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दंगल की जायरा वसीम अभिनेत्री को कश्मीर की अलगाववादियों की धमकी

दंगल की  जायरा वसीम  अभिनेत्री  को  कश्मीर की अलगाववादियों की धमकी

आजकल  सोशल मीडिया में दंगल की बहुत चर्चा हो रही है इतना ही  नहीं बहुत से टीवी सीरियल  में भी दंगल  की बात की जाती है  की दंगल करते हैं इत्यादि इत्यादि | आज यदि भारत में विमुद्रीकरण  होने के कारण  लोग बोल रहे हैं की पैसा बाजार में नहीं है तो फिर  बाजार में दंगल ने ३६० करोड़  से ज्यादा का कारोबार कैसे कर लिया ? यह बात समझ से  बाहर है | लोग आमिर  को एक समाजसेवक के रूप में  देखते हैं | समाज सेवक के रूप में लोगो को नजर आते हैं और सत्यमेव जयते को करके और भी अपने को समाज सेवक के तौर पर  लोगो में अपना दिल  बना लिया है | यह वही  आमिर खान  हैं जिन्हें  पाकिस्तान से प्रेम है  जिस कारण pk जैसे  फिल्मो  में पाकिस्तान की लव जिहाद की बात पर जोर दिया गया था की  पाकिस्तान का  लड़का है  तो क्या दिक्कत है | खैर  हमें इन सब सब बातो पर चर्चा  नहीं करनी है | फिलहाल  अभी दंगल की अभिनेत्री  के बारे में चर्चा करनी है |

सबसे पहले यह जाने की की आखिर  ये  जयरा वासिम कौन हैं और आज सभी उसकी  ओर क्यों संवेदना  प्रकट  कर रहे हैं |  कुछ तो इतना बोल रहे हैं की उन्हें सनातन धर्म में वापसी करनी चाहिए | खैर वे सनातन धर्म में वापसी करें या ना करें  यह उनकी  मर्जी है  इस मामले में हमें कुछ नहीं  बोलना चाहिए | पहले हम जायरा वासिम के बारे में बात करें ये कौन है फिर  दंगल की जायरा वासिम की बात करेंगे |

जायरा वासिम कश्मीरी मुस्लिम लड़की है  जिसकी  उम्र १६ साल की है ऐसा बतलाया जा रहा है मीडिया में |  यह फेसबुक पर बहुत ही बहुत ही जयादा इस्तेमाल करती थी  हो सकता है अब भी करती हो | यह जायरा वासिम फेसबुक पर  रास्त्रगान को नहीं गाने वाली  कई पोस्ट कर चुकी हैं ऐसा सोशल मीडिया में बाते होती रही है | जायरा वासिम  फेसबुक  पर अलगाववादी की कई बार  पोस्ट की तहत  समर्थन कर चुकी  हैं |  जो रास्ट्रगान का तिरस्कार करे  उसे देश द्रोही  ना बोला जाए ? और जब जायरा वासिम  जैसे जो राष्ट्रगान का  विरोध किया है  उसका हम समर्थन कर रहे हैं | राष्ट्रगान का  विरोध करना मतलब देशद्रोही  होना  उस हिसाब से  जायरा वासिम भी देशद्रोही न हुयी  ? वैसे आमिर खान  सलमान खान शारुखखान  इत्यादि  भी  देशद्रोही का  समर्थन करते हैं  पाकिस्तानी का समर्थन  करते हैं  फिर इन्हें देशद्रोही  बोलना कुछ गलत  नहीं होगा ?

 

अब बात करते हैं दंगल की जयरा वासिम की  | क्यों आजकल वे मीडिया में प्रसिद्ध हो  रहे हैं | आपको पहले ही बतलाया  की जयरा  वासिम  दंगल में काम कर चुकी हैं और वे  काश्मीरी  हैं | फिल्म दंगल में काम करने के कारण उसमे  नाचने के कारण आज काश्मीरी अलगाववादी  कई बार  धमकी दे रही हैं गाली दे रही हैं | कश्मीरी अलगाववादी  आज जयरा वासिम को  इस कारण धमकी गाली दे रही हैं क्यूंकि उन्होंने बुरखा क्यों नहीं पहना और क्यों दंगल में काम किया  नाच गान  किया | जबकि खुद जयरा  वासिम अलगाववादी  का समर्थन करनेवाली है | आज इस्लाम के नजर में बुरखा पहनना चाहिए जो नहीं किया इस कारण  उसे आज धमकी  मिल रही है | आज इस्लाम  में अब भी औरत की बुरी हालत है यदि वे  बुरखा ना पहने तो यह प्रमाण  के तौर पर जयरा वासिम है जिसे धमकी दी गयी है | इस्लाम में अब भी औरत की हालत बहुत ख़राब है  यह जयरा वासिम की हालत  पर मालुम चल जाता है |

सत्मेव जयते  इत्यादि में बहुत  खुद को समाजसेवक  बोलनेवाले   क्यों नहीं जायरा वासिम की मदद  करने को अग्रसर  हो रहा है  जो की उसी की फिल्म का कलाकार  थी | आज किरण राव को क्यों कुछ दर्द  नजर  नहीं आ रहा | अखलाख  के समय  पुरस्कार  वापसी करने वाले आज क्यों मौन हैं  ?  आज देश में  उन्हें बुरा नजर नहीं  आ रहा क्या ? आज सारे  सेक्युलर चुप क्यों हैं ?  पश्चिम बंगाल में दंगा हुवा क्यों सलमान  आमिर इत्यादि चुप हैं  | हमारे देश के लोग बस जब मुस्लिम पर कुछ  होता है तो तो पूरा देश में मीडिया हंगामा करने लगती हैं और जब हिन्दू पर होते हैं तब चुप क्यों हो जाते हैं सभी  नेता  अभिनेता  ?  अब क्या देश में असहिस्नुता  नहीं हो रही ? मुस्लिम  मुस्लिम को ही सताता है फिर देश में असहिस्नुता  नजर नहीं आता | मुस्लिम हिन्दू पर  मार पिट करे तब नजर नहीं आता है  असहिस्नुता | जब कभी हिन्दू  मुस्लिम पर करे तब असहिस्नुता नजर आता  है |  यह कैसी  दोहरी मानसिकता है क्या  लोगो को यह समझ  नहीं आता ? आज सलमान  सहरुख  आमिर किरण राव  इत्यादि को असहिस्नुता नजर नहीं आता जाब धोलागढ़  में हवा था | हम इसके बात खतना दिवस  १  जनुवरी का  जश्न  मना रहे थे |

आज पूरा देश जयरा  वासिम की ओर सांत्वना दे रहा है जबकि  वे खुद अलगाववादी  थे | राष्ट्रगान  का तिरस्कार  करनेवाली थी |  फिर भी पूरा देश आज जयरा वासिम के साथ है | उसकी समर्थन में सब आगे  आ रहे हैं | बोल रहे हैं  उनके साथ बहुत  गलत कर रहे  हैं |  बिना जानकारी हुए सभी जायरा वासिम की समर्थन कर रहे हैं |  अब भी आप चाहे  तो समर्थन करें जयरा  वासिम की | मर्जी आपकी विचार आपका |

धन्यवाद |

 

 

 

शैतान रात में मोमिनों के नाक में ठहरता है!

इस्लाम में वैज्ञानिकी तथ्यों की कोई कमी नहीं। इसके एक नहीं सहस्त्रों प्रमाण हैं। एक उदाहरण–

सही बुखारी, जिल्द ४, किताब ५४, हदीस ५१६-

अबु हुरैरा से रिवायत है कि मोहम्मद साहब आप फरमाते हैं, “यदि तुम में से कोई नींद से उठता है और मुँह(चेहरा) धोता है, तो उसे अपनी नाक को पानी में डालकर धोना चाहिए और तीन बार छिड़कना चाहिए क्योंकि शैतान पूरा रात नाक के उपरी हिस्से में ठहरता है।”

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यही बातें सही मुस्लिम, किताब २, जिल्द ४६२ में भी है।

वाह जी वाह! क्या बात है? चलो कुछ प्रश्नों का उत्तर दे दो जी।

१. ये शैतान रात में नाक में क्यों आ जाता है? क्या उसे रात में डर लगता है?
२. शैतान दिन में कहाँ चला जाता है? क्या खाता-पीता है?
३. और ये शैतान नाक में घुस कैसे जाता है? घुस कर करता क्या है?
४. शैतानों की संख्या कितनी है? यदि उसकी संख्या बढ़ती-घटती है तो कैसे?
५. इतने सारे शैतानों को पैदा करता कौन है और क्यों?
६. शैतान इतना छोटा है या अपने हाइट को घटा-बढ़ा सकता है?
७. शैतान यदि नाक में घुस जाता है तो वो उस मोमिन को बहका नहीं देता होगा? जो बहक गया वो काफिर हुआ न! अर्थात् रात में सभी सोये हुए मोमिन काफिर हुए? तो जो मोमिन जगे होते होंगे रात में उन्हें इन सोये हुओं का जिहाद कर देना चाहिए?

मुफ्त का सुझाव : यदि शैतान नाक में घुस आता है तो काबे के पत्थर पर क्यों मारते हो? अपने नाक पर ही पत्थर मारो। इससे शैतान मर जाएगा।

इस्लाम समीक्षा : जहाँ शैतान करता है कानों में पेशाब

सूर्योदय के बाद उठने का कारण संभवतः रात्रि में देर से सोना या अधिक थकान हो सकता है। अपितु इस्लाम का विज्ञान तो कुछ और ही कहता है। आइये देखते हैं।

सही बुखारी, जिल्द२, किताब २१, हदीस २४५–

अब्दुल्लाह से रिवायत है कि एक बार मुहम्मद साहब को बताया गया कि एक व्यक्ति सुबह तक अर्थात् सूर्योदय के बाद तक सोया रहा और नमाज के लिए नहीं उठा। मुहम्मद साहब ने कहा कि शैतान ने उसके कानों में पेशाब कर दिया था

वाह जी वाह! क्या विज्ञान है अल्लाह तआला का?
वर्तमान युग में अनेकों व्यक्ति चाहे वो मुस्लिम हैं या मुशरिक हैं, सूर्योदय के पश्चात् निद्रा त्यागने के अभ्यस्त हैं। लेकिन आज तक किसी ने ऐसी शिकायत नहीं की और न ही किसी की शैतान के मूत्र त्यागने के कारण निद्रा ही टूटी है।

इसपर कुछ प्रश्नों को उत्तर भी दे दीजिए-

१. ये शैतान कानों में पेशाब क्यों करता है?

२. क्या ये वही शैतान है जो रात भर नाक में रहता है(पिछले पोस्ट को देखिए)?

३. शैतान पेशाब कब करता है? ठीक सूर्योदय होने के बाद क्या? उसे ऐसे ऐक्युरेट टाइमिंग का पता कैसे चलता है?

४. यदि शैतान कानों में पेशाब करता है तो वो बदबू नहीं देता होगा?

५. कानों में प्रायः पेशाब होने के कारण कान खराब नहीं होते होंगे?

६. कानों के eustechean tube का लिंक सीधे pharynx से होता है। अर्थात् शैतान का पेशाब मुँह में भी चला जाता होगा जो पेट में ही अंततः जाता होगा न? तब भी शैतान का पेशाब हलाल हुआ या हराम?

७. सूर्योदय के बाद उठने पर मोमिनों के बिस्तर या तकया भीगता नहीं है?

मूत्र विसर्जन करते समय यदि मोमिन करवट बदल लेवे तो पेशाब कहाँ जाता होगा?

एक मुफ्त का सुझाव : कानों के लिए डायपर्स, पैंपर्स आदि का उपयोग करें और वैज्ञानिक इसके उपयोग को सरल करें।

यदि किसी भी व्यक्ति से, जिसने सूर्योंदय के बाद निद्रा त्याग किया है, से कहा जाये कि शैतान ने आपके कान में मूत्र त्याग किया है तो वह कहने वाले को मानसिक रोगी ही समझेगा। ऐसे में यह मौलानाओं का दायित्व्य बनता है कि वो इस हदीस की वैज्ञानिकता को सिद्ध करें जिससे सभी को इस हदीस की सत्यता का ज्ञान हो सके।

कुर्बानी कुरान के विरुद्ध?

कुर्बानी कुरान के विरुद्ध?

(इस्लाम के मतावलबी कुर्बानी करने के लिए प्रायः बड़े आग्रही एवं उत्साही बने रहते हैं। इसके लिए उनका दावा रहता है कि पशु की कुर्बानी करना उनका धार्मिक कर्त्तव्य है और इसके लिए उनकी धर्मपुस्तक कुरान शरीफ में आदेश है। हम श्री एस.पी. शुक्ला, विद्वान् मुंसिफ मजिस्ट्रेट लखनऊ द्वारा दिया गया एक फैसला  पाठकों के लाभार्थ यहाँ दे रहे हैं, जिसमें यह कहा गया है कि ‘‘गाय, बैल, भैंस आदि जानवरों की कुर्बानी धार्मिक दृष्टि से अनिवार्य नहीं।’’ इस पूरे वाद का विवरण पुस्तिका के रूप में वर्ष 1983 में नगर आर्य समाज, गंगा प्रसाद रोड (रकाबगंज) लखनऊ द्वारा प्रकाशित किया गया था। विद्वान् मुंसिफ मजिस्ट्रेट द्वारा घोषित निर्णय सार्वजनिक महत्त्व का है-एक तर्कपूर्ण मीमांसा, एक विधि विशेषज्ञ द्वारा की गयी विवेचना से सभी को अवगत होना चाहिए-एतदर्थ इस निर्णय का ज्यों का त्यों प्रकाशन बिना किसी टिप्पणी के आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत है। -समपादक)

पिछले अंक का शेष भाग…..

जहाँ तक भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25-26 का प्रश्न है उनमें प्रारमभ में ही ‘‘स्ह्वड्ढद्भद्गष्ह्ल ह्लश श्चह्वड्ढद्यद्बष् शह्म्स्रद्गह्म् द्वशह्म्ड्डद्यद्बह्लब् × द्धद्गड्डद्यह्लद्ध’’ शबद जुड़े हुए हैं, जो इस बात का प्रतीक हैं कि धार्मिक कृत्य कोई भी पबलिक आर्डर, नैतिकता एवं स्वास्थ्य के विपरीत नहीं किया जायेगा। उदाहरण के लिए हिन्दू धर्म भी सती प्रथा अथवा आत्मदाह किसी पाप के प्रायश्चित करने के प्रकार बताये गये हैं, परन्तु चूँकि वह उपरोक्त तीन शबदों के प्रतिकूल होने के कारण न्यायालय उन्हें इजाजत नहीं दे सकती।

इस बात को भी स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है कि दीवानी अधिकार (सिविल राइट) यदि मौलिक अधिकारों के समक्ष चुनौती उत्पन्न करते हैं तो मौलिक अधिकारों को वरीयता दी जायेगी और दीवानी अधिकार उस हद तक संशोधित एवं निरस्त समझे जायेंगे। यदि वादीगण को प्रतिवादीगण के विरुद्ध केवल दीवानी अधिकार ही प्रदत्त हैं, जबकि भैसें की कुर्बानी करना प्रतिवादीगण का मौलिक अधिकार है, तो निश्चय ही वह प्रतिवादीगण का मौलिक अधिकार माना जायेगा और वादीगण के दीवानी अधिकार निरस्त समझे जायेंगे। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने दुर्गा कमेटी अजमेर आदि बनाम सैयद हुसैन अली आदि ए.आइ.आर. 1964 पेज 1402 के अनुच्छेद 33 में यह स्पष्ट किया है कि बड़ी सफलतापूर्वक यह ध्यान देने योग्य है कि प्रचलित धर्म की रीति धर्म का आवश्यक एवं अभिन्न अंग है अथवा वह चली रीति धर्म का अभिन्न एवं आवश्यक अंग नहीं है और इस तथ्य को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 26 के आवरण में दिखाना होगा। उसी प्रकार प्रचलित धर्म रीति केवल अन्धविश्वास है अथवा अनावश्यक एवं स्वयं में धर्म का अंग न हो,    जब तक धार्मिक प्रचलित रीति आवश्यक एवं अभिन्न धर्म का अंग न हो। अनुच्छेद 26 के तहत सुरक्षा प्रदान नहीं की जा सकती तो उसका बड़ी सावधानीपूर्वक निरीक्षण करना होगा। दूसरे शबदों में संवैधानिक सुरक्षा उन्हीं धार्मिक रीतियों को देता है जो धर्म का आवश्यक एवं अभिन्न अंग हैं। पाक कुरान शरीफ की सन्दर्भित आयतों को देखकर एवं विद्वान् अधिवक्तागण के द्वारा प्रस्तुत किये गये तर्कों का सिंहावलोकन कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि भैंस-भैसे की कुर्बानी एक अन्ध विश्वास की देन है। पाक कुरान शरीफ अथवा इस्लाम का आदेश न होने के कारण इस्लाम धर्म का आवश्यक व अभिन्न अंग नहीं है। इस्लाम धर्म में बहुतेरे पैगबर, सिद्धहस्त फकीर एवं महान् मुसलमान आत्माओं को जन्म दिया है, जिन्होंने कोई कुर्बानी नहीं दी। इसका यह मतलब नहीं हुआ कि कुर्बानी के बिना बहिस्त प्राप्त नहीं हो सकता। वर्तमान वाद में प्रतिवादीगण भैंसे की कुर्बानी को इस्लाम का आवश्यक अंग सिद्ध करने में सर्वथा असमर्थ रहे हैं।

यहाँ पर मैं यहा भी कहना उचित समझता हूँ कि विभिन्न धर्मों के लोग महिला मऊ गाँव में रहते हैं, जहाँ अब तक भैंस-भैंसे की कुर्बानी नहीं हुई और यदि वे इसे बुरा मानते हैं और अहिंसा में विश्वास करते हैं, तो उनकी धार्मिक भावनाओं को भैंसे की कुर्बानी की इजाजत देकर ठेस पहुँचाना कहाँ तक उचित होगा, जबकि वे इतने सहिष्णु हो चुके हैं कि बकरे, भेड़, भेड़ा की कुर्बानी करने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं है।

मेरे समक्ष यह तर्क दिया गया है कि एक बड़े जानवर में सात व्यक्ति शरीक हो सकते हैं, इसलिये भैंस-भैंसे की कुर्बानी एक गरीब व्यक्ति के लिये लाजमी है, जबकि वह व्यक्ति इतना गरीब है कि एक बकरी खरीद कर कुर्बानी नहीं दे सकता तो क्या वह पबलिक आर्डर, नैतिकता की सुरक्षा, मलमूत्र, रक्त आदि विसर्जित करके ठीक से निर्वसन कर सकेंगे, इसमें सन्देह है और निश्चय ही गन्दगी को बढ़ावा मिलेगा। सरकार ने इसलिए बड़े जानवर को काटने के लिए बूचड़खानों का प्रबन्ध किया है।

यदि पाक कुरान शरीफ की गहराइयों में झाँका जाए और बारीकियों को परखा जाए तो व्यक्ति को काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह एवं अहं की कुर्बानी करनी चाहिये न कि बेचारे चौपायों की, जिन्हें चाँदी के कुछ सिक्कों में खरीदा जा सकता है। मनुष्य को इन्द्रियजित, मनोवृत्तिजित् होना चाहिये। किसी भी धर्म के आधारभूत सिद्धान्त हिंसा में विश्वास नहीं करते और मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि पाक कुरान शरीफ में भैंस-भैंसे की कुर्बानी का सन्दर्भ कहीं पर नहीं आया है अन्यथा मेरे समक्ष इस प्रकरण एवं तथ्यों पर हुई गवाही में अवश्य आता। इस साक्षी को अपने उलेमाओं से भी मदद लेने का अवसर था, परन्तु फिर भी यह साक्षी मेरे समक्ष इस प्रकार का कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका, जिससे अनुमान लगाया जायेगा कि पाक कुरान शरीफ अथवा इस्लाम में कुर्बानी करना फर्ज नहीं है और कुर्बानी भैंस या भैंसे की नहीं हो सकती।

साक्षी सं. 1 हाजी सैयद अली ने और साथ ही साक्षी सं. 5 मो. रफीकुद्दीन ने यह स्वीकार किया है कि कुर्बानी के अलावा भी अन्य तरीकों से भी बहिस्त प्राप्त हो सकती है, गरीब आदमी  इबादत के द्वारा बहिस्त प्राप्त कर सकता है। यदि कुर्बानी द्वारा ही एक मात्र बहिस्त प्राप्त किया गया होता तो निश्चय ही इस्लाम धर्म के सभी राजा-महाराजाओं सेठ-साहूकारों ने बहिस्त प्राप्त कर लिया होता और गरीब फकीर उधर लालयित होकर देखते रहते, जबकि सत्यता इसके प्रतिकूल है।

इसके विपरीत वादीगण की ओर से श्रीराम आर्य को परीक्षित किया गया, जिन्होंने करीब 80 किताबें धार्मिक विचारों पर लिखी हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि पाक कुरान शरीफ से समबन्धित आठ-दस किताबें उन्होंने लिखी हैं। कुरान शरीफ की छानबीन, कुरान शरीफ का प्रकाश व पुनर्जन्म, कुरान शरीफ में बुद्धि विज्ञान आदि कई किताबें लिखीं। इस साक्षी ने अपने मुखय कथन में स्पष्ट स्वीकार किया है कि केवल एक ही आदेश हज के समय ऊँट की कुर्बानी का है अन्य किसी जानवर की कुर्बानी का नहीं है। किसी दूसरे जानवर यानी भैंसे की कुर्बानी का आदेश पाक कुरान शरीफ में नहीं है। जो व्यक्ति भैंस-भैंसे को काटता है, उसकी कुर्बानी इस्लाम के खिलाफ है। इस साक्षी ने अपने मुखय कथन में यहा भी कहा कि उसने धार्मिक किताबें हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं में प्रकाशित की हैं। पृच्छा में इस साक्षी ने यह भी स्वीकार किया कि पाक कुरान शरीफ में कुर्बानी का जिक्र सूरे हज्ज में है, सूरे वक्र में नहीं। सूरे हज्ज में ही केवल कुर्बानी का आदेश है, अन्य कहीं नहीं। पारा बिना किताब देखे नहीं बता सकता। इस साक्षी ने यहा भी स्पष्ट इन्कार किया कि उसने कुरान शरीफ अथवा मुस्लिम कल्चर का पूर्ण अध्ययन नहीं किया है। इस साक्षी ने स्पष्ट स्वीकार किया कि कुरान शरीफ अरबी में उसने नहीं पढ़ा है, परन्तु कुरान शरीफ उसने कई बार पढ़ा। उसका ट्रान्सलेशन अहमद वसीर, काबिल तवीर, काबिल मौलवी लखनऊ, शाह अबदुल कादिर के तर्जुमें पढ़े हैं। इस साक्षी ने भी स्वीकार किया कि ये लोग आलिम हैं या नहीं, परन्तु इनका अनुवाद मान्य है। मैं इस स्वतन्त्र साक्षी के साक्ष्य को ग्राह्य करने का कोई औचित्य नहीं समझता, जबकि इस साक्षी की साक्ष्य का संपुष्टन सफाई साक्षी  नं. 5 मो. रफीकुद्दीन ने भी किया है और कुरान शरीफ में कुर्बानी फर्ज है, नहीं ढूँढ सका और अन्त में उसने विवश होकर यह स्वीकार किया कि हिंसा करना कुरान शरीफ में पाप है और सभी वस्तुएँ अल्लाह की बनाई हुई हैं, किसी को चोट पहुँचाना पाप है। ऐसी दशा में निःसंकोच कहा जा सकता है कि जब प्रतिवादीगण भैंस-भैंसे की बलि इस्लाम में सिद्ध नहीं कर पाये हैं तो उन्हें अनुच्छेद 25 व 26 भारतीय संविधान का लाभ नहीं मिल सकता और वे किस हद तक प्रतिवाद पत्र की धारा 10में वर्णित आधार पर लाभ पा सकते हैं, उत्तर नकारात्मक होगा।

उपरोक्त व्याखया के अनुसार विवाद्यक नं. 2,3 व 5 वादीगण के अनुकूल एवं प्रतिवादी गण के प्रतिकूल निर्णीत किये गये।

विवाद्यक सं. 7

इस विवाद्यक को सिद्ध करने का भार वादीगण पर है। इस समबन्ध में वादी साक्षी नं. 2 महन्त विद्याधर दास ने अपने मुखय कथन में अभिकथित किया कि कुर्बानी का प्रभाव जनता पर पड़ेगा। भैसों की कुर्बानी से हिन्दुओं में उत्तेजना फैलेगी, सामप्रदायिकता बढ़ेगी। इस गाँव में कोई पशुवधशाला नहीं है और न ही पशुवधशाला का अलग स्थान है। इस गाँव में कोई नाली आदि नहीं है जिससे भैंसों का खून आदि रास्ते में बहेगा। इस साक्षी से पृच्छा में जन स्वास्थ्य के बारे में एक भी शबद नहीं पूछा गया, केवल अन्तिम सुझाव दिया गया कि घर के अन्दर कुर्बानी करने से खुन आदि बहने का प्रश्न नहीं उठता, जिसे इस साक्षी ने इन्कार किया। इसके अतिरिक्त प्रतिवादी साक्षी नं. 6 डाक्टर मेहरोत्रा ने प्रथम प्रदर्शक-6 सिद्ध किया और बताया कि मेरे पूर्व डाक्टर श्री शर्मा ने यह प्रपत्र जारी किया था। पृच्छा में इस साक्षी ने स्वीकार किया कि जानवरों की बलि देने से बावत प्रमाणपत्र जारी करने के लिए पशु चिकित्सक अधिकृत नहीं है और न ही पशु चिकित्सक पशुबलि के लिए कोई आदेश अथवा स्वीकृति देना भी निश्चित नियमों के तहत है, जिसमें पशुओं का वध बूचड़खाना में ही हो सकता है, खुले स्थान में नहीं। खुले स्थान में पशुवध करना प्रतिबन्धित है। विवादित गाँव सहिलामऊ में कोई बूचड़खाना नहीं है। बड़े जानवरों को बूचड़खाने के अतिरिक्त अन्य किसी जगह पर काटना प्रतिबन्धित है। ऐसी दशा में यदि खुले स्थान में जानवर काटा जाता है तो निश्चय ही सामप्रदायिकता भड़केगी एवं समाज में घृणा फैलेगी, उनके खून के बहाव एवं हाड़ आदि की दुर्गंध से बीमारियाँ भी फैलने का अंदेशा रहेगा। यही नहीं, इस तथ्य को ध्यान में रखकर ही समभवतः प्रदर्श क-1 आदेश परगनाधिकारी कुमारी लोरेशन, दिगोजा एवं क्षेत्राधिकारी सुभाष जोशी ने जारी किया है।

उपरोक्त व्याखया के आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि विवाद्यक नं.-7 वादीगण के अनुकूल एवं प्रतिवादीगण के प्रतिकूल निर्णीत किया जाता है।

शेष भाग अगले अंक में……

 

कुर्बानी कुरान के विरुद्ध?

कुर्बानी कुरान के विरुद्ध?

(इस्लाम के मतावलम्बी कुर्बानी करने के लिए प्रायः बड़े आग्रही एवं उत्साही बने रहते हैं। इसके लिए उनका दावा रहता है कि पशु की कुर्बानी करना उनका धार्मिक कर्त्तव्य है और इसके लिए उनकी धर्मपुस्तक कुरान शरीफ में आदेश है। हम श्री एस.पी. शुक्ला, विद्वान् मुंसिफ मजिस्ट्रेट लखनऊ द्वारा दिया गया एक फैसला  पाठकों के लाभार्थ यहाँ दे रहे हैं, जिसमें यह कहा गया है कि ‘‘गाय, बैल, भैंस आदि जानवरों की कुर्बानी धार्मिक दृष्टि से अनिवार्य नहीं।’’ इस पूरे वाद का विवरण पुस्तिका के रूप में वर्ष १९८३ में नगर आर्य समाज, गंगा प्रसाद रोड (रकाबगंज) लखनऊ द्वारा प्रकाशित किया गया था। विद्वान् मुंसिफ मजिस्ट्रेट द्वारा घोषित निर्णय सार्वजनिक महत्त्व का है-एक तर्कपूर्ण मीमांसा, एक विधि विशेषज्ञ द्वारा की गयी विवेचना से सभी को अवगत होना चाहिए-एतदर्थ इस निर्णय का ज्यों का त्यों प्रकाशन बिना किसी टिप्पणी के आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत है। -सम्पादक)

कुर्बानी कुरान के विरुद्ध?

पिछले अंक का शेष भाग

विवाद्यक नं. १,२,३ व ५

विवाद्यक नं. १ व २ को सिद्ध करने का भार वादीगण पर है। विवाद्यक नं. ३ व ५ को सिद्ध करने का भार प्रतिवादीगण पर है। यह विवाद्यक एक दूसरे पर आधारित है। अतः इनकी व्याख्या अलग-अलग कर पाना सम्भव नहीं है। अतः न्याय की सुगमता के लिए ये विवाद्यक एक साथ निर्णीत किया जाना अधिक उपयुक्त एवं उचित होगा।

विवाद्यक नं. १ के सम्बन्ध में वादी साक्षी नं.-१ राम आसरे, वादी साक्षी सं. २ महन्त विद्याधर दास को परीक्षित किया गया। इन दोनों साक्षीगण ने शपथ पर न्यायालय में बयान दिया और कहा कि ग्राम सहिलामऊ में भैंस-भैंसा की कुर्बानी बकरीद के अवसर पर नहीं होती रही है, केवल बकरे की कुर्बानी मुसलमान भाई करते थे, जिसे कभी भी हिन्दुओं ने नहीं रोका और जिससे धार्मिक सद्भाव, सहिष्णुता, सद्व्यवहार, सदाचार एवं सहयोग का वातावरण बना हुआ था, परन्तु श्री मोहम्मद रफीकुद्दीन के गाँव में आने पर भैसों की कुर्बानी करवाने से गाँव में साम्प्रदायिक तनाव, विद्वेष व घृणा का वातावरण पनप गया। धर्म की आड़ लेकर रफीकुद्दीन भोलीभाली निरीह जनता को आपस में लड़वाना चाहते हैं। इन साक्षीगण के अनुसार ग्राम सहिलामऊ में कभी भी भैंसे की कुर्बानी नहीं दी गई। पृच्छा में भी इन साक्षियों से कोई विशेष बात प्रतिवादीगण के विद्वान् अधिवक्ता नहीं निकाल पाये हैं, जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि ग्राम सहिलामऊ में इस घटना के पहले भी भैंस-भैसों की कुर्बानी हुआ करती थी।

इसके विपरीत प्रतिवादीगण की ओर से प्रतिवादी साक्षी नं. १ सैयदअली, दीन मोहम्मद, फारुक को परीक्षित किया गया, जिन्होंने कहा कि इस गाँव में आजादी के पहले गाय की भी कुर्बानी होती थी। भेड़, भेड़ा, बकरी, बकरा, गाय-बैल, ऊँट-ऊँटनी की कुर्बानी का मजहबी प्राविधान इन लोगों ने बताया और कहा कि इस गाँव में भैंसे की कुर्बानी पहले होती थी, जिससे कोई घृणा का वातावरण नहीं बना। वादीगण धार्मिक आड़ में प्रतिवादीगण की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना चाहते हैं। इन साक्षीगण की साक्ष्य को पृच्छा की कसौटी पर कसा गया, तो सफाई साक्षी नं. १ सैयद अली ने स्वीकार किया और यह भी कहा कि हिन्दुओं ने मुर्गे की कुर्बानी पर कोई एतराज नहीं किया और इस साक्षी ने यह स्वीकार किया कि सन् ६४-६५ में जब राजबहादुर थाना मलिहाबाद में दरोगा थे, तब कुर्बानी की बात उठी थी, लेकिन सुलह हो गई थी। इस गाँव में कोई भी बूचड़खाना नहीं है। इससे यह स्पष्ट होता है यदि किसी बड़े जानवर की कुर्बानी की जायेगी तो दूसरे लोगों को यानि हिन्दुओं को भी पता चलेगा, जिससे बड़ा बखेड़ा होगा जैसा कि यह प्रतिवादी सन् ६४-६५ की वारदात स्वीकार करता है। साक्षी नं. ३ मोहम्मद फारुख ने भी पृच्छा में स्वीकार किया है कि सन् १९७९ में १७ बकरों की कुर्बानी दी गई, जिसमें से १४ बकरों को कुर्बानी न्यायालय से मिले पैसे से हुई थी और तीन बकरों का इन्तजाम उन्होंने स्वयं किया था। इस साक्षी एवं सैयद अली ने भी पृच्छा में स्वीकार किया है कि खून हड्डियाँ एवं बाल आदि को गड़वाने वाली बात जवाब दावा में नहीं लिखी गयी है। जिससे यह स्पष्ट होता है कि ये बातें इन साक्षियों ने सोच विचारकर न्यायालय में बताई हैं और न ही इन साक्षियों ने कुर्बानी बन्द करने की बात कही है, बल्कि पृच्छा में यह बात बताई जो कि विचारकर कहना प्रतीत होती है। ऐसी दशा में यदि यह कुर्बानी स्वतन्त्रतापूर्वक होती है, तो निश्चय ही हिन्दुओं को इस बात का पता लगा होता और तनाव बढ़ता।

यहाँ पर यह भी कहना अनुचित न होगा कि सफाई साक्षी सं. ५ मो. रफीकुद्दीन जो सम्पूर्ण कलह की जड़ कहे जाते हैं और ग्राम सहिलामऊ में मस्जिद में नमाज पढ़ाते हैं तथा गाँव के मुसलमानों के धार्मिक गुरु हैं, उन्होंने पृच्छा में इस बात को स्वीकार किया कि भैंस जानवर जिवा करते हैं, वह उसका कोई रिकार्ड नहीं रखते हैं। हाजी सैयद अली मस्जिद में मुतबल्ली हैं और उनके पास कुर्बानी का पूरा रिकार्ड रहता है, उसमें कुर्बानी के जानवरों की जाति लिखी जाती है। और कुर्बानी किस-किस ने कराया उसका नाम लिखा जाता है। हाजी सैयद अली इस मुकद्दमे में प्रतिवादी नं. ७ हैं, परन्तु न्यायालय में मेरे समक्ष तथाकथित अभिलेख प्रस्तुत नहीं किया गया, जिसके आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचता कि ग्राम सहिलामऊ में कुर्बानी काफी पुराने समय से चली आ रही है। वह अभिलेख प्रतिवादी नं. ७ के पास है जो महत्त्वपूर्ण अभिलेख है, जिसको प्रस्तुत करने का दायित्व प्रतिवादी नं. ७ पर है। इसको प्रस्तुत न करने से अनुमान प्रतिवादीगण के विरुद्ध लगाया जायेगा। सैयद अली प्रतिवादी नं. ७ प्रतिवादी साक्षी नं. १के रूप में न्यायालय में परीक्षित हुए हैं, इन्होंने उक्त अभिलेखों के बावजूद एक शब्द भी नहीं कहा। इस साक्षी का बयान स्वयं में विरोधाभासी है। उसने अपने मुख्य कथन में यह कहा है कि इस गाँव में आजादी के पहले गाय की बलि होती थी और उसके पहले भैंसे-भैंसों की बलि होती रही है। पृच्छा में यह साक्षी स्वीकार करता है कि उसके मजहब में गाय और भेड़ की कुर्बानी की इजाजत नहीं है। ऐसी दशा में इसका स्वयं का कथन संदेहास्पद है।

उपरोक्त व्याख्या के आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि विवादित घटना से पहले ग्राम सहिलामऊ में भैंसे की कुर्बानी नहीं होती रही थी। विवाद्यक नं १ व २ तदनुसार वादीगण के अनुकूल एवं प्रतिवादी गण के प्रतिकूल निर्णीत किये गये।

विवाद्यक नं. ३ व ५

के बावत उभय पक्ष की ओर से तर्क दिये गये। प्रतिवादीगण ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद २५ व २६ का सहारा लेकर अभिकथित किया कि मुसलमानों को कुर्बानी करने का मौलिक अधिकार प्रदत्त है और उससे उन्हें वंचित नहीं किया जा सकता। यह निःसंदेह सत्य है कि धार्मिक स्वतन्त्रता का प्रावधान भारतीय संविधान में निहित है और धर्म निरपेक्षता इस संविधान की विशेषता है, परन्तु संविधान में मौलिक अधिकारों के तहत किसी विशेष धर्म को विकसित करने, परिपोषित करने व प्रचार करने की सुविधा सरकार द्वारा प्रदत्त नहीं की गयी है, बल्कि उस धर्म के अनुयाइयों को अपने धर्म के विकास करने की सुविधा की स्वतन्त्रता है, परन्तु यह स्वतन्त्रता असीमित, अनियमित नहीं है। धार्मिक स्वतन्त्रता भारतीय संविधान में वहीं तक प्रदत्त है, जहाँ तक दूसरे धर्मवालों की भावनाओं पर कुठाराघात न हो, परन्तु जहाँ जिस धार्मिक भावना द्वारा दूसरे धर्म के लोगों की धार्मिक भावना का कुठाराघात होता है, वह धार्मिक स्वतन्त्रता नहीं दी गयी है।

मैं विद्वान् अधिवक्ता के इस तर्क से पूर्णतः सहमत हूँ कि धार्मिक स्वतन्त्रता का प्राविधान भारतीय संविधान में प्रदत्त है, परन्तु इससे दूसरे के धर्म को आघात पहुँचाने का अधिकार नहीं मिलता है। जहाँ तक कुर्बानी मजहब का अंग है, इस सम्बन्ध में हाजी मो. रफीकुद्दीन को परीक्षित किया गया। वही तथाकथित मुसलमानों के धार्मिक गुरु ग्राम सहिलामऊ में हैं, उनके समक्ष सम्पूर्ण पाक कुरान शरीफ रखी गयी और उनसे कहा गया कि वह न्यायालय को बतायें कि पाक कुरान शरीफ में कुर्बानी का प्राविधान कहाँ पर है और विशेषतः भैंसे की कुर्बानी कहाँ पर दी गई है, परन्तु वह कोई भी ऐसा सन्दर्भ पाक कुरान शरीफ में निकालकर दिखाने में असमर्थ रहे हैं। उन्होंने केवल पाक कुरान शरीफ की कुछ आयतों का सन्दर्भ दिया। उनके अनुसार केवल पाक कुरान शरीफ सूरे हज्ज के पारा-१७ रूकू  १२ के अनुसार कुर्बानी फर्ज है, लेकिन जब उन्हें कुरान शरीफ दी गई तो वह दिखा नहीं सके, बल्कि सूरे हज्ज की आयत ३६ में यह कहा कि अल्लाह के नजदीक न इसका गोश्त पहुँचता है और न ही खाल, लेकिन नीयत पहुँचती है। अल्लाह ताला नीयत को देखता है, जानवर को नहीं देखता। सूरे हज्जरूक  ५ आयत ३ में यह लिखा है कि खुदा तक न तो कुर्बानी का मांस पहुँचता है और न ही खून, बल्कि उनके पास तुम्हारी श्रद्धा भक्ति पहुँचती है, यह कहना साक्षी ने गलत बताया। कुर्बानी की दुआ इस साक्षी ने सूरे इनाम रूकू १४ पारा ७ आयत ७६ बताया और फिर बाद में ७८ कहा, परन्तु जब यह पूछा गया कि कुर्बानी फर्ज है, कहाँ पर लिखा है, तो यह बताने में साक्षी असमर्थ रहा। इस साक्षी को पाक कुरान शरीफ के प्रकाशक भुवन वाणी का शास्त्रीय अरबी पद्धति पर हिन्दी में संस्कारण दिखाया गया तो, उसने कहा कि इस ग्रन्थ के पेज नं. ५६० में सूरे हज्ज १७ वें पारे में ११ वें रूकू  में ३३ वीं आयत में यह लिखा है कि ‘‘हमने हर जमात के लिए कुर्बानी के तरीके मुकर्रर किये हैं, जो हमने उनको चौपाये जानवरों में से अनाम किये हैं। कुर्बानी करते हुए अल्लाह का नाम लें।’’ इस साक्षी ने यह स्वीकार किया कि इसमें कुर्बानी फर्ज है, इसका जिक्र नहीं है। इस साक्षी ने अन्त में विवश होकर यह स्वीकार कर लिया कि हाफिज का मतलब पाक कुरान शरीफ हिफ्ज होने से अर्थात् रटे होने से है। पाक कुरान शरीफ की आयतों का अर्थ जानने से नहीं है। मुझे कुरान शरीफ की आयतों का अर्थ नहीं मालूम। जो कुरान शरीफ की आयतों का अर्थ जानता है, उन्हें उलेमा कहते हैं, वे कुरान शरीफ की बारीकियों को समझा सकते हैं। इसके बावजूद भी प्रतिवादीगण की ओर से कोई भी उलेमा पेश नहीं किया गया, जो न्यायालय को यह बताता कि इस्लाम धर्म में भैंस-भैंसे की कुर्बानी करना कहाँ पर लिखा है और कुर्बानी करना हर इस्लाम के बंदे का फर्ज है। इस व्यक्ति से स्पष्ट प्रश्न पूछा गया कि कुरान शरीफ की किस आयत में कुर्बानी करना फर्ज लिखा है, इस साक्षी ने स्पष्ट स्वीकार किया कि उसे पता नहीं है कि कुरान शरीफ की किस आयत में कुर्बानी फर्ज लिखा है, बल्कि यह फिरंगी महल अथवा नदवे वाले हैं, उसके लोग जो बताते हैं, वह करता हूँ। फिरंगी महल अथवा नदवे का उलेमा अथवा मुल्ला कोई भी मेरे समक्ष परीक्षित नहीं किया गया, जो इस बात को स्पष्ट करता कि इस्लाम मजहब में बकरीद के अवसर पर भैंस-भैंसे की कुर्बानी करना परमावश्यक है।

इस साक्षी ने यह भी स्पष्ट स्वीकार किया है कि कुर्बानी अपनी सबसे अजीज चीज की दी जाती है। उदाहरण के लिए हजरत इब्राहिम ने अपने लड़के की कुर्बानी बकरीद के दिन दी थी, परन्तु जब इब्राहिम ने अपनी आँखों से पट्टी खोली तो दुम्मा बना हुआ निकला। इससे अधिक से अधिक तात्पर्य यह निकाला जा सकता है कि दुम्मा को कुर्बानी करने के लिए इस्लाम में प्राविधान है, परन्तु दुम्मा का तात्पर्य भैंस, गाय से नहीं हो सकता। पारा १७ आयत २६ से ३८ तक ऊँटों की कुर्बानी का प्राविधान सूरे हज्ज में दिया गया है। इसी में आयत ३२ में कहा गया है कि तुम्हें चौपायों से एक खास वक्त तक फायदे हैं, जो तुम सवारी या दूध से उठा सकते हो। फिर उसे पुराने ढाबे काबा तक कुर्बानी के लिए जाना है। आयत २७ में कहा गया है-और लोगों में हज्ज के लिए पुकार दो कि हमारी तरफ दुबले-दुबले ऊँटों पर सवार होकर दूर-दूर की राहों से चलकर आवें। आयत २७ में-अपनी भलाई की जगह के लिए हाजिर है। अल्लाह ने तो मवेशी उन्हें दिये हैं, उन पर जबह (बलिदान) के समय अल्लाह का नाम लें। उनमें से असहायों, दीन-दुखियों और फकीरों को खिलाओ। आयत २८ में चाहिए कि अपना मैल-कुचैल उतार दें और अपनी मन्नतें पूरी करें और इस तबाक की परिक्रमा करें।

यह सत्य है कि पाक कुरान शरीफ में कुर्बानी के लिए चौपायों के लिए कहा गया। पाक कुरान शरीफ में एक स्थान निश्चित कर दिया गया है और वह काबा के सामने पूरब की ओर है। कुर्बानी करने वाले जानवर का सिर काबा की ओर होगा और अल्लाह का नाम लेकर जिबा किया जायेगा। पाक कुरान शरीफ में स्पष्ट कहा गया है कि उन्हीं चौपायों की कुर्बानी दी जायगी, जो आपके प्रयोग के लिए बेकार हो गये हैं अर्थात् दूध नहीं देते हैं और जो बोझ ढोने के लायक नहीं हैं, परन्तु डाक्टर ने इस वाद में स्वयं जानवरों को सर्टीफिकेट दिया और स्वस्थ जानवरों को ही मारने के लिए यह प्रमाणपत्र दिया जाता है। ग्राम सहिलामऊ कभी काबा नहीं बन सकता और इस प्रकार की दी गई कुर्बानी भैंसों आदि की पाक कुरान शरीफ में अंकित हैं, इसमें सन्देह है। पाक कुरान शरीफ का उद्देश्य अनुपयोगी जानवरों की कुर्बानी से है, जिससे लोग उनके माँस आदि से अपना पेट पालन करते हैं, न कि हृष्ट-पुष्ट जानवरों की कुर्बानी करना, जिसके लिए डाक्टरी सर्टीफिकेट की आवश्यकता है।

यहाँ पर यह कहना अनुचित न होगा कि धर्म के आधारभूत सिद्धान्तों को अन्धविश्वास में बदलना कहाँ तक उचित है और अन्धविश्वास को भारतीय संविधान के अनुच्छेद २५ व २६ में प्रश्रय मिलेगा, यह सही नहीं है। हालाँकि उपरोक्त सभी आयतें साक्षी नं. ५ श्री मो. रफीकुद्दीन नहीं कह सके। इसलिए उन्हें इन आयतों का भी लाभ नहीं मिल सकता।

मेरे समक्ष विद्वान् अधिवक्ता प्रतिवादी ने मोहम्मद फारूक बनाम स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश आदि ए.आइ. आर. १९७० सुप्रीम कोर्ट पेज ९३ की नजीर प्रदर्शित की। यह नजीर वर्तमान वाद में लागू नहीं होती है। यह नजीर भारतीय संविधान के अनुच्छेद-१९ (जी) व्यापार करने के सम्बन्ध में है, अतः इसकी व्याख्या करना उचित न होगा।

मेरे समक्ष विद्वान् अधिवक्ता प्रतिवादी ने श्रीमद्पेरारू लाल तीर्थराज रामानुजा जी.एम. स्वामी बनाम स्टेट ऑफ तमिलनाडु ए.आई.आर. १९७२ सुप्रीम कोर्ट पेज १५८६ प्रदर्शित किया, जिसमें सरदार सइदेना तेहर शिक्यूरिटी शाहिद बनाम बाम्बे सरकार ए.आई.आर. सुप्रीम कोई पेज ५८३ पर विश्वास व्यक्त किया गया, जिसके अनुच्छेद ३४ में यह न कहा गया भारतीय संविधान के अनुच्छेद २५ व २६ में संरक्षणता केवल धार्मिक सिद्धान्त अथवा विश्वास को नहीं दी गई है। यह संरक्षणता वहाँ तक बढ़ाई जाती है जहाँ तक धार्मिक अक्षुण्यता प्रतिवादित करने में जो कृत्य किये जाते हैं और जिस प्रकार पूजा अर्चना त्योहारों के रूप में मनाई जाती है, जो धर्म का एक अभिन्न अंग है। दूसरा यह कि यह धर्म का आवश्यक अंग है अथवा धार्मिक अभ्यास है, यह विशेष धर्म के सिद्धान्तों एवं उसके अभ्यासों पर जो उस धर्म के अनुयाइयों द्वारा धर्म का अंग मानकर किया जाता है, पर निर्भर होगा। इस तथ्य को न मानने का कोई प्रश्न नहीं उठता १. यदि भैसों की बलि बिना बकरीद त्योहार मुसलमानों में नहीं मनाया जा सकता, तो निश्चय ही उन्हें भैसें की बलि की इजाजत देनी होगी, परन्तु इस आवश्यक अंग को प्रतिवादीगण सिद्ध करने में असफल रहे हैं। यदि भैंस-भैंसे की बलि विवादित ग्राम में होती रही होती तो निश्चय ही मेरे समक्ष अभिलेख प्रस्तुत किये गये होते, जबकि साक्षी सं. ५ ने स्वीकार किया है कि साक्षी नं. १ जो प्रतिवादी नं. ७ है, मस्जिद के मुतवल्ली होने के कारण इस सम्बन्ध में सभी अभिलेख रखते हैं। इस तथ्य से यह भी स्पष्ट होता है कि उस गाँव में रहने वाले मुसलमान अब तक भैंसे की बलि देकर ही बकरीद मनाते रहे हैं अथवा नहीं। बकरे दुम्मे की कुर्बानी करने के लिए वादीगण को भी कोई आपत्ति नहीं है।

शेष भाग अगले अंक में……

कुरान समीक्षा : सूरज चाँद को नहीं पकड़ सकता है

सूरज चाँद को नहीं पकड़ सकता है

साबित करें कि सूरज चांद एक-दूसरें को पकड़ने के लिए दौड़ लगा रहे हैं?

देखिये कुरान में कहा गया है कि-

लश्शम्सु यम्बगी लगा अन् तुद्रिकल्………..।।

(कुरान मजीद पारा २२ सूरा यासीन रूकू ३ आयत ४०)

न तो सूरज से ही बन पड़ता है चाँद को जा पकड़े और न रात ही दिन से आगे आ सकती है और हर कोई एक-एक घेरे में फिरते हैं।

समीक्षा

सूरज जमीन से नौ करोड़ मील पर है है जब कि चाँद दो लाख छत्तीस हजार मील के फांसले पर है है सूरज अपनी ही कीली पर घूमता है जबकि चाँद जमीन के चारों ओर घूमता हुआ स्वंय भी घुमता है। तो सूरज चांद को नहीं पकड़ सकता यह कहना बड़ी बेतुकी सी बात है कुरान को समझदारी की बात कहनी चाहिये थी।

यदि सूरज और चाँद दोनों एक ही दूरी पर होते और दोनों घूमतें भी होते तब तो यह बात कहना बन भी सकता था। शायद अरबी खुदा को इस मामले की जानकारी नहीं थी।

कुरान समीक्षा : खुदा ने हर बात लिख रखी है।

खुदा ने हर बात लिख रखी है।

खुदा खुद लिखता है या कोई उसने कलर्क या पेशकार इस काम के लिए नियत कर रखा है, हर बात लिखते रहने का उद्देश्य क्या है?

देखिये कुरान में कहा गया है कि-

इन्ना नह्नु नुह्यिल्-मौता व नक्तुबु………….।।

(कुरान मजीद पारा २२ सूरा यासीन रूकू १ आयत १२)

और हमने हर चीज खुली असल किताब यानी लौहे महफूज में लिख रखी है।

समीक्षा

डायरी में जैसे वकील व मुनीम जी हर बात को नोट करके रखते हैं, वैसे ही याद्दाश्त के लिए अरबी खुदा भी अपनी खुली किताब नाम की डायरी में लिख लेता था। वह असल किताब ही सीधी खुदा ने क्यों नहीं भेजी? यह क्या गारन्टी है कि मौजूदा कुरान ही असल किताब की वास्तविक नकल है?