परम पिता परमात्मा सदा ही दानदाता का कल्याण करते हैं

ओउम परम पिता परमात्मा सदा ही दानदाता का कल्याण करते हैं डा.अशोक आर्य जो देता है, जो देव है , उसका वह प्रभु कल्याण करते हैं । यह ही प्रभु क सत्य है , यह ही प्रभु का व्रत है , यह ही प्रतिज्ञा है । इस तथ्य पर ही प्रकाश डालते हुये मन्त्र उपदेश कर रहा है : यदङ्गदाशुषेत्वमग्नेभद्रंकरिष्यसि। तवेत्तत्सत्यमङ्गिरः॥ ऋ01.1.6 || हे सब अस्तुओं के दाता, सब वस्तुओं को प्राप्त कराने वाले पिता,सब के अग्रणी, सब से आगे रहने वाले प्रभु ! धन देव तथा आप की प्रार्थना एक साथ नहीं की जा सकती । यह नियम तो आप ही ने बनाया है कि दाता की सदा प्रार्थना करो । प्रार्थना से ही दाता देता है । जब … Continue reading परम पिता परमात्मा सदा ही दानदाता का कल्याण करते हैं

हम दिव्यगुणों के ग्रहण से प्रभु को धारण करें

ओउम हम दिव्यगुणों के ग्रहण से प्रभु को धारण करें डा.अशोक आर्य परम पिता परमात्मा होता, कविक्रतु , सत्य तथा चित्रश्रवस्तम व देव हंत । उन्हें प्राप्त करने के लिये हमें दिव्यगुणों को ग्रहण करना होता है । जैसे जैसे तथा जितना जितना हम प्रभु को , उस पिता को धारण करने का यत्न करते हैं , उतना उतना ही हम दिव्यगुणों वाले होते चले जाते हैं । इस मन्त्र में इस बात पर ही प्रकाश डालते हुये इस प्रकार व्याख्यान किया है : – अग्निर्होताकविक्रतु:सत्यश्चित्रश्रवस्तम: । देवोदेवेभिरागम ॥ ऋ0 १.१.५ ॥ १. प्रभु ही यज्ञ करता गत मन्त्र की भावना अनुरूप ही यह मन्त्र भी कहता है कि संसार में जितने प्रकार के भी यज्ञ आदि कार्य होते हैं … Continue reading हम दिव्यगुणों के ग्रहण से प्रभु को धारण करें

यग्य की अग्नि से घर की रक्षा होती है

ओउम यग्य की अग्नि से घर की रक्षा होती है डा अशोक आर्य हम प्रतिदिन दो काल यग्य करें । यग्य भी एसे करें कि इस के लिए आग को दो अरणियों से रगड़ कर पैदा किया जावे । इस प्रकार की अग्नि से किया गया यग्य , इस प्रकार की प्रशस्त अग्नि से किया गया यग्य घर की रक्षा करता है । इस तथ्य का वर्णन ऋग्वेद के सप्तम मंडल के प्रथम सूक्त के प्रथम मंत्र में इस प्रकार मिलता है : अग्नि नरो दीधितिभिररण्योर्हस्तच्युती जनयन्त प्रशस्तं | दूरेद्रशं गृह्पतिमथर्युम ।। ऋग्वेद ,,7.1.1 || मनुष्य सदा उन्नति को ही देखना चाहता है । अवन्ती को तो कभी देखना ही नहीं चाहता । मानव सदा आगे बढना चाह्ता है । … Continue reading यग्य की अग्नि से घर की रक्षा होती है

दंगल की जायरा वसीम अभिनेत्री को कश्मीर की अलगाववादियों की धमकी

दंगल की  जायरा वसीम  अभिनेत्री  को  कश्मीर की अलगाववादियों की धमकी आजकल  सोशल मीडिया में दंगल की बहुत चर्चा हो रही है इतना ही  नहीं बहुत से टीवी सीरियल  में भी दंगल  की बात की जाती है  की दंगल करते हैं इत्यादि इत्यादि | आज यदि भारत में विमुद्रीकरण  होने के कारण  लोग बोल रहे हैं की पैसा बाजार में नहीं है तो फिर  बाजार में दंगल ने ३६० करोड़  से ज्यादा का कारोबार कैसे कर लिया ? यह बात समझ से  बाहर है | लोग आमिर  को एक समाजसेवक के रूप में  देखते हैं | समाज सेवक के रूप में लोगो को नजर आते हैं और सत्यमेव जयते को करके और भी अपने को समाज सेवक के तौर पर  … Continue reading दंगल की जायरा वसीम अभिनेत्री को कश्मीर की अलगाववादियों की धमकी

हम शरीर , मन व मस्तिश्क से प्रभु स्तवन करें

औ३म हम शरीर , मन व मस्तिश्क से प्रभु स्तवन करें डा. अशोक आर्य मानव के शरीर रुपि घर के तीन निवासी होते हैं । इन तीन के द्वारा ही मानव अपने जीवन के सब कार्यों को पूर्ण करता है । वह अपने शरीर में सोम कणॊं की रकशा कर शक्ति सम्पन्न बनता है मस्तिश्क से ग्यान प्राप्त कर ग्यान का भण्डारी बनता है तथा मन से विभिन्न प्रकार का चिन्तन करता है किन्तु जब इन तीनों शक्तियों को प्रभु स्तवन में लगा देता है तो उसकी सब मनोकामनायें पूर्ण होती हैं । यह तथ्य ही इस सूक्त क मुख्य विशय है । आओ इस सूक्त के विभिन्न मन्त्रों को समझने का यत्न करें । सोम की रक्शा से हम … Continue reading हम शरीर , मन व मस्तिश्क से प्रभु स्तवन करें

मानव प्रतिदिन दो काल प्रभु के समीप बैठने वाले बनें ।

डा.अशोक आर्य मानव प्रतिदिन दो काल प्रभु के समीप बैठने वाले बनें । सम्पूर्ण दिन भर वृद्धि पूर्वक कर्मों को करते हुये , जो भी कार्य करें, उसे प्रभु चरणॊं में अर्पण करदें । प्रात:काल हम शक्ति की याचना करते हुये मांगें कि हम बुद्धि पूर्वक कर्मों को करने वाले बनें । इस बात को इस मन्त्र र्में इस प्रकार प्रकट किया गया है : – उपत्वाग्नेदिवेदिवेदोषावस्तर्धियावयम्। नमोभरन्तएमसि॥ ऋ01.1.7 || विगत मन्त्र में जो समर्पण का भाव प्रकट किया गया था , उसे ही यहां फिर से प्रकट किया गया है । मन्त्र कह रहा है कि हे अग्ने ! हे सब को आगे बढाने वाले प्रभो ! , सब कुछ प्राप्त कराने वाले प्रभो ! हम प्रतिदिन प्रात: व … Continue reading मानव प्रतिदिन दो काल प्रभु के समीप बैठने वाले बनें ।

प्रभु को जानने की कामना से सोम रक्षण करें

ओउम प्रभु को जानने की कामना से सोम रक्षण करें डा अशोक आर्य विषयों में उलझा मानव साधारण रुप में प्रभु को स्मरण नहीं करता । हम सदा प्रभु को जानने की इच्छा करते हुए इस उद्देश्य को पाने के लिए अपने शरीर में सदा सोम की रक्षा करें । इस तथ्य को ऋग्वेद के अष्टम मंडल की ऋचा संख्या 91 के मन्त्र संख्या तीन में इस प्रकार व्यक्त किया गया है : – आ चन त्वा चिकित्सामो$धि चन त्वा नेमसी । शनैरिव शनकैरिवेन्द्रायेन्दो परी स्रव।। ऋ ग्वेद .91.3 ।। मन्त्र प्रकाश डालते हुए बता रहा है कि हे प्रभो ! हम सदा आपको ही जानने की इच्छा करते हैं , आप को ही जानने की कामना करते हैं , … Continue reading प्रभु को जानने की कामना से सोम रक्षण करें

आर्य मंतव्य (कृण्वन्तो विश्वम आर्यम)