Category Archives: महर्षि दयानंद सरस्वती

महर्षि दयानन्दाष्टकम्

टिप्पणी- महामहोपाध्याय श्री पं. आर्यमुनि जी ने यह अष्टक महर्षि का गुणगान करते हुए अपने ग्रन्थ आर्य-मन्तव्य प्रकाश में दिया था। कभी यह रचना अत्यन्त लोकप्रिय थी। ११वीं व १२वीं पंक्ति ऋषि के चित्रों के नीचे छपा करती थी। पूज्य आर्यमुनि जी ने ऋषि जीवन का पहला भाग पद्य में प्रकाशित करवा दिया था, इसे पूरा न कर सके। यह ऐतिहासिक रचना परोपकारी द्वारा आर्य मात्र को भेंट है। – राजेन्द्र ‘जिज्ञासु’

वेदाभ्यासपरायणो मुनिवरो वेदैकमार्गे रत:।

नाम्ना यस्य दया विभाति निखिला तत्रैव यो मोदते।

येनाम्नायपयोनिधेर्मथनत: सत्यं परं दर्शितम्।

लब्धं तत्पद-पद्म-युग्ममनघं पुण्यैरनन्तैर्मया।।

भाषाछन्द-सवैया

१.            उत्तम पुरुष भये जग जो, वह धर्म के हेतु धरें जग देहा।

धन धाम सभी कुर्बान करें, प्रमदा सुत मीतरु कांचन गेहा।

सनमारग से पग नाहिं टरे, उनकी गति है भव भीतर एहा।

एक रहे दृढ़ता जग में सब, साज समाज यह होवत खेहा।।

२.            इनके अवतार भये सगरे, जगदीश नहीं जन्मा जग माहीं।

सुखराशि अनाशी सदाशिव जो, वह मानव रूप धरे कभी नाहीं।

मायिक होय यही जन्मे, यह अज्ञ अलीक कहें भव माहीं।

मत एक यही सब वेदन का, वह भाषा रहे निज बैनन माहीं।।

३.            धन्य भई उनकी जननी, जिन भारत आरत के दु:ख टारे।

रविज्ञान प्रकाश किया जग में, तब अंध निशा के मिटे सब तारे।

दिन रात जगाय रहे हमको, दु:खनाशकरूप पिता जो हमारे।

शोक यही हमको अब है, जब नींद खुली तब आप पधारे।।

४.            वैदिक भाष्य किया जिनने, जिनने सब भेदिक भेद मिटाए।

वेदध्वजा कर में करके, जिनने सब वैर विरोध नसाए।

वैदिक-धर्म प्रसिद्ध किया, मतवाद जिते सब दूर हटाए।

डूबत हिन्द जहाज रहा अब, जासु कृपा कर पार कराए।।

५.            जाप दिया जगदीश जिन्हें इक, और सभी जप धूर मिलाए।

धूरत धर्म धरातल पै जिनने, सब ज्ञान की आग जलाए।

ज्ञान प्रदीप प्रकाश किया उन, गप्प महातम मार उड़ाए।

डूबत हिन्द जहाज रहा अब, जासु कृपा कर पार कराए।।

६.            सो शुभ स्वामी दयानन्द जी, जिनने यह आर्यधर्म प्रचारा।

भारत खण्ड के भेदन का जिन, पाठ किया सब तत्त्व विचारा।

वैदिक पंथ पै पाँव धरा उन, तीक्ष्ण धर्म असी की जो धारा।

ऐसे ऋषिवर की सज्जनो, कर जोड़ दोऊ अब वंद हमारा।।

७.            व्रत वेद धरा प्रथमे जिसने, पुन भारत धर्म का कीन सुधारा।

धन धाम तजे जिसने सगरे, और तजे जिसने जग में सुतदारा।

दु:ख आप सहे सिर पै उसने, पर भारत आरत का दु:ख टारा।

ऐसे ऋषिवर को सज्जनो, कर जोड़ दोऊ अब वंद हमारा।।

८.            वेद उद्धार किया जिनने, और गप्प महातम मार बिदारा।

आप मरे न टरे सत पन्थ से, दीनन का जिन दु:ख निवारा।

उन आन उद्धार किया हमरा, जो गिरें अब भी तो नहीं कोई चारा।

ऐसे ऋषिवर को सज्जनो, कर जोड़ दोऊ अब वंद हमारा।।

‘सम्पूर्ण जीवन चरित्र-महर्षि दयानन्द’ को क्यों पढ़ें?:- प्रा राजेंद्र जिज्ञासु

‘सम्पूर्ण जीवन चरित्र-महर्षि दयानन्द’ को क्यों पढ़ें?:- गत वर्ष ही इस विनीत ने श्रीयुत् धर्मेन्द्र जी जिज्ञासु तथा  श्री अनिल आर्य को बहुत अधिकार से यह कहा था कि आप दोनों इस ग्रन्थ के गुण-दोषों की एक लम्बी सूची बनाकर कुछ लिखें। मुद्रण दोष के कारण कहीं-कहीं भयङ्कर चूक हुई है। जो इस ग्रन्थ में मौलिक तथा नई खोजपूर्ण सामग्री है, उसको मुखरित किया जाना आवश्यक है। विरोधियों, विधर्मियों ने ऋषि की निन्दा करते-करते जो महाराज के पावन चरित्र व गुणों का बखान किया है, वह Highlight मुखरित किया जाये। लगता है, आर्य जगत् या तो उसका मूल्याङ्कन नहीं कर सका या फिर प्रमादवश उसे उजागर नहीं करता। वे तो जब करेंगे सो करेंगे, आज से परोपकारी में इसे आरम्भ किया जाता है। पाठक नोट करते जायें।

१. महर्षि की मृत्यु किसी रोग से नहीं हुई। उन्हें हलाक ((Killed)) किया गया। नये-नये प्रमाण इस ग्रन्थ में पढिय़े। अंग्रेज सरकार के चाटुकार मिर्जा गुलाम अहमद ने अपने ग्रन्थ हकीकत-उल-वही में बड़े गर्व से महर्षि के हलाक किये जाने का श्रेय (Credit) लिया है। यह प्रमाण पहली बार ही ऋषि जीवन में दिया गया है।

२. काशी शास्त्रार्थ से भी पहले उसी विषय पर मेरठ जनपद के पं. श्रीगोपाल शास्त्री ने ऋषि से टक्कर लेने के लिये कमर कसी। घोर विरोध किया। विष वमन किया। अपनी मृत्यु से पूर्व उसने अपने ग्रन्थ ‘वेदार्थ प्रकाश’ में ऋषि के पावन चरित्र की प्रशंसा तो की ही है। ऋषि को गालियाँ देने वाले, ऋषि के रक्त के प्यासे इस विरोधी ने एक लम्बी $फारसी कविता में ऐसे लिखा है:-

हर यके रा कर्द दर तकरीर बन्द

हर कि खुद रा पेश ऊ पण्डित शमुर्द

दर मुकाबिल ऊ कसे बाज़ी न बुर्द

उस महाप्रतापी वेदज्ञ संन्यासी ने हर एक की बोलती बन्द कर दी। जिस किसी ने उसके सामने अपनी विद्वत्ता की डींग मारी, उसके सामने शास्त्रार्थ में कोई टिक न सका। सभी उससे शास्त्रार्थ समर में पिट गये।

३. ऋषि की निन्दा में सबसे पहली गन्दी पोथी जीयालाल जैनी ने लिखी। इस पोथी का नाम था ‘दयानन्द छल कपट दर्पण’ यह भी नोट कर लें कि यह कथन सत्य नहीं कि इस पुस्तक के दूसरे संस्करण में इसका नाम ‘दयानन्द चरित्र दर्पण’ था। हमने इसी नाम (छल कपट दर्पण) से छपे दूसरे संस्करण के पृष्ठ की प्रतिछाया अपने ग्रन्थ मेें दी है। इस ग्रन्थ में जीयालाल ने ऋषि को महाप्रतापी, प्रकाण्ड पण्डित, दार्शनिक, तार्किक माना है। विधर्मियों से अंग्रेजी पठित लोगों की रक्षा करने वाला माना है। कर्नल आल्काट के महर्षि दयानन्द विषयक एक झूठ की पोल खोलकर ऋषि का समर्थन किया। कर्नल ने ३० अप्रैल १८७९ को ऋषिजी की सहारनपुर में थियोसो$िफकल सोसाइटी की बैठक में उपस्थिति लिखी है। जीयालाल ने इसे गप्प सिद्ध करते हुए लिखा है कि ऋषि ३० अप्रैल को देहरादून में थे। वे तो सहारनपुर में एक मई को पधारे थे। यह प्रमाण इसी ऋषि जीवन में मिलेगा।

४. ज्ञानी दित्त सिंह की पुस्तिका सिखों ने बार-बार छपवाकर दुष्प्रचार किया कि दित्त सिंह ने शास्त्रार्थ में ऋषि को पराजित किया। हमने दित्त सिंह की पुस्तक की प्रतिछाया देकर सिद्ध कर दिया कि वह स्वयं को वेदान्ती बताता है, वह सिख था ही नहीं। वह स्वयं लिखता है कि तेजस्वी दयानन्द के सामने कोई बोलने का साहस ही नहीं करता था। यह प्रमाण केवल इसी जीवन चरित्र में मिलेंगे। (शेष फिर)

अन्य मतों पर महर्षि दयानन्द का प्रभाव

अन्य मतों पर

महर्षि दयानन्द का प्रभाव

– वैद्य रामगोपाल शास्त्री

सनातन धर्म स्त्रियों और शूद्रों को वेद पढ़ाने के विरुद्ध था। स्वामी दयानन्द ऐसे प्रथम सुधारक हुए हैं, जिन्होंने वेद के प्रमाण और युक्तियों से इस विचार की कड़ी समालोचना की। इस समालोचना का यह प्रभाव हुआ है कि सैंकड़ों स्त्रियाँ तथा शूद्र संस्कृत की शास्त्री, आचार्य, तीर्थ तथा एम.ए. परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो चुके हैं। इन में प्रायः सब को वेद का कुछ अंश अवश्य पढ़ाया जाता है और बिना किसी विरोध के सनातन धर्म के बड़े-बड़े विद्वान् विद्यालयों में इन्हें पढ़ा रहे हैं। सन्त विनोबा भावे ने एक बार अपनी मध्यप्रदेश की यात्रा में यह घोषणा की थी कि मैं ऐसे अछूतों को तैयार कर रहा हूँ जो कि वेद के विद्वान् बनें। उसके लिए बिना किसी संकोच के सब हिन्दू उस विचार की पूर्ति के लिए उन्हें द्रव्य का सहयोग देने को तैयार हो गए थे।

मैंने वे दिन भी देखे हैं कि जब आर्यसमाज ने कन्या-पाठशालाएँ आरमभ की तो लोगों ने स्त्री-शिक्षा के विरुद्ध व्याखयान दिए और पाठशालाओं के आगे धरना दिया। इस समय परिवर्तन यह हुआ कि स्वयं सनातन धर्म सभाओं ने कन्या-पाठशालाएँ खोली हुई हैं। आर्य-पाठशालाओं में सब लड़कियों को सन्ध्या-मन्त्र सिखाये जाते हैं और अधिकतर लड़कियाँ सनातन धर्मावलबियों की हैं, जो सहर्ष इन मन्त्रों को पुत्रियों से घर में सुनते हैं। यह बड़ा भारी परिवर्तन है।

नमस्ते-आरमभ में स्वामी दयानन्द ने सबको परस्पर नमस्ते करने का विचार दिया तो इसका व्याखयानों और लेखों द्वारा भारी विरोध किया गया। मैंने वे दिन देखे हैं, जब आर्यसमाज और सनातन धर्म में नमस्ते पर शास्त्रार्थ होता था। वर्तमान समय में नमस्ते का प्रचार इतना हुआ कि रूस के तत्कालीन प्रधानमन्त्री क्रुश्चे जब भ्रमण में दिल्ली के रामलीला मैदान में लाखों नर-नारियों के सामने भाषण देने  हुए तो उन्होंने सबसे पहले हाथ जोड़ कर नमस्ते की। सिनेमा की फिल्मों में भी सब पात्र आदर दिखाने के लिये नमस्ते का प्रयोग करते हैं। प्रत्येक हिन्दू ने नमस्ते अपना लिया है।

वर्ण व्यवस्था-आचार्य दयानन्द ने ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णों को जन्म से न मानकर गुण कर्म-स्वभाव से माना है। इसका बड़ा विरोध किया गया। वर्तमान काल में सनातन धर्म का शिक्षित वर्ग भी जाति-पाँति का भेद हटाकर लड़के-लड़कियों के विवाह कर रहा है। ऐसे अनेक उदाहरण हम प्रतिदिन देखते हैं, जब ब्राह्मण लड़कियों का अब्राह्मण लड़कों से विवाह हो रहा है। अखबारों में जहाँ विवाह के विज्ञापन छपते हैं, प्रायः यह लिखा होता है कि विवाह में जाति-बन्धन नहीं। दिल्ली में इतिहास के विशेषज्ञ डॉ. ताराचन्द एम.पी. ने पटेल-स्मृति व्यायानमाला के प्रथम व्यायान में कहा था कि प्राचीन आर्यों में जन्म से जाति नहीं मानी जाती थी, प्रत्युत गुण-कर्म से मानी जाती थी। यह आचार्य दयानन्द की समीक्षा का ही प्रभाव है।

ज्वर कैसे होता है?-पहले प्रत्येक वैद्य यह मानता था कि रुद्र (महादेव) के क्रोध से ज्वर पैदा हुआ (रुद्र कोपाग्निसभूतः), परन्तु वर्तमान युग में इस बात को उपहासजनक अनुभव करते हुए अब यह अर्थ करते हैं कि वेद और ब्राह्मण-ग्रन्थों में रुद्र नाम अग्नि का आता है। रुद्र-कोप का यहाँ अर्थ यह है कि अग्नि अर्थात् पेट की जठराग्नि के कोप अर्थात् विकार से ज्वर उत्पन्न होता है।

सूर्यदेव-कोणार्क (उड़ीसा) में सूर्यदेव का एक बहुत ही विशाल और सुन्दर मन्दिर है। उसमें सूर्यदेव की एक मूर्ति पत्थर के रथ पर बनी हुई है। रथ के सात घोड़े और 12 पहिए हैं। उस समय में यह कहा गया है कि इस रथ के सात घोड़े सूर्य-किरणों के सात रंग और 12 पहिए वर्ष के 12 मास को प्रकट करते हैं।

यह आचार्य दयानन्द के प्रभाव का परिणाम है कि इस प्रकार की अनेक गाथाओं को, जो पहले सनातनधर्मी विद्वान् ऐतिहासिक मानते थे, अब आलंकारिक मानकर अर्थ करते हैं।

ईसाई धर्म-ईसाई धर्म की समीक्षा दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के 13 वें समुल्लास में की है। उस समीक्षा का प्रभाव ईसाई धर्म पर पर्याप्त हुआ है। सन् 1919 में भारत में पादरियों की एक कमीशन बैठी। उसने 1500 पादरियों को चार प्रश्न भेजकर उसके उत्तर माँगे-(1) क्या ईसामसीह कुमारी मरियम के गर्भ से बिना पिता के उत्पन्न हुआ था? इसके उत्तर में 95 प्रतिशत पादरियों ने उत्तर भेजा कि वह कुमारी मरियम से उत्पन्न नहीं हुआ, प्रत्युत किसी पिता से उत्पन्न हुआ था। (2) क्या ईसामरने के बाद कब्र से उठा? इसका उत्तर 75 प्रतिशत पादरियों ने दिया कि नहीं उठा। (3) स्वर्ग और नर्क हैं तो कहाँ हैं? इसका उत्तर 83 प्रतिशत पादरियों ने दिया कि स्वर्ग और नर्क कोई स्थान विशेष नहीं हैं। (4) क्या मृत्यु के पीछे जीवात्मा रहता है? 96 प्रतिशत पादरियों ने उत्तर दिया कि जीवात्मा अमर है और रहता है।

डॉ. जे.डी.संडरलैंड ने एक पुस्तक लिखी है origin and character of bible (दि ऑरिजिन एण्ड कैरेक्टर ऑफ दि बाईबल)। उसमें उसने स्वामी दयानन्द से भी बढ़कर बाइबिल की समालोचना की है। इसी पुस्तक के पृष्ठ 132-33 पर लिखा है कि सब विद्वानों का बिना संशय का यह निर्णय है कि बाइबिल की रचना मनुष्य-कृत होने के कारण इसमें भूलें भी हैं। पादरी संडरलैंड ने इन भूलों के बहुत से प्रमाण दिए हैं। हम केवल उनमें से तीन दृष्टान्त देते हैं। (1) नई व्यवस्था के 11 पर्व में भक्ष्याभक्ष्य पशुओं की गिनती की हुई है। उसमें शश (खरगोश) को जुगाली करने वाला पशु लिखा है जो कि सर्वथा ठीक नहीं है। (2) बाइबिल का सृष्टि-उत्पत्ति और जल-प्रलय का वर्णन विज्ञान के विरुद्ध है। (3) यहोशु के कहने पर सूर्य खड़ा हो गया और अपनी गति छोड़ दी। यह बात भी विज्ञान और बुद्धि के विरुद्ध है।

इस्लाम-सत्यार्थप्रकाश के 14 वें समुल्लास में स्वामी दयानन्द ने इस्लाम धर्म की समालोचना की है। स्वामी जी के पीछे अमर शहीद पं. लेखराम जी और स्वामी दर्शनानन्द जी आदि आर्य-विद्वानों ने भी इस्लाम धर्म की पर्याप्त समालोचना की। स्वामी जी महाराज की समीक्षा के पीछे सर सय्यद अहमद खा ने उर्दू भाषा में कुरान शरीफ का भाष्य किया। अहमदी समप्रदाय की लाहौरी शाखा के प्रधान मौलवी मुहमद अली एम.ए. ने कुरान का अंग्रेजी और उर्दू में अनुवाद किया। इन अनुवादों में जो-जो कटाक्ष आर्य-विद्वानों के होते थे, उनसे बचने के लिए उन्होंने पुराने सब भाष्यों को छोड़कर बहिश्त (स्वर्ग) दोजख (नर्क), फरिश्ते, जिन, शैतान आदि की व्याखया बुद्धिपूर्वक की और मुसलमानों के पहले विचारों को बदलने का यत्न किया। इन दोनों अनुवादों से मुस्लिम जनता ने सर सय्यद अहमद को नेचरिया और दहरिया (नास्तिक) की उपाधि दी और अहमदियों को नास्तिक और इस्लाम का शत्रु माना।

इन दोनों मुसलमान अनुवादकों ने नर्क और स्वर्ग को स्थान-विशेष न मानकर मनुष्य की दो प्रकार की अवस्थाएँ माना है। (this shows clearly that paradise & hell are more like two conditions than two places )(मुहमद अली के अंग्रेजी अनुवाद की भूमिका पृष्ठ 63)।

मुहमद अली ने फरिश्ते और शैतान की पृथक् सत्ता न मानकर मनुष्य की अच्छी और बुरी भावनाओं को माना है। उन्होंने बुराई के प्रेरक शैतान को सारथि और भलाई के प्रेरक फरिश्ते को साक्षी कहा है। (देखो भूमिका पृष्ठ 78) नया मुहमद नूरुद्दीन कारी काशमीरी अपनी इस्लामी अकायद पृष्ठ 74 पर लिखते हैं- ‘‘मरते वक्त अजाब या सवाब के फरिश्ते आते हैं, वे दरहकीकत मरने वाले के बद व नेक अमाल होते हैं।’’ मुसलमानों का मत है कि कयामत के दिन मनुष्य को उसके कर्मों की पुस्तक दी जावेगी। मौलवी मुहमद अली भूमिका के पृष्ठ 61 में इस पुस्तक को न मानकर लिखते हैं कि ये कर्म मनुष्य के भीतर हैं और उस दिन कर्मों के प्रभाव से फल दिया जायेगा।

इस प्रकार स्वामी दयानन्द जी के प्रचार से सब धर्म वालों ने अपने सिद्धान्तों और अर्थों को अपने धर्म की बुद्धि और विज्ञान के आधार पर सिद्ध करने का यत्न किया है। यह आचार्य दयानन्द की समीक्षा का ही परिणाम है।

 

काशी शास्त्रार्थ में वेदः- राजेन्द्र जिज्ञासु

काशी शास्त्रार्थ में वेदः-

‘परोपकारी’ के एक पिछले अंक में महर्षि दयानन्द जी द्वारा जर्मनी से वेद संहितायें मँगवाने विषयक आचार्य सोमदेव जी को व इस लेखक को प्राप्त प्रश्नों का उत्तर दिया गया था। कहीं इसी प्रश्न की चर्चा फिर छिड़ी तो उन्हें बताया गया कि सन् 1869 के काशी शास्त्रार्थ में ऋषि जी ने महाराजा से माँग की थी कि शास्त्रार्थ में चारों वेद आदि शास्त्र भी लाये जायें ताकि प्रमाणों का निर्णय हो जाये। इससे प्रमाणित होता है कि वेद संहितायें उस समय भारत में उपलध थीं। पाण्डुलिपियाँ भी पुराने ब्राह्मण घरों में मिलती थीं।
परोपकारी में ही हम बता चुके हैं कि आर्यसमाज स्थापना से बहुत पहले पश्चिमी देशों में पत्र-पत्रिकाओं में छपता रहा कि यह संन्यासी दयानन्द ललकार रहा है, कि लाओ वेद से प्रतिमा पूजन का प्रमाण, परन्तु कोई भी वेद से मूर्तिपूजा का प्रमाण नहीं दे सका। ऋषि यात्राओं में वेद रखते ही थे। हरिद्वार के कुभ मेले में ऋषि यात्राओं में वेद रखते ही थे।

हरिद्वार के कुभ मेले में ऋषि विरोधी पण्डित भी कहीं से वेद ले आये। लाहौर में श्रद्धाराम चारों वेद ले आये। वेद कथा भी उसने की। ऐसे अनेक प्रमाणों से सिद्ध है कि जर्मनी से वेद मँगवाने की बात गढ़न्त है या किसी भावुक हृदय की कल्पना मात्र है। देशभर में ऐसे वेद पाठियों की संया तब सहस्रों तक थी जिन्हें एक-एक दो-दो और कुछ को चारों वेद कण्ठाग्र थे। सेठ प्रताप भाई के आग्रह पर कोई 63-64 वर्ष पूर्व एक बड़े यज्ञ में एक ऐसा वेदापाठी भी आया था, जिसे चारों वेद कण्ठाग्र थे। तब पूज्य स्वामी स्वतन्त्रानन्दजी महाराज भी उस यज्ञ में पधारे थे। आशा है कि पाठक इन तथ्यों का लाभ उठाकर कल्पित कहानियों का निराकरण करेंगे।

ऋषि-जीवन विचारःराजेन्द्र जिज्ञासु

ऋषि-जीवन विचारः-

परोपकारी में पहले भी स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी महाराज का यह उपदेश सन्देश दिया था कि ऋषि का जीवन चरित्र एक यति, योगी, योगेश्वर, बाल ब्रह्मचारी ऋषि और महर्षि का जीवन है। आर्यो! इसका पाठ किया करो। इसे पुस्तक समझ कर मत पढ़ा करो।
२६ अक्टूबर १८८३ को कर्नल प्रतापसिंह ने आबू पहुँच कर भक्तों से ऋषि का पता पूछा। इस पर यह कहानी गढ़ ली गई कि उसने ऋषि से पूछा यदि उन्हें डॉ. अली मर्दान पर विष देने का सन्देह है तो वह कहें, ताकि उस पर अभियोग चलाया जावे। आश्चर्य यह है कि मूल स्रोत का प्रमाण सामने लाने पर भी इस हदीस की जब यह पोल खुल गई, तब भी एक आध बन्धु ने ऋषि जीवन का पाठ करने तथा उस पर विचार करने का व्रत लेकर अपनी सोच न बदली। किसी के मन में यह न आया कि विष दिये जाने पर राज परिवार का कोई व्यक्ति (प्रतापसिंह भी) जोधपुर में ऋषि के पास नहीं आया। पं. भगवद्दत्त जी, आचार्य विरजानन्द जी इन दोनों माननीय विद्वानों का मत है कि ऋषि तब इतने निर्बल थे कि बोल ही नहीं सकते थे। मूल स्रोत परोपकारिणी सभा को सौंप दिया गया है। वहाँ प्रतापसिंह के आबू पहुँचने का तो उल्लेख है, परन्तु ऋषि जी से भेंट करने का संकेत तक नहीं। एक गप्पी ने नई गप्प गढ़ ली है कि जसवन्तसिंह भागा-भागा ऋषि जी का पता करने पहुँचा। न जाने यह नई हदीस कब गढ़ ली गई? हमें तो अभी इन्हीं दिनों पता चला है। ऋषि के कृत्रिम पत्र गढ़ लिये गये, परन्तु शोध-शोध का शोर मचाने वालों ने इस पर भी चुप्पी साध ली। नई पीढ़ी के युवक जिन्हें ऋषि मिशन प्यारा है, वे जागरूक होकर ऋषि-जीवन की रक्षा करें।

महर्षि दयानन्द के विषपान पर प्रश्नः- राजेन्द्र जिज्ञासु

महर्षि दयानन्द के विषपान पर प्रश्नः- लखनऊ से ही आशीष प्रतापसिंह जी ने चलभाष पर बताया कि एक पौराणिक ने आक्षेप किया है कि ऋषि की मृत्यु विष दिये जाने से नहीं हुई। पं. लेखराम जी ने भी नहीं लिखा कि ऋषि का निधन विषपान से हुआ। उन्हें कहा गया कि उस पौराणिक का यह कथन मिथ्या है कि पं. लेखराम जी ने महर्षि को विष दिया जाना नहीं लिखा। पौराणिकों ने भारतीय इतिहास व महापुरुषों के जीवन पर न तो कभी कोई प्रश्न उठाया है और न ही विधर्मियों के वार का कभी उत्तर दिया है। ऋषि दयानन्द पर वार प्रहार करना इनकी दृष्टि में सनातन धर्म का प्रचार व सेवा है। परोपकारी में उत्तर पढ़ लेना और चुप करवा देना।
पं. लेखराम लिखित ऋषि जीवन में अजमेर के पीर जी का कथन पढ़िये। ऋषि को संखिया दिया गया। स्पष्ट लिखा है। पण्डित जी के साहित्य में (कुल्लियाते आर्य मुसाफिर) स्पष्ट लिखा है कि ऋषि को विष दिया गया। सम्पूर्ण जीवन-चरित्र में तत्कालीन कई इतिहासकारों के प्रमाण देकर यह सिद्ध किया गया है कि ऋषि जी को विष दिया गया। राव राजा तेजसिंह का स्वामी श्रद्धानन्द जी के नाम लिखा पत्र परोपकारिणी सभा के पास सुरक्षित है। कोई भी पढ़ ले। श्री गौरीशंकर ओझा का लेख, मुंशी देवीप्रसाद इतिहासकार, क्रान्तिकारी श्री कृष्णसिंह इतिहासकार के इतिहास को पढ़िये, समाधान हो जायेगा। मिर्ज़ा कादियानी ऋषि को हलाक करवाने (हत्या) का श्रेय () लेता है। ये सब प्रमाण सम्पूर्ण जीवन-चरित्र में दिये गये हैं। ऋषि पर देश भर में आक्रमण किये गये। पूना, काशी, मुम्बई, सूरत, मथुरा, कर्णवास, गुजरांवाला, अमृतसर, वज़ीराबाद, गुजरात, कानपुर….कहाँ पर जानलेवा प्रहार नहीं किये गये? कुटिया जलाई गई, गंगा में फेंका गया और एक बार टाँग भी तोड़ी गई। इतनी बार और इस युग में किस विचारक सुधारक पर वार-प्रहार किये गये। न जाने इन पौराणिकों ने महर्षि के देश, धर्म व जाति रक्षा के लिये तिल-तिल कर जलने व जीने पर कभी भाव भरित हृदय से कुछ लिखा नहीं-कुछ कहा नहीं। कोई गिनती तो करे कि ऋषि पर कहाँ-कहाँ आक्रमण किया गया? कहाँ-कहाँ विष देने के षड््यन्त्र रचे गये?

पं. श्रद्धाराम फिलौरी विषयक गभीर प्रश्न :प्रा राजेन्द्र जिज्ञासु

पं. श्रद्धाराम फिलौरी विषयक गभीर प्रश्न :-

परोपकारी के एक इतिहास प्रेमी ने लखनऊ से प्रश्न पूछा है कि पं. श्रद्धाराम फिलौरी का ऋषि के नाम पत्र पढ़कर हम गद्गद् हैं, परन्तु पं. श्रद्धाराम ने ऋषि के विरुद्ध कोई पुस्तक व ट्रैक्ट तक नहीं लिखा, आपका यह कथन पढ़कर हम दंग रह गये। इसकी पुष्टि में कोई ठोस प्रमाण हमें दीजिये। प्रश्न बहुत गाीर व महत्त्वपूर्ण है। ऋषि की निन्दा करने वालों को मेरे कथन का प्रतिवाद करना चाहिये था। तथापि मेरा निवेदन है कि श्रद्धाराम जी के साहित्य की सूची कोई-सी देखिये। इन सूचियों में श्री कन्हैयालाल जी अलखधारी व श्री नवीन चन्द्रराय के विरुद्ध एक भी पृष्ठ नहीं लिखा गया। किसी को ऐसी कोई सूची न मिले तो फिर हमारे पास आयें। जो इसका प्रमाण माँगेंगे ठोस प्रमाण दे देंगे। सूचियाँ दिखा देंगे। हम हदीसें गढ़ने वाले नहीं हैं। इतिहास प्रदूषण को पाप मानते हैं। जिस विषय का ज्ञान न हो उसमें टाँग नहीं अड़ाते।
– वेद सदन, अबोहर-152116