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ब्रह्मा : इब्राहीम : कुरान : बाइबिल: – पं. शान्तिप्रकाश

विधर्मियों की ओर से आर्य हिन्दू जाति को भ्रमित करने के लिये नया-नया साहित्य छप रहा है। पुस्तक मेला दिल्ली में भी एक पुस्तिका के प्रचार की सभा को सूचना मिली है। सभा से उत्तर देने की माँग हो रही है। ‘ज्ञान घोटाला’ पुस्तक के साथ ही श्रद्धेय पं. शान्तिप्रकाश जी का यह विचारोत्तेजक लेख भी प्रकाशित कर दिया जायेगा। पाठक प्रतिक्षा करें। पण्डित जी के इस लेख को प्रकाशित करते हुए सभा गौरवान्वित हो रही है। – राजेन्द्र ‘जिज्ञासु’

हमारे शास्त्र ब्रह्मा को संसार का प्रथम गुरु मानते हैं। जैसा कि उपनिषदों में लिखा है कि

यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै।

परमात्मा ब्रह्मा को पूर्ण बनाता और उसके लिये (चार ऋषियों द्वारा) वेदों का ज्ञान देता है। अन्यत्र शतपथादि में भी अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा पर ऋग्यजु: साम और अथर्व का आना लिखा है। सायण ने अपने ‘ऋग्वेदोपोद्घात’ में इन चार ऋषियों पर उन्हीं चार वेदों का आना स्वीकार किया है। वेदों में वेदों को किसी एक व्यक्ति पर प्रकट होना स्वीकार नहीं किया। देखिये-

यज्ञेन वाच: पदवीयमायन्तामन्वविन्दनृषिषु प्रविष्टाम्।

– ऋ. मण्डल १०

इस मन्त्र में ‘वाच:’ वेदवाणियों के लिये बहुवचन है तथा ‘ऋषिषु प्रविष्टाम्’ ऋषियों के लिये भी बहुवचन आया है।

चार वेद और चार ऋषि- ‘चत्वारि वाक् परिमिता पदानि’ चार वेद वाणियाँ हंै, जिनके अक्षर पदादि नपे-तुले हैं। अत: उनमें परिवर्तन हो सकना असम्भव है, क्योंकि यह ईश्वर की रचना है।

देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति।

– अथर्व. १०

परमेश्वर देव के काव्य को देख, जो न मरता है और पुराना होता है। सनातन ईश्वर का ज्ञान भी सनातन है। शाश्वत है।

अपूर्वेणेषिता वाचस्ता वदन्ति यथायथम्।

– अथर्व. १०-७-१४

संसार में प्रथम उत्पन्न हुए ऋषि लोग ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद तथा पृथ्वी के वैज्ञानिक रहस्यों को प्रकट करने में समर्थ अथर्ववेद का प्रकाश ईश प्रेरणा से करते हैं।

प्रेणा तदेषां निहितं गुहावि:।। – ऋ. १०-७१-१

इन ऋषियों की आत्म बुद्धि रूपी गुहा में निहित वेद-ज्ञान-राशि ईश प्रेरणा से प्रकट होती है। इस प्रसिद्ध मन्त्र में भी ऋषियों के लिए ‘एषां’ का प्रयोग बहुवचनान्त है।

अत: उपनिषद् के प्रथम प्रमाण का अभिप्राय यह हुआ कि ब्रह्मा के लिये वेदों का ज्ञान ऋषियों द्वारा प्राप्त हुआ, वह स्पष्ट है।

अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा ने चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान जिन ऋषियों को दिया, उसमें ब्रह्मा ने सबसे प्रथम मनुष्यों में वेद-धर्म का प्रचार किया और धर्म की व्यवस्था तथा यज्ञों का प्रचलन किया। अत: ब्रह्माजी संसार के सबसे पहले संस्थापक गुरु माने जाने लगे। क्योंकि वेद में ही लिखा है कि-

ब्रह्मा देवानां पदवी:। – ऋग्वेद ९-९६-६

-ब्रह्मा विद्वानों की पदवी है। बड़े-बड़े यज्ञों में चार विद्वान् मन्त्र-प्रसारण का कार्य करते हैं। उनमें होता, उद्गाता, अध्वर्यु और ब्रह्मा अपने-अपने वेदों का पाठ करते हुए ब्रह्मा की व्यवस्था में ही कार्य करते हैं, यह प्राचीन आर्य मर्यादा इस मन्त्र के आधार पर है-

ऋचां त्व: पोषमास्ते पुपुष्वान्

गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु।

ब्रह्मा त्वो वदति जातिवद्यां

यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उत्व:। – ऋग्. १०-७१-११

ऋग्वेद की ऋचाओं की पुष्टि होता, सामकी, शक्तिदात्री ऋचाओं की स्तुति उद्गाता, यजु मन्त्रों द्वारा यज्ञमात्रा का अवधारण अध्वर्यु द्वारा होता है और यज्ञ की सारी व्यवस्था तथा यज्ञ कराने वाले होतादि पर नियन्त्रण ब्रह्मा करता है।

मनु-धर्मशास्त्र में तो स्पष्ट वर्णन है-

अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम्।

दुदोह यज्ञ सिद्धयर्थमृग्यजु: सामलक्षणम्।

-मनु. १/२३

-ब्रह्माजी ने अग्नि, वायु, आदित्य ऋषियों से यज्ञ सिद्धि के लिये ऋग्यजु:साम का दोहन किया।

मनु के इस प्रमाण में अथर्ववेद का उल्लेख इसलिये नहीं किया गया कि यज्ञ सिद्धि में अथर्ववेद तो ब्रह्मा जी का अपना वेद है।

वेदत्रयी क्यों- जहाँ-जहाँ यज्ञ का वर्णन होगा, वहाँ-वहाँ तीन वेदों का वर्णन होगा तथा चारों वेदों का विभाजन छन्दों की दृष्टि से भी ऋग्यजुसाम के नाम से पद्यात्मक, गद्यात्मक और गीतात्मक किया गया है। अत: ज्ञानकर्मोपासना-विज्ञान की दृष्टि से वेद चार और छन्दों की दृष्टि से वेद-त्रयी का दो प्रकार का विभाजन है। कुछ भी हो वेद, शास्त्र, उपनिषद् तथा इतिहास के ग्रन्थों में ब्रह्मा को प्रथम वेद-प्रचारक, संसार का अगुवा या पेशवा के नाम से प्रख्यात माना गया है।

यहूदी, ईसाई और मुसलमान संस्कार-वशात् मानते चले आए हैं, जैसा कि उनकी पुस्तकों से प्रकट है।

कुर्बानी का अर्थ- ब्रह्मा यज्ञ का नेता अगुआ या पेशवा है। यज्ञ सबका महोपकारक होने से देवपूजा, संगतिकरण दानार्थक प्रसिद्ध है। इसी को सबसे बड़ा त्याग और कुर्बानी माना गया है। किन्तु वाममार्ग प्रचलित होने पर महाभारत युद्ध के पश्चात् पशु-यज्ञों का प्रचलन भी अधिक-से-अधिक होता चला गया। इससे पूर्व न कोई मांस खाता और न यज्ञों के नाम से कुर्बानी होती थी।

बाईबल के अनुसार भी हजरत नूह से पूर्व मांस खाने का प्रचलन नहीं था, जैसा कि वाचटावर बाईबल एण्ड टे्रक्स सोसायटी ऑफ न्यूयार्क की पुस्तक ‘दी ट्रुथ वेट सीड्स ईटनैल लाईक’ में लिखा है।

यहूदियों और ईसाईयों के अनुसार मांस की कुर्बानी खूदा के नाम से नूह के तूफान के साथ शुरु हुई है। तब इसको हजरत इब्राहीम के नाम से शुरू किया गया कि इब्राहीम ने खुदा के लिये अपने लडक़े की कुर्बानी की, किन्तु खुदा ने लडक़े के स्थान पर स्वर्ग से दुम्बा भेजा, जिसकी कुर्बानी दी गई। स्वर्ग से दुम्बा लाने की बात कमसुलम्बिया में लिखी है।

यहूदी कहते हैं कि हजरत इब्राहीम ने इसहाक की कुर्बानी की थी, जो मुसलमानों के विचार से हजरत इब्राहीम की पत्नी एरा से उत्पन्न हुआ था। किन्तु मुसलमानों का विश्वास है कि हजरत इब्राहीम की दासी हाजरा से उत्पन्न हुए हजरत इस्माईल की कुर्बानी दी गयी थी, जिसके बदले में जिब्राइल ने बहिश्त से दुम्बा लाकर कुर्बानी की रस्म पूरी कराई।

इसलिये मुसलमान भी हजरत इब्राहीम की स्मृति में पशुओं की कुर्बानी देना अपना धार्मिक कत्र्तव्य समझते हैं। परन्तु भूमि के पशुओं की कुर्बानी की आवश्यकता खुदा को होती तो बहिश्त से दुम्बा भेजने की आवश्यकता न पड़ती। दुम्बा तो यहीं धरती पर मिल जाता।

बाईबल के अनुसार तो पशुबलि की प्रथा हजरत इब्राहीम के बहुत पहले नूह के युग में आरम्भ हुई है। जैसा कि पीछे ‘वाच एण्ट टावर’ का प्रमाण दिया जा चुका है। किन्तु वास्तव में ब्रह्मा मनु से पूर्व हुए हैं। मनु को ही नूह माना जाता है।

ब्रह्मा ही इब्राहीम- हाफिज अताउल्ला साहब बरेलवी अनुसार हजरत इब्राहीम तो ब्रह्मा जी का ही नाम है, क्योंकि वेदों में ब्रह्मा और सरस्वती, बाईबिल में इब्राहम हैं और सर: तथा इस्लाम में इब्राहीम सर: यह वैयक्तिक नाम हैं, जो समय पाकर रूपान्तरित हो गये। सर: सरस्वती का संक्षेप है। आर्य-जाति में वती बोलना, न बोलना अपनी इच्छा पर निर्भर है जैसा कि पद्मावती की पद्मा और सरस्वती को सर: (य सरस) बोला जाता है, जो शुद्ध में संस्कृत का शब्द है। सरस्वती शब्द वेदों में कई बार आया है। जैसे-

चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनां।

यज्ञं दधे सरस्वती। – ऋ. १-३-११

सत्य-वक्ता, धर्मात्मा-द्विज, ज्ञानयुक्त लोगों को धर्म की प्रेरणा करती हुई, परोक्ष पर विश्वास रखने वाले सुमतिमान् लोगों को शुभ मार्ग बताती हुई, सरस्वती-वेद वाणी यज्ञो (पंच महायज्ञादि) प्रस्थापना करती है।

अत: स्पष्ट है कि सरस्वती वेद-वाणी को कहते हैं और ब्रह्मा चार वेद का वक्ता होने से ही पौराणिकों में चतुर्मुख प्रसिद्ध हो गया है।

चत्वारो वेदा मुखे यस्येति चतुर्मुख:।

लुप्त बहुब्रीहि समास का यह एक अच्छा उदाहरण है। चारों वेद जिसके मुख में अर्थात् कण्ठस्थ हंै। चारों वेदों में निपुण विद्वान् का नाम ही ब्रह्मा है। ब्रह्मा विद्वानों की एक उच्च पदवी है जो सृष्टि के आरम्भ से अब तक चली आ रही है और जब तक संसार है, यह पदवी मानी जाती रहेगी। अनेकानेक ब्रह्मा संसार में हुए हैं और होंगे।

अब भी यज्ञ का प्रबन्धक ब्रह्मा कहलाता है। ब्रह्मा का वेदपाठ और यज्ञ के साथ विशेष सम्बन्ध है। वेदवाणी को सरस्वती कहा गया है।

यहूदी, ईसाई और मुसलिम मतों में सरस्वती का सर: और ब्रह्मा का इब्राम बन इब्राहीम हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है।

काबा-यज्ञस्थली- ब्रह्मा यज्ञ का आदि प्रवर्तक है। वेद, कुरान और बाईबल इसमें एक मत है। यज्ञशाला चौकोर बनाई जाती है। इसीलिये मक्का में काबा भी चौकोर है, जो इब्राहीम ने बनवाया था। यह यज्ञीय स्थान है। यज्ञ में एक वस्त्र जो सिला न हो, पहनने की प्राचीन प्रथा है। मुसलमानों ने मक्का के हज्ज में इस प्रथा को स्थिर रखा हुआ है। यज्ञ को वेद में अध्वर कहा गया है।

ध्वरति हिंसाकर्म तत्प्रतिषेध:।

अध्वर का अर्थ है, जिसमें हिंसा न की जाय। इसलिये मुसलमान हाजी हज्ज के लिये एहराम बांध लेने के पश्चात् हिंसा करना महापाप मानते हैं।

वैदिक धर्मियों में वाममार्ग युग में हिंसा का प्रचलन हुआ। वाममार्ग के पश्चात् ही वैदिक-धर्म का ह्रास होकर बौद्ध, जैन, यहूदी, ईसाई, इस्लाम आदि मतों का प्रचलन हुआ है। यज्ञों में पशु हत्या और कुर्बानी में पशु बलि की प्रथा भी वाममार्ग=उल्टा मार्ग- ही माना गया है, जो वास्तव में सच्चे यज्ञों अथवा सच्ची कुर्बानी का मार्ग नहीं है।

नमस्=नमाज- आर्यों के पाँच यज्ञों में नमस्कार का प्रयोग हुआ, नमाज नमस् का रूपान्तर है। पाँच नमाज तथा पाँच इस्लाम के अकान पंचयज्ञों के स्थानापन्न हंै:-

कुरान में पंचयज्ञ- १. ब्रह्म यज्ञ- दो समय सन्ध्या- नमाज तथा रोजा कुरान के हाशिया पर लिखा है कि पहिले दो समय नमाज का प्रचलन था। देखो फुर्कान आयत ५

२. देव यज्ञ- हज्ज तथा जकात या दान पुण्य।

३. बलिवैश्वदेवयज्ञ- कुर्बानी पशुओं की नहीं, किन्तु पशु-पक्षी, दरिद्रादि को बलि अर्थात् भेंट देना ही सच्ची कुर्बानी है। धर्म के लिये जीवन दान महाबलिदान है।

४-५. पितृ यज्ञ तथा अतिथि यज्ञ- इस प्रकार आर्यों के पंच यज्ञ और इस्लाम के पाँच अरकानों का कुछ तो मेल है ही। इस्लाम के पाँच अरकार नमाज, जकात, रोजा, हज्ज और कुर्बानी हैं।

कुर्बानी शब्द कुर्व से निकला, जिसके अर्थ समीप होना अर्थात् ईश्वरीय गुणों को धारण कर ईश्वर का सान्निध्य प्राप्त करना है, इन अर्थों में पशु हत्या तो हिन्दुओं के पशुयज्ञ की भाँति विकृति का परिणाम मात्र है। वेदों में यज्ञ को अध्वर कहा है, जिसका अर्थ है- हिंसारहित शुभकर्म इसी प्रकार कुर्बानी शब्द में भी हिंसा की भावना विद्यमान नहीं।

ब्रह्मा ने वेदों के आधार पर यज्ञों का प्रचलन किया तथा यज्ञों में सबसे बड़े विद्वान् को आर्यों में ब्रह्मा की पदवी से विभूषित किया जाता है। अत: ब्रह्मा शब्द रूढि़वादी नहीं। अनेक ब्रह्मा हुए हैं और होंगे भी। किसी समय फिलस्तीन में ब्रह्मा को इब्राम और अरब देशों में इब्राम का इब्राहीम शब्द रूढ़ हो गया।

वैदिक-ज्ञान को वेद में सरस्वती कहा है, लोक में पद्मावती को केवल पद्मा सरस्वती को केवल सर: कहने की प्रथा का उल्लेख कर चुके हैं। अत: पुराणों में ब्रह्मा और सरस्वती तथा सर: एवं इस्लाम में भी इब्राहीम और सर: शब्दों का प्रचलन होने से सिद्ध होता है कि दोनों शब्द वेदों के अपभ्रंश मात्र होकर इन मतों में विद्यमान हैं।

कुरान शरीफ में लिखा है कि हजरत साहिब फरमाते हैं-

१. लोग कहते हैं कि यहूदी या ईसाई हो जाओ, किन्तु में तो इब्राहीम के धर्म को मानता हूँ, जो एक तरफ का था और मूर्ति-पूजक न था। परमात्मा का सच्चा उपासक था। -सूरा: वकर आयत १३५

२. ईश्वर ने ब्रह्माहीम संसार का इमाम= [धर्म का नेता] बनाया। सूरा बर, आयत १२४

३. ऐ लोगो! इब्राहीम के सम्बन्ध में क्यों झगड़ते हो और इब्राहीम पर तौरेत व इन्जील नहीं उतरी, किन्तु यह तौरेत व इन्जील तो उनके बहुत पीछे की हैं। पर तुम समझदारी क्यों नहीं करते।

इबराहीम न यहूदी था, न ईसाई, किन्तु एक ओर का मुस्लिम था वा मुशरिक मूर्ति-पूजक न था अनेक-ईश्वरवादी भी न था- अल इमरान, आयत ६४.६६

उस इब्राहीम के धर्म को मानो जो एक निराकार का उपासक था और मूर्ति-पूजक न था। -अल, इमरान, आयत ९४

कुरान शरीफ में हिजरत इब्राहीम के यज्ञ मण्डप का नाम काबा शरीफ रखा है। काबा चौकाने यज्ञशाला की भाँति होने से भी प्रमाणित है कि किसी युग में यह अरब के लोगों का यज्ञीय स्थान था, जहाँ हिंसा करना निषिद्ध था, जिसकी परिक्रमा भी होती थी और उपासना करने वालों के लिये उसे हर समय पवित्र रखा जाता था। इसकी आधारशिला इब्राहीम और इस्माईल ने रखी थी। देखो- सूरा बकर, आयत १२५ से १२७

कुरान शरीफ में स्पष्ट लिखा है कि कुर्बानी आग से होती थी। अल इमरान आयत १, २, खूदा की सुन्नत कभी तबदील नहीं होती। सूरा फतह, आयत २४

मूसा को पैगम्बरी आग से मिली। जहाँ जूती पहन के नहीं जाया जाता। सूरा त्वाह, आयत ११-१३

खुदा को कुर्बानी में पशु मांस और रक्त स्वीकार्य नहीं। खुदा तो मनुष्यों से तकवा अर्थात् पशु-जगत् पर दया-परहेजगारी-शुभाचार-सदाचार स्व्ीकारता है। सूरा हज्ज, आयत १७

‘‘हज्ज और अमरा आवश्यक कर लेना एहराम हैं। एहराम यह कि नीयत करे आरम्भ करने की और वाणी से कहे लव्वैक। पुन: जब एहराम में प्रविष्ट हुआ तो स्त्री-पुरुष समागम से पृथक् रहें। पापों और पारस्परिक झगड़ों से पृथक् रहें। बाल उतरवाने, नाखून कटवाने, सुगन्ध लेप तथा शिकार करने से पृथक् रहें। पुरुष शरीर पर सिले वस्त्र न पहिने, सिर न ढके। स्त्री वस्त्र पहिने, सिर ढके, किन्तु मुख पर वस्त्र न डाले। -मौजुहुल्कुरान, सूरा बकर, आयत १९७’’

इस समस्त प्रमाण भाग का ही यही एक अभिप्राय है कि हज्ज में हिंसा की गुंजाइश नहीं। कुर्बानी – कुर्वे खुदा अर्थात् ईश्वरीय सन्निध्य प्राप्ति का नाम हुआ। अत: कुरान-शरीफ में पशुओं की कुर्बानी की मुख्यता नहीं है। ऐसा कहीं नहीं लिखा कि जो पशुहत्या न करे, वह पापी है। हाँ, यह तो लिखा है कि खुदा को पशुओं पर दया करना ही पसन्द है, क्योंकि वह खून का प्यासा नहीं और मांस का भूखा नहीं। -सूरा जारितात, आयत ५६-५८

कुछ स्थानों पर मांस खाने का वर्णन है, किन्तु वह मोहकमात=पक्की आयतें न होकर मुतशावियात=संदिग्ध हैं अथवा उनकी व्याख्या यह है कि आपत्ति काल में केवल जीवन धारण के लिये अत्यन्त अल्प-मात्रा में प्रयुक्त करने का विधान है। देखो-सूरा बकर, आयत १७३

अत: मुस्लिम संसार से प्रार्थना है कि कुरान शरीफ में मांस न खाना पाप नहीं है। खाना सन्दिग्ध कर्म और त्याज्य होने से निरामिष होने में ही भलाई है, यही दीने- इब्राहीम और ब्रह्मा का धर्म है, जिस पर चलने के लिये कुरान शरीफ में बल दिया है।

इसी आधार पर आर्य मुस्लिम एकता तो होगी ही, किन्तु राष्ट्र में हिन्दू मुसलमानों के एक कौम होने का मार्ग भी प्रशस्त हो जायेगा। परमात्मा करे कि ऐसा ही हो।

१ जनवरी विशेष : खतना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

जैसे की आप सब लोगो को विदित है कि नया साल अर्थात ईसाई नववर्ष आने वाला है और ईसाई इसे बड़ी धूमधाम से अपने अपने देशों में मनाते हैं। लेकिन भारत देश में ईसाइयों की आबादी लगभग २.५% है, फिर भी यहाँ इस देश में इस नववर्ष को ईसाई तो मनाते हैं लेकिन अधिकतर हिन्दू भी इस नववर्ष को बड़ी ही धूम धाम से मनाते हैं। भले ये वो हिन्दू हैं जिन्हें दीपावली, होली आदि में आतिशबाजी और रंग बिरंगे गुलालों से परहेज हो, मगर ईसाइयों के नववर्ष में ऐसे जोश में होते हैं कि आतिशबाजी भी करते हैं और मद्य आदि पेय तथा मांसाहार से परहेज नहीं करते। इन लोगों को क्या कहें ज्यादातर समस्या तथाकथित स्वघोषित धार्मिक गुरुओं ने ही प्रारम्भ की है। सांता के सफ़ेद दाढ़ी मूछ में कृष्ण को रंगना और धर्म की शिक्षा न देकर ईसाइयों के नये साल के बारे में न समझाकर मौन रहना, इन्हीं कारणों से हिन्दू समाज ईसाई और मुस्लिम त्योहारों में झूलता रहता है और अपने धार्मिक, ऐतिहासिक तथा वैज्ञानिक त्योहारों के प्रति उदासीन रवैया धारण करता है।
खैर आज हम चर्चा कर रहे हैं कि ये नया साल जो प्रत्येक १ जनवरी को मनाया जाता है वह क्या है? आइये देखे :

नया साल अर्थात् प्रत्येक १ जनवरी को ख़ुशी और जोश से मनाया जाने वाल दिन नया साल है क्योंकि क्रिसमस के दिन ईसा साहब पैदा हुए और इस क्रिसमस के आठवें दिन जो ईसा साहब का “खतना” (लिंग की रक्षार्थ चमड़ा ‘खिलड़ी’ काटना) हुआ था। ये खतना मुस्लिम समुदाय में भी किया जाता है। अतः ये तो सिद्ध हुआ कि ये दोनों संस्कृति कुछ भेद से एक हैं। अतः ईसा साहब के पैदा होने से आठवें दिन जो “लिंगचर्म छेदन संस्कार” अर्थात् खतना हुआ वह नया साल है

On the eighth day, when it was time to circumcise the child, he was named Jesus, the name the angel had given him before he was conceived.

[ Luke 2:21 ]

और जब बालक के खतने का आठवाँ दिन आया तो उसका नाम यीशु रखा गया। उसे यह नाम उसके गर्भ में आने से पूर्व भी पहले स्वर्गदूत द्वारा दे दिया गया था।

[ लूका २ | २१ ]

अब ये खतना तो हुआ ईसा साहब का और मनाते हिन्दू समाज के लोग हैं। वो भी पुरे जोशो खरोश से, ये बात समझ से बाहर है।

तो जो भी हिन्दू ये नया साल मनाते हैं, उन्हें जान लेना चाहिए कि खतना की परंपरा मूसा का नियम है। मूसा ईसाइयों और मुस्लिमो के बड़े पैगम्बर हुए हैं। खैर ये जान लीजिये की इसी मूसा के नियमानुसार ईसा का “लिंगचर्म छेदन संस्कार” खतना हुआ था।

And every male among you who is eight days old shall be circumcised throughout your generations, a servant who is born in the house or who is bought with money from any foreigner, who is not of your descendants.

[ Genesis 17:12 ]

जब बच्चा आठ दिन का हो जाए, तब उसका खतना करना। हर एक लड़का जो तुम्हारे लोगों में पैदा हो या कोई लड़का जो तुम्हारे लोगों का दास हो, उसका खतना अवश्य होगा।

[ उत्पत्ति १७ | १२ ]

On the eighth day the flesh of his foreskin shall be circumcised.

[ Leviticus 12:3 ]

आठवें दिन बच्चे का खतना होना चाहिए।

[ लैव्यव्यवस्था १२ | ३ ]

इसपर यदि कोई ईसाई कहे कि ये तो पुराना नियम है और इसे नहीं मानता। तो ये देखें यीशु ने स्वयं कहा:

Think not that I am come to destroy the law, or the prophets: I am not come to destroy, but to fulfil.

For verily I say unto you, Till heaven and earth pass, one jot or one tittle shall in no wise pass from the law, till all be fulfilled.

[ Matthew 5:17-18 ]

यह न समझो, कि मैं मूसा के धर्म नियम और भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकों को लोप करने आया हूँ।लोप करने नहीं, परन्तु पूरा करने आया हूँ।

मैं तुम से सच कहता हूँ कि जब तक आकाश और पृथ्वी समाप्त नो जाएँ, तब तक मूसा की व्यवस्था का एक एक शब्द और एक एक अक्षर बना रहेगा। वह तब तक बना रहेगा जब तक वह पूरा नहीं हो लेता।

[ मत्ती ५ | १७-१८ ]

उपरोक्त प्रमाणों से सिद्ध होता है कि ईसा का खतना  यानी “लिंगचर्म छेदन संस्कार” जन्म के आठवें दिन हुआ था जो ग्रैगोरियन कैलेंडर के अनुसार १ जनवरी होता है। यीशु के इसी “लिंगचर्म छेदन संस्कार” की खुशी में हर वर्ष नया साल के रूप में मनाया जाता है। वास्तव में तो ये खतना दिवस ही है, भले ही कोई इसे नया साल के रूप में मनाये।
आज तो कोई ईसाई शायद ही खतना कराता है। जबकि यीशु ने तो स्वयं खतना कराया। साथ ही साथ सभी को मूसा के नियमानुसार खतना कराने का आदेश भी दिया। क्या ये ईसाइयों द्वारा बाइबिल और यीशु के आदेश का उल्लंघन नहीं?

ग्रीक आॅर्थोडाॅक्स चर्च तो आज भी १ जनवरी को नया साल नहीं बल्कि खतना दिवस के रूप में ही मनाते हैं।
प्रमाण स्वरूप उनके 2017 के कैलेंडर को नीचे क्लिक करके देख सकते हैं –

On Sunday, January 1, 2017 we celebrate

खैर जो भी है। सबसे बड़ी बात है कि खतना करना, करवाना, ईसाई और मुस्लिम संस्कार है। हिन्दू समुदाय में ये घृणित कार्य माना जाता है क्योंकि यदि ईश्वर की रचना में कोई कमी होती तो ये खाल नहीं होती। लेकिन ईश्वर अपनी रचना में कभी कोई कमी नहीं करता, न ही किसी को इस शरीर में कांट छांट करने का अधिकार ही प्रदान करता है। अतः आप सबसे हाथ जोड़कर विनती है कि अपने अपने संस्कार सबको मानने चाहिए।

मगर हिन्दू समाज यदि १ जनवरी को “लिंगचर्म छेदन संस्कार” अर्थात खतना दिवस को सामूहिक रूप से अपने परिवार सहित मनाना ही चाहता है तो कृपया ईसा, मूसा और यहोवा की आज्ञा पालन करते हुए अपना भी खतना अर्थात “लिंगचर्म छेदन संस्कार” स्वयं करवा लेवे तभी इस संस्कार को ख़ुशी से मनाये।

हालाँकि वो हिन्दू जो इस “लिंगचर्म छेदन संस्कार” खतना दिवस को जोशो खरोश से मनाते हैं उनके लिए :

“बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना”

थोड़ा विचार कीजिए कि किसी आठ दिवसीय बालक के लिंगचर्म छेदन संस्कार के अवसर पर हर वर्ष पटाखे फोड़ेना, शायरियाँ भेजना, तरह तरह के पकवान खाना, मौज मस्ती करना क्या ये सब काम भले मानव के हो सकते हैं भला?
जो बोले हाँ! तो उनसे अनुरोध है कि अपने भी बच्चों के खतना दिवस पर हर वर्ष पार्टी का आयोजन करें, पटाखे जलाएँ, लोगों को ग्रिटिंग्स कार्ड बाँटेंऔर मौज मस्ती करें। साथ में अपने खतने किये हुए पुत्र को अवश्य बताएँ कि सुन आज ही के दिन तेरा खतना हुआ था। सो इस खुशी में हर वर्ष पार्टी चलती है। तू भी अपने आगे के बाल बच्चों का ऐसे ही करीयो।

अपने धर्म से प्रेम करने वाले हिन्दुओं से अनुरोध है कि अब से सेक्युलर हिन्दुओं को १ जनवरी पर “Happy Circumcision Day‘ या ‘खतना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ‘ अवश्य भेजें।

बहरहाल इतने सब प्रमाणों के बाद भी यदि कोई हिन्दू १ जनवरी को मनाना चाहता है। तो पंडित लेखराम वैदिक मिशन की ओर से उन सभी हिन्दुओं को Happy Circumcision Day। खतना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

हाँ अपने परिवार वालों, विशेषकर बच्चों को भी अवश्य बताएँ कि आप १ जनवरी क्यों मनाते हैं।

नमस्ते।

[रजनीश बंसल की भूमिका को मेरे द्वारा संपादित किया गया है।]

कितने ईश्वर बाइबिल में??

बाइबिल में कितने ईश्वर हैं? एक या तीन? क्या पवित्र आत्मा, ईश्वर और यीशु एक है वा अलग अलग सत्ता है? आएँ देखें।

5 क्योंकि परमेश्वर एक ही है: और परमेश्वर और मनुष्यों के बीच में भी एक ही बिचवई है, अर्थात मसीह यीशु जो मनुष्य है।

(1 तीमुथियुस, अध्याय २)

1 फिर उस से कहा, मैं तुम से सच सच कहता हूं कि तुम स्वर्ग को खुला हुआ, और परमेश्वर के स्वर्गदूतों को ऊपर जाते और मनुष्य के पुत्रा के ऊपर उतरते देखोगे।।

(यूहन्ना, अध्याय २)

1 परमेश्वर के पुत्र यीशु मसीह के सुसमाचार का आरम्भ।

(मरकुस, अध्याय १)

19 निदान प्रभु यीशु उन से बातें करने के बाद स्वर्ग पर उठा लिया गया, और परमेश्वर की दाहिनी ओर बैठ गया।

(मरकुस, अध्याय १६)

19 तुझे विश्वास है कि एक ही परमेश्वर है: तू अच्छा करता है: दुष्टात्मा भी विश्वास रखते, और थरथराते हैं।

(याकूब, अध्याय २)

उपरोक्त आयतो को पढ़ने से ज्ञात होता है, बाइबिल का कोई परमेश्वर है, और उसका पुत्र ईसा, अलग अलग हैं, यानी दो अलग अलग चरित्र हैं, यह भी ज्ञात होता है की ईसा, परमेश्वर और मनुष्यों के बीच एक बिचौलिया है और स्वर्ग में परमेश्वर के दाहिनी और बैठता है। इसी प्रकार की अनेक आयते बाइबिल के नए नियम में मौजूद हैं।

अब आगे :

14 प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह और परमेश्वर का प्रेम और पवित्र आत्मा की सहभागिता तुम सब के साथ होती रहे॥

(2 कुरिन्थियों, अध्याय १३)

19 इसलिये तुम जाकर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा दो।

(मत्ती, अध्याय २८)

2 और परमेश्वर पिता के भविष्य ज्ञान के अनुसार, आत्मा के पवित्र करने के द्वारा आज्ञा मानने, और यीशु मसीह के लोहू के छिड़के जाने के लिये चुने गए हैं। तुम्हें अत्यन्त अनुग्रह और शान्ति मिलती रहे॥

(1 पतरस, अध्याय १)

उपरोक्त आयतों से एक ईश्वर के स्थान पर तीन भिन्न भिन्न प्रकार की सत्ताओ का ज्ञान होता है वह है, एक परमेश्वर, दूसरा पुत्र ईसा और तीसरा पवित्र आत्मा। इसी प्रकार की अनेक आयते बाइबिल के नए नियम में मौजूद हैं।

अब और आगे :

30 मैं और पिता एक हैं।

(यूहन्ना, अध्याय १०)

15 वह तो अदृश्य परमेश्वर का प्रतिरूप और सारी सृष्टि में पहिलौठा है।

(कुलुस्सियों, अध्याय १)

12 तब यीशु ने फिर लोगों से कहा, जगत की ज्योति मैं हूं; जो मेरे पीछे हो लेगा, वह अन्धकार में न चलेगा, परन्तु जीवन की ज्योति पाएगा।

(यूहन्ना, अध्याय ८)

58 यीशु ने उन से कहा; मैं तुम से सच सच कहता हूं; कि पहिले इसके कि इब्राहीम उत्पन्न हुआ मैं हूँ।

(यूहन्ना, अध्याय ८)

6 यीशु ने उस से कहा, मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुंच सकता।
7 यदि तुम ने मुझे जाना होता, तो मेरे पिता को भी जानते, और अब उसे जानते हो, और उसे देखा भी है।

(यूहन्ना, अध्याय १४)

यहाँ उपरोक्त वर्णित आयतो से ज्ञात होता है, की ईश्वर और ईसा एक हैं, यानी ईसा से बड़ी सत्ता कोई नहीं, ईसा ही ईश्वर है, ऐसा ईसा का कथन है।

लेकिन आगे ईसा क्या कहता है देखिये :

28 तुम ने सुना, कि मैं ने तुम से कहा, कि मैं जाता हूं, और तुम्हारे पास फिर आता हूं: यदि तुम मुझ से प्रेम रखते, तो इस बात से आनन्दित होते, कि मैं पिता के पास जाता हूं क्योंकि पिता मुझ से बड़ा है।

(यूहन्ना, अध्याय १४)

अब समझ ये नहीं आता कि आखिर बाइबिल में ईश्वर है कौन ?
ईसा ?
परमेश्वर ?
पवित्र आत्मा ?
इससे भी बड़ी बात, कभी ईश्वर को बड़ा बनाया, कभी खुद को ईश्वर कहा, कभी पवित्र आत्मा के द्वारा पवित्र होना बताया, कभी खुद को ईश्वर के साथ होना बताया।
ईसाइयो, बाइबिल का ईश्वर आखिर है कौन ? और है तो कितने हैं?

रजनीश बंसल

क्रिसमस मनाना बाइबिल अनुसार अनुचित और अधार्मिक कार्य!

बाइबिल के नए नियम और पुराने नियम, में कहीं भी क्रिसमस (ईसा का जन्म दिवस त्यौहार) हर्षोल्लास से मनाना नहीं लिखा।

पूरी बाइबिल, नए नियम और पुराने नियम में कहीं भी क्रिसमस के लिए कोई “नकली पेड़” या “क्रूस” जैसी किसी भी छवि अथवा प्रतीक को अपनाया जाना कहीं नहीं लिखा, बल्कि यह ईश्वर की नजर में पाप है, अपराध है।
(1 कुरिन्थियों, १०-१४:१५)

पूरी पूरी बाइबिल, नए नियम और पुराने नियम में कहीं भी, क्रिसमस को मनाये, हर्षोल्लास दर्शाये, कहीं नहीं लिखा, कोई लिखी प्रमाण हैं तो कोई भी ईसाई बंधु प्रस्तुत करें।

पूरी बाइबिल, नए नियम और पुराने नियम में कहीं भी, किसी भी प्रकार के (सांटा क्लोज-क्रिश्मस का पिता) जैसा कोई ऐतिहासिक व्यक्ति वा चरित्र नहीं मिलता, यदि है, तो कोई भी ईसाई व नव-ईसाई (मसीह) बाइबिल से प्रमाण प्रस्तुत करें।

मेरे ईसाई भाइयों, नव-ईसाई (मसीह) भाइयों और प्यारे हिन्दू भाइयों! सच्चाई यह है कि क्रिसमस का त्यौहार, क्रिसमस का पेड़, और क्रॉस आदि प्रतीक, यह पगन लोगों (अरब के मूल निवासियों) का त्यौहार था। यह पगन लोग, योगेश्वर कृष्ण के पौत्र के वंशज थे जो वैदिक धर्मी थे। मगर समय के अनुसार, अनार्य स्थान पर रहने से वेदधर्म से चूककर, पौराणिक पद्धतिया धारण कर चुके थे। जैसा जिसका मत चला उस मत को अपनाते गए और वैसी ही पूजा पद्धति अपनाते गए।

क्रिसमस का पेड़ और दिसम्बर मास में ईसा का जन्मकाल मानकर, हर्षोल्लास से मनाना, ईसाइयों और नवईसाईयों(मसीहों) के लिए वर्जित है, क्योंकि ईसा का जन्म दिसम्बर में हुआ ही नहीं था, तो क्रिसमस दिसंबर में कैसे मनाते हैं ?

क्रिसमस के पेड़ को प्रतीक मानना, पूजना मूर्खता है :

2 अन्यजातियों को चाल मत सीखो, न उनकी नाईं आकाश के चिन्हों से विस्मित हो, इसलिये कि अन्यजाति लोग उन से विस्मित होते हैं।
3 क्योंकि देशों के लोगों की रीतियां तो निकम्मी हैं। मूरत तो वन में से किसी का काटा हुआ काठ है जिसे कारीगर ने बसूले से बनाया है।
4 लोग उसको सोने-चान्दी से सजाते और हयैड़े से कील ठोंक ठोंककर दृढ़ करते हैं कि वह हिल-डुल न सके।
5 वे खरादकर ताड़ के पेड़ के समान गोल बनाईं जाती हैं, पर बोल नहीं सकतीं; उन्हें उठाए फिरना पड़ता है, क्योंकि वे चल नहीं सकतीं। उन से मत डरो, क्योंकि, न तो वे कुछ बुरा कर सकती हैं और न कुछ भला।

(यिर्मयाह, अध्याय १०:२-५)

14 वह देवदार को काटता वा वन के वृक्षों में से जाति जाति के बांजवृक्ष चुनकर सेवता है, वह एक तूस का वृक्ष लगाता है जो वर्षा का जल पाकर बढ़ता है।
15 तब वह मनुष्य के ईंधन के काम में आता है; वह उस में से कुछ सुलगाकर तापता है, वह उसको जलाकर रोटी बनाता है; उसी से वह देवता भी बनाकर उसको दण्डवत करता है; वह मूरत खुदवाकर उसके साम्हने प्रणाम करता है।

(यशायाह, अध्याय ४४:१४-१५)

किसी भी त्यौहार का फैसला सिवाय ईसा व उसके पिता के अतिरिक्त कोई न करे : यहाँ इस आयत में स्पष्ट बताया है। आने वाले भविष्य, यानी ईसा की मृत्युपरांत, ईसाई समुदाय, ईसा के जन्मदिवस को विशेषतः हर्षोल्लास से मनाएंगे, मगर यहाँ चेतावनी उन्ही लोगो के लिए है, की वे पर्व (त्यौहार) के लिए कोई फैसला नहीं करे।

16 इसलिये खाने पीने या पर्व या नए चान्द, या सब्तों के विषय में तुम्हारा कोई फैसला न करे।
17 क्योंकि ये सब आने वाली बातों की छाया हैं, पर मूल वस्तुएं मसीह की हैं।

(कुलुस्सियों, अध्याय २:१६-१७)

बाइबिल के इन सभी स्थलों पर, ईसा के जन्म की शुभकानाए दी जाती हैं, मगर इस दिन को त्यौहार के रूप में मनाये, ऐसा कोई विधान प्रकट नहीं किया जाता :

लूका (अध्याय २:१०-१२) (अध्याय २:१३-१४) (अध्याय २:१५-२०)
मत्ती (अध्याय २:१-१२)

इन सभी स्थलों पर, ईसा के जन्म का हर्षोल्लास मना लिया गया, लेकिन आगे भी मनाते रहे, ऐसा कोई विधान पूरी बाइबिल में कहीं नहीं पाया जाता है।

क्रिसमस पगनों का त्यौहार :

19 मूरत! कारीगर ढालता है, सोनार उसको सोने से मढ़ता और उसके लिये चान्दी की सांकलें ढाल कर बनाता है।
20 जो कंगाल इतना अर्पण नहीं कर सकता, वह ऐसा वृक्ष चुन लेता है जो न घुने; तब एक निपुण कारीगर ढूंढकर मूरत खुदवाता और उसे ऐसा स्थिर कराता है कि वह हिल न सके॥

(यशायाह, अध्याय ४०:१९-२०)

14 वह देवदार को काटता वा वन के वृक्षों में से जाति जाति के बांजवृक्ष चुनकर सेवता है, वह एक तूस का वृक्ष लगाता है जो वर्षा का जल पाकर बढ़ता है।
15 तब वह मनुष्य के ईंधन के काम में आता है; वह उस में से कुछ सुलगाकर तापता है, वह उसको जलाकर रोटी बनाता है; उसी से वह देवता भी बनाकर उसको दण्डवत करता है; वह मूरत खुदवाकर उसके साम्हने प्रणाम करता है।
16 उसका एक भाग तो वह आग में जलाता और दूसरे भाग से मांस पकाकर खाता है, वह मांस भूनकर तृप्त होता; फिर तपाकर कहता है, अहा, मैं गर्म हो गया, मैं ने आग देखी है!
17 उसके बचे हुए भाग को लेकर वह एक देवता अर्थात एक मूरत खोदकर बनाता है; तब वह उसके साम्हने प्रणाम और दण्डवत करता और उस से प्रार्थना कर के कहता है, मुझे बचा ले, क्योंकि तू मेरा देवता है। वे कुछ नहीं जानते, न कुछ समझ रखते हैं।

(यशायाह, अध्याय ४४:१४-१७)

अतिरिक्त पढ़े (यिर्मयाह, अध्याय १०:२-५)

उपरोक्त तथ्यों से सिद्ध है, न तो, ईसा के जन्म का हर्षोल्लास मनाने के लिए कोई त्यौहार, पर्व मनाना चाहिए, ऐसा वर्णन, पूरी बाइबिल में कहीं नहीं मिलता, क्रिसमस जैसे त्यौहार के लिए कोई प्रतीक यथा, पेड़, क्रूस होना चाहिए, ऐसा विधान भी नहीं मिलता, हाँ बाइबिल में यह अवश्य लिखा है की जो कोई मनुष्य किसी पेड़, क्रूस आदि प्रतीक को माने या पूजे तो पापी होगा, और इसी सिद्धान्त को, पगन मानते थे, इसलिए बाइबिल ने उन्हें मुर्ख और विधर्मी कहा।

इसीलिए बाइबिल में क्रिसमस को मनाना, और ईसा के जन्म की खुशियां बांटना या त्यौहार मनाना बाइबिल अनुसार ही अनुचित है, अतः ईसाई भाइयो और नव ईसाइयो (मसीह) भाइयो से अनुरोध है वे न तो इस अनुचित और अधार्मिक कार्य को करे, न ही हिन्दू भाइयो में इस अधर्म का प्रचार करे।

अगली पोस्ट पर विस्तार से बताएँगे, ईसा का जन्म, दिसम्बर माह में नहीं हुआ था, जब दिसंबर में जन्म ही नहीं हुआ, तो क्रिसमस का औचित्य दिसंबर में कैसे ?

रजनीश बंसल

मेरी क्रिसमस विवेकानंदी हिन्दुओं!

आज जब ये प्रश्न कहीं भी पूछा जाता है कि हिन्दुओं की प्रेरणा कौन है?

तो एक ही उत्तर आता है स्वामी विवेकानन्द जी और उनकी संस्था यानी स्वामी विवेकानन्द के नक्शे-कदम पर चलने वाली उनकी प्रेरणा, उनके मंतव्यों पर आधारित संस्था रामकृष्ण मिशन

स्वामी विवेकानन्द का योगदान इस देश और वैदिक धर्म के लिए कितना रहा?

यह सवाल आज तक सवाल ही है क्योंकि इसमें उनका योगदान कुछ रहा ही नहीं।

उन्होंने शिकागो में केवल एक भाषण दिया था और उस एक भाषण को इतना बढ़ा चढ़ाकर दिखाया गया जैसे समग्र वैदिक धर्म, समग्र हिन्दू जाति का उस एक भाषण मात्र से ही उद्धार हो गया हो।

वास्तव में कोई स्वामी विवेकानंद को पढ़ ले, उनकी जीवनी, जो स्वयं उन्ही की संस्था से छपी हुई है, पढ़ ले तो विशवास मानिए आप अपनी सोच पर तरस खायेंगे की आपने कैसे इंसान को अपना आइडियल मान लिया था।

वेदों में मांसाहार, ब्राह्मणों द्वारा मांस भक्षण आदि बातों का डंका यदि विदेशों में किसी ने बजाया है तो वो हिन्दुओं के प्रेरणा स्तम्भ विवेकानन्द जी ने ही बजाया है!

मैंने इस क्रिसमस पर कई हिन्दुओं को ईसा और सांता का विरोध करते देखा है।

और दूसरी तरफ वही हिन्दू विवेकानन्द को अपना आदर्श मान रहा है।

भाई ये दोगलापन क्यों??

सोच रहे होंगे की में यह सब क्यों लिख रहा हूँ?

जो हिन्दू विवेकानंद जी को अपना आदर्श मानते है वही दूसरी तरफ ईसा या सांता का विरोध कर रहे है तो आपके लिए खबर है कि

इस क्रिसमस डे पर रामकृष्ण मिशन में हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी क्रिसमस डे मनाया गया है।
और बहुत ही निराले अंदाज में एक बहुत बड़ा हथकंडा अपनाया गया है अवतारवादी हिन्दूत्व संस्कृति में एक नये अवतार ईसा को लाने का।

बाइबिल में जबरदस्ती नव वेदान्त खोजने वाली इस संस्था और इससे जुड़े सभी लोगों का भारत के ईसाईकरण में एक महत्वपूर्ण योगदान रहा था, रहा है और आगे भी रहेगा।

रामकृष्ण मिशन से छपी ईसा पर एक पुस्तक के कुछ चित्र देखें:

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विश्वास मानिए की इतने खुलासे के बाद भी हिन्दू नहीं सम्भलेगा। वो स्वामी दयानंद सरस्वती को अपना आदर्श नहीं मानेगा जिन्होंने वैदिक धर्म की रक्षार्थ अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।

जिनके शिष्यों ने भी इस पथ पर अग्रसर रहते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए ।

इन हिन्दुओं को मांसाहारी विवेकानंद तो प्रिय है परन्तु धर्म रक्षक स्वामी श्रद्धानंद जी के बारे में जानकारी तक नहीं है।
स्वामी विवेकानंद पर कुछ शोध प्रस्तुत है:

1. आदर्श सन्यासी -स्वामी विवेकानन्द : प्रो धर्मवीर

2. आदर्श संन्यासी–स्वामी विवेकानन्द भाग -२ : धर्मवीर जी

3. प्राचीन काल में यज्ञ में पशु बलि विचारधारा को पोषित करते स्वामी विवेकानंद और सत्य

4. स्वामी विवेकानन्द का हिन्दुत्व : स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती की दृष्टि में

खैर हिन्दुओं के आदर्श स्वामी विवेकानंद जी की संस्था जो उनके आदर्शों का ही अनुशरण करती है रामकृष्ण मिशन द्वारा क्रिसमस डे मनाया गया।
ये सूचना स्वयं वेलूर मठ के आधिकारिक वेबसाइट से प्राप्त हुई है। देखिए वेलूर मठ क्रिसमस डे के कुछ यादगार पल:
CHRISTMAS EVE 2016 : PHOTOS

तो पण्डित लेखराम वैदिक मिशन आपको यानी सभी विवेकानंदी हिन्दुओं को क्रिसमस डे की बधाई देता है। और ईश्वर से प्रार्थना करता है कि दिखते हुए कुएँ में गिर रहे मेरे हिन्दू यानी हमारे भटके सनातनी वैदिक धर्मियों को सद्बुद्धि दें उन्हें सन्मार्ग दिखाए और झूठे धार्मिक लोगों से सतर्क रखे।

इसी के साथ सभी आर्यों के साथ पंडित लेखराम वैदिक मिशन स्वामी श्रद्धानंद बलिदान दिवस पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजली अर्पित करता है और ईश्वर से प्रार्थना करता है की हममे ये लगन लगा दो की हर आर्य एक श्रद्धानंद बनकर निकले।

ओ३म्

बाइबिल समीक्षा : युसूफ का पिता कौन?

ईसा का पिता तो कोई नहीं, ऐसा ईसाई स्वयं मानते फिरते हैं, लेकिन यदि बाइबिल पढ़ें तो स्थान स्थान पर ईसा का पिता युसूफ है, जो मरियम का पति था।

लेकिन चौकाने वाला तथ्य यह है, की युसूफ का पिता कौन था ?

मत्ती के अनुसार, युसूफ का पिता याकूब था, लेकिन लूका में ईसा स्वयम कहता है, मेरे (ईसा) पिता युसूफ का पिता एली था।

कहीं देखि है ऐसी विचित्र वंशावली?


16 और याकूब से यूसुफ उत्पन्न हुआ; जो मरियम का पति था जिस से यीशु जो मसीह कहलाता है उत्पन्न हुआ॥

(मत्ती, अध्याय १)


23 जब यीशु आप उपदेश करने लगा, जो लगभग तीस वर्ष की आयु का था और (जैसा समझा जाता था) यूसुफ का पुत्र था; और वह एली का।

(लूका, अध्याय ३)

समीक्षा : क्या युसूफ के दो-दो पिता थे? भला ये कभी संभव है कि दो व्यक्ति के वीर्य से एक पुत्र उत्पन्न हो? ईसाइयों को चाहिए कि इस विषय पर स्पष्टकरें कि युसूफ के दो-दो बाप होने का कारण क्या है?
क्या ये इस्राइली यहोवा का पक्षपात न माना जावे कि यीशु को एक भी बाप न दिया और बदले में युसूफ को दो-दो बापों की सौगात दे दी?
हाँलाकि भारत जैसे संस्कारी देश में दो बाप का औलाद एक बहुत गंदी गाली है। लेकिन यरोप आदि महादेशों में ये कोई नया नहीं कि उन्हें अपने पिता का नाम ना मालूम हो। लगता है ये प्रथा भी बाइबिल से ही आई है।

ईसाईयत समीक्षा : यीशु अच्छा चरवाहा है

ईसाइयों की मान्यता है कि यीशु ईशपुत्र थे। सर्वज्ञानी थे, सबके पापों को छुड़ाने आये थे आदि।
और सभी ईसाई यीशु के इन गुणों का बखान करते ही रहते हैं।
लेकिन आपने बहुत कम ईसाइयों को ये कहते सुना होगा कि यीशु अच्छा चरवाहा है।

जी हाँ! मैं नहीं कह रहा। स्वयं बाइबिल में यीशु ने बोला है।

I am the good shepherd, and the good shepherd gives his life for the sheep.”

[ John 10 | 11 ]

अच्छा चरवाहा मैं हूँ! अच्छा चरवाहा भेड़ों के लिये अपनी जान दे देता है।”

[ युहन्ना १० | ११ ]

समीक्षा : अब देखिए ये भी कोई ईश्वर होता है क्या? भला ईश्वर चरवाहा बनकर दिनभर धूप में क्यों दौड़े? क्या यीशु को अन्य काम नहीं था जो चरवाही करने लग गया था? और यीशु दिनभर चरवाही करते होंगे तो पैगम्बरी कब करते होंगे, चमत्कार कब करे होंगे?
और जहाँ तक जान देने का प्रश्न है! ये तो पूर्णतः ही असत्य है। क्योंकि बाइबिल वाले स्वयं मानते हैं कि यीशु नहीं मर सकता।
तो फिर यहाँ ये लिखना सिद्ध करता है कि या तो यीशु अच्छा चरवाहा नहीं था या यीशु मर भी सकता है।
अब ये ईसाइयों पर है कि वो यीशु की बात को मानें कि यीशु मर सकता है या अपने मिथ्या का प्रचार करें कि यीशु जीवित है।