Category Archives: आर्य समाज

प्रार्थना: – नाथूराम शर्मा ‘शङ्कर’

।।१।।

द्विज वेद पढ़ें, सुविचार बढ़ें, बल पाय चढें़, सब ऊपर को,

अविरुद्ध रहें, ऋजु पन्थ गहें, परिवार कहें, वसुधा-भर को,

धु्रव धर्म धरें, पर दु:ख हरें, तन त्याग तरें, भव-सागर को,

दिन फेर पिता, वरदे सविता, करदे कविता, कवि शंकर को।

।।२।।

विदुषी उपजें, क्षमता न तजें, व्रत धार भजें, सुकृती वर को,

सधवा सुधरें, विधवा उबरें, सकलंक करें, न किसी घर को,

दुहिता न बिकें, कुटनी न टिकें, कुलबोर छिकें, तरसें दर को,

दिन फेर पिता, वरदे सविता, करदे कविता, कवि शंकर को।

।।३।।

नृपनीति जगे, न अनीति ठगे, भ्रम-भूत लगे, न प्रजाधर को,

झगड़े न मचें, खल-खर्ब लचें, मद से न रचें, भट संगर को,

सुरभी न कटें, न अनाज घटें, सुख-भोग डटें, डपटें डर को,

दिन फेर पिता, वरदे सविता, करदे कविता, कवि शंकर को।

।।४।।

महिमा उमड़े, लघुता न लड़े, जड़ता जकड़े, न चराचर को,

शठता सटके, मुदिता मटके, प्रतिभा भटके न समादर को,

विकसे विमला, शुभ कर्म-कला, पकड़े कमला, श्रम के कर को,

दिन फेर पिता, वरदे सविता, करदे कविता, कवि शंकर को।

।।५।।

मत-जाल जलें, छलिया न छलें, कुल फूल फलें, तज मत्सर को,

अघ दम्भ दबें, न प्रपंच फबें, गुरु मान नबें, न निरक्षर को,

सुमरें जप से, निखरें तप से, सुर-पादप से, तुझ अक्षर को,

दिन फेर पिता, वरदे सविता, करदे कविता, कवि शंकर को।

हिन्दू जाति के रोग का वास्तविक कारण क्या है? -भाई परमानन्द

उच्च सिद्धान्त तथा उसके मानने वालों का ‘आचरण’-ये दो विभिन्न बातें हैं। मनुष्य की उन्नति और सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके सिद्धान्त और आचरण में कहाँ तक समता पाई जाती है। जब तक यह समता रहती है, वह उन्नति करता है, जब मनुष्य के सिद्धान्त और आचरण में विषमता की खाई गहरी हो जाती है, तब अवनति आरम्भ हो जाती है। मनुष्य की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि उसका लक्ष्य सदा ऊँचे सिद्धान्तों पर रहता है, परन्तु जब तक उसके आचरण में दृढ़ता नहीं होती, वह उन (सिद्धान्तों) की ओर अग्रसर नहीं हो सकता है, परन्तु संसार को वह यही दिखाना चाहता है कि उन सिद्धान्तों का पालन कर रहा है। इस प्रकार मानव समाज में एक बड़ा रोग उत्पन्न हो जाता है। धार्मिक परिभाषा में इसे ही ‘पाखंड’ कहते हैं। जब कोई जाति या राष्ट्र इस रोग से घिर जाता है तो उसकी उन्नति के सब द्वार बन्द हो जाते हैं और उसके पतन को रोकना असाध्य रोग-सा असम्भव हो जाता है।

हमारे देश में एक प्राचीन प्रथा थी कि जब कोई व्यक्ति ‘उपनिषद्’ आदि उच्च विज्ञान का जिज्ञासु होता था, तो पहले उसके ‘अधिकारी’ होने का निश्चय किया जाता था। ‘अधिकारी’ का प्रश्र बड़ा आवश्यक और पवित्र है। कई बार इसे तुच्छ-सी बात समझा जाता है, परन्तु यदि ध्यान से देखा जाय तो ज्ञात होगा कि ‘अधिकारी’ ‘अनधिकारी’ का प्रश्र प्राकृतिक सिद्धान्तों के सर्वथा अनुकूल है। एक बच्चा चार बरस का है। उसको अपने साथी की साधारण-सी चेष्टायें की बड़ी मधुर अनुभव होती हैं। इनकी विचारशक्ति परस्पर समान है, इसलिये वे परस्पर मिलना और बातें करना चाहते हैं। गेंद को एक स्थान से उठाया और दूसरे स्थान पर फैं क दिया। यह काम उन्हें बहुत वीरतापूर्ण प्रतीत होता है। दो-चार बरस पश्चात् इसी गेेंद जैसी तुच्छ बातों से उनकी रुचि हट जाती है। अब वे रेत या पत्थरों के छोटे-छोटे मकान बनाने में रुचि दिखाते हैं, ठीकरों और कंकरों से वे खेलना चाहते हैं। और ऐसे खेलों में वे इतने लीन रहते हैं कि घर और माँ-बाप का ध्यान उन्हें नहीं रहता। फिर कुछ बरस पश्चात् उनकी रुचि शारीरिक खेलों की ओर हो जाती है और पुराने खेलों को अब वे बेहूदा बताने लगते हैं।। युवावस्था में उन्हें गृहस्थ की समझ उत्पन्न हो जाती है और अब सांसारिक कार्यों में उलझ जाते हैं। धीरे-धीरे उनके मन में इस संसार से विराग और धर्म में प्रवृत्ति का आविर्भाव होता है और त्याग व बलिदान के सिद्धान्तों को समझने की शक्ति उत्पन्न होती है। इससे यह स्पष्ट है कि प्रत्येक सिद्धान्त को समझने के लिये ‘अधिकारी’ होना आवश्यक है। आज की किसी भी सभा में-चाहे वह धार्मिक हो या राजनैतिक, ९० प्रतिेशत श्रोताओं को वक्ता की बातों में रस नहीं आता। बच्चों या बच्चों के से स्वभाव वाले बड़े-बूढ़ों को भी वही बात पसन्द आती है, जिस पर लोग हँसें या तालियाँ पीट दें, अतएव अनधिकारी के सन्मुख ऊँचे सिद्धान्तों का वर्णन करना भी प्राय: हानिकारक होता है।

जब किसी जाति या राष्ट्र में उन्नति की अभिलाषा उत्पन्न हो तो इसको कार्य रूप में परिणत करने का प्रथम आवश्यक साधन उसके व्यक्तियों के आचरण की दृढ़ता है। चरित्र जितना अधिक उच्च और भला होगा, उतनी ही शीघ्रता से उच्च और भले विचार बद्धमूल होंगे। ‘चरित्र’ के खेत को भली भाँति तैयार किये बिना उच्च विचार रूपी बीज बिखेरना, ऊसर भूमि में बीज फैं कने के समान ही व्यर्थ होगा। उच्च विचारों की शिक्षा देने के साथ-साथ आचरण और चरित्र को ऊँचा रखने का विचार अवश्य होना चाहिये, अन्यथा चरित्र के भ्रष्ट होने के साथ-साथ यदि उच्च विचारों की बातें ही रहीं तो ‘पाखंड’ का भयानक रोग लग जाना स्वाभाविक हो जायेगा।

यह पाख्ंाड हिन्दुओं में कै से उत्पन्न हुआ और किस प्रकार भीतर-ही-भीतर दीमक की भाँति यह हिन्दू समाज को खोखला कर रहा है-यह बात में यहाँ दो-तीन उदाहरणों से स्पष्ट करता हँू। ‘तपस्या’ का अर्थ आजकल की भाषा में नियन्त्रित किया जा सकता है, लेकिन जिस युग में हिन्दू जाति के पुरुषों ने ‘तपस्या’ को जीवन का महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त निर्दिष्ट किया था, वे इसके महत्त्व को जानते हुए यह भी समझते थे कि जिन लोगों को इसका उपदेश दिया जा रहा है, वे भी इसके महत्त्व को समझते हैं और इन्द्रिय दमन व मन के वशीकरण को आचरण में लाना ‘तपस्या’ का लक्ष्य समझते हैं। समय आया कि जब लोग इस तप को कुछ से कुछ समझने लगे और अब तप इसलिये नहीं किया जाता कि अपने मन को वश में करना है, अपितु इसलिये कि संसार को दिखा सकें कि हम ‘बड़े तपस्वी’ हैं। आग की धूनी लगाकर बैठ गये। कभी एक हाथ ऊँचा उठा लिया, कभी दूसरा और लोगों में प्रसिद्ध कर दिया कि हम बड़े तपस्वी हैं। ‘तप’ सिद्धान्त रूप में बहुत ऊँचा सिद्धान्त है, परन्तु यह जिन लोगों के लिये है, उनका आचरण गिर गया। ‘सिद्धान्त’ और ‘आचरण’ में विषमता होने के कारण पाखण्ड आरम्भ हो गया और आज हजारों-लाखों स्त्री-पुरुष इस पाखंड के शिकार हैं। ‘त्याग’ को ही लीजिये। ‘त्याग’ के उच्च सिद्धान्त पर आचरण करने के स्थान पर आज लाखों व्यक्तियों ने इसलिये घर-बार छोड़ रखा है कि वे गृहस्थ-जीवन की कठिनाइयों को सहन नहीं कर सकते। वे त्यागियों का बाना धारण कर दूसरों को ठगने का  काम कर रहे हैं। कितनों ही ने न केवल सांसारिक इच्छाओं का त्याग नहीं किया, अपितु इनकी पूर्ति के लिये प्रत्येक अनुचित उपाय का सहारा किया है। जाति की पतितावस्था में ‘त्याग’ का ऊँचा आदर्श एक भारी पाखंड के रूप में रहता है।

देश के लिये बलिदान का आदर्श भी उच्च आदर्श है, परन्तु यदि देशभक्त कहलाने वाले व्यक्ति इसके सिद्धान्त के आचरण में इतने गिर जायें कि वे अपने से भिन्न व विरुद्ध सम्मति रखने वाले व्यक्ति को सम्मति प्रगट करने की स्वतन्त्रता भी न दें, ऐसी देशभक्ति एक प्रकार से व्यवसाय रूपी देशभक्ति है। कई बार ये लोग रुपया उड़ा लेते हैं और फिर इस बात का प्रचार करते हैं कि संसार में कोई भी व्यक्ति रुपये के लालच से नहीं बच सकता, इसलिये जो व्यक्ति इनसे असहमत रहता हो, उसे भी वे अपने ही समान रुपये के लालच में फँसा हुआ बताते हैं। ऐसी अवस्था में देशभक्ति की भावना एक पाखंड का रूप धारण कर लेती है। इसी प्रकार अनाथालय, विधवा आश्रम आदि सब परोपकार और सर्व साधारण की भलाई के कार्यों के नाम पर आज जो रुपया एकत्र होता है, वह सब चरित्र-बल न होने के कारण धोखे की टट्टी बने हुए हैं। ‘निर्वाण’ या ‘मुक्ति’ प्राप्त करने की भावना भी उच्च आदर्श है, परन्तु आज चरित्र-बल न होने से चरित्रहीन व्यक्तियों ने इसी ‘निर्वाण’ और ‘मुक्ति’ के नाम पर सैकड़ों अड्डे बना रखे हैं और लाखों नर-नारी इनके फंदे में फँस कर भी गर्व करते हैं।

यदि मुझसे कोई पूछे कि हिन्दू जाति की निर्बलता और उसके पतन का वास्तविक कारण क्या है? तो मेरा एक ही उत्तर होगा कि इस रोग का वास्तविक कारण यह ढोंग है। हिन्दुओं में प्रचलित इस ‘ढोंग’ से यह भी प्रमाणित होता है कि किसी युग में हिन्दू जाति का चरित्र और आचरण बहुत ऊँचा था और इसीलिये उन्हें ऊँचे आदर्श की शिक्षा दी जाती थी, परन्तु पीछे से घटना क्रम के वश हिन्दू जाति का आचरण गिरता गया और ‘सिद्धान्त’ शास्त्रों में सुरक्षित रहने के कारण ऊँचे ही बने रहे। व्यक्ति इन सिद्धान्तों के अनुकूल आचरण न रख सके, फिर भी उनकी यह इच्छा बनी रही कि संसार यह समझे कि उनका जीवन उन्हीं ऊँचे आदर्शों के अनुसार है। इस प्रकार ‘सिद्धान्त और आचरण’ अथवा ‘आदर्श’ और ‘चरित्र’ में विभिन्नता हो जाने के कारण ‘दिखावा’ या ‘ढोंग’ का रोग लग गया। इस समय यह ‘ढोंग’ दीमक के समान जाति की जड़ों में लगा हुआ है। इस जाति के उत्थान का यत्न करने की इच्छा रखने वाले के लिये आवश्यक है कि वह पहले इस ‘पाखंड वृत्ति’ को निकाल फैंके। यदि हम अपने आचरण या चरित्र को ऊँचा नहीं बना सकते तो उच्च आदर्शों का लोभ त्याग कर अपने आचरणों के अनुसार ही आदर्श को अपना लक्ष्य बनायें।

आर्य समाज और राजनीति: – भाई परमानन्द

मैंने पिछले ‘हिन्दू’ साप्ताहिक में यह बताने का प्रयत्न किया था कि यदि आर्यसमाज को एक धार्मिक संस्था मान लिया जाये, तब भी आर्यसमाज के नेताओं को उसके उद्देश्य को दृष्टि में रखते हुए यह निर्णय करना होगा कि उनका सम्बन्ध हिन्दू सभा से रहेगा या कांग्रेस की हिन्दू विरोधी राष्ट्रीयता से? इस कल्पित सिद्धान्त को दूर रखकर इस लेख में यह बताने का प्रयत्न करूँगा कि क्या आर्य समाज कोरी धार्मिक संस्था है या उसका राजनीति के साथ गहरा सम्बन्ध और उसका एक विशेष राजनीति आदर्श है।

इण्डियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना करने वाली, जैसा मैं कह चुका हूँ, स्वयं सरकार थी। उसके सामने पूर्ण स्वतन्त्रता अथवा उसकी पुष्टि का दृष्टिकोण हो ही नहीं सकता था। उसके सामने सबसे बड़ा उद्देश्य यही था और उसका सारा आन्दोलन इसी आधार पर किया जाता था कि ब्रिटिश साम्राज्य का एक भाग होने से उसे किस प्रकार के राजनीतिक अधिकार मिल सकते हैं और उनको प्राप्त करने के लिये कौन-से साधन काम में लाये जाने आवश्यक हैं? कांग्रेस के पूर्व भारत में जो राजनीतिक आन्दोलन चलाये गये, वे गुप्त रूप से चलते थे और उनका उद्देश्य देश को इंग्लैण्ड के बन्धन से मुक्त करना था। कांग्रेस स्थापित करने का उद्देश्य इस प्रकार के गुप्त आन्दोलनों को रोकना और देश की राजनीतिक रुझान रखने वाली संस्थाओं को एक नया मार्ग बताना था। इसका परिणाम यह हुआ कि हमारे लिए राजनीति के दो भेद हो गये। एक तो बिल्कुल पुराना था, जिसका उद्देश्य स्वतन्त्रता प्राप्त करके हिन्दुस्तान में स्वतन्त्र राज्य स्थापित करना था। दूसरा वह था, जिसका आरम्भ कांग्रेस से हुआ और जिसकी चलाई हुई राजनीति को वर्तमान राजनीति कहा जाता है।

राजनीति के इन दो भेदों को पृथक्-पृथक् रखकर हमें इस प्रश्न पर विचार करने की आवश्यकता है कि आर्यसमाज का इन दोनों के साथ किस प्रकार का सम्बन्ध था। इस प्रश्न पर विचार करने के लिए मंै उन आर्य समाजियों से अपील करूँगा, जिनका सम्बन्ध आर्यसमाज से पुराना है। दु:ख है इस प्रश्न पर कि वे नवयुवक, जो कांग्रेस के जोर-शोर के जमाने में आर्यसमाज में शामिल हुए हैं, विचार करने की योग्यता नहीं रखते। जहाँ तक मैं जानता हूँ, बीसवीं शताब्दी के आरम्भ तक आर्यसमाजी यह समझते थे कि उनका आन्दोलन केवल धार्मिक सुधार ही नहीं कर सकता, वरन् उसके द्वारा देश को उठाया जा सकता है। उनकी दृष्टि में कांग्रेस का कोई महत्त्व ही न था। कांग्रेस केवल प्रतिवर्ष बड़े दिनों की छुट्टियों में किसी बड़े शहर में अपनी कुछ माँगे लेकर उनके सम्बन्ध में कुछ प्रस्ताव पास कर लिया करती थी। उसके द्वारा जनता में राजनीतिक अधिकारों की चर्चा अवश्य होती थी, परन्तु इससे बढक़र किसी भी कांग्रेसी से देशभक्ति अथवा त्याग की आशा नहीं की जा सकती थी। सन् १९०१ ई. में कांग्रेस का अधिवेशन लाहौर में हुआ। उसके प्रधान बम्बई के वकील चन्द्राधरकर थे। उन्हें लाहौर में ही वह तार मिला कि वह बम्बई हाईकोर्ट के जज बना दिये गये हैं। कांग्रेस के मुकाबले में आर्यसमाजी समझते थे कि धर्म और देश के लिए प्रत्येक प्रकार का बलिदान करना उनका कत्र्तव्य है। आर्यसमाज में स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग का खुलमखुला प्रचार किया जाता था। सन् १८९२ में राय मूलराज एक मासिक पत्र ‘स्वदेशी वस्तु प्रचारक’ निकाला करते थे। आरम्भ से ही आर्यसमाज में एक गीत गाया जाता था, जिसकी टेक थी-

‘अगर देश-उपदेश, हमें ना जगाता।

तो देश-उन्नति का, किसे ध्यान आता।।’

भजनीक अमीचन्द की ये पंक्तियाँ सन् १८९० के लगभग की है। आर्यसमाजी इस बात को बड़े गर्व से याद करते थे कि किसी समय में आर्यों का ही सारे संसार में राज्य था। स्वामी दयानन्द ने अपनी छोटी-सी पुस्तक ‘आर्याभिविनय’ में वेद-मन्त्रों द्वारा ईश्वर से प्रार्थना की है कि हमें चक्रवर्ती राज्य प्राप्त हो। स्वामी जी का ‘सत्यार्थ प्रकाश’ देखिये, उसमें मनुस्मृति के आधार पर आर्यों के राजनीतिक आदर्श बताते हुए लिखा है कि आर्यों का राज्यप्रबन्ध किस लाईन पर हो और उसके चलाने के लिए कौन-कौन सी सभायें हों? मुझे प्रसन्नता है कि आर्यसमाज में अब भी ऐसे व्यक्ति उपस्थित हैं, जो अपने इस आदर्श को भूले नहीं हैं और यदि मैं गलती नहीं करता तो वे इसे स्थापित रखने के लिए राजार्य सभा के नाम से आर्यों की एक राजनीतिक संस्था स्थापित कर रहे है। मैं समझता हूँ कि कोई भी पुराना आर्यसमाजी इस वास्तविकता से इंकार नहीं करेगा, जबकि कांग्रेस को कोई महत्त्व प्राप्त नहीं था, तब आर्यसमाज में देशभक्ति पर व्याख्यान होते थे और आर्यसमाजियों में जहाँ वैदिक धर्म को पुनर्जीवित करने की भावना पाई जाती थी, वहाँ देश को उन्नत करने का भाव भी उनमें बड़े जोरों से हिलोरे लेता दिखाई देता था। हाँ, इस भाव में यह ध्यान अवश्य रहता था कि देश धर्म-प्रचार द्वारा ही उठाया जा सकता है। दो-चार साल बाद आर्यसमाज के जीवन में विचित्र घटना घटी। पाँच-छ: महीने सरकार के विरुद्ध बड़ा भारी आन्दोलन जारी रहा। इसमें लाला लाजपतराय का बहुत बड़ा भाग था। लाला लाजपतराय आर्यसमाज के एक बड़े प्रसिद्ध नेता माने जाते थे। पंजाब सरकार को यह संदेह हुआ कि जहाँ कहीं आर्यसमाज है, वहाँ सरकार के विरुद्ध विद्रोह का एक केन्द्र बना हुआ है। इस आन्दोलन का परिणाम यह हुआ कि लाला लाजपतराय गिरफ्तार करके देश से निकाल दिये गये और सरकार ने आर्यसमाज पर दमन किया। इस पर आर्यसमाज के कुछ नेताओं ने पंजाब के गवर्नर से भेंट करके कहा कि आर्यसमाज का न तो राजनीति से सम्बन्ध है और न लाला लाजपतराय के राजनीतिक कार्यों से। इस समय आर्यसमाजी नेताओं की दुर्बलता पर घृणा प्रकट की जाती थी और कहा जाता था कि उन्होंने लाला लाजपतराय के साथ कृतघ्नता की है और वह सरकार से डर गये हैं। मैं इसके सम्बन्ध में कुछ कहना नहीं चाहता। केवल यही कहना है कि यह एक वास्तविकता थी कि आर्यसमाज की नीति बराबर यही थी कि आर्यसमाज सामयिक आन्दोलन से कोई सम्बन्ध न रखे, यद्यपि महात्मा मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानन्द) ने बड़े जोर से लिखा था कि लाला लाजपतराय आर्यसमाजी हैं और आर्यसमाज के लिये यह उचित नहीं था कि वह इस समय उन्हें छोड़ दे। इस घटना से और इसके पहले और पीछे की दूसरी घटनाओं से यह प्रभाव पड़ा कि आर्यसमाज राजनीति से पृथक् होकर केवल धार्मिक समस्याओं पर ही अधिक जोर देने लगा। इसका कारण यह था कि आर्यसमाज ने आरम्भिक राजनीति और सामयिक आन्दोलन के भेद को उपेक्षित कर दिया था।

गाँधी जी के कांग्रेस में आ जाने से कांग्रेस और भारत की राजनीति में एक बड़ा भारी परिवर्तन हो गया, स्पष्टत: जिन वस्तुओं ने लोगों को कांग्रेस की ओर खींचा, वह उनका स्वराज्य आन्दोलन और असहयोग आन्दोलन थे। जहाँ-जहाँ जन-साधारण गाँधी जी की ओर आकर्षित हुए, वहाँ-वहाँ आर्य समाजियों पर भी इनके आन्दोलन का प्रभाव पड़ा। जनता साधारणत: युद्ध की भावना को पसन्द करती है, इसलिये उसने गाँधी जी को इन आन्दोलन का नेता मान लिया। प्रारम्भिक दृष्टि से गाँधी जी के विचार आर्यसमाज से विरुद्ध ही न थे, अपितु बहुत ही विरुद्ध थे। इन आन्दोलनों के हुल्लड़ के नीचे यह विरोध छिपा रहा। गाँधी जी आर्य समाज की नीति विशेषता से अनभिज्ञ ही नहीं थे, वरन वह उसे सहन भी नहीं कर सकते थे। उनकी राजनीति का प्रारम्भिक सिद्धान्त यह था कि हिन्दुस्तान में हिन्दू रहे तो क्या और मुसलमान हुए तो क्या? बस, देश को स्वतन्त्र हो जाना चाहिए। उनको  कई ऐसे श्रद्धालु मिल गये, जिन्हें हिन्दूधर्म और हिन्दू संस्कृति से न सम्बन्ध था, न प्रेम था। कांग्रेस के चलाये हुए नये सिद्धान्त ने हिन्दुओं के पढ़े-लिखे भाग पर अपना असर कर लिया। मुझे दु:ख इतना ही है कि आर्यसमाजी भी इस हुल्लड़ के असर से न बच सके। इस प्रभाव में आकर आर्यसमाजी यह समझने लगे हैं कि उनकी राजनीतिक स्वतन्त्रता की समस्या कांग्रेस के हाथ में है। आर्यसमाज का काम धार्मिक है। वह आर्यसमाज का धर्म पालते हुए कांग्रेसी रह सकते हैं। मैं कहता हूँ कि गाँधी जी अथवा पण्डित जवाहरलाल द्वारा दिलायी हुई स्वतन्त्रता हिन्दू धर्म के लिए वर्तमान गुलामी से कही अधिक त्रासदायी सिद्ध होगी, क्योंकि आर्यसमाज की स्वतन्त्रता का आदर्श इन कांग्रेसी नेताओं की स्वतन्त्रता के आदर्श से बिलकुल प्रतिकूल है। यह कांग्रेसी वैदिकधर्म को मिटाकर हिन्दू जाति की भस्म पर स्वतन्त्रता का भवन स्थापित करना चाहते हैं। यदि वैदिक धर्म और हिन्दू जाति न रहे, तो मेरी समझ में नहीं आता कि आर्यसमाजी उनकी राजनीति के साथ कैसे सहानुभूति रख सकते हैं?

हैदराबाद की घटना अभी-अभी हमारे सामने हुई है। कांग्रेस ने आर्यसमाज के आन्दोलन का विरोध किया और वह आरम्भ से अन्त तक विरुद्ध ही रहा। हमारे प्रभाव में आकर आर्यसमाजी पत्रों ने अपनी माँगों का विज्ञापन रोज-रोज करना आवश्यक समझा हमारी तीन माँगें धार्मिक थीं, अर्थात् आर्यसमाज को हवन करने, ओ३म् का झण्डा फहराने और आर्यसमाज के प्रचार करने की स्वतन्त्रता हो। उन्होंने अपने-आपको हिन्दुओं के आन्दोलन से इसलिए पृथक् रखा कि जिससे यह कांग्रेस के हाईकमाण्ड को खुश रख सकें और हिन्दुओं के आन्दोलन के साथ मिल जाने से कहीं आर्यसमाज साम्प्रदायिक न बन जाये। इस मुस्लिम परस्त कांग्रेस से उन्हें इतना डर था कि सार्वदेशिक सभा के दो पदाधिकारी दिन-रात दौड़ते फिरे, जिससे गाँधी जी को यह विश्वास दिला सके कि उनका आन्दोलन पूर्णत: धार्मिक है- वह न राजनीतिक है, न साम्प्रदायिक। इन्होंने छ: महीने में एक हजार रुपया खर्च करके गाँधी जी को यह विश्वास दिलाया कि आर्यसमाजियों का यह आन्दोलन धार्मिक है, इसलिए कुछ आर्यसमाजियों ने उन्हें आकाश पर चढ़ा दिया। गाँधी जी को बार-बार धन्यवाद देना आरम्भ कर दिया कि उन्होंने आर्यसमाज का इस सम्बन्ध में विश्वास करके आर्यसमाज की बड़ी भारी सेवा की। मुझे इससे दु:ख होता है। दु:ख केवल इसलिए है कि ये आर्यसमाजी समझते हैं कि गाँधी जी की राजनीति ईश्वर का इल्हाम है, इसलिए इसके सामने अपने पवित्र सिद्धान्त छोड़ देना आर्यसमाजियों का अनिवार्य कत्र्तव्य है।

रक्तसाक्षी पंडित लेखराम “आर्य मुसाफिर”

जन्म– आठ चैत्र विक्रम संवत् १९१५ को ग्राम सैदपुर जिला झेलम पश्चिमी पंजाब |
पिता का प.तारासिंह व माता का नाम भागभरी(भरे भाग्यवाली]) था | १८५० से १८६० ई. एक एक दशाब्दि में भारत मेंकई नर नामी वीर, जननायक नेता व विद्वान पैदा हुए | यहाँ ये बताना हमारा कर्त्तव्य है कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम के हुतात्मा खुशीरामजी का जन्म भी सैदपुर में ही हुआ था | वे भी बड़े दृढ़ आर्यसमाजी थे | आर्यसमाज के विख्यात दानी लाला दीवानचंदजी इसी ग्राम में जन्मे थे | पण्डितजी के दादा का पं.नारायण सिंह था | आप महाराजा रणजीतसिंह की सेना के एक प्रसिद्द योध्या थे |
आर्यसमाज में पण्डितजी का स्थान बहुत ऊँचा है | धर्मरक्षा के लिए इस्लाम के नाम पर एक मिर्जाई की छूरी से वीरगति पाने वाली प्रथम विभूति पं.लेखराम ही थे | आपने मिडिल तक उर्दू फ़ारसी की शिक्षा अपने ग्राम में व पेशावर में प्राप्त की | फ़ारमुग़लकाल के बाद सी के सभी प्रमाणिक साहित्यिक ग्रन्थों को छोटी सी आयु में पढ़ डाला | अपने चाचा पं.गण्डाराम के प्रभाव में पुलिस में भर्ती हो गए | आप मत, पन्थो का अध्ययन करते रहे | प्रसिद्द सुधारक मुंशी कन्हैयालाल जी के पत्र नीतिप्रकाश से महर्षि दयानन्द की जानकारी पाकर ऋषि दर्शन के अजमेर गए | १७ मई १८८१ को अजमेर में ऋषि के प्रथम व अंतिम दर्शन किये, शंका-समाधान किया | उपदेश सुने और सदैव के लिए वैदिक-धर्म के हो गए |

सत्यनिष्ठ धर्मवीर, वीर विप्र लेखरामजी का चरित्र सब मानवों के लिए बड़ा प्रेरणादायी है | इस युग में विधर्मियों की शुद्धि के लिए सबसे अधिक उत्साह दिखाने वाले पं.लेखराम ही थे, इस कार्य के लिए उन्होंने अपना जीवन दे दिया| आज हिन्दू समाज उनके पुनीत कार्य को अपना रहा है | परन्तु खेद की बात है कि आर्यसमाज मन्दिरों के अतिरिक्त किसी हिन्दू के घर या संघठन में पण्डितजी का चित्र नही मिलता | आर्यों की संतान इन हिन्दुओं को नही भूलना चाहिए कि विदेशी शासकों के पोषक व प्रबल समर्थक इन्हीं मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने अपनी एक पुस्तक में हिन्दुओं को “सैदे करीब” लिखा था | इसका अर्थ है कि हिन्दू तो मुसलमानों की पकड़ में शीघ्र आनेवाला शिकार है |

पण्डितजी अडिग ईश्वरविश्वासी, महान मनीषी, स्पष्ट वक्ता, आदर्श धर्म-प्रचारक, त्यागी तपस्वी, लेखक, गवेषक, और बड़े पवित्र आत्मा थे | एक बार पण्डितजी ने आर्यसमाज पेशावर के मंत्री श्री बाबू सुर्जनमल के साथ अफगानिस्तान में ईसाई मत के प्रचारक पादरी जोक्स से पेशावर छावनी में भेंट की | पादरी महोदय ने कहा कि बाइबिल में ईश्वर को पिता कहा गया है | ऐसी उत्तम शिक्षा अन्यत्र किसी ग्रन्थ में नहीं है | पण्डितजी ने कहा “ऐसी बात नही है | वेद और प्राचीन आर्य ऋषियों की बात तो छोड़िये अभी कुछ सौ वर्ष पहले नानकदेव जी महाराज ने भी बाइबिल से बढ़कर शिक्षा दी है| पादरी ने पूछा कहाँ है ?? पण्डितजी ने कहा देखिये—

तुम मात पिता हम बालक तेरे |
तुमरी किरपा सुख घनेरे || “

यहाँ ईश्वर को पिता ही नही माता भी कहा गया है| ये शिक्षा तो बाइबिल की शिक्षा से भी बढ़कर है| माता का प्रेम पिता के प्रेम से कहीं अधिक होता है | इसीलिए ईसा मसीह को युसूफ पुत्र न
कहकर इबने मरियम (मरियम पुत्र) कहा जाता है | ये सुनकर पादरी महोदय ने चुप्पी साध ली | इसी प्रकार अजमेर में पादरी ग्रे(Grey) ने भी इसी प्रकार का प्रश्न उठाया तब पण्डितजी ने यजुर्वेद
मंत्र संख्या ३२/१० का प्रमाण देकर उनकी भी बोलती बंद कर दी थी |

रोपड़ के पादरी पी सी उप्पल ने एक राजपूत युवक को बहला-फुसलाकर ईसाई बना लिया, पण्डितजी को सुचना मिली तो वे रोपड़ पहुंचे, तब तक रोपड़ के दीनबंधु सोमनाथजी ने उसे शुद्ध कर लिया था | पण्डितजी ने रोपड़ पहुंचकर मंडी में लगातार कई दिन तक बाइबिल पर व्याख्यान दिए | पादरी उप्पल को लिखित व मौखिक शास्त्रार्थ के लिए निमंत्रण दिया | उप्पल महोदय ने चुप्पी साध ली | घटना अप्रैल १८९५ की है |

मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने ‘सत बचन’ नाम से एक पुस्तक छापी | उसमें यह सिद्ध करने का यत्न किया कि बाबा नानकदेवजी पक्के मुसलमान थे | इस पुस्तक के छपने पर सिखों मरण बड़ी हलचल
मची | तब प्रतिष्ठित सिखों ने पण्डितजी से निवेदन किया वे इसका उत्तर दें | उस समय पण्डितजी के सिवा दूसरा व्यक्ति इसका उत्तर देने वाला सूझता भी नही था | बलिदान से पूर्व इस विषय पर एक ओजस्वी व खोजपूर्णव्याख्यान देकर मिर्ज़ा साहेब की पुस्तक का युक्ति व प्रमाणों से प्रतिवाद किया| भारी संख्या में सिख उन्हें सुनने आये, सेना के सिख जवान भी बहुत बड़ी संख्या में वहां उपस्थित थे | आपके व्याख्यान के पश्चात् सेना के वीर सिख जवानों ने पण्डितजी को ऐसे उठा लिया जैसे पहलवान को विजयी होने पर उसके शिष्य उठा लेते हों |

पं.लेखरामजी धर्म रक्षा के लिए संकटों, आपत्तियों और विपत्तियों का सामना किया | उनके व्यवहार से ऐसा लगता है कि मानों बड़े से बड़े संकट को भी वो कोई महत्व नही देते थे | उनके पिताजी की मृत्यु हुई तो भी वे घर में न रुक सके | बस गए और चल पड़े | उन्हें भाई की मृत्यु की सूचना प्रचार-यात्रा में ही मिली, फिर भी प्रचार में ही लगे रहे | एक कार्यक्रम के पश्चात् दुसरे और दुसरे के पश्चात् तीसरे में| इकलौते पुत्र की मृत्यु से भी विचलित न हुए | पत्नी को परिवार में छोड़कर फिर चल पड़े | दिन रात एक ही धुन थी कि वैदिक धर्म का प्रचार सर्वत्र करूँ |

पंडित लेखराम तो जैसे साक्षात् मृत्यु को ललकारते थे| कादियां का मिर्ज़ा गुलाम अहमद स्वयं को नबी पैगम्बर घोषित कर रहा था और पण्डितजी को मौत की धमकियाँ दे रहा था | उसने श्रीराम पर
श्रीकृष्ण पर, गौ पर, माता कौशल्या पर, नामधारी गुरु रामसिंह पर, महर्षि दयानन्द, वेद और उपनिषद इत्यादि सब गन्दे-गन्दे प्रहार किये | उसने श्रीकृष्ण महाराज को तो सुअर मारने वाला लिखा |
पर यहाँ पं.लेखराम धर्म पर उसके प्रत्येक वार का उत्तर देते थे | जब पण्डितजी सामने आते तो खुद को शिकारी कहने वाला बिल में छुप जाता | अपने बलिदान से एक वर्ष पूर्व पण्डितजी लाहौर रेलवे स्टेशन के पास एक मस्जिद में पहुंचे, उन्हें पता चला कि मिर्ज़ाजी वहां आये हैं | मिर्ज़ा उनकी हत्या के षड्यंत्रों में लगा था| जाते ही मिर्ज़ा को नमस्ते करके सच और झूठ का निर्णय करने का निमंत्रण दे दिया | विचार करिए जिस व्यक्ति से मृत्यु लुकती-छिपती थी और नर नाहर लेखराम मौत को गली-गली खोजता फिरता था | मौत को ललकारता हुआ लेखराम मिर्ज़ा के घर तक पहुंचा|
कादियां भी मिर्ज़ा के इलहामी कोठे में जाकर उसे ललकारा | आत्मा की अमरता के सिद्धांत को मानकर मौत के दांत खट्टे करने लेखराम जैसे महात्मा विरले होते हैं |

पण्डितजी ने हिन्दू-जाति की रक्षा के लिए क्या नही किया ?? स्यालकोट में सेना के दो सिख जवान मुसलमान बनने लगे | जब सिख विद्वानों के समझाने पर भी वे नही टेल तप सिंघसभा वालों ने
आर्यसमाजियों से कहा पं.लेखराम को शीघ्र बुलाओ | पण्डितजी आये | उन युवकों का शंका-समाधान किया, शास्त्रार्थ हुआ और वे मुसलमान बनने से बचा लिए गए | जम्मू में कोई ठाकुरदास मुसलमान होने लगा तो पण्डितजी ने जाकर उसे बचाया | एल लाला हरजस राय मुसलमान हो गए | ये प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे थे | फारसी, अरबी, अंग्रेजी के बड़े ऊँचे विद्वान थे | हरजस राय का नाम अब मौलाना अब्दुल अज़ीज़ था | वह गुरुदासपुर में Extra Assistant Commisiner रहे थे | यह सबसे बड़ा पद था जो भारतीय तब पा सकते थे | पण्डितजी कृपा से वे शुद्ध होकर पुनः हरजस राय बन गए| एक मौलाना अब्दुल रहमान तो पण्डितजी के प्रभाव से सोमदत्त बने | हैदारबाद के एक योग्य मौलाना हैदर शरीफ पर आपके साहित्य का ऐसा रंग चढ़ा कि हृदय बदल गया | वे वैदिक धर्मी बन गए |
मौलाना शरीफ बहुत बड़े कवि थे |

एक बार पण्डितजी प्रचारयात्रा से लाहौर लौटे तो उन्हें पता चला कि मुसलमान एक अभागी हिन्दू युवती को उठाकर ले गए हैं | पण्डितजी ने कहा मुझे एक सहयोगी युवक चाहिए मैं उसे खोजकर लाऊंगा | पण्डितजी युवक को लेकर मस्जिदों में उसकी खोज में निकले | उन्होंने एक बड़ी मस्जिद में एक लड़की को देखा | भला मस्जिद में स्त्री का क्या काम ? यह आकृति में ही हिन्दू दिखाई दी | पण्डितजी ने उसकी बांह पकड़कर कहा “चलो मेरे साथ |” शूर शिरोमणि लेखराम भीड़ को चीरकर उस अबला को ले आये | आश्चर्य की बात तो यह है कि उस नर नाहर को रोकने टोकने की उन लोगों की हिम्मत ही न हुई |
इसी कारण देवतास्वरूप भाई परमानन्द जी कहा करते थे कि डर वाली नस-नाड़ी यदि मनुष्यों में कोई होती है तो पं.लेखराम में वो तो कत्तई नही थी |

पं.लेखराम जी ने ‘बुराहीने अहमदियों’ के उत्तर में ‘तकजीबे बुराहीने अहमदिया’ ग्रन्थ तीन भागों में प्रकाशित करवाया | इसके छपने के साथ ही धूम मच गयी | ईसाई पत्रिका ‘नूर अफशां’ में भी इसकी समीक्षा करते हुए पण्डितजी की भूरी-भूरी प्रशंसा की | पण्डितजी इस मामले में आर्य समाज में एक परम्परा के जनक भी हैं, विरोधी यदि कविता में आर्य-धर्म पर प्रहार करते थे तो पण्डितजी कविता में ही उत्तर देते थे | जिस छंद में प्रहारकर्ता लिखता, पण्डितजी उसी छंद में लिखते थे |

मिर्ज़ा गुलाम अहमद कादियानी ने पण्डितजी को मौत की धमकियाँ देकर वेद-पथ से विचलित करना चाहा| पण्डितजी ने सदा यही कहा मुझे जला दो, मार दो, काट दो, परन्तु मैं वेद पथ से मुख नही मोड़ सकता | इसी घोष के अनुसार एक छलिया उनके पास शुद्धि का बहाना बनाकर आया | उनका नमक खता रहा | उनका चेला बनने का नाटक किया | पण्डितजी महर्षि दयानन्द का जीवन चरित्र लिखते-लिखते थक गए तो अंगडाई ली | अंगड़ाई लेते हुए अपनी छाती को खोला तो वो नीच वहीँ बैठा था, उसने कम्बल में छुरा छुपा रखा था | क्रूर के सामने शूर का सीना था, पास कोई नही था | उस कायर ने पण्डितजी के पेट में छूरा उतार दिया और भाग निकला | वो तारीख थी ६ मार्च १८९७ |

उपसंहार—धर्मवीर पं.लेखराम की महानता का वर्णन करने में लेखनी असमर्थ है | स्वामी श्रद्धानंद जैसे नेता उनका अदब मानते थे | सनातन धर्म के विद्वान और नेता पं.दीनदयाल व्याख्यान वाचस्पति कहते थे कि पं.लेखराम के होते हुए कोई भी हिन्दू जाति का कुछ नही बिगाड़ सकता | ईसाई पत्रिका का सम्पादक उनकी विद्वत्ता पर मुग्ध था | उनके बलिदान पर अमेरिका की एक पत्रिका ने उनपर लेख छापा था | ‘मुहम्मदिया पाकेट’ के विद्वान लेखक मौलाना अब्दुल्ला ने तो उन्हें ‘कोहे वकार’ अर्थात गौरव-गिरी लिखा है | पर पण्डितजी का बलिदान व्यर्थ नहीं गया, वेदों को जीवन भर पानी पी पीकर कोसने वाला मिर्ज़ा भी मरते वक़्त वेदों को ईश्वरीय ज्ञान लिखकर जाता है | पण्डितजी हम और क्या लिखे ! अपनी बात को महाकवि ‘शंकर’ के शब्दों में समाप्त करते है—–

धर्म के मार्ग में अधर्मी से कभी डरना नही |
चेत कर चलना कुमारग में कदम धरना नही ||
शुद्ध भावों में भयानक भावना भरना नही |
बोधवर्धक लेख लिखने में कमी करना नहीं ||

सुजीत मिश्र

पंडित मनसाराम जी “वैदिक तोप”

स्वनामधन्य पं॰मनसारामजी ‘वैदिक तोप’ आर्यजगत्‌ की महान विभूतियोँ मेँ अपना स्थान रखते हैँ। पण्डितजी का जन्म 1890 ई॰ हड्डाँवाला नंगल[जाखल के निकट] हरियाणा प्राप्त मेँ हुआ था।

आपके पिता लाला शंकरदासजी अन्न-धन से सम्पन्न, सुखी सद्‌गृहस्थ व्यापारी थे। वे कट्टर मूर्तिपूजक और पौराणिक थे।
पुत्र भी उनके रंग मेँ रंग गया। पण्डितजी की प्राइमरी तक की शिक्षा वामनवाला ग्राम मेँ हुई। तत्पश्चात्‌ टोहाना के मिडल स्कूल मेँ दाखिल हो गये। 1907 मेँ पण्डितजी आठवीँ श्रेणी मेँ प्रविष्ट हुए। इसी वर्ष मेँ पिताजी का देहान्त हो गया। पण्डितजी को स्कूल छोड़कर घर सम्हालना पड़ा।

लाला शंकरदास जी के वहां एक पटवारी श्री रामप्रसादजी रहा करते थे, ये बड़े सदाचारी, मधुरभाषी और निष्ठावान आर्य समाजी थे | जब मनसारामजी घर पर रहने लगे तो वे इनको वैदिक धर्म के सिद्धांतों और तत्वज्ञान से परिचय कराया करते थे | मनसारामजी महाशय रामप्रसादजी के सत्संग से आर्य समाज की ओर आकृष्ट हो गये |
१९०८ में टोहाना में आर्यों और पौराणिकों के बीच एक शास्त्रार्थ हुआ | आर्य समाज के तरफ से पं.राजारामजी शास्त्री ने पक्ष रखा और पौराणिको की ओर से पं.लक्ष्मीनारायण जी थे | श्री उदमीरामजी अध्यक्ष नियुक्त हुए | इस शास्त्रार्थ को देखने वालों में पंडित मनसाराम भी थे | शास्त्रार्थ में पं.राजाराम जी की युक्तियों की धाक पंडित मनसारामजी के मस्तिष्क पर जम गयी | आप आर्य समाज के दीवाने हो गये | अब पं.मनसाराम के मन में संस्कृत अध्ययन की धुन सवार हुई | सर्वप्रथम आप कुरुक्षेत्र की सनातनधर्म पाठशाला में प्रविष्ट हुए | यहाँ से हरिद्वार पहुंचे, संस्कृत अध्ययन की लगन में
आपने गुरुकुल काँगड़ी में चपरासी की नौकरी कर ली, उनका विचार था कि गुरुकुल में एक ओर संस्कृत अध्ययन भी कर लूँगा औरे आर्य समाज की सेवा भी कर लूँगा | पर इनकी मनोकामना
यहाँ भी पूरी न हुई | यहाँ से निराश होकर ये ज्ञानपिपासु विद्या-नगरी काशी में पहुँच गया |

काशी में संस्कृत अध्ययन के कई केन्द्र खुले हुए थे | पर उनमें सिर्फ जन्म के ब्राह्मणों को ही भोजन मिलता था | संस्कृतज्ञान के पिपासु ने कितने दिन भूखे रहकर काटे होंगे, कौन जानता है ? श्रीमनसाराम जी जंगल से बेर तोड़कर लाया करते थे, उन्हें ही खाकर निर्वाह करते
थे | एक दिन वे बेर तोड़ रहे थे, एक सेठ उधर आ निकले | संस्कृत का विद्यार्थी भांपकर सेठ ने पूछा—“क्या कर रहे हो ?” मनसाराम जी ने अपनी समस्या बता दी | सेठ ने पूछा—“केन्द्रों में भोजन क्यूँ नही करते ? मनसाराम जी ने कहा “वहां तो केवल ब्राह्मणों को भोजन मिलता है, मैं तो जन्म से अग्रवाल हूँ |” सेठ की गैरत जागी, वो स्वयं भी ऐसे कई केन्द्रों को दान देता था, उसने मनसाराम जी से कहा “तुम अमुक केन्द्र में जाकर भोजन किया कारो, वहां कोई तुम्हारी जाति नही पूछेगा |”

भोजन की समस्या से निश्चिन्त होकर मनसाराम जी विद्याध्ययन में जुट गए | विद्या समाप्त करके मनसारामजी काशी के पण्डितों के बीच गए और उनके समक्ष एक प्रश्न रखा कि—‘मैं जन्म से अग्रवाल हूँ, मुझे अब पण्डित कहलाने का अधिकार प्राप्त है या नही ? इसपर बड़ा वाद-विवाद हुआ | मनसाराम जी की विजय हुई | उन्हें पण्डित की पदवी प्रदान की गई|

विद्या प्राप्ति के बाद आप कार्यक्षेत्र में उतरे | आपके गहन अध्ययन, तीव्रबुद्धि, और अकाट्य तर्कों के कारण आपकी कीर्ति-चन्द्रिका छिटकने लगी | आर्यसमाज के क्षितिज पर एक नया नक्षत्र अपनी
प्रभा विकीर्ण करने लगा | पण्डितजी सिरसा में धर्म-प्रचार कर रहे थे, उन्ही दिनों स्वामी स्वतंत्रानन्दजी सिरसा पधारे | पण्डितजी की बहुमुखी प्रतिभा से प्रभावित होकर इन्हें आर्य प्रतिनिधिसभा पंजाब की सेवा में ले गए | पण्डितजी ने सारे पंजाब को वैदिक-नाद से गुंजा दिया| शास्त्रार्थ में उनकी विशेष रूचि थी | शास्त्रार्थ-समर के आप विजयी-योध्या थे|

एक बार भिवानी में शास्त्रार्थ हो रहा था, पौराणिकों ने आपको पूरा समय न दिया | नियमानुसार आपने २५ मिनट मांगे | उत्तर में पण्डितजी पर लाठियों से आक्रमण हुआ | जिसपर पण्डितजी ने
एक ट्रैक लिखा “मेरे पच्चीस मिनट” | इस शास्त्रार्थ का टेकचन्दजी पंसारी पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि उसने प्रतिमाएं फ़ेंक और आस्तिक बन गया | आर्यों से भिन्न लोगों पर पण्डितजी की कैसी धाक थी, इस विषय में निम्न घटना अति महत्वपूर्ण है | एक बार रामामंडी में एक जैन विद्वान आये | उनके प्रवचन होने लगे | एक दिन सभा के
अंत में एक किसान वेशधारी ने जैनियों के अहिंसा सम्बन्धी सिद्धांत पर कुछ प्रश्न कर दिए | प्रश्न सुनते ही जैन विद्वान ने कहा—“आप पं.मनसाराम तो नही हैं? ऐसे प्रश्न वे ही कर सकते हैं, साधारण व्यक्ति इतनी गहराई से विचार ही नही कर सकता| सचमुच वे ग्रामीण पण्डितजी ही थे |

उधर २-३ मई १९३१ को आर्यसमाज जाखल के वार्षिकोत्सव पर शास्त्रार्थ रखा गया | इसके अध्यक्ष थे स्वामी स्वतंत्रतानन्द और शास्त्रार्थकर्ता थे पं.लोकनाथजी ‘तर्कवाचस्पति’ |
पण्डितजी ने ‘शास्त्रार्थ-जाखल’ नाम से उर्दू में एक पुस्तक लिखी | पौराणिक बौखला उठे| भारी धन-व्यय करके उन्होंने ‘सनातन-धर्म विजय’ नामक पुस्तक लिखवाई \ पुस्तक क्या थी गाली-गलौज का पुलिन्दा थी | पण्डितजी ने सभ्य भाषा में युक्ति और प्रमाणों से सुभूषित लगभग पांच गुना बड़ा १२२४ पृष्ठों का ग्रन्थ लिखा, जिसका नाम रखा- “पौराणिक पोप पर वैदिक तोप” | इस ग्रन्थ के प्रकाशन होते ही पण्डितजी के नाम की धूम मच गयी और आपका
नाम ही ‘वैदिक तोप’ पड़ गया |

पण्डितजी के तर्क कितने तीखे होते थे, इसका आभास भटिंडा-शास्त्रार्थ से होता है | पण्डितजी ने चार प्रश्न रखे थे—
१- सनातन धर्म में पशुवध आदिकाल से है या बाद की मिलावट है ?
२- नाविक की पुत्री सत्यवती के गर्भ से उत्पन्न व्यास जी का वर्ण पौराणिक-मत के अनुसार क्या है?
३- पौराणिक मत के अनुसार सिख, जाट, स्वर्णकार, और कायस्थ किस वर्ण में हैं ?
४- पौराणिक मत के अनुसार दलित भाई ईसाई-मुसलमानों से अच्छे हैं वा नही ? अच्छे हैं तो उनके साथ अच्छा व्यवहार क्यूँ नही किया जाता ?

पण्डितजी के प्रश्न सुनकर पौराणिक अधिकारी ने कहा—मनसाराम को यहाँ से बाहर निकालो |

संगरूर-शास्त्रार्थ में मृतक-श्राद्ध पर बोलते हुए पण्डितजी ने कहा— ‘मैं भी इस जन्म में कहीं से आया हूँ| यदि मृतकों को श्राद्ध का माल पहुँचता है तो मेरा पार्सल कहाँ जाता है ?

पण्डितजी विद्या के सागर थे, आर्य समाज के मंच व्याख्यान देते तो श्रोताओं से कहते कि किस विषय पर बोलूं, आप जिस पर कहें उसी पर बोलता हूँ| उनके व्याख्यान सैद्द्धान्तिक होते थे|
व्याख्यानों में प्रमाणों की बहुलता होती थी | पण्डितजी ने स्वतंत्रता-आन्दोलन में भी भाग लिया था और कई बार जेल भी गए | १९२२ में
गाँधी द्वारा चलाये गए पहले सत्याग्रह में पण्डितजी जेल गए | उन्हें हिसार जेल में रखा गया | अभियोग के दिनों में आपने एक ऐसी साहसिक बात कही जो किसी भी क्रन्तिकारी की मुख से न निकली होगी | पण्डितजी को मजिस्ट्रेट के आगे पेश किया गया तो आपने पाने मुंह पर कपड़ा डाल लिया | मजिस्ट्रेट ने कारण पूछा तो आपने कहा—“जिस व्यक्ति ने चाँदी के चन्द-ठीकरों के लिए अपने आपको बेच दिया हो, मैं उसकी शक्ल नही देखना चाहता | ये कोर्ट का अपमान था | सत्याग्रह के साथ-साथ एक और अभियोग न्यायालय की मानहानि का भी चलने लगा |

पण्डितजी ने साहित्य भी बहुत लिखा, इनका सारा साहित्य खोजपूर्ण है | पौराणिको के खण्डन में इस साहित्य से उत्तम साहित्य नही लिखा गया | उनके कुछ प्रसिद्ध ग्रन्थ है—
१- पौराणिक पोलप्रकाश
२- पौराणिक पोप पर वैदिक तोप
३- चेतावनी प्रकाश
४- पौराणिक दम्भ पर वैदिक बम्ब

शिवपुराण आलोचना, भविष्यपुराण आलोचना आदि और अनेक ग्रन्थ पण्डितजी ने लिखे थे| दुर्भाग्य से अधिकतर अप्राप्य है | जून ईसवी १९४१ में पण्डितजी परलोक सिधार गए | पण्डितजी का पार्थिव शरीर नही रहा, परन्तु उनका यशरूपी शरीर अजर और अमर है |

सुजीत मिश्र

सरफ़रोशी की तमन्ना

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है।

रहबरे राहे मुहब्बत, रह न जाना राह में
लज्जते-सेहरा न वर्दी दूरिए-मंजिल में है।

आज मक्तल में ये कातिल कह रहा बार-बार,
अब भला शौके-शहादत भी किसी के दिल में है।

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है।

ए शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा गैर की महफ़िल में है।

अब न अगले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़,
एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है ।

कासगंज समाज का ऋणी हूँ :– राजेन्द्र जिज्ञासु

कासगंज समाज का ऋणी हूँ :-
आर्यसमाज के एक ऐतिहासिक व श्रेष्ठ पत्र ‘आर्य समाचार’ उर्दू मासिक मेरठ का कोई एक अंक शोध की चिन्ता में घुलने वाले किसी व्यक्ति ने कभी देखा नहीं। इसके बिना कोई भी आर्यसमाज के साहित्य व इतिहास से क्या न्याय करेगा? श्रीराम शर्मा से टक्कर लेते समय मैं घूम-घूम कर इसका सबसे महत्त्वपूर्ण अंक कहीं से खोज लाया। कुछ और भी अंक कहीं से मिल गये। तबसे स्वतः प्रेरणा से इसकी फाईलों की खोज में दूरस्थ नगरों, ग्रामों व कस्बों में गया। कुछ-कुछ सफलता मिलती गई। श्री यशपाल जी, श्री सत्येन्द्र सिंह जी व बुढाना द्वार, आर्य समाज मेरठ के समाज के मन्त्री जी की कृपा व सूझ से कई अंक पाकर मैं तृप्त हो गया। इनका भरपूर लाभ आर्यसमाज को मिल रहा है। अब कासगंज के ऐतिहासिक समाज ने श्री यशवन्तजी, अनिल आर्य जी, श्री लक्ष्मण जी और राहुलजी के पं. लेखराम वैदिक मिशन से सहयोग कर आर्य समाचार की एक बहुत महत्त्वपूर्ण फाईल सौंपकर चलभाष पर मुझ से बातचीत भी की है। वहाँ के आर्यों ने कहा है, हम आपके ऋणी हैं। आपने हमारे बड़ों की ज्ञान राशि की सुरक्षा करके इसे चिरजीवी बना दिया। इससे हम धन्य-धन्य हो गये। आर्य समाचार एक मासिक ही नहीं था। यह वीरवर लेखराम का वीर योद्धा था। पं. घासीराम जी की कोटि का आर्य नेता व विचारक इसका सपादक रहा। इसमें महर्षि के अन्तिम एक मास की घटनाओं की प्रामाणिक सामग्री पं. लेखराम जी द्वारा सबको प्राप्त हुई। वह अंक तो फिर प्रभु कृपा से मुझे ही मिला। उसी के दो महत्त्वपूर्ण पृष्ठों को स्कै निंग करवाकर परोपकारिणी सभा को सौंपे हैं।
पं. रामचन्द्र जी देहलवी तथा पं. नरेन्द्र जी के जन्मदिवस पर इन अंकों पर एक विशेष कार्य आरभ हो जायेगा। इसके प्रकाशन की व्यवस्था यही मेधावी युवक करेंगे।