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जिज्ञासा समाधान : आचार्य सोमदेव

जिज्ञासा २महोदय जिज्ञासा समाधान के सन्दर्भ में अवगत हो कि मेरी जिज्ञासा कुछ अटपटी है। विषय है सूर्य संसार में ऊर्जा का स्रोत है। सूर्य के प्रचंड ताप व प्रकाश के बिना जीवन असंभव है। तथापि जानकारी करना है कि सूर्य को ऊर्जा कहाँ से प्राप्त होती है।

दूसरी बात यह कि उपनिषदों में सात लोक का वर्णन आता है। १. पृथ्वी लोक २. वायु लोक ३. अन्तरिक्ष लोक४. आदित्य लोक ५. चन्द्र लोक ६. नक्षत्र लोक ७. ब्रह्माण्ड लोक। क्या इन लोकों में भी लोगों का निवास संभव है।

– रामनारायण गुप्त, बिलासपुर

 

समाधान २– (क)परमेश्वर ने ब्रह्माण्ड की रचना की है, इस विशाल ब्रह्माण्ड में करोड़ों आकाश गंगाएँ हैं, उनमें करोड़ों-करोड़ों सूर्य हैं। सूर्य, जो ऊर्जा का स्रोत है, इसकी सतह का निर्माण हाइड्रोजन, हीलियम, लोहा, निकेल, ऑक्सीजन, सिलिकॅान, सल्फर, मैग्निशियम, कार्बन, नियोन, कैल्शियम, क्रोमियम तत्वों से हुआ है। इनमें से सूर्य के सतह पर हाइड्रोजन की मात्रा ७४ प्रतिशत तथा हीलियम २४ प्रतिशत है। इन्हीं तत्वों के कारण सूर्य में ऊर्जा है। सूर्य में हाइड्रोजन के जलने से हीलियम गैस उत्पन्न होती है, जो कि ऊर्जा का महा-भण्डार है।

सूर्य के कारण ही हम पृथिवी वासियों का जीवन चल रहा है। सुबह से शाम तक सूर्य अपनी किरणों से- जिनमें औषधीय गुणों का भंडार है, अनेक रोग उत्पादक कीटाणुओं का नाश करता है। स्वस्थ रहने के लिए जितनी शुद्ध हवा आवश्यक है, उतना ही प्रकाश भी आवश्यक है। प्रकाश में मानव शरीर के कमजोर अंगों को पुनः सशक्त और सक्रिय बनाने की अद्भुत क्षमता है। सूर्य के प्रकाश का संबन्ध केवल गर्मी देने से नहीं है, अपितु इसका मनुष्य के आहार के साथ भी घनिष्ट सम्बन्ध है। छोटे-बड़े पौधे व वनस्पतियों के पत्ते सूरज की किरणों के सान्निध्य से क्लोरोफिल नामक तत्व का निर्माण करते हैं। जिससे पौधों में हरापन होता है।

सूर्य ऊर्जा का महाभण्डार है। सूर्य के एक वर्ग सेंटीमीटर से जितनी ऊर्जा पैदा होती है, उतनी ऊर्जा १०० वाट के ६४ बल्बों को जलाने के लिए काफी है। सूर्य की जितनी ऊर्जा धरती पर पहुँचती है, उतनी ऊर्जा सम्पूर्ण मानवों द्वारा खपत की ऊर्जा से ६००० गुना ज्यादा होती है। जितनी ऊर्जा ३० दिन में धरती को सूर्य द्वारा मिलती है, उतनी ऊर्जा मानवों द्वारा पिछले ४०,००० साल से खपत ऊर्जा से कहीं अधिक है। यदि सूर्य की चमक (ऊर्जा) धरती पर एक दिन न पहुँचे तो धरती कुछ घंटों में बर्फ की तरह से जम जाएगी, सम्पूर्ण पृथिवी उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव जैसी हो जायेगी।

यह सब ऊर्जा सूर्य को कहाँ से मिलती है, यह आपकी जिज्ञासा है। सूर्य में यह ऊर्जा परमेश्वर की व्यवस्था से उत्पन्न होती है। वही परमेश्वर सूर्य की रचना करने वाला है। वह ही अपनी व्यवस्था से सूर्य में ऊर्जा उत्पन्न करने वाला है।

(ख) अन्य लोकों पर भी प्राणियों का वास सम्भव है। परमात्मा की व्यवस्था से जिस लोक की संरचना हुई है, उसी संरचना के आधार पर वहाँ वास सम्भव हो सकता है। न्यायदर्शन के सूत्र ३.१.२७ के भाष्य में वात्स्यायन मुनि लिखते हैं-

‘‘अप्तैजस्वायव्यानि लोकान्तरे शरीराणि’’

अर्थात् लोकान्तर में जल, अग्नि और वायु के शरीर होते हैं। इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि लोकान्तर में केवल जल, अग्नि अथवा वायु के शरीर होते हैं, अपितु इसका अर्थ है कि जहाँ जिसकी प्रधानता होगी वहाँ वैसा शरीर होगा।

पृथिवी से अतिरिक्त करोड़ों लोक-लोकान्तर व्यर्थ नहीं होंगे। जैसे इस पृथिवी पर प्राणियों का वास है, ऐसे अन्य लोकों पर भी होगा। दिल्ली से प्रकाशित ‘नवभारत टाइम्स’ के दिनांक २४ मार्च १९९० के अंक में कुछ ऐसी बात प्रकाशित हुई-हमारी दुनिया यह नहीं मानती कि उसके अलावा और भी दुनिया है। पृथिवी का आदमी अपनी दुनिया से इतना आश्वस्त है कि वह अन्य ग्रहों या आकाशगंगाओं पर बुद्धिमान् प्राणियों की मौजूदगी की बात पर विश्वास ही नहीं कर सकता। वह सोचता है कि ऐसा कैसे हो सकता है कि उस जैसे आदमी या उनसे भी अधिक बुद्धिमान् प्राणी अन्यत्र हो सकते हैं। किन्तु वैज्ञानिकों की दुनिया में आयें तो हमें विश्वास होने लगता है कि हाँ अन्यत्र भी प्राणी हो सकते हैं।

अनेक वर्षों से वैज्ञानिक मानते आये हैं कि पृथिवी के अतिरिक्त भी बुद्धिमान् प्राणी हैं। वर्तमान वैज्ञानिकों, प्राचीन ऋषियों व तर्क से तो यही लगता है कि अन्य लोकों पर प्राणियों का वास सम्भव है।

जिज्ञासा समाधान : आचार्य सोमदेव

जिज्ञासा १ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इन चारों वर्णों का निर्णय तो कर्म के आधार पर होता है। नामकरण प्रकरण संस्कार विधि में नवजात शिशु ने अभी कोई कर्म ही नहीं किया तो किस आधार पर देवशर्मा, देववर्मा, देवगुप्त और देवदास नाम रखे जाएँ, यह बात मेरी समझ में नहीं आई। कृपया मेरी इस शंका का समाधान कर दीजिए।

– राज कुकरेजा, करनाल

यही जिज्ञासा यतीन्द्र आर्य, मन्त्री बालसमन्द, हिसार की भी है।

समाधान-१.लोक में हमारी पहचान हमारे नाम से होती है। जीवात्मा शरीर धारण कर जन्म लेता है, तब उस शरीर से युक्त मनुष्य का संसार में व्यवहार करने के लिए नाम रखा जाता है। सोलह संस्कारों में पांचवा संस्कार नामकरण संस्कार है। इस संस्कार में नवजात शिशु का सार्थक नाम रखा जाता है। शिशु के कुल, वंश को देखकर उस कुल की परम्परा अनुसार वा शिशु किस वर्ण में उत्पन्न हुआ है, उसके अनुसार नाम रखा जाता है।

महर्षि दयानन्द ने वर्णों के अनुसार नामों का संकेत किया है कि ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ हो तो अमुक नाम रखें, क्षत्रिय कुल का हो तो अमुक नाम रखें आदि।

दूसरी ओर महर्षि वर्ण का निश्चय बच्चे के बड़े हो जाने पर उसके गुण, कर्म के अनुसार करने को कहते हैं। अभी वर्ण का निश्चय हुआ नहीं और बच्चे का नाम ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि के नामों के अनुसार रखा जा रहा है। यहाँ विरोधाभास दिखाई दे रहा है। यही जिज्ञासा आप लोगों की है।

प्रथम यहाँ विचार करें कि महर्षि ने संस्कार विधि में जो बच्चे का नाम ब्राह्मण आदि का रखने के लिए कहा, वह उस बच्चे को ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि मानकर नहीं कहा है। महर्षि ने बच्चे का नाम उसके कुल के आधार पर किया है। बच्चा अभी किस वर्ण का है यह निश्चित नहीं हुआ है, फिर भी उसका नाम उसके कुल के आधार पर ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वाला रखने के लिए कहा है। दूसरी बात, भले ही बच्चों का अभी वर्ण निश्चित नहीं हुआ, ऐसा हेाते हुए भी अधिक सम्भावना है कि बच्चा जिस वर्ण में पैदा हुआ है, उसी का बने, क्योंकि अनुवांशिक गुण आना स्वाभाविक है। इसलिए भी उसके कुल के अनुसार नाम रख दिया जाता है।

अथवा शास्त्र में भावी संज्ञा का विधान भी है। अर्थात् जो परिस्थिति अभी तो नहीं है, किन्तु भविष्य में होने वाली है, जैसे कुर्ता अभी है नहीं फिर भी हम कपड़ा सिलाने वाले को कपड़ा देते हुए कहते हैं कि इसका कुर्ता बना दो। व्याकरण के ग्रन्थ महाभाष्य में भाविनी संज्ञा को दर्शाया है-

‘‘एवं तर्हि भाविनीयं संज्ञा विधास्यते, तद् यथा-कश्चित्कंचित्तन्तुवायमाह- ‘अस्य सूत्रस्य शाटकं वयेति, सः पश्यति यदि शाटको न वातव्यो न शाटकः, शाटको वातव्यश्चेति विप्रतिविद्धम् भाविनी खलवयं संज्ञाऽभिप्रेता, स मन्ये वातव्यो-यस्मिन्नुते शाटक इत्येतद् भवतीति।’’

– महाभाष्य १.१.४४ आह्निक ७

यह महाभाष्य का वचन हमने भावी संज्ञा होने के प्रमाण में दिया है। लोक में भी कोई डॉक्टर की पढ़ाई कर रहा है, डॉक्टर बना नहीं, फिर भी उसको डॉक्टर कहने लग जाते हैं। ऐसे ही यहाँ पर भी समझ सकते हैं।

स्वामी रामदेव जी नौ प्राणायाम, भस्रिका, कपालभाति, अनुलोम-विलोम आदि बताते हैं। लेकिन स्वामी दयानन्द जी ने न तो इनका वर्णन सत्यार्थ प्रकाश में किया है, न ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में। उन्होंने रेचक, पूरक व कुभक का वर्णन किया है कि इनको कम से कम तीन बार व अधिक से अधिक 21 बार या जितनी अपनी क्षमता हो उतनी बार करें। इनमें कोन सी विधि ठीक है,

जिज्ञासामाननीय, स्वामी रामदेव जी नौ प्राणायाम, भस्रिका, कपालभाति, अनुलोम-विलोम आदि बताते हैं। लेकिन स्वामी दयानन्द जी ने न तो इनका वर्णन सत्यार्थ प्रकाश में किया है, न ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में। उन्होंने रेचक, पूरक व कुभक का वर्णन किया है कि इनको कम से कम तीन बार व अधिक से अधिक 21 बार या जितनी अपनी क्षमता हो उतनी बार करें। इनमें कोन सी विधि ठीक है, स्वामी रामदेवजी वाली या स्वामी दयानन्दजी वाली। कृपया हमारा मार्गदर्शन करें। धन्यवाद

– तेजवीर सिंह, ए-1, जैन पार्क, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059

 

समाधानप्राणायाम परमेश्वर प्राप्ति के साधन अष्टाङ्ग योग का चौथा अङ्ग हैं। योग अंगों में सभी अंग महत्त्वपूर्ण है, सभी अंगों की महत्ता है। प्राणायाम की भी अपनी महत्ता है। प्राणायाम का महत्त्व प्रकट करते हुए महर्षि पतञ्जलि योग-दर्शन में लिखते हैं ‘‘ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्’’ अर्थात् विधिपूर्वक योग-दर्शन में बताए प्राणायाम का निरन्तर अनुष्ठान करने से आत्मा-परमात्मा के ज्ञान को ढकने वाला आवरण जो अविद्या है वह नित्यप्रति नष्ट होता जाता है, और ज्ञान का प्रकाश बढ़ता जाता है। और भी योग-दर्शन में मन को प्रसन्न रखने वाले उपायों में प्राणायाम को भी महत्त्वपूर्ण कहा है। महर्षि ने सूत्र लिखा ‘‘प्रच्छर्दनविधारणायां वा प्राणस्य’’ (यो. 1.34) ‘‘जैसे भोजन के पीछे किसी प्रकार का वमन हो जाता है, वैसे ही भीतर के वायु को बाहर निकाल के सुखपूर्वक जितना बन सके उतना बाहर ही रोक दे। पुनः धीरे-धीरे लेके पुनरपि ऐसे ही करें। इसी प्रकार बारबार अभयास करने से प्राण उपासक के वश में हो जाता है और प्राण के स्थिर होने से मन, मन के स्थिर होने से आत्मा भी स्थिर हो जाता है। इन तीनों के स्थिर होने के समय अपने आत्मा के बीच में जो आनन्दस्वरूप अन्तर्यामी व्यापक परमेश्वर है, उसके स्वरूप में स्थिर हो जाना चाहिए।’’ (ऋ.भा.भू.)

इन ऋषि-वचनों से ज्ञात हो रहा है कि प्राणायाम हमारे मन को स्थिर व प्रसन्न करने में अति सहायक है। महर्षि दयानन्द व योग-शास्त्र के प्रणेता महर्षि पतञ्जलि ने योग में सहायक चार प्राणायामों को ही स्वीकार किया है। महर्षि दयानन्द ने इन चारों प्राणायामों की चर्चा सत्यार्थप्रकाश के तीसरे समुल्लास व ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका की उपासना विषय में विस्तार से की है।

प्राणायाम का अर्थ क्या है, प्राणायाम-प्राण+आयाम इन दो शबदों से मिलकर बना है। प्राण की लमबाई, विस्तार, फैलाव, नियमन का नाम प्राणायाम है। प्राणायाम में प्राण का विस्तार किया जाता है, लमबे समय तक प्राण को रोका जाता है, ऐसी क्रिया जिसमें हो उसे प्राणायाम कहते हैं। ऐसी स्थिति में इन चार प्राणायाम में ही जो कि ऋषि प्रणीत है, प्राणायाम सिद्ध होते हैं। और भी-‘बाह्यस्य वायोराचमनं श्वासः’– बाह्य वायु का आचमन करना अर्थात् भीतर लेना ‘श्वास’ तथा ‘कौष्ठस्य वायोः निस्सारणं प्रश्वासः’-कोष्ठ के भीतर की वायु को बाहर निकालना ‘प्रश्वास’ है। इन दोनों की स्वाभाविक गति में विच्छेद-रुकावट डाल देना प्राणायाम कहाता है। श्वास-प्रश्वास नियमित रूप में बिना व्यवधान के चलते रहते हैं। प्राण अर्थात् श्वास-प्रश्वास की क्रिया की समाप्ति तो जीवन की समाप्ति है, अतः श्वास-प्रश्वास की गति को सर्वथा नहीं रोका जा सकता, उसमें अन्तर डाला जा सकता है। इस क्रिया से श्वास-प्रश्वास (प्राण) बन्द न होकर उसका आयाम-विस्तार होता है।

महर्षि दयानन्द सत्यार्थप्रकाश में योग के चार प्राणायामों की विधि व उसके लाभ लिखते हैं-‘‘जैसे अत्यन्त वेग से वमन होकर अन्न जल बाहर निकल जाता है, वैसे प्राण से को बल से बाहर फेंक के बाहर ही यथाशक्ति रोक देवे। जब बाहर निकालना चाहे, तब मूलेन्द्रिय को ऊपर खींच के वायु को बाहर फेंक दे। तब तक मूलेन्द्रिय को खींचे रक्खे, जब तक प्राण बाहर ही रहता है। इस प्रकार प्राण बाहर अधिक ठहर सकता है। जब घबराहट हो तब धीरे-धीरे वायु भीतर को ले के फिर वैसा ही करते जायें। जितना सामर्थ्य और इच्छा हो। और मन (ओ3म) इसका जप करता जाय। इस प्रकार करने से आत्मा और मन की पवित्रता और स्थिरता होती है। एक ‘बाह्य’ अर्थात् बाहर ही अधिक रोकना। दूसरा ‘आयन्तर’ अर्थात् भीतर जीतना प्राण रोका जाय, उतना रोके। तीसरा ‘स्तभवृत्ति’ अर्थात् एक ही बार जहां का तहां प्राण को यथाशक्ति रोक देना। चौथा ‘बाह्यायन्तराक्षेपी’ अर्थात् जब प्राण भीतर से बाहर निकलने लगे तब उसके विरुद्ध उसको न निकलने देने के लिए बाहर से भीतर ले और बाहर से भीतर आने लगे तब भीतर से बाहर की ओर प्राण को धक्का देकर रोकता जाय। ऐसे एक दूसरे के विरुद्ध क्रिया करें तो दोनों की गति रुक कर प्राण अपने वश में होने से मन और इन्द्रियां भी स्वाधीन होते हैं। बल, पुरुषार्थ बढ़कर बुद्धि तीव्र, सूक्ष्मरूप हो जाती है कि जो बहुत कठिन और सूक्ष्म विषय को भी शीघ्र ग्रहण करती है। इससे मनुष्य शरीर में वीर्य-वृद्धि को प्राप्त होकर स्थिर बल, पराक्रम, जितेन्द्रियता, सब शास्त्रों को थोड़े ही काल में समझकर उपस्थित कर लेगा।’’ (स.प्र.3)

यहाँ महर्षि ने मानसिक व शारीरिक जो लाभ लिखे हैं वे इन चार प्राणायामों से ही माने हैं। ऋषियों द्वारा बनाई व बताई गई प्रत्येक क्रिया व बातें मनुष्य के लिए कल्याणकारी ही सिद्ध होती हैं।

योग-सिद्धि के लिए तो योगदर्शन में वर्णित प्राणायाम का विधान ऋषि ने किया है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए स्वामी रामदेव जी द्वारा बताई गई विधि भी कर सकते हैं।

यज्ञ के ब्रह्मा द्वारा यज्ञ में तीन बार दक्षिणा लेना कहाँ तक उचित है?

. यज्ञ के ब्रह्मा द्वारा यज्ञ में तीन बार दक्षिणा लेना कहाँ तक उचित है?

कृपया सविस्तार समाधान दीजिये। धन्यवाद!

– मन्त्री, रविकान्त राणा, सहारनपुर

समाधान-

(ग)यज्ञ करवाने के बाद यजमान पुरोहित को उचित दक्षिणा अपने सामर्थ्य अनुसार अवश्य देवें, यह शास्त्र का विधान है। यज्ञ की दक्षिणा एक बार यज्ञ समपन्न होने पर दी जाती है अथवा यज्ञ समपन्न होने पर पुरोहित को दक्षिणा लेनी चाहिए। वह दक्षिणा एक ही बार दी जाती है। तीन-तीन बार लेने वाला भी पुरोहित महापुरुष है, इसका तो आश्चर्य है। आज यज्ञ जैसे परोपकार-रूप कर्म को भी कमाई का साधन बनाते जा रहे हैं। पौराणिक पुरोहित तो धन-हरण के लिए यज्ञकर्म में अनेक अवैदिक लीलाएँ करते हैं, किन्तु आर्यसमाज के पुरोहित द्रव्य के लालच में ऐसी क्रियाएँ कर बैठते हैं। यजमान से संकल्प पाठ करवाते समय पैसे रखवा लेते हैं, यज्ञ की दक्षिणा तो लेते ही हैं। यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद यजमानों व अन्य लोगों को फल व अन्य खाद्य पदार्थ का पुरोहित या ब्रह्मा अपने हाथ से प्रसाद के रूप में वितरण करते हैं, इस वितरण का प्रयोजन द्रव्य प्राप्ति ही है।

तीन-तीन बार दक्षिणा किस प्रकार ले लेते हैं यह तो मेरी भी समझ में नहीं आया। फिर भी जो तीन-तीन बार लेता है सो अनुचित ही करता है। अस्तु।

वेदानुसार बहुकुन्डीय यज्ञ उचित है अथवा अनुचित?

वेदानुसार बहुकुन्डीय यज्ञ उचित है अथवा अनुचित?

समाधान-

(ख)बहुत सारे कुण्ड एक स्थान पर रखकर हवन करने का पढ़ने को तो नहीं मिला, किन्तु यदि निर्लोभ होकर यथार्थ विधि पूर्वक कहीं ऐसे यज्ञों का आयोजन होता है तो इसमें हमें हानि प्रतीत नहीं हो रही। हानि वहाँ है, जहाँ बहुकुण्डिय यज्ञ करने का उद्देश्य व्यापार हो। यजमान से दक्षिणा की बोली लगवाई जा रही हो अथवा एक कुण्ड पर दक्षिणा को निश्चित करके बैठाया जाता हो। यज्ञ करवाने वाले ब्रह्मा की दृष्टि मिलने वाली दक्षिणा पर अधिक और यज्ञ क्रियाओं, विधि पर न्यून हो ऐसे बहुकुण्डिय यज्ञों से तो हानि ही है, क्योंकि यह यज्ञ परोपकार के लिए कम और स्वार्थपूर्ति रूप व्यापार के लिए अधिक हो जाता है।

प्रशिक्षण की दृष्टि से ऐसे यज्ञों का आयोजन किया जा सकता है। जिस आयोजन से अनेकों नर-नारी यज्ञ करना सीख लेते हैं और यज्ञ के लाभ से भी  अवगत होते हैं।

वेदानुसार यज्ञोपरान्त ब्रह्मा केमहिलाओं द्वारा स्वयमेव अथवा ब्रह्मा के आदेशानुसार चरण-स्पर्श क्या वैध है?

– आचार्य सोमदेव

जिज्ञासामहोदय,

वेदानुसार यज्ञोपरान्त ब्रह्मा केमहिलाओं द्वारा स्वयमेव अथवा ब्रह्मा के आदेशानुसार चरण-स्पर्श क्या वैध है?

समाधानयज्ञ कर्म वैदिक कर्म है, श्रेष्ठ कर्म है। यज्ञ को ऋषियों ने हमारी दैनिकचर्या से जोड़ दिया है। यज्ञ करने से जो हमारे शरीर से मल निकलता और उससे जो वातावरण दूषित होता है, उसकी निवृत्ति होती है अर्थात् वातावरण शुद्ध होता है। महर्षि दयानन्द ने यज्ञ की बहुत बढ़ाई की है, महर्षि यज्ञ को लोकोपकार का बहुत बड़ा साधन मानते हैं।

महर्षि दयानन्द से पहले यज्ञ रूपी कर्मकाण्ड में बहुत बड़ा विकार स्वार्थी लोगों ने कर रखा था। यज्ञ को अपने स्वार्थ व उदरपूर्ति का साधन बना डाला था। इसलिए उन स्वार्थी लोगों ने यज्ञ में अनेक अवैदिक क्रियाएँ जोड़ दी थीं। जैसे यज्ञों में पशुबलि अथवा पशुओं का मांस डालना आदि। इन अवैदिक कर्मों को यज्ञों में होते देख बहुत लोग यज्ञों से दूर होते चले गये, यज्ञ जैसे श्रेष्ठ-कर्म को हीन-कर्म मानने लग गये। जिससे लोगों की वेद व ईश्वर के प्रति श्रद्धा भी न्यून होती चली गई।

महर्षि दयानन्द ने यज्ञ में किये गये विकारों को दूर कर हमें विशुद्ध यज्ञ-पद्धति दी। जिस यज्ञ-पद्धति में पाखण्ड अन्धविश्वास का लेश भी नहीं है। यदि हम आर्यजन महर्षि की बताई पद्धति का अनुसरण करें तो यज्ञ में एकरूपता आ जावे और पाखण्ड रहित हो जावे। जब-जब हम मनुष्य ऋषियों के अनुसरण को छोड़ अपनी मान्यता को वैदिक कर्मों में करने लगते हैं तो धीरे-धीरे स्वार्थी लोगों की भाँति हम भी पाखण्ड की ओर चले जाते हैं व अन्यों को भी ले जाते हैं।

आजकल बड़े कार्यक्रम करते हुए यज्ञ के ब्रह्मा की नियुक्ति करते हैं, इसलिए कि यज्ञ का संचालन ठीक से हो जाये, लोगों को यज्ञ के लाभ व ठीक-ठीक क्रियाओं का ज्ञान हो जाये। यज्ञ में बने ब्रह्मा का उचित समान करना चाहिए, यह यजमान व आयोजकों का कर्त्तव्य बनता है। वह समान अभिवादन आदि से कर सकते हैं। पुरुष वर्ग ब्रह्मा के पैर छूकर अभिवादन करना चाहें तो कर सकते हैं, किन्तु स्त्री वर्ग सामने आ, कुछ दूर खड़े हो, हाथ जोड़, कुछ मस्तक झुकाकर अभिवादन करें तो अधिक श्रेष्ठ होगा। स्त्रियों द्वारा ब्रह्मा के पैर छूकर अभिवादन करने की परपमरा उचित नहीं, न ही कहीं ग्रन्थों में पढ़ने को मिला। ब्रह्मा को भी योग्य है कि वह स्वयं भी स्त्रियों से पैर न छूवावें, इससे मर्यादा बनी रहती है और एक आदर्श प्रस्तुत होता है। आजकल जो ये परमपरा देखने को मिल रही है, वह पौराणिकों से प्रभावित होकर देखने को मिल रही है, अपने को उनकी भाँति गुरु रूप में प्रस्तुत करने की भावना कहीं न कहीं मन के एक कोने में काम कर रही होती है। जिस गलत बात को महर्षि दूर करना चाहते थे, उसी को ऐसी भावना रखने वाले पोषित करते हैं।

हमारे आदर्श महापुरुष, ऋषि होने चाहिएँ। जैसा आचारण, व्यवहार वे करते आये वैसा करने में ही हमारा कल्याण है। महर्षि दयानन्द ने अपने जीवन काल में किसी स्त्री को पैर नहीं छूने दिये, महर्षि के इस व्यवहार से भी हम सीख सकते हैं। महर्षि ने ऐसा इसलिए किया कि वे अपने को गुरु (गुरुडम वाले गुरु) के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहते थे और एक आदर्श प्रस्तुत कर रहे थे। क्योंकि महापुरुष जानते हैं कि जैसा आचरण वे करेंगे, वैसा ही उनके अनुयायी भी करेंगे इसलिए महापुरुष ऐसा आचरण कदापि नहीं करते कि जिससे उनके अनुयायी विपरीत पथगामी हो जायें। इसलिए आर्य-विद्वानों को महिलाओं से पैर छूवाने से बचना चाहिए, बचने में अधिक लाभ है।

 

’ विषय में शिवलिंग वस्तुतः यज्ञ वेदी से उठती हुई अग्नि-शिखा का द्योतक है। स्वयं ऋग्वेद में तेईस देवियों के नाम मिलते हैं। अतः शिव और देवी को अवैदिक कहना झूँठ और बेईमानी है। जिज्ञासा यह है कि शिव, शिवलिंग और देवी शबद के यहाँ कहने का क्या तात्पर्य है एवं ऋग्वेद में देवी शबद का प्रयोग किस तात्पर्य या प्रयोजन को सिद्ध करता है। यह पौराणिक मान्यताओं के देवी शबद का प्रयोजन तो नहीं है। कष्ट के लिये क्षमा।

जिज्ञासा –

  1. इसी माह की पत्रिका के पेज 22 पर ‘‘आर्य अनार्य की बात’’ विषय में शिवलिंग वस्तुतः यज्ञ वेदी से उठती हुई अग्नि-शिखा का द्योतक है। स्वयं ऋग्वेद में तेईस देवियों के नाम मिलते हैं। अतः शिव और देवी को अवैदिक कहना झूँठ और बेईमानी है।

जिज्ञासा यह है कि शिव, शिवलिंग और देवी शबद के यहाँ कहने का क्या तात्पर्य है एवं ऋग्वेद में देवी शबद का प्रयोग किस तात्पर्य या प्रयोजन को सिद्ध करता है। यह पौराणिक मान्यताओं के देवी शबद का प्रयोजन तो नहीं है। कष्ट के लिये क्षमा।

– मुकुट बिहारी आर्य, 13/772 मालवीय नगर, जयपुर (राज.)

समाधान-

(ख) शिव और देवी के अर्थ महर्षि दयानन्द ने किये हैं। शिव का अर्थ जगत्पिता परमात्मा परक करते हुए लिखते हैं- ‘‘शिवु कल्याणे- इस धातु से शिव शबद सिद्ध होता है।……..जो कल्याणस्वरूप और कल्याण का करने हारा है, इसलिए उस परमेश्वर का नाम शिव है।’’

-स.प्र.1।

देवी का अर्थ भी ईश्वर परक करते हुए लिखते हैं-‘दिवु’ अर्थात् जिसके क्रीड़ा आदि अर्थ हैं, उससे देवी शबद सिद्ध होता है…….सबका प्रकाशक, सबको आनन्द देने वाला।

– पञ्चमहायज्ञविधि

शिव और देवी इन दोनों शबदों के अर्थ ईश्वर-परक हैं, प्रकरणानुरूप किन्हीं और के वाचक भी हो सकते हैं। वेद में जो ये शबद आये हैं, इनका अर्थ सती और पार्वती के पति, गणेश तथा कार्तिकेय के पिता, भस्मधारी, नरमुण्डमालाधारी, वृषारोही, सर्पकण्ठ, नटवर, नृत्यप्रिय, नन्दा वेश्यागामी, अनुसूया धर्मनाशक, हस्तेलिंगधृक् महादेव नामक पौराणिक व्यक्ति और चारभुजा आदि से युक्त देवी कदापि नहीं है।

शिव और देवी-इनका अर्थ जो ऊपर लिखा, इस अर्थ के अनुसार तो ये वैदिक ही कहायेंगे, किन्तु इसके विपरीत किसी व्यक्ति वा स्त्री विशेष अर्थ में तो अवैदिक ही कहे जायेंगे। और ये कहकर कि शिवलिंग यज्ञवेदी से उठती हुई अग्नि-शिखा का द्योतक है, शिवलिंग को सिद्ध करना अपनी कोरी कल्पना के अतिरिक्त कुछ भी नहीं अर्थात् ये मिथ्या कल्पनामात्र है। यदि ऐसा है तो इस विषय में कोई आर्ष-प्रमाण प्रस्तुत करने की कृपा करें। आजकल कुछ विद्वान् इन पौराणिक गपोड़ों को अपनी कल्पना के आधार पर सही सिद्ध करने में लगे हैं। कोई गणेश को सही सिद्ध कर रहा है तो कोई विष्णु के चार हाथों की व्याखया कर उसको उचित सिद्ध करने में लगा है। ऐसा करने से पौराणिक मान्यताओं को बढ़ावा ही मिलना है न कि पाखण्ड न्यून होने को।

श्रीमान् मनसाराम जी वैदिक तोप की पुस्तक ‘‘पौराणिक पोल प्रकाश’’ में  इस कथा के विषय में विस्तार से लिखा है। इस कथा को जानकर कोई कैसे कह सकता है कि शिवलिंग अग्नि-शिखा का द्योतक है। यह तो शिव-पार्वती की अश्लील क्रियाओं के अतिरिक्त कुछ नहीं है। इसलिए आर्यजन व्यर्थ की कल्पनाओं पर विश्वास न कर यथार्थ को स्वीकार कर अपने जीवन को उत्तम बनावें।