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आजकल आर्यसमाज के नए-नए विद्वान् नई-नई खोज कर रहे हैं। एक नई खोज सामने आयी है कि आत्मा साकार है और सत्यार्थप्रकाश का हवाला देते हुए बताते हैं कि स्वामी जी ने निराकार नहीं निराकारवत् लिखा। अब सही और गलत आप ही बताएँ।

– आचार्य सोमदेव

जिज्ञासाआजकल आर्यसमाज के नए-नए विद्वान् नई-नई खोज कर रहे हैं। एक नई खोज सामने आयी है कि आत्मा साकार है और सत्यार्थप्रकाश का हवाला देते हुए बताते हैं कि स्वामी जी ने निराकार नहीं निराकारवत् लिखा। अब सही और गलत आप ही बताएँ।

– यतीन्द्र आर्य, मन्त्री आर्यसमाज बालसमन्द, हिसार, हरि.

समाधानवैदिक सिद्धान्त त्रैतवाद को मानता है अर्थात् ईश्वर, जीव व प्रकृति इन तीनों की सत्ता है और वह सत्ता इन तीनों की अपनी पृथक्-पृथक् है। वेद व ऋषिकृत ग्रन्थों में इनका स्पष्ट वर्णन मिलता है। महर्षि दयानन्द ने अपने सिद्धान्त में इसी को रखा है। महर्षि ने इन तीनों स्वरूपों का वर्णन अपने ग्रन्थों, प्रवचनों व पत्र-व्यवहारों में अनेकत्र किया है। आर्य समाज के विद्वानों में महर्षि की मान्यता सर्वोपरि रहती है। वेद के आधार पर जिस बात को महर्षि मानते हैं उसी को आर्य विद्वान् स्वीकार करते हैं।

महर्षि दयानन्द ने जीवात्मा के स्वरूप विषय में जीवात्मा को स्पष्ट शब्दों में निराकार कहा है। महर्षि की इस स्पष्ट मान्यता की अवहेलना कर आर्य समाज में एक वर्ग विशेष चलाने वालें ने जीवात्मा को साकार कहना-बताना आरम्भ कर दिया है। यह ज्ञान  जिनके अन्दर उतरा है उनकी मान्यता है कि आज तक इनके अतिरिक्त यह बात किसी ने नहीं की, इसकी खोज तो मैंने ही की है। इनकी इस बात से हम सहमत हैं कि ये इलहाम इन्हीं को हुआ, अन्य किसी को नहीं। ये लोग तर्क देते हैं कि निराकार-निराकार में नहीं रह सकता अर्थात् निराकार ईश्वर में निराकार आत्मा वा अन्य कोई वस्तु नहीं रह सकती। इस तर्क को ये कथन मात्र में दोहराते हैं, सिद्ध नहीं करते। इसके लिए जहाँ तक हमारा अनुमान है कि इनके पास कोई शब्द प्रमाण नहीं है कि जीवात्मा साकार है।

हमने परोपकारी में जिज्ञासा-समाधान स्तम्भ के अन्तर्गत महर्षि दयानन्द के अनेक प्रमाण दिये। अब फिर उन प्रमाणों को देते हुए महर्षि का नया प्रमाण प्रस्तुत करते हैंः-

१. ‘‘बदला दिये जावेंगे कर्मानुसार, और प्याले भरे हुए, जिस दिन खड़े होंगे रूह और फरिश्ते सफ़ बांधकर’’ मं. ७/सि./३०/सू. ७८/आ. २६/३४/३८

समीक्षा-यदि कर्मानुसार फल दिया जाता है तो……….और रुह निराकार होने से वहाँ खड़ी क्योंकर हो सकेगी।’’ सत्यार्थप्रकाश समु. १४ (द. ग्रं. मा. भाग एक सं. १२९ वाँ बलिदान समारोह २०१२)

२. ‘‘इसी प्रकार भक्तों की उपासना के लिए ईश्वर का कुछ आकार होना चाहिए, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं, परन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि शरीर स्थित जो जीव है वह भी आकार रहित है, यह सब कोई मानते हैं अर्थात् वैसा आकार न होते हुए भी हम परस्पर एक-दूसरे को पहचानते हैं और प्रत्यक्ष कभी न देखते हुए भी केवल गुणानुवादों ही से सद्भावना और पूज्य बुद्धि मनुष्य के विषय में रखते हैं।’’ (पूना प्रवचन व्या. १)े

प्रश्न- ‘‘मूर्त पदार्थों के बिना ध्यान कैसे बनेगा?

उत्तर- शब्द का आकार नहीं, तो भी शब्द ध्यान में आता है वा नहीं? आकाश का आकार नहीं तो भी आकाश का ज्ञान करने में आता है वा नहीं? जीव का आकार नहीं तो भी जीव का ध्यान होता है वा नहीं……।’’ (पूना. प्र. व्या. ४)

महर्षि दयानन्द का एक और प्रमाण सटीक व स्पष्ट रूप से देखिये-

यच्चेतनवत्वं तज्जीवत्वम्। जीवस्तु खलु चेतनस्वभावः।

अस्येच्छादयो धर्म्मास्तु निराकारोऽविनाश्यनादिश्च वर्त्तन्ते।

‘‘जो चेतन है, वह जीव है और जीव का चेतन ही स्वभाव है। उसके इच्छा आदि धर्म हैं तथा वह भी निराकार और नाश से रहित रहता है।’’ (महर्षि दयानन्द सरस्वती का पत्र व्यवहार भाग-१)

ये सभी शब्द प्रमाण हमने महर्षि दयानन्द के दिये हैं, इन आर्ष प्रमाणों को स्वीकार न कर अपनी काल्पनिक मिथ्या बात को सर्वोपरि रख उसको प्रचारित करना हठ-दूराग्रह ही हो सकता है।

अब इन आत्मा को साकार मानने वालों का जो कथन है कि निराकार परमात्मा में निराकार आत्मा कैसे रह सकता है? इनके इस कथन का उत्तर है कि जैसे साकार वस्तुएँ एकदेशीय होती हुईं निराकार परमात्मा में रहती हैं, वैसे ही एकदेशीय निराकार आत्मा भी निराकार परमात्मा में रहती है। यहाँ विशेष ध्यान देने की बात यह है कि आत्मा और परमात्मा निराकार होते हुए भी दोनों सूक्ष्म और अतिसूक्ष्म रूप से भेद रखते हैं। इस विषय में महर्षि दयानन्द प्रश्नोत्तर पूर्वक सत्यार्थप्रकाश में लिखते हैं-

प्रश्न जिस जगह में एक वस्तु होती है उस जगह में दूसरी नहीं रह सकती, इसलिए जीव और ईश्वर का संयोग सम्बन्ध हो सकता है, व्याप्य-व्यापक का नहीं?

उत्तरयह नियम समान आकार वाले पदार्थों में घट सकता है, असमान आकृति में नहीं।…….वैसे जीव परमेश्वर से स्थूल और परमेश्वर जीव से सूक्ष्म होने से परमेश्वर व्यापक और जीव व्याप्य है।’’ महर्षि के इन वचनों से यह बात स्पष्ट हुई कि ईश्वर और जीव इयत्ता की दृष्टि से दोनों परिमाण वाले हैं, एक सूक्ष्म है दूसरा सूक्ष्मतर है, इस आधार पर एक व्याप्य है और दूसरा व्यापक है, एक एकदेशीय है तो दूसरा सर्वदेशीय है। आत्मा परमेश्वर से कुछ स्थूल है। कुछ स्थूल होने से निराकार आत्मा निराकार परमात्मा में रहता है। आत्मा के इस प्रकार रहने में कोई विरोध नहीं आ रहा।

अब साकार-निराकार पर विचार कर लेते हैं कि साकार व निराकार कहते किसे हैं।

१. जो पदार्थ आँख से दिखाई दे, वह साकार और इसके अतिरिक्त निराकार।

२. जो पदार्थ इन्द्रियों से प्रतीत होवे वह साकार और जो इन्द्रियों से प्रतीत न होवे वह निराकार।

३. जो पदार्थ प्रकृति से बना हुआ है, वह साकार और जो प्रकृति से नहीं बना वह निराकार।

पाठक विचार करके देखें कि वैदिक सिद्धान्त के अनुसार जीवात्मा में कौन सी परिभाषा घट रही है? इन तीनों परिभाषाओं में से एक भी परिभाषा जीवात्मा में नहीं घटेगी। क्योंकि जीवात्मा आँखों से दिखाई नहीं देता, इन्द्रियों से प्रतीत नहीं होता और न ही प्रकृति के अवयवों से बना हुआ। जब इन सब साकार की परिभाषाओं में जीवात्मा का स्वरूप घट ही नहीं रहा, तब जीवात्मा निराकार न होकर साकार कैसे हुआ, हाँ हो सकता है इन साकार मानने वाले अवतारों का आत्मा साकार हो।

आत्मा को निराकार न मानने वालों का तर्क है कि महर्षि ने आत्मा को निराकार न कहकर परिच्छिन्न लिखा है, इसलिए आत्मा निराकार नहीं है। इनके इस तर्क में कितना दम-खम है वह देख लेते हैं। जहाँ महर्षि ने आत्मा को परिच्छिन्न कहा है, वह किस सन्दर्भ में कहा है, वह सन्दर्भ पाठकों के लिए ज्यों का त्यों यहाँ लिख रहे हैं कि पाठक स्वयं जान लें कि सन्दर्भ आत्मा को निराकार-साकार दर्शाने के लिए है या कुछ और जानने के लिए। लीजिए सन्दर्भ प्रस्तुत है-

‘‘प्रश्न- जीव शरीर में भिन्न विभु है, वा परिच्छिन्न?

उत्तर- परिच्छिन्न। जो विभु होता तो जाग्रत, स्वप्न, मरण, जन्म,संयोग, वियोग, जाना, आना कभी नहीं हो सकता। इसलिए जीव का स्वरूप अल्पज्ञ, अल्प, अर्थात् सूक्ष्म है और परमेश्वर का अतीव सूक्ष्मात्सूक्ष्मतर, अनन्त, सर्वज्ञ और सर्वव्यापक स्वरूप है। इसलिए जीव और परमेश्वर का व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध है।’’ स.प्र.स.७

महर्षि के इन वचनों में आत्मा को निराकार कहने का कोई अवसर ही नहीं है। यहाँ तो महर्षि आत्मा के विभु अर्थात् सर्वव्यापक अथवा परिच्छिन्न अर्थात् एकदेशीय होने को लेकर चर्चा कर रहे हैं और इस चर्चा में महर्षि आत्मा को परिच्छिन्न=एकदेशीय युक्ति तर्क से सिद्ध कर रहे हैं। इस प्रकरण को न समझ समझाकर इससे अपनी काल्पनिक बात को प्रस्तुत कर जन सामान्य में मतिभ्रम फैलाना विद्वानों का कार्य नहीं हो सकता।

आओ साथ-साथ इस परिच्छिन्न और विभु शब्दों के अर्थों को और देख लेते हैं कि जिससे और स्पष्ट हो जाये कि यह सन्दर्भ आत्मा को निराकार न कहने के लिए है वा एकदेशीय।

‘‘प्रश्न- जीव शरीर में विभु है वा परिच्छिन्न?

उत्तर – परिच्छिन्न। जो विभु होता तो जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, मरण, जन्म, संयोग, वियोग, जाना, आना नहीं हो सकता। इसलिए जीव का स्वरूप अल्पज्ञ, अल्प अर्थात् सूक्ष्म है और परमेश्वर का अतीव सूक्ष्मात्सूक्ष्मतर, अनन्त, सर्वज्ञ और सर्वव्यापकस्वरूप है। इसलिए जीव और परमेश्वर का ‘व्याप्य-व्यापक’ सम्बन्ध है।’’ स.प्र.७

महर्षि ने यहाँ साकार-निराकार निरुपण किया ही नहीं, यहाँ तो विभु अथवा परिच्छिन्न की चर्चा की है, ऐसा होते हुए भी कुछ अतिविद्वान् इस प्रसंग से आत्मा को साकार अथवा निराकार न होना सिद्ध करते हैं। पाठक स्वयं विचार कर देखें कि ऋषि की आढ़ में अपने मन्तव्य परोसना चाह रहे हैं या……।

आत्मा के निराकार होने के अनेक प्रमाण हमने यहाँ महर्षि दयानन्द के दे दिये हैं। इतना होने पर भी महर्षि के मन्तव्य को कोई स्वीकार न करे तो इसको अपना दम्भ वा महत्वाकांक्षा ही कह सकते हैं।

पुस्तक परिचय पुस्तक का नाम – ऋषि दयानन्द की प्रारमभिक जीवनी

पुस्तक परिचय

पुस्तक का नामऋषि दयानन्द की प्रारमभिक जीवनी

लेखक         – दयाल मुनि आर्य

समपादक      – भावेश मेरजा

प्रकाशकडॉ. राजेन्द्र विद्यालंकार, सत्यार्थ

प्रकाश न्यास, 14251, सै. 13,

अर्बन एस्टेट, कुरु क्षेत्र, हरि.136118

पृष्ठ 168    मूल्य – निःशुल्क

महर्षि दयानन्द के जीवन चरित्र के ऊपर अनेक ऋषि भक्तों ने कार्य किया उनमें मुखय रूप से धर्मवीर पं. लेखराम, बाबु श्री देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय, स्वामी सत्यानन्द जी व उर्दू के जीवनी लेखक पं. लक्ष्मण  आर्योपदेशक आदि। इन श्रद्धालु महानुभावों ने अपना अमूल्य समय व धन लगा कर जहाँ-जहाँ ऋषिवर गये वहाँ-वहाँ पहुँचकर ऋषि जीवन की एक-एक घटना को एकत्र करने का पुण्य कार्य किया। जिनके इस पुण्य कार्य के कारण आज हम महर्षि दयानन्द के जीवन से परिचित अपने को अनुभव करते हैं।

महर्षि की मान्यता रही है कि जो भी इतिहास रूप में लिखा जाये वह सत्य के आधार पर ही लिखा जाये। महर्षि ने अपने जीवन के विषय में जो बताया वा लिखा वह तो प्रामाणिक है ही तथा महर्षि के देहपात होने के कुछ काल बाद जो ऋषि के श्रद्धालुओं ने परिश्रम करके ऋषि जीवन को लिखा वह भी  प्रामाणिक है। महर्षि दयानन्द जी की स्वयं इस बात के पक्षधर थे कि उनके विषय में जो लिखा जाये वह इतिहास सत्य ही लिखा जाये। यह बात महर्षि के एक ऐतिहासकि पत्र से ज्ञात होती है। इस पत्र को यहाँ ज्यों का त्यों लिखते हैं-

पण्डित गोपालराव हरि जी, आनन्दित रहो।

आज एक साधु का पत्र मेरे पास आया। वह आपके पास भेजता हूँ। साधु का लेख सत्य है, परन्तु आपने चित्तौड़ समबन्घी इतिहास न जाने कहाँ सुन सुना कर लिख दिया। उस काल उस स्थान में मेरा उदयपुराधीश से केवल तीन ही बार समागम हुआ। आपने प्रतिदिन दो बार होता रहा लिखा है। आप जानते हैं कि मुझे ऐसे कामों के परिशोधन का अवकाश नहीं। यद्यपि आप सत्य-प्रिय और शुद्ध भाव-भावित ही हैं और इसी हित-चित्त से उपकारक काम कर रहे हैं, परन्तु जब आपको मेरा इतिहास ठीक-ठीक विदित नहीं तो उसके लिखने में कभी साहस मत करो। क्योंकि थोड़ा-सा भी असत्य हो जाने से समपूर्ण निर्दोष कृत्य बिगड़ जाता है। ऐसा निश्चय रक्खो। और इस पत्र का उत्तर शीघ्र भेजो।

वैशाख शुक्ल 2 सवत् 1939 / स्थान शाहपुरा

दयानन्द सरस्वती

इस पत्र में महर्षि ने विशेष निर्देश किया है कि जो भी उनके विषय में लि जाये वह सत्य से युक्त हो। महर्षि के जीवन काल में ‘दयानन्द दिग्विजपार्क’ नामक जीवनी महाराष्ट्र के एक सज्जन पं. गोपालराव हरि प्रणतांकर जी ने लिखी थी। उनको यह पत्र महर्षि ने लिखा था।

प्रायः महर्षि के प्रारमभीक जीवन के विषय में सभी लेखकों का स्पष्ट मत नहीं आता दिख रहा है, जन्म स्थान माता-पिता का नाम आदि विषयों पर कुछा्रम-सा रहा है। उसा्रम को दूर करने के लिए ऋषि भक्त, चारों वेदों को गुजराती भाषा में अनुवाद करने का श्रेय प्राप्त करने वाले, अनेकों आयुर्वेद के विशाल ग्रन्थों के गुजराती अनुवादक, आयुर्वेदाचार्य, आयुर्वेद चूड़ामणि, डी.लिट्. (आयुर्वेद) उपाधियुक्त, सरल स्वभाव के धनी, टंकारा निवासी श्रीमान् दयाल मुनि आर्य जीने श्रीमान् डॉ. रामप्रकाश जी (कुरुक्षेत्र) कुलाधिपति गुरुकुल कांगड़ी के निवेदन पर महर्षि दयानन्द जी के प्रारमभिक जीवन का परिश्रम करके अन्वेषण किया, उस अन्वेषण को ‘‘ऋषि दयानन्द की प्रारमभिक जीवनी’’ नाम से पुस्तकाकार दे दिया है। जिस पुस्तक का समपादन ऋषि इतिहास व आर्य समाज के इतिहास में रूचि रखने वाले श्रीमान् भावेश मेरजा जी ने किया है।

पुस्तक में पाठकों को ऋषि के आरमभिक जीवन का परिचय कराने के लिए बारह विषय दिये गये हैं। 1. जन्म स्थान विषयक भ्रम निवारण, 2. ऋषि के भ्रातृवंश समबन्धी भ्रम का निराकरण, 3. ऋषि के वंश-वृक्ष की प्राप्ति के प्रयत्न, 4. टंकारा के जीवापुर मुहल्ले से सबन्धित तथ्य, 5.शिवरात्रि का उपासना मन्दिर, 6. ऋषि के स्व वंश समबन्धी तथ्य तथा एतद् विषयक भ्रम का निवारण, 7. ऋषि की माता का नाम क्या था, 8. ऋषि के भाई-बहन व चाचा के नामों के विषय में भ्रम निवारण, 9. ऋषि के महाभिनिष्क्रमण के समबन्ध में भ्रम निवारण, 10. ऋषि के महाभिनिष्क्रमण के बाद दूसरी रात्रि का निवास-स्थान कौन-सा था? 11. लाला भक्त (भगत) योगी नहीं थे, 12. डॉ. जॉर्डन्स की बात का निराकरण। और इस पुस्तक के परिशिष्ट में बड़ी महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ सात विषयों को लेकर हैं। ऋषि जीवन प्रेमियों के लिए यह पुस्तक अति महत्त्व रखने वाली है।

लेखक ने प्राक्कथन में अपनी पीड़ा रखी-‘‘मैं ऐसा समझता हूँ कि ऋषि जीवनी के शोध कार्य में पण्डित लेखराम और पण्डित देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय के पश्चात् यदि किसी सुयोग्य व्यक्ति ने इस दिशा में शीघ्र ही शोध कार्य को आगे बढ़ाया होता तो उस समय बहुत कुछ बातें सुलभ होतीं, परन्तु ऐसा हो नहीं पाया और इस कार्य की उपेक्षा के परिणामस्वरूप आज भी हमें ऋषि जीवन विषयक कई छोटे-बड़े भ्रम एवं विवादों का निराकरण करने के लिए प्रवृत्त होना पड़ता है।’’

लेखक के विषय में डॉ. रामप्रकाश जी बड़े विश्वास पूर्वक पुस्तक के निवेदन में लिखते हैं- ‘‘वर्तमान में टंकारा निवासी वयोवृद्ध दयाल मुनि एक मात्र ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्हें महर्षि के प्रारमभिक जीवनी के विषय में सर्वाधिक सही जानकारी है। उन्होंने यह जानकारी वर्षों की सतत साधना से प्राप्त की है।’’

ऋषि जीवन के प्रारमभीक विषयों के लिए यह पुस्तक समस्त ऋषि प्रेमी, भक्तों को आनन्द देने वाली होगी व जो भी महर्षि जीवनी पर शोध करने वाले हैं उनके लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगी। सुन्दर आवरण,छपाई व कागज से युक्त इस पुस्तक का प्रकाशन आर्य जगत् के युवा विद्वान् डॉ. राजेन्द्र विद्यालंकार जी ने करवाया है। इस पुस्तक को पाठक प्राप्त कर लेखक के शोध कार्य के दर्शन करेंगे।

– आचार्य सोमदेव

 

मैंने आर्य समाज मन्दिर में महर्षि दयानन्द जी का एक स्टेचू (बुत) जो केवल मुँह और गर्दन का है जिसका रंग गहरा ब्राउन है, रखा देखा है। पूछने पर पता चला कि यह किसी ने उपहार में दिया है। आप कृपया स्पष्ट करें कि क्या महर्षि का स्टेचू भेंट में लेना, बनाना और भेंट देना आर्य समाज के सिद्धान्त के अनुरूप है? जहाँ तक मेरा मानना है महर्षि ने अपनी प्रतिमा बनाने की सत मना ही की थी। कृपया स्पष्ट करें।

– आचार्य सोमदेव

जिज्ञासाःआदरणीय समपादक महोदय सादर नमस्ते। निवेदन यह है कि मैंने आर्य समाज मन्दिर में महर्षि दयानन्द जी का एक स्टेचू (बुत) जो केवल मुँह और गर्दन का है जिसका रंग गहरा ब्राउन है, रखा देखा है। पूछने पर पता चला कि यह किसी ने उपहार में दिया है। आप कृपया स्पष्ट करें कि क्या महर्षि का स्टेचू भेंट में लेना, बनाना और भेंट देना आर्य समाज के सिद्धान्त के अनुरूप है? जहाँ तक मेरा मानना है महर्षि ने अपनी प्रतिमा बनाने की सत मना ही की थी। कृपया स्पष्ट करें।

धन्यवाद, सादर।

– डॉ. पाल

समाधानःमहर्षि दयानन्द ने अपने जीवन में कभी सिद्धान्तों से समझौता नहीं किया। वे वेद की मान्यतानुसार अपने जीवन को चला रहे थे और समपूर्ण विश्व को भी वेद की मान्यता के प्रति लाना चाहते थे। वेद ईश्वर का ज्ञान होने से वह सदा निर्भ्रान्त ज्ञान रहता है, उसमें किसी भी प्रकार के पाखण्ड अन्धविश्वास का लेश भी नहीं है। वेद ही ईश्वर, धर्म, न्याय आदि के विशुद्ध रूप को दर्शाता है। वेद में परमेश्वर को सर्वव्यापक व निराकार कहा है। प्रतिमा पूजन का वेद में किसी भी प्रकार का संकेत नहीं है। महर्षि दयानन्द ने वेद को सर्वोपरि रखा है। महर्षि दयानन्द समाज की अवनति का एक बड़ा कारण निराकार ईश्वर की उपासना के स्थापना पर प्रतिमा पूजन को मानते हैं। जब से विशुद्ध ईश्वर को छोड़ प्रतिमा पूजन चला है तभी से मानव समाज कहीं न कहीं अन्धविश्वास और पाखण्ड में फँसता चला गया। जिस मनुष्य समुदाय में पाखण्ड अन्धविश्वास होता है वह समुदाय धर्म भीरु और विवेक शून्य होता चला जाता है। सृष्टि विरुद्ध मान्यताएँ चल पड़ती हैं, स्वार्थी लोग ऐसा होने पर भोली जनता का शोषण करना आरा कर देते हैं।

महर्षि दयानन्द और अन्य मत समप्रदाय में एक बहुत बड़ा मौलिक भेद है। महर्षि व्यक्ति पूजा से बहुत दूर हैं और अन्य मत वालों का समप्रदाय टिका ही व्यक्ति पूजा पर है। महर्षि ईश्वर की प्रतिमा और मनुष्य आदि की प्रतिमा पूजन का विरोध करते हैं, किन्तु अन्य मत वाले इस काम से ही द्रव्य हरण करते हैं। इस व्यक्ति पूजा के कारण समाज में अनेक प्रकार के अनर्थ हो रहे हैं। इसी कारण बहुत से अयोग्य लोग गुरु बनकर अपनी पूजा करवा रहे हैं। जीते जी तो अपनी पूजा व अपने चित्र की भी पूजा करवाते ही हैं, मरने के बाद भी अपनी पूजा करवाने की बात करते हैं और भोली जनता ऐसा करती भी है। इससे अनेक प्रकार के अनर्थ प्रारमभ हो जाते हैं। महर्षि दयानन्द ने जो अपना चित्र न लगाने की बात कही है, वह इसी अनर्थ को देखते हुए कही है। महर्षि विचारते थे कि इन प्रतिमा पूजकों से प्रभावित हो मेरे चित्र की भी पूजा आरमभ न कर दें। इसी आशंका के कारण महर्षि ने अपने चित्र लगाने का निषेध किया था।

यदि हम आर्य महर्षि के सिद्धान्तों के अनुसार चल रहे हैं, प्रतिमा पूजन आदि नहीं कर रहे हैं तो महर्षि के चित्र आदि लगाए जा सकते हैं रखे जा सकते हैं। चित्र वा मूर्ति रखना अपने आप में कोई दोष नहीं है। दोष तो उनकी पूजा आदि करने में हैं। महर्षि मूर्ति के विरोधी नहीं थे, महर्षि का विरोध तो उसकी पूजा करने से था। यदि महर्षि केवल चित्र वा मूर्ति के विरोधी होते तो अपने जीवन काल में इनको तुड़वा चुके होते, किन्तु महर्षि के जीवन से ऐसा कहीं भी प्रकट नहीं होता कि कहीं महर्षि दयानन्द ने मूर्तियों को तुड़वाया हो। अपितु यह अवश्य वर्णन मिलता है कि जिस समय महर्षि फर्रुखाबाद में थे, उस समय फर्रुखाबाद बाजार की नाप हो रही थी। सड़क के बीच में एक छोटा-सा मन्दिर था, जिसमें लोग धूप दीप जलाया करते थे। बाबू मदनमोहन लाल वकील ने स्वामी जी से कहा कि मैजिस्ट्रेट आपके भक्त हैं, उनसे कहकर इस मठिया को सड़क पर से हटवा दीजिये। स्वामी जी बोले ‘‘मेरा काम लोगों के मनो से मूर्तिपूजा को निकालना है, ईंट पत्थर के मन्दिरों को तोड़ना-तुड़वाना मेरा लक्ष्य नहीं है।’’ यहाँ महर्षि का स्पष्ट मत है कि वे मूर्ति पूजा के विरोधी थे, न कि मूर्ति के।

आर्य समाज का सिद्धान्त निराकार, सर्वव्यापक, न्यायकारी आदि गुणों से युक्त परमेश्वर को मानना व उसकी उपासना करना तथा ईश्वर वा किसी मनुष्य की प्रतिमा पूजन न करना है। इस आधार पर महर्षि का स्टेचू भेंट लेना देना आर्य समाज के सिद्धान्त के विपरीत नहीं, सिद्धान्त विरुद्ध तब होगा जब उस स्टेचू की पूजा आरमभ हो जायेगी। आर्य समाज का सिद्धान्त चित्र की नहीं चरित्र की पूजा अर्थात् महापुरुषों के आदर्शों को देखना अपनाना है।

किसी भी महापुरुष के चित्र वा स्टेचू को देखकर हम उनके गुणों, आदर्शों, उनकी योग्यता विशेष का विचार करते हैं तो स्टेचू का लेना-देना कोई सिद्धान्त विरुद्ध नहीं है। जब हम उपहार में पशुओं वा अन्य किन्हीं का स्टेचू भेंट कर सकते हैं तो महर्षि का क्यों नहीं कर सकते?

घर में जिस प्रकार की वस्तुएँ या चित्र आदि होते हैं उनका वैसा प्रभाव घर में रहने वालों पर पड़ता है। जब फिल्मों में काम करने वाले अभिनेता अभिनेत्रियों के भोंडे कामुकतापूर्ण चित्र वा प्रतिमाएँ रख लेते हैं, लगा लेते हैं तो घर में रहने वाले बड़े वा बच्चों पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है आप स्वयं अनुमान लगाकर देख सकते हैं। इसके विपरीत महापुरुषों क्रान्तिकारियों के चित्र घर में होते हैं तो घर वालों पर और बाहर से आने वालों पर कैसा प्रभाव पड़ता होगा। घर में रहने वालों की विचारधारा को घर में लगे हुए चित्र व वस्तुएँ बता देती हैं। अस्तु।

महर्षि ने अपनी प्रतिमा बनाने का विरोध किया था, वह क्यों किया इसका कारण ऊपर आ चुका है। स्टेचू, चित्र आदि का भेंट में लेना-देना आर्य समाज के सिद्धान्त के विरुद्ध नहीं है। यह लिया-दिया जा सकता है, कदाचित् इसकी पूजा वा अन्य दुरुपयोग न किया जाय तो। इसमें इसका भी ध्यान रखें कि पुराण प्रतिपादित कल्पित देवता जो कि चार-आठ हाथ व चार-ेपाँच मुँह वाले वा अन्य किसी जानवर के  रूप में हों उनसे लेने देने से बचें।

– ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर

 

पुस्तक परिचय पुस्तक का नाम- आनन्द रस धारा

पुस्तक परिचय

पुस्तक का नामआनन्द रस धारा

लेखक प्रा. राजेन्द्र ‘जिज्ञासु’

प्रकाशक विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द, नई सड़क, दिल्ली।

पृष्ठ 144         मूल्य- 90/- रु. मात्र

महर्षि दयानन्द के विचारों से देशी विदेशी बहुत से प्रबुद्ध जन प्रभावित होकर आर्यसमाज से जुड़े। जुड़कर मानव जाति के लिए कार्य किया। महर्षि के जीवन काल व उनके परलोक गमन के बाद भी ऐसे अनेकों महान् पुण्यात्मा जन ऋषि मिशन से जुड़े कि उन पुण्यात्माओं ने वेद व देश राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने में अपने को धन्य समझा। धर्मध्वजी श्रीयुत् पण्डित लेखराम, महात्मा मुन्शीराम (स्वामी श्रद्धानन्द), पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, पं चमुपति जी, लाला लाजपत राय, भाई परमानन्द आदि ऐसे अनोखे रत्न महर्षि के विचारों से आर्य समाज को मिले जिन्होंने विश्वभर में आर्य समाज का नाम प्रकाशित किया।

आर्य समाज ने विद्वान् अध्यापक, योग्य लेखक, समपादक, प्रबुद्ध प्रचारक, वक्ता, पुरोहित, सामाजिक कार्यकर्त्ता इस देश को दिये हैं, केवल इन्हीं लोगों को ही नहीं अपितु योग्य साधु संन्यासी भी आर्य समाज ने दिये हैं। स्वामी श्रद्धानन्द, स्वामी दर्शनानन्द, स्वामी स्वतन्त्रानन्द, महात्मा नारायण स्वामी, महात्मा आनन्द स्वामी जैसे योग्य संन्यासी हुए जिन्होंने अपनी वाणी व पुरुषार्थ से आर्यों में नई उमंग भरी।

इन सभी महापुरुषों की जीवनियाँ-लेखन के धनी, आर्यसमाज के ऊपर प्रहार कर्त्ताओं के लिए सदा जिनकी लेखनी उत्तर देने हेतु  उद्यत रहती है, आर्यसमाज के इतिहास की सर्वाधिक जानकारी रखने वाले, विश्व के सर्वाधिक जीवन चरित लिखने वाले मान्यवर प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी हैं। इन जीवनियों में महात्मा आनन्द स्वामी की जीवनी नहीं लिखी गई थी, अब वह काम भी मान्य जिज्ञासु जी ने ‘‘आनन्द रसधारा’’ पुस्तक लिखकर पूरा कर दिया है।

इस पुस्तक का प्रकाशन सबसे अधिक आर्य साहित्य देने वाले, लगभग नबे (90)वर्षों से आर्य साहित्य का प्रकाशन कर समाज को दिशा देने वाले प्रकाशक ‘‘विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द’’ ने किया है। पुस्तक के प्रकाशक मान्य अजयकुमार जी ने प्रकाशकीय बड़े भाव से लिखा है। इस जीवन चरित के विषय में अपने भाव व्यक्त करते हुए लिखा-‘‘देर से आर्य जनता आपके एक सुन्दर प्रेरक जीवन चरित की माँग करती चली आ रही थी। हर्ष का विषय है कि विश्व में सर्वाधिक जीवनियाँ लिखने का कीर्तिमान् बना चुके हमारे लेखक श्री राजेन्द्र जिज्ञासु ने इस चुभते अभाव की कमी पूरी करते हुए ‘आनन्द रसधारा’ नाम से उनका एक पठनीय जीवन चरित आपके हाथों में पहुँचा दिया है। यह पुस्तक आपने एक अलग शैली में लिखी है।’’

महात्मा आनन्द स्वामी जी के जीवन चरित को लिखने का विचार लेखकके मन में स्वामी जी के जीवन काल से ही था, किन्तु यह कार्य लेखक के जीवन की साँझ में हुआ। इस विषय में लेखक अपने प्राक्कथन में लिखते हैं-‘‘जीवन की साँझ का विचार करके मैं कई महीनों से महात्मा जी पर एक पठनीय पुस्तक लिखने का निर्णय ले चुका था…….।’’ महात्मा जी की विशेषता को बताते हुए लेखक लिखते हैं-‘‘महात्मा आनन्द स्वामी वेदभक्त, ऋषिभक्त, प्रभूभक्त, देशभक्त, जातिभक्त और लोकसेवक पहले थे और नेता बाद में थे। नेता कोई भी हो उसके जीवन के साथ छोटा-मोटा कोई न कोई विवाद जुड़ जाता है। ‘आनन्द रस धारा’ में विवादों से बचकर ऐसी सामग्री दी है जिससे अपने पराये सबको ऊर्जा प्राप्त होगी। पाठकों में नवजीवन का संचार होगा। मनु महाराज ने धर्म के दश लक्षण बताए हैं। ऋषि दयानन्द की धर्म की परिभाषा पढ़िये। योगदर्शन में वर्णित यम-नियमों व आठ अंगों पर विचार करके-इन्हें सामने रखकर ‘आनन्द रस धारा’ को कसौटी पर कसिये फिर आपको पूरा लाभ मिलेगा।’’

इस पुस्तक को लेखक ने आठ भागों में विभक्त किया है। पहला भाग-बाल्यकाल से यौवन की चौखट तक जीवन झाँकी। दूसरा भाग-अष्टांग योग की कसौटी पर। तीसरा भाग-जीवन के कुछ विशेष प्रसंग। चौथा भाग-हैदराबाद सत्याग्रह के नर नायक। पाँचवाँ भाग-संन्यास दीक्षा। छठा भाग-हैदराबाद में एक बड़ा ऑपरेशन। सातवाँ भाग-एक निराधार कथन-मिथ्या सोच। आठवाँ भाग-महाप्रयाण-वे चलते-चलते चल बसे।

आठ भागों में विभक्त यह पुस्तक अपने अन्दर महात्मा जी के जीवन के अनेक प्रसंगों को संजोये है। पाठक इस आनन्द रस धारा को पढ़कर अवश्य ही आनन्द में सराबोर होंगे। सुन्दर आवरण से सुसज्जित, उत्तम कागज व छपाई से युक्त यह पुस्तक पाठकों को बहुत प्रेरणा देने वाली सिद्ध होगी। ऐसी आशा है।                      – आचार्य सोमदेव

 

कृपया दैनिक यज्ञ के मन्त्र अलग से और साप्ताहिक यज्ञ के मन्त्र अलग से परोपकारी में सुधी पाठकों के लिए बताने का कष्ट करें। पूरा मन्त्र लिखकर कृतार्थ करें क्योंकि विभिन्न प्रदेशों में, विभिन्न आर्यसमाजों में विभिन्न विद्वानों के द्वारा बताया गया, लिखाया गया, छपवाया गया यज्ञ पद्धति प्रचलन में है।

(ग) कृपया दैनिक यज्ञ के मन्त्र अलग से और साप्ताहिक यज्ञ के मन्त्र अलग से परोपकारी में सुधी पाठकों के लिए बताने का कष्ट करें। पूरा मन्त्र लिखकर कृतार्थ करें क्योंकि विभिन्न प्रदेशों में, विभिन्न आर्यसमाजों में विभिन्न विद्वानों के द्वारा बताया गया, लिखाया गया, छपवाया गया यज्ञ पद्धति प्रचलन में है।

ऋषि दयानन्द जी की यज्ञ पद्धति कौन-सी है यह समझने में सामान्य जनों को कठिनाई होती है। गायत्री मन्त्र कब बोलना चाहिए? गुड़, स्वीट आदि इस्तमाल नहीं करना चाहिये लेकिन स्विष्टकृत आहुति में प्रयोग कर रहे हैं, और पूर्णाहुति से पूर्व विभिन्न मन्त्र पूर्णमदं…आदि और पूर्णाहुति के बाद वसो पवित्र मसि का प्रयोग कर रहे हैं। पौर्णमासी और अमावास्या की तीन-तीन आहुतियों के अलावा विभिन्न मन्त्रों को प्रयोग में ला रहे हैं। कृपया आप से विनम्र निवेदन है कि दैनिक यज्ञ पद्धति अलग से साप्ताहिक यज्ञ पद्धति अलग से पूरे मन्त्र लिख कर बताने का कष्ट करें।

धन्यवाद

– रणवीर आर्य, हैदराबाद, तेलंगाना।

समाधान 

(ग)अग्निहोत्र रूप यज्ञ कर्मकाण्ड के अन्तर्गत आता है, इसका विशुद्ध रूप महर्षि दयानन्द ने संस्कार विधि पुस्तक में दिया है। वहाँ दैनिक यज्ञ को किस प्रकार करना है वह और संस्कारों में किस विधि से यज्ञ करना है वह भी ठीक से समझाया है। वहाँ आप देख लेवें। यहाँ हम इनके मन्त्र नहीं दे सकते। कारण कि अभी विद्वान् इस यज्ञ कार्य की एकरूपता के लिए एक मत नहीं हैं। पिछले वर्षों में परोपकारिणी सभा की ओर से यज्ञ में एकरूपता हो इसके लिए यज्ञ गोष्ठियों का आयोजन हुआ था उसमें अनेक विद्वानों ने भाग लिया था। गोष्ठी में रखे गये बिन्दुओं पर चर्चा होकर निष्कर्ष भी निकला था किन्तु अनेक बिन्दु ऐसे रहे जिन पर विद्वान् एक मत नहीं हुए। परमेश्वर की कृपा से पुनः ऐसी विद्वानों की गोष्ठी होवे जिसमें सब विद्वान् एक मत हो जायें और आर्य जगत् में यज्ञ एकरूपता से होने लग जाये।

आज वर्तमान् में विभिन्न विद्वान् इस यज्ञ कर्म को विभिन्न प्रकार से करवाते हैं। जिससे सामान्य जन में भ्रम फैलता है कि  कौनसा विद्वान् ठीक पद्धति से यज्ञ करवा रहा है कौनसा अपनी मनमर्जी से। यदि ऋषि दयानन्द के अनुसार जैसा ऋषि ने लिखा है उस प्रकार भी यज्ञ कर्म करने लग जायें तो एक रूपता यज्ञ में दिखने लगेगी।

हमने पहले भी  जिज्ञासा समाधान में लिखा था कि यज्ञ में कुछ विशेष कर्मों का विधान किया है जिसमें जहाँ जैसा निर्देश होना चाहिए वहाँ वैसा निर्देश महर्षि ने किया हुआ है। महर्षि गायत्री मन्त्र की आहुति के विषय में कहते हैं कि जिसको अधिक होम करना हो तो गायत्री मन्त्र और विश्वानि देव….मन्त्र की आहुतियाँ देवें। ये आहुतियाँ हमारा सामान्य दैनिक यज्ञ पूरा होने पर देने के लिए कहा है। आज जब हवन पूरा हो चुका होता है तब आहुतियाँ तो देते हैं किन्तु ऋषि के अनुसार इन दो मन्त्रों से नहीं अन्य-अन्य मन्त्र बोलकर आहुति दी जाती हैं, यह मन मर्जी ही है। जब ऋषि ने विधान कर दिया है तो वैसा ही करना चाहिए। इसका परिणाम यह होता जा रहा है कि यज्ञ कर्म को भी व्यवसाय बनाया जा रहा है। जिससे यजमान् प्रसन्न हो और दक्षिणा अधिक मिले ऐसा उपाय अधिक होने लग गया।

स्विष्टकृत आहुति के लिए भी महर्षि ने निर्देश कर रखा है कि ‘‘यह घृत की अथवा भात की देनी चाहिए।’’ इसमें भी आहुति देते समय कोई लड्डु, बर्फी, बतासे, मखाने आदि कोई भी मीठा मिल जाये उसकी आहुति देते हैं जबकि महर्षि का स्पष्ट निर्देश भात अथवा घी का है।

पूर्ण आहुति से पहले पूर्णमदंः…..आदि मन्त्र का बोलना और इससे आहुति देना पौराणिकों की भाँति यज्ञ में पाखण्ड को जोड़ना ही है और ऐसे ही पूर्णाहुति के बाद वसो पवित्रमसि….मन्त्र का पाठ करना आदि क्योंकि इसका विधान कर्मकाण्ड में नहीं है यदि ऐसे ही करते चले गये तो जो ऋषि ने यज्ञ की जो विशुद्ध पद्धति लिखी है वह गौण हो जायेगी और ये दक्षिणार्थियों की पद्धति मुखय हो जायेगी।

पौर्णमासी व अमावस्या के दिन इनकी तीन-तीन आहुति देकर चार-चार व्याहृति आज्याहुति का विधान ऋषि ने किया है अन्य मन्त्रों का नहीं। यदि कोई अन्य मन्त्रों से भी आहुति देता है तो वह ऋषि की अवहेलना ही कर रहा है।

यज्ञ विषय में हमारा उद्देश्य रहे कि ऋषि की पद्धति के अनुसार एक रूपता हो और समूचा आर्य जगत् उस एक पद्धति से ही यज्ञ करे। यहाँ हम सब मन्त्र नहीं दे सकते इसके लिए आप संस्कार विधि का अवलोकन करें। अलमिति।

– सोमदेव आचार्य

 

ऋषि दयानन्द जी और कुछ वर्ष जीते तो संसार का कितना उपकार होता सविवरण बताने का कष्ट करें।

(ख) ऋषि दयानन्द जी और कुछ वर्ष जीते तो संसार का कितना उपकार होता सविवरण बताने का कष्ट करें।

समाधान-

(ख)किसी भी लोकोपकारक महापुरुष का शरीर जितना अधिक जीवित रहता है वह महापुरुष उतना ही अधिक जगत् का कल्याण करता है। महर्षि दयानन्द जी भी अधिक जीवित रहते तो संसार का अत्यधिक उपकार होता ही; आर्यावर्त का सबसे अधिक उपकार होता यदि ऋषिवर का शरीर बना रहता तो आर्यावर्त को अंग्रेज बहुत शीघ्र छोड़कर चला गया होता। भारत को स्वतन्त्रता कहीं पहले मिल गई होती। देश भक्त, बलिदानियों का अत्यधिक समान होता। जो आज अपने देश में अपूज्यों का समान हो रहा है देश को मुस्लिम प्रधान बनाने वाले महात्मा और इस देश को गर्त की ओर ले जाने वाले एक लपट और उसके भारत विरोधी परिवार का समान न होता। महर्षि दयानन्द सदा ही देश हितैषियों धार्मिकों का समान करते थे, वे होते तो आज भी ऐसा ही होता।

ऋषि दयानन्द और अधिक जीवित रहते तो यह देश पुनः विश्वगुरु बन गया होता। विश्वभर में वेद की मान्यता होती। हमने जो पिछले अंक सिपतमबर प्रथम में लिखा था कि ऋषि क्या-क्या करना चाहते थे, उन कार्यों में से बहुत से कार्य हो रहे होते। और अधिक कार्य क्या-क्या हो सकते थे इसका तो हम अनुमान ही लगा सकते हैं, यथार्थ में तो ऋषि होते और उनके द्वारा जो कार्य किये जाते उससे उनके उपकार का पता लगता। अस्तु।

एक और ऋषि को आने में और कितना समय लगेगा? भारत में दुनिया में ऋषि मुनि उत्पन्न होने के लिए हमें क्या-क्या कार्य करने चाहिए

आचार्य सोमदेव

जिज्ञासा- (क) एक और ऋषि को आने में और कितना समय लगेगा? भारत में दुनिया में ऋषि मुनि उत्पन्न होने के लिए हमें क्या-क्या कार्य करने चाहिए

समाधान-(क)किसी महापुरुष, ऋषि को संसार में आने में कितना समय लगेगा इस विषय में तो कुछ नहीं कह सकते यह तो परमेश्वर ही जानता है, उसी की यह व्यवस्था है। ऋषि होना और साधक योगी होना या बनना दोनों में कुछ भेद है। साधक एक सामान्य (सामान्य का अर्थ यहाँ धार्मिक विशेष से ले न कि जो कोई) व्यक्ति भी बन सकता है, किन्तु ऋषि तो धार्मिक साधक होते हुए अत्यन्त बुद्धिमान् ही बन सकता है, अल्प बुद्धि वाला नहीं। एक साधक और ऋषि के सामर्थ्य में भी अन्तर होता है। साधक उस स्तर पर काम नहीं कर सकता जिस स्तर पर ऋषि कर सकता है। साधक धार्मिक ईश्वरोपासक होता है, वैराग्य को प्राप्त होता है और ऋषि साधक धार्मिक, ईश्वरोपासक, वैराग्यवान् होते हुए वेद मन्त्रार्थ द्रष्टा होता है। ऋषि अनेक जन्मों, वर्षों के पुण्य वाले सत्व की पराकाष्ठा से युक्त आत्मा बनते हैं।

आज भी यदि कोई बुद्धिमान् व्यक्ति वेदानुकूल जीवन जीता हुआ ऋषि बनने का प्रयत्न करे तो वह इसी जन्म व अगले जन्मों में ऋषि बन सकता है। ऋषि बनने के लिए अपने पूरे जीवन को ईश्वर में समर्पित रखते हुए वैदिक वाङ्मय व वेद को जानने में लगाये। बुद्धिमान् लोग वैराग्यवान् हो वेद पढ़ने में प्रवृत्त हों, इसके लिए समाज व राजा ऐसी व्यवस्था करे। समाज व राजा वेद पढ़ने पढ़ाने वाले हों। वेदादि पढ़ने वाले को ही राज की सेवा में प्राथमिकता मिले। वेद का पढ़ा हुआ ही न्यायाधीश, उच्च अधिकारी, मन्त्री, प्रधानमन्त्री, राष्ट्रपति बने। ऐसा करने से वेद के गभीर रहस्य को जानते जायेंगे वैसे-वैसे ऋषित्व की ओर भी जाते जायेंगे। ऋषि बनना असमभव तो नहीं, परन्तु अत्यन्त कठिन अवश्य है।