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प्रत्युत्तर- ‘‘अथ-सृष्टि उत्पत्ति व्याखयास्याम की माप तौल का उत्तर’’

प्रत्युत्तर– ‘‘अथ-सृष्टि उत्पत्ति व्याखयास्याम की माप तौल का उत्तर’’

– शिवनारायण उपाध्याय

परोपकारी अक्टूबर (प्रथम) 2016 में आचार्य दार्शनेय लोकेश के लेख ‘प्रत्युत्तर-अथ-सृष्टि उत्पत्ति व्याखयास्याम की माप तौल’ का उत्तर इस लेख द्वारा दिया जा रहा है। श्री दार्शनेय लोकेश लिखते हैं कि ऋग्वेदादिभाष्याभूमिका-वेदोत्पत्ति विषय (प्रकाशक-आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट पेज 16) में ‘ते चेकस्मिन ब्राह्मदिने 14 चतुर्दशाुक्ता भोगा भवन्ति’ जो लिखा है तो उसका ये अर्थ नहीं है और न हो सकता है कि एक ब्राह्म दिन में 14 मन्वन्तर का काल ही भोगकाल होता है। वस्तुतः ऐसा कहने से स्वामी जी का तात्पर्य है कि ‘पूरे और व्यतीत भाग के साथ 7 वें वर्तमान तक बीत चुके हैं’ [फिर आप मेरे लेख में त्रुटि निकालते हुए लिखते हैं ‘भुक्त ना कि भुक्ता जैसा कि उपाध्यायजी ने लिखा है’] श्रीमान् मेरा लेख जो अगस्त द्वितीय 2016 में परोपकारी में प्रकाशित हुआ है, उसमें भुक्त ही प्रकाशित हुआ है ना किाुक्ता। आप एक बार परोपकारी के पृष्ठ 15 पर देखें। उसमें प्रकाशित है ‘ते चैकस्मिन् ब्राह्मदिने 14 चतुर्दश भुक्त भोगा भवन्ति’  साथ ही हिन्दी अनुवाद में भी प्र्रकाशित है अर्थात् 14 मन्वन्तर का काल भुक्त भोग काल है। लेखन त्रुटि तो आपके इस लेख में ही है। आठवीं पंक्ति में लिखा है ‘ब्राह्मदिने 14 चतुर्दश भुक्ता भोगा भवन्ति।’ स्वामी दयानन्द सरस्वती ऐसी त्रुटियों पर ध्यान नहीं देते थे। उन्होंने लिखा है कि ‘लेखन त्रुटि निकालना तो प्राइमरी विद्यालय के अध्यापक का कार्य है।’ इसलिए मैं आप द्वारा की गई अशुद्धि पर ध्यान देना उचित नहीं मानता हूँ।

‘ते चैकस्मिन् ब्राह्मदिने 14 चतुर्दश भुक्ताोगा भवन्ति।’ का स्वामी जी ने यही अर्थ किया है कि 14 मन्वन्तराभूक्त भोग काल है। इसलिए उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि यह जो वर्तमान ब्राह्मदिन है, इसके 1960852976 वर्ष इस सृष्टि को तथा वेदों की उत्पत्ति में व्यतीत हुए हैं और 2333227024 वर्ष सृष्टि को भोग करने के बाकी रहे हैं। इन दोनों संखयाओं का योग 1960852976

+2333227024=4294080000 वर्ष आता है जो 14 मन्वन्तरों की आयु के तुल्य है। साथ ही उन्होंने यहा भी  लिखा है कि ‘एक सहस्त्र 1000 चतुर्युगानि ब्राह्मदिनस्य परिमाणंावति। ब्राह्म्यारात्रेरपि तावदेव परिमाणं विज्ञेयम्’ मैं तो उनकी दोनों मान्यताओं को स्वीकार करता हूँ। मैं तो वेदाध्ययन के सबसे नीचे के पायदान (उपाध्याय) पर हूँ। इसलिए उनका विरोध करने को पूर्णरूप से असमर्थ हूँ। आप आचार्य हैं, मननशील विद्वान् हैं, आप उनका विरोध करने में समर्थ हैं अतः आप स्वामी दयानन्द का विरोध करते हैं तो करते रहें।

फिर आप लिखते हैं कि श्री शिवनारायण का यह लिखना गलत है कि ‘अर्थात् 14×71=994 चतुर्युगी ही भोग काल है। स्वामीजी ने सृष्टि उत्पत्ति की गणना उस समय से की है जब मनुष्य उत्पन्न हुआ।’ यही नहीं पूर्ण विरोधाभास के साथ लिखते रहे हैं ‘मनुष्य के उत्पन्न होने के साथ ही चार ऋषियों के द्वारा परमात्मा ने वेद ज्ञान दिया। परन्तु सृष्टि उत्पत्ति प्रारमभ होने से लेकर मनुष्य की उत्पत्ति होने तक के व्यतीत काल को उन्होंने गणना में नहीं लिया है।’ मेरा यह लिखना गलत कैसे हो सकता है कि स्वामी जी ने सृष्टि उत्पत्ति काल की गणना उस समय से की है जब मनुष्य उत्पन्न हुआ। सोचो जब मनुष्य उत्पन्न हुआ और यज्ञ करने लगा तो उसने संकल्प-मंत्र में पहला दिन गिना। जब मनुष्य उत्पन्न ही नहीं हुआ था तो संकल्प-मन्त्र कैसे बोला जा सकता था? फिर इसमें विरोधाभास कैसे है कि सृष्टि उत्पत्ति होने से लेकर मनुष्य की उत्पत्ति का समय उन्होंने नहीं गिना। श्रीमान् जी आपको मेरे लिखने में सन्देह इसलिए है कि आपने क्वान्टम सिद्धान्त के भाग probability के अनुसार सृष्टि के भूक्त भोग-काल को 994 चतुर्युगी तथा सृष्टि की कुल आयु 1000 चतुर्युगी स्वीकार की है। ‘एके मनकस्तथा सावर्ण्यादय आगामिनः सप्त चैते मिलित्वा 14 चतुर्दशैवावन्ति। तत्रैकसप्ततिश्चतुर्युगानि ह्येकैकस्य मनोः परिमाणंावति। ते चैकस्मिन्ब्राह्मदिने 14 चतुर्दश भुक्तभोगाावन्ति। एक सहस्त्रं 1000  चतुर्युगानि ब्राह्मदिनस्य परिमाणंावति।’ (ऋ.भा.ाू. पृष्ठ 20)

अर्थात् ये स्वायम्भवादि सात मनु और आगामी सात मनु ये सब 14 ही होते हैं। एक मनु में 71 चतुर्युगियां होती हैं और एक ब्राह्म दिन में 14 मनुओं का भुक्त भोग काल होता है। एक हजार चतुर्युगियों का ब्राह्म दिन का परिमाण होता है। इससे स्पष्ट है कि ब्राह्म दिन में 14 मन्वन्तरों का काल भुक्त भोग काल है।

ऋग्वेद भाषा-भाष्कर में एक प्रश्न पृष्ठ 30 पर उठाया गया है।

प्रश्नसृष्टि की आयु की शेष 6 चतुर्युगियों के विषय में आपका क्या मत है? इनकी गणना के विषय में क्या महर्षि ने कुछ स्पष्ट निर्देश दिया है?

उत्तरवेद तथा सृष्टि के ऐतिहासिक संवत् निर्णय होने पर जो शेष समय है वह सृष्टि की रचना का समय है। इसमें महर्षि के निम्न वचन प्रमाण स्वरूप दिये जाते हैं।

(1) सृष्टि की उत्पत्ति करके हजार चतुर्युगी पर्यन्त ईश्वर इसको बनाये रखता है। हजार चतुर्युगी पर्यन्त सृष्टि मिटाकर प्रलय अर्थात् कारण में लीन रखता है।

– ऋ.भाष्य भूमिका.

इससे स्पष्ट है कि सृष्टि रचना में जो समय लगता है वह सृष्टि का है और प्रलय होने में जो समय लगता है वह प्रलय का समय है।

(2) जब सृष्टि का समय आता है, तब परमात्मा उन सूक्ष्म पदार्थों को इकट्ठा करता है। (सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 7)

इससे भी स्पष्ट है कि सृष्टि रचना में प्रथम परमाणु संयोग से लेकर मानव रचना तक जो भी समय लगता है वह सृष्टि का समय है किन्तु उसको मानव ने नहीं गिना, अतः महर्षि ने उसे ऐतिहासिक समय में नहीं जोड़ा।

(3) सृष्टि और प्रलय के लक्षणों से भी स्पष्ट है कि संसर्गकाल सृष्टि का होता है और वियोगकाल प्रलय का होता है। पं. सुदर्शनदेव तथा पं. राजवीर शास्त्री का लेख है ‘मयासुर का सूर्य सिद्धान्त सन्धि काल की मान्यता का आधार है।’ यह ग्रन्थ अनार्ष पौराणिक मान्यताओं से ओत-प्रोत होने से महर्षि को मान्य नहीं है। उन्होंने सन्धि के विषय में एक शबद भी नहीं लिखा है। सन्धिकाल एवं सन्धांशकाल को शबद भी नहीं लिखा है। सन्धिकाल एवं सन्धांश काल को पहले ही युगों की आयु में ले लिया गया है। फिर प्रत्येक मन्वन्तर के पूर्व 1728000 वर्ष (सतयुग का काल) जोड़ना व्यर्थ है। क्या प्रत्येक मन्वन्तर में पहले दो युग सतयुग के होंगे?

आदित्य पाल सिंह ने तो वेदों के ऋषियों को मूर्ख तक लिखा है। स्वामी दयानन्द द्वारा निर्दिष्ट सन्ध्या की खिल्ली उड़ाई है। उनके लेख को प्रमाणित नहीं माना जा सकता है। संकल्प मन्त्र में गणना मनुष्य के होने पर आरमभ हुई है। इसलिए स्वामी दयानन्द की गणना उचित है।

फिर आप लिखते हैं, ‘श्रीमान् उपाध्यायजी से यह जानना जरूरी है कि वेद मनुष्य की शतवर्षीय आयु बताता है तो क्या ये मानना होगा कि र्गभ काल के 280 दिन काटने के बाद बच्चे 99 वर्ष 2 माह 20 दिन ही (भोगकाल अर्थात् वास्तविक जीवन्तता का समय) शतायर्भूव का तात्पर्य है? ऐसा कदापि नहीं हैं। इस पर मेरा कहना है कि जिस प्रकार भुक्तभोग काल में सृष्टि के निर्माण काल को नहीं जोड़ा गया है। सृष्टि के पूर्ण होने पर वेदोत्पत्ति और मनुष्य की उत्पत्ति होने के बाद से समय की गणना की है, इसी प्रकार शिशु के गर्भ में निर्माण का काल नहीं जोड़ा जायेगा। ऐतिहासिक काल की दृष्टि से माता के गर्भ से जन्म लेने के बाद ही समय की गणना प्रारमभ होगी। आप अपनी मान्यता को छलपूर्वक लागू करना चाहते हैं। ब्रह्मा की आयु तो निश्चित रूप से 1000 चतुर्युगी ही है, क्योंकि भुक्तभोग काल के अतिरिक्त सृष्टि निर्माण काल में भी वह सक्रिय रहता है। आप जब यह कहते हैं कि सृष्टि उत्पत्ति, वेदोत्पत्ति और मानव उत्पत्ति सब एक साथ होती हैं, तब मुझे कहना पड़ा कि ऋग्वेद के अनुसार सृष्टि उत्पत्ति में समय लगता है।

फिर वैदिक वाङ्मय का स्पष्ट मानना है कि सृष्टि की क्रमिक उत्पत्ति हुई है। क्रमिक उत्पत्ति में समय तो लगेगा ही। मैं इस विषय में प्रमाण देता हूँ।

(1) तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सभूतः। आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्यः पृथिवी। पृथिव्या ओषधयः। ओषधीयोऽन्नम्। अन्नाद् रेतः। रेतसः पुरुषः। स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः। (तैत्ति. उप. ब्रह्मानन्द वल्ली प्रथमोऽनुवाकः)

इस श्लोक में मनुष्य 6 क्रमिक परिवर्तनों के बाद आया है।

(2) सोऽकामयत। बहु स्यां प्रजायेयेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा इदं सर्वमसृजत। यदिदं किञ्च। तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्। तदनुप्रविश्य। सच्चत्यच्चाऽभवत्। निरुक्तञ्चानिरुक्तञ्च। निलयनञ्चानिलयञ्च। विज्ञानञ्चाविज्ञानञ्च। सत्यञ्चानृतञ्च। सत्यमभवत्। यदिदं किञ्च तत्सत्यमित्याचक्षते।। (तैत्ति.उप.ब्रह्मानन्दवल्ली षष्ठोऽनुवाकः।।)

यह श्लोक भी सृष्टि की क्रमिक उत्पत्ति बता रहा है। फिर यह श्लोक तो वर्तमान विज्ञान की एक महत्त्वपूर्ण मान्यता की घोषणा भी कर रहा है कि संसार में प्रत्येक उपपरमाण्विक कण का एक विलोम कण भी है। इसी प्रकार सांखय दर्शन भी क्रमिक उत्पत्ति बता रहा है।

(3) तस्मै स होवाच प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽप्यत, स तपस्तप्त्वा स मिथुनमुत्पादयते। रयिञ्च प्राणञ्चेत्येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति।। प्रश्नोपनिषद् के प्रथम प्रश्न के उत्तर में यह कण्डिका भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसमें भी सृष्टि उत्पत्ति के लिए तप द्वारा रयि और प्राण का जोड़ा उत्पन्न किया गया है। महात्मा नारायण स्वामी ने इस पर लिखा है कि यहाँ प्राण उसी ईश्वर प्रदत्त गति को कहते हैं, जिसका नाम वैज्ञानिकों ने शक्ति energy रखा है और उसी गति से विकृत हुई प्रकृति रयि कहलाती है। विज्ञान में इसे matter  कहा जाता है। आगे की कण्डिकाओं में सृष्टि की क्रमिक उत्पत्ति का ही वर्णन है।

(4) देवानां युगे प्रथमेऽसतः सदजायत।

 तदाशा अन्वजायन्त तदुत्तानपदस्परि।।

– ऋ. 10.72.3

देवों के निर्माण के इस प्रथम युग में अव्यक्त (असत्) प्रकृति से यह आकृति वाला जगत् उत्पन्न हुआ है। इन लोकों के उत्पन्न होने के बाद दिशाएं उत्पन्न हुईं। उसके बाद ऊर्ध्व गति वाले वृक्ष वनस्पति उत्पन्न हुए हैं। इस प्रकार देवयुग के बाद वनस्पति युग आया।

(5) देवयुग अर्थात् सूर्य-चन्द्र आदि की उत्पत्ति निम्न ऋचा में है-

देवानां नु वयं जाना प्र वोचाम विपन्यया।

उक्थेषु शस्यमानेषु यः पश्यादुत्तेर युगे।।

– ऋ. 10.72.1

अब हम वेद-वाणी रूप प्रशस्त वाणी से चन्द्र, तारे, सूर्य, पृथ्वी आदि देवों के जन्मों को प्रतिपादित करते हैं। इसलिए इन वेदमन्त्रों के स्रोतों के उच्चरित होने पर जो उपस्थित होता है, वह आगे के आने वाले युगों में इस सृष्टि की उत्पत्ति को देखता है।

(6) अघमर्षण मन्त्र भी सृष्टि की क्रमिक उत्पत्ति बताते हैं-

ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत।

ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रोऽर्णवः।।

ऋ.10.190.1

समुद्रादर्णवादधि संवत्सरोअजायत।

अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी।।

– ऋ.10.190.2

सूर्याचन्दमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्।

दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः।।

ऋ.10.190.3

इन ऋचाओं में ‘ततः’ शबद का अर्थ है-इसके बाद। इतना ही नहीं, वेद में भी सृष्टि की उत्पत्ति महान् विस्फोट big bang से ही मानी गई है।

ब्रह्मणस्पतिरेता सं कर्मार इवाधमत्।

देवानां पूर्व्ये युगेऽसतः सदजायत।।

– ऋ.10.72.2

ज्ञान का स्वामी परमात्मा इन सूर्यादि देवों की आकृतियों को, प्रकृति पिण्ड संतप्त कर ढालता था। इन देवों के निर्माण वाले प्रथम युग में अव्यक्त-प्रायः प्रकृति से व्यक्त-जगत् उत्पन्न हुआ है।

 

Want to embrace Hinduism if given a chance, says Muslim woman attacked with acid after husband deserts her

Want to embrace Hinduism if given a chance, says Muslim woman attacked with acid after husband deserts her

Her mother-in-law allegedly asked her to not “show her face” because Matlub had already given her triple talaq over phone, which Rehana says never occurred. “

Rehana Raza

If given a chance, Rehana Raza says she wants to give up Islam and embrace Hinduism.

The Uttar Pradesh resident became the latest poster woman of triple talaq after allegedly being divorced over the phone by her husband and then attacked with acid by her in-laws. Now, she told Mail Today, she wants to change her religious stripes from green to saffron.

“Hindu law at least reaffirms the right of consensus a woman should have in marriage and gives a woman a say. That’s something Islam lacks, paving the way for triple talaq,” Rehana said in a telephonic interview.

‘DON’T SHOW YOUR FACE TO US’

Thousands of Muslim women from across India have raised their voices against the Sharia law custom that allows men to split up with their wives by saying “talaq” thrice. The instant divorce practice has been barred by more than 20 Muslim countries including Pakistan, Bangladesh and Saudi Arabia. “A common law defends numerous Hindu women who need emotional and financial support after getting deserted. I have suffered because of triple talaq, despite my family’s revered status in society,” Rehana said.

A five-judge constitution bench will sit during the Supreme Court’s summer vacation in May to examine a batch of petitions challenging Islamic practices such as triple talaq and polygamy after women complained of being divorced on Facebook and WhatsApp. Rehana says she was attacked with acid by her in-laws on April 14 at their house in Neoria town of Pilibhit district. The torture did not surprise the victim, who alleges that her husband started beating her within days of their wedding after the couple moved to the United States in 1999.

“He brought me and my son back to India in 2011 when my mother passed away but he soon left us behind, claiming he had found a job in New Zealand. I had no choice but to turn to my in-laws in Pilibhit who also shunned me,” Rehana told Mail Today.

‘MODI’S ATTACK ON TRIPLE TALAQ IS GENUINE’

Her mother-in-law allegedly asked her to not “show her face” because Matlub had already given her triple talaq over phone, which Rehana says never occurred. “I had approached them after the Allahabad high court order that termed the practice of triple talaq as unconstitutional which violates the rights of Muslim women. But instead I have seen days when my son and I have lived without food and electricity,” said Rehana, who has now been assured support by women and child development minister Maneka Gandhi.

The government told the Supreme Court last year that triple talaq violates the fundamental rights guaranteed by the Constitution and said it does not form a part of the “essential religious practices” in Islam. “Given how Rehana has endured for years at her in-laws’ house, Maneka Gandhi has taken up the issue with the superintendent of police in Pilibhit to expedite the case,” a ministry official told Mail Today.

Rehana’s 14-year-old son was not around on April 14 when she claims her brother-in-law Maqbool Hussain, sisters-in-law Parveen and Shakeela started beating her and threw acid on her. Despite her narrow escape after spotting the bottle of acid, she suffered burns on her back and marks on her arms, neck and feet.

Terming the Narendra Modi government’s bid to attack triple talaq “genuine”, Rehana also said, “Given how our government has vouched for a common law, the hype around triple talaq is important to make people think about the atrocities inflicted on women.” The trauma has not ended for Rehana as she points out that her son has grown quiet over time. “I insisted for a roof at my in-laws’ house but I was thrown out every other day. When we refused to budge, my husband called my teenage son, and told him that we should vacate the house or he would get him jailed,” alleged Rehana. “Even now, I am being asked to leave the hospital by the police, who refuse get a warrant otherwise. The harassment has not ended for me.”

source : http://indiatoday.intoday.in/story/triple-talaq-uttar-pradesh-muslim-women-hindu-acid-attack/1/932438.html

यह मनु कौन थे: पण्डित गंगा प्रसाद उपाध्याय

यह मनु कौन थे यह कहना कठिन है । जिस प्रकार उपनिषत कारो तथा दर्शनकारो के विषय में बहुत कम ज्ञात है उसी प्रकार मनु के विषय में हम कुछ नही जानते । कही कही तो मनु को केवल धर्म शास्त्र का रचियता बताया गया है और कही कही समस्त सृष्टि की उत्पति ही मनु से बताइ्र्र गई है । आघ्र्य जैसी प्राचीन जाति क साहित्य मे इस प्रकार की कठिनाइयो का होना स्पाभाविक है । इसी शताब्दी के भीतर दयानन्द नाम मे दो व्यक्ति हुये एक आयर्य समाज के संस्थापक और दूसरे सनातमर्ध मंडल के कायर्यकर्ता । इन दोनो के विचारो में आकाश पाताल का भेद है । परन्तु यह बहुत ही संभव है कि कुछ दिनो पश्चात एक के वचन दूसरे के समझ लिये जाॅये । इसी प्रकार प्रतीत ऐसा होता है कि कही तो मनु शब्द ईश्वर का वाचक था कही वेदिक ऋषि का कही धर्मशास्त्र के रचियता का और कही संभव है अन्य किसी का भी । इन सब को किसी प्रकार समय की प्रगति ने मिला – जुला दिया और आगे आने वाले लोगो के लिए विवेक  करना कठिन हो गया । जितने भाष्य मनुस्मृति क इस समय प्राप्य है वह सब मेधातिथि से लेकर आज तक के आधुनिक या पौराणिक युग के ही समझने चाहिए । इसीलिए इनके आधार किसी विशेष निष्चय तक पहुॅचना दुस्तर है । शतपथ ब्राह्मण (13।4।3।3) में आता है

मनुर्वेपस्वतो राजेत्याह तस्य मनुष्या विशः

अर्थात मनु वैवस्वत राजा है और मनुष्य उसकी प्रजा है इससे प्रतीत होता है कि मनु वैवस्वत कोई राजा था । या यह भी संभव है कि राजा को ही यहाॅ विशेष गुणों के कारण मनुवैवस्वत कहा है ।

मेधातिथि ने अपने भाष्य के आरंभ मे मनु के विषय में लिखा है:-

मनुर्नाम कश्चित पुरूष विशेषोअनके वेद शाखा अघ्ययन विज्ञानानुष्ठान तथा स्मृति -परंपरा के लिए प्रसिद्ध हो गया।

यह एक हानि -शून्य कथन है और इतना मानने मे किसी को भी संकोच नही हो सकता । क्योकि जिस मनु की इतनी प्रसिद्धि है वह अवश्य ही कोई विद्वान पुरूष रहा होगा और उसने वेदाचार और लोकाचार का पूर्ण ज्ञान पा्रप्त कर लिया होगा।

मनु स्मृति का वैदिक साहित्य में प्रमाण : पण्डित गंगा प्रसाद उपाध्याय

मानव धर्मशास्त्र का वैदिक साहित्य में बहुत गोरव है । आयर्य जाति की सम्यता का मानव धर्मशास्त्र के मनुस्मृति का वैदिक साथ एक घनिष्ट संबंध हो गया है । हम चाहे मनु तथा मनुस्मुति के विषय में पुछे गये अनेको प्रश्नो का समाधान न कर सके तो भी यह अवश्य मानना पडता है कि मनु अवश्य ही कोई महा पुरूष था जिसके उपदेश आयर्य सभ्यता के निमार्ण तथा जीवन – स्थिति के लिए बडे भारी साधक सिद्ध हुए और उन पर विद्वानों की अब तक श्रद्धा चली आती है ।

निरूक्तकार यास्क ने दायभाग के विषय में मनु को प्रमाण माना है:-

अविशेषेण मिथुनाः पुत्रा दायादा इति तदेतद झक श्लोकभ्याम्भ्यक्त । अगादंगात्सम्भवसि हदयाधिजायते । आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम । अविशेषण पु़त्राण दाये भवति धर्मतः मिथुनानां विसर्गादो मनुः स्वायम्भुवोब्रवीत

बिना भेद के स्त्री और पुमान दोनो प्रकार के पुत्र (अर्थात लडकी और लडका दोनो ) दायाभाग के अधिकारी होते है यह बात ऋचा और श्लोक से कही गई । अंग अंग से उत्पन होता है हद्रय से उत्पन होता है इसलिए पुत्र आत्मा ही है वह सौ वर्ष तक जीवे (यह ऋचा हुई )। धर्म अर्थात कानून की दृष्टि से दोनो प्रकार के पुत्रो (अर्थात लडका और लडकी दोनो ) के दाया भाग मिलता है ऐसा सृष्टि की आदि मे स्वायभुव मनु ने कहा मनु ने कहा है (यह श्लोक हुआ )

निरूत्तकार को यहाॅ प्रमाण देना था कि दायभाग का अधि-कारी जैसा लडका है वैसा ही लडकी । उनहोने पुत्र शब्द दोनो के लिए प्रयोग किया है । इसमे उनहोने दो प्रमाण दिये है एक श्रुति का और दूसरा स्मृति का । अंग शतम श्रुति है । अवि शेषेणा बव्रवीत तक श्लोक है । और श्लोक मे स्वसयंभुवो मनु   उल्लेख है । आयर्यो के लिए श्रुति और स्मृति यही दोनो मुख्य प्रमाण। यही बात कवि कालिदास ने रधुवशमें उपमा के रूप मे दी है

श्रुतेरिवार्थ स्मृतिरन्वगच्छत अर्थात स्मृति श्रुति का अनुकरण करती है । मेधातिति ने मनु-माघ्य के आरम्भ में लिखा है:-

ऋचो यूजूषि सामानि मन्त्रा आथर्वण्श्चये ।

महषिभिस्तु तत प्रोक्त स्मातं तु मनुरब्रवीत ।।

अर्थात ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद तथा अर्थवेद का उपदेश ऋषियो ने किया था परन्तु स्मृति धर्म (का) उपदेश मनु ने किया । महाभारत शान्ति पर्व मे लिखा है कि

ऋषीनुवाच तान सर्वानदश्य: पुरूषोत्तम:

कृत शत-सहस्त्र हि श्लोकानामिदमृमतमम ।।

लोकतन्त्रस्य कत्स्नस्य यस्माद धर्म:प्रवर्तते।

 

तस्मात प्रवश्रयते धर्मान मनुः स्वायंभुव। स्वयं

 

स्वयंभुवेषु धर्मषु शास्त्रे चैशनसे कुते ।

बृहस्पतिमते चैव लोकेषु प्रतिचारिते ।।,

अर्थात निराकार परमात्मा ने उन ऋषियो को शत-सहस्त्र श्लोक का उत्तम ज्ञान दिया जिस पर कि संसार का समस्त धर्म स्थित है । स्वंय इन धर्मो का उपदिेश किया । और मनु के उस उपदेश के आधार पर ब्रहस्पति और उशनस ने अपनी अपनी स्मृतियाॅ बनाई ।,

मनु नाम की महत्ता : पण्डित गंगाप्रसाद उपाध्याय

वैदिक साहित्ष्किो के मार्ग मे इस प्रकार की सहस्त्रो अडचने है जिनका अधिक उल्लेख यहाॅ नही करना

मनु नाम की महता  चाहिए । परन्तु इसमे भी सन्देह नही कि कोई न कोई विद्वान मनु हो गये है जिनहोने आचार (Moral Laws) और व्यवहार (Juris-prudence) के सम्बन्ध मे नियम बनाये जिनका नाम मानव धर्म शास्त्र या मनुस्मृति पड गया । मनु नाम की महता अन्य देशो के प्राचिन इतिहास से भी विदित होती है । सर विलियम जोन्स (Sir W.Jones) लिखते है:-

“We cannot but admit that Minos Mnekes or Mneuis have only Greek terminations but that the crude noun is composed of the same radical letters both in greek and Sanskrit”

अर्थात यूनानी भाषा के माइनोस आदि शब्द संस्कृत के मनु शब्द के ही विकृत रूपा है।

Leaving others to determine whether our Menus ¼or Menu in the nominative½ the son of Brahma was the same personage with minos the son of jupitar and legislator of the Cretsans ¼who also is supposed to be the same with Mneuis spoken of as the first Law giver receiving his laws from thw Egyp-tian deity Hermes and Menes the first king of the Egyptians ½ remarks :-

“ Dara Shiloha was persuaded and not without sound reason that the first Manu of the Brahmanas could be no other person than the progenitor of makind to whom jews, Christians and mussulmans unite in giving the name of adam “ ¼Quoted by B.Guru Rajah Rao in his Ancient Hindu Judicature½

बी0 गुरू राजाराउ ने अपनी पुस्तक । Ancient Hindu Judicature मे लिखा है कि यदि हम यह अनुसधान दूसरो के लिए छोड दे कि ब्रहा का पुत्र मनु वही है जिसे कोटवालों का धर्म शास्त्र रचियता माइनौस ज्यूपीटर का पुत्र कहा जाता हे (ओर जिसके विषय मे कहा जाता है कि यह वहर म्नयूयस था जिसने मिश्र देश के देवता हमीज से धर्मशास्त्र सीखा और जो मिक्ष देश के देवता हर्मीज से धर्मशास्त्र सीखा और जो मिश्र देश का पहला राजा बना) तो भी जोन्स के इस उद्धरण पर अवश्य ध्यान देना चाहिए कि दाराशिकोह का यह विचार कुछ अनुचित न था कि ब्राह्मणो का आदि मनु वही है जो मनुष्य जाति का पूर्वज समझा जाता है और जिसको यहूदि ईसाई और मुसलमान आदम के नाम से पुकारते है।

इन उद्धरणो में कहाॅ मे कहाॅ तक सचाई है इसमे भिन्न भिन्न मत हो सकते है । परन्तु क्या यह आश्चर्य की बात नही है कि प्राचीन जितने कानून बनाने वाले हुए उनके सब युगो के नाम मनु शब्द से इतना सादृश्य रखते थे । इसके हमारी समक्ष मे दो कारण हो सकते । एक तो यह कि मनु के उपदेश ही दूसरे देशो में किसी न किसी साधन द्वारा और किसी न किसी रूप में गये हो और संस्कृत नाम मनु का ही उन भाषाओ मे विकृत रूपा हो गया हो । दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि मनु का नाम कानून बनाने के लिए इतना प्रसिद्ध हो गया हो कि वह भारतवर्ष मे व्यक्तिवाचक और अन्य देशो मे जातिवाचक बन गया हो अर्थात अन्य देशीय कानून बनाने वालो ने भी अपने को इसी प्रसिद्ध नाम से सम्बोधित करने मे गोरव समक्षा हो । जैसे शेक्सपियर कहलवाना गौरव समझे । दोनो दशाओं मे मनु की प्रसिद्धि स्वीकार करनी पडती है ।

जो भी संसार में है, उसका नाम व काम परमेश्वर द्वारा नियम किया हुआ है। कहा जाता है कि मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है, इसका हनन उपरोक्त कथन में होता है।

जिज्ञासा- 

  1. इसलिए जो भी संसार में है, उसका नाम व काम परमेश्वर द्वारा नियम किया हुआ है।

कहा जाता है कि मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है, इसका हनन उपरोक्त कथन में होता है।

अमरसिंह आर्य, सी-12, महेश नगर, जयपुर-15

समाधान-

(ग) जिज्ञासा-समाधान 103 में जो समाधान ‘क’ के अन्त में लिखा ‘‘इसलिए जो भी संसार में है, उसका नाम व काम परमेश्वर द्वारा नियम किया हुआ है।’’ इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं कि मनुष्य के कर्म करने की स्वतन्त्रता का हनन हो रहा है। वहाँ मनु का प्रमाण देते हुए कहा था-

सवेषां तु नामानि कर्माणि च पृथक्-पृथक्।

वेदशदेय एवाऽऽदौ पृथक्संस्थाश्च निर्ममे।।

-मनु. 1.21

परमेश्वर ने संसार के सब पदार्थों के नाम व काम निर्धारित कर रखे हैं। सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, गो, अश्व, मनुष्यादि, इनके भिन्न-भिन्न कर्म, जैसे-सूर्य का गर्मी व प्रकाश देना, चन्द्रमा का शीतलता देना, गाय का दूध देना, अश्व का यान के रूप में आदि। गाय-अश्व आदि को हम विद्यालंकार, वेदालंकार करवाना चाहें तो वह होगा ही नहीं, क्योंकि यह काम इनका है ही नहीं। ऐसे ही मनुष्यों के कर्म विद्या अध्ययन करना, अगले नये शुा अथवा अशुभ कर्म करना मनुष्य की स्वतन्त्रता है।

यह स्वतन्त्रता परमेश्वर की ओर से निर्धारित है। इस निर्धारण के आधार पर मनुष्य स्वतन्त्र होकर शुभ अथवा अशुभ कर्म कर सकता है। इस रूप में जिज्ञासा-समाधान 103 के तात्पर्य को समझना चाहिए। अलमिति।

Woman in Indonesia given 25 lashes under Sharia for sex before marriage

The punishment was in accordance with the Sharia law, which forbids having sex outside of wedlock and punishes all offenders publicly.
The woman was robed in white, had her face covered and then made to kneel on a stage where she was punished in front of a crowd. (Photo: AP)

 The woman was robed in white, had her face covered and then made to kneel on a stage where she was punished in front of a crowd. (Photo: AP)

Jakarta: A couple was given between 23 to 25 lashes each in public, with a cane for having sex before marriage in Indonesia.  The woman was robed in white, had her face covered and then made to kneel on a stage where she was punished in front of a crowd.

The punishment was in accordance with the Sharia law, which forbids having sex outside of wedlock and punishes all offenders publicly.

According to a report in Daily Mail, the woman one among the four couples who were punished for the same crime. The sentence was carried out in Banda Aceh in Sumatra island, where the Sharia law is a part of the official legal system. The 25 lashes given to her, is the punishment for women who have sex before marriage.

The man was dressed in white too while he was being punished, but he was allowed to stand through it.

The Sharia law code states that the cane used for punishing the accused must be no thicker than the width of a small finger. As per the code, the punishment varies with the offence. Thieves have one hand removed, while adulterers are pelted with stones and blasphemers are whipped.

source:  http://www.deccanchronicle.com/world/asia/190417/woman-punished-under-sharia-law-for-having-sex-before-marriage-given-25-lashes.html