चिंतन , मनन ही मन का कार्य

ओउम चिंतन , मनन ही मन का कार्य डा. अशोक आर्य मानव का मन ही उसके सब क्रिया कलापों का आधार है | शुद्ध व पवित्र मन से सब कार्य उतम होते हैं तथा जिसका मन अशुद्ध होता है , जिसका मन अपवित्र होता है उसके कार्य भी अशुद्ध व अपवित्र ही होते हैं | मानव का मुख्य उद्देश्य भगवद प्राप्ति है , जो शुद्ध मन से ही संभव है | सब प्रकार के ज्ञान प्राप्ति का स्रोत भी शुद्ध मन ही होता है | मानव में विवेक की जाग्रति का आधार भी मन की शुद्धता ही होती है | यह शुद्ध मन ही होता है, जिससे शुद्ध कार्य होता है तथा उसके द्वारा किये जा रहे शुद्ध कार्यों के … Continue reading चिंतन , मनन ही मन का कार्य

मनु शूद्र अर्थात् दलित विरोधी नहीं थे – डॉ रामकृष्ण आर्य (वरुणमुनि वानप्रस्थी)

(ख) मनु शूद्र अर्थात् दलित विरोधी नहीं थे। विचार करें कि मनुस्मृति में शूद्रों की क्या स्थिति है ? आजकल की दलित पिछड़ी और जनजाति कही जानेवाली जातियों को मनु ने शूद्र नहीं कहा है, अपितु जो पढ़ने-पढ़ाने का पूर्ण अवसर देने के बाद भी न पढ़ सके और केवल शारीरिक श्रम से ही समाज की सेवा करे, वह शूद्र है। (मनु0 1/90)। मनु प्रत्येक मनुष्य को समान शिक्षाध्ययन करने का समान अवसर देते हैं। जो अज्ञान, अन्याय, अभाव में से किसी एक भी विद्या को सीख लेता है, वही मनु का द्विज अर्थात् विद्या का द्वितीय जन्मवाला है। परन्तु जो अवसर मिलने के बाद भी शिक्षा ग्रहण न कर सके, अर्थात् द्विज न बन सके वह एक जाति जन्म … Continue reading मनु शूद्र अर्थात् दलित विरोधी नहीं थे – डॉ रामकृष्ण आर्य (वरुणमुनि वानप्रस्थी)

मनु और मनुस्मृति पर आक्षेप: एक विचार: डॉ0 रामकृष्ण आर्य (वरुणमुनि वानप्रस्थी)

राजर्षि मनु वेदों के बाद सर्वप्रथम धर्म प्रवक्ता, मानव मात्र के पूर्वज राजधर्म और विधि (कानून) के सर्वप्रथम प्रणेता थे। उनके द्वारा रचित धर्मशास्त्र संसार का सर्वप्रथम और सर्वश्रेष्ठ धर्मशास्त्र है, जिसे मनुस्मृति के नाम से जाना जाता है। इस मनुस्मृति में बिना किसी पक्षपात के मानवमात्र को उन्नति के समान अवसर प्रदान करनेवाली एक उत्तम वैज्ञानिक और अद्वितीय समाज-व्यवस्था का प्रतिपादन किया गया है, जिसे वर्ण-व्यवस्था कहा जाता है। जोकि मनुष्य मात्र के गुण, कर्म और स्वभाव पर आधारित है। मनु की यह सबसे बड़ी विशेषता है कि वे जन्म के आधार पर किसी मनुष्य को उच्च या नीच नहीं मानते। मनुस्मृति का वर्तमान स्वरूप स्वायम्भुव मनु मनुस्मृति के प्रवक्ता हैं। प्रवक्ता इसलिए कि मनुस्मृति मूलतः प्रवचन है, जिसे … Continue reading मनु और मनुस्मृति पर आक्षेप: एक विचार: डॉ0 रामकृष्ण आर्य (वरुणमुनि वानप्रस्थी)

क्षेपकों का दोष मनु के सिर नहीं: पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

“हम आर्यसमाज के बाहर देखते हैं कि मनुस्मृति का खुल्लमखुल्ला अपमान किया जाता है। मनु को भेषज समझने के स्थान पर लोग विष समझते हैं। समस्त हिन्दू समाज के दुर्गुणों का कारण मनु को समझा जाता है। मनुस्मृतियाँ कई स्थानों पर सार्वजनिक रूप से जलाई गई हैं, जिससे मनु के लिए जो आदर के भाव लोगों में विद्यमान हैं, उनका सर्वनाश हो जाए। बहुत से लोग इसी बात में अपना गौरव समझते हैं कि मनु के प्रति घृणा उत्पन्न की जाए। इसका मुख्य कारण है कि वह विष जो समय-समय पर मनुस्मृति में क्षेपक के रूप में मिला दिया गया और जिसने मनु के उपदेशों को विषाक्त अन्न के समान बना दिया। स्त्री और शूद्रों के पददलित होने के कारण … Continue reading क्षेपकों का दोष मनु के सिर नहीं: पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

जयपुर में स्थापित मनु प्रतिमा विषयक वाद-विवाद

मनुस्मृति विषयक आर्यसमाज तथा डॉ0 अम्बेडकर की भूमिकाओं के इस स्थूल अध्ययन के बाद एक नजर जयपुर उच्च न्यायालय में स्थापित उस मनु प्रतिमा पर भी डाल लेते हैं जिस कारण मनु, मनुस्मृति या मनुवाद विषयक चर्चा समाचार-पत्रों के माध्यम से और अधिक तीव्र स्वर में हुई है। घटना की पृष्ठभूमि निम्न प्रकार है – 2 मई 1987 को जयपुर उच्च न्यायालय के सन्निकट स्थिति चैक में तत्कालीन राष्ट्रपति आर0 वेंकटरमण के कर-कमलों से डॉ0 बाबासाहब अम्बेडकर की प्रतिमा का अनावरण हुआ। कहते हैं, यातायात में असुविधा होने के बहाने बहुत दिनों तक इस प्रतिमा को कोई समुचित स्थान ही नहीं मिल पाया था। तत्पश्चात् लगभग दो साल बाद जयपुर के प्रथम वर्ग के न्यायाधिकारी श्री पद्मकुमार जैन ने उच्च … Continue reading जयपुर में स्थापित मनु प्रतिमा विषयक वाद-विवाद

मनुस्मृति के सन्दर्भ में डॉ भीमराव अम्बेडकर और आर्यसमाज

माननीय डॉ0 अम्बेडकरजी ने मनुस्मृति का कटु विरोध क्यों किया ? इस प्रश्न को गहराई से समझने के लिए उन अपमान जनक घटनाओं पर भी ध्यान देना होगा, जो अस्पृश्य समाज को स्पृश्य समाज की ओर से समय-समय पर सहन करनी पड़ीं। उदाहरण के तौर पर सन् 1927 के अन्त में मनुस्मृति जलाई गई, उसी वर्ष के मार्च महीने में महाराष्ट्र के ’महाड़‘ (जिला-रायगढ़) नामक स्थान पर डॉ0 अम्बेडकरजी के नेतृत्व में एक तालाब पर सामूहिक रूप में पानी पीने का साहसी सत्याग्रह किया गया। परिणामस्वरूप रूढ़िवादी ब्राह्मण समाज क्षुब्ध हो उठा। ’ज्ञानप्रकाश‘ समाचार पत्र के 27/3/1927 के अंक में दिये गये समाचार के अनुसार 21 मार्च 1927 को वह तालाब तथाकथित वेदोक्त विधि से शुद्ध किया गया। उसी समय … Continue reading मनुस्मृति के सन्दर्भ में डॉ भीमराव अम्बेडकर और आर्यसमाज

दलितोद्धार में दयानन्द के देवदूतों और आर्यसमाज के स्वयंसेवकों की भूमिका

दलितोद्धार में दयानन्द के देवदूतों और आर्यसमाज के स्वयंसेवकों की भूमिका चाँद (अछूत-विशेषांक में अभिव्यक्त दलितों की व्यथा-कथा के आधार पर श्री नन्दकिशोर तिवारी के संवादकत्त्व में ’चाँद‘ नामक हिन्दी मासिक का ’अछूत‘-विशेषांक मई 1927 में आज से 81 वर्ष पूर्व इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ था। अंक के प्रधान सम्पादक नन्दकिशोर जी तिवारी और कम्पोजीटर बंशीलाल जी कोरी थे। विशेषांक के मुख पृष्ठ पर एक श्वेत-श्याम चित्र छपा है जिसमें सरयू पारिण ब्राह्मण तिवारी और कोरी चमार एक थाली और एक टेबल पर सहभोज करते हुए दिखलाई दे रहे हैं। विशेषांक की कुल पृष्ठ संख्या 192 है। यह विशेषांक दलितोद्धार व सामाजिक परिवर्तन के लिए समर्पित है। संपादक ने प्राक्कथन में अंक का उद्देश्य सामाजिक अत्याचारों पर प्रकाश डालना और … Continue reading दलितोद्धार में दयानन्द के देवदूतों और आर्यसमाज के स्वयंसेवकों की भूमिका

आर्य मंतव्य (कृण्वन्तो विश्वम आर्यम)