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ज्वलन्त प्रश्न – तीन तलाक: – दिनेश

भारत के संविधान के अनुच्छेद 44 में नीति निर्देशक तत्वों का उल्लेख है जिसमें कहा गया है कि भारत के सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक कानून बनाने का दायित्व राज्य का होगा। यह एक सलाह के रूप में उल्लिखित है। यह संविधान 1950 में लागू किया गया और तब से आज तक विभिन्न प्रकार की समितियाँ, आयोग इत्यादि गठित किए गए लेकिन समर्थन और प्रतिरोध दोनों के बीच में भारत के सभी नागरिकों के लिए समान व्यवस्था का कोई भी सर्वसम्मत निर्णय नहीं लिया जा सका है।

आज का ज्वलन्त प्रश्न मुस्लिम महिलाओं के लिए तीन तलाक है। उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड में काशीपुर निवासी 42 वर्षीया सायरा बानो ने सबसे पहले सर्वोच्च न्यायालय में तीन तलाक, निकाह-हलाला तथा बहु-विवाह के प्रावधानों को चुनौती दी। यही वह याचिका थी जिससे केवल मुस्लिम समाज में ही नहीं अपितु तथाकथित धर्म-निरपेक्षता का दावा करने वाली राजनीतिक पार्टियाँ और उनके पोषक बुद्धिजीवियों में हाहाकार मच गया। मुस्लिम समाज के प्रमुख मौलवी, उलेमा इस बात का दावा करते हैं कि ये परम्पराएँ शरीयत के अन्तर्गत हैं और इनमें परिवर्तन से उसके मूलभूत अधिकारों का अतिक्रमण होगा। ध्यातव्य है कि शरीयत में संशोधन आजादी से पूर्व कितनी ही बार हो चुका है। सन् 1772 में वारेन हेस्टिंग्स के समय में मुस्लिम कोड बिल तैयार किया गया तो काजी के स्थान पर अंगेे्रज जजों ने उस अधिकार को लिया। सन् 1843 में शरीयत में उल्लिखित गुलाम-प्रथा को समाप्त किया गया। सन् 1860 में इस्लामी अपराध कानून के स्थान पर भारतीय दण्ड संहिता (इंडियन पेनल कोड) को लागू किया गया। सन् 1861 में जाब्ता फौजदारी कानून (क्रिमिनल प्रोसिजर कोड) तथा 1872 ई. में साक्षी अधिनियम (एविडेंस एक्ट) लागू किया गया। यही नहीं मुस्लिम महिलाओं की गवाही पुरुषों की गवाही के बराबर मानने का प्रावधान भी किया गया। पहले दो महिलाओं की समान गवाही को एक पुरुष की गवाही के बराबर माना जाता था। 1882 ई. में जाब्ता दीवानी (सिविल प्रोसिजर कोड) तथा सम्पत्ति हस्तान्तरण अधिनियम (ट्रान्सफर प्रॉपर्टी एक्ट) सभी के लिए बनाया गया। ध्यान देने योग्य बात यह है कि विश्व के कितने ही मुस्लिम देश शरीयत को विदाई दे चुके हैं। इण्डोनेशिया में एक प्रान्त को छोडक़र शेष भाग में हॉलैण्ड के डच बोर्ड के आधार पर सिविल लॉ बनाया गया। तुर्की में स्विस कोर्ट के आधार पर कानून बनाया गया। जबकि मिस्र के कानून फ्रांस के आधार पर बने हैं। ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान एवं पश्चिम अफ्रीका के कई मुस्लिम देशों में शरीयत लागू नहीं होती। ईरान, पाकिस्तान, सीरिया, लेबनान और ट्यूनीशिया में भी व्यापक स्तर पर परिवर्तन किए गए हैं और भारत के गोवा प्रान्त में तो एक समान नागरिक कानून मुसलमानों सहित सभी जनता पर लागू है….. रूस, चीन, जापान, कोरिया, श्रीलंका, म्यांमार, यूरोपीय देशों और अमेरिका को मिलाकर 150 से अधिक देशों में सब पंथों, धर्मों के लोग समान कानून के अंतर्गत रहते हैं, फिर भारत में क्यों नहीं रह सकते।

यह देखा गया है कि इस्लाम में तलाक को निन्दनीय और अवांछनीय माना गया है। जिसमें तलाक के उपरान्त तलाकशुदा स्त्री के भरण-पोषण और बच्चों के विकास के लिए उचित प्रबन्ध होना चाहिए। लेकिन वर्तमान में मोबाइल, स्पीड पोस्ट से, पत्र द्वारा या दूरभाष पर ही तलाक-तलाक-तलाक कहकर शरीयत कानून के तहत तलाक की इतिश्री समझ ली जाती है। आज मुस्लिम महिलाओं के हक-हकूकों के साथ गहराई और व्यापकता के साथ विचार-विमर्श किया जा रहा है और यह तब और प्रासंगिक हो गया है जबकि केन्द्र और उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार है जिसमें उन्होंने चुनाव प्रचार के मध्य तीन तलाक पर विचार किए जाने का उल्लेख किया था। मानवीय दृष्टिकोण से विचार किया जाये तो पुरुष और नारी के मध्य बराबरी का हक है इसलिए केवल तलाक-तलाक-तलाक मात्र कह देने से जीवनसाथी को पृथक् किया जाना वर्तमान परिप्रेक्ष्य में न्यायसंगत नहीं होगा। अत: बुद्धिजीवियों, न्यायविदों, धर्म-सुधारकों और सोशल एक्टिविस्टों को इस विषय में जागरूक होकर इसका न्यायसंगत समाधान निकालना ही होगा। विधि आयोग के अध्यक्ष एवं पूर्व न्यायमूर्ति बलवीर सिंह चौहान द्वारा वर्तमान समय में इसे प्रासंगिक मानते हुए संविधान के अनुच्छेद 21 पर बहस किये जाने का सुझाव दिया गया है। क्योंकि इसके अंतर्गत नागरिकों के जीवन के संरक्षण और उनकी निजता की स्वतंत्रता सुनिश्चित की जाती है।

संविधान में जब धर्म, पंथ, जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव न किए जाने का प्रावधान किया गया है तब सायरा बानो की याचिका पर अक्टूबर 2015 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संज्ञान लिया गया। यह आज के ज्वलंत प्रश्न की प्रासंगिकता को स्वयं रेखांकित कर देता है। यह भी आश्चर्य का विषय है कि केन्द्र सरकार के अतिरिक्त अन्य दलों ने इस विषय में लिखित में अपना मत न तो विधि आयोग को प्रस्तुत किया और न ही माननीय सर्वोच्च न्यायालय को ही प्रेषित किया है। यह स्पष्टत: उनकी इस विषय पर अवधारणा को स्पष्ट करता है, जो वर्तमान परिप्रक्ष्य में समीचीन नहीं कही जा सकती।

उपर्युक्त विवरण के आधार पर यदि भारत में समान आचार संहिता पर सर्वसम्मति से विचार किया जाता है तो कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। सायरा बानो ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करके  मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लिकेशन एक्ट 1937 के अनुच्छेद 2 की संवैधानिक स्थिति पर सवाल खड़ा किया है। यही वह एक्ट है जिसके जरिए शरीयत एक से ज्यादा शादियों, तीन तलाक और निकाह हलाला जैसी रवायतों को जायज ठहराती है। याचिका में मुस्लिम विवाह एक्ट 1939 के बेमानी होने की बात भी कही गई है।

यह वास्तव में चिन्तनीय प्रश्न है कि मुस्लिम महिलाओं की प्रस्थिति अन्य भारत की महिलाओं के समान क्यों नहीं होनी चाहिए, यह मानवाधिकार के अन्तर्गत आता है। भारतीय संस्कृति प्राचीन काल से महिला और पुरुषों को समान अधिकार के रूप में स्वीकार करती रही है। यहां तक कि विवाह-विच्छेद (तलाक) का स्पष्ट शब्द वहाँ उल्लिखित नहीं है। हाँ, विशेष शर्तों के साथ एक विवाह के बाद दूसरा विवाह करने की परम्परा मौर्य काल में प्रचलन में थी।  सुप्रीम कोर्ट द्वारा केन्द्र सरकार से इस बाबत मांगी गई टिप्पणी में केन्द्र सरकार ने स्पष्ट सूचित किया कि तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं की गरिमा (डिग्निटी) सामाजिक स्तर (सोशल स्टेटस) पर प्रभाव डालता है जिससे संविधान में मिले उनके मूलभूत अधिकारों की अनदेखी होती है। भारत की कुल आबादी में मुस्लिम महिलाओं की हिस्सेदारी 8 प्रतिशत है। केन्द्र सरकार ने यह भी कहा कि लैंगिक असमानता का बाकी समुदायों पर दूरगामी असर होता है। यह बराबर की साझेदारी को रोकती है और संविधान में दिए गए हक से भी रोकती है। मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक और ज्यादा शादियों के भय से डर और खतरे में जीती हैं। केन्द्र सरकार ने तीन तलाक निकाह, हलाला और कई शादियों जैसी प्रथाओं का विरोध किया है। इस विषय में इस्लामिक देशों में अपनाये जा रहे कानून का भी केन्द्र सरकार ने उल्लेख किया है।

इस सम्बन्ध में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने उक्त प्रावधानों से शरीयत का बचाव किया है। उसने तर्क दिया है कि महिला की हत्या होने की अपेक्षा उसे तलाक दिया जाये, यही ठीक है और धर्म में मिले हुए हकों पर कानून की अदालत में सवाल नहीं उठाये जा सकते। स्पष्टत: मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड तथा अन्य संस्थाएं तीन तलाक, निकाह हलाला और बहुविवाह की परम्परा को शरीयत के अनुसार ठीक मानती हैं।

यह भी जानने के योग्य है कि शिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने केन्द्र सरकार द्वारा दी गई राय का समर्थन किया है। उन्होंंने कहा है कि शिया पर्सनल लॉ बोर्ड महिलाओं की गरिमा और उनकी सामाजिक स्थिति को बराबरी की दृष्टि से मानता है।

महर्षि दयानन्द ने संस्कारविधि में 16 संस्कारों के अंतर्गत 13वें संस्कार में विवाह संस्कार का विस्तार से विवरण दिया है। जिसमें उन्होंने तलाक जैसी किसी प्रथा को स्वीकार न करते हुए एक पत्नीव्रत की परम्परा को मानते हुए नारी के सम्मान और उसकी गरिमा को अक्षुण्ण रखने का संदेश दिया है। आर्य समाज अपनी मान्यताओं में भी केवल हिन्दू महिलाओं की ही नहीं अपितु सभी नारियों के प्रति आदर और सम्मान का भाव रखते हुए उनकी गरिमा को किसी भी प्रकार क्षति पहुंचाने को स्वीकार नहीं करता। आज इसी विचार की आवश्यकता है कि हम मुस्लिम समाज के अधिकृत मौलानाओं, उलेमाओं और मुफ्तियों को वैचारिक दृष्टि से संतुष्ट करने का प्रयास करें कि वे आगे आएँ और आज 21वीं सदी में बहन-बेटियों पर होने वाले एतद्विषयक अत्याचारों एवं कष्टों से उन्हें बचायें तथा स्वेच्छा से उसमें संशोधन करें ताकि मुस्लिम महिलाएँ गरिमा और सामाजिक सम्मान की दृष्टि से अपने जीवन को समान रूप से व्यतीत कर सकें। यद्यपि 11 मई से सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ में यह सुनवाई होगी ताकि इन प्रथाओं की संवैधानिक वैधता पर विचार किया जा सके।

विधि आयोग ने भी इस बाबत सभी नागरिकों, मुस्लिम संगठनों आदि से 16 सवाल किए हैं-

  1. क्या आप जानते हैं कि अनुच्छेद-44 में प्रावधान है कि सरकार समान नागरिक आचार संहिता लागू करने का प्रयास करेगी?
  2. क्या समान नागरिक आचार संहिता में तमाम धर्मों के निजी कानूनों प्रथागत या उसके कुछ भाग शामिल हो सकते हैं, जैसे शादी, तलाक, गोद लेने की प्रक्रिया, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और विरासत से सम्बन्धित प्रावधान?
  3. क्या समान अधिकार आचार संहिता में निजी कानूनों और प्रथाओं को शामिल करने से लाभ होगा?
  4. क्या समान नागरिक आचार संहिता से लैंगिक समानता सुनिश्चित होगी?
  5. क्या समान नागरिक आचार संहिता को वैकल्पिक किया जा सकता है?
  6. क्या बहुविवाह प्रथा, बहुपति प्रथा, मैत्री करार आदि को खत्म किया जाए या फिर नियंत्रित किया जाए?
  7. क्या तीन तलाक की प्रथा को खत्म किया जाए या रीति-रिवाजों में रहने दिया जाए या फिर संशोधन के साथ रहने दिया जाए?
  8. क्या यह तय करने का उपाय हो कि हिन्दू स्त्री अपने सम्पत्ति के अधिकार का प्रयोग बेहतर तरीके से करे, जैसा पुरुष करते हैं? क्या इस अधिकार के लिए हिन्दू महिला को जागरूक किया जाए और तय हो कि उसके सगे-सम्बन्धी इस बात के लिए दबाव न डालें कि वह सम्पत्ति का अधिकार त्याग दे।
  9. ईसाई धर्म में तलाक के लिए दो साल की प्रतीक्षा अवधि सम्बन्धित महिला के अधिकार का उल्लंघन तो नहीं है?
  10. क्या तमाम निजी कानूनों में उम्र का पैमाना एक हो?
  11. क्या तलाक के लिए तमाम धर्मों के लिए एक समान आधार तय होना चाहिए?
  12. क्या समान नागरिक आधार संहिता के तहत तलाक का प्रावधान होने से भरण-पोषण की समस्या हल होगी?
  13. शादी के पंजीकरण को बेहतर तरीके से कैसे लागू किया जा सकता है?
  14. अंतरजातीय विवाह या फिर अंतर्धर्म विवाह करने वाले युगलों की रक्षा के लिए क्या उपाय हो सकते हैं?
  15. क्या समान नागरिक आचार संहिता धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करती है?
  16. समान नागरिक आचार संहिता या फिर निजी कानून के लिए समाज को संवेदनशील बनाने के लिए क्या उपाय हो सकते हैं?

ये सभी बिन्दु भी विचार-विमर्श की अपेक्षा रखते हैं।

मुस्लिम मत के विद्वानों को भी यह स्वीकार करना चाहिए कि वे यद्यपि कुरान शरीफ को ईश्वरीय ग्रन्थ मानकर उसे अपरिवर्तनीय मानते हैं, परन्तु उससे इतर मुख्यत: हदीसों के आधार पर निर्मित शरीयत कानूनों पर उन्हें हठ और दुराग्रह त्याग देना चाहिए। ऐसी स्थिति में तो और भी कि जब विश्व के अनेक इस्लामी देश और शिक्षा सम्प्रदाय इसे उचित नहीं मानता। ध्यान रहे कि प्रकृति स्वयं अन्याय सहन नहीं करती और समयानुसार स्वत: न्याय कर देती है। बहुत पहले अकबर इलाहाबादी ने कहा था-

बिठाई जाएँगी पर्दों में बीवियाँ कब तक।

बने रहोगे तुम घर में ‘मियाँ’ कब तक।।

स्त्री-पुरुष समानता का उपदेश प्राकृतिक एवं शाश्वत है। अत: शास्त्रों का यह उपदेश अत्यन्त समीचीन है-

अर्धं भार्या मनुष्यस्य भार्या श्रेष्ठतम: सखा

एवम्

यस्यां भूतं समभवद् यस्यां विश्वमिदं जगत्।

तामद्य गाथां गास्यामि या स्त्रीणामुत्तमं यश:।।

– (महाभारत)

एक ही समाज में साथ-साथ रहने वाले नागरिकों (स्त्रियों) में एक को विशेष अधिकार प्राप्त हों और दूसरे को पैर की जूती समझा जाए, तो लोकतन्त्र में विद्रोह के स्वर मुखर होने और क्रान्ति होने की संभावना को कोई रोक नहीं सकता। मुस्लिम महिलाएँ हिन्दू महिलाओं और अन्य मतों की महिलाओं को गृहस्वामिनी और ‘साम्राज्ञी’ के पद पर आसीन देखेंगी और स्वयं को द्वितीय श्रेणी का नागरिक अपने घर में, अपने मज़हब के अनुसार पाएँगी, तो स्वाभाविकत: विद्रोह की भावना प्रबल होगी। धर्म और मज़हब यदि मनुष्य को उन्नति और समानता का पाठ नहीं पढ़ाते तो वे अप्रासंगिक हैं।

आर्यसमाज यद्यपि वेदज्ञान को शाश्वत मानता है, जिसमें सभी के यथायोग्य कत्र्तव्यों एवं अधिकारों का समुचित वर्णन है, पुनरपि आधुनिक भारत के संविधान के अंतर्गत उल्लिखित नियमों-विनियमों की बाध्यता भी स्वीकार करता है, क्योंकि यह संविधान लोककल्याणकारी और हमारे द्वारा अंगीकृत है। लेकिन यदि संविधान की कुछ धाराएँ अस्पष्ट और विभेदकारी हैं और सरकार उसमें जनकल्याण की दृष्टि से कुछ संशोधन करना/कराना चाहती है, तो हमें उसे स्वीकार करना चाहिए। इसमें असमानता के आधार पर आधी जनसंख्या को प्रताडि़त करने जैसा कुछ नहीं होना चाहिए।

कुरान का प्रारम्भ ही मिथ्या से : चमूपति जी

प्रारम्भ ही मिथ्या से

वर्तमान कुरान का प्रारम्भ बिस्मिल्ला से होता है। सूरते तौबा के अतिरिक्त और सभी सूरतों के प्रारम्भ में यह मंगलाचरण के रूप में पाया जाता है। यही नहीं इस पवित्र वाक्य का पाठ मुसलमानों के अन्य कार्यों के प्रारम्भ में करना अनिवार्य माना गया है।

ऋषि दयानन्द को इस कल्मे (वाक्य) पर दो आपत्तियाँ हैं। प्रथम यह कि कुरान के प्रारम्भ में यह कल्मा परमात्मा की ओर से प्रेषित (इल्हाम) नहीं हुआ है। दूसरा यह कि मुसलमान लोग कुछ ऐसे कार्यों में भी इसका पाठ करते हैं जो इस पवित्र वाक्य के गौरव के अधिकार क्षेत्र में नहीं।

पहली शंका कुरान की वर्णनशैली और ईश्वरी सन्देश के उतरने से सम्बन्ध रखती है। हदीसों (इस्लाम के प्रमाणिक श्रुति ग्रन्थ) में वर्णन है कि सर्वप्रथम सूरत ‘अलक’ की प्रथम पाँच आयतें परमात्मा की ओर से उतरीं। हज़रत जिबरील (ईश्वरीय दूत) ने हज़रत मुहम्मद से कहा—

‘इकरअ बिइस्मे रब्बिका अल्लज़ी ख़लका’

पढ़! अपने परमात्मा के नाम सहित जिसने उत्पन्न किया। इन आयतों के पश्चात् सूरते मुज़मिल के उतरने की साक्षी है। इसका प्रारम्भ इस प्रकार हुआ—

या अय्युहल मुज़म्मिलो

ऐ वस्त्रों में लिपटे हुए!

ये दोनों आयतें हज़रत मुहम्मद को सम्बोधित की गई हैं। मुसलमान ऐसे सम्बोधन को या हज़रत मुहम्मद के लिए विशेष या उनके भक्तों के लिए सामान्यतया नियत करते हैं। जब किसी आयत का मुसलमानों से पाठ (किरअत) कराना हो तो वहाँ ‘इकरअ’ (पढ़) या कुन (कह) भूमिका इस आयत के प्रारम्भ में ईश्वरीय सन्देश के एक भाग के रूप में वर्णन किया जाता है। यह है इल्हाम, ईश्वरीय सन्देश कुरान की वर्णनशैली जिस से इल्हाम प्रारम्भ हुआ था।

अब यदि अल्लाह को कुरान के इल्हाम का आरम्भ बिस्मिल्लाह से करना होता तो सूरते अलक के प्रारम्भ में हज़रत जिबरील ने बिस्मिल्ला पढ़ी होती या इकरअ के पश्चात् बिइस्मेरब्बिका के स्थान पर बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम कहा होता।

मुज़िहुल कुरान में सूरत फ़ातिहा की टिप्पणी पर जो वर्तमान कुरान की पहली सूरत है, लिखा है—

यह सूरत अल्लाह साहब ने भक्तों की वाणी से कहलवाई है कि इस प्रकार कहा करें।

यदि यह सूरत होती तो इसके पूर्व कुल (कह) या इकरअ (पढ़) जरूर पढ़ा जाता।

कुरान की कई सूरतों का प्रारम्भ स्वयं कुरान की विशेषता से हुआ है। अतएव सूरते बकर के प्रारम्भ में, जो कुरान की दूसरी सूरत है प्रारम्भ में ही कहा—

‘ज़ालिकल किताबोला रैबाफ़ीहे, हुदन लिलमुत्तकीन’

यह पुस्तक है इसमें कुछ सन्देह (की सम्भावना) नहीं। आदेश करती है परहेज़गारों (बुराइयों से बचने वालों) को। तफ़सीरे इत्तिकान (कुरान भाष्य) में वर्णन है कि इब्ने मसूद अपने कुरान में सूरते फ़ातिहा को सम्मिलित नहीं करते थे। उनकी कुरान की प्रति का प्रारम्भ सूरते बकर से होता था। वे हज़रत मुहम्मद के विश्वस्त मित्रों (सहाबा) में से थे। कुरान की भूमिका के रूप में यह आयत जिसका हमने ऊपर उल्लेख किया है, समुचित है। ऋषि दयानन्द ने कुरान के प्रारम्भ के लिए यदि इसे इल्हामी (ईश्वरीय रचना) माना जाए यह वाक्य प्रस्तावित किये हैं। यह प्रस्ताव कुरान की अपनी वर्णनशैली के सर्वथा अनुकूल है और इब्ने मसूद इस शैली को स्वीकार करते थे। मौलाना मुहम्मद अली अपने अंग्रेज़ी कुरान अनुवाद में पृष्ठ 82 पर लिखते हैं—

कुछ लोगों का विचार था कि बिस्मिल्ला जिससे कुरान की प्रत्येक सूरत प्रारम्भ हुई है, प्रारम्भिक वाक्य (कल्मा) के रूप में   बढ़ाया गया है यह इस सूरत का भाग नहीं।

एक और बात जो बिस्मिल्ला के कुरान शरीफ़ में बाहर से बढ़ाने का समर्थन करती है वह है, प्रारम्भिक वाक्य (कल्मा) के रूप में बढ़ाया गया है यह इस सूरत का भाग नहीं।

एक और बात जो बिस्मिल्ला के कुरान शरीफ़ में बाहर से बढ़ाने का समर्थन करती है वह है सूरते तौबा के प्रारम्भ में कल्माए तस्मिआ (बिस्मिल्ला) का वर्णन न करना। वहाँ लिखने वालों की भूल है या कोई और कारण है जिससे बिस्मिल्ला लिखने से छूट गया है। यह न लिखा जाना पढ़ने वालों (कारियों) में इस विवाद का भी विषय बना है कि सूरते इन्फ़ाल और सूरते तौबा जिनके मध्य बिस्मिल्ला निरस्त है दो पृथक् सूरते हैं या एक ही सूरत के दो भाग-अनुमान यह होता है कि बिस्मिल्ला कुरान का भाग नहीं है। लेखकों की ओर से पुण्य के रूप (शुभ वचन) भूमिका के रूप में जोड़ दिया गया है और बाद में उसे भी ईश्वरीय सन्देश (इल्हाम) का ही भाग समझ लिया गया है।

यही दशा सूरते फ़ातिहा की है, यह है तो मुसलमानों के पाठ के लिए, परन्तु इसके प्रारम्भ में कुन (कह) या इकरअ (पढ़) अंकित नहीं है। और इसे भी इब्ने मसूद ने अपनी पाण्डुलिपि में निरस्त कर दिया था।

स्वामी दयानन्द की शंका एक ऐतिहासिक शंका है यदि बिस्मिल्ला और सूरते फ़ातिहा पीछे से जोड़े गए हैं तो शेष पुस्तक की शुद्धता का क्या विश्वास? यदि बिस्मिल्ला ही अशुद्ध तो इन्शा व इम्ला (अन्य लिखने-पढ़ने) का तो फिर विश्वास ही कैसे किया जाए?

कुछ उत्तर देने वालों ने इस शंका का इल्ज़ामी (प्रतिपक्षी) उत्तर वेद की शैली से दिया है कि वहाँ भी मन्त्रों के मन्त्र और सूक्तों के सूक्त परमात्मा की स्तुति में आए हैं और उनके प्रारम्भ में कोई भूमिका रूप में ईश्वरीय सन्देश नहीं आया।

वेद ज्ञान मौखिक नहीं—वेद का ईश्वरीय सन्देश आध्यात्मिक, मानसिक है, मौखिक नहीं। ऋषियों के हृदय की दशा उस ईश्वरीय ज्ञान के समय प्रार्थी की दशा थी। उन्हें कुल (कह) कहने की क्या आवश्यकता थी। वेद में तो सर्वत्र यही शैली बरती गई है। बाद के वेदपाठी वर्णनशैली से भूमिकागत भाव ग्रहण करते हैं। यही नहीं, इस शैली के परिपालन में संस्कृत साहित्य में अब तक यह नियम बरता जाता है कि बोलने वाले व सुनने वाले का नाम लिखते नहीं। पाठक भाषा के अर्थों से अनुमान लगाता है। कुरान में भूमिका रूप में ऐसे शब्द स्पष्टतया लिखे गए हैं, क्योंकि कुरान का ईश्वरीय सन्देश मौखिक है जिबरईल पाठ कराते हैं और हज़रत मुहम्मद करते हैं। इसमें ‘कह’ कहना होता है। सम्भव है कोई मौलाना (इस्लामी विद्वान्) इस बाह्य प्रवेश को उदाहरण निश्चय करके यह कहें कि अन्य स्थानों पर इस उदाहरण की भाँति ऐसी ही भूमिका स्वयं कल्पित करनी चाहिए। निवेदन यह है कि उदाहरण पुस्तक के प्रारम्भ में देना चाहिए था न कि आगे चलकर, उदाहरण और वह बाद में लिखा जाये यह पुस्तक लेखन के नियमों के विपरीत है।

ऋषि दयानन्द की दूसरी शंका बिस्मिल्ला के सामान्य प्रयोग पर है। ऋषि ने ऐसे तीन कामों का नाम लिया है जो प्रत्येक जाति व प्रत्येक मत में निन्दनीय हैं। कुरान में मांसादि का विधान है और बलि का आदेश है। इस पर हम अपनी सम्मति न देकर शेख ख़ुदा बख्श साहब एम॰ ए॰ प्रोफ़ेसर कलकत्ता विश्वविद्यालय के एक लेख से जो उन्होंने ईदुज़्ज़हा के अवसर पर कलकत्ता के स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित कराई थी, निम्नलिखित उदाहरण प्रस्तुत किए देते हैं—

ख़ुदा बख्श जी का मत—“सचमुच-सचमुच बड़ा ख़ुदा जो दयालु व दया करने वाला है वह ख़ुदा आज ख़ून की नदियों का चीख़ते हुए जानवरों की असह्य व अवर्णनीय पीड़ा का इच्छुक नहीं प्रायश्चित? ……  वास्तविक प्रायश्चित वह है जो मनुष्य के अपने हृदय में होता है। सभी प्राणियों की ओर अपनी भावना परिवर्तित कर दी जाए। भविष्य के काल का धर्म प्रायश्चित के इस कठोर व निर्दयी प्रकार को त्याग देगा। ताकि वह इन दीनों पर भी दयापूर्ण घृणा से दृष्टिपात करे। जब बलि का अर्थ अपने मन के अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु या अन्य सत्ता का बलिदान है। ”

—‘माडर्न रिव्यु से अनुवादित’

दयालु व दया करने वाले परमात्मा का नाम लेने का स्वाभाविक परिणाम यह होना चाहिए था कि हम वाणी हीन जीवों पर दया का व्यवहार करते, परन्तु किया हमने इसके सर्वथा विरोधी कार्य………..। यह बात प्रत्येक सद्बुद्धि वाले मनुष्य को खटकती है।

मुज़िहुल कुरान में लिखा है—

जब किसी जानवर का वध करें उस पर बिस्मिल्ला व अल्लाहो अकबर पढ़ लिया करें। कुरान में जहाँ कहीं हलाल (वैध) व हराम (अवैध) का वर्णन आया है वहाँ हलाल (वैध) उस वध को निश्चित किया है जिस पर अल्लाह का नाम पढ़ा गया हो। कल्मा पवित्र है दयापूर्ण है, परन्तु उसका प्रयोग उसके आशय के सर्वथा विपरीत है।

(2) इस्लाम में बहु विवाह की आज्ञा तो है ही पत्नियों के अतिरिक्त रखैलों की भी परम्परा है। लिखा है—

वल्लज़ीन लिफ़रूजिहिम हाफ़िज़ून इल्ला अललअज़वाजुहुम औ मामलकत ईमानु हुम। सूरतुल मौमिनीन आयत ऐन

और जो रक्षा करते हैं अपने गुप्त अंगों की, परन्तु नहीं अपनी पत्नियों व रखैलों से। तफ़सीरे जलालैन सूरते बकर आयत 223 निसाउकुम हर सुल्लकुम फ़आतू हरसकुम अन्ना शिअतुम  तुम्हारी पत्नियाँ तुम्हारी खेतियाँ हैं जाओ अपनी खेती की ओर जिस प्रकार चाहो। तफ़सीरे जलालैन में इसकी व्याख्या करते हुए लिखा है—

बिस्मिल्ला कहकर—सम्भोग करो जिस प्रकार चाहो, उठकर, बैठकर, लेटकर, उल्टे-सीधे जिस प्रकार चाहो ……….. सम्भोग के समय बिस्मिल्ला कह लिया करो।

बिस्मिल्ला का सम्बन्ध बहु विवाह से हो रखैलों की वैधता से हो। इस प्रकार के सम्भोग से हो यह स्वामी दयानन्द को बुरा लगता है।

(3) सूरते आल इमरान आयत 27

ला यत्तख़िज़ु मौमिनूनलकाफ़िरीना औलियाया मिनदूनिल मौमिनीना………इल्ला अन तत्तकू मिनहुम तुकतुन

न बनायें मुसलमान काफ़िरों को अपना मित्र केवल मुसलमानों को ही अपना मित्र बनावें।

इसकी व्याख्या में लिखा है—

यदि किसी भय के कारण सहूलियत के रूप में (काफ़िरों के साथ) वाणी से मित्रता का वचन कर लिया जाए और हृदय में उनसे ईर्ष्या व वैर भाव रहे तो इसमें कोई हानि नहीं…….जिस स्थान पर इस्लाम पूरा शक्तिशाली नहीं बना है वहाँ अब भी यही आदेश प्रचलित है।

स्वामी दयानन्द इस मिथ्यावाद की आज्ञा भी ईश्वरीय पुस्तक में नहीं दे सकते। ऐसे आदेश या कामों का प्रारम्भ दयालु व दयाकर्त्ता, पवित्र और सच्चे परमात्मा के नाम से हो यह स्वामी दयानन्द को स्वीकार नहीं 1 ।

[1. इस्लामी साहित्य व कुर्आन के मर्मज्ञ विद्वान् श्री अनवरशेख़ को भी करनीकथनी के इस दोहरे व्यवहार पर घोर आपत्ति है।             —‘जिज्ञासु’]

इस्लाम का चमत्कार (अंधविश्वास) : पं॰ श्री चमूपतिजी एम॰ ए॰

चमत्कार

ईमान के दो साधन हैं—एक बुद्धि, दूसरा सीधा विश्वास, प्रकृति की पुस्तक दोनों के लिए खुली है।

प्रातःकाल सूर्योदय, सायंकाल सूर्यास्त, दिन व रात्रि का क्रम ऊषा की रंगीनी, बादलों का उड़ना, किसी बदली में से किरणों का छनना, इन्द्रधनुष बन जाना, पर्वतों की गगन चुम्बी चोटियाँ, सागर की असीम गहराई, वहाँ बर्फ के तोदे व दुर्ग, उछलती कूदती लहरों का शोर, बुद्धि देख-देखकर आश्चर्यचकित है। भूमि पर तो चेतन प्राणी हैं ही, वायु व जल में भी एक और ही विराट् संसार बसा हुआ है।

विज्ञान के पण्डित नित नए अनुसंधान करके नित नए नियमों का पता लगा रहे हैं और इन नियमों के कारण प्रकृति के ऊपर अधिकार प्राप्त करते जाते हैं। जो घटनाएँ पहले अत्यन्त आश्चर्यजनक लगतीं थीं। वह इन नियमों के प्रकाश में साधारण-सी घटनाएँ बनकर रह जाती हैं। मनुष्य यह देखकर दंग है कि पानी आकाश से कैसे बरसता है? वैज्ञानिक एक हण्डिया में पानी डालकर उसे आँच देता है। पानी सूखता है, उड़ता है। वैज्ञानिक उस उड़ते पानी को ठण्डी नली में से गुज़ारता है और उड़ती हुई भाप को फिर पानी बना देता है। यह पानी कण-कण होकर फिर गिर पड़ता है। वैज्ञानिक कहता है यही वर्षा होने का रहस्य है। हमने चमत्कार समझा था, परमात्मा की कुदरत का विशेष रहस्य माना था। वैज्ञानिक ने वही चमत्कार छोटे स्तर पर स्वयं करके दिखा दिया। हमारा आश्चर्य समाप्त हो गया। हम इन्द्रधनुष पर लट्टू थे। वैज्ञानिक ने त्रिकोण के एक शीशे में ही एक छोटा-सा इन्द्रधनुष उत्पन्न कर दिया। हम इसे साधारण बात समझ बैठे। वैज्ञानिक बुद्धिमान् था हमारी सरलता पर हँसा और कहा मेरी शक्ति प्रथम तो सीमा में छोटी है। साधारण है। भला इस इन्द्रधनुष की उस आकाश में फैले हुए इन्द्रधनुष से तुलना ही क्या? जो आकाश के एक भाग में छा जाता है? मेरे कण भर जल से कोई खेत हरियाले हो सकते हैं या झीलें भर सकती हैं? वे भण्डार प्रभु के ही

हैं जिनका संसार प्रार्थी है, याचक है। फिर मेरी खोजें और आविष्कार

तो परमात्मा की रचनाओं की नकल मात्र हैं, वह उसी भण्डार

की एक बानगी है जो वस्तु वर्तमान संसार में पहले से ही विद्यमान

है। मैं उसे देखता हूँ उसकी दशा का चित्र अपनी बुद्धि में उतारता हूँ

और अपनी सामर्थ्य के अनुसार इस भण्डार से एक छोटी-सी बानगी

प्राप्त करता हूँ और उस पर परमात्मा के ही नियमों का प्रयोग करके

कहीं इन्द्रधनुष का खिलौना कहीं पानी व भाप की गुड़िया बना लेता

हूँ। यह प्रकृति के नियमों का छोटा-सा भाग जो मेरी छोटी-सी

बुद्धि में आता है परमात्मा को सर्वशक्तिमान् व पूर्ण ज्ञान का

स्वामी सिद्ध करता है। यदि उसके सामर्थ्य का प्रकटीकरण बिना

किसी नियम के होता तो मनुष्य को अपने प्रयास की सफलता का

विश्वास करना कठिन हो जाता। उस खेती में जिससे हम सबका पेट

पालन होता है, क्या कुछ कम चमत्कार है। एक दाने के लाखों व

करोड़ों दाने हो जाते हैं। परमात्मा ही तो इन्हें बढ़ाता है। हम

उससे लाभ उठा लेते हैं। इसमें यदि नियम व व्यवस्था न हो तो

कोई किस भरोसे पर बीज बोए। उसे पानी दे और फ़सल काटे?

यह है बुद्धि के द्वारा ईश्वर पर विश्वास, अज्ञानी व्यक्ति बुद्धि से कोरा

है उसे प्रतिदिन की खेती में परमात्मा का हाथ दिखाई देना कठिन है।

सूरज व चाँद के तमाशे उसकी दृष्टि में परमात्मा की शक्ति के खेल

नहीं? परमात्मा और उसके साथ उसके प्यारों की शक्ति का

प्रदर्शन किसी प्रकृति नियम के विपरीत चमत्कार के द्वारा होना चाहिए।

1[1. मुस्लिम विचारक डॉ॰ गुलाम जैलानी बर्क ने प्रचलित इस्लाम से हटकर यह लिखा है, “अल्लाह का सबसे बड़ा चमत्कार यह सृष्टि—यह रचना है।” देखिये ‘दो कुरान’ पृष्ठ 622। पं॰ गंगाप्रसाद उपाध्याय जी ने लिखा है, “The occurence of an unnatural phenomenon is a contradiction of terms. If it occurs, it is natural, if it is natural it must occur. Then is it anti natural? No who can defy nature successfully.” Superstition अर्थात् चमत्कार यदि स्वाभाविक है तो चमत्कार नहीं यदि सृष्टि नियम विरुद्ध हैं तो हो नहीं सकते।  —‘जिज्ञासु’]

इस लड़कपन के विचार ने अज्ञानी लोगों के दिलों में चमत्कारों की सृष्टि की है। वह उन्हीं लोगों को प्रभु तक पहुँचा हुआ     मानते हैं जिनसे कोई करामात चमत्कार या प्रकृति के नियम विरुद्ध काम सम्बन्धित हो। कुछ सम्प्रदायों की आधारशिला ही इन्हीं चमत्कारी कहानियों पर है। स्वयं चमत्कार करना कठिन है, क्योंकि उसके मार्ग में प्रकृति के नियम बाधक हैं इसलिए इन मतों की पुस्तकों में चमत्कारों की असम्भवता को कुछ स्वीकार किया गया है, जैसे कि इञ्जील में वर्णन है—

“उस ईसा ने ठण्डा सांस लिया और कहा यह पीढ़ी चमत्कार चाहती है? मैं तुम्हें सच कहता हूँ इस पीढ़ी को चमत्कार नहीं दिखाया जाएगा”1। —(मरकस आयत 8-12)

[1. डॉ॰ जेलानी ने भी अपनी पुस्तकों में चमत्कारों की चर्चा करते हुए यही प्रमाण दिये हैं।   —‘जिज्ञासु’]

और कुरान में भी आया है—

व कालू लौला उन्ज़िला इलैहे आयातुन मिन रब्बिही कुल 1 इन्नमल आपातो इन्दल्लाहे व इन्नमा इन्ना नजीरुन मुबीन॰ लो लमयक फिहिम अन्ना अंजलना अलैकल किताबो, तुतला अलैहिम इन्ना फ़ीजालिका लरहमता व ज़िकरालि कौमिय्योमिनून।

—(सूरते अनकबूत आयत 50-51)

और कहते हैं क्यों नहीं उतरीं उस पर उसके रब की ओर से निशानियाँ। पास अल्लाह के हैं और निश्चत ही मैं डराने वाला हूँ, प्रकट और क्या उनके लिये यह पर्याप्त नहीं कि हमने तुम पर पुस्तक उतारी है जो पढ़ी जाती है उन पर और उसमें कृपा है और वर्णन है मौमिनों के लिए।

परन्तु पूर्ववर्तियों के सम्बन्ध में चमत्कारों की कहानियाँ सुनाने में कोई कानून बाधक नहीं। इसलिए ऐसी पुस्तकों के अपने काल के चमत्कारों का लाख इन्कार हो, पूर्वकालीन कालों के पैग़म्बरों के साथ चमत्कार जोड़ दिए गए हैं। काल बीतने पर श्रद्धालुओं ने वैसे ही और उनसे बढ़-चढ़कर विचित्र चमत्कारों के सम्बन्ध अपने पथ-प्रदर्शकों के साथ जोड़ दिए हैं। चमत्कार वास्तव में प्रभु की सत्ता की स्वीकृति नहीं इन्कार हैं।

परमात्मा नित्य है, अनादि है तो उसकी शक्ति का प्रदर्शन भी नित्य है, शाश्वत है, क्षण-क्षण में होता है। परमात्मा का ज्ञान पूर्ण है। उसका ज्ञान जैसे प्रकृति के नियम हैं। जहाँ यह नियम टूटे समझो परमात्मा का ज्ञान भंग हुआ। परमात्मा के नियम व कार्य में परिवर्तन होना असम्भव है। उसके ज्ञान व कार्य का प्रदर्शन नित्य प्रति के कार्यों में हो रहा है। उनका साँचा पलटने की सद्बुद्धि को आवश्यकता नहीं। हाँ जिन लोगों की मान्यता ही यह है कि वह कानून से भी ऊपर हों जिस पर तर्क ननुनच न कर सके, वह परमात्मा को भी एक बड़ा, सारे संसार को घेरे हुए, मनमौजी राजा कल्पना कर सकते हैं। जिसकी इच्छा का भरोसा नहीं।

अपनी या अपने प्यारों के लिए किसी समय कुछ कर गुज़रे। किसी पर दिल आ गया उसे रिझाने के लिए कुछ भी कर देना उससे दूर नहीं। आजकल राजाओं का युग नहीं रहा। सो परमात्मा की भी कल्पना परिवर्तित हो रही है।

वेद की दृष्टि में परमात्मा के नियम परमात्मा की पवित्र आज्ञाएँ हैं। उनका उल्लंघन (नऊज़ो बिल्लाह—परमात्मा की शरणागति) करके परमात्मा अपना निषेध उल्लंघन करेगा यह असम्भव है। परमात्मा के प्यारे वे हैं जिनका जीवन विज्ञान के नियमों व आध्यात्मिकता के साँचे में ढल जाता है।

1[ 1. नियम नियन्ता के होने का एक बहुत बड़ा प्रमाण होता है। अनियमितता कहीं भी हो यही सिद्ध करती है कि यहाँ कोई नियन्ता नहीं। यह सृष्टि नियमों में बंधी है जो अटल Eternal हैं। ऋत व सत्य को वेद भूमि का आधार मानता है। इन नियमों के टूटने का कोई प्रश्न ही नहीं है। —‘जिज्ञासु’]

जिनका सदाचार ही उनकी महानता है। वे नियमों का उल्लंघन नहीं करते उसके ज्ञान का प्रचार करते हैं। उनकी भक्ति बुद्धि के साथ वाणी का रूप धारण करके उसका प्रकाश करती है जिसका पवित्र नाम वेद है।

इसके विपरीत कुरान शरीफ़ में स्थान-स्थान पर चमत्कारों का वर्णन आया है। हम नीचे कुछ पैग़म्बरों के सम्बन्ध में कुरान शरीफ़ की साक्षी प्रस्तुत करेंगे जिससे प्रकट हो कि उनकी महानता की आधारशिला कुरान की दृष्टि में उनके चरित्र पर नहीं चमत्कारों पर है। कुरान शरीफ़ के कुछ पैग़म्बरों के चरित्र पर एक संक्षिप्त आलोचना पिछले अध्याय में हो चुकी है।

आचार व आध्यात्मिकता की परिपूर्णता विद्यमान होने की दशा में किसी व्यक्ति का जीवन  चमत्कारों की अपेक्षा नहीं रखता। मनुष्यों के लिए लाभदायक व सृष्टि के नियमों के या ऐसा कहो कि परमात्मा की इच्छा के रंग में रंगी हुई कार्य प्रणाली सर्वश्रेष्ठ चमत्कार है। जो ऋषि दयानन्द व उनके पूर्ववर्ती वेद के ऋषियों के भाग में आया है। अन्य महापुरुष भी इस श्रेष्ठता से रिक्त नहीं होंगे, परन्तु हमें यहाँ उन महापुरुषों के वर्णन से तात्पर्य है कि जो उनके अनुयायियों के कथानकों के द्वारा हम तक पहुँचे हैं।

इस अध्याय में हमें देखना यह होगा कि इन महापुरुषों के चमत्कार कल्पना के कितने निकट हैं? यदि कल्पना करो कि उनकी सत्यता को क्षणभर के लिए स्वीकार भी कर लिया जाए तो इससे वर्तमान काल का मानव समाज क्या लाभ उठा सकता है? माननीय पैग़म्बरों के आचार के परिपालन का द्वार इस्लाम के भाग्य लेखों के नियमों के हाथों बन्द है। क्योंकि हम वैसे ही कर्म करने पर विवश हैं जैसे प्रारम्भ से हमारे भाग्य लेखक ने लिख दिए हैं फिर आश्चर्यप्रद चमत्कार तो—

र्इं सआदत बज़ोरे बाज़ू नेस्त,

ता न बख्शद ख़ुदाए बिख्शन्दा 1 ।

[1. अर्थात् यह पुण्य अथवा सामर्थ्य भुजा बल से प्राप्त नहीं होता। जब तक विधाता की कृपा न हो—इसकी प्राप्ति असम्भव है।   —‘जिज्ञासु’]

यह चमत्कार हमारे किस काम के? अभी तो हमें इन करामातों, चमत्कारों के तथाकथित वर्णनों पर दृष्टिपात करना चाहिए। सम्भव है, इसमें हमारे सदुपयोग की भी कोई बात निकल आवे—

हम दृष्टान्त के रूप में इन पैग़म्बरों के कुछ चमत्कारों की संक्षिप्त जाँच पड़ताल किए लेते हैं—

(1) हज़रत मूसा, (2) हज़रत ईसा, (3) हज़रत इब्राहिम, (4) हज़रत सालिह, (5) हज़रत नूह, (6) हज़रत मुहम्मद।

हज़रत मूसा

हज़रत मूसा की कहानी कुरान शरीफ़ में बार-बार दोहराई गई है। हम कुछ ऐसे प्रमाणों पर सन्तोष करेंगे जिनसे इन हज़रत के किए हुए कार्यों या उनकी कहानी में वर्णित प्रकृति नियम विरुद्ध कारनामों पर प्रकाश पड़ सके।

मनुष्य बन्दर बन गए

सूरते बकर में फ़रमाया है— वलकद अनिमतुमल्लज़ीना अइतिदू मिनकुम फ़िस्सबते फ़कुलनालहुम कूनू किरदतन ख़ासिईन। फ़जअलनाहा नकालन लिमा बेनायर्देहा वमा ख़लफ़हा।

—(सूरते बकर आयत 65-66)

इसकी व्याख्या तफ़सीरे जलालैन में इस प्रकार की गई है—

सचमुच सौगन्ध है कि तुम जानते हो उनको जिन्होंने (प्रतिबन्ध लगाने पर भी) शनिवार के दिन (मछली का शिकार करके) सीमा का उल्लंघन किया (वह लोग ईला के रहने वाले थे) सो हमने उनसे कहा कि तुम बन्दर बन जाओ रहमत (प्रभु कृपा) से दूर (सो वह) हो गए और तीन दिन बाद मर गए। फिर हमने (इस दण्ड को) उनके काल के पश्चात् और बाद में आने वाले लोगों के लिए मार्गदर्शन का साधन कर दिया। —जलालैन

शरीरों का अविलम्ब परिवर्तन प्रकृति के किस नियम के अनुसार हुआ? हज़रत डारविन को कठिनाई थी कि बन्दर की पूँछ मनुष्य शरीर में आकर लुप्त कैसे हो गई? पाठक वृन्द! कुरान की कठिनाई यह है कि दुम (पूँछ) कैसे उत्पन्न हो गई? मज़हब में तर्क का प्रवेश नहीं।

मृत शरीर बोल उठा

व इज़ा कतलतुम नफ़सन फ़द्दर अतुम फ़ोहा बल्लाहो मुख़- रिजुन मा कुन्तुम तकतिमूना, फ़कुलना अज़रिबहो विबाज़िहा। कज़ालिका यहयल्लाहो अलमूता व युरीकुम आयतिही लअल्लकुम तअकिलून। —(सूरते बकर आयत 73)

जबकि तुमने एक आदमी को मारा फिर उसमें झगड़ा किया और अल्लाह प्रकट करने वाला है। इस बात को जिसको तुम छुपाते थे। फिर हमने कहा कि इस (वध किए गए) से इस (गाय) की (शाब्दिक अर्थ हैं इस गाय) का एक टुकड़ा जीभ या दुम की हड्डी मारो उन्होंने मारा और वह जीवित हो गया और अपने चाचा के बेटों के बारे में कहा कि उन्होंने मुझे मारा है यह कहकर मर गया।  अल्लाह ताला इसी प्रकार मृत शरीरों को जीवित करेगा वह तुमको अपनी शक्ति की निशानियाँ दिखाता है कि तुम विचार कर समझो। —जलालैन

गाय का एक टुकड़ा लगने से मुर्दा जी उठा न जाने मरा क्या लगने से? पर मरते तो लोग नित्यप्रति हैं। चमत्कार जीने में था। बंकिमचन्द्र बंगाल के प्रसिद्ध उपन्यासकार मजिस्ट्रेट थे। एक मुकदमें में वास्तविक परिस्थिति का पता नहीं लग रहा था। आपने मुर्दे का स्वांग भरा। लाश बनकर पड़े रहे और उस पर कपड़ा डाल दिया गया। अपराधी भी वहीं थे। बातों-बातों में निःसंकोच सारी घटना सच-सच कह गए। मुर्दा जलाने से पूर्व ही जी उठा और न्यायालय में घटना की साक्षी दे गया। कुछ ऐसी ही दशा इन आयतों में लिखी हुई तो नहीं? यह अन्तर अवश्य है कि बंकिम फिर जीवित ही रहे तीन दिन पश्चात् मरे नहीं।

डण्डे का चमत्कार

व इजस्तस्का मूसालिकौमिही, फकूलनाजरिव बिअसाक- लहजरा फन्फजरत मिनहा इसनता अशरा ऐनन।

—(सूरते बकर आयत 73)

जब कि (उस जंगल में) मूसा ने अपनी जाति के लिए पानी माँगा सो हमने कहा कि अपनी लाठी पत्थर पर मार (यह वही पत्थर था जो मूसा के कपड़े ले भागा था) नरम (चौकोन जैसा आदमी का सिर) सो उसने मारा बस 12 जल के स्रोत (चश्मे) (जितने वह गिरोह थे) उसमें से निकलकर बहने लगे। —जलालैन

डण्डा अजगर बन गया

फ़लका असाहो, फ़इज़ाहिया सअबानुन मुवीनुन, वनज़ आयदुहू फ़इज़ाहिया बैज़ा अनलिन्नाज़िरीन।

—(सूरत ऐरा फ आयत 107)

बस मूसा ने अपनी लाठी डाली सो अचानक वह बड़ा अजगर साँप बन गई और (मूसा ने) अपना हाथ (कपड़ों में से) निकाला और वह चमकता हुआ प्रकाशमान प्रकट हुआ देखने वालों की दृष्टि में (यद्यपि उस हाथ की यह रंगत न थी। गेहुआ रंग था)।

—जलालैन

पतला साँप

व अलके असाका फ़लम्मा राअहा तहतज़्जुन कअन्नहा जानुन ववलामु दब्बिरन वलम यअकिब या मूसा ला तख़िफ़।

—(सूरते नहल आयत 10)

और अपनी लाठी डाल (सो मूसा ने) अपनी लाठी डाली (उसने) जब उस लाठी को देखा कि दौड़ती है जैसे पतला साँप। मूसा पीठ फेरकर भागा और पीछे को न लौटा (अल्ला ताला ने फ़रमाया) ए मूसा तू इससे भयभीत न हो।

—जलालैन

वेदान्त में भ्रमवश रस्सी को साँप समझने का वर्णन तो प्रायः होता है, यहाँ न जाने भ्रम था या वास्तविक दशा थी?

टिड्डियों जुंओं व मैढकों का मेंह

लोग हज़रत मूसा के भक्त न बने बस फिर क्या था?

नहनोलका बिमोमिनीना फ़अरसलना अलैहुम त्तूफ़ानावल जरादा वलकमला वज़्ज़फ़ादिए वद्दम्मा आयतिन मुफ़स्सिलातिन।

—(सूरते आराफ 132-133)

हम कभी तेरा विश्वास न करेंगे और ईमान न लाएँगे (सो मूसा ने उनको शाप दिया) फिर हमने उन पर पानी का तूफ़ान भेजा (कि सात दिन तक पानी उनके घर में पानी भरा रहा। जो बैठे हुए आदमी के हलक तक पहुँचता था) और भेजा टिड्डियों को (सात दिन की उनकी खेती व फल खा गए और (भेजा) जुओं को (या वह कीड़ा जो अनाज में पैदा हो जाता है) या चिचड़ी को जो उसने टिड्डियों का बचा हुआ खाया और कुछ शेष न छोड़ा और भेजा उन पर मैंढक (कि वह उनके घरों व खानों में भर गए) और रक्त को (उनके पानी में) और यह निशानियाँ प्रकट (भेजी)।

किसी की समझ में यह चमत्कार न आए तो इसका इलाज वही है जो इस आयत के अनुसार ईमान न लाने वालों का हुआ। अर्थात् पानी का तूफ़ान, टिड्डियों, जूएँ, रक्त व मैंढक, इस भय के होते कौन हैं जो ईमान न लाए?

नदी दो टुकड़े

आगे फ़रमाया है—

फ़ग़रकनाहुम फ़िलयम्मा बिइन्नहुम कज़्ज़बू बूआया तिनाव  कानू अनहा ग़ाफ़िलीन।

—(सूरते आराफ आयत 136)

फिर डुबा दिया (उनको शोर नदी में) इस कारण से कि वह निश्चय ही हमारे आदेश को झुठलाते थे और (हमारी निशानियों से) अज्ञान रखते थे कुछ सोच विचार नहीं करते थे। —जलालैन

व जावज़ना विनब्यिय इसराईल लवहरा।

—(सूरते आराफ आयत 138)

और हमने बनी इसराईल को नदी से पार कर दिया।

इस घटना का विवरण इससे पूर्व निम्न आयत में वर्णन हो चुका है।

व इज़ा फ़रकना बिकुलमुल बहरा फ़अन्जयतकुम व अग़रकना आले फ़िरओन व अन्तुम तंज़रुना।

—(बकर आयत 50)

जबकि हमने तुम्हारे (बनी इसराईल के) कारण दरिया को चीरा (ताकि तुम शत्रुता से भागकर इसमें दाखिल हो जाओ) सो हमने तुमको डूबने न दिया और फिरऔन की जाति को डुबो दिया (फ़िरऔन सहित) और तुम देखते थे (उनके ऊपर दरिया के मिल जाने पर)।

—जलालैन

आजकल की पनडुब्बी नौकायें इससे भी कहीं अधिक चमत्कार1 दिखा रही हैं। [1. डॉ॰ ग़ुलाम जैलानी बर्क ने अपनी पुस्तक दो कुरान पृष्ठ 322 पर नील नदी का फटना, लाठी का सर्प बनना आदि चमत्कारों को झुठला दिया है। —‘जिज्ञासु’]

  1. हज़रत मसीह

हज़रत ईसा मसीह को मुसलमान वह महत्ता नहीं देते जो ईसाई लोग देते हैं, परन्तु हज़रत मसीह से भी कुछ चमत्कार कुरान में ही जोडे़ गये हैं। जैसा कि सूरते बकर आयत 87 में वर्णन है।

व आतैना ईसा इब्ने मरयमल बय्यनाते व अय्यदनाही बिरुहिलकुदस।

और मरियम के पुत्र ईसा को कई चमत्कार दिए (जीवित करना मृतकों का और अन्धें व जन्मजात कोढी को निरोग करना) और उनको सामर्थ्य दी जिबरईल से (जहाँ ईसा चलते, जिबरईल उनके साथ होते थे)।

—जलालैन

बिना पिता के सन्तानोत्पत्ति

व इज़ा कालतिलमलाइकतो या मरयमो इन्नल्लाहा इस्तफ़ाका व तहरका वस्तफ़ाका अलानिसाइल आलमीन।

—(आले इमरान 39)

जब फ़रिश्ते बोले ए मरियम! अल्लाह ने तुझे पसन्द किया व शुद्ध बनाया (टिप्पणी में है—पुरुष के निकट होने से पवित्र किया) और पसन्द किया तुझको सब संसार की स्त्रियों से।

—जलालैन

व जकरा फ़िल कितावे मरियमा इज़म्बतजतामिन अहलिहा मकानन शरकिय्यन। फ़त्तरवजत मिन दूनिहिम हिजाबन फ़अर सलना इलैहा रुहना फ़तमस्सला लहवशरन सविय्यन। कालत इन्नो अऊजो बिर्रहमाने मिन्काइन कुन्ता नकिय्य्न। काला इन्नमा अनारसूलो रब्बिकालिअहल लका ग़ुलामन ज़किय्यन॰ कालत अन्नी यकूनोली ग़ुलामुन वलम यमसइनि बशरुन वलम अकोवगिय्यन काला कज़ालिका काला रब्बुका हुवा अलय्या हय्यनुन व लि नजअहु आयतुन लिन्नासे………फ़हमलतहू फ़न्तब्जत बिहीमकानन कसिय्यन।

—(मरयम 16-20)

याद करो कुरान में कथा मरियम की जबकि वह पृथक् हुई अपने घर वालों से एक मकान के कोने में जो पूर्व दिशा में था (वहाँ जाकर) घर के लोगों के सामने परदा छोड़ दिया (ताकि कोई न देखे यह परदा इसलिए छोड़ा था कि अपने सिर या कपड़ों से जूं निकालती थी या मासिक धर्म के पश्चात् स्नान करती थी पवित्र होकर) सो भेजा हमने उनकी ओर अपनी रूह (आत्मा, जिबरईल) को। सो वह हो गया आदमी पूरे हाथ पैर वाला सुन्दर (जबकि मरियम अपने कपड़े पहन चुकी थी) मरियम बोली, निःसन्देह मैं तुझसे ख़ुदा की शरण माँगती हूँ यदि तू कोई पवित्र हृदय पुरुष है (तू मेरे शरण माँगने से पृथक् रह) जिबरईल ने कहा—बात यह है कि मैं तेरे परमात्मा का भेजा हुआ हूँ कि तुमको एक पवित्र बेटा प्रदान करूँ (जो पैग़म्बर होगा) मरियम ने कहा—मेरे पुत्र कैसे होगा।

यद्यपि किसी पुरुष ने विवाह करके हाथ नहीं लगाया और न मैं व्यभिचारिणी हूँ…….. जिबरईल ने कहा—(यह बात अवश्य होने वाली है, अर्थात् बिना पिता के पुत्र अवश्य उत्पन्न होगा) तेरा परमात्मा कहता है कि यह काम मेरे लिए सरल है (इस प्रकार कि जिबरईल मेरे आदेश से तेरे अन्दर फूँक मारे तू उससे गर्भवती हो जाए)……..और हम उसको अवश्य पैदा करेंगे ताकि बनाएँ उसको अपने सामर्थ की निशानी…..फिर मरियम गर्भवती हुई और चली गई (गर्भवती होने के कारण अपने घर वालों से) दूर।

—जलालैन

फ़रिश्ते आजकल बात भी नहीं करते। प्राचीनकाल में करते थे। परमात्मा के सन्देश लाते और उसके आदेशों का पालन करने में भाँति-भाँति के पुरस्कार प्रदान कर जाते थे। हज़रत मरियम को बिना पति के सन्तान दी। हज़रत यहया को बिना शक्ति के पुत्र दिया। इस विज्ञान के युग में अल्लाह मियाँ व उसके फ़रिश्ते सब वैज्ञानिक हो गए हैं। मजाल है कोई बात प्रकृति के नियमों के विरुद्ध कर जावें।

वल्लती अहसनत फ़रजहा फ़नफ़रवना फ़ीहा मिनरुहिनावजअलनांहां व अबनाहा आयतुन लिल आलमीन।

—(सूरते अम्बिया 88)

और स्मरण करो मरियम को जिसने अपनी योनि को (बुरे काम से) सुरक्षित रखा सो हमने अपनी रूह (आत्मा) फूँकी (अर्थात् जिबरईल ने उसके कुर्ते के गिरेबान में फूँक मारी जिससे उसको ईसा का गर्भ रह गया) और हमने मरियम को और उसके पुत्र को मनुष्यों, जिन्नों (भूतों) व फ़रिश्तों (देवताओं) के लिए एक निशानी बनाया। (क्योंकि मरियम ने ईसा को बिना पति के जन्म दिया)। —जलालैन

हज़रत इब्राहिम

कटे पशु जीवित किए

हज़रत इब्राहीम एक पुराने ईश्वरीय दूत हैं। हज़रत मुहम्मद का दावा है कि इस्लाम हज़रत इब्राहिम का ही धर्म है। उनके प्रकृति के नियमों के विरुद्ध चमत्कारों का वर्णन सूरते बकर में इस प्रकार है—

व इज़ा काला इब्राहीमो रब्बे अरनी कैफ़ा यहयुलमौता काला अवलय तौमिनो। काला बला वलाकिन लियमय्यिनाकलबी। काला फ़ख़ुज़ अरबअतन मिनत्तैरे फ़सर हुन्ना इलैका, सुम्मा अजअल अलाकुल्ले जबलिन मिनहुन्ना जुजअन सुम्मा अदउहुन्ना यातीन का सइयन व अलमी इन्नाल्लाहो अज़ीज़न हकीम। —(सूरते बकर आयत 260)

इब्राहिम ने कहा—ए मेरे प्रभु मुझको दिखला कि तू मुर्दों को कैसे जीवित कर देगा (अल्लाह ने उनसे फ़रमाया) क्या तुझको इस पर विश्वास नहीं? (कि मेरे अन्दर सामर्थ है कि मुर्दों को जीवित कर दूँ)……..(इब्राहीम ने) कहा कि मैंने निसन्देह विश्वास किया तेरी शक्ति पर……..यह मैंने तुझसे इसलिए पूछा कि आँख से देखकर पूरे हृदय को सन्तोष प्राप्त कर लूँ और विरोधियों से तर्क कर सकूँ (अल्लाह ने) फ़रमाया, अब तू चार पंछी पकड़…….और उनको अपने पास इकट्ठा कर और उनको काटकर उनके पंख गोश्त मिलाकर फिर अपनी ज़मीन के पहाड़ों में से प्रत्येक पहाड़ पर एक-एक टुकड़ा उनका रख दे फिर उनको अपनी ओर बुला वे दौड़कर आएँगे और जान ले कि अल्लाह शासक है (किसी बात से कमज़ोर नहीं उसका काम सुदृढ़ व पक्का है) सो इब्राहिम ने मोर, करगस, कौवा और मुर्ग पकड़ा और उनका मांस व पर काटकर मिला दिए और उनके सिर अपने पास रख लिए और उनको बुलाया सो तमाम टुकड़े उड़कर जिसका जो टुकड़ा था उसमें जा मिला। यहाँ तक कि पूरे होकर अपने-अपने सिरों से मिल गए।

—जलालैन

हज़रत सालिह

अल्लाह मियाँ की ऊँटनी

कौम समूद के पैग़म्बर सालिह के सम्बन्ध में सूरते हूद में आया है कि उन्होंने फ़रमाया—

वया कौमे हाजिही नाक तुल्लाहे लकुम आयतुन फजरुहा ताकुल फिलअरजे ल्लाहेवला तमस्सूहा बिसूइन फयारवुजकुम अजाबुन करीबुन फअकरुहा, फकाला तमत्तऊफी दारिकुम सलासता अय्यामिन जालिका व अदुन गैरो मकजूबिन।

—(सूरते हूद आयत 63)

और ए मेरी कौम यह अल्लाह की ऊँटनी है तुम्हारे लिए निशानी अतः इसे छोड़ दो फिर से अल्लाह की भूमि पर और इसके साथ किसी प्रकार का बुरा व्यवहार मत करो नहीं तो तुम पर बहुत बड़ा दण्ड आएगा। सो उन्होंने उसके पैर काटे (अर्थात् एक कज़ाज़ नामक व्यक्ति ने उस कौम के कहने पर ऊँटनी के पैर काट डाले)  (सालिह ने) फ़रमाया ज़िन्दा रहो तुम अपने घरों में तीन दिन फिर तुम वध कर दिए जाओगे।

—जलालैन

सूरते बनी इसराईल में कहा है—

व आतैना समूदुन्नाकतामब्सिरतुन फ़ज़लमू बिहा।

—(बनी इसराईल 58)

हमने समूद की ओर ऊँटनी को भेजा वह प्रकट निशानी थी सो उन्होंने उसका इन्कार किया। (अतः वे नष्ट हो गए)

तफ़सीरे हुसैनी में इस आयत की व्याख्या में कहा है—

समूद अज़ सालिह मोजिज़ा तलब करदन्द व ख़ुदाए बराए एशां अज़ संग नाका बेरूं आवुरद।

समूद ने सालिह से चमत्कार माँगा और ख़ुदा ने उनके लिए पत्थर से ऊँटनी उत्पन्न कर दी।

सूरते शुअरा में फ़रमाया है—

काला हाज़िही नाकतुन लहा शिरबुन वलकुम शिरबो योमिन मालूम।

—(सूरते शुअरा)

कहा यह ऊँटनी है उसके लिए पानी का एक भाग निश्चित है और तुम्हारे लिए एक निश्चित दिन का भाग।

—जलालैन

मूज़िहुल कुरान में इसी स्थान पर फ़रमाया है—

वह छूटी फिरती….जिस सरोवर पर पानी को जाती सब पशु वहाँ से भागते तब यह निश्चित कर दिया गया कि एक दिन पानी पर वह जाए एक दिन औरों के पशु जाएँ।

सूरते शमस में यह वार्ता इस प्रकार वर्णन की गई है—

फ़कालालहुम रसूलुल्लाहे नाकतुल्लाहे व सकयाहा फ़कज़िबूहा फ़अकरुहा फ़दमदमा अलै हुम रब्बुहुम बिज़नबिहिम फसब्वाहा।

—(सूरते शमस आयत 13-14)

फिर कहा उनको अल्लाह के रसूल ने सावधान हो अल्लाह की ऊँटनी से और उसके पानी पीने की बारी से फिर उसको उन्होंने झुठला दिया फिर वह काट मारी और फिर उल्टा मारा, उन पर उनके रब ने उनके पाप से फिर बराबर कर दिया।

—जलालैन

भला यह ऊँटनी क्या हुई! पत्थर से निकली और उसका अधिकार यह कि जिस दिन वह पानी पीए और पशु न पीवें आखिर अल्ला मियाँ की जो हुई। यह भी अच्छा हुआ कि पत्थर से कोई मनुष्य नहीं निकला नहीं तो मनुष्यों के लिये पानी का अकाल हो जाता। कोई पूछे कि इस चमत्कार से मनुष्य का क्या बना? और दयालु परमात्मा का क्या?

हज़रत नूह

लगभग हज़ार बरस जिए

सूरते अनकबूत में हज़रत नूह का वर्णन हुआ है। फ़रमाया है—

वलकद अरसलना नूह न इला कौमिहि फ़लबिसा फ़ीहिम अलफ़ा सनतिन इल्ला ख़मसीना आमन।

—(अनकबूत आयत 14)

और हमने भेजा नूह को उनकी कौम के पास। फिर रहे वे उनमें 50 कम 1 हज़ार बरस तक।

तफ़सीरे हुसैनी में इस आयत पर कहा है—

नूह चहल साल मबऊसशुद व नह सदपंजाह साल ख़लक रा बख़ुदा दावत करद। बाद अज़ तूफ़ान शस्त साल ज़ीस्त दर अहकाफ़ अज़ दहब नकल कुनन्द कि उम्रे नूह हज़ार व चहार सद साल बूद, साहब ऐनुलमआनी फ़रमूद कि सी सद व हफ़्ताद साल मबऊस शुद व नो सद व पंजाह साल दावत करद, बाद अज़ तूफ़ान सी सद व पंजाह साल ज़ीस्त।

नूह अलैहस्सलाम चालीस साल की आयु में पैग़म्बर हुए और नौ सौ पचास वर्ष तक लोगों को ख़ुदा का सन्देश देते रहे। तूफ़ान के पश्चात् साठ वर्ष जीवित रहे। अहकाफ़ में वह बसे रिवायत (वर्णनवार्ता) है कि नूह अलैहस्सलाम की आयु एक हज़ार चार सौ वर्ष थी। लेखक ऐनुलमआनी फ़रमाते हैं कि तीन सौ सत्तर साल की आयु में पैग़म्बर हुए नौ सौ पचास साल प्रचार किया और तूफ़ान के पश्चात् 3 सौ पचास साल जीवित रहे।

हज़रत नूह की आयु कुछ भी हो उनकी प्रचार की अवधि का प्रारम्भ पचास वर्ष स्वयं कुरान में वर्णित है। इस प्रचार का प्रभाव यह कि थोड़े गिने-चुने लोगों के उनके साथियों के अतिरिक्त कोई भी सन्मार्ग पर नहीं आया और सब को तूफ़ान की बलि होना पड़ा।   सारी सृष्टि अल्लाह की बनाई और बनाई भी वैसी जैसी अल्लाह को स्वीकार था। अल्लाह ने कुछ को जन्नत के लिए कुछ को दोज़ख़ के लिए पहले से ही चुन लिया था फिर हज़रत नूह को कष्ट देने की क्या आवश्यकता थी? यदि दिया ही था तो कुछ परिणाम निकलना चाहिए था।

हज़रत मुहम्मद

चाँद तोड़ दिया

हज़रत मुहम्मद ने चमत्कार दिखाने से इन्कार तो किया था, परन्तु अनुयायियों के आग्रह से विवश हो गए हैं। सूरते कमर में आया है—

बक्तरबत स्साअता वन्शक्कलकमरो।

निकट आ गया प्रलय दिन और फट गया चाँद (चाँद के दो टुकड़े होना)। हज़रत का चमत्कार हुआ जिसकी माँग काफ़िरों के द्वारा की गई थी। आपने उसकी ओर संकेत किया। और वह दो टुकड़े हो गया।

चाँद अरब का था क्या?—कोई प्रश्न कर सकता है कि वह चाँद अरब का था या इस चमत्कार को देखने वालों का कोई विशेष चाँद था? या यही चाँद था जो संसार की सभी जातियों के लिए सामान्य है? यदि सामान्य था तो क्या कारण है कि अरब के बाहर के लोग इस चमत्कार के साक्षी न हुए। वास्तव में यह चमत्कार ज्योतिष विद्या के इतिहास में कुछ कम महत्त्व का नहीं था कि हज़रत मुहम्मद की घटना उनके लेखकों के अतिरिक्त किसी और का ध्यान न खींचती। अपना-अपना भाग्य है इस गौरव से और लाभान्वित न हुए!

सूरते बनी इसराईल में कहा है—

सुबहानल्लज़ी असराबि अब्दिही लैलन मिनल मस्जिदल अकसा अल्लजी बरकना हौलहू लिनरीहू मिन आतेना।

—(सूरते बनी इसराईल आयत 71)

पवित्र है वह सत्ता कि अपने बन्दे को (मुहम्मद साहब को) रात में मस्जिदे हराम (अर्थात् मक्का) से मस्जिदे आकसा (बैतुल मुकद्दस-पवित्र घर) की ओर ले गया……जिसकी हर ओर से हमने बरकत दी……..कि उसको विचित्रताएँ व चिह्न दिखलाए…. आपकी भेंटें पैग़म्बरों से हुई व आपको आसमानों की ओर चढ़ाया………वास्तव में हज़रत सलअम ने फ़रमाया कि मेरे पास बुराक लाया गया कि वह एक सफ़ेद जानवर है गधे से बड़ा व खच्चर से छोटा उसके पैर वहाँ तक पड़ते हैं जहाँ तक उसकी दृष्टि पड़े सो मैं उस पर सवार हुआ। वह मुझको ले गया। यहाँ तक कि मैं बैतुल मुकद्दस पहुँचा। वहाँ मैंने अपनी सवारी को उस हलके (घर) में बाँधा जिसमें और पैग़म्बर अपनी सवारियाँ बाँधते थे।

—जलालैन

इसके पश्चात् आसमानों पर जाने का वर्णन है, द्वार खटखटाया जाता है, प्रश्न होता है कौन? हज़रत जिबरईल फरमाते हैं हज़रत मुहम्मद? पूछा जाता है। क्या वह पैग़म्बर हो गए? स्वीकारात्मक उत्तर मिलने पर द्वार खोल दिया जाता है। इस प्रकार विभिन्न आसमानों पर विभिन्न सम्मानीय पैग़म्बरों की भेंट के पश्चात्—

फिर मैं पहुँचा सदर तुलमुन्तहा (सर्वोच्च गन्तव्य स्थल) तक। उसके पत्ते ऐसे जैसे हाथी के कान और उसके फल ऐसे जैसे मटका। जब उस बेरी के वृक्ष को घेर लिया, अल्लाह के आदेश से उस वस्तु ने जिसने घेर लिया वह आश्चर्यचकित हो गया।…..आपने फ़रमाया मेरी ओर जो ईश्वरीय सन्देश मिला है वह प्रकट करने योग्य नहीं…….।

—जलालैन

हज़रत की उम्मत (समुदाय) पर पचास नमाजें  फर्ज़ हुर्इं। हज़रत वापिस लौटे, परन्तु सम्मानीय पैग़म्बरों ने समझाया1[1. नोट—यहाँ मूसा का वर्णन ।] बोझ तुम्हारे अनुयाइयों से सहन न हो सकेगा। हज़रत बार-बार ख़ुदा की सेवा में गए और वहाँ से लौटे अन्त में नमाज़ों की संख्या पाँच करा ली। हज़रत मूसा ने इसमें भी कमी कराने का परामर्श दिया तो फ़रमाया—

“मैं अनेक बार अपने रब के पास जा चुका हूँ अब मुझको लज्जा आती है। इस हदीस को बुख़ारी व मुस्लिम ने उद्धृत किया है और यह शब्द मुस्लिम के हैं।”

—जलालैन

इसमें सन्देह नहीं कि इस चमत्कारी यात्रा के विवरण कुरान के भाष्यों में लिखे हुए हैं। स्वयं कुरान में मस्जिद हराम से मस्जिदे अकसा तक एक रात में जाना वर्णन किया है। वह उस समय   कि यह  चमत्कार था, परन्तु आज गुब्बारों व विमानों का युग है। इस समय इसे कौन चमत्कार मान सकता है?

चमत्कार और भी बहुत से हैं, परन्तु यहाँ जैसे बहुतों में से कुछ नमूने के रूप में दिए हैं केवल कुछ चुने गए हैं। पाठक के लिए विचारणीय बात यह है कि क्या इन चमत्कारों से परमात्मा की किसी विशेष शक्ति का आभास होता है जो सृष्टि की कल को सामान्यतया चलाने से अधिक कठिन है? क्या इन चमत्कारों से परमात्मा के प्यारों की किसी विशेष महानता का आभास होता है जिससे उनकी पदवी बुद्धिमानों की दृष्टि में ऊँची हो? कहीं इन प्रकृति नियम के विरुद्ध कर्मों से यह तो प्रकट नहीं होता कि प्रकृति का नियम बेदाद नगरी अन्यायी नगरी का सा कानून है जो तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है।

यहाँ कर्मों की इतनी परवाह नहीं जितनी अपने प्यारों की प्रतिष्ठ व अपमान की है। लोगों ने एक मार्गदर्शक का कहना नहीं माना। बिना यह विचारे कि वह उपदेशक कैसे चरित्र का है। लोगों के लिए खून की वर्षा, नूह का तूफ़ान और न जाने क्या-क्या तैयार है। लोगों को अपना श्रद्धालु बनाने के लिए उपाय क्या-क्या प्रयोग किए जा सकते हैं। जादूगरी, डण्डे को साँप बना दिया। क्या इसी को धर्म व सत्य का प्रचार कहते हैं? इन खेलों से कहीं महान् गौरवशाली सच्चे कार्य सृष्टि-रचना में दिन-रात हो रहे हैं।

क्या बिना बाप के सन्तान उत्पन्न होने में परमात्मा की महानता का अनुमान होता है और माता- पिता दोनों के होते सन्तानोत्पत्ति होने में परमात्मा का कोई हाथ नहीं? बूढ़े के बच्चा हो जाना परमात्मा का चमत्कार है और युवक के पुत्र होना परमात्मा की कारीगरी का खण्डन है? ऊँटनी ने हज़रत सालिह के व्यक्तित्व में किस बड़प्पन की वृद्धि की? सच्चाई यह है कि परमात्मा पर विश्वास की निर्भरता यदि नित्य प्रति के साधारण कार्यों व घटनाओं पर रखो तो आज भी स्थिर रहेगा कल भी और जो किसी बीते काल के चमत्कारी कथानकों पर निर्भरता ठहरी तो जिस समय के लोग कहानियों से ऊपर उठकर वर्तमान परिस्थितियों के अभिलाषी हुए जैसे आज कल हैं उस काल में नास्तिकता ही नास्तिकता का सिक्का बैठ जाएगा। मनुष्य चरित्र से पूजा जा सकता है तथा परमात्मा अपने नियमों की सुदृढ़ता व अटलता से। जिसे न उसके (मत के अनुयायी) अपने तोड़ सकें न पराये ही।

कयामत की रात : पं॰ श्री चमूपतिजी एम॰ ए॰

 

कयामत की रात

 

एकदम अल्लाह को क्या सूझा?—पिछले अध्याय में अल्लाताला के न्याय के रूपों को तो एक दृष्टि से देख ही लिया गया! क्या ठीक हिसाब किया जाता है। अब हम इस न्याय की कार्य पद्धति देखेंगे। इसके लिए कयामत के दिन पर एक गहरी दृष्टि डाल जाना आवश्यक है, क्योंकि न्याय का दिन वही है।

मुसलमानों की मान्यता है कि सृष्टि का प्रारम्भ है। सृष्टि एक दिन प्रारम्भ हुई थी। पहले अल्लाह के अतिरिक्त सर्वथा अभाव था। एक दिन ख़ुदा ने क्या किया कि अभाव का स्थान भाव ने ले लिया। किसी के दिल में विचार आ सकता है कि इससे पूर्व अल्लाह मियाँ क्या करते थे? उनके गुण क्या करते थे? जो काम पहले कभी न किया था वह अकस्मात सूझा कैसे? क्या यह अल्लामियाँ के जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन नहीं था कि पहले अकेले विद्यमान थे और अब अपनी सत्ता में किसी और को भी सम्मिलित कर लिया? एकत्व से उकता गए थे क्या? वृद्धावस्था कुछ मनोरंजन चाहती थी? कुछ हो संसार पैदा हो गया।

इसमें असमान तत्त्व भी रख दिए। क्योंकि उसके बिना संसार का कारोबार न चलता था। असमानता में क्या नियम कार्य करता था? प्रकटरूप से अल्लाह मियाँ की इच्छा के अतिरिक्त और कोई नियम बरता ही नहीं गया। यह भी हुआ। हज़रत ने आत्माएँ उत्पन्न कीं। उनको काम करने की सामर्थ ही नहीं प्रदान की। कार्य भी निश्चित कर दिए। किसी के भाग्य लेख में पवित्रता लिखी गई। किसी के भाग्य में पाप करना। पाप कर्म का साधन शैतान को निश्चित किया गया। दोज़ख़ भर देने का निर्णय ख़ुदाई न्यायालय से प्रारम्भ से ही कर दिया गया था, इसमें जाने वाले, जलने वाले सब निश्चित हैं।

परन्तु अब एक दिन आना है जब अल्लामियाँ न्याय की कुर्सी को शोभा प्रदान करेंगे और कर्मों का फल दिया जाएगा। हम परेशान हो रहे हैं कि कर्म किसके? बदला क्यों? परन्तु अल्लाह मियाँ की इच्छा है कि करे कराए तो आप ही परन्तु बदला हमें दे। दे दें। इसके लिए दरबार लगाना क्या आवश्यक है? भाग्य लेख तो हमारा प्रारम्भ से ही निश्चित है फिर इस दिन नूतन क्या होगा? यदि इस दरबार लगाने का नाम ही न्याय है तो हमारा विनम्र निवेदन है कि यह न्याय का स्वांग एक ही दिन क्यों किया जाता है? कहीं इससे अल्लामियाँ के न्याय के गुण में अस्थाई होने का दोष तो लागू नहीं होगा 1?

[1. डॉ॰ जेलानी पहले मुस्लिम विचारक हैं जो अल्लाह द्वारा प्रतिपल न्याय देना मानते हैं। देखिये उनकी पुस्तक ‘अल्लाह की आयत’।   —‘जिज्ञासु’]

कयामत से पूर्व इस गुण का कोई प्रयोग नहीं और इसके पश्चात् भी कोई प्रयोग की अवस्था नहीं होगी।

ख़ैर आइए! इस दरबार का दर्शन करें। इस दरबार की भूमिका रूप में अवस्थाएँ बयान की गई हैं—

व तरल जिबाला तहसबहा जामिदतुन वहिया तमरुमर्रा अस्सहाबे।

—(सूरते नमल आयत 88)

और देखेगा तू पहाड़ों को कि अनुभव करेगा तू उनको जमे हुए और वह चलेंगे बादलों की भाँति।

व इज़ा रुज्जतिल अरज़ो रज्जन, व बुस्सतिल जवालो बुस्सन।

—(सूरते वाकिया आयत 4-5)

जब हिलाई जाएगी भूमि भली प्रकार और टुकड़े हों पहाड़ टूटकर।

व इज़श्शमसो कुर्रिरत व इज़न्नजूमो उन्कदिरत व इजल जवालो सुय्यरत व इज़स्समाओ कुशितत।

—(सूरते तकवीर आयत 1-2-3,11)

जब सूरज को लपेटा जाएगा और तारे गदले हो जाएँगे और जब पहाड़ चलेंगे और जब आसमान की खाल उतारी जाएगी।

सूरज लपेट दिया गया तो प्रकाश न हो सकेगा रात हो जायेगी। इसी विचार से स्वामी दयानन्द कयामत का दिन नहीं ‘रात’ लिखते हैं। अन्तिम आयत पर जलालैन ने लिखा है—

जैसे बकरी का चमड़ा उतारा जाता है।

व इज़स्समाउन्कतरनो, व इज़लकवाकिबो उन्तरसरत व इज़ल बिहार फुज्जिरत व इज़ल कबूरो बुइसरत।

—(सूरते इनफ़ितार आयत 1-4)

जब आसमान फट जावे, जब तारे झड़ जाएँ जब दरिया चीरे जाएँ, जब कबरें उठाई जाएँ।

कबरों का अर्थ यहाँ भाष्यकारों ने कबरों में लेटे मुर्दे किया है। वे मुर्दे शरीरों के साथ उठेंगे या इसके बिना1 ?

[1. अब श्री फारूकी आदि ने ये अर्थ बदल दिये हैं।   —‘जिज्ञासु’]

उठना बिना शरीर के क्या होगा? इस्लाम के अनुयायियों का सिद्धान्त यही है कि शरीर के साथ उठेंगे। वह शरीर कहाँ से आएगा? शरीर तो जर्जरित हो चुका और वह कब्र में मिलजुल गया। अब कब्र का उठना या शरीर का उठना एक ही बात है। और जो कबरें इससे पूर्व नष्ट हो चुकेंगी वह? कुछ होगा। यह हुई कब्रों की बात। अब तारे। ऊपर तो तारों को गदला (बुझे हुए) ही किया था, यहाँ झाड़ दिया है और दरिया चीरने से न जाने, क्या आशय है?

वजउश्शमसे व लकमरे।

—(शूरते कयामत आयत 9)

और इकट्ठा किया जाएगा सूरज और चाँद।

इस पर तफ़सीरे हुसैनी में लिखा है—

यानी एशां रा बयक दीगर मज्तमअ साख्ता दर दरिया अफ़गन्द।

अर्थात् इन दोनों को इक्ट्ठा करके दरिया में डाल देंगे।

क्या उस चीरे हुए दरिया में? लीजिए अब तो प्रकाश का कोई साधन न रहा। सूरज का ही लपेटा जाना (इसके अर्थ कुछ भी हों) प्रकाश को समाप्त हो जाने के लिए पर्याप्त है, क्योंकि चाँद भी तो सूरज से ही प्रकाश पाता है। परन्तु यहाँ सूरज चाँद सितारे सब कुछ झड़ गया है। कोई लपेटा गया है, कोई दरिया में डाल दिया है। इसी कयामत के दिन को रात ही नहीं घुप अन्धेरी रात कहना चाहिए। यह सब निशानियाँ लिखते हुए हम एक बात भूल गए वह है नरसघे का फूँका जाना। वह पहली बार तो इन सारी अवस्थाओं के प्रकट होने से पहले बजेगा और एक बार कब्रों के उठने पर।

वनफ़ख़ा फ़िस्सूरे फ़इजाहुम मिनल अजदाते इलारब्वहुम यन्सिलून।

—(सूरते यासीन आयत 51)

और फूँका जाएगा नरसघा। फिर अचानक वह कबरों में से अपने परवरदिगार (परमात्मा) की ओर दौड़ेंगे।

इस आयत से तो यह स्पष्ट हो जाता है कि सारी कब्र न दौड़ेगी उसका एक भाग शरीर बनकर दौड़ेगा। परन्तु हम तो यह देख रहे हैं कि एक कब्र क्या कब्रिस्तान के कब्रिस्तान नष्ट होते जाते हैं। उनके स्थान पर शहर बस रहे हैं। यह और बात है कि पहले पहल कब्रों के खुदने से रोग फैलने की आशंका होती है। वैज्ञानिकों की सम्मति है कि मुर्दे गाड़ने की रस्म स्वास्थ्य के नियमों के विरुद्ध है। इसी बात को ध्यान में रखकर योरोप व अमरीका में मुर्दे जलाने का रिवाज बढ़ रहा है। मुर्दों के उठने की भी एक योजना बताई है—

वल्लाहल्लज़ी अरसलर्रीहा फ़तुशीरो सहाबन फ़सुकानहू इलाबलदिन मय्यतिन फ़अहयैनाबिहिल अरज़ा बादो मौतिहा कज़ालिकन्नशूर।

—(सूरते फ़ातिर आयत 8-9)

और अल्लाह वह है जिसने भेजा हवाओं को, फिर उठाया बादलों को, फिर हाँक लाते हैं उसको शहरों की ओर फिर जीवित किया हमने उससे ज़मीन को उसकी मृत्यु के पश्चात्। इस प्रकार मुर्दे उठाए जाएँगे।

मिश्कात किताब फ़तन बाब नफ़ख़ फ़िस्सूर में लिखा है—

काला व लैसा मिनल इन्साने शैउन लायबली इल्लल उज़मा वाहिदहू व हुवा अजबुज़्ज़नबो व मिनहू यरकिबुल ख़लका योमिल कयामते।

कहा और नहीं मनुष्य में कोई ऐसी वस्तु जो पुरानी न हो जाए। एक हड्डी के अतिरिक्त और वह रीढ़ की हड्डी के नीचे की हड्डी है और इससे संसार की रचना होती है कयामत के दिन।

कहा जाता है कि यह हड्डी कयामत के दिन गले सड़े बिना सुरक्षित रहेगी। यह बीज का काम देगी जिससे सारा शरीर नवीन बनाया जायेगा। यह काम चालीस दिन की वर्षा से होगा जो अल्लाहताला भेजेगा। जो भूमि को आठ बलिश्त तक ढाँप लेगी और उसके इस काम से शरीर पौधों की भाँति उग आएँगे।

यह कयामत का प्रारम्भ है इसकी अवधि दो सूरतों में वर्णन की है—

सूरते सजदा में कहा है—

फ़ीयोमिन काना मिकदारहू अलफ़ा सिनत्तिन मिम्मात अदून।

—(सूरते सजदा आयत 4)

एक दिन में जिसकी मात्रा हज़ार वर्ष है तुम्हारे गणित से।

तफ़सीरे जलालैन में इस आयत पर लिखा है—

आशय हज़ार वर्ष के दिन से कयामत का दिन है। परन्तु सूरते मआरिज़ में हम एक और अवधि पाते हैं—

तअरजुल मलाइकतो वर्रुहो इलैहे फ़ीयोमिन काना मिकदारहू रवमसीना अलफ़ा सनतिन…….योमा यरवरजूना मिनल अजदाते सिराअनकअन्नहुम इलानुसुबिन युविफ़्फ़ज़ून।

—(सूरते मआरिज आयत 4)

चढ़ते हैं फ़रिश्ते और रूहें तरफ़ उसके उस दिन में जिसकी अवधि है पचास हज़ार साल………जिस दिन निकलेंगे कब्रों से दौड़ते हुए जैसे किसी निशानी पर दौड़ते हैं।

इन दो संख्याओं के मतभेद का निवारण कैसे हो? पहली संख्या के साथ गुण की वृद्धि की है और वह संख्या तुम्हारी गिनती के अनुसार है सम्भव है जो अवधि मनुष्यों की गिनती में एक हज़ार वर्ष होती है वह किसी और सृष्टि की गिनती में पचास हज़ार साल हो जाती हो।

गुत्थी सुलझा ली गई—तफ़सीरे जलालैन में इस गाँठ को यह कहकर खोला है—

दूसरी सूरत में पचास हज़ार साल फ़रमाया है यह लम्बाई कयामत की काफ़िरों को अनुभव होगी।

इन पचास हज़ार वर्षों में होगा क्या? मूजिह कुरान तो पचास हज़ार पर कहता है, जब से मुर्दे निकलेंगे जब तक दोज़ख़ बहिश्त भर जाएँगे।

तफ़सीरे हुसैनी में इस स्थान पर लिखा है—

दर अरसा हाए कयामत पंजाह मौतन व मौकफ़ ख़्वाहद बूद, व ख़लायक रा दर हर मौकफ़े हज़ार साल वाज़ दारन्द, व बयाने मवाकिफ़ दर जवाहरुत्तफ़ासीर अस्त।

कयामत के मैदान में पचास पड़ाव व ठहराव होंगे। लोगों को हर ठहराव पर पचास हज़ार साल रोका जाएगा। इन ठहरावों का वर्णन जवाहरुत्तफ़ासीर में है।

अब जरा कयामत की कार्यवाही के विवरण का दर्शन करें। चालीस दिन की बरसात से पौधों की भाँति कब्रों से उत्पन्न हुए मुर्दा मनुष्य दौड़कर न्यायालय के स्थान पर पहुँच चुके हैं। प्रत्येक को उसके भाग्य का पर्चा मिलता है। इसीलिए सूरते बनी इसराईल में आया है—

व कुल्ला इन्सानिन अलज़मनाहू ताइरतुन फ़ीउनकिही व युख़रजोलहु योमल कयामते किताबन यलकाहो मन्शूरन।

—(सूरते बनी इसराईल आयत 13)

और प्रत्येक व्यक्ति के लिए लगा दिया है हमने कर्म लेख उसका बीच उसकी गर्दन के और निकालेंगे हम उसके लिए कयामत के दिन एक पुस्तक (के रूप में) देखेगा उसको खुला हुआ।

इस पर तफ़सीरे जलालैन में लिखा है—

मुजाहिद ने कहा कि कोई बच्चा ऐसा नहीं जिसकी गर्दन में उसके एक कागज होता है उसमें यह लिखा होता है कि यह सौभाग्यशाली है या दुर्भाग्यशाली (अभागा)।

तफ़सीरे हुसैनी में इस वाक्य की भूमिका में लिखा है—

दर ज़ादुलमसीर अज़ मुज़ाहिद नकल मे कुनद।

जादुलमसीर में मुजाहिद से यह उद्धृत हुआ है।

इस कथन के बाद लिखा है—

यानी आँचे तकदीर करदा अन्द अज़ रोज़े अज़ल अज़ किरदारे ओ, लाज़िम साख्ता अन्द दर गर्दने ओ यानो ओ रा चारा नेस्त अज़ां।

अर्थात् जो भाग्य आरम्भ के दिन से उसके लिए कर्मों के लिए निश्चित कर दिए वह उसकी गर्दन में लटका दिया, अर्थात् उससे वह बच नहीं सकता।

दर ऐनुलमआनी गुफ़्ता कि तायर1 आं किताब अस्त कि रोज़े कयामत परां-परां बदस्ते बन्दा आयद।

1 [1. तायर शब्द का अर्थ पक्षी है। यह पक्षी रूपी पुस्तक कैसी होगी इसकी कल्पना करना अति कठिन है। न जाने इसके पृष्ठ कितने होंगे? —‘जिज्ञासु’]

तायर रूपी पुस्तक—ऐनुलमआनी में कहा है कि तायर  वह किताब है जो कयामत के दिन उड़ती-उड़ती बन्दे के हाथ आएगी।

प्रत्येक व्यक्ति के कर्म प्रारम्भ से ही नियत हैं। अटल भाग्य ने कर्मों का लेख बना दिया। इसमें हेर-फेर तो हो नहीं सकता। इसके अनुसार ही प्रत्येक व्यक्ति ने कार्य किया होगा। अब वह कर्मों का लेखा उसके हाथ में दे दिया जाता है।

व वज़अलकिताबा।

—(सूरते ज़मर आयत 67)

और रखे जाएँगे कर्म के हिसाब।

इस कर्म लेख के हिसाब में भी बहिश्त व जन्नत में जाने वालों में परस्पर अन्तर होगा। अतः सूरते हाका में कहा है—

कअम्मा मनओ किताबहु वियमोनिही फ़यकूली अकरऊ किताबहु व अम्मामन ऊती किताबहु बिशमालिही फ़यकूलो यालैतनी लमऊते किताबिहा।

—(सूरते हाका आयत 19 व 25)

तब जिसके दाएँ हाथ में उसका कर्मों का लेखा दिया जाएगा वह कहेगा लीजिए पढ़ो मेरा कर्म-लेख………..और जिसको कर्मों का लेखा बाएँ हाथ में दिया जाएगा वह कहेगा ऐ काश! न मिलता मेरा कर्मों का लेखा।

इस देने के ढंग से ही निर्णय का पता तो लग ही गया। अब आगे और कार्यवाही से क्या लाभ? दोज़ख़ वाले दोज़ख़ के लिए बहिश्त वाले बहिश्त के लिए तैयार हो गए। परन्तु कानून व्यवस्था फिर व्यवस्था है। इसे अल्लामियाँ भी निरस्त नहीं करते।

इधर तो इन भाग्य लेखों को नित्य कहा है। अब कहते हैं—

वल्लाहो यकतुबो मायुबेतून।

—(सूरते निसा आयत 81)

और अल्लाह लिखता है जो यह ठहराते हैं।

तफ़सीरे हुसैनी में इस पर लिखा है—

ख़ुदा मे नवीसद दरलोहे महफ़ूज़ या किरामुल कातिबीन ब अमरे ख़ुदा मे नवीसन्द।

ख़ुदा लोहे महफ़ूज़ में लिखता है या लिखने वालों में सम्मानीय ख़ुदा की आज्ञा से लिखते हैं।

नित्य लेख की पुष्टि की जाती है? या नया लेख लिखा जाता है? सम्भवतः पैंसिल के लेख पर स्याही या कोई रंग चढ़ाया जाता हो। इस प्रकार के स्मरण लेख रखने की उन्हें आवश्यकता होती है जिन्हें भूल जाने का भय हो, संसार का ज्ञान रखने वाले अल्लामियाँ को इतना दफ्तर रखने की क्या आवश्यकता पड़ी है? व्यर्थ की लेखकों में श्रेष्ठों की मेहनत। इतनी मात्रा में लेखन सामग्री का अपव्यय क्यों किया जाता है?

फिर यह भी तो आवश्यक नहीं कि स्मृतियाँ कर्मों का सही रोज़नामचा हों। क्योंकि एक और जगह फ़रमाया है—

व यमहू अल्लाहो मायशाओ।

—(सूरते रअद आयत 39)

और मिटा देता है अल्लाह जो चाहता है।

तफ़सीरे हुसैनी में इस आयत पर लिखा है—

आंचे अज़ बन्दा सादिर शुवद अज़ अकवालो अफ़आल हमा रा वनवीसन्द आं दफ्तर रा बमवमाकिफ़ अरज़ रसानन्द, हक्के सुबहानहू कोलो फ़ेले कि सवाबो व ख़ताए बदां मुतफ़र्रअनेस्त महव कुनद व बाकी रा मसबत बिगुज़ारद या सैय्याते ताइब रा महव कुनद।

जो कुछ बन्दे से काम होता है उसका लेखा वाणियों व कर्मों की दशा में वह सब लिखते हैं और उस रजिस्टर को पेश करते हैं। ख़ुदा-वन्द उस वाणी व कर्म को कि कोई पुरस्कार या दण्ड उससे कल्पनीय नहीं मिटा देते हैं व शेष को लिखा रहने देते हैं या तौबा करने वाले की बुराइयों को मिटा देते हैं।

जब यह शासकीय अधिकार भी काम में आते रहते हैं तो लिखना व्यर्थ है, परन्तु हाँ, कचहरी की परम्परा का पालन होना चाहिए। अल्लामियाँ ने स्वयं या फ़रिश्तों ने लिखा और अल्लामियाँ ने संशोधन करके पुष्टि कर दी, परन्तु कचहरियों में तो साक्षी भी होते हैं। अल्लाहमियाँ की कचहरी बिना साक्षियों के कैसे रहे? फ़रमाया है—

योमा नदऊ कुल्ला अनासिन बिइमामिहिम।

—(बनी इसराईल आयत 71)

जिस दिन बुलाएंगे सब मनुष्यों को उनके इमाम पेशवा मार्गदर्शकों के सहित।

बजाआ बिन्नबीयिन्ना व श्शुहदाए कज़ाबैनहुम बिलहक्के।

—(सूरते ज़ुमर आयत 69)

और लाए जाएँगे पैग़म्बर और साक्षी और निर्णय किया जाएगा उनमें न्याय से।

तफ़सीरे हुसैनी में लिखा है कि साक्षियों से तात्पर्य—

मुराद उम्मते मुहम्मद अस्त।

तात्पर्य हज़रत मुहम्मद की उम्मत से है।

परन्तु नहीं, साक्षी कुछ और भी है—

व योमा तशहदो अलैहिम अलसनतहुम व ऐदिहिम व औजलहुम बिमा कानूयअमलून।

—(सूरते नूर आयत 24)

जिस दिन साक्षी देंगी उन पर उनकी वाणियाँ और उनके हाथ और उनके पाँव। जिनसे वह काम करते थे।

व तशहदो अरजलहुम बिमा कानूयकसिबून।

—(सूरते यासीन आयत 65)

और गवाही देंगे पाँव उनके जो कुछ वह कमाते थे।

हत्ताइज़ामाजाऊहा शहिदा अलैहिम समउहुम व अवसारिूहुम व जलूदुहुम बिमाकानूयअमलून। वा कालूलजुलूदहुम लिमा शाहिदा तुम अलैना कालू अन्तकनल्लाहुल्लज़ी अन्तका कुल्लाशैअन।

—(सूरते हम सजदा आयत 20-21)

यहाँ तक कि जब जाएँगे पास उसके, साक्षी देंगे उन पर कान उनके और आँखें उनकी और चमड़े उनके, जो कुछ करते थे और वह कहेंगे अपने चमड़ों से क्यों साक्षी दी तुमने हमारे ऊपर। वह कहेंगे बुलवाया हमको अल्लाह ने जिसने बुलवाया प्रत्येक वस्तु को।

एक एक अंग बोलेगा!—यह अन्तिम साक्षियाँ खूब रहीं, शरीरों के यह अंग कबर की मिट्टी में मिट्टी हो चुके। रहा केवल रीढ़ की हड्डी का निचला भाग। इस पर वर्षा पड़ने से शरीर उगेगा। कयामत की कचहरी में पहुँचे तो इन अंगों को वाणी भी मिल गई, क्या यह वही अंग नहीं जो संसार में थे? परन्तु अब तो मिट्टी नहीं रही। बनाएँगे किससे? यदि यह सारी वाक्य रचना केवल अलंकारिक है तो वह तो नित्य प्रति हो ही रहा है।

अपराधी की आँखें अपराध की स्वीकृति तो देती हैं? कयामत में विशेष क्या होना है? चमड़ा कहता है। मुझे बुलवाता है अल्लाह मियाँ। क्या वही बात बुलवाता है जो चाहता है या बोलने की स्वतन्त्रता है? स्वतन्त्रता न रही तो साक्षी विश्वसनीय न रही। अल्लाहमियाँ की इच्छा हो तो क्या स्वयं कर्त्ता अपने अपराध को स्वीकार करने को तैयार नहीं? वह विचारा तो बाएँ हाथ में कर्मों का लेखा मिलते ही काँप गया था। फिर और साक्षी की आवश्यकता क्या पड़ी थी? क्या केवल औपचारिकता पूरा करनी थी? यह तो केवल कम ज्ञान वालों के लिए होता है।

सर्वज्ञ का अपना ज्ञान पर्याप्त है फिर यहाँ तो प्रत्येक के कार्यों का लेखा स्वयं बना दिया है प्रारम्भ से ही जिससे बाल बराबर भी इधर-उधर नहीं हो सकता। इसके बाद ख़ुदा के अपने हिसाब रखने वाले निश्चित हैं। वे इस बात के उत्तरदायी हैं कि जो कुछ भी नित्य सत्ता का लेख है वह पूरी तरह कार्यान्वित हुआ है। सम्भव है कि वह दूसरा रजिस्टर तैयार करते हों जिसकी लोहे महफ़ूज़ से मिलान की जाती हो फिर अल्लामियाँ अपने पवित्र हाथों से उसमें घट बढ़ करते हैं।

नबियों व उनके समुदाय की साक्षी अलग है। फिर प्रत्येक कर्त्ता को वाणी प्रदान की जाती है और वह कर्त्ता की इच्छा के विरुद्ध पर्चा फड़वा देते हैं। साक्षी के विषय का स्वयं निर्णय देते हैं या कोई और? इसमें सन्देह है।

कचहरी की कार्यवाही पूरी है। हाँ! कमी है तो केवल वकील की व युक्ति की, भला सर्वज्ञ न्यायकारी को इसकी क्या आवश्यकता है? मगर फिर दूसरे प्रावधानों की क्या आवश्यकता? और यदि यह आवश्यकता का प्रश्न एक बार चल पड़े तो फिर प्रारम्भ में ही अभाव से भाव में लाने की क्या आवश्यकता? पाप कराने की भी अच्छे भले अल्लामियाँ को क्या आवश्यकता? प्रारम्भ से अन्त काल तक अल्लामियाँ की इच्छा के चमत्कार हैं। यदि अब इन साक्षियों के पश्चात् कर्त्ता को बोलने की आज्ञा हो तो वह कहे— मुझसे अल्लाह ताला ने कराया है जो सबसे कराता है—

वही कातिल वही मुख़बिर वही मुन्सिफ़ भी।

अकरिबा मेरे करें ख़ून का दावा किस पर॥1

[1. अर्थात् हत्यारा भी वही है, सूचना देने वाला भी वही है और इस अपराध के निर्णय के लिए न्यायाधीश भी उसीको बनाया जाता है। मेरे सगे-सम्बन्धी मेरी हत्या का केस किस पर करें? उर्दू के इस प्रसिद्ध पद्य का अर्थ देना हमने आवश्यक जाना।     —‘जिज्ञासु’]

अंगों ने साक्षी देने को दे दी, अब उन पर भी ‘फ़तवा’ ख़ुदाई आदेश लागू होता है। फ़रमाया है—

कल्लइल्लन लम यन्तही लनसफ़अन, नासियतुन काज़िबतिन ख़ातियतिन।

—(सूरते अलक आयत 15-16)

निश्चय ही हम उसको पेशानी के साथ घसीटेंगे वह पेशानी जो अपराधी व झूठी है।

दण्ड की विचित्र प्रक्रिया!—ऊपर मनुष्य को उसके अंगों से पृथक् कर दिया था। अनुमान हुआ था कि आर्य दर्शन की भाँति कुरान शरीफ़ भी मानव को चेतन कर्त्ता और उसके अंगों को अचेतन साधन निर्धारित करता है, परन्तु पेशानी (सिर का अग्र भाग) को दण्ड दिये जाने से अनुमान होता है कि सम्भव है नास्तिकों के सिद्धान्त के अनुसार यहाँ भी मस्तिष्क को कर्त्ता मानते हों।

क्योंकि आत्मा का स्वरूप कुरान शरीफ़ में वर्णन नहीं किया गया। यदि पेशानी भी शरीर के दूसरे अंगों की भाँति आत्मा से पृथक् है तो इस विचारी को दण्ड के लिए क्यों चुना गया? क्या दण्ड देते समय दूसरे अंगों को जो सरकारी साक्षी बने थे बरी कर दिया जाएगा? सांसारिक न्यायालयों में यह परम्परा है ख़ुदाई न्यायालय में भी सम्भव है ऐसा ही हो।

इस दशा में नरक की पीड़ा उठाने वाले मनुष्य का रूप व दशा क्या होगी? वाणी छूट गई, कान नहीं, आँखें निरस्त, चमड़ा अलग हो गया। पाँव भी गये। पेशानी भी बिना चमड़े की होगी जो घसीटी जायेगी। यदि कुछ अंगों को इसलिए छुट्टी मिल जाए कि उन्होंने सत्य साक्षी दी है और कुछ इसलिए कि उनका दुरुपयोग हुआ है तो दण्ड की पात्र केवल आत्मा ही रह जाए जो दर्शन के अनुसार उचित है, अचेतन के दण्ड के क्या अर्थ?

कुरान का उतरना

कुरान का उतरना

जो लोग परमात्मा के विश्वासी हैं और उसमें सत् ज्ञान की शिक्षा का गुण मानते हैं उनके लिए इल्हाम (ईश्वरीय सन्देश) पर विश्वास लाना आवश्यक है। परमात्मा ने अपने नियमों का प्रदर्शन सृष्टि के समस्त कार्यों में कर रखा है। इन नियमों का जितना ज्ञान मनुष्य को होता है उतना वह प्रकृति की विचित्र शक्तियों से जो स्वाभाविक रूप से उसके भोग के साधन हैं, उनसे लाभान्वित हो सकता है। मनुष्य के स्वभाव की विशेषता यह है कि विद्या उसे सिखाने से आती है। बिना सिखाए यह मूर्ख रहता है। अकबर के सम्बन्ध में एक कवदन्ती है कि उसने कुछ नवजात बच्चे एक निर्जन स्थान में एकत्रित कर दिए थे और केवल गूँगों को उनके पालन पर नियत किया था।

वे बच्चे बड़े होकर अपनी गूँगी वाणी से केवल वही आवाज़ें निकालते थे जो उन्होंने गूँगे मनुष्यों और वाणी रहित पशुओं के मुँह से सुनी थीं। कुछ वन्य जातियाँ जो किसी कारण से एक बार पाशविकता की अवस्था में पहुँच गई हैं स्वयमेव कोई बौद्धिक विकास करती दिखाई नहीं देतीं जब तक सभ्य जातियाँ उनमें रहकर उन्हें सभ्यता की शिक्षा न दें।

वे सभ्यता से अपरिचित रहती हैं। अफ़्रीका में कुछ गिरोह शताब्दियों से नंगे चले आते हैं यही दशा मध्य भारत की कुछ पहाड़ी जातियों की है। हाँ! एक बार इन जातियों के जीवन को बदल दो फिर वह उन्नति के राजमार्ग पर चल निकलती हैं। बच्चा भी विद्या का प्रारम्भ अध्यापक के पढ़ाने से प्रारम्भ करता है। परन्तु एक बार पढ़ने लिखने में निकल खड़ा हो फिर बौद्धिक विकास का असीम क्षेत्र उसके सन्मुख आ जाता है।

ज्ञान का स्रोत ही भाषा का आदि स्रोत है—मानव जाति इस समय बहुत-सी विद्याओं की स्वामी हो रही है। शासकों के सामने यह प्रश्न प्रायः आता रहा है कि इन विद्याओं का प्रारम्भ कहाँ से हुआ। मानवीय मस्तिष्क का उसकी बोल-चाल से बड़ा सम्बन्ध है। सभ्यता की उन्नति भाषा की उन्नति के साथ-साथ होती है। व्यक्ति और समाजें दोनों जैसे-जैसे अपनी भाषा की उन्नति करती हैं   त्यों-त्यों उनके मानसिक अवयवों का भी परिवर्तन व विकास होता जाता है।

वास्तव में ज्ञान के प्रारम्भ और भाषा के प्रारम्भ का प्रश्न सम्मिलित है। मानव के ज्ञान का जो प्रारम्भिक स्रोत होगा वही भाषा का भी स्रोत माना जाएगा।

मनोविज्ञान व भाषा विज्ञान के विशेषज्ञों ने इस समस्या पर बहुत समय विचार विनमय किया है। परमात्मा के मानने वाले सदा इस नियम के समर्थक रहे हैं कि भाषा और विद्याओं का आदि स्रोत समाधि द्वारा हुआ है। परमात्मा ने अपने प्यारों की बुद्धियों में अपने ज्ञान का प्रकाश किया वह प्रारम्भिक ज्ञान था। वेद में इस अवस्था को यों वर्णन किया गया है—

यज्ञेन वाचः पदवीयमायन्तामन्वविन्दन्नृषिषु प्रविष्टाम्।

—ऋग्वेद 10।71।3

उपासनीय परमात्मा से (ऋषियों ने) भाषा का मार्गदर्शन पाया और ऋषियों में प्रविष्ट हुई भाषा को (लोगों ने) तत्पश्चात् प्राप्त किया।

इस घटना की ओर संकेत प्रत्येक धार्मिक पुस्तक में पाया जाता है। कुरान शरीफ़ में पाया है—

व अल्लमा आदमल अस्माआ कुल्लहा।

—(सूरते बकर आयत 31)

बिना नामों के वार्तालाप कैसे? : अर्थात् सिखाये आदम को नाम सब वस्तुओं के।

यह और बात है कि इन आयतों में फ़रिश्तों का भी वर्णन है। उनसे अल्लाह ताला बातचीत करता है और आदम को श्रेष्ठता प्रदान की है कि उसे नाम सिखाए। फ़रिश्तों के साथ बातचीत बिना नामों के कैसे होती होगी यह एक रहस्य है। यह भी एक पृथक् प्रश्न है कि आदम को श्रेष्ठता प्रदान करने का क्या कारण था? और फ़रिशतों को इससे वञ्चित रखने का भी क्या कारण था? आदम को स्वर्ग से निकाले जाने की कहानी पिछले एक अध्याय में वर्णन की जा चुकी है। इस अवसर पर यह भी कहा गया है—

फ़तलक्का आदमामिन रब्बिही कलमातिन।

—(सूरते बकर आयत 37)

फिर सीखे आदम ने ख़ुदा से वाक्य।

परिणामस्वरूप यह सिद्ध है कि कुरान में इस्लाम का अस्तित्व सृष्टि के प्रारम्भ से माना है। कोई पूछ सकता है कि जो शंका तुम आदम को इल्हाम की विशेष श्रेष्ठता दिए जाने के सम्बन्ध में करते हो क्या वही शंका वेद के ज्ञान प्राप्त करने वालों के बारे में नहीं की जा सकती? उन्हें क्यों इस वरदान के लिए विशेषतया चुना गया। हम सृष्टि उत्पत्ति का क्रम अनादि मानते हैं। प्रत्येक नई सृष्टि में पुरानी सृष्टि के उच्चतम व्यक्तियों को ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त करने को चुना जाता है। यह उनकी नैतिक व आध्यात्मिक श्रेष्ठता का स्वभाविक फल होता है। इस सिद्धान्त में उपरोक्त शंका का कोई स्थान नहीं। मुसलमानों को कठिनाई इसलिए है कि वे अभाव से भाव की उत्पत्ति मानते हैं। अब अभाव की दशा में विशेष वरदान नहीं दिया जा सकता, क्योंकि बिना योग्यता व कर्म के विशेष फल प्राप्त नहीं कराया जा सकता जिसका विशेष फल ईश्वरीय ज्ञान हो।

फिर भी मुसलमान इस सिद्धान्त के मानने वाले हैं कि आदम ने अल्लाह ताला से नाम व पश्चात् वाक्य प्राप्त किए थे। इस पर प्रश्न होगा कि क्या वह ज्ञान मानवीय आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त था? कुरान में कहा है कि नाम सभी वस्तुओं के सिखाए गए। स्वभावतः विज्ञान, सदाचार व आध्यात्मिकता यह सभी विद्याएँ उन नामों व वाक्यों में सम्मिलित होंगे। क्योंकि मानव भले ही उन्नति के किसी भी स्तर पर उत्पन्न किया गया हो उसकी आवश्यकताएँ वैज्ञानिक, नैतिक व आध्यात्मिक सभी प्रकार की होंगी।

मुसलमानों का एक और सिद्धान्त है कि अल्लाह ताला का ज्ञान लोहे महफ़ूज़ (आकाश में ज्ञान की सुरक्षित पुस्तक) में रहता है। सूरते वरुज में कहा है—

बल हुवा कुरानो मजीदुन फ़ीलोहे महफ़ूज।

—(सूरते बरुज आयत 21-22)

बल्कि वह कुरान मजीद है लोहे महफ़ूज़ के बीच। इस आयत की व्याख्या के सन्दर्भ में तफ़सीरे जलालैन में लिखा है—

इस (लोहे महफ़ूज़) की लम्बाई इतनी जितना ज़मीन व आसमान   के मध्य अन्तर है और इसकी चौड़ाई इतनी जितनी पूर्व व पश्चिम की दूरी 1 और वह बनी हुई है सफ़ेद मोती से।

—जलालैन

[1. पूर्व व पश्चिम की दूरी क्या है? रोहतक वालों के लिए देहली पूर्व में है और मथुरा वालों के लिये पश्चिम में है। पूर्व व पश्चिम में कोई विभाजक रेखा नहीं है, अतः यह दूरी वाला कथन अज्ञानमूलक है। —‘जिज्ञासु’]

तफ़सीरे हुसैनी में लिखा है—

 

व ओ दर किनारे फ़रिश्ता अस्त व दर यमीने अर्श।

और उसे एक फरिश्ता है बगल में रखे, अर्श (अल्लाह का सिंहासन) के दाएँ ओर।

इस लोहे महफ़ूज़ को दूसरे स्थानों पर “उम्मुल किताब” (पुस्तकों की जननी) कहा है। दूसरे शब्दों में तमाम विद्या का आदि स्रोत। इस सिद्धान्त के होते यह प्रश्न अनुचित न होगा कि क्या हज़रत आदम की शिक्षा इसी लोहे महफ़ूज़ से हुई थी या इसके बाहर से? जब सारी वस्तुओं के नाम हज़रत आदम को सिखाए गए अपनी ज़ुबानी (बोली में अल्ला मियाँ ने सिखाए तो वह लोहे महफ़ूज़ ही पढ़ा दी होगी? दूसरे शब्दों में प्रारम्भ में पूर्ण ज्ञान ही दिया होगा। यदि ऐसा कर दिया तो हज़रत आदम के बाद कोई और पैग़म्बर भेजने की आवश्यकता नहीं रहती। मगर कुरान शरीफ़ में आया है—

वलकद आतैना मूसलकिताब व कफ़ैना मिन्बादिही ब रुसुलो।

—(सूरते बकर आयत 87)

और वास्तव में मूसा को किताब दी और लाए बाद में रसूलों को।

व इज़ा जाआ ईसा बिलबय्यनाते।

—(सूरते ज़खरुफ़ आयत 63)

और जब आया ईसा प्रकट युक्तियों के साथ

वलकद बअसना फ़ीकुल्ले उम्मतिन रसूलन।

—(सूरते नहल आयत 36)

और भेजें हैं हर समुदाय के बीच रसूल।

यही नहीं इन पैग़म्बरों और उनके इल्हाम पर ईमान लाना हर  मुसलमान के लिए आवश्यक है।

अल्लज़ीन योमिनूना बिमाउन्ज़िला इलैका वमा उन्ज़िला मिनकबलिक।

—(सूरते बकर आयत 4)

जो ईमान लाए उस पर जो तुझ पर उतारा गया और उस पर जो तुझसे पहले उतारा गया।

यह मुसलमानों को अनसूजा है—अब विचारणीय प्रश्न यह रहा कि अगर हज़रत आदम का इल्हाम सही व पूर्ण था तो उसके पश्चात् दूसरे इल्हामों की क्या आवश्यकता पैदा हो गई। हज़रत मूसा व हज़रत ईसा की पुस्तकें आजकल भी मिलती हैं उन्हीं से हज़रत मुहम्मद ने काम क्यों न चला लिया? इस पर मुसलमान दो प्रकार की सम्मितियाँ रखते हैं।

पहली यह कि हज़रत आदम मानव विकास की पहली कक्षा में थे उनके लिए इस तरह का ही इल्हाम पर्याप्त था अब वह अपूर्ण है। यही दशा उनके बाद आने वाले पैग़म्बरों व उन पैग़म्बरों के इल्हामों की है। इस मान्यता पर विश्वास रखने का तार्किक परिणाम यह होना चाहिए कि कुरान को भी अन्तिम इल्हाम स्वीकार न करें। क्योंकि यदि मानवीय विकास सही हो तो उसकी हज़रत मुहम्मद के काल या उसके पश्चात् आज तक भी समाप्ति तो हो नहीं गई।

फिर यह क्या कि इल्हाम का क्रम जो एक काल्पनिक  मानवीय विकास के क्रम के साथ-साथ चलाया जाए। वह किसी विशेष स्तर पर पहुँचकर पश्चात्वर्ती क्रम का साथ छोड़ दे। वास्तव में यह विकास का प्रश्न ही मुसलमानों का प्रारम्भिक विचार नहीं। यह विचार उन्हें अब सूझा है। जो लोग इस समस्या के समर्थक हैं उन्हें धार्मिक विकास की मान्यता के अन्य विषयों पर भी विचार करना होगा। धार्मिक उन्नति के अर्थ यह हैं कि पहले मनुष्य का कोई धर्म नहीं था। या कम से कम अनेक ईश्वरों का मानने वाला था, निर्जीव शरीरों को पूजता या फिर धीरे- धीरे उन्नति करके ईश्वरीय एकता का मानने वाला हुआ।

परन्तु कुरान में प्रत्येक पैग़म्बर के इल्हाम का एकेश्वरवाद को एक आवश्यक भाग माना गया है। प्रत्येक पैग़म्बर अपने सन्देश में यह मान्यता अवश्य सुनाता है। हज़रत मूसा का यह सन्देश दूसरी आयतों के अतिरिक्त सूरते ताहा आयत 50 में लिखा है। हज़रत ईसा का सूरते   मायदा आयत 111, में हज़रत यूसुफ का आयत 101 में। इसी प्रकार अन्य पैग़म्बरों के भी प्रमाण दिए जा सकते हैं।

कुरान के पढ़ने वाले इन कथनों से परिचित हैं। इन सन्देशों का आवश्यक और प्रमुख भाग ईश्वरीय एकता है। यदि यह विचार इससे पूर्व के सभी इल्हामों में स्पष्ट रूप से विद्यमान था तो फिर मुसलमानों के दृष्टिकोण से धार्मिक विकास के कोई अर्थ ही नहीं रहते।

वास्तव में इल्हाम और विकास दो परस्पर विरोधी मान्यताएँ हैं। यदि बौद्धिक विकास से धर्म में उन्नति हुई है तो इल्हाम की आवश्यकता क्या है? मुसलमानों का एक और सिद्धान्त यह है कि पहले के इल्हामों में परिवर्तन होते रहे हैं। कुछ इल्हामी पुस्तकें तो सर्वथा समाप्त हो गई हैं और कुछ में हेर-फेर हो चुका है।

चलो वाद के लिए मान लो कि ऐसा हुआ अब प्रश्न यह होगा कि वे पुस्तकें ईश्वरीय थीं या नहीं थीं? थीं और उसी परमात्मा की देन थीं जिसकी देन कुरान है तो क्या कारण है कि वे पुस्तकें अपनी वास्तविक अवस्था में स्थिर नहीं रहीं? और कुरान रह गया या रह जाएगा? हेर-फेर में दोष मनुष्यों का है या (नऊज़ोबिल्लाह) अल्लामियाँ का? अब मनुष्य भी वही हैं और अल्लामियाँ भी वही किसका स्वभाव समय के साथ बदल गया कि आगे चलकर ईश्वरीय पुस्तकों को इस हेरा-फेरी से सुरक्षित रख सकेगा जिनका शिकार पिछली पुस्तकें होती रहीं?

मुसलमानों की मान्यता है कि अल्लाताला ने कुरान की रक्षा का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लिया है। पूछना होगा कि पहली पुस्तक के सम्बन्ध में यह उत्तरदायित्व क्यों नहीं लिया गया? क्या अल्लामियाँ का स्वभाव अनुभव से बदलता है? या पहले जान बूझकर उपेक्षा बरती गई? दोनों अवस्थाओं में ईश्वर की सत्ता पर दोष लगता है। कुरान को दोष से बचाने के लिए अल्लामियाँ पर दोष लगाना इस्लाम के लिए बुद्धिमत्ता नहीं। या तो अल्ला मियाँ के ज्ञान में दोष मानना पड़ता है या उसकी इच्छा में। दोनों ही अनिवार्य दोष पूर्ण अवस्थाएँ हैं दोनों कुफ़्र (ईश्वरीय विरोधी) हैं।

बात यह है कि सृष्टि के प्रारम्भ में इल्हाम मान लेने के पश्चात् किसी भी बाद के इल्हाम को स्वीकार करना विरोधाभास का दोषी बनना पड़ता है। इल्हाम और उसमें हेर-फेर? इल्हाम और उसमें परिवर्तन? इल्हाम एक हो सकता है। वह पूर्ण होगा। जैसा कि परमात्मा पूर्ण है।

बौद्धिक विकास का प्रश्न आए दिन की ऐतिहासिक खोजों से झूठा सिद्ध हो रहा है। प्रत्येक महाद्वीप में पुराने खण्डहरात की ख़ुदाई से सिद्ध हो रहा है कि वर्तमान पीढ़ी से शताब्दियों पूर्व प्रत्येक स्थान पर ऐसी नस्लें रह चुकी हैं जो सभ्यता व संस्कृति के क्षेत्र में वर्तमान सभ्य जातियों से यदि बहुत आगे न थीं तो पीछे भी न थीं। इस खोज का आवश्यक परिणाम धर्म के क्षेत्र में यह विश्वास है कि इल्हाम प्रारम्भ में ही पूर्ण रूप में आया था।

यदि परमात्मा अपने किसी इल्हाम का रक्षक है तो उस प्रारम्भिक इल्हाम का भी पूर्ण रक्षक होना चाहिए था। उसके ज्ञान व आदेश में निरस्त होने व हेरा-फेरी की सम्भावना नहीं।

कुरान के इल्हाम होने पर एक और शंका यह उठती है कि यह अरबी भाषा में आया है—

व कज़ालिका अन्ज़ल नाहो हुकमन अरबिय्यन।

—(सूरते रअद आयत 37)

और यह उतारा हमने आदेश अरबी भाषा में।

क्या अरबी भाषा लौहे महफ़ूज़ की भाषा है। यदि है तो उसे मानव समाज की पहली भाषा होना चाहिए था जिसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं। अन्य भाषाओं के उत्पत्ति स्थल अरबी भाषा के शब्दों को कोई भाषा विज्ञान का विशेषज्ञ स्वीकार नहीं करता है। फिर हज़रत मूसा और ईसा को इबरानी भाषा में इल्हाम मिला था यदि वह भी लौहे महफ़ूज़ की नकल थी तो लौहे महफ़ूज़ की भाषा एक नहीं रही। भाषाओं की जननी अरबी के स्थान पर इबरानी को मानना पड़ेगा।

परन्तु प्रमाण न इबरानी के प्रथम भाषा होने का मिलता है और न अरबी भाषा होने का। यदि कुरान का इल्हाम समस्त मानव समाज के लिए होता तो उसकी भाषा ऐसी होनी चाहिए थी कि सारे संसार को उसके समझने में बराबर सरलता हो। किसी का तर्क है कि अन्य जातियाँ अनुवाद से लाभ उठा सकती हैं तो निवेदन है कि अनुवाद और मूल भाषा में सदा अन्तर रहता है।

जो लोग शाब्दिक इल्हाम के मानने वाले हैं उनके लिए इल्हाम के शब्द सदा अर्थों का भण्डार बने रहते हैं जिनका स्थान और तो और उसी भाषा का किया अनुवाद भी नहीं ले सकता। अरबी भाषा    इल्हाम के समय भी तो सारे संसार की भाषा नहीं थी। जैसे वेद की भाषा सृष्टि के प्रारम्भ में सभी मनुष्यों की भाषा थी और संसार में प्रचलित बोलियाँ वेद की भाषा से मिली जुली हैं।

भाषा शास्त्रियों की यह सम्मति है कि मानव जाति के पुस्तकालय में वेद सबसे पुरानी पुस्तक है (मैक्समूलर) और उसकी भाषा वर्तमान भाषाओं की जननी है। वास्तव में कुरान का अपना प्रारम्भिक विचार केवल अरब जातियों का सुधार करना था। इसीलिए कुरान में आया है—

लितुन्जिरा कौमम्मा अताहुम मन्निज़ीरिन मिनकबलिका लअल्लकुम यहतदून।

—(सूरते सिजदा आयत 3)

ताकि तू डरा दे उस जाति को नहीं आया उनके पास डराने वाला तुझसे पूर्व जिससे उन्हें सन्मार्ग मिले।

यह जातियाँ अरब निवासी हैं। हज़रत मुहम्मद के सामने ईसाई और यहूदियों की मान्यता थी कि वह पुस्तकों के मालिक हैं और पैग़म्बरों के अनुयायी हैं। अरब निवासी यह दावा नहीं कर सकते थे। हज़रत मुहम्मद के कारण उनकी यह अभिलाषा भी पूरी हो गई।

कोई कह सकता है कि हज़रत मुहम्मद के प्रकट होने से पूर्व क्या अरब वासियों को बिना ज्ञान या शिक्षा के रखा गया था। कुरान शरीफ़ की भाषा से तो यही ज्ञात होता है। एक और स्थान पर लिखा है—

ओहेना इलैका कुरानन अरबिय्यन लितुन्ज़िरा उम्मिल कुरा व मन होलहा।

—(सूरते सिजदा रकुअ 1)

उतारा हमने कुरान अरबी भाषा का कि तू भय बताए बड़े गाँव को और उसके पास-पड़ौस वालों को।

बड़े गाँव से तात्पर्य प्रत्येक भाष्यकार के अनुसार ‘मक्का’ है। अरब वासी जिनमें मुहम्मद साहब का जन्म हुआ उनके लिए मक्का सबसे बड़ा गाँव था। कुरान के शब्दों के अनुसार हज़रत मुहम्मद के सुपुर्द यह सेवा सौंपी गई कि वह मक्का व उसके पास पड़ौस में इस्लाम का प्रचार करें।

दूसरे समुदायों के लिए तो और पैग़म्बर आ चुके थे। अरबवासियों के लिए इल्हाम की आवश्यकता थी। सो हज़रत के सन्देश से पूरी हो गई। कुरान की उपरोक्त आयतों का यदि कोई अर्थ है तो यही।

कुरान की मान्यता तो यह भी विदित होती है कि धर्म प्रत्येक जाति का पृथक्-पृथक् है। यह इस्लाम के लोगों की ज़बरदस्ती है कि जो मज़हब अरब के लिए निश्चित किया गया है उसे अन्य देशों में जो उसे अनुकूल नहीं पाते व्यर्थ ही में उसका प्रचार कर रहे हैं। इसीलिए लिखा है—

लिकुल्ले उम्मतन जअलना मन्सकन, हुमनासिकूहो।

—(सूरते अलहज्ज रकूअ 9)

प्रत्येक समुदाय के लिए बनाई है प्रार्थना पद्धति और वह उसी प्रकार प्रार्थना करते हैं उसको।

यही नहीं हमारी इस आपत्ति को परमात्मा का न्याय समर्थन करता है कि वह अपना इल्हाम ऐसी भाषा में प्रदान करें जिसके समझने में मनुष्य मात्र को बराबर सुविधा हो। स्वयं कुरान शरीफ़ स्वीकृति देता है। चुनांचे लिखा है—

वमा अरसलनामिनर्रसूले इल्ला बिलिसाने कौमिही।

—(सूरते इब्राहिम आयत 4)

और नहीं भेजा हमने कोई पैग़म्बर परन्तु साथ भाषा अपनी के।

कुरान का यह आशय है कि वह केवल अरबवासियों के लिए निर्धारित है। इससे अधिक स्पष्टता से और किस प्रकार वर्णन किया जा सकता है।

समय पाकर निरस्त हो जाने की साक्षी भी स्वयं कुरान में विद्यमान है। अतएव फ़रमाया है—

बलइनशअना लिनज़हबन्ना बिल्लज़ी औहेना इलैका।

—(सूरते बनी इसराईल रकूअ 10)

और यदि हम चाहें (वापिस) ले जाएँ वह चीज़ कि वही (सन्देश) भेजी है हमने तेरी ओर।

कुरान के लिये नया पाठ क्या विशिष्ट था?—वास्तव में इस्लाम मानने वालों के इल्हाम के सिद्धान्त के तार्किक निष्कर्ष का वह स्वयं समर्थक नहीं। यदि यह मान लो कि प्रारम्भिक इल्हाम के पश्चात् फिर इल्हाम होने की सम्भावना है तो यह भी मानना पड़ेगा कि कोई इल्हाम पूर्ण नहीं होता।

चाहे पहला इल्हाम अपने मानने वालों की उपेक्षा वृत्ति के कारण नष्ट हो जाए चाहे उनके दुराशय के   कारण उसमें हेरा-फेरी हो जाए। प्रत्येक इल्हाम में इसकी बराबर सम्भावना रहेगी, क्योंकि परमात्मा व मनुष्य जिन दो के मध्य इल्हाम का सम्बन्ध है वह प्रत्येक काल में एक से रहते हैं।

परमात्मा यदि पहले इल्हाम का उत्तरदायी न रहा तो किसी दूसरे का भी नहीं होगा। यदि एक आदेश के निरस्त हो जाने की सम्भावना है तो उसके पश्चात् आने वाले अन्य इल्हाम भी इस सम्भावना से बाहर नहीं हो सकते। हमें आश्चर्य है कि अल्ला मियाँ के आदेश के निरस्त होने की सम्भावना ही क्यों? मौलाना लोग एक उदाहरण देते हैं कि जैसे एक कक्षा के विद्यार्थी ज्यों-ज्यों उन्नति करते हैं, त्यों-त्यों उनके पाठ्य पुस्तकों में भी परिवर्तन होता रहता है।

इसी प्रकार हज़रत आदम के युग के लोग जैसे पहली कक्षा के विद्यार्थी थे अब के मानव अगली कक्षाओं में आ चुके हैं। उनके लिए इल्हाम पहले की अपेक्षा उच्चस्तर का होना चाहिए। हम इस तर्क का उत्तर ऊपर दे चुके हैं कि कुरान का सब से उच्च आदेश परमात्मा की एकता के सम्बन्ध में है तथा वह पूर्व काल के पैग़म्बरों के इल्हाम में भी स्वयं कुरान के शब्दों में विद्यमान है। फिर वह कौन-सा नया पाठ है जो कुरान के लिए ही विशिष्ट था? और वह पहले के पैग़म्बरों के इल्हाम में भी स्वयं कुरान के शब्दों में पाई जाती है।

यहाँ हम इस उदाहरण का उत्तर तर्क से देंगे। समय बीतने पर पाठ्य पुस्तक बदलने की आवश्यकता उस समय होती है जब विद्यार्थी विभिन्न कक्षाओं में एक रहें वही कक्षा उन्नति करती आगे बढ़ती जाए तो उन्हें निश्चय ही प्रत्येक कक्षा में नई शिक्षा देनी होगी। यदि मुसलमान पुनर्जन्म मानते होते कि इस समय भी वही मनुष्य जीवित अवस्था में हैं जो हज़रत आदम के समय में थे तो इस दृष्टिकोण से परिवर्तन की आवश्यकता की कल्पना की जा सकती थी। परन्तु मुसलमानी सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक नस्ल नई उत्पन्न की जाती है। प्रत्येक नस्ल अपने से पहली नस्ल के ज्ञान से वैसी ही अनजान होती है जैसे स्वयं पहली नस्ल प्रारम्भ में थी। उसे नया पाठ पढ़ाने के क्या अर्थ हुए? सच्चाई यह है कि जैसा हम ऊपर निवेदन कर चुके हैं कि इल्हाम व विकास दो परस्पर विरोधी मान्यताएँ हैं।

इल्हाम मानने वालों को प्रारम्भ में ही पूर्ण इल्हाम का उतरना स्वीकार करना पड़ेगा। प्रारम्भ में भाषाओं की विपरीतता का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि स्वयं कुरान कहता है—

मा कानन्नास इल्ला उम्मतन वाहिदतन फख्तलिफू।

—(सूरते यूनिस रकूअ 2)

सृष्टि के आरम्भ में (सब) लोग एक ही समुदाय के हैं बाद में पृथक् (समुदाय) बने।

उस समय भी ईश्वर ने आदम द्वारा इल्हाम भेजा यह मुसलमानों की मान्यता है। और वह इल्हाम कुरान के शब्दों में—

व इन्नहू फ़ीउम्मिल किताबे लदैनालि अल्लहुन हकीम।

और वह (ज्ञान) है उम्मुल किताब के बीच उच्चस्तर का कार्यकौशल भरा।

‘उच्चस्तर का कार्यकौशल भरा’ शाब्दिक अर्थ है, यही परिभाषा वेद भगवान की है। वेद के अर्थ हैं कार्यकौशल भरा ज्ञान, भगवान् के अर्थ हैं उच्चस्तर।

धर्मों के पारस्परिक मतभेदों का एक कारण यह है कि नया मत पुराने मत को निरस्त कहकर उसका विरोध करता है और पुराना मत नए मत को अकारण बुरा बताता है। नए पैग़म्बर के अपने दावे के अतिरिक्त उसके पैग़ाम के ईश्वर की ओर से होने की साक्षी भी क्या है? स्वयं कुरान ने कई नबिओं (ईश्वरीय दूतों) की ओर संकेत किया है—

व मन अज़लमा मिमनफ़्तिरा अलल्लाहि कज़िबन औ काला ऊही इलय्या वलम यूहा इलैहे शैउन व मन काला सउन्ज़िलो मिसला मा उंज़िलल्लाहो।

—(सूरते इनआम आयत 93)

और उस व्यक्ति से अधिक अत्याचारी कौन है जो ईश्वर पर ही दोष मढ़ता है और कहता है मेरी ओर इल्हाम उतरा है परन्तु वही (सन्देश) उसकी ओर नहीं की गई। मैं भी उतारता हूँ उसी प्रकार (सन्देश) जो ईश्वर ने उतारा।

कुरान के भाष्यकारों ने इसका संकेत मुसैलमा अबातील व इब्ने ईसा की ओर माना है जिन्होंने हज़रत मुहम्मद के जीवनकाल में पैग़म्बरी का दावा किया था। अब विद्वानों के पास ऐसा कौन-सा उदाहरण है जिससे पैग़म्बरी के झूठे व सच्चे दावा करने वालों की पहचान हो सके जिससे सच्चे पैग़म्बर और झूठे नबी में अन्तर करे?   दोनों अपने आप को अल्लाह की ओर से होने का दावा करते हैं।

कुरान को ईश्वरीय पुस्तक न मानने वालों की स्वयं कुरान की आयतों में बहुत आलोचना व उठा-पटक की हैं। उन पर लानतें (दुष्नाम) बरसाई हैं और पुराने समुदायों की कहानियाँ सुना-सुनाकर डराया है कि जिन दुष्परिणामों को पूर्ववर्ती पैग़म्बरों को न मानने वाले पहुँचाए गए हैं वही दशा तुम्हारी होगी। यही बात मुसैलमा अबातील व इब्ने ईसा अपने इल्हाम के दावे में प्रस्तुत करते होंगे। इसलिए यह धमकियाँ भी कुरान के इल्हामी होने का प्रमाण नहीं। सम्भव है कोई मुसैलमा अबातील और इब्ने ईसा की पुस्तकों के नष्ट हो जाने और कुरान के बचे रहने को कुरान के श्रेष्ठ होने को कुरान की महिमा बताए। सो शेष तो ऐसी पुस्तकें भी हैं जो चरित्रहीनता का दर्पण है जिनका पठन-पाठन का साहित्य लाभ केवल दुष्चरित्रों व समाज को भ्रष्ट करने वाले लोगों का मनोरंजन भरा है।

इससे यह सिद्ध नहीं होता कि इन पुस्तकों की जड़ में ईश्वरीय सन्देश है। कुरान में अपने सम्बन्ध में यह वाद भी प्रस्तुत किया गया है—

व इन कुन्तुमफ़ी रैबिनमिम्मा नज़्ज़लना अला अब्दिना फ़ातूबि सूरतिन मिन्मिसलिह व अदऊ शुहदाउकुम मिन इनिल्लाहे इन कुन्तुम सादिकीन फ़इनलम तफ़अलू वलन तफ़अलू।

—(सूरते बकर आयत 23)

और यदि तुम्हें सन्देह है उससे जो उतारा हमने अपने बन्दे के ऊपर तो लाओ एक सूरत उसके मुकाबिले की और अपने साक्षियों को बुलाओ। परमात्मा के अतिरिक्त यदि तुम सच्चे हो फिर यदि न करो और न कर सकोगे।

इस आयत का उद्धरण हम किसी पूर्व अध्याय में कर चुके हैं। कोई व्यक्ति अपने लेख के सम्बन्ध में यह दावा करे कि उस जैसा लेख नहीं हो सकता और कल्पना करो कि उस जैसा लेख दावेदार के समय में कोई न बना सके तो क्या उसके इस निरालेपन से ही वह अल्लाह मियाँ की ओर से मान लिया जायेगा? यदि ऐसा है तो प्रत्येक काल का बड़ा लेखक व महाकवि अवश्य ईश्वरीय दूत समझा जाया करे। ईश्वरीय सन्देश होने की यह कोई दार्शनिक युक्ति नहीं।

फिर भी हम इस दावे में प्रस्तुत अनुपमता की वास्तविकता पर विचार कर लेना चाहते हैं। क्या यह अनुपमता भाषा सौष्ठव के आधार पर है जैसा मौलना सनाउल्ला साहब का विचार है? सर सैयद अहमद—जैसा विचार हम इस पुस्तक के अन्तिम अध्याय में प्रस्तुत करेंगे कुरान की भाषा सौष्ठवता के समर्थक नहीं, वे अनुपम नहीं मानते। यही दशा अलामा शिबली नौमानी की थी। स्वयं कुरान के भाष्यों में एक भाष्य मौलाना फ़ैजी का है। उसका नाम सवाति अल इल्हाम है। वह सारी की सारी बिन्दु रहित पुस्तक है।

साहित्य रचना का यह भी तो कमाल है कि पूरी की पूरी पुस्तक बिना बिन्दु के लिख दी जाए। क्या इसलिए कि उस बिन्दु रहित भाष्य जैसी अनुपम पुस्तक लिखना अन्य लेखकों को असम्भव है उस भाष्य को ईश्वरीय सन्देश मान लिया जाए? इस दावे के सम्बन्ध में सूरते लुकमान की आयत 3 पर तफ़सीरे हुसैनी की टिप्पणी निम्न है—

आवुरदा अन्द कि नसरबिन हारिस लअनुल्लाहे अलैहे ब तिजारत ब बलादे फ़ारस आमदा बूद व किस्साए रुस्तम व असफ़न्द यार बख़रीद व मुअर्रब साख़्ता बमक्का बुर्द व गुफ़्त कि र्इं कि अफ़साना आवुरदा अम शीरींतर अज़ अफसाना हाय मुहम्मद……..।

कहा जाता है कि नसरबिन हारिस ईश्वरीय शाप हो उस पर व्यापार के लिए फ़ारस देश के शहरों में गया वहाँ उसने एक पुस्तक असफ़न्दयार की कहानी खरीदी और उसे अर्बी में कर दिया व कहने लगा कि यह कहानी जो मैं लाया हूँ मुहम्मद की कहानियों से अधिक रुचिकर है……..। 1 [1. मूल में उपरोक्त फ़ारसी उद्धरण के अर्थ छूट गये थे। श्री पं॰ शिवराज सह जी ने दे दिये सो अच्छा किया।   —‘जिज्ञासु’]

मआलिमु त्तंजील में यही कहानी सूरते लुकमान आयत 3 के सम्बन्ध में वर्णन करते हुए लिखा है—

यतरकूना इस्तमा अलकुरान।

लोगों ने कुरान का सुनना छोड़ दिया।

अतः भाषा सौष्ठवता या भाव गम्भीरता का कमाल भी किसी पुस्तक के ईश्वरीय होने की निर्णायक युक्ति नहीं। इस विवाद में   मतभेद होने की आशंका है और जब यह मान्यता सभी मतवादियों की है कि सृष्टि के आरम्भ में ईश्वरीय ज्ञान (वही) परमात्मा की ओर से हुई थी व वही मानव के ज्ञान का आदि स्रोत है तो इस पर व्यर्थ में परिवर्तन व निरस्तता के दोष लगाकर ईश्वरीय सन्देश का अपमान करना कहाँ तक ठीक है, अपितु उसी सन्देश पर सब को एकमत हो जाना कर्त्तव्य है। वह इल्हाम वेद है। 1 [1. सब आस्तिक मत ईश्वर को पूर्ण (PERFECT) मानते हैं। उसकी प्रत्येक कृति दोषरहित पूर्ण है। मानव, पशु, पक्षी सभी जैसे पूर्वकाल में जन्म लेते थे वैसे ही आज तथा आगे भी वैसे ही होंगे फिर प्रभु के ज्ञान में परिवर्तन व हेर-फेर का प्रश्न क्यों?   —‘जिज्ञासु’]

यह इल्हाम लोहे महफ़ूज़ में है—अर्थात् उसकी अनादि व अनन्त काल तक के लिए रक्षा की गई है। फलतः पाश्चात्य विद्वानों की भी सम्मति जिन्होंने वेद का अध्ययन किया है यही है कि वेद में हेरा-फेरी नहीं हुई। प्रोफ़ेसर मैक्समूलर अपनी ऋग्वेद संहिता भाग 1 भूमिका पृष्ठ 27 पर लिखते हैं—

हम इस समय जहाँ तक अनुसंधान कर सकते हैं हम वेदों के सूक्तों में विभिन्न्न सम्प्रदायों के होने का इस शब्द में प्रचलित अर्थों में वर्णन नहीं कर सकते।

प्रोफ़ेसर मैकडानल अपने संस्कृत साहित्य के इतिहास में पृष्ठ 50 पर लिखते हैं—

इतिहास में अनुपम—परिणाम यह है कि इस वेद की रक्षा ऐसी पवित्रता के साथ हुई है जो साहित्य के इतिहास में अनुपम है।

कुरान ने अपने सम्बन्ध में तो कह दिया कि इसे वापिस भी लिया जा सकता है। यह अरबी भाषा में है। एक ऐसी जाति के लिए है जिसमें पहले पैग़म्बर नहीं आया। इसका उद्देश्य मक्का व उसके पास-पड़ौस की सामयिक सुधारना है और यही स्वामी दयानन्द व उसके अनुयायियों का दावा है।

उम्मुल किताब (पुस्तकों की जननी) जिसको वेद ने अपनी चमत्कारिक भाषा में वेद माता कहा है वही वेद है जो सृष्टि के आरम्भ में दिया गया था और जो सब प्रकार की मिलावटों एवं बुराईयों व हटावटों से पवित्र रहा है। भला यह भी  कोई मान सकता है कि पुस्तकों की माता का जन्म तो बाद में हुआ हो और बेटियाँ पहले अपना जीवन गुज़ार चुकी थीं?

इल्हाम के सम्बन्ध में हमारी मान्यता यह है कि परमात्मा ऋषियों के हृदयों में अपने ज्ञान का प्रकाश करता है यही एक प्रकार वही (ईश्वरीय ज्ञान) का है1

[1. ईश्वरीय ज्ञान के प्रकाश अथवा आविर्भाव का यही प्रकार है और इस्लाम भी अब मानव हृदय में ईश्वरीय ज्ञान के प्रकाश के वैदिक सिद्धान्त को स्वीकार करता है। डॉ॰ जैलानी ने भी अपनी एक पुस्तक में इसे स्वीकार किया है। फ़रिशते द्वारा वही लाने को भी मानना उसकी विवशता है। —‘जिज्ञासु’]

परमात्मा सर्वव्यापक है उसके व उसके प्यारों के मध्य किसी सन्देशवाहक की आवश्यकता नहीं परन्तु कुरान का इल्हाम एक फ़रिश्ते के द्वारा हुआ है जिसने हज़रत मुहम्मद से प्रथम भेंट के समय कहा था—

इकरअ बिइस्मे रब्बिका।

पढ़ अपने रब के नाम से।

एक गम्भीर प्रश्न—दूसरे शब्दों में कुरान की शिक्षा बुद्धि के द्वारा नहीं वाणी के द्वारा दी गई है। यह इल्हाम बौद्धिक नहीं वाचक है। हज़रत मुहम्मद साहब को तो जिबरईल की वाणी (भाषा) में इल्हाम मिला। हज़रत जिबरईल को किसकी वाणी (भाषा) से मिला होगा? अल्लाह ताला तो सर्वव्यापक है उसके अंग नहीं हो सकते। स्वामी दयानन्द उचित ही लिखते हैं कि—प्रारम्भ में अलिफ़ बे पे की शिक्षा किसने मुहम्मद साहब को दी थी? आशय यह है कि यदि इल्हाम वाणी के उच्चारण से प्रारम्भ होता है तो स्वयं इल्हाम देने वाला अध्यापक बनकर पहले इन शब्दों का उच्चारण करता है जो उसके पश्चात् देने वाले की वाणी पर आए हैं तो अल्लाह ताला यह इल्हाम अपने फ़रिश्ते की वाणी पर किस प्रकार पहुँचाता है? यदि इस प्रश्न का उत्तर यह है कि अल्लाह ताला फ़रिश्ते की बुद्धि में अपनी बात प्रकट करता है।

क्योंकि वह वहाँ उपस्थित है तो क्या वह पैग़म्बर के दिल में विद्यमान नहीं है कि वहाँ तक सन्देश पहुँचाने के लिए दूसरे दूत का प्रयोग करता है? सर्वव्यापक न भी हो जैसे कि हम किसी पिछले अध्याय में बता चुके हैं कि कुरान के कुछ वर्णनों   के अनुसार वह सीमित है तो भी जिस शक्ति के सहारे अर्श पर बैठाबैठा सारे संसार का काम चलाता है उसी से पैग़म्बर के हृदय में इल्हाम क्यों नहीं डालता? फ़रिश्ता अल्लाह व पैग़म्बर के मध्य एक अनावश्यक साधन है। यह दोष है इस्लामी इल्हाम के प्रकार में।

कुरान को परमात्मा की वाणी मानने में एक बात यह भी बाधक है कि परमात्मा की वाणी अटल होनी चाहिए उसमें परिवर्तन की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। परन्तु कुरान में स्पष्ट लिखा है कि उसके आदेशों में परिवर्तन होता रहा है। जैसे सूरते बकर रुकुअ 13 में लिखा है—

मानन्सरवा मिन आयतिन औ नुन्सिहाते बिख़ैरिन मिन्हा ओमितलहा।

जो निरस्त कर देते हैं हम आयतों को या भुला देते हैं हम लाते हैं उसके समान या उससे उत्तम।

कहानियाँ भी अनादि क्या?— मुसलमानों का दावा तो यह है कि कुरान के मूल पाठ की रक्षा का उत्तरदायित्व स्वयं अल्लाह मियाँ ने अपने ऊपर ले रखा है, परन्तु कुरान न केवल निरस्तीकरण की सम्भावना प्रकट करता है, अपितु भूल जाने की भी। चलो थोड़ी देर के लिए मान लो कि कुरान का कोई वचन निरस्त नहीं होता और यह वही कुरान है जो अनादि काल से लोहे महफ़ूज़ पर लिखा हुआ है तब इन ऐतिहासिक कथाओं का क्या कीजिएगा। जो कुरान में लिखे हुए हैं। जैसे सूरते यूसुफ़ में यूसुफ़ और जुलेख़ा की कहानी है—

व रावदतहू अल्लती हुवा फ़ी बतहा अन नफ़िसही व ग़ल्ल कतेल अल बवाबा व कालत हैतालका काला मआज़ल्लाहे, इन्नहू रब्बी अहसना मसवाए इन्हू लायुफ़लिज़ोल ज़ालिमून।

—(सूरते यूसुफ आयत 23)

और फुसला दिया उसको उस स्त्री ने कि वह उसके घर के बीच था उसकी जान से और बन्द किये द्वार और कहने लगी आओ, कहती हूँ मैं तुझको, कहा, पनाह पकड़ता हूँ मैं अल्लाह की वास्तव में वह पालन करने वाला है मेरा, अच्छी तरह से उसने मेरा कहना किया। सचमुच नहीं यशस्वी बनते अत्याचारी लोग।

यदि यह ज्ञान नित्य है तो स्पष्ट है कि हज़रत यूसुफ आरम्भ से ही पवित्रतात्मा नियत किए गए और ज़ुलैखा आरम्भ से ही अत्याचारिणी ठहरी, अब अल्लाह मियाँ का लेख भाग्य लेख है वह टल नहीं सकता। कोई पूछे ऐसा निर्धारण करने के पश्चात् इल्हाम की आवश्यकता क्या? पापी लोग आरम्भ से ही पापी बन चुके वे सुधारे नहीं जा सकते और पवित्रात्मा प्रारम्भ से पवित्रात्मा बनाए जा चुके उन्हें सुधार की शिक्षा की आवश्यकता नहीं।

कुरान का आना व्यर्थ।

यही दशा उस बुढ़िया की है जो लूत के परिवार में से नष्ट हुई थी, फ़रमाया है—

इज़ानजय्यनाहो व अहलहू अजमईन इल्ला अजूज़न फ़िल ग़ाबिरीन।

—(सूरते साफ़्फ़ात आयत 134-135)

जब हमने मुक्ति दी उनको और उनके सारे परिवार को एक बुढ़िया के सिवाय जो ठहरने वालों में थी।

हज़रत नूह का लड़का और पत्नी, हज़रत मुहम्मद के चाचा अबू लहब आदि ऐसे व्यक्तियों की चर्चा कुरान में है जिन्हें कुरान यदि नित्य है तो अज़ल (अनादि काल) से ही दौज़ख़ के लिए चुन लिया गया और पैग़म्बरों व उनके अन्य परिवार जनों को बहिश्त में स्थान मिल चुका है। कुरान के इल्हाम का लाभ किसके लिए है?

इससे हमने सिद्ध कर दिया कि न तो मुसलमानों का माना हुआ इल्हाम का प्रकार ठीक है, न इल्हामों के क्रम की मान्यता दोष रहित है। न कुरान इस सिद्धान्त के अनुसार अन्तिम सन्देश होने का पात्र ही है, न उसकी भाषा ऐसी है जो संसार भर की सभी जातियों की सम्मिलित भाषा हो, वेद की भाषा सृष्टि के आरम्भ में तो विश्वभर की सांझी बोली थी ही इस समय भी उस पर समस्त संसारवासियों का अधिकार सम्मिलित रूप से उसी प्रकार है कि वह प्रत्येक जाति की वर्तमान भाषा का प्रारम्भिक स्रोत है व उन अर्थों का भण्डार है जिसका प्रकटीकरण बाद की बिगड़ी हुई या बनी हुई भाषाओं के कोष के द्वारा हो रहा है।

वर्तमानकाल की प्रचलित भाषा की धातुएँ वेद की भाषाओं की धातुएँ हैं, जिनके योगिक, अर्थात् कोष के अर्थों के कारण वेद की वाणी अर्थों का असीम भण्डार बनी हुई है। फिर वेद में ऐतिहासिक कथाएँ व घटनाएँ भी   नहीं हैं जैसे कुरान में हैं। यदि कुरान अल्लाह मियाँ की प्राचीन वाणी है व वह निरस्त न हो सके तो उसके वर्णित स्थायी नित्य पापी व पवित्रात्मा प्रारम्भ से ही पापी व पवित्रात्मा घड़े गए हैं। उनका स्वभाव बदल नहीं सकता। इल्हाम से लाभान्वित कौन होगा?1

[1. जो प्रश्न महर्षि दयानन्द जी ने एक से अधिक बार उठाया फिर हमारे शास्त्रार्थ महारथी उठाते रहे। पं॰ चमूपति जी ने इस ग्रन्थ में इसे अत्यन्त गम्भीरता से उठाते हुए बार-बार उत्तर माँगा है। वही प्रश्न अब इससे भी कहीं अधिक तीव्रता व गम्भीरता से मुस्लिम विचारक पूछ रहे हैं। ‘दो इस्लाम’ पुस्तक के माननीय लेखक का भी यही प्रश्न है। आप यह कहिये कि पं॰ चमूपति उसकी वाणी से मुसलमानों से पूछते हैं, “इस हदीस घड़ने वाले ने यह न बताया कि जब एक व्यक्ति के कर्म, भोग, सौभाग्य व दुर्भाग्य का निर्णय उसके जन्म से पहले ही हो जाता है तो फिर अल्लाह ने मानवों के सन्मार्ग दर्शन के लिए इतने पैग़म्बरों को क्यों भेजा? असंख्य जातियों का विनाश क्यों किया?” दो इस्लाम पृष्ठ 306। आगे लिखा है, “चोर के हाथ काटने का आदेश क्यों दिया? जब स्वयं अल्लाह उसके भाग्य में चोरी लिख चुका था।”   —‘जिज्ञासु’]

वास्तव में कुरान नित्य वाणी नहीं है, हमने स्वयं कुरान के प्रमाणों से सिद्ध किया है कि कुरान स्वयं को अरबवासियों के लिए जो उस समय इल्हाम के वरदान से वंचित थी। उस समय की आचार संहिता बताता है और इस बात की सम्भावना भी प्रकट करता है कि उसे वापिस ले लिया जाये। उम्मुल किताब या वेद माता की ओर संकेत है कि वह उच्चकोटि का ज्ञान भण्डार है जो सदा के लिए सुरक्षित है अत्यन्त अर्थपूर्ण है।

इस्लामिक जिहाद

जिहाद (धर्मयुद्ध)

जिहाद के सिद्धान्त ने इस्लाम को तलवार का धर्म बना दिया है ।

[1. आज विश्व में इस्लामी आतंकवाद फैला हुआ। मुस्लिम संस्थाओं व मौलवियों ने इन जिहादियों आतंकवादियों के विरुद्ध कोई फ़तवा नहीं दिया। न इनका उग्र विरोध किया है। यह जिहादी चिन्तन की ही तो उपज है। भारत में ही जिहादियों के विरुद्ध सामूहिक रूप से इस्लामी जोश से मुसलमानों ने कुछ भी नहीं किया। यदा कदा कुछ लोग गोलमोल शब्दों में आतंकवाद की निन्दा करते हुए जिहाद की अपनी व्याख्या कर देते हैं।   —‘जिज्ञासु’]

इस्लामी परम्पराओं के अनुसार मुसलमानों के लिए, यदि उनमें शक्ति हो तो अमुस्लिमों पर आक्रमण करना, उनसे लड़ना और उन्हें मार डालना अथवा वे धार्मिक कर (जज़िया) देना स्वीकार करें तो ज़िम्मी (शरणागत) बना लेना धार्मिक कर्त्तव्य है।

इसमें सन्देह नहीं कि कुरान में यह शिक्षा है कि—

व कातिलू की सबीलिल्लाहै अल्लज़ीना युकातलूनकुम।

—(सूरते बकर 190)

और लड़ो ईश्वर के मार्ग में उनसे जो तुमसे लड़ते हैं।

परन्तु तफ़सीरे हुसैनी में लिखा है कि—

र्इं हुकुम ब  आयते सैफ़  मन्सू ख अस्त।

यह आदेश आयते सैफ़ द्वारा निरस्त किया गया है।

मुज़िहुल कुरान की टिप्पणी इस आयत पर यह है—

यह जो फ़रमाया है कि जो तुमसे लड़े उनसे लड़ो और अत्याचार न करो इसके अर्थ यह हैं कि लड़ाई में लड़कों, स्त्रियों व बूढ़ों को लक्ष्य बनाकर न मारे, लड़ने वालों को मारे।

जलालैन में कहा है—

यह आयत आगामी आयत से निरस्त हो गई।

अर्थात् लड़ने का आदेश केवल आत्मरक्षा के निमित्त ही नहीं, अपितु आक्रमणकारी युद्ध व झगड़ा करने का आदेश है।

कुरान में एक स्थान पर यह भी कहा गया है—

अफ़अन्ता तकरिहुन्नासो हत्ता यकूनुल मौमिनीम।

—(सूरते यूनुस आयत 99)

ऐ मुहम्मद क्या तू लोगों पर उनके मुसलमान बनाने के लिए बलात्कार करेगा।

यह स्पष्ट ही अत्याचार का निषेध है। परन्तु इस पर भी भाष्यकारों ने लिख रखा है कि इस निषेध को आयत सैफ़ ने निरस्त कर दिया है। पाठक को यह आयत पढ़कर यह विचार भी होगा कि अल्लामियाँ को यह आदेश देने की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्यों हज़रत मुहम्मद से पूछताछ की गई? क्या हज़रत मुहम्मद की इच्छा बलात्कार करने की थी? यह इच्छा किसके आदेश से उत्पन्न हुई? और क्या यह सम्भव नहीं कि विवश अल्लाह के प्यारे ने अपनी इच्छा अल्लाह मियाँ से मनवा ही ली हो? भाष्यकारों का विचार है कि निषेध जहाँ भी हुआ परिस्थितियाँ अनुकूल न होने के कारण हुआ है। अल्लाह मियाँ प्रतीक्षा करा रहे थे, जब परिस्थितियाँ अत्याचार करने के अनुकूल हो गर्इं तो वह आदेश भी प्रदान कर दिया और अब इन सब आदेशों के अर्थ यही लिए जाते हैं कि बिना किसी झिझक व संकोच के अपनी ओर से ही आक्रमण करो। अतएव हदाया जो सुन्नी सम्प्रदाय की प्रामाणिक संहिता है उसमें जिहाद (धर्मयुद्ध) के अध्याय का प्रारम्भ ही इन शब्दों से हुआ है—

व कत्तालुल कुफ़्फ़ारो बाजिबुन व इनलम यब्तदिओ विही।

और काफ़िरों से युद्ध करना कर्त्तव्य है चाहे वे अपनी ओर से प्रारम्भ न भी करें।

सर अब्दुल रहीम जो बंगाल हाईकोर्ट के जज रहे उन्होंने एक पुस्तक लिखी है ‘मुस्लिम जुरिस्परोण्डेंस’, अर्थात् ‘इस्लामी आचार संहिता’ जिसे न्यायालयों में भी इस्लामी आचार संहिता पर प्रामाणिक पुस्तक माना जाता है। उसमें लिखा है—

“मक्का के काफ़िरों ने जो व्यवहार हज़रत रसूल से किया था उससे अनुमान किया जाता है कि इस्लाम को सदा अमुस्लिमों से शत्रुता व पक्षपात से प्रतिशोध व ख़तरों की आशंका है। इसलिए इस्लाम की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस्लामी राज्य यदि उसमें   ऐसा करने का सामर्थ्य है तो किसी पराए या विरोधी या अमुस्लिम राज्य के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर सकता है। ” —पृष्ठ 393

कुरान में फ़रमाया है—

या यत्तरिवज़ुल मौमिनूना लकाफ़िरीना औलियाआ मिन दूनिल मौमिनीना व मन यफ़अलो ज़ालिका फ़लैसा मिनल्लाहे फी शैइन इल्ला अनतत्तकू मिनहुम तुकता।

—(सूरते आले इमरान आयत 28)

इस पर जलालैन की टिप्पणी यह है—

यदि किसी भय के कारण बचाव के दृष्टिकोण से मित्रता का वचन भी कर दिया जाए और दिल में उसके ईर्ष्या व शत्रुता रहे तो इसमें कोई हानि नहीं……जिस स्थान पर इस्लाम ने पूरी शक्ति नहीं पकड़ी है वहाँ अब भी यह आदेश चालू है…….काफ़िर की मित्रता ख़ुदा के क्रोध व अप्रसन्नता का कारण है।

जहाँ शत्रुता कर्त्तव्य हो जाए मित्रता उचित भी हो तो धोखाधड़ी के रूप में, वहाँ न्याय व प्रेम ही क्या है? अच्छे या बुरे सभी धर्मों में पाए जाते हैं। अमुस्लिम सज्जन भी हों तो भी उसके विरोधी रहो, यह कहाँ का सदाचार है?

यही बात सूरते निशा में फरमाई है—

या अय्युहल्लज़ीना आमनूला तत्तरिवज़ुल काफ़िरीना औलिया- आमिन दूनिल मौमिनीन।

—(सूरते निसा आयत 144)

ऐ वह लोगो! जो ईमान लाए हो मत चुनो काफ़िरों में से मित्र केवल मुसलमानों को ही मित्र बनाओ।

आजकल की राजनीतिक कठिनाईयों का बीज इस आयत में स्पष्ट मिल जाता है। हर काफ़िर का स्थान दोज़ख़ निश्चित करने के पश्चात् ऐसी शिक्षाएँ आवश्यक हैं। जिन लोगों को अल्लाह ताला ने बनाया ही दोज़ख़ का र्इंधन बनाने के लिए है उनसे मित्रता का सम्बन्ध कैसे अपनाया जा सकता है? वे तो ईश्वरीय क्रोध के पात्र हैं, उनका जीवन हो या मृत्यु समान है। उनके जीवन का मूल्य ही क्या? फ़रमाया है—

वक्तलुहुम हैसो तक्फ़ितमूहुम व रवरिजूहुम मिन हैसो अख़रजूकुम वलफ़ितनतो अशद्दो मिनल कतले।

—(सूरते बकर आयत 191)

और मार डालो उनको जहाँ भी पाओ उनको और निकाल दो उनको जहाँ से निकाल दिया तुमको और कुफ़्र कत्ल से भी बहुत बुरा है। —(अनुवाद शाह रफ़ीउद्दीन)

यह आयत कातिलू फ़ीसबीलिल्लाह के बाद आई है जिसमें कहा था जो तुमसे लड़े उनसे ही लड़ो। परन्तु जलालैन फ़रमाते हैं—

यह आयत अगली आयत द्वारा निरस्त (निरर्थक) कर दी गई है। अब अगली आयत वही है जिसका अनुवाद हमने ऊपर दिया है। इस पर जलालैन की टिप्पणी यह है—

और उनको जहाँ भी पाओ मारो और निकालो उनको मक्का से जैसे कि उन्होंने तुमको निकाला। (अतएव मक्का विजय के वर्ष में उन्हें निकाल दिया) और हरम (हजकाल) में जब तुम हज की अवस्था में हो, लड़ने से, जिसको तुम बुरा समझते हो इस्लामी परम्परा के विपरीत आचरण बहुत बुरा है।

सूरते इन्फ़ाल में कहा है—

व कातिलूहुम हत्तालातकूनो फ़ितनतुन व यकूनुद्दीना कुल्लहू लिल्लाहे।

—(सूरते इन्फ़ाल आयत 39)

और लड़ो उनसे यहाँ तक कि न शेष रहे काफ़िरों का उपद्रव व उनका वर्चस्व समाप्त हो जाये और सारा समुदाय अल्लाह के दीन (मत) में मिल जाये। —(अनुवाद शाह रफीउद्दीन)

जलालैन की टिप्पणी है—

और काफ़िरों की हत्या करो यहाँ तक कि इस्लाम विरोधी कोई भी विचारधारा मतभेद का नामो-निशान तक न बच पाए और सर्वत्र अल्लाह का दीन वहदहूला शरीक (कल्मा पढ़ने वाला) ही फैल जावे उसके सिवा किसी और की पूजा न रहे।

आगे फ़रमाया है—

या अय्युहन्नबियो हुर्रिजल मौमिनीना अललकिताले इनयकुन आशिरुना सबिरुना यग़लिबू मियतैने।

—(इन्फ़ाल)

ऐ पैग़म्बर मुसलमानों को (काफ़िरों से) लड़ने पर उत्तेजित करो यदि तुम में धीरज वाले (और मुकावले पर) जमने वाले बीस आदमी भी होंगे तो वह दो सौ पर अपनी विजय प्राप्त कर लेंगे।

—(टिप्पणी जलालैन)

सूरते तौबा में है—

या अय्युहुल्लज़ीना आमनू कातिलुल्लज़ीना यनूतकुम मिनल- कुफ़्फ़ारे व लयजिदूफ़ीकुम ग़िलज़तन।

—(सूरते तौबा आयत 123)

ऐ लोगो! जो ईमान लाए हो, लड़ो उन लोगों से जो तुम्हारे पास रहने वाले काफ़िर हैं। ऐसा होना जरूरी है कि वे तुम्हारे अन्दर कठोरता पावें।

अर्थात् सर्वप्रथम उन काफ़िरों से लड़ो जो तुमसे मिले हुए हैं फिर उनसे जो उनके निकटवर्ती हैं इस प्रकार एक के बाद दूसरे सभी काफ़िरों का मुकाबला करो।

सूरते फ़ुरकान में है—

फ़लाततअल काफ़िरीना व जाहदाहुम जिहादनकबीरन।

—(सूरते फ़ुरकान आयत 52)

और काफ़िरों का कहना मत मान बल्कि उनके साथ बड़ा धर्मयुद्ध कर।

तफ़सीरे हुसैनी में जिहाद की परिभाषा दी है—

या ब कुरआन या ब इस्लाम या ब शमशीर या ब तरके इताअते एशां।

कुरान, इस्लाम या तलवार के बल पर अथवा उनकी अधीनता को छोड़ देने पर।

सूरते तहरीम में कहा है—

ता अय्युहन्नबिओ जाहिदलकुफ़्फ़ारा वलमुनाफ़िकीना वग़ालज़ोअलैहुम।

—(सूरते तहरीम)

ऐ पैग़म्बर काफ़िरों से धर्मयुद्ध कर (साथ वाणी के) उन पर विजय पाने के लिए उन पर लड़ाई कर उन्हें झिड़क व क्रोध कर।

सूरते सफ़ में आया है—

इन्नल्लाहा यहिब्बुल्लज़ीना युकातिलूना फ़ी सबीलिही सफ़्फ़न।

—(सूरते सफ़्फ़ आयत 4)

वास्तव में ख़ुदा अपनाता है उनको जो गिरोह बनाकर उसके मार्ग में युद्ध करते हैं।

सूरते आले इमरान में है—

या अय्युहल्लज़ीना आमिनू असबरु वसाबिरु व राबितू।

—(सूरते आले इमरान आयत 200)

ऐ ईमान वालों धैर्य रखो परस्पर दृढ़ता व विश्वास रखो और युद्ध में लगे रहो। —(अनुवाद शाह रफीउद्दीन)

हम ऊपर प्रकट कर चुके हैं कि मुसलमान धर्माचार्यों के मत में  युद्ध केवल आत्मरक्षा के निमित्त ही कर्त्तव्य नहीं, अपितु यदि सामर्थ्य हो तो स्वयं दूसरे पर आक्रमण करने का भी आदेश है। सारे युद्ध का रोक देना तो कठिन है। अत्याचार के विरुद्ध युद्ध करने की आज्ञा दी जा सकती है, परन्तु इस्लामी आचार संहिता में इस सीमा को स्वीकार नहीं किया गया है। इस सीमा के साथ भी युद्ध का ढंग ऐसा होना चाहिए कि अनावश्यक कठोरता न बरती जाए। हत्या भी करनी पड़े तो बर्बरता पूर्वक न हो। परन्तु कुरान ने तो फ़रमाया है—

सउलिकीफ़ी कुलूबिल्लज़ीना कफ़रुर्रुअबो फ़जरिबू फ़ौकलअअनाके वज़रिबू मिनहुम कुल्ला बनानिन।

—(सूरते इनफ़ाल आयत 12)

मैं काफ़िरों के दिल में आतंक डालूँगा अब मारो उनकी गर्दनों पर और काटो उनकी बोटी-बोटी। गर्दनें तो उनकी आत्मरक्षा में काटी होंगी अब उंगलियों के पोर-पोर काटने में कैसी आत्मरक्षा हुई?

यह अत्याचार व प्रतिशोध की पराकाष्ठा है। सूरते मुहम्मद में फ़रमाया है—

फ़इज़ा लकीतुमुल्लज़ीना कफ़रु फ़लरव र्रिकाबिन हत्ता इज़ा अतरब्नतमूहुम।

—(सूरते मुहम्मद आयत 4)

फिर जब तुम भेंट करो उनसे जो काफ़िर हुए बस काट दो उनकी गर्दनें यहाँ तक कि चूर-चूर कर दो उनको।

—(अनुवाद शाह रफ़ीउद्दीन)

व माकाना लिमौमिनिन अन यकतुला मौमिनून इल्ला ख़ताअन व मनकतला मौमिननख़ताअन फ़तहरीरो मोमिनतिन वदिय्यतुन मुसल्लम तुन इला अहलिही इल्लाअन यस्तद्दिद्दू। फ़अनकाना मिनकौमिन उदुव्वकुम……….व मन यक्तुला मौमिनन मुअतमिदन फ़जज़ाउहू जहन्नमा खालिदन फ़ीहा व गज़बल्लाहो अलैहे व लअनहू।

—(सूरते निसा आयत 62,93)

मुसलमानों को मुसलमान का मारना उचित नहीं, परन्तु अनजाने में, परिणामतः एक मुसलमान को आज़ाद करना है व खून की क्षति-पूर्ति अदा करना उसके घर वालों को, परन्तु यह कि दान कर देवे अतः यदि होवे उस कौम से जो दुश्मन है तुम्हारे……और जो कोई मुसलमान जानकर मार डाले वहाँ उसका फल है कि दोज़ख़ में सदा के लिए रहेगा और क्रोध अल्लाह का उसके ऊपर और लानत है।

इतना पक्षपात!—इन आयतों ने जिहाद की वास्तविकता को और स्पष्ट कर दिया है यदि जिहाद आत्मरक्षा की लड़ाई है और प्रतिशोध में विरोधी की जाति की हत्या की जा रही हो तो उस जाति में चाहे जो कोई मुसलमान हो चाहे अमुस्लिम समानरूप से वध करने योग्य होगा, परन्तु नहीं अमुस्लिम की हत्या जानकर करना भी कर्त्तव्य है और मुसलमान की हत्या यदि भूल से भी हो जाए तो उसका रक्त का बदला प्रायश्चित। इससे अधिक पक्षपात और क्या हो सकता है और यदि खून का बदला व प्रायश्चित न करे तो उसका दण्ड क्या? वही दोज़ख़।

इस प्रकार के रक्तपात व हत्या में अपनी ओर के लोग भी मारे जायेंगे और रुपया भी खर्च होगा। इसकी व्यवस्था निम्नलिखित आयत में की है—

व लातकूल्लू लिमन्युकतलो फ़ो सवीलिल्लाहे अमवातुन बल अहयाउन।

—(सूरते बकर आयत 149)

और जो ख़ुदा के मार्ग में मारे जाते हैं उन्हें मरा हुआ मत कहो, अपितु वह जीवित है।

जलालैन में टिप्पणी में लिखा है—

हरे पक्षियों के लिबास में हैं जो जन्नत में चुगते हैं।

यदि धर्म प्रचार बलपूर्वक न हो तो व्यर्थ का रक्तपात व हत्या काण्ड क्यों हो? और क्यों मरे हुओं को व्यर्थ ही जीवित कहें और बहिश्त में उन्हें पक्षी बनाएँ?

सूरते तौबा में आया है—

व लाकिनिर्रसूलो वल्लज़ीना आमन् मअहूजाहिदू विअम- वालिहिम व अनफ़ुसिहिम व उलाइकालहुमल ख़ैरातो।

—(सूरते तौबा आयत 88)

परन्तु रसूल और जो लोग ईमान लाए उसके साथ, जिहाद किया उन्होंने अपने धन और अपने जीवन व व्यक्तित्व सहित और भलाईयाँ उन्हीं के लिए हैं।

फिर फ़रमाया है—

इन्नल्लाहश्तरा मिनउल मौमिनीना अनफ़ुसहुम व अमवालहुम व अन्ना लहुम जन्नता युकातिलूना फ़ीसबीलिल्लाहे फ़यकतलूना व युकतिलून।

—(सूरते तौबा आयत 111)

सचमुच अल्लाह ने ख़रीद ली है मुसलमानों से उनकी जानें और माल उनके, इस मूल्य पर कि उनके लिए बहिश्त (दे दिया) है। वे ख़ुदा के मार्ग में लड़ेंगे।

ख़ुजमिन अमवालिहुम सदकतन तुतहिरहुम व तुन्ज़की हिमविहा।

—(सूरते तौबा आयत 103)

उनकी सम्पत्ति में से दान ले लें कि पवित्र करें उनको (प्रकट रूप में) और शुद्ध करे तू उनको साथ उनके (आन्तरिक रूप से)।

मज़हब के लिए त्याग ऐसे भी—अब यदि मुसलमानों को केवल अपने जानोमाल मज़हब पर बलिदान करने का आदेश हो तो फिर भी ठीक है, क्योंकि अमुस्लिमों से लड़े बिना यह दोनों वस्तुएँ मज़हब को भेंट की जा सकती हैं। जैसे ताऊन के समय पीड़ितों की सहायता करें। आपत्तिग्रस्त लोगों की सहायता में अपनी जान जोखिम में डालें। परन्तु इस्लाम के इतिहास में इस प्रकार के उदाहरण नहीं मिलेंगे (कि ऐसे सेवा कार्य के लिए किसी ने अपनी जान व माल भेंट किया हो।)

[ कोष्ठक में दिये गये शब्द अनुवादक ने व्याख्या के लिए दिये हैं। —‘जिज्ञासु’]

यह जानें व यह माल इस्लाम पर कैसे सत्य सिद्ध होंगे? फ़रमाया है—

व ग़नहनो नतरब्बसो बिकुम अन्युसीबुकुसुल्लाहो विअज़ाबे मिनइन्दही औविएदेना।

—(सूरते तौबा आयत 52)

और हम प्रतीक्षा करते हैं तुम्हारे लिए कि अल्लाह पहुँचाए पीड़ा अपने पास से या तुम्हारे हाथों से। 

तफ़सीरे हुसैनी में इस अन्तिम वाक्य की व्याख्या ऐसे की है—

अज़ नज़दीके ख़ुद चूं सैहा व रजफ़ व ख़सफ़ ता हलाक शवेद या बिरसानद अज़ाबे बशुमा ब दस्तहाए मा कि शुमा रा बसबब कुफ़र बकतल रसानेम।

अपने पास से (पीड़ा) जैसे सूरज ग्रहण, चन्द्र ग्रहण से मृत्यु हो जावे या तुम्हें पीड़ा पहुँचाए हमारे हाथों ताकि तुम्हें कुफ़्र के कारण वध करें।

इन ख़ुदाई फ़ौजदारों को देखना कि अल्लामियाँ ने कुफ़्र दण्ड का आदेश नहीं दिया है कि काफ़िर को वध कर दो। क्या व्यंगोक्ति है? लड़ाई में यह मरें तो जीवित हैं और जो काफ़िर मरें तो उन पर क्रोध व दण्डादेश हुआ है। मृत्यु तो भाई दोनों की एक समान है इसका नाम बलिदान है तो, और दण्डादेश है तो—

यह तो जीवनों का प्रयोग, माल (सम्पत्ति) का भी सुन लीजिए। फ़रमाया है—

या अय्युहल्लज़ीना आमनू ला तरख़ुनुल्लाहा वर्रसूला।

—(सूरते इन्फ़ाल आयत 26)

ऐ लोगो! जो मुसलमान बने हो, विश्वासघात अल्लाह व रसूल से मत करो (धन मत छुपाओ)।

इस पर मूज़िहुल कुरान में लिखा है—

अल्लाह व रसूल की चोरी यह है कि काफ़िरों से छुपकर मिलें अपनी सम्पदा व सन्तानों को बचाने के लिए………और यह भी है कि लूट के (युद्धों के) माल को छुपाकर रखें, सेना के सरदार को न प्रकट करें।

मुसलमानों की जानें व माल अल्लाहमियाँ की सम्पत्ति हुए मगर अब अल्लाहमियाँ कर्ज़ भी चाहता है। कहा है—

मनज़ल्लज़ी युकरिज़ोल्लाहा करज़न हसनन फ़यजइफ़हू।

—(सूरते बकर आयत 245)

भला कौन है जो ऋण दे ख़ुदा को अच्छा ऋण फिर वह उसके लिए उस ऋण को दोगुना करे।

इस कर्ज़ की व्याख्या मूज़िहुल कुरान में की है—

धर्मयुद्ध (जिहाद) में खर्च करें।

तफ़सीरे हुसैनी में लिखा है—

अबू अलदहद्दाह अंसारी पेश आमद व गुफ़्त वा रसूलिल्लाह ख़ुदा र्इं करज़ चिरा मेतलबद, आंहज़रत फ़रमूद कि मेख्वाहद कि ता शुमा रा ब वास्ताए आँबबहिश्त बिबुरद। अबूअलदहद्दाह गुफ़्त या रसूलिल्लाह मरा दोख़रामस्तान हस्तन्द व बहतरीन ख़रा मस्तान जनीमा नाम दारद अगर आंरा बकरज़ ख़ुदा दहम शुमा ज़ामिने बहिश्त मन मेशवेद, सैय्यद आलम फ़रमूद कि मन ज़ामिन मेशवम कि हक सुबहानहू दहचन्दा दर रियाज़े जिनां बतो अरज़ानी दारद। गुफ़्त ए सैय्यद, बशर्तें आंकि फ़रज़न्दाने मन व मादरे एशां बा मन बा मन बाशद। ख्वाजा आलम फ़रमूद कि आरे चुनीं बाशद।

अबू अलदहद्दाह अंसारी सामने आया और कहा कि या रसूलिल्लाह ख़ुदा यह कर्ज़ क्यों माँगता है। आं हज़रत ने फ़रमाया कि ख़ुदा चाहता है कि तुम्हें इसके द्वारा स्वर्ग में ले जाए। अबूअलदहद्दा ने कहा या रसूलिल्लाह मेरे पास दो नख़लिस्तान हैं उनमें से उत्तम का नाम जनीमा है, यदि उसे ख़ुदा को कर्ज़ दे दूँ तो क्या आप मेरे लिए बहिश्त के ज़ामिन (उत्तरदायी) होते हैं? सरवरे आलम ने फ़रमाया कि मैं उत्तरदायी होता हूँ कि सच्चा ख़ुदा बहिश्त में दस गुना तुझे देगा। कहा ऐ पैग़म्बर! इस शर्त पर कि मेरे लड़के व उसकी माँ भी मेरे साथ हो, फ़रमाया हाँ ऐसा ही होगा।

धर्मयुद्ध के लिए रुपये की ज़रूरत होती है। सरकार भी युद्ध के लिए कर्ज़ लेती है। अल्लाह मियाँ ने भी तो क्या बुरा किया? सरकार भी सूद का वचन देती है यह भी स्वर्ग में कई गुना दिये जाने का वचन है और केवल देने वाले को नहीं उसकी सन्तान व सन्तानों की माता को वहाँ ले जाने का वचन है। एक नख़लिस्तान के बदले में एक परिवार का परिवार स्वर्ग में, यह दयालुता है या आवश्यकता, ब्याज की दर बढ़ रही है।

यही बात सूरते माइदा में फिर फ़रमाई है—

व अकरज़ुतुमुल्लाहो करज़न हसनतन लउकुफ़िरन्ना अनकुम सियातिकुम व लअदरिवलन्नकुम जन्नातिन।

—(सूरते मायदा आयत 12)

और ऋण दो तुम अल्लाह को अच्छा, निश्चय ही मैं तुम्हारी बुराई दूर करूँगा और तुम्हें जन्नतों में प्रविष्ट करूँगा।

धर्मयुद्ध (जिहाद) में ख़र्च कर दिया। अब चाहे पाप किए भी हों सब दूर, ऊपर जो फ़रमा आय हैं। ले माल इनसे धर्मादे में ताकि तू इन्हें शुद्ध पवित्र कर दे।

यह माल किस काम में ख़र्च होता है फ़रमाया है—

व अइदूलहुम मस्ता अतुममिन कुव्वतिन व मिनरिबा तिलाहैले, तुरहिबूना बिहि अदुव्वाल्लाहो व अदुव्वकुम…………वा मातुनफ़िकू मिनशैइनकी सबीलिल्लाहे युवाफ़्फ़ा अलैकुम व अन्तुमला तुज़लिमून।

—(सूरते इन्फ़ाल आयत 59-60)

और जो तुम कर सको उनके लिए तैयारी करो शक्ति से और घोड़ों से और उनके द्वारा अल्लाह के शत्रुओं को डराओ और अपने शत्रुओं को डराओ………….और जो तुम व्यय करोगे अल्लाह के मार्ग में अल्लाह तुम्हें पूरा कर देगा। और तुम पर अत्याचार नहीं किया जाएगा।

इस्लामी शासन के काल में अधिकतर देशों में ग़ैर मुस्लिमों के लिए घोड़े की सवारी और हथियारों का प्रयोग निषिद्ध घोषित किया जाता रहा है। इसकी आधारशिला मुसलमान धर्माचार्यों ने इसी आयत को निश्चित किया है और इन सारे साधनों की आवश्यकता धर्मयुद्ध (जिहाद) के लिए है। काफ़िरों के हाथ में इन सभी साधनों को छोड़ना धर्मयुद्ध के नियमों की स्पष्ट आज्ञा का उल्लंघन है।

जान व माल ख़ुदा के मार्ग में ख़र्च करने का बदला अब तक परलोक के लिए रहा है, अर्थात् मृत्यु के पश्चात् सम्भव है कोई इस दूर के वचन के भरोसे इतना त्याग करने को तैयार न हो इसका भी फल बतलाया है—

व अदकुमुल्लाहो मग़ानिकसीरतन ताख़ुज़ूनहा।

—(सूरते फ़तह रकूअ 3)

और वचन दिया है तुमको अल्लाह ने बहुत लूटों का, कि उनको प्राप्त करोगे।

व आलमू अन्नमा ग़निमतुम मिनशैअन व अन्नल्लाहे ख़मसहू व लिर्रसूले।

—(सूरते इन्फ़ाल आयत 41)

और इस बात को समझलो कि जो कोई वस्तु तुम लूटकर लाओ उसमें से पाँचवाँ भाग अल्लाह के और रसूल के लिए (निर्धारित) है।

व यसइलूनका अनिल अन फ़ाले, कुलिल अनफ़ालो लिल्लाहे वर्रसूले बत्तकुल्लाहा।

—(सूरते इन्फ़ाल आयत 1)

तुमसे लूटों के माल के सम्बन्ध में पूछते हैं लूटें ख़ुदा के लिए और रसूल के लिए हैं इसलिए ख़ुदा से डरो।

अर्थात् ख़ुदा व रसूल का हिस्सा दो। और शेष तुम ले जाओ यही नहीं कुछ और भी है। फ़रमाया है—

ओ मा मलकत एमानहुम।

—(सूरते अलमोमिनून रकूअ 1)

और वह (लूटी हुई स्त्रियाँ) तुम्हारे दाएँ हाथ इन स्वामी बनें।

यह एक परिभाषा है कुरान की जिसका अनुवाद प्रत्येक भाष्यकार ने युद्धों में हाथ लगी हुई स्त्रियाँ किया है और वे लौंडियों (दासियों) के रूप में रखी जा सकती हैं।

गैर मुस्लिम के लिए केवल वध का ही आदेश नहीं है यदि वे धार्मिक कर (जज़िया) दे दें तो उसे प्रजा बनाकर रखा जा सकता है।

कातिलुल्लज़ीना लायोमिनूना बिल्लाहे व लाबिलयोमि लआरिवरे वला युहर्रिमूनामा हर्रमल्लाहो व रसूलूहा। वलायदीनूना दीनलहक्के मिल्लज़ीना उतुल किताबो हत्तायअतुलजतियता अनयदिव्वहुम साग़िरुन।

—(सूरते तौबा आयत 29)

जो मुसलमान नहीं बन जाते उनसे युद्ध करो, जो अल्लाह पर ईमान नहीं लाते और जो न्याय के दिन (कयामत) पर विश्वास नहीं लाते उनसे और सच्चे दीन (इस्लाम) का पालन नहीं करते जो जिन बातों को, हराम नहीं करते जो अल्लाह ने हराम किया है और उसके रसूल ने और उनमें से जिन्हें ख़ुदा ने किताब दी है जब वह आज्ञापालक हों और अपने हाथ से कर जज़िया दें और दुर्गति स्वीकार करें।

जलालैन की टिप्पणी इस आयत पर यह है कि—

उन लोगों को जो अल्लाह और कयामत पर विश्वास नहीं   रखते उनको मारो-काटो (अर्थात् रसूलिल्लाह सल्लम के प्रति भी अविश्वासी हैं, क्योंकि अल्लाह व कयामत पर विश्वास रखते तो रसूल पर भी विश्वास रखते) और जिन वस्तुओं को अल्लाह व उसके पैग़म्बर ने हराम (अवैध) निश्चित किया है जैसे शराब पीना। उसको हराम नहीं मानते और इस्लाम धर्म स्वीकार नहीं करते जो सच्चा दीन है व सब दीनों को निरस्त करने वाला है। ये लोग यहूदी व नसरानी हैं जिनको आसमानी किताब दी गई यह कदापि मुसलमान न होंगे फलतः जो कर उन पर लगाया जाएगा प्रति वर्ष अपमानित होकर उसे देंगे और इस्लामी शासन के अधीन विवशता में होंगे।

कुरान में जो यह सुविधा है कि कर (जज़िया) लेकर अपनी प्रजा बना लो ईसाइयों व यहूदियों तक ही सीमित है, परन्तु बाद के धर्माचार्यों (इस्लामी आचार संहिता के प्रणेताओं) ने इसे समस्त गैर मुस्लिमों के लिए सामान्य बना दिया है। अतएव हदाया (इस्लामी आचार संहिता) में लिखा है—

फ़इन्नमतनिऊ दऊहुम इललजियते फ़इन बज़लूहा कुलहुम मालिल मुसलिमीन।

यदि इस्लाम स्वीकार करने से अस्वीकृति दें तो उन पर कर निर्धारित किया जाए यदि उन्होंने स्वीकार कर लिया तो उनके लिए सुरक्षा है, जैसा मुसलमानों के लिए है।

 

कुरान में नारी की दुर्दशा

कुरान में नारी का रूप

फिर मानव मात्र का अर्थ ही कुछ नहीं—संसार की जनसंख्या की आधी स्त्रियाँ हैं और किसी मत का यह दावा कि वह मानव मात्र के लिए कल्याण करने आया है इस कसौटी पर परखा जाना आवश्यक है कि वह मानव समाज के इस अर्ध भाग को सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक अधिकार क्या देता है। कुरान में कुंवारा रहना मना है। बिना विवाह के कोई मनुष्य रह नहीं सकता। अल्प, व्यस्क, बच्चा तो होता ही माँ-बाप के हाथ का खिलौना है।


वयस्क होने पर मुसलमान स्त्रियों को यह आदेश है—

व करना फी बयूतिकुन्ना। —(सूरते अहज़ाब आयत 32)


यही वह आयत है जिसके आधार पर परदा प्रथा खड़ी की गई है। इससे शारीरिक, मानसिक, नैतिक व आध्यात्मिक सब प्रकार की हानियाँ होती हैं और हो रही हैं। स्वयं इस्लामी देशों में इस प्रथा के विरुद्ध कड़ा आन्दोलन किया जा रहा है। कानून बन रहे हैं जिससे परदे को अनावश्यक ही नहीं, अनूचित घोषित किया जा रहा है। परदा इस बात का प्रमाण है कि स्त्री अपनी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रखती। वह स्वतन्त्र रह नहीं सकती। विवाह से पूर्व व बाद में दोनों दशाओं में परदे का प्रतिबन्ध बना रहता है। 1

[1. अब जो कट्टरपंथी पूरे विश्व में आन्दोलन चला रहे हैं इसका अन्त क्या होता है यह आने वाले युग का इतिहास बतायेगा।   —‘जिज्ञासु’]

इस्लाम में विवाह का सम्बन्ध निरस्त किया जा सकता है, परन्तु जहाँ पति जब चाहे तलाक दे सकता है और उसे किसी न्यायालय में जाने की आवश्यकता नहीं वहाँ स्त्रियों को न्यायालय में सिद्ध करना होता है कि उसे तलाक दिया जाना आवश्यक है। नारी और न्यायालय तलाक देते समय पुरुष पर केवल आवश्यक है कि वह महर (विवाह के समय निश्चित राशि) अदा कर दे। इसे कुरान की परिभाषा में अजूरहुन्ना कहा है।

फमा अस्तमतअतमाबिहि मिन्हुन्ना फ़आतूहुन्ना अजूरहुन्ना  फरी ज़तुन।

और जिनसे तुम फ़ायदा उठाओ उन्हें उनका निर्धारित किया गया महर दे दो।

तलाक से अल्लाह रुष्ट—शादी रुपयों-पैसों का रिश्ता नहीं। यह दो शरीरों का ही नहीं दो दिलों का बन्धन है जिसकी दशा शारीरिक रूप में सन्तान, परमात्मा की पवित्र सन्तान है। और आत्मिक दशा में दो आत्माओं की दो शरीरों में एकता है। इतना ही अच्छा है कि एक हदीस में फ़रमाया है कि ख़ुदा किसी बात से इतना रुष्ट नहीं होता जितना तलाक से।

सन्तान हो जाने पर किसी ने तलाक दे दिया तो? फ़रमाया है—

बल बालिदातोयुरज़िअना औलादहुन्ना हौलैने कामिलीने, लिमन अरादा अन युतिम्मरज़ाअता व अललमौलूदे लहू रिज़ कहुन्न व कि सवतहुन्ना बिल मारुफ़े।

—(सूरते बकर आयत 233)

और माँऐ दूध पिलायें अपनी सन्तानों को पूरे दो वर्ष। और यदि वह (बाप) दूध पिलाने की अवधि पूरा कराना चाहे। और बाप पर (ज़रूरी है) उनका खिलाना, पिलाना और कपड़े-लत्तों का (प्रबन्ध) रिवाज के अनुसार माँ का रिश्ता इतना ही है औलाद से, इससे बढ़कर उनकी वह क्या लगती है?

फिर बहु विवाह की आज्ञा है। कहा है—

फ़न्किहु मताबालकुम मिनन्निसाए मसना व सलास वरूब आफ़इन ख़िफ्तुम इल्ला तअदिलू फ़वाहिदतन ओमामलकत ईमानुकुम।

—(सूरते निसा आयत 3)

फिर निकाह करो जो औरतें तुम्हें अच्छी लगें। दो, तीन या चार, परन्तु यदि तुम्हें भय हो कि तुम न्याय नहीं कर सकोगे (उस दशा में) फिर एक (ही) करो जो तुम्हारे दाहिने हाथ की सम्पत्ति है। यह अधिक अच्छा है ताकि तुम सच्चे रास्ते से न उल्टा करो।

अधिक शादियों पर न्याय शर्त है। फिर कहा है—

व लन तस्ततीऊ अन तअदिलू बैनन्निसांए वलौहरसतुम।

—(सूरते निसा आयत 129)

और तुम औरतों में न्याय नहीं कर सकते चाहे तुम लालच    करो।

मुसलमान फिर भी बहुविवाह करते हैं—ऐसी दशा में तो अहले इस्लाम को एक से अधिक विवाह करने ही नहीं चाहिए, परन्तु हो रहे हैं और उनका (हानिकारक) फल भी भुगता जा रहा है।

इस हेराफेरी के द्वारा विरोध करने से तो उचित यही था कि स्पष्ट निषेध कर दिया जाता। बात यह है कि कुरान ने (अदल बिन्नसा) (स्त्रियों में न्याय) पर तो आग्रह किया है, परन्तु अदल बैना जिन्सैन (दो प्राणियों में न्याय) स्त्री व पुरुषों में न्याय को लक्ष्य नहीं बनाया है।

औरतों में न्याय का तो अर्थ यह हुआ कि मर्द शासक है औरतें उनकी कचहरी में एक पक्ष है। चाहिए था कि मर्द व औरत को परस्पर पक्ष बनाना जैसे मर्द को यह पसन्द नहीं कि उसकी स्त्री का परपुरुष से सम्बन्ध हो, वैसे ही औरत भी सौतन के डाह से जलती है।

न्याय यह है कि दोनों को एक ही विवाह पर सन्तोष करना चाहिए फिर दाहिने हाथ की सम्पत्ति, जिसके अर्थ सभी कुरान के भाष्यकारों ने बान्दियाँ किए हैं। यह दो प्राणियों में न्याय का सर्वथा विपरीत है। यह आज्ञा किसी नैतिकता के नियमानुसार उचित नहीं हो सकती।

शियाओं के मत में मुतआ (अस्थायी विवाह) भी उचित है। जो आयत हम ऊपर महर के अधिकार के दिए जाने के सम्बन्ध में प्रमाण रूप में उद्धृत कर चुके हैं।

शिया मुसलमान इस आयत से मुतआ का औचित्य ग्रहण करते हैं। सुन्नी मुसलमान भी मानते हैं कि मुहम्मद साहेब के जीवनकाल में कुछ समय तक मुतआ प्रचलित रहा बाद में निषिद्ध हुआ और मुतआ के अर्थ हैं अस्थायी विवाह। जिसका रिवाज ईरान में अब तक पाया जाता है।

विवाह और अस्थायी, फिर इस पर हलाला है, कहा है—

वत्तलाको मर्रतैने….फ़इनतल्लकहा फ़लातहिल्लु लहू मिनबादे हत्तातन्किहाज़ौजन गरहू, फ़इन तल्लकहा फ़ला जुनाहा। अलैहुमा।

—(सूरते बकर आयत 229-230)

तलाक दो बार दिया जा सकता है…….फिर यदि (तीसरी बार) दे दे तो उसे विहित (हलाल) नहीं उसे, उसके पश्चात् यहाँ तक कि वह निकाह करे दूसरे पुरुष से फिर जब वह भी तलाक दे दे तो फिर कोई दोष नहीं।

तीसरे निकाह पर कहा है—

मुतआ क्या है? इसे हम एक जाने माने मौलाना के शब्दों में बताते हैं, ‘‘It means that a man settles it, under the name of muta, with a woman not having a husband and with whom marriage is not forbidden,according to the shariat, that he will take her for a wife for a fixed period of time and on payment of a fixed amount of money, and then during that period he can legitimately have sex with her.No qazi, witness or vakil is required for it and it needs not, also be made known nor even disclosed to a third person. It can all be done clandestine manner which (we are told) is the usual practice.” Khomeini Iranian Revolution and the Shi’te faith P. 180

[इसका सारांश यह है कि कुछ राशि देकर एक निश्चित समय के लिए किसी स्त्री से जिसका पति न हो सम्भोग किया जाता है। उस काल में उसे बीवी बनाया जाता है। यह सम्बन्ध गुप्त होता है। किसी तीसरे व्यक्ति को पता तक नहीं लगने दिया जाता। इसमें कोई काज़ी, कोई साक्षी व वकील नहीं होता।    —‘जिज्ञासु’]

निकाह नहीं बन्ध सकता जब तक कि बीच में दूसरे पति से सम्भोग न हो चुके। (मूज़िहुल कुरान)।

इस हलाला पर संख्या का बन्धन नहीं जितनी बार तीसरा तलाक दिया जाएगा। उतनी ही बार पहले पति से निकाह करने के लिए हलाला आवश्यक होगा। यह कानून की बहुत बड़ी भूल है। इसकी दार्शनिक, तार्किक, सामाजिक परिणामों की कल्पना करके भी पाठक काँप उठेगा 1 ।

[1. कुर्आन व इस्लामी साहित्य के मर्मज्ञ विश्व प्रसिद्ध लेखक श्री अनवरशेख ने ‘हलाला’ पर एक लोकप्रिय पठनीय कहानी लिखकर विचारशील लोगों को झकझोर कर रख दिया है। सत्यान्वेषी पाठकों को इसे अवश्य पढ़ना चाहिए।   —‘जिज्ञासु’]