Category Archives: आर्य समाज

सरफ़रोशी की तमन्ना

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है।

रहबरे राहे मुहब्बत, रह न जाना राह में
लज्जते-सेहरा न वर्दी दूरिए-मंजिल में है।

आज मक्तल में ये कातिल कह रहा बार-बार,
अब भला शौके-शहादत भी किसी के दिल में है।

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है।

ए शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा गैर की महफ़िल में है।

अब न अगले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़,
एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है ।

कासगंज समाज का ऋणी हूँ :– राजेन्द्र जिज्ञासु

कासगंज समाज का ऋणी हूँ :-
आर्यसमाज के एक ऐतिहासिक व श्रेष्ठ पत्र ‘आर्य समाचार’ उर्दू मासिक मेरठ का कोई एक अंक शोध की चिन्ता में घुलने वाले किसी व्यक्ति ने कभी देखा नहीं। इसके बिना कोई भी आर्यसमाज के साहित्य व इतिहास से क्या न्याय करेगा? श्रीराम शर्मा से टक्कर लेते समय मैं घूम-घूम कर इसका सबसे महत्त्वपूर्ण अंक कहीं से खोज लाया। कुछ और भी अंक कहीं से मिल गये। तबसे स्वतः प्रेरणा से इसकी फाईलों की खोज में दूरस्थ नगरों, ग्रामों व कस्बों में गया। कुछ-कुछ सफलता मिलती गई। श्री यशपाल जी, श्री सत्येन्द्र सिंह जी व बुढाना द्वार, आर्य समाज मेरठ के समाज के मन्त्री जी की कृपा व सूझ से कई अंक पाकर मैं तृप्त हो गया। इनका भरपूर लाभ आर्यसमाज को मिल रहा है। अब कासगंज के ऐतिहासिक समाज ने श्री यशवन्तजी, अनिल आर्य जी, श्री लक्ष्मण जी और राहुलजी के पं. लेखराम वैदिक मिशन से सहयोग कर आर्य समाचार की एक बहुत महत्त्वपूर्ण फाईल सौंपकर चलभाष पर मुझ से बातचीत भी की है। वहाँ के आर्यों ने कहा है, हम आपके ऋणी हैं। आपने हमारे बड़ों की ज्ञान राशि की सुरक्षा करके इसे चिरजीवी बना दिया। इससे हम धन्य-धन्य हो गये। आर्य समाचार एक मासिक ही नहीं था। यह वीरवर लेखराम का वीर योद्धा था। पं. घासीराम जी की कोटि का आर्य नेता व विचारक इसका सपादक रहा। इसमें महर्षि के अन्तिम एक मास की घटनाओं की प्रामाणिक सामग्री पं. लेखराम जी द्वारा सबको प्राप्त हुई। वह अंक तो फिर प्रभु कृपा से मुझे ही मिला। उसी के दो महत्त्वपूर्ण पृष्ठों को स्कै निंग करवाकर परोपकारिणी सभा को सौंपे हैं।
पं. रामचन्द्र जी देहलवी तथा पं. नरेन्द्र जी के जन्मदिवस पर इन अंकों पर एक विशेष कार्य आरभ हो जायेगा। इसके प्रकाशन की व्यवस्था यही मेधावी युवक करेंगे।

भीष्म स्वामी जी धीरता, वीरता व मौन : राजेंद्र जिज्ञासु जी

भीष्म स्वामी जी धीरता, वीरता व मौन :- इस बार केवल एक ही प्रेरक प्रसंग दिया जाता है। नरवाना के पुराने समर्पित आर्य समाजी और मेरे विद्यार्थी श्री धर्मपाल तीन-चार वर्ष पहले मुझे गाड़ी पर चढ़ाने स्टेशन पर आये तो वहाँ कहा कि सन् 1960 में कलायत कस्बा में आर्यसमाज के उत्सव में श्री स्वामी भीष्म जी कार्यक्रम में कूदकर गड़बड़ करने वाले साधु से आपने जो टक्कर ली वह प्रसंग पूरा सुनाओ। मैंने कहा, आपको भीष्म जी की उस घटना की जानकारी कहाँ से मिली? उसने कहा, मैं भी तब वहाँ गया था।
संक्षेप से वह घटना ऐसे घटी। कलायत में आर्यसमाज तो था नहीं। आस-पास के ग्रामों से भारी संख्या में लोग आये। स्वामी भीष्म जी को मन्त्र मुग्ध होकर ग्रामीण श्रोता सुनते थे। वक्ता केवल एक ही था युवा राजेन्द्र जिज्ञासु। स्वामी जी के भजनों व दहाड़ को श्रोता सुन रहे थे। एकदम एक गौरवर्ण युवा लंगडा साधु जिसके वस्त्र रेशमी थे वेदी के पास आया। अपने हाथ में माईक लेकर अनाप-शनाप बोलने लगा। ऋषि के बारे में भद्दे वचन कहे। न जाने स्वामी भीष्म जी ने उसे क्यों कुछ नहीं कहा। उनकी शान्ति देखकर सब दंग थे। दयालु तो थे ही। एक झटका देते तो सूखा सड़ा साधु वहीं गिर जाता।

मुझसे रहा न गया। मैं पीछे से भीड़ चीरकर वेदी पर पहुँचा। उस बाबा से माईक छीना। मुझसे अपने लोक कवि संन्यासी भीष्म स्वामी जी का निरादर न सहा गया। उसकी भद्दी बातों व ऋषि-निन्दा का समुचित उत्तर दिया। वह नीचे उतरा। स्वामी भीष्म जी ने उसे एक भी शब्द न कहा। उस दिन उनकी सहनशीलता बस देखे ही बनती थी। श्रोता उनकी मीठी तीन सुनने लगे। वह मीठी तान आज भी कानों में गूञ्ज रही हैं :-

तज करके घरबार को, माता-पिता के प्यार को,
करने परोपकार को, वे भस्म रमा कर चल दिये……

वे बाबा अपने अंधविश्वासी, चेले को लेकर अपने डेरे को चल दिया। मैं भी उसे खरी-खरी सुनाता साथ हो लिया। जोश में यह भी चिन्ता थी कि यह मुझ पर वार-प्रहार करवा सकता था। धर्मपाल जी मेरे पीछे-पीछे वहाँ तक पहुँचे, यह उन्हीं से पता चला। मृतकों में जीवन संचार करने वाले भीष्म जी के दया भाव को तो मैं जानता था, उनकी सहन शक्ति का चमत्कार तो हमने उस दिन कलायत में ही देखा। धर्मपाल जी ने उसकी याद ताजा कर दी।

काशी शास्त्रार्थ में वेदः- राजेन्द्र जिज्ञासु

काशी शास्त्रार्थ में वेदः-

‘परोपकारी’ के एक पिछले अंक में महर्षि दयानन्द जी द्वारा जर्मनी से वेद संहितायें मँगवाने विषयक आचार्य सोमदेव जी को व इस लेखक को प्राप्त प्रश्नों का उत्तर दिया गया था। कहीं इसी प्रश्न की चर्चा फिर छिड़ी तो उन्हें बताया गया कि सन् 1869 के काशी शास्त्रार्थ में ऋषि जी ने महाराजा से माँग की थी कि शास्त्रार्थ में चारों वेद आदि शास्त्र भी लाये जायें ताकि प्रमाणों का निर्णय हो जाये। इससे प्रमाणित होता है कि वेद संहितायें उस समय भारत में उपलध थीं। पाण्डुलिपियाँ भी पुराने ब्राह्मण घरों में मिलती थीं।
परोपकारी में ही हम बता चुके हैं कि आर्यसमाज स्थापना से बहुत पहले पश्चिमी देशों में पत्र-पत्रिकाओं में छपता रहा कि यह संन्यासी दयानन्द ललकार रहा है, कि लाओ वेद से प्रतिमा पूजन का प्रमाण, परन्तु कोई भी वेद से मूर्तिपूजा का प्रमाण नहीं दे सका। ऋषि यात्राओं में वेद रखते ही थे। हरिद्वार के कुभ मेले में ऋषि यात्राओं में वेद रखते ही थे।

हरिद्वार के कुभ मेले में ऋषि विरोधी पण्डित भी कहीं से वेद ले आये। लाहौर में श्रद्धाराम चारों वेद ले आये। वेद कथा भी उसने की। ऐसे अनेक प्रमाणों से सिद्ध है कि जर्मनी से वेद मँगवाने की बात गढ़न्त है या किसी भावुक हृदय की कल्पना मात्र है। देशभर में ऐसे वेद पाठियों की संया तब सहस्रों तक थी जिन्हें एक-एक दो-दो और कुछ को चारों वेद कण्ठाग्र थे। सेठ प्रताप भाई के आग्रह पर कोई 63-64 वर्ष पूर्व एक बड़े यज्ञ में एक ऐसा वेदापाठी भी आया था, जिसे चारों वेद कण्ठाग्र थे। तब पूज्य स्वामी स्वतन्त्रानन्दजी महाराज भी उस यज्ञ में पधारे थे। आशा है कि पाठक इन तथ्यों का लाभ उठाकर कल्पित कहानियों का निराकरण करेंगे।

प्रमाण मिलान की परम्परा अखण्ड रखियेः राजेन्द्र जिज्ञासु

प्रमाण मिलान की परम्परा अखण्ड रखियेः-
अन्य मत पंथों के विद्वानों ने महर्षि दयानन्द जी से लेकर पं. शान्तिप्रकाश जी तक जब कभी आर्यों के दिये किसी प्रमाण को चुनौती दी तो मुँह की खाई। अन्य-अन्य मतावलम्बी भी अपने मत के प्रमाणों का अता- पता हमारे शास्त्रार्थ महारथियों से पूछ कर स्वयं को धन्य-धन्य मानते थे। ऐसा क्यों? यह इसलिये कि प्रमाण कण्ठाग्र होने पर भी श्री पं. लेखराम जी स्वामी वेदानन्द जी आदि पुस्तक सामने रखकर मिलान किये बिना प्रमाण नहीं दिया करते थे। ऐसी अनेक घटनायें लेखक को स्मरण हैं। अब तो आपाधापी मची हुई है। अपनी रिसर्च की दुहाई देने वाले पं. धर्मदेव जी, स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी, श्री पं. भगवद्दत्त जी की पुस्तकों को सामने रख कुछ लिख देते हैं। उनका नामोल्लेख भी नहीं करते। प्रमाण मिलान का तो प्रश्न ही नहीं। स्वामी वेदानन्द जी ने प्रमाण कण्ठाग्र होने पर भी एक अलभ्य ग्रन्थ उपलब्ध करवाने की इस सेवक को आज्ञा दी थी। यह रहा अपना इतिहास।
एक ग्रन्थ के मुद्रण दोष दूर करने बैठा। प्रायः सब महत्त्वपूर्ण प्रमाणों के पते फिर से मिलाये। बाइबिल के एक प्रमाण के अता-पता पर मुझे शंका हुई। मिलान किया तो मेरी शंका ठीक निकली। घण्टों लगाकर मैंने प्रमाण का ठीक अता-पता खोज निकाला। बात यह पता चली कि ग्रन्थ के पहले संस्करण का प्रूफ़ पढ़ने वाले अधकचरे व्यक्ति ने अता-पता ठीक न समझकर गड़बड़ कर दी। आर्य विद्वानों व लेखकों को पं. लेखराम जी, स्वामी दर्शनानन्द जी, आचार्य उदयवीर और पं. गंगाप्रसाद जी उपाध्याय की लाज रखनी चाहिये। मुद्रण दोष उपाध्याय जी के साहित्य में भी होते रहे। उनकी व्यस्तता इसका एक कारण रही।

मेरी अमेरिका यात्रा – डॉ. धर्मवीर

मेरा विदेश जाने का यह तीसरा प्रसंग था। प्रथम यात्रा १९८४ में सिंगापुर की थी, दूसरी यात्रा श्री देवनारायण आर्य के निमन्त्रण पर हॉलैण्ड की थी। उसका विवरण ‘मेरी हॉलैण्ड यात्रा’ की डायरी के रूप में परोपकारी में प्रकाशित हुआ था। अमेरिका यात्रा का जिनको पता था, उन मित्रों का आग्रह था- मैं यात्रा विवरण अवश्य लिखूँ। इस लेखन का प्रमुख लाभ यह होता है कि पाठकों को अन्य देशों में आर्यसमाज की चल रही गतिविधियों का ज्ञान होता है, साथ ही सभा के कार्यकलाप एवं प्रगति से परिचय भी हो जाता है। मेरी इस अमेरिका यात्रा का कार्यक्रम बहुत आकस्मिक रूप से बना। बैंगलोर के डॉ. सतीश शर्मा निष्ठावान्, कर्मठ, सिद्धान्तप्रिय आर्य हैं। उनका परिचय हमारी बेटी सुयशा के कारण हुआ। दोनों की भेंट आर्य समाज के सत्संग में होती थी। सुयशा ने डॉ. सतीश शर्मा से मेरी वार्ता कराई। डॉक्टर जी अजमेर ऋषि मेले के अवसर पर पधारे, वेद गोष्ठी में अपने विचार रखे, तब से उनका मुझसे भातृवत् स्नेह है।
डॉक्टर जी की बड़ी बेटी गार्गी, जो ऑक्लाहोमा में चिकित्सा में स्नातकोत्तर का अध्ययन कर रही है, उसका विवाह ऑक्लाहोमा में डॉ. कौस्तुभ से निश्चित हुआ था। उस निमित्त डॉक्टर सतीश जी ने अपने जन्म स्थान मथुरा में, बैंगलोर में तथा अक्लाहोमा में कार्यक्रम निश्चित किया।
इसी विवाह के प्रसंग में डॉक्टर जी ने इच्छा व्यक्त की और कहा- भाई साहेब! गार्गी की और मेरी भी इच्छा है कि आप अमेरिका चलें और विवाह संस्कार का कार्यक्रम सम्पन्न करायें। आप अमेरिकन वीजा के लिये आवेदन कर दें। मेरा विचार है, आपको सरलता से वीजा मिल जायेगा, क्योंकि आपकी पुत्री अमेरिका में रहती है।
इस विचार के बाद मैंने पुत्री सुयशा आर्य और प्रिय भास्कर से चर्चा की। दोनों ने सब कार्यों की औपचारिकता शीघ्र ही पूर्ण कर दी और दूतावास में चार-पाँच फरवरी २०१६ को साक्षात्कार का समय मिल गया। मैंने दिल्ली पहुँचकर डॉ. राजवीर शास्त्री के साथ प्रथम दिन नेहरू प्लेस पहुँचकर प्राथमिक कार्यवाही पूर्ण की और अगले दिन चाणक्यपुरी स्थित अमेरिकी दूतावास में जाकर साक्षात्कार दिया। सुयशा ने साक्षात्कार की बहुत तैयारी कराई थी। यथाक्रम दो मिनट में साक्षात्कार पूर्ण हो गया। अधिकारी ने पूछा- आपके बच्चे कहाँ काम करते हैं, कब जायेंगे और सहज उत्तर दिया- आपका वीजा हो गया और पासपोर्ट रख लिया और इसके साथ ही अमेरिका की यात्रा भी निश्चित हो गई। डॉ. शर्मा जी को सूचित किया तो उन्हें बहुत प्रसन्नता हुई।
इस विवाह के प्रसंग में डॉ. शर्मा जी ने ६ मार्च २०१६ को मथुरा में तथा ८ मार्च को बैंगलोर में विवाह पूर्व कार्यक्रम रखा था। विवाह ११ मार्च २०१६ को ऑक्लाहोमा में होना निश्चित था।
मथुरा में कार्यक्रम सम्पूर्ण वैदिक रीति से हो, उसमें बड़े व्यक्तियों के रूप में आर्य समाज के अधिक-से-अधिक विद्वान् सम्मिलित हों, उनका आशीर्वादात्मक प्रवचन हो, ऐसी डॉक्टर जी की भावना थी। इसके लिये डॉ. सतीश जी ने मुझे व ज्योत्स्ना (मेरी धर्मपत्नी) को आमन्त्रित किया। उनका आग्रह था, मैं कुछ विद्वानों के नाम दूँ और उनसे मथुरा के कार्यक्रम में पहुँचने का आग्रह करूँ। उनकी इच्छा के अनुसार मैंने प्रो. राजेन्द्र जिज्ञासु, डॉ. वेदपाल, डॉ. सुरेन्द्र कुमार, डॉ. राजेन्द्र विद्यालंकार, आचार्य सत्यजित् जी आदि का नाम सुझाया था। डॉ. सतीश शर्मा ने सबको साग्रह निमन्त्रित भी किया। इनमें से आचार्य सत्यजित् जी और प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी, श्री आनन्द प्रकाश जी, श्री धरणे जी, श्री म्हेत्रे जी ने इस कार्यक्रम में उपस्थित होकर सौ.कां. गार्गी और पूरे शर्मा परिवार को आशीर्वाद प्रदान किया।
मथुरा का कार्यक्रम समाप्त कर प्रो. जिज्ञासु जी, ज्योत्स्ना तथा मैं दिल्ली लौट आये। मेरी यात्रा का प्रारम्भ दिल्ली से ९ मार्च २०१६ को था। सायंकाल पाँच बजे ज्योत्स्ना मुझे इन्दिरा गाँधी हवाई अड्डे पर पहुँचा गई।
यात्रा में उथल-पुथल न हो, कठिनाई न हो, वह भी क्या यात्रा? बस मेरी यह यात्रा असली यात्रा हो गई। पहली सूचना आई- दुबई जाने वाला वायुयान दो घण्टे देरी से जायेगा। विलम्ब के कारण दुबई से डैलस जाने वाले विमान में मुझे डॉक्टर शर्मा जी के साथ जाना था। बैंगलोर से विमान कुछ विलम्ब से चला, परन्तु हमारे विमान से पहले पहुँच गया और प्रतीक्षा करने पर भी हमारा विमान दुबई नहीं पहुँचा तो वह विमान प्रस्थान कर गया।
भारत से बाहर जाते ही मेरा दूरभाष बन्द हो गया। सम्पर्क करना सम्भव नहीं हुआ। रात्रि ढाई बजे वहाँ के समय अनुसार हमारा यान दुबई पहुँचा। अब इधर से उधर, उधर से इधर भटकना प्रारम्भ किया। भाषा की कठिनाई, अपरिचित स्थान, कभी ऊपर-कभी नीचे, कभी इस पंक्ति में, कभी उस पंक्ति में, सवेरे छः बजे खिड़की तक पहुँचा, तो उस समय कोई यान नहीं था। बाद में सूचना मिली- ह्यूस्टन होकर डैलस जाने वाला विमान ९ बजे प्रस्थान करेगा, वही ठीक है। टिकट लेकर प्रतीक्षा करता रहा। यहाँ शाकाहारी भोजन में कुछ था नहीं, जो कुछ साथ रख छोड़ा था, उसी से काम चला लिया। ९ बजे फिर विमान में सवार हुआ। निरन्तर तेरह घण्टे की यात्रा कर ह्यूस्टन पहुँचा। वहाँ दिन के तीन बज रहे थे। विदेश प्रवेश की औपचारिकता और सामान खोजने में दो घण्टे से भी अधिक समय लगा। अगली उड़ान पकड़ने के लिये द्वार तक गया तो पता लगा- विमान तो जा चुका है। फिर अधिकारी से सम्पर्क किया, वह एक हिन्दी भाषी सहृदय महिला थी। उसने बताया- वह मुझे दो टिकट देगी, पहला सात बजे की उड़ान का, उसमें स्थान न मिले तो नौ बजे की उड़ान का। हवाई अड्डा बहुत बड़ा था, एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के लिये रेलगाड़ी की व्यवस्था थी। पहले सात बजे के लिये गया, स्थान नहीं था। फिर नौ बजे की प्रतीक्षा की। इस बीच में एक युवक नागपुर से श्री जोशी मुझे धोती-कुर्ते में देखकर मुस्कुराया तो मैंने उससे बात की और उसके दूरभाष की सहायता से सुयशा से सम्पर्क किया। वह सम्पर्क न हो पाने से बहुत चिन्तित थी। बात करके शान्ति हुई। उसने डॉ. शर्मा जी को भी सूचित कर दिया। मैं नौ बजे चलकर दस बजे डैलस पहुँचा। बाहर शीत था। हवाई अड्डे से बाहर प्रतीक्षा में एक अपरिचित महिला यात्री बैठी थी। उससे मैंने दूरभाष की सहायता माँगी, तो उसने मुझे देखकर कहा- विदेश के लिये फोन नहीं दूँगी। मैंने कहा- अमेरिका में ही करना है, तब उसने सुयशा से मेरी बात करा दी। डॉ. शर्मा जी को सूचना मिलते ही उनके मित्र श्री वर्मा जी और उनकी डॉ. पुत्री मुझे लेने हवाई अड्डे पर आये थे। उन्होंने मुझे खोज लिया और मेरे संकट का अन्त हो गया।
डॉ. वर्मा जी डॉ. शर्मा जी के मित्र हैं। इस विवाह के अवसर पर अधिकांश मित्र मण्डल शर्मा जी के रोगियों का है और जैसे जो पहले उनके मित्र बने, बाद में उनके रोगी बन गये। मैंने शर्मा जी से पूछा- आपके सब मित्र आपके रोगी ही हैं, तो वे कहने लगे- ये सब पहले मेरे रोगी बनकर आये थे, ये ही आज मित्र और सहयोगी हैं। डॉ. वर्मा और डॉ. सिंह परस्पर समाधि हैं और इनके पुत्र राजीव डैलस में रहते हैं तथा राजीव इञ्जीनियर हैं और बेटी डॉक्टर है। रात्रि में वर्मा जी के घर पर ही ठहरा। फिर ११ मार्च को प्रातः पाँच बजे घर से अपनी गाड़ियों से ओक्लाहोमा के लिये निकले और ग्याहर बजे होटल पहुँच गये। डॉ. शर्मा जी प्रतीक्षा कर रहे थे। सबसे मिलकर बहुत प्रसन्नता हुई।
होटल में मुझे बैंगलोर के होटल व्यवसायी श्री चन्द्रशेखर राजू जी के साथ तीन दिन रहने का अवसर मिला। वे वेद और यज्ञ में बहुत निष्ठा रखते हैं। बैंगलोर में डॉ. सतीश शर्मा, श्री चन्द्रशेखर जी मिलकर यज्ञ पर अनुसन्धान करने में लगे हुए हैं।
स्नानादि से निवृत्त होकर सभी एक बजे विवाह स्थल पर पहुँचे। यहाँ का विशाल भवन गुजराती समाज का है। किराये पर लिया गया था। टेबल-कुर्सी लगाने से लेकर साजसज्जा तक, शेष सभी लोगों ने मिलकर कर लीं। यहाँ कर्मचारी बहुत महँगे होते हैं, उनसे काम सम्भव भी नहीं होता। घरेलू काम हो या सामाजिक, सभी काम स्वयं करने होते हैं। हॉल में कुछ लोगों ने पहले पहुँचकर व्यवस्था की, फिर जलपान कर संस्कार का कार्य प्रारम्भ किया। संस्कार की सारी सामग्री डॉ. शर्मा जी भारत से लेकर आये थे। संस्कार दो भागों में किया गया। संस्कार की सामान्य विधियाँ पहले कर ली गईं, फिर जो वर-वधू के मित्र अमेरिकन लोग थे, वे कार्यालय से साढ़े पाँच बजे के बाद पहुँचे, उनके लिये सब व्यवस्थाएँ पाणिग्रहण, लाजाहोम, सप्तपदी की प्रक्रिया बाद में की गई। मैंने विधिभाग सम्पन्न कराया, सबकी अंग्रेजी में व्याख्या डॉक्टर शर्मा जी ने की। यहाँ के लोगों को वैदिक विधि से संस्कार कैसे होता है, बताना तथा उसका महत्त्व समझाना, इस कार्यक्रम का उद्देश्य था। डॉक्टर शर्मा जी की तीनों पुत्रियाँ सुपठित हैं। श्रीमती गार्गी, जिसका संस्कार सम्पन्न किया, वह एम.बी.बी.एस कर स्नातकोत्तर का अध्ययन ओक्लाहोमा विश्वविद्यालय से कर रही हैं। उसके पति डॉ. कौस्तुभ न्यूक्लियर मेडिसिन में पीएच.डी. करके कार्यरत हैं। डॉ. शर्मा जी की दूसरी बेटी शिकागो में एवियेशन में अध्ययन कर रही है। तीसरी बेटी भारत में एम.बी.बी.एस. कर रही है।
संस्कार का कार्य सम्पन्न होने के पश्चात् भोजन हुआ, फिर नृत्य, संगीत का कार्यक्रम करके ११ बजे कार्यक्रम सम्पूर्ण हुआ। फिर सबने मिलकर सब सामान यथास्थान पहुँचाकर हॉल खाली कर दिया। वह कार्य सम्पन्न हो गया था, जिसके निमित्त से अमेरिका आना हुआ। आकर होटल में विश्राम किया।
१२ मार्च प्रातः सभी अतिथि धीरे-धीरे विदा हो रहे थे। समय मिलने पर श्री चन्द्रशेखर राजू से वेद के प्रचार-प्रसार पर बातें हुईं, उन्होंने अपने द्वारा किये जाने वाले कार्यों की जानकारी दी। जिनको प्रस्थान करना था, उनको विदाकर शेष लोगों का ओक्लाहोमा के दर्शनीय स्थल की यात्रा का विचार बना। सब मिलकर ओक्लाहोमा के काऊब्वाय संग्रहालय में गये। अंग्रेजों के अमेरिका में आने से पहले, यहाँ रहने वाले लोग जिनको रेड इण्डियन्स कहा जाता है, उनके जीवन व सामाजिक व्यवस्था को बताने वाला संग्रहालय है। धीरे-धीरे यहाँ के लोगों को मार दिया गया और अंग्रेजों ने यहाँ अपना राज्य स्थापित किया। शासन की प्रारम्भिक व्यवस्थाओं का भी यहाँ आकृति बनाकर प्रदर्शन किया गया है। संग्रहालय बड़ा और दर्शनीय है। वहाँ से गार्गी के घर पर भोजन करके होटल पर लौटकर विश्राम किया।
१३ मार्च अगले दिन प्रातराश करके निकले। आज के दिन गार्गी ने अपना विश्वविद्यालय दिखाया। रोगी बच्चों के लिये नया भवन बना है, जो किसी बड़े होटल जितना और उतना ही सुन्दर बना है। विश्वविद्यालय का पुस्तकालय देखा, वह भी विशाल है। यहाँ लोग पुस्तकालय का भरपूर उपयोग करते हैं। रात्रि को भट्टाचार्य जी के परिवार ने सबको भोजन पर आमन्त्रित किया, वहाँ सब भोजन पर गये। वहाँ से लौटकर होटल पर विश्राम किया।
१४ मार्च को होटल से निकल कर चन्द्रशेखर राजू को हवाई अड्डे पर विदा करने गये। आज का दिन मिलने में बीता। शर्मा जी के साथ निकलकर नगर का भ्रमण किया। सायं डॉ. शाह के घर सब भोजन पर आमन्त्रित थे। भोजन करके होटल में विश्राम किया।
१५ मार्च को प्रातः भ्रमण करते हुए प्राकृतिक दृश्यों का अवलोकन किया। आज तेज हवा चल रही थी। ओक्लाहोमा-अमेरिका का सूखा प्रदेश है। अन्य प्रान्तों की तुलना में बहुत हरा-भरा नहीं है। गर्मी भी भारत की भाँति बहुत अधिक होती है। इसे अमेरिका में पिछड़ा प्रदेश माना जाता है। आज लौटने का कार्यक्रम था। डॉ. गार्गी पाँच बजे चिकित्सालय से लौटीं। बड़ी गाड़ी नहीं मिल सकी, अतः कौस्तुभ के माता-पिता ओक्लाहोमा में रहे। बाकी लोगों ने डैलस के लिये प्रस्थान किया। रात्रि को दस बजे डैलस पहुँचे। भोजन करके शर्मा जी के आग्रह पर पूरे परिवार के साथ एक घण्टा धार्मिक चर्चा हुई, प्रश्नोत्तर हुए। यहाँ हम राजीव जी के यहाँ ठहरे। राजीव जी इञ्जीनियर हैं। राजीव जी के श्वसुर डॉ. वर्मा तथा पिता श्रीचन्द जी दोनों पुराने सहपाठी और मित्र हैं। दोनों केन्या में रहते हैं। दोनों डॉक्टर जी के मित्र हैं। विवाह के लिये केन्या से यहाँ आये हुए थे। रात्रि विश्राम किया।
१६ मार्च प्रातः शीघ्र उठकर प्रस्थान की तैयारी की, इतनी शीघ्रता में राजीव जी की पत्नी और गार्गी ने मिलकर भोजन तैयार करके साथ रख दिया। कौस्तुभ, राजीव जी, शर्मा जी, सब बस अड्डे तक छोड़ने आये। बस अड्डे के पास पहुँचकर राजीव जी ने हम सब को वह स्थान दिखाया, जहाँ अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी को गोली मारी गई थी। जिस घर से गोली मारी गई तथा जिस स्थान पर गोली लगी, सड़क पर गोली लगने के स्थान पर सफेद चिह्न बनाये गये हैं तथा जहाँ से गोली मारी गई थी, भवन की उस मंजिल को संग्रहालय बनाया गया है। बस यथासमय चली। दोनों ओर खेत-जंगल के दृश्य थे, साफ चौड़ी सड़क पर चलते हुए ११ बजे ह्यूस्टन पहुँच गया। श्री मुनीश गुलाटी जी बीमार होने पर भी अपनी पत्नी के साथ बस अड्डे पर पहुँचे, उन्हें ज्वर था। उनके साथ मार्ग में उनकी बेटी प्रिया, जो चिकित्सा विज्ञान में पढ़ती है, उसका भी एक सप्ताह का अवकाश था, उसको लेकर हम सब घर पहुँचे। गुलाटी जी का परिवार पुराना आर्य परिवार है। शुद्ध शाकाहारी है, विश्वविद्यालय में मांस बनता है, अतः उनकी बेटी वहाँ भोजन नहीं करतीं। पीने के पानी के नल के नीचे मांस धोया जाता है, अतः पानी की बोतलें भी घर से लेकर जाती हैं। यह है संस्कार का प्रभाव। भोजन के बाद विश्राम कर गुलाटी परिवार के साथ आर्य समाज ह्यूस्टन पहुँचा। प्रथम पं. सूर्यकुमार नन्द जी से भेंट हुई। उन्हें मैं गुरुकुल गौतमनगर से जानता हूँ। आर्य समाज मन्दिर विशाल तथा सुन्दर है। अमेरिका में यह सबसे समर्थ समाज माना जाता है। यहाँ के दूसरे विद्वान् डॉ. हरिश्चन्द्र हैं, वे और उनकी पत्नी कविता जी से भी पुराना परिचय है। वे अनेक बार अजमेर आते रहे हैं। यहाँ निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ७ बजे से ८ बजे तक प्रवचन तथा आधा घण्टा प्रश्नोत्तर हुए। आज के व्याख्यान का विषय था- ‘ईश्वर का सच्चा स्वरूप’। व्याख्यान के पश्चात् भोजन के साथ कार्यक्रम समाप्त हुआ। गुलाटी जी के साथ घर विश्राम किया।
१७ मार्च को प्रातः समाचार देखे। लेखन कार्य किया। दिन में डॉ. हरिश्चन्द्र जी तथा कविता जी भेंट के लिये पधारे, उनसे आर्य समाज के प्रचार-प्रसार की चर्चा होती रही। सायंकाल आर्य समाज गये। आज का विषय था- ‘आर्य समाज का प्रचार-प्रसार कैसे हो?’ उसके पश्चात् प्रश्नोत्तर हुए, भोजन करके घर लौटे।
१८ मार्च को प्रातःकाल का समय स्वाध्याय चर्चा में व्यतीत हुआ। दोपहर डॉ. हरिश्चन्द्र जी व कविता जी पधारे, उनके साथ मार्ग में मुनीष जी के भाई प्रवीण जी से मिलते हुए श्री जसवीर सिंह जी के घर पहुँचे। ये फरीदाबाद के पास गाँव दयापुर के निवासी हैं। आपके भाई वेदपाल जी ऋषि उद्यान के साधना शिविर में भाग ले चुके हैं। वर्षों से अमेरिका में निवास कर रहे हैं। निष्ठावान् आर्यसमाजी हैं। घर में प्रतिदिन यज्ञ करते हैं। आज सायं इनके घर पर यज्ञ किया और फिर आर्य समाज पहुँचे, आज का विषय ‘वैदिक वाङ्मय का महत्त्व’ था। उसी प्रकार शंका-समाधान हुआ, भोजन के साथ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। आज अजमेर में ज्योत्स्ना के साथ अध्ययन करने वाली श्रीमती उषा जी अपने पति के साथ कार्यक्रम में आईं। चर्चा कर समाचार जाने, पुराना परिचय फिर नया हुआ। आप भारतीय वाणिज्य दूतावास (कॉन्स्युलेट) में कार्यरत हैं, आपके पति इञ्जीनियर हैं। आज रात्रि को जसवीरसिंह जी के घर पर ही निवास रहा।
१९ मार्च को प्रातःकाल आर्य समाज में जसवीरसिंह जी की ओर से गायत्री यज्ञ का आयोजन रखा गया था। आठ बजे से प्रथम ओम् संकीर्तन, गायत्री यज्ञ तथा गायत्री मन्त्र का अर्थ कर प्रवचन किया। इसके बाद जलपान कर शनिवार होने के कारण प्रवचन का कार्यक्रम भी यज्ञ के साथ ही रखा गया था। आज ‘उपासना का महत्त्व’ पर व्याख्यान दिया, शंका समाधान हुआ। भोजन करके जसवीर सिंह जी घर जाते हुए श्रीमती उषा जी के घर पर रुके, कुशलक्षेम की चर्चा हुई, वहाँ से घर पहुँचकर विश्राम किया। सायं जसवीर जी की बेटी, जो विश्वविद्यालय में चिकित्सा विज्ञान की छात्रा है, जिसके अवकाश समाप्त हो रहे थे, उसे छात्रावास तक पहुँचाकर आये। विश्वविद्यालय बहुत भव्य बना हुआ है, घर लौटकर रात्रि विश्राम किया।
शेष भाग अगले अंक में…..

ये प्रेरक प्रसंग, यह किया और यह दिया: राजेन्द्र जिज्ञासु

ये प्रेरक प्रसंग, यह किया और यह दिया :- मार्च 2016 के वेदप्रकाश के अंक में श्री भावेश मेरजा ने मेरी दो पुस्तकों के आधार पर देशहित में स्वराज्य संग्राम में आर्यसमाज के बलिदानियों को शौर्य की 19 घटनायें या बिन्दु दिये हैं।

किन्हीं दो आर्यवीरों ने ऐसी और सामग्री देने का अनुरोध किया है। आज बहुत संक्षेप से आर्यों के साहस शौर्य की पाँच और विलक्षण घटनायें यहाँ दी जाती हैं।
1. देश के स्वराज्य संग्राम में केवल एक संन्यासी को फाँसी दण्ड सुनाया गया। वे थे महाविद्वान् स्वामी अनुभवानन्दजी महाराज। जन आन्दोलन व जन रोष के कारण फाँसी दण्ड कारागार में बदल दिया गया।

2. हैदराबाद राज्य के मुक्ति संग्राम में सबसे पहले निजामशाही ने पं. नरेन्द्र जी को कारागार में डाला अन्य नेता बाद में बन्दी बनाये गये।

3. निजाम राज्य में केवल एक क्रान्तिवीर को मनानूर के कालेपानी में एक विशेष पिंजरे में निर्वासित करके बन्दी बनाया गया।

4. स्वराज्य संग्राम में केवल एक राष्ट्रीय नेता को पिंजरे में गोराशाही ने बन्दी बनाया। वे थे हमारे पूज्य स्वामी श्रद्धानन्द जी।

5. जब वीर भगतसिंह व उनके साथियों ने भूख हड़ताल करके अपनी माँगें रखीं तब उनके समर्थन में एक विराट् सभा की। अध्यक्षता के लिए एक बेजोड़ निर्ाीक सेनानी की देश को आवश्यकता पड़ी। राष्ट्रवासियों की दृष्टि हमारे भीमकाय संन्यासी स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी पर पड़ी।

सरकार उनके उस ऐतिहासिक भाषण से हिल गई। आर्य समाज के पूजनीय नेता के उस अध्यक्षीय भाषण को क्रान्तिघोष मान कर सरकार ने केहरी को (स्वामी जी का पूर्व नाम केहर सिंह-सिंहों का सिंह था) कारागार में डाल दिया। आज देशवासी और आर्यसमाज भी यह इतिहास-गौरव गाथा भूल गया।

पाठक चाहेंगे तो ऐसी और सामग्री अगले अंकों में दी जायेगी। मेरे पश्चात् फि र कोई यह इतिहास बताने, सुनाने व लिखने वाला दिख नहीं रहा। श्री धर्मेन्द्र जिज्ञासु इस कार्य को करने में समर्थ हैं यदि……..