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विधिहीन यज्ञ और उनका फल: – स्वामी मुनीश्वरानन्द सरस्वती त्रिवेदतीर्थ

स्वामी मुनीश्वरानन्द सरस्वती त्रिवेदतीर्थ आर्यसमाज के शीर्ष विद्वान् रहे हैं। आपके द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘विधिहीन यज्ञ और उनका फल’ यज्ञ सम्बन्धी कुरीतियों पर एक सशक्त प्रहार है। इसी पुस्तक का कुछ अंश यहाँ पाठकों के अवलोकनार्थ प्रकाशित है।           -सम्पादक

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज की मान्यता है कि श्री कृष्ण जी एक आप्त पुरुष थे। यज्ञ के विषय में इस आप्त पुरुष का कहना है कि-

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्,

श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।।

-गीता १७/१३

१. विधिहीनं यज्ञं तामसं परिचक्षते।

२. असृष्टान्नं यज्ञं तामसं परिचक्षते।

३. मन्त्रहीनं यज्ञं तामसं परिचक्षते।

४. अदक्षिणं यज्ञं तामसं परिचक्षते।

५. श्रद्धा विरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।

इन पाँच प्रकार के दोषों में से किसी एक, दो, तीन, चार या पाँचों दोषों से युक्त यज्ञ तामसी कहा जाता है। तामसी कर्म अज्ञानमूलक होने से परिणाम में बुद्धिभेदजनक तथा पारस्परिक राग, द्वेष, कलह, क्लेशादि अनेक बुराइयों का कारण होता है।

प्रस्तुत लेख में हम ‘विधिहीनं यज्ञं तामसं परिचक्षते।’ इस एक विषय पर स्वसामथ्र्यानुसार कुछ विचार प्रस्तुत कर रहे हैं।

१. श्री कृष्ण जी का कहना है कि विधिहीन यज्ञ तामसी होता है। विधि के अनुसार सबसे प्रथम स्थान यजमान का है। जो ‘यष्टुमिच्छति’ यज्ञ करना चाहता है। यज्ञ का सम्पूर्ण संभार तथा व्यय यजमानकर्तृक होता है। अग्नि यजमान की, अग्निशाला (यज्ञशाला) यजमान की, हविद्र्रव्य यजमान का। ऋत्विज् यजमान के। उनका मधुपर्कादि से सत्कार करना तथा उनकी उत्तम भोजन व्यवस्था यजमान कत्र्तृक। उनका शास्त्रानुसार दक्षिणा द्रव्य यजमान का। इतनी व्यवस्था के साथ अग्न्याधान से पूर्णाहुति तक का पूरा अनुष्ठान ऋत्विजों की देखरेख में यजमान करता है। यजमान इस सामथ्र्य से युक्त होना चाहिये। अपरं च पूर्णाहुति के बाद उपस्थित जनता से पूर्णाहुति के नाम से तीन-तीन आहुतियाँ डलवाना पूर्णरूपेण नादानी और अज्ञानता है। इसका विधि से कोई सम्बन्ध न होने से यह भी एक विधिविरुद्ध कर्म है, जिसे साहसपूर्वक बन्द कर देना चाहिए। इस आडम्बर से युक्त यज्ञ भी तामसी होता है। क्या आर्यसमाज संगठन के यजमान तथा ऋत्विक् कर्म कराने वाले विद्वान् इस व्यवस्था तथा यजमान सम्बन्धी इस विधि-विधान के अनुसार यज्ञ करते-कराते हैं। जब पकडक़र लाया हुआ यजमान तथा विधिज्ञान शून्य ऋत्विक् इन बातों को छूते तक नहीं तो केवल विधिविरुद्ध आहुति के प्रकार ‘ओम् स्वाहा’ के लिए ही मात्र आग्रह करना कौनसी बुद्धिमत्ता है। इस उपेक्षित वृत्त को देखकर यही कहा जायेगा कि ऋत्विक् कर्मकत्र्ता सभी विद्वान् इन विधिहीन यज्ञों के माध्यम से केवल दक्षिणा द्रव्य प्राप्त कर अपने आप को धन्य मानते हैं तथा यजमान अपने आप को पूर्णकाम समझता है, विधिपूर्वक अनुष्ठान की दृष्टि से नहीं।

ऐसे यजमान और ऋत्विक् सम्बन्धी-ब्राह्मण में महाराज जनमेजय के नाम से एक उपाख्यान में कहा गया है कि-

‘अथ ह तं व्येव कर्षन्ते यथा ह वा इदं निषादा वा सेलगा वा पापकृतो वा वित्तवन्तं पुरुषमरण्ये गृहीत्वा कर्त (गर्त) मन्वस्य वित्तमादाय द्रवन्ति, एवमेव त ऋत्विजो यजमानं कत्र्तमन्वस्य वित्तमादाय द्रवन्ति यमनेवं विदोयाजयन्ति। अनेवं विदो अभिषेक प्रकारं (अनुष्ठान प्रकारं वा) अजानन्त ऋत्विजोयं क्षत्रियं (यजमान वा) याजयन्ति। तं क्षत्रियं (यजमानं वा) विकर्षन्त्येव विकृष्टमपकृष्टं कुर्वन्त्येव। तत्रेदं निदर्शनमुच्यते।’ – ए.ब्रा. ३७/७

सायण भाष्य:- निषादा नीचजातयो मनुष्या:। सेलगाश्चौरा:। इडाऽन्नं तया सह वत्र्तन्त इति सेडा।

धनिकास्तान् धनापहारार्थं गच्छन्तीति सेलगाश्चौरा:। पाप कृतो हिंसा कारिण:। त्रिविधा: दुष्टा: पुरुषा वित्तवन्तं बहुधनोपेतं पुरुषमरण्यमध्ये गृहीत्वा कत्र्तमन्वस्य कश्मिेश्चिदन्ध कूपादि रूपे गत्र्तेतं प्रक्षिप्य तदीयं धनमपहृत्य द्रवन्ति पलायन्ते। एवमेवानभिज्ञा ऋत्विजो यजमानं नरक रूपं कत्र्तमन्वस्य नरकहेतो दुरनुष्ठानेऽवस्थाप्य दक्षिणारूपेण तदीयं द्रव्यमपहृत्य स्वगृहेषु गच्छन्ति। अनेन निदर्शनेन ऋत्विजामनुष्ठान परिज्ञानाभावं निन्दति।

डॉ. सुधाकर मालवीय कृत हिन्दी अनुवाद:- इस प्रकार (अभिषेक प्रकार को या अनुष्ठान प्रकार को न जानने वाले ऋत्विज् जिस क्षत्रिय के लिए या जिस यजमान के लिए यजन करते हैं, तो वे उस क्षत्रिय वा यजमान का अपकर्ष भी करते हैं, जिस प्रकार नीच जाति के ये निषाद, चोर और (हिंसा करने वाले शिकारी आदि) पापी पुरुष बहुधन से युक्त पुरुष को अरण्य के मध्य पकडक़र (किसी अन्ध कूपादि) गड्ढे में फेंककर उसके धन का अपहरण करके पलायित हो जाते हैं, उसी प्रकार ये अनुष्ठान प्रकार से अनभिज्ञ ऋत्विज् लोग यजमान को नरकरूप (विधिहीन) अनुष्ठान में स्थापित करके दक्षिणारूपी उसके धन का अपहरण करके अपने घर चले जाते हैं।

आर्यसमाज के क्षेत्र में अनुष्ठीयमान यज्ञों में यह पहले प्रकार का विधिहीनता-रूपी दोष सर्वत्र रहता है। इस प्रकार हमारे ये यज्ञ तामसी कोटि के हो जाते हैं। हमारे ये पारायण-यज्ञ जहाँ से चलकर आर्यसमाज में आए हैं, वहाँ पूर्ण रीति से इनका विधि-विधान लिखा हुआ है। हमारे विद्वान् उसे देखना या उधर के तज्ज्ञ विद्वानों से सम्पर्क करना भी उचित नहीं समझते। हमारी स्थिति तो सन्त सुन्दरदास के कथनानुसार-

पढ़े के न बैठ्यो पास अक्षर बताय देतो,

बिनहु पढ़े ते कहो कैसे आवे पारसी।

इस पद्यांश जैसी है। संस्कार विधि यद्यपि हिन्दी भाषा में है, पर फिर भी इसे समझना आसान काम नहीं है। गुरुचरणों में बैठ, पढक़र ही समझा जा सकता है। हमारा पुरोहित समुदाय ऐसा करना आवश्यक नहीं समझता तो फिर विधिपूर्वक अनुष्ठान कैसे हो सकते हैं और कैसे कर्मकाण्ड में एकरूपता आ सकती है।

ये वेद पारायण-यज्ञ (संहिता स्वाहाकार होम) जहाँ से हमने लिए हैं, वहाँ इनके अनुष्ठान के लिए विधिविधान का उल्लेख करते हुए अपने समय के ब्राह्मण, आरण्यक, श्रौत और गृह्य सूत्रों के उद्भट विद्वान् स्वर्गीय श्री पं. अण्णा शास्त्री वारे (नासिक) अपने ग्रन्थ ‘संहिता स्वाहाकार प्रयोग प्रदीप’ में लिखते हैं कि-

‘तत्र कात्यायनप्रणीतशुक्लयजुर्विधान सूत्रं, सर्वानुक्रमणिकां च अनुसृत्य संहितास्वाहाकार होमे प्रतिऋग्यजुर्मन्त्रे आदौ प्रणव: अन्ते स्वाहाकारश्च। मध्ये यथाम्नायं मन्त्र:। प्रणवस्य स्वाहाकारस्य च पृथक् विधानात् मन्त्रेण सह सन्ध्याभाव:। मन्त्र मध्ये स्वाहाकारे सति तत्रैवाहुति: पश्चान्मन्त्र समाप्ति:। न पुनर्मन्त्रान्ते स्वाहोच्चारणमाहुतिश्च।।  – पृ. २४०

अर्थ:- संहिता स्वाहाकार होम विषय में कात्यायन प्रणीत शुक्ल यजुर्विधान सूत्र और सर्वानुक्रमणिका का अनुसरण करते हुए संहिता स्वाहाकार होम में प्रत्येक ऋग्यजुर्मन्त्र के आदि में प्रणव (ओम्) तथा अन्त में स्वाहाकार, मध्य में संहिता में पढ़े अनुसार मन्त्र। मन्त्र और स्वाहाकार के पृथक् विधान होने से इनकी मन्त्र के साथ सन्धि नहीं होती। मन्त्र के बीच में स्वाहाकार आने पर वहीं आहुति देकर पश्चात् मन्त्र समाप्त करना चाहिए। फिर से मन्त्र के अन्त में स्वाहाकार का उच्चारण कर आहुति नहीं देनी चाहिये।

प्रणव और स्वाहाकार का मन्त्र से पृथक् विधान होने से मन्त्रान्त में ओम् स्वाहा उच्चारण कर आहुति देना नहीं बनता। कात्यायन भिन्न अन्य सभी ऋषि-महर्षियों का भी ऐसा ही मत है। उदाहरणस्वरूप प्रस्तुत प्रमाण का अवलोकन कीजिए-

सर्व प्रायश्चित्तानि जुहुयात्

स्वाहाकारान्तैर्मन्त्रैर्न चेत् मन्त्रे पठित:।

– आश्वलायन श्रौतसूत्र १/११/१०

आत्मनिवेदन: दिनेश

आचार्य धर्मवीर जी नहीं रहे। यह सुनना और देखना अत्यंत हृदय विदारक रहा है। आचार्य धर्मवीर जी देशकाल के विराट मंच पर महर्षि दयानन्द के विचारों के अद्वितीय कर्मवीर थे। महर्षि दयानन्द के विचारों के विरुद्ध प्रतिरोध की उनकी क्षमता जबर्दस्त थी। वैचारिक दृष्टि से तात्विक चिन्तन का सम्प्रेषण सहज और सरल था, यही उनका वैशिष्ट्य था, जो उन्हें अन्य विद्वानों से अलग खड़ा कर देता है। वे जीवनपर्यन्त संघर्ष-धर्मिता के प्रतीक रहे। ‘परोपकारी’ के यशस्वी सम्पादक के रूप में उन्होंने वैदिक सिद्धान्त ही नहीं, अपितु समसामयिक विषयों पर अपने विचारों को खुले मन से प्रकट किया। वे सत्य के ऐसे योद्धा थे जो महर्षि दयानन्द द्वारा प्रतिपादित पथ के सशक्त प्रहरी रहे और ऐसा मानदण्ड स्थापित कर गये, जो अन्यों के लिये आधारपथ सिद्ध होगा। मानवीय व्यवहारों के प्रति वे सिद्धहस्त थे। भले ही अपने परिवार पर केन्द्रीभूत न हुये हों, परन्तु समस्त आर्यजगत् की आदर्श परोपकारिणी सभा के विभिन्न प्रकल्पों के प्रति वे सर्वात्मना समर्पित रहे।

उन्होंने ‘परोपकारी’ का सम्पादन करते हुए जिन मूल्यों, सिद्धान्तों का निर्भय होकर पालन किया, जिस शैली और भाषा का प्रयोग किया, जिन तथ्यों के साथ सिद्धान्तों को पुष्ट किया, वे प्रभु की कृपा से ही संभव होते हैं। मैं विश्वास दिलाता हँू कि कीर्तिशेष आचार्य धर्मवीर जी ने सम्पादन का जो शिखर निर्धारित किया है वहाँ तक पहुँचना यद्यपि असंभव है तथापि केवल भक्ति-भावना से मैं चलने का प्रयास भी कर लूँ तो भी मेरे लिए परमशुभ हो सकेगा। प्रभु मुझे इसकी शक्ति दे।

‘परोपकारी’ के पाठक विगत लगभग ३३ वर्षों से अमूल्य विरासत से परिपूर्ण तार्किक विश्लेषण से सम्प्रक्त सम्पादकीय पढऩे के आदी हुए हैं, उस स्तर को बनाये रखना यद्यपि मेरे लिये दुष्कर है, लेकिन पाठक हमारे मार्गदर्शक हैं, मैं आचार्य धर्मवीर जी के द्वारा निर्धारित पथ का पथिक मात्र हो सकूं, यही मेरे लिये परम सौभाग्य की बात होगी।

आज चुनौतियाँ हैं, दबाव हैं, सिद्धान्तों के प्रति मतवाद है, फिर भी हमें इन सभी से सामना करना है।

आचार्य धर्मवीर जी ने महर्षि दयानन्द के चिन्तन को सम्पूर्ण रूप में स्वीकार कर उनकी उत्तराधिकारिणी परोपकारिणी सभा की जीवन्तता में अद्वितीय साहस का परिचय दिया। राष्ट्र की आकंाक्षा को दृष्टिगोचर रखते हुए वे अघोषित आर्यनेता के रूप में आर्यजगत् के सर्वमान्य नेतृत्वकर्ता बने। वैदिक संस्कृति और सभ्यता के माध्यम से उन्होंने सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक मूल्यों को समृद्ध ही नहीं किया अपितु अपने व्यक्तित्व से, लेखनी से, वक्तृत्वकला से राष्ट्रीय तत्वों की अग्रि को उद्बुध किया।

आचार्य डॉ. धर्मवीर कुशल संगठनकत्र्ता थे, उन्होंने दृढ़ इच्छाशक्ति और समर्पण से जहाँ परोपकारिणी सभा को आर्थिक स्वावलंबन दिया, वहीं सृजनात्मक अभिव्यक्ति से वैदिक सिद्धान्तों के विरोधियों को भी वैदिक-दर्शन से आप्लावित किया। आचार्य धर्मवीर ने जीवनपर्यंत उत्सर्ग करने का ही कार्य किया, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से उन्होंने स्वयं को परिपूर्ण किया है। वैदिक पुस्तकालय में नित्य नूतन ग्रन्थों का प्रकाशन, वितरण, नवलेखन को प्रोत्साहन, वैदिक साहित्य के अध्येताओं को वैदिक साहित्य पहुँचाना जैसे पुनीत कार्य उनके कत्र्तृत्व के साक्ष्य परिणाम हैं। उन्होंने सारस्वत साधना से विभिन्न विद्वानों, संन्यासियों के व्यक्तिगत पुस्तकालयों को मँगवाकर वैदिक पुस्तकालय को समृद्ध किया है।

आचार्य डॉ. धर्मवीर ने महर्षि दयानन्द के हस्तलेखों, उनके द्वारा अवलोकित ग्रन्थों एवं उनके पत्रों इत्यादि का डिजिटलाईजेशन करने का अभूतपूर्व कार्य किया ताकि आगामी पीढ़ी को उस अमूल्य धरोहर को संरक्षित कर सौंपा जा सके। आर्यसमाज के प्रसिद्ध चिन्तकों को निरन्तर प्रोत्साहन कर लेखन के लिए सहयोग प्रदान करने का उन्होंने जो महनीय कार्य किया है, वह स्तुत्य है।

वैदिक चिन्तन के अध्येता आचार्य धर्मवीर जी ने परोपकारी पत्रिका को पाक्षिक बनाकर उसकी संख्या को १५ हजार तक प्रकाशित कर, देश-विदेश में पहुँचाकर एक अभिनव कार्य संपादित किया। उनकी भाषा में सहज प्रवाह और ओज था। वैदिक विचारों के प्रति वे निर्भीक और ओजस्वी वक्ता के रूप में हमेशा याद किये जाएंगे। उनकी मान्याता थी कि असत्य के प्रतिकार में निर्भय होकर अपने विचारों को व्यक्त करने का अधिकार जन्मजात है। लेकिन संवादहीनता उन्हें स्वीकार्य नहीं थी। यही कारण था कि वे अजातशत्रु कहलाते थे। परोपकारी के लेखों और संपादकीय के द्वारा आर्यजगत् में उनकी प्रासंगिकता निरन्तर प्रेरणादायी बनी रही। सहज और सरल शब्दों में वैदिक सिद्धान्तों के प्रति कितने ही बड़े व्यक्ति की आलोचना करने में वे कभी भयभीत नहीं हुए। उन्होंने भारत के समस्त विश्वविद्यालयों के कुलपतियों व कुलसचिवों को परोपकारी पत्रिका नि:शुल्क पहुँचाने का अभिनव कार्य किया।

उन्होंने देवभाषा संस्कृत को जिया और अपने परिवार से लेकर समस्त आर्यजनों को भी आप्लावित किया। यह कहना और अधिक प्रासंगिक होगा कि अष्टाध्यायी-पद्धति के अध्ययन और अध्यापन को महाविद्यालय में ही नहीं अपितु ऋषिउद्यान में संचालित गुरुकुल में पाणिनी-परम्परा का निर्वहन करने का उन्होंने अप्रतिम कार्य किया।

आचार्य धर्मवीर जी ऋषिउद्यान मेें विभिन्न भवनों के नवनिर्माण के प्रखर निर्माता थे, जिन्होंने देश में निरन्तर भ्रमण करते हुए धन का संग्रह कर विद्यार्थियों, साधकों, वानप्रस्थियों और संन्यासियों के लिए श्रेष्ठ  आवास की सुविधा प्रदान की, ताकि ऋषिउद्यान में निरन्तर आध्यात्मिक जीवन का संचार होता रहे एवं चर्चा का कार्य संपादित होता रहे। वे स्पष्ट वक्ता थे। उन्हें कितनी ही बार विभिन्न महाविद्यालयों के प्राचार्य का पद, चुनाव लडऩे, पुरस्कार प्राप्त करने हेतु आग्रह किया गया, लेकिन उनके लिए ये पद ग्राह्य नहीं थे। उनके लिए महर्षि दयानन्द का अनुयायी होना ही सबसे बड़ा पद था।

आचार्य डॉ. धर्मवीर जी, आचार्य की प्रशस्त परम्परा की साक्षात् प्रतिमूर्ति थे। वे अकेले ही अन्याय का प्रतिकार करने में समर्थ थे। वे उन मतवादियों के लिए कर्मठ योद्धा थे, जो भारत विरोधी मत रखते थे। उन्हें यह स्वीकार नहीं था कि लोग क्या कहेंगे अपितु उन्हें यह स्वीकार्य था कि आर्ष परम्परा क्या है। समकालीन प्रख्यात विचारकों, राजनीतिक व्यक्तियों, विद्वानों का वे व्यक्तिश: आदर करते थे, परन्तु वैदिक विचारधारा के विरुद्ध लोगों का खण्डन करने में वे कोताही नहीं बरतते थे। उन्होंने परोपकारिणी सभा के विकल्पों का संवर्धन किया और परोपकारिणी सभा की यशकीर्ति को फैलाने में विशेष योगदान किया। आलोचना और विरोधों का धैर्यपूर्वक सामना करना उनकी विशेषता थी।

वे दिखने में कठोर थे, लेकिन हृदय से अत्यन्त सरल थे। चाहे आचार्य वेदपाल सुनीथ हों या श्री नरसिंह पारीक या डॉ. देवशर्मा या सहायक कर्मचारी सुरेश शेखावत, मैंने ऐसे दृढ़निश्चयी स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की आँखों में उन सबके लिए अश्रुकणों को बहते देखा है। आर्थिक सहयोग करना, बिना किसी को बताये, यह उनकी मानवीय श्रेष्ठता का अद्वितीय उदाहरण है।

ऐसे चिन्तक, विशेषताओं के आगार, वैदिक चिन्तन के सजग प्रहरी तथा विचारों के विरल विश्लेषक आचार्य डॉ. धर्मवीर जी की संपादकीय परम्परा के कार्य का प्रारम्भ करते हुए मैं उन्हें जिन्होंने अनादि ब्रह्म की उपासना के साथ राष्ट्रचेता महर्षि दयानन्द के विचार और आचार से कभी विमुख नहीं हुए, को शत्-शत् नमन करता हुआ उस पथ का अनुयायी बनने का प्रयास करूं, ऐसा विश्वास दिलाता हँू।

आपका

– दिनेश

अब स्मृतियाँ ही शेष: -साहब सिंह ‘साहिब’

पक्षी पिंजड़ा छोडक़र चला गया कोई देश,

डॉ. धर्मवीर की अब स्मृतियाँ ही शेष।

स्मृतियाँ ही शेष नाम इतिहास बन गया,

लेकिन हम लोगों में यह दुख खास बन गया।

लेकिन हमको याद रहे हम जिस पथ के हैं अनुगामी,

देह स्वरूप मरण धर्मा है आत्मा तत्व अपरिणामी।

मन में उनकी ले स्मृतियां याद करें अवदान को,

आर्य समाजी इस योद्धा के ना भूलें बलिदान को।

और सब मिलकर यही प्रार्थना सदा करें भगवान् से,

जो अनवरत् चला करता है चलता जाये शान से।

उनके लक्ष्यों को धारण कर ऐसा इक परिवेश बने,

वेदभक्त हो सकल विश्व यह गुरु फिर भारत देश बने।

कृतज्ञता ज्ञापन

-आनन्दप्रकाश आर्य

जिन क्षेत्रों में आर्य समाज शिथिल था सपने टूट रहे थे।

धर्मवीर जी के उपदेशों से अब वहाँ अंकुर फूट रहे थे।।

समाचार मिला ये दु:खद अचानक कि जहाँ से धर्मवीर गये।

ये शब्द सुने जिस आर्य ने उसका ही कलेजा चीर गये।।

परोपकारिणी सभा में छटा बिखेरी ज्योत्स्नापुंज चमत्कारी थे।

उत्तराधिकारिणी सभा में ऋषि के सच में उत्तराधिकारी थे।।

आर्यसमाज का यशस्वी योद्धा महा विद्वान् रणधीर गया।

दयानन्द के तरकश में से मानो एक अमूल्य तीर गया।।

देह चली गई तो क्या घुल गये हो सबकी आवाजों में।

हे धर्मवीर! तुम रहोगे जिन्दा हर जगह आर्यसमाजों में।।

ब्रह्मा : इब्राहीम : कुरान : बाइबिल: – पं. शान्तिप्रकाश

विधर्मियों की ओर से आर्य हिन्दू जाति को भ्रमित करने के लिये नया-नया साहित्य छप रहा है। पुस्तक मेला दिल्ली में भी एक पुस्तिका के प्रचार की सभा को सूचना मिली है। सभा से उत्तर देने की माँग हो रही है। ‘ज्ञान घोटाला’ पुस्तक के साथ ही श्रद्धेय पं. शान्तिप्रकाश जी का यह विचारोत्तेजक लेख भी प्रकाशित कर दिया जायेगा। पाठक प्रतिक्षा करें। पण्डित जी के इस लेख को प्रकाशित करते हुए सभा गौरवान्वित हो रही है। – राजेन्द्र ‘जिज्ञासु’

हमारे शास्त्र ब्रह्मा को संसार का प्रथम गुरु मानते हैं। जैसा कि उपनिषदों में लिखा है कि

यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै।

परमात्मा ब्रह्मा को पूर्ण बनाता और उसके लिये (चार ऋषियों द्वारा) वेदों का ज्ञान देता है। अन्यत्र शतपथादि में भी अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा पर ऋग्यजु: साम और अथर्व का आना लिखा है। सायण ने अपने ‘ऋग्वेदोपोद्घात’ में इन चार ऋषियों पर उन्हीं चार वेदों का आना स्वीकार किया है। वेदों में वेदों को किसी एक व्यक्ति पर प्रकट होना स्वीकार नहीं किया। देखिये-

यज्ञेन वाच: पदवीयमायन्तामन्वविन्दनृषिषु प्रविष्टाम्।

– ऋ. मण्डल १०

इस मन्त्र में ‘वाच:’ वेदवाणियों के लिये बहुवचन है तथा ‘ऋषिषु प्रविष्टाम्’ ऋषियों के लिये भी बहुवचन आया है।

चार वेद और चार ऋषि- ‘चत्वारि वाक् परिमिता पदानि’ चार वेद वाणियाँ हंै, जिनके अक्षर पदादि नपे-तुले हैं। अत: उनमें परिवर्तन हो सकना असम्भव है, क्योंकि यह ईश्वर की रचना है।

देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति।

– अथर्व. १०

परमेश्वर देव के काव्य को देख, जो न मरता है और पुराना होता है। सनातन ईश्वर का ज्ञान भी सनातन है। शाश्वत है।

अपूर्वेणेषिता वाचस्ता वदन्ति यथायथम्।

– अथर्व. १०-७-१४

संसार में प्रथम उत्पन्न हुए ऋषि लोग ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद तथा पृथ्वी के वैज्ञानिक रहस्यों को प्रकट करने में समर्थ अथर्ववेद का प्रकाश ईश प्रेरणा से करते हैं।

प्रेणा तदेषां निहितं गुहावि:।। – ऋ. १०-७१-१

इन ऋषियों की आत्म बुद्धि रूपी गुहा में निहित वेद-ज्ञान-राशि ईश प्रेरणा से प्रकट होती है। इस प्रसिद्ध मन्त्र में भी ऋषियों के लिए ‘एषां’ का प्रयोग बहुवचनान्त है।

अत: उपनिषद् के प्रथम प्रमाण का अभिप्राय यह हुआ कि ब्रह्मा के लिये वेदों का ज्ञान ऋषियों द्वारा प्राप्त हुआ, वह स्पष्ट है।

अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा ने चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान जिन ऋषियों को दिया, उसमें ब्रह्मा ने सबसे प्रथम मनुष्यों में वेद-धर्म का प्रचार किया और धर्म की व्यवस्था तथा यज्ञों का प्रचलन किया। अत: ब्रह्माजी संसार के सबसे पहले संस्थापक गुरु माने जाने लगे। क्योंकि वेद में ही लिखा है कि-

ब्रह्मा देवानां पदवी:। – ऋग्वेद ९-९६-६

-ब्रह्मा विद्वानों की पदवी है। बड़े-बड़े यज्ञों में चार विद्वान् मन्त्र-प्रसारण का कार्य करते हैं। उनमें होता, उद्गाता, अध्वर्यु और ब्रह्मा अपने-अपने वेदों का पाठ करते हुए ब्रह्मा की व्यवस्था में ही कार्य करते हैं, यह प्राचीन आर्य मर्यादा इस मन्त्र के आधार पर है-

ऋचां त्व: पोषमास्ते पुपुष्वान्

गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु।

ब्रह्मा त्वो वदति जातिवद्यां

यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उत्व:। – ऋग्. १०-७१-११

ऋग्वेद की ऋचाओं की पुष्टि होता, सामकी, शक्तिदात्री ऋचाओं की स्तुति उद्गाता, यजु मन्त्रों द्वारा यज्ञमात्रा का अवधारण अध्वर्यु द्वारा होता है और यज्ञ की सारी व्यवस्था तथा यज्ञ कराने वाले होतादि पर नियन्त्रण ब्रह्मा करता है।

मनु-धर्मशास्त्र में तो स्पष्ट वर्णन है-

अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम्।

दुदोह यज्ञ सिद्धयर्थमृग्यजु: सामलक्षणम्।

-मनु. १/२३

-ब्रह्माजी ने अग्नि, वायु, आदित्य ऋषियों से यज्ञ सिद्धि के लिये ऋग्यजु:साम का दोहन किया।

मनु के इस प्रमाण में अथर्ववेद का उल्लेख इसलिये नहीं किया गया कि यज्ञ सिद्धि में अथर्ववेद तो ब्रह्मा जी का अपना वेद है।

वेदत्रयी क्यों- जहाँ-जहाँ यज्ञ का वर्णन होगा, वहाँ-वहाँ तीन वेदों का वर्णन होगा तथा चारों वेदों का विभाजन छन्दों की दृष्टि से भी ऋग्यजुसाम के नाम से पद्यात्मक, गद्यात्मक और गीतात्मक किया गया है। अत: ज्ञानकर्मोपासना-विज्ञान की दृष्टि से वेद चार और छन्दों की दृष्टि से वेद-त्रयी का दो प्रकार का विभाजन है। कुछ भी हो वेद, शास्त्र, उपनिषद् तथा इतिहास के ग्रन्थों में ब्रह्मा को प्रथम वेद-प्रचारक, संसार का अगुवा या पेशवा के नाम से प्रख्यात माना गया है।

यहूदी, ईसाई और मुसलमान संस्कार-वशात् मानते चले आए हैं, जैसा कि उनकी पुस्तकों से प्रकट है।

कुर्बानी का अर्थ- ब्रह्मा यज्ञ का नेता अगुआ या पेशवा है। यज्ञ सबका महोपकारक होने से देवपूजा, संगतिकरण दानार्थक प्रसिद्ध है। इसी को सबसे बड़ा त्याग और कुर्बानी माना गया है। किन्तु वाममार्ग प्रचलित होने पर महाभारत युद्ध के पश्चात् पशु-यज्ञों का प्रचलन भी अधिक-से-अधिक होता चला गया। इससे पूर्व न कोई मांस खाता और न यज्ञों के नाम से कुर्बानी होती थी।

बाईबल के अनुसार भी हजरत नूह से पूर्व मांस खाने का प्रचलन नहीं था, जैसा कि वाचटावर बाईबल एण्ड टे्रक्स सोसायटी ऑफ न्यूयार्क की पुस्तक ‘दी ट्रुथ वेट सीड्स ईटनैल लाईक’ में लिखा है।

यहूदियों और ईसाईयों के अनुसार मांस की कुर्बानी खूदा के नाम से नूह के तूफान के साथ शुरु हुई है। तब इसको हजरत इब्राहीम के नाम से शुरू किया गया कि इब्राहीम ने खुदा के लिये अपने लडक़े की कुर्बानी की, किन्तु खुदा ने लडक़े के स्थान पर स्वर्ग से दुम्बा भेजा, जिसकी कुर्बानी दी गई। स्वर्ग से दुम्बा लाने की बात कमसुलम्बिया में लिखी है।

यहूदी कहते हैं कि हजरत इब्राहीम ने इसहाक की कुर्बानी की थी, जो मुसलमानों के विचार से हजरत इब्राहीम की पत्नी एरा से उत्पन्न हुआ था। किन्तु मुसलमानों का विश्वास है कि हजरत इब्राहीम की दासी हाजरा से उत्पन्न हुए हजरत इस्माईल की कुर्बानी दी गयी थी, जिसके बदले में जिब्राइल ने बहिश्त से दुम्बा लाकर कुर्बानी की रस्म पूरी कराई।

इसलिये मुसलमान भी हजरत इब्राहीम की स्मृति में पशुओं की कुर्बानी देना अपना धार्मिक कत्र्तव्य समझते हैं। परन्तु भूमि के पशुओं की कुर्बानी की आवश्यकता खुदा को होती तो बहिश्त से दुम्बा भेजने की आवश्यकता न पड़ती। दुम्बा तो यहीं धरती पर मिल जाता।

बाईबल के अनुसार तो पशुबलि की प्रथा हजरत इब्राहीम के बहुत पहले नूह के युग में आरम्भ हुई है। जैसा कि पीछे ‘वाच एण्ट टावर’ का प्रमाण दिया जा चुका है। किन्तु वास्तव में ब्रह्मा मनु से पूर्व हुए हैं। मनु को ही नूह माना जाता है।

ब्रह्मा ही इब्राहीम- हाफिज अताउल्ला साहब बरेलवी अनुसार हजरत इब्राहीम तो ब्रह्मा जी का ही नाम है, क्योंकि वेदों में ब्रह्मा और सरस्वती, बाईबिल में इब्राहम हैं और सर: तथा इस्लाम में इब्राहीम सर: यह वैयक्तिक नाम हैं, जो समय पाकर रूपान्तरित हो गये। सर: सरस्वती का संक्षेप है। आर्य-जाति में वती बोलना, न बोलना अपनी इच्छा पर निर्भर है जैसा कि पद्मावती की पद्मा और सरस्वती को सर: (य सरस) बोला जाता है, जो शुद्ध में संस्कृत का शब्द है। सरस्वती शब्द वेदों में कई बार आया है। जैसे-

चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनां।

यज्ञं दधे सरस्वती। – ऋ. १-३-११

सत्य-वक्ता, धर्मात्मा-द्विज, ज्ञानयुक्त लोगों को धर्म की प्रेरणा करती हुई, परोक्ष पर विश्वास रखने वाले सुमतिमान् लोगों को शुभ मार्ग बताती हुई, सरस्वती-वेद वाणी यज्ञो (पंच महायज्ञादि) प्रस्थापना करती है।

अत: स्पष्ट है कि सरस्वती वेद-वाणी को कहते हैं और ब्रह्मा चार वेद का वक्ता होने से ही पौराणिकों में चतुर्मुख प्रसिद्ध हो गया है।

चत्वारो वेदा मुखे यस्येति चतुर्मुख:।

लुप्त बहुब्रीहि समास का यह एक अच्छा उदाहरण है। चारों वेद जिसके मुख में अर्थात् कण्ठस्थ हंै। चारों वेदों में निपुण विद्वान् का नाम ही ब्रह्मा है। ब्रह्मा विद्वानों की एक उच्च पदवी है जो सृष्टि के आरम्भ से अब तक चली आ रही है और जब तक संसार है, यह पदवी मानी जाती रहेगी। अनेकानेक ब्रह्मा संसार में हुए हैं और होंगे।

अब भी यज्ञ का प्रबन्धक ब्रह्मा कहलाता है। ब्रह्मा का वेदपाठ और यज्ञ के साथ विशेष सम्बन्ध है। वेदवाणी को सरस्वती कहा गया है।

यहूदी, ईसाई और मुसलिम मतों में सरस्वती का सर: और ब्रह्मा का इब्राम बन इब्राहीम हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है।

काबा-यज्ञस्थली- ब्रह्मा यज्ञ का आदि प्रवर्तक है। वेद, कुरान और बाईबल इसमें एक मत है। यज्ञशाला चौकोर बनाई जाती है। इसीलिये मक्का में काबा भी चौकोर है, जो इब्राहीम ने बनवाया था। यह यज्ञीय स्थान है। यज्ञ में एक वस्त्र जो सिला न हो, पहनने की प्राचीन प्रथा है। मुसलमानों ने मक्का के हज्ज में इस प्रथा को स्थिर रखा हुआ है। यज्ञ को वेद में अध्वर कहा गया है।

ध्वरति हिंसाकर्म तत्प्रतिषेध:।

अध्वर का अर्थ है, जिसमें हिंसा न की जाय। इसलिये मुसलमान हाजी हज्ज के लिये एहराम बांध लेने के पश्चात् हिंसा करना महापाप मानते हैं।

वैदिक धर्मियों में वाममार्ग युग में हिंसा का प्रचलन हुआ। वाममार्ग के पश्चात् ही वैदिक-धर्म का ह्रास होकर बौद्ध, जैन, यहूदी, ईसाई, इस्लाम आदि मतों का प्रचलन हुआ है। यज्ञों में पशु हत्या और कुर्बानी में पशु बलि की प्रथा भी वाममार्ग=उल्टा मार्ग- ही माना गया है, जो वास्तव में सच्चे यज्ञों अथवा सच्ची कुर्बानी का मार्ग नहीं है।

नमस्=नमाज- आर्यों के पाँच यज्ञों में नमस्कार का प्रयोग हुआ, नमाज नमस् का रूपान्तर है। पाँच नमाज तथा पाँच इस्लाम के अकान पंचयज्ञों के स्थानापन्न हंै:-

कुरान में पंचयज्ञ- १. ब्रह्म यज्ञ- दो समय सन्ध्या- नमाज तथा रोजा कुरान के हाशिया पर लिखा है कि पहिले दो समय नमाज का प्रचलन था। देखो फुर्कान आयत ५

२. देव यज्ञ- हज्ज तथा जकात या दान पुण्य।

३. बलिवैश्वदेवयज्ञ- कुर्बानी पशुओं की नहीं, किन्तु पशु-पक्षी, दरिद्रादि को बलि अर्थात् भेंट देना ही सच्ची कुर्बानी है। धर्म के लिये जीवन दान महाबलिदान है।

४-५. पितृ यज्ञ तथा अतिथि यज्ञ- इस प्रकार आर्यों के पंच यज्ञ और इस्लाम के पाँच अरकानों का कुछ तो मेल है ही। इस्लाम के पाँच अरकार नमाज, जकात, रोजा, हज्ज और कुर्बानी हैं।

कुर्बानी शब्द कुर्व से निकला, जिसके अर्थ समीप होना अर्थात् ईश्वरीय गुणों को धारण कर ईश्वर का सान्निध्य प्राप्त करना है, इन अर्थों में पशु हत्या तो हिन्दुओं के पशुयज्ञ की भाँति विकृति का परिणाम मात्र है। वेदों में यज्ञ को अध्वर कहा है, जिसका अर्थ है- हिंसारहित शुभकर्म इसी प्रकार कुर्बानी शब्द में भी हिंसा की भावना विद्यमान नहीं।

ब्रह्मा ने वेदों के आधार पर यज्ञों का प्रचलन किया तथा यज्ञों में सबसे बड़े विद्वान् को आर्यों में ब्रह्मा की पदवी से विभूषित किया जाता है। अत: ब्रह्मा शब्द रूढि़वादी नहीं। अनेक ब्रह्मा हुए हैं और होंगे भी। किसी समय फिलस्तीन में ब्रह्मा को इब्राम और अरब देशों में इब्राम का इब्राहीम शब्द रूढ़ हो गया।

वैदिक-ज्ञान को वेद में सरस्वती कहा है, लोक में पद्मावती को केवल पद्मा सरस्वती को केवल सर: कहने की प्रथा का उल्लेख कर चुके हैं। अत: पुराणों में ब्रह्मा और सरस्वती तथा सर: एवं इस्लाम में भी इब्राहीम और सर: शब्दों का प्रचलन होने से सिद्ध होता है कि दोनों शब्द वेदों के अपभ्रंश मात्र होकर इन मतों में विद्यमान हैं।

कुरान शरीफ में लिखा है कि हजरत साहिब फरमाते हैं-

१. लोग कहते हैं कि यहूदी या ईसाई हो जाओ, किन्तु में तो इब्राहीम के धर्म को मानता हूँ, जो एक तरफ का था और मूर्ति-पूजक न था। परमात्मा का सच्चा उपासक था। -सूरा: वकर आयत १३५

२. ईश्वर ने ब्रह्माहीम संसार का इमाम= [धर्म का नेता] बनाया। सूरा बर, आयत १२४

३. ऐ लोगो! इब्राहीम के सम्बन्ध में क्यों झगड़ते हो और इब्राहीम पर तौरेत व इन्जील नहीं उतरी, किन्तु यह तौरेत व इन्जील तो उनके बहुत पीछे की हैं। पर तुम समझदारी क्यों नहीं करते।

इबराहीम न यहूदी था, न ईसाई, किन्तु एक ओर का मुस्लिम था वा मुशरिक मूर्ति-पूजक न था अनेक-ईश्वरवादी भी न था- अल इमरान, आयत ६४.६६

उस इब्राहीम के धर्म को मानो जो एक निराकार का उपासक था और मूर्ति-पूजक न था। -अल, इमरान, आयत ९४

कुरान शरीफ में हिजरत इब्राहीम के यज्ञ मण्डप का नाम काबा शरीफ रखा है। काबा चौकाने यज्ञशाला की भाँति होने से भी प्रमाणित है कि किसी युग में यह अरब के लोगों का यज्ञीय स्थान था, जहाँ हिंसा करना निषिद्ध था, जिसकी परिक्रमा भी होती थी और उपासना करने वालों के लिये उसे हर समय पवित्र रखा जाता था। इसकी आधारशिला इब्राहीम और इस्माईल ने रखी थी। देखो- सूरा बकर, आयत १२५ से १२७

कुरान शरीफ में स्पष्ट लिखा है कि कुर्बानी आग से होती थी। अल इमरान आयत १, २, खूदा की सुन्नत कभी तबदील नहीं होती। सूरा फतह, आयत २४

मूसा को पैगम्बरी आग से मिली। जहाँ जूती पहन के नहीं जाया जाता। सूरा त्वाह, आयत ११-१३

खुदा को कुर्बानी में पशु मांस और रक्त स्वीकार्य नहीं। खुदा तो मनुष्यों से तकवा अर्थात् पशु-जगत् पर दया-परहेजगारी-शुभाचार-सदाचार स्व्ीकारता है। सूरा हज्ज, आयत १७

‘‘हज्ज और अमरा आवश्यक कर लेना एहराम हैं। एहराम यह कि नीयत करे आरम्भ करने की और वाणी से कहे लव्वैक। पुन: जब एहराम में प्रविष्ट हुआ तो स्त्री-पुरुष समागम से पृथक् रहें। पापों और पारस्परिक झगड़ों से पृथक् रहें। बाल उतरवाने, नाखून कटवाने, सुगन्ध लेप तथा शिकार करने से पृथक् रहें। पुरुष शरीर पर सिले वस्त्र न पहिने, सिर न ढके। स्त्री वस्त्र पहिने, सिर ढके, किन्तु मुख पर वस्त्र न डाले। -मौजुहुल्कुरान, सूरा बकर, आयत १९७’’

इस समस्त प्रमाण भाग का ही यही एक अभिप्राय है कि हज्ज में हिंसा की गुंजाइश नहीं। कुर्बानी – कुर्वे खुदा अर्थात् ईश्वरीय सन्निध्य प्राप्ति का नाम हुआ। अत: कुरान-शरीफ में पशुओं की कुर्बानी की मुख्यता नहीं है। ऐसा कहीं नहीं लिखा कि जो पशुहत्या न करे, वह पापी है। हाँ, यह तो लिखा है कि खुदा को पशुओं पर दया करना ही पसन्द है, क्योंकि वह खून का प्यासा नहीं और मांस का भूखा नहीं। -सूरा जारितात, आयत ५६-५८

कुछ स्थानों पर मांस खाने का वर्णन है, किन्तु वह मोहकमात=पक्की आयतें न होकर मुतशावियात=संदिग्ध हैं अथवा उनकी व्याख्या यह है कि आपत्ति काल में केवल जीवन धारण के लिये अत्यन्त अल्प-मात्रा में प्रयुक्त करने का विधान है। देखो-सूरा बकर, आयत १७३

अत: मुस्लिम संसार से प्रार्थना है कि कुरान शरीफ में मांस न खाना पाप नहीं है। खाना सन्दिग्ध कर्म और त्याज्य होने से निरामिष होने में ही भलाई है, यही दीने- इब्राहीम और ब्रह्मा का धर्म है, जिस पर चलने के लिये कुरान शरीफ में बल दिया है।

इसी आधार पर आर्य मुस्लिम एकता तो होगी ही, किन्तु राष्ट्र में हिन्दू मुसलमानों के एक कौम होने का मार्ग भी प्रशस्त हो जायेगा। परमात्मा करे कि ऐसा ही हो।

महर्षि दयानन्दाष्टकम्

टिप्पणी- महामहोपाध्याय श्री पं. आर्यमुनि जी ने यह अष्टक महर्षि का गुणगान करते हुए अपने ग्रन्थ आर्य-मन्तव्य प्रकाश में दिया था। कभी यह रचना अत्यन्त लोकप्रिय थी। ११वीं व १२वीं पंक्ति ऋषि के चित्रों के नीचे छपा करती थी। पूज्य आर्यमुनि जी ने ऋषि जीवन का पहला भाग पद्य में प्रकाशित करवा दिया था, इसे पूरा न कर सके। यह ऐतिहासिक रचना परोपकारी द्वारा आर्य मात्र को भेंट है। – राजेन्द्र ‘जिज्ञासु’

वेदाभ्यासपरायणो मुनिवरो वेदैकमार्गे रत:।

नाम्ना यस्य दया विभाति निखिला तत्रैव यो मोदते।

येनाम्नायपयोनिधेर्मथनत: सत्यं परं दर्शितम्।

लब्धं तत्पद-पद्म-युग्ममनघं पुण्यैरनन्तैर्मया।।

भाषाछन्द-सवैया

१.            उत्तम पुरुष भये जग जो, वह धर्म के हेतु धरें जग देहा।

धन धाम सभी कुर्बान करें, प्रमदा सुत मीतरु कांचन गेहा।

सनमारग से पग नाहिं टरे, उनकी गति है भव भीतर एहा।

एक रहे दृढ़ता जग में सब, साज समाज यह होवत खेहा।।

२.            इनके अवतार भये सगरे, जगदीश नहीं जन्मा जग माहीं।

सुखराशि अनाशी सदाशिव जो, वह मानव रूप धरे कभी नाहीं।

मायिक होय यही जन्मे, यह अज्ञ अलीक कहें भव माहीं।

मत एक यही सब वेदन का, वह भाषा रहे निज बैनन माहीं।।

३.            धन्य भई उनकी जननी, जिन भारत आरत के दु:ख टारे।

रविज्ञान प्रकाश किया जग में, तब अंध निशा के मिटे सब तारे।

दिन रात जगाय रहे हमको, दु:खनाशकरूप पिता जो हमारे।

शोक यही हमको अब है, जब नींद खुली तब आप पधारे।।

४.            वैदिक भाष्य किया जिनने, जिनने सब भेदिक भेद मिटाए।

वेदध्वजा कर में करके, जिनने सब वैर विरोध नसाए।

वैदिक-धर्म प्रसिद्ध किया, मतवाद जिते सब दूर हटाए।

डूबत हिन्द जहाज रहा अब, जासु कृपा कर पार कराए।।

५.            जाप दिया जगदीश जिन्हें इक, और सभी जप धूर मिलाए।

धूरत धर्म धरातल पै जिनने, सब ज्ञान की आग जलाए।

ज्ञान प्रदीप प्रकाश किया उन, गप्प महातम मार उड़ाए।

डूबत हिन्द जहाज रहा अब, जासु कृपा कर पार कराए।।

६.            सो शुभ स्वामी दयानन्द जी, जिनने यह आर्यधर्म प्रचारा।

भारत खण्ड के भेदन का जिन, पाठ किया सब तत्त्व विचारा।

वैदिक पंथ पै पाँव धरा उन, तीक्ष्ण धर्म असी की जो धारा।

ऐसे ऋषिवर की सज्जनो, कर जोड़ दोऊ अब वंद हमारा।।

७.            व्रत वेद धरा प्रथमे जिसने, पुन भारत धर्म का कीन सुधारा।

धन धाम तजे जिसने सगरे, और तजे जिसने जग में सुतदारा।

दु:ख आप सहे सिर पै उसने, पर भारत आरत का दु:ख टारा।

ऐसे ऋषिवर को सज्जनो, कर जोड़ दोऊ अब वंद हमारा।।

८.            वेद उद्धार किया जिनने, और गप्प महातम मार बिदारा।

आप मरे न टरे सत पन्थ से, दीनन का जिन दु:ख निवारा।

उन आन उद्धार किया हमरा, जो गिरें अब भी तो नहीं कोई चारा।

ऐसे ऋषिवर को सज्जनो, कर जोड़ दोऊ अब वंद हमारा।।

आर्य समाज और राजनीति: – भाई परमानन्द

मैंने पिछले ‘हिन्दू’ साप्ताहिक में यह बताने का प्रयत्न किया था कि यदि आर्यसमाज को एक धार्मिक संस्था मान लिया जाये, तब भी आर्यसमाज के नेताओं को उसके उद्देश्य को दृष्टि में रखते हुए यह निर्णय करना होगा कि उनका सम्बन्ध हिन्दू सभा से रहेगा या कांग्रेस की हिन्दू विरोधी राष्ट्रीयता से? इस कल्पित सिद्धान्त को दूर रखकर इस लेख में यह बताने का प्रयत्न करूँगा कि क्या आर्य समाज कोरी धार्मिक संस्था है या उसका राजनीति के साथ गहरा सम्बन्ध और उसका एक विशेष राजनीति आदर्श है।

इण्डियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना करने वाली, जैसा मैं कह चुका हूँ, स्वयं सरकार थी। उसके सामने पूर्ण स्वतन्त्रता अथवा उसकी पुष्टि का दृष्टिकोण हो ही नहीं सकता था। उसके सामने सबसे बड़ा उद्देश्य यही था और उसका सारा आन्दोलन इसी आधार पर किया जाता था कि ब्रिटिश साम्राज्य का एक भाग होने से उसे किस प्रकार के राजनीतिक अधिकार मिल सकते हैं और उनको प्राप्त करने के लिये कौन-से साधन काम में लाये जाने आवश्यक हैं? कांग्रेस के पूर्व भारत में जो राजनीतिक आन्दोलन चलाये गये, वे गुप्त रूप से चलते थे और उनका उद्देश्य देश को इंग्लैण्ड के बन्धन से मुक्त करना था। कांग्रेस स्थापित करने का उद्देश्य इस प्रकार के गुप्त आन्दोलनों को रोकना और देश की राजनीतिक रुझान रखने वाली संस्थाओं को एक नया मार्ग बताना था। इसका परिणाम यह हुआ कि हमारे लिए राजनीति के दो भेद हो गये। एक तो बिल्कुल पुराना था, जिसका उद्देश्य स्वतन्त्रता प्राप्त करके हिन्दुस्तान में स्वतन्त्र राज्य स्थापित करना था। दूसरा वह था, जिसका आरम्भ कांग्रेस से हुआ और जिसकी चलाई हुई राजनीति को वर्तमान राजनीति कहा जाता है।

राजनीति के इन दो भेदों को पृथक्-पृथक् रखकर हमें इस प्रश्न पर विचार करने की आवश्यकता है कि आर्यसमाज का इन दोनों के साथ किस प्रकार का सम्बन्ध था। इस प्रश्न पर विचार करने के लिए मंै उन आर्य समाजियों से अपील करूँगा, जिनका सम्बन्ध आर्यसमाज से पुराना है। दु:ख है इस प्रश्न पर कि वे नवयुवक, जो कांग्रेस के जोर-शोर के जमाने में आर्यसमाज में शामिल हुए हैं, विचार करने की योग्यता नहीं रखते। जहाँ तक मैं जानता हूँ, बीसवीं शताब्दी के आरम्भ तक आर्यसमाजी यह समझते थे कि उनका आन्दोलन केवल धार्मिक सुधार ही नहीं कर सकता, वरन् उसके द्वारा देश को उठाया जा सकता है। उनकी दृष्टि में कांग्रेस का कोई महत्त्व ही न था। कांग्रेस केवल प्रतिवर्ष बड़े दिनों की छुट्टियों में किसी बड़े शहर में अपनी कुछ माँगे लेकर उनके सम्बन्ध में कुछ प्रस्ताव पास कर लिया करती थी। उसके द्वारा जनता में राजनीतिक अधिकारों की चर्चा अवश्य होती थी, परन्तु इससे बढक़र किसी भी कांग्रेसी से देशभक्ति अथवा त्याग की आशा नहीं की जा सकती थी। सन् १९०१ ई. में कांग्रेस का अधिवेशन लाहौर में हुआ। उसके प्रधान बम्बई के वकील चन्द्राधरकर थे। उन्हें लाहौर में ही वह तार मिला कि वह बम्बई हाईकोर्ट के जज बना दिये गये हैं। कांग्रेस के मुकाबले में आर्यसमाजी समझते थे कि धर्म और देश के लिए प्रत्येक प्रकार का बलिदान करना उनका कत्र्तव्य है। आर्यसमाज में स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग का खुलमखुला प्रचार किया जाता था। सन् १८९२ में राय मूलराज एक मासिक पत्र ‘स्वदेशी वस्तु प्रचारक’ निकाला करते थे। आरम्भ से ही आर्यसमाज में एक गीत गाया जाता था, जिसकी टेक थी-

‘अगर देश-उपदेश, हमें ना जगाता।

तो देश-उन्नति का, किसे ध्यान आता।।’

भजनीक अमीचन्द की ये पंक्तियाँ सन् १८९० के लगभग की है। आर्यसमाजी इस बात को बड़े गर्व से याद करते थे कि किसी समय में आर्यों का ही सारे संसार में राज्य था। स्वामी दयानन्द ने अपनी छोटी-सी पुस्तक ‘आर्याभिविनय’ में वेद-मन्त्रों द्वारा ईश्वर से प्रार्थना की है कि हमें चक्रवर्ती राज्य प्राप्त हो। स्वामी जी का ‘सत्यार्थ प्रकाश’ देखिये, उसमें मनुस्मृति के आधार पर आर्यों के राजनीतिक आदर्श बताते हुए लिखा है कि आर्यों का राज्यप्रबन्ध किस लाईन पर हो और उसके चलाने के लिए कौन-कौन सी सभायें हों? मुझे प्रसन्नता है कि आर्यसमाज में अब भी ऐसे व्यक्ति उपस्थित हैं, जो अपने इस आदर्श को भूले नहीं हैं और यदि मैं गलती नहीं करता तो वे इसे स्थापित रखने के लिए राजार्य सभा के नाम से आर्यों की एक राजनीतिक संस्था स्थापित कर रहे है। मैं समझता हूँ कि कोई भी पुराना आर्यसमाजी इस वास्तविकता से इंकार नहीं करेगा, जबकि कांग्रेस को कोई महत्त्व प्राप्त नहीं था, तब आर्यसमाज में देशभक्ति पर व्याख्यान होते थे और आर्यसमाजियों में जहाँ वैदिक धर्म को पुनर्जीवित करने की भावना पाई जाती थी, वहाँ देश को उन्नत करने का भाव भी उनमें बड़े जोरों से हिलोरे लेता दिखाई देता था। हाँ, इस भाव में यह ध्यान अवश्य रहता था कि देश धर्म-प्रचार द्वारा ही उठाया जा सकता है। दो-चार साल बाद आर्यसमाज के जीवन में विचित्र घटना घटी। पाँच-छ: महीने सरकार के विरुद्ध बड़ा भारी आन्दोलन जारी रहा। इसमें लाला लाजपतराय का बहुत बड़ा भाग था। लाला लाजपतराय आर्यसमाज के एक बड़े प्रसिद्ध नेता माने जाते थे। पंजाब सरकार को यह संदेह हुआ कि जहाँ कहीं आर्यसमाज है, वहाँ सरकार के विरुद्ध विद्रोह का एक केन्द्र बना हुआ है। इस आन्दोलन का परिणाम यह हुआ कि लाला लाजपतराय गिरफ्तार करके देश से निकाल दिये गये और सरकार ने आर्यसमाज पर दमन किया। इस पर आर्यसमाज के कुछ नेताओं ने पंजाब के गवर्नर से भेंट करके कहा कि आर्यसमाज का न तो राजनीति से सम्बन्ध है और न लाला लाजपतराय के राजनीतिक कार्यों से। इस समय आर्यसमाजी नेताओं की दुर्बलता पर घृणा प्रकट की जाती थी और कहा जाता था कि उन्होंने लाला लाजपतराय के साथ कृतघ्नता की है और वह सरकार से डर गये हैं। मैं इसके सम्बन्ध में कुछ कहना नहीं चाहता। केवल यही कहना है कि यह एक वास्तविकता थी कि आर्यसमाज की नीति बराबर यही थी कि आर्यसमाज सामयिक आन्दोलन से कोई सम्बन्ध न रखे, यद्यपि महात्मा मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानन्द) ने बड़े जोर से लिखा था कि लाला लाजपतराय आर्यसमाजी हैं और आर्यसमाज के लिये यह उचित नहीं था कि वह इस समय उन्हें छोड़ दे। इस घटना से और इसके पहले और पीछे की दूसरी घटनाओं से यह प्रभाव पड़ा कि आर्यसमाज राजनीति से पृथक् होकर केवल धार्मिक समस्याओं पर ही अधिक जोर देने लगा। इसका कारण यह था कि आर्यसमाज ने आरम्भिक राजनीति और सामयिक आन्दोलन के भेद को उपेक्षित कर दिया था।

गाँधी जी के कांग्रेस में आ जाने से कांग्रेस और भारत की राजनीति में एक बड़ा भारी परिवर्तन हो गया, स्पष्टत: जिन वस्तुओं ने लोगों को कांग्रेस की ओर खींचा, वह उनका स्वराज्य आन्दोलन और असहयोग आन्दोलन थे। जहाँ-जहाँ जन-साधारण गाँधी जी की ओर आकर्षित हुए, वहाँ-वहाँ आर्य समाजियों पर भी इनके आन्दोलन का प्रभाव पड़ा। जनता साधारणत: युद्ध की भावना को पसन्द करती है, इसलिये उसने गाँधी जी को इन आन्दोलन का नेता मान लिया। प्रारम्भिक दृष्टि से गाँधी जी के विचार आर्यसमाज से विरुद्ध ही न थे, अपितु बहुत ही विरुद्ध थे। इन आन्दोलनों के हुल्लड़ के नीचे यह विरोध छिपा रहा। गाँधी जी आर्य समाज की नीति विशेषता से अनभिज्ञ ही नहीं थे, वरन वह उसे सहन भी नहीं कर सकते थे। उनकी राजनीति का प्रारम्भिक सिद्धान्त यह था कि हिन्दुस्तान में हिन्दू रहे तो क्या और मुसलमान हुए तो क्या? बस, देश को स्वतन्त्र हो जाना चाहिए। उनको  कई ऐसे श्रद्धालु मिल गये, जिन्हें हिन्दूधर्म और हिन्दू संस्कृति से न सम्बन्ध था, न प्रेम था। कांग्रेस के चलाये हुए नये सिद्धान्त ने हिन्दुओं के पढ़े-लिखे भाग पर अपना असर कर लिया। मुझे दु:ख इतना ही है कि आर्यसमाजी भी इस हुल्लड़ के असर से न बच सके। इस प्रभाव में आकर आर्यसमाजी यह समझने लगे हैं कि उनकी राजनीतिक स्वतन्त्रता की समस्या कांग्रेस के हाथ में है। आर्यसमाज का काम धार्मिक है। वह आर्यसमाज का धर्म पालते हुए कांग्रेसी रह सकते हैं। मैं कहता हूँ कि गाँधी जी अथवा पण्डित जवाहरलाल द्वारा दिलायी हुई स्वतन्त्रता हिन्दू धर्म के लिए वर्तमान गुलामी से कही अधिक त्रासदायी सिद्ध होगी, क्योंकि आर्यसमाज की स्वतन्त्रता का आदर्श इन कांग्रेसी नेताओं की स्वतन्त्रता के आदर्श से बिलकुल प्रतिकूल है। यह कांग्रेसी वैदिकधर्म को मिटाकर हिन्दू जाति की भस्म पर स्वतन्त्रता का भवन स्थापित करना चाहते हैं। यदि वैदिक धर्म और हिन्दू जाति न रहे, तो मेरी समझ में नहीं आता कि आर्यसमाजी उनकी राजनीति के साथ कैसे सहानुभूति रख सकते हैं?

हैदराबाद की घटना अभी-अभी हमारे सामने हुई है। कांग्रेस ने आर्यसमाज के आन्दोलन का विरोध किया और वह आरम्भ से अन्त तक विरुद्ध ही रहा। हमारे प्रभाव में आकर आर्यसमाजी पत्रों ने अपनी माँगों का विज्ञापन रोज-रोज करना आवश्यक समझा हमारी तीन माँगें धार्मिक थीं, अर्थात् आर्यसमाज को हवन करने, ओ३म् का झण्डा फहराने और आर्यसमाज के प्रचार करने की स्वतन्त्रता हो। उन्होंने अपने-आपको हिन्दुओं के आन्दोलन से इसलिए पृथक् रखा कि जिससे यह कांग्रेस के हाईकमाण्ड को खुश रख सकें और हिन्दुओं के आन्दोलन के साथ मिल जाने से कहीं आर्यसमाज साम्प्रदायिक न बन जाये। इस मुस्लिम परस्त कांग्रेस से उन्हें इतना डर था कि सार्वदेशिक सभा के दो पदाधिकारी दिन-रात दौड़ते फिरे, जिससे गाँधी जी को यह विश्वास दिला सके कि उनका आन्दोलन पूर्णत: धार्मिक है- वह न राजनीतिक है, न साम्प्रदायिक। इन्होंने छ: महीने में एक हजार रुपया खर्च करके गाँधी जी को यह विश्वास दिलाया कि आर्यसमाजियों का यह आन्दोलन धार्मिक है, इसलिए कुछ आर्यसमाजियों ने उन्हें आकाश पर चढ़ा दिया। गाँधी जी को बार-बार धन्यवाद देना आरम्भ कर दिया कि उन्होंने आर्यसमाज का इस सम्बन्ध में विश्वास करके आर्यसमाज की बड़ी भारी सेवा की। मुझे इससे दु:ख होता है। दु:ख केवल इसलिए है कि ये आर्यसमाजी समझते हैं कि गाँधी जी की राजनीति ईश्वर का इल्हाम है, इसलिए इसके सामने अपने पवित्र सिद्धान्त छोड़ देना आर्यसमाजियों का अनिवार्य कत्र्तव्य है।

आयु को निश्चित मानना वेद विरुद्ध है: -ब्र. वेदव्रत मीमांसक

परोपकारी मासिक, वर्ष २४, अङ्क ११, आश्विन २०३१ वि. में श्री पं. फूलचन्द शर्मा निडर भिवानी वालों का ‘आयु को निश्चित न मानने वालों से कुछ प्रश्र’ शीर्षक एक लेख छपा है। उसमें उन्होंने आयु निश्चित सिद्ध करने का प्रयत्न किया है।

आर्य विद्वानों में आयु निश्चित है अथवा अनिश्चित। इस विषय में मतभेद है। एक वर्ग वाले मानते हैं कि आयु निश्चित है और दूसरे वर्ग वाले कहते हैं कि अनिश्चित है। इस विषय में दो-बार शास्त्रार्थ हुआ। दूसरी बार का शास्त्रार्थ ‘दयानन्द सन्देश’ वर्ष २, अङ्क ९, १० के विशेषाङ्क के रूप में प्रकाशित हुआ, जिसको देखने से दोनों पक्ष वालों के मूलभूत विचार स्पष्ट होते हैं।

किसी बात को सिद्ध करने के लिए प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन नामक पञ्च अवयवों की आवश्यकता होती है। इन्हीं को प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द और प्रमाण कहा जाता है। किसी वस्तु की सिद्धि में हेतु प्रमुख होता है। हेतु के प्रबल होने से पक्ष सिद्ध होता है। हेतु के न होने से अथवा हेत्वाभास से पक्ष सिद्ध नहीं होता। हेतुओं और हेत्वाभासों पर न्यायशास्त्र में अतिसूक्ष्मता से विचार किया गया है। प्रमाणों के द्वारा वस्तु की परीक्षा करना न्याय कहलाता है। महर्षि वात्स्यायन ने न्याय १/१/१ पर लिखा है ‘‘प्रत्यक्षागमाश्रितमनुमानं सा अन्वीक्षा। प्रत्यक्षागमाभ्यामीक्षितस्यान्वीक्षणमन्वीक्षा तथा प्रवर्तत इत्यान्वीक्षिकी न्यायविद्या न्यायशास्त्रम्। यत्पुनरनुमानं प्रत्यक्षागमविरुद्धं न्यायाभास: स इति।’’ प्रत्यक्ष और आगम पर आश्रित अनुमान को अन्वीक्षा क हते हैं। प्रत्यक्ष और आगम के द्वारा ईक्षित का पश्चात् ईक्षण अन्वीक्षा है। उसको लेकर जो प्रवृत्त हो, उसको आन्वीक्षिकी, न्यायविद्या, न्यायशास्त्र कहते हैं। जो अनुमान प्रत्यक्ष तथा आगम के विरुद्ध हो, वह न्याय नहीं अपितु न्यायाभास है।

श्री निडर जी आयु के विषय में सत्यासत्य का निर्णय नहीं करना चाहते, क्योंकि वे कहते हैं ‘‘मैं तो न्यायशास्त्र नहीं जानता। न्यायशास्त्र के बिना ही मैं आयु को निश्चित सिद्ध कर दूँगा।’’ भला जो व्यक्ति प्रतिज्ञा को नहीं जानता, हेतु क ो नहीं जानता, हेत्वाभास को नहीं जानता, उदाहरण को नहीं जानता, उपनय और निगमन को नहीं जानता, छल, जाति, निग्रह स्थान को नहीं जानता, वह सत्यासत्य का निर्णय कैसे कर सकता है?

आर्यसमाज सोनीपत का उत्सव हो रहा था। निडर जी के ज्येष्ठ पुत्र मन्त्री थे। मञ्च पर मैं था और निडर जी भी थे। मुझे देखकर आपने मञ्च से यह घोषणा की-ब्रह्मचारी जी उपस्थित हैं। उत्सव भी चल रहा है। आयु विषय पर शास्त्रार्थ हो जाए तो अच्छा रहे। मैंने उसी समय उसको स्वीकार कर लिया, किन्तु आर्यसमाज के अधिकारियों ने शास्त्रार्थ का आयोजन नहीं किया। मैं अब भी निडर जी से अथवा और किसी भी अन्य विद्वान् से इस विषय पर वाद करने को उद्यत हँू। न्यायशास्त्र अनुमोदित प्रक्रिया के अनुसार शास्त्रार्थ हो। यदि न्यायशास्त्र के विरुद्ध कोई वाद करना चाहे तो सत्यासत्य का निर्णय नहीं हो सकता।

यदि निडर जी जब कभी इस विषय पर लेख लिखें, न्यायानुसार ही लिखें तो विद्वानों में मान्य हो, किन्तु उनके लेख में प्रत्यक्षागम विरुद्ध अनुमान होता है।

आयु के निश्चित न होने में अनेक प्रमाण हैं, उन सबको लिखने की, आवश्यकता नहीं है। उनमें से स्थालीपुलाक न्याय से कुछ प्रस्तुत किय जाते हैं-

१. त्र्यायुषं जमदग्रे: कश्यपस्य त्र्यायुषं यद्देवेषु त्र्यायुषं तन्नो अस्तु त्र्यायुषम् (यजु. ३५/१५)

भावार्थ-ये परमेश्वरेण व्यवस्थापितां धर्मानोल्लङ्घन्ते अन्यायेन परपदार्थान् न स्वीकुर्वन्ति ते अरोगा: सन्त: शतं वर्षाणि जीवितुं शक्रुवन्ति नेतरे ईश्वराज्ञा भङ्क्तार:। ये पूर्णेन ब्रह्मचर्येण विद्या अधीत्य धर्ममाचरन्ति तान् मृत्युर्मध्येनाऽप्रोतीति।

भाषार्थ-जो लोग परमेश्वर के नियम का कि धर्म का आचरण करना और अधर्म का आचरण छोडऩा चाहिए- उल्लङ्घन नहीं करते, अन्याय से दूसरों के पदार्थों को नहीं लेते, वे नीरोग हो कर सौ वर्ष तक जी सकते हैं, ईश्वराज्ञा विरोधी नहीं। पूर्ण ब्रह्मचर्य से विद्या पढ़ कर धर्म का आचरण करते हैं, उनको मृत्यु मध्य में प्राप्त नहीं होती।

२. ‘‘अग्र आयूंषि पवस आसुवोर्जमिषंचन:। आरे बाधस्वदुच्छुनाम्’’ (यजु. ३५/१५)

भावार्थ-ये मनुष्या: दुष्टाचरणदुष्टसङ्गौ विहाय परमेश्वराप्तयो: सेवां कुर्वन्ति ते धनधान्य युक्ता: सन्तो दीर्घायुषो भवन्ति।

भाषार्थ-जो मनुष्य दुष्टाचरण दुष्ट सङ्ग छोड़ परमेश्वर और आप्तों की सेवा करते हैं, वे धन-धान्य से युक्त हो दीर्घायु को प्राप्त करते हैं।

३. ‘‘परं मृत्यो अनुपरे कि पन्थां यस्ते अन्य इतरो देवयानात् चक्षुष्मते शृण्वते ते ब्रवीमि मा न: प्रजां रीरिषो मोत वीरान्’’ (यजु. २५/७)

भावार्थ-मनुष्यैर्यावज्जीवनं तावद्विद्वन्मार्गेण गत्वा परमायुर्लब्धव्यम् कदाचित् विना ब्रह्मचर्येण स्वयंवरं कृत्वा अल्पायुषी: प्रजा नोत्पादनीया।

भाषार्थ-मनुष्यों को चाहिए कि जीवनपर्यन्त विद्वानों के मार्ग से चलकर उत्तम अवस्था को प्राप्त हों और ब्रह्मचर्य पर्यन्त बिना स्वयंवर विवाह करके कभी न्यून अवस्था की प्रजा सन्तानों को न उत्पन्न करे।

४. ‘‘भद्रं कर्णेभि: शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्ष-भिर्यजत्रा: स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवां सस्तनुभिव्र्यशेमहि देवहितं यदायु:’’  -(यजु. २५/२१)

भावार्थ-यदि मनुष्या: विद्वत्सङ्गे विद्वांसो भूत्वा सत्यंशृणुयु: सत्यं पश्येयु: जगदीश्वरं स्तुयुस्तर्हि ते दीर्घायुष: भवेयु:।

भाषार्थ-जो मनुष्य विद्वानों के सङ्ग में विद्वान् होकर सत्य सुनें, सत्य देखें और जगदीश्वर की स्तुति करें तो वे बहुत अवस्थावाले हों।

५. ‘‘अतिमैथुनेन ये वीर्यक्षयं कुर्वन्ति तर्हि ते सरोगा: निर्बुद्धयो भूत्वा दीर्घायुष: कदापि न भवन्ति’’

अतिमैथुन करके जो वीर्य का नाश करते हैं, वे रोगयुक्त निर्बुद्धि हो दीर्घायुवाले कभी नहीं होते। (यजु. २५/२२ ऋ.द.भाष्य)

६. ‘‘यथा रशनया बद्धा प्राणिन: इतस्तत: पलायितुं न शक्नुवन्ति तथा युक्त्या धृतमायुरकाले न क्षीयते न पलायते।’’

जैसे डोर से बन्धे हुए प्राणी इधर-उधर भाग नहीं सकते, वैसे युक्ति से धारण की हुई आयु अकाल में नहीं जाती। (यजु. २२/२ ऋ. द. भाष्य)

७. मनुष्या: आलस्यं विहाय सर्वस्य द्रष्टारं न्यायाधीशं परमात्मानं कत्र्तुमर्हा तदाज्ञा च मत्वा शुभानि कर्माणि कुर्वन्तो अशुभानि त्यजन्तो ब्रह्मचर्येण विद्यासुशिक्षे प्राप्योपस्थेन्द्रयनिग्रहेण वीर्यमुन्नीयाल्पमृत्यं ध्रन्तु। युक्ताहारविहारेण शतवार्षिकमायु प्राप्नुवन्तु। यथा मनुष्या: सुकर्मसु चेष्टन्ते तथा तथा पापकर्मतो बुद्धिर्निवर्तते। विद्या आयु: सुशीलता च वर्धन्ते।

मनुष्य आलस्य को छोड़ कर सब देखनेहारे न्यायाधीश परमात्मा और करने योग्य उसकी आज्ञा को मानकर शुभ कर्मों को करते हुए और अशुभ कर्मों को छोड़ते हुए ब्रह्मचर्य के सेवन से विद्या और अच्छी शिक्षा को पाकर उपस्थेन्द्रिय के रोकने से पराक्रम को बढ़ाकर अल्पायु को हटावें। युक्ताहार विहार से सौ वर्ष क ी आयु को प्राप्त होवें। जैसे-जैसे मनुष्य सुकर्मों में चेष्टा करते हैं, वैसे-वैसे ही पापकर्म से बुद्धि की निवृत्ति होती, विद्या आयु और सुशीलता बढ़ती है। यजु. ४०/२

८. अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन:। चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम् ।। मनु. २/१२१।।

जो सदा नम्र, सुशील, विद्वान् और वृद्धों की सेवा करता है, उसके आयु, विद्या, कीर्ति और बल ये चार सदा बढ़ते हैं और जो ऐसा नहीं करते उनके आयु आदि नहीं बढ़ते।

९. दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दित:। दु:खभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च।। मनु.

जो दुष्टाचारी पुरुष होता है, वह सर्वत्र व्याधित अल्पायु होता है।

१०. आचाराल्लभते ह्यायु:।। मनु.

धर्माचरण ही से दीर्घायु प्राप्त होती है।

११. हितोपचारमूलं जीवितमतो विपर्ययो हि मृत्यु:। चरक, वि. १-४१।।

जीवन हितकारी चिकित्सा पर है। इसके विरुद्ध चिकित्सा ठीक न होने पर मृत्यु होती है।

१२. द्विविधा तु खलु भिषजो भवन्ति अग्रिवेश। प्राणानां हि एके अभिसरा: हन्तारो रोगाणाम्। रोगाणां हि एके अभिसरो हन्तार: प्राणानामिति ।। चरक।।

हे अग्निवेश, दो प्रकार के वैद्य होते हैं, एक तो प्राणों को प्राप्त कराने वाले और रोगों को मारने वाले और दूसरे वे जो रोगों के लाने वाले और प्राणों को नष्ट करने वाले।

१३. अनशनं आयुह्र्रासकराणाम्।। चरक।।

आयु के ह्रास करनेवाले अनेक कारणों में से अनशन-भोजन न करना सब से प्रबल कारण है।

१४. ब्रह्मचर्यमायुष्याणाम्।। चरक।।

आयु के बढ़ाने वाले अनेक साधनों में से ब्रह्मचर्य सर्वोकृष्ट साधन है।

१५. जिसमें उपकारी प्राणियों की हिंसा अर्थात् जैसे एक गाय के दूध, घी, बैल, गाय आदि उत्पन्न होने से एक पीढ़ी में ४७५६०० मनुष्यों को सुख पहुँचता है, वैसे पशुओं को न तो मारें न मरने दें।

इन स्पष्ट प्रमाणों के लिखने के पश्चात् इनकी व्याख्या की आवश्यता नहीं। निडर जी वा अन्य आयु को निश्चत मानने वाले इन प्रमाणों को छूना ही नहीं चाहते। अतिविस्तृत वैदिक साहित्य में इन प्रमाणों के विरुद्ध आयु को निश्चित मानने वाला एक भी प्रमाण नहीं। आयु को निश्चित माननेवाले इन प्रमाणों के विरुद्ध युक्ति का आश्रय लेते हैं।

आयु को निश्चित माननेवाले ‘‘सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगा:’’ (योग. २-१३) इस एक मात्र सूत्र को उपस्थित करते हैं, किन्तु आयु को निश्चित बतलाने वाला इसमें एक शब्द भी नहीं। आयु और आयु की इयत्ता दोनों भिन्न-भिन्न हैं। आयु से जीवनकाल मात्र अभिप्रेत होता है, इयत्ता नहीं। आयु शब्द का अर्थ इयत्तापरक मानना अप्रामाणिक है।

मनुष्य की आयु को पहले कोई भी निश्चित नहीं कर सकता-यह एक उदाहरण से स्पष्ट हो जायेगा। मिट्टी के एक घड़े को लीजिए। उसकी आयु कोई नहीं बतला सकता, न ही कोई जान सकता है कि कितने काल तक सुरक्षित रहेगा और कब टूट-फूट जायेगा? निश्चितवादी यह कहते हैं कि मिट्टी के घड़़े में और शरीर में समानता नहीं है, किन्तु सूक्ष्मता से देखें तो समानता दिखती है। (पूर्व पक्ष के अनुसार जैसे मनुष्य की आयु निश्चित होती है, वैसे घड़े की भी निश्चित ही है। उनके पक्ष में यह दृष्टान्त ही नहीं बनेगा।) वास्तव में शरीर में मिट्टी के घड़े में कोई अन्तर नहीं। यदि कुछ अन्तर है तो यही है कि जीव शरीर के भीतर रहकर शरीर का प्रयोग करता है। शरीर का एवं घड़े का प्रयोग चेतन ही करता है। पूर्व पक्षानुसार घड़ा और शरीर दोनों भाग साधन हैं, इसीलिए दृष्टान्त विषम नहीं है। शरीर की आयु क्षण-क्षण में परिवर्तित होती है। यदि संयम से नीरोग रहता है तो शरीर दीर्घकाल तक रहने योग्य बनता है। असंयम से रोगी बनता रहता है तो शरीर की शक्ति क्षीण होती है। शरीर में दीर्घकाल तक रहने का सामथ्र्य न्यून होता जाता है। इस रूप में आयु घटती है। पौष्टिक आहार से आयु बढ़ती है, नीरस आहार से आयु घटती है। राग, द्वेष, ईष्र्या, चिन्ता, भय, शोक आदि से आयु घटती है तो आनन्द, उत्साह, मैत्री, निश्चिन्तता, धैर्य आदि से आयु बढ़ती है। इसका अपलाप नहीं किया जा सकता। जीव कर्म करने में स्वतन्त्र होने से उसके कर्मानुसार क्षण-क्षण में उसकी आयु परिवर्तित होती रहती है। यह कहना अयुक्त है कि परमात्मा पहले ही निश्चित आयु देता है।

निडर जी ने लिखा है कि ‘‘महर्षि दयानन्द से भी अधिक कोई ब्रह्मचारी हुआ क्या? तो आदित्य ब्रह्मचर्य के अनुसार उनकी चार सौ वर्ष की आयु क्यों न हुई? वे उन्सठ वर्ष की आयु में ही क्यों चले गए।’’

इससे प्रतीत होता है कि निडर जी अपने पक्ष के व्यामोह के कारण से सत्यासत्य के जानने में असमर्थ हैं। क्या निडर जी यह सिद्ध कर सकते हैं कि महर्षि दयानन्द सरस्वती को ५९ वर्ष ही जीवित रहना था? उनके अनुसार स्वामी दयानन्द जी की आयु निश्चित करते समय विषदाता को भी निश्चित किया होगा और समय पर विष देने के लिए भेजा भी होगा। स्वामी श्रद्धानन्द जी की आयु निश्चित करते समय मुसलमान के हाथ से गोली खाकर मरना भी निश्चित किया होगा। पं. लेखराम जी की आयु निश्चित की होगी। हत्यारे को भी निश्चित किया होगा। परमात्मा ने भारतवालों के लिए यह लिखा होगा कि अंग्रेजों के द्वारा पद दलित होकर नाना दु:खों को भोगते रहेंगे।

निडर जी ने वेदों में विद्यमान प्रार्थनाओं को झूठा लिख दिया है। वास्तव में निडर जी का यह लेख साहसमात्र है। यदि ऐसे व्यक्ति वेद पर लेखनी उठावें तो वेद के साथ अनर्थ के अतिरिक्त कुछ नहीं होगा। क्या परमात्मा ने मनुष्यों के लिए जो आशीर्वाद दिया है, वा मनुष्यों को प्रार्थना का आदेश दिया है, यह सारा व्यर्थ है? निडर जी ने यह आक्षेप किया है कि ‘यदि ईश्वर किसी की प्रार्थना या अशीर्वाद को सुनने लगे तो ईश्वर का कोई भी न्याय या व्यवस्था नहीं चल सकती।’

इससे प्रतीत होता है कि प्रार्थना का अर्थ निडर जी ने समझा ही नहीं। परमात्मा ने प्रार्थना कराने का आदेश दिया है, असम्भव के लिए नहीं। असम्भव की प्रार्थना का उपदेश करना अल्पज्ञ का काम है, सर्वज्ञ का नहीं।

निडर जी ने आयु को अनिश्चित मानना मूर्खता का काम लिखा है। यदि निडर जी निष्पक्ष होकर विचार करें तो ज्ञात हो जायेगा कि उनकी मान्यता वेद-विरुद्ध, वैदिक-साहित्य के विरुद्ध है। आश्चर्य इस बात का है कि वे अपनी मान्यता को सत्य मानते हैं, वेदानुकूल मानते हैं, जबकि उनकी विचारने की शैली अदार्शनिक है। न्याय विरुद्ध है। परमात्मा उनको दार्शनिक प्रक्रिया से विचारने की शक्ति दे।