Category Archives: श्रेष्ठ आर्य

‘शूरता की शान श्रद्धानन्द थे’: राजेन्द्र ‘जिज्ञासु’

यह सन् १९९४ से भी पहले की घटना है, आदरणीय क्षितीश कुमार जी वेदालंकार ने हमारा एक लेख ‘जब महात्मा मुंशीराम जी को फांसी पर लटकाया गया’ पढक़र अत्यन्त भावुक होकर बड़े प्रेम से इस विनीत से कहा था कि अब तक जिस-जिसने भी स्वामी श्रद्धानन्द जी महाराज की जीवनी लिखी है, उनमें से कोई भी उर्दू नहीं जानता था। उस युग में आर्यसमाज के सब बड़े-बड़े पत्र उर्दू में छपते थे। साहित्य भी अधिक उर्दू में छपता रहा, इस कारण श्री स्वामी जी के जीवनी लेखक उनसे पूरा न्याय न कर सके। आपने आर्यसमाज के निर्माताओं के जीवन पर बहुत खोजपूर्ण ग्रन्थ लिखे हैं। स्वामी श्रद्धानन्द जी महाराज पर अब लेखनी उठायें।

गुणी कृपालु विद्वान् का आदेश शिरोधार्य करते हुये इस कार्य को करने की हाँ भर दी। कुछ वर्ष पूर्व प्रिय श्री अनिल आर्य की प्रेरणा से लिखना आरम्भ भी कर दिया, परन्तु आर्यसामाजिक कार्यों की अधिकता में यह कार्य बीच में छूट गया। अब कमर कसकर यह लेखक कुछ समय से इस कार्य में जुट गया है। आर्यवीरों की प्रेरणा पर प्राणवीर पं. लेखराम जी पर नेट पर किये जा रहे निरन्तर आक्रमणों का उत्तर प्रत्युत्तर देकर अब हम पूरा समय अपने नये ग्रन्थ ‘शूरता की शान श्रद्धानन्द’ के लेखन कार्य में दे रहे हैं। ‘शूरता की शान श्रद्धानन्द’ एक छोटी पुस्तक पहले भी दी थी। अब बहुत बड़ा ग्रन्थ लिखा जा रहा है। पं. लेखराम जी, वीर राजपाल के लहू की धार से प्रेरणा पाकर कुछ कृपालु आर्यवीर इसके प्रकाशन के लिये मैदान में अपने आप आ गये हैं।

अब कई व्यक्ति अपनी-अपनी पीएच.डी. आदि के लिये चलभाष पर लम्बी-लम्बी जानकारी चाहते हैं। ऐसे सब सज्जनों को बोलना पड़ा है- समय नहीं है। जिस कार्य को हाथ में लिया है, जीवन की सांझ में प्रभु कृपा से उसे पूरा करने दीजिये।

मित्रो! ‘सद्धर्म प्रचारक’ उर्दू की पूरी फाइल, तेज दैनिक, पतितोद्धार, ‘शुद्धि समाचार’ आदि पत्रों के बलिदान अंक (१९२६) हमारी पहुँच में हैं। हिन्दी सद्धर्म प्रचारक की $फाइल भी कभी देखी-पढ़ी थी। मिजऱ्ाइ पत्र अल्$फज़ल की भी सन् १९२०-१९२७ तक सारी फाईलें हमने पढ़ रखी हैं और क्या-क्या हमारी पहुँच में है, उससे पाठक सोच-समझ लें कि यह ग्रन्थ कैसा होगा? स्वामी जी महाराज के जीवनकाल में छपी उनकी प्रथम जीवनी भी हमने पढ़ी है। उनके बलिदान पर छपी सबसे पहली पुस्तक भी हमारे पास है। प्रेमी पाठकों का स्नेह व आशीर्वाद चाहिये। प्रतीक्षा करें। नये वर्ष में यह ग्रन्थ आर्यजाति को भेंट किया जायेगा।

 

वृद्धों की दिनचर्या: – राजेन्द्र ‘जिज्ञासु’

वृद्धों की दिनचर्या:- सेवानिवृत्त होने पर क्या करें? समय कैसे बिताया जाये? यह समस्या बहुतों को सताती है। ऐसा इसलिये होता है, क्योंकि अधिकांश लोग उद्देश्यहीन जीवन जीते हैं। वे पैदा हो गये, इसलिये जीना पड़ता है। खाने-पीने के आगे कुछ सोचते ही नहीं। दयानन्द कॉलेज शोलापुर में विज्ञान के एक अत्यन्त योग्य प्राध्यापक टोले साहिब थे। धोती पहने कॉलेज में आते थे। अध्ययनशील थे, परन्तु थे नास्तिक। एक बार वह हमारे निवास पर पधारे। मेरे स्वाध्याय व अध्ययन की उन्होंने वहाँ बैठे व्यक्तियों से चर्चा चला दी। वह सेवानिवृत्त होने वाले थे। उनकी पुत्रियों के विवाह हो चुके थे। अपने बारे में बोले, मेरी समस्या यह है कि रिटायर होकर समय कैसे बिताऊँगा? मैं नास्तिक हूँ। मन्दिर जाना, सन्ध्या-वन्दन में प्रात:-सायं समय लगाना, सत्संग करना, यह मेरे स्वभाव में नहीं।

पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय जी से प्रात: भ्रमण करते समय एक व्यक्ति ने पूछा, मुझे बताइये मैं रिटायर होने वाला हूँ। रिटायर होकर क्या करूँ? उपाध्याय जी ने कहा, जो आप अब तक करते रहे हो, वही करोगे। यह उत्तर बड़ा मार्मिक है। कई व्यक्ति रिटायर होने पर मुझसे भी यही प्रश्न पूछते हैं कि आप दिनभर व्यस्त रहते हैं, हमें भी कुछ बतायें, हम क्या करें?

डॉ. वसन्त जी का उदाहरण:- परोपकारी के एक प्रेमी पाठक डॉ. स.ल. वसन्त ९२ वर्ष पूरे करने वाले हैं। देश के एक जाने-माने आयुर्वेद के आचार्य रहे हैं। अब बच्चे कोई काम-धंधा नहीं करने देते। कई प्रदेशों में उच्च पदों पर कार्य कर चुके हैं। वह दिनभर गायत्री जप, ओ३म् का नाद और वेद के स्वाध्याय में व्यस्त-मस्त रहते हैं। परोपकारिणी सभा से चारों वेद भाष्य-सहित मंगवाये। डॉ. धर्मवीर जी, आचार्य सोमदेव जी, कर्मवीर जी व लेखक उनके दर्शन करने गये थे। तब एक वेद का स्वाध्याय पूरा करके दूसरे वेद का स्वाध्याय आरम्भ किया था।

अब उन्हें असली महात्मा पुस्तक भेंट करने गया, तो मेरे साथ मेरा नाती पुलकित अमेरिका में एक गोष्ठी में भाग लेने से पूर्व उनका आशीर्वाद लेने गया। हम यह देखकर अत्यन्त दंग रह गये कि आप तब तीन वेद पूरे करके चौथे का पाठ कर रहे थे। अपनी दिनचर्या के कारण वह सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं। शरीर में किसी विकार का प्रश्न ही नहीं। परोपकारी के आरपार जाकर उन्हें चैन आता है।

ऐसे ही मैंने आचार्य उदयवीर जी को सद्ग्रन्थों के स्वाध्याय व अनुसन्धान में डूबा देखा। जीवन की अन्तिम वेला में भी उनकी दिनचर्या सबके लिये एक उदाहरण थी। जो व्यक्ति आनन्दपूर्वक वृद्धावस्था में जीना चाहता है, उसे अपनी शास्त्र-सम्मत दिनचर्या बनानी चाहिये। अमृत वेला में उठना, भ्रमण, प्राणायाम, व्यायाम, उपासना व स्वाध्याय को जीवन का पौष्टिक आहार मानकर जीने वाले सुखपूर्वक जीते मिलेंगे। संसार से सुखपूर्वक विदा होने के इच्छुक भी दिनचर्या बनाकर जीना सीखें और कोई मार्ग है ही नहीं।

आत्मनिवेदन: दिनेश

आचार्य धर्मवीर जी नहीं रहे। यह सुनना और देखना अत्यंत हृदय विदारक रहा है। आचार्य धर्मवीर जी देशकाल के विराट मंच पर महर्षि दयानन्द के विचारों के अद्वितीय कर्मवीर थे। महर्षि दयानन्द के विचारों के विरुद्ध प्रतिरोध की उनकी क्षमता जबर्दस्त थी। वैचारिक दृष्टि से तात्विक चिन्तन का सम्प्रेषण सहज और सरल था, यही उनका वैशिष्ट्य था, जो उन्हें अन्य विद्वानों से अलग खड़ा कर देता है। वे जीवनपर्यन्त संघर्ष-धर्मिता के प्रतीक रहे। ‘परोपकारी’ के यशस्वी सम्पादक के रूप में उन्होंने वैदिक सिद्धान्त ही नहीं, अपितु समसामयिक विषयों पर अपने विचारों को खुले मन से प्रकट किया। वे सत्य के ऐसे योद्धा थे जो महर्षि दयानन्द द्वारा प्रतिपादित पथ के सशक्त प्रहरी रहे और ऐसा मानदण्ड स्थापित कर गये, जो अन्यों के लिये आधारपथ सिद्ध होगा। मानवीय व्यवहारों के प्रति वे सिद्धहस्त थे। भले ही अपने परिवार पर केन्द्रीभूत न हुये हों, परन्तु समस्त आर्यजगत् की आदर्श परोपकारिणी सभा के विभिन्न प्रकल्पों के प्रति वे सर्वात्मना समर्पित रहे।

उन्होंने ‘परोपकारी’ का सम्पादन करते हुए जिन मूल्यों, सिद्धान्तों का निर्भय होकर पालन किया, जिस शैली और भाषा का प्रयोग किया, जिन तथ्यों के साथ सिद्धान्तों को पुष्ट किया, वे प्रभु की कृपा से ही संभव होते हैं। मैं विश्वास दिलाता हँू कि कीर्तिशेष आचार्य धर्मवीर जी ने सम्पादन का जो शिखर निर्धारित किया है वहाँ तक पहुँचना यद्यपि असंभव है तथापि केवल भक्ति-भावना से मैं चलने का प्रयास भी कर लूँ तो भी मेरे लिए परमशुभ हो सकेगा। प्रभु मुझे इसकी शक्ति दे।

‘परोपकारी’ के पाठक विगत लगभग ३३ वर्षों से अमूल्य विरासत से परिपूर्ण तार्किक विश्लेषण से सम्प्रक्त सम्पादकीय पढऩे के आदी हुए हैं, उस स्तर को बनाये रखना यद्यपि मेरे लिये दुष्कर है, लेकिन पाठक हमारे मार्गदर्शक हैं, मैं आचार्य धर्मवीर जी के द्वारा निर्धारित पथ का पथिक मात्र हो सकूं, यही मेरे लिये परम सौभाग्य की बात होगी।

आज चुनौतियाँ हैं, दबाव हैं, सिद्धान्तों के प्रति मतवाद है, फिर भी हमें इन सभी से सामना करना है।

आचार्य धर्मवीर जी ने महर्षि दयानन्द के चिन्तन को सम्पूर्ण रूप में स्वीकार कर उनकी उत्तराधिकारिणी परोपकारिणी सभा की जीवन्तता में अद्वितीय साहस का परिचय दिया। राष्ट्र की आकंाक्षा को दृष्टिगोचर रखते हुए वे अघोषित आर्यनेता के रूप में आर्यजगत् के सर्वमान्य नेतृत्वकर्ता बने। वैदिक संस्कृति और सभ्यता के माध्यम से उन्होंने सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक मूल्यों को समृद्ध ही नहीं किया अपितु अपने व्यक्तित्व से, लेखनी से, वक्तृत्वकला से राष्ट्रीय तत्वों की अग्रि को उद्बुध किया।

आचार्य डॉ. धर्मवीर कुशल संगठनकत्र्ता थे, उन्होंने दृढ़ इच्छाशक्ति और समर्पण से जहाँ परोपकारिणी सभा को आर्थिक स्वावलंबन दिया, वहीं सृजनात्मक अभिव्यक्ति से वैदिक सिद्धान्तों के विरोधियों को भी वैदिक-दर्शन से आप्लावित किया। आचार्य धर्मवीर ने जीवनपर्यंत उत्सर्ग करने का ही कार्य किया, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से उन्होंने स्वयं को परिपूर्ण किया है। वैदिक पुस्तकालय में नित्य नूतन ग्रन्थों का प्रकाशन, वितरण, नवलेखन को प्रोत्साहन, वैदिक साहित्य के अध्येताओं को वैदिक साहित्य पहुँचाना जैसे पुनीत कार्य उनके कत्र्तृत्व के साक्ष्य परिणाम हैं। उन्होंने सारस्वत साधना से विभिन्न विद्वानों, संन्यासियों के व्यक्तिगत पुस्तकालयों को मँगवाकर वैदिक पुस्तकालय को समृद्ध किया है।

आचार्य डॉ. धर्मवीर ने महर्षि दयानन्द के हस्तलेखों, उनके द्वारा अवलोकित ग्रन्थों एवं उनके पत्रों इत्यादि का डिजिटलाईजेशन करने का अभूतपूर्व कार्य किया ताकि आगामी पीढ़ी को उस अमूल्य धरोहर को संरक्षित कर सौंपा जा सके। आर्यसमाज के प्रसिद्ध चिन्तकों को निरन्तर प्रोत्साहन कर लेखन के लिए सहयोग प्रदान करने का उन्होंने जो महनीय कार्य किया है, वह स्तुत्य है।

वैदिक चिन्तन के अध्येता आचार्य धर्मवीर जी ने परोपकारी पत्रिका को पाक्षिक बनाकर उसकी संख्या को १५ हजार तक प्रकाशित कर, देश-विदेश में पहुँचाकर एक अभिनव कार्य संपादित किया। उनकी भाषा में सहज प्रवाह और ओज था। वैदिक विचारों के प्रति वे निर्भीक और ओजस्वी वक्ता के रूप में हमेशा याद किये जाएंगे। उनकी मान्याता थी कि असत्य के प्रतिकार में निर्भय होकर अपने विचारों को व्यक्त करने का अधिकार जन्मजात है। लेकिन संवादहीनता उन्हें स्वीकार्य नहीं थी। यही कारण था कि वे अजातशत्रु कहलाते थे। परोपकारी के लेखों और संपादकीय के द्वारा आर्यजगत् में उनकी प्रासंगिकता निरन्तर प्रेरणादायी बनी रही। सहज और सरल शब्दों में वैदिक सिद्धान्तों के प्रति कितने ही बड़े व्यक्ति की आलोचना करने में वे कभी भयभीत नहीं हुए। उन्होंने भारत के समस्त विश्वविद्यालयों के कुलपतियों व कुलसचिवों को परोपकारी पत्रिका नि:शुल्क पहुँचाने का अभिनव कार्य किया।

उन्होंने देवभाषा संस्कृत को जिया और अपने परिवार से लेकर समस्त आर्यजनों को भी आप्लावित किया। यह कहना और अधिक प्रासंगिक होगा कि अष्टाध्यायी-पद्धति के अध्ययन और अध्यापन को महाविद्यालय में ही नहीं अपितु ऋषिउद्यान में संचालित गुरुकुल में पाणिनी-परम्परा का निर्वहन करने का उन्होंने अप्रतिम कार्य किया।

आचार्य धर्मवीर जी ऋषिउद्यान मेें विभिन्न भवनों के नवनिर्माण के प्रखर निर्माता थे, जिन्होंने देश में निरन्तर भ्रमण करते हुए धन का संग्रह कर विद्यार्थियों, साधकों, वानप्रस्थियों और संन्यासियों के लिए श्रेष्ठ  आवास की सुविधा प्रदान की, ताकि ऋषिउद्यान में निरन्तर आध्यात्मिक जीवन का संचार होता रहे एवं चर्चा का कार्य संपादित होता रहे। वे स्पष्ट वक्ता थे। उन्हें कितनी ही बार विभिन्न महाविद्यालयों के प्राचार्य का पद, चुनाव लडऩे, पुरस्कार प्राप्त करने हेतु आग्रह किया गया, लेकिन उनके लिए ये पद ग्राह्य नहीं थे। उनके लिए महर्षि दयानन्द का अनुयायी होना ही सबसे बड़ा पद था।

आचार्य डॉ. धर्मवीर जी, आचार्य की प्रशस्त परम्परा की साक्षात् प्रतिमूर्ति थे। वे अकेले ही अन्याय का प्रतिकार करने में समर्थ थे। वे उन मतवादियों के लिए कर्मठ योद्धा थे, जो भारत विरोधी मत रखते थे। उन्हें यह स्वीकार नहीं था कि लोग क्या कहेंगे अपितु उन्हें यह स्वीकार्य था कि आर्ष परम्परा क्या है। समकालीन प्रख्यात विचारकों, राजनीतिक व्यक्तियों, विद्वानों का वे व्यक्तिश: आदर करते थे, परन्तु वैदिक विचारधारा के विरुद्ध लोगों का खण्डन करने में वे कोताही नहीं बरतते थे। उन्होंने परोपकारिणी सभा के विकल्पों का संवर्धन किया और परोपकारिणी सभा की यशकीर्ति को फैलाने में विशेष योगदान किया। आलोचना और विरोधों का धैर्यपूर्वक सामना करना उनकी विशेषता थी।

वे दिखने में कठोर थे, लेकिन हृदय से अत्यन्त सरल थे। चाहे आचार्य वेदपाल सुनीथ हों या श्री नरसिंह पारीक या डॉ. देवशर्मा या सहायक कर्मचारी सुरेश शेखावत, मैंने ऐसे दृढ़निश्चयी स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की आँखों में उन सबके लिए अश्रुकणों को बहते देखा है। आर्थिक सहयोग करना, बिना किसी को बताये, यह उनकी मानवीय श्रेष्ठता का अद्वितीय उदाहरण है।

ऐसे चिन्तक, विशेषताओं के आगार, वैदिक चिन्तन के सजग प्रहरी तथा विचारों के विरल विश्लेषक आचार्य डॉ. धर्मवीर जी की संपादकीय परम्परा के कार्य का प्रारम्भ करते हुए मैं उन्हें जिन्होंने अनादि ब्रह्म की उपासना के साथ राष्ट्रचेता महर्षि दयानन्द के विचार और आचार से कभी विमुख नहीं हुए, को शत्-शत् नमन करता हुआ उस पथ का अनुयायी बनने का प्रयास करूं, ऐसा विश्वास दिलाता हँू।

आपका

– दिनेश

मेरे अंतेवासी बन्धु : डॉ. धर्मवीर: -स्वामी वेदात्मवेश

मैं और डॉ. धर्मवीर जी एक ही कुल के अन्तेवासी थे। वह महर्षि दयानन्द सरस्वती के कर्मठ, तपस्वी, प्रिय शिष्य स्वामी श्रद्धानन्द की तप:स्थली गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार थी। वहाँ से डॉ. धर्मवीर जी ने एम.ए. और आयुर्वेदाचार्य किया और मैंने वेदालंकार। श्रद्धेय तप:पूत, सरल, प्राञ्जल, गुरुवर्य पं. रामप्रसाद जी वेदालंकार, आर्यनगर, ज्वालापुर हरिद्वार में उनके आवास पर मैं वेदपठन के लिये गया था। तब डॉ. धर्मवीर जी अपनी धर्मपत्नी ज्योत्स्ना जी के साथ स्नातक से पदौन्नत हो ‘नव-गृही’ (गृहस्थी) बन आचार्य जी को प्रथम बार मिलने आये थे। उस समय आर्यसमाज और गुरुकुल का स्वर्णिमकाल था। अतित के गुरु शिष्य के गौरवशाली संबन्ध का कितना सुन्दर निरुपण है यह रूपक। अन्तेवासी आचार्य चरणों में समित्पाणि होकर आया था। ‘‘सा विद्या या विमुक्तये’’ पवित्र ऋषियों की तपस्थली की तरह वेद की ऋचाओं के अनुरूप स्वामी श्रद्धानन्द जी ने गुरुकुल काँगड़ी की स्थापना की थी और वेद का यह संदेश सामने रख कर गुरुकुल भूमि का चयन किया था।

उपह्वरे च गिरीणां संगमे च नदीनाम्।

धिया विप्रो अजायत।।  यजु.।।

गुरुकुल के दीक्षान्त समारोह में यह कुलगीत सब दीक्षित स्नातकों की हृत्तन्त्रि को झंकृत करने वाला ओजस्वी संदेश देता था। प्राणों से हमको प्यारा है कुल हो सदा हमारा। विष देनेवालों के  भी बन्धन कटाने वाला। मुनियों का जन्मदाता कुल हो सदा हमारा। कट जाय सिर न झुकना यह मन्त्र जपने वाले वीरों का जन्मदाता कुल हो सदा हमारा। तन मन सभी निछावर कर वेद का संदेशा जग में पहुँचाने वाला। कुल हो सदा हमारा। स्वाधीन दीक्षितों पर सब कुछ लुटाने वाले धनियों का जन्मदाता, कुल हो सदा हमारा। हिमशैल तुल्य ऊँचा भागीरथी-सा पावन, बटुक का मार्ग दर्शक कुल हो सदा हमारा। अदित्य ब्रह्मचारी ज्योति जगा गया है अनुरूप पुत्र उसका कुल हो सदा हमारा।

ऐसे ओजस्वी आर्यसमाज के प्रहरी, कर्मठ, कुलपुत्र के रूप में डॉ. धर्मवीर जी ने अपना सम्पूर्ण जीवन देश जाति, संस्कृति, समाज के लिये समर्पित किया था। प्रखर राष्ट्रवादी पंजाब केसरी ला. लाजपतराय आर्य समाज को अपनी ‘माँ’ मानते थे। उस आर्यसमाज रूपी ‘माँ’ को जिस पुत्र पर गर्व अनुभव हो ऐसे गौरवशाली सुपुत्र थे, डॉ. धर्मवीर। बचपन में कभी सुनते थे ‘‘महानाश की ज्वालायें भारत पर दौड़ी आ रही हैं, आर्यों तुमको कुछ करना है मानवता चिल्ला रही इस धरती पर कौन बढेगा हमें बता दो आर्यसमाज!! कौन बढेगा? आर्यसमाज!! कौन बढेगा? आर्यसमाज!!’’ व्यक्तिश: मैं डॉ. धर्मवीर जी के रूप में ‘परोपकारी’ पत्रिका के माध्यम से आर्यसमाज के बढते चिह्नों से निश्चिन्त था कि आर्यसमाज का एक प्रहरी अभी जिन्दा है। व्यक्तिश: मेरा डॉ. धर्मवीर जी और ज्योत्स्ना जी दोनों परिवार से जुड़ाव रहा। परोपकारी के सम्पादक श्री धर्मवीर जी के रूप में। यह आश्वासन उनकी उपस्थिति मात्र से मिलता था। बस आज वह भी स्वप्र भी भंग हो गया। डॉ. धर्मवीर जी से श्वसुर भारतेन्द्रनाथ जी से हमारा जुड़ाव था, पृष्ठभूमि थी आर्यसमाज, जो बाद में वेदभिक्षु बने। वे दयानन्द के दीवाने थे। तब पं. राकेशरानी का ‘जनज्ञान’ के माध्यम से हमें पत्र मिला- कौन करेगा स्वीकार, मेरे राखी के ये तार। तो हमने भी हम करेंगे स्वीकार, आपके राखी के ये तार। के उत्तर के रूप में ‘जनज्ञान’ में एक लेख भी दिया था। तब मैं श्रीमद् दयानन्द ब्राह्म महाविद्यालय (उपदेशक महाविद्यालय) हिसार, हरियाणा में पढ़ता था। बाद में गुरुकुल काँगड़ी आया। ज्योत्स्ना जी के साथ जब डॉ. धर्मवीर जी के वाग्दान का निश्चय हुआ था तब मैं दोनों ओर से था। दिल्ली में डॉ. योगानन्द शास्त्री के यहाँ वह आयोजन था। तब यज्ञ में आर्यजगत् के  प्रथित यश आर्य संन्यासी डॉ. सत्यप्रकाश जी भी उपस्थित थे। डॉ. धर्मवीर जी के  अनुज भाई प्रकाश जी तब गुरुकुल काँगड़ी में हमारे साथ पढ़ते थे। महाराष्ट्र के गुंजोटी से जुड़े होने से प्राध्यापक जिज्ञासु जी के माध्यम से मेरी और श्री भारतेन्द्रनाथ जी (वेदभिक्षु) से उनके करौल बाग स्थित ‘जनज्ञान’ कार्यालय में मेरा प्रथम परिचय हुआ था। चूंकि शोलापुर दयानन्द कॉलेज में प्राध्यापक जिज्ञासु जी मेरे बड़े भाई श्री शिवराज आर्य ‘‘बेधडक़’’ एवम् मुझसे वे पूर्व परिचित थे। जन्म स्थली गुंजोटी से उनका विशेष लगाव रहा है। जिसे वे प्यार से आज भी अपने पंजाबी लहजे में गंजोटी (महाराष्ट्र) ही कहते हैं। जिसे आर्यजगत् के  विद्वान् आचार्य विश्वबन्धु जी जो गुँज उठी वह गुंजोटी अपने व्याख्यानों में उसका निर्वचन करते थे। आज आर्यसमाज में सक्रिय स्व. पं. दिगम्बरराव गुरुजी, श्री रमेश गुरुजी, श्री काशीनाथ गुरुजी, पं. प्रियदत्त शास्त्री जी, पं. रायाजी शास्त्री जी, श्री प्रताप सिंह चौहान इसी गुंजोटी की देन हैं। जो भूमि हैदराबाद के सत्याग्रह के समय हुये प्रथम बलिदानी हुतात्मा वेदप्रकाश के बलिदान से पावन हुई है जिसकी मिट्टी की महकती खुशबू ने आचार्य डॉ. धर्मवीर जी को अभी हाल ही में वहाँ बुलाया था और वाग्मी धर्मवीर जी ने वहाँ की जनता को अमृतमय् वेदोपदेश से खुब संतृप्त भी किया था।

गुरुकुल काँगड़ी ने आर्य जगत् में पत्रकारिता के बड़े-बड़े मानदंड स्थापित किये हैं। १९७५ के बाद दैनिक हिन्दुस्तान से अलग होकर पं. क्षितिज वेदालंकार ने ‘आर्यजगत्’ को जिस ऊँचाई पर पहुँचा दिया था अथवा उससे पूर्व ‘आर्योदय’ एवं ‘जनज्ञान’ के माध्यम से भारतेन्द्रनाथ जी ने जो यश आर्यजगत् में अर्जित किया था। बाद में वही यश डॉ. धर्मवीर जी ने ‘परोपकारी’ पत्रिका के माध्यम से अर्जित किया और एक मानदंड स्थापित किया। वर्तमान में आर्यजगत् में सम्पादन कौशल में डॉ. धर्मवीर जी कवि कुलगुरु कालिदास की तरह ‘कनिष्ठिकाधिष्ठित धर्मवीर:’ ऐसा कहें तो अत्युक्ति नहीं होगी। डॉ. धर्मवीर जी के लेखन में निर्भिकता, प्रज्ञा की विलक्षण अद्भुतता, प्रवाह, अन्वेक्षा, लाघव, सरलता, दृढ़ता, समन्वय एवं प्रासंगिकता का सुन्दर, सन्तुलित समायोजन मिलता है। डॉ. धर्मवीर जी वर्तमान के  ‘आर्यसमाज की आशा की किरण’ थे। बस आज दु:ख के साथ यह बताने में हमें यद्किंचित भी संकोच नहीं है कि सम्पूर्ण आर्यसमाज का नेतृत्व आर्यसमाज की गाड़ी को पटरी से उतारने में मशगूल है। जिस वाटिका का माली दयानन्द था उसको उजाडऩे में लोग लगे हैं। असली, नकली, फसली आर्यसमाजियों के बीच नकली, फसली लोगों का बोलबाला अधिक है, जबकि असली ‘विजनवास’ को भोगने के लिये अभिशप्त हैं। यह आर्य समाज ही नहीं देश और विश्व के लिये बड़ी पीड़ा एवं यन्त्रणा का विषय है। इस तरह की जटिल राजनीति की दुर्भिसन्धि के मध्य डॉ. धर्मवीर जी की अन्त:पीड़ा उनके सम्पादकीय के माध्यम से पुन:-पुन: उजागर होती थी। जो सच्चे आर्यसमाजियों क ो उत्साह और निरन्तर प्रेरणा देती रहती थी। डॉ. धर्मवीर जी के शंकराचार्य, विवेकानन्द का हिन्दुत्व और हाल ही में स्वतन्त्रता दिवस पर मोदी जी द्वारा दयानन्द का उल्लेख न होना -भय या अज्ञान, अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी और अन्यान्य भारतीय भाषाओं को बढावा देने वाली एक उनकी समसामयिक सम्यक सुलझी हुई सोच, उनके द्वारा लिखित सम्पादकीय में दूरदृष्टि को ही रेखांकित करती है। मैं अभी हाल ही में माता राकेश रानी जी को मिलने दिल्ली गया था। तब ज्योत्स्ना जी से उनकी बहन सुमेधा जी के साथ परिवार की चर्चा चल रही थी। सुमेधा जी के अन्यत्र जाने पर ज्योत्स्ना जी और हमारे मध्य चर्चा का एक ही विषय था। वे थे डॉ. धर्मवीर जी। मैं काफी अन्तराल के बाद ज्योत्स्ना जी को मिला था। डॉ. धर्मवीर जी का विषय आते ही अपने पिता की तरह सरल, स्पष्टवादी ज्योत्स्ना जी भावुक हो गई थी। डॉ. धर्मवीर जी नहीं बनते यदि ज्योत्स्ना जी का उन्हें पूरा-पूरा सहयोग साथ नहीं मिलता। ज्योत्स्ना जी कहती हंै वे गृहस्थी संन्यासी थे। ऐसा ही रूप उनके पिता का भी था। पं. भारतेन्द्रनाथ जी और डॉ. धर्मवीर जी से आर्यजगत् को बड़ी आशायें थीं। माता राकेशरानी जी ने पं. भारतेन्द्रनाथ जी के न होने पर जो भोगा, वो डॉ. धर्मवीर जी के न होने पर ज्योत्स्ना जी को सहना पड़ रहा है, किन्तु उनके होठों पर उफ तक नहीं है। आर्यसमाज को ऐसी गौरवशाली बेटियों पर, विरांगनाओं पर सती साध्वी माता बहनों और देश धर्म पर आत्मोत्सर्ग करने वाली देवियों एवं सन्नारियों पर गर्व है। इनका आत्मोत्सर्ग ही इस देश को आर्यसमाज को संजीवनी देगा। जीवन एवं चैतन्य देगा इसमें संदेह नहीं। मैंने तब ज्योत्स्ना जी को कहा था। ज्योत्स्ना जी व डॉ. धर्मवीर जी नोबल पुरस्कार प्राप्त ‘श्री कैलाश सत्यार्थी’ से भी किसी भी रूप में कम हस्ती नहीं हैं। भारतेन्द्रनाथ जी और माता राकेशरानी जी को उनके इन दो मानसपुुत्रों पर निश्चित रूप से गर्व होगा। ये दोनों मानसपुत्र उनकी दो आँखें रही हैं। डॉ. धर्मवीर जी ज्ञान के समुद्र थे। आर्यसमाज को ऐसे कर्मठ ओजस्वी युवाओं की आवश्यकता है।

आर्यसमाज का अतीत उज्जवल रहा है। आर्यसमाज ने स्वामी दयानन्द सरस्वती के बाद पं. गुरुदत्त, श्यामजी कृष्ण वर्मा, स्वामी श्रद्धानन्द, ला. लाजपतराय, पं. लेखराम, स्वामी स्वतन्त्रतानन्द, स्वामी वेदानन्द, स्वामी आत्मानन्द, नारायण स्वामी, आचार्य अभयदेव, स्वामी ब्रह्ममुनि, स्वामी ओमानन्द सरस्वती जैसे लोगों के मध्य आर्यसमाज का ही नहीं देश का भी उज्जवल काल देखा। एंड्रू डेविड जेक्सन को एक आग दिखाई देती थी जो आदित्य ब्रह्मचारी दयानन्द के अन्तस् में उद्बुद्ध हुई थी। उस अग्रि को स्वामी श्रद्धानन्द के परम शिष्य डॉ. धर्मवीर जी ने निरन्तर जलाये रखा।

श्रद्धया अग्रि: समिध्यते श्रद्धयाहूयते हवि:।

श्रद्धां भगस्य मूर्धनि वचसा वेदयामसि।।

संसार की कोई भी अग्रि श्रद्धा के बिना प्रदिप्त नहीं होती और कोई भी बलिदान श्रद्धा के बिना किया नहीं जा सकता। डॉ. धर्मवीर जी को यह मन्त्र प्रिय था। वे मरे नहीं राष्ट्र, समाज, संस्कृति और मानवता के लिये अपनी आत्मा की ही नहीं सर्वस्व की आहुति दी है। यह आत्म-बलिदान आर्यजगत् को निरन्तर प्रेरणा देता रहेगा और इस अग्रि स्फुलिंग से हजारों ‘धर्मवीर’ और पैदा होंगे। इसमें संदेह नहीं। धर्म पर ‘धर्मवीर बलिदान’ हुये हैं इसमें अत्युक्ति नहीं। धर्मवीर जी का न होना आर्यजगत् को निश्चय ही खलेगा, किन्तु उनकी यश: काया को कोई नहीं मार सकता। अपने कार्य एवं परोपकारी पत्रिका के सम्पादकीय के माध्यम से डॉ. धर्मवीर हमेशा अमर रहेंगे।

उत्पद्यन्ते म्रियन्ते च बहव: क्षुद्र जन्तव:।

अनेन सदृश्यो लोके न भूतो न भविष्यति।

ऐसे लोकोत्तर युग-मानव को विश्व लम्बे समय तक भुलाये नहीं भूल सकता। संसार में कोई भी प्राणी मृत्यु के चंगुल से बच नहीं सकता। महाकाल ने प्रत्येक जीव को अपने पाँव तले दबोच रखा है जिस दिन उसकी इच्छा होती है उस दिन उस पाँव को दबाकर प्राणी को मृत्यु कुचल डालती है। समाप्त कर देती है, विशेषत: शरीर धारी मानव में आत्म-शक्ति का प्रकाश करने के लिये ही आत्मा शरीर को धारण करती है। अत: शरीर पाकर इस जगत् में संसार में आई सब महान् आत्मायें इस संसार में कुछ न कुछ जगत् हितकारी वस्तु का सृजन करके जगत् में उच्च से उच्च ऐश्वर्य को बढ़ा्रकर चली जाती है। अत: डॉ. धर्मवीर जी जैसे वेदवीणा के मधुरगान करने वाले हमें यही संदेश देंगे-‘‘हे अमर पुत्रों उठो! जागो! मरणधर्मा जीवन के सुखसुविधाओं के पिछलग्गु बनना छोड़ो। बेकार में मुरझायी, गिरी हुई तबीयत वाला जीवन क्यों ढोते हो? शुद्ध, पूत समर्पित और आत्म बलिदानी उन्नत जीवन जीकर मृत्यु के पैर को परे हटाकर, अपने अमरत्व की घोषणा कर दो।’’

‘कीर्तिर्यस्य स जीवति।’ का संदेश देते हुये डॉ. धर्मवीर जी हमें मानो कह रहे हैं ‘मरना एक कला एक चाँस है।’ निरन्तर यात्रा करने वाले ‘यायावर’ धर्मवीर जी अब एक लम्बी यात्रा के लिये निकल गये हैं। हमें उपनिषदों का यह संदेश देते हुये चरैवेति! चरैवेति! धर्म के लिये, सत्य के लिये, न्याय के लिये, परोपकार के लिये, करुणा के लिये, मानव मात्र के कल्याण के लिये निरन्तर अनथक चलते रहे। ऋषिवर देव दयानन्द के इस सन्देश को कदापि न भूलें कि ‘‘संसार का उपकार करना आर्यसमाज का मुख्य उद्देश्य है।’’ इस लक्ष्य को पूरा करके ही हम डॉ. धर्मवीर जी को सच्ची श्रद्धाञ्जलि दे सकते हैं। आज राष्ट्र्र, समाज, राजनीति, धर्म, संस्कृति संक्रमण के दौर से गुजर रहे है। चरित्र की अपेक्षा धन का नशा समुचे विश्व को अक्रान्त कर रहा है। ऐसे समय में मनु महाराज का यह सन्देश भारत ही नहीं समूचे विश्व को प्रेरणा देगा।

एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्र जन्मना।

स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा।

काल इन्द्र समय-समय पर भारी-भारी आहुतियाँ माँगता है और इसी से यह संसार निरन्तर उन्नत हो रहा है। वह महाकाल समय-समय पर बड़े-बड़े बलिदान चाहता है, आत्मबलिदान की हवि चाहता है। ‘उत्तिष्ठत अव पश्यत’।। ‘ऋग्वेद १०.१७९.१’ इस ऋग्वेद की ऋचा के अनुसार उठो! खड़े हो और सावधानी से देखो ‘ऋत्वियं भागं जुहोतन’ समय-समय पर दिये जाने वाली ‘आत्म बलिदान’ रूपी हवी को दो। स्वामी दयानन्द जैसे सर्वात्मना बलिदानी ने जिसकी नींव डाली। स्वामी श्रद्धानन्द, लेखराम जिस भवन पर खड़े हुये, उस पर डॉ. धर्मवीर जैसे गर्वोन्नत कलश शिखर विश्वसागर में ‘दिपस्तम्भ’ बनकर सर्वदा मार्गदर्शन करते रहेंगे, इसमें सन्देह नहीं।

स्वामी श्रद्धानन्द जी का ९०वाँ बलिदान दिवस: – चान्दराम आर्य

स्वामी दयानन्द ने ही स्वराज्य की चिंगारी सुलगाई थी। उसी चिंगारी से श्रद्धानन्द ने क्रान्ति का दावानल फैलाया था। कोई माने या न माने, सत्य तो यही है। आर्यवीरों की कुर्बानी से ही आजादी आई थी।

बालक मुन्शीराम का जन्म पंजाब प्रान्त के तलवन (जालन्धर) ग्राम के लाला नानकचन्द के घर सन् १८५६ को हुआ था। पुरोहितों ने बच्चे का नाम ‘बृहस्पति’ रखा, परन्तु पिता ने उनका नाम मुंशीराम रखा। बदा में महात्मा गाँधी ने उनके नाम के आगे ‘महात्मा’ शब्द और जोड़ दिया। पिता नानकचन्द उन दिनों शहर कोतवाल थे। बरेली में स्थायी नियुक्ति हो जाने पर पिता ने परिवार को तलवन से बरेली में ही बुला दिया।

बरेली में मुंशीराम को महर्षि दयानन्द  के दर्शन हुए। उनके भाषणों से व दर्शन से मुंशीराम बहुत प्रभावित हुए। कानूनी शिक्षा प्राप्त करने के लिए आप लाहौर पधारे। वहाँ पढ़ाई के साथ-साथ सभा-संस्थाओं में आना-जाना आरम्भ हुआ। लाहौर में ही उन्हें आर्यसमाज में जाने का चस्का लगा। वहाँ पर उन्होंने आर्यसमाज के सभी ग्रन्थ पढ़ डाले थे। महर्षि दयानन्द के निर्वाणोपरान्त आर्यसमाज लाहौर के पदाधिकारियों ने १ जून १८८६ को डी.ए.वी. कॉलेज की स्थापना की। महात्मा हंसराज उस कॉलेज के अवैतनिक प्राचार्य नियुक्त किए गए। उससे वैदिक सिद्धान्तों का शिक्षण संस्कृत भाषा के द्वारा सम्भव न हो सका। आपने मन-ही-मन वैदिक सिद्धान्तों की शिक्षा मातृभाषा में देने के लिए गुरुकुल की स्थापना करने का संकल्प किया और उचित अवसर की तलाश करने लगे। दुर्भाग्य से ३१ अगस्त १८९१ को उल्टी-दस्त से पत्नी शिवदेवी जी का देहान्त हो गया।

दूसरे दिन जब मुुंशीराम जी शिवदेवी जी का सामान सँभालने लगे तो उनकी बड़ी बेटी वेदकुमारी जी ने माता जी के हाथ का लिखा हुआ कागज लाकर दिया, उसमें लिखा था- ‘‘बाबू जी, अब मैं चली। मेरे अपराध क्षमा करना। आपको तो मुझसे भी अधिक रूपवती व बुद्धिमती सेविका मिल जाएगी, किन्तु इन बच्चों को मत भूलना। मेरा अन्तिम प्रणाम स्वीकार करें।’’ पत्नी के इन शब्दों ने मुन्शीराम जी के हृदय में एक अद्भुत शक्ति का संचार कर दिया। निर्बलता सब दूर हो गई। बच्चों के लिए माता का स्थान भी स्वयं पूरा करने का संकल्प लिया। ऋषि दयानन्द के उपदेश और वैदिक आदेश को पूरा करने के लिए सन् १९०२ को गुरुकुल काँगड़ी (हरिद्वार) की स्थापना की। इसके साथ-साथ देश के उद्धार और जाति के उत्थान का कोई क्षेत्र अछूता न रहा। राजनीति, समाज सुधार, हिन्दी भाषा, अनाथ रक्षा, अकाल, बाढ़, दीन रक्षा, अछूतोद्धार, शुद्धि आन्दोलन आदि सभी कार्यों में स्वामी जी आगे दिखाई देते थे।

श्री रैम्जे मैकडॉनल्ड महोदय ने एक स्थान पर उनके सम्बन्ध में इस प्रकार लिखा है-

‘‘एक महान्, भव्य और शानदार मूत्र्ति-जिसको देखते ही उसके प्रति आदर का भाव उत्पन्न होता है, हमारे आगे हमसे मिलने के लिए बढ़ती है। आधुनिक चित्रकार ईसा मसीह का चित्र बनाने के लिए उसको अपने सामने रख सकता है और मध्यकालीन चित्रकार उसे देखकर सेन्ट पीटर का चित्र बना सकता है। यद्यपि उस मछियारे की अपेक्षा यह मूत्र्ति कहीं अधिक भव्य और प्रभावोत्पादक है।’’

कांग्रेस के स्वागताध्यक्ष पद से अमृतसर पंजाब में राष्ट्रभाषा हिन्दी में जो भाषण मुंशीराम ने दिया था, उनकी ये पंक्तियाँ अब भी रह-रहकर हमारे कानों में गूँज रही हैं, ‘मैं आप सब बहनों व भाइयों से एक याचना करूँगा। इस पवित्र जातीय मन्दिर में बैठे हुए अपने हृदयों को मातृभूमि के प्रेम जल से शुद्ध करके प्रतिज्ञा करो कि आज से साढ़े छ: करोड़ हमारे लिए अछूत नहीं रहे, बल्कि हमारे भाई-बहन हैं। हे देवियो और सज्जन पुरुषो! मुझे आशीर्वाद दो कि परमेश्वर की कृपा से मेरा स्वप्न पूरा हो।’ स्वामी श्रद्धानन्द जी के कार्य का परिचय कराने वाले दीनबन्धु श्री सी.एफ. एण्ड्रूज थे, जिन्होंने गाँधी जी से परिचय करवाया। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के नेटाल सत्याग्रह में व्यस्त गाँधी जी के दिव्य गुणों का वर्णन किया था। उस समय स्वामी जी केवल मुंशीराम जी थे, गाँधी जी भी केवल मिस्टर गाँधी थे। बाद में दोनों का पुण्य स्मरण ‘महात्मा’ नाम से होने लगा। गाँधी जी ने २१ अक्टूबर १९१४ को जो पत्र लिखा था, उसके कुछ अंश इस प्रकार हैं-

प्रिय महात्मा जी,

मि. एण्ड्रूज ने आपके नाम और काम का इतना परिचय दिया है कि मैं अनुभव कर रहा हूँ कि मैं किसी अजनबी को पत्र नहीं लिख रहा हूँ, इसलिए आप मुझे आपको महात्मा जी लिखने के लिए क्षमा करेंगे। मैं और एण्ड्रूज साहब आपकी चर्चा करते हुए आपके लिए इसी शब्द का प्रयोग करते हैं। उन्होंने मुझे आपकी संस्था गुरुकुल को देखने के लिए अधीर बना दिया है।

आपका मोहनदास कर्मचन्द गाँधी

इसके छ: महीने बाद गाँधी जी भारत में आये तो आप गुरुकुल पधारे। वहाँ गुरुकुल की ओर से उन्हें जो मानपत्र ८ अप्रैल १९१५ को दिया गया, उसमें गाँधी जी को भी ‘महात्मा’ नाम से सम्बोधित किया। आपने १५ वर्ष तक गुरुकुल की सेवा की और १९१७ में संन्यास लेकर स्वामी श्रद्धानन्द कहलाये। २३ दिसम्बर १९२६ को दिल्ली में उनके निवास स्थान पर एक मतान्ध अब्दुल रशीद ने स्वामी जी पर गोलियाँ चलाकर शहीद कर दिया। उनके बलिदान पर पंजाब केसरी लाला लाजपतराय ने निम्न उद्गार प्रकट किए- ‘स्वामी जी की हड्डियों से यमुना के तट पर एक विशाल वृक्ष उत्पन्न होगा, जिसकी जड़े पताल में पहुँचेंगी। शहीदों के खून से नये शहीद पैदा होते हैं।’

जो जीवनभर संघर्षों से खेला, मृदु मुस्कान लिए,

बाधाओं का वक्ष चीरता बढ़ा वेद का ज्ञान लिए।

तोपों-बन्दूकों के आगे, डटा रहा जो सीना तान,

धन्य-धन्य वह वीर तपस्वी, स्वामी श्रद्धानन्द महान्।

श्रद्धेय आचार्य डॉ धर्मवीर को प्रथम पुण्य तिथि पर भावभीनी श्रद्धांजलि

Dharmveer ji

भला समय बीतते भी कहीं समय लगता है? विश्वास नहीं होता कि डॉ. धर्मवीर जी को पार्थिवता से मुक्त हुये एक वर्ष हो गया। हो भी कैसे? एक दिन की …. है जो हमारे हृदय पटल पर उस दिव्य मूर्ति का सौम्य स्वरूप न प्रकट हुआ हो, जो हमारी सांसों के स्पन्दन में भीगी हुयी करुणा न छायी हो, जो हमारे कण्ठ ने फफक-फफक कर आहें न भरी हों, जो इन शुष्क आखों ने यह जानते हुये कि यह सम्भव नहीं है राह तकते-तकते तनिक आराम की ख्वाहिश की हो। पर समय पर जोर किसका? वह तो यूँ भी बीतेगा और यूँ भी।

हाय रे! निष्ठुर हृदय, निष्ठुरता पर आश्चर्य है। इतने संताप को तू सह कैसे गया?

हे आचार्य! जरा देखो तो, आपकी सजाई बगिया का हर नुक्कड़ आपकी बाट जोहता है। ये झील, ये पर्वत, ये उमड़ती हुयी बदलियाँ आपके गुञ्जायमान शब्दों के श्रवण को लालयित हैं। देखें इन वृक्षों को और लताओं को, इन खिलती हुयी कलियों की मजबूर हँसी को। लगता है जैसे हँसने की कोई कीमत ली हो इन्होंने। निरापद झूठी और फीकी हँसी। यह निष्प्राण उद्यान अब किसी बीहड़ वन सा मालूम होता है। न जाने क्यूँ? पर सब कछ नीरस सा हो गया है। सब कुछ बिखर सा गया है। किस-किस बात पर रोयें। उस जगन्नाथ के रहते हम स्वयं को अनाथ भी नहीं कह सकते, भला हम क्या जगत् से बाहर हैं? और सनाथ कहने का भी अब कोई कारण न रहा है। हाय! माता जी की अन्तर्वेदना को कौन मरणधर्मा जान सकता है। कौन सुन सकता है उनके दर्द की पुकार। अब तो आँसू भी थक गये है। किसका सामथ्र्य है जो उन पथरायी हुयी आँखों से आखें मिला सके। दिन में न जानें किनी बार एक ही प्रश्र उनकी जिह्वा पर उठता है बाकी सब ठीक पर धर्मवीर जी  क्यों …..? कदाचित् आपके पास इसका उत्तर हो।

काश….काश! कि आप इस पीड़ा को सुन पाते। पर अफसोस! ‘काश’ जैसे शब्द तो पीड़ा को बढ़ाने के लिये बनते हैं।

वो और दौर था जब संन्यासी श्रद्धानन्द, पं. गुरुदत्त और पं. लेखराम जैसे दिग्गजों की धाक् थी। स्वामी दर्शनानन्द, पं. गणपति और पं. चमूपति जैसे सूरमा विचरते थे। किसी एक के हाथ से पतवार छूटे तो पलक झपकते ही उसे दूसरा सम्भाल लेता था। पर आज तो आर्यजगत् की पतवार सिर्फ और सिर्फ आपके हाथ में थी। और कोई दीखता ही नहीं जो खिवैया बन सके। न जाने इस नैया को और कितना वक्त लगे अपना सिपैया ढूढऩे में। वैदुष्य के दर्शन को हमारी आखें तरस गयी हैं। वेद और उपनिषद् की बातें तो जैसे बातें ही बनकर रह गयी हैं। अब अगर विरोधी प्रश्र उठायें तो हमारी आँखें झुक जायेंगी। मगर हाँ! आपको ये जानकर सन्तोष होगा कि आपकी जलाई लौ मन्द बेशक पड़ी हो, पर बुझी नहीं है और हमारा विश्वास है कि दयानन्द के स्वप्र पर बलिहारी होने को फिर अनेकों धर्मवीर उठ खड़े होंगे। ऋषिवर की जय-जयकार चहुँओर गूँजेगी।

‘आप नहीं हैं’ इस सत्य को स्वीकार करने में हम अब तक समर्थ न हो पाये हैं। और शायद हो भी न सकें। यतो हि यह सत्य भी असत्य सा मालूम होता है और कदाचित् हो भी। आपकी वाणी और आपकी लेखनी आज भी हृदयों को झंकझोरने में समर्थ है। आपके व्याख्यानों को लिपिबद्ध किया जा रहा है। ये समस्त कार्य सदैव आपके होने की सूचना देते रहेंगे।

हे आचार्य! हमें प्रेरणा दीजिये कि हम आपके पथ के पथिक बन सकें।

 

पंडित मनसाराम जी “वैदिक तोप”

स्वनामधन्य पं॰मनसारामजी ‘वैदिक तोप’ आर्यजगत्‌ की महान विभूतियोँ मेँ अपना स्थान रखते हैँ। पण्डितजी का जन्म 1890 ई॰ हड्डाँवाला नंगल[जाखल के निकट] हरियाणा प्राप्त मेँ हुआ था।

आपके पिता लाला शंकरदासजी अन्न-धन से सम्पन्न, सुखी सद्‌गृहस्थ व्यापारी थे। वे कट्टर मूर्तिपूजक और पौराणिक थे।
पुत्र भी उनके रंग मेँ रंग गया। पण्डितजी की प्राइमरी तक की शिक्षा वामनवाला ग्राम मेँ हुई। तत्पश्चात्‌ टोहाना के मिडल स्कूल मेँ दाखिल हो गये। 1907 मेँ पण्डितजी आठवीँ श्रेणी मेँ प्रविष्ट हुए। इसी वर्ष मेँ पिताजी का देहान्त हो गया। पण्डितजी को स्कूल छोड़कर घर सम्हालना पड़ा।

लाला शंकरदास जी के वहां एक पटवारी श्री रामप्रसादजी रहा करते थे, ये बड़े सदाचारी, मधुरभाषी और निष्ठावान आर्य समाजी थे | जब मनसारामजी घर पर रहने लगे तो वे इनको वैदिक धर्म के सिद्धांतों और तत्वज्ञान से परिचय कराया करते थे | मनसारामजी महाशय रामप्रसादजी के सत्संग से आर्य समाज की ओर आकृष्ट हो गये |
१९०८ में टोहाना में आर्यों और पौराणिकों के बीच एक शास्त्रार्थ हुआ | आर्य समाज के तरफ से पं.राजारामजी शास्त्री ने पक्ष रखा और पौराणिको की ओर से पं.लक्ष्मीनारायण जी थे | श्री उदमीरामजी अध्यक्ष नियुक्त हुए | इस शास्त्रार्थ को देखने वालों में पंडित मनसाराम भी थे | शास्त्रार्थ में पं.राजाराम जी की युक्तियों की धाक पंडित मनसारामजी के मस्तिष्क पर जम गयी | आप आर्य समाज के दीवाने हो गये | अब पं.मनसाराम के मन में संस्कृत अध्ययन की धुन सवार हुई | सर्वप्रथम आप कुरुक्षेत्र की सनातनधर्म पाठशाला में प्रविष्ट हुए | यहाँ से हरिद्वार पहुंचे, संस्कृत अध्ययन की लगन में
आपने गुरुकुल काँगड़ी में चपरासी की नौकरी कर ली, उनका विचार था कि गुरुकुल में एक ओर संस्कृत अध्ययन भी कर लूँगा औरे आर्य समाज की सेवा भी कर लूँगा | पर इनकी मनोकामना
यहाँ भी पूरी न हुई | यहाँ से निराश होकर ये ज्ञानपिपासु विद्या-नगरी काशी में पहुँच गया |

काशी में संस्कृत अध्ययन के कई केन्द्र खुले हुए थे | पर उनमें सिर्फ जन्म के ब्राह्मणों को ही भोजन मिलता था | संस्कृतज्ञान के पिपासु ने कितने दिन भूखे रहकर काटे होंगे, कौन जानता है ? श्रीमनसाराम जी जंगल से बेर तोड़कर लाया करते थे, उन्हें ही खाकर निर्वाह करते
थे | एक दिन वे बेर तोड़ रहे थे, एक सेठ उधर आ निकले | संस्कृत का विद्यार्थी भांपकर सेठ ने पूछा—“क्या कर रहे हो ?” मनसाराम जी ने अपनी समस्या बता दी | सेठ ने पूछा—“केन्द्रों में भोजन क्यूँ नही करते ? मनसाराम जी ने कहा “वहां तो केवल ब्राह्मणों को भोजन मिलता है, मैं तो जन्म से अग्रवाल हूँ |” सेठ की गैरत जागी, वो स्वयं भी ऐसे कई केन्द्रों को दान देता था, उसने मनसाराम जी से कहा “तुम अमुक केन्द्र में जाकर भोजन किया कारो, वहां कोई तुम्हारी जाति नही पूछेगा |”

भोजन की समस्या से निश्चिन्त होकर मनसाराम जी विद्याध्ययन में जुट गए | विद्या समाप्त करके मनसारामजी काशी के पण्डितों के बीच गए और उनके समक्ष एक प्रश्न रखा कि—‘मैं जन्म से अग्रवाल हूँ, मुझे अब पण्डित कहलाने का अधिकार प्राप्त है या नही ? इसपर बड़ा वाद-विवाद हुआ | मनसाराम जी की विजय हुई | उन्हें पण्डित की पदवी प्रदान की गई|

विद्या प्राप्ति के बाद आप कार्यक्षेत्र में उतरे | आपके गहन अध्ययन, तीव्रबुद्धि, और अकाट्य तर्कों के कारण आपकी कीर्ति-चन्द्रिका छिटकने लगी | आर्यसमाज के क्षितिज पर एक नया नक्षत्र अपनी
प्रभा विकीर्ण करने लगा | पण्डितजी सिरसा में धर्म-प्रचार कर रहे थे, उन्ही दिनों स्वामी स्वतंत्रानन्दजी सिरसा पधारे | पण्डितजी की बहुमुखी प्रतिभा से प्रभावित होकर इन्हें आर्य प्रतिनिधिसभा पंजाब की सेवा में ले गए | पण्डितजी ने सारे पंजाब को वैदिक-नाद से गुंजा दिया| शास्त्रार्थ में उनकी विशेष रूचि थी | शास्त्रार्थ-समर के आप विजयी-योध्या थे|

एक बार भिवानी में शास्त्रार्थ हो रहा था, पौराणिकों ने आपको पूरा समय न दिया | नियमानुसार आपने २५ मिनट मांगे | उत्तर में पण्डितजी पर लाठियों से आक्रमण हुआ | जिसपर पण्डितजी ने
एक ट्रैक लिखा “मेरे पच्चीस मिनट” | इस शास्त्रार्थ का टेकचन्दजी पंसारी पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि उसने प्रतिमाएं फ़ेंक और आस्तिक बन गया | आर्यों से भिन्न लोगों पर पण्डितजी की कैसी धाक थी, इस विषय में निम्न घटना अति महत्वपूर्ण है | एक बार रामामंडी में एक जैन विद्वान आये | उनके प्रवचन होने लगे | एक दिन सभा के
अंत में एक किसान वेशधारी ने जैनियों के अहिंसा सम्बन्धी सिद्धांत पर कुछ प्रश्न कर दिए | प्रश्न सुनते ही जैन विद्वान ने कहा—“आप पं.मनसाराम तो नही हैं? ऐसे प्रश्न वे ही कर सकते हैं, साधारण व्यक्ति इतनी गहराई से विचार ही नही कर सकता| सचमुच वे ग्रामीण पण्डितजी ही थे |

उधर २-३ मई १९३१ को आर्यसमाज जाखल के वार्षिकोत्सव पर शास्त्रार्थ रखा गया | इसके अध्यक्ष थे स्वामी स्वतंत्रतानन्द और शास्त्रार्थकर्ता थे पं.लोकनाथजी ‘तर्कवाचस्पति’ |
पण्डितजी ने ‘शास्त्रार्थ-जाखल’ नाम से उर्दू में एक पुस्तक लिखी | पौराणिक बौखला उठे| भारी धन-व्यय करके उन्होंने ‘सनातन-धर्म विजय’ नामक पुस्तक लिखवाई \ पुस्तक क्या थी गाली-गलौज का पुलिन्दा थी | पण्डितजी ने सभ्य भाषा में युक्ति और प्रमाणों से सुभूषित लगभग पांच गुना बड़ा १२२४ पृष्ठों का ग्रन्थ लिखा, जिसका नाम रखा- “पौराणिक पोप पर वैदिक तोप” | इस ग्रन्थ के प्रकाशन होते ही पण्डितजी के नाम की धूम मच गयी और आपका
नाम ही ‘वैदिक तोप’ पड़ गया |

पण्डितजी के तर्क कितने तीखे होते थे, इसका आभास भटिंडा-शास्त्रार्थ से होता है | पण्डितजी ने चार प्रश्न रखे थे—
१- सनातन धर्म में पशुवध आदिकाल से है या बाद की मिलावट है ?
२- नाविक की पुत्री सत्यवती के गर्भ से उत्पन्न व्यास जी का वर्ण पौराणिक-मत के अनुसार क्या है?
३- पौराणिक मत के अनुसार सिख, जाट, स्वर्णकार, और कायस्थ किस वर्ण में हैं ?
४- पौराणिक मत के अनुसार दलित भाई ईसाई-मुसलमानों से अच्छे हैं वा नही ? अच्छे हैं तो उनके साथ अच्छा व्यवहार क्यूँ नही किया जाता ?

पण्डितजी के प्रश्न सुनकर पौराणिक अधिकारी ने कहा—मनसाराम को यहाँ से बाहर निकालो |

संगरूर-शास्त्रार्थ में मृतक-श्राद्ध पर बोलते हुए पण्डितजी ने कहा— ‘मैं भी इस जन्म में कहीं से आया हूँ| यदि मृतकों को श्राद्ध का माल पहुँचता है तो मेरा पार्सल कहाँ जाता है ?

पण्डितजी विद्या के सागर थे, आर्य समाज के मंच व्याख्यान देते तो श्रोताओं से कहते कि किस विषय पर बोलूं, आप जिस पर कहें उसी पर बोलता हूँ| उनके व्याख्यान सैद्द्धान्तिक होते थे|
व्याख्यानों में प्रमाणों की बहुलता होती थी | पण्डितजी ने स्वतंत्रता-आन्दोलन में भी भाग लिया था और कई बार जेल भी गए | १९२२ में
गाँधी द्वारा चलाये गए पहले सत्याग्रह में पण्डितजी जेल गए | उन्हें हिसार जेल में रखा गया | अभियोग के दिनों में आपने एक ऐसी साहसिक बात कही जो किसी भी क्रन्तिकारी की मुख से न निकली होगी | पण्डितजी को मजिस्ट्रेट के आगे पेश किया गया तो आपने पाने मुंह पर कपड़ा डाल लिया | मजिस्ट्रेट ने कारण पूछा तो आपने कहा—“जिस व्यक्ति ने चाँदी के चन्द-ठीकरों के लिए अपने आपको बेच दिया हो, मैं उसकी शक्ल नही देखना चाहता | ये कोर्ट का अपमान था | सत्याग्रह के साथ-साथ एक और अभियोग न्यायालय की मानहानि का भी चलने लगा |

पण्डितजी ने साहित्य भी बहुत लिखा, इनका सारा साहित्य खोजपूर्ण है | पौराणिको के खण्डन में इस साहित्य से उत्तम साहित्य नही लिखा गया | उनके कुछ प्रसिद्ध ग्रन्थ है—
१- पौराणिक पोलप्रकाश
२- पौराणिक पोप पर वैदिक तोप
३- चेतावनी प्रकाश
४- पौराणिक दम्भ पर वैदिक बम्ब

शिवपुराण आलोचना, भविष्यपुराण आलोचना आदि और अनेक ग्रन्थ पण्डितजी ने लिखे थे| दुर्भाग्य से अधिकतर अप्राप्य है | जून ईसवी १९४१ में पण्डितजी परलोक सिधार गए | पण्डितजी का पार्थिव शरीर नही रहा, परन्तु उनका यशरूपी शरीर अजर और अमर है |

सुजीत मिश्र