Category Archives: वैदिक धर्म

पंडित मनसाराम जी “वैदिक तोप”

स्वनामधन्य पं॰मनसारामजी ‘वैदिक तोप’ आर्यजगत्‌ की महान विभूतियोँ मेँ अपना स्थान रखते हैँ। पण्डितजी का जन्म 1890 ई॰ हड्डाँवाला नंगल[जाखल के निकट] हरियाणा प्राप्त मेँ हुआ था।

आपके पिता लाला शंकरदासजी अन्न-धन से सम्पन्न, सुखी सद्‌गृहस्थ व्यापारी थे। वे कट्टर मूर्तिपूजक और पौराणिक थे।
पुत्र भी उनके रंग मेँ रंग गया। पण्डितजी की प्राइमरी तक की शिक्षा वामनवाला ग्राम मेँ हुई। तत्पश्चात्‌ टोहाना के मिडल स्कूल मेँ दाखिल हो गये। 1907 मेँ पण्डितजी आठवीँ श्रेणी मेँ प्रविष्ट हुए। इसी वर्ष मेँ पिताजी का देहान्त हो गया। पण्डितजी को स्कूल छोड़कर घर सम्हालना पड़ा।

लाला शंकरदास जी के वहां एक पटवारी श्री रामप्रसादजी रहा करते थे, ये बड़े सदाचारी, मधुरभाषी और निष्ठावान आर्य समाजी थे | जब मनसारामजी घर पर रहने लगे तो वे इनको वैदिक धर्म के सिद्धांतों और तत्वज्ञान से परिचय कराया करते थे | मनसारामजी महाशय रामप्रसादजी के सत्संग से आर्य समाज की ओर आकृष्ट हो गये |
१९०८ में टोहाना में आर्यों और पौराणिकों के बीच एक शास्त्रार्थ हुआ | आर्य समाज के तरफ से पं.राजारामजी शास्त्री ने पक्ष रखा और पौराणिको की ओर से पं.लक्ष्मीनारायण जी थे | श्री उदमीरामजी अध्यक्ष नियुक्त हुए | इस शास्त्रार्थ को देखने वालों में पंडित मनसाराम भी थे | शास्त्रार्थ में पं.राजाराम जी की युक्तियों की धाक पंडित मनसारामजी के मस्तिष्क पर जम गयी | आप आर्य समाज के दीवाने हो गये | अब पं.मनसाराम के मन में संस्कृत अध्ययन की धुन सवार हुई | सर्वप्रथम आप कुरुक्षेत्र की सनातनधर्म पाठशाला में प्रविष्ट हुए | यहाँ से हरिद्वार पहुंचे, संस्कृत अध्ययन की लगन में
आपने गुरुकुल काँगड़ी में चपरासी की नौकरी कर ली, उनका विचार था कि गुरुकुल में एक ओर संस्कृत अध्ययन भी कर लूँगा औरे आर्य समाज की सेवा भी कर लूँगा | पर इनकी मनोकामना
यहाँ भी पूरी न हुई | यहाँ से निराश होकर ये ज्ञानपिपासु विद्या-नगरी काशी में पहुँच गया |

काशी में संस्कृत अध्ययन के कई केन्द्र खुले हुए थे | पर उनमें सिर्फ जन्म के ब्राह्मणों को ही भोजन मिलता था | संस्कृतज्ञान के पिपासु ने कितने दिन भूखे रहकर काटे होंगे, कौन जानता है ? श्रीमनसाराम जी जंगल से बेर तोड़कर लाया करते थे, उन्हें ही खाकर निर्वाह करते
थे | एक दिन वे बेर तोड़ रहे थे, एक सेठ उधर आ निकले | संस्कृत का विद्यार्थी भांपकर सेठ ने पूछा—“क्या कर रहे हो ?” मनसाराम जी ने अपनी समस्या बता दी | सेठ ने पूछा—“केन्द्रों में भोजन क्यूँ नही करते ? मनसाराम जी ने कहा “वहां तो केवल ब्राह्मणों को भोजन मिलता है, मैं तो जन्म से अग्रवाल हूँ |” सेठ की गैरत जागी, वो स्वयं भी ऐसे कई केन्द्रों को दान देता था, उसने मनसाराम जी से कहा “तुम अमुक केन्द्र में जाकर भोजन किया कारो, वहां कोई तुम्हारी जाति नही पूछेगा |”

भोजन की समस्या से निश्चिन्त होकर मनसाराम जी विद्याध्ययन में जुट गए | विद्या समाप्त करके मनसारामजी काशी के पण्डितों के बीच गए और उनके समक्ष एक प्रश्न रखा कि—‘मैं जन्म से अग्रवाल हूँ, मुझे अब पण्डित कहलाने का अधिकार प्राप्त है या नही ? इसपर बड़ा वाद-विवाद हुआ | मनसाराम जी की विजय हुई | उन्हें पण्डित की पदवी प्रदान की गई|

विद्या प्राप्ति के बाद आप कार्यक्षेत्र में उतरे | आपके गहन अध्ययन, तीव्रबुद्धि, और अकाट्य तर्कों के कारण आपकी कीर्ति-चन्द्रिका छिटकने लगी | आर्यसमाज के क्षितिज पर एक नया नक्षत्र अपनी
प्रभा विकीर्ण करने लगा | पण्डितजी सिरसा में धर्म-प्रचार कर रहे थे, उन्ही दिनों स्वामी स्वतंत्रानन्दजी सिरसा पधारे | पण्डितजी की बहुमुखी प्रतिभा से प्रभावित होकर इन्हें आर्य प्रतिनिधिसभा पंजाब की सेवा में ले गए | पण्डितजी ने सारे पंजाब को वैदिक-नाद से गुंजा दिया| शास्त्रार्थ में उनकी विशेष रूचि थी | शास्त्रार्थ-समर के आप विजयी-योध्या थे|

एक बार भिवानी में शास्त्रार्थ हो रहा था, पौराणिकों ने आपको पूरा समय न दिया | नियमानुसार आपने २५ मिनट मांगे | उत्तर में पण्डितजी पर लाठियों से आक्रमण हुआ | जिसपर पण्डितजी ने
एक ट्रैक लिखा “मेरे पच्चीस मिनट” | इस शास्त्रार्थ का टेकचन्दजी पंसारी पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि उसने प्रतिमाएं फ़ेंक और आस्तिक बन गया | आर्यों से भिन्न लोगों पर पण्डितजी की कैसी धाक थी, इस विषय में निम्न घटना अति महत्वपूर्ण है | एक बार रामामंडी में एक जैन विद्वान आये | उनके प्रवचन होने लगे | एक दिन सभा के
अंत में एक किसान वेशधारी ने जैनियों के अहिंसा सम्बन्धी सिद्धांत पर कुछ प्रश्न कर दिए | प्रश्न सुनते ही जैन विद्वान ने कहा—“आप पं.मनसाराम तो नही हैं? ऐसे प्रश्न वे ही कर सकते हैं, साधारण व्यक्ति इतनी गहराई से विचार ही नही कर सकता| सचमुच वे ग्रामीण पण्डितजी ही थे |

उधर २-३ मई १९३१ को आर्यसमाज जाखल के वार्षिकोत्सव पर शास्त्रार्थ रखा गया | इसके अध्यक्ष थे स्वामी स्वतंत्रतानन्द और शास्त्रार्थकर्ता थे पं.लोकनाथजी ‘तर्कवाचस्पति’ |
पण्डितजी ने ‘शास्त्रार्थ-जाखल’ नाम से उर्दू में एक पुस्तक लिखी | पौराणिक बौखला उठे| भारी धन-व्यय करके उन्होंने ‘सनातन-धर्म विजय’ नामक पुस्तक लिखवाई \ पुस्तक क्या थी गाली-गलौज का पुलिन्दा थी | पण्डितजी ने सभ्य भाषा में युक्ति और प्रमाणों से सुभूषित लगभग पांच गुना बड़ा १२२४ पृष्ठों का ग्रन्थ लिखा, जिसका नाम रखा- “पौराणिक पोप पर वैदिक तोप” | इस ग्रन्थ के प्रकाशन होते ही पण्डितजी के नाम की धूम मच गयी और आपका
नाम ही ‘वैदिक तोप’ पड़ गया |

पण्डितजी के तर्क कितने तीखे होते थे, इसका आभास भटिंडा-शास्त्रार्थ से होता है | पण्डितजी ने चार प्रश्न रखे थे—
१- सनातन धर्म में पशुवध आदिकाल से है या बाद की मिलावट है ?
२- नाविक की पुत्री सत्यवती के गर्भ से उत्पन्न व्यास जी का वर्ण पौराणिक-मत के अनुसार क्या है?
३- पौराणिक मत के अनुसार सिख, जाट, स्वर्णकार, और कायस्थ किस वर्ण में हैं ?
४- पौराणिक मत के अनुसार दलित भाई ईसाई-मुसलमानों से अच्छे हैं वा नही ? अच्छे हैं तो उनके साथ अच्छा व्यवहार क्यूँ नही किया जाता ?

पण्डितजी के प्रश्न सुनकर पौराणिक अधिकारी ने कहा—मनसाराम को यहाँ से बाहर निकालो |

संगरूर-शास्त्रार्थ में मृतक-श्राद्ध पर बोलते हुए पण्डितजी ने कहा— ‘मैं भी इस जन्म में कहीं से आया हूँ| यदि मृतकों को श्राद्ध का माल पहुँचता है तो मेरा पार्सल कहाँ जाता है ?

पण्डितजी विद्या के सागर थे, आर्य समाज के मंच व्याख्यान देते तो श्रोताओं से कहते कि किस विषय पर बोलूं, आप जिस पर कहें उसी पर बोलता हूँ| उनके व्याख्यान सैद्द्धान्तिक होते थे|
व्याख्यानों में प्रमाणों की बहुलता होती थी | पण्डितजी ने स्वतंत्रता-आन्दोलन में भी भाग लिया था और कई बार जेल भी गए | १९२२ में
गाँधी द्वारा चलाये गए पहले सत्याग्रह में पण्डितजी जेल गए | उन्हें हिसार जेल में रखा गया | अभियोग के दिनों में आपने एक ऐसी साहसिक बात कही जो किसी भी क्रन्तिकारी की मुख से न निकली होगी | पण्डितजी को मजिस्ट्रेट के आगे पेश किया गया तो आपने पाने मुंह पर कपड़ा डाल लिया | मजिस्ट्रेट ने कारण पूछा तो आपने कहा—“जिस व्यक्ति ने चाँदी के चन्द-ठीकरों के लिए अपने आपको बेच दिया हो, मैं उसकी शक्ल नही देखना चाहता | ये कोर्ट का अपमान था | सत्याग्रह के साथ-साथ एक और अभियोग न्यायालय की मानहानि का भी चलने लगा |

पण्डितजी ने साहित्य भी बहुत लिखा, इनका सारा साहित्य खोजपूर्ण है | पौराणिको के खण्डन में इस साहित्य से उत्तम साहित्य नही लिखा गया | उनके कुछ प्रसिद्ध ग्रन्थ है—
१- पौराणिक पोलप्रकाश
२- पौराणिक पोप पर वैदिक तोप
३- चेतावनी प्रकाश
४- पौराणिक दम्भ पर वैदिक बम्ब

शिवपुराण आलोचना, भविष्यपुराण आलोचना आदि और अनेक ग्रन्थ पण्डितजी ने लिखे थे| दुर्भाग्य से अधिकतर अप्राप्य है | जून ईसवी १९४१ में पण्डितजी परलोक सिधार गए | पण्डितजी का पार्थिव शरीर नही रहा, परन्तु उनका यशरूपी शरीर अजर और अमर है |

सुजीत मिश्र

धर्म की आवश्यकता क्यों? – शिवदेव आर्य

धर्म की आवश्यकता क्यों?
– शिवदेव आर्य
गुरुकुल पौन्धा, देहरादून
मो.-8810005096

जीवन की सफलता सत्यता में है। सत्यता का नाम धर्म है। जीवन की सफलता के लिए अत्यन्त सावधान होकर प्रत्येक कर्म करना पड़ता है, यथा – मैं क्या देखूॅं, क्या न देखूॅं, क्या सुनॅूं, क्या न सुनूॅं, क्या जानॅंू, क्या न जानूॅं, क्या करुॅं अथवा क्या न करूॅं। क्योंकि मनुष्य एक चिन्तनशील प्राणी है, जब मनुष्य किसी भी पदार्थ को देखता है तब उसके मन में उस पदार्थ के प्रति भाव ;विचारद्ध उत्पन्न होते हें। क्योंकि यही मनुष्य होने का लक्षण है, इसीलिए निरुक्तकार यास्क ने मनुष्य का निर्वचन करते हुए लिखा है कि ‘मनुष्यः कस्मात् मत्वा कर्माणि सीव्यति’ (३/८/२) अर्थात् मनुष्य तभी मनुष्य है जब वह किसी भी कर्म को चिन्तन तथा मनन पूर्वक करता है। यही मनन की प्रवृत्ति मनुष्यता की परिचायक है अन्यथा मनुष्य भी उस पशु के समान ही है जो केवल देखता है और बिना चिन्तन मनन के विषय में प्रवृत्त हो जाता है।
मनुष्य जब किसी पदार्थ को देखकर कार्य की ओर अग्रसर होता है तब चिन्तन उसको घेर लेता है, ऐसे समय में धर्म बताता है कि आपको किस दिशा में कार्य करना है, यही धर्म की आवश्यकता है। यदि धर्म जीवन में होगा तब जाकर श्रेष्ठ कर्म को कर सकेंगे अथवा पदार्थ का यथायोग्य व्यवहार (कर्म) कर सकेंगे।
काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, मद और मोह ये मानव जीवन में मनःस्थिति को दूषित करने वाले हैं। ये षड्रिपु मनुष्य की उन्नति के सर्वाधिक बाधक होते हैं इनका नाश मनुष्य धर्मरूपी अस्त्र से कर सकता है। इन विध्वंसमूलक प्रवृत्तियों को जीतना ही जितेन्द्रियता तथा शूरवीरता कहलाता है। यदि व्यक्ति के अन्दर धर्म नहीं है तो वह इनके वशीभूत होकर स्वयं तथा सामाजिक पतन का कारण बन जाता है।
इन पतनोन्मुखी प्रवृत्तियों को रोकने के लिए परमावश्यक होता है कि व्यक्ति विवेकशील हो और विवेकशील होने के लिए आवश्यक है अच्छे सद् चरित्रवान् मित्रों का संग करें तथा अच्छे ग्रन्थों का स्वाध्याय करें।
आज हमारी युवा पीढ़ी धर्म के अभाव में पतन की ओर अग्रसरित होती चली जा रही है, ऐसे में लोगों की चिन्तन क्षमता समाप्त हो गयी है। नित्य नये-नये मानवीय ह्रासता के कृत्य दिखायी देते हैं, ऐसा क्यों है? क्या हमने कभी विचार व चिन्तन किया है? आज हमारी सोचने की क्षमता इतनी कम क्यों हो गयी है, क्योंकि हम धर्म को समझ ही नहीं पा रहे हैं। हम धर्म को एकमात्र कर्मकाण्ड का रूप स्वीकार करते हैं। आज हमें धर्म को स्वयं के अन्दर धारण करना होगा। धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य, अक्रोध इन दश प्रमुख कर्तव्यों को स्वयं के लिए धारण करने का नाम धर्म बताया है।
धर्म की परिभाषा करने वाले विभिन्न आचार्यों के अपने-अपने मत हैं। संसार में मतवालों ने अपने-अपने धर्म के नाम पर विभिन्न चिह्न बना लिए हैं, जैसे- कोई केश बढ़ा रहा है, कोई लम्बी दाढ़ी बढ़ाये हुए है, कोई केश व दाढ़ी दोनों ही बढ़ाये हुए है, कोई पॉंच शिखाएं रखे हुए है, कोई मूछ कटाकर दाढ़ी बढ़ा रहा है, कोई चन्दन का तिलक लगाए हुए है, कोई माथे पर अनेक रेखाओं को अंकित किये हुए है और न जाने धर्म के नाम पर क्या-क्या करते हैं। किन्तु ये सभी धर्म से सम्बन्ध नहीं रखते हैं क्योंकि कहा भी है – ‘न लिंग धर्मकारणम्’ अर्थात् धर्म का कारण कोई चिह्न विशेष नहीं होता है।
यदि हम धर्म को जानना चाहते हैं तो हमें धर्मशास्त्र की इस पंक्ति को समझना होगा-
‘धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः’
जो व्यक्ति धर्म को जानना चाहता है, उसे वेद को प्रमुखता के साथ जानना होगा। धर्म धारण करने का नाम है इसी लिए कहते हैं ‘धारणाद् धर्म इत्याहुर्धर्मो धारयते प्रजाः’। जो किसी भी कार्य को करने में सत्य-असत्य का निर्णय कराये, चिन्तन व मनन कराये उसे धर्म कहते हैं। हम धर्म को धारण करते हैं तथा उसको व्यवहार रूप में प्रस्तुत करते हैं।
धर्म ज्ञान के लिए वेद ज्ञान की अत्यन्त आवश्यकता है, क्योंकि वेद ज्ञान ईश्वरीय ज्ञान है और ईश्वर सर्वज्ञ होने से उसके ज्ञान में भ्रान्ति अथवा अधूरापन का लेशमात्र भी निशान नहीं है। वेदज्ञान सृष्टि के आदि का है तथा सभी का मूल है, अतः हम मूल को छोड़ पत्तों अथवा टहनियों को समझने में अपना समय व्यर्थ न करें।
इसीलिए धर्म का ज्ञान और उस पर आचरण मनुष्य के लिए परमावश्यक है, यह हमारी उन्नति व सुख का आधार है। मनुष्य के परम लक्ष्य पुरुषार्थ चतुष्ट्य की सिद्धि में परमसहायक है।
वेद मनुष्य को आदेश देता है ‘मा मृत्योरुदगा वशम्’। मनुष्य को प्रतिक्षण सर्तक रहकर अपने चारों ओर फैले मृत्यु के भयंकर पाशों से बचने का प्रयास करना चाहिए।
उपनिषद् का ऋषि प्रार्थना करता है-‘मृत्योर्माऽमृतं गमय’ हे प्रभो ! मुझे इन मृत्युपाशों से बचाकर अमरता का पथिक बनाइए। इसी रहस्य को स्पष्ट करने के लिए ही धर्मशास्त्रकार घोषणा करता है-धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। अर्थात् जो व्यक्ति धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है और जो धर्म को नष्ट करता है, धर्म उसको नष्ट कर देता है। जीवन में हताशा और किंकर्त्तव्यमूढ़ता धार्मिक पक्ष के निर्बल होने पर ही आती है। जीवन में अधर्म की वृद्धि ही व्यक्ति को निराश तथा दुर्बल बना देती है अतः धर्म की वृद्धि करके व्यक्ति को सबल व सशक्त रहना चाहिये जिससे अधर्म के कारण क्षीणता न आ सके। धर्म से परस्पर प्रीति व सहानुभूति के भावों की वृद्धि होती है।
आचार्य चाणक्य ने लिखा है-‘‘सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलमिन्द्रियजयः।’’ अर्थात् सुख का मूल धर्म है और धर्म का मूल -इन्द्रियों को संयम में रखना है। संसार में प्रत्येक मनुष्य की इच्छा होती है कि मैं सुखी रहूँ और सुख की प्राप्ति धर्म के बिना नहीं हो सकती। अतः धर्म का आचरण अवश्य ही करना चाहिये। बिना धर्म को अपनाये कोई भी मनुष्य सुखी नहीं हो सकता।
संसार की कोई भी वस्तु सुख का हेतु हो सकती है परन्तु मरणोत्तर किसी के साथ नहीं जा सकती। शास्त्रकार कहते हैं-‘धर्म एकोऽनुगच्छति’ आर्थात् एक धर्म ही मरणोत्तर मनुष्य के साथ जाता है। संस्कृत के नीतिकार कहते है-
धनानि भूमौ, पशवश्च गोष्ठे, नारी गृहे बान्धवाः श्मशाने।
देहश्चितायां परलोकमार्गे, धर्मानुगो गच्छति जीव एक: ।।
अर्थात् समस्त भौतिक धन भूमि में ही गड़ा रह जाता है अथवा आजकल बैंकों में या तिजोरियों में ही धरा रह जाता है और गाय आदि पशु गोशाला में ही बंधे रह जाते हैं । पत्नी घर के द्वार तक ही साथ जाती है और परिवार के भाई-बन्धु व मित्रजन श्मशान तक ही साथ देते हैं एक मनुष्य का शुभाशुभ कर्म ;धर्मद्ध ही परलोक में मनुष्य का साथ देता है अर्थात् धर्म के अनुसार ही मनुष्य को परलोक में अच्छी-बुरी योनियों में जाना पड़ता है।
हमे धर्म को यथार्थ में जानकर व्यवहार रूप में स्वयं के लिए धारण करने की आवश्यकता है। धर्म ही एकमात्र हमारा अस्त्र तथा शस्त्र है, जिसका प्रयोग कर हम इह लोक से पारलौकिक यात्रा को पूर्ण करें। आओं! हम सब मिलकर धर्म को धारण करें।

ईश्वर सुकृत कैसेः- राजेन्द्र जिज्ञासु

श्री सुधाकर आर्य कोशाबी गाजियाबाद की दोनों नन्हीं-नन्हीं पुत्रियाँ बहुत कुशाग्र बुद्धि हैं। कभी-कभी ऐसे प्रश्न पूछ लेती हैं कि उनके दादा डॉ. अशोक आर्य सोच में पड़ जाते हैं कि इतनी छोटी-सी आयु की बालिकाओं को कैसे समझाऊँ। बच्चे के स्तर पर उत्तर देना प्रत्येक व्यक्ति के बस की बात नहीं है। एक आर्य बालक ने अपने स्वाध्यायशील पिता से पूछ लिया, वायु क्यों और कैसे चलती है? पिता के लिये समस्या खड़ी हो गई कि इसे क्या उत्तर दूँ?

डॉ. अशोक जी की चार वर्षीय पौत्री ने घर के बड़ों से पूछा, हम सबके घर में काले बाल हैं, दादा जी के काले क्यों नहीं हैं? उनकी दूसरी पोत्री से सन्ध्या के पश्चात् प्रश्न उठाया, मैं आप सबको देाती हूँ, परन्तु भगवान् दिखाई क्यों नहीं देता। मुझे उन्हें सन्तुष्ट करने को कहा गया। मैंने छोटी बालिका से कहा, तुम पहले से बड़ी हो गई हो। हम सबमें व्यापक ईश्वर हमारे शरीरों का परिवर्तन व वृद्धि करता रहता है। जवानी ढलती है, तो शरीर शिथिल हो जाता है। काले बाल श्वेत हो जाते हैं। वह प्रभु सुकृत सुन्दर और विचित्र कला वाला कलाकार या कारीगर है।

कहीं यह प्रसंग सुना रहा था तो किसी को सुकृत शब्द तो बहुत भाया, परन्तु इसे और स्पष्ट करने को कहा। साथ ही एक नया प्रश्न जोड़ दिया सूअर जैसे गन्दे प्राणी तथा सर्प जैसी योनि को बनाने वाले को वेद ‘सुकृत’ कहता है। हम उसे सुकृत कैसे मान लें?
उसे उत्तर दिया, देखो! हमारे बच्चों की आयु बढ़ती है तो पहले वाले मूल्यवान् वस्त्र कोट, स्वैटर आदि काम नहीं आते। वे ठीक होने पर भी बच्चों के काम नहीं आते। हमें बहुत व्यय करके नये मूल्यवान् वस्त्र सिलवाने पड़ते हैं, परन्तु मानव चोला वही का वही काम करता है। छोटा, कोट तो बड़ा नहीं बन सकता, परन्तु प्राु हमारे पैरों, टाँगों, भुजाओं, हाथों व मुख आदि सब अंगों को बिना कतरणी चलाये बढ़ाता जाता है। क्या कोई मानवीय कारीगर ऐसा कर सकता है? उस प्रश्न कर्त्ता तथा सब श्रोताओं का मेरे द्वारा दिया गया उत्तर बहुत जँचा। वे मुग्ध हो गये। अब उन्हें समझ में आ गया कि वेद ने ईश्वर को सुकृत क्यों कहा है।
रही बात सूअर आदि योनियों को क्यों बनाया? सो उन्हें बताया कि जिसने सूअर जैसा आपको गन्दा दिखने वाला जन्तु पैदा किया है। मोर व तोते जैसे सुन्दर प्राणी पक्षी भी उसी ने बनाये हैं। सुन्दर दर्शनीय नगरों में जहाँ स्कूल, कॉलेज, हस्पताल बनाये जाते हैं, वहीं कारागार व फांसी का फँदा भी होता है। ये भी जीवों के कल्याणार्थ आवश्यक हैं।

जिज्ञासा: जो मन्त्र ‘‘विश्वेदेवा यजमानश्च सीदत’’ है, …..आचार्य सोमदेव

. जो मन्त्र ‘‘विश्वेदेवा यजमानश्च सीदत’’ है, इसमें यजमान अलग से कहने की आवश्यकता क्या है? यह तो ठीक है कि यजमान के बिना यज्ञ कैसे होगा और उसका यज्ञ में विशेष महत्त्व भी है, परन्तु जब देव ही यज्ञ करने का अधिकार रखते हैं, मनुष्यों को यज्ञ करने का अधिकार ही नहीं है, फिर विश्वेदेवा में यजमान स्वतः ही आ जाता है। उसके लिए अलग से यजमान भी बैठ जाएँ-कहने का प्रयोजन क्या है? समझ नहीं आता है। हम तो यही सुनते थे कि शूद्रों को यज्ञ करने का अधिकार नहीं है। हम साधारण व्यक्ति तो यही समझे हैं कि उक्त मन्त्र में केवल सभी देव और यजमान के लिए बैठने का ही निर्देश नहीं है, बल्कि जलाई गई अग्नि को और अधिक प्रज्वलित करने के बारे में भी कहा गया होगा और इससे अन्य भी कोई महत्त्वपूर्ण बात है, इसलिए इस मन्त्र का क्रम इसी स्थान पर आता होगा, परन्तु सभी देवों और यजमान को इतने समय बाद बैठने का निर्देश देना समझ नहीं आता। यहाँ ‘‘सीदत’’ का कुछ अन्य भी अर्थ होगा। कृपया, समझाने का कष्ट करें।

(ग) इस तीसरे बिन्दु में भी आपकी वही समस्या है कि मनुष्यों को यज्ञ करने का अधिकार ही नहीं है, आपने यह बात कहाँ से कैसे निकाल डाली, ज्ञात नहीं हो रहा। जिस प्रकरण को लेकर आप यह बात कह रहे हैं, उस प्रकरण वा किसी अन्य स्थल से आप पहले यह प्रमाण दें कि मनुष्य यज्ञ करने का अधिकारी नहीं है। हाँ, इसके विपरीत मनुष्यों द्वारा यज्ञ करने के प्रमाण तो ऋषियों के अनेकत्र मिल जायेंगे। आप फिर उस बात को दोहरा रहे हैं कि देव ही यज्ञ करने के अधिकारी हैं, इस बात की भी सिद्धि नहीं होगी कि केवल देव ही यज्ञ कर सकते हैं।
अर्थात् मनुष्य यज्ञ करने का अधिकारी है, यह बात ऊपर शास्त्र से सिद्ध है। महर्षि दयानन्द लिखते हैं- ‘‘प्रत्येक मनुष्य को सोलह-सोलह आहुति-और छः छः माशे घृतादि एक-एक आहुति का परिमाण न्यून से न्यून चाहिए।’’ स.प्र. ३। यहाँ महर्षि ने मनुष्य लिखा है और अन्यत्र भी मनुष्यों द्वारा यज्ञ विधान है, इसलिए मन्त्र में ‘‘विश्वेदेवा यजमानश्च सीदत’’ दोनों को पढ़ा गया है। यजमान और सब देवों के स्थिर होने का प्रयोजन है। केवल देव अर्थात् विद्वान् अथवा केवल यजमान (मनुष्य) ही नहीं, अपितु ये दोनों उस यज्ञ रूपी श्रेष्ठ कर्म में स्थिर हों। इन दोनों को कहने रूप प्रयोजन से मन्त्र में दोनों को कहा है। अधिक जानने के लिए उपरोक्त महर्षि के अर्थ को देखें।
अन्त में आपसे निवेदन है कि इस प्रकार के प्रश्न प्रकरण को ठीक से समझने पर अपने-आप सुलझ जाते हैं। शतपथ में किस प्रकरण को लेकर कहा है और वेद का क्या प्रसंग है, यदि हम उस प्रकरण, प्रसंग को ठीक से देख लें तो बात उलझेगी नहीं, अपितु सुलझ जायेगी। उलझती तब है, जब हम दो प्रकरणों को मिलाकर देखते हैं। अस्तु। – ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर (राज.)

१. हमें मनुष्य बनना चाहिए या देव बनने का प्रयास करना चाहिए? – आचार्य सोमदेव

जिज्ञासा- निम्नलिखित जिज्ञासाओं का समाधान करने का कष्ट करेंः-
१. हमें मनुष्य बनना चाहिए या देव बनने का प्रयास करना चाहिए?
मनुष्य बनेंगे तो ‘‘शतपथ’’ वाली बात बाधा डालती है, जिन्हें यज्ञ करने तक का अधिकार नहीं है। जब महर्षि दयानन्द द्वारा अनेक स्थलों पर दी गई ‘‘मनुष्य’’ की परिभाषा में सभी श्रेष्ठ गुण आ जाते हैं, तो फिर देव बनने की क्या आवश्यकता रह जाएगी और इस तरह मन्त्र में ‘‘मनुर्भव’’ वाली बात का औचित्य भी सिद्ध हो जाएगा।

समाधान-(क) वेद व ऋषियों के तात्पर्य को समझने के लिये वेद व ऋषियों की शैली को ही अपनाना पड़ता है। इस आर्ष शैली को अपनाकर जब हम वेद और ऋषि वाक्यों को देखते हैं, तब वे वाक्य हमें स्पष्ट समझ में आते चले जाते हैं। महर्षि दयानन्द ने वक्ता अथवा लेखक का भाव, उद्देश्य समझने के लिए सत्यार्थ प्रकाश की भूमिका में चार बातें-आकांक्षा, योग्यता, आसत्ति और तात्पर्य को जानने के लिए कहा है। प्रायः जब हम भाषा-शैली वा भाषा-विज्ञान को नहीं जान रहे होते, तब हम किसी बात के अर्थ को ठीक से नहीं जान पाते।
महर्षि दयानन्द ने मनुष्य की परिभाषा अनेक स्थानों पर दी है। वे परिभाषाएँ अपने-अपने स्थान पर उचित हैं। महर्षि मनुष्य के अन्दर जो मनुष्यता के भाव होने चाहिए उनको लेकर परिभाषित कर रहे हैं, जैसे स्वात्मवत्, सुख-दुःख में वर्तना, विचार पूर्वक कार्य करना आदि। यह मनुष्य बनने की प्रेरणा वेद भी ‘मनुर्भव’ वाक्य से कर रहा है। इसको देखकर आप तो शतपथ के वाक्य को देख रहे हैं और उसमें विरोधाभास दिख रहा है, सो है नहीं। यहाँ जो ‘‘अनृतं मनुष्याः’’ कहा है, वह एक सामान्य कथन है। इसका यह तात्पर्य कदापि नहीं है कि मनुष्य सदा झूठ ही बोलता है, सत्य बोलता ही नहीं। हाँ, इसका यह तात्पर्य तो अवश्य है कि मनुष्य अपने अज्ञान आदि के कारण झूठ बोल देता है, जबकि यह भाव देवताओं में नहीं होता, क्योंकि विद्वानों, ज्ञानियों को देवता कहा गया है, ‘‘विद्वांसो वै देवाः’’। विद्वान् ज्ञानी लोगों में अज्ञान स्वार्थ आदि के न होने के कारण वे सत्य बोलते हैं, सत्य का आचरण करते हैं। इसका यह भी तात्पर्य नहीं है कि कभी झूठ बोल ही नहीं सकते, नहीं बोलते। हाँ, देव और मनुष्य कोई अलग नहीं हैं। दोनों में एक ही अन्तर है कि देवों से त्रुटियाँ नहीं होती अथवा यूँ कहें कि अत्यल्प होती हैं। जो होती हैं, वे जीव की अल्पज्ञता के कारण होती हैं और इनसे इतर जो हैं, वे मनुष्य हैं। मनुष्यों से त्रुटियाँ अधिक हो सकती हैं, होने की सम्भावना अधिक रहती हैं।
‘‘अनृतं मनुष्याः’’ इस सामान्य कथन को लेकर ‘‘मनुर्भव’’ से विरोध देखना उचित नहीं हैं। ‘‘मनुर्भव’’ मनुष्यता से युक्त मनुष्य बनने की बात कह रहा है और ‘‘अनृतं मनुष्याः’’ कह रहा है कि मनुष्य से अज्ञान के कारण त्रुटि हो सकती है। इन दोनों में कोई विरोध नहीं है, दोनों वाक्य अपने-अपने स्थान पर अपनी बात कह रहे हैं।
हमें मनुष्य बनना चाहिए या देव? तो हमें श्रेष्ठता की ओर बढ़ना चाहिए। मनुष्य बनना कोई हीन बात नहीं है। वेद ने मनुष्य बनने के लिए कहा है और इससे आगे अपने अन्दर देवत्व पैदा करने की बात कही, अर्थात् मनुष्य से आगे हम देव बनें।
आप शतपथ की इस बात को लेकर कह रहे हैं कि ‘‘इससे सिद्ध होता है कि मनुष्य को यज्ञ करने का अधिकार नहीं है।’’
शतपथ के इस पूरे प्रसंग से कहीं भी ऐसी बात प्रतीत नहीं हो रही कि मनुष्य को यज्ञ से दूर रखा जा रहा हो और देवताओं के लिए यज्ञ करने का विघान हो। यहाँ तो केवल सामान्य परिभाषा की जा रही है कि जो असत्य बोल देता है (किन्हीं कारणों से) वह मनुष्य और जो सत्य बोलता है, देवता होता है। यहाँ मनुष्यों के यज्ञ न करने की बात कहाँ से आ गई? अपितु शास्त्र में यह कथन तो मिलता है- ‘‘मनुष्याणां वारम्भसामर्थ्यात्।।’’ का. श्रौ. पू. १.४ अर्थात् यज्ञ-याग आदि कर्म करने का अधिकर मनुष्यों का है, मनुष्य इस कार्य के लिए समर्थ हैं। इस शास्त्र वचन में मनुष्य ही यज्ञ का अधिकारी है और आप इसके विपरीत देख रहे हैं जो कि है ही नहीं।
अभी हमने पीछे कहा कि मनुष्य बनना कोई हीन काम नहीं है,मनुष्य बनना एक श्रेष्ठ स्थिति है। जिस स्थिति को महर्षि दयानन्द परिभाषित करते हैं, वहाँ यहाँ वाली स्थिति नहीं है। महर्षि की मनुष्य वाली परिभाषा में धर्म का बाहुल्य है, विचार का बाहुल्य है। किन्तु देव मनुष्यों से आगे धर्म और विचार का बाहुल्य रखते हुए विवेक विद्या का बाहुल्य भी रखते हैं, वे राग-द्वेष से ऊपर उठे हुए होते हैं। यह सब होते हुए देव बनने की आवश्यकता है, इसलिए वेद ने कहा ‘मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्।’ इस आधार पर मनुष्य और देव दोनों बनने का औचित्य है।

वैदिक धर्म प्रचार की शैली क्या हो? : डॉ. धर्मवीर

वैदिक धर्म प्रचार की शैली क्या हो?
सम्पूर्ण समय में सब कुछ विकसित या सब कुछ अविकसित नहीं हो सकता। इस बात को इस तरह भी समझा जा सकता है कि सदा सब कुछ एक जैसा नहीं होता। ज्ञान-विज्ञान की शक्ति इतनी प्रबल होती है कि समय को चलाने के लिये उसका थोड़ा होना भी बहुत होता है। हम उसे समाज का मुख भी कह सकते हैं। वह ही संसार में आगे चलता है। जैसे शरीर में मुख के अतिरिक्त बहुत कुछ है, परन्तु सब ज्ञानेन्द्रियाँ मुख पर ही आश्रित हैं, सारा शरीर उसी से चलता है। समाज को सभी वर्णों की आवश्यकता होती है, परन्तु समाज को विद्या और विज्ञान जानने वाला वर्ग ही चलाता है। पहले भी ऐसा ही था, आज भी ऐसा ही है और आगे भी ऐसा ही होगा। यदि विद्या वाला वर्ग सोचे कि वह कुछ नया नहीं जानेगा और समाज का संचालन करेगा, तो यह सोचना गलत होगा। तब तक समाज में उसका स्थान दूसरे ले चुके होंगे। ज्ञान ही मनुष्य को संचालित करेगा, चाहे वह किसी भी दिशा से आये या किसी भी भाषा से आये। जब कभी कोई संसार में प्रगति को अवरुद्ध करता है, तब गति की दिशा और स्थान बदल जाते हैं, परन्तु गति बनी रहती है। संसार में निरन्तर ऐसा ही होता रहता है।
इस बात को एक और तरह से भी समझ सकते हैं। इस जीवित शरीर में चेतना होने पर ही जीवन रहता है। चेतना के समाप्त होने पर शरीर तो रह सकता है, परन्तु उसमें जीवन नहीं हो सकता, इसी कारण मनुष्य शरीर के लिये सब कुछ करके भी अपने को अपूर्ण अनुभव करता है। यह अपूर्णता हमें पूर्णता के लिये कुछ करने को विवश करती है। यह विवशता धार्मिकता के बिना दूर नहीं हो सकती, इसे रूढ़िवादी धर्म कभी भी पूरा नहीं कर सकते। वैदिक धर्म की वैज्ञानिकता ही इस शरीर और आत्मा के प्रयोजन को सिद्ध करने में समर्थ है।
जो लोग बिना ज्ञान के चलना चाहते हैं, उन्हें उनका आग्रह समाज में पीछे धकेल देता है। प्रायः हम धर्म के नाम पर अपने को एक स्थान पर बाँध लेते हैं और जब बँध जाते हैं तो हमारी गति रुक जाती है। संसार में सबसे अधिक ईसाई और मुसलमान हैं, उन्होंने धर्म और विज्ञान से अपने को विचित्र तरह से जोड़ा। इस्लाम की विचाराधारा ज्ञान-विज्ञान पर रोक लगाने वाली है, वहाँ प्रगति के लिये कोई स्थान नहीं। ईसाइयत ने इसे दो भागों में बाँट लिया है, गति के लिये विज्ञान का आश्रय लिया है, परन्तु धर्म के बन्धन को भी नहीं छोड़ा है, इसलिये वह विज्ञान को स्वीकार करने पर भी अपने धर्म को वैज्ञानिक नहीं बना सका। वैदिक धर्म ने जब तक अपने ज्ञान-विज्ञान को जीवित रखा, तब तक वह विज्ञान-सम्मत था, गति करता रहा। जब वह वैज्ञानिक सोच से वञ्चित हो गया, प्रगति से शून्य हो गया।
इस युग में ऋषि दयानन्द का आगमन वैदिक धर्म को विज्ञान-सम्मत बनाने का प्रयास था। धर्मों की लड़ाई में ऋषि दयानन्द की वैज्ञानिकता ने वैदिक धर्म को गति दी। उनके अनुयायियों ने धर्म को तो अपनाया, परन्तु वैज्ञानिक सोच को भूल गये या वह उनसे छूट गया, परिणाम स्वरूप उनकी लड़ाई अन्य धर्म वालों के साथ रह गई, वैज्ञानिकों के साथ छूट गई। दूसरे शब्दों में आर्य समाज शिक्षा, विद्या एवं विज्ञान के क्षेत्र में अपना स्थान नहीं बना सका। वह उन्हीं धार्मिक लोगों से लड़ता रहा और आज भी लड़ रहा है। हमारी लड़ाई विज्ञान के बिना और वैज्ञानिक लोगों से न होकर रूढ़िवादी धार्मिक लोगों के साथ रह गई है, जो वैज्ञानिक सोच बिल्कुल नहीं रखते। ऋषि दयानन्द के समय हमारी धार्मिक लड़ाई हमें आगे ले जा सकी थी, परन्तु आज हमारी धार्मिक लड़ाई हमें आगे क्यों नहीं ले जा पा रही है- इसके विषय में विचार करने की आवश्यकता है।
प्रगति के अवरुद्ध होने का जो कारण हमारी समझ में आता है, वह यह है कि ऋषि दयानन्द के समय संसार भर में धर्म का प्रभाव अधिक था, विज्ञान का विकास थोड़ा था, प्रभाव भी थोड़ा था, इसलिये धर्म के नाम पर कही गई वैज्ञानिक बातों को धार्मिक लोग आसानी से स्वीकार कर लेते थे, परन्तु आज विज्ञान का अनुयायी वर्ग संसार में बहुत बढ़ गया है और धार्मिक वर्ग प्रतिशत में अधिक होने पर भी पहले से बहुत घट गया है, ऐसी स्थिति में आर्य समाज या वैदिक धर्म की लड़ाई वर्तमान धार्मिक परिस्थितियों में पिछड़ गई है। इसका एक कारण है- इन धार्मिक संगठनों का प्रभाव क्षेत्र, उनका संगठन तथा प्रचार तन्त्र और उसके लिये प्राप्त उनके साधन हमारी तुलना में हजारों गुना अधिक हैं। हमारे पास वैज्ञानिक विचार तो हैं, परन्तु इन विचारों को गति देने वाला तन्त्र नहीं है। नये विचारक उत्पन्न करने के साधन नहीं हैं, प्रतिभाशाली लोगों तक पहुँचने के उपाय भी नहीं, व्यक्ति भी नहीं। इस स्थिति में हमारे किये जाने वाले प्रयास समुद्र के सम्मुख बिन्दु जैसे भी नहीं दीखते। ऐसी परिस्थिति में क्या किया जा सकता है और क्या किया जाना चाहिए?
प्रथम जिस परिवेश और समाज में हम लोग रह रहे हैं, उसमें दोनों प्रकार के लोग हैं, एक वे जो अपने को धार्मिक कहते हैं और दूसरे वे जो अपने को प्रगतिशील या वैज्ञानिक सोच का व्यक्ति मानते और समझते हैं। वैदिक विचारों के लिये जो अवसर पहले था, आज भी वही है। विज्ञान कितना भी आगे क्यों न बढ़ गया हो, कितना भी विकसित क्यों न हुआ हो, आज भी शरीर के स्तर से आगे नहीं बढ़ा है। मनुष्य के लिये शरीर ही अन्तिम नहीं है। यहाँ आकर व्यक्ति अपने को वैज्ञानिक विचारधारा वाला मान कर स्वयं को धर्म से- रूढ़िवादिता से दूर कर लेता है, परन्तु अपने-आपको विज्ञान की खोज से सन्तुष्ट नहीं कर पाता। ऐसे लोग अपने को वैज्ञानिक मानते हैं, परन्तु धार्मिकता की परम्पराओं से स्वयं को दूर रखते हुए विज्ञान के अन्दर जो अभाव है, उसे पूरा करने के लिये अपने को अध्यात्मवादी कहते हैं। उनका मानना है कि भले ही वे धर्म के नाम पर पाखण्ड को स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं हैं, परन्तु सोचते कुछ और हैं, जिसे विज्ञान से अभी तक समझा नहीं जा सका है। इसी कारण वे अपने को धार्मिक (रिलीजियस) न कहकर अध्यात्मवादी (स्प्रिच्युलिस्ट) कहते हैं।
ऋषि दयानन्द ने अपने विचार समाज के बुद्धिजीवी वर्ग में ही रखे थे। स्वामी दयानन्द ने अपने जीवन काल में जितना प्रचार किया, साहित्य लिखा, उसका सम्पर्क तत्कालीन बुद्धिजीवी लोगों से रहा, जिसके कारण उनके विचारों का प्रभाव समाज के बुद्धिजीवी वर्ग पर देखा जा सकता है। राजा-महाराजा हों, न्यायाधीश, पत्रकार, विद्वान्, लेखक हों। सभी उनके विचारों से परिचित थे, चाहे लोग स्वामी जी के विचारों से सहमत हों या असहमत हों। इसी चर्चा के कारण देश में ही नहीं, देश के बाहर भी उनके विचारों की चर्चा, उनके जीवन काल में हम देख सकते हैं।
धीरे-धीरे आर्य समाज की चर्चा समाज में तो रही, परन्तु उसके केन्द्र से बुद्धिजीवी वर्ग बाहर होता गया, उस वर्ग के लोगों को आर्य समाज के विचार और सिद्धान्तों से परिचित होने का अवसर कम होता गया। इसके दो कारण रहे- एक तो शिक्षा के क्षेत्र में पठन-पाठन क्रम का पाश्चात्य विचारधारा वाले लोगों के हाथ में जाना, सरकार द्वारा इसी को स्वीकार करना। इस प्रयास से शिक्षा का प्रचार-प्रसार तो हुआ, परन्तु पूरा समाज दो भागों में बंट गया। एक अंग्रेजी शिक्षा में दीक्षित वर्ग अभिजात्य श्रेणी में आ गया, देसी भाषा में शिक्षा लेने वाले बहुसंख्यक शेष लोग पीछे रह गये। आर्य समाज का क्षेत्र जनसामान्य का क्षेत्र रहा, उनमें प्रचार तो हुआ, परन्तु विचारों का प्रसार नहीं हो सका, क्योंकि नई पीढ़ी के लोग इस देश में सामान्य लोग श्रोता तो हो सकते हैं, समाज के संचालक नहीं हो सकते, अतः संचालक तथाकथित शिक्षित वर्ग रहा। किसी भाषा के बोलने वाले बहुत हैं, इसलिये उनकी आवाज सत्ता पर प्रभावकारी हो, यह अनिवार्य नहीं है। अंग्रेज तो एक प्रतिशत भी नहीं थे, परन्तु उनकी सत्ता अंग्रेजी से चलती थी, आज यह संख्या समाज में पाँच प्रतिशत से भी अधिक है, अतः सत्ता ही मजबूत हुई है, समाज नहीं। शिक्षा में जो लोग हैं, उनतक वैदिक विचारों की पहुँच शून्य स्तर पर है, अतः समाज पर हम अपना विशेष प्रभाव डाले, ऐसी सम्भावना कम है।
सामान्य वर्ग परम्परागत धर्म व रुढ़िवाद के साथ बंधा है। उसे मन्दिर, मस्जिद, चर्च ने अपने साथ बांध रखा है, जिसका विकल्प आर्य समाज के पास नहीं है। उनसे बहुत परिवर्तन की आशा नहीं की जा सकती। शिक्षित और बुद्धिजीवी लोग भी उसी प्रकार धार्मिक अन्धविश्वास और परम्पराओं से बंधे हुए हैं, परन्तु उनको वैज्ञानिक विचारों से परिचित कराने पर उनमें स्वीकृति की सम्भावना अधिक होती है और उनकी स्वीकृति समाज पर प्रभावकारी होती है।
महर्षि दयानन्द का धर्म-वेद का धर्म, अध्यात्म और विज्ञान को एक साथ देखता है। आत्मा की अनुभूति की ओर जाने वाले मार्ग को वह धर्म कहता है और ज्ञान की प्राप्ति के मार्ग को विज्ञान कहता है। हम धर्म को विज्ञान समझे बिना ग्राह्य नहीं बना सकते। हमारी समस्या है- हम जिन्हें धार्मिक कहते हैं, वे सब विज्ञान विरोधी हैं, चाहे वे इस्लाम या ईसाइयत के अनुयायी हों या रूढ़िवादी हिन्दू कहलाने वाले लोग। जो कोरे वैज्ञानिक हैं, उन्हें धर्म के नाम से भी चिढ़ है और जो कट्टर धार्मिक हैं, उन्हें विज्ञान से सम्बन्ध रखने की इच्छा भी नहीं है। अब वे शेष रहते हैं, जो धर्म को नहीं मानते, पर वैज्ञानिक दृष्टि रखते हैं तथा विज्ञान सम्मत धार्मिक विचारों को सुनने के लिये और स्वीकार करने के लिये तैयार हैं। वे ही हमारे कार्य के क्षेत्र में होने चाहिए। इन लोगों का कोई परिभाषित या चिह्नित वर्ग नहीं है। प्रत्येक स्थान पर जिनकी वैज्ञानिक बुद्धि में जिज्ञासा विद्यमान है, उनको इन विचारों से परिचित कराया जाये तो वे इन्हें सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं। आज उनको केन्द्र में रखकर प्रचार करने की आवश्यकता है।
किसी भी विचारधारा के प्रचार-प्रसार में व्यक्ति के विचारों में परिवर्तन लाना आवश्यक है। विज्ञापनों से प्रचार उन बातों का हो सकता है, जो मनुष्य की आवश्यकता है। चाहे फिर तेल, साबुन आदि या अन्य, उपभोग की वस्तु जिनके प्रति किसी भी मनुष्य का स्वाभाविक आकर्षण होता है। भाषणों से प्रचार तात्कालिक प्रभाव के लिये उपयोगी रहता है। आप कोई आन्दोलन चला रहे हैं, चुनाव लड़ रहे हैं, तब सार्वजनिक सभा, व्याख्यान अनिवार्य हो जाता है, केवल समाचार पत्रों में विज्ञापन देकर या लेख देकर या पत्रक बाँटकर काम नहीं चलता, ये बातें सम्पर्क करने में सहायक अवश्य होती हैं, परन्तु इनसे प्रयोजन की सिद्धि नहीं होती।
मत, सम्प्रदाय धार्मिक विचारों का प्रभाव तो व्यक्ति के साथ निकट सम्पर्क से ही पड़ता है। सार्वजनिक सभा वार्ता कथा सत्संग मनुष्य को निकट लाने के लिये साधन है। सत्संग, सभा, कथा, वार्ता से थोड़े समय के लिये मनुष्य के विचारों पर प्रभाव पड़ता है, परन्तु इसकी निरन्तरता के लिये कर्मकाण्ड की आवश्यकता होती है। कोई मनुष्य आपकी बात सुनके क्या करे? जिससे आप के द्वारा बताये गये लाभ उसे प्राप्त हो सके। इस कर्मकाण्ड में भी ऐसे आचार्य गुरुओं का भक्तों और शिष्यों से निरन्तर सम्पर्क रहना आवश्यक है। गुरु लोग यजमानों के घर पर जायें अथवा यजमान गुरुओं के आश्रम पर पहुँचकर अपने विचारों को पुष्ट करें। जहाँ आचार्य शिष्य या साधु, सन्त, भक्तों का सम्पर्क बनता है, वहाँ धार्मिक परम्परा चलती है। इसके स्थापित होने में बहुत समय लगता है और इसका क्षेत्र भी बहुत लम्बा नहीं हो पाता फिर आज के वातावरण में आर्य समाज या वैदिक विचारों को केवल प्रचार करने मात्र से नहीं फैलाया जा सकता। जिन लोगों की आजीविका, व्यापार या स्वार्थ पुरातन परम्परा से जुड़ा है, उनके द्वारा इन विचारों से परिचित होने पर उचित मानने पर भी स्वीकार करना कठिन होता है। ऐसी परिस्थिति में वैदिक धर्म या विचार के प्रचार-प्रसार करने का क्या उपाय हो?
हमें एक बात स्मरण रखनी चाहिए- समाज के तीन प्रतिशत लोग ही समाज को संचालित करते हैं, परन्तु इन तीन प्रतिशत लोगों का ज्ञानवान और समर्थ होना आवश्यक होता है। समाज में बुद्धिजीवी लोग यदि किसी बात को स्वीकार कर लेते हैं, तब शेष लोगों को उसे स्वीकार करने में संकोच या कठिनाई नहीं होती। जो स्थापित है, उनको समझाना सबसे कठिन है। विचारों के प्रचार के लिये सबसे सरल मार्ग है- बुद्धिजीवी युवकों को, जो अभी ऊँच शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, उनको इन विचारों से परिचित कराया जाय, वे बुद्धिजीवी होने के साथ युवा होने के कारण जो विचार उन्हें उचित लगते हैं, विचारों को अपनाने में भी उन्हें कोई संकोच नहीं होती। यदि शिक्षा संस्थानों को विशेष रूप से महाविद्यालय विश्वविद्यालय को केन्द्र बना कर सर्वोच्च बुद्धि वाले युवकों को विचारों से जोड़ा जाय तो यह कार्य कुछ वर्षों में प्रभावकारी हो सकता है। पाँच से दस वर्षों में समाज पर प्रभाव परिलक्षित होने लगेगा तथा बीस वर्ष में आप इससे यथेच्छ परिणाम भी प्राप्त कर सकते हैं।
यह कार्य केवल कल्पना नहीं है अपितु महाराष्ट्र में स्वामी श्रद्धानन्द जी ने अपने जीवन के साठ वर्ष से अधिक समय इस पद्धति का प्रयोग कर इसकी सफलता का अनुभव किया है। किसी विचारधारा या संगठन के लिये दस-बीस वर्षों का समय बहुत नहीं होता। आवश्यकता है- योजना और निष्ठा से इस कार्य को करने की और धर्म का मूल वेद बुद्धिमानों के ही समझ में आ सकता है और उन्हीं के द्वारा इसका विस्तार भी हो सकता है।
हम कितने जिज्ञासुओं तक अपना समाधान पहुँचा सकते हैं, इस पर ही हमारी सफलता निर्भर करती है। ऋषि दयानन्द के विचार ही वैदिक धर्म को जीवित रख सकते हैं, ऐसा धर्म मनुष्यता को जीवित रख सकता है, जिससे वर्तमान और भविष्य दोनों का कल्याण हो। इसीलिये कहा है-
यतोऽभ्युदय निः श्रेयस् सिद्धिः स धर्मः।
– धर्मवीर

गीता महाभारत का नवनीत : बी.के. श्रीवास्तव

श्रीमद्भगवद्गाीता का भारतवर्ष के पौराणिक विद्वानों में बहुत मान्य है। भारत के प्रसिद्ध विद्वानों एवं सम्प्रदाय आचार्यो (द्वैत अद्वैत षुद्धाद्वैत विषिष्टाद्वैत ) ने अपने अपने दृष्टिकोण के अनुसार अनेक प्रकार के भाष्य गीता पर किये हैं। सभी पौराणिक टीकाकार जो गीता के समर्थक रहे हैं उनको गीता के कृष्ण ईष्वर के अवतार के रूप में मान रहे हैं। अतः उन्हें गीता के अन्दर कुछ भी प्रक्षिप्त या अस्वाभाविक दृष्टिगोचर नही हुआ। क्योंकि गीता उनके लिए वस्तुतः ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ (श्रीमान भगवान विष्णु यानी उनके अवतार कृष्ण के द्वारा गाई गयी – कही गई ही थी ) इस विषय में एक कथा भी प्रचलित है कि महाभारत का युद्ध आरम्भ होने से पहले अर्जुन अपने बन्धु-बान्धव के मोह मे फंसकर युद्ध से विमुख हो गया था। उसे समझाने के लिए ही कृष्ण ने जो उपदेष दिया वही गीता के रूप में प्रसिद्ध हुआ है। इसी आधार पर गीता को वेदादि षास्त्रों से अधिक मान्यता दी जाती है।
गीता के महत्त्व विषयक निम्न ष्लोक प्रसिद्ध भी हैः-
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै षास्त्र विस्तरै।
या स्वयं पदमानाभस्य मुखपदमाह विनिःसृता।
अर्थ- गीता की ठीक से चर्चा करनी चाहिए, अन्य षास्त्रों के विस्तार से क्या प्रयोजन। गीता स्वयं विष्णु (कृष्ण)के मुख से निकली है।
इस ष्लोक का पद्मनाभ षब्द गीता को वेदो से उत्तम बताने का प्रयत्न करता है। विष्णु के नाभि से कमल निकला कमल से ब्रम्हा उत्पन्न हुए और ब्रम्हा के मुख से वेदो का जन्म हुआ। इस प्रकार वेदों का ब्रम्हा से परम्परा सम्बन्ध है जबकि गीता स्वयं उन्हीं के मुख से उच्चारित है। इस बात को इसी रूप मे मान लिया जाये तो गीता का रचना काल द्वापर सिद्ध होता है। आधुनिक विद्वान की भाषा मे कहा जाये तो गीता का रचना आज से पांच हजार वर्ष पहले हुई ।परन्तु यदि बुद्धि का थोड़ा सा प्रयोग करते हुए ध्यानपूर्वक महाभारत का अध्ययन किया जाये तो कोई भी इस निष्कर्ष मे पहुचे विना नही रहेगा कि गीता का न तो श्रीकृष्ण से कोई संबंध है, न ही व्यास मुनि महाभारत से , बल्कि यह सर्वथा काल्पनिक है- इसके कई कारण है।
गीता और श्री कृष्ण
(अ) ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाये तो किसी भी समय पद्यबद्ध बातचीत का चलन इतिहास मे सिद्ध नही होता। अतः गीता स्वयं पद्मनाभ विष्णु के मुख से निकली यह तो किसी प्रकार कहा ही नही जा सकता। हां यह हो सकता है कि किसी अन्य ने कृष्णार्जुन संवाद ही गीता का वर्तमान रूप दिया हो।
(आ) यदि यह भी मान लिया जाये कि गीतोक्त कृष्णार्जुन संवाद पद्यबद्ध न होकर गद्य मे ही हुआ था, बाद मे किसी अन्य ने गद्य मे व्यक्त भावों को पद्यबद्ध रूप दे दिया तो यह भी नही माना जा सकता क्योंकि युद्धभूमि मे इतना समय कहां था कि 700ष्लोको का वार्तालाप चलता रहता जिसमे कि कम से कम चार घण्टे यानी कि लगभग सवा प्रहर से कम का समय नही लग सकता था।
(इ) गीता का कथानक प्रारम्भ होता है महाभारत युद्ध के पूर्व से। अब यदि युद्ध के पहले दिन की घटनाओं पर ध्यान दे तो मालुम होता है कि गीता के इतने लम्बे और उबाऊ उपदेष के लिए समय बिल्कुल नही था क्योंकि दोनो सेनाओं ने संध्या हवन करके व्यूह रचना की। कौरव सेना की व्यूह रचना देखकर युधिष्ठिर घबरा गये। अर्जुन ने उन्हें भांति भांति के आष्वासन देकरषान्त किया। फिर अर्जुन व्यतमोह और गीता का लम्बा उपदेष चला । अर्जुन के तैयार हो जाने के बाद युधिष्ठिर युद्ध की अनुमति लेने के लिए पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण, कृपाचार्य तथा षल्य नरेष के पास गये। बाद मे दोनो सेनाओ ने दो प्रहर तक युद्ध किया।
यहां ध्यान रखने योग्य तथ यह है कि महाभारत का युद्ध अगहन-पूष मे हुआ था जबकि दिन बहुत ही छोटा होता है- लगभग सवा तीन प्रहर का । इसमे से युद्ध के दो प्रहर निकाल दिए जाये तो सवा प्रहर ही बचता है। जो संध्या हवन जैसे आवष्यक कर्म करने, अपनी अपनी सेना के व्युह रचना करने , कौरवो की व्यूह रचना देखने युधिष्ठिर के घबरा जाने, अर्जुन द्वारा उन्हें भांति भांति के आष्वासन देकर उन्हें समझाने व षान्त करने पितामह भीष्म व अन्य आचार्य जनों के पास युद्ध के लिए अनुमति लेने हेतु जाने वहां से लौटकर आने आदि कर्मों के बाद षेष समय तो गीता जैसे लम्बे उपदेष के लिउ कतई पर्याप्त नहीं।
गीता और महर्षि व्यास
परन्तु निम्न तर्क और प्रमाण महर्षि व्यास को भी गीता का रचयिता नही मानने देते ।
(अ) गीता को गहराई से देखने पर स्पष्ट प्रतीत होता है कि गीता महर्षि व्यास की रचना नही है। क्योंकि जिस महर्षि व्यास के महाभारत का गीता नवनीत बतीई जाती है वह एैतिहासिक महाकाव्य है। जिसने कौरव पाण्डवों और उनके पूर्वजों, बन्धु-बान्धवों, इष्ट मित्रों, सम्बन्धियों आदि सभी के जीवन मरण यष अपयष, उत्थान पतन, कुषल अकुषल अच्छे बुरे सभी कामों का विसद वर्णन है, परन्तु गीता के 18 अध्यायों में प्रथम अध्याय के कुछ ष्लोकों को छोडकर सेष सम्पूर्ण गीता ऐतिहासिक घटनाक्रम से रहित दार्षनिक उहापोह से भरी पड़ी है जैसे आत्मा की अमरता, ज्ञानयोग, कर्म संन्यासयोग, योनियों की परिभाषा, यज्ञों का वर्णन, सकाम-निष्काम कर्मों का विवेचन, ध्यान योग प्रकार,योगभ्रष्ट लोगों की गति, देवता उपासना, देवी व आसुरी सम्प्रदाय वालों की विवेचन ,षुक्ल व कृष्ण मार्ग, जगत की उतपत्ति का वर्णन, सकाम निष्काम, उपासना का विष्लेपण, निष्काम कर्म की प्रषंसा, विष्वरूप दर्षन, साकार उपासना की प्रषंसा, प्रकृती पुरुष की व्याख्या, जीवात्मा की विवेचना, संसार वृक्ष का कथन, सत्त्व रज तम का विवेचन, श्री कृष्ण ही परमेष्वर है, वह ओमवाची हैं, यज्ञों से भी केवल वही प्राप्तव्य हैं, वेदों में भी उन्हीं की प्रषंसा है, वर्ण धर्मो का कथन, योग्याभ्यास करने का प्रकार, ब्रम्हाज्ञानी को अक्षय सुख की प्राप्ती, मुक्त जीवों का भिन्न भिन्न लोको से लौटना केवल कृष्ण लोक से न लौटना, कर्मफल त्याग की प्रषंसा, चार प्रकार के भक्तों का वर्णन, अन्य अन्य देवो की उपासना की निन्दा, क्षेत्र क्षेत्रिज्ञ के स्वरूप का कथन परमात्मा की एकता निरुपण, परमेष्वर का सगुण निर्गुण स्वरूप कथन, आत्मा को अकर्ता और गुणहीन जानने से भगवत् प्राप्ती आदि पचासों विषयों का उपदेष श्रीकृष्ण अर्जुन के वार्तालाप के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिसका कि इतिहासिकता से दूर का भी संबंध नहीं है।
जहां तक दार्षनिकता का प्रष्न है भरतीय वैदिक परम्परा में 6 दर्षन ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं। सांख्य, योग, वैषेसिक, पूर्वमीमांसा एवं उत्तरमीमांसा (जिसे ब्रह्मसूत्र या वेदांन्त दर्षन भी कहते है) इस वेदांत दर्षन के रचयिता भी महर्षि व्यास ही हैं। इसके साथ साथ योग दर्षन के भाष्यकार भी महर्षि व्यास ही हैं इतनी उच्च कोठि का विद्वान ऋषि ऋषि ही नही महर्षि गीता जैसी निम्न स्तर की पुस्तक की रचना करे। कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति मानने को तैयार न होगा। गीता के अधिकांष दार्षनिक विचार वेद विरोधी है। जबकि वेदांत दर्षन सर्वथा वेदानुकूल है।
वेदों मं जिस परमेष्वर की व्याख्या की गई है। गीताकार उसके विपरीत भी श्रीकृअण को ईष्वर माना है। जीवात्मा भी विवेचना भी वेद विरुद्ध है, ईष्वरावतार की कल्पना भी गीता की सर्वथा अवैदिक तर्क एवं बुद्धि के विरुद्ध है, देवतावाद एवं स्वर्ग नर्क की मान्यता एवं मोक्ष के सिद्धान्त पर भी गीता का पक्ष वेद विरुद्ध है। वेदों के स्वरूप पर भी गीताकार का पक्ष प्रत्यक्ष के विरुद्ध है। गीताकार वेदों को ईष्वर एवं अध्यात्म विषय से रहित केवल भोतिक जगत की व्याख्या करने वाला स्वीकार करते हैं। गीता सब धर्म अधर्म के बखेड़ो को त्यागकर केवल श्रीकृष्ण जी की षरण मे जाने मात्र से पाप नाष व मोक्ष दिलाने की बात कहती है जो सर्वथा मिथ्या है। गीता को पढ़ने या सुनने मात्र से पाप नाष होना व सदगति गारण्टी देना गीता की मिथ्या प्रलोभन मात्र है जैसे की रामायण, भागवत, हनुमान चालीसा व गंगा आदि के महात्म्य लेखको ने अपने अपने ग्रन्थों के प्रचार के लिए लिखे हैं। ।
इस प्रकार गीता दर्षनकार व्यास की रचना न होकर किसी पौराणिक कालीन संस्कृति कवि की रचना प्रतीत होती है। जिसमें उस युग के सभी अंध विष्वास प्रविष्ट हैं। जैसे अवतारवाद, जातीवाद, साकारोपासना, बहुदेवतावाद, भाग्यवाद, आदि आदि। यहां तक कि गीता के कृष्ण अपने आप को जुआ बनाने मे भी नही लजाते।
(इ) इतिहास को ध्यान में रखकर विचार करें तो महर्षि व्यास महाभारतकालीन महापुरुष हैं जिसे आज लगभग 5000 से कुछ अधिक समय हो चुका है। जबकि गीता का रचनाकाल आठवी षताब्दी से पहले का नही ठहरता। गीता की प्राप्त टिकाओं में सबसे प्राचीन टीका श्री षंकराचार्य जी की है। श्री षंकराचार्य जी का काल भी विद्वानों द्वारा आठवी षताब्दी ही मान्य है। गीता की प्राप्त प्रतियों में भी कोई प्रति आठवीं षताब्दी से पूर्व प्राप्त नही होती इस प्रकार से गीता को महर्षि व्यास की रचना बताना यह सरासर उनके साथ अन्यान हां यह पौराणिक काल की रचना तो हो सकती है जैसा कि उपर दर्षाया जा चुका है और सह भी सम्भव हो सकता है कि इस प्रचारित करने की दृष्टि से उसके लेखक ने महर्षि व्यास के नाम का सहारा लिया हो जिससे कि खोटा सिक्का चलन में आ जाये
(ई) यदि दुर्जनतोष न्याय से मान भी लिया जाये कि गीता महर्षि व्यास की ही रचना है।तो प्रष्न उपस्थित होता कि आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व के जिन बौद्ध विद्वानों ने नाम ले लेकर ब्राम्हण धर्म के ग्रन्थों का खण्डन किया है उनमे से किसी मे भी गीता का नाम नही लिया इससे ज्ञात होता है। कि उस समय या तो गीता थी नही और यदी थी तो उसे कोई मान्यता प्राप्त नही थी ।
केवल बौद्ध साहित्य ही नहीं बल्कि संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध ग्रन्थ पंचतंत्र जिसमें कि सभी प्रसिद्ध एवं प्रचलित अच्छी अच्छी पुस्तकों के ष्लोक उद्धूत किये गये हैं।
उसमें भी गीता का एक भी ष्लोक नही है। आजकल जो पंचतंत्र प्रचलित है उसे पांचवी षताब्दी में संग्रहित किया गया है।
इससे सिद्ध होता है कि गीता कोई प्राचीन रचना न होकर आर्वाचीन रचना है। तथा महर्षि व्यास से इसका कोई संबंध नही है
गीता और महाभारत
अब हम यह देखने का प्रयास करेगे कि गीता महाभरत का भी अंग है या नही । आगे कुछ भी लिखने से पूर्व में अपने पाठको से निवेदन करना चाहूगां कि अब तक के तर्क और प्रमाणों के लिए तो महाराज श्रीकृष्ण और महर्षि व्यास को सक्षात् उपस्थित करना मेरे बष की बात न थी लेकिन अब बात महाभारत की है जो कि बाजार मे उपलब्ध होता है। गीता का सबसे बड़ा्र प्रचारक गीता प्रेस गोरखपुर है जिस गीता को महाभारत का नवनीत बताया जाता है वह महाभारत भी 6 खंड़ो में यही से प्रकाषित होता है। इसका तृतीय खण्ड हाथ में लेकर देखने का कष्ट करें कि इसमे दिये भीष्म पर्व को इस प्रतिज्ञा के साथ ‘ सत्य के ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने मे सदा उद्यत रहेगे’ तो स्वयं पता लग जायेगा कि गीता की सही स्थिति क्या है।
अ. महाभारत के भीष्मवर्प के अध्याय 25 से लेकर अध्याय 42 तक वाला भाग गीता कहलाता है। 23 वे अध्याय दुर्गा स्त्रोत है। 24वे में संजय धृतराष्ट संवाद है।43 वे अध्याय के प्रथम 6 ष्लोको में गीता का महात्म्य है। अब यदि इन सबको निकालकर 22 वें अध्याय के साथ 43वे अध्याय के सातवें ष्लोक का पढ़ा जाये तो कथानक में कोई अन्तर नही आता । न कथानक का सूत्र टूटा हुआ लगता हैः- देखिए (भीष्मपर्व अ. 22 ष्लोक 14 से 16 तक ) उस समय सेना के मध्य में खढे हुए निद्राविजय राजकुमार दुर्जयवीर अर्जुन से कृष्ण ने कहा
ये जो अपनी सेना के मध्य में स्थित रोष से तप रहे हैं तथा हमारी सेना कि ओर सिंह की भांति देख रहे हैं जिन्होने 300 अष्वमेघ यज्ञ किये है। ये कौरव सेना महानुभाव भीष्म को इस प्रकार ढके हुए हैं जिस ्रपकार बादल सूर्य को ढक लेते हैं। हे नरवीर अर्जुन ! तुम इन सेनाओं को मारकर भीष्म के साथ युद्ध की अभिलाषा करो। (भीष्मपर्व अध्याय 43ष्लोक 6-7)
अर्जुन को धनुष बाण धारण किये देखकर पाण्डव महारथियों सैनिको तथा उनके अनुगामी सैनिको ने सिंहनाद किया, सभी वीरों ने प्रसन्नतापूर्वक षंख वजाये ।
यहां विचारणीय तथ्य यह है कि क्या किसी ऐतिहासिक लेखक की रचना में से एैसा होना संभव है कि उसके 20 अध्याय हटाने पर भी कथानक पर कोई प्रभाव न पड़े। मैं समझता हूं कि डा.सा.भी. ऐसा कोई उदाहरण न कर पायेगे जनसाधारण की तो बात ही क्या है। इसका सीधा अर्थ है कि गीता की रचना न तो श्रीकृष्ण ने की, न महर्षि व्यास ने बल्कि किसी अन्य ने इसे रचकर बाद में महाभारत घुसेड़ दिया है।
(आ) महाभारत के भीष्म पर्व मे गीता के कुल ष्लोक संख्या संबंधी निम्न ष्लोक प्राप्त होता है। :-
षट्षतानि सविंषानि ष्लोकानि प्राह केषवः
अजर्ुूनः सप्त पंचाषत सप्तषष्टिस्तु संजयः
धृतराष्टःष्लोकमेकं गीतायाः मानमुच्यते।
जिसके अनुसार 620ष्लोक कृष्ण ने कहे 57 अर्जृन ने कहे 67 संजय ने कहे और 1 धृतराष्ट ने कहा इस प्रकार गीता के ष्लोक की संख्या 745 बैठती है। जबकि वर्तमान मे प्राप्त गीता मे 700ष्लोक ही पाये जाते हैं जिनका विभाजन इस प्रकार है। कृष्ण ने 574 अर्जुन ने 86 संजय ने 39 और धृतराष्ट ने 1 ही कहा है।
इससे स्पष्ट है कि आजकल प्रचलित गीता महर्षि व्यास कृत नही है न महाभारत का अंग है क्योंकि इसमें पात्रो के बोलने के मात्रा मे भी परिवर्तन दिखाई देता है। यवगीता वास्तव मे इतना महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ होता तो इसकी मौलिकता सुरक्षित रखने के लिए अर्थात घटा बढी रोकने के लिए कढ़े कदम उठाये जाते। जैसे की वेदो की सुरक्षा के लिए स्वर ,पद , क्रम, घन, जटा, माला, आदि अनेक प्रकार के पाठ चलाये गये थे ।
(इ) जिस प्रकार गीता के प्रथम अध्याय में अर्जुन व्यामोह का वर्णन है उसी प्रकार महाभारत में अर्जुन से बहुत पहले युधिष्ठिर व्यामोह का वर्णन है जिसमे अर्जुन ने युधिष्ठिर को अनेक प्रकार से समझाया, तब कहीं वह षांत हुए। यदि गीता के रचयिता महर्षि व्यास ही होते या गीता महाभारत का ही अंग होती तो वह अर्जुन को समझाते समय कृष्ण द्वारा यह बात अवष्य कहलाते कि ” भले मानुष ! अभी तो तू अपने भाई को समझा रहा था अब स्वयं बहक गया। पर गीता मे इसका कोई संकेत नही है। इससे भी संकेत मिलता है कि गीता महाभारत का अंग नही है। न दोनों काले एक है।

(ई) अर्जुन ने युद्ध न करने के जो कारण बताए उनमे से एक यह भी है कि :7
हे मधुसूदन! मैं युद्ध मे भीष्म और द्रोण को बाणो से कैसे मारूंगा ये दोनो तो मेरे पूज्य हैं।
यदि गीता महाभारतकार महर्षि व्यास की ही रतचा होती तो वह पहले के उस युद्ध को न भूल जाते जहां विराट की गायें छिनने के प्रसंग मे अर्जुन ने इन्हीं पूज्योुं को मार मारकर बेहाल कर दिया था परन्तु गीता मे अर्जुन को समझाने के लिए ऐसा कोई संकेत इधर नही किया गया है। वस्तुतः अर्जुन को तों स्वयं ही यह बात करनी नही चाहिए था कि क्या उस दिन ये लोग पूज्य नही थे। पर दोनो ही इतनी बड़ी घटना भूले रहे जो सिद्ध करता है कि गीता महाभारत का अंष नही अन्यथा इसे पूर्व मे हुए युद्ध का ध्यान अवष्य रहा होता।

(उ) गीता के 11 वे अध्याय मे इस बात का वर्णन आता है कि जब श्रीकृष्ण ही बात नही मानी तो उन्होने अपना विराट रूप् दिखाया और बाद में श्रीकृष्ण ने अहसान जतातु हुए कहा कि ” हे अर्जुन! मैने प्रसन्न होकर आत्मयोग से यह रूप तुझे दिखाया है। मेरा यह आदि अन्त सीमा से रहित तेजोन्मय रूप तेरे अतिरिक्त पहले किसी ने नहीं देखा है।
अब विचारनीय बात यह है कि यहि गीता और महाभारत एक ही व्यक्ति की रचनाये होती तो वह उस प्रसंग को कैसे भूल जाता जब श्रीकृष्ण द्वारा विराट रूप् दिखाकर दुर्योधन को अभिभूत किया थौ इसका सीधा अर्थ यह है कि गीता महाभारत का अंग नही है। यदि गीता श्रीकृष्ण का उपरोक्त कथन कैसे संगत हो सकता है।
(ऊ) महाभारत मे छोटी बड़ी दर्जनों गीताय भरी पड़ी है।जिन्हे किसी न किसी बहाने घुसेड़ा गया है हम यहां केवल अनुगीता कीी बात करेंगे जो इस बात का प्रइल प्रमाण है कि महाभारत मे इस प्रकार की गीताओं को घुसेरने के लिए किस प्रकार से बयानवाजी से काम किया गया है। और ये गीताये महाभारत का अंग नही है।
महाभारत के अष्वमेघ पर्व मे (अ. 16ष्लोक 57 ) मे श्रीकृष्ण जब द्वारका चलने लगे तो उनसे अर्जुन ने कहा ”हे देवतीनन्दन महाबाहु ! महाभारत युद्ध के समय मुझे आपके महात्मय और ईष्वरीय रूप का ज्ञान हुआ था। आपने मित्रतावष जो भी ज्ञान मुझे उस समय दिया वह मै भूल गया उसको दोबारा सुनना चाहता हूं आपषीर्घ ही द्वारका जाने वाले हैं एक बार गीता का वह उपदेष फिर से सुनाते जाइये।

यह सुनकर पहले तो श्रीकृष्ण अर्जुन पर बहुत बिगड़े फिर असमर्थता जताते हुए बोले तो उसे तो मै भी भूल गया, वह ज्ञान तो तुम्हे योगयुक्त होकर तुम्हे सुनाया था। अब उसे फिर से दोहराना संभव नही लो तुम्हारा काम चलाने के लिए दूसरा इतिहास बताता हूं।
इसके बाद जो उपदेष हुआ उसका नाम अनुगीता है। वक्ता और श्रोता दोनो एक नम्बर के भुलक्कड़ निकले।
इस प्रकरण से स्पष्ट प्रतीत होता है कि अनुगीता के महाभारत मे मिलाने के लिए अर्जुन और श्रीकृष्ण के भुलक्कड़पन का बहाना करने वाला विद्वान यह भूल ही गया कि जब अर्जुन और श्रीकृष्ण दोनो ही गीता को भूल गये थे तो बाद में इसका प्रचार कैसे हुआ क्योकि अर्जुन और श्रीकृष्ण की बात के समय कोई भी उपस्थित नही था, संजय की दिव्य दृष्टी भी वहां सहायता नही कर सकती थी। क्योकि दृष्टि से सुनने का काम नही लिया जा सकता । महाभारत के अनुसार दिव्यदृष्टि वाली बात गलत है क्योंकि उसमे संजय द्वारा धृतराष्ट को प्रत्यक्ष देखी बात का उल्लेख है।(देखिए भीष्म पर्व अ. 13ष्लोक 1-2) इससे सिद्ध होता है कि महाभारत का गीता से कोई संबंध है।
एक ओर भी बात विचारणीय है – और वह यह की महाभारत और गीता की पुष्पिकाओं मे भी अन्तर है। यदि गीता महाभारत की ही भाग होती तो इसकी पुष्पिकाये भी महाभारत की भांति होनी चाहिए। परन्तु ऐसा नही है महाभारत के अध्यायों के अन्त मे जो पुष्पिकाये दी गई हैं वे गीता के अध्यायों के अन्तवाली पुष्पिकाओ से भिन्न है। महाभारत में नाम केवल पर्वों के है – अध्यायों के नही जबकि गीता के प्रत्येक अध्याय का नाम अलग अलग दिया गया है। गीता के पुष्पिकाओं मे उसे स्पष्ट रूप् से उपनिषद या ब्रम्हाविद्या स्वीकार किया गया हैं इस प्रकार भी गीता महाभारत का अंग नही ठहरती एक नमूना देखिए :-
ठति श्रीमद्भगवदगीतासूपनिषत्सु ब्रम्हाविद्या योगषास्त्रं कृष्णार्जुन संवादे कर्मसंन्यासयोगानम् पंचमोध्यायः
अन्त में एक प्रमुख बात विचारणीय यह है कि कोई भी लेखक या कवि पुस्तक की समाप्ति पर ही प्रायः उसका महात्म्य लिखता है कि कोई भी पढ़ने या सुनने मा़त्र से अमुख अमुख लाभ है ऐसा नही है कि किसी एक भाग या प्रसंग की समाप्ति पर उसका महात्म्य अलग से लिखता फिरे । गीता के अन्त में उसका महात्म्य लिखा हुआ है जो उसको एक स्वतंत्र पुस्तक या रचना सिद्ध करता है और यह भी सिद्ध करता है कि यह महाभारत के लेखक महर्षि व्यास की रचना नही क्योंकि कोई भी लेखक या कवि यह नही भूल जाता कि यह मेरी दूसरी पुस्तक है या इसी का भाग है। गीता के 18 अध्यायों के बाद इसका महात्म्य इस प्रकार बताया गया हैः-
गीता सुगीता कर्त्तव्या किमन्यैःषास्त्र संग्रहैः
या स्वयं पद्मनामस्य मुखपदमाद विनिसृतः
सर्वषास्त्रमयीगीता सर्वषास्त्रमयी हरिः
सर्वतीर्थमयी गंगा च गायत्राी गोविन्दोती हृदिस्थिते।।
चतुर्मकार संयुक्ते पुनर्जन्म न विद्यते ।
महाभारत सर्वस्यं गीताया मथितस्य च।
सारमुदधृत्य कृष्णेन अर्जुनस्य मुखे हुतम्।।
इस प्रकार प्रमाण तर्क और ऐतिहासिक विवेचन के पष्चात यह अधिक विष्वास से कहा जा सकता है कि गीता का न तो कृष्ण से कोई संबंध है न महर्षि व्यास से न महाभारत से । इस रचना को बहुत बाद में महाभारत के चोखटे मे फिर कर दिया है
लेखकः श्री बी.के. श्रीवास्तव
सम्भागीय लेखाधिकारी (से.नि.)
रायपुर भारत