Category Archives: श्रेष्ठ आर्य

पंडित मनसाराम जी “वैदिक तोप”

स्वनामधन्य पं॰मनसारामजी ‘वैदिक तोप’ आर्यजगत्‌ की महान विभूतियोँ मेँ अपना स्थान रखते हैँ। पण्डितजी का जन्म 1890 ई॰ हड्डाँवाला नंगल[जाखल के निकट] हरियाणा प्राप्त मेँ हुआ था।

आपके पिता लाला शंकरदासजी अन्न-धन से सम्पन्न, सुखी सद्‌गृहस्थ व्यापारी थे। वे कट्टर मूर्तिपूजक और पौराणिक थे।
पुत्र भी उनके रंग मेँ रंग गया। पण्डितजी की प्राइमरी तक की शिक्षा वामनवाला ग्राम मेँ हुई। तत्पश्चात्‌ टोहाना के मिडल स्कूल मेँ दाखिल हो गये। 1907 मेँ पण्डितजी आठवीँ श्रेणी मेँ प्रविष्ट हुए। इसी वर्ष मेँ पिताजी का देहान्त हो गया। पण्डितजी को स्कूल छोड़कर घर सम्हालना पड़ा।

लाला शंकरदास जी के वहां एक पटवारी श्री रामप्रसादजी रहा करते थे, ये बड़े सदाचारी, मधुरभाषी और निष्ठावान आर्य समाजी थे | जब मनसारामजी घर पर रहने लगे तो वे इनको वैदिक धर्म के सिद्धांतों और तत्वज्ञान से परिचय कराया करते थे | मनसारामजी महाशय रामप्रसादजी के सत्संग से आर्य समाज की ओर आकृष्ट हो गये |
१९०८ में टोहाना में आर्यों और पौराणिकों के बीच एक शास्त्रार्थ हुआ | आर्य समाज के तरफ से पं.राजारामजी शास्त्री ने पक्ष रखा और पौराणिको की ओर से पं.लक्ष्मीनारायण जी थे | श्री उदमीरामजी अध्यक्ष नियुक्त हुए | इस शास्त्रार्थ को देखने वालों में पंडित मनसाराम भी थे | शास्त्रार्थ में पं.राजाराम जी की युक्तियों की धाक पंडित मनसारामजी के मस्तिष्क पर जम गयी | आप आर्य समाज के दीवाने हो गये | अब पं.मनसाराम के मन में संस्कृत अध्ययन की धुन सवार हुई | सर्वप्रथम आप कुरुक्षेत्र की सनातनधर्म पाठशाला में प्रविष्ट हुए | यहाँ से हरिद्वार पहुंचे, संस्कृत अध्ययन की लगन में
आपने गुरुकुल काँगड़ी में चपरासी की नौकरी कर ली, उनका विचार था कि गुरुकुल में एक ओर संस्कृत अध्ययन भी कर लूँगा औरे आर्य समाज की सेवा भी कर लूँगा | पर इनकी मनोकामना
यहाँ भी पूरी न हुई | यहाँ से निराश होकर ये ज्ञानपिपासु विद्या-नगरी काशी में पहुँच गया |

काशी में संस्कृत अध्ययन के कई केन्द्र खुले हुए थे | पर उनमें सिर्फ जन्म के ब्राह्मणों को ही भोजन मिलता था | संस्कृतज्ञान के पिपासु ने कितने दिन भूखे रहकर काटे होंगे, कौन जानता है ? श्रीमनसाराम जी जंगल से बेर तोड़कर लाया करते थे, उन्हें ही खाकर निर्वाह करते
थे | एक दिन वे बेर तोड़ रहे थे, एक सेठ उधर आ निकले | संस्कृत का विद्यार्थी भांपकर सेठ ने पूछा—“क्या कर रहे हो ?” मनसाराम जी ने अपनी समस्या बता दी | सेठ ने पूछा—“केन्द्रों में भोजन क्यूँ नही करते ? मनसाराम जी ने कहा “वहां तो केवल ब्राह्मणों को भोजन मिलता है, मैं तो जन्म से अग्रवाल हूँ |” सेठ की गैरत जागी, वो स्वयं भी ऐसे कई केन्द्रों को दान देता था, उसने मनसाराम जी से कहा “तुम अमुक केन्द्र में जाकर भोजन किया कारो, वहां कोई तुम्हारी जाति नही पूछेगा |”

भोजन की समस्या से निश्चिन्त होकर मनसाराम जी विद्याध्ययन में जुट गए | विद्या समाप्त करके मनसारामजी काशी के पण्डितों के बीच गए और उनके समक्ष एक प्रश्न रखा कि—‘मैं जन्म से अग्रवाल हूँ, मुझे अब पण्डित कहलाने का अधिकार प्राप्त है या नही ? इसपर बड़ा वाद-विवाद हुआ | मनसाराम जी की विजय हुई | उन्हें पण्डित की पदवी प्रदान की गई|

विद्या प्राप्ति के बाद आप कार्यक्षेत्र में उतरे | आपके गहन अध्ययन, तीव्रबुद्धि, और अकाट्य तर्कों के कारण आपकी कीर्ति-चन्द्रिका छिटकने लगी | आर्यसमाज के क्षितिज पर एक नया नक्षत्र अपनी
प्रभा विकीर्ण करने लगा | पण्डितजी सिरसा में धर्म-प्रचार कर रहे थे, उन्ही दिनों स्वामी स्वतंत्रानन्दजी सिरसा पधारे | पण्डितजी की बहुमुखी प्रतिभा से प्रभावित होकर इन्हें आर्य प्रतिनिधिसभा पंजाब की सेवा में ले गए | पण्डितजी ने सारे पंजाब को वैदिक-नाद से गुंजा दिया| शास्त्रार्थ में उनकी विशेष रूचि थी | शास्त्रार्थ-समर के आप विजयी-योध्या थे|

एक बार भिवानी में शास्त्रार्थ हो रहा था, पौराणिकों ने आपको पूरा समय न दिया | नियमानुसार आपने २५ मिनट मांगे | उत्तर में पण्डितजी पर लाठियों से आक्रमण हुआ | जिसपर पण्डितजी ने
एक ट्रैक लिखा “मेरे पच्चीस मिनट” | इस शास्त्रार्थ का टेकचन्दजी पंसारी पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि उसने प्रतिमाएं फ़ेंक और आस्तिक बन गया | आर्यों से भिन्न लोगों पर पण्डितजी की कैसी धाक थी, इस विषय में निम्न घटना अति महत्वपूर्ण है | एक बार रामामंडी में एक जैन विद्वान आये | उनके प्रवचन होने लगे | एक दिन सभा के
अंत में एक किसान वेशधारी ने जैनियों के अहिंसा सम्बन्धी सिद्धांत पर कुछ प्रश्न कर दिए | प्रश्न सुनते ही जैन विद्वान ने कहा—“आप पं.मनसाराम तो नही हैं? ऐसे प्रश्न वे ही कर सकते हैं, साधारण व्यक्ति इतनी गहराई से विचार ही नही कर सकता| सचमुच वे ग्रामीण पण्डितजी ही थे |

उधर २-३ मई १९३१ को आर्यसमाज जाखल के वार्षिकोत्सव पर शास्त्रार्थ रखा गया | इसके अध्यक्ष थे स्वामी स्वतंत्रतानन्द और शास्त्रार्थकर्ता थे पं.लोकनाथजी ‘तर्कवाचस्पति’ |
पण्डितजी ने ‘शास्त्रार्थ-जाखल’ नाम से उर्दू में एक पुस्तक लिखी | पौराणिक बौखला उठे| भारी धन-व्यय करके उन्होंने ‘सनातन-धर्म विजय’ नामक पुस्तक लिखवाई \ पुस्तक क्या थी गाली-गलौज का पुलिन्दा थी | पण्डितजी ने सभ्य भाषा में युक्ति और प्रमाणों से सुभूषित लगभग पांच गुना बड़ा १२२४ पृष्ठों का ग्रन्थ लिखा, जिसका नाम रखा- “पौराणिक पोप पर वैदिक तोप” | इस ग्रन्थ के प्रकाशन होते ही पण्डितजी के नाम की धूम मच गयी और आपका
नाम ही ‘वैदिक तोप’ पड़ गया |

पण्डितजी के तर्क कितने तीखे होते थे, इसका आभास भटिंडा-शास्त्रार्थ से होता है | पण्डितजी ने चार प्रश्न रखे थे—
१- सनातन धर्म में पशुवध आदिकाल से है या बाद की मिलावट है ?
२- नाविक की पुत्री सत्यवती के गर्भ से उत्पन्न व्यास जी का वर्ण पौराणिक-मत के अनुसार क्या है?
३- पौराणिक मत के अनुसार सिख, जाट, स्वर्णकार, और कायस्थ किस वर्ण में हैं ?
४- पौराणिक मत के अनुसार दलित भाई ईसाई-मुसलमानों से अच्छे हैं वा नही ? अच्छे हैं तो उनके साथ अच्छा व्यवहार क्यूँ नही किया जाता ?

पण्डितजी के प्रश्न सुनकर पौराणिक अधिकारी ने कहा—मनसाराम को यहाँ से बाहर निकालो |

संगरूर-शास्त्रार्थ में मृतक-श्राद्ध पर बोलते हुए पण्डितजी ने कहा— ‘मैं भी इस जन्म में कहीं से आया हूँ| यदि मृतकों को श्राद्ध का माल पहुँचता है तो मेरा पार्सल कहाँ जाता है ?

पण्डितजी विद्या के सागर थे, आर्य समाज के मंच व्याख्यान देते तो श्रोताओं से कहते कि किस विषय पर बोलूं, आप जिस पर कहें उसी पर बोलता हूँ| उनके व्याख्यान सैद्द्धान्तिक होते थे|
व्याख्यानों में प्रमाणों की बहुलता होती थी | पण्डितजी ने स्वतंत्रता-आन्दोलन में भी भाग लिया था और कई बार जेल भी गए | १९२२ में
गाँधी द्वारा चलाये गए पहले सत्याग्रह में पण्डितजी जेल गए | उन्हें हिसार जेल में रखा गया | अभियोग के दिनों में आपने एक ऐसी साहसिक बात कही जो किसी भी क्रन्तिकारी की मुख से न निकली होगी | पण्डितजी को मजिस्ट्रेट के आगे पेश किया गया तो आपने पाने मुंह पर कपड़ा डाल लिया | मजिस्ट्रेट ने कारण पूछा तो आपने कहा—“जिस व्यक्ति ने चाँदी के चन्द-ठीकरों के लिए अपने आपको बेच दिया हो, मैं उसकी शक्ल नही देखना चाहता | ये कोर्ट का अपमान था | सत्याग्रह के साथ-साथ एक और अभियोग न्यायालय की मानहानि का भी चलने लगा |

पण्डितजी ने साहित्य भी बहुत लिखा, इनका सारा साहित्य खोजपूर्ण है | पौराणिको के खण्डन में इस साहित्य से उत्तम साहित्य नही लिखा गया | उनके कुछ प्रसिद्ध ग्रन्थ है—
१- पौराणिक पोलप्रकाश
२- पौराणिक पोप पर वैदिक तोप
३- चेतावनी प्रकाश
४- पौराणिक दम्भ पर वैदिक बम्ब

शिवपुराण आलोचना, भविष्यपुराण आलोचना आदि और अनेक ग्रन्थ पण्डितजी ने लिखे थे| दुर्भाग्य से अधिकतर अप्राप्य है | जून ईसवी १९४१ में पण्डितजी परलोक सिधार गए | पण्डितजी का पार्थिव शरीर नही रहा, परन्तु उनका यशरूपी शरीर अजर और अमर है |

सुजीत मिश्र

यज्ञ की वेदी पर पाखण्ड के पाँव – धर्मवीर

यज्ञ की वेदी पर पाखण्ड के पाँव
– धर्मवीर
प्रस्तुत सपादकीय प्रो. धर्मवीर जी ने आकस्मिक निधन से पूर्व लिखा था। इसे यथावत् प्रकाशित किया जा रहा है।
-सम्पादक गत दिनों एक संस्था की यज्ञशाला देखने का अवसर मिला। यज्ञशाला भव्य और सुन्दर बनी हुई देखकर अच्छा लगा। प्रतिदिन यज्ञ होता है, यह जानकर प्रसन्नता होनी स्वाभाविक है।
यज्ञशाला देखने पर दो बातों की यज्ञ से संगति बैठती नहीं दिखी। संस्था प्रमुख उस समय संस्था में थे नहीं, अतः मन में उठे प्रश्न अनुत्तरित ही रहे। पहली बात यज्ञशाला के बाहर और सब बातों के साथ-साथ एक सूचना पर भी दृष्टि गई, उसमें लिखा था- ‘आप यज्ञ नहीं कर सकते, न करें, आप यज्ञ के निमित्त राशि उक्त संस्था को भेज दें। आपको यज्ञ का फल मिल जायेगा।’
दूसरी बात ने और अधिक चौंकाने का काम किया, वह बात थी कि वहाँ जो रिकॉर्ड बज रहा था, उस पर वेद मन्त्रों की ध्वनि आ रही थी, प्रत्येक मन्त्र के अन्त में स्वाहा बोला जा रहा था। एक व्यक्ति यज्ञ-कुण्ड के पास आसन पर बैठकर घृत की आहुतियाँ दे रहा था। इस क्रम को देखकर विचार आया कि मन्त्र-पाठ का विकल्प तो मिल गया, मन्त्रों को रिकॉर्ड करके बजा लिया पर अभी आहुति डालने वाले का विकल्प काम में नहीं लिया। यदि वह भी ले लिया जाय तो यज्ञ का लाभ भी मिल जायेगा और उस कार्य में लगने वाले समय को अन्यत्र इच्छित कार्य में लगाने का अवसर भी मिल जायेगा। मेरे साथ संयोग से सार्वदेशिक सभा के मन्त्री प्रकाश आर्य भी थे। मैंने उनसे इस विषय पर प्रश्न किया और उनकी समति जाननी चाही, तो वे केवल मुस्कुरा दिये और कहने लगे- मैं क्या बताऊँ।
इसके बाद इस बात की चर्चा तो बहुत हुई, परन्तु अधिकारी व संस्था-प्रमुख व्यक्ति से संवाद नहीं हो सका। संयोग से कुछ दिन पहले उस संस्था के प्रमुख से साक्षात्कार हुआ, सार्वजनिक मञ्च से मुझे उनसे अपनी शंकाओं का समाधान करने का अवसर मिल गया। जब मैंने दोनों बातें उनके सामने रखकर इसका अभिप्राय जानना चाहा तो उन्होंने अपने चालीस मिनट में इसका उत्तर इस प्रकार दिया। उन्होंने कहा- हमने कभी यह नहीं कहा और न ही कभी हमारा मन्तव्य ऐसा रहा कि हमारा यज्ञ किसी के व्यक्तिगत यज्ञ का विकल्प है। हमारे यज्ञ में सहयोग करने वाले व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से यज्ञ करने का लाभ तो नहीं मिलेगा। परन्तु उसके धन की सहायता से जिस घृत और सामग्री से हमारे यहाँ यज्ञ किया जा रहा है, उस सद्कर्म के पुण्य का लाभ उस व्यक्ति को भी मिलेगा। इसमें आपत्तिजनक कोई भी बात नहीं।
पहली बात व्यक्तिगत रूप से घर पर किया गया यज्ञ करने वाले के घर की परिस्थिति और वातावरण की शुद्धि का कारण होता है, वह दूर देश में जाकर करने पर घर की पवित्रता का कारण नहीं बन सकता। दूसरी बात यज्ञ केवल पर्यावरण शुद्धि का स्थूल कार्य मात्र नहीं है, यह मनुष्य के लिये उपासना का भी आधार है। इससे वेद-मन्त्रों के पाठ, विद्वानों के सत्संग और यज्ञ में किये जाने वाले स्वाध्याय से परमात्मा की उपासना भी होती है। यज्ञ का यह लाभ दूसरे के द्वारा तथा दूर देश में किये जाने पर केवल धन देने वाले यज्ञकर्त्ता या यजमान को प्राप्त नहीं हो सकता। किसी भी शुभ कार्य के लिये किसी के द्वारा दिये सहयोग, दान का पुण्य दाता को अवश्य प्राप्त होगा, क्योंकि वह उस दान का वह कर्त्ता है।
जहाँ तक दूसरे प्रश्न की बात है कि मन्त्र को रिकॉर्ड पर बजाकर आहुति देने से यज्ञ सपन्न होता है। उनका यह कहना ठीक है कि इतने विद्वान् या वेदपाठी कहाँ से लायें, जो पूरे दिन मन्त्र-पाठ कर सकें? रिकॉर्ड पर मन्त्र चलाकर अपने को तो समझा सकते हैं, परन्तु यह अध्यापक या विद्वान् का विकल्प नहीं हो सकता। संसार की सारी वस्तुयें साधन बन सकती हैं, परन्तु कर्त्ता का मूल कार्य तो मनुष्य को ही करना पड़ता है। सभवतः आचार्य के उत्तर से सन्तुष्ट हुआ जा सकता था, परन्तु संस्था की ओर से जो लिखित स्पष्टीकरण प्राप्त हुआ, वह मौािक स्पष्टीकरण से नितान्त विपरीत है।
स्पष्टीकरण में शास्त्रों की पंक्तियाँ उद्धृत करके यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि यज्ञ के लिये दान देने वाले को यज्ञ का फल मिलता है, प्रमाण के रूप में मनुस्मृति के ‘‘अनुमन्ता…….’’, योग-दर्शन के ‘‘वितर्का हिंसादय……’’ आदि कई प्रमाण दिये गये हैं। वे शायद ये भूल जाते हैं कि संसार की किन्हीं भी दो अलग-अलग क्रियाओं का फल एक जैसा नहीं हो सकता। दान करने वाले व्यक्ति को दान का फल मिलेगा,ये भी हो सकता है कि अन्य कार्यों के लिये दान करने की अपेक्षा यज्ञ हेतु दान करने का फल अधिक अच्छा हो पर फल तो दान का ही होगा। दरअसल जब हम यज्ञ का फल केवल वातावरण की शुद्धि-मात्र ही समझ लेते हैं, तब इस तरह के तर्क मन में उभरने लगते हैं, और जब कहीं के भी वातावरण की शुद्धि को यज्ञ का फल मान बैठें तो तर्क और अधिक प्रबल दिखाई देने लगते हैं।
ऋषि दयानन्द ने जिस दृष्टि से यज्ञ का विधान किया है, वह अन्यों सेािन्न है। उन्होंने यज्ञ का विधान भौतिक शुद्धि के साथ-साथ अध्यात्म और वेद-मन्त्रों की रक्षा के लिये भी किया है, साथ ही केवल एक ही जगह और कुछ एक व्यक्तियों के द्वारा ही यज्ञ किये जाने से यज्ञ का भौतिक फल एक ही स्थान पर होगा। यदि इन्हीं सब सीमित परिणामों को यज्ञ का फल मान रहे हैं तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता है।
एक और तर्क ये दिया गया है कि संस्कार विधि में ऋषि दयानन्द ने पति-पत्नी के एक साथ उपस्थित न होने पर किसी एक के द्वारा ही दोनों की ओर से आहुति देने का विधान किया है, इससे सिद्ध होता है कि एक दूसरे के लिये यज्ञ किया जा सकता है। ऋषि दयानन्द ने ये विधान केवल इसलिये किया है, जिससे कि यज्ञ की परपरा बनी रहे, न कि कर्मफल की व्यवस्था को परिवर्तित करने के लिये। एक और तर्क ये कि यदि कोई व्यक्ति भण्डारा, ऋषि लंगर आदि की व्यवस्था करता है, तो उसका फल दानी व्यक्ति को ही मिलना है, पकाने या परोसने वाले को नहीं। यहां पर ये महानुााव अपने ही तर्क ‘‘अनुमन्ता विशसिता………’’ का खण्डन कर गये, जिसमें उन्होंने कहा था कि हिंसा का अपराध माँस बेचने, खरीदने, सलाह देने वाले आदि सभी व्यक्ति द्वारा होता है। एक और तर्क सुनिये- राजा समयाभाव के कारण अपने माता-पिता की सेवा भृत्यों से कराता है। ऋषि दयानन्द व मनु के अनुसार राजा स्वयं राजकार्य में रहकर अग्निहोत्र व पक्षेष्टि आदि के लिये पुरोहित व ऋत्विज् को नियुक्त करे।
ऐसे कई उदाहरण दिये गये हैं, और अन्य भी दिये जा सकते हैं, पर इन सभी उदाहरणों में एक सामान्य सी बात ये है कि सभी जगह अति-आपात् की स्थिति या अन्य बड़ा दायित्व होने की स्थिति में अन्यों से यज्ञादि कराने का विकल्प है, वह भी तब, जबकि व्यक्ति मन में ईश्वर के प्रति आस्था, अध्यात्म, वेद की रक्षा के प्रति पूर्ण निष्ठा रखता हो और किसी अति-अनिवार्यता के कारण से यज्ञादि कार्य में असमर्थ हो। इस परिस्थिति में जिनको नियुक्त किया जाता है वे वेतन, पारिश्रमिक आदि लेकर कार्य करते हैं। यदि दान लेकर दाता के नाम से यज्ञ कराने वाले भी यज्ञ करने का पारिश्रमिक लेते हैं, और दानदाता वास्तव में यज्ञ, वेद, ईश्वर, अध्यात्म के प्रति पूर्ण निष्ठावान् रहते हुये भी यज्ञ करने में पूर्ण अक्षम है तो शायद बात कुछ मानी जा सके, लेकिन उतने पर भी वायु तो वहाँ की ही शुद्ध होगी, जहाँ यज्ञ हो रहा है, वेद-मन्त्र तो उसे ही स्मरण होंगे जो कि मन्त्र बोल रहा है। ईश्वर व अध्यात्म में अधिक गति तो उसकी होगी जो आहुति दे रहा है।
इतने पर भी आप यदि अपनी बात को सैद्धान्तिक और सत्य मानना चाहें तो मानें, परन्तु यह अवश्य स्मरण रखना होगा कि ऋषि दयानन्द ने जिन अन्धविश्वासों का खण्डन किया था, वह सब मिथ्या और व्यर्थ सिद्ध हो जायेगा। एक बार सोनीपत आर्यसमाज के उत्सव पर वहाँ के कर्मठ कार्यकर्त्ता सत्यपाल आर्य जी ने अपने जीवन की घटना सुनाई, उन्होंने बताया कि लोकनाथ तर्क-वाचस्पति उन्हीं के गाँव के थे, वे स्वतन्त्रता संग्राम में आन्दोलन करके जेल गये। उस धरपकड़ में उनके गाँव का पौराणिक पण्डित भी धर लिया गया। जेल में तो वह रहा, परन्तु छूटते समय लोकनाथ जी से बोला, इतने दिनों में तुमने कुछ कमाई की या नहीं? लोकनाथ जी बोले- जेल में कैसी कमाई करेंगे? तो पण्डित ने कहा- मैंने तो इन दिनों अपने सेठों के नाम पर इतना जप किया है, जाते ही पैसे ले लूंगा। तब आप क्या करेंगे?
सारे पौराणिक पण्डित यही तो करते हैं। इनको जो लोग दान देंगे, तो क्या पण्डित जी के कार्य का पुण्य फल उन भक्तों को नहीं मिलेगा? फिर ईसाई लोग स्वर्ग की हुण्डी लेते थे, तो क्या बुरा करते थे, दान का पुण्य तो स्वर्ग में मिलेगा ही। फिर श्राद्ध का भोजन, गोदान, वैतरणी पार होना, यज्ञ में पशुबलि आदि सब कुछ उचित हो जायेगा।
धार्मिक कार्य स्वयं करने, दूसरों से कराने और कराने की प्रेरणा देने से निश्चित रूप से पुण्य मिलेगा, परन्तु स्वयं करने का विकल्प-करने की प्रेरणा देना और दूसरों को सहायता देकर कराना नहीं हो सकता। मेरा भोजन करना आवश्यक है, मुझे दूसरों को भी भोजन कराना आवश्यक है। मेरे भोजन करने का विकल्प दूसरे को प्रेरणा देना और सहायता देकर कराना नहीं होता। मेरे घर कोई आता है तो उसे भोजन कराना ही है। मेरे घर कोई नहीं आया, तो मेरे संस्कार बने रहें, इसलिये मैं कहीं किसी को भोजन कराने की सहायता देता हूँ, वह स्वयं कराये गये भोजन का विकल्प नहीं है। एक के अभाव में अन्य के भोजन की बात है।
यज्ञ, संस्कार आदि का प्रयोजन ऋषि ने शरीरात्म विशुद्धये कहा है। दूर किये गये यज्ञ से या दूसरे के यज्ञ से मेरे शरीर-आत्मा की शुद्धि नहीं होती। किसी की तो होती है, उससे दूसरे का भला करने का लाभ होगा, पर आत्मलाभ की बात इससे पूर्ण नहीं होती। प्राचीन सन्दर्भ से देखें तो ऋषि का यज्ञ-विधान परपरा से हटकर है। पुराने समय के यज्ञ चाहे राजा के हों या ऋषि के, सभी व्यक्तिगत रूप से किये जाने वाले रूप में मिलते हैं। ऋषि की उहा ने यज्ञ को एक सामूहिक रूप दिया है, जिसमें यजमान के आसन पर बैठा व्यक्ति पूरे समूह का प्रतिनिधि है, यह यज्ञ सामाजिक संगठन का निर्माण करने वाला होता है।
यज्ञ में वेद-मन्त्र पढ़ने का लाभ बताते हुए ऋषि लिखते हैं-
जैसे हाथ से होम करते, आँख से देखते और त्वचा से स्पर्श करते हैं, वैसे ही वाणी से वेद-मन्त्रों को भी पढ़ते हैं, क्योंकि उनके पढ़ने से वेदों की रक्षा, ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना होती है तथा होम से जो फल होते हैं, उनका स्मरण भी होता है। वेद मन्त्रों का बार-बार पाठ करने से वे कण्ठस्थ भी रहते हैं और ईश्वर का होना भी विदित होता है कि कोई नास्तिक न हो जाये, क्योंकि ईश्वर की प्रार्थनापूर्वक ही सब कर्मों का आरभ करना होता है।
वेद-मन्त्रों के उच्चारण से यज्ञ में तो उसकी प्रार्थना सर्वत्र होती है। इसलिये सब उत्तम कर्म वेद-मन्त्रों से ही करना उचित है। – ऋग्वेद भूमिका पृ. 721
यह बात इस कारण लिखनी आवश्यक हुई, जिससे जनसामान्य यथार्थ से परिचित हों। किसी के दान से किसी को क्यों द्वेष हो तथा किसी की प्रसिद्धि से ईर्ष्या का क्या लेना? इस अवसर पर संस्कृत की एक उक्ति सटीक लगती है, इसलिये लेख दिया-
का नो हानिः परकीयां खलुचरति रासभोद्राक्षम्।
तथापि असमञ्जसमिति ज्ञात्वा खिद्यते चेतः।।
– धर्मवीर

पण्डित लेखराम वैदिक मिशन की गुरुवर वेदग्य देव धर्मवीर जी को श्रद्धांजली

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ओउम
धर्मवीर जी का यूँ जाना ……….
हाय ! देव के दुर्विपाक से , ये क्या अपने साथ हो गया I
धर्मवीर जी का यूँ जाना, बहुत बड़ा आघात हो गया II
जिनको पाकर परोपकारिणी प्रगति पथ पर चल निकली थी I
परोपकारी पत्र लोकप्रिय , ऋषि उद्यान सनाथ हो गया …….
उनके जितने सद्गुण वाला व्यक्ति मिलना महा कठिन है I
इसीलिये आने वाला दिन , दिन न रहा , अब रात हो गया …
उनके अपनेपन की परिधि , इतनी विस्तृत और विशाल थी I
सत्यनिष्ठ , सिद्धांतनिष्ठ , हर व्यक्ति उनके साथ हो गया ……
लेकिन कपट कुटिलता रखकर सज्जनता का पहन मुखौटा
जो छलने टकराने आया, तर्क बुद्धि से मात हो गया ……

स्वाध्याय उनका सजीव था , वेद शाश्त्र भाषा पण्डित थे I
आयुर्वेद , व्याकरण उनको , तत्व रूप से ज्ञात हो गया …..
उनके प्रवचन लेखन दोनों वर्तमान में अद्वितीय थे I
सम्पादकीय पढ़ा जिसने भी , सबको आत्मसात हो गया
पता नहीं वो क्या नाता था उनका कितनों से ऐसा था ?
बढे बड़ों का धीरज टूटा , खुलकर अश्रुपात हो गया ….
यह सब कुछ लिखते लिखते “गुणग्राहक” तू भी रोया था I
महीनों तक यूँ ही रोयेगा ऐसा विकट विषाद हो गया …
भावी कल को आज समान देखने कि अन्तर्दृष्टि थी I
जिसके बल उनका हर निर्णय , आज सुखद संवाद हो गया
रवि सम ज्ञान प्रकाश हमें , मिलता संग शीतल सी ज्योत्सना के
सुखद सुहाना समय हाय क्यों , सहसा उल्कापात हो गया
अधिक क्या कहूँ सद्गुण प्रेरक , सज्जनता का पोषक जीवन
कल जो हम सबका हिस्सा था , आज पुरानी बात हो गया I I
राम निवास गुणग्राहक

भीष्म स्वामी जी धीरता, वीरता व मौन : राजेंद्र जिज्ञासु जी

भीष्म स्वामी जी धीरता, वीरता व मौन :- इस बार केवल एक ही प्रेरक प्रसंग दिया जाता है। नरवाना के पुराने समर्पित आर्य समाजी और मेरे विद्यार्थी श्री धर्मपाल तीन-चार वर्ष पहले मुझे गाड़ी पर चढ़ाने स्टेशन पर आये तो वहाँ कहा कि सन् 1960 में कलायत कस्बा में आर्यसमाज के उत्सव में श्री स्वामी भीष्म जी कार्यक्रम में कूदकर गड़बड़ करने वाले साधु से आपने जो टक्कर ली वह प्रसंग पूरा सुनाओ। मैंने कहा, आपको भीष्म जी की उस घटना की जानकारी कहाँ से मिली? उसने कहा, मैं भी तब वहाँ गया था।
संक्षेप से वह घटना ऐसे घटी। कलायत में आर्यसमाज तो था नहीं। आस-पास के ग्रामों से भारी संख्या में लोग आये। स्वामी भीष्म जी को मन्त्र मुग्ध होकर ग्रामीण श्रोता सुनते थे। वक्ता केवल एक ही था युवा राजेन्द्र जिज्ञासु। स्वामी जी के भजनों व दहाड़ को श्रोता सुन रहे थे। एकदम एक गौरवर्ण युवा लंगडा साधु जिसके वस्त्र रेशमी थे वेदी के पास आया। अपने हाथ में माईक लेकर अनाप-शनाप बोलने लगा। ऋषि के बारे में भद्दे वचन कहे। न जाने स्वामी भीष्म जी ने उसे क्यों कुछ नहीं कहा। उनकी शान्ति देखकर सब दंग थे। दयालु तो थे ही। एक झटका देते तो सूखा सड़ा साधु वहीं गिर जाता।

मुझसे रहा न गया। मैं पीछे से भीड़ चीरकर वेदी पर पहुँचा। उस बाबा से माईक छीना। मुझसे अपने लोक कवि संन्यासी भीष्म स्वामी जी का निरादर न सहा गया। उसकी भद्दी बातों व ऋषि-निन्दा का समुचित उत्तर दिया। वह नीचे उतरा। स्वामी भीष्म जी ने उसे एक भी शब्द न कहा। उस दिन उनकी सहनशीलता बस देखे ही बनती थी। श्रोता उनकी मीठी तीन सुनने लगे। वह मीठी तान आज भी कानों में गूञ्ज रही हैं :-

तज करके घरबार को, माता-पिता के प्यार को,
करने परोपकार को, वे भस्म रमा कर चल दिये……

वे बाबा अपने अंधविश्वासी, चेले को लेकर अपने डेरे को चल दिया। मैं भी उसे खरी-खरी सुनाता साथ हो लिया। जोश में यह भी चिन्ता थी कि यह मुझ पर वार-प्रहार करवा सकता था। धर्मपाल जी मेरे पीछे-पीछे वहाँ तक पहुँचे, यह उन्हीं से पता चला। मृतकों में जीवन संचार करने वाले भीष्म जी के दया भाव को तो मैं जानता था, उनकी सहन शक्ति का चमत्कार तो हमने उस दिन कलायत में ही देखा। धर्मपाल जी ने उसकी याद ताजा कर दी।

श्री कृष्ण चोर या महापुरुष

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कृष्ण जन्माष्टमी आते ही योगिराज श्री कृष्ण की मान मर्यादा को तार तार करने का सिलसिला प्रारम्भ हो जाता है, सोशल मिडिया को महापुरुषों के लिए शोषण मिडिया बनाकर रख दिया है

महापुरुषों की या हिन्दू देवी देवताओं के किसी की भी जयंती आने वाली हो सोशल मिडिया पर ऐसे संदेशों की बहार आ जाती है जिसमें उन पर कई गन्दी और बेहूदा मजाक बनाई होती है

जन्माष्टमी पर कृष्ण को लेकर एक संदेश बहुत चल रहा है

गुरुवार तारीख 25-08-2016 को दुनिया के सबसे
बड़े डॉन का बर्थडे है
कोई ऐसा गुनाह नहीं जो उन्होंने नहीं किया हो….
1. जेल में जन्म
2. माँ-बाप की हेरा-फेरी
3. बचपन में लड़कियों का चक्कर
4. नागदेवता को भी मार दिया
5. कंकर मार कर लडकियों को छेड़ना
6. 16108 लफड़ा
7. दो-दो बीवियां
8. अपने मामू का मर्डर
9. मथुरा से तड़ीपार
फिर भी भाई कभी पकडे नहीं गये
इसलिए तो उसे में भगवान मानता हूँ

इस संदेश की जड़ वैसे तो कुलषित मनोवृत्ति का कोई असामाजिक तत्व है
परन्तु ये सब बाते फैली है विष्णु पुराण आदि की वजह से, जिसमें हमारे पूर्वज योगिराज श्री कृष्ण के जीवन चरित्र को बेहद घटिया बताया है

हम लोग इन अवैदिक झूठे ग्रन्थों को सही मान कर कृष्ण को इस तरह का समझ बैठते है और ऐसे घटिया बेहूदा संदेशों को मजाक समझकर आगे भेजते रहते है

श्री कृष्ण योगिराज थे और ये विचारणीय बात है की कोई योगिराज क्या धर्मपत्नी को छोड़कर अन्य औरतों के साथ सम्बन्ध रखेगा यहाँ यह बात भी झूठी है कि “नरकासुर की कैद से १६१०० स्त्रियाँ छुड़ाई गई थी जिन्हें संभवतः समाज स्वीकार नहीं कर रहा था, उन्हें पत्नी का सम्मानजनक दर्जा दिया, वे भोगी नहीं योगी थे”

श्री कृष्ण का ओहदा उस समय भी उच्च स्तर का था तो यदि ऐसी कोई घटना हुई की १६१०० स्त्रियों को छुड़ाया तो सम्भवतः कृष्ण जब लोगों को समझाते की ये स्त्रियाँ पवित्र है और जो विवाह योग्य है उनसे उचित व्यक्ति विवाह करे और जो छोटी है उन्हें अपनी बेटी बना उनका लालन पालन करें तो आमजन उनकी बात को समझकर उसे स्वीकार उन स्त्रियों को अपनाते

बाकी जो कपडे चुराना लडकियां छेड़ना जैसी असभ्य हरकतों का जो जिक्र है वह वाम मार्गियों द्वारा बनाये गए ग्रन्थ भागवत हरिवंश पुराण आदि की देन है श्री कृष्ण का जीवन चरित्र महाभारत में मिलता है उससे इतर बाद के लोगों और वाममार्गियों ने उनके बारे में झूठी बाते लिखकर हमारे इतिहास को बदलने की चेष्टा की है

परन्तु यह हम सनातनियों का दायित्व है की हम अपने महापुरुषों को जानकर, समझकर, उनके बारे में सत्य जीवन चरित्र पढ़कर गलतफहमियों को मिटाने का प्रयास करे

youtube पर “pandit lekhram vedic mission” के नाम से एक चैनल है

श्री कृष्ण के विवाहों का सच

राधा का सच

श्री कृष्ण की माखन चोरी और वस्त्र चोरी सच क्या

द्रौपदी के विवाह का सच

जहाँ श्री कृष्ण के बारे में जो झूठी भ्रांतियां फैलाई गई है उनके बारे में एनीमेशन विडियो बनाकर लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया है उन विडियो को भी शेयर करके आप लोगों को जागरूक कर सकते है

जरूरत है लोगों में श्री कृष्ण के जीवन चरित्र को लेकर जागरूकता फैलाने की इसके लिए हमें स्वयं इनके जीवन चरित्र को पढना पड़ेगा और कुछ वेबसाइट पर उनके जीवन चरित्र को लेकर सत्यता बताई है उसे अधिक से अधिक शेयर करने की

इसके लिए आप
www.aryamantavya.in पर जाकर और अधिक विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते है

श्री ब्रजराज जी आर्य – एक परिचय – ओममुनि वानप्रस्थी

श्री ब्रजराज जी आर्य का जन्म बीसवीं शताब्दी के द्वितीय दशक के मध्य में तह. ब्यावर, जिला, अजमेर राज. में हुआ। आपके पिताजी का नाम श्री गोपीलाल जी व माता जी का नाम दाखा बाई था। आपके पिताजी का खेती व चूने भट्टे का व्यवसाय था। उनका जन्म एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। श्री ब्रजराज जी १० वर्ष की आयु में ही आर्य समाज के सम्पर्क में आ गए थे। अल्प आयु में ही वे समाज के प्रति समर्पित हुए। उनके मन में समाज सेवा व देशप्रेम के प्रति लगन थी। उन्होंने आर्य वीर दल के शिविरों में बौद्धिक व शारीरिक प्रशिक्षण प्राप्त किया। श्री रामदेव जी साम्भर वालों से लाठी व तलवार का ज्ञान प्राप्त किया, जिससे श्री ब्रजराज जी को लाठी व तलवार संचालन का अच्छा ज्ञान प्राप्त हुआ। वे एक अच्छे आर्यवीर होने के साथ अच्छे पहलवान भी थे। होली के अवसर पर श्री बजरंग महाराज अनेक स्वांग रचते हुए मुसलमानों के मौहल्ले से गुजरते थे। इस पर मुसलमानों ने बजरंग महाराज को पीटा, जिससे उनके अनेक चोटें आईं। इस पर ब्रजराज जी ने मुसलमानों के मौहल्ले में जाकर उनको ललकारा और मुसलमानों को खदेड़कर आर्य शक्ति का परिचय दिया। ब्रजराज जी पहलवानों के साथ रहने से मजबूत व निर्भीक हो गए। उनका विवाह श्रीमती भँवरी देवी के साथ सम्पन्न हुआ। श्री प्रभु आश्रित जी के द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया, उससे इनके सन्तानें हुईं। युवा अवस्था में ही इनके दो पुत्रों की मृत्यु हो गई। ‘जन्म व मृत्यु एक अटल सत्य है’ इससे परिचित अपने पुत्रों की मृत्यु को भी सहजता से स्वीकार कर लिया। सन् १९५० में वे व्यायामशाला के माध्यम से आर्य समाज के सेवाभावी कार्यकर्त्ता बन गए। अस्पताल में गरीबों व रोगियों को औषधि, फल वितरण, प्रसव हेतु सामग्री प्रदान करने, गरीबों की बच्चियों का विवाह करवाने हेतु आर्थिक सहयोग प्रदान करते थे। वे एक ईमानदार एवं सत्यवादी व्यक्ति थे। धीरे-धीरे उनकी सत्यवादिता व ईमानदारी समाज में प्रचारित होने लगी।
ब्यावर की जनता ने ऐसे कर्मठ समाजसेवी को नगर पालिका, ब्यावर के चुनाव में खड़े होने के लिये कहा, तो उन्होंने मना कर दिया। इस पर वहाँ के लोगों ने स्वयं ही चुनाव का फार्म भरकर, उनके हस्ताक्षर करवाकर, उनको विजेता बनवाया। चुनाव के प्रचार के लिये ब्रजराज जी ने एक रुपया भी खर्च नहीं किया। लगभग ३५ वर्ष तक उन्होंने समाज सेवा की। प्रत्येक तीन माह में जनता की मीटिंग बुलवाते तथा सभी विकास के कार्यों को बतलाते। उनकी समस्या व समाधान पर चर्चा करते। उक्त मीटिंग का प्रचार मैं स्वयं तांगे में बैठकर किया करता था।
सन् १९५६ में सम्पूर्ण भारत की प्रथम वातानुकूलित बस सेवा का परमिट माँगा। उस बस में ए.सी., पंखें, रेडियो, अखबार, बच्चों के लिये खिलौने, पानी और आरामदायक सीटों की व्यवस्था का दावा किया। उच्च न्यायालय में वकालात कर रहे एवं नगर परिषद् ब्यावर के चेयरमैन रह चुके श्री महेशदत्त भार्गव ने यहाँ तक कहा कि आर्यसमाजी श्री ब्रजराज आर्य कभी झूठ नहीं बोलते। ये जो कहते हैं वह करके दिखाते हैं और यदि ये अपने दावे में कहीं पर भी कमजोर साबित हुए तो स्वयं ही हमें परमिट लौटा देंगे। जब इस तरह की अत्याधुनिक सुविधा सम्पन्न बस के संचालन हेतु परमिट माँगी तो अनुमति प्रदान करने वालों को यह पूर्णतया मिथ्या लगा। और तब ब्रजराज जी आर्य की सत्यनिष्ठा एवं ईमानदारीपूर्ण व्यक्तित्व के साक्षी एक सदस्य श्री महेशदत्त भार्गव के कहने पर परमिट मिली। और तब उस बस का निर्माण किया गया। यह बस ब्यावर से अजमेर के लिए संचालित की गई। उस जमाने में इस प्रकार की सर्वसुविधायुक्त बस का निर्माण एवं संचालन ने जनता व अधिकारियों को अचम्भित कर दिया। उस बस में बैठने वालों में मैं भी सम्मिलित था।
इसी प्रकार एक बार नगर परिषद् ब्यावर ने पानी के मीटर लगाने की तैयारी की, तो श्री ब्रजराज जी ने इसे जनता के विरुद्ध मानते हुए, उन मीटरों को नहीं लगाने के लिए आन्दोलन छेड़ दिया तथा पक्ष व विपक्ष के पार्षदों को आमन्त्रित किया। श्री ब्रजराज जी के पक्ष में पानी के मीटर नहीं लगाने हेतु अधिकांश पार्षदों एवं सम्पूर्ण जनता ने अपना समर्थन दिया।
अगस्त १९७५ में अजमेर में बाढ़ के समय काफी तबाही हुई, जिसमें ब्रजराज जी के नेतृत्व में आर्य समाज ब्यावर ने सेवा की। लगभग तीन-चार दिनों तक पाँच-पाँच हजार लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था करवाई। लगभग ५० कार्यकर्त्ता प्रतिदिन सेवा में आते थे। गायत्री मन्त्र के उपरान्त सबको भोजन करवाया जाता था। वर्तमान कलेक्टर श्री कुमठ जी भी उनकी प्रशंसा करते थे। अजमेर के अतिरिक्त डेगाना, नागौर में भी उन्होंने सेवा प्रदान की।
२६ जनवरी २००१ में आये भूकम्प से तबाह हुए गुजरात राज्य में भी श्री ब्रजराज जी के नेतृत्व में आर्यसमाज ब्यावर ने सेवा प्रदान की।
श्री ब्रजराज जी काफी समय तक आर्य समाज ब्यावर के प्रधान व मन्त्री पद पर रह कर सेवा प्रदान की।
वर्तमान में श्री ब्रजराज जी की आयु १०० वर्ष से ऊपर हो गई है किन्तु वे प्रतिदिन दैनिक यज्ञ करना नहीं भूलते। यज्ञ की प्रेरणा उनको श्री प्रभु आश्रित जी ने प्रदान की थी।

सलामतराय कौन थे: राजेन्द्र जिज्ञासु

सलामतराय कौन थे?ः-

परोपकारी में इस सेवक ने महाशय सलामतराय जी की चर्चा की तो माँग आई है कि उन पर कुछ प्रेरक सामग्री दी जाये। श्री ओमप्रकाश वर्मा जी अधिक बता सकते हैं। स्वामी श्रद्धानन्द जी की कोठी के सामने जो पहली बार जालंधर में उनके दर्शन किये, वह आज तक नहीं भूल पाया। भूमण्डल प्रचारक मेहता जैमिनि जी के व्याख्यान में कादियाँ में यह प्रेरक प्रसंग सुना था कि कन्या महाविद्यालय की स्थापना पर केवल पाँच कन्यायें प्रविष्ट हुई थीं। उनमें एक श्री सलामतराय जी की बेटी भी थी। महात्मा मुंशीराम जी की पुत्री वेदकुमारी तो थी ही। शेष तीन के नाम मैं भूल गया हूँ। इस पर नगर में पोपों ने मुनादी करवाई कि बेटियों को मत पढ़ाओ। पढ़-लिख कर गृहस्थी बनकर पति को पत्र लिखा करेंगी। यह कार्य (पत्र लिखना) लज्जाहीनता है। ऐसी-ऐसी गंदी बातें मुनादी करवाकर कन्या विद्यालय के कर्णधारों के बारे में अश्लील कुवचन कहे जाते थे।
मेहता जी ने यह भी बताया था कि ऋषि भक्त दीवानों द्वारा यह मुनादी करवाई जाती थी कि विद्यालय में प्रवेश पानेवाली प्रत्येक कन्या को चार आने (१/४ रु०) प्रतिमास छात्रवृत्ति तथा एक पोछन (दोपट्टा) मिला करेगा। वे भी क्या दिन थे! कुरीतियों से भिड़ने वालों को पग-पग पर अपमानित होना पड़ता था। महाशय सलामतराय जी अग्नि-परीक्षा देने वाले एक तपे हुये आर्य यौद्धा थे।
जो प्रेरक प्रसंग एक बार सुन लिया, वह प्रायः मेरे हृदय पर अंकित हो जाता है। महात्मा हंसराज के नाती श्री अमृत भूषण बहुत सज्जन प्रेमी थे। महात्माजी पर मेरी पाण्डुलिपि पढ़कर एक घटना के बारे में पूछा, ‘‘यह हमारे घर की बात आपको किसने बता दी?’’ मैंने कहा, क्या सत्य नहीं है? उन्होंने कहा, ‘‘एकदम सच्ची घटना है, परन्तु मेरे कहने पर आप इसे पुस्तक में न देवें।’’ वह अठारह वर्ष तक अपने नाना के घर पर रहे। उन्हें इस बात पर आश्चर्य हुआ करता था कि इस लेखक को पुराने आर्य पुरुषों के मुख से सुने असंख्य प्रसंग ठीक-ठीक याद हैं।