शंका समाधान

(1) शंका :- यह भाव से अभाव तथा अभाव से भाव कैसे हो जाता है?

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- vedic dharm

समाधान :-

जिज्ञासा :- आचार्य जी, ‘‘समाधान – 93’’ में आपने जो दिया है, उसमें थोड़ी-सी शंका शेष रह गई है और वह यह है कि ईश्वर ने इस साकार जगत् की रचना प्रकृति के परमाणुओं से की है। इसका मतलब प्रकृति के परमाणुओं में साकारत्व का गुण है, तभी तो साकार जगत् बन पाया। पंचभौतिक तत्त्व भी प्रकृति के परमाणुओं से ही बने हैं, तो इन परमाणुओं से निराकार पदार्थ कैसे बन जाते हैं और फिर वे निराकार पदार्थ परस्पर मिलते हैं, तो आकार कैसे ग्रहण कर लेते हैं, अर्थात् साकार कैसे बन जाते हैं? यह भाव से अभाव तथा अभाव से भाव कैसे हो जाता है?

निम्न बिन्दुओं पर भी स्थिति स्पष्ट करने का कष्ट करें-

(1) आपने आकाश निराकार बताया है। यह प्रकृति के परमाणुओं से बना है। इसी तरह वायु भी निराकार है, अग्नि जब प्रकट होती तब साकार होती है, अन्यथा निराकार। यह क्यों है?

(2) मेरे विचार से प्रलयकाल में जब प्रकृति अपने विशुद्ध रूप में होती है, तब निराकार ही होती है और ईश्वर तथा जीव निराकार होते ही हैं। फिर निराकार प्रकृति से साकार जगत् कैसे बना?

(3) महर्षि दयानन्द जी ने बताया है कि साकार चीजें असीम नहीं होती, बल्कि जीवात्माएँ भी संया वाली हैं, चाहे वे मनुष्य की गिनती से बाहर हों। ऐसी अवस्था में आकाश या अवकाश रूप आकाश असीम है या ससीम है?

(4) वायु ससीम है या असीम?

(5) क्या ईश्वर के अतिरिक्त अन्य भी कोई तत्त्व ऐसा है, जो असीम हो?

कृपया, समाधान करने का कष्ट करें।

– इन्द्रसिंह पूर्व एस.डी.एम. 29- नई अनाज मण्डी, भिवानी (हरियाणा) चलभाषः – 9416057813

समाधानः परमेश्वर ने यह संसार अपने सामर्थ्य से मूल प्रकृति को लेकर बनाया है। संसार के बनाने में परमेश्वर निमित्त कारण और प्रकृति उपादान कारण है। स्थूल जगत् के बनने की प्रक्रिया महर्षि कपिल ने अपने सांय दर्शन में दी है-

सत्त्वरजतमसां सायावस्था प्रकृतिः प्रकृतेर्महान्, महतोऽहङ्कारोऽहङ्कारात् पञ्चतन्मात्राण्युभयमिद्रियं पञ्चतन्मात्रेयः स्थूलभूतानि……।।  सां.- 1.61

सत्त्व, रज, तम- इन तीन वस्तुओं से मिलकरजो एक संघात है, उसका नाम प्रकृति है। उस प्रकृति से महतत्त्व बुद्धि, उस महतत्त्व से अहंकार, अहंकार से पाँच तन्मात्रा अर्थात् सूक्ष्म भूत- रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द , दस इन्द्रियाँ तथा ग्यारहवाँ मन, पाँच तन्मात्राओं से पाँच स्थूल भूत अर्थात् पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश और इन पाँच महाभूतों से यह दृश्य जगत्।

प्रकृति से जो कुछ भी उत्पन्न होता है, वह आकार वाला होता है, क्योंकि प्रकृति स्वयं आकार वाली है, जो गुण कारण में नहीं होते, वे कार्य में भी नहीं होते। यदि ऐसा होने लग जाये, तो अभाव से भाव की उत्पत्ति माननी पड़ेगी, जो द्रव्यात्मक पदार्थों में कभी घट ही नहीं सकता। महर्षि दयानन्द ने भी प्रकृति को आकार वाला माना है। महर्षि लिखते हैं-‘‘…….वह प्रकृति और परमाणु जगत् का उपादान कारण है और वे सर्वथा निराकार नहीं, किन्तु परमेश्वर से स्थूल और अन्य कार्य से सूक्ष्म आकार रखते हैं।’’ – स. प्र. स. 8

आपने जो कहा कि ‘‘मेरे विचार से प्रलयकाल में जब प्रकृति अपने विशुद्ध रूप में होती है, तब निराकार ही होती है।’’ यह विचार ऋषि के विचार से नहीं मिल रहा है। यदि ऐसा मान भी लें तो अभाव से भाव की उत्पत्ति वाली बात हो जायेगी, जो कि युक्त नहीं है। ऊपर जो लिखा कि प्रकृति से उत्पन्न पदार्थ आकार वाले होते हैं, इस कथन से आकाश निराकार कैसे सिद्ध होगा- यह प्रश्न खड़ा हो जायेगा। इसके लिए मेरा कथन है कि जो आपने परोपकारी के जिज्ञासा समाधान-93 की चर्चा की है, उसमें साकार निराकार की तीन परिभाषाएँ लिखी हैं, उनको यहाँ पुनः उद्धृत करता हूँ-

  1. साकार वह है, जो प्रकृति से बना हुआ, इसके अतिरिक्त निराकार।
  2. साकार वह, जिसमें रूप, रस, गन्धादि पाँचों गुण प्रकट हों, इससे भिन्न अर्थात् जिसमें पाँचों गुण प्रकट न हों, वह निराकार।
  3. साकार वह, जिसमें केवल रूप गुण प्रकट रूप में हो, अर्थात् जो आँखों से दिखाई दे वह साकार, इससे भिन्न निराकार।

इन परिभाषाओं के आधार से पहली परिभाषा के अनुसार देखें तो जो प्रकृति से बना आकाश है, वह भी साकार होगा। जहाँ आकाश को निराकार कहा है, वहाँ सापेक्ष रूप से कहा है। आकाश पाँच भूतों में सबसे सूक्ष्म है, उसको हम केवल शब्द  के आधार से अनुमान लगाकर जान पाते हैं। इसी प्रकार वायु को स्पर्श से जान पाते हैं। रूप क ी दृष्टि से तो ये निराकार ही कहलाएँगे।

हाँ, जिस अवकाश रूप आकाश की बात ऋषि करते हैं, जो कि प्रकृति से नहीं बना, वह तो निराकार ही है और यह अवकाश रूप आकाश असीम है। इन आकाश, वायु आदि के असीम-ससीम के विषय में हम इतना ही कह सकते हैं कि ये पदार्थ प्रकृति से बने होने केकारण ससीम हैं। शेष बाद में लिखेंगे।

– ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर

(2) शंका :- जिज्ञासा- कुछ जिज्ञासायें मन में हैं। कृपया समाधान करने का कष्ट करेंः- 1-यम, 2-नियम, 3-आसन, 4-प्राणायाम, 5- प्रत्याद्वार, 6-धारणा, 7-ध्यान एवं 8-समाधि। यह क्रम महर्षि पतञ्जलि ने योग दर्शन में दिया है। क्या यम-नियम का पालन करने वाला व्यक्ति भी सीधे ध्यान (7) अवस्था में पहुँचकर ध्यान का अयास कर सकता है? यदि कर सकता है तो फिर यम- नियम आदि की क्या आवश्यकता है? आखिर यह ‘‘ध्यान प्रशिक्षण योजना’’ जो परोपकारी पत्रिका मार्च (प्रथम) 2015 में प्रकाशित है व पहलेाी कई बार प्रकाशित/प्रचारित हुई है, क्या है?

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- विविध

समाधान :-

समाधान– (क) ध्यान/उपासना के लिए यम-नियम रूप योगाङ्गों का अनुष्ठान अनिवार्य है। इसको महर्षि पतञ्जलि अपने योगदर्शन में कहते हैं। महर्षि दयानन्द नेाी इस तथ्य को अनिवार्य कहा है। महर्षि उपासना प्रकरण ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में लिखते हैं- ‘……….इन पाँचों का ठीक-ठीक अनुष्ठान करने से उपासना का बीज बोया जाता है।’’ ऋषियों के इन मन्तव्यों से तो यही ज्ञात हो रहा है कि ध्यान-उपासना के लिए यम-नियम का पालन करना अनिवार्य है।

अब हम थोड़ा विचार इन आठ अङ्गों पर कर लेते हैं। इन योगाङ्गों की व्याया करते हुए प्रायः उपदेशक वर्ग इनक ो सीढ़ी की भाँति बताया करता है, अर्थात् जैसे ऊपर चढ़ने के लिए हम सीढ़ी का प्रयोग करते हैं। सीढ़ी से चढ़ने के लिए पहले हम प्रथम सीढ़ी पश्चात् दूसरी, तीसरी आदि का प्रयोग करते हैं, पहली से अन्तिम पर नहीं पहुँच जाते वहाँ तो क्रम है। ऐसे ही इन योगाङ्गों की व्याया की जाती है, अर्थात् पहले यम को सिद्ध करें फिर नियम को पश्चात् आसन को आदि।

किन्तु यह जो सीढ़ी की तरह कहना दिखाना है, युक्ति युक्त नहीं है, क्योंकि बिना यम-नियम के पालन से भी व्यक्ति आसन लगा सकता है, प्राणायाम कर सकता है। यदि ऐसा न होता तो कोई आसन, प्राणायाम न कर सकता था, इसलिए यह सीढ़ी वाला उदाहरण योगाङ्गों में घटाना सर्वाथा युक्त नहीं है।

इसमें यह अवश्य समझना चाहिए कि व्यक्ति जितना-जितना यम-नियम का पालन करता जायेगा, वह उतना-उतना धारणा, ध्यान की ओर अग्रसर होता चला जायेगा। कोई यह न समझे कि जब इन यम-नियम को पूरी तरह सिद्ध कर लूँगा, तब ही ध्यान करुँगा। ध्यान का अयास यम-नियम की प्रारभिक अवस्था से किया जा सकता है। हाँ, ध्यान की ऊँची अवस्था तो यम-नियम के पूर्ण रूप से पालन करने पर ही होगी, किन्तु प्रारभ में भी जब व्यक्ति सात्विक भाव से युक्त होकर ध्यान करता है तो उसको भी प्रारभिक ध्यान का आनन्द तो आयेगा ही।

इतना सब लिखने का तात्पर्य यही है कि सर्वथा यम-नियम से रहित व्यक्ति तो ध्यान नहीं कर सकता अपितु जो जितने अंश में इनका पालन करता है, वह इतने स्तर का ध्यान भी कर सकता है, किन्तु जिस ध्यान की बात महर्षि पतञ्जलि करते हैं, वह ध्यान तो नहीं होगा, फिर भी इस ध्यान को आप गौण रूप में तो देख ही सकते हैं।

आपने परोपकारिणी सभा की ध्यान पद्धति के विषय में पूछा है। इस विषय में आपको बता दें कि इस ध्यान पद्धति की योजना इस कारण बनी कि सब मत-सप्रदाय प्रायः अपने-अपने विचार से ध्यान करवाते हैं। हमारे आर्य समाज में संध्या की जाती है। संध्या के बहुत सारे मन्त्र हैं, इन मन्त्रों को सब कोई नहीं जानता। जो नहीं जानता वह भी वैदिक रीति से ध्यान, उपासना कर सके, उसके लिए यह ध्यानह-पद्धति विद्वानों ने मिलकर तैयार की है। इस ध्यान पद्धति में अवैदिक और सिद्धान्त विरुद्ध कुछ भी नहीं है। यह पद्धति ऋषियों की रीति अनुसार विद्वानों द्वारा निर्मित है। इस पद्धति से साधारण से साधारण व्यक्ति भी ध्यान कर सकता है।

इस ध्यान-पद्धति का अनेक लोग लाभ उठा रहे हैं और जिन्होंने इसका प्रशिक्षण परोपकारिणी सभा से लिया है वे प्रशिक्षक होकर अन्यों को भी सिखा रहा है। इस प्रकार इससे अनेक जन उपकृत हो रहे हैं।

जैसे ऊपर कहा जा चुका है कि यह ध्यानह-पद्धति जन साधारण भी कर सके उसके लिए है। उन जन साधारण के लिए तो इस पद्धति को पर्याप्त कह सकते हैं किन्तु जो विशेष अध्यात्म के मार्ग में योग्यता रखते हैं, उनके लिए  कदाचित यह पर्याप्त न हो। यह ध्यान-पद्धति दो भागों में विभक्त कर रखी है, एक पन्द्रह मिनट की और दूसरी तीस मिनट की। जो लोग ध्यान करना चाहते हैं किन्तु विशेष योग्यता नहीं रखते, वे इस पन्द्रह मिनट की ध्यान- पद्धति का लाभ उठा सकते हैं और जो कुछ योग्य हैं, उनके लिए तीस मिनट की ये पद्धति है। वे इससे लाभ उठा सकते हैं। किन्तु जो विशेष योग्यता रखते हैं, वे महर्षि वर्णित उपासना प्रकरण व योग दर्शन के अनुसार अपने को प्रगति दे सकते हैं अथवा ध्यान योग शिविरों में इस विषय के योग्य विद्वानों के संग अपना परिष्कार कर सकते हैं। इस विषय में इतना ही।

(3) शंका :- महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने अन्त समय में यह किस आशय से पूछा था कि ‘आज कौन-सा पक्ष, क्या तिथि और क्या वार है?’ अन्यत्र संस्कार विधि में भी तिथि व नक्षत्रादि का उल्लेख मिलता है। हमने एक वैद्य से सुना है कि ‘वैद्यक शास्त्रों’ में लिखा है कि औषिधियों का प्रभाव तिथि, नक्षत्र, पक्ष तथा उत्तरायण व दक्षिणायन में अलग-अलग पड़ता है?

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- vedic dharm

समाधान :-

महर्षि दयानन्द ने अन्त समय में जो तिथि वार आदि पूछे, वे सामान्यरूप से पूछे गये प्रतीत होते हैं। इसमें कोई बड़ा रहस्य हो ऐसा लग नहीं रहा। कई बार हम श्रद्धावशात् सामान्य को भी विशेष रूप में देखने का प्रयास करने लगते हैं और इस हमारे प्रयास में कहीं न कहीं पौराणिकता आ जाती है।

हाँ आपने जो औषधियों पर प्रभाव की बात कही वह तो सकती है, होती होगी।

(4) शंका :- इसी प्रकार गृहाश्रमविधि में या दुर्हार्दो युवतयो…… मन्त्र के अर्थ करते हुए अन्त में लिखते हैं- ‘…..वृद्ध स्त्रियाँ हों, वे इस वधू को शीघ्र तेज देवें। इसके पश्चात् अपने-अपने घर को चली जावें, और फिर इसके पास कभी न आवें।’ यहाँ कभी न आवें का भाव समझ में नहीं आया।

समाधान कर्ता :- , विषय :- vedic dharm

समाधान :-

(ग) गृहाश्रमप्रकरण में महर्षि ने जो अथर्ववेद का यह मन्त्र दिया है-

या दुर्हार्दो युवतयो याश्चेह जरतीरति।

वर्चो न्वस्यै सं दत्ताथास्तं विपरेतन।।

अर्थ- (याः) जो (दुर्हार्दः) दुष्ट हृदयवाली अर्थात् दुष्टात्मा (युवतयः) जवान स्त्रियाँ (च) और (याः) जो (रह) इस स्थान में (जरती) बूढ़ी=वृद्ध स्त्रियाँ हों, वे (अपि) भी (अस्थै) इस वधू को (नू) शीघ्र (वर्चः) तेज (संदत्त) देवें (अथ) इसके पश्चात् (अस्तम्) अपने-अपने घर को (विपरेतन) चली जाएँ और फिर कभी इसके पास न आवें।

यहाँ प्रकरण विवाह और गृहाश्रम का है, जब नववधू से बहुत-सी स्त्रियाँ मिलने आती हैं, तब उनमें बहुत-सी कुलीन और कुछ मन्त्र में वर्णित दुष्ट हृदय वाली भी होती हैं। यहाँ उन दुष्ट हृदय वाली स्त्रियों की ओर संकेत किया है। यदि ऐसी स्त्रियाँ वधू के पास आवें तो वधू उनको महत्त्व न देवे। जब वधू उनको महत्त्व न देगी, तब उनका मान-समान न होगा अर्थात् उनका तेज ले लिया जायेगा और वहाँ लौट, वापस न आवेंगी। जब हम किसी को महत्त्व नहीं देते, तब सामने वाला उपेक्षित होकर श्रीहीन हो जाता है उसका तेज ले लिया जाता है। ऐसा यहाँ भी कुछ इसी प्रकार का है। मन्त्र में निर्देश किया है कि दुष्ट हृदय वाली स्त्रियाँ कुलीन स्त्रियों के पास कभी न आवें। जब उनके साथ उपेक्षा का बर्ताव किया जायेगा, तब वे उनके पास भी न आवेंगी। यही अभिप्राय प्रतीत हो रहा है। इस मन्त्र क विषय में विस्तार से जानने के लिए पं. मनसाराम जी  वैदिक तोप की पुस्तकें ‘‘पौराणिक पोप पर वैदिक तोप’’ पृष्ठ 366 से देखा जा सकता है।

(5) शंका :- महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने संस्कार-विधि के सामान्य प्रकरण में आघारावाज्याहुति व आज्याभागाहुति देने से पूर्व लिखा है कि ‘स्रुवा को भर अँगूठा मध्यमा अनामिका से स्रुवा को पकड़ के…..’ कृपया बताएँ कि स्रुवा को इन तीन से ही क्यों पकड़ा जाए?

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- vedic dharm

समाधान :-

(ख) स्रुवा को तीन अंगुलियों से पकड़ने का विधान महर्षि दयानन्द द्वारा ही वर्णित मिलता है, कहीं और स्थान पर इसका वर्णन हो ऐसा देखने में नहीं आया। तीन से पकड़े जाने का प्रयोजन क्या है, इसका भी वर्णन देखने को नहीं मिलता। हाँ अपनी कुछ संगतियाँ तो लगा सकते हैं। पाँचों अँगुलियों में एक-एक महाभूत कुछ लोग मानते हैं- इस आधार अँगुलियों की मुद्रा विशेष भी बनाई जाती हैं, जिससे कुछ शारीरिक प्रभाव पड़ता है। हो सकता है यहाँ भी वह प्रभाव होता हो, इस दृष्टि इन तीनों से स्रुवा पकड़ने लिए कहा हो। अथवा अन्य कोई प्रयोजन विद्वान् लोगों ने विचार किया हो तो हमें ज्ञात करावें।

(6) शंका :- श्रौत-यज्ञ-मीमांसा’ पुस्तक के पृष्ठ 177 व 178 पर श्रद्धेय युधिष्ठिर मीमांसक जी ने कश्यप-पुत्र असुर को इस पृथिवी का प्रथम शासक बताया है।

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- vedic dharm

समाधान :-

श्रौत-यज्ञ-मीमांसा’ पुस्तक के पृष्ठ 177 व 178 पर श्रद्धेय युधिष्ठिर मीमांसक जी ने कश्यप-पुत्र असुर को इस पृथिवी का प्रथम शासक बताया है। साथ ही वे (तैत्तिरीय-संहिता 6-3-7-2 का सर्न्दा देकर) लिखते हैं कि पहले निश्चय ही यज्ञ असुरों में था….बाद में देवों के हाथ में आ गया……यहाी लिखा है कि असुरों का यज्ञ ध्वंसनात्मक (यज्ञ क्या ध्वंसनात्मक भी होता है) था । कृपया, इस पूरे प्रकरण का सही-सही भाव बताने का कष्ट करें।

 

समाधान– (क) शास्त्रों में यज्ञ का वर्णन विस्तार से मिलता है। यज्ञ का अर्थ करते समय ऋषियों ने व्यापक दृष्टि रखी है। यज्ञ केवल अग्निहोत्र ही नहीं है, अपितु इस ब्रह्माण्ड में जो हो रहा है वह भी यज्ञ ही है। प्रातः काल से ही सूर्य संसार को अपनी ऊर्जा देकर यज्ञ कर रहा होता है। रात्रि में चन्द्रमा अपना शीतल प्रकाश फैलाकर यज्ञ कर रहा होता है। इस प्रकार यज्ञ के व्यापक रूप को देख प्रलय और सृष्टि को भी यज्ञ का ही रूप दे डाला। प्रलय को ध्वंसनात्मक यज्ञ और सृष्टि उत्पत्ति को सृजनात्मक यज्ञ कहा गया है।

पं. युधिष्ठिर जी मीमांसक ने इस को लेकर अपनी पुस्तक में विस्तार से वर्णन किया है। पाठकों की दृष्टि से उनके वचन ही यहाँ लिखते हैं- ‘‘यज्ञों के सबन्ध में कथानक वैदिक वाङ्मय में मिलता है वह दो प्रकार का है। एक सृष्टिगत आसुर और दैव यज्ञों के सबन्ध में, और दूसरा श्रोतसूत्रोक्त मानुष द्रव्य यज्ञों के सबन्ध में। दोनों के वर्णन में स्थान-स्थान पर देव और असुर शदों का प्रयोग मिलता है, अतः इन वचनों के विषय में बड़ी कठिनाई होती है। हम अपनी बुद्धि के अनुसार दोनों वचनों का विभाग करके लिखते हैं।’’

प्रस्तुत आसुर यज्ञों पर विचार करने से पूर्व यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि भारतीय दर्शन के अनुसार सृष्टि और प्रलय का चक्र सदा चलता ही रहता है। परन्तु जब वर्तमान सृष्टि के विषय में लिखना होता है तो भारतीय ग्रन्थकार वर्तमान सृष्टि से पूर्व जो प्रलयावस्था रही थी, उसका पहले संक्षेप से वर्णन करते हैं, पश्चात् सृष्टि के  सृजन का।

हमारे सौरमण्डल की स्थिति और प्रलय का काल  8 अरब 64 करोड़ वर्ष का है। इसमें 4 अरब 32 करोड़ वर्ष दिन अर्थात् सृष्टि का स्थिति काल और 4 अरब 32 करोड़ वर्ष रात्रि अर्थात् प्रलयकाल होता है। प्रलयकाल के आरा में आसुर=ध्वंसनात्मक प्रवृत्तियाँ उत्तरोतर वृद्धिगत होती है प्रलय के मध्य में पूर्णता को प्राप्त होने के पश्चात् दैवी प्रवृत्तियों का उत्तरोत्तर विकास होता है और आसुर प्रवृत्तियाँ घटती जाती हैं। इस कारण वर्तमान सृष्टि से पूर्व प्रलय काल में आसुर प्रवृत्तियों के कारण ध्वंसनात्मक यज्ञ हो रहे थे, अर्थात् प्रलयात्मक यज्ञ आसुर शक्तियों के पास था। इसी का निर्देश तैत्तिरीय संहिता 6.3.7.2 में किया है।

‘‘असुरेषु वै यज्ञ आसीत्, तं देवा तुष्णीं होमेनापवृञ्जन्।।’’ अर्थात् – पहले निश्चय ही यज्ञ असुरों में था। देवों ने उसे तूष्णीम् होम से काट लिया=छीन लिया। अभिप्राय स्पष्ट है कि जब प्रलयकाल में आसुरी शक्तियाँ प्रबल हो रही थीं, तब सर्गोन्मुखकाल में दैवी शक्तियों ने तूष्णीं=चुपचाप=शनैः-शनैः अपना कार्य=सर्जनरूप यज्ञ का आरा किया और शनैः-शनैः सर्जन प्रक्रिया बढ़ती गई। इस प्रकार यज्ञ असुरों से देवों के हाथ में आ गया।’’

इस पूरे प्रकरण में पं. युधिष्ठिर जी  यज्ञ को विस्तृत रूप में देख रहे हैं। प्रलय और निर्माण इन दोनों को यज्ञ रूप में देखा है। सृष्टि का प्रलय होना, क्षय होना जब प्रारभ होता है, तब उसको ध्वंसनात्मक यज्ञ कहा है। असुर बिगाड़ने वाले होते हैं बनाने वाले नहीं। इस आसुरी स्वभाव को देख सृष्टि प्रलयावस्था में आसुरी शक्तियों का प्रबल होना माना है। ये आसुरी शक्ति प्रलय काल के मध्य तक प्रबल रहती हैं और वे आसुरी शक्तियाँ इस जगत् को नष्ट करने में लगी रहती हैं, इसी को ध्वंसनात्मक यज्ञ कहा है।

प्रलय के मध्यकाल के बाद धीरे-धीरे देव अर्थात् दैवी शक्तियाँ सक्रिय हो जाती हैं। देव अर्थात् निर्माण करने वाली शक्तियाँ जो बनाने वाली, बिगाड़ने वाली नहीं। सृष्टि निर्माण से पहले ध्वंसनात्मक यज्ञ असुर कर रहे थे, उस यज्ञ को शनैः-शनै-धीरे-धीरे देवों ने ले लिया हैं अर्थात् निर्माण प्रक्रिया को आरा कर दिया। इस सृष्टि काल में दैवी शक्तियाँ कार्य करती हैं। इस प्रकार शास्त्र के आधार पर पं. मीमांसक जी  ने सृष्टि प्रलय और सृष्टि निर्माण को यज्ञ रूप में कहा है।

ये देवासुर प्रक्रिया हम अपने ऊपर, समाज, राष्ट्र में कहीं भी देख सकते हैं। हमारे मन में अच्छे-बुरे दोनों विचार चलते रहते हैं। मन के अन्दर कभी बुरे विचार अधिक प्रबल होते हैं, जिससे हम टूटते जाते हैं, क्षय को, पतन को प्राप्त होते हैं। ये आसुरी शक्ति का प्रााव है। और जब हम अच्छे विचारों से ओत-प्रोत होते हैं, तब हमारा निर्माण हो रहा होता है, उस समय हम पतन को प्राप्त न हो श्रेष्ठता को प्राप्त होते हैं। जैसे सृष्टि निर्माण और प्रलय प्रक्रिया में देव और असुर कोई व्यक्ति विशेष नहीं होते। वहाँ निर्माण और प्रलय में शक्ति विशेष लगती है, होती है, उसको देव और असुर कहा है, वैसे ही हमारे मन के अच्छे विचार देव हैं और बुरे विचार असुर। असुरों का काम पतनोन्मुख करना और देवों का काम उत्थान की ओर ले जाना है।

समाज राष्ट्र में भी दो प्रकार के मनुष्य देखे जाते हैं, सज्जन और दुर्जन। सज्जन देव हैं जो समाज राष्ट्र का भला चाहते हैं, भला करते हैं और  दुर्जन असुर हैं जो कि समाज राष्ट्र के निर्माण में बाधा डालते रहते हैं। इस प्रकार इसको भी यज्ञ रूप में देखा जा सकता है

लौकि क इतिहास की दृष्टि से पं. युधिष्ठिर मीमांसक जी  इसी पुस्तक के पृष्ठ 180 पर लिखते हैं, ‘‘असुर आरभ में श्रेष्ठ चरित्रवान् थे। प्रजापति कश्यप ने इनकी श्रेष्ठता और ज्येष्ठता के कारण पृथिवी का शासन इन्हें दिया। इन्हीं असुरों ने वेद के अनुसार वर्णाश्रम-विभाग और यज्ञों का प्रवर्तन किया । शासन अथवा विशेषाधिकार मिल जाने पर अंकुश न रखा जाय तो मनुष्य की मति धीरे-धीरे विकृत होने लगती है। इसी सिद्धान्त के अनुसार असुरों में गिरावट आयी। असुर शद, जो पहले श्रेष्ठ अर्थ (असु+र=प्राणों से युक्त=बलवान्) का वाचक था, वह उनके  निकृष्ट आचरण से निकृष्ट का बोधक बन गया।………..‘पूर्वे देवाः’ यह असुरों के पर्यायवाची नामों में उपलध होता है।’’

यहाँ असुरों के श्रेष्ठ होने से प्रजापति ने उनको पृथिवी का शासन दिया ऐसा लिखा है, दूसरे स्थान पर स्वायंभुव मनु का पुत्र मरीचि प्रथम क्षत्रिय राजा हुआ- यह लिखा है। इन दोनों कथनों में विरोध दिख रहा है। इससे ऐसा विचार किया जा सकता है कि जो मीमांसक जी ने शास्त्र प्रमाणयुक्त लिखा है। वह क्षत्रिय राजा के विषय में न हो और जो दूसरा वचन है उससे तो स्पष्ट है ही की प्रथम क्षत्रिय राजा मरीचि हुआ। फिर भी यह इतिहास का विषय है, इसमें हम निश्चय पूर्वक नहीं कह सकते।

यज्ञ ध्वंसनात्मक भी होता है उसका आलंकारिक रूप को सृष्टि प्रलय की स्थिति को उपरोक्त प्रकरण में हमने देखी। इतिहास में भी ध्वसनात्मक यज्ञ किये जाते रहे हैं। एक राजा दूसरे राजा हराने नष्ट करने के लिए इस प्रकार के यज्ञों का आयोजन करता था। इस यज्ञ में उसको सफलता कितनी मिलती थी- यह तो कहा नहीं जा सकता, किन्तु ध्वंसनात्मक यज्ञ तो होता था। किसी को नष्ट करने के लिए ध्वसंनात्मक का प्रचलन था।

(7) शंका :- अग्नि, वायु…….इनको वेदों का ज्ञान किसने दिया। : आचार्य सोमदेव जी

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- vedic dharm

समाधान :-

जिज्ञासा ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका (श्री घूडमल प्रहलाद कुमार आर्य धर्मार्थ न्यास) द्वारा प्रकाशित छप रहा था उसमें पेज नं. 24 पर लिखा है ब्रह्मा जी ने अग्नि, वायु, रवि व अङ्गिरा से वेद पढे।

इसका मतलब ही ब्रह्मा जी का जन्म अग्नि, वायु… आदि के बाद हुआ है।

(1) अग्नि, वायु…….इनको वेदों का ज्ञान किसने दिया।

(2) ओ3म् का जाप करके हम ब्रह्मा जी की उपासना करते हैं उपनिषद में भी ओ3म्ाम् ब्रह्मा तीनों को एक ही बताया गया है। गीता में भी कृष्ण अर्जुन को कहते हैं ओ3म् का जप करके उस ब्रह्मा को प्राप्त कर,

जिज्ञासा यह है कि ओ3म् का जाप करके ब्रह्मा जी की उपासना करते हैं । ब्रह्माजी से पहले अग्नि, वायु….आदि हुये क्योंकि ब्रह्माजी ने उनसे वेदों का ज्ञान प्राप्त किया, फिर जिसने अग्नि, वायु, रवि व अङ्गिरा को वेदों का ज्ञान दिया उसका जाप किस शब्द या श्लोक से करे क्योंकि सभी जगह तो ब्रह्मा जी का ही जिक्र आता है।

समाधान-(1) (क)किसी विषय को स्पष्ट समझने के लिए पूर्वापरप्रसंग को ठीक से जानना, विषय वस्तु वाले ग्रन्थ को सपूर्ण पढ़ना व उस ग्रन्थ के लेखक की अन्य कृतियाँ भी पढ़ना आवश्यक हो जाता है। इतना करने पर प्रायः हमें बात स्पष्ट समझ में आ जाती है इतना करने पर भी समझ में न आवे तो योग्य विद्वान् से पूछ कर स्पष्ट कर लें। बहुत कुछ जिज्ञासाओं का समाधान तो हमारे द्वारा ठीक प्रकार से अध्ययन करने में ही हो जाता है।

आपने जो संदर्भ दिया है वह संर्दा सर्वथा ठीक है भूल समझने की है, सर्वप्रथम वेद पढ़ने वाला ऋषि ब्रह्मा ही हुआ है। महर्षि ब्रह्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य, अङ्गिरा इन चारों ऋषियों से चारों वेद पढ़े। उन चारों ऋषियों को स्वयं परमात्मा ने वेद का ज्ञान दिया क्योंकि आदि सृष्टि में ये चार आत्माएँ अत्यन्त पवित्र थी। इनके अन्दर साक्षात् परमेश्वर से वेद ज्ञान ग्रहण करने की पात्रता थी। आपने जो पूछा हैं ‘इन चारों को ज्ञान किसने दिया’ उसका उत्तर यहाँ आ गया है।

ब्रह्मा व इन चार ऋषियों में ये भिन्नता है कि सीधा परमेश्वर से ज्ञान लेने की पात्रता इन चारों में थी जबकि ब्रह्माजी ने सीधा परमेश्वर से ज्ञान ग्रहण न कर ऋषियों से ग्रहण किया है।

आपने कहा अग्नि आदि ऋषि पहले हुए और ब्रह्मा जी बाद में हुए। इसके लिए महर्षि दयानन्द का कथन है कि ये सभी ऋषि आदि सृष्टि में हुए अर्थात् सृष्टि के प्रारभ में हुए।

(ख) आप भाषा के प्रयोग को समझें, भाषा में एक ही शब्द अनेक वस्तुओं का कहने वाला हो सकता है। जैसे एक ‘गो’ शब्द गाय, वहणी, इन्द्रियाँ, पृथिवी आदि को कहता है। वैसे ही ‘ब्रह्मा’ शब्द भी अनेक का द्योतक हो सकता है। जिस ब्रह्मा ने चारों वेद पढ़े वह एक व्यक्ति विशेष मनुष्य है। किन्तु जिस ब्रह्मा की उपासना करने का प्रसंग है वहाँ कोई मनुष्य रूपी व्यक्ति विशेष नहीं अपितु वहाँ तो उपासना परमेश्वर की करनी है और परमेश्वर के असंय नामों में एक नाम ‘ब्रह्मा’ भी है, जिसका अर्थ महर्षि दयानन्द जी लिखते हैं- ‘‘(बृह् बृहि वृद्धौ) इन धातुओं से ब्रह्मा शब्द सिद्ध होता है। थोडखिंल जगन्निर्माणेन बर्हति (बृंहति) वर्द्धयति स ब्रह्मा, जो सपूर्ण जगत् को रचके बढ़ाता है इसलिए परमेश्वर का नाम ‘ब्रह्मा’ है।’’ स.प्र.स. 1

ब्रह्मा परमेश्वर का एक नाम है, इसके अनेकों प्रमाण हैं-

स ब्रह्मा स विष्णुः………..।। कैवल्य उपनिषद् .1.8

इन्द्रो ब्रह्मेन्द्र……………।। ऋग्वेद 8.16.7

सोमं राजनं…………..ब्रह्माणंच बृहस्पतिम्।।

– साम. 1.1.10.1

ओं खं ब्रह्म।। यजु. 40.17

यत्र ब्रह्मविदो यान्ति दीक्षया तपसा सह।

ब्रह्मा मा तत्र नयतु ब्रह्मा ब्रह्म दधातु मे।।अथर्व-19.43.8

इन सभी वेद शास्त्रवचनों में ईश्वर का एक नाम ब्रह्म= ब्रह्मा कहा है। जिस परमेश्वर का ब्रह्मा नाम है,उस परमेश्वर का मुय नाम ‘ओ3म्’ है।  इस ‘ओ3म्’ के जप से परमेश्वर ब्रह्म की उपासना होती है न कि चारों वेद को पढ़ने वाले ब्रह्मा नाम वाले महर्षि की। यदि अध्ययन करने वाला प्रकरणविद् हो तो वह स्वयं समझ सकता है कि ‘ब्रह्मा’ शब्द परमेश्वर को कह रहा है या ऋषि रूप व्यक्ति विशेष को।

जिस परमेश्वर ने अग्नि, वायु, आदित्य, अङ्गिरा ऋषियों को ज्ञान दिया उसकी उपासना ‘ओ3म्’ शब्द से करनी चाहिए अथवा परमेश्वर के जो अनन्त गुण, कर्म, स्वभाव के आधार पर नाम हैं उनसेाी ईश्वर की उपासना की जा सकती है। जैसे न्यायकारी, दयालु, सर्वरक्षक, पवित्र आदि नामों से उपासना कर सकते हैं। मन्त्रों के माध्यम से भी परमेश्वर की उपासना की जाती है। जिस मन्त्र में परमेश्वर की स्तुति हो, प्रार्थना हो उस मन्त्र से उपासना कर सकते हैं, जैसे गायत्री मन्त्रादि।

जो उपासना विषय में ब्रह्मा जी का जिक्र है वह मनुष्य रूपी ब्रह्मा का नहीं अपितु परमात्मा रूपी ब्रह्मा का जिक्र मानना चाहिए। महर्षि दयानन्द की यह बात सदा स्मरण रखें कि जहाँ भी उपासना करने की बात आती है वहाँ उपासनीय केवल परमात्मा ग्रहण करना चाहिए अन्य का नहीं। अस्तु।

– ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर

 

(8) शंका :- सृष्टि उत्पति : आचार्य सोमदेव जी

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- विविध

समाधान :-

जिज्ञासा- सत्यार्थप्रकाश के अष्टम समुल्लास में वर्णित मनुष्य जाति की आदि सृष्टि त्रिविष्टप अर्थात तिबत में हुई, जिसमें श्रेष्ठ विद्वान् लोग आर्य और मूर्ख अनार्य (अनाड़ी) कहलाये। आर्य और अनार्य में सदा लड़ाई बखेड़ा होने के कारण आर्य लोग सर्व भूगोल में उत्तम इसाूखण्ड को जानकर सृष्टि की आदि के कुछ काल पश्चात् तिबत से सीधे इस देश में बस गये, जिसका नाम आर्यावर्त हुआ। इससे पूर्व इस देश का क ोई भी नाम नहीं था और न कोई आर्यों से पूर्व इस देश में बसते थे। अतः आर्य जाति का उद्गम व आदि उत्पत्ति-स्थल तिबत है और सभवतः वही हमारे चारों वेद का ईश्वरीय ज्ञान ऋषियों को प्राप्त हुआ। कृपया उक्त तथ्यों के प्रमाण से अवगत कराने का कष्ट करें। आज दिन भी तिबत में हमारे तीर्थ-स्थल कैलाश, मानसरोवर स्थित हैं। जहाँ  प्रतिवर्ष हजारों भारतवासी तीर्थ यात्रा व दर्शन हेतु जाते हैं। इस तरह सारा तिबत हमारा आदि जन्म स्थल है। अतः सारा तिबत हमारा (भारत का) है। चीन उस पर जबरन काबिज है।

समाधान महर्षि दयानन्द ने मानवोत्पत्ति तिबत पर कही है। महर्षि प्रश्न पूर्वक लिखते हैं- ‘‘मनुष्यों की आदि सृष्टि किस स्थल में हुई?

उत्तर – त्रिविष्टप अर्थात् जिसको तिबत कहते हैं।’’ आपने महर्षि के इस स्थल को लेकर प्रश्न पूछा है कि इसका आधार है या नहीं। इस विषय में जैसी जानकारी मुझे ‘सत्यार्थ भास्कर’ से प्राप्त हुई है, वैसा यहाँ लिखता हूँ।

जैसा बिना बीज के, निर्जीव रेत में जड़ और अंकुर नहीं फूटते। बीजाी अपने आप ही आप नहीं निकलता, किन्तु खोज करके लाया जाता है और अनुकूल स्थान पर बोया जाता है, जहाँ जलवायु पौधे के अनुकुल होता है, उसका खाद्य पर्याप्त मात्रा में मिलता है और आंधी-ओले से उसे सुरक्षित रखा जा सकता है। माली पहले एक क्यारी में पौध तैयार करता है फिर वहाँ से पौधे ले-लेकर यथास्थान सारी फुलवारी में रोपता है और आवश्यकतानुसार बाहर भी भेजता है। तात्पर्य यह है कि बीज सर्वत्र पैदा नहीं होता, एक ही स्थान से अन्यत्र फैलता है। इसी बीज क्षेत्र न्याय के अनुसार मनुष्य भी किसी एक ही स्थान पर पैदा हुआ और फिर संसार भर में फैल गया। प्रारभ में मनुष्य भी किसी एक ही स्थान पर पैदा हुआ और फिर संसार भर में फैल गया। प्रारभ में मनुष्य भी ऐसे स्थान पर हुआ होगा, जहाँ का जलवायु उसके अनुकूल हो, खाद्य सामग्री सुलभ हो और जहाँ वह अधिक से अधिक सुरक्षित रह सके। मनुष्य ही नहीं, पशु, पक्षी, वनस्पति आदि के लिए भी ऐसा ही स्थान उपयुक्त होगा। आदि सृष्टि के लिए उपयुक्त स्थान की योग्यता –

  1. जो सबसे ऊँचा स्थान हो, 2. जहाँ सर्दी-गर्मी जुड़ती हो, 3. जहाँ मनुष्य के खाद्य फल वनस्पति आदि प्रचुरता से उपलध हों, 4. जिसके आसपास सब रंग-रूपों के विकास के लिए उपयुक्त वातावरण हो, 5. जिसका नाम सबके स्मरण का विषय हो।

अब इन पाँचों बिन्दुओं को विस्तार से देखते हैं-

  1. 1. हिमालय निर्विवाद रूप से सबसे ऊँचा स्थान है। कहते हैं कि पहले सपूर्ण पृथिवी जलमग्न थी। उस जल से सबसे पहले वही भूमि निकली उसी में वनस्पति उत्पन्न हुई और उसी पर सबसे पहले मनुष्यादि प्राणियों की सृष्टि हुई।

2.संसार में ऋतुएँ चाहे कितनी कही जाएँ, किन्तु सर्दी और गर्मी दो उनमें मुय हैं। यही कारण है कि समस्त भूमण्डल में सर्द और गर्म दो ही प्रकार के देश पाये जाते हैं। कुछ प्रदेश दोनों के मिश्रण से बने पाये जाते हैं, तो भी दोनों में से एक की प्रधानता रहती है। कश्मीर, नेपाल, भूटान और तिबत आदि प्रदेश बसे हुए हैं, इनके निवासी उसी सर्दी-गर्मी का अनुभव करते हैं। इसलिए मानव-सृष्टि के लिए हिमालय ही सर्वाधिक उपयुक्त स्थान ठहरता है। वैज्ञानिकों के अनुसार मनुष्य के आदि युग में मानसरोवर के आसपास का क्षेत्र शीतोष्ण जलवायु युक्त था। भारतीय प्राचीन साहित्य में भी इसका उल्लेख मिलता है।

  1. 3. मनुष्य का सर्वाधिक खाद्य दूध और फल है- पयः पशूनां रसमोषधीनाम्। दूध पशुओं से और फल वृक्षों से मिलते हैं। जब मनुष्य दूध और फल के बिना और पशु वनस्पति के बिना नहीं रह सकते तो मनुष्य ऐसे देश में उत्पन्न नहीं हो सकता, जहाँ ये पदार्थ उपलध न हों। हिमालय ऐसा स्थान है, जहाँ मनुष्य के लिए अपेक्षित समस्त पदार्थ सहज उपलध है।
  2. 4. मूल स्थान के आसपास ऐसी विस्तृत भूमि होनी चाहिए, जहाँ सब रंग-रूपों के विकास की स्थिति हो और जहाँ रहकर मनुष्य संसार भर में रहने की योग्यता प्राप्त करके पृथिवी में सर्वत्र फैल सके। हिमालय से लगता भारत ऐसा देश है, जहाँ सब छहों ऋतुएँ वर्तमान रहती हैं। इस सर्वगुण सपन्न देश में सब रंग रूप के आदमी निवास करते हैं। ऐसे देश के सामीप्य के कारण भी यही प्रतीत होता है कि हिमालय (तिबत) पर ही मनुष्य की आदि सृष्टि हुई।
  3. 5. सभी देशों में बसने वालों को किसी न किसी रूप में हिमालय की स्मृति बनी हुई है। भारतीय आर्यों को हिमालय से और ईरानी आर्यों को भारत से आने की स्मृति आज भी बनी हुई है। चरक संहिता के प्रमाण से सिद्ध है कि आर्य लोग हिमालय (तिबत) से ही भारत आये थे और बीमार होकर एक बार फिर अपने स्थान हिमालय को लौट गये थे। इतना ही नहीं, कुछ समय बाद उनके फिर लौटकर भारत में बसने का उल्लेख मिलता है। चरक संहिता में लिखा है-

ऋषयः खलु कदाचिच्छालीना यायावराश्च ग्रायौषध्याहाराः सन्तः सापन्निका मन्दचेष्टाश्च नातिकल्याश्च प्रायेण बभूवुः। ते सर्वा समिति कर्त्तव्यतानामसमर्थाः सन्तो ग्रायवासकृतमात्मदोषं मत्वा पूर्वनिवासमपगतग्रायदोषं शिवं पुण्यमुदारं मेध्यगयसुकृतिभिर्गङ्गाप्रभवममरगन्धर्व-किन्नरानुचरितमनेक रत्ननिचयमचिन्त्याद्भुतप्रभवं ब्रह्मर्षिसिद्धचरणानुचरितं दिव्यती र्थैषधिप्रभवमतिशरव्यं….. महर्षयः।। चिकित्सा स्थान. 4/3

इन चरक वचनों से मानव हिमालय पर था, बाद में मैदानी क्षेत्र में बस गया, यह वर्णन है। इनसे सिद्ध हो रहा है कि मानवोत्पत्ति सृष्टि के आरभ में हिमालय पर ही हुई।

हिमालय पर प्राणियों के शरीरांश बहुतायत से पाये जाते हैं। पृथिवी पर ऐसा कोई स्थान नहीं है जो हिमालय स्थित प्राणियों के शेषांगों से अधिक पुराने चिह्न दे सके। इससे भी प्रमाणित होता है कि हिमालय पर मनुष्य से पहले उत्पन्न होने वाले और उनके जीवनाधार वृक्ष और गौ आदि पशु पूर्वातिपूर्व काल में उत्पन्न हो गये थे, अतएव हिमालय आदि सृष्टि उत्पन्न करने की पूर्ण योग्यता रखता है। (हिमालय पर)

प्रारभ में आर्य हिमालय तिबत में ही उनका मूल उत्पत्ति स्थान तिबत रहा, बाद में निचले मैदानी क्षेत्र आर्यावर्त में आकर बस गये। आर्यावर्त की सीमा महर्षि मनु ने लिखी है-

आ समुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात्।

तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्तं विदुर्बुधाः।। मनु. 2.22

अर्थात्- पूर्व समुद्र से लेकर पश्चिम समुद्र पर्यन्त विद्यमान उत्तर में हिमालय और दक्षिण में स्थित विन्ध्याचल का मध्यवर्ती देश है, उसे विद्वान् लोग आर्यावर्त कहते हैं। इसी मनु के श्लोक के आधार पर महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के आठवें समुल्लास में आर्यावर्त देश की सीमा निर्धारण की है- ‘‘हिमालय की मध्य रेखा से दक्षिण और पहाड़ों के भीतर रामेश्वर पर्यन्त विन्ध्याचल के भीतर जितने प्रदेश हैं, उन सबको आर्यावर्त इसलिए कहते हैं कि यह आर्यावर्त देश देवों और विद्वानों ने बसाया और आर्यजनों के निवास करने से आर्यावर्त कहलाया।’’ आर्यावर्त की सीमा में हिमालय भी है और तिबत हिमालय पर है, इस आधार पर आप कह सकते हैं कि तिबत हम आर्यों का स्थान है। इस लेख में चरकादि का प्रमाण दिया है। ये प्रमाण आर्यों का मूल स्थान हिमालय को सिद्ध करते हैं। महर्षि का तो प्रत्यक्ष वचन है ही। यह तो निश्चित है कि तिबत पर चीन ने बलात् अधिकार जमा रखा है। जबकि अधिकार हम भारतीयों का होना चाहिए। ऐतिहासिक दृष्टि से भी और हमारी भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि से भी। अलम्।

– आचार्य सोमदेव, ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर

(9) शंका :- 5. सन् 1875 के बाद अर्थात् 140 साल व्यतीत हो जाने के बाद भी विवाहदि संस्कार 90/95 प्रतिशत पौराणिक रीति से हो रहे हैं। यदि लग्न पत्रिका आदि की जरुरत पड़े तो वही हाथी की सूण्ड वाले गणेश की छपी मिलती है। क्या आर्य समाज कोई ऐसी योजना बना रहा है कि कम से कम जिला स्तर पर ऐसी पत्रिका या वैदिक कलेण्डर या पुरोहित उपलध हो जाए।

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- vedic dharm

समाधान :-

(ङ) इस विषय में आर्य समाज का कुछ प्रयत्न तो रहा है, कहीं-कहीं आर्य समाजों में बिना गणेश की लग्न पत्रिका मन्त्रों से युक्त भी मिलती है। इसके लिए योजना हो सकती है जो कि शीर्षस्थ सभाओं की धर्मार्य सभा का कार्य है।

लग्न पत्रिका को तो आप व्यक्तिगत रूप से भी क्रियान्वित कर सकते हैं। कुछ काम हम अपने स्तर पराी कर सकते हैं, हमारे द्वारा किये जा सकते हैं। कुछ कार्य सभाएँ ही कर सकती हैं किन्तु सभाओं की आज कथा ही क्या कहें, इनको जो करना था 140 वर्षों में वह न कर कुछ और ही कर रही हैं जो कि आपको व अन्य संवेदनशील आर्यों को पीड़ित करती हैं।

– ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर

(10) शंका :- . क्या वर्तमान में अपने देश भारत या अन्यत्र कहीं भी पृथ्वी पर अध्ययन-अध्यापन की ऐसी व्यवस्था है, जहाँ पर चारों वेदों का ज्ञान कराया जाता हो। यदि हाँ तो कहाँ-कहाँ पर ऐसी व्यवस्था है। 4. आर्य समाज के धुंआधार प्रचार से और वेदों का डंका पीटने या बजाने से पौराणिक भी जाग्रत हो गए, तो अब आर्य सामाज के कितने केन्द्र चारों वेद पढ़ा रहे हैं और पौराणिकों के कितने केन्द्र हैं।

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :-

समाधान :-

) वर्तमान में अपने देश व अन्यत्र चारों वेद पढ़ाने की व्यवस्था है या नहीं इस विषय में मैं नहीं जानता हाँ वर्तमान में आर्य समाज के वरिष्ठ विद्वान् आचार्य श्री सत्यानन्द वेदवागीश चारों वेदों को पढ़ाने का सामर्थ्य रखते हैं। उनसे एक युवा विद्वान् आचार्य सनतकुमार जी ने चारों वेद पढ़े हैं और वे अन्य को पढ़ाने का प्रयास करते हैं। किसी गुरुकुल संस्था आदि की जानकारी मुझे नहीं है। वेद कण्ठस्थ कराने वाली संस्थाएँ तो हैं जो कि प्रायः पौराणिकों की हैं। आपके बिन्दु 4 (घ) का उत्तर भी इसी में आ गया है।

(11) शंका :- 2. यदि चारों वेद संहिताएं विदेश से मंगवाए गए तो फिर यह क्यों कहा जाता है कि स्वामी दयानन्द ने 2 वर्ष 10 महीने में अपने गुरु विरजानन्द जी से चारों वेदों का अध्ययन किया और शंकाओं का समाधान किया। जब वेद मंगवाए ही बाद में हैं तो अपने गुरु जी से कैसे पढ़े? और यदि वेद पहले ही उपलध थे तो मंगवाने की क्या जरूरत थी। इससे यह भी प्रतीत होता है कि स्वामी दयानन्द जी ने भी अपने गुरु जी के पास से शिक्षा पूरी करने के बाद ही चारों वेद पढ़े। गुरु जी के पास तो जो आधे अधूरे उपलध थे वे ही पढ़ पाए। फिर पूरे वेद बाद में पढ़े हैं तो स्वामी जी को पढ़ाने वाले अन्य कौन गुरु मिले जो स्वामी विरजानन्द जी से भी भली प्रकार पढ़ा सकते थे।

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- vedic dharm

समाधान :-

ऊपर हमने देखा कि वेद हमारे पास पहले ही उपलध रहे हैं, यह भ्रान्ति फैलाई गई कि वेद जर्मन में थे भारत में नहीं। महर्षि दयानन्द ने गुरु विरजानन्द से चारों वेद को पढ़ा यह वर्णन कहीं देखने को नहीं मिलता हाँ कुछ वक्ता लोग इस प्रकार की अप्रमाणिक बातें बोलते हैं। महर्षि ने गुरु विरजानन्द से 2 वर्ष 10 महीने में मुय रूप से व्याकरण महाभाष्य पढ़ा था। हाँ जहाँ कहीं व्याकरण में वेद का विषय आया है वहाँ गुरुवर ने वेद मन्त्रों के उद्धरण अवश्य दिये होंगे। इस विषय में डॉ. रामप्रकाश जी द्वारा लिखित ‘गुरु विरजानन्द दण्डी जीवन एवं दर्शन’ पुस्तक की पंक्तियाँ लिखता हूँः- ‘‘कुछ लेखक मानते हैं कि दयानन्द ने दण्डी जी से केवल व्याकरण पढ़ा और कुछ नहीं परन्तु यह कैसे सभव है कि जिस आर्ष अनार्ष ग्रन्थ निर्णय के लिए पूरा एक दशक (1859-1868) लगा दिया तथा किसी भी पण्डित से एतद् विषयक चर्चा अथवा शास्त्रार्थ का अवसर हाथ से न जाने दिया, वह चिन्तन वे अढ़ाई साल की लबी अवधि में अपनी आशा के केन्द्र बिन्दु दयानन्द से सांझा न करते। वे तो व्याकरण मात्र को मानते ही वेदादि के अध्ययन के लिए थे। अतः संहिता विशेष भले ही न पढ़ाई हो पर यत्र तत्र वेद से उदाहरण देकर व्याकरण समझाना तो स्वभाविक था। स्वामी दयानन्द ने भी गुरु से जितना पढ़ा, उससे कहीं अधिक सीखा। यद्यपि अभी वैदिक साहित्य का सपूर्ण ज्ञान करना शेष था परन्तु उन्हें आर्ष – अनार्ष ग्रन्थों के विवेक की सूझ अवश्य प्राप्त हुई।’’

इस समस्त कथन से ज्ञात हो रहा है कि महर्षि ने गुरु विरजानन्द जी से चारों वेद संहिताओं का अध्ययन नहीं किया अपितु आंशिक रूपसे कुछ अध्ययन किया और मुय रूप से व्याकरण का अध्ययन किया। चारों वेदों का अध्ययन महर्षि ने व्यक्तिगत रूप से अपनी योग्यता के आधार पर स्वयं किया। इस आधार पर हम यह नहीं कह सकते कि गुरु विरजानन्द के समय वेद आधे अधूरे थे, ऊपर इस विषय में लिखा जा चुका है।

(12) शंका :- काफी समय से यह पढ़ते और सुनते आए हैं कि पौराणिक लोग कहते थे कि वेदों को शंखासुर पाताल में लेकर घुस गए हैं, इसलिए अब शेष बचे 18 पुराणों से ही काम चलाओ। ऐसी स्थिति में स्वामी दयानन्द जी ने जर्मनी से चारों वेदों को मंगवा कर पण्डितों को दिखाया और सब को बताया। इससे पता चलता है कि स्वामी जी के आने, से पहले चारों वेद भारत में उपलध ही नहीं रह गए थे। इसीलिए तो विदेश से मंगवाने पड़े। अर्थात् आर्ष ग्रन्थों और इतिहास आदि में वेदों के नाम चर्चा ही थी और वे संहिताओं के रूप में उपलध नहीं थे। यह हमारी हालत हो चुकी थी। क्या यह बात ठीक है।

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- vedic dharm

समाधान :-

-(क) वेदों के विषय में स्वार्थी लोगों ने जन सामान्य में भ्रान्ति फैला रखी थी। जैसे वेदों को शूद्र और स्त्री पढ़-सुन नहीं सकते । वेदों में केवल कर्मकाण्ड है, वेदों में मानवीय इतिहास है आदि-आदि के साथ यह भी भ्रान्ति फैलाई कि वेदों को शंखासुर राक्षस पाताल में ले गया। यह  भ्रान्तियाँ स्वार्थी लोगों के द्वारा फैलाई गई थीं। महर्षि दयानन्द ने इन सभी भ्रान्तियों को दूर किया। महर्षि ने वेद के प्रमाण से ही सिद्ध किया कि वेद के पढ़ने का अधिकार सभी को है, वेद का मुय निहितार्थ परमेश्वर है, वेद में किसीाी प्रकार का मानवीय इतिहास नहीं है। और वेद को हम भारतीयों के आलस्य प्रमाद रूपी शंखासुर ने पाताल में पहुँचा दिया। वेद के विषय में यह विशुद्ध स्पष्टीकरण महर्षि दयानन्द का ही था।

अब आपकी बात पर आते हैं, महर्षि दयानन्द ने जर्मन से चारों वेदों को मंगवाया………। उससे पहले हमारे यहाँ मूल वेद नहीं थे। यह बात अनेक वक्ता, विद्वान् बोलते व लिखते हैं। जब इस बात के वास्तविक तथ्य को देखते हैं तो कुछ और ज्ञात होता है। महर्षि ने जर्मन से वेद मंगवाया वह भी केवल ऋग्वेद, यह बात तो सत्य है किन्तु यह कहना की इससे पहले हमारे यहाँ वेद नहीं थे सर्वथा मिथ्या है। महर्षि के द्वारा जर्मन से मंगवाया हुआ वेद अपने यहाँ उपलध सहिंताओं से मिलान करने के लिए था। अन्यथा वेद तो अपने यहाँ विद्यमान थे ही। आज भी महर्षि दयानन्द के समय वा उनसे पूर्व की पाण्डुलिपियाँ उपलध होती हैं। महर्षि स्वयं अपने जन्मचरित्र में लिखते हैं- ‘‘और मुझको यजुर्वेद की संहिता का आरभ करा के उसमें प्रथम रुद्राध्याय पढ़ाया गया……। इस प्रकार 14 चौदहवें वर्ष की अवस्था के आरभ तक यजुर्वेद की संहिता सपूर्ण और कुछ अन्य वेदों कााी पाठ पूरा हो गया था। ’’ दयानन्द ग्रन्थ माला भाग 2. पृष्ठ 768 महर्षि के इन वचनों से ज्ञात होता है कि वेद अपने यहां पहले से विद्यमान रहे हैं।

दक्षिण के ब्राह्मणों में जो वेद कण्ठस्थ करने की परपरा आज भी है और महर्षि के समय में वा उनसे पूर्व भी थी। कण्ठ किये हुए वेद तो थे ही। जो वेद कण्ठस्थ करते थे निश्चित रूप से ये उनके पास वेद संहिताएँ रही होंगी। इसलिए यह कहना कि वेद महर्षि ने जर्मन से मंगवाये उससे पहले यहाँ वेद नहीं थे सर्वथा अनुचित है।

(13) शंका :- जिज्ञासा- यह पत्र मैं मन्त्रों में ‘‘स्वाहा’’ शद के अर्थ में शंका समाधान हेतु लिख रहा हूँ। प्रायः स्वाहा शद आहुति देते समय बोला जाता है किन्तु कुछ मन्त्रों में स्वभाविक रूप से स्वाहा शद का प्रयोग भी देखा है। अतः आप कृपया यथाशीघ्र स्वाहा शद की सभी प्रकार के विभिन्न अर्थ लिखने बताने की कृपा करें। धन्यवाद। – सुरेन्द्र कुमार आर्य।

समाधान कर्ता :- , विषय :-

समाधान :-

समाधान प्रायः यज्ञ में आहुति देते समय ‘स्वाहा’ शद का प्रयोग किया जाता है। यह स्वाहा शद मूल वेद मन्त्रों में भी अनेकत्र आया है। इस स्वाहा का जो अर्थ मुझे आप्त लोगों का मिला है वहा यहाँ लिख रहा हूँ-

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने इस स्वाहा शद की व्याया निरुक्त के आधार पर अपनी लघु पुस्तक पञ्चमहायज्ञविधि में सन्ध्योपासना के ‘‘चित्रंदेवानामुदगादनीकम्…….।’’ इस मन्त्र के अन्त में आये स्वाहा को लेकर की और महर्षि ने वेदभाष्य में भी जहाँ-जहाँ स्वाहा शद आया है वहाँ-वहाँ की है। यहाँ पहले पञ्चमहायज्ञविधि वाली व्याया देखते हैं-

‘‘स्वाहा अथात्र स्वाहाशदार्थे प्रमाणम् निरुक्तकारा आहुः- स्वाहाकृतयः स्वाहेत्येतत्सु आहेति वा, स्वा वागाहोति वा, स्वं प्राहेति वा, स्वाहुतं हविर्जुहातीति वा, तासामेषा भवति। – निरु. अ. 8/खं 20।।’’

‘‘स्वाहाशदस्यायमर्थः- (सु आहेति वा) सु सुठु कोमलं मधुंर कल्याणकरे प्रियं वचनं सर्वैर्मनुष्यैः सदा वक्तव्यम्। (स्वा वागाहेति ना) या स्वकीय वाग् ज्ञान मध्ये वर्त्तते, सा यदाह तदेव वागिन्द्रियेण सर्वदा वाच्यम्। (स्वं प्राहेति वा) स्वं स्वकीय पदार्थ प्रत्येव स्वत्वं वाच्यम् न पर पदार्थ प्रति चेति। (स्वाहुतं ह.) सुष्ठुरीत्या संस्कृत्य संस्कृत्य हविः सदाहोतव्यमिति स्वाहाशदस्यपर्य्यायार्याः स्वमेव पदार्थ प्रत्याह वयं सर्वदा सत्यं वदाम इति, न कदाचित् पर पदार्थ प्रति मिथ्या वदेमेति।’’ – पंचमहा.

अर्थात्- 1. जिस क्रिया के द्वारा सुन्दर मधुर कल्याणकर शद या वचन बोले जाते हैं, 2. अपनी वाणी के द्वारा वही वचन बोलना जो हृदय में है,3. अपने ही पदार्थ को अपना कहना दूसरे के पदार्थ में लालसा न करना, 4. सुसंस्कृत हवि सत्यवाणी, सत्य-आचरणयुक्त क्रिया, त्याग एवं सुखकारी क्रिया, सुसंस्कृत हवि प्रदान करने की क्रिया, प्रशंसायुक्त वाणी, अपने पदार्थ के प्रति सदा सच बोलना और दूसरे के पदार्थ के प्रति कभी मिथ्याभाषण न करना आदि स्वाहा के अर्थ हैं। निघण्टु में वाक् को स्वाहा कहा है।

पौराणिक लोग इस स्वाहा के इतने महत्वपूर्ण अर्थ को छोड़कर अपनी काल्पनिक कथा के अनुसार लेते हैं। भागवत पुराण के अनुसार स्वाहा दक्ष की कन्या और अग्नि की पत्नी है। ब्रह्मवैवर्तपुराण प्रकृति खण्ड, स्वाहोपायान नामक अध्याय में स्वाहा की उत्पत्ति आदि को विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है।

स्वाहा देवहविर्दाने प्रशस्ता सर्वकर्मसु।

पिण्डदाने स्वधा शस्ता दक्षिणा सर्वतो वरा।।1.

प्रकृतेः कलया चैव सर्वशक्तिस्वरूणिणी ।

बभूव वाविका शक्तिरग्ने स्वाहा स्वकामिनी।।2.

ईषद् हास्यप्रसन्ननास्या भक्तानुग्रकातरा।

उवाचेति विधेरग्रे पद्मयोने । वरंश्रुणु।।3.

विधिस्तद्वचनं श्रुत्वा संभ्रमात् समुवाच ताम्।4.

त्वमग्नेर्दाहिका शक्तिर्भव पत्नी च सुन्दरी।

दग्धुं न शक्तस्त्वकृती हुताशश्च त्वया बिना।।5.

तन्नामोच्चार्य मन्त्रान्ते यो दास्यति हविर्णरः।

सुरेश्यस्तत् प्राप्नुवन्ति सुराः स्वानन्दपूर्वकम्।।6.

इन पुराण के श्लोकों में ‘स्वाहा’ को एक स्त्री के रूप में दर्शाया है। उसको अग्नि की पत्नी कहा है, जैसे अन्य देवियों की स्तुति पुराणों में मिलती है इन श्लोकों में भी स्वाहा रूप अग्नि की पत्नी की स्तुति की गई है। ऊपर जो सत्य शास्त्रोक्त अर्थ लिखा उससे यह पौराणिक मान्यता सर्वथा भिन्न व अवैदिक है।

महर्षि दयानन्द के वेदभाष्य व अन्य ग्रन्थों में स्वाहा अर्थ लगभग तरेसठ (63)स्थलों पर आया है जो शास्त्र समत है। यहाँ महर्षि दयानन्द द्वारा कुछ और स्थलों पर स्वाहा के लिए किये गये अर्थों को लिखता हूँ-

‘‘सत्यभाषणयुक्ता वाक्, यच्छोभनं वचनं सत्यकथनं, स्वपदार्थान् प्रति ममत्ववचो, मन्त्रोच्चारणेन हवनं चेति स्वाहा-शदार्था विज्ञेयाः।’’ – यजुर्वेद 2.2

जो सत्यभाषणयुक्त वाणी, भ्रमोच्छेदन करने वाला सत्य कथन, अपने ही पदार्थों के प्रति ममत्व अर्थात् अपनी वस्तु को ही अपना कहना और मन्त्रोच्चार के साथ हवन आहुति देना ये सब स्वाहा के अर्थ हैं।

‘‘सुष्ठु जुहोति, गृहणाति, ददाति यथा क्रियया तथा, सुशिक्षितया वाचा, विद्याप्रकाशिकया वाण्या सत्यप्रियत्वादिगुणविशिष्टयावाचा।’’ – यजु. 4.6

जिस क्रिया के द्वारा अच्छे प्रकार ग्रहण किया और दिया जाता है, सुशिक्षा से युक्त, विद्या को प्रकाशित करने वाली, सत्य और प्रियता रूपी गुणों से विशिष्ट वाणी के द्वारा जो क्रिया की जाती है वह स्वाहा कहलाती है।

‘‘पुष्टायादि कारक घृतादि उत्तम पदार्थों के होम करने।’’ स.प्र.

‘‘सत्यमानं, सत्यभाषणं सत्याचरणं सत्यवचनश्रवणश्च’’ – ऋ. भा. भू.।

सत्य को मानना, सत्य भाषण करना, सत्य का आचरण करना और सत्यवचन का सुनना।

‘‘जैसा हृदय में ज्ञान वैसा वाणी से भाषण।’’

– आर्याभि.

ये सब महर्षि द्वारा किये गये स्वाहा के अर्थ हैं। अधिक जानने के लिए महर्षि दयानन्दकृत यजुर्वेद भाष्य व शतपथादि ग्रन्थों का अध्ययन करें। अलम्

– सोमदेव ऋषि उद्यान, अजमेर

(14) शंका :- जिज्ञासाः- निम्न लिखित वेद मन्त्रों से शंका और उपशंका उत्पन्न होता है। यजुर्वेद अ. 29 के मन्त्रों 40,41 और 42 संया वाले…. ‘‘छागमश्वियोस्वाहा। मेषं सरस्वत्ये स्वाहा, ऋषभमिन्द्राय….। 40’’ ‘‘छागस्य वषाया मेदसो…..मेषस्य वषाया मेदसो, ऋषभस्य वषाया मेदसो……41’’ छागैर्न मेषै, र्मृषमैःसुता…..42 इनमें से 41 और 42 मन्त्रों का अर्थ ‘‘दयानन्द संस्थान से प्रकाशित भाष्य में भी बकरे, भेड़ों और बैल किया गया है। ये सब पौराणिक के जैसा भाष्य देखने को आया शंका होता है इस शंका के समाधान कर के उत्तर भेजें।’’ पं. गभीर राई अग्निहोत्री, कोलाखाम, पोस्ट लावा बाजार- 734319, कालिपोङ

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- vedic dharm

समाधान :-

समाधानमहर्षि दयानन्द आर्यावर्त की उन्नति, सुख, समृद्धि का एक कारण यज्ञ को कहतेहैं। महर्षि सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास में लिखते हैं- ‘‘आर्यवर शिरोमणि महाशय, ऋषि, महर्षि, राजे महाराजे लोग बहुत सा होम करते और कराते थे। जब तक इस होम करने का प्रचार रहा तब तक आर्यावर्त देश रोगों से रहित और सुखों से पूरित था, अब भी प्रचार हो तो वैसा ही हो जाये।’’ महर्षि ने यहाँ यज्ञ की महत्ता को प्रकट किया है। यज्ञ से रोग कैसे दूर होंगे? जब हवन की अग्नि में रोगनाशक पदार्थ डालेंगे तब रोग दूर होगें। यज्ञ में माँस आदि पदार्थ डालने से रोग दूर होकर कैसे कभी सुख की वृद्धि हो सकती है? उलटे मांसादि द्रव्य अग्नि में होम करने से तो रोग उत्पन्न हो दुःख की वृद्धि होगी। महर्षि होम से रोग दूर होना और सुख का बढ़ना देख रहे हैं। यज्ञ में मांसादि का डालना कब और क्यों हुआ वह अन्य पाठकों को दृष्टि में रखकर आगे लिखेगें। पहले आपकी जिज्ञासा का समाधान करते हैं। आपने जो यजुर्वेद 21 वें अध्याय के 40-42 मन्त्र उद्धृत किये हैं वह जो उन मन्त्रों का महर्षि ने भाष्य किया है सो ठीक है। इस भाष्य को देखने पर पौराणिकों जैसा भाष्य न लगकर अपितु और दृढ़ता से आर्ष भाष्य दिखता है। यहाँ पाठकों को दृष्टि में रखकर मन्त्र व उसका ऋषि भाष्य लिखते हैं।

(1) होता यक्षदाग्नि ँ स्वाहाज्यस्य स्तोकानाथंस्वाहा मेदसां पृथक् स्वाहा

छागमश्वियाम् स्वाहा मेषं सरस्वत्यै स्वाहाऽऋषभमिन्द्राय

…..पयः सोमः परिस्रुता घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज।।

19.40

मन्त्रों को पूरा पदार्थ न लिखकर, जिन पर आपकी जिज्ञासा है उनका अर्थ व मन्त्रों का भावार्थ यहाँ लिखते हैं- (छागम्)  दुःख छेदन करने को (अश्वियाम्) राज्य के स्वामी और पशु के पालन करने वालो से (स्वाहा) उत्तम रीति से (मेषम्)सेचन करने हारे को (सरस्वत्यै) विज्ञानयुक्त वाणी के लिए (ऋषभम्) श्रेष्ठ पुरुषार्थ को (इन्द्राय) परमैश्वर्य के लिए।

भावार्थइस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोप्मालङ्कार है। जो मनुष्य विद्या, क्रियाकुशलता और प्रयत्न से अग्न्यादि विद्या को जान के गौ आदि पशुओं का अच्छे प्रकार पालन करके सबके उपकार को करते हैं वे वैद्य के समान प्रजा के दुःख के नाशक होते हैं।

(2) होता यक्षदश्विनौ छागस्य वपाया मेदसो जुषेताम्…

………मेषस्य वपाया मेदसो जुषताम् हविर्होतर्यज……..

….ऋषभस्य वपाया मेदसो जुषताम्……..   19.41

(छागस्य) बकरा, गौ, भैंस आदि पशु सबन्धी (वपाया) बीज बोने वा सूत के कपड़े आदि बनाने और (मेदसः) चिकने पदार्थ के (हविः) लेने देने योग्य व्यवहार का (जुषेताम्) सेवन करें…………(मेषस्य) मेढ़ा के (वपायाः) बीज को बढ़ाने वाली क्रिया और (मेदसः) चिकने पदार्थ सबन्धी (हविः) अग्नि में छोड़ने योग्य संस्कार किये हुए अन्न आदि पदार्थ (जुषताम्) सेवन करें…………(ऋषभस्य) बैल की (वपायाः) बढ़ाने वाली रीति और (मेदसः) चिकने पदार्थ सबन्धी (हविः) देने योग्य पदार्थ का (जुषताम्) सेवन करें।

भावार्थ जो मनुष्य पशुओं की संया और बल  को बढ़ाते हैं वे आपाी बलवान् होते और जो पशुओं से उत्पन्न हुए दूध और उससे उत्पन्न हुए  घी का सेवन करते वे कोमल स्वभाव वाले होते हैं और जो खेती करने आदि के लिए इन बैलों को युक्त करते हैं वे धनधान्य युक्त होते हैं।

(3)होता यक्षदश्विनौ सरस्वतीमिन्द्रम…छागैर्नमेषैर्ऋषभैः

सुता …………मधु पिवन्तु मदन्तु व्यन्तु होतर्यज।। 19.42

पदार्थ (छागैः) विनाश करने योग्य पदार्थों वा बकरा आदि पशुओं (न) जैसे तथा (मेषैः) देखने योग्य पदार्थों वा मेढ़ों (ऋषभैः) श्रेष्ठ पदार्थों वा बैलों (सुताः) जो अभिषेक को पाये हुए हों वे।

भावार्थजो संसार के पदार्थों की विद्या, सत्यवाणी और भली भांति रक्षा करने हारे राजा को पाकर पशुओं के दूध आदि पदार्थों से पुष्ट होते हैं वे अच्छे रसयुक्त अच्छे संस्कार किये हुए अन्न आदि जो सुपरीक्षित हों, उनको युक्ति के साथ खा और रसों को पी धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के निमित्त अच्छा यत्न करते हैं, वे सदैव सुखी होते हैं।

यहाँ इन मन्त्रों के भाष्य और भावार्थ में कहीं भी पौराणिकता नहीं लग रही है। मन्त्रों में छाग, ऋ षभ, मेष आदि शद आये हैं, उनका महर्षि ने जो युक्त अर्थ था वह किया है। छाग का अर्थ लौकिक भाषा में बकरा होता है किन्तु महर्षि ने छाग का अर्थ दुःख छेदन किया है। मेष का अर्थ सामान्य भेड़ होता है, और महर्षि का अर्थ सेचन करने हारा है। ऐसे ही ऋषभ का सामान्य अर्थ बैल और महर्षि का अर्थ श्रेष्ठ पुरुषार्थ है। जब ऐसे पौराणिकता से परे होकर महर्षि ने वैदिक अर्थ किये हैं तब कै से कोई कह सकता है कि यह पौराणिकों जैसा भाष्य दिखता है। भेड़ बैल, बकरा आदि शद आने मात्र से पौराणिकों जैसा भाष्य नहीं हो जाता।

हाँ यदि महर्षि मन्त्र में आये हुए वपा और मेद का अर्थ चर्बी करके उसकी हवन में आहूति की बात कहते तो यह महर्षि का भाष्य अवश्य पौराणिकों वाला हो जाता किन्तु महर्षि ने ऐसा कहीं भी नहीं लिखा। अपितु वपा का अर्थ महर्षि बीज बढ़ाने वाली क्रिया करते हैं और मेद का अर्थ चिकना पदार्थ जो कि महर्षि ने मन्त्रों के भावार्थ में घी-दूध आदि पदार्थ लिखे हैं।

महर्षि का किया वेद भाष्य तो पौराणिकता से दूर वैदिक रीति का भाष्य है। जो पौराणिकों ने इन्हीं वेद मन्त्रों के अर्थ भेड़, बकरा, बैल आदि पशुओं के मांस को यज्ञ में डालना कर रखे थे, उनको महर्षि ने दूर कर शुद्ध भाष्य किया है। पौराणिक लोगों ने लोक प्रचलित अर्थ वेद के साथ जोड़कर भाष्य किया, जिससे इतना बड़ा अनर्थ हुआ कि संसार के जो सभी मनुष्य एक वेद मत को मानकर चल रहे थे, उसको छोड़ नये-नये मत बनाकर चलने लग गये। यह वही वेदमन्त्रों के अनर्थ करने का परिणाम था।

वपा और मेद का अर्थ चर्बी, वसा लोक में है जो कि यही अर्थ पौराणिकों ने लिया। पौराणिकों को ज्ञात नहीं की वेद में रूढ शद और अर्थों का प्रयोग नहीं है अपितु यौगिक शद और अर्थों का प्रयोग है जो कि महर्षि दयानन्द ने योगिक मानकर ही वेदमन्त्रों का अर्थ किया है।

यज्ञ में मांस आदि का डालना महाभारत युद्ध के पश्चात् ब्रह्मणों के आलस्य प्रमाद के कारण हुआ। महर्षि दयानन्द इस  विषय में कहते हैं- ‘‘परन्तु ऐसे शिरोमणि देश को महाभारत के युद्ध ने ऐसा धक्का दिया कि अब तक भी यह अपनी पूर्व दशा में नहीं आया। क्योंकि जब भाई को भाई मारने लगे तो नाश होने में क्या संदेह?………….।’’

जब ब्राह्मण विद्याहीन हुये तब क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के अविद्वान् होने में तो कथा ही क्या कहानी? जो परपरा से वेदादिशास्त्रों का अर्थ सहित पढ़ने का प्रचार था, वहाी छूट गया। केवल जीविकार्थ पाठमात्र ब्राह्मण लोग पढ़ते रहे। सो पाठ मात्र भी क्षत्रियों आदि को न पढ़ाया। क्योंकि जब अविद्वान् हुए, गुरु बन गये, तब छल-कपट-अधर्म भी उनमें बढ़ता चला।…….’’ स.प्र.स. 11।।

यज्ञ में मांसादि का कारण ब्राह्मणों का आलस्य प्रमाद व विषयासक्ति रहा है, यह मान्यता महर्षि दयानन्द की है जो युक्त है।

जब यज्ञों में अथवा यज्ञों के नाम पर पशु हिंसा का प्रचलन हुआ तो अश्वमेघ, गोमेध, नरमेध आदि यज्ञों का यथार्थ स्वरूप न रखकर उल्टा कर दिया अर्थात् अश्वमेघ यज्ञ जो चक्रवर्ती राजा करता था, इसमें इन पोप ब्राह्मणों ने घोड़े के मांस की आहुति का विधान यज्ञ कर दिया। ऐसे गोमेध जो कि गो का अर्थ इन्द्रियाँ अथवा पृथिवी था, जिसमें इन्द्रिय संयमन किया जाता था उस गोमेध यज्ञ में गाय के मांस का विधान इन तथाकथित ब्राह्मणों ने कर दिया। इसके विधान के लिए सूत्रग्रन्थों में ब्राह्मण ग्रन्थों का प्रक्षेप कर दिया। यज्ञों के यथार्थ अर्थ, स्वरूप को समझकर जो पशु यज्ञ व यजमान् के उपकारक थे, उन पशुओं को मार-मारकर यज्ञकुण्डों में उनकी आहुति देने लगे। धीरे-धीरे अनाचार इतना बढ़ा कि वैदिक मन्त्रों का विनियोग यज्ञों में और उनके माध्यम से पशुहिंसा में होने लगा। जिस प्रकार के मन्त्र ऊपर दिये हैं ऐसे मन्त्रों का विनियोग ब्राह्मण वर्ग यज्ञ में पशुहिंसा के लिए करने लगे थे।

वेदों में यज्ञ के पर्याय अथवा विशेषण रूप में ‘अध्वर’ शद का प्रयोग सैकड़ों स्थानों पर आया है। निघण्टु में ‘ध्वृ’ धातु हिंसार्थक है। अध्वर शद में हिंसा का निषेध है अर्थात् नञ् पूवर्क ध्वृ धातु से अध्वर शद बना है। इस अध्वर शद का निर्वचन करते हुए महर्षि यास्क ने लिखा है- अध्वर इति यज्ञनाम-ध्वरहिंसाकर्मा तत् प्रतिषेधः। (निरुक्त-1.8)

अध्वर यज्ञ का नाम है, जिसका अर्थ हिंसा रहित है। अर्थात् जहाँ हिंसा नहीं होती वह अध्वर=यज्ञ कहलाता है। ऐेसे हिंसा रहित कर्म को भी इन पोपों ने महाहिंसा कारक बना दिया था।

मेध शद ‘मेधृ’ धातु से बना है। मेधृ– मेधाहिंसनयोः संगमे च यह धातुपाठ का सूत्र है। मेधृ धातु के बुद्धि को बढ़ाना, लोगों में एकता या प्रेम को बढ़ाना और हिंसा ये तीन अर्थ हैं। इन तीनों अर्थों में से पोप जी को हिंसा अर्थ पसन्द आया और इससे यज्ञ को भी हिंसक बना दिया। जिस धर्म और समाज में अहिंसा को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था वहाँ यज्ञों हिंसा करना एक विडबना ही थी।

वेदों में अनेकत्र ऐसे वचन उपलध हैं जिसमें स्पष्ट ही पशु रक्षा का निर्देश है। यजुर्वेद के प्रारा में यज्ञ को श्रेष्ठतम कर्म कहते हुए कहा है – ‘पशुन्पाहि’ पशु मात्र की रक्षा करो। इसी यजुर्वेद के मन्त्र 1.1 में गौ को ‘अघ्न्या’ न मारने योग्य कहा है। यजु. 6.11 में गृहस्थ को आदेश दिया है- ‘पशुंस्त्रायेथाम्’ पशुओं की रक्षा करो। 14.3 में कहा- ‘द्विपादवचतुष्पात् पाहि’ दो पैर वाले मनुष्य और चार पैर वाले पशुओं की रक्षा करो। वेद में ऐसे-ऐसे निर्देश अनेक स्थलों पर हैं। जो वेद पशुओं की रक्षा करने का निर्देश देता हो उसमें पशुओं की हिंसा का अर्थ निकालना भी पशुता ही है।

महर्षि दयानन्द वेदों के अनुयायी थे। वेदों को सर्वोपरि प्रमाण मानते थे। महर्षि की वेदों के प्रति दृढ़ आस्था थी। और महर्षि ने वेदों को यथार्थ में समझा था। यथार्थरूप में वेद को समझने वाले ऋषि के वेद भाष्य में पौराणिकता कैसे हो सकती है, ऐसा होना सर्वथा असभव है। अस्तु

-ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर

(15) शंका :- (ङ) पंच भौतिक तत्वों में से एक आकाश भी है और भौतिक तत्व प्रकृति के परमाणुओं से बनते हैं, जिनसे पृथ्वी, सूर्यादि पूरा जगत् बनता है। यदि आकाश को निराकार कहा जाए, तो अभाव से भाव कैसे बनेगा। यदि आकाश साकार है तो ‘ओ3म् खम् ब्रह्म’ क्यों कहते हैं। कृपया समाधान करने का कष्ट करें।

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- विविध

समाधान :-

) आकाश को ऋषि दो प्रकार का मानते हैं, एक- जो शद तन्मात्रा से बना है, दूसरा- जो अवकाश रूप आकाश है। उपरोक्त आकार की परिभाषा 3 के आधार पर देखेंगे तो यह शद सूक्ष्म भूत से निर्मित आकाश भी निराकार कहलायेगा और दूसरा जो अवकाश रूप आकाश है वह तो है ही निराकार। यदि आप इस परिभाषा 3 को न मानकर 1 को माने तो भी कोई बाधा नहीं आयेगी क्योंकि अवकाश रूप आकाश तो निराकार है ही। यदि आप निराकार आकाश को लेकर ‘ओ3म् खं ब्रह्म’ को घटाना चाहते हैं तो इस प्रकार आपकी बात घट जायेगी।

किन्तु यहाँ ‘ओ3म् खं ब्रह्म’ में साकार निराकार को लेकर बात नहीं कही जा रही है, यहाँ तो ब्रह्म की विशालता को कहा जा रहा है कि वह ब्रह्म आकाश के समान व्यापक है, विशाल है, बड़ा है। यहाँ यह नहीं कहा जा रहा कि वह ब्रह्म आकाश के समान निराकार है। इस प्रकार यहाँ ब्रह्म की व्यापकता को जो आकाश की उपमा देकर कहा है वह उपमा दोनों आकाश से कही जा सकती है क्योंकि दोनों ही आकाश व्यापक है।

(16) शंका :- (घ) ईश्वर अनन्त, असीम है परन्तु आत्मा ससीम है, इसलिए अणुस्वरूप होने के कारण उसकी कुछ न कुछ लबाई-चौड़ाई तो होगी ही। इसलिए क्या उसे हम साकार नहीं कह सकते, क्योंकि उसकी सीमाएँ हैं? निराकार-साकार की परिभाषा क्या है?

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- विविध

समाधान :-

(घ) आत्मा ससीम, अणुस्वरूप है, इस कारण उसकी कुछ न कुछ तो लबाई-चौड़ाई होगी ही इसलिए उसको साकार कह सकते हैं। यह कहने वाला इसी कारण उसको साकार मानता है तो वह मानता रहे क्योंकि ऐसा मानने वाला साकार-निराकार की परिभाषा ही नहीं जानता। वह तो महत्स्वरूप को निराकार और अणु स्वरूप को साकार मानता है, जो कि इस आधार पर साकार, निराकार की परिभाषा ठीक नहीं है।

(1) साकार वह है जो प्रकृति से बना हुआ है, इससे अतिरिक्त निराकार।

(2) साकार वह जिसमें रूप, रस, गन्ध आदि पाँचों गुण प्रकट हों, इनसे भिन्न अर्थात् जिसमें ये पाँचों प्रकट न हों, वह निराकार।

(3) साकार वह जिसमें रूप गुण प्रकट रूप में हो, इससे भिन्न निराकार।

उपरोक्त साकारा-निराकार की किसी भी परिभाषा से आत्मा साकार सिद्ध नहीं हो रहा और यदि इन परिभाषाओं

की अवहेलना करके कोई व्यक्ति आत्मा को साकार मानता है तो आत्मा सदा नित्य और चेतन सिद्ध न हो पायेगा जो कि वह सदा नित्य और चेतन है। इसलिए उपरोक्त ऋषि प्रमाणों व साकार-निराकार की परिभाषा के अनुसार आत्मा साकार नहीं अपितु निराकार ही है।

(17) शंका :- (ग) आत्मा निराकार है या साकार? आपने लिखा है कि निराकार है, तो क्या आप किसी आर्ष ग्रन्थ या वेद का प्रमाण इस बारे में दे सकते हैं, जैसे कि परमात्मा के बारे में अनेक दिए जा सकते हैं (वेद, उपनिषद, अन्य आर्ष ग्र्रन्थ)।

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- विविध

समाधान :-

(ग) आत्मा निराकार है वा साकार? मैंने अपने समाधान में आत्मा को निराकार लिखा, मेरे ऐसा लिखने पर आपने आर्ष प्रमाण माँगा है। मैं आपको आर्ष प्रमाण देने से पहले निवेदनपूर्वक पूछता हूँ कि क्या आपने साकार मानने वालों से और साकार के विषय में कोई एक-आध आर्ष प्रमाण प्राप्त किया? अस्तु।

आत्मा निराकार है इसके लिए मैंने पहले भी तीन आर्ष प्रमाण दिये थे। अब फिर लिखता हूँ- सत्यार्थप्रकाश, प्रकाशक- सत्यधर्म प्रकाशन, शोधकर्त्ता-समीक्षक- सपादक व भाष्यकार- डॉ. सुरेन्द्र कुमार, पृष्ठ- 557 व सत्यार्थप्रकाश, प्रकाशक- परोपकारिणी सभा, अजमेर, संस्करण 40वाँ, पृष्ठ- 551।

(1) ‘‘बदला दिये जावेंगे कर्मानुसार ।।और प्याले हैं भरे हुए।। जिन दिन खड़े होंगे रूह और फ़रिश्ते सफ़ बांधकर।।मं. 7/सि. 30/सू. 78/आ. 26/34/38 समीक्षा- यदि कर्मानुसार फल दिया जाता है तो…… और रूह निराकार होने से वहाँ खड़ी क्योंकर हो सकेगी।’’ सत्यार्थप्रकाश समुल्लास 14

(2) ‘‘इसी प्रकार भक्तों की उपासना के लिए ईश्वर का कुछ आकार होना चाहिए, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं, परन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि शरीर स्थित जो जीव है, वह भी आकार रहित है, यह सब कोई मानते हैं…… प्रत्यक्ष कभी न देखते हुए भी केवल गुणानुवादों ही से सद्भावना और पूज्य बुद्धि मनुष्य के विषय में रखते हैं।’’ देखें पूना प्रवचन व्या. 1

(3) ‘‘प्रश्न- मूर्त पदार्थों के बिना ध्यान कैसे करते बनेगा?

उत्तर – शद का आकार नहीं तो भी शद ध्यान में आता है वा नहीं? आकाश का आकार नहीं तो भी आकाश का ज्ञान करने में आता है वा नहीं? जीव का आकार नहीं तो भी जीव का ध्यान होता है वा नहीं?…….।’’ पूना प्रवचन व्या. 4

इन सभी स्थलों पर महर्षि ने आत्मा को निराकार लिखा और कहा है। महर्षि की इन बातों की कोई अवहेलना कर आत्मा साकार माने मनवावे तो उसका कौन क्या कर सकता है?

(18) शंका :- (ख) यदि आत्मा अर्थात् मैं या मेरा आत्मा स्थान बदलता है तो मुझे पता क्यों नहीं चलता। किसके बदलने से बदलता है, संचालन कौन करता है?

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- विविध

समाधान :-

(ख) यदि आत्मा स्थान बदलता है तो हमें पता क्यों नहीं चलता? इसमें मैं इतना ही कहूँगा कि यह व्यवस्था ईश्वराधीन है। ईश्वर ने ऐसी अवस्था कर रखी है कि आत्मा स्थान बदलता है। यहाँ व्यवस्था ईश्वर की है और संचालक स्वयं आत्मा है।

स्थान बदलता है तो हमें पता क्यों नहीं चलता? इसको तो आप छोड़िए कितनी सारी स्थूल बातों का ही हमें पता नहीं चल पा रहा। कैसे हमारे अन्दर भोजन विखण्डन हो रहा है, उससे रक्तादि का निर्माण कैसे हो रहा है, हमारे पूरे शरीर के ऊपर रोम-बाल कितने हैं, नेत्र की संरचना कैसी है और भी बहुत सारी स्थूल बातों को हम नहीं जान पा रहे, जान पाते। और फिर आत्मा का विषय तो अति सूक्ष्म है। हाँ, हो सकता है इस स्थान वाली स्थिति को योगी लोग जान लेते हों।

(19) शंका :- परोपकारी जुलाई प्रथम में जिज्ञासा नं. 2 का समाधान करते हुए यह तो बता दिया गया है कि आत्मा का शरीर में मुय निवास स्थान हृदय प्रदेश में ही है, परन्तु जिज्ञासु की इस जिज्ञासा का समाधान नहीं बताया गया कि सुषुप्ति, स्वप्न और जागृत अवस्था में शरीर में आत्मा एक ही स्थान पर रहती है या स्थान बदलती रहती है। यदि स्थान बदलती है तो क्यों?

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- विविध

समाधान :-

समाधान – आपने जो अपनी पीड़ा कही है वह युक्तियुक्त है। निश्चित रूप से जब एक ही बिन्दु पर दो विद्वान् भिन्न-भिन्न विचार प्रकट करते हैं तो सामान्य जन में भ्रान्ति उत्पन्न होती है। वह दोनों के प्रति विश्वास का भाव रखता है, ऐसा होते हुए वह सामान्य जन किसको नकारे वा किसको स्वीकारें। इस विषय में हमारा निवेदन है कि जब-जब ऐसी परिस्थिति बने तब-तब यह अवश्य देख लें कि किस विद्वान् की बात ऋषि समत है और किसकी बात ऋषियों से मेल नहीं रख पा रही। इन दोनों में जिस किसी की बात ऋषियों से प्रमाणित हो उसी विद्वान् की बात को सामान्य जन स्वीकार करें अन्य की नहीं। अस्तु।

अब मैं आपके एक-एक बिन्दु पर विचार करते हुए समाधान लिखता है-

(क) जुलाई प्रथम-2015 की जिज्ञासा-2 के समाधान में मैंने आत्मा का मुय स्थान इसलिए बताया क्योंकि जिज्ञासु आत्मा-परमात्मा को जानना चाहता है, सो इन दोनों का ज्ञान महर्षि दयानन्द के अनुसार हृदय प्रदेश में ही होता है। जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति में आत्मा के जो स्थान जिस उपनिषद् में कहे हैं, वे स्थान युक्ति व ऋषि दयानन्द के मन्तव्य से मेल नहीं रखते। ब्रह्मोपनिषद् में लिखा है-

नेत्रस्थं जागरितं विद्यात् कण्ठे स्वप्नं समाविशेत्।

सुषुप्तं हृदयस्थं तु तुरीयं मुर्ध्नि संस्थितम्।।

अर्थात् जागृत अवस्था में आत्मा को नेत्र में जानें, स्वप्न में कण्ठ में रहता है, सुषुप्ति में हृदयस्थ रहता है और तुरीय अवस्था में आत्मा मूर्धा में निवास करता है।

महर्षि दयानन्द ने दश उपनिषदों को प्रमाण माना है, ग्यारहवें श्वेताश्वतर के प्रमाण भी महर्षि ने अपने ग्रन्थों में कहे हैं इसलिए इस उपनिषद् को भी मिलाकर ग्यारह उपनिषदें प्रामाणिक हैं। यह ब्रह्मोपनिषद् इन ग्यारह से अतिरिक्त है, इस उपनिषद् में पौराणिकता से युक्त बातें भी कही गई हैं जो कि आर्षानुकूल नहीं हैं।

उपरोक्त श्लोक में आत्मा के कहे गये स्थान कितने युक्त हैं, आप करके देखे, जागते हुए जब हमें भय, दुःख, अशान्ति वा प्रसन्नता की अनुभूति आँखों  में होती है वा ऋषि द्वारा वर्णित हृदय में। जब ये सारी अनुाूतियाँ हृदय में होती हैं तो आत्मा को वहीं मानना होगा, अर्थात् आत्मा का निवास स्थान हृदय है, इसलिए मैंने उस लेख में लिखा कि आत्मा का मुय निवास स्थान हृदय है। इसी प्रकार स्वप्न में भय अथवा प्रसन्नता अनुभूति कहाँ होती है, उसको देख विचार करें, वह अनुाूति भी हदृय में ही मिलेगी क्योंकि जहाँ आत्मा है, वहीं उसी स्थान पर प्रसन्नता-अप्रसन्नता की अनुभूति वह करता है। इस प्रकार यह कहना असंगत न होगा कि आत्मा का मूल निवास स्थान हृदय है।

(20) शंका :- क्या ईश्वर संसार में किसी स्थान विशेष में, किसी काल विशेष में रहता है? क्या ईश्वर किसी जीव विशेष को किसी समुदाय विशेष के कल्याण के लिए और दुष्टों का नाश करने के लिए भेजता है? – आचार्य सोमदेव जी

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- अवतारवाद

समाधान :-

ईश्वर इस संसार के स्थान विशेष वा काल विशेष में नहीं रहता परमेश्वर संसार के प्रत्येक स्थान में विद्यमान है। जो परमात्मा को एक स्थान विशेष पर मानते हैं वे बाल बुद्धि लोग हैं। वेद ने परमेश्वर को सर्वव्यापक कहा है। वेदानुकुल सभी शास्त्रों में परमात्मा को सर्वव्यापक कहा है। एक स्थान विश्ेाष पर परमेश्वर को कोई सिद्ध नहीं कर सकता , न ही शद प्रमाण और न ही युक्ति तर्क से। हाँ ईश्वर शद प्रमाण और युक्ति तर्क से विभु= सर्वत्र व्यापक तो सिद्ध हो रहा है, हो सकता है। वेद में कहा-

एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः।

पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।

– प. 31.3

इस पुरुष की इतनी महिमा है कि यह सारा ब्रह्माण्ड परमेश्वर के एक अंश में है अर्थात् वह ईश्वर इस समस्त ब्रह्माण्ड में समाया हुआ अनन्त है, यह समस्त जगत् परमात्मा के एक भाग में है अन्य तीन भाग तो परमात्मा के अपने स्वरूप में प्रकाशित हैं अर्थात् परमात्मा अनन्त है अर्थात् सर्वत्र विद्यमान है उसको किसी एक स्थान पर नहीं कह सकते।

नहि त्वा रोदसी उभे ऋघायमाणमिन्वतः।

जेषः स्वर्वतीरपः सं गा अस्मयं धूनुहि।।

– ऋ. 1.10.8

इस मन्त्र के भावार्थ में महर्षि लिाते हैं – ‘‘जब कोई पूछे कि ईश्वर कितना बड़ा है तो उत्तर यह है कि जिसको सब आकाश आदि बड़े-बड़े पदार्थ भी घेर में नहीं ला सकते, क्योंकि वह अनन्त है। इससे सब मनुष्यों को उचित है कि उसी परमात्मा को सेवन उत्तम उत्तम कर्म करने और श्रेष्ठ पदार्थों की प्राप्ति के लिए उसी से प्रार्थना करते रहें। जब जिसके गुण और कर्मों की गणना कोई नहीं कर सकता, तो कोई अंत पाने को समर्थ कैसे हो सकता है। और भी -’’

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविंर शुद्धमपापाविद्धम्।

कविर्मनीषी परिभूः स्वयभूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीश्यः समायः।।

– य. 40.8

इस मन्त्र में परमेश्वर को सब में व्याप्त कहा है, इस व्याप्ति से ज्ञात हो रहा है कि परमात्मा किसी एक स्थान विशेष पर नहीं अपितु सर्वत्र है। इस प्रकार परमेश्वर के सर्वत्र व्यापक स्वरूप को सिद्ध करने के लिए शास्त्र के हजारों प्रमाण दिये जा सकते हैं। कोईाी प्रमाण ऐसा उपलध नहीं होता जो परमात्मा को एकदेशीय सिद्ध करता हो।

युक्ति से भी कोई परमात्मा को किसी स्थान विशेष पर सिद्ध नहीं कर सकता। आज विज्ञान का युग है, वैज्ञानिकों ने समस्त पृथिवी, समुद्र, आकाश आदि को देख डाला है। जिन किन्हीं का भगवान् समुद्र, पहाड़ आकाश आदि में होता तो अब तक वह भगवान् वैज्ञानिकों के हाथ में होता। जो लोग ईश्वर को ऊपर सातवें वा चौथे आसमान अथवा इससे कहीं और ऊपर मानते हैं वे यह सिद्ध नहीं कर सकते कि कौनसा ऊपर, कौनसा आसमान। क्योंकि प्रमाण सिद्ध यह पृथिवी गोल है। इस गोल पृथिवी के लगभग चारों और मानव आदि प्राणी रहते हैं।

जो मनुष्य भारत में रहते हैं अर्थात् पृथिवी के ऊपरी भाग पर रहते हैं उनका आसमान उनके शिर के ऊपर और जो मनुष्य अमेरिका आदि देशों में है अर्थात् पृथिवी के निचलेााग में रहते हैं उनका आकाश (आसमान) भारत आदि देश में रहने वालों की अपेक्षा विपरीत होगा अर्थात् भारत वालों को पैरों में आकाश होगा ऐसा ही पृथिवी के अन्य स्थानों पर रहने वाले मनुष्य का आकाश जाने । पृथिवी के चारों ओर आकाश है, आसमान है, पृथिवी पर रहने वाले मनुष्यों के शिर जिस ओर होंगे उनका आसमान उसी ओर होगा। ऐसा विचार करने पर जो परमात्मा को आसमान में मानते हैं वे भी एक स्थान विशेष पर सिद्ध नहीं कर सकते। इस विचार से भी परमात्मा सर्वत्र ही सिद्ध होगा। इसलिए परमात्मा सब स्थानों पर विद्यमान है  न कि किसी एक स्थान विशेष पर।

स्थान विशेष की कल्पना ब्रह्माकुमारी मत वालों की भी है। उनका कहना है कि यदि ईश्वर को सर्वव्यापक मानते हैं तो ईश्वर गन्दगी में शौच आदि मेंाी होगा। यदि ऐसा होगा तो ईश्वराी गन्दा हो जायेगा। इन ब्रह्माकुमारी बाल बुद्धि वालों ने ईश्वर को कितना कमजोर बना दिया कि जो ईश्वर सदा पवित्र रहने वाला है, इन ब्रह्माकुमारी वालों का ईश्वर गन्दगी से गन्दा हो जाता है। इनको यह नहीं पता कि यह गन्दगी भौतिक है और ईश्वर अभौतिक। परमेश्वर के अभौतिक ओर सदा पवित्र होने से परमेश्वर के ऊपर इस गंदगी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। हमारे ऊपर भी जो प्रभाव पड़ता है वह इसलिये क्योंकि हमारे पास भौतिक शरीर इन्द्रियाँ आदि हैं, इनसे रहित होने पर हम जीवात्माओं पर भी उस गंदगी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ईश्वर तो सर्वथा इनसे रहित है तो ईश्वर पर इस गंदगी का प्रभाव कैसे पड़ेगा। इसलिए मलिनता से बचाने के लिए ईश्वर को एक स्थान विशेष पर मानना मूर्खता ही है।

इसी प्रकार ईश्वर किसी काल विशेष में होता हो ऐसा नहीं है, परमेश्वर तो सदा सभी कालों में वर्तमान रहता है। काल विशेष में होने की कल्पना अवतारवादी कर सकते हैं, जो कि उनकी यह मान्यता सर्वथा असंगत है। वर्तमान, भूत, भविष्यत काल की आवश्यकता हम जीवों की अपेक्षा से है। परमेश्वर के लिए तो सदा वर्तमान रहता है, भूत भविष्य परमात्मा के लिए नहीं है। परमात्मा सदा एक रस रहता है।

परमात्मा किसी जीव विशेष को किसी समुदाय विशेष की रक्षा वा दुष्टों के नाश के लिए भेजता हो ऐसा नहीं है। यह कल्पना भी अवतारवादियों की है। परमात्मा तो जीवों के कर्मानुसार उनको जन्म देता है। जो जीव विशेष संस्कार युक्त होता हैं वे जगत् के कल्याण और दुष्टों के नाश में प्रवृत्त होते हैं। ऐसा करने पर परमात्मा उनको आनन्द उत्साह आदि प्रदान करता है। किन्तु ऐसा कदापि नहीं है कि परमात्मा ने किसी जीव विशेष को इस कार्य में लगााया है यदि ऐसा मानेंगे तो जीव की स्वतन्त्रता न रहेगी। ऐसा मानने पर सिद्धान्त की हानि होगी। कर्म फल व्यवस्था की सिद्धि ठीक से न हो पायेगी। किसी समुदाय की रक्षा करे तो दोष का भागी हो जायेगा क्योंकि ऐसा कदापि नहीं हो सकता कि पूरे समुदाय में सभी लोग एक जैसे धर्मात्मा हों, उस समुदाय में उलटे लोग भी हो सकते हैं। समुदाय में होने से उनकी भी रक्षा करनी पड़ेगी तो न्याय न हो सकेगा। जब कि परमेश्वर न्याय कारी है उसके द्वारा भेजी गई आत्मा को भी न्याय करना चाहिए जो कि वह कर न सकेगी।

अधिकतर लोगों की मान्यता है कि परमेश्वर किसी आत्मा को न भेजकर स्वयं अवतार लेते हैं । ऐसा करके परमात्मा सज्जनों की रक्षा और दुर्जनों का नाश करते हैं। इस प्रकार की यह मान्यता भी ईश्वर के स्वरूप से विपरीत तथा वेद-शास्त्र के प्रतिकूल है। क्योंकि ईश्वर विभु है, अनन्त है, वह अनन्त प्रभु एक छोटे से शान्त शरीर में कैसे आ सकता है? परमेश्वर जन्म मरण से परे है फिर शरीर में आकर जन्म-मृत्यु को कैसे प्राप्त कर सकता है? परमेश्वर का अवतार मानने पर इस प्रकार की अनेक दोषयुक्त बातों को मानाना पड़ेगा।

अवतारवादियों का अवतार मानने का मुय आधार ये दो श्लोक हैं-

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अयुत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजायहम्।।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।

इन श्लोकों में अवतार लेने का कारण कि जब-जब धर्म की हानि होगी तब-तब धर्म के उत्थान और अर्धा के नाश के लिए तथा श्रेष्ठों के परित्राण =रक्षा और दुष्टों के नाश के लिए अवतार लेता है। अब यहाँ विचारणीय यह है कि जिस परमात्मा ने बिना शरीर के इस सब ब्रह्माण्ड को रच डाला, हम सब प्राणियों के शरीरों की रचना की है, उस परमात्मा को कुछ क्षुद्र, दुष्ट व्यक्तियों को मारने के लिए शरीर धारण करना पड़े यह बात बुद्धिग्राह्य नहीं है। इससे तो ईश्वर का ईश्वरत्व न रहकर ईश्वर का बहुत लघुत्व सिद्ध हो रहा है। यदि परमात्मा को यही करना है तो वह इस प्रकार के कार्य बिना शरीर के भी कर सकता है क्योंकि वह पूर्ण समर्थ है। अस्तु

इन उपरोक्त गीता के श्लोकों में अवतार का कारण हमने देखा अब देवी भागवत पुराण में अवतार लेने का कारण देखिये कया लिखा –

शपामि त्वां दुराचारं किमन्यत् प्रकरोमिते।

विध्ुारोहं कृतः पाप त्वयाऽहं शापकारणात्।।

अवतारा मृत्युलोके सन्तु मच्छापसंभवाः।

प्रापो गर्भभवं दुःख भुक्ष्ंव पापाज्जनार्दन।।

इन देवी भागवत के श्लोकों में अवतार का कारण धर्म की रक्षा वा अधर्म के नाश करने के लिए नहीं कहा अपतिु भृगु का शाप कहा है। अर्थात् महर्षि भृगु ने विष्णु को उसके दुराचार कर्म के कारण शाप दिया उनके शाप के प्रााव  से विष्णु का मृत्य ुलोक में अवतार हुआ। गीता के और देवी भागवत पुराण में अवतार के कारणों में परस्पर विरोध है। और देखिये-

बौद्धरूपस्त्वयं जातः कलौ प्राप्ते भयानके।

वेदधर्मपरायन् विप्रान् मोहयामास वीर्यवान्।

निर्वेदा कर्मरहितास्त्रवर्णा तामासान्तरे ।।

यहाँ गीता से सर्वथा विपरीत अवतार का कारण कहा है। गीता धर्म की रक्षा कारण कहती है और यहाँ तो धर्म के नाश के लिए अतवार ले लिया, अर्थात् भागवत पुराण कहता है- भगवान ने बुद्ध का अवतार लेकर, सबको विरुद्ध उपदेश देकर नास्तिक बनाया तथा वेद मार्ग का नाश किया। यहाँ ये अवतारवादियों के ग्रन्थ परस्पर विरुद्ध कथन कर रहे हैं।

यथार्थ में तो ईश्वर के किसी भी रूप में जन्म धारण करने की कल्पना ही युक्ति व शास्त्र विरुद्ध है। क्योंकि ईश्वर को किसी भी प्रकार के सहारे की आवश्यकता नहीं, चाहे वह सहारा किसी शरीर का हो अथवा किसी अन्य प्राणी का। परमेश्वर अपने सब कार्य करने में समर्थ है, उसको कोई अवतार लेने की आवश्यकता नहीं है।

वेद में ईश्वर को ‘‘अकायमव्रणमस्नाविरम्’’ कहा है। वह परमात्मा सूक्ष्म और स्थूल शरीर के बन्धन से रहित है अर्थात् इन बन्धन में नहीं पड़ता। श्वेताश्वतर उपनिषद् मेंऋषि ने कहा-

वेदाहमेतमजरं पुराणं सर्वात्मानं सर्वगतं विभुत्वात्।

जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यस्य ब्रह्मवादिनो हिप्रवदन्ति नित्यम्।।

– 4.21

अर्थात् वह परमात्मा अजर है, पुरातन (सनातन) है, सर्वान्तर्यामी है, विाु और नित्य है। ब्रह्मवादी सदा उसका बखान करते हैं वह कभी जन्म नहीं लेता।

उपरोक्त सभी प्रमाणों से सिद्ध हो रहा है कि परमात्मा जीव के कर्मानुसार उसके भोग के लिए शरीर स्थान, समुदाय आदि देता है न कि अपनी इच्छा से किसी का नाश वा रक्षा के लिए उसको भेजता है और ऐसे ही स्वयं भी अवतार लेकर कुछ नहीं करता अर्थात् स्वयं शरीर धारण करके किसी की रक्षा वा नाश नहीं करता।

(21) शंका :- आचार्य सोमदेव समानीय आचार्य सोमदेव जी को मेरा सादर प्रणाम। जिज्ञासा- श्रद्धास्पद आचार्य जी! मैं उदालगुरी आर्यसमाज का पुरोहित हूँ। मैं 2012 जून महीने में अनुष्ठित योग-साधना-शिविर में उपस्थित रहकर एक सप्ताह तक योग-साधना आप ही से सीखकर आया हूँ। उसी समय से परोपकारिणी सभा की ओर से नियमित रूप से परोपकारी पत्रिका उदालगुरी आर्यसमाज को निःशुल्क मिल रही हूँ। सभा को उदालगुरी आर्यसमाज की ओर से धन्यवाद ज्ञापन करते हैं। आचार्य जी! मैं तीन साल से अन्य द्वारा पूछे गये जिज्ञासा-समाधान पढ़-पढ़ कर उपकृत होता आया हूँ। लेकिन आज मेरे मन में भी एक जिज्ञासा है, समाधान चाहता हूँ। प्रश्न- महोदय! यजुर्वेद के बारे में जानना था- प्रायः यजुर्वेद के बारे में शुक्ल और कृष्ण शद व्यवहार होता है। किन्तु मेरे पास जो वेद हैं, उसमें सिर्फ ‘यजुर्वेद’ लिखा हुआ है। कृष्ण-शुक्ल कुछ भी नहीं लिखा है। कोई पौराणिक पण्डित संकल्प पढ़ते समय ‘शुक्ल यजुर्वेदाध्यायी’ ऐसााी पढ़ लेते हैं। कृपया शुक्ल और कृष्ण के बारे में स्पष्टिकरण देने की कृपा करें। – रुद्र शास्त्री, गाँव- गोलमागाँव, पो.जि.- उदालगुरी, आसाम

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- vedic dharm

समाधान :-

समाधान चारों वेदों में से यजुर्वेद दो प्रकार का मिलता है। शुक्ल यजुर्वेद और कृष्ण यजुर्वेद। इसके इन दोनों नामों का कारण है कि शुक्ल यजुर्वेद में केवल मन्त्र भाग है, अर्थात् इसमें मूल मन्त्र होने से शुक्ल (शुद्ध) वेद कहलाता है। कृष्ण यजुर्वेद विनियोग, मन्त्र व्याया आदि से मिश्रित होने के कारण मूल न होकर मिश्रित वा कृष्ण यजुर्वेद कहलाता है। मुय रूप से यही कारण शुक्ल और कृष्ण कहने का है।

शुक्ल यजुर्वेद की दो शाखाएँ वर्तमान में मिलती हैं, वाजसनेयि माध्यन्दिन संहिता और काण्व संहिता। दोनों में चालीस अध्याय हैं, काण्व संहिता का चालीसवां अध्याय ईशोपनिषद् के रूप में प्रयात है। कृष्ण यजुर्वेद की चार शाखाएँ मिलती हैं- तैत्तिरीय, मैत्रायणी, काठक और कठ कपिष्ठल शाखा।

महर्षि दयानन्द के अनुसार मूल वेद शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा है। इसी का महर्षि ने भाष्य किया है।

आपके प्रश्न का उत्तर तो इतने से ही है। इस विषय में पौराणिकों ने इन दोनों शुक्ल, कृष्ण को सिद्ध करने के लिए अपनी कथाएँ कल्पित कर रखी हैं। इन कत्थित कथाओं को छोड़ शुक्ल-कृष्ण का यथार्थ कारण उपरोक्त ही है।

अब यजुर्वेद के विषय में कुछ और लिखते हैं। वेदों की कुल शाखा 1127 होने का प्रमाण पातञ्जल महाभाष्य में मिलता है। वहाँ लिखा है- एकविंशतिधा वाह्वृच्यम्, एकशतम् अध्वर्युशाखाः, सहस्रवर्त्मा सामवेदः, नवधाऽऽथर्वणो वेदः, अर्थात् इक्कीस शाखा ऋग्वेद की, एक सौ एक शाखा यजुर्वेद की, एक हजार शाखा सामवेद की और नौ शाखा अथर्ववेद की।

यजुर्वेद की एक सौ एक शाखाओं में से छः शाखाएँ उपलध होती हैं। जो कि ऊपर कह दिया है। शुक्ल यजुर्वेद का ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण है, जिसके रचयिता महर्षि याज्ञवल्क्य हैं। कृष्ण यजुर्वेद का ब्राह्मण तैत्तिरीय ब्राह्मण है, जिसकी रचना तित्तिरि आचार्य ने की है। शुक्ल यजुर्वेद का श्रौतसूत्र कात्यायन कृत है जो कि कात्यायन श्रोतसूत्र कहलाता है। कृष्ण यजुर्वेद से सबन्धित आठ श्रौतसूत्र हैं- 1. बौधायन, 2. आपस्तब, 3. सत्यषाढ़ या हिरण्यकेशी, 4. वैखासन, 5. भारद्वाज, 6. वाधूल, 7. वाराह, 8. मानव श्रौतसूत्र।

महर्षि दयानन्द यजुर्वेद के प्रतिपाद्य विषय के सबन्ध में अपने भाष्य के प्रारभिक प्रकरण में लिखते हैं कि ‘‘ईश्वर ने जीवों को गुण-गुणी के विज्ञान के उपदेश के लिए ऋग्वेद में सब पदार्थों की व्याया करके यजुर्वेद में यह उपदेश किया कि उन पदार्थों से यथायोग्य उपकार ग्रहण करने के लिए कर्म किस प्रकार करने चाहिए। उसके लिए जो-जो अङ्ग और जो-जो साधन उपेक्षित हैं, उन सबका प्रकाश यजुर्वेद में किया गया है। जब तक ज्ञान क्रियानिष्ठ नहीं होता, तब तक उससे श्रेष्ठ सुख कभी नहीं हो सकता। विज्ञान क्रिया में निमित्त बनता है, प्रकाशकारक होता है, अविद्या की निवृत्ति करता है, धर्म में प्रवृत्ति करता है और धर्म तथा पुरुषार्थ का मेल कराता है, जो-जो कर्म विज्ञाननिमित्तक होता है, वह-वह सुखजनक हो जाता है। अतः मनुष्यों को चाहिए कि विज्ञानपूर्वक ही नित्य कर्मानुष्ठान करें। जीव चेतन होने से बिना कर्म किये नहीं रह सकता। कोई भी मनुष्य आत्मा मन, प्राण और इन्द्रियों के संचालन के बिना क्षणभर भी नहीं रह सकता। ‘यजुर्भिः यजन्ति’ इस प्रमाण से यजुर्वेद के मन्त्रों से यजन किया जाता है। जिससे मनुष्य ईश्वर का और धार्मिक विद्वानों का पूजा सत्कार करते हैं, पदार्थों के संगतिकरण द्वारा शिल्पविद्या की सिद्धि किया करते हैं, शुभ विद्या और शुभ गुणों का दान किया करते हैं, यथायोग्य सबके उपकार में शुभ व्यवहार में और विद्वानों में धनादि का व्यय करते हैं वह यजुः है।’’ इस प्रकार यजुर्वेद में मुय करके कर्मकाण्ड का विषय है। महर्षि ने इसी बात को सत्यार्थप्रकाश व ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में भी कहा है।

– ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर

(22) शंका :- मेरा प्रश्न है कि ऋषि के सत्यार्थ प्रकाश के अनुसार शरीर की चार अवस्था मानी गई हैं। सुषुप्ति, स्वप्न और जागृत व तुरीय। हम सामान्य पुरुषों की तुरिय न होकर अन्य तीन अवस्थाएँ मैं समझती हूँ। इन तीन अवस्थाओं में आत्मा का निवास कहाँ होता है। ये मेरी शंका है क्योंकि मैंने स्वाध्याय में पाया है- प्रथम आत्मा का ज्ञान होगा तो तभी ईश्वर का ज्ञान होगा, अन्यथा नहीं। त्रैतवाद का दूसरा अंग आत्मा ही है। अतः मैं आत्मा के विषय मैं पूरा-पूरा ज्ञान जानना चाहती हूँ। कृपया मुझे बताईये। – सुमित्रा आर्या, 961/10, आदर्श नगर, सोनीपत, हरियाणा।

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- vedic dharm

समाधान :-

सत्यार्थप्रकाश के 9वें समुल्लास में महर्षि ने मुक्ति साधन कहे हैं, उन साधनों में तीन अवस्थाओं का वर्णन है- जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति। वहाँ तुरीय को अवस्था न कहकर ऋषि ने चौथे शरीर रूप में वर्णन किया है। इस तुरीय शरीर की व्याया करते हुए महर्षि लिखते हैं – ‘‘तुरीय शरीर वह कहाता है, जिसमें समाधि से परमात्मा के आनन्दस्वरूप में जीव होते हैं। इसी समाधि संस्कारजन्य शुद्ध शरीर का पराक्रम मुक्ति में भी यथावत् सहायक रहता है।’’ इस प्रकार यह तुरीय अवस्था न होकर तुरीय शरीर है।

आप शरीर में आत्मा निवास को जानना चाहती हैं, इस विषय में उपनिषद् में लिखा हुआ कि उसका निवास स्थान हृदय है। महर्षि दयानन्द ने ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका में उपासना विषय में इस हृदय स्थान की व्याया स्पष्ट की है। यह भी लिखा है कि इसी हृदय प्रदेश में योगी जन अपने आत्मा का मेल परमात्मा से करते हैं। यह मेल जाग्रत अवस्था समाधि में होता है, सुषुप्ति में नहीं। इससे ज्ञात होता है कि आत्मा का शरीर में मुय निवास स्थान हृदय प्रदेश में ही है। इसकी अनुभूति आप स्वयं भी कर सकते हैं, जब हमें भय लगता है तो भय की अनुभूति न तो आँखों में होती न ही कण्ठ व अन्य स्थान पर, यह अनुभूति हृदय प्रदेश में ही होती है। क्योंकि वहाँ आत्मा रहता है, जो कि अनुभव करने वाला है। भय के समान सुख-दुःख आदिकी अनुभूति समझें।

रही आत्मा के स्वरूप की बात तो यह स्वरूप ऋषियों ने शास्त्र में वर्णित कर रखा है। जीवात्मा नित्य है, चेतन, अनादि, निराकार, अल्पज्ञ एकदेशीय, अल्पशक्तिवाला, जन्म-मरण में जाने आने वाला, कर्म करने में स्वतन्त्र, फल भोगने में परतन्त्र है इत्यादि स्वरूप आत्म का वर्णन मिलता है।

लिंग की दृष्टि से देखें तो आत्मा स्त्री, पुरुष, नपुंसक लिंग भेद नहीं। पुरुष का आत्मा अन्य जन्म में स्त्री शरीर में और स्त्री का आत्मा पुरुष शरीर में आता-जाता है, आ-जा सकता है। लिंग निर्धारण तो शरीर के आधार पर होता है, यथार्थ आत्मा का कोई लिंग नहीं है। इस प्रकार आत्मा के स्वरूप को जानने के लिए ऋषियों के ग्रन्थों का स्वाध्याय करें विस्तार से जानकारी मिलेगी। अस्तु।

– ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर।

 

(23) शंका :- बहुतायत आर्य समाजों में यज्ञ के पश्चात् ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिन…..’’का पाठ किय जाता है। शंका संया 1- यह श्लोक है या कि मन्त्र है? किसी आर्ष ग्रन्थ से उद्घृत किया गया है?

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- विविध

समाधान :-

समाधान 1- यज्ञ के बाद प्रायः यज्ञ प्रार्थना व अन्य श्लोक, गीत आदि गाये जाते हैं, जा रहे हैं। अनेक बार समय का आाव होने पर भी ये प्रार्थना श्लोक आदि यज्ञ के समय को बढ़ा देते हैं, जिससे जो लेगा अपने व्यस्त जीवन में से समय निकालकर यज्ञ करना चाहते हैं तो वे लोग इस लबी प्रक्रिया को देख पीछे हट जाते हैं।

आपको बात दें कि इस यज्ञ प्रक्रिया को ऋषि दयानन्द जितना सरल बना सकते थे, उतना सरल बनाकर गये हैं। इस सरलतम विधि से यज्ञ करते हैं तो अति व्यस्त व्यक्ति भी नित्य प्रति यज्ञार्थ 15-20 मिनट निकाल सकता है। महर्षि दयानन्द ने यज्ञ की पूर्ण आहुति के बाद कुछ करने को नहीं लिखा है, हाँ संस्कार विशेष में ‘वामदेव’ गान की तो बात महर्षि कहते हैं। फिर भी जिसके पास समय है, वह ये यज्ञ प्रार्थना आदि कर सकता है, इसके करने से कोई विशेष पुण्य मिलेगा अथवा न करने से पाप हो जायेगा ऐसी कोई बात प्रतीत नहीं होती।

अब आपकी बात पर आते हैं- आपने जो ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिन…..’’ विषय में पूछा है कि यह मन्त्र है या श्लोक? तो हम आपको बता दें कि यह किसी वेद का मन्त्र नहीं है। यह तो पुराण का श्लोक है। गरुड़ पुराण  में श्लोक कुछ पाठ भेद से दिया गया है। पुराण में यह श्लोक इस रूप में है-

सर्वेषां मंगलं भूयात् सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भागभवेत्।।

– ग. पु. अ. 35.51

पुराण में ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’’ के स्थान पर ‘‘सर्वेषां मंगलं भूयात्’’ है। आपकी जिज्ञासा इस श्लोक के कविताशं पर है। आप ‘‘कोई न हो दुःखारी’’ का अर्थ ‘‘क ोई न हो दुःख का शत्रु’’ ऐसा निकाल रहे हैं अर्थात् इस अर्थ के अनुसार सभी दुःखी होवें, ऐसा अभिप्राय आयेगा। इस प्रकार का अर्थ करने में आपका हेतु है ‘पुजारी’ शद इस पुजारी शद का अर्थ आप पूजा का शत्रु कर रहे हैं और इसमें महर्षि दयानन्द का साक्ष्य भी दे रहे हैं। हम आपको बता दें ‘पुजारी’ शद का अर्थ तो ‘‘पूजा करने वाला’’ ही है। इसी अर्थ को ‘पुजारी’ शद लिए है, कहा जा रहा है। महर्षि ने जो अर्थ ‘पूजा का शत्रु’ किया है वह आजकल के पूजा करने वालों पर विनोद में (मजाक में) व्यंग किया है। मात्र वहाँ महर्षि विनोद में यह अर्थ कर रहे हैं, न कि यथार्थ में। यदि महर्षि से कोई यथार्थ में इसका अर्थ पूछता तो महर्षि ‘पूजा करने वाला’ इस अर्थ को ही कहते बताते क्योंकि इस शद का अर्थ ही यह है।

आपने अपनी बात को सिद्ध करने के लिए ‘मुरारि’ शद दिया है, यह पहली  बार आपने ठीक लिखा किन्तु इससे आपकी बात सिद्ध न हुई तो इसको बिगाड़ कर ‘मुरारी’ लिख दिया, जो कि अयुक्त है। कहीं भी किसी भी कोश में आपको ‘मुरारि’ (मुर नामक दैत्य को मारने वाला= कृष्ण) के स्थान पर ‘मुरारी’ नहीं मिलेगा। इसलिए जिस बात को आप सिद्ध करना चाहते हैं, वह सिद्ध न होगी।

आपने यह भी प्रतिबन्ध लगा दिया की मात्रा का भेद न करें। आप भाषा विज्ञान शद विज्ञान को जानेंगे-समझेंगे तो ऐसा भ्रम नहीं होगा। जो शद जैसा है, वह अपने उस स्वरूप के अनुसार, प्रकरण और प्रसंग अनुसार अर्थ देता है। ऐसा ही यहाँ भी समझें।

(24) शंका :- हमारे चार वेद हैं और वे चारों ज्ञान के भण्डार हैं, लेकिन श्रीकृष्ण ने श्रीमद् भगवद्गीता में सामवेद को ही अपनी विभूति क्यों कहा है?

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- vedic dharm

समाधान :-

चारों वेद ज्ञान के भण्डार हैं, यह ठीक है, चारों ही वेदों का बराबर महत्व  है। वेदों के अपने विषय हैं- ज्ञान, कर्म, उपासना, विज्ञान, इनमें से किसी को सभी प्रिय हो सकते हैं और किसी को एक या दो। हो सकता है, जिस समय कृष्ण जी ने यह कहा, उस समय उनको उपासना प्रिय हो, जो कि सामवेद का विषय है।

आपको बता दें कि साम नाम केवल सामवेद का ही नहीं है, अपितु चारों वेदों में जो ऋचाएँ स्वर सहित गाई जाती हैं, उनका नाम साम है। इस आधार पर केवल सामवेद ही विभूति नहीं है, अपितु चारों वेदों में गायी जाने वाली सभी ऋचाएँ विभूति हैं। श्रीकृष्ण जी योगीराज थे, योगीजन उपासना प्रिय होते हैं, उपासना की दृष्टि से उन्होंने सामवेद को अधिक मह        व दिया होगा। अस्तु।

(25) शंका :- उपनिषद् ग्यारह हैं, उनके नाम मेरे पास हैं, लेकिन प्रत्येक उपनिषद् में किस-किस प्रकार का ज्ञान है, वह नहीं मिलता या प्राप्त है।

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- vedic dharm

समाधान :-

आपने कहा ‘उपनिषदों में किस प्रकार का ज्ञान है? वह नहीं मिलता अर्थात् क्या विषय है, यह नहीं मिलता’ यह कहना उपयुक्त नहीं, क्योंकि उपनिषदों को पढ़ने से इनमें आये विषय का स्पष्ट ज्ञान होता है। उपनिषदों में मुख्य आत्मा-परमात्मा का विषय है। आत्मा व परमात्मा के स्वरूप को उपनिषद् बताते हैं। इनकी प्राप्ति कैसे होती है, यह उपनिषद् बताते हैं, प्रकृति का वर्णन भी उपनिषदों में आया है। पुनर्जन्म, सूक्ष्मशरीर, प्राण, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि इन सबके विषय में उपनिषद् वर्णन करते हैं। इतना सब उपनिषदों से ज्ञात होता है, इससे आप उपनिषदों के विषय को जान सकते हैं।

(26) शंका :- अब तक कितने मनु हुए हैं, उनके क्या नाम हैं, उनमें से प्रत्येक ने किस प्रकार का ज्ञान दिया? श्रीमद् भगवद्गीता में योगीराज श्रीकृष्ण ने चौदह मनु को रेफर किया है, परन्तु इससे अधिक कुछ नहीं कहा।

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- vedic dharm

समाधान :-

अब तक कितने मनु हुए? इस विषय में सर्वांशरूप से तो कुछ नहीं कह सकते। मनु नाम के कितने ऋषि वा मनुष्य हुए, यह कहना कठिन है। हाँ, मनुस्मृति के रचनाकार महर्षि मनु वा स्वायम्भुव मनु का इतिहास तो अनेकत्र उपलब्ध  होता है, जो कि आदि सृष्टि में हुए हैं, किन्तु और कितने तथा कौन-कौन नाम वाले मनु हुए, इसका इतिहास प्राप्त नहीं है। हाँ, अनार्ष ग्रन्थ भागवत पुराण में चौदह मनुओं का व उनके पुत्रादि का वर्णन मिलता है, किन्तु यह तो उनकी कल्पना ही लगती है।

मन्वन्तर रूपी काल के नाम तो उपलब्ध  हैं, जैसे दिनों के नाम रवि, सोम एवं महिनों के नाम चैत्र, ज्येष्ठ आदि हैं, उसी प्रकार चौदह मन्वन्तरों के भी नाम हैं- १. स्वायम्भुव, २. स्वरोचिष, ३. उ      ाम, ४. तामस, ५. रैवत, ६. चाक्षुष, ७. वैवस्वत, ८. सावर्णि, ९. दक्षसावर्णि, १०. ब्रह्मसावर्णि, ११. धर्मसावर्णि, १२. रुद्रसावर्णि, १३. देव सावर्णि, १४. इन्द्रसावर्णि। ये मनु हैं, अथवा ये चौदह मन्वन्तर के नाम हैं।

इस विषय में अनार्ष ग्रन्थ भागवत पुराण में लिखा है-

राजंश्चतुर्दशैतानि त्रिकालानुगतानि ते।

प्रोक्तन्येभिर्मितः कल्पो युगसाहस्रपर्ययः।।

– ८.१३.३६

हे राजन! ये चौदह मन्वन्तर भूत, वर्तमान और भविष्य- तीनों ही कालों में चलते रहते हैं। इन्हीं के द्वारा एक सहस्र चतुर्युगी वाले कल्प के समय की गणना की जाती है।

ये चौदह नाम मनु के मिलते हैं और ये समय (काल) के नाम हैं। काल जड़ है, चेतन नहीं है। जड़ होते हुए ये चेतन की भाँति किसी प्रकार का ज्ञान देने में असमर्थ हैं, ज्ञान नहीं दे सकते।

(27) शंका :- श्रुतियाँ कितनी हैं, उनके क्या-क्या नाम हैं, उनके लेखक/सृजन कर्ता कौन हैं, उनमें किस विषय का ज्ञान है?

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- vedic dharm

समाधान :-

महर्षि दयानन्द के अनुसार वेद को ही श्रुति कहते हैं, इस आधार पर श्रुतियों की संख्या चार ही रहेंगी अर्थात् श्रुतियाँ चार हैं। महर्षि दयानन्द ऋग्वेदादिभाष्य-भूमिका के वेदोत्पत्ति  विषय में प्रश्नोत्तर  पूर्वक लिखते हैं-

‘‘प्रश्न- वेद और श्रुति ये दो नाम ऋग्वेदादि संहिताओं के क्यों हुए हैं? उत्तर – अर्थभेद से। क्योंकि एक ‘विद’ धातु ज्ञानार्थ है, दूसरा ‘विद’ सत्तार्थ  है, तीसरे ‘विदलृ’ का अर्थ लाभ हैं, चौथे ‘विद’ का अर्थ विचार है। इन चार धातुओं से करण और अधिकरण कारक में ‘घञ्’ प्रत्यय करने से ‘वेद’ शब्द  सिद्ध होता है तथा ‘श्रु’ धातु श्रवण अर्थ में है। इससे करण कारक में ‘क्तिन्’ प्रत्यय के होने से ‘श्रुति’ शब्द  सिद्ध होता है। जिनके पढ़ने से यथार्थ विद्या का विज्ञान होता है, जिनको पढ़के विद्वान् होते हैं, जिनसे सब सुखों का लाभ होता है और जिनसे ठीक सत्यासत्य का विचार मनुष्यों को होता है, इससे ऋक्संहितादि का वेद नाम है। वैसे ही सृष्टि के आरम्भ से आज पर्यन्त और ब्रह्मादि से लेके हम लोग पर्यन्त। जिससे सब विद्याओं को सुनते आते हैं, इससे वेदों का ‘श्रुति’ नाम पड़ा है, क्योंकि किसी ने वेदों के बनाने वाले देहधारी को साक्षात् कभी नहीं देखा। इस कारण से जाना गया कि वेद निराकार ईश्वर से ही उत्पन्न हुए हैं और सुनते-सुनाते ही आज पर्यन्त सब लोग चले आते हैं।’’

महर्षि के इन वचनों से स्पष्ट हो रहा है कि वेद ही श्रुति है। अब रही नाम की बात तो वह भी सरलता से पता चलता है, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद ये श्रुतियों के नाम हैं।

इन श्रुतियों का सृजन कर्ता  कोई देहधारी मनुष्य नहीं था। इनका सृजन कर्ता  तो निराकार, सर्वज्ञ परमेश्वर ही है। इनका ज्ञान परमेश्वर ने आदि सृष्टि में ऋषियों को दिया। किन ऋषियों ने कब इस श्रुतिरूपी ज्ञान को लिपिबद्ध किया अर्थात् लिखा, इसका इतिहास प्राप्त नहीं है, अर्थात् हम यह नहीं बता सकते कि इनको लिखने वाले ऋषि कौन थे और इनको किस समय लिखा।

इनमें किस विषय का ज्ञान है, इसको विस्तार से जानने के लिए महर्षि दयानन्द द्वारा लिखित ऋग्वेदादि-भाष्यभूमिका का अध्ययन करें।

श्रुति के विषय में हमने महर्षि दयानन्द की मान्यता को रखा, जिसको हम भी स्वीकारते हैं। अब अन्य विद्वानों की मान्यता को यहाँ थोड़ा लिखते हैं। कुछ विद्वान् श्रुति से मन्त्र भाग व ब्राह्मण भाग दोनों लेते हैं, अर्थात् मूल वेद और उसके व्याख्या ग्रन्थ शतपथ आदि ब्राह्मण ग्रन्थ। उनका कहना है- ‘श्रूयतेऽनया सा श्रुतिः’ जिससे अर्थ को सुना जाये अर्थात् जाना जाये। ऐसी व्याख्या करके वे दोनों अर्थ ग्रहण करते हैं।

ऐसी मान्यता वाले विद्वान्, जब कभी श्रुति की बात आती है तो व्याख्यान ग्रन्थ ब्राह्मणों का भी प्रमाण मानते हैं, जबकि महर्षि दयानन्द श्रुति से वेद को प्रमाण मानते हैं। इस विषय में आर्यसमाज के योग्य विद्वान् पं. युधिष्ठिर मीमांसक जी ने भी अपना विचार रखा है, वे लिखते हैं- ‘‘हमारे विचार से ‘श्रुति’ शब्द  का प्रधान अर्थ गुरु परम्परा से नियमतः अधीयमान मन्त्रों का ही है, परन्तु व्याख्येय-व्याख्यानसम्बन्ध रूप लक्षणा से इनका प्रयोग ब्राह्मण वचनों के लिए भी होता है।’’

(28) शंका :- ब्राह्मण ग्रन्थ कितने हैं, उनके क्या नाम हैं, उनके रचयिता/लेखक कौन हैं, प्रत्येक ग्रन्थ में क्या ज्ञान है?

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- vedic dharm

समाधान :-

मुझे आपके व अन्य विद्वानों के लेख, जो कि परोपकारी पत्रिका में समय-समय पर प्रकाश्ति होते हैं, उनमें हमारी वैदिक संस्कृति से सम्बन्धित ग्रन्थों का सन्दर्भ दिया  जाता है। यह मेरा दुर्भाग्य है कि मैं उनके

बारे में अधिक ज्ञान नहीं रखता और कदाचित कोई इस प्रकार की पुस्तक भी नहीं है, जिसमें उन ग्रन्थों के नाम, उनके प्रकार, लेखक/रचयिता तथा उनमें क्या ज्ञान छिपा हुआ है, प्रकाशित हों।

मेरे प्रश्न इस प्रकार हैं-

१. ब्राह्मण ग्रन्थ कितने हैं, उनके क्या नाम हैं, उनके रचयिता/लेखक कौन हैं, प्रत्येक ग्रन्थ में क्या ज्ञान है?

डॉ. वेदप्रकाश गुप्ता, एफ १-३-३, सेक्टर ३-४, ज्ञानदीप, वाशी, नवी मुम्बई-४००७०३

समाधानमानव संस्कृति, सभ्यता  व ज्ञान के भण्डार, वेद व वेदानुकूल ऋषियों के ग्रन्थ हैं। वेद स्वयं ईश्वर द्वारा बनाये हुए अपौरुषेय हैं, जिससे वे स्वतः प्रमाण हैं अर्थात् वेद के लिए स्वयं वेद ही प्रमाण हैं। जैसे सूर्य को दिखाने के लिए अन्य किसी प्रकार के साधन की आवश्यकता नहीं होती, सूर्य तो अपने आप दिखने में समर्थ है, वैसे ही वेद को जानें।

वेद मन्त्र भाग हैं, मन्त्र संहिताएँ हैं अर्थात् मूल मन्त्र भाग वेद कहलाते हैं। उनके उन मन्त्रों के जो व्याख्या करने वाले ग्रन्थ हैं, वे ब्राह्मण कहलाते हैं। आप इन्हीं ब्राह्मण ग्रन्थों के विषय में जानना चाहते हैं। ब्राह्मण ग्रन्थ कितने हैं, उनके लेखक कौन हैं, उनके विषय क्या हैं, यह लिखने से पहले यह देख लेते हैं कि ब्राह्मण ग्रन्थ किनको कहते हैं? इनकी अपर संज्ञाएँ क्या हैं आदि।

महर्षि दयानन्द ने ब्राह्मण ग्रन्थ बताने के लिए अपनी पुस्तक अनुभ्रमोच्छेदन में लिखा है- ‘‘जिससे ये ऐतरेय आदि ग्रन्थ ब्रह्म अर्थात् वेदों के व्याख्यान भाग हैं, अर्थात् ब्रह्मणां वेदानामिमानि व्याख्यानानि ब्राह्मणानि। अर्थात् शेष भूतानि सन्तीति।’’ इससे महर्षि कहना चाहते हैं कि जो ऐतरेय आदि वेद मन्त्रों की व्याख्या करने वाले ग्रन्थ हैं, वे ब्राह्मण ग्रन्थ कहलाते हैं।

और भी-‘‘वेद का अपर नाम ब्रह्म है। -शतपथ ७.१.१५ में कहा है- ‘‘ब्रह्म वै मन्त्रः’’, अतः वेद मन्त्रों की व्याख्या प्रस्तुत करने वाले ग्रन्थों की ब्राह्मण संज्ञा है। ‘ब्रह्म’ श       द का अर्थ यज्ञ भी है। इस आधार पर मन्त्रों की व्याख्या करने के साथ-साथ यज्ञ में उनका विनियोग करने तथा कर्मकाण्ड की व्याख्या एवं विवरण प्रस्तुत करने के कारण भी उन्हें ब्राह्मण नाम से अभिहित किया गया है। भट्टभास्कर ने कर्मकाण्ड तथा मन्त्रों की व्याख्या करने वाले ग्रन्थों क ो ब्राह्मण कहा है-

‘ब्राह्मणं नाम कर्मणस्तन्मन्त्राणां व्याख्यानग्रन्थः’

– तै    िारीय संहिता १.५.१का भाष्य।’’ स.भा

ब्राह्मण ग्रन्थों के ही अपर नाम इतिहास, पुराण, कल्प, गाथा और नाराशंसी हैं। इन ब्राह्मण ग्रन्थों में जो (देवासुराः संप ाा आसन्) अर्थात् देव (विद्वान्) असुर (मूर्ख) ये दोनों युद्ध करने को तत्पर हुए थे- इत्यादि कथा भाग है, उसका इतिहास नाम है, जिसमें

‘सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्’,

‘आत्मा वा इदमेकमेवाग्र आसीन्नान्यत् किंचन मिषत्’

‘आपो ह वा इदमग्रे सलिलमेवास’,

‘इदं वा अग्रे नैव किंचिदासीत्।’

इस प्रकार के वर्णन पूर्वक जगत् की उत्प    िा को कहा है, वह भाग पुराण कहलाता है।

‘‘कतपा मन्त्रार्थसामर्थ्यप्रकाशकाः।’’ जो वेदमन्त्रों के अर्थ अर्थात् जिनमें द्रव्यों के सामर्थ्य का कथन किया है, उनका नाम कल्प है।

इसी प्रकार शतपथ ब्राह्मण में याज्ञवल्क्य, जनक, गार्गी, मैत्रेयी आदि की कथाओं का नाम ‘गाथा’ है।

जिनमें नर अर्थात् मनुष्यों ने ईश्वर, धर्मादि पदार्थ विद्याओं और मनुष्यों की प्रशंसा की है, उनको नाराशंसी कहते हैं। यह वर्णन महर्षि दयानन्द ने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के वेद संज्ञा विचार प्रकरण में किया है।

अब आपके मूल प्रश्न पर आते हैं- ब्राह्मण ग्रन्थ कितने हैं? आज वर्तमान में चार ब्राह्मण मुख्य रूप से प्रचलित हैं, किन्तु ब्राह्मणों की संख्या इतनी ही है, ऐसा नहीं है। विद्वानों का ऐसा मानना है कि वेद की सभी शाखाओं के अपने-अपने ब्राह्मण थे। उनमें से अनेकों के आज नाम तक ज्ञात नहीं हैं। जो ब्राह्मण आज उपल   ध हैं वे लगभग अठारह हैं और जो उपलध नहीं हैं, केवल जिनके नामों का पता मिलता है, उनकी संख्या लगभग इक्कीस है। इन ब्राह्मण ग्रन्थों, लेखकों अथवा प्रवक्ताओं के नाम कुछ को छोड़कर प्रायः नहीं मिलते हैं। इसमें कारण ऋषियों की यश कामना से रहितता होना लगता है।

प्रसिद्ध प्रचलित चार ब्राह्मण ऐतरेय, शतपथ, ताण्ड्य और गोपथ ब्राह्मण हैं। अब कौन-सा ब्राह्मण किस वेद का है, उस वेद के कितने ब्राह्मण हैं यह लिखते हैं। ऋग्वेद के मुख्य तीन ब्राह्मण हैं-

. ऐतरेय ब्राह्मण :इस ब्राह्मण का प्रवक्ता इतरा का पुत्र ऐतरेय महीदास था। इस ऐतरेय ब्राह्मण में आठ पंचिकाएँ हैं। प्रत्येक पंचिका में पाँच अध्याय हैं। सम्पूर्ण ब्राह्मण में चालीस अध्याय हैं।

. कौषीतकि ब्राह्मण :इस ग्रन्थ का परिमाण तीस अध्यायों का है। इस ग्रन्थ के प्रवचनक     र्ाा कौषीतकि अथवा शाङ्खायन इन दोनों में से कोई एक है, ऐसी विद्वानों की मान्यता है।

. शाङ्खायन ब्राह्मणः इस ग्रन्थ में तीस अध्याय हैं। इस ग्रन्थ के नाम से पता लगता है कि इसके प्रणेता शाङ्खायन रहे होंगे।

यजुर्वेद के भी तीन ब्राह्मण उपल    ध होते हैं-

. माध्यन्दिन शतपथ ब्राह्मण :यह ब्राह्मण सबसे अधिक प्रचलन में है । इसके नाम के अनुसार इसमें एक सौ अध्याय हैं। इस ब्राह्मण में चौदह काण्ड, एक सौ अध्याय, चार सौ अड़तीस ब्राह्मण और सात हजार छः सौ चौबीस कण्डिकाएँ हैं। इसका दूसरा नाम वाजसनेय ब्राह्मण भी मिलता है। इसके रचयिता महर्षि याज्ञवल्क्य रहे हैं।

. काण्व शतपथ ब्राह्मणः इस ब्राह्मण के काण्ड विभाग या वाक्य रचना के स्वतन्त्र भेद को छोड़कर यह ब्राह्मण माध्यन्दिन शतपथ के समान ही है। इसमें एक सौ चार अध्याय, चार सौ चवालीस ब्राह्मण और पाँच हजार आठ सौ पैंसठ कण्डिकाएँ हैं।

. कृष्ण यजुर्वेदीय तै       िारीय ब्राह्मणः इस ब्राह्मण का संकलन वेशम्पायन के शिष्य ति िारि ने किया था। इस ब्राह्मण में तीन अष्टक हैं।

सामवेद के ग्यारह ब्राह्मण मिलते हैं-

. ताण्ड्य ब्राह्मण-सामवेद का यह ब्राह्मण मुख्य रूप से प्रचलित है। इसका संकलन सामविधान ब्राह्मण (२.९३) के अनुसार ताण्डि नामक एक आचार्य ने किया था। इसमें पच्चीस प्रपाठक और तीन सौ सैंतालीस खण्ड हैं।

. षड्विंश ब्राह्मण-इस ब्राह्मण का संकलन भी विद्वान् लोग आचार्य ताण्डि अथवा उनके निकटवर्ती शिष्यों के द्वारा किया गया मानते हैं। इस ब्राह्मण में पाँच प्रपाठक और अड़तालीस खण्ड हैं।

. मन्त्र ब्राह्मण-इस ब्राह्मण का परिमाण दो प्रपाठकों और सोलह खण्डों का है।

. दैवत अथवा देवताध्याय ब्राह्मण-दैवत ब्राह्मण का दूसरा नाम देवताध्याय ब्राह्मण है। यह ब्राह्मण आकार की दृष्टि से छोटा-सा ही है, इसके केवल तीन खण्ड व बासठ कण्डिकाएँ हैं।

. आर्षेय ब्राह्मण-यह ब्राह्मण सामवेद की कौथुम शाखा को मानने वालों का ही है। इसमें सामवेद के सामगान के नामों का मुख्यतः वर्णन है। इसमें तीन प्रपाठक और बयासी खण्ड हैं।

. सामविधान ब्राह्मण-इस ब्राह्मण में अभिचार आदि कर्मों का बहुत वर्णन है। इसमें तीन प्रपाठक व पच्चीस खण्ड हैं।

. संहितोपनिषद् ब्राह्मण-यह बहुत छोटा-सा है। सारा ही एक प्रपाठक और पाँच खण्डों का है। इस ब्राह्मण में सामवेद के अरण्य गान व ग्रामगेय गान का वर्णन है।

. वंश ब्राह्मण-यह भी लघु ही है, केवल तीन खण्ड का ही है। इसमें सामवेद के आचार्यों की वंश परम्परा दी गई है।

. जैमिनीय ब्राह्मण-इस ब्राह्मण का संकलन महर्षि व्यास के प्रसिद्ध शिष्य सामवेद के आचार्य जैमिनी और उनके शिष्य तवलकार का किया हुआ है। इसके मुख्य तीन भाग है। पहले में तीन सौ साठ खण्ड, दूसरे में चार सौ सैंतीस  और तीसरे में तीन सौ पिच्चासी खण्ड हैं।

१०. जैमिनीय आर्षेय और ११. जैमिनीयोपनिषद्  ब्राह्मण-ये ग्यारह सामवेद के ब्राह्मण मिलते हैं।

अथर्ववेद का एक ही ब्राह्मण ‘गोपथ ब्राह्मण’उपल   ध होता है। इस ब्राह्मण के पूर्व और उ   ार दो भाग हैं। पूर्व भाग में पाँच प्रपाठक और उ    ार में छः प्रपाठक हैं, कुल मिलाकर ग्यारह प्रपाठक का यह ब्राह्मण है। इसमें एक ही स्थान पर बहुत यज्ञों के नाम लिखे हुए हैं। इसमें मन्त्र, कल्प, ब्राह्मण का एक ही स्थान पर उल्लेख है। इसके पूर्व भाग में विपाट् नदी के मध्य में बड़ी-बड़ी शिलाओं पर वशिष्ठ के आश्रमों का वर्णन है। यह अनेक प्राचीन साम्राज्यों का कथन करता है। यही ब्राह्मण ओंकार की तीन मात्राओं का वर्णन करता है।

चारों वेदों के ये अठारह ब्राह्मण उपल       ध हैं। इनका विषय है- आत्मा का अस्तित्व और पुनर्जन्म, अमर आत्मा, परमेश्वर (प्रजापति), तीन लोक, मानव आयु व उसके पूर्ण भोगने के उपाय, सुखी गृहस्थ, गृहस्थ में स्त्री का स्थान, विवाह, सत्य, पाप का स्वरूप, यज्ञ का स्वरूप, यज्ञों के मुख्य भेद, यज्ञ तथा पाप विमोचन, यज्ञ और बलिदान व देवता, आपः (जल) का विषय, हिरण्यगर्भ= तेजोमय महद्अण्ड का वर्णन, अग्नि का स्वरूप, वृष्टि का वर्णन, वर्षा, समुद्र, सूर्य, प्राणायाम का कथन, पृथिवी का इतिहास अर्थात् आर्द्रा (शिथिल पृथिवी), आर्द्रा पृथिवी पर क्रमशः सृष्टियाँ – फेन, मृत ऊष, सिकता, शर्करा, अश्मा, अयः और हिरण्यम् औषधि वनस्पति का प्रादुर्भाव, आग्नेयी पृथिवी, अग्निगर्भा पृथिवी, परिमण्डला पृथिवी, अयस्मयी पृथिवी, सर्व राज्ञी पृथिवी आदि, अन्तरिक्ष मरुत, अन्तरिक्षस्थ पशु, धातुओं को टाँका लगाना, रेखागणित व स्वर्ग- ये इतने सारे इन ब्राह्मण ग्रन्थों के विषय हैं, अर्थात् इतने विषयों का ज्ञान कराने वाले ये हैं।

कुछ अनुपल ध ब्राह्मण ग्रन्थों के नाम भी मिलते हैं, इनके विषय में विस्तार से जानने के लिए विद्वान् पण्डित भगवद्द   ा जी द्वारा लिखित विशेष ग्रन्थ ‘वैदिक वाङ्मय का इतिहास’ तृतीय खण्ड देखना चाहिए। हमने भी यह सब इसी ग्रन्थ को देखकर लिखा है।

आपके अन्य प्रश्नों के उत्तर  आगे लिखेंगे, अस्तु।

ऋषिउद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर।

(29) शंका :- मुक्ति किसे मिलेगी?

समाधान कर्ता :- प्रा राजेंद्र जिज्ञासु , विषय :-

समाधान :-

इस विषय पर श्री स्वामी जी और सोमदेव जी तो लिखते ही रहते हैं। एक प्रेमी ने इस विषय में एक प्रश्न पूछा है, तो आस्तिक वेदाभिमानी होने से कुछ निवेदन करने का मुझे भी अधिकार है। उत्कृष्ट शंका समाधान में कहते हैं, यह घोषणा की गई कि मुक्ति केवल संन्यासी को ही मिल सकती है। प्रश्नकर्ता  ने इसके लिए वेद तथा ऋषि का प्रमाण माँगा है।

प्रश्नकर्ता की सेवा में नम्र निवेदन है कि स्वाध्याय तो कुमार अवस्था से ही करता चला आया हूँ। बहुत कुछ पढ़ा है और उससे भी अधिक सुना है, परन्तु मेरे सुनने व पढ़ने में तो उत्कृष्ट समाधान की बात की पुष्टि के लिए कभी कोई प्रमाण नहीं आया। स्वामी आत्मानन्द जी, वेदानन्द जी, प्रसिद्ध योगी महात्मा हरिराम जी, श्रद्धेय उपाध्याय जी, आचार्य उदयवीर जी को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

ऋषि-जीवन से मैं उपरोक्त कथन के तीन प्रमाण दे सकता हूँ। इनमें से एक स्वामी सर्वानन्द जी भी दिया करते थे। स्वामी सत्यानन्द जी आदि तीनों प्रमाण दिया करते थे। गृहस्थ में जाना यदि मुक्ति में बाधक व पाप है तो फिर गृहस्थ को धरती का स्वर्ग, सब आश्रमों का आधार क्यों कहा गया? ओ३म् के जप से ही मुक्ति हो जायेगी, यह कथन क्या मिथ्या है? आचार्य उदयवीर की कोटि के महापण्डित ने ऐसा लिखा है। मुक्ति सद्ज्ञान, सत्कर्मों व उपासना से ही होती है। सन्त तुकाराम जी ने भी लिखा है कि सत्कर्मों के बिना मुक्ति नहीं। स्वामी दर्शनानन्द जी महाराज ने तो ‘सच्चिदानन्द’ के जप से मुक्ति की प्राप्ति को सम्भव बताया है। उपनिषदों में, दर्शनों में, मनुस्मृति में कहीं नहीं आता कि संन्यासी को ही मुक्ति मिल सकती है।

यह भी कहा जाता है कि चारों वेदों का, दर्शनों का, उपनिषदों का ज्ञान मुक्ति के लिए आवश्यक है। अरे भाई! परमात्मा ने तो सर्वकल्याण के लिए चार वेदों का प्रकाश किया। दर्शन आदि देना, क्या ईश्वर भूल गया था? इन्हें पहले ही दे देता। मेरा मत है कि उत्कृष्ट समाधान का कथन एक अति है।

(30) शंका :- प्रभु कैसे ज्ञान देता है

समाधान कर्ता :- प्रा राजेंद्र जिज्ञासु , विषय :- vedic dharm

समाधान :-

प्रभु कैसे ज्ञान देता है?ः- परोपकारी के एक अंक में बताया था कि मेरे साठ वर्ष के ऊपर के सार्वजनिक जीवन में उदयपुर के आर्य पुरुष श्री प्रकाश जी श्रीमाली ने घर के बच्चों, बड़ों सबकी शंकायें पूछकर लिखलीं और पहली बार मुझे उनके प्रश्नों का उत्तर  देने का सुखद अनुभव हुआ। प्रधान जी के दस वर्ष के पौत्र ने ईश्वरीय ज्ञान के आविर्भाव पर प्रश्न और पूरक प्रश्न पूछकर अपने संस्कारों व परिवार के वातावरण की मुझ पर अमिट छाप लगा दी।

उसका पूरक प्रश्न था कि सर्वव्यापक प्रभु बिना वाणी के हृदय में कैसे ज्ञान देता है?

स्वामी सत्यप्रकाश जी का उत्तर स्वामी सत्यप्रकाश जी के श्रीमुख से सुना अनूठा उत्तर जब मैंने दिया तो सारा परिवार झूम उठा। उस बालक की समझ में भी वेद का सिद्धान्त आ गया। स्वामी जी कहा करते थे- ‘‘आदि सृष्टि में प्रभु ने ऋषियों को कैसे ज्ञान दिया? कहा, जैसे वह आज देता है। आप एक ग्राम चीनी यहाँ रख दें। थोड़ी देर में कई चींटियाँ पंक्तिबद्ध यहाँ आ जायेंगी, परन्तु चीनी सरीखे नमक का एक बोरा यहाँ रख दें, एक भी चींटी पास नहीं आयेगी। चीनी व नमक का यह भेद उनको किसने सिखाया, पशुओं को स्वाभाविक ज्ञान उसी ईश्वर की देन है। उस प्रभु ने जीवन बिताने के लिए आवश्यक ज्ञान दिया है। ईश्वरीय ज्ञान के अनादित्व, ईश्वर के स्वरूप, उसकी दया व न्याय, कर्मफल सिद्धान्त, पाप का क्षमा होना, जीव की कर्म करने की स्वतन्त्रता, मांसाहार आदि पर जिस शैली में पं. चमूपति जी ने लिखा है, उसे जानने, समझने व समझाने का समाज में कोई सामूहिक प्रयास नहीं हुआ। पं. चमूपति जी की पुस्तकों को इस्लाम की विवेचना और आक्षेपों का उत्तर मात्र समझा गया।

(31) शंका :- नरक, स्वर्ग व मोक्ष क्या हैं ? – आचार्य सोमदेव

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- आर्य समाज

समाधान :-

नरक, स्वर्ग व मोक्ष  क्या हैं ?  – आचार्य सोमदेव

जिज्ञासा मैं आपसे अपनी ही नहीं अपितु आम व्यक्तियों की जिज्ञासा हेतु कुछ जानना चाहता हूँ। कृपया समाधान कर कृतार्थ करें-

(क) तमाम कथावाचक, उपदेशक, साधु व सन्त नरक, स्वर्ग व मोक्ष की बातें करते हैं। आप इन को विस्तृत रूप से समझायें और अपने विचार दें।

समाधन– (क) वेद विरुद्ध मत-सम्प्रदायों ने अनेक मिथ्या कल्पना कर, उन कल्पनाओं को जन सामान्य में फैलाकर पूरे समाज को अविद्या अन्धकार में फँसा रखा है, जिससे जगत् में दुःख की ही वृद्धि हो रही है। ये मत-सम्प्रदाय ऊपर से अध्यात्म का आवरण अपने ऊपर डाले हुए मिलते हैं। यथार्थ में देखा जाये तो जो वेद के प्रतिकूल होगा वह अध्यात्म हो ही नहीं सकता। कहने को भले ही कहता रहे। महर्षि दयानन्द के काल में व उनसे पूर्व और आज वर्तमान में इन मत-सम्प्रदायों की संख्या देखी जाये तो हजारों से कम न होगी। उन हजारों में शैव, शाक्त, वैष्णव, वाममार्ग, बौद्ध, जैन, ईसाई, इस्लाम आदि प्रमुख हैं। महर्षि दयानन्द के समय से कुछ पूर्व स्वामी नारायण सम्प्रदाय, रामस्नेही सम्प्रदाय, वल्लभ सम्प्रदाय, गुसाईं मत आदि और महर्षि के बाद राधास्वामी मत, ब्रह्माकुमारी मत, हंसा मत, सत्य सांई बाबा पंथ (दक्षिण वाले), आनन्द मार्ग, महेश योगी, माता अमृतानन्दमयी, डेरा सच्चा सौदा, आर्ट ऑफ लिविंग, निरंकारी, विहंगम योग, शिव बाबा आदि कितनों के नाम लिखें। ये सब अवैदिक मान्यता वाले हैं। इन्होंने अपने-अपने मत की पुस्तकें भी बना रखी हैं। इन पुस्तकों में इन मत वालों ने अपनी मनघड़न्त कल्पनाओं के आधार पर ही अधिक लिख रखा है। स्वर्ग, नरक, मोक्ष, आकाश में देवताओं का निवास स्थान, यमराज, यमदूत आदि की व्याख्याएँ अविद्यापरक ही हैं।

आपने स्वर्ग, नरक, मोक्ष के विषय में जो आज के तथाकथित उपदेशक, कथावाचक, साधु-सन्त कहते-बतलाते हैं, उसके सम्बन्ध में जानना चाहा है। यहाँ हम महर्षि की मान्यता को लिखते हैं व इन तथाकथित कथावाचकों की इन विषयों में क्या दृष्टि है उसको भी लिखते हैं। ‘‘स्वर्ग- जो विशेष सुख और सुख की सामग्री को जीव का प्राप्त होना है वह स्वर्ग कहाता है। नरक- जो विशेष दुःख और दुःख की सामग्री को जीव का प्राप्त होना है उसको नरक कहते हैं।’’ आर्योद्दे. १४-१५ स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश में महर्षि इनके विषय में लिखते हैं- ‘‘स्वर्ग- नाम सुख विशेष भोग और उनकी सामग्री प्राप्ति का है। नरक- जो दुःख विशेष भोग और उनकी सामग्री प्राप्ति को प्राप्त होना है।’’ सत्यार्थप्रकाश ९वें सम्मुल्लास में महर्षि लिखते हैं- ‘‘…….सुख विशेष स्वर्ग और विषय तृष्णा में फँसकर दुःख विशेष भोग करना नरक कहाता है। ‘स्वः’ सुख का नाम है, स्व सुखं गच्छति यस्मिन् स स्वर्गः, अतो विपरीतो दुःखभोगो यस्मिन् स नरक इति। जो सांसारिक सुख है वह सामान्य स्वर्ग और जो परमेश्वर की प्राप्ति में आनन्द है, वही विशेष स्वर्ग कहाता है।’’

महर्षि की इन परिभाषाओं के आधार पर (परमेश्वर की प्राप्ति रूप विशेष स्वर्ग को छोड़) स्वर्ग-नरक किसी लोक विशेष या स्थान विशेष पर न होकर, जहाँ भी मनुष्य आदि प्राणी हैं, वहाँ हो सकते हैं। जो इस संसार में सब प्रकार से सम्पन्न है अर्थात् शारीरिक स्वस्थता, मन की प्रसन्नता, बन्धु जन आदि का अनुकूल मिलना, अनुकूल साधनों का मिलना, धन सम्प   िा पर्याप्त मिलना आदि है, जिसके पास ये सब हैं वह स्वर्ग में ही है। इसके विपरीत होना नरक है, नरक में रहना है। वह नरक भी इसी संसार में देखने को मिलता है।

नरक के विषय में किसी नीतिकार ने लिखा है

अत्यन्तकोपः कटुका च वाणी, दरिद्रता च स्वजनेषु वैरम्।

नीचप्रसङ्गः कुलहीनसेवा चिह्नानि देहे नरकस्थितानाम्।।

अत्यन्त क्रोध, कटुवचन, दारिद्र्य, अपने स्वजनों से वैर-भाव, नीच-दुर्जनों का संग और कुलहीन की सेवा, ये चिह्न नरकवासियों की देह में होते हैं। ये सब चिह्न इसी संसार में देखने को मिलते हैं। इस आधार पर स्वर्ग अथवा नरक के लिए कोई लोक पृथक् से हो ऐसा प्रतीत नहीं हो रहा। यह काल्पनिक ही सिद्ध हो रहा है।

जिस स्वर्ग लोक की कल्पना इन लोगों ने कर रखी है, वह तो इस पृथिवी पर रहने वाले एक साधन सम्पन्न व्यक्ति से अधिक कुछ नहीं है।

मोक्ष निराकार परमेश्वर को प्राप्त कर, उसके आनन्द में रहने का नाम है अर्थात् जब जीव अपने अविद्यादि दोषों को सर्वथा नष्ट कर, शुद्ध ज्ञानी हो जाता है तब वह सब दुःखों से छूट कर परमेश्वर के आनन्द में मग्न रहता है, इसी को मोक्ष कहते हैं। वहाँ आत्मा अपने शरीर रहित अपने शुद्ध स्वरूप में रहता है। कथावाचकों के मोक्ष की कल्पना और उसके साधनों की कल्पना सब मिथ्या है। किन्हीं का मोक्ष गोकुल में, किसी का विष्णु लोक क्षीरसागर में, किसी का श्रीपुर में, किसी का कैलाश पर्वत में, किसी का मोक्षशिला शिवपुर में, तो किसी का चौथे अथवा सातवें आसमान आदि पर। इस प्रकार के मोक्ष के उपाय भी मिथ्या एवं काल्पनिक हैं। जैसे-

गङ्गागङ्गेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि।

मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति।।

– ब्रह्मपुराण. १७५.९२/पप.पु.उ. २३.२

अर्थात् जो सैकड़ों सहस्रों कोश दूर से भी गंगा-गंगा कहे, तो उसके पाप नष्ट होकर वह विष्णु-लोक अर्थात् वैकण्ठ को जाता है।

हरिर्हरति पापानि हरिरित्यक्षरद्वयम्।।

अर्थात् हरि इन दो अक्षरों का नामोच्चारण सब पापों को हर लेता है, वैसे ही राम, कृष्ण, शिव, भगवती आदि नामों का महात्म्य है।

इसी तरह

प्रातः काले शिवं दृष्ट्वा निशि पापं विनश्यति।

आजन्म कृतं मध्याह्ने सायाह्ने सप्तजन्मनाम्।।

अर्थात् जो मनुष्य प्रातः काल में शिव अर्थात् लिंग वा उसकी मूर्ति का दर्शन करे तो रात्रि में किया हुआ, मध्याह्न में दर्शन से जन्मभर का, सायङ्काल में दर्शन करने से सात जन्मों का पाप छूट जाता है।

इस प्रकार के उपाय पाप छूटाने मोक्ष दिलाने के मिथ्या ग्रन्थों में लिखे हैं और इन्हीं प्रकार के उपाय आज का तथाकथित कथावाचक बता रहा है। पाठक स्वयं देखें, समझें कि ये उपाय पाप छुड़ाने वाले हैं या अधिक-अधिक पाप कराने वाले। भोली जनता इन साधनों से ही अपना कल्याण समझती है, जिससे लोक में अविद्या अन्धकार, अन्धविश्वास, पाखण्ड और अधिक फैल रहा है।

वेद व ऋषियों द्वारा मुक्ति व उसके उपाय ऐसे नहीं हैं। वहाँ तो सब बुरे कामों और जन्म-मरण आदि दुःख सागर से छूटकर सुखस्वरूप परमेश्वर को प्राप्त होकर सुख ही में रहना मुक्ति कहाती है। और ऐसी मुक्ति के उपाय महर्षि दयानन्द लिखते हैं ‘‘…..ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना का करना, धर्म का आचरण और पुण्य का करना, सत्संग, विश्वास, तीर्थ सेवन (विद्याभ्यास, सुविचार, ईश्वरोपासना, धर्मानुष्ठान, सत्य का संग, ब्रह्मचर्य, जितेन्द्रियतादि उत्तम कर्मों का सेवन), सत्पुरुषों का संग और परोपकारादि सब अच्छे कामों का करना तथा सब दुष्ट कर्मों से अलग रहना, ये सब मुक्ति के साधन कहाते हैं।’’ इन मुक्ति के साधनों को देख पाठक स्वयं विचार करें कि यथार्थ में मुक्ति के साधन, उपाय ये महर्षि द्वारा कहे गये हैं वा उपरोक्त मिथ्या ग्रन्थों व तथाकथित कथावाचकों द्वारा कहे गये हैं वे हैं। निश्चित रूप से ऋषि प्रतिपादित ही मुक्ति के उपाय हो सकते हैं, दूसरे नहीं।

मिथ्या पुराणों जैसी ही मुक्ति ईसाइयों व मुसलमानों की भी है। ईसाइयों के यहाँ खुदा का बेटा जिसे चाहे बन्धन में डलवा दे। ईसाई जगत् में तो जीवितों को मुक्ति के पासपोर्ट मिल जाते हैं। समय से पूर्व अपना स्थान सुरक्षित कराया जाता है। जितना कुछ चाहिए उससे पूर्व उतना धन चर्च के पोप को पूर्व में जमा कराया जाता है।

मुसलमानों के यहाँ भी ‘नजात’ होती है और वहाँ पहुँच कर सब सांसारिक ऐश परस्ती के साधन विद्यमान हैं, मोहम्मद की सिफारिश के बिना उसकी प्राप्ति नहीं है अर्थात् उन पर ईमान लाये बिना। कबाब, शराब, हूरें, गितमा आदि सभी ऐय्याशी के साधन मिलते हैं। क्या यह भी कभी मुक्ति कहला सकती है? अर्थात् ऐय्याशी करना कभी मुक्ति हो सकती है? इस मुक्ति पर मुसलमानों का विश्वास भी है। वे कहते हैं-

अल्लाह के पतले में वहदत के सिवाय क्या है।

जो कुछ हमें लेना है ले लेंगे मोहम्मद से।।

इतना सब लिखने का तात्पर्य यही है कि जो वेद व ऋषि प्रतिपादित नरक, स्वर्ग व मोक्ष की परिभाषाएँ हैं, वही मान्य हैं इससे इतर नहीं। स्वर्ग व मोक्ष के उपाय भी वेद व ऋषियों द्वारा कहे गये ही उचित हैं। इन मिथ्या पुराणों व इनके कथावाचकों द्वारा कहे गये नहीं।

 

(32) शंका :- जिज्ञासा – मेरे मन में एक छोटी-सी शंका है कि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आगे स्वामी और बाद में सरस्वती क्यों लगाते थे स्वामी जी! उस का अर्थ क्या है? हमें बताईएगा। – एन. रणवीर, नलगोंडा, तेलंगाना

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- आर्य समाज

समाधान :-

समाधान-२ स्वामी दयानन्द सरस्वती जी आगे तो स्वामी इसलिए लगाते हैं क्योंकि वे संन्यासी थे, संन्यासी के लिए यह शब्द  आदर के लिए लगाया जाता है। यह शब्द  संन्यासी के लिए रुढ़ सा हो गया है। इसका अर्थ स्वत्वाधिकारी होता है अर्थात् अपने आपका अधिकारी चूंकि संन्यासी स्वत्वाधिकारी होता है इसलिए उनके नाम के आगे स्वामी लगाते हैं। स्वामी का एक अर्थ उच्च कोटि का धार्मिक पुरुष होता है।

दूसरी सरस्वती लगाने वाली बात- आचार्य शंकर से दस नामी संन्यासियों की परम्परा चली आयी है उनमें से एक सरस्वती भी है। स्वामी दयानन्द जी ने सरस्वती परम्परा वाले संन्यासी से संन्यास दीक्षा ग्रहण की थी, इसलिए संन्यास गुरु परम्परा अनुसार स्वामी दयानन्द के पीछे (सरस्वती) लग गया। इस सरस्वती शब्द  का अर्थ महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के प्रथम समुल्लास में दिया है-

सरो विविधं ज्ञानं विद्यते यस्यां चित्तौ  सा सरस्वती।

जिसको विविध विज्ञान अर्थात् शब्द  सम्बन्ध प्रयोग का ज्ञान यथावत होवे उसको सरस्वती कहते हैं। विद्या, वाणी आदि का नाम भी सरस्वती है।

(33) शंका :- मृत्यु के बाद आत्मा दूसरा शरीर कितने दिनों के अन्दर धारण करता है? किन-किन योनियों में प्रवेश करता है? क्या मनुष्य की आत्मा पशु-पक्षियों की योनियों में जन्म लेने के बाद फिर लौट के मनुष्य योनियों में बनने का कितना समय लगता है? आत्मा माता-पिता के द्वारा गर्भधारण करने से शरीर धारण करता है यह मालूम है लेकिन आधुनिक पद्धतियों के द्वारा टेस्ट ट्यूब बेबी, सरोगसि पद्धति, गर्भधारण पद्धति, स्पर्म बैंकिंग पद्धति आदि में आत्मा उतने दिनों तक स्टोर किया जाता है क्या? यह सारा विवरण परोपकारी में बताने का कष्ट करें। – एन. रणवीर, नलगोंडा, तेलंगाना

समाधान कर्ता :- आचार्य सोमदेव , विषय :- विविध

समाधान :-

समाधान १ मृत्यु के  बाद आत्मा कब शरीर धारण करता है, इसका ठीक-ठीक ज्ञान तो परमेश्वर को है। किन्तु जैसा कुछ ज्ञान हमें शास्त्रों से प्राप्त होता है वैसा यहाँ लिखते हैं। बृहदारण्यक-उपनिषद् में मृत्यु व अन्य शरीर धारण करने का वर्णन मिलता है। वर्तमान शरीर को छोड़कर अन्य शरीर प्राप्ति में कितना समय लगता है, इस विषय में उपनिषद् ने कहा-

तद्यथा तृणजलायुका तृणस्यान्तं गत्वाऽन्यमाक्रममाक्रम्यात्मानम्

उपसँ्हरत्येवमेवायमात्मेदं शरीरं निहत्याऽविद्यां गमयित्वाऽन्यमाक्रममाक्रम्य् आत्मानमुपसंहरति।।

– बृ. ४.४.३

जैसे तृण जलायुका (सुंडी=कोई कीड़ा विशेष) तिनके के अन्त पर पहुँच कर, दूसरे तिनके को सहारे के लिए पकड़ लेती है अथवा पकड़ कर अपने आपको खींच लेती है, इसी प्रकार यह आत्मा इस शरीररूपी तिनके को परे फेंक कर अविद्या को दूर कर, दूसरे शरीर रूपी तिनके का सहारा लेकर अपने आपको खींच लेता है। यहाँ उपनिषद् संकेत कर रहा है कि मृत्यु के बाद दूसरा शरीर प्राप्त होने में इतना ही समय लगता है, जितना कि एक कीड़ा एक तिनके से दूसरे तिनके पर जाता है अर्थात् दूसरा शरीर प्राप्त होने में कुछ ही क्षण लगते हैं, कुछ ही क्षणों में आत्मा दूसरे शरीर में प्रवेश कर जाता है। आपने पूछा है- आत्मा कितने दिनों में दूसरा शरीर धारण कर लेता है, यहाँ शास्त्र दिनों की बात नहीं कर रहा कुछ क्षण की ही बात कह रहा है।

मृत्यु के विषय में उपनिषद् ने कुछ विस्तार से बताया है, उसका भी हम यहाँ वर्णन करते हैं-

स यत्रायमात्माऽबल्यं न्येत्यसंमोहमिव न्येत्यथैनमेते प्राणा अभिसमायन्ति स एतास्तेजोमात्राः समभ्याददानो हृदयमेवान्ववक्रामति स यत्रैष चाक्षुषः पुरुषः पराङ् पर्यावर्ततेऽथारूपज्ञो भवति।।

– बृ. उ.४.४.१

अर्थात् जब मनुष्य अन्त समय में निर्बलता से मूर्छित-सा हो जाता है, तब आत्मा की चेतना शक्ति जो समस्त बाहर और भीतर की इन्द्रियों में फैली हुई रहती है, उसे सिकोड़ती हुई हृदय में पहुँचती है, जहाँ वह उसकी समस्त शक्ति इकट्ठी हो जाती है। इन शक्तियों के सिकोड़ लेने का इन्द्रियों पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका वर्णन करते हैं कि जब आँख से वह चेतनामय शक्ति जिसे यहाँ पर चाक्षुष पुरुष कहा है, वह निकल जाती तब आँखें ज्योति रहित हो जाती है और मनुष्य उस मृत्यु समय किसी को देखने अथवा पहचानने में अयोग्य हो जाता है।

एकीभवति न पश्यतीत्याहुरेकी भवति, न जिघ्रतीत्याहुरेकी भवति, न रसयत इत्याहुरेकी भवति, न वदतीत्याहुरेकी भवति, न शृणोतीत्याहुरेकी भवति, न मनुत इत्याहुरेकी भवति, न स्पृशतीत्याहुरेकी भवति, न विजानातीत्याहुस्तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्क्रामति चक्षुष्टो वा मूर्ध्नो वाऽन्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यस्तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनूत्क्रामति प्राणमनूत्क्रामन्तं सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति सविज्ञानो भवति, सविज्ञानमेवान्ववक्रामति तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते पूर्वप्रज्ञा च।।

– बृ.उ. ४.४.२

अर्थात् जब वह चेतनामय शक्ति आँख, नाक,जिह्वा, वाणी, श्रोत्र, मन और त्वचा आदि से निकलकर आत्मा में समाविष्ट हो जाती है, तो ऐसे मरने वाले व्यक्ति के पास बैठे हुए लोग कहते हैं कि अब वह यह नहीं देखता, नहीं सूँघता इत्यादि। इस प्रकार इन समस्त शक्तियों को लेकर यह जीव हृदय में पहुँचता है और जब हृदय को छोड़ना चाहता है तो आत्मा की ज्योति से हृदय का अग्रभाग प्रकाशित हो उठता है। तब हृदय से भी उस ज्योति चेतना की शक्ति को लेकर, उसके साथ हृदय से निकल जाता है। हृदय से निकलकर वह जीवन शरीर के किस भाग में से निकला करता है, इस सम्बन्ध में कहते है कि वह आँख, मूर्धा अथवा शरीर के अन्य भागों-कान, नाक और मुँह आदि किसी एक स्थान से निकला करता है। इस प्रकार शरीर से निकलने वाले जीव के साथ प्राण और समस्त इन्द्रियाँ भी निकल जाया करती हैं। जीव मरते समय ‘सविज्ञान’ हो जाता है अर्थात् जीवन का सारा खेल इसके सामने आ जाता है। इसप्रकार निकलने वाले जीव के साथ उसका उपार्जित ज्ञान, उसके किये कर्म और पिछले जन्मों के संस्कार, वासना और स्मृति जाया करती है।

इस प्रकार से उपनिषद् ने मृत्यु का वर्णन किया है। अर्थात् जिस शरीर में जीव रह रहा था उस शरीर से पृथक् होना मृत्यु है। उस मृत्यु समय में जीव के साथ उसका सूक्ष्म शरीर भी रहता, सूक्ष्म शरीर भी निकलता है।

आपने पूछा किन-किन योनियों में प्रवेश करता है, इसका उत्तर  है जिन-जिन योनियों के कर्म जीव के साथ होते हैं उन-उन योनियों में जीव जाता है। यह वैदिक सिद्धान्त है, यही सिद्धान्त युक्ति तर्क से भी सिद्ध है। इस वेद, शास्त्र, युक्ति, तर्क से सिद्ध सिद्धान्त को भारत में एक सम्प्रदाय रूप में उभर रहा समूह, जो दिखने में हिन्दू किन्तु आदतों से ईसाई, वेदशास्त्र, इतिहास का घोर शत्रु ब्रह्माकुमारी नाम का संगठन है। वह इस शास्त्र प्रतिपादित सिद्धान्त को न मान यह कहता है कि मनुष्य की आत्मा सदा मनुष्य का ही जन्म लेता है, इसी प्रकार अन्य का आत्मा अन्य शरीर में जन्म लेता है। ये ब्रह्माकुमारी समूह यह कहते हुए पूरे कर्म फल सिद्धान्त को ताक पर रख देता है। यह भूल जाता है कि जिसने घोर पाप कर्म किये हैं वह इन पाप कर्मों का फल इस मनुष्य शरीर में भोग ही नहीं सकता, इन पाप कर्मों को भोगने के लिए जीव को अन्य शरीरों में जाना पड़ता है। वेद कहता है-

असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः।

ताँऽस्ते प्रेत्यापि गच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः।।

– यजु. ४०.३

इस मन्त्र का भाव यही है कि जो आत्मघाती=घोर पाप कर्म करने वाले जन है वे मरकर घोर अन्धकार युक्त=दुःखयुक्त तिर्यक योनियों को प्राप्त होते हैं। ऐसे-ऐसे वेद के अनेकों मन्त्र हैं जो इस प्रकार के कर्मफल को दर्शाते हैं। किन्तु इन ब्रह्माकुमारी वालों को वेद शास्त्र से कोई लेना-देना नहीं है। ये तो अपनी निराधार काल्पनिक वाग्जाल व भौतिक ऐश्वर्य के द्वारा भोले लोगों को अपने जाल में फँसा अपनी संख्या बढ़ाने में लगे हैं। अस्तु।

(34) शंका :- सद्धर्मप्रचारक उर्दू हिन्दी का जन्म-भ्रान्ति निवारण-

समाधान कर्ता :- प्रा राजेंद्र जिज्ञासु , विषय :- आर्य समाज

समाधान :-

किसी के लेख में यह छपा बताते हैं कि महात्मा मुंशीराम जी ने रात-रात में ‘सद्धर्मप्रचारक’ उर्दू साप्ताहिक को हिन्दी में कर दिया। एक प्रबुद्ध आर्य भाई ने चलभाष पर प्रश्न किया कि ‘सद्धर्मप्रचारक’ को हिन्दी में निकालने के महात्मा जी के साहसिक क्रान्तिकारी पग पर आप प्रामाणिक तथ्यपरक प्रकाश डालें। यह प्रश्न तो उन्हीं लेखक जी से पूछा जाता तो अच्छा होता तथापि मैं किसी आर्य भाई को निराश नहीं करता। कोई चार दिन पूर्व तड़प-झड़प लिखकर भेजी तो कुछ समाधान करते हुए लिखा कि स्मृति के आधार पर बहुत कुछ लिखा है। सद्धर्मप्रचारक की अन्तिम फाईल खोज कर कोई भूल मेरे लेख में होगी तो उसे फिर सुधार कर दूँगा।

अब चैन कहाँ? वह फाईल खोज निकाली। लीजिये! ‘सद्धर्मप्रचारक’ के जन्म-पुनर्जन्म का प्रामाणिक इतिहास। सुन-सुनाकर और कुछ कहानी को चटपटा बनाने वाले इतिहास को प्रदूषित करने का अवसर हाथ से जाने नहीं देते। अनजाने में भी इस पत्रिका के बारे में कई एक ने कई भ्रान्तियाँ फैला रखी हैं। आज यथासम्भव सब भ्रामक लेखों का निराकरण हो जायेगा।

महात्मा मुंशीराम जी ने रात-रात में अथवा एकदम ‘सद्धर्मप्रचारक’ उर्दू को हिन्दी में नहीं निकाला था। हाँ! जब निश्चय कर लिया तो फिर टले नहीं। घाटा, हानि का भय दिखाया गया परन्तु उन्होंने हानि लाभ की चिन्ता नहीं की, पग दृढ़ता से आगे धरते गये। ‘प्रचारक की काया पलट का दृढ़ निश्चय’ एक लम्बा लेख पाँच अक्टूबर सन् १९०६ के अंक में दिया था। यह मेरे सामने है। इसके बाद निरन्तर पाँच मास तक प्रायः प्रत्येक अंक में प्रचारक के हिन्दी संस्करण के बारे में विज्ञापन तथा लेख छपते रहे जो सब मेरे पास हैं। सद्धर्मप्रचारक के सम्पादकीय लेख एक ग्रन्थ के रूप में भी बाद में छपे थे जो इतिहास की धरोहर है और बहुत से तथ्यों पर जिससे प्रकाश पड़ता है। वह ग्रन्थ मेरे पास भी है और बन्धुवर सत्येन्द्रसिंह आर्य के पास भी है। विस्तारपूर्वक एतद्विषयक जानकारी इतिहास प्रेमी चाहेंगे तो फिर कभी यह सेवा भी की जा सकती है।

. डॉ. जे. जार्डन्स जी ने लिखा है कि उर्दू सद्धर्म-प्रचारक सन् १८८८-१९०७ तक निकलता रहा। यह सत्य नहीं है। लेखक से भूल हुई है। किसी ने कभी इस चूक पर दो शब्द  नहीं लिखे।

. स्वामी श्रद्धानन्द जी पर हिण्डौन से छपे ग्रन्थ में लिखा है कि उर्दू सद्धर्मप्रचारक का जन्म १९ फरवरी १८८९ में हुआ, यह भी सत्य नहीं। भ्रामक कथन है।

प्रबुद्ध पाठक नोट करें कि इस समय मेरे सामने सद्धर्म-प्रचारक का प्रथम अंक है। यह १३ अप्रैल सन् १८८९ को निकला था। तब इसके आठ ही पृष्ठ होते थे। एक ही वर्ष में पृष्ठ संख्या १६ और सन् १९०७ में १८ और कभी-कभी २२ पृष्ठ भी होते थे। मैंने सब अंक देखे हैं। स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी ने भी सद्धर्मप्रचारक का जन्म वैशाखी (१३ अप्रैल) लिखा है।

. हिण्डौन वाले ग्रन्थ में इसके जन्म की एक और स्थान पर भी जन्म तिथि १९ फरवरी १८८९ छपी है जो ठीक नहीं है।

सेवा का एक अवसर मिला। भ्रम भञ्जन कर दिया। पूरी खोज करने में लगा तो पता चला कि अपने समय के प्रसिद्ध वैदिक विद्वान् और पं. बाल शास्त्री काशी के शिष्य गोस्वामी घनश्याम मुलतान निवासी सद्धर्मप्रचारक उर्दू के नियमित लेखक थे। उनके कई लेख मिले हैं। इनको हिन्दी में अनूदित करके ‘परोपकारी’ में प्रकाशित करवा दिया जायेगा। वे ‘परोपकारी’ के भी तो लेखक रहे।

(35) शंका :- आर्य पत्रों की समाचार शैली कैसी थी?-

समाधान कर्ता :- प्रा राजेंद्र जिज्ञासु , विषय :- आर्य समाज

समाधान :-

हरियाणा में एक आर्य प्रचारक के निधन पर शोक सभा में भाषण देने व भाग लेने वाले अनेक सज्जनों के नाम पत्र में पढ़े। मरने वाले के बारे में चार पंक्तियाँ भी नहीं छपी मिलीं। इसे नाम की भूख कहें या हमारे आज के पत्रों का घटिया स्तर? यत्न करूँगा कि सौ, सवा सौ वर्ष पुराने पत्रों में छपे समाचार दो-चार लेखों में दूँ। अब सिद्धान्त की बात नहीं होती, लीडर सूची समाचारों में होती है। यह बहुत दुःख का विषय है। पं. लेखराम जी तथा महात्मा मुंशीराम जी उत्सवों में विद्वानों के व्याख्यानों का सार दिया करते थे। सबसे अन्त में अपने भाषण की चर्चा किया करते थे। ‘आर्य समाचार’ मेरठ के प्रचार-समाचार पाठकों में उत्साह व जोश का संचार कर देते थे। आज के पत्र तो ‘लीडर नामा’ और व्यक्तियों के प्रचार को बढ़ाने वाले हैं। ‘सार्वदेशिक’ मासिक के १९३८-१९४६ तक के अंकों को देखिये….।

(36) शंका :- दक्षिण में प्रथम आर्य सत्याग्रहीः

समाधान कर्ता :- प्रा राजेंद्र जिज्ञासु , विषय :- आर्य समाज

समाधान :-

गुंजोटी में एक भाई ने पूछा दक्षिण में बलिदान की अखण्ड परम्परा वीर वेदप्रकाश से आरम्भ हुई आपका यह कथन सत्य है। हैदराबाद सत्याग्रह का प्रथम सत्याग्रही कौन था? मैंने उ  ार दिया कि मैंने पहला सत्याग्रही कौन था, यह भी भलीप्रकार से लिखा व बताया है। धर्म दीवाने पं. त्रिलोकचन्द्र शास्त्री जी प्रथम सत्याग्रही थे जिन्हें श्याम भाई ने बहुत पहले दक्षिण में खींच लिया। कहाँ कादियाँ! और कहाँ शोलापुर!! स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी ने जेल नहीं जाने दिया। वह प्रचार तन्त्र के सेनापति बनाये गये। कवि ने इन रणवीरों के लिये ही तो लिखा हैः-

तेरे दीवाने जिस घड़ी दक्षिण दिशा को चल दिये,

हैरत में लोग रह गये दुनिया का दिल दहला दिया।

(37) शंका :- ईश्वर कब और क्या-क्या सहायता देता है, और क्या-क्या नहीं देता?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

ईश्वर बहुत प्रकार की सहायता देता है। एक तो सामान्य सहायता है, जो सबको दे रखी है। जिसने अच्छे कर्म किये हैं, उसको अच्छा फल, जिसने बुरा किया है, उसको बुरा फल देता है। अपने-अपने कर्मों का फल ईश्वर देता है। ये ईश्वर की सहायता है।
स ईश्वर की सहायता के बिना हम स्वयं अकेले अपने कर्मों का फल नहीं ले सकते। भगवान यूँ कहें कि अपना कर्म करो और अपने फल ले लो, मुझे बीच में क्यों चक्कर में डालते हो। क्या आप अपने कर्मों का फल स्वयं ले सकते हो? अपना कैरियर स्वयं बना सकते हो? न हम धरती अपने रहने के लिये बना सकते हैं, न हम स्वयं फल ले सकते। ईश्वर सबको न्यायानुसार सबके कर्मों के हिसाब से फल देते हैं। ये ईश्वर की सामान्य सहायता है जो सबको दी जाती है।
स जो विशेष-पुरूषार्थ करता है, उसको ईश्वर विशेष सहायता देते हैं। उसको ईश्वर विशेष आनंद देते हैं, विशेष सुख देते हैं, अंदर से उत्साह बढ़ाते हैं। उसकी बु(ि बढ़िया बना देते हैं। जैसे- जो विद्यार्थी अच्छी पढ़ाई करता है तो गुरूजी उसको विशेष सहायता देते हैं। उसको अतिरिक्त समय भी देते हैं कि- भई, ये मेहनती आदमी है। ईश्वर भी ज्ञान-विज्ञान बढ़ायेंगे, उत्साह बढ़ायेंगे, बु(ि बढ़ायेंगे और आनंद देंगे। ये ईश्वर की विशेष सहायता होगी। जो ईश्वर के आदेश का जितना अधिक पालन करेगा, ईश्वर उसको उतनी विशेष सहायता देगें।
स सूरज, चाँद, धरती, सितारे, अन्न, औषधि, वनस्पति, साग, फल, फूल, सब्जी, ये सारी चीजें ईश्वर ने बनाकर दे रखी हैं। ये सब ईश्वर की सहायता से हैं। उनके बिना हम कुछ नहीं कर सकते। न खा सकते हैं, न पी सकते हैं। इस प्रकार से ईश्वर हमारी सहायता करते हैं।

(38) शंका :- ईश्वर’ पहले से है।’आत्मा’ को किसने बनाया ?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

आत्मा को किसी ने नहीं बनाया। ईश्वर को भी किसी ने नहीं बनाया, दोनों हमेशा से हैं। स्वयं अपनी सत्ता से हैं। और एक तीसरी वस्तु-प्रकृति भी हमेशा से है। इस प्रकार से ये तीनों वस्तुएँ अनादि हैं। इन तीनों को किसी ने नहीं बनाया।

(39) शंका :- क्या मनुष्यों के अतिरिक्त कुत्ते आदि पशु-पक्षियों को भी कर्म करने की स्वतंत्रता है ? क्या इन्हें पुण्य पाप लगता है ?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

हाँ। कुत्ते आदि अन्य प्राणियों को भी कर्म करने की चार- पॉच प्रतिशत स्वतन्त्रता है। मुख्य रूप से तो वह भोग योनि है। परन्तु गौण रूप से (थोड़ी सी( कर्म करने की स्वतंत्रता भी है। जैसे- पुलिस वाले कुत्ते को ट्रेनिंग देते हैं, और वो ट्रेन्ड कुत्ते चोरों को पकड़वा देते हैं। यह उनकी चार-पाँच पर्सेन्ट की स्वतंत्रता है और इसका उनको ईनाम मिलता है। अच्छा बढ़िया डबल रोटी, बिस्किट खाने को मिलता है। बढ़िया शैम्पू से नहाते हैं, बढ़िया सुविधाओं में रहते हैं।
स आप शांति से अपने रास्ते में जा रहे हैं और एक कुत्ता पीछे से चुप-चाप आता है और आपकी टांग पकड़ लेता है, काट लेता है। तो आप उसकी डंडे से पिटाई करते हैं न। उसने अपनी स्वतंत्रता का दुरूपयोग किया, इसीलिये तो पिटाई हुई। उसने पाप किया, इसीलिए दण्ड मिला। पुलिस के कुत्ते ने चोर को पकड़वाया, पुण्य किया। इसलिए उसको ईनाम मिला। यह है कुत्ते आदि प्राणियों की कर्म करने की दो-चार-पाँच पर्सेन्ट की स्वतंत्रता।

(40) शंका :- मानव जीवन की सबसे बड़ी भूल कौन सी है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

संसार में पूर्ण सुख मानना, यह मानव जीवन की सबसे बड़ी भूल है। यहाँ पूर्ण सुख नहीं है, मगर हम पूर्ण सुख मान बैठे हैं। लोग यहाँ दुनिया में सुख ढूँढ़ते हैं, जो कि बिल्कुल नहीं मिलेगा। लोग दुनिया में न्याय ढूँढ़ते हैं, वो बिल्कुल नहीं मिलेगा। यहाँ तो कदम-कदम पर अन्याय होता है। भयंकर दुख भोगने पड़ते हैं। इसलिये सबसे बड़ी भूल यह मानना है कि- ‘संसार में सुख मिलेगा।’ इस बात को याद रखें और मोक्ष की तैयारी करें। हाँ, मोक्ष में अवश्य पूर्ण सुख मिलेगा।
संसार में मनुष्य की सबसे बड़ी भूल है – भौतिक (प्राकृतिक( सुखों को लक्ष्य बनाना, मोक्ष को लक्ष्य नहीं बनाना। यही हमारे दःुखों का कारण है।

(41) शंका :- बौ(िक स्तर पर किसी भी जीव का या आकृति का पोस्टमार्टम कैसे किया जाता है, ताकि आकर्षण खत्म हो जाये?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

इसके लिये कभी-कभी श्मशान घाट में जाया करें और वहाँ जलते हुये शव को देखा करें। इससे आपका आकर्षण कम हो जायेगा। दूसरा, कभी-कभी हॉस्पिटल में जाया करें, जहाँ रोगी पड़े रहते हैं। किसी की टाँग लटकी है, किसी का पाँव टूटा हुआ है, किसी का प्लास्टर चढ़ा हुआ है, किसी को कोई रोग है, किसी को कोई। वहाँ हॉस्पिटल में जाकर अपनी आँख से रोगियों को देखें। तीसरा, वो जो कहीं-कहीं हॉस्पिटल में हड्डियों वाले कंकाल होते हैं, उनको देखा करें। चौथा कभी-कभी मौका लग जाये, तो ऑपरेशन थियेटर में जाकर रोगियों का चीर-फाड़ वाला पेट का ऑपरेशन भी देखें। ऐसे दो-चार उपाय करें। और फिर चार, छह महीने में, सालभर में दो बार-चार बार इसको दोहरायें। और उस तरह के चित्र हमेशा दिमाग में रखें। उनको बार-बार दोहराते रहें। सारा आकर्षण खत्म हो जायेगा।

(42) शंका :- मेरा पड़ोसी प्रायः हर रोज बच्चों को भेजकर साइकिल, प्रेस, पंप, तेल, हल्दी, जीरा, कुकर आदि हमारे घर से मंगवाता है? अब मना करें, तो संबंध खराब होने का डरऋ और झूठ बोलकर मना करें, तो ईश्वर का डरऋ और दे दें, तो अंदर मन में दुःखऋ बताइये क्या करें?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

आपका पड़ोसी जो बार-बार ये चीजें माँगता है, उसे एक-दो बार दे दो। बार- बार आये तो कहो- बस भैया, हमारे पास इतनी ही ताकत है। अब हम रोज-रोज नहीं दे सकते। तुम अपने पैसे कमाओ और अपना खाओ। वह नाराज होता है, तो होये। उसकी चिंता नहीं। हम स्वार्थी नहीं हैं, हम लोभी नहीं हैं। पड़ोसी की सहायता करनी चाहिये। जितनी शक्ति हो, जितना सामर्थ्य हो, उतनी पड़ोसी की सहायता करनी चाहिये। अब जब सामर्थ्य पूरा हो जाये, तो साफ बोल दो, कि भाई अब नहीं कर सकते। हमारी ताकत खत्म। अब तुम खुद कमाओ और खाओ। किसी और के पास जाओ। तुम खुद मेहनत क्यों नहीं करते? तुम्हारे भी तो हाथ हैं। हमारे दो हाथ हैं, तुम्हारे भी दो हाथ हैं। जब हम कमा सकते हैं तो तुम भी कमा सकते हो। अपना कमाओ और खाओ। प्रेम से कहो, झगड़ा नहीं करना। यदि अधिक नहीं कमा सकते, तो थोड़े में गुजारा करना सीखो । रोज-रोज माँगना तो अच्छा नहीं है।

(43) शंका :- रात्रि को केवल ढ़ाई-तीन घंटे नींद आती है। खाना, बिस्तर ठीक है। क्या तीन घंटे की नींद काफी है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

ढाई-तीन घण्टे की नींद तो कम है। एक स्वस्थ वयस्म व्यक्ति को कम से कम 6-7 घण्टे तो अवश्य नींद लेनी चाहिए । अच्छी गहरी नींद आये, इसके लिये तीन काम करें। एक तो दिन में खूब मेहनत करें। शारीरिक, बौ(िक, मानसिक परिश्रम करें ताकि रात को थक जायें। आप अच्छी तरह से थक जायेंगे, तो बढ़िया नींद आएगी।
दूसरी बात है कि चिंता (टेंशन( कुछ नहीं करें, नहीं तो नींद नहीं आएगी। तीसरा- सोते समय बिस्तर पर लेटकर कोई चिंतन नहीं करना, कोई विचार नहीं उठाना, कोई योजना नहीं बनानी। अगर इस नियम का पालन करेंगे तो नींद बहुत अच्छी आएगी। और यदि सब विचारों को उठायेंगे, तो आपको नींद पर्याप्त नहीं आयेगी। जो योजना (प्लानिंग( बनानी है, चिंतन-विचार करना है, वह दिन में करो।
स्त्री को मुँह-हाथ धोकर, सोने से पूर्व बिस्तर पर बैठकर, पाँच-दस मिनट ईश्वर का ध्यान करो। उसके बाद तीन काम करने से बढ़िया नींद आएगी। पहला काम- लाइट बंद, दूसरा काम- आँख बंद, तीसरा काम- विचार बंद। ये तीन काम करो, बढ़िया नींद आएगी। विचार बंद करने के लिये उपाय है, ‘गायत्री मंत्र’ का पाठ। बिस्तर पर आप लेटकर, आँख बंद रखें। जब तक नींद न आये, तब तक गायत्री मंत्र का पाठ चालू रखें। ईश्वर का ही स्मरण करें। आपको अच्छी नींद आएगी।

(44) शंका :- हमने सुना है, मुक्त आत्मायें आपस में बातें करती हैं। लेकिन वे स्थूल शरीर के बिना कैसे बातें कर सकती हैं?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

व्यक्ति शरीर के बंधन में होने पर शरीर, इन्द्रियों की सहायता से सारे काम करता है। मोक्ष में ये शरीर, इन्द्रियाँ नहीं रहते। मोक्ष में प्रकृति के बने साधन नहीं होते। वहाँ तो ईश्वर की शक्ति का सहयोग मिलता है। ईश्वर की शक्ति से मुक्त आत्मायें सब जगह घूमती हैं, देखती हैं, सुनती हैं, बातें करती हैं। जो भी मुक्ति का आनंद होता है, वो ईश्वर की शक्ति से भोगती हैं। मुक्त आत्मा, मुक्त आत्मा से बात करेगी, हमसे नहीं। और हम बु( आत्माएँ आपस में बात करेंगे, मुक्तात्माओं से नहीं । और हम बु( आत्माएँ आपस में बात करेंगे, मुक्तात्माओं से नहीं ।

(45) शंका :- क्या किसी भी धर्म, पंथ या देवी-देवता का मजाक उड़ाकर हम अपने आपको श्रेष्ठ कहलवा सकते हैं?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

मजाक बिल्कुल नहीं उड़ाना चाहिये। पर सत्य कहने में कोई आपत्ति नहीं। अगर कोई व्यक्ति गलती कर रहा है, तो उसकी गलती बताने में कोई आपत्ति नहीं है। उसकी गलती (दोष( बतायेंगे। अपनी अच्छाई बतायेंगे। लोगों को उस बुराई से बचायेंगे। लोगों को भटकने से बचाने के लिये, अगर हम किसी का दोष बताते हैं, तो कोई आपत्ति नहीं। और मजाक उड़ाने के लिये खण्डन करते हैं, तो वो गलत है, अपराध है। ऐसा नहीं करना चाहिये । ऐसा करने से हम श्रेष्ठ नहीं कहला सकते ।

(46) शंका :- जब हम शिविर इत्यादि में आते हैं। तब सब कुछ अच्छा लगता है। क्रोध कम हो जाता है। लेकिन जब हम वापस सांसारिक-जीवन में जाते हैं, तो ऐसे नहीं जी पाते, क्या करें?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

पहला उपाय तो यह है कि- सांसारिक जीवन में वापस मत जाओ, यहीं रहो। जब यहाँ शांति से जी रहे हो, तो क्यों जाओ बेकार दुनिया में? वहाँ काम, क्रोध, लोभ, ईष्या, द्वेष आदि सब झंझट हैं। इसलिए एक उपाय तो यह है, कि- ऐसे किसी भी आश्रम में रहो, जहाँ व्यवस्था मिले। यहाँ रहने की गारंटी मेरे अधिकार में नहीं है। अधिकारी हैं, उनसे पूछो, कि यहाँ के नियम क्या हैं? आपकी योग्यता यहाँ रहने की है या नहीं है। वो अधिकारी बतायेंगे। मैंने तो आपको सुझाव दिया, कि यदि ऐसा जीवन अच्छा लगता है, संसार में झंझट होता है, तो वो जीवन छोड़कर किसी भी आश्रम में रहो। जहाँ सुविधा, अनुकूलता हो, वहाँ रहो।
दूसरा- यहाँ से खूब तैयारी करके जाओ, खूब संकल्प करके जाओ, कि हम नगर के जीवन में जायेंगे, लेकिन यह छल-कपट नहीं करेंगे। फिर उसके हिसाब से वहाँ मेहनत करो। यहाँ से जब जायेंगे तो कुछ दिन तक तो आपका वो संकल्प टिकेगा और आप ठीक मेहनत करेंगे। शांति से जी लेंगे। कुछ महीने में आपकी बैटरी डाउन हो जाएगी, तो कुछ महीने बाद चार्जिंग के लिये अगले शिविर में फिर आओ और अपनी बैटरी चार्ज करो। फिर वापस जाओ।
तीसरा- कुछ महीने या वर्ष (जब तक आपकी सांसारिक जिम्मेदारी पूरी हो जाए, तब तक( शिविरों में आ-आकर वानप्रस्थी बनने की तैयारी करो । जब सांसारिक जिम्मेदारी भी पूरी हो जाए, वानप्रस्थी बनने की योग्यता भी बन जाये, तब वानप्रस्थी बनकर किसी आश्रम में रहना शुरु करो । इस प्रकार से दो-तीन विकल्प हैं, जो आपको ठीक लगे, उसको अपनाओ।

(47) शंका :- दस वर्ष के लड़के-लड़की ठीक से भोजन नहीं करते। इस तरह के बच्चों का मन ईश्वर में लगाने के लिये उन्हें कैसी शिक्षा दी जाये?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

ये समस्याएँ घर-घर में है। बच्चों से पूछो- क्या खाओगे बेटा? तो अधिकांश बच्चे बोलेंगे- आलू। अगर पूछें कि- अच्छा, यह बैगन खा लो। तो बच्चे बोलेंगे – न बैगन नहीं खाऊँगा, वो मुझे पसंद नहीं है। ऐसे नखरे घर-घर में बहुत हैं। तो बच्चों के नखरे नहीं सुनना। बच्चों की एक भी गलत बात नहीं माननी। बच्चो ठीक बात बोलें, तो सब मानो। भाई, टिंडे में, दूधी (घिया( में क्या तकलीफ है? इन्हें खाना स्वास्थ के लिये अच्छा है। नेत्र-ज्योति (आई-साइट( के लिये अच्छा है। पालक, मैथी, सरसों आदि-आदि जो हरी पत्ती वाले साग हैं, वो बच्चे नहीं खाते। इससे आई-साइट कमजोर हो जाएगी। छोटी उम्र में चश्मे लग जाएंगे। इसलिए उनको समझाओ और खिलाओ।
स हम भी छोटे बच्चे थे। एक दिन हमारे घर में टिंडे की सब्जी बनी। वो हमको अच्छी नहीं लगी तो हमने कहा- यह टिंडे की सब्जी हम नहीं खायेंगे। हमारे लिये दूसरी सब्जी बनाओ। माता जी ने कहा- बेटा, हमारे घर में एक ही सब्जी बनती है। खानी है तो खा ले, नहीं तो सो जा। बोलिये, क्या करेंगे? भूखे सो जायेंगे। हमको खानी पड़ी। एक दिन नखरा किया, दूसरे दिन किया। वो ही जवाब था कि आज तो बैगन की सब्जी बनी है, तुमको यही खानी पड़ेगी, नहीं खानी तो भूखे सो जाओ। यह घर है, कोई होटल नहीं है। तुम्हारे लिये दूसरी सब्जी नहीं बनेगी। दो दिन नखरा किया। तीसरे दिन अक्ल ठिकाने आ गयी। बस, सीख गये। तब से लेकर आज तक जो मिलता है, खाते हैं, सब खाते हैं, कोई नखरा नहीं। भगवान ने सारी सब्जियाँ हमारे स्वास्थ के लिये ही बनाई हैं। अच्छी बनाई हैं। बच्चों को समझाओ और बारह-तेरह साल की उम्र तक जबरदस्ती खिलाओ। तब तक उनको आदत हो जाएगी। आगे फिर अपने आप खायेंगे। उनको इस तरह से खिलाओ।
स ऐसे बच्चों या सभी बच्चों का मन ईश्वर में लगाने के लिये उन पर नियम लगाओ, कि सुबह शाम ईश्वर का ध्यान, यज्ञ, सन्ध्या, गायत्री मन्त्र का पाठ अवश्य करना पड़ेगा । जो नहीं करेगा, उसको नाश्ता, भोजन आदि नहीं मिलेगा। अच्छे खिलौने, फल, मिठाई, कम्प्यूटर आदि की सुविधा नहीं मिलेगी। जो करेगा, उसे सब सुविधाएँ और कभी-कभी विशेष इनाम भी मिलेगा बच्चों पर ऐसे नियम उनकी 12-13 वर्ष की उम्र तक जबरदस्ती लगायें । अन्यथा आपके बच्चे बिगड़ जाएँगे । भविष्य में वे स्वयं दुखी होंगे और सबको दुख देंगे ।

(48) शंका :- प्रणव’ का अर्थ क्या है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

प्रणव’ शब्द का अर्थ है, वह शब्द, जिससे ईश्वर की अच्छी प्रकार से स्तुति की जाये। और वह होती है ‘ओ३म्’ से। तो प्रणव का अर्थ हुआ- ‘ओ३म्’।
स इस ओम का जप करना चाहिये। ओम शब्द को बार-बार दोहराना चाहिये और अर्थ सहित दोहराना चाहिये। योग दर्शन के सूत्र 1/27 में लिखा है- ‘तस्य वाचकः प्रणवः’। ईश्वर का का नाम ओम है। अगले सूत्र 1/28 में लिखा है, ‘तज्जपस्तदर्थ भावनाम्’ अर्थात् ‘ओ३म्’ का जप अर्थ की भावना सहित करो।
स अर्थ की भावना क्या होती है? अर्थ की भावना करना, ट्रांसलेसन करना नहीं कहलाता। ‘सबकी रक्षा करने वाला’ यह तो ओ३म शब्द का अनुवाद हुआ। अर्थ भावना नहीं हुई। अर्थ भावना का मतलब है, वैसी हमारी मानसिकता (मेनटेलिटी( भी बननी चाहिए, कि ‘ईश्वर सबकी रक्षा करने वाला है। मन-बु(ि में ऐसा हमको प्रतीत होना चाहिए। वो है ‘अर्थ भावना’। मान लीजिए, आप में से एक व्यक्ति मंच पर आ गया। आप उनका परिचय नहीं जानते। पहले-पहले जब आप परिचय नहीं जानते, तो आपको क्या दिखेगा। यह एक व्यक्ति है। चालीस की उमर दिखती है। बस, इतना दिखता है। अब जब उसका यह परिचय कराया जाएगा, कि ये जो व्यक्ति आपके सामने बैठे हुए हैं, ये हाईकोर्ट के जज हैं, तो आपकी दृष्टि बदल जाएगी। अब आपको वो चालीस साल का जवान नहीं दिखेगा। अब वो कुछ और दिखेगा। अब जो कुछ आपको दिख रहा है, वो है ‘अर्थ भावना’। अब आपको वह सामान्य व्यक्ति नहीं दिख रहा है, उसमें एक न्यायाधीश दिख रहा है। हाईकोर्ट का उच्च स्तर का एक बु(िमान न्यायाधीश दिख रहा है। तो अब जो कुछ भी दिख रहा है, दरअसल वो है ‘अर्थ भावना’।
स ऐसे ही जब ओ३म् का जप करें, तो अर्थ की भावना सहित करें। हम कहते हैं, ‘ओम सर्वरक्षक’, तो ‘ईश्वर सर्वव्यापक निराकार होता हुआ सबकी रक्षा करता है,’ ऐसे भाव हमारे मन में होने चाहिए। जब हम कहेंगे, ‘ओ३म् आनंदः’ तो ‘ईश्वर आनंद का भंडार है’, ऐसा प्रतीत होना चाहिए। जैसे रसगुल्ले का नाम लेते ही, उसकी याद करते ही मस्तिष्क में विचार आता है – वाह! बहुत अच्छी वस्तु है, मिठाई है, खाने की चीज है। बहुत सुखदाई है। उससे हमको आनंद मिलता है। जैसे रसगुल्ले का स्मरण करने से आनंद मिलता है, ये प्रतीति होती है। ऐसे ही भगवान को आनंद स्वरूप कहेंगे। उसको भी आनंद का भंडार मानना चाहिए। ‘इससे हमको आनंद मिलेगा,’ इस तरह का भाव यदि हमारे मन में है, तो यह हुई- ‘अर्थ-भावना’। इस प्रकार से जप करना चाहिए।

(49) शंका :- ओ३म््’ का उच्चारण किस जगह और कितने समय पर किया जाना चाहिए। इसमें दिन और रात देखे जाते हैं या नहीं?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

इसमें स्थान और समय का कोई बन्धन नहीं है। क्या माता-पिता को याद करने में कोई स्थान, समय का बन्धन है! नहीं। ईश्वर भी तो हमारा माता-पिता है। ओ३म् भगवान का नाम है। ओ३म् का उच्चारण कहीं भी कर लो, कभी भी कर लो। भगवान को हमेशा याद रखना चाहिए। इसलिए ओ३म् का उच्चारण हमेशा कर सकते हैं। दिन में करो, रात में करो। भगवान का दरवाजा बंद होता ही नहीं है। वह चौबीस घंटे खुला रहता है।
वेद में तो एक ही देवता है। परमात्मा और ‘ओ३म्’ उसका नाम है। ईश्वर को ठीक से पहचानिये।
ईश्वर एक है, सर्वव्यापक है, निराकार है, उसकी कोई आकृति नहीं है। उसको प्राप्त करने के लिए कहीं दूर मक्का मदीना, वाराणसी और हरिद्वार में जाने की आवश्यकता नहीं है। अपने घर में बैठकर शास्त्रों का
अध्ययन, मनन, स्वाध्याय कीजिए। हाँ, शिविर में जाइए। वेद के विद्वानों के पास जाइए। वहाँ सत्संग सुनिए। शंका- समाधान कीजिए। वेदानुकूल पठन-पाठन व्यवहार कीजिए। इससे हमारा कल्याण होगा। इधर-उधर व्यर्थ भटकने से कोई लाभ नहीं।

(50) शंका :- ईश्वर को ज्ञान से जानते हैं। और यह ईश्वर-ज्ञान सबके बस की बात नहीं है, तो क्या ईश्वर को जाने बिना केवल अच्छे कर्म करने से ‘मोक्ष’ की प्राप्ति की जा सकती है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

बिल्कुल नहीं की जा सकती। ईश्वर को जाने बिना मोक्ष प्राप्त नहीं किया जा सकता। ईश्वर को जानना सबके लिए अनिवार्य (कम्पलसरी( है। सबके लिए मोक्ष प्राप्ति का एक ही मार्ग है, एक ही नियम है, किसी को कोई छूट-छाट नहीं है।
स चाहे लाख जन्म लो या करोड़ जन्म लो, जब तक वेद के अनुसार ईश्वर को नहीं जानेंगे, तब तक मोक्ष नहीं होने वाला। जो परीक्षा में अच्छा उत्तर लिखेगा, उसको अच्छे नंबर मिलेंगे। जो नहीं लिखेगा, नहीं मिलेंगे। वहाँ पर कोई कन्सेशन नहीं है। सबके ऊपर एक ही नियम लागू होगा। जी हाँ, वो तो न्याय की बात है। यहाँ संसार में तो अन्याय चलता है। भगवान के यहाँ अन्याय नहीं चलता, न्याय ही चलता है।

(51) शंका :- कठोर’ शब्द का क्या अर्थ है? कठोर शब्द का प्रयोग कब करना चाहिए?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

कठोर शब्द अर्थात् जो सुनने में बुरा लगे, सुनने में अच्छा न लगे। जैसे एक व्यक्ति कुछ देर से आया। तो उसको हम कोमल शब्द कहेंगे। प्रेम से यूं बोलेंगे कि- ‘जी, आप देर से आये, थोड़ा जल्दी आते, तो अच्छा लगता।’ ऐसी भाषा बोलेंगे, तो यह ‘कोमल’ भाषा है। इसी को हम कठोर भाषा में बोलेंगे। ‘आपको समझ नहीं आती क्या। यहाँ पर कितनी बार बतायें, अब तक समझ में नहीं आई! लेट आते हो आप, क्या मजाक बनाा रखा है!’ ऐसे बोलेंगे, तो यह कठोर भाषा है। यह उसको अच्छी नहीं लगेगी। तो फिर कैसे बोलना चाहिये-
‘भाई, आपको जल्दी आना चाहिए, समय का पालन करना चाहिये, आप देर से आते हैं तो सबका नुकसान होता है।’ ऐसे प्रेम से भाषा बोलनी चाहिए।
किसी बच्चे को हमने प्रेमपूर्वक कुछ कार्य बतलाया, उसने नहीं सुना। फिर दो बार, तीन बार प्रेमपूर्वक कहा लेकिन उसने बात नहीं मानी। तब हमने जोर से कह दिया, अब तो मान गया। यह कठोर शब्द तो है, पर यह दण्ड-व्यवस्था है। अब यह सामान्य नियम नहीं है। सामान्य नियम यह है कि- पहली बार में आप ऐसा कठोर बोलते हैं, वो ठीक नहीं है। चार बार प्रेम से समझाने के बाद भी नहीं मानता, तो अब दण्ड दे सकते हैं। उससे कठोर बोल सकते हैं। और अगर दो बार कठोर भाषा बोली, तब भी नहीं सुधरा, तो दो थप्पड़ भी लगाओ, यह दण्ड हैं। दण्ड व्यवस्था अलग है, सामान्य व्यवहार अलग है। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं, उन्हें प्रेम की भाषा समझ में आती ही नहीं। जोर से बोल दो, तो तुरंत सुन लेते हैं। तो चाहे एक महीने तक प्रेमपूर्वक कहते रहो, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। हाँ, तो जो
सीधी-भाषा नहीं समझता। उसे कड़क भाषा बोलो, वो वही भाषा समझता है, इसलिए उससे वो ही भाषा बोलनी पड़ेगी।

(52) शंका :- जीवात्मा शरीर छोड़ने के वक्त कहाँ जाता है? और शरीर छोड़ने के बाद उसकी स्थिति, पुर्नजन्म कैसे होता है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

जैसे ही आत्मा शरीर को छोड़ेगा, वैसे ही बेहोश हो जायेगा। उसको कोई होश नहीं, कोई शक्ति नहीं। अब आगे नहीं चल सकता। जीवात्मा स्थूल शरीर के बिना कुछ नहीं कर सकता।
स शरीर छोड़ते ही ईश्वर उसको पकड़ लेगा। वह ईश्वर के नियंत्रण में आ जायेगा। अब ईश्वर उसको ले जायेगा। उसके कर्मानुसार रूस में, जापान में, अमेरिका में जहाँ कहीं भी अगला जन्म देना होगा, अथवा भारत में ही कहीं अगला जन्म देना होगा, तो उसको वहाँ तक पहुँचायेगा। फिर वहाँ अगला जन्म देगा। उसके कर्मानुसार यह व्यवस्था रहती हैं।
स यह निश्चित है, कि- भूत-प्रेत बनके नहीं भटकेगा, किसी के शरीर में घुसकर उसको परेशान नहीं करेगा, यह पक्की बात है। यह शास्त्रों में लिखा है।
स फिर चौथा करो, दसवाँ करो, बारहवाँ करो, तेरहवाँ करो। कोई फर्क नहीं पड़ता। वो जो बचे हुए जीवित लोग हैं, वो अपने लिये करते हैं। अंतिम-संस्कार जिसको अंत्येष्टि कहते हैं। यह सोलह संस्कारों में अन्तिम है। तो ये शब्द ही कह रहा है कि अंत्येष्टि हो गयी यानि बात खत्म हो गयी। अंत्येष्टि के बाद मृतक के लिए हम कुछ नहीं कर सकते। आत्मा तो दूसरे जन्म में गया और उसका शरीर भी खत्म हो गया। सारे रिश्ते खत्म हो गये। उसके बाद हम उसके लिए कुछ नहीं कर सकते।

(53) शंका :- जीवात्मा को जीने की उत्कट इच्छा क्यों होती है? अथवा जीवात्मा को जीने के लिये कौन सा तत्त्व प्रेरित करता है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

जीवात्मा सुख चाहता है। यह सुख की इच्छा उसे जीने के लिये प्रेरित करती है। मुझे सुख मिलेगा, इसलिए जी रहा हूँ। सुख के लिए व्यक्ति जीता है। कभी-कभी उसके जीवन में दुख बढ़ जाता है, तब वो उस दुख से घबरा जाता है। जब उसको दिखता है कि, मेरे जीवन में सुख कहीं नहीं है, दुःख ही दुख है, तो फिर वो जीना नहीं चाहता, फिर वो कहीं नदी में कूद जाता है। कोई कुएं में कूद जाता है, कोई जहर पी लेता है, कोई ट्रेन के नीचे कट जाता है। फिर आत्महत्या (सोसाइड( कर लेता है। आत्महत्या नहीं करनी चाहिए। उस समस्या का हल ढूंढ लेना चाहिये। हर समस्या का हल होता है, समाधान होता है। उसको खोजने की आवश्यकता है। स्वयं आपको समझ में नहीं आता तो दूसरे व्यक्ति के पास जाइए, उससे सलाह सुझाव लीजिए, कि- मेरी समस्या का क्या समाधान है? कहीं न कहीं मिलेगा। सोसाइड करना पाप और अपराध है, भारतीय कानून में भी, ईश्वर के कानून में भी। जो कोई ऐसा करेगा, उसको दण्ड मिलेगा।

(54) शंका :- घर के बच्चे कैसे बिगड़ते हैं?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

मान लीजिये छह वर्ष का एक छोटा बच्चा है। उसको एक दिन सर्दी, जुखाम हो गया, हल्का बुखार आ गया । और बाहर गली में आइसक्रीम बेचने वाला आया। उसने आवाज लगाई आइसक्रीम-आइसक्रीम। बच्चे ने सुन लिया, कि बाहर आइसक्रीम बेचने वाला आया है, तो बच्चे का मन करता ही है। वो अपनी माँ से कहेगा- मम्मी, मम्मी, मुझे आइसक्रीम दिलाओ, आइसक्रीम खानी है।
स माँ को पता है, कि आज इसकी तबियत ठीक नहीं है, इसको सर्दी-जुखाम है, बुखार है, आज तो आइसक्रीम नहीं खानी चाहिये, नही तो और अधिक रोगी हो जायेगा। इसलिए माँ ने मना कर दिया। बेटा आज आइसक्रीम नहीं मिलेगी, तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है। तीन दिन में ठीक हो जाओगे, फिर खिलायेंगे। अब यह बात बच्चे की समझ में थोड़े ही आती है, कि ‘आज मेरी तबियत ठीक नहीं है। मुझे नहीं खानी चाहिये।’ वो तो छोटा बच्चा है। उसका मन पर इतना नियंत्रण (कंट्रोल( नहीं है। वो तो कहता है, नहीं, मैं तो अभी आइसक्रीम खाऊँगा।’ वो नहीं समझता है, कि आज आइसक्रीम से नुकसान होगा। वो फिर दोबारा रट लगाता है, कि ‘नहीं-नहीं, मुझे तो आइसक्रीम खिलाओ।’ अब उसको खिलायेंगे, तो रोगी पड़ेगा। इसीलिये माँ ने दोबारा मना कर दिया, कि ‘नहीं बेटा, आज नहीं मिलेगी। तीसरी बार फिर माँगी। माँ ने फिर मना कर दिया। बच्चा रोने लगा, ‘मुझे तो आइसक्रीम चाहिये।’ जमकर रोना शुरू कर दिया।
स इतने में आई बच्चे की चाची। उसने पूछा, बेटा क्यों रोते हो। बच्चे ने कहा- ‘यह मम्मी बहुत खराब है।’ अच्छा क्यों क्या हुआ?’ मुझे आइसक्रीम नहीं खिलाती।’ अच्छा, मम्मी आइसक्रीम नहीं खिलाती। अच्छा चल, तू मेरे साथ चल। मैं तुझे आइसक्रीम खिलाती हूँ। वो चाची आकर के ले जायेगी और उसको बाहर जाकर के आइसक्रीम खिला देगी। समझ लेना, आपका बच्चा बिगड़ेगा। आपके हाथ में नहीं रहेगा। यह गलती की चाची ने। चाची को पहले पूछना चाहिये था, कि तुम्हारी माँ ने तुमको आइसक्रीम क्यों नहीं खिलाई। बिना पूछे ऐसे ही आकर मम्मी के ऊपर आरोप लगा दिया, ‘तुम्हारी मम्मी बहुत खराब है, बच्चों का इतना भी ध्यान नहीं देती। बच्चे रोते रहते हैं और उनको आइसक्रीम नहीं खिलातीं। अरे! आइसक्रीम ही तो है न, दो-चार-पाँच रुपये की आइसक्रीम होती है। पैसे किसलिए कमाते हैं। ये किस दिन काम आयेंगे।’ ऐसे उसने डाँट-फाँट शुरू कर दी। बच्चे की माँ से यह नहीं पूछा कि ‘तुमने बच्चे को आइसक्रीम क्यों नहीं खिलाई। बस यहाँ चाची मार खा गई। उसे पहले आकर पूछना चाहिये था, कि ‘आपने इस बच्चे को आइसक्रीम क्यों नहीं खिलाई।’ तो माँ बताती, कि ‘आज इसको सर्दी है, जुकाम है, बुखार है, इसीलिये आइसक्रीम नहीं खिलायी।’ पहले जानकारी करो। फिर चाहे, चाची खिलाये, चाहे दादी खिलाये, चाहे दादा खिलाये, चाहे चाचा। कोई भी आये, चाहे बच्चों का पिता जी आये। पहले वो माँ से पूछेगा, कि इसको आइसक्रीम क्यों नहीं खिलाई, और माँ बतायेगीं, सर्दी है, बुखार है, इसलिये नहीं खिलाई।’ सारी जानकारी करके अब बच्चे को सभी बड़े लोग एक ही जवाब दो- ‘बेटा तुम्हारी मम्मी बहुत अच्छी है। बहुत समझदार है। उसने आइसक्रीम नहीं खिलाई, बहुत अच्छा किया। आज तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है। आज तुमको आइसक्रीम नहीं मिलेगी।’ तो माँ ने भी मना किया, चाची ने भी मना किया। चाचा आया, तो उसने भी मना किया। अब बताइये बच्चा कहाँ जायेगा? उसको चुपचाप मन मारके रहना पड़ेगा। अगर आप इतना कर सकते हैं, तो समझ लो आपके बच्चे अच्छे बनेंगे, आपके नियंत्रण में रहेंगे। आपके अनुशासन में चलेंगे। अगर आप इतनी मेहनत नहीं कर सकते, जानकारी नहीं करते और खामखां बिना परीक्षण किये ऐसे दोष लगाते हैं चाची के ऊपर, माँ के ऊपर, पिता के ऊपर, तो समझ लेना बच्चे बिगड़ेंगे। माँ ने कह दिया, ‘बेटा परीक्षा आ रही है सर पे, बैठ के थोड़ी देर पढ़ लो। अचानक आए पिताजी। उन्होंने कुछ जानकारी की नहीं। और आते ही उसका विरोध कर दिया।’ क्या तुम सारा दिन बच्चे को पढ़ते ही रहने दोगी। कभी खेलने की छुट्टी भी तो दिया करो। पढ़-पढ़के पागल हो जायेंगे। जाओ बेटा, जाओ खेलो।’ पिताजी ने कह दिया जाओ खेलो। माँ कह रही है, बेटा पढ़ो। बच्चा किसकी बात सुनेगा? पिताजी की। क्योंकि उसको तो खेलना अच्छा लगता है। वो माँ की नहीं सुनेगा। और फिर माँ चिल्लायेगी- ‘देखो मेरा बेटा मेरी बात नहीं सुनता।’
स इस झंझट से बचने के लिये, अपने घर में विधान-सभा लगाओ। जैसे सब राज्यों (स्टेट( की अपनी-अपनी विधानसभा होती है। और जितने मंत्री लोग होते हैं, वहाँ सब बैठके बहस करते हैं, चर्चा करते हैं। समस्याओं को सुलझाते हैं, और सारे मिल करके एक कानून पास करते हैं। और फिर उस कानून को जनता पर लागू करते हैं। तब सरकार चलती है, तब शासन चलता है। जो घर के बड़े लोग हैं, माता-पिता, चाचा-चाची, दादा-दादी, ये सब घर के राजा लोग हैं। और बच्चे आपकी प्रजा हैं। अगर आपको प्रजा पर ठीक शासन करना है, तो घर के जितने बड़े लोग हैं, बैठ करके अपने घर में विधानसभा लगाओ। और बच्चों के लिये कानून पास करो। ‘इन बच्चों को क्या खिलाना, कब खिलाना, क्या नहीं खिलाना, कितना खिलाना, कैसे खिलाना, कब सुलाना, कब जगाना, कब स्कूल भेजना, कब खेलना, कब कूदना, कब टी.व्ही, देखना?’ यानि पूरा चौबीस घंटे का टाइम-टेबिल बनाओ।
स माँ कहती है, बच्चा दस बजे सो जायेगा। पिताजी कहते हैं, नहीं बारह बजे तक पढ़ेगा। गलत बात है। बच्चा आपके हाथ में नहीं रहेगा।
स पहले माता-पिता दोनों एक विचार तो बना लो। आपका खुद का एक विचार नहीं है। बच्चा किसकी सुनेगा! उसके मन में जो आयेगा, वो उसकी बात सुनेगा। आपकी बात नहीं सुनेगा। अगर माता-पिता में आपस में मतभेद हैं तो पहले बैठकर के अपने घर की विधानसभा में बहस कर लो। दस बजे सोना ठीक है या बारह बजे। दोनों पहले एक निर्णय कर लो। और फिर वो जो एक निर्णय स्वीकार हो जाये, फाइनल हो जाये। फिर उसको बच्चे पर लागू करो, दो अलग-अलग बात नहीं। एक मंत्री ने कहा कि जमीन के ऊपर तीस प्रतिशत टैक्स लगेगा। दूसरे मंत्री ने कहा नहीं-नहीं पच्चीस प्रतिशत टैक्स लगेगा। बोलो जनता किसकी बात सुनेगी? पच्चीस वाले की। तीस वाले की क्यों सुनेगी। फिर तीस वाला मंत्री चिल्लायेगा, ‘देखो साहब, यह जनता कैसी है, मेरी बात ही नहीं सुनती।’ आपकी बात तब सुनेगी, जब आप दोनों मंत्री एक बात बोलेंगे। तो बच्चे आपकी जनता हैं, आपकी प्रजा हैं। आप उनके शासक हैं, राजा हैं, माता-पिता, चाचा-चाची, दादा-दादी। आपको जो भी बच्चों को सिखाना है। उसका कानून बनाओ। और फिर सबके सब वो कानून बच्चों पर लागू करो। देखो आपके बच्चे कैसे नहीं बनते। हम गारंटी देते हैं, खूब बनेंगे। और आपने पालन नहीं किया, तो फिर वो खूब बिगड़ेंगे। और बिगाड़-बिगाड़ के हमारे पास ले आओगे। महाराज जी ये बच्चा बिगड़ गया है, अब आप सुधारो।’ बिगाड़ो आप, सुधारें हम। आपकी भी तो कुछ जिम्मेदारी है। आप भी तो कुछ मेहनत करो। हम तो करते ही हैं, आगे भी करेंगे।
स 24 घण्टे का टाइम टेबिल बनाओ। रात के दस बजे सोना है, और सुबह पाँच बजे उठ जाना है। इसके बाद कोई नहीं सोयेगा। आज संडे है, तो आठ बजे तक सोयेंगे। और स्कूल जाना है तो पाँच बजे उठेंगे। यह क्या मतलब हुआ भाई, सन्डे को तो स्कूल जाना नहीं, तो क्यों सोओ आठ बजे तक? क्या सन्डे को रोटी नहीं खाते? जब संडे को रोटी खाते हैं, तो आठ बजे तक क्यों सोयेंगे? ऐसे माता-पिता ने बिगाड़ रखा है बच्चों को। तो पहले माता-पिता को सुधरने की जरूरत है। पहले वो अपना कानून ठीक करें।
स सुबह जल्दी उठना इसलिए नहीं होता, कि हमको स्कूल जाना है। दरअसल, अपने स्वास्थ्य की रक्षा के लिये उठना है। स्कूल जाना, नहीं जाना, वो अलग विषय है। सबने सीख रखा है- ”अरली टू बैड, अरली टू राईज, मेक्स अ मैन, हेल्दी-वेल्दी एंड वाईज”। सबको पता है। लेकिन प्रैक्टिकल उल्टा है- ”लेट टू बेड, लेट टू राईज, मेक्स अ मैन, अनहैल्दी, अनवैल्दी अनवाईज।” रिजल्ट भी उल्टा ही आयेगा। अनहैल्दी (रोगी( पड़ेंगे। देखो पूरा देश रोगी हो गया, कश्मीर से कन्याकुमारी तक पूरा देश रोगी है। तभी तो जाते हैं स्वामी रामदेव जी के पास, सुबह-सुबह वो व्यायाम करवाते हैं न। आजकल लोग पाँच बजे टेलीविजन के सामने बैठ जाते हैं। थोड़ा एक्सरसाईज करें, तो ठीक हो जायेंगे। दूसरा परिणाम = अनवैल्दी यानि पैसे नहीं कमा सकता। और अनवाईज यानि बु(ि भी जायेगी। शरीर रोगी हो जायेगा, बु(ि भी जायेगी, तो फिर पैसा क्या कमायेंगे। तीनों जायेंगे। और आज तीनों बिगड़े हुये हैं। इसीलिये जल्दी सोयें, जल्दी उठें। जल्दी सोने का मतलब, दस बजे सोना। साढ़े नौ दस बजे तक सो जाओ। यह मेडिकल साइंस कह रहा है, मैं नहीं कह रहा हूँ। हाँ, मेरा कोई संदेश नहीं है, यह सब शास्त्रों का संदेश है। नौ, साढ़े नौ, दस बजे सो जाइये। जल्दी उठने का मतलब सुबह चार बजे, साढ़े चार, पाँच बजे तक उठ जाना । बस, पाँच के बाद नहीं। फिर देखो आपका स्वास्थ्य अच्छा रहेगा।
स जो बच्चे रात को देर तक पढ़ते हैं। रात को दस से लेकर बारह, एक, दो बजे तक पढ़ते हैं। क्या रात को पढ़ने से दिन अट्ठाइस घंटे का हो जाता है। दिन के घंटे तो चौबीस ही रहते हैं। आप दिन में पढ़ो, चाहे रात में, घंटे तो उतने ही रहने हैं। तो रात को क्यों पढ़ते हो, सुबह उठके पढ़ो न। पुराने समय में लोग जल्दी सोते थे, जल्दी उठते थे। सुबह-सुबह पढ़ते थे, उससे बहुत अच्छा याद होता था। सात घंटा आप नींद ले चुके हैं, तो आपका माइंड फ्रेश हो जायेगा। सुबह तरोताजा दिमाग के साथ पढ़ाई अच्छी होती है। अच्छा याद रहेगा। स्मृति अच्छी बनेंगी। और देर तक रात को जागेंगे, पढ़ाई अच्छी नहीं होगी, स्मृति अच्छी नहीं होगी। दिन-भर के थके हुए दिमाग से आप रात को पढ़ेंगे, तो पढ़ाई अच्छी नहीं होती। सुबह अच्छी होती है।
स इस तरह से अपना टाइम-टेबिल बनायें। बच्चों का चौबीस घंटे का समय-चक्र कागज पर लिखें। उनके कमरे में चिपका दें दीवार पर। कहें, यह तुम्हारा टाइम-टेबिल है, अब इसके हिसाब से चलना है। और जो पालन नहीं करेगा, उसको दंड मिलेगा।
स दंड के बिना कोई सुधरता नहीं है। यह बिलकुल सही नियम है। धरती पर बु(िमान लोगों ने प्रैक्टिकल करके, इसके बड़े अच्छे रिजल्ट देखे हैं। ये सिर्फ किताबी बातें नहीं हैं। आप दंड लागू करो। बच्चे फटाफट ठीक हो जायेंगे। माता-पिता दंड देना नहीं चाहते। वो डरते हैं। सोचते हैं कि बच्चे बीमार हो जायेंगे, दुःखी हो जायेंगे। ये भूखे रहेंगे तो कैसे गाड़ी चलेगी। आप दो बार, चार बार, दंड देकर तो देखो। फटाफट सीधे हो जायेंगे। अब मैं आपको अपने घर की बात सुना रहा हूँ। जब मैं छोटा बच्चा था। हमारे घर में ये सारे नियम चलते थे, जो मैंने अब तक आपको सुनाये। दस बजे सोना, सुबह पाँच बजे उठना। हम बचपन से ये काम करते रहे। हमको माता-पिता ने बचपन से सिखा दिया। दस बजे लाइट ऑफ हो जायेगी, कोई नहीं जगेगा। हमारे माता-पिता भी दस बजे सो जाते थे। यदि वो बारह बजे तक जागते होते, तब हम भी बारह बजे तक जागते होते।
स तो पहले आपको सुधरने की जरूरत है। पहले माता-पिता सुधरेंगे, तो बच्चे सुधरेंगे। गृहस्थ-आश्रम मौज-मस्ती के लिये नहीं है, तपस्या के लिये है। बच्चे ऐसे ही नहीं बनते। बहुत तप करना पड़ता है। हमारे माता-पिता ने यह तप किया। वो खुद सुबह चार बजे उठते थे। और हमको पाँच बजे उठाते थे। और पाँच बजे कैसे उठाते थे? पिताजी एक बार आवाज लगाते थे- ”हाँ बेटा, पाँच बज गये उठ जाओ।” अब दूसरी आवाज नहीं लगेगी। तुम्हारी मर्जी है, सोते रहो या उठो। और आज मैं देखता हूँ, आधे घंटे तक माता-पिता चिल्लाते रहते हैं, ‘बेटा उठो, उठो न।’ उठ रहा हूँ। यहाँ से उठके, वहाँ सो जायेगा। ‘बेटा स्कूल का टाइम हो रहा है, जल्दी उठो, नहाना भी है, स्कूल भी जाना है।” उठता हूँ, उठता हूँ, फिर यहाँ से उठेगा, वहाँ सो जायेगा। आधा-पौना घंटा तो उठाने में चला जाता है। इतना तो सीख लो कम से कम, यह आधे घंटे तक बच्चों को उठाना छोड़ दो। बिल्कुल नहीं उठाना। एक आवाज लगाना बस, बेटा पाँच बज गये उठ जाओ। न उठे, छोड़ दो, उसको सोने दो, लेट होगा न स्कूल जाने में। एक दिन स्कूल लेट जायेगा, वहाँ होगी पिटाई। फलस्वरूप दूसरे दिन से ठीक हो जायेगा।
स मैं कह रहा हूँ, ‘दंड के बिना कोई सुधरता नहीं।’ हमारे घर में सुबह छह बजे नहा-धोकर तैयार होके हवन में आना होता था। छह बजे जो हवन में नहीं आता था, उसे नाश्ता नहीं मिलता था, यानि नो ब्रेकफास्ट। भूखे जाओ स्कूल, नहीं मिलेगा नाश्ता। आपमें हिम्मत है, अपने बच्चे को बोल सकते हो, बेटा छह बजे नहा धोकर तैयार हो जाओ और हवन करना है, बिना हवन के नाश्ता नहीं मिलेगा। है हिम्मत? नहीं है। इसीलिये आपके बच्चे नहीं बनते। इतनी हिम्मत जगाओ, घर आपका है। आप घर के मालिक हैं, क्यों खिलाते हो बच्चे को रोटी। जब वो आपकी बात नहीं सुनता। रोटी कब खिलाओ, जब वो आपकी बात मानेगा। आजकल गड़बड़ मम्मी में है, और पापा में है। दोनों में गड़बड़ है। पहले वो सुधरने चाहिये। फिर शाम को हम खेलकूद के आये तो भूख लगी है। माता जी को बोला, ‘माता जी, भोजन चाहिये, तो माताजी कहती थीं- सन्ध्या की या नहीं । हम कहते-नहीं की । तो वे कहतीं -भाग जाओ यहाँ से, खाना नहीं मिलेगा, पहले सन्ध्या करो, फिर खाना मिलेगा।’ है इतनी हिम्मत आपके अंदर, जो अपने बच्चों को ऐसा बोल सकें। अगर इतनी हिम्मत नहीं है तो भूल जाओ। आपके बच्चे नहीं सुधरने वाले। अगर सुधारना चाहते हैं, तो इतनी हिम्मत बनाओ। सुबह हवन के बिना नाश्ता नहीं मिलेगा, पाँच बजे सुबह उठना पड़ेगा, रात को दस बजे सोना पड़ेगा। चौबीस घंटे का टाइम-टेबिल हमारे पिताजी ने बनाया, हमारे कमरे में चिपका दिया दीवार पर। और कह दिया, इसका पालन करना है। मेरे घर में रहना है तो यह करना पड़ेगा। नहीं तो दरवाजा खुला है, भाग जाओ यहाँ से। ये सब प्रैक्टिकल बातें हैं। हमारे घर में हो चुकी है। तब जाकर हम कुछ ज्ञानार्जन करके आपके सामने बैठकर बोल रहे हैं। इसके पीछे बहुत लंबी तपस्या है। माता-पिता की भी और कुछ हमारी भी। गुरूजनों की, परमात्मा की बहुत कृपा है। इस तरह से बच्चों का निर्माण होता है। आप लोग भी अपने बच्चों के निर्माण के लिये इस प्रकार से प्रयत्न करें ।

(55) शंका :- पन्द्रह साल का लड़का यदि दुष्ट व्यसन में पड़ जाये तो उसे कैसे सुधारा जा सकता है? कृपया विस्तार से बतलायें?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

पहले यह जान लें, कि सुधार और बिगाड़ का जो समय है, वो पन्द्रह साल के बाद नहीं है। दरअसल, उससे पहले है। अब तो घोड़ा हाथ से छूट गया। पन्द्रह साल का हो गया बेटा। अब तो गया हाथ से। इसका भी उत्तर बतायेंगे।
स जिनके बच्चे अभी पन्द्रह साल से छोटे हैं, वो लोग पहले ध्यान से सुनें। अगर आप अपने बच्चों को अनुशासन में रखना चाहते हैं। और उनको बुराईयों से, व्यसनों से बचाना चाहते हैं, अच्छी बात सिखाना चाहते हैं, अच्छा इंसान बनाना चाहते हैं, तो शुरु से ही सावधान हो जायें। सावधानी शुरू से होती है। जन्म से भी पहले से होती है।
स विवाह-संस्कार के बाद पहला संस्कार होता है- ‘गर्भाधान संस्कार।’ वहाँ से बच्चे को तैयारी शुरू होती है। बल्कि उससे भी पहले से होती है। शास्त्र का नियम तो यह है कि- पहले माता-पिता योजना बनाते हैं, कि हमको कैसी संतान चाहिये। उनके लिए मानसिक-संकल्प करते हैं। वो वैसी मानसिक तैयारी करते हैं। वैसी पुस्तकें पढ़ते हैं। वैसा खान-पान रखते हैं। इतनी तैयारी करके फिर वो ‘गर्भाधान-संस्कार’ करते हैं। तो उसी तरह की ‘आत्मा’ ईश्वर भेजता है। वहाँ से शुरूआत हो सकती है। लेकिन लोगों को पता नहीं है। अब कोई व्यक्ति गृहस्थ आश्रम के नियम जानते ही नहीं तो पालन क्या करेंगे?
स दरअसल, गृहस्थ आश्रम उत्तम संतान बनाने के लिये ही निर्धारित किया गया है, मौज-मस्ती के लिये नहीं। आज जितने लोग गृहस्थ में जाते हैं, शादी करते हैं, उनसे आप पूछो- आप शादी क्यों कर रहे हैं? उनके पास कोई उत्तर नहीं है। सारी दुनिया करती है, इसलिये हम भी कर रहे हैं, यह उनका जवाब है। हमारे माता-पिता का दबाव (प्रेशर( है। शादी करो, इसलिये कर रहे हैं। यह उत्तर है, उनके पास। गृहस्थ का उद्देश्य पता नहीं है।
स क्यों शादी करनी चाहिये, संतान कैसी बनानी चाहिये, संतान कैसे बनाई जाती है, कुछ पता नहीं। इसीलिये वो बच्चों को बिगाड़-बिगाड़ के रख देते हैं। सीखा ही नहीं, कि बच्चों को कैसे बनाया जाता है। यह बहुत बड़ा विज्ञान (साइंस( है। आप मकान बनाते हैं। उसके लिये कितनी मेहनत करते हैं। इंजीनियरिंग करते हैं, सिविल इंजीनियरिंग करते हैं। मकान बनाना सीखते हैं। और कितने सालों तक मेहनत करते हैं, तब जाके मकान ठीक से बनता है। यह तो जड़ वस्तु है। जड़ वस्तु को बनाने, सीखने के लिये कितनी मेहनत करते हैं। कितने सालों तक योजना बनाते हैं। कितनी प्रैक्टिस करते हैं, अभ्यास करते हैं। और एक बच्चे को अच्छा इन्सान बनाना है तो वो तो चेतन वस्तु है, वो तो मकान बनाने से हजार गुना कठिन है। और इंसान को अच्छा कैसे बनाया जाये, यह सीखते नहीं। किसी को पता नहीं। और इसीलिये बच्चों को बिगाड़ के रख देते हैं। और जब बच्चे बिगड़ जाते हैं तो फिर हमारे पास ले आते हैं- महाराज जी यह बच्चा बिगड़ गया, इसको सुधारो। बिगाड़ो आप, सुधारें हम। तो पहले आप बच्चों को बनाना सीख लो। बच्चे कैसे बनाये जाते हैं। इसके कैसे नियम होते हैं। कैसे पालन करना चाहिये।
स गर्भाधान-संस्कार से पहले तैयारी करो। हमको कैसा बच्चा चाहिये। हम उसको क्या बनाना चाहते हैं, पहले से योजना बनाओ। वैसी तैयारी करो, वैसी पुस्तकें पढ़ो। वैसा स्वाध्याय करो। ऐसे लोगों के साथ बैठो। ऐसा चिंतन करो। ऐसा खान-पान रखो। फिर आत्मा को बुलाओ। फिर ईश्वर आपके पास अच्छी आत्मा भेजेगा। और फिर उसको वैसे ही संस्कार देना। वैसा ही सोचना। वैसी ही बात सुनाना, वैसे ही लोरियाँ सुनाना। वैसी ही बातें सिखाना। फिर जब डेढ़-दो साल का बच्चा हो जाये, तब से वो समझने लगता है। फिर उसके सामने अच्छी-अच्छी बातें करना। उसको अच्छी-अच्छी चीज सिखाना। शिष्टाचार से वार्तालाप सिखाना। सभ्यता से उठना-बैठना सिखाना। लेन-देन सिखाना। और उसको धीरे – धीरे सब बातें समझाते जाना।
स उसके सामने झूठ नहीं बोलना। बहुत मातायें देखी गई हैं। जो बच्चों के सामने झूठ बोलती हैं। पिता भी कम नहीं हैं। वो भी बच्चे से झूठ बोलते हैं। और जब बच्चा सीख लेता है तो फिर कहते हैं- यह बच्चा कैसे बिगड़ गया। यह कहाँ से सीख आया झूठ बोलना। हमने तो नहीं सिखाया। अच्छा जी, आपने ही तो सिखाया था। आपको पता भी नहीं चला, कि आपने इसको झूठ बोलना कब सिखा दिया। कैसे सिखा दिया। कल्पना करो एक माता रसोई में काम करती हैं, वहाँ रसोई में चाकू रखा था। दो साल के बच्चे ने चाकू उठा लिया। बच्चा, तो अपनी मनमर्जी करता है। जैसा मन में आता है, वैसा ही करता है। माँ ने देखा, तो कहा बेटा, चाकू छोड़ दो। उसने चाकू नहीं छोड़ा, तो माँ ने उससे चाकू छीन लिया। और छीन करके पीठ के पीछे छुपा लिया। और कहा, वो कौआ ले गया। बोलो ऐसा करते हो या नहीं करते? करते हैं। आप समझते हो, यह बच्चा तो दो साल का है, यह नहीं समझेगा। हम तो इसको उल्लू बना लेंगे, इसको मूर्ख बना लेंगे। आपका यह सोचना गलत है। वो सब समझता है। हाँ बोल नहीं सकता। अभी वो बता नहीं सकता कि आपने झूठ बोला है। लेकिन वो समझ गया। वो देखता है, कि कौआ तो आया नहीं। ये कहते हैं, कौआ ले गया। पीठ के पीछे छुपाया और बोले कौआ ले गया। फिर उसने दूसरी चीज उठा ली, तो आपने फिर छीन ली, और पीठ के पीछे छिपाकर कहा, वो बंदर ले गया। न कौआ आया, और न बंदर आया। उसने देखा, कि मेरी माँ झूठ बोलती हैं। कभी कहती है, कौआ ले गया, और कभी कहती है, बंदर ले गया। न कौआ आया, न बंदर। झूठ बोलती है। माँ से बच्चे ने झूठ ‘बोलना’ सीख लिया।
स और दो महीने बाद क्या हुआ। बच्चे ने माचिस उठा ली। माँ बोली- नहीं-नहीं माचिस मत उठाओ। यह मुझे दे दो। अब वही बच्चा माचिस अपनी पीठ के पीछे छिपाकर जवाब देगा, माँ माचिस तो कौआ ले गया। मैंने ऐसा भी देखा है। माँ को बोलते देखा है। और फिर उसी मां के बच्चे को झूठ बोलते भी देखा है। अपनी आँख से देखा है। अब आपको समझ में आया, कि आपने अनजाने में क्या पढ़ा दिया। तो ऐसे नहीं पढ़ाना। आप खुद ही उनको बिगाड़ते हैं। खुद झूठ बोलते हैं। और फिर कहते हैं साहब! बच्चा बिगड़ गया। उसका दोषी और कोई नहीं है। आप हैं। तो ऐसी गलतियाँ न करें।
स उसको चाकू नहीं देना। सच बोल करके उससे चाकू ले लेना। झूठ बोलकर नहीं। चाकू उससे छीन लो। और कहो तुमको चाकू नहीं मिलेगा। चाकू हमारे पास है। हम नहीं देंगे। चाकू उठाके ऊपर रख दो। जहाँ उसका हाथ नहीं पहुँचे। चाकू नहीं मिलेगा। उसको प्रेम या गुस्से से डराते हुए समझायें तुम्हारा हाथ कट जायेगा, इसीलिये चाकू बिल्कुल नहीं मिलेगा। सच बोल करके उसको ब्रेक लगाओ। ब्लेड उठा लिया, ब्लेड छीन लो। तुम्हारा हाथ कट जायेगा। ब्लेड ऊँचा रख दो। ब्लेड नहीं मिलेगा। माचिस उठा ली। माचिस छीन लो, ऊपर रख दो। नहीं मिलेगी। ऐसे बच्चों को सच बोल करके सिखाओ। ये मातायें झूठ बोलती हैं, तो बच्चे झूठ पकड़ते हैं।
स और पिता लोग भी कम नहीं हैं। बच्चा हो गया पाँच-छह साल का। एक बार क्या हुआ, एक व्यापारी आया पैसा लेने। तो पिताजी ने दरवाजे में से देखा कि अरे! ये तो पैसे लेने आया है, और पैसे तो हैं नहीं। तो पिताजी ने बच्चे से कहा उसको जाकर के बोलो, पिताजी घर पर नहीं है। बच्चा बेचारा छोटा था। उसने जैसा सुना, वैसा बोल दिया। पिताजी कह रहे हैं, पिताजी घर पर नहीं हैं। तो वो व्यापारी जो आया था पैसे लेने के लिये, वो भी समझ गया पिताजी घर पर हैं या नहीं हैं।
स बाद में उस बच्चे ने सोचा, कि पिताजी तो घर में हैं। पिताजी घर में नहीं हैं, यह ये तो झूठ है। अब पिताजी ने तो उसको झूठ बोलना सिखा दिया। फलस्वरूप दो-तीन साल के अंदर वो बच्चा पिताजी को धोखा देने लग गया। दो-चार साल का और बड़ा हो गया। दसं में ग्यारह फिर और बड़ा- चौदह-पन्द्रह साल का हो गया। स्कूल जाता है। दोस्तों के साथ इधर-उधर घूमता रहता है। होमवर्क करता नहीं है, कभी गार्डन में टाइम बर्बाद करता है। तो कभी पिक्चर देखने चला जाता है। और शाम को घर आ जाता है फिर कहता है, मैं तो स्कूल गया था। मैं कहीं गार्डन में नहीं गया था। मैं कहीं पिक्चर देखने नहीं गया था। मैं तो स्कूल गया था। अब बोलो, किसने उसको झूठ बोलना सिखाया? उत्तर है माता-पिता ने। तो अगर आप ऐसी गलतियाँ करेंगे तो आपके बच्चे बिगड़ेंगे। इसलिए कृपया ऐसी गलतियाँ न करें। जो भी बच्चे को सिखाना है सच-सच सिखाओ। हमेशा सच बोलो।
स दस में से आठ बातें बच्चे आपके आचरण से सीखते हैं। आप जो करते हैं, बच्चे आपकी नकल करते हैं। दो बात केवल आपके उपदेश से सीखेंगे। बेटा यह अच्छी चीज है यह करो, ये खराब चीज है यह मत करो। बाकी तो आपके प्रैक्टिकल-जीवन में से सीखते हैं। आप सच बोलेंगे, तो आपके बच्चे सच बोलेंगे। आप झूठ बोलेंगे, तो आपके बच्चे झूठ बोलेंगे। तो बच्चे बिगड़ते हैं, उसके लिए सबसे बड़े दोषी उनके माता-पिता हैं।
स और तीसरा दोषी है, स्कूल का टीचर। आजकल टीचर अपना कर्तव्य छोड़ चुका है। केवल सिलेबस पढ़ा देने मात्र से अध्यापक की जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती। उसको चाल-चलन, व्यवहार, बोलना, सभ्यता और मॉरल-एजूकेशन भी देना चाहिये। यह भी टीचर की बड़ी जिम्मेदारी है। पहले के टीचर लोग ऐसा करते थे। लेकिन अब छोड़ दिया। इसलिये दुनिया बिगड़ गई।
स बच्चों के बिगाड़ के बहुत सारे कारण हैं। और भी कई कारण हैं। मैंने अभी केवल तीन मुख्य कारण बतलाये। तीन बड़े कारण हैं। एक माता, दूसरा पिता और तीसरा गुरू, (आचार्य, शिक्षक, टीचर स्कूल का( तो अगर यह तीनों अच्छे हैं। तो बच्चे अच्छे बनेंगे। अगर ये तीनों खराब हैं, तो बच्चे खराब बनेंगे। तो जिनके बच्चे अभी छोटे हैं, वो अभी से सावधान हो जायें। ऐसा कोई व्यवहार न करें, जिससे बच्चे का बिगाड़ हो।
स अपने व्यवहार को शु( रखें। मेरे पास आते हैं लोग, कहते हैं साहब! मेरे बच्चे रात को बारह बजे, एक बजे तक जागते हैं। मैंने पूछा, अच्छा आप कितने बजे तक जागते हैं। वे बोले, साहब मैं भी एक बजे सोता हूँ। मैंने कहा, जब आप एक बजे सोते हैं तो बच्चे दस बजे क्यों सोयेंगे? आप क्यों एक बजे तक जागते हो। आप भी दस बजे सोओ न, फिर देखो बच्चे क्यों नहीं सोयेंगे। तो पहले माता-पिता को अपने सुधार की जरूरत है, फिर बच्चे सुधरेंगे। मैंने कुछ मूल-मूल सि(ांत बतलाये, कि बच्चे का बिगाड़ और सुधार कैसे होता है। उस पर विशेष ध्यान दें। और जो बात आप अपने बच्चे को सिखाना चाहते हैं पहले खुद अपने जीवन में आचरण करें। जिस दोष से बच्चे को बचाना चाहते हैं, पहले स्वयं उस दोष को छोड़ें, स्वयं अच्छे कामों को करें। फिर आपका बच्चा अच्छे काम करेगा।
स पन्द्रह साल का लड़का हो गया, अब छोटा नहीं है, बड़ा हो गया। उसको जिस दुर्व्यसन से बचाना चाहते हैं। उस व्यसन की हानियाँ, नुकसान बतलायें। हानियों की सूची (लिस्ट( बनायें। उसमें लिख-लिखकर बतायें, कि यह आपने जो दुर्व्यसन पकड़ लिया है। ऐसा करने से ये हानियाँ होंगी। और उस दुर्व्यसन से बचकर ठीक काम करेंगे, तो उससे क्या लाभ होंगे? लाभ की दूसरी लिस्ट बनायें। और उससे कहें बेटा, ये जो सूचियाँ हैं, इनको हर रोज तीन बार, चार बार, पाँच बार रोज पढ़ना है। और कुछ नहीं करना, बस सूची को पढ़ना है। जैसे डॉक्टर लोग तीन बार दवा खिलाते हैं ना सुबह, दोपहर, शाम। वैसे ही यह तुम्हारी दवा है। तुमको तीन बार यह दवा खानी है। अर्थात् तीन बार यह सूचियाँ पढ़नी हैं। चार बार पढ़ो, पाँच बार पढ़ो, कोई नुकसान नहीं है। इसमें कोई ओवर डोज (अति( नहीं होती है। पाँच बार पढ़ेंगे जल्दी लाभ होगा। तीन बार पढ़ेंगे, तो कुछ देर लगेगी। तो उसको हानि और लाभ समझायें। उसकी बु(ि जागने लग जाएगी। बु(ि जाग्रत होने लग गयी, बु(ि विकसित होने लग गई। और अब शरीर भी बड़ा हो रहा है। साल दो साल में अच्छी ताकत आ जायेगी।
स जब बेटा-बेटी पन्द्रह साल के हो जायें, या उससे ऊपर सोलह-अठारह के हो जायें, तब उनको प्रेम से समझायें। बु(ि में डालें, कि यह जो तुम गलती करते हो, इससे क्या-क्या नुकसान हैं। और ऐसा नहीं करोगे, ठीक काम करोगे तो क्या-क्या फायदे हैं। यह उनको समझायें, बार-बार बतायें। और फिर उनके ऊपर छोड़ दें, कि तुम्हें अपना भविष्य अच्छा बनाना हो, तो ऐसा काम करो। और ये काम करोगे तो भविष्य खराब होगा। अब तुम जानो। हमने समझा दिया, हमारी ड्यूटी खत्म। यह पन्द्रह साल की उम्र वाले और उससे बड़ी उम्र वाले बच्चों के साथ व्यवहार होना चाहिये।
स और अगर बच्चे छोटे हैं, छोटे बच्चों का भी समझ लीजिये, कैसा होना चाहिये। छोटे बच्चे पाँच साल से कम उम्र वाले, दो साल, तीन साल, चार साल, छोटी उम्र के। उनको भी आप प्रेम से बतलायें, बेटा ऐसा करो। ऐसा मत करो। दो बार, पाँच बार, प्रेम से बतलाओ, नहीं मानते, थोड़ा-थोड़ा हल्की डाँट लगा सकते हैं। पर पाँच साल से कम उम्र वाले बच्चों की पिटाई नहीं करना। पीटना नहीं। पाँच साल से कम उम्र के बच्चों की आप यदि पिटाई करेंगे, तो वे जिद्दी हो जायेंगे। अड़ियल हो जायेंगे, हठी हो जायेंगे। प्रेम से काम चलाओ, उनको कुछ खाने-पीने की चीज दो, कोई मिठाई दो, कोई फल दो। कोई और खाने की अच्छी चीज दो। कोई खिलौना दो और अपना काम चलाओ। जो काम करवाता है, वो काम करवाओ। उनको खिलाओ-पिलाओ और काम करवाओ,
स वही काम कराना है, जो आप चाहते हैं। हम बड़े हैं आपको पता है। क्या ठीक है, क्या गलत है। बच्चे छोटे हैं, उनको पता नहीं। वो तो अपनी मनमानी करेंगे। पर उनकी मनमानी बात नहीं माननी है। जो घर के बड़े लोग हैं, समझदार हैं, वो अपनी मनमानी करवायेंगे। जो उनको ठीक लगता है, वो करवायेंगे। प्यार से, डाँट से, खिला करके, कोई प्रलोभन दे के, कोई ईनाम देकर, जैसे भी।
स कभी-कभी ईनाम भी दिया, नहीं मानता। प्यार से समझाया, नहीं मानता। थोड़ी डाँट भी लगायी, नहीं मानता। छोटे-बच्चों के लिये बहुत बढ़िया उपाय है। जब ये उपाय काम नहीं करें, तो एक अंतिम उपाय है। छोटे बच्चों से बात करना बंद कर दें, बोलना बंद। उनसे कहो, बेटा यह काम करो। वो कहता है, हम नहीं करेंगे। तो बोलो- ठीक है, हम तुमसे बात नहीं करेंगे। ऐसे मुँह घुमाके बैठो। हम बात नहीं करेंगे। छोटे-बच्चे यह नहीं सहन कर सकते। पाँच साल से कम उम्र के बच्चे जब आपकी बात नहीं मानें, तो बोलो- तुम हमारी नहीं मानते, जाओ हम भी तुम्हारी नहीं मानते। हम बात नहीं करेंगे। ऐसे घूम के बैठ जाओ। दो मिनट में दिमाग ठीक हो जायेगा। फटाफट कहेंगे- हाँ-हाँ, आप जो कहोगे, हम करेंगे। वो सीधे हो जायेंगे।
स पाँच साल से बड़ी उम्र के बच्चों और बारह, अधिकतम तेरह तक की उम्र तक यानि पाँच से तेरह, इस ऐज ग्रुप में बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करें? इस पर चर्चा करते हैं।
स आप जो भी काम करवाना चाहते हैं, उसके बारे में, उससे होने वाले लाभ के बारे में उनको समझायें। प्यार से कहें- बेटा यह काम करो। कई तो चुपचाप मान लेंगे। कई अड़ियल होंगे, नहीं मानेंगे। तो दो बार, चार बार प्रेम से बतायें, नहीं मानते, फिर डाँट लगाओ, जबरदस्ती करवाओ। चलो करो, करना पड़ेगा। चलो जल्दी करो, फटाफट जल्दी करो। उनको ऐसे थोड़ा जबरदस्ती करवाओ। फिर कोई उससे भी नहीं मानेगा तो फिर उसको थप्पड़ लगाओ, कैसे नहीं करेगा। दो थप्पड़ लगेंगे। जल्दी काम करेगा। और थप्पड़ से भी बात नहीं बनी, तो खाना बंद। तुम हमारी बात नहीं मानोगे, शाम को खाना नहीं मिलेगा। खाना बंद कर दो। कैसे नहीं करेगा। बिलकुल करेगा। उसके खिलौने बंद कर दो। ‘तुम हमारी बात नहीं मानोगे, हम तुम्हारी बात नहीं मानेंगे। तुमको अच्छे खिलौने लाकर नहीं देंगे।’ ऐसे-ऐसे उन पर प्रतिबंध लगाओ। जो करवाना है, आप करवाओ। जो आपको ठीक लगता है, वो काम बच्चों से करवाओ। जो ठीक नहीं लगता, वो नहीं करवाना।
स बच्चे चाहे जो भी करें। जो भी मानें, कहें, उनकी गलत बात बिल्कुल नहीं सुननी। हाँ, जो उनकी उचित बात है, वो तो मानेंगे। अगर वो अनुचित बात कहते हैं, गलत बात कहते हैं, नहीं मानेंगे। रोते हैं, तो रोने दो। कोई चिंता नहीं। वो ही करवाना, जो आप चाहते हैं।
स अगर आपने बच्चों की उल्टी-सुल्टी मनमानी बातें स्वीकार करनी शुरू कर दी, फिर वो थोड़े दिनों में अच्छी तरह बिगड़ जायेंगे। फिर वो आपकी नहीं सुनेंगे। और अपनी सब मनमानी पूरी करवायेंगे। फिर आप कहेंगे, देखो साहब! ये कैसे बच्चे हो गये हमारे। हमने इनके ऊपर मेहनत की, इतना समय खर्च किया, इतने पैसे खर्च किये, दिन-रात पसीना बहाया और आज ये बड़े हो गये, हमारी बात ही नहीं सुनते। अरे! आपने स्वयं बिगाड़े। आपका दोष है। आपने बच्चों का संचालन करना सीखा नहीं। उनकी गलत बातें मानते रहे तो वो अपनी ही मनवायेंगे। आपकी बात नहीं सुनेंगे।
स घर-गृहस्थी वाले लोग, सि(ांत याद कर लें। ”बच्चों की गलत बात एक भी नहीं मानेंगे। सही बात सब मानेंगे।” बस, और मान लो कई-कई अड़ियल बच्चे होते हैं, बड़े ढीठ होते हैं, हठी होते हैं, इतना सब करने के बाद भी वे नहीं मानते। मान लो दस साल का बच्चा है। आपने कहा बेटा, यह काम करो- वो कहता है, मैं नहीं करूँगा। अब उसके लिये फाइनल (अंतिम( हथियार है, उसको धमकी लगाओ। यह घर हमारा है। तुमको इस घर में रहना है या नहीं रहना है? वो कहेगा- हाँ रहना है। रहना है, तो जो हम कहेंगे, वो करो। तुम नहीं करोगे, तो भाग जाओ यहाँ से। वो दरवाजा खुला है, भाग जाओ यहाँ से। हम नहीं रखते अपने घर में, निकल जाओ। उसको धमकी लगा दो, दस साल का बच्चा है, ग्यारह साल का है, बारह साल का है। आपकी धमकी सुनकर डर जायेगा। सीधा हो जायेगा। हाँ, एकाध होता है जो सचमुच भाग जाता है। इसीलिये मैंने बारह साल उम्र बताई है। बारह साल से कम उम्र का बच्चा घर छोड़ के नहीं भागेगा।
स यहाँ एक श्रोता ने कहा- हम तो बच्चे को समझाते और डाँडते हैं । परन्तु उसकी दादी बीच में आ जाती है। वह नहीं मानती। तब मैंने कहा- दादी नहीं मानती, दादी को अलग बैठाओ। उसको समझाओ। खराबी बच्चे में नहीं है। खराबी बच्चे की दादी में है। जो नहीं मानती, जो उसको बिगाड़ रही है।
स बच्चे को धमकी लगाओ, यह घर हमारा है। तुमको इस घर में रहना है। तो जो हम कहेंगे वो करना पड़ेगा। और नहीं तो भाग जाओ यहाँ से। ‘अब दस-बारह साल का बच्चा छोटा है। उसको पता है, मैं अकेला नहीं जी सकता। अभी मेरे पास इतनी बु(ि सामर्थ्य नहीं है, ताकत नहीं है, मैं अकेला नहीं जी सकता। अभी मुझे माता-पिता की जरूरत है। तो वो आपकी धमकी सुन करके, सीधा हो जायेगा। वो कहेगा- नहीं-नहीं मुझे यहाँ रहना है। तो बोलो, ‘जो हम कहेंगे वो करोगे।’ तो यह धमकी चलेगी, थप्पड़ चलेगा, मार-पीट चलेगी। डाँट-धमकी चलेगी, कब तक बारह-तेरह साल की उम्र तक।
स उसके बाद अब चौदह का हो गया, पन्द्रह का हो गया, सोलह-अठारह का हो गया, अब धमकी नहीं देना। अब तो वो भाग जायेगा। तेरह के बाद धमकी नहीं लगाना। बेटा-बेटी बड़े हो जायें, फिर धमकी नहीं लगाना, कि यह हमारा घर है, भाग जा यहाँ से।’ फिर तो भाग जायेगा।
स फिर वही जो पहले बताया था। फिर वो करना। अब उसको बु(ि से समझाओ। ‘बेटा! अब तुम बड़े हो गये, तुम समझदार हो गये, जवान हो गये। तुम्हारे पास ताकत भी आ गई। अक्ल भी आ गई। अब अपनी अक्ल से सोचो। सुझाव देना हमारा काम है। क्या करना है, क्या नहीं करना है, वो तुम जानो।’ उसके सर पर भार डालो। तो वो थोड़ा सावधान होकर सोचेगा।’ अच्छा, अगर मैं ऐसा करूँगा, तो मेरा भविष्य बिगड़ेगा। और ऐसा करूँगा तो ठीक हो जायेगा। तो अब मुझे देखना है, अपना भविष्य ठीक करना है।’ कि बिगाड़ना है। बस वो हानि और लाभ वाली लिस्ट पढ़वाओ, और वो स्वयं पढ़ करके, उसको समझ जायेगा, क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये। अगर आपने बारह-तेरह-चौदह-पन्द्रह साल तक बच्चे को बचपन से पूरी ट्रेनिंग ठीक-ठीक दी है। यह सही है, यह गलत है, यह करना है, यह नहीं करना है, इसमें लाभ है, इसमें हानि है। तो आगे फिर उसके निर्णय ठीक चलेंगे। और पहले ही पन्द्रह साल तक आपने उसको अच्छा प्रशिक्षण (ट्रेनिंग( नहीं दिया, सही गलत नहीं समझाया, हानि-लाभ नहीं बताया, उचित-अनुचित का पालन नहीं करवाया, तो आगे फिर उसके निर्णय वैसे ही उलट-पुलट होंगे। फिर आपको नुकसान होगा। तो इस तरह से बच्चों का नियंत्रण करें।

(56) शंका :- कृपया उपासना शब्द के अर्थ को ठीक से स्पष्ट करके समझाइये?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

उप+आसना त्र उपासना। सीधा-सीधा तो शब्दार्थ है- ‘पास में बैठना’ उप माने ‘पास’ और ‘आसन माने बैठना’। किसी वस्तु के पास श्र(ापूर्वक बैठना ही उसकी उपासना कहलाती है।
स अच्छा हम कैसी वस्तु के पास बैठेंगे, अच्छी वस्तु के या खराब वस्तु के? अच्छी वस्तु के पास बैठेंगे। तो उपासना का अर्थ हो गया अच्छी वस्तु के पास बैठना। अच्छा, जब अच्छी वस्तु के पास बैठेंगे तो उसका गुण हमें प्राप्त होगा या नहीं होगा? होगा न। तो अच्छी वस्तु के गुण को प्राप्त करना यह ‘उपासना’ का फल हो गया। और खराब वस्तु के पास आप बैठेंगे नहीं। कहीं कचरा पेटी में कूड़ा-कचरा पड़ा हो, दुर्गंध आदि आती हो तो वहाँ तो आप बैठेंगे नहीं। तो खराब वस्तु के पास कोई नहीं बैठना चाहता। जब उसके बैठेंगे नहीं, तो वहाँ की दुर्गंध को भी हम नहीं प्राप्त करेंगे। उस वस्तु को छोड़ देंगे। तो इतनी सारी बातें इस उपासना के अंतर्गत छिपी हुई हैं।
स अब शरीर से किसी वस्तु के पास बैठना, तो उपासना है ही । जैसे-अग्नि के पास बैठना। इसके अतिरिक्त दूसरी उपासना मानसिक है। अर्थात् मन से किसी वस्तु का चिन्तन करना, उसे प्रिय या सुखदाई मानना। यह भी उपासना है। यह मानसिक उपासना है। जैसे-मन से धन को या ईश्वर को प्रिय मानना । व्यक्ति सारा दिन या तो भौतिक वस्तुओं = (धन, भोजन, वस्त्र, सोना चाँदी आदि( की उपासना करता है, या जीवों = (भाई, बहिन, बेटा-बेटी, पत्नी, मित्र आदि( की उपासना करता है, या ईश्वर की । इन तीनों में से किसी न किसी की उपासना सारे दिन चलती रहती है।
स वेद आदि शास्त्रों के आधार पर )षियों का कथन यह है, कि -भौतिक वस्तुओं और जीवों की उपासना नहीं करनी चाहिये । इससे दुख मिलता है और व्यक्ति का बन्धन बना रहता है। इसके स्थान पर ईश्वर की उपासना करनी चाहिये। इससे व्यक्ति जीते जी आनन्दित रहता है, और उसका मोक्ष भी हो जाता है।

(57) शंका :- कर्म का फल भोगने के बाद संस्कार नष्ट हो जाते हैं या बने रहते हैं?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

संस्कार बने रहते हैं। फल तो भोग लिया, संस्कार बने रहेंगे। जैसे- एक व्यक्ति ने चोरी कर ली। चोरी करना कर्म है। अशुभ कर्म अर्थात् चोरी कर ली। पुलिस ने खोजबीन की। चोर मिल गया। चोरी का सामान भी बरामद हो गया। कोर्ट में केस हुआ। जज साहब ने कहा- छह महिने की जेल दी जायेगी। छह माह की जेल हो गई। यह उसका फल हो गया। छह माह बाद वो जेल से छूटकर बाहर आया। चोरी-कर्म का दंड (फल( क्या था? छह महिना जेल में रहना। फल भोग लिया। लेकिन जेल से छूटने के बाद जो चोरी करने का संस्कार है, वो अभी खत्म नहीं हुआ है। जो बिल्कुल पेशेवर (व्यावसायिक( चोर हैं, जिनका धंधा ही चोरी करने का है, वो जेल से छूटते ही चोरी करेंगे। उनको और कोई काम आता ही नहीं, कुछ सीखा ही नहीं, वे मेहनत करना जानते ही नहीं। बस, चोरी करना जानते हैं। तो वो बार-बार चोरी करते हैं। उससे उनको चोरी करने की जो आदत पड़ जाती है, इसका नाम है- संस्कार। तो यह संस्कार नहीं छूटा। चोरी कर ली, उसका दंड भी भोग लिया। छह मास जेल में भी रहा। पर अभी संस्कार नहीं छूटा। वो अभी बाकी है। बाहर जेल से आते ही फिर चोरी करेगा। इस गलत संस्कार को मिटाने के लिये अलग से मेहनत करनी पड़ेगी। उसके लिये संकल्प करना पड़ेगा, कि ‘अब बस, बहुत चोरी कर ली। अब नहीं करूँगा।’ ऐसा संकल्प करो। कुछ कष्ट उठाओ, थोड़ी तपस्या करो, तो वो संस्कार छूट जाएगा। वरना ऐसे नहीं छूटेगा।

(58) शंका :- वेद में विज्ञान है। लेकिन वेद पढ़े बिना कुछ देश या लोग वैज्ञानिक उन्नति कर रहे हैं, तो वेद पढ़ने की वैज्ञानिक दृष्टि से क्या आवश्यकता है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

वेद की भाषा भी ईश्वर ने बनायी और उसमें व्याकरण के नियम भी साथ में थे। वेद में सारी सत्य विद्याओं का उपदेश है। महर्षि दयानंद जी ने लिखा है, वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तकें हैं। वेद में व्याकरण है, गणित है, भूगोल है, खगोल है, नौका विद्या, विज्ञान विद्या, वायरलेस विद्या, तार विद्या सब है।
स एक पुस्तक है-)ग्वेदादि, भाष्य भूमिका। इस पुस्तक को पढ़िये? आप को पता लगेगा कि वेदों में कैसी-कैसी विद्या है। सब तरह की सत्य-विद्या वेद में बतायी गयी है। फिर आगे )षियों ने एक-एक विद्या को छाँट-छाँट करके अलग-अलग ग्रंथ बना दिये, ताकि लोग आसानी से पढ़ सके, समझ सकें।
स देखिये, ये लोग जो समझ रहे हैं, कि वेद पढ़े बिना ही वैज्ञानिक लोग उन्नति कर रहे हैं, यह भ्रांति है। कोई भी वैज्ञानिक बिना वेद पढ़े विज्ञान की खोज नहीं कर सकता। )ग्वेदादि भाष्य भूमिका आदि ग्रंथों में महर्षि जी लिखते हैं, कि संसार में जितना भी सत्य फैला है, वह सब वेदों में से गया है। ‘कोई भी व्यक्ति वेद पढ़े बिना विद्वान नहीं हो सकता। अगर ईश्वर ने वेद न बनाये होते और वेदों को पढ़कर मनुष्य विद्वान न हुए होते तो कोई भी व्यक्ति नयी खोज-नया आविष्कार नहीं कर सकता। जैसे-मैंने अभी निवेदन किया। सृष्टि के आरभ में ईश्वर ने चार वेदों का ज्ञान चार )षियों को दिया। उन्होंने अन्य मनुष्यों को पढ़ाया । उन्होंने फिर अन्यों को पढ़ाया। इस प्रकार से पीढ़ी दर पीढ़ी पढ़ते पढ़ते आये। तब बु(िमान हुये। हमने बहुत कुछ गुरुओं से, अपने शिक्षकों से, अध्यापकों से पढ़ा।
स भाषा भले ही अंगेजी हो, जर्मन हो, फ्रेंच हो, लेटिन हो, जो भी हो, हमने वेद ही पढ़ा है। जो-जो सत्य विद्या पढ़ी, वो सब वेद है। भाषा बदल जाने से विद्या नहीं बदल जाती है। हिन्दी भाषा में गणित पढ़ाइये 5ग्8त्र40 ठीक है। अब इसको अंग्रेजी में पढ़ाइयें-”5 पदजव 8 मुनंस जव वितजल” । यहां पर भाषा बदल गई, लेकिन क्या गणित बदल गया? गणित तो वही है, चाहे आप हिन्दी में पढ़ाओ, अंग्रेजी में पढ़ाओ, चायनीज में पढ़ाओ, चाहे जपानी में पढ़ाओ, किसी भी भाषा में पढ़ाओ। तो जितने भी लोग सारी दुनिया भर में सत्य विद्या पढ़-पढ़ा रहे हैं, उनकी भाषाऐं अलग-अलग हैं। लेकिन वो सारी विद्या वेद में से गयी है। इसलिए दूसरी भाषाओं में दूसरी पुस्तकों के रूप में वो वेद ही पढ़ा रहे है। और गुरु से बिना पढ़े कोई साइंटिस्ट नहीं बन सकता। हजारों साल तक जंगली जीतियाँ, जंगली ही रहीं। उन्होंने कोई भी आविष्कार नहीं किया। कोई उनमें बु(ि का विकास नहीं कर पाये। अब उनमें से कुछ लोग नगर में आये या उनके लिये शिक्षा का प्रबंध किया गया, तो वो पढ़-लिखकर बु(िमान हो गये। जिस भी भाषा में व्यक्ति पढ़ता है, अगर वो सत्य पढ़ता है, सच्ची विद्या ही पढ़ता है, तो वो वेद ही पढ़ रहा हैं। भाषा बदल जाने से वेद नहीं बदलता। इसलिये संसार में जितने भी वैज्ञानिकों ने जितने भी आविष्कार किये, वे सब अपनी-अपनी भाषा में वेद = (सत्य विद्या( पढ़कर ही किये हैं ।

(59) शंका :- शास्त्रों के आधार पर प्रेम का अर्थ क्या होता है, क्या प्रेम और राग एक ही हैं या उसमें अंतर है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

प्रेम और राग में अंतर है। प्रेम का अर्थ है, रुचि, आकर्षण। ईश्वर में प्रेम होना चाहिए, ईश्वर में रुचि होनी चाहिये, ईश्वर में आकर्षण होना चाहिए। लेकिन जो राग है, राग में गड़बड़ है।
स राग में क्या गड़बड़ है? राग में आसक्ति (अटैचमेंट( है, वो अटैचमेन्ट अविद्या से पैदा होती है। जो रुचि, जो आकर्षण ‘अविद्या’ के कारण पैदा होती है, उसको बोलते हैं-‘राग’। और जो रुचि, जो आकर्षण ‘विद्या’ (तत्त्व ज्ञान( से पैदा होती है, उसको बोलते हैं-‘प्रेम’।
स प्रेम सबसे करना चाहिए। गाये से, घोड़े से, पशु-पक्षी, मनुष्य, ईश्वर सबसे प्रेम करना चाहिए। प्रेम करने का विधान है। अहिंसा का मतलब है, ‘सबसे प्रेमपूर्वक व्यवहार करना।’
स प्रेम सबसे करना चाहिए, पर राग किसी से भी नहीं करना चाहिए। धन से, पुत्र से, परिवार से, संपत्ति से, मोटर-गाड़ी, सोने-चांदी आदि किसी भी चीज से राग नहीं करना चाहिए। राग, दुःख-दायक है। प्रेम, दुख दायक नहीं है। क्योंकि राग ‘अविद्या’ के कारण उत्पन्न होता है, और प्रेम ‘तत्त्व-ज्ञान’ के कारण उत्पन्न होता है। इसलिए दोनों में अंतर है।

(60) शंका :- वेद’ ईश्वर की वाणी है। ईश्वर ने इसके निर्माण में कैसे सहायता की?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

वेद ईश्वर की वाणी है। इसको इस तरह से समझना चाहिए, कि मनुष्य बिना सिखाए नहीं सीखता। बचपन से माता-पिता ने हमकों उठना-बैठना, खाना-पीना, चलना-फिरना, बोलना आदि सब बात सिखाई, तब जाकर हम सीख पाए। फिर स्कूल में गए। अनेक अध्यापकों, शिक्षकों ने हमें पढ़ाया-लिखाया, तब जाकर हमारी बु(ि का कुछ विकास हुआ।
स एक मनुष्य के बच्चे को जन्म से ही बड़े से कमरे में रख दिया जाए। जिसमें बहुत बड़ी लाइब्रेरी हो, और बहुत बड़ी-बड़ी मशीनें हों, कम्प्यूटर भी हो, सिखाने वाली सारी चीजें हों। और उसको शिक्षक, टीचर कुछ भी न दिया जाये। तो क्या वो सारी लाइब्रेरी की पुस्तकें पढ़कर विद्वान हो जायेगा? नहीं होगा न। तो इससे पता लगता है, कि जब तक शिक्षक-अध्यापक (टीचर( न मिलें, तब तक व्यक्ति का विकास नहीं होता।
स आप और हम, आज पढ़-लिखकर बु(िमान हो गये। हमें बु(िमान बनाया, हमारे अध्यापकों ने। हमारे अध्यापकों को बु(िमान बनाया उनके अध्यापकों ने। और उनको-उनके अध्यापकों ने। तो पीछे-पीछे चलते जाइये। सबसे पहले जो मनुष्य पैदा हुये, इनको बु(िमान किसने बनाया? उनको भी कोई अध्यापक-शिक्षक चाहिए। उनकी किसने विद्वान बनाया? ईश्वर ने। तो ईश्वर ने जो पहली पीढ़ी (फर्स्ट जनरेशन( को जो पढ़ा-लिखा कर विद्वान बनाया, वो ही चारों वेद थे। उन चार वेदों के माध्यम से ईश्वर ने पहले-पहले मनुष्य को पढ़ा करके बु(िमान बनाया।
स और फिर ईश्वर ने उनको पढ़ा कर, उनकी ड्यूटी लगा दी कि मैंने आपको पढ़ा दिया अब आप आगे वाली पीढ़ी को पढ़ाओ। फिर वो आगे-आगे गुरू-शिष्य परंपरा से पढ़ना-पढ़ाना चलता रहा, और आज तक हम पढ़ते चले आ रहे हैं। जब तक लोग ऐसे पढ़ते जायेंगे, तब तक लोग बु(िमान बनते जायेंगे। और जब पढ़ना-पढ़ाना छोड़ देंगे, फिर जंगलियों की तरह हो जायेंगे, पशुओं की तरह बन जायेंगे। तो ईश्वर ने सबसे पहले चार वेदों का उपदेश दिया। फिर उन्हीं चार वेदों से सब लोग बारी-बारी से पढ़कर बु(िमान हुए।
स अब प्रश्न यह रह जाता है, कि ईश्वर ने यह चार वेदों का उपदेश कैसे दिया। उसकी प(ति क्या है? इसको समझाते हैं। प्रश्न है – ईश्वर एक है या अनेक? उत्तर है-एक । अगला प्रश्न है, वह एक ईश्वर एक जगह पर रहता है, या सब जगह पर ? उत्तर है- सब जगह पर। अगर ईश्वर सब जगह रहता है तो हमारे अंदर भी है, बाहर भी है। तो शुरु-शुरु में जो हजारों मनुष्य पैदा हुए थे। उनमें जो बहुत अच्छे सबसे अधिक बु(िमान थे, सुपर जीनियस क्लास में चार व्यक्ति धरती पर भगवान ने सिलेक्ट कर लिये (चुन लिये( । उनको हम ‘)षि’ नाम से कहते हैं । )षि-सबसे अधिक बु(िमान व्यक्ति। वो इतने बु(िमान कहां से हो गये थे। वो पिछली सृष्टि के कर्म-फल के अनुसार बु(िमान थे, उनके ऐसे अच्छे कर्म थे। तब उन चार व्यक्तियों के मन में एक-एक वेद का उपदेश दिया। इस तरह से ईश्वर ने चार व्यक्तियों को चार वेदों का उपदेश उनके मन में दिया। क्योंकि ईश्वर उनके अंदर भी था और बाहर भी था।
स जब अंदर ही अंदर आपको बोलना हो, अपने मन में ही कोई बातचीत करनी हो, योजना बनानी हो, प्लानिंग करनी हो, तो बिना जबान हिलाये, आप मन-मन में खूब योजना बना सकते हैं। और जब ध्यान में बैठते हैं, तो बिना हिलाये चलाये, बिना जबान चलाये मन्त्रपाठ, अर्थ का विचार कर सकते हैं। तो ईश्वर भी उन चार व्यक्तियों के मन में था। और उनके अंदर बैठे भगवान ने चारों वेदों का उपदेश दे दिया और सारी बात अंदर ही अंदर सिखा दी। उसको न जबान की जरुरत पड़ी, न मुंह की जरुरत पड़ी, न होठ की जरुरत पड़ी। उन )षियों के नाम अग्नि, वायु, आदित्य, अंगिरा थे। अग्नि को )ग्वेद का ज्ञान दिया। वायु को यजुर्वेद का, आदित्य को सामवेद का और अंगिरा को अथर्ववेद का। इस तरह ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में वेद का ज्ञान दिया।

(61) शंका :- हिंसक प्राणियों साँप, बिच्छु, चींटी, काकरोच आदि के साथ कैसा व्यवहार करें?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

जहां तक संभव हो, इनको न मारें। झाडू मारके इनको हटा दो, बाहर कर दो। घर में कौऐ घुसते हैं, कबूतर आते हैं, चिड़िया आती हैं, हम बाहर निकाल देते हैं। चोर आता है, उसको भी बाहर निकाल देते हैं। बिच्छू, साँप आयेगा, उसको भी बाहर निकाल देंगे, मारेंगे नहीं। जहाँ तक हो सके, इन प्राणियों को नहीं मारना चाहिए।
स लोग सांप को देखते ही मारते हैं। अगर उनसे पूछें कि क्यों भाई, क्यों मारते हो? तो जवाब देते हैं – ये साँप काट लेगा। हम अगर उनसे पूछें, कि अभी काटा तो नहीं न। तो फिर क्यों मारते हो? तो वे कहते हैं, कि साहब इसकी संभावना है।’ तो इसका जवाब है कि ‘संभावना के आधार पर आप किसी को दण्ड दे सकते हैं क्या? न्याय का नियम यह है, कि जब तक कोई अपराध न कर ले, तब तक उसे दण्ड नहीं दिया जा सकता है। हम रेल में चलते हैं, बस में चलते हैं, कितने सारे लागे चलते हैं, तो संभावना तो किसी की भी हो सकती है, कि कोई भी जेब काट सकता है। क्या बिना जेब काटे ऐसे केवल संभावना के आधार पर में सबको पकड़ के जेल के अंदर कर देंगे? ऐसा तो नहीं कर सकते। तो केवल संभावना के
आधार पर दंड नहीं दे सकते। जब तक कि वो अपराध न कर लें। ‘
स अपनी सुरक्षा रखो, खिड़कियों में जाली लगाओ, कौओं, कबूतर, चिड़ियों को मत घुसने दो। मच्छर काटते हैं, मच्छर दानी लगाओ, तो जहाँ तक हो सके, इनको नहीं मारना चाहिए। देखिए, चौबीस साल से हम जंगल में रहते हैं। (हम जंगल में जरूर रहते हैं पर पूरे जंगली नहीं हैं( यहां आस-पास में काफी सांप रहते हैं। और खूब सांप आगे-पीछे, इधर-उधर घूमते रहते हैं। तालाब की तरफ खूब साँप आते हैं। हमने आज तक एक भी सांप नहीं मारा और न साँप ने हमको काटा। हम उनको नहीं छेड़ते, वो हमको नहीं छेड़ते। वो चुपचाप चले जाते हैं। हम अपना चुप-चाप चले जाते हैं, कुछ भी नहीं करते। आप भी ऐसा ही करने का प्रयत्न करें।
स बिल्कुल इमरजेन्सी हो, बहुत मुसीबत आ रही हों, तो मजबूरी में उनको हटा सकते हैं। और मान लो, मारने की बहुत मजबूरी हो, और आपको ऐसा लगता हो कि साँप बिल्कुल आपके ऊपर आक्रमण करने को तैयार है । और आपको अपनी जान का खतरा है, तो आप भी मार सकते हैं, पर द्वेष के कारण नहीं मारना। अपनी रक्षा के लिए तो मारेंगे तो उसमें थोड़ा दण्ड तो मिलेगा, पर ज्यादा नहीं मिलेगा। द्वेष के कारण मारेंगे तो ज्यादा दण्ड मिलेगा। अपनी रक्षा करने का अधिकार सबको है, इस प्रकार से जहाँ तक संभव हो सके, वहाँ तक किसी को न मारें।

(62) शंका :- परमात्मा और जीव को पदार्थ क्यों कहा है, जबकि ये दोनों चेतन स्वरूप हैं, जड़ नहीं?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

आजकल के स्कूल-कॉलेज में चार तरह का द्रव्य पढ़ाया जाता है- ठोस, द्रव, गैस और प्लाजमा। सॉलिड, लिक्विड़, गैस और प्लाजमा नामक, ये चार तरह की वस्तुए पढ़ाई जाती हैं। उनका नाम वस्तु है, पदार्थ है, द्रव्य है, चीज है। ‘जो स्थान घेरती है,’ जिसमें भार रहता है, वह वस्तु कहलाती है।’
स ईश्वर और जीव तो इस परिभाषा में आता ही नहीं। ईश्वर और जीव न तो ठोस है, न द्रव है, न गैस है, न प्लाजमा है । तो उसको वस्तु क्यों कहा, पदार्थ क्यों कहा? तो इस प्रश्न का उत्तर है कि ये जो सालिड, लिक्विड, गैस और प्लाजमा की परिभाषा है, ये केवल भौतिक-विज्ञान की परिभाषा है। ईश्वर और आत्मा भौतिक विज्ञान का विषय ही नहीं है, उसका क्षेत्र (फील्ड( ही नहीं है। वस्तुतः वो जितनी बात जानते हैं, उतनी ही की तो परिभाषा बनायेंगे। जबकि दर्शन और वेद की वस्तु की परिभाषा इससे और व्यापक है।
स दर्शन और वेद की परिभाषा है- ‘जिस तत्त्व में कुछ गुण हों अथवा क्रिया भी हो, उसे पदार्थ कहते हैं। पदार्थ, वस्तु, चीज उसका नाम हैं, जिसमें गुण हों, अथवा गुण के साथ-साथ क्रिया भी हो। क्रिया हो या न हो, वो वैकल्पिक (ऑप्शनल( है, लेकिन गुण अवश्य होना चाहिए। उसको द्रव्य या वस्तु कहते हैं।
स अब इस परिभाषा में देखिये कि-ईश्वर में कुछ गुण हैं, या नहीं? हैं न। तो ईश्वर एक वस्तु हो गयी। आत्मा में कुछ गुण हैं या नहीं है। इसलिए आत्मा भी एक वस्तु है। और प्रकृति में तो गुण हैं ही। प्रकृति में रूप, रस, गंध आदि गुण हैं ही। इसलिए प्रकृति भी एक वस्तु है। तो वेदों के अनुसार, )षियों के अनुसार तीन वस्तुऐं अनादि हैं- ईश्वर, आत्मा और प्रकृति। इसलिए ईश्वर और आत्मा भी वस्तु हैं।
स इस आधार पर हम यह कह सकते हैं, कि वस्तुएँ दो प्रकार की होती हैं-एक जड़ वस्तुएँ, दूसरी चेतन वस्तुऐं। तीन में से एक जड़ वस्तु हैं ‘प्रकृति’। और दो हैं-चेतन वस्तुऐं- ‘ईश्वर’ और ‘आत्मा’। इसलिए इन दोनों को भी हम वस्तु कह सकते हैं, पदार्थ कह सकते हैं, द्रव्य कह सकते हैं, चीज भी कह सकते हैं।

(63) शंका :- वास्तविक मृत्यु ईश्वर द्वारा लिखी जाती है, जो कि सौ वर्ष से कम नहीं है। क्या इससे कम जीवन देकर ईश्वर जीव को संसार में नहीं भेजता?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

हाँ इससे कम जीवन देकर भी भेजता है। कर्मानुसार ईश्वर आयु देता है । पहले लोग अच्छे काम करते थे, खान-पान ठीक था, व्यायाम भी ठीक था, ब्रम्हचर्य का पालन भी करते थे, दिनचर्या का पालन भी करते थे आदि आदि। लोग आयु बढ़ाने वाले कर्मों का आचरण करते थे तो भगवान सौ वर्ष की आयु देकर भेजता था। अब वो सारा कुछ बदल गया। खान-पान बिगड़ गया, जलवायु बिगड़ गया, दिनचर्या बिगड़ गई, ब्रह्मचर्य का पालन भी नहीं रहा। और भी कई चीजें बिगड़ गई। इसलिए भगवान अब सौ वर्ष की आयु देकर नहीं भेजता। किसी-किसी को देता है। जिससे के जैसे कर्म होते हैं, उसको वैसी आयु देता है, कम भी देकर भेजता है। पर जितनी आयु देकर भेजता है, उसकी भी गारंटी नहीं है, कि व्यक्ति उतने दिन जी लेगा। तब जी सकता है, जबकि वह दुर्घटनाओं से बचता रहे। एक्सीडेंट होता है, मर जाते हैं, पैदा होते ही मरते हैं, दो साल के भी मरते हैं। उनकी सुरक्षा-देखभाल ठीक से नहीं हो पायी। इंफेक्श्न हो गया, मर गये। एक की भूल के कारण दूसरे को नुकसान होता है। हम सड़क पर चलते हैं, ठीक-ठाक चलते हैं। पीछे से ट्रक, कार वाला आकर के हमको ठोकता है। उसकी गलती से हमको नुकसान होता है। ऐसे ही डॉक्टर की भूल से, नर्स की भूल से, मां-बाप की भूल से, बच्चे को नुकसान हो सकता है। उसकी मृत्यु हो सकती है, हाथ-पांव, टेढ़े-मेढ़े हो सकते है, कुछ भी हो सकता है।

(64) शंका :- व्याप्य-व्यापक संबंध का अर्थ समझने में आया। पर उसकी अनुभूति नहीं होती। इसके लिए क्या करना चाहिए?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

इसके लिए अभ्यास करना चाहिए। रोज अभ्यास कीजिए। रोज ऐसे सोचिए जैसे आज हम यहां बैठे हैं। आपके आस-पास चारों तरफ हवा है। आप सोच सकते हैं न। क्योंकि हवा के साथ रहते हुये बहुत दिन हो गये और इसके बारे में बीस बार, पचास बार हमने सोचा भी है कि हवा हमारे चारों तरफ है। तो हवा हमारे चारों तरफ है, यह सोचना सरल है। इसका हमने बहुत बार अभ्यास किया है। ‘ईश्वर भी, हमारे चारों तरफ है, हमारे आस-पास है, जैसे हवा है।’ हमने इस बात का अभ्यास कम किया। अब इस बात का अभ्यास करें।
जैसे वायु हमारे चारों तरफ है, हमारे अंदर भी है, बाहर भी है, रोज सांस लेते हैं, हर समय लेते हैं। वायु अंदर भी जाती रहती है, बाहर भी आती रहती है। चारों तरफ वायु फैली हुई है। ऐसे ही ईश्वर के बारे में भी अभ्यास करें। ‘ईश्वर भी हमारे अंदर भी है और बाहर भी है। चारों तरफ फैला हुआ है ईश्वर। इसका रोज अभ्यास करेंगे। तो दो, चार, छः महीने में आपको थोड़ा-थोड़ा अनुभव होने लगेगा, कि हाँ ईश्वर हमारे अंदर-बाहर, आस-पास, ऊपर-नीचे, दांये-बांये है,’ सब जगह मौजूद है। जैसे वायु सब जगह है, जैसे आकाश सब जगह है। ऐसे ही ईश्वर का भी धीरे-धीरे अभ्यास होने से उसकी सर्वव्यापकता का या ईश्वर के साथ हमारे व्याप्ययय-व्यापक संबंध का अनुभव होने लगेगा।

(65) शंका :- हमारे देश में मूर्ति-पूजा कब से शुरू हुई? हम यदि मूर्ति-पूजा नहीं करते है लेकिन साथ के अन्य लोग कर रहे हैं, तो उनके साथ कैसे रहें?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

आप रेल यात्रा करते हैं, बस में चला करते हैं। जब आपके पड़ोस में बैठे लोग बीड़ी पीते हैं, तब क्या आप लाठी उठा लेते हैं? तब भी उनके साथ बैठे रहते हैं न। उनके बीडी, सिगरेट पीने को सहन करते हैं। और उनको समझाते हैं, कि भई बीड़ी मत पिओ। सामने नो स्मोकिंग लिखा है न। उनको बस समझा सकते हैं, लेकिन लाठी थोड़े मारेंगे। कुछ लोग समझदार होते हैं, मान लेते हैं। कुछ लोग अड़ियल होते हैं, वे नहीं मानते हैं। तब हम मुँह पर रूमाल डाल लेते हैं।
स संसार में बहुत तरह के लोग हैं। कोई मूर्ति पूजा करता है, कोई नास्तिक होता है, कोई झूठ बोलता है। हम उसको प्रेम से समझाऐंगे। समझ जाएगा, तो ठीक है। और नहीं समझेगा, तो अपनी आँखें बंद कर लेंगे।
स सवाल है कि मूर्ति पूजक हमारा लाइफ- पार्टनर ही हो, तब उसके साथ कैसे रहें? उसको भी आप समझाएँ। अगर वो मानता हो, तो बहुत अच्छा। और नहीं मानता हो, तो जब वो मूर्ति पूजा करें, तब आप दूसरी तरफ मुंह करके अपना ध्यान कर लेना। दोनों मिलकर खाऐंगे, एक ही घर में रहेंगे। प्रेम से समझाएँगे, तो कभी न कभी उसकी समझ में आएगा। समय ज्यादा लग सकता है, पर समझ में आएगा। इसलिए झगड़ा नहीं करना। हमारा काम प्र्रेम से समझाना है, उनसे झगड़ा करना नहीं। उनको समझ में आए तो ठीक, न समझ में आए, तो कोई बात नहीं।
स अगर प्र्रेम से समझाऐंगे, तो आज नहीं तो कुछ साल में, कभी न कभी उनको समझ में आ जाएगा। झगड़ा करेंगे, तो वह पचास साल में भी नहीं समझेगा। और आपका दुश्मन हो जाएगा। प्रेम से अगर उनको समझ में आता है, तो ठीक है। नहीं आता तो छोड़ दीजिए। लेकिन रहेंगे तो साथ में ही न उनके। वो भी रोटी खाते हैं, हम भी रोटी खाते हैं।
स मूर्ति पूजा जैनियों से शुरू हुई। और जैनियों का समय आज से लगभग चार हजार वर्ष पहले है। जैनियों ने शुरू की, फिर बौ(ों ने शुरू की, बौ( पैंतीस सौ वर्ष पहले हुये। तो लगभग साढ़े तीन, चार हजार वर्ष से भारत में मूर्ति पूजा शुरू हुई। और उनकी देखा-देखी अपने आर्य लोगों ने भी शुरू कर दी। उन्होंने अपनी देवी-देवताओं की, महापुरूषों की मूर्तियाँ बनाना शुरू कीं और पूजा शुरू कर दी। महाभारत से पहले धरती पर भारत में और विदेशों में कोई मूर्र्ति पूजा (बुतपरस्ती( नहीं थी।
स श्रीकृष्ण जी तो वेद के विद्वान थे। वे गुरूकुल में पढ़ने संदीपनी गुरू जी के पास गये थे। गीता में क्या लिखा हैः- ‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृदयऽर्जुनतिष्ठति’, हे अर्जुन! ईश्वर तो सब प्राणियों के हृदय में रहता है। ‘तमेव शरणं गच्छ’, उसी की शरण में जा।’ यहाँ तो श्री कृष्ण जी कितनी अच्छी बात कह रहे हैं। ईश्वर सर्वव्यापक है, अर्जुन तू उसकी शरण में जा। यह बात बिल्कुल ठीक है। वेद के अनुकूल है। श्रीकृष्ण जी महाराज की ऐसी बात तो माननी चाहिये। भगवान कभी आता-जाता नहीं। वह सर्वव्यापक है। कहाँ से आएगा और कहाँ जाएगा?
स वेद ईश्वर का वचन है, और ईश्वर सर्वज्ञ है। सर्वज्ञ के वचन में कोई भूल नहीं है, कोई भ्राँति नही ंहै, कोई संशय नहीं है, कोई गड़बड़ नहीं है। चाहे कोई भी हो, परमात्मा से बड़ा तो कोई भी मनुष्य नहीं है।
स यजुर्वेद के बत्तीसवें अध्याय में तीसरा मंत्र लिखा है – ‘न तस्ये प्रतिमा अस्ति’। ईश्वर की कोई मूर्ति नहीं है। ईश्वर कभी शरीर धारण नहीं करता।
स बहुत से लोग इसका अर्थ यह लेते हैं, कि जब-जब धर्म की हानि होती है, अधर्म की वृ(ि होती है, तब-तब भगवान अवतार लेता है। तब जो भगवान का दर्शन करते हैं, उनकी मुक्ति हो जाती है। क्योंकि भगवान के दर्शन से ही मुक्ति होती है। अगर इसका यह ही अर्थ है, तब तो भगवान के दर्शन करने का बड़ा सरल उपाय है। क्या उपाय है? खूब पाप करो, खूब अधर्म करो ताकि जल्दी से जल्दी भगवान आयें और उनका दर्शन हो और हमारी मुक्ति हो जाए। क्या ये बात ठीक है? गलत है। पाप करने से कभी भी मनुष्य की मुक्ति नहीं हो सकती। ‘पाप करने से मुक्ति होने’ की बात को कोई भी बु(िमान् व्यक्ति नहीं मानेगा। इसलिए अधर्म की वृ(ि होने पर भगवान नहीं आता।
स गीता के अंदर बहुत सारी अच्छी बातें है। परन्तु बहुत सी बातें इसमें गलत मिला दी गई हैं और उसकी परख हर व्यक्ति को नहीं है। सोने में कितनी मिलावट है, इसको हर व्यक्ति नहीं पहचान सकता। कौन पहचान सकता है? सुनार ही पहचान सकता है, कि इसमें कितनी खोट है, कितनी मिलावट है। शास्त्रों में भी बहुत सी मिलावट है। उसको हर व्यक्ति नहीं पकड़ सकता। जो उस विषय में अधिकारी है, वो ही पकड़ सकता है।
स आपको आश्चर्य की बात बताऊँ, दसवाँ और ग्यारहवाँ अध्याय गीता का, जिसमें भगवान का विराट स्वरूप बतलाया है- मैं वेदों में सामवेद हूँ, फूलों में कमल का फूल हूँ, और सितारों में फलाना हूँ, )षियों में फलाना अगस्त हूँ, और ये और वो, जो भी विस्तार से लिखा है। इसी विराट स्वरूप में दसवें अध्याय के छत्तीसवें श्लोक में लिखा है कि- ‘द्यूतं छलयताम् अस्मि’ अर्थात् मैं छल कपट की विद्या में जुआ हूँ।’ अब गीता में तो लिखा है कि, भगवान छली-कपटी हैं आप मानेंगे, भगवान छली-कपटी है! या तो भगवान को छली-कपटी मानो, या कहो कि गीता में मिलावट है। बोलो क्या मानेंगे? मिलावट। बस हो गई बात खत्म। तो ऐसी-ऐसी गलत बातें उसमें डाल रखीं हैं। उनको आप हटा दीजिये। गीता में जितनी सही बात है, वो मान लीजिये।

(66) शंका :- इस जन्म में मांस और शराब बुरा समझते हुऐ हम नहीं खाते हैं या इन्हें बुरा मानकर खाना छोड़ दिया है। अगले जन्म में खाना-पीना नहीं चाहते, क्या ऐसा होगा?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

हाँ बिल्कुल हो जाएगा, आप इस जन्म में नहीं खाते और संकल्प भी करते हैं कि यह बहुत बुरी चीज है, हम आगे भी नहीं खायेंगे। तो अगले जन्म में आप नहीं खायेंगे। आपके खाने-पीने के संस्कार बनेंगे ही नहीं। और जो पहले कभी थोड़ा-बहुत खाया भी हो, तो अब उसका आपने प्रायश्चित् कर लिया, और पक्का संकल्प कर लिया कि जो खा लिया, सो खा लिया, वो तो गलती हो गई। अब ऐसी गलती आगे नहीं करेंगे। तो आगे योगदर्शन में एक शब्द लिखा है, दग्धबीज करना’-जिस कार्य को दोबारा करने की इच्छा कभी भी न हो, उसको बोलते हैं-दग्धबीज। तो इस जन्म में तो शायद आप नहीं खायेंगे। बस बात खत्म हो गई। आपको कोई जबर्दस्ती, खिलाये तो भी नहीं खायेंगे। संस्कार अभी तो दग्धबीज जैसा ही हो गया। और यदि बिल्कुल कभी भी इच्छा नहीं होगी खाने की, तो इस कारण से संस्कार दग्धबीज हो गया।

(67) शंका :- मन एक जड़ पदार्थ है । तो मन, शरीर में किस जगह पर रहता है, और मन को कैसे पकड़ा जाए?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

रात्रि में जो हम शयनकालीन मंत्र पढ़ते हैं, …..(30.04( उन मंत्रों में एक शब्द आता है हृत्प्रतिष्ठम् । अंतिम छठे मंत्र में आता है न। ………………तो उससे पता लगता है, कि मन, हृदय में रहता है। वो विद्वान लोग कहते हैं, कि हृदय दो तरह का है। एक छाती में है, एक सर में है। तो अपने चिंतन से, व्यवहार से, सामान्य स्वभाव से हमको ऐसा लगता है कि मन मस्तिष्क वाले हृदय में रहना चाहिए। क्यों रहना चाहिए? मन का काम है- संकल्प-विकल्प, विचार करना। जो हम विचार करते हैं, वो तो मस्तिष्क से ही करते हैं। मन का जो कार्य है विचार करना। विचार करने में जो स्थूल शरीर का भाग है, वो ब्रेन (दिमाग( ही है। इसी से हम विचार करते हैं। आज की मेडीकल साइंस भी यही कहती है। इससे लगता है कि मन-मस्तिष्क में रहना चाहिए।
अगला प्रश्न है – उसको पकड़े कैसे? आंख बंद कर के बैठो और अपने मन के विचारों को पकड़ो। मेरे मन में कौन सा विचार आ रहा है? वस्तुतः आ नहीं रहा है, हम ही ला रहे हैं। हम कौन सा विचार ला रहे हैं। हम खाने-पीने का विचार ला रहे हैं, घूमने-फिरने का विचार ला रहे हैं, उस विचार को पकड़ लीजिए, बस मन पकड़ में आ गया। गाय के गले में रस्सी बंधी है। अगर गले की रस्सी पकड़ में आ जाए, तो गाय पकड़ में आ गई न। मन का काम क्या है-विचार करना। बाल्टी की तरह पकड़ में नहीं आयेगा वो। विचारों से ही पकड़ में आयेगा। विचारों को पकड़िये, मन आ गया हाथ में।

(68) शंका :- साठ वर्ष का पिता रिटायर्ड फौजी है। शराब की आदत है। सारी पेन्शन शराब में उड़ा देता है। क्या शराब छुड़ाने का कोई उपाय है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

शराब छुड़ाने के लिए सरकारी अस्पताल में संपर्क करें। कुछ प्राइवेट डॉक्टर्स भी होते हैं, कुछ सरकारी हॉस्पिटल होते हैं। वहाँ से आपको दवाई मिल जाएगी। शराब छूट सकती है। पिता को प्रेम से समझायें, बतायें। बु(िमत्ता से काम लेना अच्छा है। झगड़ा करना अच्छा नहीं है।

(69) शंका :- मृत शरीर को वैदिक धर्मानुसार जलाते हैं। कुछ वैज्ञानिक कहते है कि शरीर को गाड़ने से जमीन में अच्छी फसल तैयार होती है, और लकड़ी जो आजकल महंगी है, वो बच जाती है। कृपया इसकी विस्तृत जानकारी दें?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

मृत शरीर को गाड़ना अच्छा नहीं है। वेद के अनुकूल नहीं है। वेद में लिखा है – यजुर्वेद पढ़िये, चालीसवां अघ्याय है, उसमें लिखा है -भस्मान्तम शरीरम्। तो वेद में ईश्वर ने बताया है, सबसे बढ़िया तरीका है,अग्नि संस्कार करना।
स ईश्वर कहता है- शरीर को अन्त में भस्म करना चाहिए। यह शरीर का निपटाने का सबसे अच्छा तरीक है। मिटटी में गाड़ते है, तो जमीन खराब होती है। कब्रिस्तान में गाड़ते-गाड़ते इतनी जगह मुर्दों ने ले ली, कि जिन्दों के लिए जगह ही नही बची। जमीन दूषित होती है, खामखां जमीन घेर ली जाती है। सौ आदमी मर गए, तो मरे हुए लोग, सौ जीवित आदमियों के बराबर जगह घेर लेंगे। और अपने यहाँ अन्तिम संस्कार कराने में एक ही चिता पर सौ आदमी जला लो। एक जल गया, दूसरा जल गया, सौ जल गये उससे जमीन भी बचती है और उसका अच्छी तरह से निपटारा हो जाता है, जलाने से थोड़ी सी दुर्गन्ध भी फैलती है, उसके निवारण के लिए घी का प्रयोग करते हैं। तो उससे दुर्गन्ध का भी शु(िकरण हो जाता है।
स रही बात लकड़ी की । उसका उत्तर है- जितने पेड़ काटते है उतने पेड़ और लगाओ, लकड़ी की समस्या हल हो जाती है। फिर कहते हैं, लकड़ी मँहगी हो गई। मँहगाई का उत्तर है, कोई वस्तु यदि आवश्यक है, तो कितनी भी मँहगी हो जाए, उसका प्रयोग तो करेंगे ही । जैसे- पैट्रोल, डीजल, घी, तेल, गेहूँ, चावल आदि क्या मँहगे नहीं हो गये ? क्या उनका प्रयोग करना बन्द कर दिया? जब इनका प्रयोग कर रहे हैं, तो लकड़ी का भी करेंगे, चाहे जितनी भी मँहगी हो जाये।

(70) शंका :- समाधि अवस्था क्या है? हमने सुना है बहुत सारे संत ‘समाधि अवस्था’ में भगवान के पास गए। यह कैसे संभव है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

समाधि अवस्था एक ऐसी अवस्था है, जिसमें हम योगदर्शन में बताई गई पांच प्रकार की प्रमाण आदि वृत्तियों को रोक लेते हैं। और ईश्वर की अनुभूति शुरू हो जाती है। ईश्वर का अनुभव प्राप्त हो जाता है। उससे हमें ज्ञान, आनन्द, बल आदि बहुत सारी चीजें मिल जाती है। इसका नाम है ‘समाधि’। ऐसी समाधि लगाकर बहुत सारे संत, महात्मा, )षि मुनि लोग ईश्वर के पास चले गए और जन्म-मरण के चक्कर से छूट गए अर्थात् उनका मोक्ष हो गया ।

(71) शंका :- आज वैज्ञानिकों ने जो ‘क्लोन’ बनाया है, क्या वो वैदिक-सि(ांत के अनुकूल है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

अनुकूल नहीं है। क्लोन बनाऐंगे, डुप्लीकेट कॉपी हो जाएगी। डुप्लीकेट कॉपी होगी, तो झंझट हो जाएगा। चोरी कोई करेगा, और जेल में कोई दूसरा जाएगा। घोटाला कोई और करेगा, पकड़ा कोई और जाएगा। इसलिए यह क्लोन बनाना ठीक नहीं है।
स जुड़वां बच्चों (ट्विन्स( में शक्ल उतनी नहीं मिलती, जितनी क्लोन्स में मिलती है। ऐसे बहुत एक्सेप्शनल केसेस = (अपवाद( होंगे। दो भाई बिल्कुल एक जैसे शक्ल के हों, करोड़ों-अरबों में एक-आध केस = (घटना( ऐसा हो सकता है।
स और क्लोनिंग करके तो यहॉे हजारों गड़बड़ खड़े कर दिए जाएंगे। परीक्षा देने कोई और आएगा, नौकरी किसी और को मिलेगी। जो बेवकूफ होगा, वो परीक्षा देने नहीं जाएगा, उसकी जगह जो पढ़ा-लिखा बु(िमान होगा, उसको भेज देंगे। ऐसी बहुत सारी गड़बड़ियाँ होंगी। इसलिए क्लोनिंग करना ठीक नहीं है।

(72) शंका :- ईश्वर ने मांसाहारी योनियाँ क्यों बनाई? उन्हें इतना बलवान भी क्यों बनाया? उन्हें बलवान बनाकर क्या ईश्वर ने अत्याचारी का साथ देने के बराबर काम नहीं किया?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

शेर बनाया, भेडिया बनाया। ईश्वर ने उनको इतनी ताकत दी, कि वे खरगोश,हिरण आदि प्राणियों के उपर हमला कर उन्हें खा जातें हैं। भगवान ने बलवान का, अत्याचारी का साथ दिया, ऐसा लगता है। परन्तु भगवान ने जो किया, ठीक किया। उसकी पॉलिसी (नीति( को समझ पाना हमारे वश की बात नहीं है। जरा सोचिये शाकाहारी प्राणी घास-पात खाकर अपना जीवन जिऐंगे। और जब मर जाऐंगे, तो उनके शव (डेड बॉडीज( से दुर्र्गंध फैलती रहेगी। तो उनकी साफ-सफाई करने के लिए कुछ प्राणी ऐसे बना दिए, जो प्राणी मर-मरा जाऐं तो उनको खा जाओ ताकि शव साफ हो जाए और दुर्गंध न फैले, रोग न फैले। अब कितने प्राणी मर जाते है, जंगल में तो गि( खा जाते हैं, पक्षी खा जाते हैं। और ऐसे ही शेर, भेड़िया हैं, वो खा जाते हैं। आपके घरों में कहीं-कहीं कॉकरोच मर जाते हैं, तो चीटियाँ उठाकर ले जाती हैं, साफ-सफाई कर जाती है। छिपकलियाँ बना दी, मकड़ियाँ बना दी। प्राणी जगत के अंदर एक नियम चलता है – ‘जीवों वो जीवस्य भोजनम्’। एक जीव दूसरे जीव का भोजन है। यह सारी व्यवस्था ईश्वर ने की है, कुछ सोच-समझकर की होगी। हम नहीं समझ पा रहें हैं वो हमारी कमी है। पर ‘जीवो जीवस्य भोजनम्ः’ यह नियम सब प्राणियों पर लागू होता है, मनुष्यों पर भी। मनुष्यों का भोजन कौन सा जीव है?
ख् समाधान- आप भी शेर-भेड़िया मार-मारकर खाऐं, या गाय को बकरी को मार-मारकर खाऐं और कहें – ‘जीवो जीवस्य भोजनम्’ ऐसा नहीं है। मांस मनुष्य का भोजन नहीं है । मनुष्य का भोजन तो वनस्पति है। वनस्पति में भी जीव है। मनुष्यों के लिए इतना नियम लागू होता है, कि वह वनस्पति को ठीक तरह से विधिपूर्वक काटकर-पकाकर खा सकता है।

(73) शंका :- सृष्टि की शुरुआत में लोगों की भाषा कौन सी थी?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

सृष्टि के आरंभ में लोगों की भाषा वैदिक ”संस्कृत” थी। सबसे पुरानी वैदिक संस्कृत” भाषा है। इससे पुरानी कोई भाषा है ही नहीं। ।
स वेद की भाषा तो सार्वकालिक है, सब कालों में लागू होती है। यह जो आजकल बोली जाने वाली संस्कृत है, वो भी वेद में से ही निकली है। बाकी सभी भाषाएँ संस्कृत के बाद में बनी।
स संस्कृत से ही तैयार हुई वेद भाषा है-नियमों की भाषा। वेद की भाषा, संविधान वाली भाषा है, जैसे-ऐसा करना चाहिए, ऐसा नहीं करना चाहिए, सच बोलना चाहिए, झूठ नहीं बोलना चाहिए। चोरी नहीं करनी चाहिए। झगड़ा नहीं करना चाहिए। और जब हम व्यवहार करते हैं, तो हमको तीन कालों में बदलकर वह भाषा बोलनी पड़ती है। मैंने सत्य बोला,-यह भूतकाल हो गया, मैं सत्य बोलता हूँ-अब वर्तमान काल हो गया। मैं सत्य बोलूंगा- यह भविष्यत् काल हो गया। तो ऐसे विधान की भाषा में और व्यवहार की भाषा में इतना अन्तर आ जाता है। इस तरह वेद की भाषा संविधान की भाषा है और व्यवहार की भाषा को तीन कालों से जोड़कर देखा जाता है। वेद की भाषा से हमारी बोलचाल की भाषा संस्कृत तैयार हुई।

(74) शंका :- मनुष्य श्रेष्ठ है, ऐसा शास्त्र कहता है पर जो हिंसा चोरी आदि बुरे काम करते हैं, उन्हें अच्छे-बुरे का पता नहीं चलता। उनके लिए क्या उपाय है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

वैसे पता तो चलता है, लेकिन वो उस पर ध्यान नहीं देते। जब कोई आदमी बुरी योजना बनाता है, तो उसे अंदर से भय, शंका होती है। सबको होती है, सबको पता चलता हैं। उदाहरण के लिये यहां तक कि कुछ पशुओं को भी पता चलता है। आपके घर में रोज कोई बिल्ली निश्चित समय पर आती है, रसोई के बाहर उसका एक बर्तन रखा हुआ है और आप दूध डाल देते हैं। वह दूध पीती है रोज ! एक दिन आपने दूध नहीं डाला। आप किसी काम में व्यस्त थे। और बिल्ली अपने टाइम पर आ गयी। उसने अपना बर्तन देखा, कि उसमें दूध नहीं है। तो आज बिल्ली सोचती है कि आज यहाँ दूध नहीं मिला, तो अंदर घुस के पिऊं। लेकिन जब वो अंदर घुसने लगती है, तो चार बार सोचती है, जाऊं या नहीं जाऊं। इधर देखती है उधर देखती है, और पता करती है, कि कोई आ तो नहीं जायेगा। उसको भी पता चल रहा है कि आज मैं लाइन क्रॉस कर रहीं हूं। आज गड़बड़ है, आज रेड लाइट एरिये में जा रही हूँ। आज मेरी पिटाई हो सकती है। जब बिल्ली जैसे प्राणी को भी पता चलता है, कुत्ते को भी पता चलता है। तो इंसान को पता क्यों नहीं चलेगा, उसकी बु(ि तो उनसे ज्यादा है। तो पता तो सबको चलता है। पर लोग उस पर ध्यान नहीं देते हैं। बुरे विचार करते समय, बुरे काम करते समय, भय, शंका, लज्जा होती है, पर ध्यान नहीं देते। और बुरा काम कर डालते हैं। फिर उनको दंड भोगना पड़ता है। और अच्छा काम करते हैं, तो आनंद, उत्साह भी मिलता है। वो भी सबको पता चलता है। जो लोग इस परमात्मा की शिक्षा पर ध्यान देते हैं, वो दुःख से छूट जाते हैं । वो सदा अच्छे काम करते हैं और सुखी रहते हैं।
स तो यह जो शिक्षा मिलती है कि मन में जो भय, शंका, लज्जा और आनंद, उत्साह पैदा होता है, यह जीवात्मा की नहीं, बल्कि परमेश्वर की ओर से है। यह सब उसको पता चलता है। मोटा-मोटा तो इससे पता चल जाता है। और अच्छी तरह गहराई से जानना हो, तो उसके लिए वेद पढ़ना चाहिए।
स महर्षि मनु कहते हैं-धर्म को जो अच्छी तरह से जानना चाहते हैं, उनके लिए सबसे ऊंचा ग्रंथ, सबबे ऊंचा प्रमाण वेद है। तो वेद पढ़ के हम पता लगा सकते हैं, कि क्या अच्छा और क्या बुरा है? इसके अतिरिक्त वेदानुकूल )षियों के द्वारा बनाये हुए ग्रन्थां = (दर्शन शास्त्रों, उपनिषदों, सत्यार्थ प्रकाश आदि( से भी अच्छे बुरे = (सत्यासत्य( का पता चलता है। और जिन शु( अन्तःकरण वाले विद्वानों ने उक्त वेद व )षिकृत ग्रन्थों को अच्छी तरह से पढ़ा, समझा और आचरण किया हो, उनसे भी हमें अच्छे बुरे का ज्ञान हो सकता है।

(75) शंका :- क्या जन्म-दिवस (बर्थ डे( मनाना चाहिये?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

जी हाँ, बिल्कुल मनाना चाहिये। कैसे मनाना चाहिये? केक काटना, मोमबत्ती जलाना, फूँक मारकर बुझाना, और हैप्पी बर्थडे टू यू, ऐसा नहीं। ऐसे नहीं मनाना चाहिये। ये तो वेस्टर्न कल्चर है, पश्चिमी सभ्यता है। भारतीय सभ्यता से जन्म दिन मनाना चाहिये। अपने घर में हवन करो। सब मित्र, संबंधी, रिश्तेदारों को बुलाओ, आज मेरा जन्म दिन है। बुलाओ और सबके सामने संकल्प लो, और सोचो, मेरा जन्म क्यों हुआ था? मैं किस काम के लिये दुनिया में आया हूँ? मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? क्या मैं अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहा हूँ? बढ़ रहा हूँ तो ठीक है। थोड़ी और गति बढ़ाओ। और यदि नहीं बढ़ रहा हूँ, तो संकल्प लो, अब मैं अपने लक्ष्य की ओर बढूँगा। मेरा लक्ष्य क्या है- मोक्ष। ईश्वर प्राप्ति, मोक्ष प्राप्ति, जन्म-मरण से छूटना, यह सबके जीवन का लक्ष्य है। जिसको भी जन्म दिन मनाना हो, इस तरीके से मनाये। ऐसा संकल्प करें, कि आज मैं इस गुण को धारण करता हूँ और कम से कम एक दोष को छोड़ें। गुस्सा करना, झूठ बोलना, छल-कपट करना, हेरा-फेरी करना, जो भी हो, कोई भी एक दोष छोड़ें। एक जन्मदिन पर एक दोष छोड़ें और एक गुण को धारण करें। अगर आपने बीस साल जन्म दिन मनाया, तो देखिये बीस साल में कितनी अच्छी उन्नति हो जायेगी। बीस गुण आ जायेंगे, बीस दोष चले जायेंगे। यज्ञ करें, सब लोगों को इकट्ठा करें। और सबको अच्छी-अच्छी मिठाई खिलायें, आप भी खायें। इस तरह से जन्मदिन मनाना चाहिये।

(76) शंका :- क्या गंगा आदि नदियों मृत व्यक्ति की अस्थियाँ विसर्जन करने में जाना उचित नहीं है? यदि नहीं, तो फिर उन अस्थियाँ का क्या करें?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

यह उचित नहीं है। किसी शास्त्र में नहीं लिखा, कि हरिद्वार में जाओ, गंगा जी में उन अस्थियों को डालो, या नर्मदा जी में डालो, या और किसी नदी में डालो। ऐसा कोई विधान नहीं है। बल्कि उससे नुकसान होता है। जल अशु( होता है। लोग वहाँ पर स्नान करते हैं, उनके पाँव में हड्डी टकराती है, तो कितना खराब लगता है। उसका नाम हर की पेड़ी नही है, उसका नाम हाड़पेड़ी है। वहाँ पर हड्डियाँ, ही हड्डियाँ इतनी हड्डियाँ डाल दी गई, कि लोगों को स्नान करना कठिन हो गया। तो वहाँ नहीं डालना चाहिये, ऐसा कोई विधान नहीं है। तो फिर क्या करें? स्वामी दयानंद जी ने संस्कार-विधि में लिखा है, मृतक का अंतिम संस्कार करने के बाद उसकी अस्थियाँ चयन करके, त्र (इकट्ठी करके( कहीं कोने में गड्ढ़ा खोदकर के उसमें गाड़ देनी चाहिये। बस, और इसके बाद कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।

(77) शंका :- एक समय में एक ही प्रकार का प्राणायाम करना चाहिए। जैसे बाह्य प्राणायाम या आभ्यन्तर-प्राणायाम। दो या तीन प्रकार के प्राणायाम एक साथ क्यों नहीं करना चाहिए। क्या ऐसा करने से कोई हानि है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

हाँ ऐसा करने से हानि हो सकती है। एक समय में एक ही प्रकार का प्राणायाम करना चाहिए। यदि आपने बाह्य प्राणायाम किया, तो केवल बाह्य प्राणायाम ही करें। दो, तीन, चार, पांच, सात जितने भी करें, बाह्य प्राणायाम ही करें। फिर शाम को उपासना में आप दूसरा बदल सकते हैं। शाम को दो, तीन, चार, पांच अभ्यांतर प्राणायाम कर लें। एक ही समय की उपासना में दो बाह्य कर लिए, तीन आभ्यन्तर कर लिए ऐसा न करें।

(78) शंका :- लोग कहते हैं कि आत्मा ही परमात्मा है। और वही लोग कहते हैं, कि ईश्वर एक है। तो जब ईश्वर एक है, तो आत्मा में कैसे आ सकता है? आत्मा तो अनेक हैं। तो आत्मा, परमात्मा कैसे हैं, क्या परमात्मा खंडित-खंडित है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

आत्मा और परमात्मा एक नहीं है। आत्मा अलग चीज है, परमात्मा अलग चीज है। परमात्मा एक है, और आत्मायें तो अनेक हैं, असंख्य हैं। हम तो गिन भी नहीं सकते हैं। ईश्वर तो गिन सकता है, कि कितनी आत्मायें है । आत्मा का टोटल नम्बर (कुल संख्या( ईश्वर को पता है। हमको नहीं पता है। आत्माओं की इतनी अधिक संख्या है, कि हम दिमाग लगायेंगे, तो भी फैल हो जायेंगे। हम कल्पना भी नहीं कर सकते।
स ईश्वर और आत्मा दोनों अलग-अलग चीजें है, दोनों में अंतर है। कैसे अंतर है? इलेक्ट्रान और प्रोटॉन में अंतर है या नहीं। है यह कैसे पता चला? उनकी प्रॉपर्टीज (गुणधर्म( से। इलेक्ट्रान में निगेटिव चार्ज है, और प्रोटॉन में पोजिटिव चार्ज है। उसकी प्रोपर्टीज से पता लगता है, कि इलेक्ट्रान अलग चीज है, प्रोटॉन अलग चीज है। इसी तरह से आत्मा और ईश्वर इन दोनों की प्रॉपर्टीज भी अलग-अलग हैं। इनकी प्रोपर्टीज से पता लगता है कि ईश्वर अलग है, आत्मा अलग है। क्या अंतर हैं इनकी प्रॉर्टीज में।
स सोचिये, क्या ईश्वर कभी दुःखी होता है ? नहीं और आत्मा तो रोज दुःखी रहता है। इससे पता लगा दोनों अलग-अलग हैं। ईश्वर सर्वव्यापक है, क्या जीवात्मा सर्वव्यापक है? नहीं। जीवात्मा एक स्थान पर रहता है। ईश्वर को सब कुछ मालूम है, क्या जीवात्मा को सब कुछ मालूम है? नहीं मालूम। जीवात्मा घोटाले करता है, क्या ईश्वर भी घोटाले करता है। यहां तो रोज अखबारों में घोटाले पढ़ते हैं। कोई चार सौ करोड़ खा गया, कोई नौ सौ करोड़ खा गया, कोई पन्द्रह हजार करोड़ खा गया। इसलिए जब दोनों की प्रॉर्टीज अलग-अलग है, तो दोनों चीजें अलग-अलग है। ईश्वर अलग है, आत्मा अलग है।
स ईश्वर एक है, और वो अखंड तत्त्व है। वो टुकड़े-टुकड़े नहीं है। जीवात्माएं अलग-अलग हैं। एक-एक आत्मायें भी स्वतंत्रता पूर्वक अखंड है। आत्मा भी कोई टुकड़ों (पार्टीकल्स( का कॉमबीनेशन नहीं है,= खंडों का समुदाय नहीं है। वो भी एक तत्त्व है। लेकिन आत्मा बहुत छोटा है, और ईश्वर बहुत बड़ा है। ईश्वर पूरे ब्रह्माण्ड में और उससे भी बाहर, बहुत दूर-दूर तक फैला हुआ है। इस प्रकार दोनों अलग-अलग है।

(79) शंका :- संस्कार-दोष और इन्द्रिय-दोष में क्या अंतर है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

आपने सूत्र पढ़ा होगा : -इन्द्रिय दोषात् संस्कार दोषाच्चाविद्या। वैशेषिक. इन्द्रिय दोष का अर्थ है-इन्द्रियों में टूट-फूट, खराबी। आँख बिगड़ गई, आईसाइट कमजोर हो गई या आँख में कलर ब्लाइंडनेस (रंग ठीक न दिखना या रात को न दीखना( आदि कोई रोग हो गया, तो कलर नहीं पहचान पाते, रंगों में अन्तर नहीं समझ में आता। यह इन्द्रिय दोष है।
स संस्कार दोष यह है कि इन्द्रिय बिल्कुल ठीक है, पर वो संस्कार यानी आदत ऐसी पड़ी हुई है, कि इन्द्रिय से ठीक दिखते हुए भी हम आदत के वशीभूत होकर फिर वही गलती कर बैठते हैं। जैसे- चाय पीने की आदत पड़ गई। चाय पीते हैं, सुख मिलता है, फिर दोबारा पीते हैं, सुख मिलता है, फिर तीसरी बार पीते हैं, सुख मिलता है। सैकड़ों बार चाय पी-पीकर उसका जो सुख ले लिया, उससे मन के ऊपर जो छाप लगी कि चाय बहुत अच्छी थी, चाय पीने में बहुत मजा आता है, बढ़िया कड़क चाय होनी चाहिए । तो यह हो गया संस्कार।
स जब हम रोज चाय पीते हैं और एक दिन शिविर में आये तो यहाँ पर चाय नहीं मिली। अब आपको बड़ी बेचैनी होगी, कष्ट होगा। सोचेंगेः- क्या बात है, आज चाय नहीं मिली, क्या जंगल में फंस गए भई, इससे तो घर में ही अच्छे थे। अब यह दुःख हो रहा है न, यह संस्कार के कारण ही हो रहा है। इसका नाम है-संस्कार दुःख। वो चीज नहीं मिल पाई, तो उसके जो संस्कार पड़े हुए थे, अब वो दुःख दे रहे हैं। इसका नाम संस्कार दुःख है।
स और आँख में टूट-फूट हो गई, कान में खराबी आ गई, सुनाई नहीं देता, उसके कारण अविद्या पैदा हो गई, तो यह इन्द्रिय दोष के कारण अविद्या हुई। आदत के कारण चाय नहीं मिल रही है और फिर मन में अविद्या पैदा हो रही है, कि ‘चाय बहुत अच्छी (सुखदायक( है, चाय देते नहीं, ये लोग बड़े खराब है।’ अब ये जो अविद्या पैदा हो रही है, यह संस्कार दोष से हो रही है। यह दोनों में अंतर है।

(80) शंका :- श्रेष्ठ पुरूषों की संकट से ईश्वर तत्काल रक्षा करता है, या कुछ और है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

ईश्वर श्रेष्ठ पुरूषों की रक्षा तत्काल करता है। पर वो अंदर से उत्साह देकर, अंदर से कुछ सूझबूझ देकर, ज्ञान-विज्ञान देकर। ऐसे कोई दुष्ट व्यक्ति, श्रेष्ठ व्यक्ति पर हथियार उठाये, तलवार उठाये और ईश्वर यहाँ बीच में ढाल अड़ा दे, ईश्वर ऐसा नहीं करता। ऐसी प्रेरणा ईश्वर सबकी यथायोग्य रक्षा करता है। श्रेष्ठों की भी अन्यों की भी

(81) शंका :- चिंतन क्या है और यह कैसे किया जाता है। उसके लिये क्या-क्या चीजें आवश्यक हैं?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

चिंतन का मतलब होता है किसी बात की गहराई में जाना। उसको कई प्रकार से सोचना। जैसे मान लीजिये, आपने प्रवचन में सुना अथवा किसी पुस्तक से पढ़ा कि- ‘एक ईश्वर है।’ ईश्वर कितने हैं?ं एक है। सभी लोग कहते हैं। आप बातचीत में किसी से भी पूछो, कि भगवान एक हैं या अनेक ? तो क्या उत्तर देगा -एक। फिर दूसरा सवाल पूछो वो एक भगवान एक जगह रहता है, या सब जगह। सब जगह ? सभी लोग यही कहेंगे- सब जगह। जब दो बात तो उन्होंने ठीक बोल दी, भगवान एक है और वह सब जगह रहता है। और जब तीसरा सवाल पूछेंगे, तो झगड़ा शुरू हो जायेगा। तीसरा सवाल यह है कि जो वस्तु सब जगह रहती है, क्या उसकी शक्ल होनी चाहिये या नहीं होनी चाहिये? नहीं होनी चाहिये। अब पूछो, आपके घर में शक्ल वाला भगवान रखा है या नहीं रखा है? रखा है। बस यही गड़बड़ है। जब ऐसी गड़बड़ सामने आये, तब चिन्तन की जरूरत है, तब सोचने की जरूरत है। इसकी गहराई में उतरो, अगर भगवान शक्ल वाला है तो वह सब जगह नहीं रह सकता । और अगर वह सब जगह रहता है, तो शक्ल वाला नहीं हो सकता। ऐसे बैठ करके विचार करना।
स दो पक्ष बनाकर के तर्क-वितर्क उठाना। फिर प्रश्न उठाना, फिर उसका उत्तर ढूंढना, फिर प्रश्न उठाना, फिर उत्तर ढूंढना। इसका नाम है ”चिन्तन”। इस चिन्तन के लिये पहली चीज है, अच्छी प्रकार ध्यान से प्रवचन सुनना। किसी वक्ता का प्रवचन पूरे ध्यान से सुनना। मन लगाकर सुनना, कि उसने क्या बोला। क्या-क्या शब्द बोले? क्या कहना चाहता है? उसके अभिप्राय को ठीक से समझना, पहली बात। और दूसरी बात-उसको थोड़ा दोहराना (रिवाइज( करना। सोचना, उसने क्या बोला था। उसके वचनों का अर्थ क्या था? और फिर तीसरी बात, ऐसे पक्ष-विपक्ष बनाकर के प्रश्न-उत्तर करना, और उस बात की गहराई में उतरना। और अंत में एक निर्णय पर पहुँचना। सारे प्रश्न-उत्तर करके अंत में सार क्या निकला। ईश्वर को शक्ल वाला मानें या नहीं। अगर वो एक है, यह हमने स्वीकार कर लिया। और यह भी स्वीकार कर लिया, कि वो सब जगह रहता है। तो फिर तीसरी बात अपने आप साफ है, जो चीज सब जगह रहती है, उसकी कोई शक्ल नहीं हो सकती। या तो कोई प्रमाण लाओ, कि अमुक वस्तु सब जगह रहती है, और उसकी शक्ल भी है। यदि कोई ऐसी वस्तु मिल जाये, कि वो सब जगह रहती है और उसकी भी फोटो (शक्ल( है। तब तो हम ईश्वर की फोटो (शक्ल( मान लेंगे। वो भी सब जगह रहता है, उसकी भी फोटो शक्ल है । यदि आप ऐसा कोई भी प्रमाण नहीं ढूंढ पाये, कोई्र उदाहरण नहीं ढूंढ पाये, कि कोई वस्तु सब जगह है और शक्ल भी है। यदि नहीं ढूंढ पाये, तो इसका मतलब साफ है, कि ईश्वर सब जगह रहता है, इसलिए उसकी कोई शक्ल नहीं हो सकती। इसका नाम है- ‘चिन्तन’। इस तरह से करना चहिये। और जो अंत में सार निकले उसको स्वीकार करना चहिये। जब यह प्रमाण से सि( हो गया कि ईश्वर सब जगह रहता है, और उसकी कोई शक्ल, आकृति नहीं है। तो फिर उसको स्वीकार करो। आज के बाद शक्ल वाले की, फोटो वाले की पूजा नहीं करना। वो तो महापुरूषों की फोटो है। रखो घर में, कोई आपत्ति थोड़े ही है। फोटो रखना कोई बुरी बात थोड़े ही है। देखो हमने कितनी फोटो लगा रखी है यहाँ पर। अपने महापुरूषों की, दादा-परदादा की, बड़े-बुजुर्गों की फोटो लगानी चाहिये। देश के वीर पुरूषों की, महारानी लक्ष्मीबाई, महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी, चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, सुभाषचन्द्र बोस ऐसे-ऐसे वीर पुरूषों की फोटो लगानी चाहिये। अच्छे-अच्छे संत महात्मा, महर्षि दयानंद, महर्षि कणाद, महर्षि गौतम, महर्षि कपिल ऐसे-ऐसे साधु, संतों, )षियों के फोटो लगाने चाहिये। फोटो लगाने मं् कोई आपत्ति नहीं है। उनकी पूजा नहीं करनी, उन की आरती नहीं करनी, उनको खिलाना-पिलाना नहीं है। यह गड़बड़ है। बोलो, अग्नि सब जगह रहती है न। जब वो सब जगह रहती है तो उसकी आकार, आकृति कौन सी है। जो अग्नि लपटों के रूप में दिख रही है। वो सब जगह नहीं रहती। और जो सब जगह रहती है, वो दिखती नहीं। बताईये, आकार कहाँ हुआ? इसलिये दोनों में अंतर है। यह है चिन्तन का स्वरूप।

(82) शंका :- अनेकता में एकता कैसे हो सकती है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

बिल्कुल नहीं हो सकती। अनेकता में एकता बिल्कुल नहीं हो सकती। अनेकता बिल्कुल अलग चीज है, एकता बिल्कुल अलग चीज है। दोनों में सौ प्रतिशत विरोध है। यह सब झूठ है, धोखा है। जनता को बेवकूफ बनाते हैं ये नेता लोग जो कहते हैं ‘अनेकता में एकता है।’ अनेकता में एकता कभी नहीं होती। अनेकता शब्द का अर्थ ही यह है – ‘जहाँ एकता न हो।’

(83) शंका :- मुझे पता है कि ईश्वर सर्वव्यापक और निराकार हैं और वही हमारे वास्तविक माता-पिता, पालक-पोषक और रक्षक हैं। फिर भी मैं ईश्वर को अपने माता-पिता की तरह प्रेम नहीं कर सकती। मुझे क्या करना चाहिये, जिससे मैं परमपिता परमात्मा को माता-पिता की तरह प्रेम कर सकूँ?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

बार-बार ईश्वर के बारे में चिंतन करें, बार-बार सोचें। हम जी रहें हैं। चौबीस घंटे वायु का प्रयोग करते हैं, श्वास लेते हैं। अगर पाँच मिनट शु( वायु न मिले, तो शायद हमारा शांतिपाठ हो जायेगा। हो जायेगा न। शु( वायु पाँच मिनट न मिले, तो शांतिपाठ (मृत्यु( हो जायेगा। जीना कठिन है। इस तरह से सोचिये । कौन है जो हमारे जीवन की रक्षा कर रहा है। एक-एक मिनट, एक-एक सेकंड कौन हमको यह शु( वायु (ऑक्सीजन( दे रहा है, जिसके कारण हम जी रहे हैं। कौन हमारे लिए हर एक )तु में अलग-अलग सब्जियाँ बनाकर भेज रहा है। अलग-अलग फल बनाकर भेज रहा है। अलग-अलग वनस्पतियाँ, औषधियाँ और तरह-तरह की चीजें बनाकर भेज रहा है। ऐसे ईश्वर के गुणों पर विचार करें। कौन है, जो हमारे कर्मों का हिसाब रख रहा है। एक-एक कर्म का हिसाब रखता है। चौबीस घंटे में हम पता नहीं कितने कर्म करते हैं मन से, वाणी से, शरीर से। कौन है, जो हमारे सारे कर्मों का हिसाब रखता है? कौन है, जो हम पर अन्याय करने वालों को दण्ड देता है? उन अन्यायकारियों से जो हमको नुकसान होता है, हानि होती है, उस नुकसान की पूर्ति करता है, हमारी क्षतिपूर्ति करता है। कम्पन्सेशन देता है। वो कौन है? मनुष्यों में तो कोई नहीं दिखता। और हम जो अच्छे कर्म करते हैं, उन अच्छे कर्मों का फल हमको कौन देता है? हमें मनुष्य जन्म देता है, आगे बार-बार देता है। अनादिकाल से दे रहा है और भविष्य में अनंतकाल तक देता रहेगा। इतने अच्छे-अच्छे लोग संसार में जिसने उत्पन्न किये हैं। अच्छे-अच्छे धार्मिक लोग, देशभक्त लोग, ईमानदार लोग, वीरपुरूष, ऐसे अच्छे-अच्छे साधु, संत, महात्मा, विद्वान लोग, जो धर्म की रक्षा करते हैं, देश की रक्षा करते हैं, दूसरों को सुख देते हैं। सब दुनिया का भला करते हैं। कौन है, उनको भेजने वाला। और यह सब करके भी वो भगवान हमसे कितनी फीस लेता है, कितना शुल्क लेता है? कुछ नहीं। इस तरह से बार-बार सोचें, तो आपके मन में प्रेम बढ़ेगा, रूचि बढ़ेगी। और माता-पिता वाले उदाहरण की बात थी, तो वैसे भी सोचें। जैसे छोटा बच्चा होता है, पन्द्रह दिन का, एक महीने का। उसका सारा काम उसकी माँ ही करती है। खिलाना, पिलाना, सुलाना, जगाना, नहलाना, धुलाना सारा काम उसकी माँ ही करती है। उस बच्चे को तो कुछ होश ही नहीं, वो कुछ कर नहीं सकता। तो उस तरह से भी सोचें। जैसे माता छोटे बालक की सब प्रकार से रक्षा करती है, उसका सारा ध्यान रखती है। ऐसे ही हम छोटे बच्चे की तरह हैं। हमारी बु(ि क्या है, कुछ भी नहीं है। क्या खाना, क्या नहीं खाना, कुछ भी पता नहीं। उल्टा-सीधा खाते रहते हैं। शरीर को बिगाड़ते रहते हैं। और एक लंबी सीमा तक ईश्वर हमारी रक्षा करता रहता है, रोगों से बचाता रहता है। इतनी व्यवस्था उसने हमारे शरीर में कर रखी है। और जब बहुत ज्यादा सीमा पार हो जाती है, अतिक्रमण बहुत हो जाता है, तब जाकर के भगवान हमारे शरीर में कुछ छोटा सा रोग पैदा करता है। और वो भी सावधान करने के लिये। सावधान! बहुत लापरवाही कर ली, जागो, लापरवाही मत करो। जानकारी करो, क्या खाना, क्या नहीं खाना। और उस हिसाब से खाओ-पिओ, और अपने शरीर की रक्षा करो। तो इस तरह से हम बहुत कम जानते हैं। कैसे जीना चाहिये, कैसे सोचना चाहिये, कैसे बोलना चाहिये, कैसे व्यवहार करना चाहिये, कैसे उठना-बैठना चाहिये, बहुत कम जानते हैं। और फिर भी ईश्वर हमको पता नहीं अंदर से कैसे-कैसे सूचना देता रहता है चौबीस घंटे यह उसकी बड़ी कृपा है। इस तरह जब हम सोचते हैं तो हमें लगता है कि हम वैसे ही बच्चे हैं, पन्द्रह दिन के, एक महीने के, दो महीने के और हमारी सब रक्षा भगवान ही कर रहा है। कब, कैसी बु(ि देता है, कब क्या अंदर से सुझाव देता है, और जब हम उसकी बात मान लेते हैं, तो हमारा बहुत अच्छा काम निपट जाता है। हमारा बहुत अच्छा भला हो जाता है। हम अनेक आपत्तियों से, दुर्घटनाओं से बच जाते हैं। इस तरह से सोचें। तो माता-पिता की तरह हमारे अंदर भी रूचि आयेगी, कि जैसे हम माता-पिता को चाहते हैं, उनसे प्रेम करते हैं, उनका उपकार समझते हैं, ऐसे हम ईश्वर का भी उपकार समझेंगे। ऐसा बार-बार सोचें। तो हम उनसे माता-पिता की तरह प्रेम करने की स्थिति भी प्राप्त कर लेंगे।

(84) शंका :- क्या जब हम समाधि अवस्था प्राप्त करें तब ही ईश्वर का अनुभव होगा?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

जी हाँ, ईश्वर का अनुभव, जो सूक्ष्म अनुभव है, जिसको समाधि कहते हैं, समाधि-प्रत्यक्ष कहते हैं, वो तो समाधि लगाने पर ही होगा। परंतु उससे पहले भी कुछ मोटे स्तर का अनुभव हो सकता है। और वैसे बहुत सारे लोगों को होता भी है, पर वो ध्यान नहीं देते, ध्यान कम देते हैं। कैसे होता है ईश्वर का अनुभव? पहले भी मैंने कहा था, कि जब हम बुरा काम करने की बात सोचते हैं, तो मन में भय, शंका, लज्जा होती है। होती है कि नहीं होती? होती है न। यह जीवात्मा की ओर से नहीं है। यह ईश्वर की ओर से है। ये ‘सत्यार्थ-प्रकाश’ के सातवें समुल्लास में लिखा है। इस तरह से हम अपने अंदर ईश्वर को अनुभव कर सकते हैं। जब हम अच्छी योजना बनाते हैं, तब आनंद, उत्साह, निर्भयता, ये अंदर से प्रतीत होता तो है। तो महर्षि दयानंद जी लिखते हैं यह ईश्वर का अनुभव है यह एक मोटे स्तर का आंतरिक अनुभव है। और एक दूसरा स्थूल-बाह्य अनुभव भी है, वो कौन सा है। इस प्रसंग में सातवें समुल्लास में लिखा है, गुणों को देखकर गुणी का प्रत्यक्ष होता है। प्रसंग यह चल रहा है, आप ईश्वर-ईश्वर कहते हो, उसकी सि(ि कैसे करते हो? तो उत्तर दिया है, कि सब प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से हम ईश्वर की सि(ी करते हैं। तो प्रत्यक्ष प्रमाण के प्रसंग में महर्षि दयानंद जी ने लिखा है, कि गुणों के माध्यम से गुणी का प्रत्यक्ष होता है। उदाहरण के लिये जैसे यह पृथ्वी है। पृथ्वी एक गुणी है, एक द्रव्य है। और इसमें रूप, रस, गंध, स्पर्श आदि-आदि ये गुण हैं। जब हम पृथ्वी का प्रत्यक्ष करते हैं, तो आँख से देखकर के रूप के माध्यम से पृथ्वी का प्रत्यक्ष करते हैं या इसकी (मिट्टी की( गंध आती है, तो गंध से हम पृथ्वी का प्रत्यक्ष करते हैं। अथवा हाथ से छूकर के स्पर्श गुण से प्रत्यक्ष करते हैं। इससे पता चला कि किसी पदार्थ का जो प्रत्यक्ष है, वो उस पदार्थ के गुणों के माध्यम से होता है। तो यह उदाहरण देकर महर्षि दयानंद जी आगे कहते हैं कि इस सृष्टि में ईश्वर के ‘रचना आदि गुण’ इस सृष्टि में देखिये । सूर्य ईश्वर द्वारा रचित पदार्थ है, चंद्रमा ईश्वर की रचना है, पृथ्वी ईश्वर द्वारा रचित पदार्थ है, और फल-फूल, वनस्पतियाँ, पशु-पक्षी, प्राणियों के शरीर, ये किसने बनाये? ईश्वर ने। तो सृष्टि के पदार्थो में ईश्वर की रचना आदि गुणों को सृष्टि में देखो और इस रचना गुण से इनके रचनाकार ईश्वर का प्रत्यक्ष करो। तो यदि हम इन पदार्थों की रचना को ध्यान से देखेंगे, तो भी हमको मोटे स्तर पर ईश्वर का अनुभव होगा, कि हाँ,कोई न कोई है, जो फूल बनाता है, कलियाँ बनाता है, वनस्पतियाँ बनाता है, पेड़-पौधे बनाता है, और साग-सब्जी बनाता है, प्राणियों के शरीर बनाता है, सूरज-चाँद-धरती बनाता है, कोई न कोई है। इस तरह से मोटे स्तर का प्रत्यक्ष, बिना समाधि के भी हो सकता है। तो यह है दो प्रकार का प्रत्यक्ष। एक तो रचना आदि गुणों को देखकर ईश्वर का मोटा स्तर का अनुभव, और दूसरा अंदर वाला। अर्थात् भय, शंका, लज्जा के माध्यम से ईश्वर का अनुभव। यह दो तरह का अनुभव तो सबको हो सकता है। थोड़ा सा ध्यान देंगे, तो सबको हो जायेगा। बाकी तीसरा समाधि वाला सूक्ष्म है, कठिन है । इसलिए वो लंबे समय के बाद होगा।

(85) शंका :- क्या कुसंस्कार से आत्मा दबता है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

जी हाँ, कुसंस्कारों से आत्मा दबता है, आत्मा की अवनति होती है। इसलिये कुसंस्कारों का विरोध करना चाहिये।

(86) शंका :- ध्यान करते समय किस चीज या आकृति का मन में ध्यान किया जाये? उस चीज को या नाम को या भगवान का कहाँ पर ध्यान लगाया जाये। उसका स्थान और उसका स्वरूप बताने की कृपा करें तथा किस आसन में तथा किस समय ध्यान किया जाये?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

देखिये, आसन तो यह है, जिसमें हम चौकड़ी मार के बैठें हैं। यह है ‘सरल आसन’, सबसे आसान। इस आसन में भी आप ध्यान कर सकते हैं। फिर एक है ‘स्वस्तिक आसन। ‘ दाँये पाँव को उठाकर के बाँये पाँव की पिंडली पर उल्टा रख लें और बाँये पाँव को इस दाँये पाँव की पिंडली के नीचे रख दें, उल्टा करके। और कमर सीधी, गर्दन सीधी, भुजायें सीधी। यह हो गया स्वस्तिक आसन। इसमें भी बैठ सकते हैं। यह भी सरल है। फिर थोड़ा कठिन ‘पद्मासन’ है। दायाँ पाँव ऊपर उठाओ, बांयी जंघा पर रखो। फिर बाँया पाँव उठाकर दांयी जंघा पर रखो। अब यह थोड़ा कठिन है। इसको ‘पद्मासन’ कहते हैं। किसी-किसी को इसमें बैठने का अभ्यास हो तो इसमें भी ध्यान कर ले और नहीं हो तो कोई बात नहीं।
ध्यान का समय आपकी इच्छा पर है। सुबह चार बजे बैठें, पाँच बजे बैठें, छह बजे बैठें, सात बजे बैठें। दिन निकलने से पहले कर लें, तो अच्छा है। उस समय शोर-शराबा नहीं होता। शांति होती है तो मन अच्छा लगेगा। आसानी से
ध्यान होगा। शाम को भी सूर्यास्त के आसपास का समय ध्यान करने के लिए अच्छा है। इसके अलावा यदि मजबूरी है, जैसे कि कोई आठ बजे ऑफिस से घर आता है तो आठ बजे कर लो। कोई सात बजे आता है तो सात बजे कर लो। नौ बजे आता है तो नौ बजे कर लो और उसको टाइम ही नहीं मिलता है, तो रात को खाना खाके सोने से पहले कर लो। कुछ तो करो, कभी भी ध्यान करो। ध्यान जरूरी है। अगर प्रॉपर टाइम पर बैठ सकते हैं तो बहुत अच्छा है। सही समय सुबह सूर्योदय से पहले और शाम को सूर्यास्त के आसपास है। यदि सही अनुकूल समय नहीं मिलता तो आगे-पीछे करें।
जहाँ आपको मन एकाग्र करने में सुविधा हो, वहाँ पर ध्यान करें। अधिकांश लोगों को मस्तक के बीच में, मन एकाग्र करने में सुविधा रहती है, आसानी होती है। वे आँख बंद करके अपनी अंर्तदृष्टि से मस्तक के बीच के स्थान को देखें। और रूप, रंग, आकृति, लाइट, कुछ नहीं देखनी, सब हटा दीजिये। बिल्कुल अंधेरा बनाईये, जैसे रात को अंधेरा होता है, ऐसा खूब गहरा अंधेरा अपने मन में देखिये। फिर अंधेरे के बाद एक लंबा चौड़ा विस्तृत आकाश देखिये। खाली-खाली स्थान और अंधेरा ये दो चीजें देखिये। यह हो गई ध्यान की तैयारी। अब ईश्वर का ध्यान शुरू करेंगे। पर ध्यान का ‘प्रैक्टिकल’ करने से पहले होती है ‘थ्योरी’। पहले थ्योरोटिकल समझ लो, कि ईश्वर कैसा है? लोगों को यहीं झगड़ा है बहुत। अच्छा यह बताइये, ईश्वर एक है या अनेक? एक है, बस है याद रखना। अब ये प्रैक्टिकल के लिए पहले हम थ्योरी तैयार कर रहे हैं। पहले थ्योरी ठीक करेंगे, फिर प्रैक्टिकल करेंगे। तो ईश्वर एक है। दूसरी बात- एक ईश्वर एक जगह पर रहता है, या सब जगह रहता है? सब जगह रहता है। जो वस्तु सब जगह रहती है, क्या उसकी शक्ल, फोटो, आकृति होनी चाहिये या नहीं होनी चाहिये? नहीं होनी चाहिये। अब देखो, बात साफ हो रही है न। हमारी यह थ्योरी तैयार हो रही है। ईश्वर एक है, वो सब जगह रहता है, उसकी कोई शक्ल नहीं है, वो निराकार है। तीन बात साफ हो गई। मेरे साथ दोहराईये पहली बात क्या थी? ईश्वर एक है। दूसरी बात- ईश्वर सब जगह रहता है और तीसरी बात- ईश्वर निराकार है। अब चौथी बात- ईश्वर चेतन है या जड़? चेतन है। तो यह चौथी बात दिमाग में रखनी है कि ईश्वर चेतन है। गॉड इज ओमनीशियन्ट, ईश्वर सर्वज्ञ है, वो सब कुछ जानता है। वो ईंट, पत्थर की तरह, दीवार की तरह जड़ नहीं है। हमारी आपकी तरह चेतन है, सोचता है, समझता है, सबको देखता है, सुनता है, सबके कर्मों का हिसाब रखता है। तो चौथी बात ईश्वर चेतन है। और पाँचवी बात- ईश्वर में आनंद है या नहीं है? है। बस पाँच बात तैयार रखो, ये थ्योरी हो गई। ईश्वर एक है, सर्वव्यापक है, निराकार है, चेतन है, आनंदस्वरूप है। यह थ्योरी तैयार करके और फिर ध्यान करेंगे। हमने ध्यान के लिए मन को एकाग्र किया और ऐसा सोचा कि चारों तरफ खूब गहरा अंधेरा है, और शून्य आकाश है। कुछ नहीं। इतनी तैयारी करने के बाद अब वो पाँच बातें यहाँ दोहरायेंगे। इस पूरे आकाश में एक ईश्वर है और वो पूरे आकाश में सर्वव्यापक है, फैला हुआ है। वो निराकार है उसकी कोई आकृति नहीं है, कोई शेप नहीं, कोई कलर नहीं, कोई फोटो नहीं, कुछ नहीं वो चेतन है। और आनंद का भंडार है। जैसे समुद्र में पानी ही पानी होता है, ऐसे ही ईश्वर में आनंद ही आनंद है। इस तरह से बैठकर पाँच बातें दोहरायें और फिर ईश्वर का ही चिंतन करें। दूसरी बात बीच में नहीं घुसनी चाहिये। खाने-पीने की बात, शॉपिंग की बात, टेलीफोन की बात, बच्चे के स्कूल की फीस की बात, लड़ाई-झगड़े की बात, मुकदमे की बात बीच में कोई नहीं आनी चाहिये। बस यही पॉच बातें दोहराइये। और फिर इसके बाद ओ३म् का जप कर सकते हैं। ओ३म् का जप अर्थ सहित करें। केवल ओ३म् शब्द बोलें, फिर उसका अर्थ बोलें। दूसरा विकल्प है- ओ३म् के साथ ईश्वर का एक गुण जोड़ दें। जैसे- ‘ओ३म् आनंदः’। यह एक मंत्र हो गया। इस तरह से मंत्र बोलें, फिर उसका अर्थ बोलें। तीसरा विकल्प- फिर गायत्री मंत्र का पाठ करें, वो भी अर्थ सहित करें। चौंथा विकल्प- वैदिक संध्या के मंत्रों से ईश्वर का ध्यान करें। मंत्र भी बोलें। मन में, एक-एक शब्द का अर्थ भी दोहरायें, और फिर उसका भावार्थ भी दोहरायें। इस तरह से ईश्वर का ध्यान करना चाहिए। कोई लाइट, कोई आकृति, कोई फोटो, कोई गुरू जी का चित्र कुछ नहीं रखना। कई लोग गुरूजी का ही ध्यान करते हैं। कोई उनका फोटो लगा लेता है, उसको देखता रहता है। फिर आँख बंद करके उसी का ध्यान करता रहता है। ये आपको मुक्ति नहीं दिलाने वाले। ये जो शरीरधारी हैं,
गुरू इनमें से कोई आपको मुक्ति दिलाने वाला नहीं है। ये सब मनुष्य लोग
हैं। इनमें से कोई परमात्मा नहीं, किसी के पास शक्ति नहीं, किसी के अधिकार में मोक्ष नहीं। मोक्ष केवल सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान परमात्मा के हाथ में है। अगर आपको मोक्ष चाहिये, आनंद चाहिये तो जैसे अभी हमने थ्योरी पर विचार किया, ऐसे ही ईश्वर का ध्यान करना है और किसी का नहीं।

(87) शंका :- ऐसा हम सुनते हैं, कि- सत्य आचरण करने वालों से ईश्वर प्रसन्न होता है। किन्तु देखा गया है कि असामाजिक तत्त्व, असत्य आचरण करने वाले लोग ज्यादा सुखी हैं। आध्यात्मिक सत्य आचरण करने वाले लोगों को कष्ट अधिक सहन करना पड़ता है। ऐसे समय में ईश्वर के अस्तित्त्व पर संदेह हो जाता है। मोक्ष मिलेगा, जब मिलेगा, तब मिलेगा। लेकिन आज तो भगवान के न्याय कार्य के ऊपर से विश्वास उठ जाता है। कृपया इस स्थिति पर मार्गदर्शन करें?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

हम देखते हैं कि सच्चा आदमी, ईमानदार आदमी दुनिया में ज्यादा मार खा रहा है। उसको धन भी कम मिलता है, सम्मान भी कम मिलता है,। गालियां भी पड़ती है, झूठे आरोप भी लगते हैं। और ऑफिस में लोग उसको परेशान भी खूब करते हैं। गंदे व्यापार में भी उसकी पिटाई ज्यादा होती है। हम यह भी देखते हैं, कि जो बेईमान है, छली-कपटी, धोखेबाज, चालाक आदमी है, वो दूसरों से छीन-झपट के खा जाता है। और वो खूब पैसे वाला, संपन्न दिखता है, सुखी दिखता है। तो ऐसी स्थिति में ईश्वर के अस्तित्त्व पर शंका तो होती है।
स उसका समाधान यह है, कि एक बार तो मार खानी पड़ेगी। चाहे इस जन्म में खाओ या अगले जन्म में खाओ। इस जन्म में हम मनुष्य बनकर इन संसार के लोगों की मार खा लेंगे। अगर ईमानदारी से चलेंगे, तो संसार के लोगों की मार खायेंगे। पर ईश्वर की मार से बच जायेंगे। आगे जन्म बढ़िया हो जायेगा। यदि बेईमानी करेंगे, छल-कपट करेंगे, धोखेबाजी करेंगे तो लोगों से शायद कम मार खायेंगे, लेकिन फिर आगे चलकर ईश्वर की मार खानी पड़ेगी। हमें सूअर, गधा, कुत्ता, बिल्ली बनना पड़ेगा ।
स अब आप सोच लीजिए, कि दोनों में से कौन सी मार खानी है। कोई एक तो खानी पड़ेगी। आप ईमानदारी से चलकर लोगों की मार खा लें, या बेईमानी करके ईश्वर की मार खा लें। विचारणीय यह है कि कौन सी मार सस्ती है।
स विचारेंगे तो पता चलेगा कि – लोगों की मार खानी सस्ती है। इसीलिए ईमानदारी से चलना चाहिए। लोग थोड़ा परेशान करेंगे। उसको सहन करने के तीन शब्द आपको दे दिये- कोई बात नहीं। इससे आपको शक्ति मिलेगी और आप लोगों की मार खा लेंगे, आसानी से सह लेंगे। पर इसके परिणाम स्वरुप आपका अगला जन्म अच्छा होगा। आगे अच्छे मनुष्य बनेंगे और ऐसे पुरुषार्थ कर-कर के मोक्ष भी हो जायेगा। इसलिए ईमानदारी से चलना ज्यादा अच्छा है।
स जो बेईमानी करते हैं, वो बड़े सुखी दिखते हैं। वो केवल सुखी दिखते हैं, लेकिन सुखी हैं नहीं सुखी। ऊपर-ऊपर से सुखी दिखते हैं केवल। हम बड़े-बड़े करोड़ पति, अरब पति, सेठों के यहां पर भी जाते हैं। और वो स्वयं हाथ जोड़कर के बोलते हैं, कि महाराज जी। आप बहुत सुखी हो, हम बहुत दुखी हैं।’ तो वो सुखी केवल बाहर से दिखते हैं। अंदर से बेचारे बहुत दुःखी हैं। उनके मन में हमारे प्रति श्र(ा है, इसलिए अपने दिल की बात वो सबको नहीं बताते, हमको बताते है। वे आपको नहीं बतायेंगे। कुछ पूर्वजन्म के भी कर्म है, इस जन्म के भी है, दोनों मिलजुल कर के वो इतने संपन्न हो जाते हैं। परन्तु वे पैसे के कारण बहुत सुखी नहीं हैं। आपको केवल सुखी दिखते हैं।
स सुख तो अंदर की (मन की( चीज है, बाहर की चीज नहीं है। बाहर तो आपको मोटर-गाड़ी दिखती है, धन दिखता है, भवन दिखता है, सोना-चांदी दिखता है। बाहर की चीजें अच्छी-अच्छी चमकीली दिखती हैं। उन चीजों से कोई सुख नहीं होता है।
स देखिये, हम जंगल में रहते हैं, यह मकान भी हमारा नहीं है। यह संसार वालों का है। हम तो यहां मेहमान के तौर पर रहते हैं। हमारे पास कुछ नहीं है। कोई बैंक-बैलेंस नहीं, कोई व्यक्तिगत संपत्ति नहीं। और आप बताइये, हम कितने सुखी हैं। खूब आनंद से रहते हैं, विद्या पढ़ते हैं, योगाभ्यास करते हैं, समाज की सेवा करते हैं, निष्काम भाव से करते हैं, खूब भगवान हमको सुख देता है। जो भी संपत्ति है, सब समाज की है। और भगवान की है और फिर भी हम बहुत सुखी हैं। उनके पास खूब संपत्ति है, फिर भी बेचारे दुःखी हैं। सि(ांत की बात यह है कि-केवल संपत्ति होने से कोई सुखी नहीं होता। सुखी होता है-विद्या से, सत्संग से, वैराग्य से, आचरण से। इन चीजों से व्यक्ति सुखी होता है। तो वो लोग सुखी जरूर दिखते हैं, हैं नहीं।
स एक बात इसमें आई है, कि कोई अच्छा ईमानदार आदमी दुखी होता है तो ईश्वर के न्यायकारी होने पर शंका होती है। इसका उत्तर यह है, कि जो अच्छे लोग मेहनत और ईमानदारी से काम कर रहे हैं, उनको जो दुःख भोगने पड़े रहे हैं, वो दुख उनको ईश्वर दे रहा है या समाज के लोग दे रहे हैं। समाज के लोग। तो फिर समाज के लोग अन्यायकारी हुये, ईश्वर कहां अन्यायकारी हुआ। ईश्वर पर शंका क्यों? ईश्वर ने थोड़े ही किया अन्याय। वो अन्याय तो समाज के लोगों ने किया। उसका दण्ड उनको मिलेगा। ईश्वर तो पूर्ण न्यायकारी है। वो तो जब फल देता है, ठीक न्याय से ही देता है। अन्याय का जो रूप दिख रहा है, यह तो ईश्वर का किया हुआ है ही नहीं। फिर ईश्वर पर हम क्यों शंका करें। इसीलिए ईश्वर पर शंका नहीं करनी चाहिए। संसार के प्राणियों को देखिये, पता चल जाता है। ईश्वर ने कैसा बढ़िया न्याय किया। जो अच्छे काम करते हैं, उनको मनुष्य बनाता है। और जो बुरे काम करते हैं, उनको कौआ, कबूतर, गिलहरी, सूअर, बंदर इत्यादि बना देता है।

(88) शंका :- योग में मन के सभी विचारों को पूरी तरह से नहीं रोक पाते हैं तो क्या उन विचारों को रोककर दूसरी ओर लगाना है। मार्गदर्शन कीजिए?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

जी हाँ योगाभ्यास में मन के सारे विचारों को नहीं रोकना है। कुछ विचार रोक दनते हैं, कुछ चालू रखने हैं । संसार के विचारों को बंद कर देना है और ईश्वर के विचारों को चालू रखना है। सारे विचारों को बिल्कुल बंद कर दें, विचारशून्य हो जाएँ। यह शुरू में बहुत कठिन है। सांसारिक विचारों को बंद कर दीजिए। खाना-पीना, घूमना-फिरना, शापिंग वगैरेह के सारे विचार बंद। ईश्वर के विचार को मन में चालू रखिए। तो इसका नाम-योग है। तो यह कर सकते हैं। है तो यह भी कठिन, लेकिन अभ्यास करेंगे तो यह हो जाएगा।

(89) शंका :- हर नया कर्म करते समय मन में पहले शंका उत्पन्न होती है और उसके साथ बाद में भय भी उत्पन्न होता है। ऐसा क्यों?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

:- कोई भी नया काम करते हैं तो मन में शंका उत्पन्न होती है, कि-यह ठीक है या गलत। और भय भी लगता है, कि करुँ या न करुँ। अर्थात् सफलता मिलेगी या नहीं ।
स इसका कारण यह है, कि कर्मों के संबंध में हमारी जानकारी कम है। अच्छे से पता नहीं रहता, कि यह काम ठीक है या गलत है। इसलिए हमको शंका होती है, कि करुँ या न करुँ। अथवा हमको जानकारी भी है, कि यह काम ठीक है। और फिर भी हमको शंका होती है। इसका कारण यह हो सकता है, कि आत्मविश्वास की कमी है। हमको अपने पर ही शंका है-पता नहीं कर पाऊँगा या नहीं कर पाऊँगा? फेल तो नहीं हो जाऊँगा? इन दो कारणों को दूर कर दें। यह काम करना ही है, यह काम ठीक है, इसकी जानकारी वेद आदि ग्रंथों से होगी। ईश्वर का बताया हुआ वेद, वही हमारा असली संविधान है। वहाँ से पता लगा लेंगे, कि बात सही है या गलत। इससे आपकी शंका दूर हो जाएगी।
स और दूसरा, अपने अन्दर आत्मविश्वास पैदा कीजिए, कान्फीडेंस लाइए, कि-यह काम ठीक है, मेरी क्षमता के अनुरूप है, मैं यह कर सकता हूँ, मुझमें इतनी क्षमता है। भगवान ने मुझे बहुत शक्ति दी है। बहुत विद्या दी है, बु(ि दी है, इसलिए कर सकता हूँ । तो आप खुद करेंगे। न कोई शंका होगी, न कोई भय लगेगा, कुछ नहीं होगा।
स काम गलत हो, तो डिसीजन (निर्णय( ले लीजिए, कि नहीं करना। यह कानून के विरू( है। करूंगा तो दण्ड मिलेगा। बस सारी शंका, भय खत्म।

(90) शंका :- आपने कहा था कि ईश्वर का रंग, रुप आकार कुछ नहीं है। तो ध्यान करते समय निराकार ईश्वर का ध्यान कैसे करें?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

ध्यान करने के लिए ईश्वर की आकृति आवश्यक नहीं है, बिना आकृति के भी ध्यान हो सकता है। आप लोग सुख का ध्यान करते हैं कि सुख मिलना चाहिए। सुख का ध्यान करते हैं न, तो क्या सुख की आकृति बनाकर ध्यान करते हैं या बिना आकृति बनाए? हम बिना आकृति बनाए ध्यान करते हैं और दुःख का भी ध्यान करते हैं, कि ‘हे भगवान दुःख न आ जाए।’ रोज ध्यान करते हैं, लेकिन दुःख की कोई आकृति नहीं बनाते। इसलिए ध्यान करने के लिए आकृति बनाना आवश्यक नहीं है।
पृथ्वी के अन्दर गुरूत्वाकर्षण (ग्रबिटेशन फोर्स( की कोई आकृति है क्या? उसकी शक्ल, कोई रूप, रंग, कलर, कुछ नहीं है। फिर भी देखो निराकार स्वरुप में उसको लोग पढ़ते भी हैं, पढ़ाते भी हैं, समझाते भी हैं और सारे व्यवहार भी चल रहे हैं। कोई भी साइंटिस्ट (वैज्ञानिक( यह नहीं कहता, कि ग्रेविटेश्न फोर्स की कोई पीली आकृति है, लाल आकृति है या किस रंग की है? और सब मानते हैं, पढ़ते हैं, पढ़ाते भी हैं। ऐसी पता नहीं कितनी चीजे हैं, जिनका कोई रूप, रंग, आकृति नहीं है, फिर भी उनको सब स्वीकार करते हैं। उनको मानते हैं उनके आधार पर सारा व्यवहार भी चलता है।
एक्स-रे नहीं दिखती, अल्फा-रे नहीं दिखती, बीटा-रे नहीं दिखती, गामा रेज नहीं दिखती, ग्रेविटेशन फोर्स नहीं दिखती, इनफ्रारेड लाईट नहीं दिखती, अल्ट्रासाउण्ड नहीं दिखती, पता नहीं कितनी चीजें हैं, जो नहीं दिखती। रेडियो और टेलीविजन का प्रसारण हो रहा है कि नहीं ? यहाँ उनकी किरणे हैं कि नहीं? जो सारे चैनल चल रहे, इस समय भी तो चल रहे हैं न। तो यहाँ पर उनकी सारी किरणें हैं, पर ये नहीं दिखतीं। ऐसी बहुत सारी चीजें हैं, जो होती है, अपना-अपना काम करती है और दिखती एक भी नहीं। और वो सब माननी पड़ती है। ईश्वर भी ऐसा है, कि कोई आकृति नहीं है। बिना आकृति के ही उसका ध्यान करेंगे, धीरे-धीरे अभ्यास करेंगे हो जाएगा ।

(91) शंका :- ‘दण्ड देते समय वाणी में क्रोध लाना पड़े तो लाएँ, किन्तु मन में क्रोध न लाएँ”-ऐसा करना अहिंसा है, ऐसा आपने बतलाया, किन्तु ये असत्य है, क्योंकि मन और वचन की एकरूपता नहीं रही?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

यह तो सत्य है कि एक व्यक्ति के मन में आ गया कि मैं फलां पड़ोसी की टांग तोड़ दूंगा और वाणी से भी उसने अपने दोस्त को बोल दिया कि इस पड़ोसी की टांग तोड़ दूंगा और शरीर से वह उसकी टांग तोड़ दे, तो तीनों में एकरूपता हो गई। तीनों में एकरूपता होते हुए भी यह अहिंसा नहीं है, यह हिंसा है।
स सत्य का यह अर्थ नहीं है कि मात्र तीनों में एकरुपता हो। मात्र एकरुपता होना, सत्य नहीं कहलाता। उसका प्रयोजन अहिंसा होना चािहए। अहिंसा आदि 5 यम और शौच आदि 5 नियम हैं।
स अहिंसा के संबंध में व्यास भाष्य में लिखा है- उत्तरे च यमनियमास्तन्मूलाः तत्सि(िपरतयैव प्रतिपाद्यन्ते। अर्थात् बाकी के नौ यम-नियम अहिंसा मूलक हैं। उनका प्रयोग इस ढंग से करना है, कि उनसे अहिंसा की रक्षा होनी चाहिए। हिंसा नहीं होनी चाहिए। अहिंसा का पालन करना हमारा मुख्य प्रयोजन है। अहिंसा का व्यवहार करने के लिए यदि हमको मन और वाणी में कुछ अंतर भी करना पड़े तो कर सकते हैं। प्रयोजन अगर हमारा अहिंसा करना है, दूसरों को धोखा देना नहीं है। जब दूसरे को धोखा दे रहे हैं, तो वो हिंसा और असत्य होता है।
स बच्चे ने जैसे- गड़बड़ कर दी। उसे बार-बार समझाया, लेकिन नहीं मानता। अब उसको ठीक करना है तो हम ऊपर से तो डाँट लगायेंगे, पर मन में उसके प्रति प्रेम-भाव बनाये रखेंगे। अगर मन में प्रेम नहीं है और मार-पीट देंगे, तो ज्यादा पीट देंगे, अन्याय कर देंगे। उसका हाथ-पाँव टूट जाएगा, तो जीवन भर के लिए विकलांग हो जाएगा। ऐसा नहीं करना है। यदि हम ऊपर से डाँटते नहीं, तो वो सुधरेगा भी नहीं। इस सुधार के लिए ऊपर-ऊपर से डाँटना भी है। पर मन में प्रेम-भाव रखना है। इसका नाम अहिंसा है।
स यहां पर दण्ड का प्रयोजन है-सुधार करना। अपना गुस्सा ठंडा करना बिलकुल नहीं। दण्ड इसलिए दिया जाता है, कि बस अपराधी का सुधार हो जाए। न्यायाधीश महोदय कोर्ट में बैठकर के मुकद्मे सुनते हैं, और फिर अपराधियों को दण्ड देते हैं। छः मास की जेल, एक वर्ष की जेल, दो वर्ष की जेल और किसी को फांसी तक भी देते हैं। क्यों जी, क्या जज साहब अपना गुस्सा ठंडा करने के लिए फांसी देते है? वो तो अपराधी केस सुधार के लिए दण्ड देते हैं। ऐसे ही माता-पिता के मन में बच्चे का हित करना ही है। वो मन में हित की भावना रखें, और ऊपर से डाँट लगाएं, ऐसा शास्त्रों में विधान हैं।

(92) शंका :- हमारे निवास स्थान पर मुण्डकोपनिषद् का एक श्लोक लिखा है, जिसमें ओ३म् को धनुष, आत्मा को तीर और ब्रह्म को लक्ष्य बताया गया है। कृपया इसे स्पष्ट करें?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

दृष्टांत है- मान लीजिए, एक व्यक्ति धनुष बाण ले करके तीर को लकड़ी के खंबे में ठोकना चाहता है। उसकी ऐसी इच्छा है। जैसे बाहर से एक दृष्टांत समझाने के लिए बताया, कि एक लकडी का खम्भा है, वो है- लक्ष्य। और उस लकडी के खम्भे में क्या फेंकना है? तीर। और फेंकने के लिए साधन क्या है? धनुष। ठीक है, तो तीन बात हो गईं। एक तीर, एक धनुष और एक लक्ष्य। ऐसे ही ब्रह्म लक्ष्य है, ब्रह्म तल्लक्ष्य मुच्यते। प्रणव त्र (ओ३म्( धनुष के समान है। ‘प्रणवो धनुः शरो हि आत्मा’- आत्मा जो है, वो तो तीर के समान है। जैसे धनुष में तीर को देखते हैं, और फिर धनुष की रस्सी खींच करके, और तीर को छोड़ करके लक्ष्य तक पहुँंचा देते है। ऐसे ही ओ३म् है- धनुष, धनुष के समान। और जो आत्मा है, वो तीर (ऐरो( के समान है। और ब्रह्म जो है, वो टारगेट है, वो लक्ष्य है। तो ओ३म् के मंत्र से आत्मा का तीर छोड़ो और ब्रह्म में फिट कर दो। यह उस वचन का अभिप्राय है।

(93) शंका :- जब संसार प्रलय-अवस्था में चला जाता है, तब परमात्मा कुछ करता है या निठल्ला बैठा रहता है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

जब संसार प्रलय अवस्था में चला जाता है तो ईश्वर निठल्ला नहीं बैठता। जो आत्मायें मुक्ति में जा चुकी हैं, उनको आनंद देता रहता है। उसका यह काम होता है। बाकि जो ब( आत्माऐं हैं, वे प्रलय अवस्था में पड़ी रहती हैं, सोती रहती हैं, विश्राम करती है। ईश्वर बिल्कुल निठल्ला नहीं होता, वो काम करता रहता है। उस समय उसका थोड़ा काम तो घट ही जाता है, क्योंकि तब उसको सृष्टि चलाने का भार नहीं रहता। लेकिन आप ऐसा मत समझिये, कि उसकी मुसीबत छूट गई। इतने दिन छुट्टी हो गई। दरअसल, ऐसा नहीं है। वो सृष्टि चला दे, तब भी उसे भार नहीं पड़ता। सहज स्वभाव से बड़ी आसनी से वो सृष्टि का संचालन करता है। जैसे हम आँखें झपकाते रहते हैं, दिन भर आँख झपकाते हैं, कोई भार लगता है क्या? पता भी नहीं चलता। तो भगवान के लिए सृष्टि का संचालन करना ऐसा ही काम है। जैसे हम श्वास-प्रश्वास लेते-छोड़ते हैं। कोई भारी काम नहीं है। इसीलिए भगवान को कोई फर्क नहीं पड़ता। सृष्टि हो या प्रलय हो, उसको कोई भार नहीं लगता। बस इतना है, कि सृष्टि चलती है, जीवात्मा को कर्मफल देता है, सृष्टि की व्यवस्था करता रहता है। और अगर प्रलय हो जाती है, तो मुक्त आत्माओं को आनंद देता रहता है। उसको कोई फर्क नहीं पड़ता। सृष्टि या प्रलय होने पर हमको फर्क पड़ता है।

(94) शंका :- मोक्ष की अवस्था में जीवात्मा को देखने, सुनने आदि के लिए, नेत्र, श्रोत्र बिना शरीर कैसे मिलते हैं?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

आत्मा के पास अपनी देखने,सुनने की शक्तियाँ हैं, परंतु वो बहुत कमजोर हैं। केवल अपनी शक्तियों से वो देख-सुन नहीं पाता। जब बंधन में आता है, तो प्राकृतिक शरीर की सहायता से, इन्द्रियों से वो काम करता है। जीवात्मा जब मोक्ष में जाता है, तो ईश्वर उसको अपनी शक्ति देता है। जैसे छोटा बच्चा चल नहीं पाता, तो माँ उसको गोद में उठा लेती है। और माँ की गोद में बैठकर फिर वह यात्रा करता है। उसके पास शक्ति कम है, इसलिए तब माँ उसकी सहायता करती है, और उसका काम पूरा हो जाता है। ऐसे ही ईश्वर आत्मा को मोक्ष में देखने के लिए, सुनने के लिए, सारे काम करने के लिए अपनी शक्ति दे देता है।

(95) शंका :- सृष्टि केवल एक है या बहुत सारी हैं?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

वैसे तो ‘सृष्टि’ शब्द का अर्थ ही पूरा ‘ब्रह्मंड’ है। पूछना यह चाहिए था, कि सौर मंडल एक है, या बहुत सारे हैं। सृष्टि तो एक ही है। पूरा ब्रह्माण्ड एक सृष्टि है। इसमें बहुत सारे सौर मंडल हैं। उनमें से एक हमारा यह सौर मंडल है, जिसमें हम रहते हैं। एक सूर्य और उसका परिवार, यह हुआ एक सौर मंडल। अरबों तारे त्र (अरबों सूर्य( और उनके परिवार। यानि अरबों की संख्या में सौर मंडल एक आकाशगंगा में हैं। और ब्रह्माण्ड में ऐसी-ऐसी अरबों आकाशगंगाऐं हैं। तो इतना विशाल यह ब्रह्माण्ड है। इसे हम समग्रतः सृष्टि कह सकते हैं। सृष्टि शब्द से संपूर्ण ब्रह्माण्ड का ग्रहण हो जाएगा। पूरी सृष्टि एक ही है।

(96) शंका :- जीवात्मा निराकार है या साकार? इस प्रश्न के उत्तर में आपने जीवात्मा को निराकार बतलाया था और कहा था कि वो चेतन है। जो चेतन होता है, वो निराकार होता है और जो जड़ होता है वो साकार होता है। अब प्रश्न बना कि ईश्वर निराकार होने से एक है, परंतु जीवात्मा निराकार होने से अनेक क्यों है? क्या कठोपनिषद् के आचार्य ने जीवात्मा को आकारवान माना है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

निराकार होने से वो वस्तु एक ही होगी, ऐसा कोई नियम नहीं है, और न ही मैंने ऐसा बताया। निराकार होने से वो चेतन है, यह तो मैंने बताया था। ईश्वर निराकार है, वो चेतन है। जीवात्मा निराकार है, वो भी चेतन है। ये दोनों निराकार हैं, दोनों चेतन हैं। दूसरी बात यह है कि- निराकार वस्तु एक भी हो सकती है, अनेक भी हो सकती हैं। जीवात्मा अनेक हैं और ईश्वर एक है। ईश्वर स्वभाव से एक है और जीवात्मा स्वभाव से अनेक हैं। जिस वस्तु का जो स्वभाव होता है, उसके स्वभाव पर ‘क्यों’ का प्रश्न करना अनुचित है। स्वभाव है, सो है। स्वभाव का मतलब क्या हुआ? ‘स्व’ ‘भाव’, यानि उसकी ओरीजिनैलटी, वो उसका स्वभाव है। अनादिकाल से उसका वैसा ही धर्म है। जो है सो है, अब हम उसमें तोड़-मरोड़ कैसे कर सकते हैं। हमने कहा था- जो निराकार है, वो चेतन है, जिसका आकार है, वो जड़ है। बताइये नियम कहाँ टूटा। पृथवीजड़ है, पृथवी का आकार है, कहाँ नियम टूटा। वायु और आकाश भी जड़ हैं। उनका आकार भी सूक्ष्म है, हम इनको आँखों से देख नहीं सकते। वायु और आकाश तो स्थूल भूत हैं। अभी इससे छोटी सूक्ष्म चीजें और बहुत सारी हैं। मन है, इन्द्रियाँ हैं, बु(ि है। बिल्कुल नीचे चले जाओ, सत्त्व, रज और तम नामक प्रकृति के मूल तत्त्व, वो भी साकार हैं। पर उनमें आकार सूक्ष्म है। इनको आँखों से नहीं देख सकते, माइक्रोस्कोप से भी नहीं देख सकते। फिर भी वो साकार हैं। सत्यार्थ-प्रकाश में महर्षि दयानंद जी ने लिखा है- यदि प्रकृति निराकार होती, तो उस निराकार प्रकृति से साकार जगत कैसे बनता? जगत साकार है या निराकार? साकार है न। जब साकार जगत है तो प्रकृति भी साकार होगी। जैसे गुण कारण द्रव्य में होते हैं, वैसे कार्य द्रव्य में आते हैं। यह नियम है। प्रकृति साकार है इसलिये जगत साकार है। भले ही प्रकृति का आकार सूक्ष्म है, वो हमको इन आँखों से नहीं दिखता, तो भी साकार है। आत्मा एक नहीं अनेक है, पर वो निराकार होने से चेतन है। और ईश्वर भी निराकार होन से चेतन है। सूक्ष्म शरीर जड़ है। वो निराकार नहीं है। वह साकार है। पर वो सूक्ष्म इतना है, कि हम आँख से नहीं देख पाते। जिन चीजों को हम आँख से देख नहीं पाते, उनको मोटी भाषा में निराकार कह देते हैं। वास्तव में वो पूरी तरह निराकार नहीं है। पूरी तरह निराकार वस्तुयें वो ही हैं, जो ‘चेतन’ वस्तुएं हैं।
।प्रकृति साकार है। परन्तु जड़ होने से वह बन्धन का अनुभव नहीं करती। इसलिये प्रकृति की मुक्ति का कोई प्रश्न ही नहीं है। जीवात्मायें निराकार हैं और वे बंधन में आती रहती हैं। इसलिये उनको मुक्ति की आवश्यकता पड़ती है। ईश्वर निराकार है, परन्तु योगदर्शन व्यास-भाष्य में लिखा है, कि ईश्वर तो हमेशा से ही मुक्त है। वो बंधन में आया ही नहीं। इसलिए उसके लिये कैसे कहेंगे, कि उसको मुक्ति की आवश्यकता है। उसको आवश्यकता नहीं है, वो पहले से ही मुक्त है। अनादिकाल से मुक्त है, आज भी मुक्त है और आगे अनंतकाल तक मुक्त रहेगा। इसलिये ईश्वर को तो मुक्ति की आवश्यकता नहीं है। जीवात्माओं को ही मुक्ति की आवश्यकता है, क्योंकि वो बंधन में आते रहते हैं।

(97) शंका :- जब शरीर जड़ है, तो इसकी पीड़ा हमें क्यों होती है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

अच्छा जब आपकी कार टूटती है तो किसको पीड़ा होती है? मकान गिर जाता है, तो किसको पीड़ा होती है? आपको ही होती है न। वो जड़ है। जड़ मकान टूटने पर, जड़ कार के टूटने पर भी आपको पीड़ा होती है। इसलिये होती है कि क्योंकि आपका उससे कोई संबंध है। और जापान में भूकंप आये, पाकिस्तान में भूकंप आये तब पीड़ा नहीं होती। क्योंकि उससे आपका संबंध नहीं है। यहाँ सवाल जड़ और चेतन का नहीं है, सवाल तो संबंध का है। जिस वस्तु से हमारा संबंध है, उस वस्तु के टूटने-फूटने, नष्ट होने पर हमको कष्ट होता है, वो वस्तु चाहे जड़ हो, चाहे जो भी हो। मकान जड़ है, कार भी जड़ है, वो टूट जाते हैं तो पीड़ा होती है, क्योंकि वो हमारी कार है। ऐसे ही यह शरीर हमारा है। शरीर जड़ है, और शरीर में चोट लगती है तो हमको कष्ट होता है। कष्ट तो चेतन को ही होना है। जड़ वस्तु तो सुख-दुख को महसूस करती नहीं। चेतन हैं हम (आत्मा(, इसलिए हमको ही कष्ट होता है। तो अब शरीर को जो सामान्य चोट लगती है, उतना कष्ट तो हम सहन भी कर लेंगे। पर ज्यादा गहरी चोट लगेगी, तो उस कष्ट को रोकने का हमारा सामर्थ्य नहीं है। इसलिये हमको न चाहते हुए भी वो कष्ट भोगना पड़ता है। जैसे- सर दुख रहा है, पेट दुख रहा है, बुखार आ गया, तो उस कष्ट को हम रोक नहीं पाते, जीवात्मा में इतनी शक्ति नहीं है। इसलिये उसको भोगना पड़ता है। और फिर दवाई-चिकित्सा करते हैं तो वो रोग हट जाता है, वो कष्ट मिट जाता है। सार यह हुआ – शरीर के साथ हमारा संबंध होने के कारण हमें पीड़ा होती है।

(98) शंका :- जैसे कार आदि जड़ वस्तु और आँख, हाथ आदि अपने जड़ अंगों को एक बार नियंत्रित करने पर, वो पर्याप्त समय तक नियंत्रित रहते हैं। परंतु मन, जो कि जड़ है, उसको एक बार नियंत्रित करने पर भी वो बार-बार अनियंत्रित होकर हमारे ध्यान में बाधा डालता ही रहता है, ऐसा क्यों? कृपा करके समझा दें?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

एक व्यक्ति कार चला रहा है। और वो कार चलाते-चलाते एक्सीलेटर पर पाँव रखता है। और एक्सीलेटर को थोड़ा दबाता है तो कार भागती है। फिर पाँव थोड़ा पीछे खींच लेता है, तो स्पीड कम हो जाती है। और वो बार-बार ऐसे एक्सीलेटर दबाता रहे तो कार फिर ऐसे ही चलेगी न। झटके मार-मार के, फिर चलेगी, फिर स्लो हो जायेगी, फिर चलेगी, फिर स्लो हो जायेगी। अब बताइये, इसमें किसका दोष है। कार का दोष है , कि ड्रायवर का दोष है। तो आप मन को ऐसे ही करते रहते हैं। उसको बार-बार एक्सीलेटर देते रहते हैं। और कहते हैं -साहब, यह ज्यादा परेशान करता है। वास्तव में मन परेशान नहीं करता है। आप ही उसको भगाते रहते हैं। आप उसमें विचार उठाते रहते हैं, वो भागता रहता है। जैसे ‘कार’ जड़ है वैसे ही ‘मन’ जड़ है।
स गलती हमारी है। हमने मन को ठीक तरह से चलाना सीखा नहीं। अब मन को चलाना भी सीख लीजिये और मन को रोकना भी सीख लीजिये। तो यह समस्या हल हो जायेगी। मन कैसे चलता है, मन में विचार कैसे आते हैं। पहला कारण है- ‘इच्छा’ और दूसरा कारण है- ‘प्रयत्न’। तो लोग जब ध्यान में बैठते हैं, वो मन में दुनिया भर की इच्छायें पैदा करते रहते हैं। कपड़े खरीदने हैं, शॉपिंग में जाना है, फलानी पार्टी में जाना है, बच्चे की स्कूल की फीस भरनी है, कोर्ट में झगड़ा चल रहा है। वो तरह-तरह की इच्छायें पैदा करते रहते हैं। और फिर उन बातों का याद करने का प्रयत्न करते रहते हैं। इच्छा करते रहते हैं, प्रयत्न करते रहते हैं, तो मन में विचार उठते रहते हैं।
स आप उन सब बातों को याद करने की इच्छा को बंद कर दो। और उन सब बातों को याद करने का प्रयत्न बंद कर दो। इच्छा भी नहीं करनी, प्रयत्न भी नहीं करना। इस तरह कोई विचार नहीं आयेगा। मन बिल्कुल आपकी इच्छा के अनुसार चलेगा।
स अगर एक मिनट का प्रयोग करना हो तो अभी कर लो। हाँ जी करेगें। आप आसन लगाइये, कमर सीधी, गर्दन सीधी, आँखे बंद। पूरी सावधानी के साथ मेरी बात को सुनें, और मन में वैसा ही सोचने का प्रयत्न करें। कल्पना कीजिये, आप अपने घर में बैठे हैं। अपने ड्राइंग रूम में, जहाँ आपके अतिथि लोग आकर बैठते हैं, उस कमरे में बैठे हैं। आपके सामने टेबल पर अखबार पड़ा है। आपने अखबार उठाया और उसकी हेडलाइन पढ़नी शुरू की। कश्मीर में बम विस्फोटः चार मृत, अठारह घायल। दूसरा समाचार- महाराष्ट्र के एक गाँव में चोरी। पाँच लाख की संपत्ति चोर लूट कर ले गये। आपने समाचार पढ़ा। इतने में दरवाजे पर घंटी बजी। आपने अखबार छोड़ दिया, उठकर के बाहर गये, दरवाजा खोला। आपके एक मित्र आये। आपने उनको नमस्ते किया, कहा-आइये, स्वागत है, बहुत दिनों बाद मिले। उनको प्रेम से अंदर लेकर आये। वहीं पर बैठाया, ड्राइंग रूम में। हालचाल पूछा, सब ठीक-ठाक है? हाँ ठीक-ठाक है। फिर उनको बैठाकर आप रसोई में गये। एक डिब्बे में से आपने चार लड्डू निकाले, प्लेट में लड्डू रखे। दो गिलास पानी भरा, और ट्रे में पानी का गिलास और लड्डू की प्लेट ले आये। उन आये हुये मित्र को लड्डू खिलाया, एक लड्डू मित्र ने खाया, एक लड्डू आपने खाया। दोनों ने थोड़ा-थोड़ा पानी पिया। दस मिनट कुछ बातचीत हुई, कुछ चर्चा हुई, उसके बाद वो मित्र जाने लगे। तो आपने प्रेम से विदाई दी। और उनको बाहर दरवाजे तक छोड़कर आये। बस, अब आप आँखें खोल सकते हैं। अब बताइये, आपने अपने मित्र को लड्डू खिलाया, कि नहीं खिलाया। खिलाया। और आपने खाया कि नहीं खाया, खाया न। अब बताइये, दूसरा विचार क्यों नहीं आया। अब नहीं आया न। अब वही विचार आया। अब तो दूसरा विचार नहीं आया। और ध्यान में दूसरा विचार क्यों आता है।
स कारण पहले मैं बता चुका हूँ। लड्डू खाने में रूचि है, ईश्वर में रूचि नहीं है, गड़बड़ी यह है। लड्डू खा रखा है, पानी पी रखा है, मित्र को देख रखा है, अपना घर भी मालूम है, ड्राइंग रूम भी पता है, न्यूज पेपर भी रोज पढ़ते हैं। इन सब से हम परिचित हैं और इन चीजों में, कार्यों में खूब रूचि है। इसलिये वहाँ पर मन खूब लगता है। और ईश्वर में रूचि नहीं, ईश्वर का महत्व नहीं जानते, ईश्वर के प्रति श्र(ा कम है, इसलिये ईश्वर का विचार मन में नहीं टिकता है। तो इस प्रयोग से पता चला, कि हमारी इच्छा से, हमारे प्रयत्न से ही मन में विचार उठते हैं। बस, तो ईश्वर के प्रति इच्छा पैदा करो, ईश्वर के प्रति रूचि बनाओ और उसको स्मरण करने का प्रयत्न करो। तो यह मन ठीक-ठाक चलेगा। कार की तरह चलेगा। फिर दूसरी बात नहीं उठायेंगे, ईश्वर की बात उठायेंगे।

(99) शंका :- क्या ईश्वर दयालु है और हम सबका भला चाहता है, तो उसने जीव को काम करने में स्वतंत्र क्यों बनाया? उसने सभी को सुबु(ि क्यों नहीं दी, ताकि कोई बुरा काम कर ही न सके?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

प्रश्न है, कि ईश्वर ने हमको स्वतंत्र क्यों बनाया? इसका उत्तर यह है कि ईश्वर ने हमको स्वतंत्र नहीं बनाया है। बल्कि जीवात्मा स्वभाव से ही स्वतंत्र है। ईश्वर ने उसको छूट नहीं दी है। वह अनादिकाल से स्वतंत्र है। जब वह स्वभाव से स्वतंत्र है तो ईश्वर उसकी स्वतंत्रता में बाधक क्यों बने? यह तो अन्याय है। जो अनादिकाल से हमारा गुण-कर्म- स्वभाव है, ईश्वर उस पर लगाम (ब्रेक( क्यों लगाये, उस पर प्रतिबंध क्यों लगाये? तो जीव स्वभाव से स्वतंत्र है, इसीलिये वो स्वतंत्रता से कर्म करता है।
स हाँ, फल भोगने में वो परतंत्र है। इसलिये वेद में ईश्वर क्या कहता है कि- ”सच बोलो, झूठ मत बोलो, चोरी मत करो, दान दो, सेवा करो, परोपकार करो, अच्छे काम करो”। यह सब ईश्वर का आदेश नहीं है, बल्कि ये उसके सुझाव (सजेशन( हैं। ईश्वर कहता है ये अच्छे काम हैं, इन्हें करो। और ये बुरे काम हैं, इन्हें मत करो। अच्छे करोगे, तो ‘ईनाम’ दूँगा। बुरे करोगे, तो ‘दंड’ दूँगा। आपकी इच्छा है, जो चाहे सो करो। इस तरह फल भोगने में आप परतंत्र हैं।
स अगर ऐसे ईश्वर हमको स्वतंत्र ही न छोड़े, हमारी स्वतन्त्रता पर प्रतिबंध लगा दें, तो फिर हम बुरे काम कर ही नहीं पायेंगे। और बुरे नहीं कर पायेंगे, तो फिर सृष्टि बनाने का उद्देश्य ही क्या रहा? अगर एक विद्यार्थी को कहा जाय, कि आप यहाँ बैठो और तीन घंटे परीक्षा दो और परीक्षा में हम जो कहेंगे, वो ही लिखना है, अपनी मर्जी से कुछ नहीं लिखना। तो बताइये परीक्षा का लाभ क्या रहा, परीक्षा का उद्देश्य ही क्या रहा? जब कोई उद्देश्य ही नहीं रहा, तो सब बेकार है। तो फिर परीक्षा क्यों हुई? जब विद्यार्थी अपनी मर्जी से कुछ लिख ही नहीं सकता, तो फिर परीक्षा व्यर्थ हुई? यही तो परीक्षा है, कि उसको छूट दी जाये। वो जो चाहे सो लिखे, बाद में अगर गलत लिखा पायेगा, तो आप उसके नंबर भले ही काट लेना, पर उसको अभी तो लिखने दो, तभी तो वो परीक्षा है। इसलिये संसार में, यह जीवन भी एक परीक्षा है। जैसे कॉलेज और स्कूल की तीन घंटे की परीक्षा होती है। ऐसे ही यह जीवन की भी तीन घंटे की परीक्षा है। स्कूल, कॉलेज की परीक्षा में तीन घंटे (180 मिनिट( का समय होता है। जबकि हमारे जीवन की परीक्षा में घंटा कई वर्षों का होता है।
स पहला घंटा- बचपन है, दूसरा घंटा- जवानी है, और तीसरा घंटा- बुढ़ापा है। उसके बाद मृत्यु की घंटी बजने वाली है। उसके बाद नंबर मिलेंगे। अच्छे उत्तर लिखे अर्थात् अच्छे कर्म किये, तो अच्छा जन्म, और बुरे उत्तर लिखे अर्थात् बुरे कर्म किये, तो बुरा जन्म मिलेगा। स्कूल की परीक्षा में ईश्वर वाली परीक्षा में एक और अन्तर भी है। स्कूल की परीक्षा में तीन घंटे पूरे होने के बाद परीक्षा पूरी हो जाती है। तब घंटी बजती है। घंटी के बाद गणना (मार्किंग( होती है। बीच में मार्किंग नहीं होती। तीन घंटा जब तक पूरा न हो जाये तब तक नंबरिंग नहीं होती। परन्तु जीवन की परीक्षा में तो बीच में भी मार्किंग होती है। बीच में ही नम्बर मिलने शुरू हो जाते है। तात्पर्य है कि चालू (इसी( जीवन में ही कुछ कर्मों का फल मिलना शुरू हो जाता है। बचे हुये कर्मों का फल अगले जन्मों में धीरे- धीरे मिलता रहता है। जैसे ईश्वर की फल देने की व्यवस्था होती है, उसी के अनुसार फल मिलता रहता है। इसलिये ईश्वर ने हमको ‘स्वतंत्र’ छोड़ रखा है। वो हमारा स्वाभाविक धर्म है, हमारा स्वाभाविक अधिकार है। ईश्वर सबको अच्छी बु(ि देता है। सुझाव तो अच्छा ही देता है। फिर हमारी मर्जी है, हम उसे सुनें या नहीं सुनें।

(100) शंका :- क्या ब्रह्माण्ड में इस दुनिया के अलावा कहीं और भी ऐसी दुनिया है, जैसी इस पृथ्वी पर है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

बिल्कुल है। इसमें कोई शंका नहीं है।
स सत्यार्थ प्रकाश के आठवें समुल्लास में इस बारे में लिखा है। ईश्वर सर्वज्ञ है। सर्वज्ञ का कोई भी कार्य व्यर्थ नहीं होता। आप और हम, जो थोड़ी-बहुत बु(ि रखते हैं, जब भी कोई काम करते हैं, तो सोच-समझकर करते हैं। हम कोई फालतू काम नहीं करते। अगर कोई काम करने से कुछ भी लाभ नहीं है, तो हम बिल्कुल नहीं करेंगे। जब हम इतनी छोटी बु(ि रखने वाले होकर भी, व्यर्थ में कोई काम नहीं करते, तो इतनी बड़ी सृष्टि बनाने वाला सर्वज्ञ ईश्वर ऐसा क्यों करेगा। ब्रह्माण्ड में अरबों-खरबों आकाशगंगायें हैं। एक-एक आकाशगंगा में खरबों-खरबों तारे हैं, उनके अपने-अपने सोलर सिस्टम्स है। तो सवाल उठता है, कि इतनी लंबी-चौड़ी दुनिया जो ईश्वर ने बनाई है, क्या यह व्यर्थ में बनाई है? अगर यहाँ प्राणी न रहते हों, तो इतनी बड़ी सृष्टि बनाना व्यर्थ है। हमारे इस सौर मंडल में कम से कम एक पृथ्वी पर तो जीवन है। यह प्रत्यक्ष दिख रहा है। मंगल पर जीवन नहीं मिला, बृहस्पति पर नहीं मिला, शुक्र पर नहीं मिला, बुध पर नहीं मिला, शनि पर नहीं मिला, न सही। विभिन्न ग्रहों में से एक ग्रह ‘पृथ्वी’ पर तो जीवन है। तो इसी हिसाब से अनुमान लगा लीजिये कि जैसे इस एक सौरमंडल में कम से कम एक पृथ्वी पर जीवन है। ऐसे ही प्रत्येक सौरमंडल में कम से कम एक ग्रह में तो निःसंदेह जीवन होना ही चाहिये, अन्यथा वो बनाना व्यर्थ है। तो अनुमान-प्रमाण से सि( होता है, कि और भी करोड़ों अरबों पृथ्वियाँ हैं। वहाँ भी हमारे जैसे ही मनुष्य, पशु-पक्षी, आदि प्राणी रहते होंगे। वहाँ भी इसी ईश्वर का शासन चलता होगा। वहाँ भी ऐसे ही चार ‘वेद’ होंगे, जैसे हमारी इस धरती पर है।

(101) शंका :- किसी को मारना जीव-हत्या कहलाती है। कीड़े, मच्छर, मक्खियाँ जानबूझकर या अनजाने में मारे जाते हैं, तो क्या ये भी जीव-हत्या कही जाएगी?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

हाँ, बिल्कुल कही जायेगी, क्यों नहीं कही जाएगी। आप मक्खी, मच्छर मारेंगे, तो फिर हत्या तो कही ही जायेगी। ध्यान में बैठते हैं, एक मक्खी आ गई। कान में गुनगुनाती है, तो आप हटा देते हैं। फिर बैठते हैं, तो वो फिर आती है। मक्खी में इतनी बु(ि थोड़ी है, कि आप हटाना चाहते हैं, तो वो हट जाए। वो तो बार-बार आती है। फिर व्यक्ति को गुस्सा आता है, तो वो फिर क्या करता है? सोचता है- अच्छा देखता हूँ कि वो फिर कैसे आती है। अब मक्खी आई, यूं मारेगा। मच्छर आया, यूँ मारेगा। वो हिंसा है, पाप है। चाहे जानबूझकर मारे, चाहे अनजाने में मारे, पाप तो पाप ही है। अनजाने में किए गए पाप का दंड थोड़ा कम होता है। जानबूझकर करेंगे, तो दंड अधिक मिलेगा। अरे, मक्खी परेशान करती है, तो हटा दो। आप कमरे में मक्खी-मच्छर को क्यों आने देते हैं। कमरे मे जाली लगाओ। दरवाजे बंद रखो। खिडकी में जाली लगाओ। मच्छरदानी लगाओ, मच्छर नहीं आने दो। उसका उपाय करो। मारेंगे तो हिंसा होगी, पाप लगेगा।
अगर बिना मारे काम चलता है, तो क्यों मारें। हमारी आदत खराब हो जाएगी। जानबूझकर मारेंगे, क्रोधपूर्वक मारेंगे, तो निःसंदेह हिंसा के भागी बनेंगे। दुष्ट को दंड देने का विधान जरूर है, पर यदि आपने क्रोधपूर्वक दंड दिया, तो आप हिंसक हो जाऐंगे। न्यायाधीश जो दंड देता है, वो क्रोध करके नहीं देता। दुष्ट को दंड देता है, पर बिना क्रोध किए। ऐसे ही आप मक्खी को हटा दें। बिना क्रोध किए। मच्छर को हटा दें। और कभी बहुत समझाने के बाद भी मच्छर नहीं मानता। बार-बार समझा दिया, मच्छर हटता ही नहीं। मक्खी को समझा दिया, लेकिन वो हटती ही नहीं। अब उसको दंड देना है। मान लो, चलो मारना ही है, तो बिना क्रोध किए मारो, तब तो ठीक है। जब आप क्रोध में आ के मारते हैं, तो हिंसा हो जाती है। अपने स्वभाव को बिगड़ने नहीं देना। क्रोध मत करना। क्रोध पूर्वक नहीं मारना। अब ऐसा करने में आपको कई साल लग जायेंगे। करो परिश्रम, क्रोध को जीतने के लिये।

(102) शंका :- जब हम वैदिक गणना के अनुसार इस संसार की आयु एक अरब 96 करोड़, इतना वर्ष कहते हैं, तो यह गणना हमारी पृथ्वी अर्थात् सौरमंडल की है अथवा समस्त दृश्य-अदृश्य ब्रह्माण्ड की?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

इसका उत्तर है, इस पृथ्वी की गणना तो यह है ही। इस पृथ्वी को उत्पन्न हुये इतना समय हो गया। महर्षि दयानंद जी के ग्रन्थों को देखने से पता चलता है, कि महर्षि दयानन्द जी पूरे ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति एक साथ मानते हैं और पूरे ब्रह्माण्ड की प्रलय भी एक साथ मानते हैं। )ग्वेद भाष्य-भूमिका आदि जो ग्रंथ हैं, उनके आधार पर ऐसा लगता है, कि यह सारे ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का काल है।

(103) शंका :- ईश्वर, उपासना करना कठिन लगता है। जबकि हम दिनभर मन में सांसारिक बातें खूब सोचते हैं। वह सरल लगता है। ऐसा क्यों है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

हम जिस कार्य का अधिक अभ्यास करते हैं, वो कार्य हमारे लिये सरल हो जाता है। आपने देखा होगा कि कुछ लोग शारीरिक कार्य करते हैं, कोई पैकिंग का कार्य करता है। फटाफट वस्तु उठाई, डिब्बे में डाली। डिब्बे में पैक की और भेज दी। मातायें स्वेटर बुनती हैं, उनको अभ्यास हो जाता है तो फटाफट स्वेटर बुनती हैं, जल्दी-जल्दी सलाई चलती है। तात्पर्य है- जिस कार्य को हम अभ्यास में ले आते हैं, वो कार्य तीव्रता और सरलता से होता है। और जिस कार्य का अभ्यास नहीं होता, वो कार्य मंद गति से होता है और कठिन लगता है। जब कहा जाता है कि- मन में मंत्रोच्चारण करो, वेद मंत्रों को याद करो, ईश्वर की उपासना करो। आपने इसका अभ्यास बहुत कम किया है, इसलिये आपको यह कठिन लगता है। और मन में दिनभर उल्टे- सीधे विचार करते रहते हैं, उसका अभ्यास सारे दिन किया है। बहुत किया है, इसलिये वो सरल लगता है। तो चाहे अच्छी बात हो, या बुरी बात हो, मन में खूब तेजी से होती रहती है। सांसारिक बातें खूब चलती रहती हैं, इसलिए वो सरल लगती हैं। उसका लम्बे समय तक अभ्यास किया गया। और ईश्वर उपासना का, मंत्रोच्चारण का, उनके अर्थों को याद करने का अभ्यास नहीं किया, इसलिये वो कठिन जान पड़ता है। यह अंतर है दोनों में। यदि ईश्वर उपासना के मंत्रों का आप बार-बार अभ्यास करें, तो कुछ समय के बाद वो भी आपको सरल लगेंगे। फिर कठिनाई नहीं आयेगी, अभ्यास की बात है, और दूसरी बात है, वैराग्य की। संसार में राग-द्वेष बहुत अधिक है। वैराग्य है या नहीं। ईश्वर में रुचि है या बहुत कम है। इसलिये इश्वरोपासना करना कठिन लगता है। संसार में राग-द्वेष अधिक होने के कारण सांसारिक विचार उठाना सरल लगता है।

(104) शंका :- ईश्वर को पाने के लिए क्या यह आवश्यक है कि संध्या, उपासना आदि संस्कृत में बोलकर की जाये। अब अगर वेद हिन्दी में लिखे गये हैं, तो मंत्र भी हिन्दी में होंगे। इसलिए संध्या उपासना भी क्या हिन्दी में की जा सकती है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

आदि सृष्टि में ईश्वर ने संस्कृत भाषा में वेदों का ज्ञान दिया। वेद संस्कृत में थे। तब एक ही भाषा थी, दूसरी कोई भाषा नहीं थी। उस समय संस्कृत में ही लोग बोलते थे, संस्कृत में ही व्यवहार करते थे, संस्कृत में ही वेद मंत्रों के आधार पर ईश्वर की उपासना चलती थी। अब भले ही उसके हिन्दी भाष्य बन गये हैं। परन्तु मूल, मूल ही होता है और भाष्य, भाष्य ही होता है। ईश्वर उपासना मूल मंत्रों से संस्कृत में ही की जानी चाहिए। बाद में आप हिन्दी अनुवाद भले ही कर लें। अगर मूल संस्कृत छूट गई, तो मूल मंत्र छूट जायेगा। और यदि मंत्र छूट गया, तो किसी भी उपासना करने वाले को उपासना करनी ही नहीं आयेगी, वो भटक जायेगा। पंडित गंगाप्रसाद उपाध्याय जी ने अपनी एक पुस्तक में विदेश की घटना लिखी है। विदेश में एक गड़रिया भेड़, बकरी चराने वाला था। और वो बड़ा ईश्वर भक्त था। वहां ठंड बहुत होती थी। वो ओवरकोट पहनकर के भेड़ चराने बाहर जाता था। एक दिन वो पहाड़ पर जाकर के भगवान से प्रार्थना कर रहा था- ”ऐ भगवान! मेरी बहुत इच्छा है, कि मैं तुम्हारी बहुत सेवा करूं। भगवान, तुम मुझे कभी मिल जाओ, तो तुम्हारी बहुत सेवा करूंगा। जैसे मैं इन भेड़-बकरियों को चराता हूँ। और इन भेड़-बकरियों में कीड़े भी होते हैं, और वो कीड़े मेरे कोट में चिपक जाते हैं। मैं उन्हें साफ करता रहता हॅूँ। तुम भी भेड़-बकरी चराते होगे, तुम्हारे भी कोट में कीड़े चिपक जाते होंगे। तुम मुझे कभी मिल जाओ, तो ऐसी सेवा करुँ, कि एकदम बढ़िया पूरा कोट साफ कर दूँ।” अब बताइये, संस्कृत वेद मंत्र छोड़ दिया, तो परिणाम क्या निकला। लोग क्या समझेंगे, कि भगवान भी हमारी तरह ही भेड़-बकरी चरा रहा है। इस तरह भगवान का ही स्वरुप समझ में नहीं आयेगा, और लोग भटक जायेंगे। इसलिए वेद मंत्रों से उपासना करनी चाहिए, ताकि पता चले, भगवान कोई भेड़-बकरी चराने वाला गड़रिया नहीं है। भगवान सर्वव्यापक है, सर्वशक्तिमान है, कभी शरीर धारण नहीं करता। तो ईश्वर का स्वरुप ठीक बचा रहेगा और उसकी उपासना ठीक हो सकेगी। इसलिए वेद मंत्रों से उपासना करनी चाहिए। आज जो लोग मूर्तियों की पूजा कब्रों की पूजा कर रहे हैं। यह वेद मन्त्रों से ईश्वर उपासना छोड़ देने का ही परिणाम है। देख लीजिये, संसार ईश्वर के सही मार्ग से भटके गया या नहीं!

(105) शंका :- किस प्रकार के कर्मों के आधार पर स्त्री या पुरूष का जन्म मिलता है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

भई ये पूरे-पूरे तो मुझे भी समझ में नहीं आये, तो मैं कैसे बताऊँ आपको कि कौन से कर्म करेंगे तो स्त्री बनेंगे, और कौन से कर्म करेंगे तो पुरूष बनेंगे। मुझे इतना समझ में आया कि बस अच्छे से अच्छा कर्म करो। अब भगवान बना देगा, जो बना देगा।
स कई लोगों के दिमाग में यह बात बैठी हुई है, कि स्त्री जन्म अच्छा है। कई लोगों के दिमाग में यह बात बैठी है, कि पुरूष जन्म अच्छा है। जो सत्य है, वो सत्य है। सत्य को जानना चाहिये, समझना चाहिये और सत्य को खुलकर स्वीकार करना चाहिये, उससे हमारी उन्नति होती है।
सवैसे तो स्त्री और पुरूष दोनों एक ही योनि में हैं, मनुष्य योनि में। मनुष्य योनि की दृष्टि से दोनों बराबर हैं। इसमें कोई ऊँचा-नीचा नहीं है। क्या स्त्रियों का बस में, रेल में आधा टिकिट लगता है और पुरूषों का पूरा लगता है? इस हिसाब से दोनों भारत के समान नागरिक हैं। सबको समान अधिकार है, वोट देने का अधिकार बराबर है। पाकिस्तान में स्त्रियों का आधा वोट है, वो मुझे पता है। वो गलत बात है। यह वेद के अनुसार अन्याय है। वेद में स्त्री और पुरूष दोनों को बराबर बताया है।
स हाँ, किसी व्यावहारिक दृष्टि से किसी-किसी क्षेत्र में स्त्रियाँ ऊपर हैं, पुरूष छोटे हैं। किसी क्षेत्र में पुरूष बड़े हैं तो स्त्रियाँ छोटी हैं। वो अलग-अलग क्षेत्र हैं। कौन सा क्षेत्र है इसमें? वेद कहता है- जब बालक के साथ माता-पिता का संबंध हो, तो माता बड़ी और पिता छोटा। माता का नंबर पहला, माता सबसे पहला गुरू है। अगर पहला गुरू बु(िमान हो, तो बच्चा बु(िमान बनेगा। और पहला गुरू ही मूर्ख हो तो बच्चा मूर्ख बनेगा। तो पहला गुरू माता है, तो माता का नंबर पहला। यहाँ पुरूष छोटा और स्त्री बड़ी। यह एक क्षेत्र है।
स और दूसरा क्षेत्र है, पति-पत्नी का। जब पति-पत्नी का आपस में संबंध हो, तो वहाँ पति बड़ा और पत्नी छोटी, वहाँ यह नियम है। अब बताइये क्या चाहिये आपको, एक तरफ ये (पुरूष( बड़े हैं, एक तरफ ये (स्त्रियाँ( बड़े हैं, दोनों बराबर हो गये, बात खत्म। झगड़ा-वगड़ा कुछ नहीं।
स हाँ, यह ठीक है। कहीं व्यावहारिक दृष्टि से कुछ समस्यायें पुरूषों के साथ कम हैं, और स्त्रियों के साथ कुछ अधिक हैं। कुछ हमारी जिम्मेदारियाँ रहती हैं व्यवहार की। तो उसमें स्त्रियों पर बंधन अधिक रहते हैं, पुरूषों पर उतने नहीं होते हैं। पुरूष तो अकेला घूम लेगा, खा लेगा, कहीं रात को दो बजे प्लेटफार्म पर सो जायेगा, कोई पूछने वाला नहीं। वो तो अकेला ही पूरे देशभर में घूम आयेगा। पर स्त्रियों को इतनी सुविधा नहीं है। उस दृष्टि से हमको स्वीकार करना पड़ता है। बाकी तो मनुष्यता की दृष्टि से दोनों बराबर हैं। इसमें कोई ज्यादा हीन भावना (इंफीरियरिटी कॉम्पलेक्स( की जरूरत नहीं है।
स स्त्रियाँ बेशक पढ़ सकती हैं। वेद में लिखा है, ‘सत्यार्थ-प्रकाश’ में लिखा है, महर्षि दयानंद जी ने लिखा- अगर ईश्वर का प्रयोजन स्त्रियों को पढ़ाने में न होता, तो इनके शरीर में आँख और कान क्यों रखता। वे भी वेद पढ़ सकती हैं, वे भी वैराग्य प्राप्त कर सकती हैं, वे भी संन्यास ले सकती हैं। पर वे संन्यास लेती नहीं, झगड़े करती हैं, संन्यास नहीं लेती, तो हम क्या करें। ये प्रायः झगड़ा ज्यादा करती हैं, राग-द्वेष ज्यादा करती हैं, पढ़ाई करती नहीं हैं, दोष इनका है। बाकी इनका चाँस पूरा है। छूट पूरी है, ये भी पढ़ें, वेद पढ़ें। ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् अर्थात् अथर्ववेद में लिखा है कि- ”कन्या को भी ब्रह्म्चर्य का पालन करके, वेद पढ़ने का पूरा अधिकार है। और विद्या पढ़कर फिर विवाह करना चाहिये।” तो छूट सबको है सारी। बाकी कोई करें या न करें, वो उसकी मर्जी।

(106) शंका :- मृत्यु के उपरांत मस्तिष्क भस्म हो जाता है, हृदय भी भस्म हो जाता है, फिर इसमें संस्कार कैसे संचित रह सकते हैं?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

ये जो ‘संस्कार’ जमा होते हैं वो ‘मन’ में होते हैं। मन ‘सूक्ष्म शरीर’ का भाग है। वो अलग है। और हमारा यह मस्तिष्क ‘स्थूल शरीर’ का भाग है। यह उससे अलग है। और यह हृदय भी स्थूल शरीर का भाग है। जब मृतक का अंतिम संस्कार करते हैं अर्थात् अग्नि-संस्कार करते हैं तो स्थूल शरीर वाला मस्तिष्क जल जायेगा, हृदय भी जल जायेगा, और पूरा स्थूल शरीर भी जल जायेगा पर ‘मन’ नहीं जलेगा। मन तो आत्मा के साथ अगले जन्म में चला जायेगा। सस्ंकार जमा हुये थे, आत्मा और मन में। इसलिये ‘संस्कार’ आत्मा और मन के साथ चले जाते हैं। इस प्रकार से संस्कार पुर्नजन्म में चले जायेंगे।

(107) शंका :- ईश्वर और जीव दोनों चेतन हैं। जीव में इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, क्रिया, सुख-दुःख आदि गुण हैं, क्या ईश्वर में भी ये गुण होते हैं?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

हाँ, देखिये विचार कर लेते हैं। ईश्वर में, इच्छा होती है। अच्छा तो यह बताइये, कि ईश्वर सृष्टि बनाता है तो बिना इच्छा के बनाता है क्या? आप जो मकान बनाते हैं, रोटी बनाते हैं, तो क्या बिना इच्छा के बनाते हैं, या इच्छा होने पर बनाते हैं? नहीं। जब आप इच्छा होने पर ही काम करते हैं तो ईश्वर भी इच्छा होने पर ही काम करता है।
स शास्त्रों में लिखा भी है कि ईश्वर में इच्छा होती है। पर वैसी इच्छा नहीं होती, जैसी कि जीवों की इच्छा होती है। ईश्वर की इच्छा में और जीवों की इच्छा में मूलभूत फर्क है। क्या अंतर है?
स जीवों की इच्छा दो प्रकार की होती है। एक, अपनी कमी को पूरा करने के लिये और एक, दूसरे के भले के लिये। जीवों को आनंद चाहिये, सुख चाहिये, रोटी चाहिये, कपड़ा चाहिये, मकान चाहिये। कुछ कमी है हमारे पास, इसलिये हमको अपनी कमी की पूर्ति करने के लिये भी इच्छा होती है और दूसरों की सेवा के लिये भी हमारी इच्छा होती है। हम दूसरों की सेवा भी करते हैं।
स ईश्वर में दो तरह की इच्छा नहीं है। ईश्वर में केवल एक ही प्रकार की इच्छा है- कौन सी? दूसरों के भले की। पहले वाली इच्छा ईश्वर में नहीं है। क्योंकि ईश्वर में स्वयं में कोई कमी नहीं है। जब कमी ही नहीं है तो कमी को पूरा करने का प्रश्न ही कहाँ से आयेगा। परंतु ईश्वर में इच्छा तो है। ईश्वर में परोपकार की इच्छा है। ईश्वर सबका भला करना चाहता है। ‘ईश्वर क्या चाहता है’, सत्यार्थ प्रकाश में इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है, कि ईश्वर सबके लिए सुख और सबकी उन्नति चाहता है।
स क्या ईश्वर में द्वेष भी है। जी हाँ। परन्तु द्वेष क्या होता है, पहले इसको समझ लीजिये। अनिच्छा का नाम द्वेष है। मैं यह चीज नहीं चाहता, मुझे इसकी इच्छा नहीं है, इसका नाम है- द्वेष। तो ईश्वर को पाप-कर्मों से द्वेष है। समझ में आया। क्या ईश्वर पाप करना चाहता है? नहीं चाहता। तो ईश्वर को पाप से, अन्याय से, बुराई से इन सब चीजों से द्वेष है।
स ध्यान दीजियेगा, द्वेष दो प्रकार का होता है। एक द्वेष ऐसा होता है जिससे व्यक्ति दुःखी हो जाता है। और एक द्वेष ऐसा होता है जिससे व्यक्ति दुःखी नहीं होता। एक मनुष्य को एक कुत्ते ने काट लिया, तो उस मनुष्य को कुत्ते से द्वेष होता है, उस पर क्रोध आता है, गुस्सा आता है और वह उससे परेशान रहता है, उससे बदला लेने की बात सोचता है, दुःखी होता है। मनुष्य ऐसे दुःखी हो जाता है। ईश्वर ऐसे दुःखी नहीं होता। ईश्वर का द्वेष दूसरे प्रकार का है। बस वो यह चाहता है, कि मनुष्य को पाप नहीं करना चाहिये, बुराई से बचना चाहिये। बस, इतना ही उसमें द्वेष है। लेकिन इस द्वेष के कारण ईश्वर दुःखी नहीं होता।
स टाइमिंग ईश्वर ने डिसाइड की है कि इतने समय के बाद में प्रलय करूँगा, और इतने समय के बाद दोबारा सृष्टि बनाऊँगा। वो ईश्वर बनायेगा, अपने आप होगा नहीं, ईश्वर करेगा। जैसे हम अपनी योजना बनाते हैं। कल हम ये काम करेंगे, परसों ये काम करेंगे, एक वर्ष तक ये जॉब करेंगे, फिर अगले वर्ष ये जॉब करेंगे। और जैसे हम अपनी योजना बनाते हैं, वैसे ही ईश्वर भी अपनी योजना बनाता है।
स साइंस वालों में और आध्यात्म वालों में यही तो फर्क है। साइंस वाले कहते हैं- सृष्टि बनती है। हम कहते हैं- नहीं, सृष्टि बनती नहीं है बनाई जाती है। ईश्वर का द्वेष दुःखदायक नहीं है। जो स्वभाव से उसका गुण है, वो तो रहेगा।
स सोचियेगा, चिंतन कीजियेगा, जरूरी नहीं है, कि सारी बात आज ही समझ में आ जायेगी। जो बात मुझे चालीस साल में समझ में आई, वो बात आपको चालीस मिनट में कैसे समझ में आ जायेगी? आपको भी मेहनत करनी पड़ेगी, तब जाकर समझ में आयेगी।
स दरअसल जो ईश्वर की इच्छा है, उस बारे में स्वामी दयानंद जी का अभिप्राय स्पष्ट है। पर लोग इसका उल्टा अर्थ यह करते हैं-‘हे ईश्वर! अब मैंने काम किया सो किया, अब मैं मर रहा हूँ, तो तुम्हारी यही इच्छा है, कि मैं मर जाऊँ, तो बस ठीक है, मैं मरता हूँ। तुम्हारी ये इच्छा पूरी हो।’ लोग ऐसा अर्थ करते हैं, यह गलत है। ईश्वर की इच्छा नहीं थी कि स्वामी दयानंद जी मर जायें। ईश्वर की इच्छा थी, कि वेद का प्रचार होना चाहिये, और स्वामी दयानंद जी तो वेद का प्रचार कर रहे थे, वो क्यों मर जायें। और मर जायें, तो ईश्वर की इच्छा के विरू( बात है। यह अनाड़ी लोग ऐसी व्याख्या करते हैं। यह उसका अर्थ नहीं है। सही अर्थ यह है- ईश्वर की इच्छा है, सबकी भलाई और सबकी उन्नति हो। वस्तुतः स्वामी दयानंद का यह विचार है, जो सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है। तो स्वामी दयानंद के इस सि(ांत के अनुसार उस वाक्य का अर्थ लगाइये। स्वामी दयानंद जी ने कहा- ‘मेरा जितना जीवन था मैंने काम किया। देश की, धर्म की सेवा की, और अब मैं शरीर छोड़ के जा रहा हूँ। और ईश्वर की इच्छा है, कि सबको सुख मिले, सबकी उन्नति हो, तो मैंने जितना किया सो किया। बाकी ये दुनिया वाले लोग अब ईश्वर की इच्छा को पूरा करें। सबकी उन्नति करें, सबकी भलाई करें। यह है उसका सही अर्थ। ईश्वर में इच्छा है, द्वेष है, प्रयत्न है। ईश्वर सृष्टि बनाता है, उसमें प्रयत्न है। क्रिया भी है।
स और रही बात फिर सुख-दुःख की। हाँ ईश्वर में सुख तो है, ईश्वर हमेशा आनंद में रहता है। उपनिषद्कार ने लिखा है- ‘रसो वैसः’ स्वर्यस्य च केवलं -अर्थात् जिसमें केवल सुख ही है, दुखः बिल्कुल नहीं है, ऐसा है वह ईश्वर। ईश्वर आनंद स्वरूप है। आनन्दं ब्रहाणों विद्वान् -अर्थात् ईश्वर के आनंद को जानकर के मनुष्य (जीवात्मा( भी सुखी हो जाता है। ऐसे-ऐसे वेद में भी बहुत से मंत्र आते हैं। जिनमें ईश्वर को आनंद स्वरूप बताया गया है। जैस कि रसेन तृप्जः न कुतश्चनोनः ।। अर्थात् ईश्वर आनन्द से परिपूर्ण है, उसमें कोई भी कमी नहीं है। तो ईश्वर में आनंद तो है, पर वो दुःखी नहीं है। दुःख कभी नहीं भोगता। दुःख से हमेशा परे है। इस-इस प्रकार से ईश्वर में भी ये गुण मानने चाहिये।

(108) शंका :- क्या गीता का उपदेश भगवान श्री कृष्ण का है। यदि है, तो यु( स्थल में इतना अठारह अध्यायों का उपदेश कैसे संभव है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

इसका उत्तर है कि- जितना लंबा उपदेश आज गीता में उपलब्ध है, यह सारा का सारा उपदेश श्रीकृष्ण जी का नहीं है। और व्यावहारिक दृष्टि से यु( के मैदान में इतना लंबा उपदेश संभव भी नहीं है। महाभारत में मूल श्लोक दस हजार थे, और आज मिलते हैं- एक लाख। नब्बे हजार श्लोंको की तो महाभारत में मिलावट है। और महाभारत के ही एक हिस्से का नाम गीता है। गीता कोई स्वतंत्र ग्रंथ नहीं है, अलग पुस्तक नहीं है। देखिये महाभारत के अंदर अठारह भाग हैं। इन भागों को ‘पर्व’ नाम से कहा गया है। अठारह पवरें में एक छठा पर्व है, जिसका नाम है- ‘भीष्म पर्व’। इस भीष्म पर्व के अठारह अध्यायों का नाम गीता है। जब महाभारत में इतनी मिलावट है, तो गीता में भी उतने ही प्रतिशत (परसेन्ट( मिलावट गिन लो। जब वहाँ दस हजार के एक लाख श्लोक हो गये, मतलब उससे नौ गुनी मिलावट हो गई, तो गीता में भी नौ गुनी मिलावट है। अब जितने श्लोक आजकल गीता में मिलते हैं। उनका दस प्रतिशत निकाल लो, कितना हुआ? साठ-सत्तर श्लोक बनेंगे। बस असली गीता इतनी ही थी। साठ-सत्तर श्लोक का उपदेश था, और वो पन्द्रह-बीस मिनट में हो सकता है। श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन को भ्रांति होने पर पन्द्रह -बीस मिनट का उपदेश दिया, उसका दिमाग ठीक हो गया, और उसने कहा- लाओ मेरा गांडीव धनुष, मैं अभी कौरवों को ठीक करता हूँ। हो गई गीता पूरी। और कुछ नहीं है। बाकी सब बाद की मिलावट है, यानि प्रक्षेप है।

(109) शंका :- जीवात्मा’ का स्थान मनुष्य ‘शरीर’ के अंदर कहाँ है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

कठोपनिषद् में लिखा है, कि- ‘हृदि ह्येष आत्मा’ अर्थात् आत्मा हृदय में रहता है। लेकिन वो हमेशा एक जगह नहीं रहता। उपनिषदों में अनेक स्थानों पर ऐसी चर्चा आती है। जीवात्मा चौबीस घंटे एक जगह नहीं रहता, वो स्थान भी बदलता रहता है। जैसे आप अपने घर में क्या एक ही कमरे में बैठे रहते हैं, बदलते रहते हैं न। कभी बेडरूम में चले गए, कभी किचन में चले गए, कभी बाथरूम में चले गए, कभी ड्राइंगरूम में चले गए। ऐसे ही यह शरीर जीवात्मा का घर है। वो जब इच्छा होती है, तो अपनी जगह बदल लेता है।
जीवात्मा के सोने के लिए लिखा है, कि हृदय में से बहुत सारी नाड़ियाँ निकलती हैं, उनमें से एक नाड़ी का नाम है- ‘पुरीतत’। जब जीवात्मा सोता है, तो पुरीतत नाम की नाड़ी में जाकर सोता है, यह उसका बेडरूम है। एक उपनिषद् है- ”ऐतरेय’ उपनिषद्, उसमें जीवात्मा के स्थान की चर्चा आई है। उसमें एक वाक्य लिखा है- ‘त्रयः आवसथाः’ अर्थात् जीवात्मा के शरीर में निवास के तीन स्थान हैं- ‘त्रयः’ तीन। फिर आगे लिखा है-‘अयं आवसथ, अयं आवसथ, अयं आवसथा।’ इसका मतलब होता है- यह स्थान है, यह स्थान है और यह स्थान है। अब कौन सा स्थान है, उसका नाम तो लिखा नहीं। दरअसल, विद्यार्थियों को कोई गुरूजी पढ़ा रहे होंगे, जैसे अब आप मेरे सामने बैठे हैं। और मैं कहूँ देखो, जीवात्मा शरीर में तीन जगह रहता है, एक यहाँ रहता है, एक यहाँ रहता है, और एक यहाँ रहता है। अब मैंने ऐसे इशारे से बता दिया और नाम नहीं बोला, तो किसी लिखने वाले ने यूँ का यूँ लिख दिया, कि- यहाँ रहता है, यहाँ रहता है, यहाँ रहता है। अब भई! सामने दिखता हो तो समझ भी जाए, किताब में लिखने से क्या पता चले, कि कहाँ रहता है? ‘यहाँ’ का मतलब क्या? इसलिए पता नहीं चला, कहाँ रहता है। पर तीन जगह लिखा है, यह तो स्पष्ट है। तीन जगह कौन सी? यह स्पष्ट नहीं है।
जीवात्मा के तीन अलग-अलग स्थान हैं। जाग्रत में जीवात्मा कहीं और होता है, स्वप्न में कहीं और होता है, सुषुप्ति में कहीं और होता है। मतलब स्थान बदलता रहता है। इतनी बात तो स्पष्ट है।
एक उपनिषद् है- ‘ब्रह्मोपनिषद्’। वैसे तो वो प्रमाणिक उपनिषद् नहीं है। पर कुछ लोग दूसरे उपनिषदों को भी पढ़ लेते हैं। कुछ अच्छी बातें वहाँ भी मिल जाती हैं। ‘ब्रह्मोपनिषद््’ में एक जगह पर आत्मा के तीन स्थान बताए गए- एक नेत्र, एक कंठ, और एक हृदय। ये तीन स्थान उसमें नामपूर्वक लिखें हैं। वैसे प्रमाणिक तो नहीं है, फिर भी हो सकता है, वो भी अनुकूल हो। इसलिए कुछ कह नहीं सकते, लेकिन जीवात्मा जगह बदलता है, इसमें कोई संशय नहीं है।

(110) शंका :- जीवात्मा एक शरीर को छोड़ दे, तो दूसरे शरीर में जाने के लिए उसको कितना समय लगता है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

उपनिषद् में लिखा है, कि एक कीड़ा अपने दो अगले पाँव उठाकर के ऐसे रख देता है और पीछे के पाँव उठा करके यूँ आगे चलता रहता है। जैसे वो अगले पाँव उठाकर यूँ चलता है, बस इतनी देर में जीवात्मा एक शरीर छोड़कर दूसरा शरीर धारण कर लेता है।
मोटे-तौर पर यह मानना चाहिए कि उसको बहुत ज्यादा देर नहीं लगती, क्योंकि हर आत्मा का कर्मों का बही-खाता (एकाउंट( तैयार ही रहता है।

(111) शंका :- चारों युग की गणना कीजिए?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

सबसे छोटा कलियुग है, जिसमें चार लाख बत्तीस हजार वर्ष, द्वापर युग में इससे दोगुने- आठ लाख चौंसठ हजार वर्ष, त्रेता युग में इससे तीन गुना- बारह लाख छियान्नवे हजार वर्ष, और सतयुग में इससे चार गुना- सत्रह लाख अट्ठाइस हजार वर्ष होते हैं। इन चारों को जोड़ देंगे, तो तैंतालीस लाख बीस हजार वर्ष हुए। यह एक चतुर्युगी हो गई। एक सृष्टिकाल में एक हजार चतुर्युगी होती हैं। तो इसको एक हजार से गुणा करेंगे, तो चार अरब बत्तीस करोड़ वर्षों की संख्या होती है। एक हजार बार इस सृष्टिकाल में चतुर्युगियों की पुनरावृत्ति (रिपीट( होती है। यह चारों युगों के वर्षों की उपयुक्त संख्या है।

(112) शंका :- ईश्वर ने मनुष्य को कैसा रूप धारण करके ज्ञान दिया, मनुष्य रूप से या आकाशवाणी से। कृपया समाधान किया जाए?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

ईश्वर ने मनुष्य रूप धारण करके वेदों का ज्ञान नहीं दिया। ईश्वर सर्वव्यापक है। सर्वव्यापक ईश्वर हमारे अन्दर है। वह चार )षियों के अंदर भी था। अन्दर ही अंदर ईश्वर ने उनको सारा पाठ पढ़ा दिया। जैसे आप अभी भी आंख बंद करके बैठ सकते हैं। मन में अन्दर ही अन्दर सोचते रहिए,आपको बोलने की जरूरत नहीं, जुबान हिलाने की आवश्यकता नहीं। आप अंदर ही अंदर सारी बातें करते रहें। घंटो तक बैठें रहिए, चिंतन-मनन करते रहिए। ऐसे ही ईश्वर ने चार )षियों के अंदर ही अंदर सारी पिक्चर दिखा दी। और चारों वेद पढ़ा दिये।
जैसे- )ग्वेद का यह सबसे पहला मन्त्र है-
ओ३म् अग्निमीउे पुरोहिंत यज्ञस्य देवमृत्विजम्। होतारं रत्नधारतमम्।।
ईश्वर ने यह मन्त्र भी पढ़ा (सिखा( दिया। इसका अर्थ- (शब्दानुसार( भी सिखा दिया। इसका पिक्चर- (चित्र( भी दिखा दिया। क्योंकि बिना पिक्चर दिखाए व्यक्ति को अर्थ समझ में नहीं आता। आप छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ाइए स्कूल में। ए फॉर एपल, बी फॉर बॉल। सी फॉर कैट, डी फॅार डॉल। न तो कैट दिखाइयेगा, न तो डॉल दिखाइयेगा। क्या उनकी समझ में आ जाएगा, कि एप्पल क्या होता है? आपको चार्ट दिखाना पड़ेगा, या प्रेक्टिकली एपल लाना होगा। ‘ए’ फॉर एपल होता है, वो तब समझ में आएगा। उसका फोटो भी बताना पड़ता है। उसे शब्द भी सिखाना पडता है। ईश्वर ने ‘अग्निमीडे पुरोहितम्’ शब्द भी सिखा दिए, और आँख बंद करने पर पूरी फिल्म दिखा दी। अग्नि इसको बोलते है, स्तुति ऐसे की जाती है। इसी प्रकार से वेद के अन्य मन्त्रों के अर्थ भी चित्र सहित समझाये जैसे- देखो, खेती ऐसी की जाती है, ऐसे हल चलाया जाता है। इस तरह की पूरी फिल्म दिखा दी। उसको बोलते हैं- वेद का ज्ञान। ईश्वर अंदर ही वेद का ज्ञान दे देता है, मनुष्य रूप धारण नहीं करता।

(113) शंका :- वेद की उत्पत्ति कैसे हुई?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

आदि सृष्टि में भगवान ने चार )षियों को चार वेदों का ज्ञान दिया। पहले धरती से वनस्पतियाँ, कीड़े-मकोड़े तैयार हुए, बाद में मनुष्य उत्पन्न हुए। उनमें भी जो सबसे अधिक बु(िमान थे, उनका नाम था )षि। इन चार )षियों के नाम थे- 1. अग्नि, 2. वायु, 3. आदित्य, 4. अंगिरा। इन चार में से एक-एक )षि )षियों को ईश्वर ने एक-एक वेद का ज्ञान दिया।
ईश्वर सर्वव्यापक (व्उदपचतमेमदज( है। वह )षियों के हृदय में भी था। आपको अपने ही अन्दर कुछ बातचीत करनी है, कुछ योजना बनानी है, तो आप बिना जबान हिलाये, मन में शब्दोच्चारण कर सकते हैं। उन चार )षियों के अन्दर बैठे हुए ईश्वर ने चार )षियों को वेद का ज्ञान दे दिया। जैसे आपको अपने आपसे बात करने के लिए चमड़े की जबान की जरूरत नहीं पड़ती, वैसे ही अपने अन्दर बात करने के लिए ईश्वर को बाहर से कान में बोलने की जरूरत नहीं पड़ती।
चार )षियों ने ईश्वर से मंत्र सीख लिये। उनके अर्थों का चित्र भी देख लिया। जिस तरह सिनेमा में पर्दे पर चित्र देखते हैं, उसी तरह मन रूपी पर्दे (स्क्रीन( पर आँख बंद करके सारे अर्थ समझ लिये।
जैसे वेद में कहा है कि- खेती करो। खेती कैसे करें, उसकी पिक्चर भगवान ने मन रूपी स्क्रीन पर बनाई। जैसे आप टेलीविजन में देखते हैं- हल बनाना, हल को बैल से जोड़ना, हल चलाना, फिर पानी डालना, घास काटना, फसल काटना। अगर भगवान यह पिक्चर नहीं दिखाते, सिर्फ वेद मंत्र पढ़वाते, मंत्र रटाते, उसका शाब्दिक अनुवाद करवाते तो भी इतने मात्र सिखाने से बात समझ में नहीं आती, जब तक कि उसका चित्र अर्थ सहित नहीं समझाया जाये। जैसे कि कक्षा में बच्चे को जब क, ख, ग सिखाते हैं। ”क” से कबूतर अपने बच्चे को रटाते हैं। फिर कबूतर लिखकर बना देते हैं। अगर कबूतर का फोटो नहीं दिखाया तो बच्चा कभी नहीं समझ पायेगा, कि कबूतर किसको कहते हैं। ऐसे ही भगवान ने सूर्य का चित्र दिखा दिया, अग्नि जलती हुई दिखा दी और बता दिया कि यह सूर्य है, यह अग्नि है। और चार )षियों की ड्यूटी लगा दी, कि भाई, मैंने तुम्हें सिखा दिया, अब आगे इन हज∙ारों लोगों को तुम सिखाओ। तब से यह पढ़ने-पढ़ाने की परम्परा चल रही है।

(114) शंका :- ईश्वर निराकार है, तो योग द्वारा ईश्वर का किस रूप में साक्षात्कार होता है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

ईश्वर निराकार है, तो निराकार स्वरूप में ही ईश्वर का साक्षात्कार होता है। अगर लाल टोपी होगी, तो किस रंग की दिखाई देगी? लाल दिखेगी। इसी तरह से जो वस्तु जैसी होगी, ठीक वैसी वो साक्षात्कार के समय दिखती है। ईश्वर निराकार है, तो निराकार दिखाई देगा। आनंद स्वरूप है, तो आनंद स्वरूप दिखाई देगा, अर्थात् उसकी वैसी अनुभूति होगी। उसकी आकृति- (शेप( दिखाई नहीं देगी। ईश्वर की आकृति तो है ही नहीं। बिना आकृति के ही, उसकी अनुभूति ही, उसका साक्षात्कार है। साक्षात्कार का नियम यह है, कि- जिस-जिस द्रव्य में, जो-जो गुण होते हैं, उन्हीं-उन्हीं गुणों के माध्यम से, उस-उस द्रव्य का साक्षात्कार होता है। नीला वस्त्र नीले रंग का और पीला वस्त्र पीले रंग का दिखाई देगा। यही उसका साक्षात्कार है। अब प्रारंभिक स्तर पर योगी भी आंख खोलकर ईश्वर साक्षात्कार नहीं कर सकता। पहले-पहले योगी को भी आंख बंद करके ही अभ्यास करना पड़ता है। और फिर लंबे-काल तक अभ्यास कर करके वो इतना कुशल हो जाता है, कि आंख खोलकर भी वह सर्वव्यापक ईश्वर का अनुभव कर सकता है। आंख खुली रहेगी, आंख से उसको बाहर का दृश्य दिखाई नहीं देगा। वो ईश्वर को देखेगा। कभी-कभी सामान्य व्यक्ति भी ऐसा अनुभव करता है। जैसे कि- एक व्यक्ति आँख खोलकर बैठा था। उसके सामने से एक दूसरा व्यक्ति निकल गया। लोग पूछते हैं- ‘यह कौन कौन गया’? वह बोला- पता नहीं साहब। अरे! आप तो आंख खोलकर बैठे थे, आपको पता नहीं चला? उसने कहा, बिल्कुल पता नहीं चला। आँखे भले खुली थी। मैं आंख के साथ नहीं था, मैं कहीं और था। सोच कुछ और रहा था। इसलिए कौन सामने से निकल गया, मुझे पता ही नहीं चला। तो ऐसे ही कुशल योगी व्यक्ति, आँख भले खोलकर रखे, पर वो आंख से देखता नहीं। अर्थात् ईश्वर का अनुभव करता है।

(115) शंका :- समाधि लगने पर अर्न्तज्ञान प्राप्त होता है। )षि-काल में )षि लोग अर्न्तज्ञान से कैसा जानते थे?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

लोगों को आंतरिक ज्ञान होता था। उदाहरण कोई भी सौ प्रतिशत साध्य के समान नहीं होता, यह नियम है। उदाहरण मोटे स्तर का होता है, और किसी अंश को समझाने के लिए होता है। आंतरिक ज्ञान कैसा होता है, इसे एक उदाहरण से ऐसे समझें? मान लीजिए, आप बिस्तर पर लेट गए। आंख बंद हो गई और गहरी नींद तो आई ही नहीं। नींद में शुरू हो गया स्वप्न। तो जब आप स्वप्न देखते हैं, तब आंखें तो बंद रहती हैं, फिर भी आपको अंदर से ज्ञान होता है। स्वप्न में चित्र दिखते हैं- एक महल है। उसमें बहुत से नौकर-चाकर हैं, बहुत सुुंदर सजा हुआ है। बाहर चौकीदार खड़े हैं, अंदर राजा है। वो आराम से राजमहल में बैठा है। सभा लगी हुई है, बहुत सारे लोग उसकी सेवा कर रहे है। अब देखिए, स्वप्न में अन्दर से ज्ञान हो रहा है या नहीं? जैसे स्वप्न में अंदर से ज्ञान होता है, ऐसे ही )षियों को समाधि में अंदर से ज्ञान होता है। समाधि में जो ज्ञान प्राप्त होता है, वो ईश्वर की ओर से होता है। और स्वप्न में तो हमारे अपने संस्कार होते हैं, जिनको हम स्मृति के रूप में,चित्र के रूप में देखते हैं। इस तरह से )षियों को आंतरिक ज्ञान होता है।

(116) शंका :- कृपया गुणकर्म स्वभाव की परिभाषाएँं बतलाइए। तीनों में क्या भेद है? ईश्वर के गुण-कर्म स्वभाव अलग-अलग बताइए। क्योंकि इनके ओवरलेपिंग होने के कारण कन्फ्यूजन रहता है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

सही बात है। देखिए, कर्म तो स्पष्ट है। कर्म कहते हैं- क्रिया (एक्शन( को। एक मजदूर ने ईटें उठाकर यहाँ डाल दी। मिस्त्री ने ईटों पर ईट रखके,मसाला डालकर दीवार खड़ी कर दी। यह तो कर्म है। यहाँ स्पष्ट है, कि क्रिया हो रही है, उसका नाम है-कर्म। अब विचारने के लिए दो बातें बची-गुण और स्वभाव।
स्वभाव का अर्थ होता है- ‘स्व’ का भाव, अर्थात् किसी द्रव्य के अपने गुण। जैसे-अग्नि में गर्मी। यह गर्मी, अग्नि का अपना गुण है, इसे ‘स्वभाव’ कहेंगे। ‘गुण’ किसी दूसरे द्रव्य से उधार लिया हुआ भी हो सकता है। जैसे- यदि पानी को अग्नि के सम्पर्क से गर्म कर दिया जाये, तो गर्म पानी में ‘गर्मी’ पानी का ‘गुण’ तो कहलाएगा, परन्तु उसका ‘स्वभाव’ नहीं। क्योंकि वह गर्मी, पानी ने अग्नि से उधार ले रखी है। इस प्रकार से- जो किसी द्रव्य की विशेषता केवल अपनी है, उसे ‘स्वभाव’ कह देंगे। और जो बाहर से ले रखी है, उसको ‘गुण’ कह देंगें। गुण और स्वभाव में ज्यादा अंतर नहीं है। स्वभाव में भी गुण ही होते हैं। अंतर केवल इतना है, कि किसी द्रव्य के अपने गुण हैं, पर्सनल प्रापर्टी है ‘स्वभाव’। और यदि किसी दूसरे द्रव्य से उधार ले रखे हों, उन्हें हम ‘गुण’ कह देंगे। गुण-कर्म स्वभाव की यह एक मोटी-मोटी परिभाषा हो गई।
अब ईश्वर की बात करते हैं। क्या ईश्वर कोई गुण दूसरे पदार्थ से भी
धारण करता है, उधार लेता है? नहीं लेता। ईश्वर के जितने भी गुण हैं, वे सारे उसके अपने हैं। इसलिए ईश्वर के संबंध में ‘गुण और स्वभाव’ में कोई अंतर नहीं।
और कर्म तो स्पष्ट ही है। ईश्वर सृष्टि बनाता है, न्याय करता है। लोगों को मनुष्य, पशु-पक्षी बनाता है- ये कर्म हैं। ईश्वर वेद का उपदेश देता है। उपदेश देना एक कर्म है। ईश्वर कर्म से अलग नहीं है। तो सार यह हुआ, कि ईश्वर के गुण और स्वभाव में अंतर नहीं है। परन्तु मनुष्यों में गुण और स्वभाव का अंतर दिखता है। जैसे जीवात्मा में इच्छा गुण है। कुछ इच्छाऐं ऐसी हैं, जो हमारी अपनी हैं, स्वाभाविक इच्छाऐं हैं- वह हमारा स्वभाव है। कुछ इच्छाऐें ऐसी हैं, जो किन्हीं कारणों से उत्पन्न हो गर्ईं, और वो हट भी जायेंगी। उदाहरण के लिए, सुख प्राप्ति की इच्छा है। सुख मिलना चाहिए। यह तो स्वाभाविक इच्छा है। लेकिन खीर, पूड़ी, हलवा,लड्डू की इच्छा स्वाभाविक नहीं है। जब तक खीर, पूड़ी, हलवा में आपको सुख दिखता है, तब तक वह इच्छा रहेगी। जब उसमें दुःख दिखने लगेगा, वह इच्छा समाप्त हो जाएगी। जो नैमित्तिक इच्छाऐं हैं, उन्हें ‘गुण’ कहेंगे। नैमित्तिक यानी किन्हीं कारणों से जो इच्छाऐं पैदा हो गईं, तो वह ‘इच्छा’ गुण कहलाएगा। और जो सदा से अपना गुण हैं, उसका नाम ‘स्वभाव’ है। जो अनादिकाल से जीव का अपना है। इच्छा है, प्रयत्न है, जो हमेशा से उसके अपने हैं, वह स्वभाव है। और जो किन्ही कारणों से उसमें आ जाते हैं, पैदा हो जाते हैं, तो वो है- ‘गुण’। जीवात्मा में ऐसी बात मिल जाएगी, प्रकृति में भी ऐसी बात मिल जाएगी। जैसे अभी बताया था- प्रश्न है- अग्नि के अंदर गर्मी अपनी है या बाहर से ले रखी है। उत्तर है- वह उसकी अपनी गर्मी है। जब चूल्हे के ऊपर पतीला रखकर पानी गर्म करते हैं, तो अब पानी में जो गर्मी आई वो पानी की अपनी है या अग्नि से ली हुई है? उत्तर है- अग्नि से ली हुई है। तो अब देखिए प्रकृति के अन्दर दोनों बातें देख रहे हैं। गर्मी, तापमान अग्नि का अपना है, इसलिए स्वभाव है। और पानी में वो अग्नि से आया हुआ है, इसलिये नैमित्तिक गुण है।
इस तरह हम गुण, स्वभाव, कर्म में अंतर समझ सकते हैं। ईश्वर के मामले में तो गुण और स्वभाव दोनों एक ही जैसे दिखते हैं। उनमें कोई अंतर समझ में नहीं आया। किसी द्रव्य में जो स्वाभाविक गुण होता है, वो उसे कभी नहीं छोड़ता। जो है, वह स्वाभाविक है। अग्नि का गुण गर्मी है, तो क्या वो अग्नि को कभी छोड़ देगी? नहीं छोड़ेगी। स्वाभाविक गुण कभी किसी द्रव्य को नहीं छोड़ता।
अब राग-द्वेष भी जीवात्मा का स्वाभाविक गुण त्र (दोष( मान लें, तो उसको छोड़ेंगे ही नहीं। नहीं छूटेगा, तो मुक्ति नहीं हो सकती। तो मुक्ति होगी, कि नहीं होगी, क्या समझते हैं? होगी न। तभी मुक्ति होगी, जब राग-द्वेष छूट जाऐंगे। राग-द्वेष छूट जाऐगे तो यह स्वाभाविक गुण नहीं हुआ बल्कि नैमित्तिक हुआ।

(117) शंका :- आपने कहा, ईश्वर निराकार है। परछाई (प्रतिबिंब( का आकार दिखता तो है, लेकिन परछाई, (प्रतिबिंब( पकड़ नहीं सकते? फिर हम निराकार ईश्वर को कैसे पकड़ेंगे?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

ईश्वर के प्रतिबिंब को पकड़ नहीं सकते। यह तो अलग बात है। परछाई को पकड़ने की बात तो बाद में। पहले बने तो परछाई। परछाई बनती है साकार वस्तु की। ईश्वर है ही निराकार, तो परछाई बनेगी ही नहीं। अगर परछाई बनेगी ही नहीं, तो उसका प्रतिबिंब सि( ही नहीं होता, तो उसे पकड़ने का प्रश्न ही नहीं है। इसलिए न तो ईश्वर की परछाई है, न ही उसकी परछाई पकड़नी है। निराकार त्र (साक्षात्कार करना( है। और वह होगा, अष्टांग योग से। उसे करें। ईश्वर को पकड़ना। जीव अलग है, ईश्वर अलग है। ईश्वर निराकार है और जीव भी निराकार है।

(118) शंका :- भारत में महिला और पुरुष दोनों को समान दर्जा प्राप्त है। लेकिन विवाह के बाद महिलाओं के पास मंगलसूत्र और सिंदूर रहता है। वो उनकी विवाहित होने की पहचान है। लेकिन विवाहित पुरूषों की क्या पहचान है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

देखिये पुरुषों के पास भी पहचान है। पर आजकल लोगों ने उनकी पहचान बिगाड़ दी है। हमारे वैदिक शास्त्रों के अनुसार विवाह से पूर्व श्रृंगार करने का अधिकार न पुरुष को है और न स्त्री को। जब विवाह होता है, उस दिन उनको श्रृंगार का अधिकार मिलता है। मातायें श्रृंगार कर लेती हैं, बिंदी लगा लेती हैं, सिंदुर लगा लेती हैं और आभूषण आदि पहन लेती हैं। विवाहित पुरुषों को भी अधिकार मिलता है, कि हाथ में अंगूठी पहनो, गले में चेन पहनो। ये श्रृंगार के साधन हैं। इससे पता लगता है कि यह विवाहित पुरुष है। जिसके हाथ में अंगूठी नहीं है, गले में चेन नहीं है, इसका मतलब है कि वो व्यक्ति अविवाहित है। अब तो अविवाहित लोग भी अंगूठी पहन लेते हैं, चेन पहन लेते हैं। लोगों लोगों ने पहचान में बिगाड़ कर दिया। यह लोगों का दोष है। लोगों को पहचान में बिगाड़ नहीं करना चाहिए। जब श्रृंगार का अधिकार मिले, तभी करना चाहिए, उससे पहले नहीं।

(119) शंका :- आदिकाल से सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय होता चला आ रहा है, तो क्या इससे यह मान सकते हैं कि उत्पत्ति व प्रलय का जो क्रम है, कभी उसकी शुरूआत हुई होगी, और इसका अन्त भी आएगा, क्योंकि हर कार्य की शुरूआत और अन्त होता है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

वर्तमान सृष्टि उत्पन्न हुई, वर्तमान सृष्टि का अन्त होगा। इससे पहले एक सृष्टि थी, उसके पहले भी एक सृष्टि थी, उससे पहले भी थी। जितना पीछे-पीछे चलते जाएँगे, पीछे-पीछे, उतनी सृष्टियाँ पाते जायेंगे। सृष्टि और प्रलय का यह जो क्रम है, इसका कोई प्रारंभ नहीं है। ‘पहली सृष्टि’ नाम की कोई चीज नहीं थी। जब भगवान ने ‘पहली बार’ सृष्टि बनाई हो, ऐसी कोई सृष्टि नहीं है। यह अनादिकाल से सृष्टि बन रही है, इस बार भी बनी है। ‘प्रथम सृष्टि’ कोई नहीं है। यह बात बु(ि में बड़ी मुश्किल से बैठती है, कम बैठती है। अच्छा एक सिरे की बात समझ में नहीं आई, दूसरे सिरे की बात करेंगे, तो शायद समझ में आ जाये। वर्तमान में यह सृष्टि चल रही है, इसका विनाश हो जाएगा, यानि प्रलय हो जाएगा। उस प्रलय के बाद फिर यह सृष्टि बनेगी। और फिर अगली दूसरी सृष्टि का प्रलय होगा। फिर तीसरी बनेगी, उसका प्रलय होगा। इस प्रकार भविष्य में नई सृष्टियाँ बनती रहेंगी, प्रलय होते रहेंगे। क्या भविष्य में यह बनने-बिगड़ने का क्रम समाप्त हो जाएगा? नहीं होगा। भविष्य में कभी इसका अन्त नहीं होगा। बनती रहेगी, बिगड़ती रहेगी। इसका क्रम कभी समाप्त नहीं होगा। अब नियम क्या कहता है, ‘जिस वस्तु का आरम्भ होता है, उस वस्तु का अन्त होता है।’ अब इस बात को उलटकर बोलिए। ‘जिसका आरंभ नहीं होता, उसका अंत भी नहीं होता।’ इस आधार पर आपने स्वीकार किया, कि सृष्टि-प्रलय का भविष्य में अन्त नहीं होगा। इस तरह दूसरी बात अपने आप सि( हो गई, ‘जब अन्त नहीं है, तो आरंभ भी नहीं है।’ अगर भविष्य में इस सृष्टि-प्रलय का क्रम कभी समाप्त नहीं होगा, तो भूतकाल में भी इसका आरंभ नहीं हुआ होगा। इसलिए बनने-बिगड़ने का क्रम न कभी आरम्भ हुआ, और न कभी समाप्त होगा। थोड़ा गहराई से बैठकर मनन करेंगे, तो अच्छी तरह स्पष्ट हो जाएगा।

(120) शंका :- आत्मा के संयोग से ‘जड़-शरीर’ चेतन लगता है। ‘चेतन-ईश्वर’ जड़ पदार्थों, जैसे कि- दीवार, पत्थर आदि में है, तो ये चेतन क्यों नहीं दिखते?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

जड़ वस्तु स्वयं क्रिया नहीं करती। शरीर जड़ है, वो स्वयं हिलता-डुलता, चलता-फिरता नहीं है। जब ‘आत्मा’ शरीर में जाता है, तब चेतन आत्मा की प्रेरणा से शरीर क्रिया करता है। ऐसे ही दीवार के परमाणुओं में क्रिया हो रही है। सब जगह परमाणु (एटम( घूम रहे हैं। एटम कौन घुमा रहा है? ईश्वर। ईश्वर के संयोग से वहाँ भी क्रिया हो रही है। अनार में हो रही है, केले के अंदर हो रही है, हर वस्तु में हो रही है। जितने एटम्स घूम रहे हैं, उन्हें तो ईश्वर घुमा रहा है। लेकिन जैसे शरीर में हाथ हिलता दिखता है, वैसे दीवार हिलती नहीं दिखती। दीवार हिलती, तो सभी भाग जाते। सोचते कि- कहीं वो हमारे सिर पर न गिर जाये। इसलिए वो ऐसी हिलती हुई नहीं दिखती, चुपचाप स्थिर है। लेकिन उसके अंदर क्रिया होती है। सूर्य में, पृथ्वी में, चाँद में, तारों में, यानि हर वस्तु में ऐसी क्रिया हो रही है। और वो क्रिया चेतन ईश्वर के संयोग से है। चेतन-ईश्वर उसमें क्रिया करता है। वस्तुतः हर वस्तु क्रियाशील है। एक साइंटिस्ट से पूछिये- वो बताएगा, कि क्या क्रिया हो रही है। सेव में, केले में क्रिया होती है। सेव रखा-रखा सड़ जाता है। आपको हिलता तो नहीं दिखता, मगर सड़ जाता है। ऐसा इसलिये, क्योंकि इसके परमाणुओं में सूक्ष्म-रूप से आंतरिक क्रिया होती है। इलेक्ट्रॉन्स घूमते रहते हैं, एटम्स सारे घूमते रहते हैं, जिसके कारण उसमें वृ(ि-हृास होता रहता है। सेव, केले में यह क्रिया तीव्र होती है। सेव, केला दो-तीन दिन में सड़ जाएगा। दीवार में ये क्रिया उतनी तीव्र नहीं होती, उससे बहुत कम होती है। दीवार को टूटने में सौ-दो सौ साल लग जाते हैं। इसमें ज्यादा समय लगता है। प्रत्येक पत्थर, दीवार आदि पदार्थों में गति क्रिया होने के कारण ही वे पदार्थ धीरे-धीरे नष्ट हो जाते हैं। और यदि आप यह चाहते हैं, कि दीवार आदि पदार्थ भी चेतन ईश्वर के कारण चलने फिरने लगें, (जैसे-आत्मा के कारण शरीर चलता फिरता है( तो व्यवहार करना कठिन हो जाएगा। क्योंकि ईश्वर तो सभी वस्तुओं में है। तब सभी चीजें चलने लगेंगी। तो आप अपना सामान त्र (रुपये, सोना, चाँदी, बर्तन, बिस्तर आदि( जहाँ रखकर ऑफिस जाएँगे। और जब शाम को ऑफिस से लौटकर आयेंगे, तब आपका सामान आपको वहाँ मिलेगा नहीं, जहाँ आप रखकर गये थे। सुबह से शाम तक आपका मकान त्र (घर( भी 5-7 किलोमीटर दूर चला गया होगा। तब बताइये, आपका जीवन-व्यवहार कैसे चल पाएगा।

(121) शंका :- यदि मांसाहार का निषेध कर दिया जाये, तो मांस पर निर्भर लोगों की रोजी-रोटी का क्या प्रबंध है। वो क्या करेंगे?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

बहुत सारे लोग चोरी करते हैं, बहुत सारे लोग डकैती भी करते हैं, तो क्या आप यह कहेंगे, ‘कि चोरी डकैती यदि बंद कर दी जाये, तो उनके धंधे का क्या होगा? चोरी, डकैती उनका धंधा है। उनकी रोजी-रोटी मारी जायेगी। चोरी डकैती वो बंद कैसे कर सकते हैं।’ चालू रखो। चालू रखो। चलेगा क्या?
धन्धा कौन सा करना, व्यवसाय कौन सा करना। वो भी ईश्वर ने बता रखा है। अच्छा धन्धा करो, अच्छा व्यवसाय करो। लूट-मार वाला नहीं, चोरी-डकैती वाला नहीं। मांसाहार का धन्धा ही गलत है। वो धन्धा ही कानून के विरू( है। वो बंद करना पड़ेगा। गेहूं पैदा करो, अनाज पैदा करो, खेती करो, व्यापार करो, मेहनत करो, मकान बनाओ, कपड़ा बेचो, रोटी बेचो, मिठाई बेचो। दुनिया भर की चीजें हैं, एक मांस ही बस है क्या खाने के लिये। चीन देश वाले अपने आप को बौ( मानते हैं। और बौ(ों का नारा क्या है-अहिंसा परमो धर्मः। और व्यवहार में देखो तो- हिंसा परमोधरमः। चीन वालों ने एक भी प्राणी नहीं छोड़ा, सब खा जाते हैं। कछुए, केकड़े, सांप, बिच्छू सब खा जाते हैं, कुछ नहीं छोड़ा। बताईये, यह अपने आप को अहिंसावादी कहते हैं। तो क्या खाना, क्या नहीं खाना यह भी वेद में बताया है। उदाहरण के लिये- आप एक मोटरसाइकिल खरीदकर लाये उसमें कौन सा फ्यूल डालें, पेट्रोल डालें, डीजल डालें, या कैरोसीन डालें, यह कौन डिसाईड करेगा। कस्टमर करेगा या कंपनी। कंपनी डिसाईड करेगी न, जिस इंजीनियर ने इंजन डिजाइन किया है, वही डिसाईड करेगा, इसमें कौन सा फ्यूल डालना है। ठीक है। मान लीजिये, मोटरसाइकिल का नाम हीरो-होण्डा है। अब आपको पता लग गया इसमें कौन सा फ्यूल डलेगा। फ्रेश पेट्रोल डलेगा। न डीजल डलेगा, न कैरोसीन डलेगा। और पेट्रोल में भी ऑइल मिक्स नहीं करना। फ्रेश पेट्रोल ही टन्की में डलेगा। तो यह डिसीजन किसने लिया? उस इंजन के डिजाईन करने वाले इंजीनियर ने। उसको पता है, कि मैंने कैसा इंजन बनाया है, इसमें कौन सा फ्यूल डालना है। ठीक इसी तरह से, यह जो हमारा मनुष्य शरीर है, यह भी एक मशीन है। और इसके अंदर पाचन संस्थान भी एक इंजन है। तो इस पाचन संस्थान में कौन सा फ्यूल त्र (भोजन( डालना है, यह कौन डिसाईड करेगा। हम करेंगे या इसका इंजीनियर। इसका इंजीनियर करेगा, जिसने ये बॉडी (शरीर( बनाई है। यह शरीर किसने बनाया, ईश्वर ने। तो यह ईश्वर डिसाइड करेगा, कि हमको क्या खाना है, और क्या नहीं खाना। इस इंजन में कौन सा फ्यूल डालना। तो वेद में ईश्वर ने शाकाहारी भोजन खाने को बताया हे। जो मैंने पहले आपको मंत्र भी सुना दिये, बहुत से प्रमाण सुना दिये, यजुर्वेद के, अथर्ववेद के। तो जब ईश्वर कहता है- शाकाहारी भोजन खाने के लिये यह इंजन डिसाइड किया गया है। अगर आप इसमें मांस डालोगे, तो बिल्कुल वैसी ही बात है, कि हीरो-होण्डा मोटरसाइकिल के अंदर आप डीजल भरते हैं। तो इंजन का सत्यानाश हो जायेगा। मांस खाना, शराब पीना और अण्डे खाना, ये सब मनुष्य शरीर में डालना। इसका अर्थ है, कि ‘पेट्रोल’ इंजन के अंदर ‘डीजल’ फ्यूल डालना। वो उसका विनाश करेगा। इसलिये मनुष्य को मांस आदि नहीं खाना चाहिये।

(122) शंका :- आप कहते हैं, कि क्रोध नहीं आना चाहिए। परशुराम, द्रोणाचार्य जैसे तपस्वी लोग क्रोधी थे फिर भी दुनिया उनकी पूजा क्यों करती है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

हर व्यक्ति में गुण भी होते हैं, दोष भी होते हैं। परशुराम में कुछ गुण भी थे, और दोष भी थे। और द्रोणाचार्य में गुण भी थे, और दोष भी थे। गुणों की पूजा होती है, दोषों की पूजा नहीं होती है। कोई भी व्यक्ति इसलिए परशुराम या द्रोणचार्य की पूजा नहीं करता, कि वे महाक्रोधी थे। उनकी पूजा इसलिये होती है क्योंकि उनमें योग्यता थी। वे विद्वान थे, धनुर्धारी थे, बलवान थे और बड़े वीर थे। किसी भी व्यक्ति की, उसके दोषों के कारण कभी पूजा नहीं होती। रावण के पास बहुत सारे गुण थे, इसलिये दक्षिण भारत के लोग रावण का सम्मान करते हैं। संस्कृत साहित्य में एक कहावत है- ‘गुणाः पूजा स्थानम्”। अर्थात् गुण पूजा का स्थान है, व्यक्ति नहीं। गुण जिस व्यक्ति में होते हैं, उस व्यक्ति की पूजा हो जाती है। वो पूजा वास्तव में व्यक्ति की नहीं है, गुणों की पूजा है। दोषों की कभी पूजा नहीं होती। दोषों का हमेशा अपमान ही होता है। परशुराम द्रोणाचार्य के अंदर कुछ गुण थे, इसलिए उनकी पूजा होती हैं। जो दोष थे, उनके कारण पूजा नहीं होती है।

(123) शंका :- ‘जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन। जैसा पिये पानी, वैसी बने वाणी। जैसा करे संग, वैसा चढ़े रंग।” तो मित्रों के, रिश्तेदारों आदि के घर में भ्रष्टाचार का धन आता है और वहाँ जाना ही होता है। वहाँ का अन्न, पानी ग्रहण न करने पर संबंध बिगड़ते हैं। और यदि स्वीकार करेंगे, तो मन बिगड़ेगा। बताइये क्या करना चाहिये?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

आपके मित्र-संबंधी, रिश्तेदार जिनके बारे में आपने यह प्रश्न लिखा है, कि वो चोरी से, बेईमानी से, भ्रष्टाचार से धन कमाते हैं? क्या वो सारा सौ प्रतिशत धन चोरी, बेईमानी से कमाते हैं या फिर कुछ मेहनत, ईमानदारी से भी कमाते हैं। कुछ तो मेहनत से कमाते हैं, कुछ तो ईमानदारी का होता है। मित्रों के यहाँ और रिश्तेदारी में, आना-जाना, खाना-पीना सब कुछ करना पड़ता है। तो जब आपको वहाँ खाना-पीना पड़े तो उनकी जो मेहनत और ईमानदारी की कमाई है, उसमें से खा लेना। बेईमानी वाला छोड़ देना, वो मत खाना। आपका मन भी नहीं बिगड़ेगा और रिश्ता भी नहीं बिगड़ेगा, दोनों ठीक बने रहेंगे। समाधान तो यही है।
इसे और स्पष्ट समझने के लिये एक अन्य उदाहरण देता हूँ। एक व्यक्ति ने मुझसे पूछा – ‘ सेठ लोगों का धन कुछ ईमानदारी का और कुछ बेईमानी का (मिला-जुला( होता है। अतः उन सेठों से दान लेना उचित है ? मैंने कहा- ‘हाँ, दान लेना चाहिये। दान देना एक पुण्य कर्म है। कोई सेठ पुण्य कमाना चाहे तो क्या उसे पुण्य कमाने का अधिकार नहीं है। यदि है तो वह दान देगा, और संस्था लेगी। वह व्यक्ति बोला- ‘सेठ का धन तो मिला-जुला है। संस्था उससे दान लेगी, तो संस्था वालों में भी बेईमानी का दोष आ जायेगा।’ मैंने कहा- क्या कोई व्यक्ति अपने जीवन में सारे कर्म अच्छे ही करता है या कुछ बुरे भी करता है? यदि दोनों प्रकार के करता है तो सेठ जो दान देता है, वह अच्छा कर्म है। और व्यापार में जो थोड़ी बहुत बेईमानी करता है, वह बुरा कर्म है। वह अलग कर्म है। बुरे कर्म का दण्ड उसे भोगना पड़ेगा। आप इन दोनों कर्मो को मिश्रित (मिक्स( मत करिये। सेठ कर्म करने में स्वतंत्र है। वह कुछ काम अच्छे भी करता है और कुछ बुरे भी करता है। ऐसे ही सभी लोग करते हैं। आपको पाप तो तब लगेगा, जब आप मित्रों-संबंधियों के घर जाकर उनकी वस्तुयें चुराकर खायेगें। तब वह बुरा कर्म होगा। यदि वे लोग प्रेमपूर्वक, श्रृ(ापूर्वक आपको भोजन आदि खिलाते हैं, और आप खाते हैं, तो इसमें कोई बुराई नहीं है।

(124) शंका :- द्रोपदी का चीरहरण चुपचाप देखते रहना, क्या भीष्मपितामह जैसे महान व्यक्ति की कमजोरी नहीं दर्शाता? कहते है, कि कौरवों का अन्न खाने से उनकी बु(ि मलीन हो गई थी। हम भी इतना दूषित भोजन खाते हैं, तो क्या हमारी बु(ि भी मलीन हो गई है। फिर योग धर्म कैसे असर करेगा?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

महाभारत’ में नौ सौ प्रतिशत मिलावट है। जैसे एक आदमी ने दस हजार रुपये घर से लेकर के व्यापार किया। और उसने कुल मिलाकर के एक लाख रुपये कमाया। उसने नौ सौ प्रतिशत लाभ कमाया। महाभारत की स्थिति भी ऐसी ही है। उसमें मूल श्लोक केवल दस हजार थे। व्यास जी ने जब महाभारत का इतिहास लिखा था तब इसका नाम था-‘जय। फिर फिर बाद में हुआ-‘भारत’। तब इसका नाम ‘महाभारत’ नहीं था। चीन का इतिहास ‘चायना’ के नाम से प्रस्तुत है। जापान का इतिहास ‘जापान’ के नाम से और भारत का इतिहास ‘भारत’ के नाम से। तो पहले जब मूल रुप से इतिहास लिखा था तब उसमें केवल 10,000 श्लोक थे। और बाद में जब इतिहास की कथा होने लगी। तो कुछ दो, चार, पांच, दस पंडितों ने अपनी कथायें शुरु की और दो श्लोक एक ने डाले, दो दूसरे ने डाले, दो तीसरे ने डाले और वो बढ़ते-बढ़ते आज एक लाख श्लोक हो गए। तो कितनी मिलावट हुई, नौ सौ प्रतिशत। 90 हजार मनगढंत श्लोक इसमें जोड़ दिये गये। अब जो घटना आती है, कि द्रोपदी का चीर हरण हुआ। हमको तो यह सरासर मिलावट दिखती है, ऐसा कुछ हुआ नहीं। ऐसा हो भी नहीं सकता।
यह बेकार की बात पढ़ते हैं, लिखते हैं और टीवी सीरियल में भी दिखा दिया इन्होंने। सब झूठ बाते हैं। आप कल्पना तो करके देखिये, कि- क्या ऐसा हो सकता है। आपके मोहल्ले में, आपकी नजर में एक सामान्य स्तर का व्यक्ति ऑटो-रिक्शा चलाता है। पाँचवी-छटवीं कक्षा पढ़ा हुआ है। कल्पना कीजिए- उसकी पत्नी को कोई आदमी पकड़ ले, और उसके कपड़े खींचने लगे तो क्या वो देखता रहेगा? वो लड़ मरेगा। वो कहेगा- पहले मुझसे बात करो, बाद में इसको हाथ लगाना। मेरे जिन्दा रहते तुम इसको हाथ नहीं लगा सकते। इसकी रक्षा की जिम्मेदारी मैंने ली है। पहले मुझसे दो-दो हाथ करो बाद में इधर बात करना। तो वो पांच-पांडव बड़े राजा लोग थे। बड़े वीर धर्नुधारी, बड़े पहलवान, कितने विद्वान और कितने मल्ल स्तर के लोग थे भीम जैसे, अर्जुन जैसे। वो क्या मुंह देखते होंगे? कल्पना तो करके देखो, कितनी झूठ बात है। एक रिक्शा ड्राईवर भी ऐसी बात को सहन नहीं कर सकता, कि कोई उसकी पत्नी को हाथ लगाये। वो पांच बड़े पढ़े-लिखे, बलवान, यो(ा महापुरूष कैसे सहन करेंगे, कि उनके देखते-देखते कोई उनकी घर की स्त्री को हाथ लगाये। इसलिए चीरहरण तो बिल्कुल कोरी कल्पना है। यह जुआ खेलने की घटना में भी घोटाला है। बहुत कपोल कल्पनायें हैं। जुआ में रुपया हार जाये, जमीन हार जाये, तो बात कुछ समझ में आती है। लेकिन पत्नी को हार जाये, दिमाग में बैठता नहीं है। पत्नी जुअे में, दाव में लगायी जाती है क्या? वो कोई संपत्ति है, कोई जड़ संपत्ति है, कोई सोना-चांदी है? वो चेतन व्यक्ति है। चेतन व्यक्ति को कोई भी जुअें में दाव पर नहीं लगा सकता। कानून का नियम है। महारभारत में इतनी मिलावट है, जैसे एक किलो दाल में नौ किलो कंकड़। असली दाल ढूँढने में कितनी मेहनत करनी पड़ेगी। दो-चार मिनिट में फैसला नहीं होगा। पर बैठकर के रिसर्च करनी पड़ेगी। तब पता लगेगा। ये सब बातें काल्पनिक है, झूठ बाते हैं। इसलिए इन्हें बु(ि स्वीकार नहीं करती।
अगला प्रश्न है, कि ‘भीष्म, दुर्योधन का अन्न खाते थे, जिससे बु(ि भ्रष्ट हो गई। इसलिए उसका विरोध नहीं कर पाये। हम भी तो दूषित अन्न खा रहे हैं, तो हमारी बु(ि पर योग का असर कैसे होगा?’ उसका उत्तर यह है, कि यदि हम अच्छा अन्न खायेंगे, अच्छी मेहनत से कमायेंगे, ईमानदारी से कमायेंगे और शु( भोजन खायेंगे। मांस-अण्डे आदि नहीं खायेंगे, सात्विक भोजन खायेंगे, तो योग का असर होगा। जितना पुरुषार्थ करेंगे, उतना लाभ होगा।

(125) शंका :- पुरुषार्थ-चतुष्ट्य में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष है। इसमें ‘काम’ से क्या अभिप्राय है। क्या मोक्ष की प्राप्ति हेतु प्रारंभ के तीन पुरूषार्थ साधने आवश्यक हैं?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

काम’ का मतलब है-अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करना। ‘धर्म’ है- वेद के अनुसार आचरण करना। ‘अर्थ’ है- वेदानुसार आचरण करके
धनादि प्राप्त करना यानि ईमानदारी और मेहनत से धन कमाना।’ और उससे खाना-पीना, रोटी-कपड़ा, मकान आदि का प्रबंध करना ‘काम’ है। जब धर्म, अर्थ और काम, ये तीनों चीजें सि( हो जायेंगी, तब उसके बाद ही ‘मोक्ष’ मिलेगा। जो व्यक्ति ‘धर्म’ का आचरण नहीं करता, वो ‘अर्थ’ नहीं प्राप्त कर सकता, वो काम की पूर्ति भी नहीं कर सकता और उसको ‘मोक्ष’ भी नहीं मिल पायेगा। जो ये तीन ठीक कर लेगा, उसका मोक्ष भी हो जायेगा।

(126) शंका :- सब मनुष्यों को सामाजिक सर्व-हितकारी नियम पालन में स्वतंत्र रहना चाहिए और प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतंत्र रहें। इस नियम का क्या अर्थ है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

सब मनुष्यों को सामाजिक सर्व-हितकारी नियम पालन में स्वतंत्र रहना चाहिए और प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतंत्र रहें। इस नियम का क्या अर्थ है?

(127) शंका :- जब ध्यान में बैठा जाये, तो क्या देखने का प्रयत्न किया जाये। अंधकार, प्रकाश, ओम, प्रतीक या कुछ और?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

तो देखिये! यह लम्बा-चौड़ा विषय है। और हर व्यक्ति का स्तर एक जैसा नहीं होता है। अलग-अलग स्तर के व्यक्ति के लिये अलग-अलग प्रकार के अभ्यास हैं। पहले-पहले आँख खोलकर के भी आप किसी वस्तु को देख सकते हैं। ऐसा पांच दिन, दस दिन, पन्द्रह दिन करें, बहुत दिन नहीं करें। दीवार पर एक ओम अक्षर लिख लीजिये और उस ओम को देखिये। स्थिर दृष्टि से दस-पांच दिन उसको देखिये। पाँच मिनट, दस मिनट रोज देखिये। तो देखते-देखते आपको दृष्टि स्थिर करने का अभ्यास हो जायेगा। उसके बाद फिर इस अभ्यास को बन्द कर देंगे। अगला अभ्यास करेंगे।
फिर आंख बंद करके मन के अंदर कोई प्रकाश, कोई सूर्य, कोई चन्द्रमा, कोई दीपक इस तरह की कोई प्रकाश वाली वस्तु को देखेंगे। आँख बंद करके पांच दिन, दस दिन, पन्द्रह दिन तक देखेंगे, इससे अधिक नहीं। नहीं तो फिर उसी अभ्यास में चिपक जायेंगे, उससे पीछा छुड़ाना मुश्किल हो जायेगा। यह प्रारंभिक अभ्यास है। पहले आंख खोलकर करें, फिर आंख बंद करके करें। आँख बन्द करके कोई प्रकाश देंखे, कोई दीपक देखें, कोई चन्द्रमा देखें, फिर धीरे-धीरे और अगला अभ्यास शुरू करें।
धीरे- धीरे सब प्रकाश को समाप्त कर दें। जैसे मान लीजिये-अमावस्या की रात है, तो उस दिन चन्द्रमा भी नहीं होता और रात को सूरज भी नहीं दिखता। और मान लीजिये कि- खूब गहरे बादल छाये हुये हैं, तो तारे भी नहीं दिखेंगे, उनका भी प्रकाश नहीं है। और यह जो सरकारी बिजली आती है, वो भी बंद। अब तो सब तरफ घुप्प अंधेरा हो जायेगा। फिर ऐसा देंखें, सब तरफ से अंधकार ही अंधकार, कोई प्रकाश नहीं। मन में ऐसा देखेंगे, तो क्या होगा? आपको केवल यह आकाश दिखाई देगा, शून्य आकाश। इस शून्य आकाश में अब ईश्वर का विचार करेंगे। ईश्वर एक देशीय है, या सर्वव्यापक? सर्वव्यापक है। यह सि(ांत की बात है। तो जब ध्यान में बैठेंगे, तब सि(ांत का क्रियात्मक रूप देखेंगे। उसको प्रैक्टिकल करेंगे, कि ईश्वर सर्वव्यापक है। जैसे आकाश दूर तक फैला हुआ है और आकाश की कोई आकृति नहीं है अर्थात् आकाश निराकार है। जैसे आकाश दूर तक फैला हुआ है, निराकार है, ऐसे ही ईश्वर भी आकाश के समान दूर तक फैला हुआ है। और वो भी निराकार है। उसकी भी कोई आकृति नहीं है। तब ऐसे ईश्वर का ध्यान करेंगे, तो आपको सफलता मिलेगी।

(128) शंका :- वेद के होते हुए भी ‘गीता’ का उपदेश देने का क्या प्रयोजन है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

गीता बहुत अच्छी पुस्तक है, उसमें बहुत सारी बातें ठीक हैं। वे वेद व्यास जी की लिखी है। उसमें श्रीकृष्ण जी का उपदेश है। जो व्यक्ति कर्तव्य से विमुख हो गया, उसको कर्तव्य परायण बनाने के लिये ग्रन्थ है। व्यक्ति उसको पढ़ के जोश में आयेगा और अपना काम शुरू कर देगा। बस गीता का इतना ही प्रयोजन है।
स गीता का उपदेश किसने दिया था? श्रीकृष्ण जी ने। किसको दिया था? अर्जुन को। कहाँ पर दिया था? यु( के मैदान में। क्यों दिया था? अर्जुन बेचारा ढ़ीला पड़ गया था। ये सारे चाचा-मामा, ताऊ सामने खड़े हैं। इनको मारूंगा, तो मुझे पाप लगेगा, मुझे तो नरक में जाना पड़ेगा। मैं नहीं लडूंगा। वो बेचारा घबरा गया, उसको भ्रान्ति हो गई, उसने हथियार छोड़ दिये।
स इस स्थिति में श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन को उपदेश दिया। क्या उपदेश दिया? अर्जुन देख, इस समय तेरी बु(ि काम नहीं कर रही। तुझे भ्रान्ति हो गई है। तू यह समझता है कि ये चाचा-मामा, ताऊ सारे मार डालूंगा, तो पाप लगेगा। तुझे पाप नहीं लगेगा। मैं ठीक होश में हूँ और जो कहता हूँ, मेरी बात सुन। तेरी बु(ि इस समय ठीक काम नहीं कर रही है। तू इनको मार, तुझे कोई पाप नहीं लगेगा।
स क्यों मार? क्षत्रिय का धर्म क्या है? जो अन्याय के विरू( लड़ता है, वो क्षत्रिय कहलाता है। जो अन्यायी का विनाश करे, वो क्षत्रिय है। अब ये सारे जितने लोग खड़े हैं, सब अन्याय के पक्ष में हैं, तो इनको मारना तेरा धर्म है। अब तू अपने धर्म का पालन नहीं करेगा, तो लोग क्या कहेंगे, कि अर्जुन तो कायर था, मैदान में पीठ दिखाकर भाग गया, हथियार छोड़कर भाग गया। क्षत्रिय तो अपने धर्म का पालन करता है। अन्यायकारियों को मारना, यह क्षत्रिय का धर्म है। तू क्षत्रिय है, उठा अपने तीर-तलवार और मार इन लोगों को। फिर तुझे क्यूं लगता है, कि मैं इन चाचा-मामा, ताऊ को मारूंगा, तो मुझे पाप लगेगा।
स अब यह तो प्रासंगिक बात आ गई कि चाचा-मामा, ताऊ, गुरू, रिश्तेदार जो भी हैं, ये तो आत्मायें हैं। रिश्ता किन से है, आत्माओं से है, या शरीर से है? रिश्ता तो आत्माओं से है, और आत्मा तो मरती नहीं। फिर तू क्यों डरता है, किसको मार डालेगा, कोई नहीं मरने वाला। यह तो प्रासंगिक बात थी, जो उसकी भ्रान्ति दूर करने के लिये कहना पड़ी। और लोगों ने इसी को ऊंचा चढ़ा दिया। आत्मा अजर-अमर है, इसको जान लो, इसका साक्षात्कार करो, इसी से मुक्ति हो जाती है। यह कोई ‘ मुक्ति प्राप्ति के लिये उपदेश नहीं था। यह तो एक ढ़ीले-ढ़ाले क्षत्रिय को जोश दिलाने वाला ग्रन्थ था। और कृष्ण जी ने बड़ी बु(िमत्ता से उपदेश दिया और वे अपने कार्य में सफल हो गये। अर्जुन की भ्रान्ति दूर हो गई और उसने कहा, ”ठीक है गुरूजी, बात मेरी समझ में आ गई। मैं लडूंगा। योगेश्वर, मेरी बु(ि ठीक हो गई, अब सारी भ्रान्ति दूर हो गई। अब आप जो कहते हो, मैं वही करूंगा। लाओ, मेरा हथियार कहाँ है।” तो यह थी गीता। यह इतिहास का ग्रन्थ है, क्षत्रियों का ग्रन्थ है। उस भावना से गीता को पढ़िये।
स आपको पता है कि गीता कहाँ से निकली? ‘उपनिषद’ में से। उसके महत्व में यही तो लिखा है न। गीता जो है, उपनिषद का सार है। और उपनिषद कहाँ से आये? वो वेद का सार हैं। इस तरह गीता तो सार का भी सार है। सार का सार पढ़ेंगे, तो थोड़ी जानकारी होगी। ओरिजनल टैक्स्टबुक पढ़ेंगे, तो आपकी नॉलेज अच्छी होगी। वेद ओरिजनल टैक्स्टबुक है, वो ईश्वर ने दिया। और उसका सार उपनिषद् है। और उसका भी सार गीता है।
स यदि मोक्ष में जाना हो, तो उसके लिये दर्शन है, उपनिषद है, वेद हैं, इन ग्रन्थों को पढ़िये। तब आपका मोक्ष होने वाला है।
स ‘टैक्स्टबुक’ पढ़ने से अधिक अच्छी जानकारी होती है या ट्वेन्टी इम्पोर्टेन्ट क्वेश्चन पढ़ने से ज्यादा अधिक जानकारी होती है? ‘टैक्स्टबुक’ पढ़ने से अच्छी नॉलेज होती है। गीता कोई टैक्सबुक है क्या? गीता तो ‘ट्वेन्टी इम्पॉर्टेन्ट क्वेश्चन’ सीरीज है। ओरिजनल टैक्स्टबुक को पढ़िये, वो ‘वेद’ है। वेद पढ़िये, फिर आपका नॉलेज अच्छा होगा और फिर आप मोक्ष में जा सकते हैं।
स कुछ गड़बड़ बातें बाद में लोगों ने इसमें मिक्स कर दीं। उनको अलग कर दीजिये और जो अच्छी बातें हैं, उन्हें स्वीकार कीजिये।

(129) शंका :- क्या व्यक्ति को बुरे कर्म करने के पश्चात अन्य सभी योनियों को भोगना पड़ेगा अथवा कुछ योनियों के पश्चात् वापस मानव जन्म मिलेगा?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

एक व्यक्ति ने 20 हजार रुपये की चोरी की, दूसरे व्यक्ति ने दो अरब रुपये की चोरी की। चोरी दोनों ने की, इसलिए दोनों अपराधी हैं। निःसंदेह दोनों को दण्ड मिलेगा।
क्या दण्ड की मात्रा दोनों की समान रहेगी, या कम अधिक? दण्ड की मात्रा कम-अधिक होगी। क्योंकि दोनों को बराबर दण्ड दिया जाये, तो यह न्याय थोड़े ही होगा, यह तो अन्याय होगा। एक ने अपराध थोड़ा किया, तो उसको थोड़ा दण्ड। और एक ने अधिक अपराध किया, तो उसको अधिक दण्ड, यह न्याय है। किसी ने 20 हजार पाप किये, किसी ने 50 हजार पाप किये। और दोनों को ही 84 लाख योनियों में डाल दें, तो फिर यह न्याय कहां होगा? जिसने जितना अपराध किया, उतनी ही योनियों में जायेगा, दण्ड भोगेगा, धक्का खायेगा और लोटकर वापस मनुष्य बनेगा। जिसने थोड़ा अपराध किया, वह थोड़ी योनियों में धक्का खायेगा। जिसने ज्यादा अपराध किये, वो ज्यादा योनियों में जायेगा। इसलिये सब को 84 लाख योनियों में नहीं जाना। यही न्याय है।

(130) शंका :- क्या हजारों वैज्ञानिकों की तुलना में एक ब्रह्मवेत्ता द्वारा संसार का उपकार अधिक होता है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

हाँ! बिल्कुल अधिक होता है। ये सैकड़ों वैज्ञानिक मिलकर के विज्ञान के अविष्कार तो कर देंगे और अच्छी चीजें भी बनायेंगे, बना भी रहे हैं। इन्होंने बड़ा अच्छा परिश्रम किया, हम इनकी प्रशंसा करते हैं। लेकिन जो मनुष्य की मूल आवश्यकता है, उसकी पूर्ति वैज्ञानिक लोग नहीं कर सकते। ये रेडिया बना देंगे, टेलीवीजन बना देंगे, सैटेलाईट बना देंगे, कम्प्यूटर बना देंगे, मोबाईल फोन बना देंगे, सारी सुविधा दिला देंगे, पर व्यक्ति को इससे आगे शांति भी चाहिये। वो शांति ये नहीं दिला सकते। वो इनके बस की बात नहीं है। हजारों वैज्ञानिक भी मिलकर के मनुष्य की अंतिम इच्छा को पूर्ण नहीं कर सकते लेकिन एक ब्रह्मवेत्ता कर सकता है। वो लोगों को शांति दिला सकता है। उसके पास समाधान है। जैसे एक विद्यार्थी गया था काकरिया तालाब में डूबने के लिये, तो एक वृ( व्यक्ति ने उसको समझा दिया न, और उसको समझ में आ गई बात। फिर उसने मरना कैन्सिल कर दिया। तो ऐसे ही एक ब्रह्मवेत्ता लोगों की आखिरी इच्छा पूर्ण कर सकता है।
जब तक व्यक्ति के पास शांति नहीं है, तब-तक उसके पास सारे साधन होते हुये भी उसका जीवन व्यर्थ है। वेद आदि शास्त्र, )षि मुनि लोग इस बात को मानते हैं, कि यदि आपके पास शांति है, तो सब कुछ है। और शांति नहीं है, तो कुछ भी नहीं है। भौतिक साधन कितने भी हों, उससे आपका जीवन संतुष्ट नहीं होगा, तृप्त नहीं होगा। और फिर अन्त में लोगों को वहीं समाधान दिखता है- जापान वाला। आत्महत्या कैसे करें?

(131) शंका :- योगाभ्यास को कष्ट न समझकर करें, तो क्या उसमें सफलता मिल सकती है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

बिल्कुल मिल सकती है। योगाभ्यास को कष्ट मानकर के मत कीजिये, तपस्या मानकर के कीजिये, तो आपको सफलता मिलेगी। कष्ट मानकर करेंगे, तो सफलता नहीं मिलेगी। आप योगाभ्यास को कष्ट मानकर करेंगे, तो मन में खिन्नता हो जायेगी, मन चंचल हो जायेगा, अस्थिर हो जायेगा, तो सफलता नहीं मिलेगी। तपस्या मानकर करेंगे तो मन में प्रसन्नता होगी, शांति और स्थिरता होगी और आप योगाभ्यास में सफल हो जायेंगे।

(132) शंका :- जहाँ अपना अनुभव काम नहीं कर पा रहा हो, स्थिति डावाँडोल हो रही हो, तब योगाभ्यासी किसके आधार पर दृढ होता है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

तो इसका उत्तर यही है, कि अपने से जो अधिक अनुभवी लोग हैं, अपने से जो अधिक योग्य हैं, प्राचीन काल के )षि मुनि हैं और वेद हैं, उन ग्रन्थों को देखना चाहिये। महान् पुरूषों को देखना चाहिये, कि वे लोग ऐसी परिस्थिति में क्या करते थे। शास्त्र क्या बोलते हैं, कि जब हमारी स्थिति खराब हो रही हो, तब ऐसी परिस्थिति में हमें क्या करना चाहिये। उन प्राचीन )षि मुनियों के जीवन वृत्तान्त से, उनके इतिहास से, उनकी दिनचर्या से, उनकी शैली से हमें पता चल जायेगा, कि क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये।

(133) शंका :- हमारा ज्ञान सत्य है, या नहीं। यह जानने के लिये अपने ज्ञान की तुलना किसके ज्ञान के साथ करनी चाहिये?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

हम कोई बात समझ रहे हैं। वो ठीक समझ रहे हैं, या गलत समझ रहे हैं, इसका निर्णय करने के लिये अपने ज्ञान की तुलना वेद के साथ करनी चाहिये। अथवा अन्य प्रमाणों के साथ करनी चाहिये। प्रत्यक्ष प्रमाण, अनुमान प्रमाण आदि-आदि प्रमाणों से तुलना करनी चाहिये, कि मैं तो यह समझ रहा हूँ, और इस बारे में शब्द प्रमाण क्या कह रहा है, वेद क्या कह रहा है, )षि लोग क्या कह रहे है। यदि वे भी वही कुछ कह रहे हैं, जो मैं समझ रहा हूँ, तो मेरा ज्ञान ठीक है। और वेद कुछ और कह रहा है, और मैं कुछ और समझ रहा हूँ, तो इसका मतलब गड़बड़ है। गड़बड़ कहाँ है, मुझमें या वेद में? मुझमें गड़बड़ है, वेद झूठा नहीं है। हमारे समझने में भूल हो सकती है, ईश्वर के कहने में भूल नहीं है। इस प्रकार अपने ज्ञान का निर्णय करने के लिये वेद से तुलना करो, )षियों के ग्रन्थों से तुलना करो तो पता चल जायेगा कि हम ठीक ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं अथवा हम गड़बड़ (भ्रान्ति( में है।

(134) शंका :- श्रीराम ने बाली का वध छुपकर के किया, और छुपकर के दुश्मन को मारना या किसी को मारना, यह तो गद्दारी है। ऐसा कुछ लोग कहते हैं?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

जब यु( के नियमों का उल्लंघन किया जाये अथवा जो विधि-विधान है, कानून है, जो हमारा कर्तव्य है, हम उसको भंग करते हैं, तो उसका नाम गद्दारी है, उसका नाम देशद्रोह है। यु( में तो रणनीति में कई तरह के नियम होते हैं। उसमें सामने से भी हमला होता है, छुपकर के भी होता है। दुष्ट के साथ तो छुपकर के ही व्यवहार किया जाता है, यह तो यु( का नियम है। श्रीराम जी ने यु( के नियम का पालन किया, उल्लंघन नहीं किया। इसलिये उनको गद्दार नहीं कह सकते। जब श्रीराम जी ने तीर मार दिया, और फिर श्रीराम जी सामने आ गये, तो बाली ने पूछा कि- भई! श्रीराम जी आपने मुझको छुपकर के मारा, यह तो आपने ठीक नहीं किया। यह तो नियम का उल्लंघन किया। आपने मुझे किस अधिकार से मारा? आपको लड़ना था तो मेरे सामने आकर लड़ते, तो पता चलता कि कितने क्षत्रिय हो। छुपकर के मारा, यह तो आपने नियम तोड़ दिया। उस समय श्रीरामचंद्र जी ने क्या उत्तर दिया। श्रीराम ने कहा, कि हम जिस परिवार से आये हैं, जिस वंश के हैं, उस वंश का इस धरती पर चक्रवर्ती शासन है। इस समय महाराजा भरत चक्रवर्ती राजा हैं। तुम महाराजा भरत के अंतर्गत उनके अधीन हो। महाराजा भरत के अंतर्गत रहते हुए तुमने अपने भाई पर अन्याय किया है, अत्याचार किया है। पहले गलती तुमने की है। और हम महाराजा भरत की ओर से तुमको दंड देने आये हैं। हमने दंड देकर के न्याय किया है। हमने कोई छल-कपट नहीं किया, कोई धोखा नहीं दिया। यह श्रीराम ने ऐसा न्यायपूर्ण उत्तर दिया। इसलिये उन्हें गद्दार कहना गलत है।

(135) शंका :- यदि मन जड़ है, तो ‘मन’ बंधन और ‘मोक्ष’ का कारण कैसे है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

क्यों जी, कारण बनने में क्या दिक्कत है मन को। अच्छा ये बताईयेः- खीर, पुड़ी, हलवा जड़ है या चेतन? जड़ है न। तो ये चीजें आप खाते-पीते हैं, उसमें सुख लेते हैं, तो वो आपके बंधन का कारण बनती है। जब ये खीर-पुड़ी, हलवा, मिठाई आदि जड़-वस्तुएँ आपके बंधन का कारण हो सकती हैं, तो मन भी जड़ है, वो बंधन का कारण क्यों नहीं हो सकता? एक शास्त्र में तो लिखा ही है ‘मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः’ अर्थात् मन ही मनुष्यों के बंधन और मोक्ष का कारण है। इस बात का अभिप्राय यह मत समझना कि जड़-वस्तु हमको अपनी स्वतंत्रता से बांध लेती है। शायद प्रश्न पूछने वाले इस भावना से पूछ रहे हैं, कि जड़-वस्तुएँ हमको कैसे बाँध लेगी? जड़-वस्तु होकर के भी हमें बाँध लेती है, पर वो हमें बाँधने में पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है। यदि हम बंधना चाहें, तो वो हमको बाँध सकती है। यदि हम नहीं बंधना चाहें तो नहीं बाँध सकती।
उदाहरण- एक व्यक्ति ठंडी के मौसम में सो रहा था। उठने का समय हो गया, और वो उठ नहीं रहा था। तो उसके घर के दूसरे व्यक्ति ने कहा- भई उठो, क्या बात है ऑफिस नहीं जाना है क्या? वो कहता है- जी मैं क्या करूँ, मैं तो उठना चाहता हूँ, पर यह रजाई मुझे नहीं छोड़ती। अब बताईये, रजाई नहीं छोड़ती या वो रजाई को नहीं छोड़ रहा। और बोलता क्या है, यह रजाई मुझे नहीं छोड़ती। ठीक इसी तरह से मन सीधा-सीधा बंधन का कारण नहीं है। न मन सीधा-सीधा मोक्ष का कारण है। बंधन और मोक्ष का कारण सीधा-सीधा तो जीवात्मा है। जीवात्मा अगर मोक्ष में जाना चाहे, तो मन उसको मोक्ष में जाने के लिए पूरा सहयोग देगा। और जीवात्मा बंधन में ही रहना चाहता है, वो मोक्ष में जाना ही नहीं चाहता, तो फिर मन उसको बंधन में डाल देगा। मन का कोई दोष नहीं है। मन एक जड़ वस्तु है, फिर भी वो इस नाम से कह दिया जाता है। जैसे यह कह दिया जाता है, कि मेरी तो इच्छा है, पर यह रजाई मुझे नहीं छोड़ रही। जैसे वो मोटी सी बात कह दी, ऐसे ही ये मोटी सी बात है। मन का संचालन आत्मा के अधीन है। आत्मा चाहेगा, तो मन से बंधन अथवा मोक्ष दोनों कर सकता है।

(136) शंका :- ईश्वर ने सृष्टि बनाई, यह कैसे सि( करें?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

देखिये, तीन पदार्थ हैं- एक ईश्वर, एक जीवात्मा,एक प्रकृति। इन तीनों के बारे में विचार करेंगे, बारी-बारी से चिंतन करेंगे। फिर कोई न कोई निर्णय हो जाएगा।
पहला प्रश्न- क्या जीवात्मा सृष्टि बना सकता है। उत्तर है- जीवात्मा सृष्टि को नहीं बना सकता। तारों को नहीं बना सकता, पृथ्वी को नहीं बना सकता। यह उसके वश की बात नहीं है। उसमें इतनी शक्ति, बु(ि व योग्यता ही नहीं है। तो तीन में से एक का निर्णय तो हो गया, कि जीवात्मा सृष्टि नहीं बना सकता।
दूसरा प्रश्न- क्या प्रकृति स्वयं पृथ्वी बना सकती है? उत्तर है- कभी नहीं बना सकती। क्योंकि उसमें अक्ल ही नहीं है। सृष्टि की रचना को देखने से पता चलता है, कि कितनी बु(िमत्ता का इसमें प्रयोग किया गया है। बहुत बु(िमता से व्यवस्थित पृथ्वी बनी हुई है। किसी भी पेड़-पत्त्ते को देख लीजिए। वनस्पति शास्त्र पढ़िये। ऊँचे नीचे वृक्षों की रचना को देखिए, तो आपको पता चलेगा, कि कितनी व्यवस्थित है। शरीर विज्ञान पढ़िये। शरीर रचना को देखिए, कि वो कितनी व्यवस्थित है। नस, नाड़ियाँ, पाचन तंत्र, तंत्रिका तन्त्र आदि, सारे सिस्टम कितने व्यवस्थित हैं। इनमें जो इतनी व्यवस्था है- इसको प्रकृति अपने आप नहीं बना सकती। उसमें इतनी अक्ल नहीं है। तीन में से दो का निर्णय हो गया। न तो जीवात्मा बना सकता है। उसमें इतनी विद्या और शक्ति नहीं है। न तो प्रकृति स्वयं बना सकती है, क्योंकि उसमें तो बिल्कुल अक्ल ही नहीं है। अब तीन में से दो का निर्णय हो गया। बाकी कौन बचा? जो बचा है, वही सृष्टिकर्ता है। इसमें वही है- परिशेष न्याय। यानी बचे हुए पदार्थ का नियम। तो तीन में से दो बातें कैंसिल हो गयीं। जीव और प्रकृति ने सृष्टि नहीं बनाई। बाकी ‘ईश्वर’ बचा, उसी ने जगत बनाया। यह अनुमान प्रमाण से सि( हो गया, कि ईश्वर ने ही ‘सृष्टि’ बनाई है। उसमें इतनी बु(ि और इतनी शक्ति है, कि वह अकेला ही सारी सृष्टि बना देता है।
ईश्वर की सि(ि प्रत्यक्ष प्रमाण से कैसे करेंगे? उत्तर है, कि- एक होता है, ‘बाह्य प्रत्यक्ष’, और एक होता है, ‘आंतरिक प्रत्यक्ष’। जब कोई व्यक्ति अच्छा काम करने लगता है, तो उसको अपने अंदर से आनंद, उत्साह, निर्भयता जैसे अनुकूल भाव महसूस होते हैं। और जब बुरा काम करने की योजना बनाता है, तब अंदर से भय, शंका, लज्जा का अनुभव होता है। ‘सत्यार्थ-प्रकाश’ में लिखा है- यह जीवात्मा की ओर से नहीं, परमेश्वर की ओर से है। अब अगर हमको भय, शंका लज्जा का अनुभव होता है, तो यह प्रत्यक्ष अनुभव है। यह किसकी ओर से है? ईश्वर की ओर से है। यह ईश्वर का आंतरिक प्रत्यक्ष है। परन्तु स्थूल (मोटे( स्तर का प्रत्यक्ष है। इसके बाद का सूक्ष्म प्रत्यक्ष भी होता है, जो सारे जीवों को नहीं होता है। स्थूल प्रत्यक्ष का अनुभव तो सभी लोग कर सकते हैं। जो बुरा काम करेगा, उसके अन्दर भय, शंका, लज्जा होगी। ईश्वर अपना सिग्नल भेज रहा है, कि गलत काम कर रहे हो। यह है- रेड सिग्नल, यानि खतरा है। मत करो। तो इस तरह ईश्वर का आंतरिक स्थूल अनुभव हो सकता है। विशेष सूक्ष्म प्रत्यक्ष करना हो, तो ‘समाधि’ लगाइये। समाधि में ईश्वर का विशेष- (सूक्ष्म( अनुभव या प्रत्यक्ष होता है। उसमें ईश्वर से आनन्द, ज्ञान, बल आदि मिलता है। अब समाधि का अनुभव हम आपको शब्दों से नहीं बता सकते। क्योंकि यह अन्दर से स्वयं ही अनुभव करने की वस्तु है। उदाहरण के लिए, जब आपने रसगुल्ला खाया, तब उसमें कैसा टेस्ट लगा? बढ़िया लगा। आप कैसे समझाओगे? नहीं समझा सकते। आप सभी यही कहेंगे, कि ‘बड़ा अच्छा है, बड़ा स्वादिष्ट है, बहुत मीठा है।’ इतना कहने से क्या मुझे समझ में आ गया, कि यह कैसा स्वाद है। जब आप रसगुल्लों जैसी स्थूल वस्तु का स्वाद नहीं समझा सकते, तो हम आपको भगवान जैसी सूक्ष्म वस्तु का आनंद कैसे समझाऐंगे? वो तो और बहुत कठिन है। तो शास्त्रकार लिखते हैं- ”न शक्यते वर्णयितुं गिरा”अर्थात् वाणी से उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। ”स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते।”
अंतःकरण से, अन्दर से ही ईश्वरानुभूति का आनन्द महसूस होता है। उसको हम अन्दर से ही अनुभव कर सकते हैं, वाणी से नहीं समझा सकते। वाणी से सिर्फ इतना ही बोल सकते हैं- बहुत बढ़िया होता है, बहुत अच्छा है, बहुत आनंद आता है। वाणी से इससे अधिक नहीं कह सकते। तो ईश्वर का आन्तरिक सूक्ष्म प्रत्यक्ष कैसा होता है, समाधि लगाओ तब ही पता चलेगा।

(137) शंका :- समाधि की प्राप्ति में गुरू का कितना सहयोग चाहिये?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

समाधि की प्राप्ति में ‘गुरू’ का उतना ही सहयोग चाहिए, जितना कि वैज्ञानिक (साइंटिस्ट( बनने के लिए साइंस टीचर का चाहिए। जैसे साइंस टीचर के बिना कोई व्यक्ति साइंटिस्ट नहीं बन सकता, वैसे ही बिना गुरू के ‘समाधि’ की उपलब्धि संभव नहीं है। वस्तुतः सामान्य नियम तो यही है। हालांकि इसके अपवाद भी हो सकते हैं। कोई ऐसा भी हो सकता है, जो पूर्व जन्म के संस्कार और विद्या लेकर आया हो, वह किसी मनुष्य को गुरू बनाये बिना ही पूर्व संचित विद्या से पुरूषार्थ करके और ईश्वर रूपी गुरू की सहायता से समाधि को प्राप्त कर ले। दरअसल,अपवाद (एक्सेप्शन( हर जगह होते हैं। इसलिए यदि किसी को मनुष्य शरीरधारी गुरू के बिना समाधि प्राप्त हो जाए, तो वह अपवाद की श्रेणी में रखा जाएगा। लेकिन यह सामान्य यही नियम नहीं है। सामान्य नियम तो यही है, कि जैसे गणित पढ़ाने के लिए,साइंस पढ़ाने के लिए,कॉमर्स पढ़ाने के लिए अध्यापक, शिक्षक चाहिए। वैसे ही योग समाधि के लिए भी देहधारी शिक्षक चाहिए,गुरूजी चाहिए।

(138) शंका :- मोक्ष में आत्मा के साथ में मन, बु(ि, चित्त, कारण शरीर आदि रहते हैं या नहीं?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

मोक्ष में ये प्राकृतिक शरीर, मन, बु(ि, चित्त, इन्द्रियाँ, यह स्थूल शरीर, कोई भी साथ में नहीं रहता। प्रकृति से बना कोई भी शरीर मोक्ष में नहीं रहता। कारण शरीर भी प्राकृतिक है। सत्त्व, रजस, और तमस जो मूल प्रकृति है, उसका नाम ही कारण शरीर है। वो भी साथ नहीं रहता। कोई प्राकृतिक शरीर साथ नहीं रहता मोक्ष में। जीवात्मा के 24 शु( गुण सत्यार्थ-प्रकाश के नौंवे समुल्लास में लिखे हैं। वो साथ रहते हैं। और ईश्वर का आनंद मिलता है। ईश्वर के मुक्तात्मा के साथ होता है। बस मोक्ष में इतना ही होता है। प्रकृति या प्राकृतिक संबंध नहीं होता। जीवात्मा मुक्ति में परमात्मा की शक्ति से सुनेगा, देखेगा, सारे काम करेगा। जीवात्मा और परमात्मा दोनों अलग-अलग हैं। दोनों की शक्ति अलग है। ईश्वर की शक्ति के सहयोग से ‘मुक्त-आत्मा’ सारे काम करता है। मोक्ष में प्रकृति वाला मन नहीं रहता है। सत्यार्थ प्रकाश का नौंवा समुल्लास पढ़िये। उसमें जीवात्मा की चौबीस शक्तियाँ लिखी हैं। उसमें जीवात्मा की एक मनन शक्ति भी है। वो मनन शक्ति से मनन करेगा, घ्राण शक्ति से सूंघेगा, दर्शन शक्ति से देखेगा, श्रवण शक्ति से सुनेगा। पर उसकी अपनी शक्ति बहुत कम है। जीवात्मा केवल अपनी शक्ति से मुक्ति में सारे काम नहीं कर सकता। उसमें ईश्वर की शक्ति और साथ उसके जुड़ेगी

(139) शंका :- स्वार्थ की व्याख्या करें? कृपया तीन-चार व्यावहारिक उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

स्वार्थ का मतलब होता है- केवल अपने लाभ की बात सोचना, दूसरों के लाभ और भले की बात नहीं सोचना। इसको बोलते हैं ‘स्वार्थ’। यह मोटी सी परिभाषा है। पहला उदाहरण- खाने का नंबर आया, तो मुझे खाना मिलना चाहिये, दूसरों को मिले या न मिले, उसकी परवाह नहीं है। यह स्वार्थ की बात है। सोने की बारी आयी, मेरा बिस्तर बढ़िया होना चाहिये, मेरी जगह साफ-सुथरी, पंखे के नीचे होनी चाहिये, दूसरे को पंखे की हवा मिले या न मिले, मुझे कोई मतलब नहीं। यह स्वार्थ की बात है। धंधे व्यापार के क्षेत्र में- मेरी दुकान चलनी चाहिये, दूसरे की चले न चले। यह स्वार्थ की बात है। तो ऐसे आप कितने ही उदाहरण बनाते जायें। खाने में, पीने में, घूमने में, सोने में, जागने में, सुविधा में, बिस्तर में, कपड़ों में। जब केवल व्यक्ति अपने ही मतलब की बात सोचता है, अपने ही लाभ की बात सोचता है, दूसरों के लाभ और भले लिये कुछ नहीं सोचता, तो इसको स्वार्थ कहते हैं। जब व्यक्ति अपने लिये और दूसरों के लिये, यानी दोनों के लिये सोचता है, औरों को भी मिले, मुझे भी मिले, तो वो ठीक बात है, वो स्वार्थ की बात नहीं है, वो परोपकार की बात है। मेरा भी काम चले, दूसरों का भी चले। मैं पढूँ, दूसरे भी पढ़ें। मैं भी सुखी रहूँ, दूसरे भी सुखी रहें। मुझे भी खाने को मिले, दूसरों को भी मिले। मुझे भी सोने की जगह मिले, दूसरों को भी मिले। मैं भी दुःख से छूटूँ, दूसरा भी छूटे। ऐसे सोचना चाहिये।

(140) शंका :- किसी ने चोरी की और भगवान ने नहीं देखा। क्या यह हो सकता है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

समाधान-ऐसा नहीं हो सकता, कि किसी ने चोरी की और भगवान ने उसे देखा नहीं। भगवान सब जगह रहता है और सबको देखता है। जो भी चोरी करता है, भगवान उसे देखता है। फिर उसके कर्मों के खाते में जमा कर देता है। और समय आने पर उसको दण्ड भी देता है।

(141) शंका :- मोक्ष में जीवात्मा आनंद का अनुभव कैसे करता है। क्या वह समझता है, कि आनंद प्राप्त कर रहा है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

हाँ बिल्कुल, मोक्ष में उसको पूरा अच्छी तरह अनुभव होता है, कि मैं आनंद प्राप्त कर रहा हूँ। जैसे- आपके सामने प्लेट में रसगुल्ले रखे हैं, और आप जाग रहे हैं, अच्छी तरह होश में हैं। आप जब रसगुल्ले खा रहे हैं, तो आपको पता चलता है, कि रसगुल्ले का स्वाद ले रहे हैं। जैसे आप जागृत अवस्था में रसगुल्ले, मिठाई खाते हैं, उसका स्वाद मिलता है, सुख मिलता है। और आप समझ रहे हैं कि हम रसगुल्ले का स्वाद ले रहे हैं, उसका सुख भोग रहे हैं। ऐसे ही मोक्ष में जीवात्मा को पूरा-पूरा होश रहता है। उसे पूरा-पूरा पता चलता है, कि हम ईश्वर का आनंद ले रहे हैं। ईश्वर का आनंद उसको मिलता रहता है। और वो ठीक ऐसे ही समझता है, जैसे हम जागृत अवस्था में यहाँ संसार में समझते हैं, कि हम सुख भोग रहे हैं। यह मोक्ष में जीवात्मा द्वारा आनंद भोगने की स्थिति है।

(142) शंका :- हम अध्यापक हैं, और हमारे विद्यार्थी बार-बार कहने पर भी मानते नहीं, तो हमें गुस्सा आता है। क्या यह सही है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

विद्यार्थी नहीं मानते, तो न मानें। विद्यार्थी नहीं सुधरते तो न सुधरें। लेकिन क्रोध कर हम नहीं बिगड़ेंगे। हम बिगड़ने के लिये नहीं आये। हम सुधरने के लिये आये हैं। विद्यार्थी भी सुधरने के लिये आयें। वो सुधरते हैं, तो बहुत अच्छी बात है। और नहीं सुधरते, तो उनसे कह दो अपने घर जाओ, दूसरी संस्था में जाओ, कहीं भी जाओ। हमें मत बिगाड़ो, हम नहीं बिगड़ेंगे। इसलिये हमें क्रोध नहीं करना है।

(143) शंका :- शंका-प्रकृति तीन तत्त्वों का समुदाय है? इनमें सत्त्व प्रकाशशील, सुखस्वरूप, रजोगुण क्रियाशील, तमोगुण स्थितिशील है। प्रकृति से बने संसार अर्थात् विकृति में ये तीनों गुणों को देखकर ऐसा संदेह होता है कि ये गुण ही स्वयं विकृति करते हैं। फिर सृष्टि निर्माण में ईश्वर की क्या और क्यों आवश्यकता है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

शंका-प्रकृति तीन तत्त्वों का समुदाय है? इनमें सत्त्व प्रकाशशील, सुखस्वरूप, रजोगुण क्रियाशील, तमोगुण स्थितिशील है। प्रकृति से बने संसार अर्थात् विकृति में ये तीनों गुणों को देखकर ऐसा संदेह होता है कि ये गुण ही स्वयं विकृति करते हैं। फिर सृष्टि निर्माण में ईश्वर की क्या और क्यों आवश्यकता है?

(144) शंका :- मोक्ष की इच्छा एक कामना है, मोक्ष की कामना से किया हुआ निष्काम कर्म सकाम हो सकता है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

पूछना शायद ऐसा चाहते हैं कि मोक्ष की कामना भी तो एक कामना है? यदि मोक्ष की कामना से कर्म किया गया, तो फिर वो निष्काम कर्म कैसे हुआ? कामना तो उसमें भी है। महर्षि दयानंद जी ने )ग्वेदादि भाष्य भूमिका में परिभाषा लिखी है कि- ”परमेश्वर प्राप्ति या मोक्ष प्राप्ति को लक्ष्य बनाकर जो कर्म किये जाते हैं, उसका नाम ही निष्काम कर्म है।” बिना कामना के तो कर्म हो ही नहीं सकता, वह असंभव है। व्यक्ति जो भी क्रिया करता है, वो कामनापूर्ण ही होती है। यह बात ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में लिखी है। हमें पता भी नहीं चलता कि हमने कितनी बार आंख बंद की और कितनी बार खोली। वो भी जब बिना इच्छा के नहीं होती। तब यज्ञ करना, दान देना, सेवा करना, प्रचार करना आदि इतने बड़े-बड़े काम बिना इच्छा के कैसे हो सकते हैं? नहीं हो सकते। कामना तो जरूर है, पर कामनाओं में अंतर है। लौकिक सुख की कामना किया तो वह सकाम कर्म है। और मोक्ष सुख की कामना से कर्म किया तो निष्काम कर्म है। ऐसा जानना चाहिये।

(145) शंका :- जो संन्यासी होते हैं, उनका मुख्य लक्ष्य ईश्वर को प्राप्त करना अथवा समाधि प्राप्त करना होता है। एक योगाभ्यासी बनने के लिये हमें लोभ, मोह, लालच नहीं करना चाहिये। सवाल उठता है, कि क्या ईश्वर को प्राप्त करना लोभ, मोह, लालच नहीं है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

ईश्वर को प्राप्त करना या मोक्ष प्राप्त करना, कोई लोभ नहीं है। लोभ की परिभाषा अलग है। जब परिभाषा पकड़ लेंगे, तो प्रश्न स्वतः सुलझ जायेगा। दो साबुन खरीदो और तीसरा मुफ्त में, यह लोभ है। आप बिना कर्म किये वस्तु प्राप्त करना चाहते हैं। कर्म तो किया आपने दो साबुन का और प्राप्त करना चाहते हैं तीन। तो बिना पुरूषार्थ किए, बिना कर्म किये, बिना पेमेंट किये, बिना पैसा दिये, आप जो मुफ्त में लेना चाहते हैं, उसका नाम है-लोभ।
जो संन्यासी बनता है, ईश्वर प्राप्त करना चाहता है, मोक्ष प्राप्त करना चाहता है, तो क्या वो मुफ्त में प्राप्त करना चाहता है या पुरूषार्थ करके प्राप्त करना चाहता है? पुरूषार्थ करके। तो लोभी नहीं हुआ। बिना पुरूषार्थ किए वह मोक्ष प्राप्त करना चाहे, तब तो वो लोभ है। लेकिन वो तो पुरूषार्थ करता है, पूरी मेहनत करता है।
और यह नियम है, कि जो पुरूषार्थ करेगा, उसको फल अवश्य मिलेगा। जैसा कर्म, वैसा फल। ईश्वर न्यायकारी है, फल तो देगा। तो यदि पुरूषार्थ करके कोई व्यक्ति धन प्राप्त करना चाहता है, तो यह न्याय की बात है, उचित बात है,
धर्म की बात है। तो करो पुरूषार्थ, क्योंकि इसमें तो कोई आपत्ति नहीं है। वैसे ही कोई पुरूषार्थ करके ईश्वर को प्राप्त करना चाहता है, तो यह न्याय की बात है, वो लोभ नहीं है। इसलिये ईश्वर प्राप्ति करना या मोक्ष प्राप्ति करना कोई लोभ नहीं है, कोई अधर्म नहीं है, कोई अन्याय नहीं है। यह बिल्कुल उचित है। ऐसा आप भी कर सकते हैं। इसलिए जोर लगाओ, संन्यासी बनो।
संन्यासी बनने से तो लोगों को डर लगता है, कि हमको संन्यासी बनवा देंगे, घर छुड़वा देंगे। मोक्ष में जाने के लिये संन्यास लेना अनिवार्य (कम्पलसरी( है। आज लो, बीस जन्म बाद लो, पचास जन्म के बाद लो, लेना तो पड़ेगा और कोई रास्ता नहीं है।
मोक्ष का रास्ता क्या है? पहले मनुष्य का जन्म धारण करो। और फिर मनुष्यों में ऊँचे-ऊँचे स्तर के मनुष्य बनते जाओ, ऊँची-ऊँची योग्यता प्राप्त करते जाओ। पहले शूद्र के यहाँ जन्म हो गया। फिर पुरूषार्थ करके हमने अच्छे कर्म किये, मेहनत की, तो वैश्य के गुणकर्म को धारण कर लिया, फिर वैश्य बन गये। जन्म की बात नहीं कर रहा हूँ, वर्ण-व्यवस्था गुण कर्मों से है, जन्म से नहीं। वैश्य वाली योग्यता प्राप्त कर ली, उसके बाद फिर और ऊँचे उठे, क्षत्रिय बन गये। फिर और ऊँचे उठे, ब्राह्मण बन गये। फिर ब्राह्मणों में भी और ऊँचे ब्राह्मण बन गये। फिर उनमें भी और ऊँचे उठे, संन्यासी बन गये। और संन्यास के बाद फिर मोक्ष होता है। यह है क्रम। मोक्ष में जाने की प(ति इस प्रकार से है। तो जो-जो मोक्ष में जाना चाहते हैं, उनको यह सब क्रम अपनाना पड़ेगा। योग्यता बनानी पड़ेगी, ब्राह्मण बनना पड़ेगा, संन्यासी बनना पड़ेगा, घर छोड़ना पड़ेगा, संसार छोड़ना पड़ेगा, तब मोक्ष होगा। मेरा प्रवचन सुनकर के, आप जोश में आकर, कल ही घर मत छोड़ देना। करना यही पड़ेगा, लेकिन कब करें? उसके लिए तैयारी करनी पड़ेगी, योग्यता बनानी पड़ेगी। आपको घर छोड़ने की तैयारी करने में पाँच-दस वर्ष निकल जायेंगे। आज से आप सोचना शुरू करें, कि हमें घर छोड़ना है, हमें वानप्रस्थ लेना है, हमें संन्यास लेना है, योग्यता बनानी है। तो उसमें भी पाँच-दस वर्ष निकल जायेंगे। इसलिये जोश में आकर कोई काम नहीं करना चाहिये। होश में रहकर बु(िमत्ता से अपने सामर्थ्य को ध्यान में रखकर के करना चाहिये। तैयारी जरूर कर सकते हैं। तैयारी तो आप आज से भी शुरू कर सकते हैं, कि हम समय आने पर योग्यता बनाकर वानप्रस्थ लेंगे, संन्यास लेंगे।

(146) शंका :- सर्वार्न्तयामी’ का अर्थ क्या है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

सर्व’ यानि सभी में, ‘अर्न्तयामी’ अर्थात् अन्दर रहकर नियंत्रण करने वाला। जो सबके अन्दर रहता है, मन की सारी बातें जानता है और नियंत्रण करता है, यह सभी बातें सर्वार्न्तयामी से जुड़ी हुई हैं। ‘ईश्वर’ सर्वार्न्तयामी है। जब व्यक्ति बुरी योजना बनाता है, तो ईश्वर अन्दर से भय, लज्जा व शंका उत्पन्न करता है और वह बुरा काम करने से रोकता है। यही ईश्वर का नियंत्रण है। इसके विपरीत, जब व्यक्ति अच्छी योजना बनाता है, तो ईश्वर आनंद व उत्साह देता है, प्रोत्साहित करता है। सर्वार्न्तयामी ईश्वर हाथ पकड़कर किसी काम से नहीं रोकता, बल्कि मानसिक रूप से ही बुरा काम करने की मनाही करता है और सही काम के लिए प्रेरित करता है। यही उसका ‘सर्वान्तर्यामी’ रूप है।

(147) शंका :- मुझे गुस्सा बहुत आता है। कृपया उपाय बतलायें?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

गुस्सा बहुत आता है तो उसका उपाय तो दर्शन योग महाविद्यालय से प्रकाशित पर्चे में लिखा है। क्रोध को कैसे दूर करें, इस संबंध में उसमें बहुत सारे उपाय लिखे हैं।
क्रोध कम करने का मोटा सा उपाय दोहरा देता हूँ। क्रोध को दूर करने का सबसे बढ़िया उपाय है- अपनी इच्छाओं को कम करें। आप दूसरों से उम्मीद रखते हैं कि यह व्यक्ति मेरे साथ ऐसा व्यवहार करेगा, इसको मेरे साथ ऐसा करना चाहिये। यह जो उम्मीद रखते हैं, इसको कम करें। जितनी इच्छायें बढ़ायेंगे, जितनी उम्मीदें बढ़ायेंगे, दूसरों से उतना दुःख बढ़ेगा। कैसे बढ़ेगा? दो वाक्यों में समझ लीजिये। क्या हमारी सारी इच्छायें पूरी हो सकती हैं? नहीं न। जितनी इच्छायें पूरी होती जायेंगी, वो समाप्त होती जायेंगी या बढ़ती जायेंगी? वे तो और बढ़ती जायेंगी और सारी तो पूरी होंगी नहीं। बताइये, वो अधूरी इच्छा आपको सुख देंगी कि दुःख देंगी? बस, वो दुःख देंगी, उससे फिर आपका क्रोध बढ़ेगा। इसलिए उपाय क्या हुआ? अपनी इच्छाओं को कम करें।
हमेशा एक सा नहीं सोचें। पॉजिटिव भी सोचें, कुछ-कुछ नेगेटिव भी सोचें। यह काम जरूर हो जायेगा, यह व्यक्ति हमारा काम जरूर करेगा और इस दिन तो कर ही देगा, ऐसा कभी नहीं सोचना। ऐसा भी हो सकता है कि काम न हो। इसलिए दोनों संभावनायें हैं तो दोनों क्यों नहीं सोचें? किसी ने हमारा काम कर दिया, तो ठीक। और नहीं किया तो यह शब्द दोहरायें- ”कोई बात नहीं”। इससे आपको गुस्सा नहीं आएगा या कम आएगा।
एक ही व्यक्ति पर पूरी तरह से आधारित मत रहिये। एक ही व्यक्ति पर पूरा भरोसा मत रखिये। अगर वो धोखा दे गया तो आपको बहुत मुश्किल हो जायेगी। उसका दूसरा विकल्प (ऑप्शन( अपने दिमाग में रखिये। इधर से काम नहीं हुआ तो दूसरे से, दूसरे से नहीं हुआ तो तीसरे से काम करायेंगे। इसी प्रकार चौथा, पाँचवा, छठा ऑप्शन रखिये। कहीं न कहीं तो काम हो ही जायेगा। अगर आपने अपने मन में चार, पाँच, छह ऑप्शन रख लिये कि यहाँ से नहीं तो वहाँ से, कहीं से तो काम होगा।
मान लीजिये कि- छह में से कहीं भी काम नहीं हुआ, तो एक सातवाँ ऑप्शन और भी रखिये अपने दिमाग में। वह ऑप्शन है- नहीं हुआ तो न सही, हम इसके बिना ही जी लेंगे। अगर यह सातवाँ ऑप्शन आपके दिमाग में है तो आपको कोई दुःखी कर ही नहीं सकता। आप कभी दुःखी नहीं होंगे और कभी क्रोध नहीं करेंगे। इस तरह से आप क्रोध को जीत सकते हैं।

(148) शंका :- कृपया द्वेष के पर्यायवाची बतलायें। द्वेष का अर्थ, बुरा लगना, अच्छा न लगना, घृणा करना, विरोधी समझना, गलत भावना बना लेना, क्या ठीक है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

देखिये, द्वेष के पर्यायवाची कई हो सकते हैं और इनके स्वरूप भी छोटे-बड़े हो सकते हैं। द्वेष का मोटा सा अर्थ है, अच्छा न लगना। जब हमारे मन में दूसरे व्यक्ति के प्रति क्रोध आता है, जलन होती है, उसका नाम भी द्वेष है। किसी ने हमारी थोड़ी सी बेइज्जती कर दी और हमारे मन में इच्छा हो गई कि- ”अब इससे बदला लेंगे, इसका भी दिमाग दुरूस्त कर देंगे, यह अपने आपको क्या समझता है, मेरा भी अवसर आने दो, इसको दिन के तारे दिखा दूँगा।” व्यक्ति मन में ऐसा सोचता है और जलता-भुनता रहता है। इसका नाम नैमित्तिक द्वेष है। मन में अगर जलन होती है, गुस्सा आता है, बदला लेने की भावना आती है, मार डालने की इच्छा होती है तो यह नैमित्तिक द्वेष है। यह तो अभ्यास से हट जायेगा।
एक द्वेष का बहुत सूक्ष्म स्वरूप भी है ‘कोई चीज पसंद न आना’ वो स्वाभाविक है, वो हटेगा नहीं। यह तो जीवात्मा में सदा ही रहेगा। यह जीवात्मा का नित्य गुण है। हम अल्पज्ञ हैं, अल्प शक्तिमान हैं और हमारी रुचि हर वस्तु में हो भी नहीं सकती। कोई जरूरी थोड़े ही है कि हर चीज हमको अच्छी लगे। आपको खाने में हर आइटम पसंद नहीं आती हर सब्जी आप रुचिपूर्वक नहीं खाते। कोई खाते हैं, कोई नहीं खाते। यह तो स्वाभाविक बात है।

(149) शंका :- तेजो असि तेजो महि घेही’। इस मंत्र में हमने ईश्वर से क्रोध की और सहन-शक्ति की भी प्रार्थना की है। जो दोनों मुझे विरू(ार्थी लगते हैं?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

अन्याय के प्रति पराक्रम दिखाकर, क्रोध करना चाहिये अर्थात् विरोध करना चाहिये या फिर अन्याय को सह लेना चाहिये? यह बहुत अच्छा प्रश्न है। दोनों अवसरों पर दोनों काम करने चाहिये। छोटा-मोटा अन्याय हो तो सह लेना चाहिये। बड़ी गड़बड़ हो और बिल्कुल हमारी जान पर आ गयी हो तो फिर अपनी रक्षा भी करनी चाहिये।
लड़ाई-झगड़ा करना हमारा उद्देश्य नहीं है। व्यर्थ में किसी को मारना-पीटना, किसी को परेशान करना, किसी को दुःख देना हमारा ऐसा कोई उद्देश्य नहीं। पर अपने जीवन की रक्षा करना तो हमारा अधिकार है। अपने जीवन की रक्षा तो हम करेंगे। महर्षि दयानंद जी का ही उदाहरण ले लीजिये। लोगों ने उन पर पत्थर फेंके, साँप फेंके, झूठे आरोप लगाए, बहुत उलटे- सीधे काम किये। कई बार जहर भी पिलाया तब भी उन्होंने कहा- ”चलो जाने दो, कोई बात नहीं”। अपनी रक्षा उन्होंने कर ली, अपना बचाव कर लिया, मारने की बात नहीं की थी। एक बार कुछ लोग जंगल में देवी के मंदिर में ले गए और वहाँ उनकी बलि चढ़ाने की तैयारी थी। वो जा तो नहीं रहे थे लेकिन ऐसे ही उनको बहका करके ले गए और वो चले गए तो वहाँ जाकर देखा, अरे यहाँ तो मामला गड़बड़ है। यह तो तलवार लेकर खड़ा है, मुझे मारेगा। तो वो फटाफट दीवार कूदकर भाग गए। देखो, उन्होंने अपनी रक्षा कर ली या नहीं। इसलिये अपनी रक्षा कर लेनी चाहिये, उसमें कोई आपत्ति नहीं है। वो तो हमारा जन्मसि( अधिकार है। भगवान ने भी छूट दे रखी है और सरकार ने भी छूट दे रखी है। अपनी रक्षा पूरी करो लेकिन खामखाँ दूसरे से झगड़ा मत करो। इस तरह से सहन भी करना चाहिये।
अगर हम सहन नहीं करेंगे तो फिर मनुष्य, मनुष्य नहीं रहेगा। फिर तो वो मशीन की तरह हो जाएगा। जैसे बिजली की मशीन थोड़ा सा भी उसको छू दो तो फट से करेंट मारती है। हम भी अगर कोई थोड़ा सा बस में, भीड़-भाड़ में पाँव पर पाँव रख दें और हम उसको दो थप्पड़ मारते हैं तो हम भी मशीन की तरह हो जायेंगे। फिर हम इंसान थोड़े रहेंगे। बस में भीड़ होती है, रेल में भीड़ होती है, बाजार में भीड़ होती है। कोई चलते-चलते थोड़ा सा टकरा गया, किसी का हाथ टकरा गया तो वहाँ तो ऐसा ही बोलना पड़ेगा कि- कोई बात नहीं, जाने दो, भीड़-भाड़ है, हो जाता है ऐसा। वहां तो सहन ही करना पड़ेगा। अगर कोई जबरन हमें परेशान करे तो फिर अपनी रक्षा भी करनी चाहिये। इतने कमजोर भी नहीं बनना चाहिये। फिर भी क्रोध करना तो ठीक नहीं है। क्योंकि क्रोध की अवस्था में बु(ि ठीक काम नहीं करती और व्यक्ति गलत काम कर बैठता है, जिससे उसकी हानि होती है।
मन्युरसि मन्युं मयि धेहि’। प्रार्थना इसलिये करें, क्योंकि यहाँ पर ‘क्रोध’ का अर्थ ‘क्रोध’ नहीं है। जो प्रचलित अर्थ में क्रोध है, वह अर्थ नहीं है। यहाँ पर क्रोध का अर्थ है, ‘जो बुरे काम हैं, उनसे बचकर रहें।’ यदि हम उनसे बचकर नहीं रहेंगें तो बुरे काम हम सीख लेंगें और करने लगेंगें। तो यहाँ गौण अर्थ में क्रोध शब्द का प्रयोग है कि- बुरे कामों पर क्रोध करें, अर्थात बुरे काम न करें, उनसे घृणा (परहेज( करें, उनसे दूर रहें, उनसे बचकर रहें। क्रोध शब्द का अर्थ यह है।
साधारण व्यक्ति जब यह प्रार्थना करे तो इसका अर्थ यह है – मैं बुरे कामों का विरोध करूं अर्थात् मंस बुरे काम न करूं। बुरे लोगों से बचकर रहूँ, ताकि मेरा जीवन ठीक-ठाक चले।
इसका दूसरा अर्थ यह है कि जो राजा है, क्षत्रिय है, वह यह प्रार्थना करे- ‘हे ईश्वर! आप दुष्टों को दण्ड देने वाले हैं। मुझे भी शक्ति दो, ताकि मैं इस धरती के सारे दुष्टों को ठीक कर दूँ। इन दुष्टों को दण्ड दूं ताकि ये जनता को परेशान न कर सकें। राजा की ओर से यह प्रार्थना है। राजा अपनी प्रार्थना करे।

(150) शंका :- हम लोग बेल्ट, जूता, चप्पल आदि चमड़े से बनी वस्तुओं का प्रयोग करते हैं, तो क्या ये अप्रत्यक्ष रूप से हिंसा है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

यदि जूता, चप्पल, बेल्ट इत्यादि चीजें प्राणियों को मार-मारकर बनाई जाती है, तो वो परोक्ष रूप से हिंसा है। यदि गांव में हम देखते है, कि कोई व्यक्ति चमड़े का काम करता है या स्वाभाविक मृत्यु से कोई पशु मर गया, वह उसका चमड़ा उतार अगर लाए, उससे जूते बना दिये, और उसका उपयोग करते हैं, तो कोई हिंसा नहीं। वेद में लिखा है – प्राणियों की हिंसा न करो, स्वाभाविक रूप से जो गाय-भैस मर जाते हैं, उसका चमड़ा उतारकर जूते बना लो, बेल्ट बना लो, और चीजें बना लो, तो उसमें हिंसा नहीं है। हाँ, चमड़े के लिए ही प्राणियों को मारा जाता है, तो वो हिंसा है। हमें इन सबसे बचना चाहिए। गाय दूध देना बंद कर दे, तो उसको मारकर खाना या उसको मारकर चमड़ा बनाना, यह हिंसा होगी।
मान लीजिए, हमारे दादा जी बूढ़े हो गए, अब वे काम नहीं कर सकते, कुछ पैसे नहीं कमाते। तो क्या दादाजी को मार देना चाहिए? यह कोई बात है भला? दादाजी हैं, या जो भी बड़े हैं, उनकी सेवा करो। गाय-भैंस ने पन्द्रह बीस साल दूध दिया, अब बूढ़ी हो गई, दूध नहीं दे सकती, तो कोई बात नहीं। उसने पंद्रह साल हमारी सेवा की, तो अब बुढ़ापे में हमको उसकी सेवा करनी चाहिए। चारा खिलाओ, उसकी रक्षा करो। उसको मारना नहीं है।

(151) शंका :- राजनीतिज्ञों की अहिंसा किस कोटि में रखनी चाहिए?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

आपके घर का व्यक्तिगत सवाल हो तो ठीक है। जैसे कि एक व्यक्ति ने आपको झापड़ मार दिया, आपके साथ धोखा कर दिया, उसे आप सहन कर सकते हैं। पर समाज के लिये, देश के लिये आप इस तरह से काम नहीं कर सकते हैं। देश किसी एक व्यक्ति की जागीर नहीं है। पहले इस बात को अच्छी तरह समझना।
राजनीति के नियम अलग हैं, और आध्यात्मिक-क्षेत्र के नियम अलग हैं। अन्याय को सहन करना, ब्राह्मण के लिए गुण है। लेकिन अन्याय को सहना करना, क्षत्रिय के लिए दोष है। इसलिए दोनों के नियम अलग-अलग हैं। अन्याय को अगर क्षत्रिय (सेना( सहना शुरु कर दें तो अहिंसा की रक्षा नहीं हो सकेगी।
अगर विदेशी शत्रु हमारे देश में घुस जायें और वो कहें कि हम तो तुम्हारे देश में शासन करेंगे। और हम कहें- ‘हाँ-हाँ ठीक है, तुम कर लो मगर हम तुमसे लडेंगे नहीं, हम तुमको कुछ नहीं कहेंगे, तुम हमारे देश में शासन कर लो, हम तुम्हारे गुलाम बनके रहेंगे, तुम हमारी शिक्षा, धर्म, माँ और बहनों को भ्रष्ट करोगे तो भी हम तुमसे लड़ेंगे नहीं क्योंकि हम तो अहिंसावादी हैं, हमे तो अहिंसा का पालन करना है।’
‘राजनीति’ एक अलग चीज है, ‘आध्यात्म’ एक अलग चीज है। अंहिसा, सत्य, आदि के जो उपदेश चल रहे हैं, यह आध्यात्मिक क्षेत्र की बातें हैं। गांधी जी की जो अहिंसा है, इस तरह की अहिंसा राजनीतिक क्षेत्र में नहीं चलती है। यह जो अहिंसा की बात है, आध्यात्मिक-क्षेत्र की बात है, राजनैतिक क्षेत्र इससे अलग है। उसमें तो राजनीति के नियमों से ही चलना पड़ता है। राजनीति में तो न्याय चलता है। वहाँ पर दण्ड चलता है। राजनीति में ऐसा थोड़े चलता है। यह तो हमारा देश है, हम इसके मालिक हैं। तुम यहाँ से बाहर निकलो। कोई किसी को हाथ जोड़कर यह कहे कि- अच्छा जी, तुम चले जाओ। क्या ऐसे कोई चला जाता है? केवल हाथ जोड़ने से अंग्रेज नहीं चले गए। यह ध्यान रखने वाली बात है कि जब क्रांतिकारियों ने अपने दल बनाये और धड़ाधड़ काकोरी-कांड किये और जबरदस्त सेनायें बनाईं, आजाद हिन्द सेना बनायी और अंग्रेजों को यहां रहना फायदेमंद नहीं लगा, तब जाकर अंग्रेजों का दिमाग ठिकाने आया। देश आजाद ऐसे ही नहीं हुआ। बहुत से देशभक्तों ने अपना जीवन बलिदान किया। तब जाकर के हमारा देश स्वतंत्र हुआ। सत्य, अहिंसा की जो आध्यात्मिक चर्चा है, यह आध्यात्मिक क्षेत्र में ठीक है। राजनीति के क्षेत्र में ऐसा इस रूप में नहीं चलता। वहाँ तो न्याय चलता।
जब भारत-पाकिस्तान का विभाजन हो गया, और यह निर्णय हो गया, कि हिन्दु लोग इधर आ जायेंगे और मुस्लिम-लोग उधर चले जायेंगे। तो भी गांधी जी ने कह दिया, कि चलो ‘कोई बात नहीं’, इनको इधर ही रहने दो। यह ‘कोई बात नहीं’ राजनीति में नहीं चलता। वहां तो, न्याय चलता है। चलो, ‘कोई बात नहीं’, यह नियम आध्यात्मिक क्षेत्र में चलता है। राजनीति में इस नियम को लागू करने का परिणाम अच्छा नहीं होता। गाँधीजी की जो अच्छी बात है,ं वो अच्छी बात सीख लो तो कोई बात नहीं। पर जो दोष हैं, उनको छोड़ देना चाहिये। उसको नहीं अपनाना चाहिये।

(152) शंका :- व्यक्ति किसी डेढ़ साल की बच्ची के साथ बलात्कार कर जान से मार देता है। वो पकड़ा जाता है। जज उसकी सजा फांसी के रूप में देता है। यह हिंसा है या अहिंसा?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

इसका उत्तर यह है, कि यह अहिंसा है। हमेशा याद रखें- जो न्याय है, वह अहिंसा है। और जो अन्याय है, वह हिंसा है। अगर जज उसको मृत्युदण्ड देता है, तो बहुत अच्छा करता है। यह न्याय है, अहिंसा है। हमारा शास्त्र यह कहता है, कि उसको यह दण्ड सड़क पर, चौराहे पर देना चाहिए। आजकल की भाषा में बोलें, तो दिल्ली के जवाहर लाल नेहरु स्टेडियम में बहुत से लोगों को बुलाना चाहिए। पचहत्तर हजार लोग उसमें बैठ सकते हैं। सबके सामने उसको फांसी दो। और उसका लाइव टेलीकास्ट करो। जैसे पूरे देश में क्रिकेट मैच का लाइव टेलीकास्ट करते हैं, वैसा उसका प्रसारण होना चाहिए। पूरे भारत के लोगों को दिखाओ, कि ऐसे अपराध करने वालों को क्या दण्ड दिया जाता है। ऐसे पाँच-दस लोगों को फांसी मिल जावे, तो पन्द्रह दिन के अन्दर ऐसे अपराध बंद हो जाएँगे। फांसी मिलेगी पन्द्रह लोगों को, और लाखों लोग इससे सुधर जाएँगे। महर्षि मनु जी का, वेद का यह संविधान है कि अपराधी को कठोर दण्ड देना चाहिए। एक-दो, पाँच-पन्द्रह को मिलेगा, लेकिन करोड़ों लोग सुधर जाएँगे। इसलिए वह न्याय है, अहिंसा है।

(153) शंका :- कीट, पतंग, मच्छर को लार्बा-ट्रीटमेन्ट से विनिष्ट करते हैं। यह कर्म करना चाहिये या नहीं, और इस कर्म का फल क्या होगा?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

यदि मक्खी, मच्छर हमें परेशान करते हैं, तो हमें इनसे अपनी रक्षा करनी चाहिये। जैसे कोई पाकिस्तानी आतंकवादी हमारे देश में घुस आये, तो क्या हम उससे अपनी रक्षा नहीं करेंगे? करेंगे न। अपनी रक्षा करने का हमको अधिकार है, तो खिड़कियाँ, दरवाजे अच्छी तरह से बन्द रखें। वहाँ जाली लगायें, ताकि मच्छर अंदर न घुसें। कीट, पतंग, मच्छर तरह-तरह की बीमारियाँं अथवा रोग न फैला सकें।
स जहाँ तक हो सके, बिना मारे काम चलता हो, तो इनको न मारें। मान लीजिये, एक मच्छर हमारे हाथ में आकर बैठ गया। तो पहली बार उसको सूचना दें, वार्निंग दें, कि जाओ-जाओ, यहाँ मत काटो। ये हमारा हाथ तुम्हारे काटने के लिये नहीं है। कंधे पर आये,कान पर आये, कहीं भी आये, बैठे और काटने लगे तो एक बार, दो बार उसको वार्निंग देनी चाहिये, कि जाओ भाई! जाओ तुम्हारे खाने के लिये बाहर कूड़ा कचरा बहुत है, जाओ वो खाओ। हमारा शरीर तुम्हारे खाने के लिये नहीं है। यदि फिर भी वह नहीं मानता, आकर बार-बार बैठता है, तो दण्ड व्यवस्था लागू होती है। अब उसको दण्ड दे सकते है। अब आके बैठता है तीसरी बार, चौंथी बार तो अब उसको हल्के से मारना। एकदम जोर से नहीं। दण्ड देते समय द्वेष नहीं आना चाहिये। अगर आपने जोर से मारा, तो इसका मतलब मन में द्वेष आया। ध्यान रहे- द्वेष नहीं करना, गुस्सा नहीं करना। उसको प्रेम से दण्ड देना, जाओ भई! तुमको तीन बार समझाया, तुम नहीं जाते। इसलिए अब दण्ड मिलेगा। अब उसको ऐसे प्रेम से मारो। जाओ छुट्टी।
स और अगर कैमिकल छिड़कने पड़ते हैं, तो वह भी मजबूरी की बात है। तो उसमें थोड़ा बहुत पाप भी लगेगा। दो, चार, पांच, दस पर्सेन्ट, तो कोई बात नहीं, भोग लेंगे।
स अगर जीना है, तो प्राणियों को कुछ तो कष्ट देना ही पड़ता है। हमारे शास्त्रों में लिखा है, कि मनुष्य दूसरे प्राणियों को दुःख दिए बिना जी नहीं सकता। कुछ न कुछ तो हमारे कारण दूसरों को दुःख होता ही है। अपनी जान बचाने के लिए, अपनी रक्षा के लिए कुछ न कुछ तो दूसरों को कष्ट देना ही पड़ता है। जो मजबूरी है, सो ठीक है। मजबूरी मानकर करेंगे, जानबूझकर नहीं, द्वेष भाव से नहीं, अपनी रक्षा की भावना से करना चाहिए।
स कीड़ों से बचाने के लिए किसान कुछ दवाइयाँ छिड़कते है। उससे बहुत से कीड़े मरते हैं, तो उसमें दोष तो लगता है। यह ठीक बात है। लेकिन उस फसल की रक्षा करने से मनुष्य आदि प्राणियों को खाने को भोजन मिलता है। इससे उनके जीवन की रक्षा भी होती है। कुछ हानि होती है, और बहुत सारा पुण्य मिलता है। इस प्रकार से इसको मिश्रित कर्म कहते है।
स इसका प्रायश्चित्त यह है कि कुछ प्राणियों को खाने को भी दो। जैसे कौवे आते हैं, कबूतर आते हैं, वे खेत में फसल खाते हैं, तो उनको खाने भी दो। उनके कोई अलग से फैक्ट्री, कारखाने, व्यापार तो है नहीं। वो बेचारे प्राणी कहाँ खाएंगे? यहीं तो खाएंगे। भगवान ने जो फसल पैदा की है, वह मनुष्य के लिए भी है और कौवों-कबूतरों के लिए भी है। उनको भी खाने दो। वे इतना नहीं खा लेंगे कि मनुष्य के लिए कुछ भी न बचे। थोड़ा वो भी खाएं, थोड़ा हम भी खाएं। पंच महायज्ञ है। उसमें जो बलि वैश्वदेव यज्ञ है, वह एक प्रकार से प्रायश्चित्त के रूप में हैं। आप उनका अनुष्ठान करें।
फिर दो-पांच पर्सेन्ट जो दण्ड मिलेगा, भोग लेंगे। क्या दण्ड होगा, पूरा-पूरा तो हम नहीं कह सकते। थोड़ा बहुत, जो भी दण्ड होगा,भोग लेंगे।

(154) शंका :- किसी ने वृक्ष को योनि माना है और किसी ने नहीं माना है, इसमें से कौन सा पक्ष सत्य है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

जिसने वृक्ष को योनि माना है, उसका पक्ष ठीक है। वृक्ष एक योनि है, कर्मों का फल है। यह ‘सत्यार्थ-प्रकाश’ के नौवें समुल्लास में लिखा है, कि जो व्यक्ति शरीर से पाप करता है, चोरी आदि बुरे कर्म करता है, उसको वृक्ष का जन्म मिलता है। यह शारीरिक अपराधों का दंड है।
वृक्ष में भी आत्मा है। जैसे मनुष्यों में आत्मा होती है, वैसे ही वृक्षों में भी आत्मा होती है। जैसे मनुष्यों से उसी जाति की, उसी नस्ल की आगे वृ(ि होती है, ऐसे ही वृक्षों में भी होती है। इससे सि( होता है कि उनमें भी जीवन है, उनमें भी आत्मा है।
वस्तुतः वो भी पूर्वकृत कर्मों का फल भोग रहे हैं। कर्मफल तो सुख-दुःख का अनुभव करना है। अगर यह माना जाये, कि वृक्ष सुख-दुःख अनुभव नहीं करते, तो फिर वो कर्मफल (योनि( नहीं मानी जायेगी। कर्मफल तो वृक्ष अनुभव करते हैं। वृक्ष, पेड़-पौधे, वनस्पति आदि भोग योनि हैं। इनके अन्दर इच्छा, द्वेष, प्रयत्न आदि सारे गुण होते हैं। लेकिन वे थोड़ी बेहोशी की अवस्था में है, नशे में हैं, पर आत्मा तो है न उनमें। अगर उनमें कुछ भी कष्ट न माना जाये, जीरो कष्ट मान लें, फिर वो व्यवस्था फेल हो जायेगी, कि कर्मफल नहीं हुआ। वृक्षों के बारे में महर्षि मनु जी ने लिखा है कि- अन्तः संज्ञा भवन्त्येते। सुख दुःखसमन्विताः।
अर्थात् वे वृक्षादि सुख-दुःख से युक्त हैं। वे आंतरिक सुख-दुख भोगते हैं, लेकिन बाहर के स्थूल सुख-दुःख नहीं भोगते। जैसे कुत्ते को डंडा मारो, तो वह चिल्लाता है और भागकर अपनी जान बचाने की कोशिश करता है। वृक्ष को डंडा मारो, तो वह चिल्लायेगा नहीं, भागेगा नहीं, जान बचाने की कोशिश नहीं करेगा। इस प्रकार पशुओं और वृक्षों की बाहरी क्रियाओं में तो अंतर हैं, लेकिन अंदर से बेचारों (वृक्षों( को वहाँ खड़ा करके रखा गया है। वृक्ष मनुष्यादि प्राणियों के समान भाग नहीं सकता, चल नहीं सकता, कुछ कर्म नहीं कर सकता, आँख नहीं खोल सकता, सुन नहीं सकता, देख नहीं सकता। यह सारा दुःख तो उसको आंतरिक रूप से भोगना ही पड़ेगा। नहीं तो कर्मफल क्या हुआ? वो ईश्वर की दण्ड व्यवस्था है। इसलिए वो ही जाने।

(155) शंका :- क्या वृक्षों में ज्ञान भी होता है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

जी हाँ, वृक्षों में ज्ञान होता है। अब देखिये, एक चीकू का वृक्ष है और एक नीबू का वृक्ष है। मान लीजिये दोनों पास-पास हैं। तो चीकू का वृक्ष जमीन में से अपने अनुकूल भोजन खींचेगा और नीबू का वृक्ष जमीन में से अपने अनुकूल भोजन खींचेगा। उनमें अपने अनुकूल भोजन ग्रहण करने का ज्ञान है। यदि वृक्ष में ज्ञान ही नहीं है, कि मेरे अनुकूल कौन सा भोजन है, तो कैसे खींचेगा? इससे पता चलता है, कि उसमें ज्ञान है, कि ‘पृथ्वी में से मुझे कौन से परमाणु खींचने हैं, कौन से मेरे अनुकूल हैं।’ चीकू का पौधा, नींबू का पौधा, मिर्ची का पौधा, सबको पता है, कि मुझे कौन से परमाणु खींचने हैं। जैसे गाय और घोड़े को पता है, कि मुझे क्या खाना है और क्या नहीं खाना। गाय के आगे घास रख दीजिये, खा लेगी। और माँस रख दीजिये, नहीं खायेगी। कुत्ते के सामने आप माँस रख दीजिये, खा लेगा और रोटी रख दीजिये, खा लेगा और घास का गठ्ठर रख दीजिये, नहीं खायेगा। कुत्ता कभी-कभी घास खाता है। उसका पेट खराब हो, तो वो कभी-कभी उल्टी करने के लिये खाता है, भोजन के तौर पर नहीं खाता। वृक्ष को भी पता है, मुझे क्या खाना है और क्या नहीं खाना है अर्थात् उसमें ज्ञान है।

(156) शंका :- शंका- वृक्ष में जीवन है या नहीं है? क्या वनस्पति में आत्मा होती है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

वृक्ष साँस लेता है, वृक्ष जीवित रहता है, और मिट्टी, पानी खुराक भी लेता है, धूप भी लेता है। और फिर उसके बाद जैसे मनुष्यों से आगे मनुष्य पैदा होते हैं, गाय-घोड़े से गाय-घोड़े पैदा होते हैं, वैसे ही वृक्षों से आगे वृक्ष भी पैदा होते हैं। वैसे ही वनस्पतियों की भी नस्ल से आगे वैसी ही नस्ल चलती हैं। उनकी पीढ़ी (जनरेशन( भी आगे चलती है। संतति-उत्पत्ति भी होती है। जैसे आलू से आलू होता है, टमाटर से टमाटर होता है, गेहूँ से गेहूँ होता है। ये सारे लक्षण जीवन को सि( करते हैं।
और यदि जीवन है, तो वहाँ आत्मा है। जैसे मनुष्य जीवित रहता है, सांस लेता है, वैसे ही वनस्पतियाँ भी सांस लेती है, अतः उनमें भी जीवन होता है। इनमें आत्मा होती है, ऐसा ही मानना चाहिये।

(157) शंका :- एक की जमीन पर दूसरा ताकतवर होने के नाते कब्जा कर ले। तो क्या साधक वही तीन शब्द कहकर छोड़ दें कि ‘कोई बात नहीं’, अथवा फिर क्या करें?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

यदि किसी ने हमारी जमीन पर अवैध कब्जा कर लिया है, तो उसे प्राप्त करने के लिये हर संभव कोशिश तो करनी ही चाहिये। प्रेम से, सभ्यता से, ठीक-ठाक शांतिपूर्वक बातचीत से अपनी जमीन को वापस ले सकते हो, तो ले लो। पूरा प्रयास करने पर भी अगर वो हाथ में नहीं आती है और उसके बिना भी हमारा काम चलता है और अगर हमें मोक्ष में जाना है, तो फिर झगड़ा नहीं करना चाहिये। फिर कोई जमीन खाये तो खाये, कोई चिंता नहीं। आपको अगले जन्म में दे देगा न्यायकारी ईश्वर। और मोक्ष में नहीं जाना है, तो फिर तो बहुत से रास्ते खुले हैं। लाठी उठाओ, गोली चलाओ, पिस्तौल उठाओ, कोर्ट में जाओ, जेल में जाओ, कुछ भी करो। लेकिन मोक्ष में जाना है तो झगड़े से बचना पड़ेगा।

(158) शंका :- क्या सृष्टि के आदि में जितनी आत्मायें थी, उतनी ही आज हैं अथवा कम या ज्यादा होती रहती हैं?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

आत्मायें उतनी ही हैं, न कम होती हैं, न बढ़ती हैं। कम तो तब होंगी, जब मर जावें। जब मर जायेंगी, तो कम हो जायेंगी। और आत्मा बढ़ेंगी तब, जब नई पैदा होंगी। नई पैदा हो आत्मायें, तो बढ़ जायेंगी। क्या आत्मा पैदा होती हैं, और क्या आत्मायें मरती हैं? आत्मा न मरती हैं, न जन्म लेती हैं। वे उतनी की उतनी ही रहेंगी। इसलिये आत्मायें उतनी ही हैं। अनादिकाल से जितनी थीं, उतनी ही आज हैं। अनन्त काल तक आगे भी उतनी ही रहेंगी, न घटेंगी, न बढ़ेंगी।

(159) शंका :- आत्मा’ अणु के बराबर होती है जबकि चेतना हमारे सारे शरीर में व्याप्त है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

आत्मा ‘अणु-स्वरूप’ मतलब बहुत सूक्ष्म होती है। जीवात्मा बहुत छोटा है।
चेतना तो सारे शरीर में व्याप्त है। सिर से पाँव तक हमें सब जगह अनुभूति होती है। अनुभूति सारे शरीर में होती है, ईश्वर ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है। आत्मा एक ही स्थान पर रहता है, और नस-नाड़ियों के माध्यम से और तंत्रिका-तंत्र के माध्यम से शरीर में अनुभूतियों की व्यवस्था कर रखी है। जैसे- एक फैक्ट्री का मालिक अपने कार्यालय में- (एक जगह( बैठा रहता है। और उसने फैक्ट्री के अलग-अलग दो कमरों में वीडियो कैमरे लगा रखे हैं। उन कैमरों की सहायता से वह एक जगह बैठकर फैक्ट्री के अनेक कमरों की जानकारी करता रहता है। इसी प्रकार से मन है, बु(ि है, इंद्रियाँ हैं, इन सारे उपकरणों के माध्यम से जीवात्मा को एक ही स्थान पर रहते हुए भी पूरे शरीर की बहुत सारी मोटी-मोटी अनुभूतियाँ हो जाती है, लेकिन सारी नहीं। आपको पेट में क्या रोग हो रहा है? आपको पता नहीं है। जब वो काफी बढ़ जाता है, दर्द होने लगता है, तो जाते हैं, डॉक्टर साहब के पास। फिर वो चेकअप करते हैं, और बताते हैं कि साहब, ये बीमारी तो तीन साल से चल रही है। आपने चेकअप ही नहीं कराया, इसलिए तीन साल बाद पता चला। इस तरह आत्मा को सब बातों का पता नहीं चलता, मोटी-मोटी अनुभूतियाँ अवश्य हो जाती हैं। कहीं पेट दुख रहा है, पाँव दुख रहा है, सर दुख रहा है, जो भी हो रहा है, वह मोटा-मोटा पता चलता है। वो ईश्वर की व्यवस्था है।

(160) शंका :- आत्मा का क्या परिमाण है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

आत्मा बहुत छोटा है यह इतना छोटा है कि ऐसे-ऐसे जीव-जन्तुओं में भी आत्मा होता है जिन्हें हम आंख से देख नहीं सकते, कभी-कभी माइक्रोस्कोप से भी नहीं देख पाते।

(161) शंका :- जीवात्मा का स्वरूप क्या है? क्या जीवात्मा निराकार है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

आत्मा ‘अणु-स्वरूप’ मतलब बहुत सूक्ष्म होती है। आत्मा एक जगह रहती है। वह स्थान नहीं घेरती। जीवात्मा निराकार है। नियम सुन लीजिये। जो वस्तु चेतन होती है, वो निराकार होती है। ईश्वर चेतन है या जड़? चेतन। ईश्वर साकार है या निराकार? निराकार। ईश्वर चेतन है, ईश्वर निराकार है। जीवात्मा चेतन है या जड़? उत्तर है- चेतन है। तो वो भी निराकार है, जैसे ईश्वर। और यह प्रकृति जड़ है या चेतन? जड़। प्रकृति जड़ है, तो वो साकार है। दोनों नियम साफ हैं। जो वस्तु चेतन होती है, वो निराकार होती है। जो वस्तु जड़ होती है, वो साकार होती है। प्रकृति जड़ है, वो साकार है। ईश्वर और जीव चेतन हैं, वो दोनों निराकार हैं। मन, आदि जड़ होने के कारण सब साकार हैं। इनका आकार बहुत छोटा है। हम देख नहीं पाते, वो अलग चीज है। लेकिन हैं ये सब साकार। प्रकृति- (सत्त्व, रज, तम( वो भी जड़ हैं, वो भी साकार हैं।
महर्षि दयानंद जी ने ‘सत्यार्थ-प्रकाश’ में लिखा है कि- साकार वस्तु से ही साकार वस्तु उत्पन्न हो सकती है। निराकार से साकार नहीं हो सकती। एक संदर्भ में लिखा है- जहाँ पर ये लोग मानते हैं, कि यह जगत ईश्वर का ही रूपांतर है, मतलब ईश्वर से ही यह जगत बना है, इस जगत का रॉ-मटेरियल ईश्वर है। इसके संदर्भ में महर्षि दयांनद जी ने लिखा, कि- ईश्वर साकार है या निराकार? यदि ईश्वर निराकार है, और जगत का उपादान कारण ईश्वर होवे, तो जगत भी निराकार होना चाहिये, परंतु जगत तो साकार है। इससे सि( हुआ, कि इसका रॉ-मटेरियल भी साकार है। जगत साकार है, यह प्रत्यक्ष है। इससे अनुमान हुआ, कि जो इसका उपादान कारण प्रकृति है, वो भी साकार है। उसी प्रकृति से- (साकार सत्, रज, तम से( ही मन, इन्द्रियाँ, बु(ि, शरीर आदि सब पदार्थ बने हैं। इसलिये मन, बु(ि, इन्द्रियाँ जड़ भी हैं, साकार भी हैं।

(162) शंका :- मैं नेत्रहीन हूँ, पर स्वप्न क्यों आते हैं?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

अनेक जन्मों के संस्कार इस जन्म में साथ में आते हैं। अब संस्कार से ही स्वप्न पैदा होता है। स्वप्न की उत्पत्ति संस्कारों से होती है। अब यह तो मेरा अनुभव नहीं है। मैं सीधा-सीधा प्रत्यक्ष नहीं कह सकता, कि पूर्वजन्म के संस्कारों से भी स्वप्न आते हैं, या नहीं आते। आपको रूप का स्वप्न नहीं आता, इससे यह संभावना लगती है, कि पूर्वजन्म के संस्कार से स्वप्न नहीं आ रहा क्योंकि पूर्वजन्म में तो आपकी आँख ठीक-ठाक रही होगी। यह तो इसी जन्म में बिगड़ी है। या ऐसा मान लिया जाए, पिछले बीस जन्म से बिगड़ी है। ऐसा तो नहीं मान सकते न। आँख से उस समय तो आपने दृश्य देखे होंगे। वो संस्कार इस जन्म में साथ में चले आए। पर इस जन्म में आपको रूप का दर्शन नहीं हुआ और आपको रूप का स्वप्न भी नहीं आया। आपकी इस बात से यह लगता है, कि पूर्वजन्मों के संस्कारों से इस जन्म में स्वप्न नहीं आ रहे। सुनकर तथा अन्य इन्द्रियों के विषयों को भोगने भी संस्कार बनते हैं, और उन संस्कारों से स्वप्न आते हैं। यह बात है। जो आपके प्रश्न का उत्तर है।

(163) शंका :- मृत्यु से भय क्यों लगता है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

मृत्यु से भय का कारण है- ‘अविद्या’। सवाल उठता है, कि इस अविद्या को कैसे दूर करें? बताइये, आप शरीर हैं या आत्मा? आत्मा। क्या आत्मा का जन्म होता है? नहीं। आत्मा का जन्म नहीं होता। क्या आत्मा मरती है? नहीं मरती। आत्मा का जन्म भी नहीं होता और आत्मा मरती भी नहीं, तो फिर मरने से डरना क्यों? मृत्यु से डर तो इसलिये लगता है, कि हम शरीर को आत्मा समझने की भूल करते हैं, यह गड़बड़ है। यह सबकी समस्या है।
सब लोग शरीर को आत्मा मानते हैं, यही अविद्या है। इस अविद्या को दूर करें। ‘शरीर’ अलग है, ‘आत्मा’ अलग है। शरीर का जन्म होता है, शरीर की मृत्यु होती है। आत्मा का जन्म नहीं होता, आत्मा की मृत्यु नहीं होती है। और हम शरीर नहीं हैं, हम तो हैं आत्मा। तो फिर मरने से क्या डरना? मौत आएगी, तो आएगी।
हम आत्मा हैं, शरीर हमारी गाड़ी है, आत्मा इस शरीर में बैठा है। आत्मा शरीर में बैठने से, वो दो चीज नहीं हो जाता। जैसे आप कार में बैठ गए तो क्या आप दो चीज बन गए? आप कार में बैठ गए तो केवल इतना ही तो है, कि आप कार में बैठे हैं। बैठ गए, फिर उतर जायेंगे, अलग हो जायेंगे। ऐसे ही ‘आत्मा’ शरीर में बैठा है, फिर छोड़कर अलग हो जाएगा। इतनी सी बात है। कार में बैठने से व्यक्ति कार नहीं बनता, यथावत् दोनों का संयुक्त स्वरूप नहीं हो जाता। ऐसे ही आत्मा के शरीर में बैठने से शरीर और आत्मा दोनों का मिश्रित (मिक्स( स्वरूप नहीं हो जाता है। हम शरीर को आत्मा मानते हैं अथवा दोनों को मिलाकर एक चीज मानते हैं, यही तो अविद्या है। इसी अविद्या के कारण मृत्यु से डर लगता है।

(164) शंका :- वृक्षों’ के अंदर ‘जीवात्मा’ कहाँ रहता है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

इसका उत्तर है- वृक्षों की जड़ में। जब तक वृक्ष की जड़ सलामत है, तब तक वृक्ष जीवित है। यदि जड़ को उखाड़ दिया जाये, तो फिर वह मर गया। ऊपर से काटते-छाँटते रहो, लेकिन जड़ पर प्रहार मत करो। कई बार ऊपर से वृक्षों को काट देते हैं, लेकिन वो मरते नहीं, फिर दोबारा खड़े हो जाते हैं। इसका मतलब जीवात्मा वृक्ष की जड़ में होना चाहिए।

(165) शंका :- वृक्ष में भी आत्मा है तो वनस्पति खाना, प्रयोग में लाना ठीक नहीं है, उसे हम किस अधिकार से दण्डित करें?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

देखिये! वनस्पति, पेड़-पौधों में हम यह मानकर चलते हैं, कि इनमें जीव है, आत्मा है। कारण कि, उसके सारे जीवन व्यवहार से ऐसा पता चलता है। वनस्पति भी सांस लेते हैं, इनमें भी रीजेनरेशन होता है। जैसे मनुष्य में होता है, गाय, घोड़ों, पशु-पक्षियों में होता है, वैसे ही पेड़-पौधों में भी होता है। इसलिए हम मान लेते हैं, कि इनमें जीवात्मा है।
अब रही बात यह, कि पेड़-पौधों को, वनस्पतियों को, फल-फूल, अनाज को खाये, काटें, तो इसमें पाप लगता है या नहीं लगता है? तो इसका उत्तर यह है, कि इसमें पाप नहीं लगता।
बहुत से लोग शंका करते हैं, कि क्यों जी! गाय-घोड़े में आत्मा है, उसको मार के खाते हैं, तो उसमें तो पाप लगता है। इन पौधों में भी आत्मा है। जब इनको काट कूट कर खायेंगे, तो इनमें पाप क्यों नहीं लगता। मैंने कहा कि साइंस के सि(ान्तों पर तो यह प्रश्न ही नहीं उठा सकते, कि पेड़-पौधों में आत्मा होती है, इनको काट के खायें, तो हमको पाप लगेगा कि नहीं लगेगा। विज्ञान के सि(ान्तों के अनुसार तो आत्मा की सत्ता का कोई उल्लेख उनकी किताबों में नहीं है।
आध्यात्मिक शास्त्रों (वेद आदि( के आधार पर आपका प्रश्न हो सकता है, कि इनमें आत्मा मानते हैं, तो इनको खायेंगे, तो पाप लगेगा कि नहीं लगेगा? जिस किताब के आधार पर आपका प्रश्न है, उसी किताब से उसका उत्तर भी मिलेगा। तो क्या उत्तर मिलेगा? यर्जुवेद में लिखा है- ‘गोधूमाश्च, यवाश्च तिलाश्च, माशाश्च”- गेहूं खाओ, तिल खाओ, उड़द खाओ, जौ खाओ, घी-दूध खाओ, दही खाओ, मक्खन खाओ, मलाई खाओ, मिठाई खाओ, गाय का घी खाओ, दूध पियो। ”सं सिंचामि गवां क्षीरम्” भगवान कहते हैं- गाय का दूध पियो, घी खाओ, मक्खन खाओ, गेहूं का प्रयोग करो, सब अनाज का प्रयोग करो। ”रसम् ओषधीनाम्” औषधियों का रस निकाल-निकाल करके पियो। हमने कहा कि हमारा जो
धर्मशास्त्र है, वह तो हमको छूट देता है, कि औषधियों का प्रयोग कर सकते हैं, वनस्पतियों का प्रयोग कर सकते हैं। जब कानून हमें इजाजत देता है, वो हमें छूट देता है, कि इसका प्रयोग कर सकते हैं। इसलिये सब्जी-भाजी, गेहूँ-चावल खाना अपराध नहीं है, कोई पाप नहीं है, कोई हिंसा नहीं है। और जो भेड़-बकरियों में आत्मा है, उसको मार के खायेंगे, तब उसमें पाप है। क्योंकि किताब- (वेदादि( में लिखा है- ”अविं मा हिंसीः” भेड़ को मत मारो, ”अजाम् माँ हिंसीः, गां मां हिंसीः बकरी,” गाय को मत मारो। ”शं नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे” दो पांव वाले मनुष्यों का कल्याण हो, चार पांव वाले गाय आदि प्राणियों का कल्याण हो। उनको मारके नहीं खा सकते।”मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्” तो हमारे शास्त्र में लिखा है- गाय-घोड़ों को नहीं मारो, उनको मारेंगे, तो पाप लगेगा। और वनस्पतियों को खाओ, उनको खायेंगे, तो कोई पाप नहीं लगेगा। ईश्वर के कानून का पालन करना पाप नहीं है। ईश्वर के कानून का उल्लंघन करना पाप है।

(166) शंका :- बेटा अपने पिता पर न्यायपूर्वक क्रोध करता है, वह हिंसा है या अहिंसा है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

अगर न्यायपूर्वक कोई बात कहनी है, तो क्रोध में नहीं कहें। क्रोध में कोई बात कहना तो हिंसा है। वही बात प्रेम से भी की जा सकती है। पिताजी को प्रेम से कहें, कि आपकी यह बात ठीक नहीं है। हम यह नहीं करेंगे। हम इसे नहीं स्वीकारेंगे।
इसी तरह नौकर को अपने मालिक पर क्रोध करने का अधिकार नहीं है। नौकर को अगर मालिक की बात गलत लगती है, तो वह प्रेम से बोल दे, कि यह काम ठीक नहीं है। मैं नहीं करूँगा। मालिक नौकर को नौकरी से निकाल सकता है। अगर इतनी हिम्मत है, तो कह सकते हैं, कि मैं नौकरी नहीं करूँगा।

(167) शंका :- कृषि करने के दौरान केंचुआ आदि छोटे जीवों की मृत्यु हो जाती है। फिर हम हिंसावादी हुए कि नहीं?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

कृषि करने से लाभ भी होता है, बहुत सा पुण्य भी मिलता है। खाने को बहुत सा अन्न मिलता है, बहुत से प्राणियों की रक्षा होती है। कृषि करने से कुछ प्राणी मर भी जाते हैं, इससे हिंसा भी होती है।
स इस प्रकार कृषि से कुछ पुण्य होता है और कुछ पाप होता है। इसलिए कृषि को मिश्रित-कर्म कहा जाता है।
स अगर आप मिश्रित कर्म के फल से बचना चाहते हैं, तो खेती छोड़ दें। दूसरा खेती करेगा, जिसको करनी हो। हर व्यक्ति एक ही काम करे, यह आवश्यक नहीं है। अपनी रुचि के अनुसार वह अपना व्यवसाय चुन ले। जिसकी जैसी रुचि होगी, वह वैसा काम करेगा। योग्यता भी हो, और रुचि भी हो, तभी काम को करना चाहिए।

(168) शंका :- पाकिस्तानी हमारे जवानों को बार-बार धोखे से मारते हैं, क्या हमें उनको नहीं मारना चाहिए? मारना हिंसा है, तो क्या करे?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

पाकिस्तानी लोग हमारे जवानों को मारते हैं तो हमारे जवान भी उनको मारेंगे, वे चुपचाप क्यों बैठेंगे? ईंट का जवाब पत्थर से देंगे। सेना विभाग क्षत्रियों का है। कोई विदेशी शत्रु हमारे घर में घुसेगा, तो क्षत्रिय उसको नहीं घुसने देंगे, उसको दण्ड देंगे।
पाकिस्तानी हमारे देश में घुसता है, तो क्या यह न्याय है या अन्याय? अन्याय है न। अन्याय का विरोध करना, यह न्याय है। वो हमारे देश में क्यों घुसता है? आप अपने घर में रहो, हम अपने घर में रहेंगे। आप जबरदस्ती हमारे घर में घुसेंगे, तो हम उसका प्रतिकार करेंगे। यह हमारा जन्मसि( अधिकार है। यह हमारी मातृ-भूमि है। इसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है, हमारा धर्म है। कोई भी विदेशी शत्रु हमारे घर में घुसेगा, हम उसका दिमाग ठीक कर देंगे। हम उसको मार-पीट कर बाहर निकाल देंगे। और ज्यादा गड़बड़ करेगा, तो पूरा ही मार डालेंगे। इसका नाम हिंसा नहीं है। इसका नाम अहिंसा है। हिंसा के विरु( व्यवहार अहिंसा है।
वह अन्यायपूर्वक हमारे देश में घुसता है। इसलिए हिंसा तो उसने की, हमने थोड़े की। हमने तो उस हिंसा का विरोध किया, तो वह अहिंसा हुई।
यह काम क्षत्रिय विभाग को दे देंगे, वो अपना काम करता रहेगा। हम अपने योगाभ्यास में, अपने क्षेत्र में काम करेंगे। इस तरह से इसका उत्तर समझना चाहिये।

(169) शंका :- योगदर्शन में’अहिंसा’ का क्या अर्थ है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

किसी से भी वैर-भाव नहीं रखना, द्वेष नहीं करना, बिना किसी अपराध के, कठोर भाषा नहीं बोलना, किसी पर अत्याचार नहीं करना, अन्याय नहीं करना, अहिंसा का यह मतलब है।

(170) शंका :- आयुर्वेद में लिखा है, कि ‘मांस खिलाओ और वह वैद्य माँस खिलाये, तो क्या उसको पाप नहीं लगेगा।’

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

आयुर्वेद में भी मिलावट है। आयुर्वेद कौन से ग्रन्थ का उपवेद है? वेद का है न। तो आयुर्वेद का बेस तो वेद है। अब बेसिक ग्रन्थ वेद को देखो। क्या उसमें मांस खाने को लिखा है। हाँ या न? नहीं। जब नहीं लिखा वेद में मांस खिलाना, तो क्यों खिलायें। तो इससे पता चला कि आयुर्वेद में मिलावट है। वो आयुर्वेद का अपना सि(ांत है ही नहीं।
स आयुर्वेद के अंदर, चरक के अंदर, राजयक्ष्मा रोग की उत्पत्ति क्या लिखी है। चन्द्रमा की सत्ताइस कन्यायें थीं। और उसके कारण वो रोग हुआ। क्या गप्पें मार रहे हैं। क्या चन्द्रमा की सत्ताइस कन्यायें हो सकती हैं। ऐसी-ऐसी कत्थकड़ आयुर्वेद के अंदर, बिना सिर पैर की बातें मिला दी हैं। तो माँस खाने का विधान चाहे वो चरक में हो, चाहे अन्य ब्राह्मण ग्रन्थ में हो, वो सब बाद की मिलावट है। वो वेद के अनुकूल नहीं है।
स वेद के अंदर व्यक्ति को शाकाहारी भोजन खाने का विधान किया है। यजुर्वेद का मंत्र हैः- ‘गोधूमाश्च यवाश्च तिलाश्च माशाश्च’ अथर्ववेद का मंत्र हैः- रसमोषधीनाम् अर्थात् औषधियों का रस पियो। ‘सं सिंचामि गवां क्षीरम्’ अर्थात् ईश्वर कहता है, कि मैं मनुष्यों के लिये गाय का दूध दे रहा हूँ, गाय का दूध पियो, यह अथर्ववेद में लिखा हैः- ‘पृषदाज्यम्’- ‘प्रसादायम्’ घी खाओ, दही खाओ, मक्खन खाओ, मलाई खाओ, शाकाहारी भोजन खाओ। वेद का यह सि(ान्त है। तो जो आयुर्वेद में मांस खाने का लिखा है, वह मिलावट है।
स जब वेद कहता है, ‘मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षत्ताम् क्षन्ताम्’ सब प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखो। भेड़-बकरी मार के खायेंगे, तो मित्र को कोई मारता है क्या? इसलिये वे सब गड़बड़ बातें हैं, उनको छोड़ देना चाहिये।
स शरीर में मांस की कमी हो गई तो मांसवर्धक शाकाहारी भोजन बहुत मिलता है, जो मांस की वृ(ि करता है। आप घी खाईये, मक्खन, मलाई, मिठाई, केला, आलू, अरबी आदि लीजिये, देखिये मांस बढ़ जायेगा। अच्छा खुश रहिये और थोड़ा अच्छे से सो जाईये। खूब खाए और खूब सोए, देखो आदमी मोटा हो जायेगा। खामख्वाह कुढ़ता रहे, दुःखी होता रहे, तो सारी चरबी उतर जायेगी, कमजोर पड़ जायेगा, घिस जायेगा। आयुर्वेद में अपने शाकाहारी तरीके से भी शरीर की वृ(ि, विकास बहुत लिखा है। उस हिसाब से हमको करना चाहिये।

(171) शंका :- हमें किस सीमा तक सहनशील होना चाहिऐ और कब प्रतिकार करना चाहिए? यदि कोई माता-पिता का अपमान करे तो क्या सहन करना उचित होगा?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

इसका उत्तर यह है कि कोई हमारे ऊपर छोटा-मोटा आरोप लगाए तो हमें उसको सहन कर लेना चाहिए। कोई माता-पिता का अपमान करे तो उसको रोकना चाहिए। उसको सहन नहीं करना चाहिए। उसको सावधान करना चाहिए किः- ”तुम ऐसा गलत काम मत करो, अपनी सीमा में रहो।” हमें इतने कायर, कमजोर भी नहीं बनना चाहिए कि कोई अगर एक थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल आगे कर दो कि, हाँ भई, ले मार। ऐसा नहीं चलता है। स्वाभिमान से जीना चाहिए।
स हमारा उद्देश्य किसी से झगड़ना नहीं है। हम किसी को परेशान नहीं करना चाहते, पर कम से कम कोई हमें भी तो परेशान न करे। आप सम्मान से जियो, हमको भी जीने दो।
स हम आपको तंग नहीं करते तो आप हमको क्यों तंग करते हो? आप अपने ढंग से जीयो, हम अपने ढंग से जीएंगे। आप हमारे माता-पिता का अपमान करेंगे, यह नहीं चलेगा। आपको हम टोकेंगे, सावधान कर देंगे।

(172) शंका :- रोग दूर करने के लिए और स्वच्छता के लिए आज कीटनाशक दवाओं का इस्तेमाल अनिवार्य हो गया है, क्या ऐसा करना भी हिंसा करना होगा?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

आप अपनी जीवन रक्षा के लिये कीड़े-मकोड़े आदि प्राणियों को मारते हैं। दरअसल, वह हिंसा तो है ही। उसका थोड़ा बहुत दोष भी लगेगा। यह अलग बात है कि आप खेती करते हैं, बहुत सा अनाज उत्पन्न करते हैं, उससे बहुत से प्राणियों की रक्षा करते हैं, उससे पुण्य भी मिलेगा। पर जितना-जितना प्राणियों को दुःख देते हैं, उतना-उतना हिंसा भी मानी जायेगी।

(173) शंका :- दुष्ट-प्रकृति के लोग हमारे साथ हिंसा कर दें, तो किस-किस अवस्था में हम कैसा-कैसा व्यवहार करें?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

पहले से सावधानी रखें।
स अच्छे-बुरे लोगों की पहचान करें, कि कौन व्यक्ति अच्छे स्वभाव का है, कौन व्यक्ति खराब स्वभाव का है। अगर इस दुनिया में ठीक तरह से जीना है, तो हमको अच्छे-बुरे की पहचान करना सीखना पड़ेगा।
जो अच्छे स्वभाव का है, उसके साथ मित्रता रखें, उससे दोस्ती रखें, उसके साथ उठना-बैठना रखें, लेन-देन का व्यवहार रखें। जो खराब स्वभाव के लोग हैं, उनसे दूर रहें, बच के रहें, उनसे झगड़ा भी नहीं करना और उनसे रिश्ता भी नहीं रखना। उनसे अलग ही रहें। अच्छे लोगों से मित्रता बनायें, खराब लोगों से दूर रहें।
स और फिर भी मान लो, कोई ऊँचा-नीचा व्यवहार कर दे, और थोड़ा-बहुत नुकसान कर भी दे, तब भी उस पर गुस्सा नहीं करना, क्रोध नहीं करना, चुपचाप कन्नी-काटकर अपना बचाव कर लेना। दुष्टों से झगड़ा नहीं करना, जहाँ तक हो सके झगड़े से बचने की कोशिश करना।
स जिनको आध्यात्म में विशेष उन्नति करनी है, उनको इस तरह से व्यवहार करना पड़ेगा। वे इस तरह से नहीं करेंगे, लड़ाई-झगड़ा करेंगे, कोर्ट-केस करेंगे तो क्या कोर्ट में हमेशा ही न्याय मिलता है? नहीं मिलता। कोर्ट में जाने से कोई विशेष लाभ नहीं। वहाँ दस साल तक केस चलेगा, आपका सारा समय बेकार चला जायेगा, पैसा चला जायेगा। और तब तक के लिए टेंशन हो जायेगी, वो अलग। लाभ कुछ होगा नहीं। तो फिर व्यर्थ में इतना समय, पैसा और बु(ि क्यों खर्च करें? ईश्वर की कोर्ट में केस डाल दें, वही ठीक है। ”ईश्वर न्याय करेगा।” बस ये तीन शब्द बोलो और अपना मस्त रहो। शांति से अपना योगाभ्यास करो।
स छोटी-मोटी बात हो, तो उसके लिये एक और सूत्र है, वो भी तीन शब्द का है- ”कोई बात नहीं”। यानि छोटी-मोटी बात हो तो, बोलो- कोई बात नहीं। और अगर बड़ी बात हो, और हम उससे लड़ नहीं सकते, न्याय नहीं ले सकते, न्याय कोर्ट में नहीं मिलता। तो बस फिर ईश्वर के न्यायालय में केस डाल दो, ‘ईश्वर न्याय करेगा’।
स रोज संध्या में आप एक मंत्र बोलते हैं -”जो हम पर अन्याय करता है, द्वेष करता है, हम उसको ईश्वर के न्यायालय में छोड़ते हैं।” लेकिन दिक्कत यह है, कि हम सिर्फ बोलते ही बोलते हैं, छोड़ते कहाँ हैं? छोड़ते तो हैं ही नहीं। अगर ईश्वर के न्याय पर छोड़ देंगे तो मस्त रहेंगे, कोई टेंशन नहीं है, खूब आनंद से जियो।
स सावधान रहो, दुर्घटना से बचो, खराब लोगों से बच के जियो, यही तरीका है और कोई रास्ता नहीं है। बचो न, इसलिये तो कह रहा हूँ। अत्याचारी को ठीक करने के लिये दूसरे बहुत से क्षत्रिय लोग बैठे हैं। वो यह काम कर लेंगे। लेकिन आप इस काम में लगे रहेंगे, तो आपका योगाभ्यास रह जायेगा।
स और आप पिछले जन्मों में यही तो करते चले आ रहे हैं। पिछले जन्मों में यही तो करते थे, और क्या किया? भई, कब तक करेंगे, ऐसे तो हर जन्म में लाखों झगड़ालू लोग आपको मिलेंगे। आप किस-किस से निपटेंगे। हर आदमी झगड़ने को तैयार बैठा है। किस-किस से झगड़ा करेंगे और कब तक करेंगे? यहाँ तो झगड़े का कोई अंत नहीं है। इसीलिये तो अब तक यहाँ बैठे हैं, वरना अब तक ‘मोक्ष’ में चले जाते। पिछले जन्मों में योगाभ्यास किया होता, तो मोक्ष में चले जाते। पिछले जन्मों में लोगों से लड़ते रहे, इससे लड़ाई की, उससे लड़ाई की, इसीलिए तो यहाँ बैठे हैं। कम से कम अब तो मोक्ष की तैयारी करो।
स परिस्थितियों को सहन करो, अपना बचाव करो, झगड़ा मत करो, द्वेष मत करो, चुपचाप कन्नी-काटकर मोक्ष में सरक जाओ। यहाँ जितनी देर लगायेंगे, उतने ज्यादा दुःख भोगने पड़ेंगे। मैंने तो बता दिया, आगे जैसा आपको ठीक लगे, वैसा करो। मेरी समझ में तो आ गया, कि ‘यहाँ दुनिया में बार-बार जन्म लेना कोई समझदारी का काम नहीं है, इसलिये मैं तो जा रहा हूँ मोक्ष में। आपको चलना हो तो स्वागत है। मुझे यहाँ नहीं रहना। मुझे यहाँ बार-बार जन्म लेना ठीक नहीं लगता। आप भी मेरे साथ चलो। आओ, मोक्ष की यात्रा में बड़ा आनंद मिलेगा।’
स यदि आप सेना में हैं, पुलिस में हैं, तो सहन करना आपके लिये अपराध है। अगर आप सेना में, पुलिस में नहीं हैं, तो फिर कोई अपराध नहीं है। राजा और क्षत्रियों के लिए अपराध है कि वे अन्याय को सहन करें। अत्याचारी को सबक सिखाना उनका कर्तव्य है। आप अधिक से अधिक किसी पुलिस वाले को जाकर सूचना दे सकते हैं, आपका कर्तव्य पूरा। आप पूरे केस में लड़ेंगे, तो आप यहीं रह जायेंगे। फिर मोक्ष नहीं हो पायेंगे।
स अगर आपको मोक्ष में जाना है, तो शास्त्र कहता है- ब्राह्मण बनो। सहन करना ब्राह्मण के लिये धर्म है। मनु जी के अनुसार धर्म का दसवां लक्षण है- ‘अक्रोधो’। दशकं धर्मलक्षमणम् । क्रोध नहीं करना, क्षमा करना, सहन करना, यह ब्राह्मण का तो गुण है, और क्षत्रिय के लिये दोष है। क्षत्रिय व्यक्ति अगर अपराध को सहन करता है, अन्याय को सहन करता है तो उसके लिये यह कार्य दोष है। ब्राह्मण के लिये यह गुण है, वो सहन करेगा, तो उसे मोक्ष मिलेगा। यदि क्षत्रिय अपराध को सहन करता है, और अन्याय का विरोध नहीं करता है, तो उसको नरक मिलेगा, उसको दण्ड मिलेगा।
स एक व्यक्ति ने पूछा- सबके साथ यथायोग्य व्यवहार करना चाहिये। इसका क्या अर्थ है? तो मैंने उसको उत्तर दिया कि- यथायोग्य व्यवहार का मतलब यह नहीं कि मारामारी करो। लोग इसका गलत अर्थ करते हैं। नियम है कि- ‘सबके साथ प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य बरतना चाहिये।’ अब ‘यथायोग्य’ शब्द इस नियम में, इस अर्थ (सेंस( में नहीं है, कि कोई मारामारी करे, तो उससे डबल मारामारी करो। यथायोग्य का अर्थ है, कि जो हमारे सामने पात्र है, जो व्यक्ति हमसे छोटा है, बड़ा है, बराबर का है, किस स्तर (लेवल( का है, उसके साथ उस स्तर (लेवल( का व्यवहार करो। जब प्रीतिपूर्वक व्यवहार करना है, धर्मानुसार व्यवहार करना है तो फिर मारामारी कहाँ से आ गई? हम राजा नहीं हैं, हम क्षत्रिय नहीं हैं। यह नियम क्षत्रियों के लिये नहीं बनाया गया। यह नियम तो सबके लिये है। जहाँ क्षत्रियों का प्रसंग हो, वहाँ पर यथायोग्य का अर्थ यह होगा कि कोई ब्राह्मण है, कोई परोपकारी व्यक्ति है, उसका सम्मान करो और कोई दुष्ट, डाकू, चोर है, उसकी पिटाई करो, और उसको जेल में डालो। यह क्षत्रियों के लिये उपदेश है। लेकिन यह नियम केवल क्षत्रियों के लिये नहीं है। यह नियम तो सबके लिये है। इसका अर्थ यह है कि सबके साथ यथायोग्य व्यवहार करो, यदि हमसे बड़ा है तो उसका आदर सम्मान करो, बराबर का है तो बराबर वाला व्यवहार करो, और छोटा है, तो उसको आशीर्वाद दो, स्नेह, प्रेम से उसको खाने-पीने को दो, खुश रखो। यह है- यथायोग्य व्यवहार।

(174) शंका :- व्यक्ति के साथ कब तक संयमित व्यवहार करें? वह भी घर का ही सदस्य हो तो?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

जब तक आपकी सहनशक्ति हो, तब तक निभाओ और अपनी सहन शक्ति को बढ़ाओ। आजकल लोगों में सहनशक्ति बहुत घट गई है। तीस-चालीस साल पहले लोगों में जितनी सहन शक्ति थी, क्या आज उतनी है? नहीं है। आज सहनशक्ति घट गई है। गड़बड़ हमारी तरफ से है। अपनी सहनशक्ति को बढ़ाइए।
स आप भौतिक साधनों का जितना अधिक प्रयोग करेंगे, आपकी सहनशक्ति उतनी अधिक घटती जाएगी। जितना हमारा जीवन विलासितापूर्ण होता जाएगा, उतनी सहनशक्ति कम होती जाएगी।
पिछले तीस-चालीस साल में भौतिक साधन बहुत बढ़ गए हैं। सड़कें बहुत बढ़ गईं, मोटर-गाड़ियाँ बढ़ गई, टेलीफोन बढ़ गए, बिजली बढ़ गई और मशीनें बढ़ गई यानि सारे भोग के साधन बढ़ गए और लोग इन भोग-साधनों के आदी हो गये। इसलिए सहनशक्ति घट गई।
स जीवन चलाने के लिए, देश की सेवा करने के लिए इन भोतिक चीजों का उपयोग करें तो कोई आपत्ति नहीं। सुख लेने के लिए आप इन वस्तुओं का उपयोग नहीं करना। अगर सुख के लिए इन चीजों का प्रयोग करेंगे तो आपकी सहनशक्ति घट जाएगी। लगातार इन चीजों का प्रयोग न करें। कभी प्रयोग करें, कभी नहीं करें। जानबूझकर बीच-बीच में प्रयोग छोड़ दें। पाँच दिन प्रयोग करें, एक दिन न करें तो आपकी क्षमता बनी रहेगी।
स दूसरी बात यह है कि, यह ना मानें कि भौतिक साधनों में ही अंतिम सुख है। आज लोगों ने यह मान लिया है कि- ”धन-संपत्ति आदि भौतिक साधनों में अंतिम सुख है, जैसे-तैसे करके इन साधनों को प्राप्त करो, जिसके पास
धन-संपत्ति अधिक से अधिक होगी, वो अधिक से अधिक सुखी होगा।” यह मान्यता गलत है। इस गलत मान्यता से लोगों के जीवन की दिशा बदल चुकी है। सब लोग भोग साधनों के पीछे भाग रहे हैं और सहनशक्ति को छोड़ते जा रहे हैं।
स जिन कार्यों से व्यक्ति के जीवन में शांति थी, सुख था, चैन था, आनंद था, वो कार्य उसने छोड़ दिए। ईश्वर की भक्ति करना, यज्ञ करना, दान देना, सेवा करना, बड़ों का आदर करना, इन कार्यों से हमारे जीवन में शांति थी। आज वे काम तो लगभग छूटते जा रहे हैं। आज पूछो कि- आप हवन करते हैं, आप भगवान का ध्यान करते हैं, आप बच्चों को बिठा करके अच्छी बाते सिखाते हैं, आप बड़ों की कुछ सेवा करते हैं? तो वे कहते हैं- साहब, समय नहीं मिलता।
स उनके पास धंधा करने के लिए बहुत समय है, व्यापार करने के लिए बहुत समय है, शॉपिंग करने के लिये बहुत समय है, गप्पें मारने के लिए बहुत समय है। वे घंटों तक मोबाईल फोन पर चिपके रहेंगे, लेकिन अच्छे काम के लिए समय नहीं है और इधर-उधर के कामों में फालतू समय गंवाते रहते हैं। शांति देने वाले काम तो छोड़ दिए, तो फिर शांति कहां से मिलेगी? इसलिए जो शांति देने वाले काम हैं, मन को प्रसन्न करने वाले काम हैं, उन कामों को करें, सहनशक्ति बढ़ाएं।
स जब तक सहनशक्ति है, तब तक अपने परिवार वाले के साथ निभाएं। तब तक उसके साथ मिलके रहें, उसको बार-बार समझाएं, सहन करें। जब बिलकुल ऐसी परिस्थिति आ जाए कि वो पत्थर उठाकर सर फोड़ने को तैयार हो जाए, तब चुपचाप नमस्ते कर दें। फिर उससे अलग हो जाएं। यह बिल्कुल आखिरी सीमा है।
छोटी-मोटी बात हो तो ऐसा मन में बोलें- ”कोई बात नहीं”। और बड़ी बात हो तो वोलें-”ईश्वर न्याय करेगा”। इससे आपकी सहनशक्ति बढ़ेगी। ये आपकी सहनशक्ति बढ़ाने वाले सूत्र हैं।

(175) शंका :- क्या कोई आत्मा अन्य आत्मा में प्रवेश कर उस जीवात्मा को प्रभावित करके सता सकता है। क्या मृत शरीर में अन्य आत्मा घुस सकता है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

इसका उत्तर है- नहीं। ये भूत-प्रेत (घोस्ट( की मान्यता बिल्कुल गलत है।
स किसी जीवित शरीर में कोई आत्मा, भूत-प्रेत बनकर घुस जाये और उसको परेशान करे, ऐसा कभी नहीं हो सकता। किसी मृत शरीर में कोई आत्मा घुस जाए और वो शरीर चल पड़े और सारे काम शुरू कर दे, ऐसा भी नहीं हो सकता।
स कभी-कभी मानसिक रोग से पीड़ित व्यक्ति अस्वाभाविक क्रियाऐं करने लगते हैं। जो आत्मा के बारे में ठीक से नहीं जानते-समझते, वे मानते हैं, कि हममें कोई भूत-प्रेत घुस गया है। दरअसल, कोई भूत-प्रेत नहीं घुसता। यह केवल भ्रांति की बात है। इस भ्रांति से दूर रहिए। भ्
स भूत-प्रेत होता ही नहीं है। जो नहीं मानते, उनको कोई नहीं सताता। जो लोग मानते हैं, उनको यह सताता है। केवल मन का भूत है, मन की कल्पना है, भ्रम है, और कुछ नहीं। यह मानसिक रोग है, इसकी चिकित्सा कराओ।
स भूत लगना केवल मनोवैज्ञानिक-रोग की स्थिति है। जिसमें व्यक्ति रोग से ग्रस्त होकर विक्षिप्त-अवस्था में कुछ का कुछ बोलने लगता है।
स भूत-प्रेत उतारने वाले को ओझा कहते हैं। गुजरात में भुआ कहते हैं। ओझा या भुआ उस पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालते हैं और उसको कहते हैं, अब तुम ठीक हो गए और वो भी मान लेता है, कि हाँ मैं ठीक हो गया। उसका भूत-प्र्रेत सब निकल गया। भूत-प्र्रेत कुछ नहीं होता। इसलिये इसके चक्कर में नहीं आना।
स मैं पिछले बीस वर्षों से यह चैलेंज करता आ रहा हूँ। अगर कोई भूत-प्रेत उतारने या डालने वाला व्यक्ति यह दावा करता है, कि मैं भूत-प्र्रेत डाल सकता हूँ, निकाल सकता हूँ, तो मेरे शरीर में एक भूत-प्र्रेत डाल दो। मैं सामने से ऑफर करता हूँ। उसको मेरी तरफ से एक लाख रुपये ईनाम। और जो नुकसान होगा, वो मेरा। उसके ऊपर कोई आपत्ति नहीं। कोर्ट में चलेंगे, मजिस्ट्रेट साहब के सामने कॉन्ट्रेक्ट साईन करेंगे। दो गवाह उनके, दो गवाह हमारे। चाहो तो प्रयोग कर लो। अगर मेरे शरीर में भूत डाल दे, तो लाख रूपए ईनाम। और अगर नहीं डाल सका तो पांच लाख रुपये जुर्माना भरो। वन-वे ट्रेफिक नहीं चलेगा। बीस साल हो गए मुझे चैलेन्ज करते हुए। अब तक तो मेरे सामने कोई नहीं आया है, जो भूत-प्रेत डाल दे। इसलिए व्यर्थ की बात है, इसको छोड़ दीजिए।
स जैसे एक आत्मा शरीरधारी है। वो अपनी आत्मा दूसरे शरीर में प्रविष्ट करा दे, यह संभव नहीं। सवाल है कि एक शरीरधारी जीवात्मा दूसरे जीवित शरीर में अपनी आत्मा को डालेगा कि मृत शरीर में? मृत में डालेगा न, जीवित में तो नहीं डालेगा। चलो एक बात तो कैंसिल हुई कि वो जीवित शरीर में तो नहीं घुसेगा। अब मृत शरीर में डाले तो इसमें कौन सी समझदारी है? मृत शरीर तो पहले ही सड़-गल जायेगा। आप कहो कि सड़ा-गला नहीं है, अभी-अभी बिलकुल ताजा मरा है। बेचारे को ढूँढ़ना पड़ेगा ताकि कोई ताजा मरा हुआ शरीर मिले तो वह अपनी आत्मा को उसमें डाले। उसमें डालने से उसको लाभ क्या है? कोई लाभ नहीं है, और इतनी क्षमता भी नहीं है कि वह अपनी आत्मा मृत शरीर में से निकाल कर वापस अपने शरीर में डाल दे। अगर वो योगी अपनी आत्मा को निकालकर उस मृत शरीर में डालेगा, तो उसका अपना शरीर मर जायेगा। और एक बार निकल गया, तो वापस आने की कला उसको आती नहीं। यह परकाया प्रवेश आदि की बातें सब कहानियाँ हैं। इनमें विश्वास नहीं करना चाहिये। न इससे कोई लाभ है। ऐसी इतिहास में पता नहीं कितनी कहानियाँ आती हैं। भूत-प्रेत की कहानियों की कमी नहीं है। टेलीविजन में भी बहुत से हॉरर सीरियल भूत-प्रेतों के आते हैं। वो सब झूठ बात है। संसार में सच्चा-झूठा दोनों चलता है।
स मरने के बाद आत्मा इधर-उधर नहीं भटकती। मृत्यु के बाद जीवात्मा ईश्वर के नियंत्रण में चला आता है। अब उसके कर्मानुसार अगला जन्म कहाँ देना है, ईश्वर उसकी व्यवस्था करेगा। मान लीजिये एक व्यक्ति की भारत में मृत्यु हुई। अगला जन्म उसको देना है जापान में। तो भारत से लेकर जापान तक की यात्रा वह जीवात्मा स्वयं नहीं करेगा, बल्कि ईश्वर उसको लेकर जाएगा। मरने के बाद जीवात्मा को तो होश ही नहीं होता है। अगला जन्म कहाँ लेना है- उसके वश की बात थोड़े ही है। फल देने वाला न्यायाधीश ‘ईश्वर’ है। ईश्वर बताएगा कि उसको कहाँ जाना है। और वो खुद पहुँचाता है। ईश्वर यमदूत नहीं रखता, असिस्टेंट नहीं रखता। वो अपना काम खुद करता है, क्योंकि वह सर्वशक्तिमान है। ईश्वर उसको पहुँचाता है, जहाँ पहुँचाना है।
स एक शरीर की आत्मा दूसरे शरीर में नहीं जाती है। हाँ, अगर आत्मा ने एक बार शरीर छोड़ दिया तो फिर छोड़ दिया। आत्मा वापस उसमें नहीं जा सकती। उसको वापस जाने का तरीका नहीं मालूम। जो आत्मा शरीर छोड़ दे, उसको वापस दोबारा उस शरीर में डाल दे, ईश्वर ऐसा काम नहीं करता है। अगर एक आत्मा ने एक शरीर छोड़ दिया तो दूसरे जन्म में फिर उसका नया शरीर बनेगा, उस शरीर में ही जायेगी।

(176) शंका :- कारण-शरीर’ और ‘सूक्ष्म-शरीर’ कैसे बनते हैं। और आत्मा के साथ इनका सम्बन्ध कब तक रहता है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

कारण शरीर ”प्रकृति” का नाम है। सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण, इन तीनों के समुदाय का नाम प्रकृति है। ये सूक्ष्मतम कण हैं। उसी का नाम ‘कारण-शरीर’ है।
स अब उस प्रकृति रूपी कारण शरीर से दूसरा जो शरीर उत्पन्न हुआ, उसका नाम ‘सूक्ष्म शरीर’ है। आपने शरीर पर सूती कुर्ता (कपड़ा( पहन रखा है। इसका कारण है धागा। और धागे का कारण है- रूई। रूई, धागा और कॉटन-कुर्ता ये तीन वस्तु हो गयीं। कुर्ता, धागा और रूई, तो ऐसे तीन शरीर हैं- स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। स्थूल शरीर है कुर्ता, सूक्ष्म शरीर है धागा, और कारण शरीर है- रूई।
स जो संबंध कुर्ते, धागे और रूई में है, वो ही संबंध इन तीनों शरीर में है। क्या रूई के बिना धागा बन जायेगा, और क्या धागे के बिना कुर्ता बनेगा? कारण शरीर के बिना सूक्ष्म शरीर नहीं बनेगा। सूक्ष्म शरीर के बिना स्थूल शरीर नहीं बनेगा। कहा हैः- कारण शरीर प्रकृति सत्त्वरजसतमः। सत्त्व, रज और तम से अठारह चीजें बनी। उसका नाम है- सूक्ष्म शरीर।
स सृष्टि के आरंभ में जब भगवान ने ये सारी दुनिया बनायी तो कारण शरीर प्रकृति से अठारह पदार्थ उत्पन्न किये। उनके नाम हैं- बु(ि, अहंकार, मन, पाँच ज्ञान- इन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच तन्मात्रा। इनका नाम सूक्ष्म शरीर है। ये सारे पदार्थ प्रकृति से बनते हैं। रूप,रस, गंध आदि पाँच तन्मात्राओं से पाँच महाभूत बनते हैं। जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि, आकाश, इन पाँच महाभूतों के नाम है। इन्हीं पाँच पदार्थों का समुदाय ये स्थूल शरीर है। जो आपको आँख से दिखता है, वो स्थूल रूप। तो ये इन तीनों का संबंध है।
स जब तक जीवात्मा पुर्नजन्म धारण करेगा, यानी एक शरीर छोड़ दिया, दूसरा शरीर धारण कर लिया, तो स्थूल शरीर छूट जायेगा। अतः मृत्यु होने पर ये छूट जायेगा। सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर, ये दोनों जीवात्मा के साथ जुड़े रहेंगे। पुर्नजन्म हुआ फिर नया स्थूल शरीर मिल गया, फिर अगला शरीर, फिर अगला। जब तक मुक्ति नहीं होगी तब तक सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर साथ रहेगा। जब मुक्ति हो जायेगी तब तीनों शरीर छूट जायेंगे। धागा वही रहता है, कुर्ते बदलते रहते हैं।
स सूक्ष्म-शरीर और कारण-शरीर तब तक साथ रहेंगे, जब तक पुर्नजन्म होता रहेगा। जब मोक्ष हो जायेगा तब तीनों दूर हो जायेंगे। अथवा मोक्ष नहीं हुआ और आ गई प्रलय तो प्रलय में तीनों शरीर छूट जायेगा। स्थूल शरीर तो वैसे ही थोड़े-थोड़े दिनों में छूटते रहता हैं। तब सूक्ष्म शरीर भी टूट-फूट कर नष्ट हो जायेगा और कारण शरीर रूपी प्रकृति बचेगी। सूक्ष्म शरीर वापस टूट-फूट कर कारण शरीर के रूप में परिवर्तित हो जायेगा। जैसे मिट्टी का हमने ढ़ेला लिया और उसकी ईंट पका ली और फिर ईंट तोड़कर वापस मिट्टी बना दी, तो वापस ये मिट्टी बन गई यानि कारण शरीर बन गया। जीवात्मा प्रलय के समय तो अलग हो गया पर मुक्ति नहीं मिली। फिर एक नयी सृष्टि बनेगी, तो उसके साथ जीवात्मा को ईश्वर फिर दोबारा जोड़ देगा। तब तक वह बंधन की स्थिति में है। जब तक मोक्ष न हो जाये अथवा प्रलय न हो जाये तब तक ये दोनों शरीर आत्मा के साथ जुड़े रहेंगे। मोक्ष में या प्रलय में ये छूट जायेंगे। मोक्ष होने पर तो फिर हजारों सृष्टियों तक ये तीनों शरीर फिर जुड़ते नहीं हैं।
स अब रही बात राग और द्वेष की। राग और द्वेष भी जीवात्मा की शक्ति है। राग और द्वेष दो प्रकार का है :- एक स्वाभाविक और दूसरा नैमित्तिक। जो स्वाभाविक राग-द्वेष है, वो जीवात्मा से नहीं छूटेगा। वो मुक्ति में भी जीवात्मा में रहेगा। और स्वाभाविक राग-द्वेष में रहते-रहते मुक्ति हो जायेगी। इसमें कोई आपत्ति नहीं है, कोई बाधा नहीं है। जो नैमित्तिक राग-द्वेष है, वो बाधक है। उसे हटाना पड़ेगा, मुक्ति में वो छूट जायेगा।
स स्वाभाविक राग-द्वेष क्या है? और नैमित्तिक राग-द्वेष क्या है? उत्तर है कि जीवात्मा को हमेशा सुख चाहिये। यह उसको सूक्ष्म राग है। ये स्वाभाविक राग है। ये मुक्ति में बाधक नहीं है। जीवात्मा को दुःख कभी भी नहीं चाहिये। दुःख में उसको स्वाभाविक द्वेष है। ये भी मुक्ति में बाधक नहीं। ये स्वाभाविक राग और द्वेष रहेंगे, मुक्ति हो जायेगी। कोई परवाह नहीं।
स अमुक व्यक्ति ने मेरी हानि कर दी, मैं उसकी गर्दन तोडूँगा, ये सोचना नैमित्तिक द्वेष है। खीर, पूड़ी, लड्डू, हलुआ मुझे मिलना चाहिये, मुझे अधिक मिलना चाहिये, उसको कम, ये सोच नैमित्तिक राग है। ये मुक्ति में बाधक है। ये हट जायेगा, फिर मुक्ति होगी। इसके रहते मुक्ति नहीं होगी। इसको छोड़ देंगे तो मुक्ति हो जायेगी।

(177) शंका :- मन जड़ है। इसमें क्षण-क्षण में अलग-अलग स्मृति व विचार उठते हैं और वह इधर-उधर दौड़ता है, यह कैसे?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

घर में बिजली काम कर रही है। जिस बिजली से हमारे साधन काम कर रहे हैं जैसे कि- माइक्रोफोन चल रहा है, ट्यूबलाइट्स जल रही हैं, पंखे चल रहे हैं, कारखानों में मशीनें चल रही हैं। बताइये कि यह जो बिजली है, यह जड़ है या चेतन? जड़ है। और अगर हम बिजली के तार का यहाँ से लेकर के दिल्ली तक पूरा कनेक्शन लगा दें, और यहाँ से बटन ऑन कर दें, तो करंट कितनी देर में दिल्ली पहुँच जायेगा? एक सेकंड से भी पहले पहुँच जायेगा। बिजली एक सेकंड में एक लाख, छियासी हजार, दो सौ मील चली जाती है। और दिल्ली तो मात्र एक हजार किलोमीटर ही है।
स जड़ होते हुए भी, बिजली कितनी चंचल है, कितनी तीव्रता से काम करती है। जब बिजली जड़ होते हुए इतनी तीव्रता से चल सकती है, तो फिर मन भी जड़ है, तो वो तीव्रता से काम क्यों नहीं कर सकता?
स मन की अपनी गति है, घोड़े की अपनी गति है, शरीर की अपनी गति है। वस्तुतः हर चीज की अपनी अलग-अलग गति है। शरीर इतनी तेज नहीं दौड़ सकता, स्कूटर शरीर से ज्यादा तेज दौड़ सकता है। स्कूटर से कार ज्यादा तेज दौड़ सकती है, और कार से विमान और तेज चल सकता है। मन की भी अपनी गति है, वो बहुत तेज चलता है, फटाफट विचार करता है। भगवान ने मन के अंदर ऐसी क्षमता दी है, कि जीवात्मा मन से जल्दी-जल्दी विचार कर सके। यदि इतनी जल्दी विचार न कर सके, तो उसके सांसारिक व्यवहार सि( न हों।
स पायलट विमान चलाता है, और विमान की गति आप जानते हैं, वो आठ सौ, एक हजार, बारह सौ, पन्द्रह सौ किलोमीटर प्रति घंटे की तेजी (स्पीड( से चलता है। मान लो, दो हजार किलोमीटर प्रति घंटे की गति से विमान चलता है, तो जो पायलट उसको चला रहा है, उसका दिमाग विमान से तीव्र चलना चाहिये या
धीमे चलना चाहिये? तीव्र चलना चाहिये। तभी तो वो विमान को नियंत्रित कर पायेगा, नहीं तो दुर्घटनाग्रस्त हो जायेगा। दिमाग तेज चलेगा, तभी तो वो सामने आने वाली वस्तुओं से बचा पायेगा, नहीं तो टकरा जायेगा।
स भगवान ने मन इसलिये तीव्रता से कार्य करने वाला बनाया, कि हम विमान को भी चला सकें, हम रॉकेट भी चला सकें, हम सेटेलाइट भी चला सकें, हम कम्प्यूटर भी चला सकें, तीव्रता से काम करने वाली मशीनों पर नियंत्रण कर सकें। और ऐसे ही समाधि भी लगा सकें, उसके लिए भी मन तीव्र गति वाला होना चाहिये।
स मन जड़ होते हुये भी बहुत तीव्रता से कार्य करता है, बिल्कुल बिजली की तरह। बिजली बहुत तीव्र गति से चलती है। और यहाँ से एक सेकंड में अमेरिका तक, लंदन तक पहुँच जायेगी, पर है जड़। मन भी ऐसा ही है। आत्मा उसको चलाता है। और वो एक-एक क्षण में फटाफट विचार बदलता है, स्मृतियाँ उठाता है, स्मृतियाँ बदलता रहता है। आत्मा चेतन है, वो उसको चलाता है। मन में इतनी क्षमता है, कि वो ये सब कार्य इतनी तेजी से कर सकता है।

(178) शंका :- क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र और निरू( मन की इन पांच अवस्थाओं को समझाने की कृपा करें?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

मन एक है, उसकी पाँच अवस्थायें हैं। जो समय-समय पर ऑटोमेटिक रूप से मौसम के कारण, खान-पान आदि परिस्थितियों के कारण, घटनाओं के कारणऋ और कुछ हमारे अपने विचारों से बदलती रहती हैं। इसलिए हमको सावधानी से प्रयोग करना है और अच्छी से अच्छी अवस्था बना के रखनी है।
1. क्षिप्त अवस्था :- मन की पहली अवस्था है- क्षिप्त अवस्था। क्षिप्त का अर्थ है-मन की चंचल स्थिति, चंचल अवस्था।
स मन की जब चंचल अवस्था होती है, उसका नाम है- क्षिप्त-अवस्था। हम मन में जल्दी-जल्दी विचारों को बदलते रहते हैं। आप पांच मिनिट बैठिये। मन में देखिए, आप फटाफट पचास विचार उठा लेंगे। वहाँ जाना है, यह करना है, उसको यह बोलना, उससे यह लेना है, उसको वो देना है, ये खरीदना है, वो काम करना है, अभी यह कर लूँ, यह खा लूँ, फिर वहाँ सो जाऊँ, फिर यूँ बात कर लूँ। फटाफट विचार बदलते रहना मन की ‘क्षिप्त-अवस्था’ है।
स क्षिप्त अवस्था में रजोगुण की प्रधानता होती है। चंचल-अवस्था में व्यक्ति जल्दी-जल्दी मन में विचार बदलता है, वो जल्दी-जल्दी स्मृतियाँ उठाता है। कभी इसको याद किया, कभी उसको याद किया, कभी और चीज याद की, कभी और चीज याद की।
2. मूढ़ अवस्था – दूसरी अवस्था है-मूढ़ अवस्था। जब तमोगुण का प्रभाव अधिक होता है, तब मूढ़ अवस्था उत्पन्न होती है। मूर्च्छा जैसी, थोड़ी नशीली, नशे जैसी अवस्था या तमोगुणी अवस्था मूढ़़ता प्रधान अवस्था है।
जैसे-थोड़ी नींद सी आ रही है, झटके आ रहे हैं, आलस्य आ रहा है। या कोई शराब पी लेता है तो नशे की स्थिति हो जाती है। ये सारी मूढ़-अवस्था कहलाती है। उस समय व्यक्ति का मन पूरा स्वस्थ नहीं होता। बु(ि काम नहीं करती, समझ नहीं आता है, उसको पता नहीं चलता, कि क्या करना, क्या नहीं करना। इस तरह की जो स्थिति है, उसको ‘मूढ़-अवस्था’ कहते हैं।
3. विक्षिप्त अवस्था- फिर तीसरी है- विक्षिप्त अवस्था। विक्षिप्त अवस्था में सत्त्वगुण प्रभावशील होता है, सत्त्व गुण प्रधान होता है। लेकिन बीच-बीच में रजोगुण और तमोगुण स्थिति को बिगाड़ते रहते हैं। जैसे कोई व्यक्ति ध्यान में दो-चार मिनट बैठा, उसका मन ठीक लगा। उसका मन थोड़ा-थोड़ा टिकने लगता है, फिर किसी कारण से वो ध्यान टूट जाता है, इसलिए उसकी एकाग्रता बिगड़ जाती है। इसको बोलते हैं-‘विक्षिप्त अवस्था’।
दो-चार मिनट बाद उसने फिर कोई वृत्ति उठा ली और वो स्थिति बिगड़ गई। इस बिगड़ी हुई अवस्था का नाम है- विक्षिप्त। विक्षिप्त का अर्थ ‘बिगड़ा हुआ’ होता है। इस तरह रजोगुण के कारण ध्यान की अवस्था जब बिगड़ती है, मन की शांत-स्थिर अवस्था जब बिगड़ती है, तब उसका नाम है- ‘विक्षिप्त अवस्था’।
4. एकाग्र अवस्था- फिर चौथी है- एकाग्र अवस्था। जिसमें पूरा सत्त्वगुण का प्रभाव होता है। अब रज और तम पूरे चुपचाप बैठ गए, ठंडे हो गए। अब वो बीच में गड़बड़ नहीं कर सकते। मन के ऊपर आत्मा का पूरा प्रभाव है, पूरा कंट्रोल है, पूरा नियंत्रण है।
स ‘एकाग्र-अवस्था’ का मतलब है, कि मन अब पूरा नियंत्रण में आ गया, पूरा अधिकार में आ गया। मन अब हमारी इच्छा के विरु( कहीं इधर-उधर नहीं जाता। जैसे पहले लगता था, कि हम विचार उठाना नहीं चाहते, फिर भी आ जाते हैं। लेकिन अब ऐसा नहीं होता है। अब तो हम जो चाहते हैं, वही विचार लाते हैं। इस अवस्था का नाम है-‘एकाग्र -अवस्था’।
स अब ”दिल है, कि मानता नहीं” वाली शिकायत खत्म हो गई। पहले शिकायत थी न, दिल है कि मानता नहीं, वो क्षिप्त अवस्था थी। और अब दिल पूरा मान लेता है, सौ प्रतिशत कंट्रोल में आ जाता है। इस अवस्था का नाम है- एकाग्र अवस्था। यानि अब सत्त्वगुण प्रबल है। व्यक्ति का मन के ऊपर वैसा ही कंट्रोल है, जैसा कार वाले का कार के ऊपर है। ऐसा ही आत्मा का मन के ऊपर जब पूरा कंट्रोल होता है, तो वो ‘एकाग्र-अवस्था’ है।
स इस अवस्था में जीवात्मा को समाधि में अपने आत्मस्वरूप की अनुभूति होती है और सूक्ष्म प्राकृतिक तत्त्वों की भी अनुभूति होती है। इस चौथी अवस्था में प्राकृतिक तत्त्वों और आत्मा, इन दो चीजों का अनुभव होता है। इसका नाम एकाग्र अवस्था। इस अवस्था में एक समाधि होती है, उसको बोलते हैं-‘संप्रज्ञात- समाधि’ ।
5. निरू(-अवस्था :-मन की पाँचवी अवस्था है- निरू( अवस्था। यह एकाग्र अवस्था से भी और ऊंची अवस्था है। इसमें भी मन पर पूरा नियंत्रण होता है। इसमें भी एकाग्र की तरह से ही मन पर पूरा कंट्रोल है तो एकाग्र में और निरू( में अंतर क्या है? अंतर इतना है, एकाग्र अवस्था में प्राकृतिक तत्त्वों और जीवात्मा, इन दो चीजों की अनुभूति होती है। लेकिन इस अवस्था में समाधि का विषय बदल जाता है। असंप्रज्ञात समाधि यानी निरू( अवस्था में ‘ईश्वर’ का अनुभव होता है। जब ईश्वर की अनुभूति होती है, उस अवस्था का नाम है- निरू( अवस्था। और उस समय जो समाधि होती है, उसका नाम है- ‘असंप्रज्ञात-समाधि’।
स इस तरह से मन की ये पांच अवस्थाऐं हैं। इनमें से चौथी और पांचवी एकाग्र और निरू(, इन दो अवस्थाओं में समाधि होती है, बाकी तीन में समाधि नहीं है।
स क्षिप्त और मूढ़ अवस्था तो खराब ही है। उनसे अच्छी तो है विक्षिप्त अवस्था। और इससे अच्छी है चौथी- एकाग्र अवस्था। और सबसे अच्छी है- निरू( अवस्था।
स योगाभ्यास में यही करना है। ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’ अर्थात् मन के विचारों को रोको। जैसे-जैसे रोकते जाएंगे, वैसे-वैसे हमारी स्थिति ऊँची-ऊँची होती जाएगी। जैसे-जैसे थोड़े-थोड़े विचार रुकेंगे, तो विक्षिप्त अवस्था आ जाएगी और जब पूरे विचार रोक देंगे तो समाधि शुरू हो जाएगी अर्थात एकाग्र अवस्था आ जाएगी। फिर ईश्वर की अनुभूति हो जाएगी, तो निरू( अवस्था आएगी। इस तरह से मन की बात समझनी चाहिए। मन एक ही है, दो तीन नहीं।

(179) शंका :- रजोगुण से चंचलता होती है, तमोगुण से मूढ़ता होती है, तो विक्षिप्त अवस्था किस गुण से होती है?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

विक्षिप्त अवस्था में थोड़ा सत्त्व गुण होता है, जिसके कारण कुछ स्थिरता होती है।
स आप सोचेंगे स्थिरता तो तमोगुण से होती है, और हमने कहा कि- विक्षिप्त अवस्था में स्थिरता सत्त्वगुण से होती है। दरअसल, तमोगुण की स्थिरता अलग प्रकार की है। तमोगुण की स्थिति में मन में विचार आता है, कि ‘घंटी बज गई, उठो भई उठने का समय हो गया है, और तमोगुण के प्रभाव से व्यक्ति कहता है- पड़े रहो, थके हुए पड़े रहो, सोते रहो, उठना ही नही, जल्दी नहीं है, रोज ही तो उठते हैं, एक दिन नहीं उठेंगे तो क्या फर्क पड़ेगा।’ पड़े रहो वाली, यह जो स्थिरता है, वो तमोगुण की है।
स सत्त्वगुण के कारण से जो स्थिरता होती है, वो अलग है। उसका नाम है- एकाग्रता, यानी एक विषय में मन का टिक जाना। मन एक जगह पर ज्ञानपूर्वक टिका रहे, वो स्थिरता सत्त्वगुण की है। दोनों में यही अंतर है।
स सत्त्वगुण के कारण जब मन एक विषय में टिक गया, तो कुछ देर के बाद रजोगुण बीच में कूद पड़ा और जो टिका हुआ मन था, उसको उखाड़ दिया। वो विक्षिप्त अवस्था हो गई या तमोगुण बीच में कूद गया, तो उसके प्रभाव से आलस्य आ गया, नींद आ गई या उसके कारण कोई और गड़बड़ी खड़ी हो गई।
स जब सत्त्वगुण के कारण जो मन टिका हुआ था, वो उखड़ जायेगा, उसको हम विक्षिप्त अवस्था बोलते हैं।
स सार यह निकला कि विक्षिप्त अवस्था कभी रजोगुण के कारण, और कभी तमोगुण के कारण भी होती रहती है।

(180) शंका :- क्या सूक्ष्म-इच्छाएँ ‘सब-कांशियस-माइंड’ में उत्पन्न होती हैं?

समाधान कर्ता :- स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक , विषय :- विविध

समाधान :-

यह ‘सब-कांशियस’ माइंड क्या है? आजकल के साइकोलॉजी वाले कितने सारे माइंड पढ़ाते हैं। दरअसल, इनको ठीक से पता नहीं है। ये लोग नहीं जानते, कि माइंड इज वन, ऑनली वन। हमारे शरीर में, एक आत्मा के साथ केवल एक ही मन है। मन दो-तीन-चार नहीं हैं, लेकिन ये दो-तीन-चार पढ़ाते हैं। एक सब-कांशियस माइंड है, एक कांशियस माइंड है, एक अनकांशियस माइंड है। जबकि मन एक ही है।
स हालांकि मन की अवस्थायें (स्टेट्स ऑफ माइन्ड( पाँच हैं। इनके नाम ‘योग-दर्शन’ के व्यास-भाष्य में लिखे हैं। मन की पहली अवस्था का नाम है- क्षिप्त। दूसरी का नाम है- मूढ़। तीसरी का नाम है- विक्षिप्त। चौथी का नाम है- एकाग्र। पाँचवी अवस्था का नाम है- निरू(।
स प्रकृति में तीन प्रकार के तत्त्व (द्रव्य( हैं, जिनको गुण कहते हैं। उनके नाम हैं- सत्त्व गुण, रजोगुण, तमोगुण। इस प्रकृति के इन सबसे छोटे-छोटे कणों (सत्त्व, रज और तम( का अपना-अपना अलग-अलग स्वभाव है।
स सत्त्व गुण का स्वभाव यह है, कि वो शांति देता है, सुख देता है, जिससे मन में स्थिरता होती है। जब मन में सत्त्वगुण