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स्वामी दयानन्द सरस्वती जी की मूर्ति सही या गलत : आचार्य सोमदेव जी

जिज्ञासा  समाधान – ११९

– आचार्य सोमदेव

जिज्ञासा:- आदरणीय सम्पादक महोदय सादर नमस्ते। निवेदन यह है कि मैंने आर्य समाज मन्दिर में महर्षि दयानन्द जी का एक स्टेचू (बुत) जो केवल मुँह और गर्दन का है जिसका रंग गहरा ब्राउन है, रखा देखा है। पूछने पर पता चला कि यह किसी ने उपहार में दिया है। आप कृपया स्पष्ट करें कि क्या महर्षि का स्टेचू भेंट में लेना, बनाना और भेंट देना आर्य समाज के सिद्धान्त के अनुरूप है? जहाँ तक मेरा मानना है महर्षि ने अपनी प्रतिमा बनाने की सख्त मनाही की थी। कृपया स्पष्ट करें।

धन्यवाद, सादर।

– डॉ. पाल

समाधान:- महर्षि दयानन्द ने अपने जीवन मेंं कभी सिद्धान्तों से समझौता नहीं किया। वे वेद की मान्यतानुसार अपने जीवन को चला रहे थे और सम्पूर्ण विश्व को भी वेद की मान्यता के प्रति लाना चाहते थे। वेद ईश्वर का ज्ञान होने से वह सदा निभ्र्रान्त ज्ञान रहता है, उसमें किसी भी प्रकार के पाखण्ड अन्धविश्वास का लेश भी नहीं है। वेद ही ईश्वर, धर्म, न्याय आदि के विशुद्ध रूप को दर्शाता है। वेद में परमेश्वर को सर्वव्यापक व निराकार कहा है। प्रतिमा पूजन का वेद में किसी भी प्रकार का संकेत नहीं है। महर्षि दयानन्द ने वेद को सर्वोपरि रखा है। महर्षि दयानन्द समाज की अवनति का एक बड़ा कारण निराकार ईश्वर की उपासना के स्थापना पर प्रतिमा पूजन को मानते हैं। जब से विशुद्ध ईश्वर को छोड़ प्रतिमा पूजन चला है तभी से मानव समाज कहीं न कहीं अन्धविश्वास और पाखण्ड में फँसता चला गया। जिस मनुष्य समुदाय में पाखण्ड अन्धविश्वास होता है वह समुदाय धर्म भीरु और विवेक शून्य होता चला जाता है। सृष्टि विरुद्ध मान्यताएँ चल पड़ती हैं, स्वार्थी लोग ऐसा होने पर भोली जनता का शोषण करना आरम्भ कर देते हैं।

महर्षि दयानन्द और अन्य मत सम्प्रदाय में एक बहुत बड़ा मौलिक भेद है। महर्षि व्यक्ति पूजा से बहुत दूर हैं और अन्य मत वालों का सम्प्रदाय टिका ही व्यक्ति पूजा पर है। महर्षि ईश्वर की प्रतिमा और मनुष्य आदि की प्रतिमा पूजन का विरोध करते हैं, किन्तु अन्य मत वाले इस काम से ही द्रव्य हरण करते हैं। इस व्यक्ति पूजा के कारण समाज में अनेक प्रकार के अनर्थ हो रहे हैं। इसी कारण बहुत से अयोग्य लोग गुरु बनकर अपनी पूजा करवा रहे हैं। जीते जी तो अपनी पूजा व अपने चित्र की भी पूजा करवाते ही हैं, मरने के बाद भी अपनी पूजा करवाने की बात करते हैं और भोली जनता ऐसा करती भी है। इससे अनेक प्रकार के अनर्थ प्रारम्भ हो जाते हैं। महर्षि दयानन्द ने जो अपना चित्र न लगाने की बात कही है, वह इसी अनर्थ को देखते हुए कही है। महर्षि विचारते थे कि इन प्रतिमा पूजकों से प्रभावित हो मेेरे चित्र की भी पूजा आरम्भ न कर दें। इसी आशंका के कारण महर्षि ने अपने चित्र लगाने का निषेध किया था।

यदि हम आर्य महर्षि के सिद्धान्तों के अनुसार चल रहे हैं, प्रतिमा पूजन आदि नहीं कर रहे हैं तो महर्षि के चित्र आदि लगाए जा सकते हैं रखे जा सकते हैं। चित्र वा मूर्ति रखना अपने आप में कोई दोष नहीं है। दोष तो उनकी पूजा आदि करने में हैं। महर्षि मूर्ति के विरोधी नहीं थे, महर्षि का विरोध तो उसकी पूजा करने से था। यदि महर्षि केवल चित्र वा मूर्ति के विरोधी होते तो अपने जीवन काल में इनको तुड़वा चुके होते, किन्तु महर्षि के जीवन से ऐसा कहीं भी प्रकट नहीं होता कि कहीं महर्षि दयानन्द ने मूर्तियों को तुड़वाया हो। अपितु यह अवश्य वर्णन मिलता है कि जिस समय महर्षि फर्रुखाबाद में थे, उस समय फर्रुखाबाद बाजार की नाप हो रही थी। सडक़ के बीच में एक छोटा-सा मन्दिर था, जिसमें लोग धूप दीप जलाया करते थे। बाबू मदनमोहन लाल वकील ने स्वामी जी से कहा कि मैजिस्ट्रेट आपके भक्त हैं, उनसे कहकर इस मठिया को सडक़ पर से हटवा दीजिये। स्वामी जी बोले ‘‘मेरा काम लोगों के मनो से मूर्तिपूजा को निकालना है, ईंट पत्थर के मन्दिरों को तोडऩा-तुड़वाना मेरा लक्ष्य नहीं है।’’ यहाँ महर्षि का स्पष्ट मत है कि वे मूर्ति पूजा के विरोधी थे, न कि मूर्ति के।

आर्य समाज का सिद्धान्त निराकार, सर्वव्यापक, न्यायकारी आदि गुणों से युक्त परमेश्वर को मानना व उसकी उपासना करना तथा ईश्वर वा किसी मनुष्य की प्रतिमा पूजन न करना है। इस आधार पर महर्षि का स्टेचू भेंट लेना देना आर्य समाज के सिद्धान्त के विपरीत नहीं, सिद्धान्त विरुद्ध तब होगा जब उस स्टेचू की पूजा आरम्भ हो जायेगी। आर्य समाज का सिद्धान्त चित्र की नहीं चरित्र की पूजा अर्थात् महापुरुषों के आदर्शों को देखना अपनाना है।

कि सी भी महापुरुष के चित्र वा स्टेचू को देखकर हम उनके गुणों, आदर्शों, उनकी योग्यता विशेष का विचार करते हैं तो स्टेचू का लेना-देना कोई सिद्धान्त विरुद्ध नहीं है। जब हम उपहार में पशुओं वा अन्य किन्हीं का स्टेचू भेंट कर सकते हैं तो महर्षि का क्यों नहीं कर सकते?

घर में जिस प्रकार की वस्तुएँ या चित्र आदि होते हैं उनका वैसा प्रभाव घर में रहने वालों पर पड़ता है। जब फिल्मों में काम करने वाले अभिनेता अभिनेत्रियों के भोंडे कामुकतापूर्ण चित्र वा प्रतिमाएँ रख लेते हैं, लगा लेते हैं तो घर में रहने वाले बड़े वा बच्चों पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है आप स्वयं अनुमान लगाकर देख सकते हैं। इसके विपरीत महापुरुषों क्रान्तिकारियों के चित्र घर में होते हैं तो घर वालों पर और बाहर से आने वालों पर कैसा प्रभाव पड़ता होगा। घर में रहने वालों की विचारधारा को घर में लगे हुए चित्र व वस्तुएँ बता देती हैं। अस्तु।

महर्षि ने अपनी प्रतिमा बनाने का विरोध किया था, वह क्यों किया इसका कारण ऊपर आ चुका है। स्टेचू, चित्र आदि का भेंट में लेना-देना आर्य समाज के सिद्धान्त के विरुद्ध नहीं है। यह लिया-दिया जा सकता है, कदाचित् इसकी पूजा वा अन्य दुरुपयोग न किया जाय तो। इसमें इसका भी ध्यान रखें कि पुराण प्रतिपादित कल्पित देवता जो कि चार-आठ हाथ व चार-ेपाँच मुँह वाले वा अन्य किसी जानवर के  रूप में हों उनसे लेने देने से बचें।

– ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर

आज के युग में ऋषि दयानन्द की प्रासंगिकता: राजेन्द्र जिज्ञासु

आर्य वक्ताओं व लेखकों की सेवा में:-कुछ समय से आर्यसमाज के उत्सवों व सम्मेलनों में सब बोलने वालों को एक विषय दिया जाता है, ‘‘आज के युग में ऋषि दयानन्द की प्रासंगिकता’’ इस विषय पर बोलने वाले (अपवाद रूप में एक दो को छोडक़र) प्राय: सब वक्ता ऋषि दयानन्द की देन व महत्ता पर अपने घिसे-पिटे रेडीमेड भाषण उगल देते हैं। जब मैं कॉलेज का विद्यार्थी था तब पूज्य उपाध्याय जी की एक मौलिक पुस्तक सुरुचि से पढ़ी थी। पुस्तक बहुत बड़ी तो नहीं थी, परन्तु बार-बार पढ़ी। आज भी यदा-कदा उसका स्वाध्याय करता हँू। आज के संसार में वैदिक विचारधारा को हम कैसे प्रस्तुत करें, यही उसके लेखन व प्रकाशन का प्रयोजन था।

इसमें दो अध्याय अनादित्त्व पर हैं। सब मूल सिद्धान्तों पर लिखते हुए महान् दर्शनिक की तान यही है कि ईश्वर, जीव व प्रकृति अनादि हैं। ईश्वर का ज्ञान और विद्या भी अनादि है। यह जगत् परिवर्तनशील है, परन्तु इस सृष्टि के नियम जो प्रभु ने बनाये हैं वे सब अपरिवर्तनशील व अनादि हैं, परमेश्वर इन नियमों का नियन्ता है। उसका एक भी नियम ऐसा नहीं जो श्वह्लद्गह्म्ठ्ठड्डद्य अनादि व नित्य (अनश्वर) न हो। ऋषि दयानन्द के वैदिक दर्शन की महानता, विलक्षणता, उपयोगिता तथा प्रासंगिकता का बोध इसी से हो जाता है। हमारे अधिकंाश वक्ता इस विषय पर बोलते हुए इसे छूते ही नहीं।

एक बार नागपुर के एक महासम्मेलन में मुझे भी इसी विषय पर बोलना पड़ा। मैंने पहला वाक्य यह कहा, ‘‘क्या कभी किसी ने यह प्रश्र उठाया है कि आज के युग में चाँद की, सूर्य की, पृथिवी की गति की, सूर्य के पूर्व से उदय होने की, दो+दो=चार, दिन के पश्चात् रात और रात के पश्चात् दिन की, कर्मफल सिद्धान्त की, प्रभु की दया, प्रभु के न्याय की, व्यायाम की, दूध-दही के सेवन की, गणित के नियम की, भौतिकी शास्त्र के नियमों की क्या प्रासंगिकता  है?’’

जो इस प्रश्र को उठायेगा, उसका उपहास ही उड़ाया जायेगा। इस प्रकार त्रैतवादी विचारक महर्षि दयानन्द के सन्देश, उपदेश ‘वेद अनादि ईश्वर का अनादि ज्ञान है’ को सुनकर जो उसकी प्रासंगिकता का प्रश्र उठाता है तो उसे कौन बुद्धिमान् कहेगा? एक सेवानिवृत्त प्राध्यापक मुझे बाजार में मिल गया। वार्तालाप में उसने एक बात कही, ‘‘वैज्ञानिक चाँद पर घूम आये। उपग्रह से भ्रमण करते रहते हैं। कहीं उन्हें नरक व स्वर्ग नहीं दिखे। कहीं किसी ने हूरें नहीं देखीं, फरिश्ते नहीं देखे……..।’’

मित्रो! जो चमत्कार मानते थे उनको लिखित रूप से मानना पड़ रहा है कि किसी पैगम्बर ने कोई चमत्कार नहीं किया। धर्म अनादि काल से है। युग-युग में ईश्वर नया ज्ञान नहीं देता। ऐसा साहित्य छप रहा है। ऐसे लोगों से पूछो कि आज के युग में उनके ग्रन्थों व पन्थों की क्या प्राासंगिकता है? विस्तार से कभी फिर कुछ लिखूँगा। आशा है हमारे बड़े-बड़े विद्वान् नये $फैशन के इस सम्मेलन से समाज को बचायेंगे।

हमारे पूजनीय स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी तो पण्डित चमूपति जी की यह तान सुनाया करते थे:-

जुग बीत गया दीन की शमशीर ज़नी का।

है वक्त दयानन्द शजाअत के धनी का।।

महर्षि दयानन्द का राष्ट्र-चिन्तन: – दिनेश

१९ वीं शताब्दी के पुनर्जागरण आन्दोलन मे महर्षि दयानन्द सरस्वती का राष्ट्र चिन्तन परवर्ती भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के चिन्तन की आधारशिला बना। महर्षि दयानन्द के राष्ट्र-चिन्तन का आधार वेद था, जिन्हें महर्षि ने सभी सत्यविद्याओं की पुस्तक घोषित किया। किसी भी विषय के  व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही उसके क्रियान्वयन और उसके परिणाम की अभिव्यक्ति होती है और यही चिन्तन अन्त:वैश्वीकरण के रूप में युगानुरूप राष्ट्रीय आन्दोलन की बहुआयामी प्रवृत्तियों को अभिव्यक्त करता रहा है। महर्षि दयानन्द सरस्वती के समक्ष विभिन्न प्रकार की चुनौतियाँ थीं। एक ओर ब्रिटिश साम्राज्य की आधीनता, तो दूसरी ओर भारतीय समाज में आई सामाजिक और धार्मिक विकृतियाँ। महर्षि दयानन्द सरस्वती को दुधारी तलवार से सामना करना था। यह कार्य निश्चय ही एक ओर अधार्मिक, अमानवीय और अंधविश्वासी परम्पराओं केा ध्वस्त करना था तो दूसरी ओर नवनिर्माण की आधारशिला पर विश्वग्राम की आधारशिला की संकल्पना को पूर्ण करना था।

महर्षि दयानन्द सरस्वती की राष्ट्रदृष्टि कालजयी तथा सकारात्मक सोच के साथ प्रतिरोध-प्रतिकार के बाद भी नवसंरचना की बुिनयाद पर टिकी थी, यही कारण था कि १८७५ में आर्य समाज की स्थापना के बाद महर्षि दयानन्द ने स्वराज्य, स्वदेश और स्वभाषा का शंखनाद किया था। यद्यपि काँग्रेस की स्थापना उपर्युक्त तीनों मान्यताओं के लिए नहीं हुई थी, तथापि १९०५ में गोपाल कृष्ण गोखले ने काँग्रेस के प्रस्ताव में स्वदेशी को स्वीकार किया और १९०६ में स्वराज्य दादा भाई नौरोजी की अध्यक्षता में स्वीकार किया गया। ‘स्वभाषा’ (आर्य भाषा या हिन्दी) को महात्मा गाँधी ने कालांतर में काँग्रेस के प्रस्ताव में स्वीकार किया। महर्षि दयानन्द सरस्वती का यह कथन स्वदेश के प्रति उनकी तीव्र उत्कंठा को स्पष्ट करता है कि ‘छ: पैसे का चाकू वही काम करता है तो सवा रुपये का विदेशी चाकू क्यों खरीदा जाये’ यह कथन परवर्ती भारतीय राष्ट्रीय एवं स्वदेशी आन्दोलन का प्रबल उद्घोष बना।

महर्षि दयानन्द सरस्वती का राष्ट्र-चिन्तन आज भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि यह धर्म या सम्प्रदाय का नहीं है अपितु यह वेदों से नि:सृत मानव कल्याण का राष्ट्रशास्त्र है। जिसमें मतवाद का दुराग्रह नहीं है। जातिवाद का विध्वंसकारी मतवाद नहीं है, अपितु यह लोकतंत्र की स्वत: उद्भुत विचार-पद्धति है, जिसके विमर्श की आज महती आवश्यकता है।

आर्यसमाज के सभासदों, संन्यासियों, गुरुकुल के आचार्यों, छात्रों सभी ने राष्ट्रयज्ञ में सक्रिय भाग लिया। उन्होंने जहाँ एक ओर क्रान्तिकारी आन्दोलनों में भाग लिया, वहीं दूसरी ओर गाँधी के नेतृत्व में उनके सभी आन्दोलनों में भाग लिया।

आर्यसमाज स्वतन्त्रता से पूर्व जिन उद्देश्यों के लिए समर्पित था, स्वतन्त्रता के बाद भी उनकी महत्त्वपूर्ण आवश्यकता थी। आर्यसमाज एक सशक्त राजनैतिक संगठन के रूप में अन्य राजनैतिक दलों की तरह भले ही प्रस्तुत ना हुआ हो, लेकिन देश के विभिन्न क्षेत्रों में आर्यजन अपनी उल्लेखनीय कार्यक्षमता का परिचय दे रहे हैं।

परन्तु वर्तमान में चुनावों के समय महर्षि दयानन्द सरस्वती का राष्ट्र-चिन्तन, जिसका उल्लेख ‘सत्यार्थप्रकाश’ जैसी कालजयी रचना में किया गया है, के अनुरूप ही आर्यजनों को मताधिकार का प्रयोग करना चाहिये। धर्म, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर मत ना देने का प्रावधान जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा १०३ (३) में दिया गया है। यदि  इनके आधार पर मत देने का आग्रह किया जाता है तो उसे भ्रष्ट आचरण में रखा जाता है। अभी हाल ही में पांच राज्यों पंजाब, गोवा, उत्तरप्रदेश, उत्तराखण्ड और मणिपुर के चुनावों के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने चुनाव को पंथनिर्पेक्ष प्रक्रिया मानते हुए धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्रवाद इत्यादि के आधार पर मत देने को भ्रष्ट आचरण घोषित किया और उसे छ: वर्ष तक चुनाव लडऩे के अयोग्य करार देने का फैसला दिया गया।

महर्षि दयानन्द सरस्वती का राष्ट्र-चिन्तन हमारे मत देने के मौलिक अधिकारों को पुष्ट करता है, जिसमें वेद, भारतीय संस्कृति, भाषा, जातिविहीन  समाज-व्यवस्था, छुआछूत का विरोध, भ्रष्टाचार, वंशवाद के विरुद्ध जिस राजनैतिक दल की निष्ठायें हैं, उसी दल को आर्यजन स्वविवेक से अपना मतदान करते हैं। महर्षि दयानन्द सरस्वती राजधर्म को एकांगी नहीं मानते थे अपितु उन्होंने संस्कृति के संरक्षणीय मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में राजनीति को विवेचित किया है। पृथ्वी और स्वयं को उसका पुत्र भाव रूपी राष्ट्रधर्म की व्याख्या अथर्ववेद के शब्दों में निम्र प्रकार की गई:-

माता भूमि:पुत्रोऽहं पृथिव्या:।

पर्जन्य: पिता स उ न: पिपर्तृ।

– (१२/१/१२)

सांस्कृतिक उत्थान अक्षत राष्ट्रवाद के मूल में ही संरक्षित एवं पल्लवित होता है। यही आज आर्यजनों को अभीष्ट है।

– दिनेश

महर्षि दयानन्द सरस्वती- सम्पूर्ण जीवन चरित्र: राजेन्द्र ‘जिज्ञासु’

पिछली बार इस ग्रन्थ की मौलिकता तथा विशेषताओं पर हमने पाँच बिन्दु पाठकों के सामने रखे थे। अब आगे कुछ निवेदन करते हैं।

६. इस जीवन-चरित्र में ऋषि जीवन विषयक सामग्री की खोज तथा जीवन-चरित्र लिखने के इतिहास पर दुर्लभ दस्तावेज़ों के छायाचित्र देकर प्रामाणिक प्रकाश डाला गया है। दस्तावेज़ों से सिद्ध होता है कि ऋषि के बलिदान के समय पं. लेखराम जी के अतिरिक्त कोई उपयुक्त व्यक्ति-इस कार्य के लिये ग्राम-ग्राम, नगर-नगर, डगर-डगर धक्के खाने को तैयार ही नहीं था। सब यही कहते थे कि ऋषि जी की घटनायें उनके घर में मेज़ पर पहुँचाई जायें। ऐसे दस्तावेज़ हमने खोज-खोजकर इस ग्रन्थ में दे दिये हैं। ऋषि का जीवन-चरित्र लिखने में तथा सामग्री की खोज में जो महापुुरुष, विद्वान् और ऋषिभक्त नींव का पत्थर बने, हमने उनके चित्र खोज-खोजकर इस ग्रन्थ में दिये हैं। हमें कहा गया कि महाशय मामराज जी का तो चित्र ही नहीं मिलता। महर्षि के पत्रों की खोज के लिये पं. भगवद्दत्त जी, पूज्य मीमांसक जी के इस अथक हनुमान् का चित्र खोजकर ही चैन लिया। ऋषि जीवनी के एक लेखक जिसको इस अपराध में घर-बार, सगे-सम्बन्धी, सम्पदा तथा परिवार तक छोडऩा पड़ा, उस तपस्वी निर्भीक विद्वान् पं. चमूपति का चित्र इस ऐतिहासिक ग्रन्थ में देकर एक नया इतिहास रचा है। जिस-जिस ने ऋषि जीवन के लिये कुछ मौलिक कार्य किया, सामग्री की खोज की, उन सबके चित्र देने व चर्चा करने का भरपूर प्रयास किया।

७. ऋषि के विषपान, बलिदान व दाहकर्म संस्कार का विस्तृत तथा मूल स्रोतों के आधार पर वर्णन किया गया है। लाला जीवनदास जी ने अरथी को कंधा दिया, ऋषि ने नाई को पाँच रुपये दिलवाये, ऋषि की आँखें खुली ही रह गईं- यह प्रामाणिक जानकारी इसी ग्रन्थ में मिलेगी। प्रतापसिंह की विषपान के पश्चात् ऋषि से जोधपुर में कोई भेंट नहीं हुई और आबू पर भी कोई बात नहीं हुई। ये सब प्रमाण हमने खोज निकाले।

८. जोधपुर के राजपरिवार की कृपा से बलिदान के पश्चात्  परोपकारिणी सभा को कोई दान नहीं मिला। २४०००/- रुपये की मेवाड़ आदि से प्राप्ति के दस्तावेज़ी प्रमाण खोजकर इतिहास प्रदूषण से ऋषि जीवनी को बचाया गया है।

९. ऋषि के बलिदान के समय स्थापित समाजों की दो सूचियाँ केवल इसी ग्रन्थ में खोजकर दी गई है।

१०. ऋषि के पत्र-व्यवहार का सर्वाधिक उपयोग इसी ग्रन्थ में किया गया है। ऋषि के कई महत्त्वपूर्ण पत्रों को पहली बार हमीं ने मुखरित किया है।

११. ऋषि के शास्त्रार्थों के तत्कालीन पत्रों व मूल स्रोतों को खोजकर, छायाचित्र देकर सबसे पहला प्रयास हमीं ने इस जीवन चरित्र में करके इतिहास प्रदूषण का प्रतिकार किया है।

१२. ऋषि के आरम्भिक काल के शिष्यों, अग्नि परीक्षा देने वाले पहले आर्यों, सबसे पहले आर्य शास्त्रार्थ महारथी राव बहादुरसिंह जी को मुखरित करके इसी ग्रन्थ में दिया गया है।

१३. पं. श्रद्धाराम फिलौरी के हृदय परिवर्तन विषयक उसके ऋषि के नाम लिखे गये ऐतिहासिक पत्र का फोटो देकर ऋषि-जीवन का नया अध्याय  इसमें लिखा है।

१४. ऋषि के व्यक्तित्व का, शरीर का, ब्रह्मचर्य का सबसे पहले जिस भारतीय ने विस्तृत वर्णन किया, वह बनेड़ा के राजपुरोहित श्री नगजीराम थे। उनकी डायरी के ऐसे पृष्ठों का केवल इसी ग्रन्थ में फोटो मिलेगा। (शेष अगले अंकों में)

महर्षि दयानन्दाष्टकम्

टिप्पणी- महामहोपाध्याय श्री पं. आर्यमुनि जी ने यह अष्टक महर्षि का गुणगान करते हुए अपने ग्रन्थ आर्य-मन्तव्य प्रकाश में दिया था। कभी यह रचना अत्यन्त लोकप्रिय थी। ११वीं व १२वीं पंक्ति ऋषि के चित्रों के नीचे छपा करती थी। पूज्य आर्यमुनि जी ने ऋषि जीवन का पहला भाग पद्य में प्रकाशित करवा दिया था, इसे पूरा न कर सके। यह ऐतिहासिक रचना परोपकारी द्वारा आर्य मात्र को भेंट है। – राजेन्द्र ‘जिज्ञासु’

वेदाभ्यासपरायणो मुनिवरो वेदैकमार्गे रत:।

नाम्ना यस्य दया विभाति निखिला तत्रैव यो मोदते।

येनाम्नायपयोनिधेर्मथनत: सत्यं परं दर्शितम्।

लब्धं तत्पद-पद्म-युग्ममनघं पुण्यैरनन्तैर्मया।।

भाषाछन्द-सवैया

१.            उत्तम पुरुष भये जग जो, वह धर्म के हेतु धरें जग देहा।

धन धाम सभी कुर्बान करें, प्रमदा सुत मीतरु कांचन गेहा।

सनमारग से पग नाहिं टरे, उनकी गति है भव भीतर एहा।

एक रहे दृढ़ता जग में सब, साज समाज यह होवत खेहा।।

२.            इनके अवतार भये सगरे, जगदीश नहीं जन्मा जग माहीं।

सुखराशि अनाशी सदाशिव जो, वह मानव रूप धरे कभी नाहीं।

मायिक होय यही जन्मे, यह अज्ञ अलीक कहें भव माहीं।

मत एक यही सब वेदन का, वह भाषा रहे निज बैनन माहीं।।

३.            धन्य भई उनकी जननी, जिन भारत आरत के दु:ख टारे।

रविज्ञान प्रकाश किया जग में, तब अंध निशा के मिटे सब तारे।

दिन रात जगाय रहे हमको, दु:खनाशकरूप पिता जो हमारे।

शोक यही हमको अब है, जब नींद खुली तब आप पधारे।।

४.            वैदिक भाष्य किया जिनने, जिनने सब भेदिक भेद मिटाए।

वेदध्वजा कर में करके, जिनने सब वैर विरोध नसाए।

वैदिक-धर्म प्रसिद्ध किया, मतवाद जिते सब दूर हटाए।

डूबत हिन्द जहाज रहा अब, जासु कृपा कर पार कराए।।

५.            जाप दिया जगदीश जिन्हें इक, और सभी जप धूर मिलाए।

धूरत धर्म धरातल पै जिनने, सब ज्ञान की आग जलाए।

ज्ञान प्रदीप प्रकाश किया उन, गप्प महातम मार उड़ाए।

डूबत हिन्द जहाज रहा अब, जासु कृपा कर पार कराए।।

६.            सो शुभ स्वामी दयानन्द जी, जिनने यह आर्यधर्म प्रचारा।

भारत खण्ड के भेदन का जिन, पाठ किया सब तत्त्व विचारा।

वैदिक पंथ पै पाँव धरा उन, तीक्ष्ण धर्म असी की जो धारा।

ऐसे ऋषिवर की सज्जनो, कर जोड़ दोऊ अब वंद हमारा।।

७.            व्रत वेद धरा प्रथमे जिसने, पुन भारत धर्म का कीन सुधारा।

धन धाम तजे जिसने सगरे, और तजे जिसने जग में सुतदारा।

दु:ख आप सहे सिर पै उसने, पर भारत आरत का दु:ख टारा।

ऐसे ऋषिवर को सज्जनो, कर जोड़ दोऊ अब वंद हमारा।।

८.            वेद उद्धार किया जिनने, और गप्प महातम मार बिदारा।

आप मरे न टरे सत पन्थ से, दीनन का जिन दु:ख निवारा।

उन आन उद्धार किया हमरा, जो गिरें अब भी तो नहीं कोई चारा।

ऐसे ऋषिवर को सज्जनो, कर जोड़ दोऊ अब वंद हमारा।।

‘सम्पूर्ण जीवन चरित्र-महर्षि दयानन्द’ को क्यों पढ़ें?:- प्रा राजेंद्र जिज्ञासु

‘सम्पूर्ण जीवन चरित्र-महर्षि दयानन्द’ को क्यों पढ़ें?:- गत वर्ष ही इस विनीत ने श्रीयुत् धर्मेन्द्र जी जिज्ञासु तथा  श्री अनिल आर्य को बहुत अधिकार से यह कहा था कि आप दोनों इस ग्रन्थ के गुण-दोषों की एक लम्बी सूची बनाकर कुछ लिखें। मुद्रण दोष के कारण कहीं-कहीं भयङ्कर चूक हुई है। जो इस ग्रन्थ में मौलिक तथा नई खोजपूर्ण सामग्री है, उसको मुखरित किया जाना आवश्यक है। विरोधियों, विधर्मियों ने ऋषि की निन्दा करते-करते जो महाराज के पावन चरित्र व गुणों का बखान किया है, वह Highlight मुखरित किया जाये। लगता है, आर्य जगत् या तो उसका मूल्याङ्कन नहीं कर सका या फिर प्रमादवश उसे उजागर नहीं करता। वे तो जब करेंगे सो करेंगे, आज से परोपकारी में इसे आरम्भ किया जाता है। पाठक नोट करते जायें।

१. महर्षि की मृत्यु किसी रोग से नहीं हुई। उन्हें हलाक ((Killed)) किया गया। नये-नये प्रमाण इस ग्रन्थ में पढिय़े। अंग्रेज सरकार के चाटुकार मिर्जा गुलाम अहमद ने अपने ग्रन्थ हकीकत-उल-वही में बड़े गर्व से महर्षि के हलाक किये जाने का श्रेय (Credit) लिया है। यह प्रमाण पहली बार ही ऋषि जीवन में दिया गया है।

२. काशी शास्त्रार्थ से भी पहले उसी विषय पर मेरठ जनपद के पं. श्रीगोपाल शास्त्री ने ऋषि से टक्कर लेने के लिये कमर कसी। घोर विरोध किया। विष वमन किया। अपनी मृत्यु से पूर्व उसने अपने ग्रन्थ ‘वेदार्थ प्रकाश’ में ऋषि के पावन चरित्र की प्रशंसा तो की ही है। ऋषि को गालियाँ देने वाले, ऋषि के रक्त के प्यासे इस विरोधी ने एक लम्बी $फारसी कविता में ऐसे लिखा है:-

हर यके रा कर्द दर तकरीर बन्द

हर कि खुद रा पेश ऊ पण्डित शमुर्द

दर मुकाबिल ऊ कसे बाज़ी न बुर्द

उस महाप्रतापी वेदज्ञ संन्यासी ने हर एक की बोलती बन्द कर दी। जिस किसी ने उसके सामने अपनी विद्वत्ता की डींग मारी, उसके सामने शास्त्रार्थ में कोई टिक न सका। सभी उससे शास्त्रार्थ समर में पिट गये।

३. ऋषि की निन्दा में सबसे पहली गन्दी पोथी जीयालाल जैनी ने लिखी। इस पोथी का नाम था ‘दयानन्द छल कपट दर्पण’ यह भी नोट कर लें कि यह कथन सत्य नहीं कि इस पुस्तक के दूसरे संस्करण में इसका नाम ‘दयानन्द चरित्र दर्पण’ था। हमने इसी नाम (छल कपट दर्पण) से छपे दूसरे संस्करण के पृष्ठ की प्रतिछाया अपने ग्रन्थ मेें दी है। इस ग्रन्थ में जीयालाल ने ऋषि को महाप्रतापी, प्रकाण्ड पण्डित, दार्शनिक, तार्किक माना है। विधर्मियों से अंग्रेजी पठित लोगों की रक्षा करने वाला माना है। कर्नल आल्काट के महर्षि दयानन्द विषयक एक झूठ की पोल खोलकर ऋषि का समर्थन किया। कर्नल ने ३० अप्रैल १८७९ को ऋषिजी की सहारनपुर में थियोसो$िफकल सोसाइटी की बैठक में उपस्थिति लिखी है। जीयालाल ने इसे गप्प सिद्ध करते हुए लिखा है कि ऋषि ३० अप्रैल को देहरादून में थे। वे तो सहारनपुर में एक मई को पधारे थे। यह प्रमाण इसी ऋषि जीवन में मिलेगा।

४. ज्ञानी दित्त सिंह की पुस्तिका सिखों ने बार-बार छपवाकर दुष्प्रचार किया कि दित्त सिंह ने शास्त्रार्थ में ऋषि को पराजित किया। हमने दित्त सिंह की पुस्तक की प्रतिछाया देकर सिद्ध कर दिया कि वह स्वयं को वेदान्ती बताता है, वह सिख था ही नहीं। वह स्वयं लिखता है कि तेजस्वी दयानन्द के सामने कोई बोलने का साहस ही नहीं करता था। यह प्रमाण केवल इसी जीवन चरित्र में मिलेंगे। (शेष फिर)

अन्य मतों पर महर्षि दयानन्द का प्रभाव

अन्य मतों पर

महर्षि दयानन्द का प्रभाव

– वैद्य रामगोपाल शास्त्री

सनातन धर्म स्त्रियों और शूद्रों को वेद पढ़ाने के विरुद्ध था। स्वामी दयानन्द ऐसे प्रथम सुधारक हुए हैं, जिन्होंने वेद के प्रमाण और युक्तियों से इस विचार की कड़ी समालोचना की। इस समालोचना का यह प्रभाव हुआ है कि सैंकड़ों स्त्रियाँ तथा शूद्र संस्कृत की शास्त्री, आचार्य, तीर्थ तथा एम.ए. परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो चुके हैं। इन में प्रायः सब को वेद का कुछ अंश अवश्य पढ़ाया जाता है और बिना किसी विरोध के सनातन धर्म के बड़े-बड़े विद्वान् विद्यालयों में इन्हें पढ़ा रहे हैं। सन्त विनोबा भावे ने एक बार अपनी मध्यप्रदेश की यात्रा में यह घोषणा की थी कि मैं ऐसे अछूतों को तैयार कर रहा हूँ जो कि वेद के विद्वान् बनें। उसके लिए बिना किसी संकोच के सब हिन्दू उस विचार की पूर्ति के लिए उन्हें द्रव्य का सहयोग देने को तैयार हो गए थे।

मैंने वे दिन भी देखे हैं कि जब आर्यसमाज ने कन्या-पाठशालाएँ आरमभ की तो लोगों ने स्त्री-शिक्षा के विरुद्ध व्याखयान दिए और पाठशालाओं के आगे धरना दिया। इस समय परिवर्तन यह हुआ कि स्वयं सनातन धर्म सभाओं ने कन्या-पाठशालाएँ खोली हुई हैं। आर्य-पाठशालाओं में सब लड़कियों को सन्ध्या-मन्त्र सिखाये जाते हैं और अधिकतर लड़कियाँ सनातन धर्मावलबियों की हैं, जो सहर्ष इन मन्त्रों को पुत्रियों से घर में सुनते हैं। यह बड़ा भारी परिवर्तन है।

नमस्ते-आरमभ में स्वामी दयानन्द ने सबको परस्पर नमस्ते करने का विचार दिया तो इसका व्याखयानों और लेखों द्वारा भारी विरोध किया गया। मैंने वे दिन देखे हैं, जब आर्यसमाज और सनातन धर्म में नमस्ते पर शास्त्रार्थ होता था। वर्तमान समय में नमस्ते का प्रचार इतना हुआ कि रूस के तत्कालीन प्रधानमन्त्री क्रुश्चे जब भ्रमण में दिल्ली के रामलीला मैदान में लाखों नर-नारियों के सामने भाषण देने  हुए तो उन्होंने सबसे पहले हाथ जोड़ कर नमस्ते की। सिनेमा की फिल्मों में भी सब पात्र आदर दिखाने के लिये नमस्ते का प्रयोग करते हैं। प्रत्येक हिन्दू ने नमस्ते अपना लिया है।

वर्ण व्यवस्था-आचार्य दयानन्द ने ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णों को जन्म से न मानकर गुण कर्म-स्वभाव से माना है। इसका बड़ा विरोध किया गया। वर्तमान काल में सनातन धर्म का शिक्षित वर्ग भी जाति-पाँति का भेद हटाकर लड़के-लड़कियों के विवाह कर रहा है। ऐसे अनेक उदाहरण हम प्रतिदिन देखते हैं, जब ब्राह्मण लड़कियों का अब्राह्मण लड़कों से विवाह हो रहा है। अखबारों में जहाँ विवाह के विज्ञापन छपते हैं, प्रायः यह लिखा होता है कि विवाह में जाति-बन्धन नहीं। दिल्ली में इतिहास के विशेषज्ञ डॉ. ताराचन्द एम.पी. ने पटेल-स्मृति व्यायानमाला के प्रथम व्यायान में कहा था कि प्राचीन आर्यों में जन्म से जाति नहीं मानी जाती थी, प्रत्युत गुण-कर्म से मानी जाती थी। यह आचार्य दयानन्द की समीक्षा का ही प्रभाव है।

ज्वर कैसे होता है?-पहले प्रत्येक वैद्य यह मानता था कि रुद्र (महादेव) के क्रोध से ज्वर पैदा हुआ (रुद्र कोपाग्निसभूतः), परन्तु वर्तमान युग में इस बात को उपहासजनक अनुभव करते हुए अब यह अर्थ करते हैं कि वेद और ब्राह्मण-ग्रन्थों में रुद्र नाम अग्नि का आता है। रुद्र-कोप का यहाँ अर्थ यह है कि अग्नि अर्थात् पेट की जठराग्नि के कोप अर्थात् विकार से ज्वर उत्पन्न होता है।

सूर्यदेव-कोणार्क (उड़ीसा) में सूर्यदेव का एक बहुत ही विशाल और सुन्दर मन्दिर है। उसमें सूर्यदेव की एक मूर्ति पत्थर के रथ पर बनी हुई है। रथ के सात घोड़े और 12 पहिए हैं। उस समय में यह कहा गया है कि इस रथ के सात घोड़े सूर्य-किरणों के सात रंग और 12 पहिए वर्ष के 12 मास को प्रकट करते हैं।

यह आचार्य दयानन्द के प्रभाव का परिणाम है कि इस प्रकार की अनेक गाथाओं को, जो पहले सनातनधर्मी विद्वान् ऐतिहासिक मानते थे, अब आलंकारिक मानकर अर्थ करते हैं।

ईसाई धर्म-ईसाई धर्म की समीक्षा दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के 13 वें समुल्लास में की है। उस समीक्षा का प्रभाव ईसाई धर्म पर पर्याप्त हुआ है। सन् 1919 में भारत में पादरियों की एक कमीशन बैठी। उसने 1500 पादरियों को चार प्रश्न भेजकर उसके उत्तर माँगे-(1) क्या ईसामसीह कुमारी मरियम के गर्भ से बिना पिता के उत्पन्न हुआ था? इसके उत्तर में 95 प्रतिशत पादरियों ने उत्तर भेजा कि वह कुमारी मरियम से उत्पन्न नहीं हुआ, प्रत्युत किसी पिता से उत्पन्न हुआ था। (2) क्या ईसामरने के बाद कब्र से उठा? इसका उत्तर 75 प्रतिशत पादरियों ने दिया कि नहीं उठा। (3) स्वर्ग और नर्क हैं तो कहाँ हैं? इसका उत्तर 83 प्रतिशत पादरियों ने दिया कि स्वर्ग और नर्क कोई स्थान विशेष नहीं हैं। (4) क्या मृत्यु के पीछे जीवात्मा रहता है? 96 प्रतिशत पादरियों ने उत्तर दिया कि जीवात्मा अमर है और रहता है।

डॉ. जे.डी.संडरलैंड ने एक पुस्तक लिखी है origin and character of bible (दि ऑरिजिन एण्ड कैरेक्टर ऑफ दि बाईबल)। उसमें उसने स्वामी दयानन्द से भी बढ़कर बाइबिल की समालोचना की है। इसी पुस्तक के पृष्ठ 132-33 पर लिखा है कि सब विद्वानों का बिना संशय का यह निर्णय है कि बाइबिल की रचना मनुष्य-कृत होने के कारण इसमें भूलें भी हैं। पादरी संडरलैंड ने इन भूलों के बहुत से प्रमाण दिए हैं। हम केवल उनमें से तीन दृष्टान्त देते हैं। (1) नई व्यवस्था के 11 पर्व में भक्ष्याभक्ष्य पशुओं की गिनती की हुई है। उसमें शश (खरगोश) को जुगाली करने वाला पशु लिखा है जो कि सर्वथा ठीक नहीं है। (2) बाइबिल का सृष्टि-उत्पत्ति और जल-प्रलय का वर्णन विज्ञान के विरुद्ध है। (3) यहोशु के कहने पर सूर्य खड़ा हो गया और अपनी गति छोड़ दी। यह बात भी विज्ञान और बुद्धि के विरुद्ध है।

इस्लाम-सत्यार्थप्रकाश के 14 वें समुल्लास में स्वामी दयानन्द ने इस्लाम धर्म की समालोचना की है। स्वामी जी के पीछे अमर शहीद पं. लेखराम जी और स्वामी दर्शनानन्द जी आदि आर्य-विद्वानों ने भी इस्लाम धर्म की पर्याप्त समालोचना की। स्वामी जी महाराज की समीक्षा के पीछे सर सय्यद अहमद खा ने उर्दू भाषा में कुरान शरीफ का भाष्य किया। अहमदी समप्रदाय की लाहौरी शाखा के प्रधान मौलवी मुहमद अली एम.ए. ने कुरान का अंग्रेजी और उर्दू में अनुवाद किया। इन अनुवादों में जो-जो कटाक्ष आर्य-विद्वानों के होते थे, उनसे बचने के लिए उन्होंने पुराने सब भाष्यों को छोड़कर बहिश्त (स्वर्ग) दोजख (नर्क), फरिश्ते, जिन, शैतान आदि की व्याखया बुद्धिपूर्वक की और मुसलमानों के पहले विचारों को बदलने का यत्न किया। इन दोनों अनुवादों से मुस्लिम जनता ने सर सय्यद अहमद को नेचरिया और दहरिया (नास्तिक) की उपाधि दी और अहमदियों को नास्तिक और इस्लाम का शत्रु माना।

इन दोनों मुसलमान अनुवादकों ने नर्क और स्वर्ग को स्थान-विशेष न मानकर मनुष्य की दो प्रकार की अवस्थाएँ माना है। (this shows clearly that paradise & hell are more like two conditions than two places )(मुहमद अली के अंग्रेजी अनुवाद की भूमिका पृष्ठ 63)।

मुहमद अली ने फरिश्ते और शैतान की पृथक् सत्ता न मानकर मनुष्य की अच्छी और बुरी भावनाओं को माना है। उन्होंने बुराई के प्रेरक शैतान को सारथि और भलाई के प्रेरक फरिश्ते को साक्षी कहा है। (देखो भूमिका पृष्ठ 78) नया मुहमद नूरुद्दीन कारी काशमीरी अपनी इस्लामी अकायद पृष्ठ 74 पर लिखते हैं- ‘‘मरते वक्त अजाब या सवाब के फरिश्ते आते हैं, वे दरहकीकत मरने वाले के बद व नेक अमाल होते हैं।’’ मुसलमानों का मत है कि कयामत के दिन मनुष्य को उसके कर्मों की पुस्तक दी जावेगी। मौलवी मुहमद अली भूमिका के पृष्ठ 61 में इस पुस्तक को न मानकर लिखते हैं कि ये कर्म मनुष्य के भीतर हैं और उस दिन कर्मों के प्रभाव से फल दिया जायेगा।

इस प्रकार स्वामी दयानन्द जी के प्रचार से सब धर्म वालों ने अपने सिद्धान्तों और अर्थों को अपने धर्म की बुद्धि और विज्ञान के आधार पर सिद्ध करने का यत्न किया है। यह आचार्य दयानन्द की समीक्षा का ही परिणाम है।