Category Archives: हिन्दी

कुरान समीक्षा : खुदा जमीन पर उतर कर आया

खुदा जमीन पर उतर कर आया

खुदा पहले शायद पलंग पर लेटा होगा, फिर उठकर बैठ गया फिर ऊपर से उतर कर नीचे जमीन पर आया।

इससे क्या यह स्पष्ट नहीं है कि वह खुदा हाजिर नाजिर अर्थात् सर्वव्यापक नहीं है। वह आसमान में रहता है और सैर करने कभी-कभी जमीन पर चला आता है और फिर वापस चला जाता है?

ज् मिर्रतिन फस्तवा………।।

(कुरान मजीद पारा २७ सूरा नज्म रूकू १ आयत ६)

(खुदा) जो जोरावर है। फिर सीधा बैठा।

व हु-व बिल्-उफुकिल्-अअ्……….।।

(कुरान मजीद पारा २७ सूरा नज्म रूकू १ आयत ७)

और वह आसमान ऊँचे किनारे पर था।

सुम्-म दना फ-त-दल्ला……….।।

(कुरान मजीद पारा २७ सूरा नज्म रूकू १ आयत ८)

फिर वह नजदीक हुआ और करीब आ गया।

फका-न का-ब कौसैनि औ…………।।

(कुरान मजीद पारा २७ सूरा नज्म रूकू १ आयत ९)

फिर दो कमान के बराबर या उससे भी कम फर्क रह गया।

फऔहा इला अब्दिही मा औहा……..।।

(कुरान मजीद पारा २७ सूरा नज्म रूकू १ आयत १०)

उस वक्त खुदा ने फिर अपने बन्दे ( मुहम्मद) पर हुक्म भेजा।

समीक्षा

खुदा को हाजिर नाजिर (सर्वव्यापक) इस्लाम साबित नहीं कर सकता है।

उसका अरबी खुदा आसमान पर रहता है, वहीं से आता जाता है यह ऊपर के प्रमाण से स्पष्ट है सर्वव्यापक का आना जाना बन ही नहीं सकता है।

सृष्टि-प्रसंग में विरोध कहने वालों का समाधान: पण्डित भीमसेन शर्मा

सृष्टिप्रक्रिया में कोई वेदादि ग्रन्थों का परस्पर विरोध कहते हैं उसकी निवृत्ति के लिये सब वचनों का यहां संग्रह तो हो नहीं सकता। और वैसा करने से लेख भी अत्यन्त बढ़ जाना सम्भव है, ऐसा विचार के संक्षेप से लिखते हैं- वेदादिग्रन्थों में कहीं-कहीं सृष्टि आदि विषयों का वर्णन शब्दों के भेद से किया गया है अर्थात् जिस विषय के लिये एक पुस्तक में जैसे शब्द हैं उससे भिन्न द्वितीय पुस्तक में लिखे गये, तब किन्हीं को भ्रम हो जाता है कि इसमें विरोध है। और सब पुस्तकों का लेख एक प्रकार के शब्दों में हो नहीं सकता क्योंकि देश, काल, वस्तु भेद से भेद हो जाता है और अनेक कर्त्ताओं के होने से भी उन-उन की शैली अलग-अलग होती है परन्तु विचारशील लोग जब उसके मुख्य सिद्धान्त पर ध्यान देते हैं तो उस मूल सिद्धान्त में कुछ भेद नहीं जान पड़ता किन्तु अज्ञानियों की बुद्धि में परस्पर विरोध बना रहता है, उसका कारण अज्ञान है। इसमें वेदादि शास्त्रों का कुछ दोष नहीं और इस अज्ञानियों के भेद से संसार की कुछ हानि भी नहीं हो सकती।

तथा अन्य वेदादिग्रन्थों में जहां-जहां सृष्टि का प्रकरण है, वहां-वहां रचना के वर्णन से पूर्व और प्रलयदशा के अन्त में कहा है कि-‘उस ने विचार किया कि मैं अनेकरूप सृष्टि करूँ’१ तथा प्रश्नोपनिषद् में लिखा है कि- ‘संसार की रचना से पहले उसने तप किया’२ यहां तपशब्द से भी सृष्टि-रचना के        अनुसन्धान करने से तात्पर्य है, क्योंकि परमेश्वर के सम्बन्ध में तपशब्द का अर्थ ज्ञान ही लिया गया है। सो ब्राह्मणग्रन्थों में लिखा है कि- ‘जिसका तप ज्ञान है।’३ यही अंश यहां मनुस्मृति में भी लिखा है कि- ‘उसने अपने सामर्थ्य से अनेक प्रकार की प्रजा रचने की इच्छा से विचार करके प्रथम प्राण अर्थात् सूत्रात्मा वायु को रचा’४ सृष्टि विषयक इत्यादि सभी वचनों का एक ही आशय है।

तथा प्रश्नोपनिषद् में लिखा है कि५- ‘उसने तप अर्थात् सत्-असत् अच्छे बुरे की प्रमाण वा कारण के अनुसार समीक्षा करके दो वस्तुओं को अर्थात् प्रथम दो प्रकार की शक्ति को उत्पन्न किया। जिनमें एक का नाम रयि और दूसरे का प्राण नाम रक्खा।’ इन्हीं दोनों का स्त्रीशक्ति और पुरुषशक्ति शब्दों से भी व्यवहार करते हैं। कहीं इन्हीं को सूर्य-चन्द्रमा नामों से कहा है, क्योंकि चन्द्रमा में स्त्रीशक्ति की और सूर्य में पुरुषशक्ति की प्रधानता वा उत्तेजकता है। इन्हीं दोनों को भोग्य-भोक्ता वा प्रकृति-पुरुष नामों से भी कोई लोग कहते हैं। इस प्रकार इन दो शक्तियों का अनेक नामों से व्यवहार किया गया है। यही अंश मनुस्मृति में स्पष्ट लिखा है कि- ‘उस परमेश्वर ने प्रारम्भ में अपने सत्त्वादि गुणों की साम्यावस्थारूप प्रकृति नामक एक (जिसमें अनिर्वाच्य होने से द्वित्वादि नहीं कहा जा सकता) सामर्थ्य के दो खण्ड किये, जिसके अर्द्धभाग में पुरुष और आधे भाग में स्त्री हुई। उस स्त्री में विराट् नाम ब्रह्माण्ड के प्रत्येक वस्तु को उत्पन्न किया।’१ अर्थात् प्रलय के पश्चात् स्त्री-पुरुष के संयोग के बिना भी जितना जगत्- प्राणी उत्पन्न हुए वा जो कुछ जड़ वस्तु उत्पन्न होकर दृष्टिगोचर हुए उन सबकी उत्पत्ति स्त्रीपुरुषरूप दो शक्ति के मेल से हुई है। क्योंकि सब प्राणी और भूतों की उत्पत्ति से पहले दो शक्तियों की उत्पत्ति दिखाने का यही तात्पर्य है। अनुमान होता है कि इसी आशय को लेकर किन्हीं लोगों ने प्रारम्भ में एक स्त्री वा एक पुरुष को उत्पन्न किया माना है। उसी आदि पुरुष शक्ति को ब्रह्मा, स्त्रीशक्ति को सरस्वती वा महादेव-पार्वती (आदम-हव्वा) आदि नाम रखे गये। सम्भव है कि शक्ति की सौकर्यातिशय विवक्षा में स्वतन्त्र कर्त्ता की अविवक्षा कर देने से शक्ति का प्रयोग शक्तिमान् के स्थान पर मान लिया गया जिससे अनेक असम्भव पौराणिक कथा बन गईं। यहां प्रश्रोपनिषद् और मनुस्मृति का एक ही आशय है। केवल दोनों के कथन में किसी प्रकार कुछ भेदमात्र प्रतीत होता है। लोक में भी एक आशय वाले अविरुद्ध एक विषय को व्याख्यान कर्त्ताओं के भेद से भिन्न जैसा मान लेते हैं। वैसे ही सृष्टि में शास्त्रों का वास्तविक विरोध नहीं है।

सृष्टि प्रक्रिया में वेदों का जो सिद्धान्त है, वही इस मानवधर्मशास्त्र में भी समझना चाहिये। वेदों में जहां-जहां सृष्टि का वर्णन है वहां-वहां सर्वत्र वा प्रायः प्रथम प्रलय दशा का स्वरूप दिखाया गया है। जैसे- ऋग्वेद में लिखा है कि ‘उत्पत्ति से पहले अन्धकार से आच्छादित जगत् का कारण था।’२ इत्यादि प्रकार के मूल वेदमन्त्रस्थ आशय को लेकर के ही वाक्यभेद से मनु जी ने भी लिखा है कि३- ‘यह सब जगत् अन्धकाररूप अज्ञात- किसी प्रकार के चिह्न से रहित सब ओर से सोया जैसा था।’ तथा उक्त मन्त्र के “महिना जायतैकम्…” वाक्य का आशय भी मनुस्मृति के इसी प्रथमाध्याय में “महाभूतादिवृत्तौजाः प्रादुरासीत्तमोनुदः…”2 वर्णन किया गया है। इत्यादि प्रकार वेदानुकूल ही यहां सृष्टि का वर्णन है।

न्याय-मीमांसा और सांख्यादि शास्त्रों में कहीं-कहीं सृष्टि का वर्णन परस्पर विरुद्ध जैसा प्रतीत होता है। वहां भी वास्तविक विरोध नहीं। उस एक-एक में अपने-अपने अभीष्ट व्याख्येय कारण की प्रधानता दिखायी है। वे सब शास्त्रों में माने हुए सब कारण सृष्टि प्रक्रिया में उपयोगी होते हैं। काल, कर्म, उपादान और निमित्त शब्द वाच्यों की ही मुख्यकर शास्त्रों में कारणबुद्धि से प्रधानता दिखायी है। इन्हीं कालादि सृष्टि के कारणों की वेद में भी मुख्यता दीखती है। सो अथर्ववेद में भी “कालः प्रजा असृजत कालो अग्रे प्रजापतिम्। स्वयम्भूः कश्यपः कालात्तपः कालादजायत।। कालादापः समभवन्कालाद् ब्रह्म तपो दिशः। कालेनोदेति सूर्यः काले निविशते पुनः।।3 इत्यादि अनेक मन्त्र काल को ही सृष्टि का कारण कहते हैं कि काल से ही सृष्टि हुई। इसी प्रकार के मन्त्रों का आश्रय लेकर शास्त्रकारों ने अनेक प्रकार से काल की महिमा का वर्णन किया है। और ठीक-ठीक तो यह है कि उत्पत्ति-स्थिति-प्रलयों में काल ही प्रथम कारण है क्योंकि कभी आधी रात में सूर्य का उदय नहीं हो सकता अथवा न मध्याह्न में अस्त हो सकता है। इसी प्रकार अनियत समय में सृष्टि भी उत्पन्न नहीं हो सकती, किन्तु अपने-अपने समय में सब उत्पन्न होते, समय आने पर नष्ट होते और अपने समय में सब वस्तु स्थिर रहते हैं। समय पर वृक्ष फूलते-ह्ल लते, समय पर मेघ वर्षता है। इसी प्रकार सब पदार्थ अपने-अपने समय पर उत्पन्न होते हैं। इसीलिये कहा गया कि काल प्रजाओं को उत्पन्न करता है। अर्थात् प्रलय के पश्चात् जब उत्पत्ति का समय आता है तभी परमेश्वर भी जगत् को रचता है किन्तु समय के नियम को परमेश्वर भी नहीं तोड़ता वा तोड़ सकता। तात्पर्य यह है कि प्रलय दशा के भीतर परमेश्वर भी सृष्टि रचने में असमर्थ है। इसीलिये कहा है कि काल ने ही प्रथम सृष्टि होने से पूर्व परमेश्वर को सृष्टि रचने के लिये प्रेरित किया। जैसे प्रातःकाल में सूर्य का उदय होना मनुष्यों को प्रेरणा कर निद्रा से उठाता वा उद्योग कराता है। तथा कश्यप नाम सबको दिखाने वाला, सर्वज्ञ, सर्वाधार, सबकी स्थिति का हेतु, सर्वरक्षक, सर्वसाक्षी परमेश्वर किसी मनुष्य की सहायता के बिना रचना का उद्योग करता है। इसीलिये उसको स्वयम्भू कहते हैं। वह परमेश्वर ऐसा होने पर भी काल की प्रेरणा से ही स्वाभाविक शक्ति के साथ सब करता है। तप नाम सृष्टि रचना का ज्ञान भी काल से ही होता है कि काम मुझको इस प्रकार करना चाहिये। मनुष्य भी अपने शरीर से हो सकने वाली प्रत्येक रचना को काल से ही जानता है कि अमुक काम का समय आ गया, वह अब करना चाहिये। काल से ही जल वा प्राण उत्पन्न हुए। वेदज्ञान और दिशा भी काल से ही उत्पन्न होती हैं, काल से सूर्य का उदय और अस्त होता है। यह सब अथर्ववेद के मन्त्रों का आशय है। इसी प्रकार काल की प्रधानता वैशेषिकशास्त्र में भी विशेषकर कही है।

तथा वेद में कर्मादि को भी सृष्टि के कारण ठहराने वाले बहुत मन्त्र हैं, उनका संग्रह खोजने से हो सकता है। कर्म की प्रधानता मीमांसा और न्याय में कही है। सांख्यशास्त्र में जगत् के उपादान कारण का और वेदान्त ब्रह्मसूत्रों में जगत् के निमित्त कारण का विशेषकर व्याख्यान किया है। वे अपने-अपने अवसर पर सब प्रधान हैं। इसलिये सृष्टि में परस्पर किसी प्रकार का विरोध नहीं है।

विद्वानों ने परमेश्वर के जो काम स्वीकार किये हैं, उनको वह मनुष्य के तुल्य नहीं करता, किन्तु जैसे सूर्य के उदय होने के पश्चात् बहुत कार्य सूर्य के निमितमात्र वर्तमान रहने से होते हैं। सूर्य के होने पर उन कार्यों का वैसा होना और न होने पर वैसा न होना ही सूर्य का निमित्त कारण होना जताता है। वैसे ही परमेश्वर के प्रकट होने पर सृष्टि उत्पन्न होती है (जैसे कि स्वामी के उपस्थित सम्मुख रहने पर सेवक लोग अपना-अपना काम यथावत् करते हैं, स्वामी को कुछ कहने तक की आवश्यकता नहीं होती। पर वह चाहता है कि ये सेवक जन ऐसा करें और सेवक भी चाहते हैं कि हम स्वामी की इच्छानुसार करें) किन्तु वह कुम्हार के तुल्य हाथ से काम नहीं करता। इसी आशय को लेकर कोई लोग सृष्टि करने में परमेश्वर की अपेक्षा नहीं समझते उनको यह भ्रान्ति ही है। क्योंकि निमित्त कारण के बिना वे लोग सृष्टि-प्रक्रिया का प्रतिपादन नहीं कर सकते। अर्थात् जड़ वस्तुओं के संयोगमात्र से ईक्षण पूर्वक सृष्टि नहीं हो सकती। इसलिये श्रौतस्मार्त्त सिद्धान्त के अनुसार सर्वज्ञ चेतन कोई इस जगत् का कर्त्ता है, ऐसा सब शिष्ट विद्वानों का सम्मत हमको भी मान्य है।

उन अवान्तर प्रलयों में जिस प्रकार वा जो सृष्टि उत्पन्न होती है, उसका यहां वर्णन नहीं है किन्तु ब्राह्म कल्प में होने वाली सृष्टि का वर्णन है। और अवान्तर प्रलय ब्रह्म के एक ही दिन में (प्रत्येक मन्वन्तर के आदि-अन्त में जैसा कि सूर्यसिद्धान्त में विशेषकर वर्णन किया गया है) कई बार होते हैं उनमें भूतसृष्टि का सर्वथा प्रलय नहीं होता, किन्तु प्रायः प्राणियों का प्रलय होता है। किन्हीं-किन्हीं ग्रन्थों में अवान्तर प्रलय के पश्चात् सृष्टि का वर्णन है, उसके साथ इस ब्राह्मदिन की सृष्टि का कुछ विरोध हो तो वह विरोध नहीं जानना चाहिये, क्योंकि उन दोनों सृष्टियों में देशकालादि के भेद से विषय में भेद हो गया और विषय भेद में विरोध होता नहीं, किन्तु एक ही विषय में विरोध होता है। उन प्रलय और सृष्टि के भेदों के व्याख्यान का यहां अवसर नहीं, किन्तु यहां तो इस वर्त्तमान ब्राह्मदिन के प्रारम्भ में कैसे सृष्टि हुई ऐसा विचार किया जाता है।

उसमें अन्य भाष्यकारों का यह सिद्धान्त है कि प्रलय दो प्रकार का है एक महाप्रलय और द्वितीय अवान्तर प्रलय। महाप्रलय में ब्रह्मा भी नहीं रहता क्योंकि महाप्रलय का समय आने तक ब्रह्मा की आयु भी पूर्ण हो जाती है और अवान्तर प्रलयों में वही एक ब्रह्मा स्थित रहता वा सोता है। महाप्रलय के पश्चात् सृष्टि का वर्णन करने में ब्रह्मा की भी उत्पत्ति कहनी पड़ती है। सो यहां मनुस्मृति के सृष्टि-प्रकरण में ब्रह्मा की उत्पत्ति मानते हैं इससे महाप्रलय के पश्चात् सृष्टि का वर्णन मनुस्मृति में बतलाना बनता है। ऐसा माना जावे तो इन लोगों के कथनानुसार ब्राह्म महाकल्प का यह प्रथम दिन हुआ और इस हिसाब से ब्रह्मा अभी एक दिन का नहीं हुआ। परन्तु प्रचरित पञ्चाग् और सटल्प की प्रक्रिया से यह कथन विरुद्ध प्रतीत होता है। क्योंकि पञ्चागें के लेखानुसार सटल्प में भी यह पढ़ा जाता है- “समस्तजगदुत्पत्तिस्थितिलयकारणस्य कमलासनस्य स्वमानेन परमायुर्वर्षशतं तस्यार्द्धं पञ्चाशद् गतमथ ब्रह्मणो द्वितीये परार्द्धे प्रथमवर्षे प्रथममासे प्रथमपक्षे प्रथमदिवसे द्वितीययामे- इत्यादि पञ्चाग्ेषु दृश्यते।” इसका तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय करने वाले ब्रह्मा की अपने दिन आदि के परिमाण से सौ वर्ष की अवस्था है उसका आधा ५० वर्ष बीत गया अब ब्रह्मा के द्वितीय उत्तरार्द्ध के प्रथम वर्ष के प्रथम मास के प्रथम पक्ष के प्रथम दिन में यह द्वितीय प्रहर है इत्यादि। पाठकों को इससे स्पष्ट विरोध प्रतीत हो जायगा। और परस्पर विरुद्ध पक्ष कदापि ठीक नहीं होते, यह विद्वानों का सिद्धान्त है। और वह ब्रह्मा अपने वर्षों से नियत सौ वर्ष जीवता है। यही महाप्रलय के अन्त में ह्लि र उत्पन्न होकर और अवान्तर प्रलयों में जाग-जाग कर सृष्टि रचता है। इत्यादि प्रकार शरीरधारी की असम्भव आयु स्वीकार करते हैं।

इसका उत्तर यह है कि किसी शरीरधारी की इतनी अवस्था हो नहीं सकती क्योंकि अन्य प्राणियों के तुल्य उसका शरीर भी मिट्टी आदि के परमाणुओं से मिलकर बना है। वे संयोगी पदार्थ कोई ऐसे नहीं जो अर्बों वर्ष चल जावें। सौ वर्ष की अवस्था वाला पुरुष है वा ‘मैं सौ वर्ष तक देखूं’ इत्यादि प्रकार वेद में भी कहा है जिससे सिद्ध है कि मनुष्य का आयु सौ वर्ष का है। और सौ शब्द से दैव वा ब्राह्म कोई सौ वर्ष लिये जावें सो नहीं, किन्तु मानुष ही लिये जावेंगे, क्योंकि वेदसम्बन्धी सब ही नियम वा आज्ञा मनुष्य पर ही घटती हैं। कोई कहे कि वेद में तो “भूयश्च शरदः शतात्” इस प्रमाण के अनुसार अधिक भी आयु हो सकती है। तो भी कोटिगुण अधिक नहीं हो सकती। संयेाग से उत्पन्न होने वाले वस्तु की ऐसी अवधि हो यह कौन बुद्धिमान् मान लेगा ?

तथा संयोग से उत्पन्न हुआ परिच्छिन्न- जिसकी लम्बाई-चौड़ाई आदि की अवधि है, ऐसा मनुष्य अचिन्त्य शक्ति से युक्त और अनन्तशक्ति नहीं हो सकता। सर्वशक्तिमान् परमेश्वर यदि अपने तुल्य अन्य ब्रह्मा को उत्पन्न करे तो जानो यह स्वयं जगत् को नहीं बना सकता। और जब जगत् को नहीं रच सकता तो उसका सर्वशक्तिमान् होना भी सिद्ध होना दुस्तर है। और ऐसा मानने से अनेक ईश्वर माननेरूप दोष भी उनके मत में आता है। और हमको ऐसा कोई प्रयोजन भी नहीं जान पड़ता कि जो प्राणियों की रचना के लिये किसी देहधारी पुरुषविशेष ब्रह्मादि को परमेश्वर बनाये। तिससे यह पक्ष श्रेष्ठ नहीं है।

कोई मेधातिथि आदि भाष्यकार इस प्रसग् में प्रचरित सांख्य के मतानुसार सृष्टि का वर्णन करते हैं तथा इस मनुस्मृति के सृष्टि-प्रकरण में कोई कुल्लूक भट्ट आदि परमेश्वर ही जगत् का उपदानकारण है ऐसे आधुनिक वेदान्त मत को स्वीकार करके सृष्टिप्रक्रिया का वर्णन करते हैं। और वेदान्त तथा सांख्य के सिद्धान्त में परस्पर विरोध मानते हैं, वह उन लोगों का केवल भ्रममात्र है, किन्तु सांख्य-वेदान्त में सृष्टिप्रक्रिया में मतभेद नहीं है। इस कार्य जगत् का उपादानकारण जड़ कारण ही हो सकता है। कार्य-कारण की विरूपता वा विरुद्धता किसी प्रकार सिद्ध करना ठीक नहीं हो सकता। अर्थात् वेदान्त का यह सिद्धान्त नहीं है कि जगत् का उपादानकारण चेतन आत्मा है। और सांख्य में भी किसी परमात्मा के बिना स्वतन्त्र जड़ स्वरूप प्रकृति विचार पूर्वक होने वाली सृष्टि को नहीं बना सकती। इसलिये दोनों का विरोध न होना ही ठीक है। वेदान्त में निमित्त कारण का तथा सांख्य में उपादान का प्रधानता के साथ वर्णन होने से लोगों को भ्रान्ति हो गई होगी कि सांख्यवादी तो केवल प्रकृति को ही जगत् का कारण मानते हैं, और वेदान्त में भी ब्रह्म को ही कारण माना है, ऐसा अनुमान से भ्रम होना सम्भव जान पड़ता है। सृष्टि के आरम्भ में परमेश्वर सृष्टि बनाने के पूर्वकल्प सम्बन्धी प्रकार को सोचता है, इसी का नाम ईक्षण, इसी का नाम तप और यही उसका प्रादुर्भाव है, यही उसकी प्रकटता है और इसी से वह स्वयम्भू कहाता है। इन वाक्यों से अन्य किसी देहधारी की उत्पत्ति होती हो ऐसा विचार न करना चाहिये। इस सब कथन से एक ही परमेश्वर इस सृष्टि का निमित्त कारणरूप है, यह कथन सिद्ध होता है। वाद-विवाद तो बने ही रहते हैं।

सृष्टि-प्रकरण का सामान्य विचार :पण्डित भीमसेन शर्मा

अब क्रमप्राप्त छठे सृष्टि प्रकरण की आलोचना करनी चाहिये। इस प्रकरण में कई अंश विचारने योग्य हैं, जिनमें पहला अंश यह है कि इस मानवधर्मशास्त्र में सृष्टि का वर्णन क्यों होना चाहिये ? क्योंकि इसका नाम धर्मशास्त्र है, सृष्टि का वर्णन करना कोई धर्म नहीं है। और यही बात अन्य महर्षियों ने मनु जी से पूछी सो इस मनुस्मृति के आरम्भ में द्वितीय श्लोक में ही लिखा है कि- ‘हे मनु जी! आप सब ब्राह्मणादि वर्णों और वर्णसटरों के धर्म कहने योग्य वा समर्थ हैं।’१ केवल इसी एक प्रश्न के ऊपर यह सब धर्मशास्त्र बना है अर्थात् यह मनुस्मृति इसी प्रश्न का उत्तररूप है, तो इसमें सृष्टि की उत्पत्ति कहने का काई प्रश्न भी नहीं, ह्लि र इस प्रथमाध्याय में सृष्टि का वर्णन क्यों किया गया ? और किया गया तो ‘आम पूछने पर कचनार के उत्तर देने’ के तुल्य प्रमत्तदशा का कथन हो गया। इस प्रसग् में इग्लेण्ड निवासी व्यूलर साहब ने कहा है कि- ‘गौतम और वसिष्ठ आदि के धर्मशास्त्रों में तथा मानव धर्मसूत्रों में सृष्टि का वर्णन नहीं प्राप्त होता और न यह सृष्टि की प्रक्रिया का वर्णन धर्मशास्त्र के साथ सम्बन्ध रखता है तथा सृष्टि का व्याख्यान धर्म भी नहीं हो सकता और धर्मशास्त्रों की परिपाटी से भी यह विपरीत है। इससे सृष्टि का प्रकरणरूप प्रथमाध्याय इस पुस्तक में पीछे किन्हीं लोगों ने मिलाया है।’ यह उक्त गौराग् महाशय का आशय है। इसी शटा को लेकर दो श्लोक२, पीछे बनाकर किन्हीं लोगों ने द्वितीय श्लोक के आगे धरे हैं। कि- ‘मनुष्य पश्वादि, पक्षी सर्पादि, मक्खी मच्छरादि और वृक्षादि तथा पृथिवी आदि सब भूतों की उत्पत्ति और प्रलय को सबके आचरण और विवादों का निर्णय- राज्यव्यवस्था राजनीति आदि सम्पूर्ण कहो।’ ये दोनों श्लोक मुम्बई के छपे छह टीका से युक्त पुस्तक में पाठान्तर बुद्धि से छपे हैं। और इन दोनों का व्याख्यान आधुनिक अति नवीन टीकाकार नन्दन और रामचन्द्र ने किया है। इससे इन दोनों श्लोकों का प्रक्षिप्त होना स्पष्ट प्रतीत होता है। यदि पूर्व से ये श्लोक होते तो पहले भाष्यकार मेधातिथि आदि भी इनका भाष्य करते वा ऐसी शटा न करते कि “क्वास्ताः क्व निपतिताः”। सो ये श्लोक वास्तव में इस पुस्तक के नहीं, इससे पीछे किसी ने मिलाये, यही निश्चय है। इस पर अधिक विचार करने की आवश्यकता नहीं है।

इस प्रसग् में जो प्रश्न और उत्तर में विरोध आता है, उसको हटाने के लिये भाष्यकारों ने समाधान दिये हैं। उनमें पहले मेधातिथि भाष्यकार ने लिखा है कि- ‘इस सृष्टिप्रक्रिया के वर्णन से इस धर्मशास्त्र का महान् प्रयोजन जताया गया है क्योंकि ब्रह्मा से लेकर वृक्षादि पर्यन्त धर्म-अधर्म ही जिनके निमित्त, ऐसी संसार की दशा इस प्रकरण में कही गयी है। ‘वैसे कर्म होने में बहुत प्रकार के तमोगुण से ढपे हुए स्थावर योनि में जीव रहते हैं।’१ तथा आगे बारहवें अध्याय में भी कहा है कि- ‘अपने कर्मों के अनुसार जीवात्मा की इन पूर्वोक्त दशाओं को विचारपूर्वक देखकर धर्म-अधर्म से हटाकर केवल धर्म में मन लगावे।’२ इस प्रकार धर्म में मन के ठहराने से असीम ऐश्वर्य प्राप्ति का हेतु धर्म और इससे विपरीत असीम दरिद्रता का हेतु अधर्म है। उन दोनों का स्वरूप जानने के अर्थ महान् फल वाले इस     धर्मशास्त्र को पढ़ना चाहिये, यह इस प्रथमाध्याय का तात्पर्य है। इसके पीछे गोविन्द राज भाष्यकार ने लिखा है कि- ‘जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय धर्म-अधर्म के अधीन हैं। उसके प्रतिपादनार्थ होने से यह शास्त्र महान् प्रयोजन वा ह्ल ल वाला है, इस कारण यत्न के साथ पढ़ना चाहिये। इसलिये जगत् की उत्पत्ति का प्रकरण प्रथम आरम्भ किया है।’ इसके पीछे सर्वज्ञ नारायण ने लिखा है कि- ‘इस धर्मशास्त्र में ब्राह्मणादि वर्णों के क्रम से धर्म का कहना अभीष्ट होने से सम्पूर्ण देवताओं की उत्पत्ति रूप तत्त्वकथन का ज्ञान होता है, उससे ब्राह्मणादि वर्णों में पूर्व-पूर्व की श्रेष्ठता का प्रतिपादन इष्ट होने तथा मुखादि विशेष स्थानों से उत्पत्ति होने से वे ब्राह्मणादि श्रेष्ठ हैं, उस धर्म को कहने के लिये धर्मशास्त्रकर्त्ता ब्रह्मा की उत्पत्ति दिखाने को अपनी उत्पत्ति द्वारा जगत् की पूर्व प्रलयावस्था को प्रथम कहते हैं।’ इन सबके आशयों का खण्डन करते हुए कुल्लूक भट्ट कहते हैं कि- ‘ऋषियों के धर्मविषयक प्रश्न में जगत् के कारण होने से ब्रह्म का प्रतिपादन करना भी धर्म का ही कथन है, किन्तु प्रकरण-विरुद्ध कुछ नहीं है, क्योंकि आत्मज्ञान भी धर्म ही है। सो मनु ने ही धैर्य, क्षमा आदि दस प्रकार के धर्म कहने में विद्या शब्द वाच्य आत्मज्ञान को धर्म कहा है।’ इत्यादि प्रकार से कुल्लूक भट्ट ने बहुत कुछ लिखा है। राघवानन्द भाष्यकार समाधान कहते हैं कि- ‘धर्म के उपयोगी चार वर्णों की उत्पत्ति के क्रम से प्रधानता वा अप्रधानता मुखादि अवयवों से कहने के लिये ब्रह्मज्ञान होने के अर्थ सृष्टि के जानने की आवश्यकता प्रकट करते हुए श्रोतव्य कहते हैं।’ नन्दन और रामचन्द्र ने इस विषय में कुछ विशेष नहीं कहा, क्योंकि उनको उक्त दो श्लोक पुस्तक में मिलने से वैसी शटा ही न हुई। मेधातिथि और गोविन्दराज का समाधान विषय में एक ही आशय है। इन समाधानों से व्यूलर साहब का किया आक्षेप किसी प्रकार कट जाता है, सो बुद्धिमानों को विचारणीय है। और गौतमीयादि धर्मशास्त्रों में यदि सृष्टि का वर्णन नहीं, इससे अन्य धर्मशास्त्रों में भी न हो, यह अयुक्त है। क्योंकि जो विषय एक पुस्तक में न हो, वह अन्य किसी में क्यों न रखा जाये ? क्या एक-दो अज्ञानी वा अपूर्ण विचारशक्ति वाले हों तो सभी वैसे होने चाहियें ? वे गोतमादि के धर्मशास्त्र प्रधान नहीं, किन्तु गौण हैं। और यह मानवधर्मशास्त्र सर्वोपरि प्रधान है। इसलिये गम्भीर और प्रबल काम प्रधानों में ही हो सकते हैं, वैसा महत्त्व सबमें नहीं हो सकता। और यह नियम कहीं नहीं मिलता कि जो बात एक स्थल में न हो तो अन्यत्र होने से उसकी निन्दा हो जावे। इसलिये जिन धर्मशास्त्रों में सृष्टि का वर्णन नहीं है, उनमें यह भी एक प्रकार की न्यूनता है। और समस्त वेद धर्म का मूल है, यह सब आर्यों के सम्मत है। यदि सृष्टि के वर्णन का धर्म के साथ सम्बन्ध न हो तो वेद में भी सृष्टि का कथन स्पष्ट है, उसका भी धर्म के साथ सम्बन्ध न हो सकने से सब वेद का धर्ममूलक कहना न बने। और जब यह मानवधर्मशास्त्र मुख्य है तो इसकी जो परिपाटी है वही धर्म शास्त्रों की जाननी चाहिये। इससे विरुद्ध चलने वाले ही दूषित ठहर सकते हैं। अन्य धर्मशास्त्र इसी के आश्रयभूत हैं। इससे धर्मशास्त्र के प्रारम्भ में सृष्टि का वर्णन करना ठीक ही है।

मेधातिथि आदि भाष्यकारों ने अपनी-अपनी बुद्धि, विद्या के अनुसार         समाधान दिये हैं, वे किसी अंश में किसी प्रकार सम्भव हैं। इसलिये उनका खण्डन करने में प्रयत्न न करके यथाबुद्धि हम भी अपने विचार को प्रकाशित करते हैं- जिन किन्हीं शास्त्रों में जो कुछ जिस किसी कथनीय विषय का प्रस्ताव किया जाता है, वहां सभी स्थलों में उस विषय के चार भाग करके कथन करना चाहिये। वैसा करने से वह सुलभ होता है। सो योगभाष्य में व्यासदेव ने कहा भी है कि- (१.) रोग, (२.) रोग का कारण, (३.) रोगरहित होना, (४.) ओषधि करना। ये चार भेद त्याज्य पक्ष में हैं। इसी प्रकार सभी स्थलों में प्रथम उसके स्वरूप का निरूपण करना, द्वितीय उसके हेतु मूलकारण वा निदान को बताना कि जिससे वह उत्पन्न हुआ हो। तृतीय उसके प्रतिपक्षी शत्रु को जताना कि जिससे उसकी निवृत्ति वा हानि हो सकती है। चतुर्थ उसको प्राप्त होने वा छोड़ देने के परिणाम वा ह्ल ल को जान लेना। प्रथम जिसको त्यागना वा ग्रहण करना चाहते हैं, उसके वास्तविक स्वरूप को जान लेना चाहिये। स्वरूप का ज्ञान हुए बिना त्याग वा ग्रहण करना कदापि नहीं बन सकता। द्वितीय उसके हेतु मूल उपादान कारण का जानना इस कारण आवश्यक है कि जैसे धातुओं की विषमता से रोग होता है तो उस विषमता के मिटाने का उपाय करना, जब तक विषमता न मिटेगी तब तक रोग नहीं जा सकता। वा जैसे दीपक जलने का कारण स्नेह वा चिकनाई जान लिया जाय तो उस कारण से दीपक जला सकते और कारण का अभाव करके दीपक की निवृत्ति भी कर सकते हैं। तृतीय प्रतियोगी शत्रु का ज्ञान इस कारण आवश्यक है कि जैसे रोग का प्रतियोगी औषध वा पथ्य है। वहां अनेक प्रतियोगियों में कौन किसका प्रतियोगी है, ऐसा जान लेने से औषधादि प्रतियोगी के प्रयोग से रोगादि की निवृत्ति कर सकता है। चतुर्थ ह्ल ल जाने बिना निष्प्रयोजन वा निष्ह्ल ल कार्य के करने में रुचि वा प्रीति नहीं हो सकती इस कारण ह्ल ल का जानना आवश्यक है। यह सब प्रतिकूल वा त्याज्य वस्तु रोगादि में क्रम है। और अनुकूल में कारण मुख से (अर्थात् प्रथम कक्षा में धर्मादि के कारण को दिखाकर द्वितीय कक्षा में उसके स्वरूप को कहना जैसे प्रथम सृष्टि प्रक्रिया में धर्म का हेतु कहकर आगे स्वरूप कहा है) भी व्याख्यान होता है।

वैसे यहां मुख्य प्रसग् में देखो- कि मुख्य वस्तु जिसका स्वरूप जानना चाहिये वह धर्म ग्राह्य और अधर्म त्याज्य है। और उसका मूलकारण द्वितीय है कि जिससे धर्म उत्पन्न होता है, उस वेद और परमेश्वर को जानना वही धर्म का भण्डार है और परमेश्वर का वा कार्य जगत् के साथ रहने वाले धर्म का सम्बन्ध दिखाना यही उत्पत्ति प्रक्रिया है। तृतीय धर्म का अधर्म और अधर्म का धर्म प्रतियोगी है।   धर्म के ह्ल ल सुखविशेष वा अधर्म के ह्ल ल दुःखविशेष का जानना। निर्मूल वस्तु शशविषाण के तुल्य मिथ्या न हो इसलिये उसका समूल होना साध्य है और धर्म के समूल सिद्ध करने में सृष्टि का वर्णन धर्मानुकूल ही है, प्रतिकूल नहीं। प्रतिकूल की हानि हुए बिना अनुकूल की सम्यक् प्रवृत्ति नहीं हो सकती, ऐसा मान के शत्रुरूप अधर्म की व्याख्यान पूर्र्वक निवृत्ति करनी अवश्य चाहिये। जो कुछ मनुष्य करता है वह समूल ही करना चाहिये अर्थात् निर्मूल वस्तु वा विषय के जानने का कभी उद्योग न करे। धर्म का मूल वेद है और वेद की नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वभाव परमेश्वर से प्रवृत्ति होती है। धर्र्म के आधार ब्राह्मणादि वर्ण हैं और उन सब वर्णों को परमेश्वर ने धर्म के साथ ही धर्म की प्रवृत्ति के लिये उत्पन्न किया है। ऐसे अनेक प्रकार होने से धर्म के साथ सृष्टि का मुख्य सम्बन्ध है। और सृष्टि के आरम्भ से ही जिस धर्म की प्रवृत्ति है यही सनातन धर्म है यह जताने को भी सृष्टि के साथ धर्म का सम्बन्ध दिखाना चाहिए। इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय रूप तीन ही अवस्था हैं। उन तीनों दशाओं में सर्वोपरि विचारशील बुद्धिमान् उत्तरदाता मनु जी को धर्म की स्थिति कहनी चाहिये। क्योंकि प्रश्नकर्त्ता महर्षियों ने स्थिति दशा में ही धर्म नहीं पूछा, यदि प्रश्न में ऐसा कोई शब्द पड़ा होता कि संसार की वर्त्तमान दशा में धर्म कहो तो उत्पत्ति, प्रलय में धर्म का सम्बन्ध दिखाना ‘आम के पूछने में कचनार के उत्तर देने’ के समान विरुद्ध होता सो तो है नहीं, इस कारण सामान्य से किये प्रश्न का तीनों अवस्था में उत्तर देना ही ठीक है, इससे कुछ विरोध नहीं है। और धर्मशब्द भी द्रव्य वा जाति वाचकों का गुण वा स्वभाव है, तिससे किस दशा, देश, काल वा वस्तु में कैसा गुण वा स्वभाव है उसका यथार्थरूप से जान लेना ही धर्मज्ञान है, और ज्ञान के अनुकूल आचरण करना     धर्म का आचरण कहाता है। ऐसा धर्म किसी एक ही दशा में नहीं हो सकता, किन्तु सब दशाओं में स्वरूप भेद से रहता है। इसी प्रकार विपरीत ज्ञान अधर्म दुःख का हेतु है यह कह सकते हैं। इसी पूर्वोक्त आशय को लेकर के ही ‘हम इस कारण अब धर्म की व्याख्या करेंगे’१ यह वैशेषिककार की प्रतिज्ञा बन सकती है। क्योंकि मनुस्मृति आदि ग्रन्थकारों के समान उस वैशेषिक ग्रन्थ में धर्म का व्याख्यान नहीं दीख पड़ता है। इसलिये जिस गुण वा स्वभाव का नाम धर्म है, वह कार्यरूप वा कारणरूप वस्तु में उत्पत्ति, स्थिति वा प्रलय तीनों दशा में अवस्थित अवश्य रहता है। इस कारण प्रश्न के सामान्य दशापरक होने से तीनों दशा के साथ उसका व्याख्यान उचित है और जो प्रलय वा उत्पत्ति दशा में धर्म न रहे उसका सनातन होना नहीं कह सकते। इसलिये सब दशाओं के साथ धर्म मानना चाहिए।

प्रलय दशा में धर्मी के साथ धर्म भी दबा हुआ रहता है, उत्पत्ति दशा में वही धर्म धर्मी के साथ प्रकट हो जाता है। जो कारणदशा में नहीं है उसका यदि कार्यदशा में भाव माना जावे तो सूखे चिकनाहट रहित तिलों में से भी तेल निकलना चाहिये सो नहीं होता। तो धर्म को भी सब दशाओं के साथ अवस्थित मानना चाहिये, इस कारण तीनों दशाओं के साथ दशा के तुल्यरूप से ही धर्म का व्याख्यान होना भी ठीक है। कैसे गुण वाले सामर्थ्य वा कारण से किस वस्तु की उत्पत्ति हुई ? ऐसा ज्ञान हुए बिना कार्य में भी गुणरूप धर्म का ठीक-ठीक ज्ञान नहीं हो सकता। और वैसा ज्ञान उत्पत्ति दशा का क्रमपूर्वक वर्णन हुए बिना नहीं हो सकता। इस कारण धर्म का मर्म ज्ञान होने के लिये सृष्टि का वर्णन पहले किया गया। तथा सनातन धर्म कारण से ही कार्य में आते हैं, उनका उत्पत्ति प्रकरण के साथ सुगमता से ज्ञान हो सकता है। जैसे मुख से ब्राह्मण रचा गया, इसलिये वर्णों में ब्राह्मण मुख्य है। यहां कारण से ही मुख्यता आयी है। इस कारण धर्म की व्याख्या के साथ सृष्टि की प्रक्रिया कहनी चाहिये। तथा एक उत्तर यह भी है कि जब कोई किसी वस्तु को पूछकर जानना चाहे तो उत्तरदाता को उचित होगा कि प्रश्नकर्त्ता की ठीक तृप्ति होने के लिये उस विषय वा वस्तु को मूल वा उत्पत्ति सहित समझा दे, जिससे किसी प्रकार का सन्देह शेष न रह जावे। इस कारण     धर्म प्रकरण में सृष्टि का भी वर्णन होना उचित है। इस कथन से व्यूलरसाहब का भी उत्तर आ गया।

और धर्म शब्द का अर्थ भी जो धारण, आत्मा वा अन्तःकरण से मिलित वा अनुकूल मान के आकर्षण किया जावे वह धर्म कहा गया है, वह सब उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयदशा में वर्णों से किस प्रकार धारण किया जाता है, ऐसा प्रश्न का आशय माना जावे तो प्रश्न उत्तर में कुछ भी विरोध नहीं, किन्तु मेल है। व्यूलरसाहब के कहने से राज्य की व्यवस्था करना भी धर्मशास्त्र के अनुकूल नहीं। तब ऐसी दशा में यदि कोई पूछे कि क्षत्रिय का क्या धर्म है ? तो क्या कहना चाहिए ? इससे राज्य की व्यवस्था करना क्षत्रिय का धर्म है, उसकी व्याख्या     धर्मशास्त्र में क्यों न हो ? व्यूलरसाहब का आशय कोई विद्वान् सुने तो यही निकलेगा कि जो मनुष्यजाति की उन्नति के कारण हैं अथवा जिसके सेवन से वेदमत के अनुगामीमात्र आर्य लोगों की उन्नति हो सकती है वे ही विषय इस मनुस्मृति पुस्तक में आधुनिक लोगों ने मिलाये हैं। जैसे राजधर्म को प्र्रक्षिप्त कहा इत्यादि। इस पर विचारशीलों को ध्यान देना चाहिए कि इससे क्या तत्त्व निकलता है ? सो भी बुद्धिमान् लोग विचार ही लेंगे। अर्थात् भारतवासियों की पुरानी दशा को निकृष्ट कहना। वर्त्तमान में तो प्रत्यक्ष हीन दशा में हैं। अर्थात् उनको आर्यों की उच्च दशा कदापि अभीष्ट नहीं। इससे अनेक राजनैतिक लोग गूढ़ प्रयोजनसिद्धियां मानते हैं।

कुरान समीक्षा : खुदा अपनी पूजा का भूखा है

खुदा अपनी पूजा का भूखा है

अपनी पूजा का शौक खुदा को पैदा हुआ तो उसने सभी को अपना चेला क्यों नहीं बनाया और क्यों लोगों को स्वयं गुमराह किया? व क्यों लोगों के पीछे शैतान लगाये ताकि वे गुमराह होवें । अपनी पूजा के शौक से खुदा को क्या लाभ पहुंचता था यह बताया जावे?

देखिये कुरान में कहा गया है कि-

व माख-लक्तुल्जि-न वल्इन………।।

(कुरान मजीद पारा २७ सूरा जारियात रूकू ३ आयत ५६)

और मैंने जिन्नों और आदमियों को इसी मतलब से पैदा किया है कि वे हमारी पूजा करें।

समीक्षा

खुदा को अपनी पूजा कराने का शौक प्रत्यक्ष है। इन्सान को उसकी तरक्की व फायदे तथा पुरूषार्थ के लिये पैदा न करके खुदगरजी से खुदा ने पैदा किया है। यदि ऐसी ही बात थी तो दोजख भरने के लिए गुनाहगारों को पैदा करने की क्या जरूरत थी? सभी को खुदापरस्त बना देना चाहिए था।

कुरान समीक्षा : खुदा ने आसमानों को अपने बाहुबल से बनाया था

खुदा ने आसमानों को अपने बाहुबल से बनाया था

दूनियां बनाने वक्त खुदा ‘कुन’अर्थात् हो जा कहकर सब कुछ बना लेने का अपना बताया नुस्खा क्यों भूल गया तथा खुदा के हाथ कितने लम्बे हैं? क्या पोला आकाश भी बनाया सकता है, जो स्वयं में कुछ भी ने हों?

देखिये कुरान में कहा गया है कि-

वस्समा-अ बनैनाहा बिऐदिव्-व……….।।

(कुरान मजीद पारा २७ सूरा जारियात रूकू ३ आयत ४७)

और हमने आसमानों को अपने बाहुबल से बनाया और हम सामर्थ्य वाले हैं।

समीक्षा

खुदा ने शून्य आकाश (जिसे बनाने की बात कहना भी नादानी है) को अपने हाथों की बड़ी भारी ताकत लगाकर बनाया था। वाकई अरबी खुदा के हाथों में बड़ी ताकत है कि वह शून्य आकाश को भी बना सकता है जिसमें कुछ नहीं बना होता है।

धर्म के लक्षणों की परस्पर उत्तमता, मध्यमता और निकृष्टता का विचार: पण्डित भीमसेन शर्मा

अब धर्मों की उत्तमता, मध्यमता और निकृष्टता का सापेक्ष होना इस पाँचवें प्रकरण में दिखाते हैं- इससे पूर्व धर्म शब्द का व्याकरण और कोष सम्बन्धी दोनों अर्थ दिखाया गया है। अब धर्म के अवान्तर भेद, उसका स्वरूप और उस धर्म के सहायकारी कहने चाहियें। इसके पीछे धर्मों के उत्तम, मध्यम, निकृष्ट होने में सापेक्षता कहेंगे।

इसी मानवधर्मशास्त्र में लिखा है कि ‘सम्पूर्ण वेद धर्म का मूल है’१ इस प्रमाण का आश्रय लेकर वृक्षरूप धर्म का मूल वेद है क्योंकि वेद से ही धर्मरूप वृक्ष उगता है यह विद्वानों का सिद्धान्त है। उस वृक्षरूप धर्म के तीन अवयव या भाग मुख्य हैं। सो ब्राह्मणों या उपनिषदों में ठीक-ठीक कहा है कि ‘धर्म के तीन कांड वा गुद्दे हैं- यज्ञ, अध्ययन और दान’२। वृक्ष में पहले निकलने वाली स्थूल शाखाओं को स्कन्ध (गुद्दा) कहते हैं। वैसे ही धर्म के मुख्य या स्थूल तीन अवयव हैं। अर्थात् धर्म तीन भागों में विभक्त है। यज्ञ शब्द से कर्म, उपासना और ज्ञान इन तीनों का ग्रहण होता हैं। इसीलिये धर्मशास्त्र में लिखा है कि- ‘कोई विद्वान् लोग वाणी में प्राण का और कोई प्राण में वाणी का होम करते हैं’३ अर्थात् यह अध्यात्म यज्ञ है। जो लोग प्राण की क्रिया को वाणी में अर्थात् देखने-सुनने रूप क्रिया को वाणी में समाप्त करते अर्थात् वाणी से पढ़ना-पढ़ाना, धर्म   सम्बन्धी सत्य विषयों का उपदेश करना वा स्तुति-प्रार्थना की प्रवृत्ति बढ़ाना और अन्य इन्द्रियों के कार्य को शिथिल करना जानते हैं, वे ही जानो वाणी में अर्थात् कर्मेन्द्रियों में ज्ञानेन्द्रियों को शिथिल वा लीन करते हैं। और जो प्राण में वाणी का होम करते हैं, वे ज्ञानेन्द्रियों में कर्मेन्द्रियों की वृत्ति को समाप्त करते हैं। क्योंकि ज्ञानेन्द्रियों की मुख्य प्रवृत्ति करने वाला प्राण है। और वाणी में प्राण का वा प्राण में वाणी का कोई लोग होम करते हैं, इस कथन का मुख्य अभिप्राय तो यही है कि सत्यभाषण और प्राणायामादि धर्म सम्बन्धी कृत्य भी एक यज्ञ ही है। वेदादि शास्त्रों वा उनके अभिप्रायों को सत्यवक्ता विद्वान् के मुख से सुनना और उस सुनने से हुए अच्छे संस्कार वा शुभ गुणों का धारण करना अध्ययनरूप धर्म कहाता है। उन वेदादि के ही सुनने से धारण किये धर्मरूप संस्कारों को परोपकार होने के लिए देना दान कहाता है, अर्थात् शास्त्र की आज्ञानुसार अन्यों को सुख पहुंचाने के लिए विद्या वा धर्म उपदेश करना वाणी का देना है। मन से अन्यों का भला चाहना मन का दान है। और शास्त्र में लिखे अनुसार सुपात्रों का धनादि से यथायोग्य सत्कार करना शरीर से दान है। अर्थात् जिन पदार्थों से अन्य प्राणियों को सुख पहुंचे तथा वे पदार्थ अपने पास हों तो दूसरों को देना मुख्यकर दान है। प्रयोजन यह है कि जिस वस्तु को हम देना चाहते हैं वह याचक के पास भी है और उसके देने से ग्रहीता को विशेष सुख नहीं पहुंचता तो वह मुख्य दान नहीं किन्तु गौण है। इससे सिद्ध हुआ कि जिस वस्तु, गुण, कर्म वा वचन के बिना किसी को दुःख मिल रहा है और वही वस्तु आदि यदि अपने निकट है तो उस मनुष्य को उस वस्तु आदि का अंश उस दुःखी आदि को देना चाहिये यही दान परमधर्म है। और जो दया, क्षमा, जितेन्द्रियतादि अन्य धर्म के अवयव दीख पड़ते हैं, वे इसी तीन प्रकार के अवान्तर भेद हैं। जैसे दान के अन्तर्गत दया घुस जाती है। क्योंकि दया का प्रयोजन है कि दुःखी पर दया करे तो उसको दुःख हटने के लिये औषध देवे कि जिससे उसका दुःख दूर हो तो जानो वह पुरुष दयालु है। दया दान में भेद केवल यही है कि दया केवल मानस धर्म है और दान मुख्यकर वाणी और शरीर से सम्बन्ध रखता है। इसी प्रकार अन्य भी भेद इन्हीं में आ जाते हैं।

मनुस्मृति के षष्ठाध्याय में लिखा है१ कि ‘धृति- धैर्य, क्षमा- सहना, दम- इन्द्रियों की भीतरी वृत्ति को वश में रखना, अस्तेय- आज्ञा के बिना किसी की वस्तु को न लेना, शौच- मन वा शरीर को भीतर-बाहर शुद्ध रखना अर्थात् मिथ्या व्यवहार न करना। इसीलिये पञ्चमाध्याय में लिखा है कि- ‘जो लेन-देनरूप व्यवहार में शुद्ध है, जो कभी मिथ्या व्यवहार वा छल प्रपञ्चादि नहीं करता है, वही शुद्ध है और उसकी अपेक्षा मिट्टी-जल से शुद्ध हुआ वैसा शुद्ध नहीं।’२ अर्थात् इसका यह अभिप्राय नहीं है कि मिट्टी-जल से शुद्धि न करनी चाहिये वा करना अच्छा नहीं, किन्तु अभिप्राय यह है कि एक तो केवल मिट्टी-जल से शरीर को शुद्ध रखता और एक पुरुष शुद्ध सत्य व्यवहार करता, भीतर से किसी प्रकार का छल-कपट नहीं रखता, इन दोनों में व्यवहार की शुद्धि रखने वाला उसकी अपेक्षा अच्छा श्रेष्ठ है। दोनों प्रकार की शुद्धि न रखने की अपेक्षा केवल शरीर को शुद्ध रखने वाला भी उत्तम है परन्तु दोनों प्रकार की भीतर-बाहर शुद्धि रखने वाला केवल व्यवहार की शुद्धि रखने वाले की अपेक्षा अत्यन्त श्रेष्ठ है। इस प्रकार ये सब सापेक्ष हैं।

विषयों पर गिरने से इन्द्रियों को रोकना इन्द्रियनिग्रह कहाता है। धी- कर्त्तव्याकर्त्तव्य को न भूलना या विचार पूर्वक परिणाम को सोचकर कार्य का प्रारम्भ करना, विद्या पढ़ना, सत्य बोलना और क्रोध को छोड़ना ये आध्यात्मिक सामान्यकर धर्म के दश चिह्न हैं।’ ये चिह्न जिसमें हों, वह पुरुष सामान्य कर धर्मात्मा कहाता है। ये सामान्य धर्म के स्वरूप हैं। इनके साथ सामान्य विशेषण इसलिये लगाया है कि ये किसी निज ब्राह्मणादि वर्ण के धर्म नहीं किन्तु सब वर्णों वा सब आश्रमियों को सेवने योग्य हैं। यद्यपि सामान्य धर्म का सेवन किये बिना विशेष का सेवन ठीक-ठीक उपकारी नहीं हो सकता, तथापि यदि दोनों का एक साथ सेवन आ पड़े और एक ही का हो सकता हो तो वहां विशेष का सेवन करना चाहिये और सामान्य को छोड़ देना चाहिये यही विशेष धर्म में विशेषता है। और इसी आशय को लेकर कहा गया है कि- ‘विशेष प्रबल होता है।’१ इसीलिये इस श्लोक से पूर्व ९१वें श्लोक में यह धर्म चारों आश्रम वालों को सेवने योग्य लिखा है।

महाभारत के वनपर्वान्तर्गत यक्ष-युधिष्ठिर संवाद में लिखा है कि- ‘यशः= अच्छे-अच्छे संसारी मनुष्यों को सुख पहुंचानेरूप धर्मसम्बन्धी कार्यों के करने से संसार में कीर्त्ति होना सत्यम्= मन, वचन, कर्म से सत्य का वर्त्ताव करना दमः= इन्द्रियों के साथ लगी मन की वृत्ति को वश में करना शौचम्= विद्या, तप आदि से भीतरी मन की और मिट्टी-जलादि से बाहरी शरीर की शुद्धि करना आर्जवम्= कोमलता का वर्त्ताव करना अर्थात् गर्व, मान, अभिमान, ईर्ष्या, द्वेष या क्रोधादि का छोड़ना ह्रीः= बुरे निन्दित काम से लज्जित होना अचापलम्= चपलता का छोड़ना दानम्= सुपात्रों को विद्या, धनादि का यथायोग्य देना दया= चित्त में दूसरों के दुःख हटाने की इच्छा रखना वा अन्य के दुःख में दुःख मानना ब्रह्मचर्यम्= धर्मशास्त्रों में लिखे अनुसार ब्रह्मचर्य आश्रम के नियमों का यथावत् सेवन करना वा गृहाश्रम में भी परस्त्री के साथ व्यभिचार छोड़कर अपनी स्त्री के साथ ऋतुकालाभिगामी होना, ये सब धर्म के शरीर वा स्वरूप हैं।’२ अर्थात् इन सबका होना ही साक्षात्   धर्म का होना है। और ये लक्षण जिसमें हों वही धर्मात्मा कहाता है।

तथा महाभारत के उसी स्थल में यह भी लिखा है कि- ‘अंहिसा= सब काल में सब प्राणियों से सब प्रकार द्रोह न रखना समता= अपने तुल्य सबको समझना जैसे हम अपने लिये किसी प्रकार का दुःख वा दुःख की सामग्री नहीं चाहते वैसे जान लें कि अन्य भी कोई नहीं चाहता होगा। जैसे दुःख देने वाले को हम बुरा समझते हैं, वैसे यदि हम किसी को दुःख दें तो हमको भी वह वैसा ही समझेगा। इसका नाम समता है। इसी को आत्मौपम्यदर्शन भी कहते हैं। शान्तिः= व्याकुल न होना न घबराना तपः= भूख-प्यास, मान-अपमान आदि में हर्ष-शोक न करना शौचम्= पवित्रता रखना अमत्सरः= ईर्ष्या, मत्सरता का छोड़ना, ये सब धर्म के द्वार हैं’१ अर्थात् धर्मरूप दुर्ग में घुसना, चाहे वह इन अहिंसादि का सेवन करे। जो मनुष्य अहिंसादि की परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया, वह जानो धर्म के द्वार पर पहुंच गया। परन्तु यह भी सामान्य धर्म है अर्थात् सब मनुष्यमात्र को सेवने योग्य है।

तथा महाभारत उद्योगपर्व के विदुरप्रजागर में यह लिखा है कि- ‘यज्ञ करना, वेदादि का पढ़ना और दान देना, तप- मानापमानादि का सहना, सत्य बोलना, क्षमा करना, बुराई से घृणा रखना, लाभ छोड़के सन्तोष को धारण करना यह आठ प्रकार का धर्म सम्बन्धी मार्ग है।’२ इस पर चलने वाला धर्मनिष्ठ वा     धर्मात्मा कहाता है। यह सब भी उन्हीं तीन यज्ञादि धर्मों का व्याख्यान या विस्तार है। इन पूर्वोक्त धर्म के आठ भेदों में से यज्ञ, अध्ययन, दान, तप ये चार दम्भ के लिये भी सेवन किये जाते हैं। अर्थात् अपने को धर्मात्मा प्रसिद्ध करने के लिये ढोंगलीला करने वाले लोग भी दिखाने मात्र के लिये यज्ञादि करते वा कर सकते हैं। और पिछले सत्यादि चार धर्म के लक्षण दुरात्मा वा अधर्मियों में नहीं ठहर सकते। अर्थात् पिछले चार का सेवन दम्भ से नहीं हो सकता। परन्तु धर्म का मुख्य स्वरूप तो सत्य ही है। इसी कारण शास्त्रों में सर्वोपरि सत्य की प्रशंसा लिखी है कि- ‘सत्य से परे कोई उत्तम धर्म नहीं और मिथ्या व्यवहार से परे बुरा कोई पाप नहीं।’३ तथा ‘जिसमें सत्य का लेश नहीं वह धर्म नहीं है।’४ इससे सत्य और     धर्म का समवाय सम्बन्ध समझना चाहिये कि जहां-जहां सत्य रहता है वहां-वहां धर्म वा जहां-जहां धर्म है वहां-वहां सत्य अवश्य रहता है। इससे ज्ञात होता है कि जहां-जहां छल-कपटादि का प्रवेश है वहां-वहां यज्ञादि को भी धर्म नहीं कह सकते। इसी से अपने तुल्य सबके सुख-दुःख को देखना रूप समता भी धर्म का स्वरूप है, यह सिद्ध हो जाता है। क्योंकि मेरे साथ कोई छल-कपटादि करे, ऐसा कोई नहीं चाहता तो समदर्शी होना भी सत्याचरण के अनुकूल ही बन सकता है। तात्पर्य यह है कि जैसे ‘हाथी के पांव में सबका पांव’ यह जनश्रुति- (कहावत) प्रसिद्ध है वैसे सत्य नामक धर्म के लक्षण में सब लक्षण अन्तर्गत हो जाते हैं। और कहीं आनृशंस्य को परमधर्म माना है। आनृशंस्य नाम दया वा रक्षा करने का है दोनों का तात्पर्य यह है कि दुःखी प्राणी वा मनुष्यों को दुःख से बचाना, इसकी उत्तमता भी सापेक्ष है। सब पर दया वा सबकी रक्षा करने की अपेक्षा मनुष्य की रक्षा करना वा मनुष्य जाति पर दया करना उत्तम है। पर सत्य सब धर्म के अंगों में मिला रहता है। इसी से बनावटी दया वा रक्षा को कभी धर्म नहीं कह सकते। इसलिये सत्य ही मुख्य धर्म का स्वरूप है, अन्य सब उसके सहायकारी हैं।

कहीं माता, पिता और आचार्य की सेवा को परम धर्म माना, यह भी उक्त प्रकार से सापेक्ष है और सत्य के आश्रय है। इत्यादि प्रकार से धर्म के अनेक लक्षणों की यथावसर वा यथाप्रयोजन प्रधानता दिखायी है, वह सबकी प्रधानता सापेक्ष है। निरपेक्ष वा निरतिशय (बेहद) प्रधानता केवल सत्य की है कि जिसके तुल्य धर्म के स्वरूपों में किसी की प्रधानता नहीं। इससे सिद्ध हुआ कि सत्य ही धर्म का स्वरूप है। कर्म का भी धर्म नाम है यह पहले कह चुके हैं। इसी के अनुसार कह सकते हैं कि- ‘धर्म किया, धर्म करता है, धर्म करेगा, धर्म कर’ इत्यादि, इसी अंश को लेकर मन, वाणी और शरीर के भेद से धर्म वा अधर्म के तीन भेद वात्स्यायन ऋषि ने न्यायभाष्य1 में दिखाये हैं- ‘संसार में तीन दोष हैं जिनका नाम राग, द्वेष और मोह रखा है, अन्य दोष इन्हीं तीन के साथ लग जाते हैं। वैसे काम, मत्सरता, तृष्णा, स्पृहा और लोभ राग के साथी हैं। क्रोध, ईर्ष्या, निन्दा, पिशुनता (चुगली), द्रोह और अमर्ष इत्यादि द्वेष के साथी और मिथ्याज्ञान, सन्देह, अभिमान तथा प्रमाद-आलस्यादि मोह के साथी हैं। इन्हीं दोषों के वशीभूत होने से मनुष्य पाप करता है अर्थात् इन दोषों की प्रेरणा से जो कुछ चेष्टा मनुष्य करता है उसके दश भेद होने से दश नाम पड़ते हैं, जिसमें तीन प्रकार का पाप शरीर से होता है। एक तो वेद की वा धर्मशास्त्र की आज्ञा से विरुद्ध हिंसा करना (अर्थात् किन्हीं प्राणियों को किसी लोभादि के वश होकर मारना वा उनको महाकष्ट पहुंचाने का उद्योग करना। वेदादि के अनुकूल हिंसा करना वैदिकी हिंसा कहाती है, उसका करना पाप के अन्तर्गत नहीं किन्तु धर्म ही माना गया है। जैसे क्षत्रिय लोग संग्राम में एक-दूसरे को निर्भय होकर मारें वहां शत्रुओं को मारने में पाप नहीं। महा अधर्मी मनुष्य को मारने में कदापि पाप नहीं। आततायी- जो सामने शस्त्र लेकर मारने को आता हो, उसके मारने में पाप नहीं। राजा को वध योग्य के मरवा डालने में पाप नहीं। सिंह, व्याघ्र, वृश्चिकादि हिंसक जन्तुओं के मारने में पाप नहीं। इत्यादि प्रकार की हिंसा वेदानुकूल है, इसलिये इसको हिंसा नहीं कहते, किन्तु अहिंसा के तुल्य इसको भी धर्म ही मानना चाहिये)। द्वितीय चोरी- जो स्वामी की आज्ञा के बिना किसी वस्तु को ले लेना। तृतीय निषिद्ध मैथुन करना अर्थात्- माता, भगिनी, गुरुपत्नी आदि से व्यभिचार करना, ये तीन प्रकार के शारीर पाप हैं। तथा मिथ्या बोलना, हृदय में छेद करने वाला कठोर वचन बोलना। सूचना- किसी की किसी से बुराई करना, तथा असम्बद्ध व्यर्थ बहुत बोलना ये चार प्रकार के वाचिक- वाणी से होने वाले पाप हैं। दूसरों को मारने वा दुःख देने की इच्छा रखना, दूसरों के द्रव्य को ले लेने की इच्छा रखना, तथा नास्तिकता कि- जन्मान्तर वा परलोक में जो बुरे कर्र्मों का बुरा ह्ल ल शास्त्रों में लिखा है वा पण्डितों द्वारा सुना जाता है सो ठीक नहीं, यहां निरन्तर आनन्द भोगना चाहिये, परलोक किसने देखा है, आजतक लौटकर किसी ने सन्देश नहीं दिया कि वहां ऐसा नरक भोग मैंने किया, केवल भय दिखानामात्र है इत्यादि प्रकार की इच्छा वा विचार रखना नास्तिकता कहाती है। ये तीन प्रकार के मानस- मन सम्बन्धी महापाप हैं। सो यह सब पापरूप दश प्रकार का कर्म अधर्म बढ़ाने वाला है।

और पूर्वजन्म वा इस जन्मसम्बन्धी अच्छे पुण्य कर्मों से हृदय के बीच जो शुभ संस्कार संचित होते हैं, वही संचित पुण्य है। उसकी प्रेरणा से जो मनुष्य क्रिया करता है, वही दश प्रकार का पुण्य वा धर्म कहाता है, जैसे द्रव्य-धनादि का हाथ से दान देना, शरणागत वा धर्मात्मा मनुष्यों वा उपकारी गौ आदि प्राणियों की सब प्रकार रक्षा करना और माता-पिता वा गुरु आदि की सेवा-शुश्रूषा यथावत् करना, यह तीन प्रकार का शरीर से होने वाला पुण्य वा धर्म है। सत्य बोलना, सबका वा अधिक का हितकारी वचन बोलना, प्रिय बोलना और वेदादिशास्त्र पढ़ना यह चार प्रकार का वाचिक- वाणी से होने वाला पुण्य वा धर्म है। सब पर दया करना, किसी से कुछ लेने की इच्छा न रखना, किन्तु मन में सन्तोष रखना और धर्म सम्बन्धी कामों में तथा परमेश्वर की स्तुति-प्रार्थनादि शुभ कर्म में श्रद्धा रखना यह तीन प्रकार का मानस धर्म है।

ये ही तीन प्रकार के अधर्म दश भेदों सहित मनुस्मृति के बारहवें अध्याय में लिखे हैं। वहां धर्म के दश भेद यद्यपि नहीं हैं, तो भी एक के कहने से द्वितीय उसका प्रतियोगी उसी में से निकल आता है। जैसे हिंसा कहा तो अहिंसा शारीरिक पुण्य होगा। अहिंसा और परित्राण दोनों का एक ही आशय है अर्थात् अहिंसा में हिंसा का निषेध मात्र कर देने से तात्पर्य नहीं किन्तु उसके प्रतियोगी का ग्रहण अर्थापत्ति से समझना चाहिये। इसी प्रकार परद्रोह रखना मानस पाप और उसके बदले में दया रखना मानस पुण्य तथा झूठ बोलना वाचिक पाप और सत्य बोलना वाणी सम्बन्धी पुण्य है। इस प्रकार एक के कहने से दूसरे अर्थापत्ति से आ सकते हैं। इसलिये मनुस्मृति में दोनों भिन्न-भिन्न नहीं गिनाये।

जितने धर्म और अधर्म के भीतरी भेद हैं, वे सब मुख्य कर दश प्रकार के ही हैं, अन्य भेद इन्हीं में आ जाते हैं। जैसे किसी की निन्दा वा मत्सरतादि का परद्रोह के बीच मेल है अथवा जैसे कृतज्ञतादि का दयादि में मेल हो जाता है। धर्म के सहकारी साधनों का प्रायः इस मानवधर्ममीमांसा भाष्य में व्याख्यान किया जाएगा। जैसे रसोई बनाने के साधन जोड़ने वाले को भी रसोई बनाता कहते हैं, वैसे धर्म के सहकारी साधनों का व्याख्यान होने से भी इसको धर्मशास्त्र ही कहेंगे।

धर्म के मुख्यकर दो ही भेद हैं। एक सामान्य, दूसरा विशेष। अपनी-अपनी कक्षा में दोनों की प्रधानता वा प्रबलता है। सामान्यधर्म वह है जिसका सब मनुष्य मात्र को सेवन करना वा स्वीकार करना योग्य है। इसमें किसी के लिये किसी प्रकार का भेदभाव नहीं। इस पर लिखा भी है कि- ‘अहिंसा, सत्य, चोरी का त्याग, शुद्धि रखना और इन्द्रियों को वश में करना यह संक्षेप से सब वर्णों का सामान्य धर्म है, यह बात मनु जी ने विशेषकर कही है।’१ इत्यादि प्रकार से अनेक स्थलों में व्याख्यान किया गया सामान्यधर्म सबको सेवने योग्य है। और जिनके लिये विशेष धर्म भिन्न-भिन्न कहा गया है, उनको भी कारण रूप सामान्य धर्म सेवने योग्य है। अर्थात् हिंसक वा मिथ्यावादी पुरुष पढ़ने-पढ़ाने और जप-तप आदि   धर्म सम्बन्धी कर्मों का सेवन नहीं कर सकता। कदाचित् दम्भ बढ़ाने को करेगा तो उसकी पोल अवश्य खुल जायेगी। तथा करने पर उसकी सह्ल लता होना दुस्तर है। इसीलिये कारणरूप सामान्यधर्म की मनु जी ने भी प्रधानता दिखायी है कि२- ‘अहिंसा, सत्य अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह इन सामान्य कर्त्तव्यरूप यमों का सेवन निरन्तर करे, किन्तु केवल शौचादि नियमों का सेवन न करे, क्योंकि केवल नियमों का सेवन करने से और यमों का सेवन न करने से मनुष्य पतित हो जाता है।’ इससे सिद्ध हुआ कि अहिंसादि यमों का सेवन करता हुआ शौचादि नियमों का सेवन करे इसी में कल्याण है।

विशेषधर्म- किन्हीं निज मनुष्यों को जो कर्त्तव्य हो और जिसके करने योग्य सब न हों वह विशेष धर्म है।

इस पर कोई शटा करे कि धर्म तो सबका एक ही होना चाहिये। धर्म का भेद पड़ने से ही मनुष्यों में ह्लू ट पड़ती है, इसलिये ईश्वर के उपदेश किये धर्म में भेद न होना चाहिये जैसे कि पृथिवी-जलादि में उसने भेद नहीं रखा, सबके चलने- फिरने को एक ही पृथिवी, एक ही वायु-आकाशादि हैं। वैसे ईश्वरोपदिष्ट धर्म भी सबके लिये एकसा होना चाहिये।

इसका उत्तर यह है कि पृथिवी, जल, वायु आदि में भी भेद है। सबके लिये एकसी पृथिवी वा वायु आदि नहीं है। देखो- भंगी पुरीषालय-(पाखाने) के निकट घृणित दुर्गन्धयुक्त पृथिवी में रहता है, जहां होकर श्रीमानों का निकल जाना दुस्तर है। ऐश्वर्यवान् लोग अनेक प्रकार चित्र-विचित्रता से रमणीय स्वर्ग भूमि में रहते हैं, जहां नीचों का पहुंचना असम्भव है। किन्हीं के समीप पुष्पादि का सुगन्धित वायु चल रहा है तथा कहीं ग्रीष्म ऋतु शीतल मन्द सुगन्ध पवन बह रहा है। कहीं दुर्गन्ध युक्त उष्ण लपट चलता है जिससे शरीर जला जाता है। क्या यह पृथिवी, वायु आदि का भेद नहीं है ? और यह भेद अपने-अपने कर्मानुसार ही होता है। कर्म के भेद से ही अधिकारियों का भेद मानना चाहिये। जैसे पुरीषालय के शोधक चाण्डालादि राजा के तुल्य सुख के अधिकारी वा प्रतिष्ठा के अधिकारी नहीं हो सकते। वैसे ही सब मनुष्य सब प्रकार के धर्म का सेवन करने योग्य नहीं हो सकते। सबको सब काम कर सकने की योग्यता हो जावे, ऐसा कभी न हुआ और न होगा। यही कारण अधिकारी और अधिकारों में भेद होने का है। इसी मूल पर वर्र्र्र्णव्यवस्था ठहरती वा माननी पड़ती है और सबको माननी भी चाहिए। संसार में कोई ऐसा समुदाय नहीं जो वर्णव्यवस्था को न मानता हो। हां, केवल मानने में अवान्तर भेद अवश्य हो जाते हैं। यदि कोई कहे कि हम वर्णाश्रम भेद को नहीं मानते तो हम यही उत्तर देंगे कि जैसे सूर्य के प्रकाश बिना कोई मनुष्य नेत्र से कुछ नहीं देख सकता तो भी कोई न माने कि मुझे सूर्य के प्रकाश की कुछ आवश्यकता नहीं, मैं अपने नेत्रों से देखता हूँ। ह्लि र ऐसे हठी मनुष्य से क्या कहा जावे। और उसको कोई पूछे कि यदि तुम नेत्र से ही देखते हो तो अन्धेरी रात में भी बिना दीपकादि के नेत्र से क्यों नहीं देख लेते ? उस समय भी तुम्हारे नेत्र तो बने ही हैं, केवल सहायकारी सूर्यादि का प्रकाश नहीं है, तो क्या उत्तर देगा ? अर्थात् कुछ भी नहीं। इसलिये धर्म में भेद अवश्य मानना चाहिए। और सामान्य धर्म सब मनुष्यों का एक है यही सबमें साधर्म्य है। धर्म के भेद से मनुष्यों में फूट नहीं पड़ती और जिससे फूट पड़ती है, उस पौराणिक मतवाद का नाम धर्म नहीं। यहां शास्त्रीय व्यवस्थानुसार अन्तःकरण से धारण करने योग्य दृढ विचार का नाम धर्म है। सो सबका विचार एकसा नहीं हो सकता। यह धर्मभेद को न मानना एक नास्तिक मत है कि जिनका सिद्धान्त वर्णाश्रम धर्म भेद के न रखने पर है। इसलिये यहां थोड़ा सा लिख दिया है। इसका विशेष विचार वर्णव्यवस्था प्रकरण में किया जायेगा। यहां केवल आशय यही था कि विशेष धर्म ब्राह्मणादि वर्णों का भिन्न-भिन्न है, इसी से उसको विशेष कहते हैं। एक स्थल से विशेषता को हटाया जावे और वह हटाना ठीक हो तो अन्यत्र भी विशेषता के न ठहर सकने से विशेष की अपेक्षा रखने वाला सामान्य भी बिगड़ जायेगा। इसीलिये विशेष धर्म भी मानना चाहिये।

सामान्य और विशेष का भेद अधिकार के भेद से होता है। जैसे सब मनुष्य राजा वा अधिकारी नहीं हो सकते। इससे मेरा यह प्रयोजन नहीं है कि उत्तम   अधिकार मिलने का सब किसी को उपाय ही न करना चाहिये। किन्तु यही मुख्य कर्त्तव्य है कि सब लोग पूर्ण प्रयत्न करें, कर्मानुकूल ही वर्त्तमान अधिकारियों को भी जब अधिकार मिला है तो हमको भी कर्म से अधिकार मिल सकता है। इसलिये उपाय सबको अवश्य करना चाहिए। मनुष्य जैसे शुभ-अशुभ कर्म करता है, वैसी ही वासना और वैसे ही उसके हृदय में संस्कार उत्पन्न होते हैं। वे संस्कार देश-काल और वस्तुओं के भेद से भिन्न-भिन्न हैं। इसी कारण बुद्धि की विचित्रता होने से अधिकारियों का भेद होता है। जैसे यदि युद्ध हो तो क्षत्रियपन की परीक्षा हो सकती है। यदि संग्राम से विमुख हो जावे तो क्षत्रिय समुदाय में गिना जाने पर भी वह क्षत्रिय नहीं, यही मानना पड़ेगा। किन्तु जो निर्भय होकर सम्मुख युद्ध करता-करता शरीर छोड़ दे वा शत्रुओं को जीत ले, वही क्षत्रिय है। यद्यपि क्षत्रिय के अन्य भी विशेष धर्म हैं, तो भी उन सबमें यह और भी अधिक विशेष है। जो दुःख से बचाये अर्थात् प्रबल प्राणियों से निर्बल वा दीनों को दुःख न पहुंचने देवे, वही क्षत्रिय है यह क्षत्रियशब्द के अर्थ से उसका धर्म वा तत्त्व प्रतीत होता है। इस अर्थ से भी यही ज्ञात होता है कि जो युद्ध में मरणभय से न डरे वही क्षत्रिय है, क्योंकि जो आप मारे जाने से डरेगा वह अन्य प्रजा की रक्षा क्या कर सकता है? जो स्वयं डर गया वह अन्य को भय से क्योंकर बचा सकता है ? इसलिये दोनों प्रकार बलवानों से बचाना ही क्षत्रियों का क्षत्रियपन है। यह ब्राह्मणादि वर्णों का   धर्म जन्म से वा कर्म से जिस प्रकार मान सकते हैं, सो ब्राह्मणादि वर्णविचार प्रकरण में कहेंगे।

इस प्रकरण में धर्मों की सापेक्षता का मुख्य विचार करना चाहिये ऐसा प्रस्ताव हो चुका है। किसी लक्षण की अपेक्षा से ही अन्य किसी की उत्तमता वा नीचता हो सकती है। यह ऊंच-नीच का व्यवहार सब वस्तुओं में सापेक्ष होता ही है। जैसे कहा जावे कि देवदत्त उत्तम पण्डित और यज्ञदत्त नीचबुद्धि है। यहां दोनों की ऊंचता वा नीचता सापेक्ष है, क्योंकि देवदत्त से उत्तम और यज्ञदत्त से नीच कोई मनुष्य पृथिवी पर न हो ऐसा हो नहीं सकता वा कह नहीं सकते। और जैसे कौड़ी की अपेक्षा पैसा और पैसा की अपेक्षा चांदी के रुपये, उसकी अपेक्षा सुवर्ण की मुद्रा- मोहर (अशरह्ल ी) की प्रशंसा है, इत्यादि प्रकार से ही सब धन वाचकों में नीचता भी किसी की अपेक्षा से ही होती है। वैसे ही प्रकृत धर्म के लक्षणों के प्रस्तार में भी जहां-जहां किसी की ऊंचता वा नीचता कही जाती है वहां-वहां सापेक्ष ही जानना चाहिये। जैसे माता, पिता और गुरु की सेवा करना वा उनकी आज्ञा का पालन परमधर्म कहा है। पर उसकी प्रशंसा सत्याचरण की अपेक्षा नहीं, किन्तु अन्य सम्बन्धी वा विद्वान् लोगों की सेवा करने की अपेक्षा से प्रशंसा है। सबकी अपेक्षा लेकर योनि-सम्बन्ध में माता-पिता की और विद्यासम्बन्ध में गुरु की आज्ञा का पालन और उनके साथ प्रियाचरण करना ही श्रेष्ठ है। इसीलिये सबके साथ यथायोग्य बर्तना सामान्य धर्म है। माता आदि की सेवा उसकी अपेक्षा विशेष है। तथा सब शास्त्रों का पढ़ना सामान्य से धर्म है उसकी अपेक्षा वेद का पढ़ना विशेष प्रशस्त धर्म कहाता है। किसी को कहीं किसी की अपेक्षा से नीचता कही गयी। उनमें किसी प्रकार अपने-अपने प्रसग् में दोनों का धर्म होना सम्भव हो तो भी जिसकी निकृष्टता वा अकर्त्तव्य होना कहते हैं। जिसका करना उस समय भी किसी की अपेक्षा से हानिकारक है, उसको अधर्म होना कहते हैं और उसको न करने के लिये भयानक वाक्य भी कहे जाते हैं। और जिसके विशेष प्रबल ह्ल ल देने वाले होने से उसका होना कर्त्तव्य इष्ट है। उसका धर्म होना कहा जाता है, उसमें अर्थवादरूप रोचक वचन भी कहे जाते हैं। जिससे उस कृत्य में यह पुरुष प्रवृत्त हो जावे। इस प्रकार रोचक भयानक वचन भी धर्मशास्त्रों में वर्त्तमान हैं, और वे सब सार्थक हैं।

इस पूर्वोक्त कथनानुसार धर्मों की सापेक्ष उत्तमता, मध्यमता वा निकृष्टता को जानकर जिस समय जिसका करना कल्याणकारी हो वा जिसकी अपेक्षा से जिसका करना अधिक सुख-मग्लकारी हो, उस काम को प्रयत्न के साथ करना ही चाहिये। जैसे सब मान्य पुरुषों की सेवा-शुश्रूषा यथायोग्य ठीक-ठीक किसी कारण न हो सके, तो माता, पिता और गुरु की सेवा तो अवश्य करनी चाहिये। यदि सबकी कर सके तो मातादि की विशेष प्रयत्न के साथ वा प्रथम करनी चाहिये। अर्थात् मातादि की सेवा की अपेक्षा अन्य की सेवा दुःखदायी है। माता, पिता वा गुरु की सेवा को छोड़के अन्य की सेवा करने वाला धर्मात्मा नहीं कहावेगा।

कुरान समीक्षा : खुदा का न थकने का बयान

खुदा का न थकने का बयान

बतावें कि खुदा को यह अपने न थकने की झूठी शेखी क्यों बधारनी पडी थी जब कि तौरेत में थककर आराम करना उसने खुद स्वीकार किया था। बतावें कुरान की बात तौरेत के मुकाबिले क्यों न गलत मानी जावे?

देखिये कुरान में कहा गया है कि-

व ल-कद् ख-लक्-नस्समावाति………।।

(कुरान मजीद पारा २६ सूरा काफ रूकू ३ आयत ३८)

और हमने आसमानों और जमीन को कुछ उनके उनके बीच में है उसे छः दिन में बनाया और हम जरा भी नहीं थके।

समीक्षा

ज्यादा काम करने पर खुदा जरूर थक जाता होगा, वह बच नहीं सकता था। देखिये तौरेत में उत्पत्ति २-२ में लिखा है-

और परमेश्वर ने अपना काम जिसे वह करता था सातवें दिन समाप्त किया और उसने अपने किये हुए सारे काम से सतवें दिन विश्राम किया और परमेश्वर ने सातवें दिन आशीष दी और पवित्र ठहराया, क्योंकि उसमें उसने अपनी सृष्टि की रचना के सारे काम से विश्राम किया था।

कुरान ने तौरेत को खुदाई व सच्ची किताब माना है। खुदा का विज्ञाम करना यह बताता है कि ‘‘वह जरूर गया था’’तभी तो उसने आराम किया। कुरान की बात तौरेत की बात के सामने गलत है, कि खुदा नहीं थका था।