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स्वामी दयानन्द सरस्वती जी की मूर्ति सही या गलत : आचार्य सोमदेव जी

जिज्ञासा  समाधान – ११९

– आचार्य सोमदेव

जिज्ञासा:- आदरणीय सम्पादक महोदय सादर नमस्ते। निवेदन यह है कि मैंने आर्य समाज मन्दिर में महर्षि दयानन्द जी का एक स्टेचू (बुत) जो केवल मुँह और गर्दन का है जिसका रंग गहरा ब्राउन है, रखा देखा है। पूछने पर पता चला कि यह किसी ने उपहार में दिया है। आप कृपया स्पष्ट करें कि क्या महर्षि का स्टेचू भेंट में लेना, बनाना और भेंट देना आर्य समाज के सिद्धान्त के अनुरूप है? जहाँ तक मेरा मानना है महर्षि ने अपनी प्रतिमा बनाने की सख्त मनाही की थी। कृपया स्पष्ट करें।

धन्यवाद, सादर।

– डॉ. पाल

समाधान:- महर्षि दयानन्द ने अपने जीवन मेंं कभी सिद्धान्तों से समझौता नहीं किया। वे वेद की मान्यतानुसार अपने जीवन को चला रहे थे और सम्पूर्ण विश्व को भी वेद की मान्यता के प्रति लाना चाहते थे। वेद ईश्वर का ज्ञान होने से वह सदा निभ्र्रान्त ज्ञान रहता है, उसमें किसी भी प्रकार के पाखण्ड अन्धविश्वास का लेश भी नहीं है। वेद ही ईश्वर, धर्म, न्याय आदि के विशुद्ध रूप को दर्शाता है। वेद में परमेश्वर को सर्वव्यापक व निराकार कहा है। प्रतिमा पूजन का वेद में किसी भी प्रकार का संकेत नहीं है। महर्षि दयानन्द ने वेद को सर्वोपरि रखा है। महर्षि दयानन्द समाज की अवनति का एक बड़ा कारण निराकार ईश्वर की उपासना के स्थापना पर प्रतिमा पूजन को मानते हैं। जब से विशुद्ध ईश्वर को छोड़ प्रतिमा पूजन चला है तभी से मानव समाज कहीं न कहीं अन्धविश्वास और पाखण्ड में फँसता चला गया। जिस मनुष्य समुदाय में पाखण्ड अन्धविश्वास होता है वह समुदाय धर्म भीरु और विवेक शून्य होता चला जाता है। सृष्टि विरुद्ध मान्यताएँ चल पड़ती हैं, स्वार्थी लोग ऐसा होने पर भोली जनता का शोषण करना आरम्भ कर देते हैं।

महर्षि दयानन्द और अन्य मत सम्प्रदाय में एक बहुत बड़ा मौलिक भेद है। महर्षि व्यक्ति पूजा से बहुत दूर हैं और अन्य मत वालों का सम्प्रदाय टिका ही व्यक्ति पूजा पर है। महर्षि ईश्वर की प्रतिमा और मनुष्य आदि की प्रतिमा पूजन का विरोध करते हैं, किन्तु अन्य मत वाले इस काम से ही द्रव्य हरण करते हैं। इस व्यक्ति पूजा के कारण समाज में अनेक प्रकार के अनर्थ हो रहे हैं। इसी कारण बहुत से अयोग्य लोग गुरु बनकर अपनी पूजा करवा रहे हैं। जीते जी तो अपनी पूजा व अपने चित्र की भी पूजा करवाते ही हैं, मरने के बाद भी अपनी पूजा करवाने की बात करते हैं और भोली जनता ऐसा करती भी है। इससे अनेक प्रकार के अनर्थ प्रारम्भ हो जाते हैं। महर्षि दयानन्द ने जो अपना चित्र न लगाने की बात कही है, वह इसी अनर्थ को देखते हुए कही है। महर्षि विचारते थे कि इन प्रतिमा पूजकों से प्रभावित हो मेेरे चित्र की भी पूजा आरम्भ न कर दें। इसी आशंका के कारण महर्षि ने अपने चित्र लगाने का निषेध किया था।

यदि हम आर्य महर्षि के सिद्धान्तों के अनुसार चल रहे हैं, प्रतिमा पूजन आदि नहीं कर रहे हैं तो महर्षि के चित्र आदि लगाए जा सकते हैं रखे जा सकते हैं। चित्र वा मूर्ति रखना अपने आप में कोई दोष नहीं है। दोष तो उनकी पूजा आदि करने में हैं। महर्षि मूर्ति के विरोधी नहीं थे, महर्षि का विरोध तो उसकी पूजा करने से था। यदि महर्षि केवल चित्र वा मूर्ति के विरोधी होते तो अपने जीवन काल में इनको तुड़वा चुके होते, किन्तु महर्षि के जीवन से ऐसा कहीं भी प्रकट नहीं होता कि कहीं महर्षि दयानन्द ने मूर्तियों को तुड़वाया हो। अपितु यह अवश्य वर्णन मिलता है कि जिस समय महर्षि फर्रुखाबाद में थे, उस समय फर्रुखाबाद बाजार की नाप हो रही थी। सडक़ के बीच में एक छोटा-सा मन्दिर था, जिसमें लोग धूप दीप जलाया करते थे। बाबू मदनमोहन लाल वकील ने स्वामी जी से कहा कि मैजिस्ट्रेट आपके भक्त हैं, उनसे कहकर इस मठिया को सडक़ पर से हटवा दीजिये। स्वामी जी बोले ‘‘मेरा काम लोगों के मनो से मूर्तिपूजा को निकालना है, ईंट पत्थर के मन्दिरों को तोडऩा-तुड़वाना मेरा लक्ष्य नहीं है।’’ यहाँ महर्षि का स्पष्ट मत है कि वे मूर्ति पूजा के विरोधी थे, न कि मूर्ति के।

आर्य समाज का सिद्धान्त निराकार, सर्वव्यापक, न्यायकारी आदि गुणों से युक्त परमेश्वर को मानना व उसकी उपासना करना तथा ईश्वर वा किसी मनुष्य की प्रतिमा पूजन न करना है। इस आधार पर महर्षि का स्टेचू भेंट लेना देना आर्य समाज के सिद्धान्त के विपरीत नहीं, सिद्धान्त विरुद्ध तब होगा जब उस स्टेचू की पूजा आरम्भ हो जायेगी। आर्य समाज का सिद्धान्त चित्र की नहीं चरित्र की पूजा अर्थात् महापुरुषों के आदर्शों को देखना अपनाना है।

कि सी भी महापुरुष के चित्र वा स्टेचू को देखकर हम उनके गुणों, आदर्शों, उनकी योग्यता विशेष का विचार करते हैं तो स्टेचू का लेना-देना कोई सिद्धान्त विरुद्ध नहीं है। जब हम उपहार में पशुओं वा अन्य किन्हीं का स्टेचू भेंट कर सकते हैं तो महर्षि का क्यों नहीं कर सकते?

घर में जिस प्रकार की वस्तुएँ या चित्र आदि होते हैं उनका वैसा प्रभाव घर में रहने वालों पर पड़ता है। जब फिल्मों में काम करने वाले अभिनेता अभिनेत्रियों के भोंडे कामुकतापूर्ण चित्र वा प्रतिमाएँ रख लेते हैं, लगा लेते हैं तो घर में रहने वाले बड़े वा बच्चों पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है आप स्वयं अनुमान लगाकर देख सकते हैं। इसके विपरीत महापुरुषों क्रान्तिकारियों के चित्र घर में होते हैं तो घर वालों पर और बाहर से आने वालों पर कैसा प्रभाव पड़ता होगा। घर में रहने वालों की विचारधारा को घर में लगे हुए चित्र व वस्तुएँ बता देती हैं। अस्तु।

महर्षि ने अपनी प्रतिमा बनाने का विरोध किया था, वह क्यों किया इसका कारण ऊपर आ चुका है। स्टेचू, चित्र आदि का भेंट में लेना-देना आर्य समाज के सिद्धान्त के विरुद्ध नहीं है। यह लिया-दिया जा सकता है, कदाचित् इसकी पूजा वा अन्य दुरुपयोग न किया जाय तो। इसमें इसका भी ध्यान रखें कि पुराण प्रतिपादित कल्पित देवता जो कि चार-आठ हाथ व चार-ेपाँच मुँह वाले वा अन्य किसी जानवर के  रूप में हों उनसे लेने देने से बचें।

– ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर

ज़वाले हैदराबाद और पुलिस ऐक्शन’: राजेन्द्र जिज्ञासु

सन् १९८८ में श्री राजीव गाँधी के काल में इस नाम की घातक, विषैली तथा देश के लिए सर्वथा अपमानजनक एक पुस्तक हैदाराबद में छपी थी। संसद सदस्य ओवैसी जी मजलिस इत्तहाद उलमुसलमीन के सर्वमान्य नेता हैं और आज श्री राहुल व केजरीवाल की पंक्ति में खड़े सबसे अधिक भाषण देने वाले राजनेता हैं। इस पुस्तक का लेखक इसी पार्टी का नेता कासिम रिज़वी देशद्रोही का अंगरक्षक व एक सेनापति रहा है। हैदराबाद के भारत में विलय को हैदराबाद का पतन बताया गया है। नेहरु जी का तो गुणगान किया गया है। सरदार पटेल, भारतीय सेना व भारतवर्ष को कोसते हुए इन्हें अन्यायी सिद्ध किया गया है। भारत में हैदराबाद के लिये की गई कार्यवाही को पशुतापूर्ण व दानवता सिद्ध किया गया है। क्यों आज तक काँग्रेस ने इस पुस्तक के बारे में चुप्पी साध रखी है। क्या केजरीवाल इसके बारे में ओवैसी से झड़प लेगा? क्या इसका लेखन व प्रकाशन देशद्रोह नहीं है। कासिम रिज़वी को सबसे बड़ा जिहादी बताकर महिमामण्डित किया गया है। पुस्तक २०८ पृष्ठ की है। यह कोई टै्रक्ट नहीं। इसमें यह भी सप्रमाण दिया गया है कि नेहरु जी तो हैदराबाद की शक्ति से भयभीत थे। सरदार ने उसी हैदराबाद को तीन दिन में रौंद डाला।

ये प्रश्र कोई नये नहीं हैं:- राजेन्द्र जिज्ञासु

दो प्रश्र किन्हीं लोगों ने हमारे आर्य युवकों से पूछे हैं। हर वस्तु को बनाने वाला,जगत् को बनाने वाला और हमें बनाने वाला जब परमात्मा है तो फिर परमात्मा को बनाने वाला कौन है? यह प्रश्र इस्लाम, ईसाई मत से तो पूछा जा सकता है। हम वैदिकधर्मी तो ईश्वर, जीव व प्रकृति को अनादि मानते हैं। यह ऊपर बताया जा चुका है। श्री लाला हरदयालजी ने भी यह प्रश्र उठाया है। बनी हुई वस्तु (मिश्रित) का तो कोई बनाने वाला होता है। ईश्वर, जीव व प्रकृति (अपने मूल स्वरूप में) अमिश्रित हैं। इनको बनाने का प्रश्र ही नहीं उठता। पूरे विश्व में सारे वैज्ञानिक अब एक स्वर में यह घोषणा कर रहे हैं कि प्रकृति को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही इसका नाश होता है। इस युग में यह ऋषि की बहुत बड़ी वैचारिक विजय है। यह हमारी एक मूल मान्यता है।

दूसरा प्रश्र भी बड़ा विचित्र है। जब जीव व प्रकृति भी अनादि हैं, जैसे कि परमात्मा, तो फिर परमात्मा उनसे बड़ा कैसे? प्रभु इनको नियन्त्रण में कैसे करता है? प्रश्र तो अच्छा है, परन्तु पढ़े-लिखे प्रश्रकत्र्ता यह भूल जाते हैं कि नियन्त्रण करने का आयु से कोई सम्बन्ध ही नहीं। मौलवी लोग चाँदापुर शास्त्रार्थ के समय से यह कहते आ रहे हैं कि जब जीवों को प्रभु ने पैदा ही नहीं किया तो फिर वह हमारा मालिक (स्वामी) कैसे हो सकता है।

अध्यापक ने विद्यार्थियों को पैदा नहीं किया। शासक प्रशासक आयु में भले ही छोटे हों, बड़ी आयु की प्रजा पर उन्हीं का नियन्त्रण होता है। संसार में गुणों से, योग्यता से, बल से दूसरों को वश में रखा जाता है। अपने खेतों को, मकान को, सामान को क्या हमने पैदा किया है? हम उसके स्वामी कहलाते हैं। पूज्य देहलवी जी ने पानीपत के एक शास्त्रार्थ में अपने प्रतिपक्षी मौलवी के इसी प्रश्र के उत्तर में कहा था, क्या तुम्हारी बीवी को तुमने पैदा किया है? वह आपके वश में है। आप उसके मालिक कहलाते हो। ठाकुर अमरसिंह जी ने मौलवी सनाउल्ला को घेरते हुए कहा कि आप जॉर्ज छठे से आयु में बड़े हैं, परन्तु सम्राट् की प्रजा के नाते उसके नियन्त्रण में हैं। घोड़ा आयु में बड़ा होता है फिर भी छोटी आयु का सवार उससे काम लेता है। इन बातों पर विचार करने से शंका का समाधान हो जाता है।

पूज्य मीमांसक जी और परोपकारिणी सभा:- राजेन्द्र जिज्ञासु

कुछ विचारशील मित्रों से सुना है कि एक अति उत्साही भाई ने श्री पं. युधिष्ठिर जी मीमांसक के नाम की दुहाई देकर, सत्यार्थप्रकाश के प्रकाशन की आड़ लेकर परोपकारिणी सभा तथा उसके विद्वानों व अधिकारियों पर बहुत कुछ अनाप-शनाप लिखा है। किसी को ऐसे व्यक्ति की कुचेष्टा पर बुरा मनाने की आवश्यकता नहीं। आज के युग में लैपटॉप आदि साधनों का दुरुपयोग करते हुए बहुत से महानुभाव यही कुछ करते रहते हैं। आर्य समाज में धन का उपयोग यही है कि एक ही लेख को सब पत्रों में छपवा दो।

केजरीवाल व राहुल से कुछ युवकों ने यही तो सीखा है कि जैसे मोदी को कोसकर वे मीडिया में चर्चित रहते हैं, आप परोपकारिणी सभा को कोसकर और सत्यार्थ प्रकाश के प्रकाशन पर अपनी रिसर्च का शोर मचाकर चर्चा में रहो। विधर्मियों से टक्कर लेने का इनमें साहस कहाँ? बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम न होगा?

धर्मप्रेमियों को पूज्य मीमांसक जी व परोपकारिणी सभा विषयक कुछ और प्रेरक घटनायें बताते हैं।

१. लोकतन्त्र में किन्हीं बातों पर विचार-भेद की सम्भावना तो सम्भव है। मन-भेद व सिद्धान्त-भेद अहितकर है। पूज्य मीमांसक जी से परोपकारिणी सभा के अधिकारी व विद्वान् यदा-कदा मिलने जाते रहते थे। श्री धर्मवीर जी उनके दर्शनार्थ तथा विचार-विमर्श के लिये उनके पास गये। धर्मवीरजी ने ऋषि के कुछ पत्र खोजकर छपवा दिये थे। मीमांसक जी इससे गद्गद हो गये। आपके पास कुछ और नये पत्र थे, जो ट्रस्ट के नहीं बल्कि पण्डित जी की खोज व पुरुषार्थ का फल थे। श्री धर्मवीर जी को इन पत्रों का पता नहीं था। आपने अत्यन्त उदारता व आत्मीयता से ये पत्र डॉ. धर्मवीर जी को भेंट कर दिये। यह भी कहा, मैंने यह पत्र किसी को दिखाये भी नहीं। इनकी सुरक्षा के लिये आपसे उपयुक्त और कोई व्यक्ति मेरे ध्यान में नहीं है।

पण्डित जी इन्हें बेचकर पैसा कमा सकते थे। किन्तु आपने अपने प्यारे धर्मवीर जी को यह आर्ष सम्पदा सौंप दी।

२. धर्मवीर जी पण्डित जी के दर्शन करने गये। किसी विषय पर कुछ विचार करना था। पण्डित जी से एक दुर्लभ ग्रन्थ दिखाने को कहा। उस अलमारी की चाबी पण्डित जी के पास ही रहती थी। ऐसी ज्ञान-सम्पदा तक हर किसी की पहुँच होनी भी नहीं चाहिये। परोपकारिणी सभा के ज्ञानकोश की तस्करी ऐसे ही तो होती रही।

धर्मवीर जी की विनती सुनकर पूज्य मीमांसक जी ने झट से वह अलभ्य ग्रन्थ उन्हें दिखा दिया।

३. पण्डित जी ने अपनी टिप्पणियों से युक्त सत्यार्थप्रकाश छापा। उसमें ‘जप’ विषय के प्रसंग में ‘मन’ शब्द की बजाय जन्म कर दिया और बड़ी लम्बी विचित्र टिप्पणी दे दी। शुद्ध को अशुद्ध कर दिया।

श्री विरजानन्द जी उनके चरणों में उपस्थित हुए, कहा, ‘‘यह क्या कर दिया महाराज?’’ विचार-विमर्श हुआ। श्रद्धेय मीमांसक जी को अपनी भूल पर बड़ा दु:ख हुआ। विरजानन्द जी को अपार प्रसन्नता हुई कि हमारे श्रद्धेय मीमांसक जी ने भूल का सुधार करना मान लिया।

४. पूज्य पण्डित जी अपने ग्रन्थों के लेख व विशेषाङ्कों के लिये इस विनीत से भी विचार-विमर्श व पत्र-व्यवहार करते  रहते थे। सत्यार्थ प्रकाश के सम्पादन व प्रकाशन के समय कुछ स्थलों पर मेरे साथ विचार न कर सके। आपने उसमें लिख दिया कि चौदहवें समुल्लास में कुरान की आयतों के अर्थ महर्षि ने अपने तैयार करवाये गये हिन्दी कुरान (अप्रकाशित) से दिये हैं। मेरा ध्यान पण्डित जी के इस कथन पर गया। मैं बहालगढ़ पहुँचा। कहा, ‘‘गुरुजी! यह क्या लिख दिया? सत्यार्थ प्रकाश की अन्त:साक्षी का प्रमाण दिया, श्री स्वामी वेदानन्द जी, दर्शनानन्द जी, पं. लेखराम जी, स्वामी योगेन्द्रपाल जी, देहलवी जी आदि विद्वानों के प्रमाण तथा कोर्टों के निर्णय सुनाये तो झट से बोले, ‘‘यह तो भयंकर भूल हो गई। अब तो अगले संस्करण में ही सुधार होगा।’’

इस भेंट के पश्चात् भूल स्वीकार करने के उनके साहस को उनकी महानता बताते हुए मैंने ‘परोपकारी’ तथा ‘दयानन्द सन्देश’ में लेख दिये। ऐसा करना आवश्यक था अन्यथा विरोधी लाभ उठाते।

५. पण्डित जी के निधन से पूर्व परोपकारिणी सभा के कई ट्रस्टी, कई विद्वान् कई बार उनके स्वास्थ्य का पता करने जाते रहे। ये बातें बनाने वाले कितनी बार गये? उनसे अन्तिम भेंट जब हुई तो ‘रसाला एक आर्य’ मूल उर्दू पुस्तक की खोज करने का मुझे आदेश देते हुए कहा, ‘‘सब कार्य छोडक़र पहले इसे करो। यह महर्षि की लिखवाई पुस्तक है। इसे फिर से तैयार (अनुवाद-सम्पादन) करके यह पुस्तक छपवा दो। आर्यसमाज को बता दो कि सब प्रश्रों के उत्तर ऋषि जी द्वारा लिखवाये गये हैं। यह ला. साईंदास रचित पुस्तक नहीं है। कोई असाधारण विद्वान् ही इतने ग्रन्थों के प्रमाण व उत्तर दे सकता है।’’

ईश्वर कृपा से उनके निधन के शीघ्र पश्चात् वह पुस्तक अकस्मात् मिल गई। मैंने यह हिन्दी में छपवाकर पूज्य पण्डित जी को समर्पित कर दी। उनका आदेश हुआ तो उनकी प्रेरणा से सम्पूर्ण जीवन चरित्र-महर्षि दयानन्द भी दो खण्डों में छपवा दिया।

पण्डित जी के निधन के पश्चात् डॉ. सुरेन्द्र कुमार जी ने पता दिया कि उनके ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश शताब्दी संस्करण में ‘दौड़ा सपुर्द’ शब्द एक से अधिक बार आया है। ऐसा कोई शब्द है ही नहीं। शब्द था ‘दौर सपुर्द’ ऐसे ही बाईबल के एक अवतरण में वे भूल कर गये। डॉ. सुरेन्द्र जी ने भूल का सुधार करके आर्यसमाज का गौरव बढ़ाया,उपहास से बचाया।

रामलाल कपूर ट्रस्ट से पता किया जा सकता है कि पं. युधिष्ठिर जी मीमांसक की शोकसभा में परोपकारिणी सभा के तो कई विद्वान् पहुँचे और किसी सभा से एक भी व्यक्ति न पहुँचा। सम्भवत: यह चर्चा छेडऩे वाले भाई भी नहीं पहँुचे थे। यह एक ऐसी शोक सभा थी जिसके दो अध्यक्ष थे। दोनों परोपकारिणी सभा के……………। केवल परोपकारिणी सभा ने उनके निधन पर एक श्रद्धाञ्जलि सम्मेलन आयोजित किया। रामलाल कपूर ट्रस्ट ने उसकी अध्यक्षता के लिये मेरा ही नाम सुझाया। मैंने तथा श्री डॉ. धर्मवीर जी ने कहा, ‘‘अध्यक्ष ट्रस्ट का होना चाहिये।’’ हमने विचार करके आचार्य प्रदीप जी को उस सभा का अध्यक्ष बनाया।

पूज्य पं. सत्यानन्द जी को श्रद्धेय मीमांसक जी अगली पीढ़ी का सबसे बड़ा आर्ष ग्रन्थों व व्याकरण का विद्वान् मानते थे। सभा ने उन्हें आदरपूर्वक अपना न्यासी चुना है। कभी एक भद्रपुरुष ने ऋषि मेले  पर उन्हें ब्रह्मा ही न बनने दिया। स्वामी सर्वानन्द-युग में उनका ध्यान इधर दिलाया गया। धर्मवीर जी ने बार-बार उन्हें यज्ञ का ब्रह्मा बनाया। रामलाल कपूर ट्रस्ट में अलभ्य स्रोत हर किसी की पहुँच में न हों, यह नियम पूज्य मीमांसक जी के समय मे भी था। इसके न होने से सार्वदेशिक के पुस्तकालय का नाश हो गया। सब तस्करी हो गई।

परोपकारिणी सभा ने ही तो ‘परोपकारी’ द्वारा बताया कि ऋषि के शास्त्रार्थ-संग्रह में भयङ्कर अशुद्धियाँ हैं। क्या यह सुधार सभा का आलोचक मण्डल कर सकता है? जिसने कभी विधर्मियों से लिखित व मौखिक शास्त्रार्थ नहीं किया, ऐसे गुणी पहलवान परोपकारिणी सभा को शास्त्रार्थ की चुनौती देते सुने गये। सभा का पत्र विरोधियों के उत्तर देने में प्रमाद नहीं करता। आक्षेप करने वालों को सभा रोक नहीं सकती। उनका भगवान् भला करे।

आज के युग में ऋषि दयानन्द की प्रासंगिकता: राजेन्द्र जिज्ञासु

आर्य वक्ताओं व लेखकों की सेवा में:-कुछ समय से आर्यसमाज के उत्सवों व सम्मेलनों में सब बोलने वालों को एक विषय दिया जाता है, ‘‘आज के युग में ऋषि दयानन्द की प्रासंगिकता’’ इस विषय पर बोलने वाले (अपवाद रूप में एक दो को छोडक़र) प्राय: सब वक्ता ऋषि दयानन्द की देन व महत्ता पर अपने घिसे-पिटे रेडीमेड भाषण उगल देते हैं। जब मैं कॉलेज का विद्यार्थी था तब पूज्य उपाध्याय जी की एक मौलिक पुस्तक सुरुचि से पढ़ी थी। पुस्तक बहुत बड़ी तो नहीं थी, परन्तु बार-बार पढ़ी। आज भी यदा-कदा उसका स्वाध्याय करता हँू। आज के संसार में वैदिक विचारधारा को हम कैसे प्रस्तुत करें, यही उसके लेखन व प्रकाशन का प्रयोजन था।

इसमें दो अध्याय अनादित्त्व पर हैं। सब मूल सिद्धान्तों पर लिखते हुए महान् दर्शनिक की तान यही है कि ईश्वर, जीव व प्रकृति अनादि हैं। ईश्वर का ज्ञान और विद्या भी अनादि है। यह जगत् परिवर्तनशील है, परन्तु इस सृष्टि के नियम जो प्रभु ने बनाये हैं वे सब अपरिवर्तनशील व अनादि हैं, परमेश्वर इन नियमों का नियन्ता है। उसका एक भी नियम ऐसा नहीं जो श्वह्लद्गह्म्ठ्ठड्डद्य अनादि व नित्य (अनश्वर) न हो। ऋषि दयानन्द के वैदिक दर्शन की महानता, विलक्षणता, उपयोगिता तथा प्रासंगिकता का बोध इसी से हो जाता है। हमारे अधिकंाश वक्ता इस विषय पर बोलते हुए इसे छूते ही नहीं।

एक बार नागपुर के एक महासम्मेलन में मुझे भी इसी विषय पर बोलना पड़ा। मैंने पहला वाक्य यह कहा, ‘‘क्या कभी किसी ने यह प्रश्र उठाया है कि आज के युग में चाँद की, सूर्य की, पृथिवी की गति की, सूर्य के पूर्व से उदय होने की, दो+दो=चार, दिन के पश्चात् रात और रात के पश्चात् दिन की, कर्मफल सिद्धान्त की, प्रभु की दया, प्रभु के न्याय की, व्यायाम की, दूध-दही के सेवन की, गणित के नियम की, भौतिकी शास्त्र के नियमों की क्या प्रासंगिकता  है?’’

जो इस प्रश्र को उठायेगा, उसका उपहास ही उड़ाया जायेगा। इस प्रकार त्रैतवादी विचारक महर्षि दयानन्द के सन्देश, उपदेश ‘वेद अनादि ईश्वर का अनादि ज्ञान है’ को सुनकर जो उसकी प्रासंगिकता का प्रश्र उठाता है तो उसे कौन बुद्धिमान् कहेगा? एक सेवानिवृत्त प्राध्यापक मुझे बाजार में मिल गया। वार्तालाप में उसने एक बात कही, ‘‘वैज्ञानिक चाँद पर घूम आये। उपग्रह से भ्रमण करते रहते हैं। कहीं उन्हें नरक व स्वर्ग नहीं दिखे। कहीं किसी ने हूरें नहीं देखीं, फरिश्ते नहीं देखे……..।’’

मित्रो! जो चमत्कार मानते थे उनको लिखित रूप से मानना पड़ रहा है कि किसी पैगम्बर ने कोई चमत्कार नहीं किया। धर्म अनादि काल से है। युग-युग में ईश्वर नया ज्ञान नहीं देता। ऐसा साहित्य छप रहा है। ऐसे लोगों से पूछो कि आज के युग में उनके ग्रन्थों व पन्थों की क्या प्राासंगिकता है? विस्तार से कभी फिर कुछ लिखूँगा। आशा है हमारे बड़े-बड़े विद्वान् नये $फैशन के इस सम्मेलन से समाज को बचायेंगे।

हमारे पूजनीय स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी तो पण्डित चमूपति जी की यह तान सुनाया करते थे:-

जुग बीत गया दीन की शमशीर ज़नी का।

है वक्त दयानन्द शजाअत के धनी का।।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता : दिनेश

अभिव्यक्ति  की स्वतंत्रता और देशभक्ति विगत लगभग ढाई वर्षों में अत्यन्त ज्वलन्त प्रश्न रहा है। अभिव्यक्ति  मानव वाणी के द्वारा, लेखन के द्वारा या क्रियात्मक  सृजना शक्ति के  द्वारा, संगीत के द्वारा या अभिनय के द्वारा व्यक्त हो सकती है। प्रश्न यह है कि अभिव्यक्ति  की मर्यादाएँ और उसका उद्देश्य किस प्रकार सुनिश्चित किया जा सकेगा। प्राचीन भारतीय संस्कृति अभिव्यक्ति  की स्वतन्त्रता की सर्वोन्मुखी प्रवक्ता रही है। जहाँ विचारधाराओं के आधार पर किसी भी प्रकार का प्रतिबन्ध न राज्य की ओर से होता था और न किसी विचारधारा विशेष के द्वारा। यही कारण था कि चिन्तन की इस उर्वरा भूमि में विभिन्न प्रकार की विचारधाराएँ पल्लवित हुईं और पुष्पित हुईं। भले ही उन विचारों से अन्य मत्तावलम्बी सहमत हों या ना हों।

छठी शताब्दी ईसा पूर्व में इसी प्रकार जैन और बौद्ध धर्मों का उद्भव हुआ। क्या यह सुखद आश्चर्य नहीं है उन लोगों के लिए जो वैदिक परम्परा और विचारधारा के भिन्न चिन्तन को प्रस्फुटित कर रहे थे, वैदिक मीमांसा और कर्मकाण्ड पर तीव्र प्रहार हो रहे थे, तब न किसी शासक ने और न किसी चिन्तक ने बल प्रयोग या हिंसा के आधार पर स्वमत के विरुद्ध प्रचलित चिंतन की विभिन्न धाराओं के विपरीत बल प्रयोग किया हो। यही कारण है कि भारत में चरक जहाँ सांख्य का विचार देता है, वहीं पतंजलि महाभाष्य में दर्शन के मूल प्रश्नों को भाषा के माध्यम से अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। नागार्जुन और अश्वघोष भले ही वे ब्राह्मण कुल में जन्में हों, वैदिक परम्परा का अध्ययन किया हो फिर भी उन्होंने बौद्ध दर्शन के आधारभूत ग्रन्थों का प्रणयन ही नहीं किया अपितु उनके साहित्य सृजन में अनवरत योगदान भी दिया। चार्वाक ने तो सभी तत्कालीन दार्शनिक विचारधाराओं पर तीव्र कुठाराघात किया।

मध्यकालीन भारतीय संस्कृति में सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार, जगत सत्य है या असत्य, इत्यादि अनेक विचारधाराओं पर भारतीय तत्ववेत्ताओं, साहित्यकारों और सन्तों ने अपनी भावभूमि को निर्मित किया। यद्यपि शासन मताग्रही था, तथापि देश के विभिन्न क्षेत्रों में सृजन की अनवरत प्रक्रिया संचालित होती रही। भारत में अभिव्यक्ति के विभिन्न आयाम रहे हैं, जिनमें प्रतीकों की प्रधानता सर्वत्र विद्यमान रही है।

समकालीन संदर्भों में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता और देशभक्ति के विश्लेषण की गहरी परख की आवश्यकता है। वेद में मातृभूमि की अभ्यर्थना विभिन्न मतों के द्वारा अभिव्यक्त की गई है। भाव और समर्पण मातृभूमि के प्रति अभिव्यक्त होते हैं। अभी हाल ही में दिल्ली के रामजस कॉलेज और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति की विद्रूप घटनायें, जिनमें विभिन्न राजनीतिक दलों का सोची समझी नीति के तहत कूदना अप्रत्याशित नहीं है फिर भी देश के भावनात्मक लगाव और देश को तोडऩे वाली शक्तियों के बीच गहरी खाई का निर्माण अवश्य करती है।

तथाकथित राजनीतिक अकादमिक विश्लेषण किसी ऐसी प्रविधि का निर्माण नहीं कर पाये कि ‘कश्मीर की आजादी’, ‘भारत के टुकड़े करने’, ‘अफजल गुरु की फाँसी…….’ जैसे नारों का औचित्य देशभक्ति के रूप में सिद्ध कर सकें। फिर क्यों नेताओं के रूप में विभिन्न घटकों में बंटे मीडिया, शिक्षक और नेता पिष्टपेषण की नूरा कुश्ती करते दिख रहे हैं?

वस्तुत: सामान्य सी घटना बताने वाले युद्ध और पाकिस्तान जैसे शब्द की पक्षधर्मिता को समझना नहीं चाहते। जाने-अनजाने में कहे गये कथनों को अपने पक्ष में करने की जिद अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के मूल भाव को ही तिरोहित कर देती है।

आवश्यकता है कि महर्षि दयानन्द की चिन्तनधारा के आलोक में ‘सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोडऩे में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये।’ अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता और देशभक्ति की भावना चाहिए तभी हम शिक्षा के मन्दिरों को निष्पक्ष ज्ञान की प्रयोगशाला बना पायेंगे। अभी तक ये सभी केन्द्र विशेष मतों के मठ बन रहे थे, अब उनके ढहने की बारी है, बस इसी अकुलाहट का परिणाम है यह भ्रान्त धारणा कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता वर्तमान में बाधित हो रही है।

भारत ही ऐसा देश है कि जहाँ देश-प्रेम हमारी संस्कृति की आधारशिला है और अभिव्यक्ति की अनन्त स्वतन्त्रता यहाँ के कण-कण में विद्यमान है। जिगर मुरादाबादी ने ठीक ही लिखा है-

उनका जो काम है, वह अहले सियासत जानें

मेरा पैगाम मुहब्बत है, जहाँ तक पहुँचे।

इसलिए स्थापित मठाधीशों के अस्तित्व को अब चुनौती दी जा रही है, जिसे वे पचा नहीं पा रहे और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की आड़ लेकर अपना बचाव करने का ढोंग कर रहे हैं।

आपका

दिनेश

प्रार्थना: – नाथूराम शर्मा ‘शङ्कर’

।।१।।

द्विज वेद पढ़ें, सुविचार बढ़ें, बल पाय चढें़, सब ऊपर को,

अविरुद्ध रहें, ऋजु पन्थ गहें, परिवार कहें, वसुधा-भर को,

धु्रव धर्म धरें, पर दु:ख हरें, तन त्याग तरें, भव-सागर को,

दिन फेर पिता, वरदे सविता, करदे कविता, कवि शंकर को।

।।२।।

विदुषी उपजें, क्षमता न तजें, व्रत धार भजें, सुकृती वर को,

सधवा सुधरें, विधवा उबरें, सकलंक करें, न किसी घर को,

दुहिता न बिकें, कुटनी न टिकें, कुलबोर छिकें, तरसें दर को,

दिन फेर पिता, वरदे सविता, करदे कविता, कवि शंकर को।

।।३।।

नृपनीति जगे, न अनीति ठगे, भ्रम-भूत लगे, न प्रजाधर को,

झगड़े न मचें, खल-खर्ब लचें, मद से न रचें, भट संगर को,

सुरभी न कटें, न अनाज घटें, सुख-भोग डटें, डपटें डर को,

दिन फेर पिता, वरदे सविता, करदे कविता, कवि शंकर को।

।।४।।

महिमा उमड़े, लघुता न लड़े, जड़ता जकड़े, न चराचर को,

शठता सटके, मुदिता मटके, प्रतिभा भटके न समादर को,

विकसे विमला, शुभ कर्म-कला, पकड़े कमला, श्रम के कर को,

दिन फेर पिता, वरदे सविता, करदे कविता, कवि शंकर को।

।।५।।

मत-जाल जलें, छलिया न छलें, कुल फूल फलें, तज मत्सर को,

अघ दम्भ दबें, न प्रपंच फबें, गुरु मान नबें, न निरक्षर को,

सुमरें जप से, निखरें तप से, सुर-पादप से, तुझ अक्षर को,

दिन फेर पिता, वरदे सविता, करदे कविता, कवि शंकर को।