैं ।
सामान्यत:; लोग इस बात को जानते हैं कि जिसके पास अपार धन सम्पदा होती है , उसके लिये अवनति का मार्ग खुला रहता है । इस धन की सहायता से वह अपनी इन्द्रियों को सुखी बनाने का यत्न करता है ,शराब, जुआ आदि अनेक प्रकार की बुराइयां उस में आ जाती हैं किन्तु जो धन प्रभु स्मरण से मिलता है,जो धन प्रभु स्तवन से मिलता है, जो धन अग्निहोत्र से मिलता है, जो धन यज्ञ से मिलता है, उस धन की एक विशेषता होती है , इस प्रकार से प्राप्त धन प्रतिदिन हमारे पोषण का कारण होता है । इससे हमारा किसी प्रकार का नाश, किसी प्रकार का ह्रास नहीं होता । इस प्रकार प्राप्त धन हमें कभी विनाश की ओर , मृत्यु की ओर नहीं ले जाता अपितु यह तो हमें वृद्धि की ओर , उन्नति की ओर ले जाता है , जीवन को जीवन्त बनाने व उंचा उठाने की ओर ले जाता है ।
इस प्रकार यज्ञीय विधि से हमें जो धन मिलता है , यह धन हमें यश्स्वी बनाता है, यश से युक्त करता है । इस धन में परोपकार की भावना भरी होने से हम इसे दान में लगाते हैं , दूसरों की सहायता में लगाते हैं । इस कारण हम निरन्तर यशस्वी होते चले जाते हैं । हमारा यश व कीर्ति दूर दूर तक जाती है । मानव अनेक बार अपार धन सम्पदा पा कर इसके अभिमान में मस्त हो जाता है । इस मस्ती में वह अनेक बार एसे कार्य भी कर लेता है , जो उसे अपयश का कारण बनाते हैं । किन्तु यज्ञ आदि में धन का प्रयोग करने से उस का यश व कीर्ति बढते हैं ।
प्रभु उपासना से प्राप्त धन हमें अत्यधिक सशक्त करने वाला होता है, हमारी शक्ति बढाने वाला होता है । जब अत्यधिक धन के अभिमान में व्यक्ति अनेक नोकर – चाकरों को रख कर आलसी बन जाता है , कोइ कार्य नहीं करता, निठला हो जाता है तो स्वाभाविक रूप से शारीरिक कार्य वह स्वयं नहीं करता, इस कारण निर्बल हो जाता है । क्रिया अर्थात मेहनत ही सब प्रकार की शक्तियों का आधार होती है , जो व्यक्ति क्रियाशील रहता है , उसमें शक्ति की सदा वृद्धि होती रहती है, ह्रास नहीं होता । यह क्रिया शीलता ही शक्ति की जन्म दाता होती है । जब क्रिया का क्षय हो जाता है तो शक्ति का नाश होता है । हम अपने शरीर को ही देखे , हमारे दो हाथ हैं , एक दायां तथा दूसरा बायां । प्रत्येक व्यक्ति का बायां हाथ उसके अपने ही दायें हाथ से कमजोर होता है । एसा क्यों , क्योंकि मानव अपना सब काम दायें हाथ से ही करता है, बायें हाथ से वह बहुत कम कार्य करता है । इस कारण बायां हाथ दायें की अपेक्षा कमजोर रह जाता है । यही कारण है कि क्रियाशीलता के बिना तो प्रभु स्मरण भी नहीं होता । अत: प्रभु स्मरण हमें क्रियाशील बना कर बलवान बनाता है । क्रियाशील होने से हमारा शरीर पुष्ट होता है, पुष्टी से हम अधिक कार्य करने में सक्षम होते हैं, धनेश्वर्य के स्वामी बनते हैं। हमें यश व कीर्ति मिलते हैं तथा हम में शक्ति का संचय होता है , जिससे हम वीर बनते हैं ।

डा.अशोक आर्य

इस्लामी ज्ञान : अंतरिक्ष में आठ बकरियाँ हैं!

नमस्ते जी!

आज के वैज्ञानिक एलियन के बारे में पता लगा रहे हैं कि क्या पृथिवी से भिन्न और कहीं भी जीवन संभव है या नहीं? इसपर तो अभी कुछ निष्कर्ष नहीं निकलता दिख रहा। अपितु इस्लामी किताबों में ऐसा हीं रहस्यमय विज्ञान छिपा हुआ है। सुनन अबु दाउद के एक हदीस में मोहब्बत साहब ने बताया है कि अंतरिक्ष में बकरियाँ रहती हैं।

सुनन अबु दाउद(अरबी), हदीस ५७२३ में लिखा है-

अल अब्बास इब्न अब्दुलमुत्तलीब से रिवायत है मैं अल बाथा में एक समूह में बैठा था जिसमें पैगम्बर साहब भी बैठे थे, तभी उपर से एक बादल गुजरा।
पैगम्बर मोहम्मद ने उसपर देखा और पूछा: तुम इसे क्या कहते हो? उन्होंने कहा सहाब (एक बादल)।
उन्होंने(पै•) कहा मुज्न (वर्षा करने वाले बादल)? उन्होंने कहा: मुज्न। उन्होंने(पै•) कहा: और अनान(बहुत से बादल)? उन्होंने कहा: अनान। अबु दाउद ने कहा: मैं अनान शब्द के विषय पर आश्वस्त नहीं हूँ। उन्होंने(पै•) पूछा: क्या तुम पृथिवी और जन्नत के बीच की दूरी जानते हो? उन्होंने उत्तर दिया: हम नहीं जानते। तब उन्होंने(पै•) कहा: इनके बीच की दूरी एकहत्तर, बहत्तर या तीहत्तर वर्ष है। जो जन्नत इसके उपर है, वो भी सामान्य दूरी पर है(आगे बढ़ते हुए उन्होंने सातों जन्नतों को गिना)। सातवें जन्नत/आसमान के उपर एक समुद्र है, जिसके उपरी सतह और तल के बीच की दूरी दो क्रमागत जन्नतों/आसमानों के बीच के दूरी के समान है। इसके उपर आठ पहाड़ी बकरियाँ हैं, जिनके खुरों और कुल्हों के बीच की दूरी दो क्रमागत जन्नतों/आसमानों के बीच के दूरी के समान है। उनके पीठ पर सिंहासन है, और सिंहासन के ऊपर और नीचे की दूरी दो क्रमागत जन्नतों/आसमानों के बीच के दूरी के समान है। अल्लाह उसके उपर हैं।

image

समीक्षा : वाह जी वाह! इस हदीस को पढ़कर तो निश्चित हीं सबके मन में प्रश्नों का आना स्वाभाविक है। तो मेरे भी मस्तिष्क में कुछ प्रश्न कौंध रहे हैं। कृपया कोई भी मोमिन भाई उत्तर दे दें। आसमानों की बातें छोड़ दिया जाए और केवल बकरिओं पर प्रश्न पूछा जाए तो हीं काफी है।

१. इन बकरिओं का जन्म कैसे हुआ और इनके माता पिता कौन और कहाँ हैं? क्या मर गये?

२. ये बकरियाँ यहाँ कैसे पहुँचीं और इनके यहाँ होने का प्रयोजन क्या है?

३. और ये बकरियाँ पहाड़ी हैं अर्थात् पहाड़ पर रहने वाली हैं, तो पहाड़ कहाँ है?

४. ये बकरियाँ कहाँ ठहरी हैं? जो कहो समुद्र के उपर तो बकरियाँ समुद्र पर कैसे ठहर सकती हैं
डूबती नहीं होंगी क्या? ये समुद्र कहाँ ठहरा है?

५. और ये बकरियाँ कितनी बड़ी हैं कि इनके खुरों और कुल्हों के बीच की दूरी दो क्रमागत जन्नतों के दूरी के समान है? ऐसी भी कहीं बकरियाँ होतीं हैं भला?

६. ये बकरियाँ खाती क्या होंगी? और खाना आता कहाँ से होगा?

७. बेचारी निर्दोष बकरियाँ साल साँस लिए विना मरती नहीं होंगी? वा वहाँ अल्लाह तआला ने पूरी व्यवस्था कर रखी है?

८.  बकरियाँ मल-मूत्र कहाँ त्यागती होंगी? या करती भी हैं या नहीं? जो कहो नहीं, तो ये उत्तर दो कि तब अनपचा भोजन कहाँ जाता होगा?

९. ये बकरियाँ दूध वगैरह देती हैं या नहीं?  संत्नोत्पति होती है या नहीं?

आज कल मुसलमान महर्षि के सत्यार्थ प्रकाश में सूर्य पर जीवन संभव होने वाले तथ्यों का मजाक उड़ाया तो कृपया निम्नलिखित प्रशनों का उत्तर पहले दो।

अभिषेक कुमार

answeringaryamantavya ब्लॉग की जवाब (इस्लाम में नारी की दुर्दशा) भाग १

answeringaryamantavya ब्लॉग  की जवाब (इस्लाम में नारी की दुर्दशा) भाग १
(इस्लाम में नारी की दुर्दशा)
अभी एक उत्साही मोमिने ने मुझे एक लिंक दिया जिसमें उसने आर्यसमाज( सच पूछो तो पूरे सनातन धर्म) को नीचा दिखाने का प्रयास किया गया.
http://answeringaryamantavya.blogspot.in/2016/09/1_27.html?m=1
ये वह पोस्ट है.
हम क्रमशः इस पोस्ट का खंडन करेंगे
१:-बेशक कोइ शक ही नहीँ
अल्लाह ने फरमाया है कुरआन ए पाक मेँ कि मर्द औरत का
निगेहबान है । लेकिन वो इस बात को क्या
समझगेँ जो भरी सभा मेँ एक औरत कि इज्जत ना बचा
सके । भरी सभा मेँ उसे निवर्स्त होने से ना बचा सके
प्रमाण महाभारत मेँ द्रोपदी वो इस
बात को कया समझेगेँ जो एक औरत कि नाक ही काट देँ

वो भला इस बात को क्या समझेगेँ जो एक औरत को भोग
की वसतु समझते है ।
11 11 वाले मिशन कि पैदाइश आर्य समाजी क्या
समझेगेँ ।
आगे चलीये
*समीक्षा* पाठक पोस्ट पढ़कर समझ जायेंगे कि ऐसी हेय भाषा प्रयोग करने वाला कैसा व्यक्ति होगा.
इनके आरोपों पर नजर डालें:-
” भरी सभा में एक औरत की इज्जत न बचा सके”
हजरत साहब, मां द्रौपदी का चीरहरण भारतीय संस्कृति पर कलंक है.सत कहो तो दुर्योघन केवल द्रौपदी जी को दासी के वस्त्र पहना कर और झाडू लगवा कक अपमामित करना चाहता था.उनका चीरहरण करना उसका मकसद न था.सच कहो तो द्रौपदी का चीरहरण और वस्त्र का बढ जाना आदि गपोड़े महाभारत में कालांतर में जोड़े गये.सच कहो तो श्रीकृष्ण ने कहा था कि यदि मैं सभा में होता तो न तो जुआ होता न द्रौपदी और पांडवों का अपमान.महाभारत का काल पतनकाल था.पर तब भी स्त्रियों का सम्मान था.स्त्री के अपमान के कारण ही महाभारत क् युद्ध हुआ और स्त्रा की गरिमा पर हाथ डालने वाले रणभूमि में खून से लथपथ पड़े थे.मां सीता का हरण करने वाले रावण का वंशनाश हो गया.यह है स्त्री की गरिमा! वैदिक धर्म में ६ आततायी कहे गय हैं.उनमें स्त्री से जबरदसती करने वो भी आते हैं.मनु महाराज ने ऐसों को मौत की सजा का विधान रखा है.इस पर ” आर्यमंत्वय ” के लेख पढे होते उसके बाद कलम चलाई होती.
रजनीश जी द्रौपदी चीरहरण पर जवाब दे चुके हैं
देखिये:-http://aryamantavya.in/%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8C%E0%A4%AA%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%9A%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%A3-%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%A5%E0%A4%95-%E0%A4%B8%E0%A5%87/
आगे श्रीराम और लक्ष्मण जी को शूपणखा के नाक काटना का आरोप है.हजरत साहब! शूपणखा राक्षसी थी.वो कामुक भाव से श्रीराम से गांधर्वविवाह करने आई थी.पर उनके मना करने पर मां सीता पर झपट पड़ी क्योंकि उसको लगा कि राम जी को पानो से पहले सीता जी को रास्ते से हटाना होगा.तब वह राक्षसी रूप में आकर मां सीता पर टूट पड़ी.तब जवाब में लक्ष्मण जी ने उसको दूर हटा दिया उसकी नाक काट दी यानी अपमानित कर दिया.अब बतायें जरा, आपकी मां बहन बेटी पत्नी पर कोई जानलेवा वार करे तो क्या आप शांत बैठोगे? नहीं, पत्नी रक्षा पति का धर्म है.अतः इससे श्रीराम और लक्ष्मण जी को नारीविरोधी कहना धूर्तता है.राम जी ने शबरी अंबा और देवी अनसूया का आतिथ्य स्वीकार किया.इससे पता चलता हा कि वे कितने स्त्रीसमर्थक थे
बाकी *हम डंके की चोट पर कहतेहैं कि रामायण में उत्तरकांड और बीच बीच के कई प्रसंग प्रक्षिप्त हैं और अप्रमाण हैं.अतः सीता त्याग का हम खंडन करते हैं.( देखिये पुस्तक ‘ रामायण :भ्रांतियां और समाधान)*
मनुस्मृति में भी कई श्लोक प्रकषिप्त हैं.अतः हम आपसे आग्रह करेंगे कि स्वामी जगदीश्वरानंदजी और डॉ सुरेंद्रकुमार जी के ग्रंथ ” वाल्मीकीय रामायण” ” विशुद्ध मनुस्मृति” पढें जिनमें प्रक्षेप हटाकर इनको शुद्ध किया गया है.
बाकी ११-११ नियोग की बात तो नियोग केवल आपद्धर्म है.यह सेरोगेसी की तरह है जिससे उत्तम कुल के वर्ण के नियुक्क से शुक्रदान होता है.यह केवल सबसे रेयर केसेस में से एक है.हजरत, जरा उन मां बाप से पूछें जिनके संतान नहीं है.तब पता चलेगा कि निःसंतान होना कैसा है? इस स्थिति में संतान गोद ले लें.यदि न हो सके तो नियोग करें.पर सच कहो तो गृहस्थ होने की काबिलियत भी हममें नहीं, स्वामीजी के मत में.क्योंकि उसके लिये पूर्ण विद्वान और तैयार होना जरूरी है.तब तो नियोग करना दूर की बात.पर ये प्रथा ” हलाला” से तो बहुत अच्छी है.
अब इस्लाम पर आते हैं कि यदि तीन तलाक हो जाये और तलाकशुदा स्त्री पुराने पति को पाना चाबहे तो उसको परपुरुष से निकाह कर बिस्तर गरम करना होगा और फिर दुबारा वो पुराने पति के लिये हलाल है.( सूरा बकर २२९-२३०) अब किसी मोमिन में औकात है कि नियोग पर आक्षेप लगायें.नियोग के लिये आर्यमंतव्य  के ब्लॉग देख सकते हैं.शायद आपका शंका समाधान हो जाये.
शेष अगले लेख में
आर्यवीर  की  कलम से