Category Archives: समाज सुधार

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता : दिनेश

अभिव्यक्ति  की स्वतंत्रता और देशभक्ति विगत लगभग ढाई वर्षों में अत्यन्त ज्वलन्त प्रश्न रहा है। अभिव्यक्ति  मानव वाणी के द्वारा, लेखन के द्वारा या क्रियात्मक  सृजना शक्ति के  द्वारा, संगीत के द्वारा या अभिनय के द्वारा व्यक्त हो सकती है। प्रश्न यह है कि अभिव्यक्ति  की मर्यादाएँ और उसका उद्देश्य किस प्रकार सुनिश्चित किया जा सकेगा। प्राचीन भारतीय संस्कृति अभिव्यक्ति  की स्वतन्त्रता की सर्वोन्मुखी प्रवक्ता रही है। जहाँ विचारधाराओं के आधार पर किसी भी प्रकार का प्रतिबन्ध न राज्य की ओर से होता था और न किसी विचारधारा विशेष के द्वारा। यही कारण था कि चिन्तन की इस उर्वरा भूमि में विभिन्न प्रकार की विचारधाराएँ पल्लवित हुईं और पुष्पित हुईं। भले ही उन विचारों से अन्य मत्तावलम्बी सहमत हों या ना हों।

छठी शताब्दी ईसा पूर्व में इसी प्रकार जैन और बौद्ध धर्मों का उद्भव हुआ। क्या यह सुखद आश्चर्य नहीं है उन लोगों के लिए जो वैदिक परम्परा और विचारधारा के भिन्न चिन्तन को प्रस्फुटित कर रहे थे, वैदिक मीमांसा और कर्मकाण्ड पर तीव्र प्रहार हो रहे थे, तब न किसी शासक ने और न किसी चिन्तक ने बल प्रयोग या हिंसा के आधार पर स्वमत के विरुद्ध प्रचलित चिंतन की विभिन्न धाराओं के विपरीत बल प्रयोग किया हो। यही कारण है कि भारत में चरक जहाँ सांख्य का विचार देता है, वहीं पतंजलि महाभाष्य में दर्शन के मूल प्रश्नों को भाषा के माध्यम से अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। नागार्जुन और अश्वघोष भले ही वे ब्राह्मण कुल में जन्में हों, वैदिक परम्परा का अध्ययन किया हो फिर भी उन्होंने बौद्ध दर्शन के आधारभूत ग्रन्थों का प्रणयन ही नहीं किया अपितु उनके साहित्य सृजन में अनवरत योगदान भी दिया। चार्वाक ने तो सभी तत्कालीन दार्शनिक विचारधाराओं पर तीव्र कुठाराघात किया।

मध्यकालीन भारतीय संस्कृति में सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार, जगत सत्य है या असत्य, इत्यादि अनेक विचारधाराओं पर भारतीय तत्ववेत्ताओं, साहित्यकारों और सन्तों ने अपनी भावभूमि को निर्मित किया। यद्यपि शासन मताग्रही था, तथापि देश के विभिन्न क्षेत्रों में सृजन की अनवरत प्रक्रिया संचालित होती रही। भारत में अभिव्यक्ति के विभिन्न आयाम रहे हैं, जिनमें प्रतीकों की प्रधानता सर्वत्र विद्यमान रही है।

समकालीन संदर्भों में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता और देशभक्ति के विश्लेषण की गहरी परख की आवश्यकता है। वेद में मातृभूमि की अभ्यर्थना विभिन्न मतों के द्वारा अभिव्यक्त की गई है। भाव और समर्पण मातृभूमि के प्रति अभिव्यक्त होते हैं। अभी हाल ही में दिल्ली के रामजस कॉलेज और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति की विद्रूप घटनायें, जिनमें विभिन्न राजनीतिक दलों का सोची समझी नीति के तहत कूदना अप्रत्याशित नहीं है फिर भी देश के भावनात्मक लगाव और देश को तोडऩे वाली शक्तियों के बीच गहरी खाई का निर्माण अवश्य करती है।

तथाकथित राजनीतिक अकादमिक विश्लेषण किसी ऐसी प्रविधि का निर्माण नहीं कर पाये कि ‘कश्मीर की आजादी’, ‘भारत के टुकड़े करने’, ‘अफजल गुरु की फाँसी…….’ जैसे नारों का औचित्य देशभक्ति के रूप में सिद्ध कर सकें। फिर क्यों नेताओं के रूप में विभिन्न घटकों में बंटे मीडिया, शिक्षक और नेता पिष्टपेषण की नूरा कुश्ती करते दिख रहे हैं?

वस्तुत: सामान्य सी घटना बताने वाले युद्ध और पाकिस्तान जैसे शब्द की पक्षधर्मिता को समझना नहीं चाहते। जाने-अनजाने में कहे गये कथनों को अपने पक्ष में करने की जिद अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के मूल भाव को ही तिरोहित कर देती है।

आवश्यकता है कि महर्षि दयानन्द की चिन्तनधारा के आलोक में ‘सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोडऩे में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये।’ अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता और देशभक्ति की भावना चाहिए तभी हम शिक्षा के मन्दिरों को निष्पक्ष ज्ञान की प्रयोगशाला बना पायेंगे। अभी तक ये सभी केन्द्र विशेष मतों के मठ बन रहे थे, अब उनके ढहने की बारी है, बस इसी अकुलाहट का परिणाम है यह भ्रान्त धारणा कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता वर्तमान में बाधित हो रही है।

भारत ही ऐसा देश है कि जहाँ देश-प्रेम हमारी संस्कृति की आधारशिला है और अभिव्यक्ति की अनन्त स्वतन्त्रता यहाँ के कण-कण में विद्यमान है। जिगर मुरादाबादी ने ठीक ही लिखा है-

उनका जो काम है, वह अहले सियासत जानें

मेरा पैगाम मुहब्बत है, जहाँ तक पहुँचे।

इसलिए स्थापित मठाधीशों के अस्तित्व को अब चुनौती दी जा रही है, जिसे वे पचा नहीं पा रहे और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की आड़ लेकर अपना बचाव करने का ढोंग कर रहे हैं।

आपका

दिनेश

‘जल्लीकट्टू का विरोध’-एक अन्तर्राष्ट्रीय षडय़न्त्र: -प्रभाकर

कुछ कार्य बाहर से देखने पर तो बड़े अच्छे और कल्याणकारी प्रतीत होते हैं, पर उनके पीछे छिपा स्वार्थ उतना ही भयावह होता है। हमारी दृष्टि केवल थोड़ा ही देख पाती है, पर उसकी जडं़े कहाँ तक हैं, ये शायद हम सोच भी नहीं पाते।

तमिलनाडु के पारम्परिक खेल ‘जल्लीकट्टू’ का एक गैर-सरकारी संस्था क्कश्वञ्ज्र द्वारा किया गया विरोध भी कुछ ऐसा ही है।

पहले इन गैर-सरकारी संस्थाओं (हृत्रह्र)की पृष्ठभूमि और उनके उद्देश्य को समझ लें तो बाकि अपने आप समझ में आ जायेगा।

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर देशों के बीच आगे बढऩे की प्रतियोगिता रहती है। दूसरे देशों को पिछड़ा और गरीब बनाये रखने के लिये कुछ विकसित देश जिन तरीकों का उपयोग करते हैं, उनमें एक तरीका है-एन.जी.ओ.। बाहर से दिखने में ये संस्थायें समाज, पशु, मानव, प्रकृति की हितैषी लगती हैं, परन्तु इनका मूल उद्देश्य समाज और सरकारों को अस्थिर करना होता है, जिससे देश में कोई प्रगति का कार्य ना हो सके और वह देश वैश्विक मंच पर पिछड़ा बना रहे। प्राकृतिक संतुलन का मुखौटा ओढक़र बांध न बनने देना, सडक़ों उद्योगों का विरोध करना, पिछड़े दलित वर्ग को भडक़ाकर उन्हें देश के विरोध में खड़ा कर देना आदि इनके माध्यम होते हैं।

जल्लीकट्टू के विरोध के पीछे कितनी गहरा और दूरगामी षडय़न्त्र है, इसके बारे में जानना प्रत्येक भारतीय के लिये आवश्यक है।

क्या है ‘जल्लीकट्टू’?- ‘जल्लीकट्टू’ भारतीय गायों की नस्लों का संवर्धन करने वाली एक प्रतियोगिता है। जैसे मनुष्यों में योग्यताओं को बढ़ाने के लिये कुश्ती आदि खेल होते हैं, ठीक वैसे ही। इस प्रथा में केवल भरतीय नस्लों को ही लिया जाता है। किसी समय इस खेल में ६ नस्लों को बैलों के लिया जाता था। अब एक प्रजाति ‘अलामबादी’ विलुप्त हो चुकी है, बाकी प्रजातियाँ भी विलुप्ति के कगार पर हैं। १९९० में कंगायम प्रजाति के १० लाख बैल थे, अब वह संख्या मात्र १५००० रह गई है। प्रतियोगिता में सभी पशुपालक अपने बलिष्ठ बैलों को लाते हैं। बैलों को बड़ी चारदीवारी में छोड़ दिया जाता है, फिर उन्हें नियन्त्रित करने का प्रयास किया जाता है, जिन बैलों को वश में नहीं किया जा सकता, उन्हें वंशवृद्धि के लिये प्रयोग किया जाता है। बाकि बैलों को खेती के कार्य में लिया जाता है। इस प्रकार यह सुनिश्चित किया जाता है कि सबसे ताकतवर बैल ही गोधन की वृद्धि के लिये प्रयुक्त हो, जिससे होने वाला पशु भी बलिष्ठ, रोगों से लडऩे वाला और अधिक दूध देने वाला होता है। यह एक परम्परागत, व्यावहारिक तरीका है, जिससे किसान अच्छे जीन को सुरक्षित व देशी नस्ल की वृद्धि कर सकते हैं। किसानों को इस स्पर्धा से पशुओं का अच्छा मूल्य भी मिलता है। इस कारण भी यह प्रथा महत्त्वपूर्ण है। यदि यह प्रतियोगिता ना हो तो पशुपालकों का उत्साह गिरेगा, जिससे कि लोग पशु पालना, खरीदना कम कर देगें। फलस्वरूप गाय व बैलों का मूल्य कम हो जायेगा और इसका सीधा-सीधा लाभ कत्लखानों को मिलेगा।

२०११ में इस परम्परा पर तब विवाद शुरु हुआ, जब एक पशु अधिकार संस्था ने उच्चतम न्यायालय में ‘जल्लीकट्टू’ पर रोक लगाने की माँग की। उनकी अपील का आधार जानवरों के साथ क्रूरता का व्यवहार था। उच्चतम न्यायालय ने २०१४ में फैसला सुनाते हुए इस प्रथा पर रोक लगा दी।

‘जल्लीकट्टू’ के विरोध का अन्तर्राष्ट्रीय कारण- इस प्रथा के विरोध का कारण पशुओं पर होने वाली क्रू रता नहीं, बल्कि व्यापारिक स्वार्थ है।

गाय के दूध में दो प्रकार के क्चद्गह्लड्ड ष्टड्डह्यद्गद्बठ्ठ प्रोटीन पाये जाते हैं- ए१ व ए२। अधिकतर लोग मानते हैं कि ए२ प्रोटीन ज्यादा लाभकारी है। भारत में देशी गाय की ३७ नस्लें हैं (१०० वर्ष पहले १५०० नस्लें थीं)। इनमें से ३६ में ए२ प्रोटीन पाया जाता है। माना जाता है कि ए१ प्रोटीन दीर्घकालिक बीमारियों जैसे-टाइप १ डायबिटीज़ और ऑटिज्म को जन्म देता है। यहाँ यह जानना आवश्यक है कि एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी जो ए२ प्रोटीन वाले दूध का उत्पादन करती है, उसकी आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड में उपस्थिति है। इस कम्पनी के पास ए१/ए२ प्रोटीन वाले जीन के परीक्षण का पेटेंट है। समस्या यह है कि इसी कम्पनी के पास ए२ जीन वाले बैल से कृत्रिम गर्भाधान का पेटेंट भी है। उनके पास इस प्रयोग का पेटेंट भी है, जिससे ए२ जीन को प्रभावशाली बनाकर ए१ जीन को प्रमुख होने से रोका जा सकता है। अगर भारत की सभी देसी नस्लें नष्ट हो जायें, तब या तो हमें ए१ प्रोटीन वाला हानिकारक दूध पीना पड़ेगा या बहुत मूल्य देकर इस कम्पनी की पेटेंट तकनीक का उपयोग करके ए२ दूध प्राप्त करना पड़ेगा।

नियम के अनुसार यह पेटेंट सिर्फ एक प्रजाति ‘बोस टॉरस’ (क्चशह्य ञ्जड्डह्वह्म्ह्वह्य) पर ही लागू होता है। और ‘बोस टॉरस’ से भी शुद्ध प्रजाति ‘बोस इण्डिकस’ (क्चशह्य ढ्ढठ्ठस्रद्बष्ह्वह्य) तमिलनाडु की है, जो कि ‘जल्लीकट्टू’ में प्रयोग की जाती है, पर यह प्रजाति पेटेंट में नहीं आती। इसलिये जब तक यह प्रजाति सुरक्षित है, तब तक कम्पनी अपना व्यापार पूरी तरह भारत में फैलाने में असमर्थ है। इसके समाप्त होते ही ए२ प्रोटीन का दूध लेने के लिये हमें विदेशी कम्पनियों पर आश्रित होना पड़ेगा। यही समस्या तमिलनाडु के किसानों को परेशान कर रही है।

‘जल्लीकट्टू’ पर रोक लगने से पहले तमिलनाडु में गाय-बैल का अनुपात ४:१ था, परन्तु अब यह बढक़र ८:१ हो गया है। इसके अतिरिक्त अब बैलों को कसाइयों को बेचा जा रहा है। इसलिये यह प्रथा देसी नस्ल के गाय-बैल के अनुपात को स्वस्थ रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका रखती है, इससे देसी नस्ल को ही प्रोत्साहन मिलता है। इस प्रथा का विरोध करने वाले ‘पेटा’ का मुख्य तर्क है कि इसमें पशुओं की पूँछ तोडऩा, घायल करना, शराब पिलाना, आदि क्रूरता की जाती है और कई बार पशु मर भी जाते हैं।

इस पर मदुरई निवासी श्री पंडीयन रंजीत (पशु-पालक) का कहना है कि वह पिछले २० वर्षों से इस प्रथा के लिये बैलों को तैयार कर रहे हैं। उन्होंने इस खेल में मनुष्यों को तो चोट खाते देखा है, पर बैलों को कभी नहीं। प्रतिभागियों और आयोजकों का ये कहना कि ‘‘यदि इस आयोजन में किसी पशु के खून की एक बँूद भी गिरती है तो खेल को रोक दिया जाता है’’ उनके पशुप्रेम का परिचायक है।

स्थानीय नेता व राज्य सरकार इस प्रथा की अनिवार्यता को देखते हुए इसके पक्ष में है, लेकिन केन्द्र और न्यायालय की मजबूरी क्या है-ये विचारणीय है।

ये कोई पहली घटना नहीं, इससे पहले भी मुम्बई में चलने वाली विक्टोरिया घोड़ा गाडिय़ों पर भी प्रतिबन्ध इसी ‘पेटा’ द्वारा लगवाया गया था। मिर्जापुर का कालीन उद्योग, भारतीय सर्कस, फिरोजाबाद का चूड़ी उद्योग भी इन्हीं हृ.त्र.ह्र. की भेंट चढ़ गया। भारत की भूमि में सदियों से उगाये जाने वाले बासमती चावल का पेटेंट आज अमेरिका के पास है। उत्तर प्रदेश में बैलों की दौड़ पर प्रतिबन्ध भी ऐसे ही षडय़न्त्रों का हिस्सा रहा है, आज वहाँ बैलों की कीमत नाममात्र की रह गई है। तर्क यही था-पशुओं पर अत्याचार।

विदेशों के दान और उनके इशारों पर चलने वाली इन संस्थाओं को पशुओं व समाज की इतनी ही चिन्ता है तो वह ईद जैसे हिंसक त्यौहार पर प्रतिबन्ध लगाने की माँग क्यों नहीं करती? पशुओं को हलाल होते देख क्यों अपनी आँखें मूंद लेती है? सौन्दर्य प्रसाधनों के लिये निरीह जीवों को तड़पते वक्त उनकी चीख इन संस्थाओं को दिखाई नहीं देती। कत्लखानों में कटते छोटे-छोटे पशुओं के बच्चे इनके विरोध के दायरे में क्यों नहीं आते?

पशुहिंसा ना हो ये आवश्यक है, लेकिन उनके संवर्धन को हिंसा नाम देना कहाँ तक उचित है?

कमियाँ तो कहीं भी ढूँढी जा सकती हैं, आपत्ति कहीं भी हो सकती है। एक महिला जब प्रसव पीड़ा झेलती है तो उसे भी हिंसा घोषित किया जा सकता है। सैनिक सीमा पर खड़ा होकर जान को जोखिम में डालता है। एक मजदूर भवन निर्माण में जो मेहनत करता है, क्या उसे भी क्रूरता कहा जायेगा?

नहीं, क्योंकि ये सब अनिवार्य हैं, हित के लिये हैं। भारतीय संस्कृति की नींव अनिवार्यता पर टिकी है, आवश्यकता व संतुलन ही उसका आधार है, विलासिता, हिंसा और उपद्रव नहीं। यहाँ का त्यौहार, हर खानपान, ऋतु, फसल, प्रकृति से अनिवार्यता से जुड़ा है, जिनका उद्देश्य व्यक्ति व समाज को उन्नति प्रदान करना है। दुनिया के हर कार्य में कष्ट हैं। अच्छाई है, तो कुछ समस्यायें भी हैं, पर हम हर कार्य को प्रतिबन्धित नहीं कर सकते। यदि कार्य का उद्देश्य व विधि सही है तो कुछ समस्याएं होते हुए भी कार्य सही होगा, क्योंकि समस्या और कार्य परस्पर साथी हैं, परन्तु यदि किसी कार्य का उद्देश्य गलत है तो उसकी दलीलें सही प्रतीत होते हुए भी वह कार्य गलत ही होगा। बाहर से अच्छा दिखने वाला यह कार्य समाज व राष्ट्र के लिये अहितकर ही होगा।

 

अविद्या को दूर करना ही देशोन्नति का उपाय है: – सत्यवीर शास्त्री

विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।

अविद्यया मृत्युं तीत्र्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते।।

– (यजु. ४०/१४)

साधारण संस्कृत भाषा का ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी इस वेदमन्त्र के सामान्य अर्थ को समझ सकता है।

अर्थ-जो विद्वान् विद्या और अविद्या को साथ-साथ जानता है, वह महान् आत्मा, अविद्या से मृत्यु को पार कर विद्या से अमृत (मोक्ष) सुख को प्राप्त कर लेता है, परन्तु चिन्तन इस विषय का है कि महर्षि स्वामी दयानन्द जी सरस्वती तथा आर्यसमाज तथा वैदिक-धर्मी विद्वानों के सिद्धान्तानुसार विद्या से सुख और अविद्या से दु:ख की प्राप्ति होती है और ‘‘जो पदार्थ जैसा है, उसको वैसा ही मानना’’ विद्या है, इसके विपरीत ‘‘जो पदार्थ जैसा है, उसको वैसा न मानना’’ अविद्या है।

महर्षि पतञ्जलि ने भी ‘योगदर्शन’ में विद्या का लक्षण बताते हुए कहा है-

अनित्याशुचिदु:खानात्मसुनित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या

अनित्य को नित्य, अपवित्र को पवित्र, दु:ख को सुख और जड़ को चेतन आत्मा या परमात्मा मानना अविद्या है। इसके विपरीत मानना अर्थात् अनित्य को अनित्य, नित्य को नित्य, अपवित्र को अपवित्र, पवित्र को पवित्र, दु:ख को दु:ख, सुख को सुख, जड़ पदार्थ को जड़ एवं चेतन आत्मा व परमात्मा को चेतन मानना विद्या कहलाती है। व्याख्या के आधार पर यह भी कहा जा सकता है कि जो व्यक्ति यह मानता है कि यह भौतिक शरीर या पंचभूतों से निर्मित ब्रह्माण्ड ऐसा ही था, ऐसा ही है और ऐसा ही रहेगा- यह नास्तिकवादियों की अविद्या नहीं है तो और क्या है? यक्ष के प्रश्र के उत्तर में धर्मराज युधिष्ठिर ने ठीक ही उत्तर दिया है-

अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयं, शेषा: स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यत: परम्।

प्रतिदिन हम देख रहे हैं कि प्राणी मृत्यु का ग्रास बनते जा रहे हैं, फिर भी सबसे अधिक आश्चर्य यह है कि शेष बचे  प्राणियों (चिन्तनशील मानव) को यह विश्वास नहीं हो रहा कि एक दिन हमको भी मृत्यु का ग्रास बनना पड़ेगा। इससे बड़ी अविद्या और क्या हो सकती है? यदि यह भौतिक शरीर ऐसा ही था और ऐसा ही रहेगा तो जिन माता-पिता ने हमें उत्पन्न किया, पालन-पोषण किया, वे माता-पिता, दादा-दादी, दयानन्द, श्रद्धानन्द, राम और कृष्ण हमें छोडक़र क्यों चले गये?

पतञ्जलि ऋषि ने अविद्या का दूसरा लक्षण अशुचि को शुचि मानना अर्थात् अपवित्र को पवित्र मानना कहा है। वास्तव में ऋषि जी ने बात तो सत्य ही कही है, लेकिन शास्त्रों ने तो इस शरीर की उपमा राम की प्यारी नगरी अयोध्या से की है, यथा-

‘अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पुरयोध्या’

इस शरीर रूपी देवताओं की सुन्दर नगरी में नौ द्वार हैं तथा इसकी रक्षा हेतु अष्ट (आठ) चक्र लगे हुए हैं। कवियों ने इसकी सुन्दरता का वर्णन करते हुए अपनी कलम ही तोड़ दी है। इस शरीररूपी अयोध्या के मुख्य द्वार मुख की उपमा चन्द्रमा से की है। इसके दूसरे द्वार नेत्रों की उपमा कमलनयन कमल के फूल की पँखुडिय़ों से की है। तीसरे, मुख पर होठों की उपमा गुलाब के फू ल की पंखुडिय़ों से की है। चौथे, नाक की तुलना सुन्दर पक्षी तोते की नाक से की है। नर और मादा एक-दूसरे के साथ ऐसे समाहित हो जाते हैं कि स्वयं को भूल जाते हैं। इसी प्रकार सांसारिक भौतिक धन, ऐश्वर्य, महल, अटारी के लिये तथा उपरोक्त सुन्दर शरीर रूपी अयोध्या के पोषण के लिए प्राणी, प्राणी की हत्या कर रहा है। आज इस स्वार्थसिद्धि के लिए मानव जिस गोमाता के दुग्ध से अपने तथा अपने परिवार का पालन-पोषण करता है, उसी के खून, मांस का भी स्वाद ले रहा है।

अब उस शरीर रूपी अयोध्या का दूसरा रूप भी देखें। जिस मुख की तुलना चन्द्रमा से की गई है, उस मुख से क्या निकलता है? जिन नेत्रों की तुलना कमल की पंखुडिय़ों से की गई है, प्रात:काल उन नेत्रों से कौन-सा मल निकलता है? जिस नाक की तुलना तोते की नाक से की है, उससे क्या निकलता है? शरीर के प्रत्येक रोम से पसीने के रूप में क्या निकलता है? गुह्य इन्द्रियों से क्या निकलता है? इन सभी मलों को नाम लेने मात्र से मानव को घृणा होती है। इसके उपरान्त भी इस अशुचि, अपवित्र शरीर को पवित्र मानकर इसके पोषणार्थ मानव प्राणियों की ही नहीं, मानवों की भी हत्या कर हाड़-मांस का व्यापार करता है, जबकि  इस शरीर ने एक दिन साथ छोडऩा है। जिन भौतिक पदार्थों का हम संग्रह कर रहे हैं, उन्हें हमारे साथ चलना नहीं है, फिर मानव ऐसा क्यों कर रहा है? इसी का नाम तो अविद्या है तथा जानते हुए भी न जानना है।

तीसरा, ऋषि पतञ्जलि ने अविद्या का लक्षण दु:ख को सुख मानना बताया है। काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि दु:ख के कारणों में मानव सुख की इच्छा से फँसता है। कामवासना-जो दु:ख का कारण है, उसको सुख का कारण समझकर रावण ने सीता का हरण किया। कामवासना रूपी दु:ख के कारण को सुख मानने के कारण ही रावण स्वर्ण नगरी लंका सहित विनाश को प्राप्त हुआ। संयोगिता के मोह में फँसकर पृथ्वीराज स्वयं नष्ट हो गया तथा सम्पूर्ण भारत को लगभग ग्यारह सौ वर्षों तक गुलाम कर गया। क्रोध के वशीभूत होकर दुर्योधन ने महाभारत के युद्ध का सूत्रपात किया, जिसके परिणाम को आज तक राष्ट्र भुगत रहा है। लोभरूपी दु:ख को सुख मानने के कारण घर-बार, जमीन-जायदाद के लोभ में आज भाई-भाई की हत्या कर रहा है। पुत्र पिता का हत्यारा बना हुआ है। भाई बहन के मुकदमे चले हुए हैं। दु:ख को सुख मानने वाली अविद्या ने मानव का ही पतन नहीं किया, अपितु राष्ट्र को भी भयंकर कालग्रस्त किया हुआ है।

चौथा-‘अनात्मसु आत्मख्यातिरविद्या’ कहा है, अर्थात् अनात्म जड़ भौतिक पत्थर मूर्ति को चेतन आत्मा अथवा परमात्मा मानना अविद्या का चौथा लक्षण कहा है। इस प्रकार माता-पिता तथा ईश्वर की जड़, पत्थर मूर्ति बनाकर पूजना, उनके किये गये उपकारों के प्रति भयंकर कृतघ्रता है, जिसका कोई भी प्रायश्चित्त नहीं हो सकता है, क्योंकि आत्मा व परमात्मा जड़-पदार्थ के बने हुए नहीं है।

आत्मा का लक्षण- आत्मा का लक्षण बताते हुए न्यायदर्शनकार मुनि ने कहा है कि

‘सुखदु:खेच्छाद्वेषप्रयत्नज्ञानानि आत्मनो लिङ्गम्’

जो सुख-दु:ख को अनुभव करता हो, जिसमें इच्छा, राग, द्वेष, प्रयत्न तथा ज्ञान हो, ये लक्षण आत्मा के होते हैं। बहुत से व्यक्ति यह कहेंगे कि सुख-दु:ख का अनुभव शरीर करता है। इच्छा, राग, द्वेष, प्रयत्न और ज्ञान ये भी शरीर के ही लक्षण हैं, परन्तु उनका यह कथन तर्क एवं विज्ञान की कसौटी में नहीं आता, न ही इसका कोई प्रमाण है।

श्रुति, उपनिषद् तथा दर्शनों के प्रमाण आत्मा के लिये तो अनेक प्राप्त हो जायेंगे, जैसे उदाहरण के लिये एक प्रमाण यहाँ प्रस्तुत करते हैं-

यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति:।

तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते।।

– केनोपनिषद्

जो आँख से नहीं देखता, जिसके कारण से आँख देखती है, वही ब्रह्म (अध्यात्म) है।

अन्यच्च ‘परांचिखानि व्यतृणत् स्वयंभू:’ (कठोपनिषद्)। परमात्मा ने इस शरीर के पुतले में काट-काटकर पाँच छेद बनाए हैं, जिसमें से ज्ञान अन्दर आता है। ये पाँच छेद वाली पाँच ज्ञान इन्द्रियाँ स्वयं कुछ नहीं करतीं, इन छेदों (इन्द्रियों) के भीतर बैठा (आत्मा) जो झाँक रहा है, वही सब ज्ञान प्राप्त करता है। आँखें खुली हों, परन्तु देखने वाला कहीं अन्यत्र मग्र हो तो आँखें खुली होने पर भी नहीं देखतीं, कान खुले होने पर भी नहीं सुनते।

इस शरीर में जो सुन्दरता, ओज, कान्ति आदि दिखाई देती हैं, वह भी आत्मा के कारण ही दिखाई देती हैं। जब आत्मा शरीर को छोडक़र निकल जाती है, तब न तो आँखें देखने का कार्य करती है, न कान सुन सकते है। पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ जड़ हो जाती हैं। शरीर का ओज व कान्ति नष्ट हो जाती है। इस शरीर से कोसों दूर तक दुर्गन्ध आने लग जाती है, अत: मूर्ति जड़ पदार्थ की होती है, चेतन आत्मा की नहीं।

परमात्मा का लक्षण- क्लेषकर्मविपाकाश-यैरपरामृष्ट:पुरुषविशेष ईश्वर:। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश-मानव के जीवन में ये पाँच क्लेश हैं। इन क्लेशों से ईश्वर अछूता है, दूर है। चारों प्रकार की अविद्या का वर्णन तो ऊपर कर ही चुके हैं।

अस्मिता- ज्ञान को प्राप्त करने वाला जीवात्मा तथा ज्ञान को आत्मा जिस बुद्धिरूपी साधन से प्राप्त करता है, उन दोनों को एक मानना अस्मिता नामक क्लेश है।

राग- सुख भोगने पर पुन: सुख भोगने की तृष्णा राग नामक क्लेश है।

द्वेष- दु:ख भोगने के उपरान्त उसके प्रति क्रोध, रोष द्वेष नामक क्लेश है।

अभिनिवेश- पूर्वजन्मों के संस्कारों के वश मैं मृत्यु को प्राप्त नहीं होऊँ, यह दु:ख सभी प्राणियों की तरह शब्द ज्ञानी विद्वानों को भी होता है, जिसे अभिनिवेश नामक क्लेश कहते हैं। ये पाँच क्लेश परमात्मा को नहीं छूते। उसके अन्दर नहीं आते।

कर्म- कर्म तीन प्रकार के होते हैं, जिन्हें सामान्य व्यक्ति करते हैं- सत्, असत् और मिश्रित, अर्थात् शुभ-अशुभ व मिले-जुले, पुण्य, पाप व पाप-पुण्य से मिले-जुले। इन तीनों प्रकार के कर्मों तथा इनके फलों से ईश्वर अछूता होता है। परमात्मा आत्मा से भिन्न है। आत्मा पुरुष है तो परमात्मा पुरुषविशेष ईश्वर है। परमात्मा कभी भी क्लेश, कर्म आदि के निकट नहीं आता। जीव क्लेश तथा तीनों प्रकार के कर्मों के सम्पर्क में आते रहते हैं और छूटते रहते हैं।

तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम्- योगदर्शनकार बताते हैं कि ईश्वर के समान तथा उससे अधिक किसी का ज्ञान नहीं है, अत: वह सर्वज्ञ है, जबकि जीवात्मा अल्पज्ञ तथा प्रकृति जड़ है। ईश्वर पूर्व समय के गुरुओं, ऋषियों, महर्षियों का भी गुरु है, क्योंकि वह तीनों कालों में एकरस रहता है। उसका जन्म-मरण नहीं होता। सृष्टि के आदि तथा पूर्व सृष्टियों में भी ईश्वर ने ही ऋषियों के हृदय में वेद का ज्ञान दिया है, अत: ईश्वर ही पूर्व के  सभी गुरुओं, ऋषियों, महर्षियों का गुरु है और रहेगा।

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्- इस ब्रह्माण्ड में, सृष्टि में जो कुछ दृष्टिगोचर हो रहा है, उसके कण-कण में ईश्वर का निवास उसी प्रकार है, जिस प्रकार दूध के एक-एक कण में घृत समाया हुआ होता है अथवा यह कहा जाये- जिस प्रकार फूल में सुगन्ध का वास होता है, अर्थात् वह एकदेशीय नहीं, सर्वव्यापक विभु है।

‘अकायमव्रणम्’ (यजु. ४०/४) वह परमपिता परमेश्वर निराकार शरीर रहित बिना नस-नाडिय़ों वाला है।

‘न तस्य प्रतिमास्ति’ (यजु. ३२/३) उस ईश्वर की कोई प्रतिमा अर्थात् मूर्ति नहीं है।

‘स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमाम्’ वह ईश्वर ही पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा तथा तारागण आदि लोक-लोकान्तरों को धारण किये हुए है।

तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति

इसी ईश्वर के प्रकाश को लेकर ये सब सूर्य, चन्द्र, तारे और बिजली आदि प्रकाशित होते हैं। यदि ईश्वर इनको प्रकाश न दे तो ये कुछ भी प्रकाश नहीं कर सकते। इनके अन्दर जो भी प्रकाश है, वह उनका अपना नहीं, यह प्रकाश परमात्मा का दिया हुआ ही है। जैसे सभी व्यक्ति जानते हैं कि घड़ी में अपनी गति नहीं है, किसी के द्वारा चाबी भरकर गति दी गई है, अत: इस ब्रह्माण्ड मेें जो गति दिखाई दे रही है, वह उस परमात्मा की दी हुई है।

‘यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे’- जिस प्रकार आत्मा इस शरीर को गति दिये हुये है, उसी प्रकार ब्रह्माण्ड में जो गति दिखाई दे रही है, वह उस परमपिता परमेश्वर की ही दी हुई है।

अत: जड़ अनात्म को चेतन आत्मा अथवा परमात्मा मानना अविद्या का चौथा लक्षण है। इस अविद्या के चौथे लक्षण ने व्यक्ति, समाज व राष्ट्र को बहुत बड़ी हानि पहुँचाई है, जिसकी पूर्ति होना संभव नहीं है।

जैसा कि महर्षि पतञ्जलि ने योगशास्त्र में कहा है-

‘विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम्’

विपर्यय मिथ्या (विपरीत) ज्ञान को कहते हें। जैसे अँधेरे मेें पड़ी रज्जू (रस्सी) को साँप मान लेने से वह साँप नहीं हो सकती, इसी प्रकार जीवित माता-पिता का अपमान कर उनकी मूर्ति बना, भोग लगा, पूजा करने से माता-पिता का प्यार व सम्पत्ति प्राप्त नहीं हो सकती, न ही ऐसा व्यक्ति कभी भी जन्म-जन्मान्तरों तक मोक्ष सुख के मार्ग का अनुगामी ही हो सकता है। उस परम कृपालु ईश्वर की दया के लिये महर्षि दयानन्द के बताये आर्यसमाज के दूसरे नियम के स्वरूप वाले ईश्वर की आराधना ही करनी आवश्यक है।

शेष भाग अगले अंक में….

हिन्दू जाति के रोग का वास्तविक कारण क्या है? -भाई परमानन्द

उच्च सिद्धान्त तथा उसके मानने वालों का ‘आचरण’-ये दो विभिन्न बातें हैं। मनुष्य की उन्नति और सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके सिद्धान्त और आचरण में कहाँ तक समता पाई जाती है। जब तक यह समता रहती है, वह उन्नति करता है, जब मनुष्य के सिद्धान्त और आचरण में विषमता की खाई गहरी हो जाती है, तब अवनति आरम्भ हो जाती है। मनुष्य की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि उसका लक्ष्य सदा ऊँचे सिद्धान्तों पर रहता है, परन्तु जब तक उसके आचरण में दृढ़ता नहीं होती, वह उन (सिद्धान्तों) की ओर अग्रसर नहीं हो सकता है, परन्तु संसार को वह यही दिखाना चाहता है कि उन सिद्धान्तों का पालन कर रहा है। इस प्रकार मानव समाज में एक बड़ा रोग उत्पन्न हो जाता है। धार्मिक परिभाषा में इसे ही ‘पाखंड’ कहते हैं। जब कोई जाति या राष्ट्र इस रोग से घिर जाता है तो उसकी उन्नति के सब द्वार बन्द हो जाते हैं और उसके पतन को रोकना असाध्य रोग-सा असम्भव हो जाता है।

हमारे देश में एक प्राचीन प्रथा थी कि जब कोई व्यक्ति ‘उपनिषद्’ आदि उच्च विज्ञान का जिज्ञासु होता था, तो पहले उसके ‘अधिकारी’ होने का निश्चय किया जाता था। ‘अधिकारी’ का प्रश्र बड़ा आवश्यक और पवित्र है। कई बार इसे तुच्छ-सी बात समझा जाता है, परन्तु यदि ध्यान से देखा जाय तो ज्ञात होगा कि ‘अधिकारी’ ‘अनधिकारी’ का प्रश्र प्राकृतिक सिद्धान्तों के सर्वथा अनुकूल है। एक बच्चा चार बरस का है। उसको अपने साथी की साधारण-सी चेष्टायें की बड़ी मधुर अनुभव होती हैं। इनकी विचारशक्ति परस्पर समान है, इसलिये वे परस्पर मिलना और बातें करना चाहते हैं। गेंद को एक स्थान से उठाया और दूसरे स्थान पर फैं क दिया। यह काम उन्हें बहुत वीरतापूर्ण प्रतीत होता है। दो-चार बरस पश्चात् इसी गेेंद जैसी तुच्छ बातों से उनकी रुचि हट जाती है। अब वे रेत या पत्थरों के छोटे-छोटे मकान बनाने में रुचि दिखाते हैं, ठीकरों और कंकरों से वे खेलना चाहते हैं। और ऐसे खेलों में वे इतने लीन रहते हैं कि घर और माँ-बाप का ध्यान उन्हें नहीं रहता। फिर कुछ बरस पश्चात् उनकी रुचि शारीरिक खेलों की ओर हो जाती है और पुराने खेलों को अब वे बेहूदा बताने लगते हैं।। युवावस्था में उन्हें गृहस्थ की समझ उत्पन्न हो जाती है और अब सांसारिक कार्यों में उलझ जाते हैं। धीरे-धीरे उनके मन में इस संसार से विराग और धर्म में प्रवृत्ति का आविर्भाव होता है और त्याग व बलिदान के सिद्धान्तों को समझने की शक्ति उत्पन्न होती है। इससे यह स्पष्ट है कि प्रत्येक सिद्धान्त को समझने के लिये ‘अधिकारी’ होना आवश्यक है। आज की किसी भी सभा में-चाहे वह धार्मिक हो या राजनैतिक, ९० प्रतिेशत श्रोताओं को वक्ता की बातों में रस नहीं आता। बच्चों या बच्चों के से स्वभाव वाले बड़े-बूढ़ों को भी वही बात पसन्द आती है, जिस पर लोग हँसें या तालियाँ पीट दें, अतएव अनधिकारी के सन्मुख ऊँचे सिद्धान्तों का वर्णन करना भी प्राय: हानिकारक होता है।

जब किसी जाति या राष्ट्र में उन्नति की अभिलाषा उत्पन्न हो तो इसको कार्य रूप में परिणत करने का प्रथम आवश्यक साधन उसके व्यक्तियों के आचरण की दृढ़ता है। चरित्र जितना अधिक उच्च और भला होगा, उतनी ही शीघ्रता से उच्च और भले विचार बद्धमूल होंगे। ‘चरित्र’ के खेत को भली भाँति तैयार किये बिना उच्च विचार रूपी बीज बिखेरना, ऊसर भूमि में बीज फैं कने के समान ही व्यर्थ होगा। उच्च विचारों की शिक्षा देने के साथ-साथ आचरण और चरित्र को ऊँचा रखने का विचार अवश्य होना चाहिये, अन्यथा चरित्र के भ्रष्ट होने के साथ-साथ यदि उच्च विचारों की बातें ही रहीं तो ‘पाखंड’ का भयानक रोग लग जाना स्वाभाविक हो जायेगा।

यह पाख्ंाड हिन्दुओं में कै से उत्पन्न हुआ और किस प्रकार भीतर-ही-भीतर दीमक की भाँति यह हिन्दू समाज को खोखला कर रहा है-यह बात में यहाँ दो-तीन उदाहरणों से स्पष्ट करता हँू। ‘तपस्या’ का अर्थ आजकल की भाषा में नियन्त्रित किया जा सकता है, लेकिन जिस युग में हिन्दू जाति के पुरुषों ने ‘तपस्या’ को जीवन का महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त निर्दिष्ट किया था, वे इसके महत्त्व को जानते हुए यह भी समझते थे कि जिन लोगों को इसका उपदेश दिया जा रहा है, वे भी इसके महत्त्व को समझते हैं और इन्द्रिय दमन व मन के वशीकरण को आचरण में लाना ‘तपस्या’ का लक्ष्य समझते हैं। समय आया कि जब लोग इस तप को कुछ से कुछ समझने लगे और अब तप इसलिये नहीं किया जाता कि अपने मन को वश में करना है, अपितु इसलिये कि संसार को दिखा सकें कि हम ‘बड़े तपस्वी’ हैं। आग की धूनी लगाकर बैठ गये। कभी एक हाथ ऊँचा उठा लिया, कभी दूसरा और लोगों में प्रसिद्ध कर दिया कि हम बड़े तपस्वी हैं। ‘तप’ सिद्धान्त रूप में बहुत ऊँचा सिद्धान्त है, परन्तु यह जिन लोगों के लिये है, उनका आचरण गिर गया। ‘सिद्धान्त’ और ‘आचरण’ में विषमता होने के कारण पाखण्ड आरम्भ हो गया और आज हजारों-लाखों स्त्री-पुरुष इस पाखंड के शिकार हैं। ‘त्याग’ को ही लीजिये। ‘त्याग’ के उच्च सिद्धान्त पर आचरण करने के स्थान पर आज लाखों व्यक्तियों ने इसलिये घर-बार छोड़ रखा है कि वे गृहस्थ-जीवन की कठिनाइयों को सहन नहीं कर सकते। वे त्यागियों का बाना धारण कर दूसरों को ठगने का  काम कर रहे हैं। कितनों ही ने न केवल सांसारिक इच्छाओं का त्याग नहीं किया, अपितु इनकी पूर्ति के लिये प्रत्येक अनुचित उपाय का सहारा किया है। जाति की पतितावस्था में ‘त्याग’ का ऊँचा आदर्श एक भारी पाखंड के रूप में रहता है।

देश के लिये बलिदान का आदर्श भी उच्च आदर्श है, परन्तु यदि देशभक्त कहलाने वाले व्यक्ति इसके सिद्धान्त के आचरण में इतने गिर जायें कि वे अपने से भिन्न व विरुद्ध सम्मति रखने वाले व्यक्ति को सम्मति प्रगट करने की स्वतन्त्रता भी न दें, ऐसी देशभक्ति एक प्रकार से व्यवसाय रूपी देशभक्ति है। कई बार ये लोग रुपया उड़ा लेते हैं और फिर इस बात का प्रचार करते हैं कि संसार में कोई भी व्यक्ति रुपये के लालच से नहीं बच सकता, इसलिये जो व्यक्ति इनसे असहमत रहता हो, उसे भी वे अपने ही समान रुपये के लालच में फँसा हुआ बताते हैं। ऐसी अवस्था में देशभक्ति की भावना एक पाखंड का रूप धारण कर लेती है। इसी प्रकार अनाथालय, विधवा आश्रम आदि सब परोपकार और सर्व साधारण की भलाई के कार्यों के नाम पर आज जो रुपया एकत्र होता है, वह सब चरित्र-बल न होने के कारण धोखे की टट्टी बने हुए हैं। ‘निर्वाण’ या ‘मुक्ति’ प्राप्त करने की भावना भी उच्च आदर्श है, परन्तु आज चरित्र-बल न होने से चरित्रहीन व्यक्तियों ने इसी ‘निर्वाण’ और ‘मुक्ति’ के नाम पर सैकड़ों अड्डे बना रखे हैं और लाखों नर-नारी इनके फंदे में फँस कर भी गर्व करते हैं।

यदि मुझसे कोई पूछे कि हिन्दू जाति की निर्बलता और उसके पतन का वास्तविक कारण क्या है? तो मेरा एक ही उत्तर होगा कि इस रोग का वास्तविक कारण यह ढोंग है। हिन्दुओं में प्रचलित इस ‘ढोंग’ से यह भी प्रमाणित होता है कि किसी युग में हिन्दू जाति का चरित्र और आचरण बहुत ऊँचा था और इसीलिये उन्हें ऊँचे आदर्श की शिक्षा दी जाती थी, परन्तु पीछे से घटना क्रम के वश हिन्दू जाति का आचरण गिरता गया और ‘सिद्धान्त’ शास्त्रों में सुरक्षित रहने के कारण ऊँचे ही बने रहे। व्यक्ति इन सिद्धान्तों के अनुकूल आचरण न रख सके, फिर भी उनकी यह इच्छा बनी रही कि संसार यह समझे कि उनका जीवन उन्हीं ऊँचे आदर्शों के अनुसार है। इस प्रकार ‘सिद्धान्त और आचरण’ अथवा ‘आदर्श’ और ‘चरित्र’ में विभिन्नता हो जाने के कारण ‘दिखावा’ या ‘ढोंग’ का रोग लग गया। इस समय यह ‘ढोंग’ दीमक के समान जाति की जड़ों में लगा हुआ है। इस जाति के उत्थान का यत्न करने की इच्छा रखने वाले के लिये आवश्यक है कि वह पहले इस ‘पाखंड वृत्ति’ को निकाल फैंके। यदि हम अपने आचरण या चरित्र को ऊँचा नहीं बना सकते तो उच्च आदर्शों का लोभ त्याग कर अपने आचरणों के अनुसार ही आदर्श को अपना लक्ष्य बनायें।

मस्जिद में चुपके से हुआ भगाई लड़की का निकाह. पहले हिन्दू संगठन पहुचे, फिर पहुची पुलिस. मौलवी हिरासत में

अगर किसी ने जवानी के जोश में कोई गलती की थी तो एक बुजुर्ग मौलाना हो कर उन्हें दोनों को समझाना था , पर वो तो देने लगे थे बढ़ावा उस कार्य को जो अपराध था , मानवता की नजर में भी और कानून की नजर में भी . लव जिहाद के दायरे में लाने के लिए किसी को भी ना किसी कानून की फ़िक्र है , ना ही किसी प्रकार के नियमों की . वो जैसे भी , जहाँ भी , जिसको भी चाहे शकार बना लेते हैं . ऐसा ही एक मामला एक बुजुर्ग मौलाना और पवित्र कही जाने वाली मस्जिद में चल रहा था जहाँ एक अबोध बालिका का निकाह चुपके से पढ़ाया गया . मौलाना को पता था कि चुपके से केवल अपराध किये जाते हैं और वो ऐसा ही कर रहे थे . चुपके से निकाह रूप अपराध के 3 पहलू थे . हिन्दू संगठन हिन्दू रक्षा दल का पहला आरोप है कि वो बालिका नाबालिग थी और नाबालिग बालिका से विवाह किसी भी प्रकार से सामजिक और कानूनी अपराध है . दूसरा पहलू था कि बालिका दूसरे धर्म की थी इसलिए मौलाना को और जल्दी थी इसे करने की .. तीसरा पहलू था कि ये बालिका तेलंगाना से भगा कर लाई गयी थी जिसके माता पिता का अपनी बेटी को खोज कर बुरा हाल था . उनके आंसू नहीं थम रहे थे अपनी बेटी के इस तरह अचानक गायब हो जाने पर .. मौलाना ये सारा कुकृत्य गाजियाबाद के नंदग्राम इलाके की एक मस्जिद में कराया था जहां एक स्थानीय वर्ग विशेष निवासी ने इनको छुपा कर रखा था . इस पूरे प्रकरण में लिप्त लोगों को जबकि निश्चित रूप से उसे कानून की पूरी जानकारी थी . अपनी नजर चरों तरफ गड़ाए बैठे हिन्दू संघठनो को इस बात की भनक लग गयी ..उसके बाद हिन्दू रक्षा दल नाम के संगठन ने मस्जिद और जिस घर में लड़की को छिपाया गया था उसको घेर लिया और मौलवी के साथ लड़की को छिपा कर रखे स्थानीय को बाहर निकालने लगे. थोड़ी देर में वहां पुलिस आ गयी और मौलाना ,  नाबालिग लड़की को भगा कर लाये अपराधी व् लड़की को हिरासत में ले कर थाने गयी .  हिन्दू रक्षा दल के कार्यकर्ताओं के अनुसार तेलंगाना से भगा कर लाने के बाद उस नाबालिग लड़की का लगभग 10 दिनों से नई बस्ती नंदग्राम में रख कर शारीरिक शोषण किया जा रहा था. पुलिस के अनुसार विवेचना जारी है . हिन्दू रक्षा दल के कार्यकर्ताओं का कहना है कि वो इस विषय से जुड़े एक एक लोगों को सज़ा दिलाने तक चुप नहीं बैठेंगे.
source: http://www.sudarshannews.com/category/national/love-jihad-in-ghaziabad-up-1004

जब मुस्लिम महिलाएं शादी बचाने के लिए अजनबी के साथ सोती हैं

जब मुस्लिम महिलाएं शादी बचाने के लिए अजनबी के साथ सोती हैं

 

 

  • जब मुस्लिम महिलाएं शादी बचाने के लिए अजनबी के साथ सोती हैं

    एक न्यूज रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ मुस्लिम महिलाएं तलाक के बाद अपनी शादी बचाने के लिए मोटी रकम देकर ‘हलाला’ विवाह करती हैं. कुछ मुस्लिमों के द्वारा माने जाने वाले ‘हलाला’ परंपरा में तलाक के बाद महिला अगर पहले पति के पास जाना चाहती है तो उसे किसी दूसरे पुरुष से शादी करनी पड़ती है और फिर उसे तलाक देना होता है.

  • जब मुस्लिम महिलाएं शादी बचाने के लिए अजनबी के साथ सोती हैं

     

    बीबीसी लंदन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, डिजिटल एज में हलाला सर्विस देने के नाम पर कई ऑनलाइन एकाउंट चल रहे हैं. किसी अजनबी के साथ हलाला विवाह करने के लिए महिलाएं से सर्विस एजेंसी पैसे मांगती है और उस शख्स के साथ उसे सोना भी पड़ता है.

  • जब मुस्लिम महिलाएं शादी बचाने के लिए अजनबी के साथ सोती हैं

    हालांकि, काफी मुस्लिम हलाला को गलत मानते हैं. लंदन के इस्लामिक शरिया काउंसिल भी इस परंपरा का कड़ा विरोध करती है.

  • जब मुस्लिम महिलाएं शादी बचाने के लिए अजनबी के साथ सोती हैं

    हालांकि, काफी मुस्लिम हलाला को गलत मानते हैं. लंदन के इस्लामिक शरिया काउंसिल भी इस परंपरा का कड़ा विरोध करती है.

  • जब मुस्लिम महिलाएं शादी बचाने के लिए अजनबी के साथ सोती हैं
     

    रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि ऑनलाइन एजेंसी सर्विस देने के लिए महिलाओं से 2 लाख रुपए तक चार्ज करते हैं. ऐसी ही एक सर्विस देने वाले शख्स ने यह भी बताया कि एक बार हलाला होने के बाद एक पुरुष महिला को तलाक देने से इनकार करने लगा.

  • जब मुस्लिम महिलाएं शादी बचाने के लिए अजनबी के साथ सोती हैं

    कई बार हलाला के तहत महिलाओं को कई मर्दों के साथ भी सोना पड़ता है. उनका यौन शोषण भी होता है.

  • जब मुस्लिम महिलाएं शादी बचाने के लिए अजनबी के साथ सोती हैं

    लंदन के इस्लामिक शरिया काउंसिल की खोला हसन कहती हैं कि हलाला पाखंड है. यह सिर्फ पैसा बनाने के लिए किया जाता है.

  • जब मुस्लिम महिलाएं शादी बचाने के लिए अजनबी के साथ सोती हैं

    खोला हसन यह भी कहती हैं कि महिलाओं को इससे बचाने के लिए काउंसिलिंग मुहैया कराई जानी चाहिए.

    source:http://aajtak.intoday.in/gallery/muslim-women-sleep-stranger-save-marriage-4-11853.html

video : पण्डित लेखराम वैदिक मिशन द्वारा परोपकारिणी सभा के नेतृत्व निर्देशन में सामाजिक समरसता यज्ञ का आयोजन किया गया

पण्डित लेखराम वैदिक मिशन द्वारा परोपकारिणी सभा के नेतृत्व निर्देशन में  सामाजिक समरसता यज्ञ का आयोजन किया गया जो की अत्यंत सफल रहा इसे सफल बनाने में जिन जिन लोगों की भागीदारी थी हम उनके ऋणी रहेंगे |