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स्वामी दयानन्द सरस्वती जी की मूर्ति सही या गलत : आचार्य सोमदेव जी

जिज्ञासा  समाधान – ११९

– आचार्य सोमदेव

जिज्ञासा:- आदरणीय सम्पादक महोदय सादर नमस्ते। निवेदन यह है कि मैंने आर्य समाज मन्दिर में महर्षि दयानन्द जी का एक स्टेचू (बुत) जो केवल मुँह और गर्दन का है जिसका रंग गहरा ब्राउन है, रखा देखा है। पूछने पर पता चला कि यह किसी ने उपहार में दिया है। आप कृपया स्पष्ट करें कि क्या महर्षि का स्टेचू भेंट में लेना, बनाना और भेंट देना आर्य समाज के सिद्धान्त के अनुरूप है? जहाँ तक मेरा मानना है महर्षि ने अपनी प्रतिमा बनाने की सख्त मनाही की थी। कृपया स्पष्ट करें।

धन्यवाद, सादर।

– डॉ. पाल

समाधान:- महर्षि दयानन्द ने अपने जीवन मेंं कभी सिद्धान्तों से समझौता नहीं किया। वे वेद की मान्यतानुसार अपने जीवन को चला रहे थे और सम्पूर्ण विश्व को भी वेद की मान्यता के प्रति लाना चाहते थे। वेद ईश्वर का ज्ञान होने से वह सदा निभ्र्रान्त ज्ञान रहता है, उसमें किसी भी प्रकार के पाखण्ड अन्धविश्वास का लेश भी नहीं है। वेद ही ईश्वर, धर्म, न्याय आदि के विशुद्ध रूप को दर्शाता है। वेद में परमेश्वर को सर्वव्यापक व निराकार कहा है। प्रतिमा पूजन का वेद में किसी भी प्रकार का संकेत नहीं है। महर्षि दयानन्द ने वेद को सर्वोपरि रखा है। महर्षि दयानन्द समाज की अवनति का एक बड़ा कारण निराकार ईश्वर की उपासना के स्थापना पर प्रतिमा पूजन को मानते हैं। जब से विशुद्ध ईश्वर को छोड़ प्रतिमा पूजन चला है तभी से मानव समाज कहीं न कहीं अन्धविश्वास और पाखण्ड में फँसता चला गया। जिस मनुष्य समुदाय में पाखण्ड अन्धविश्वास होता है वह समुदाय धर्म भीरु और विवेक शून्य होता चला जाता है। सृष्टि विरुद्ध मान्यताएँ चल पड़ती हैं, स्वार्थी लोग ऐसा होने पर भोली जनता का शोषण करना आरम्भ कर देते हैं।

महर्षि दयानन्द और अन्य मत सम्प्रदाय में एक बहुत बड़ा मौलिक भेद है। महर्षि व्यक्ति पूजा से बहुत दूर हैं और अन्य मत वालों का सम्प्रदाय टिका ही व्यक्ति पूजा पर है। महर्षि ईश्वर की प्रतिमा और मनुष्य आदि की प्रतिमा पूजन का विरोध करते हैं, किन्तु अन्य मत वाले इस काम से ही द्रव्य हरण करते हैं। इस व्यक्ति पूजा के कारण समाज में अनेक प्रकार के अनर्थ हो रहे हैं। इसी कारण बहुत से अयोग्य लोग गुरु बनकर अपनी पूजा करवा रहे हैं। जीते जी तो अपनी पूजा व अपने चित्र की भी पूजा करवाते ही हैं, मरने के बाद भी अपनी पूजा करवाने की बात करते हैं और भोली जनता ऐसा करती भी है। इससे अनेक प्रकार के अनर्थ प्रारम्भ हो जाते हैं। महर्षि दयानन्द ने जो अपना चित्र न लगाने की बात कही है, वह इसी अनर्थ को देखते हुए कही है। महर्षि विचारते थे कि इन प्रतिमा पूजकों से प्रभावित हो मेेरे चित्र की भी पूजा आरम्भ न कर दें। इसी आशंका के कारण महर्षि ने अपने चित्र लगाने का निषेध किया था।

यदि हम आर्य महर्षि के सिद्धान्तों के अनुसार चल रहे हैं, प्रतिमा पूजन आदि नहीं कर रहे हैं तो महर्षि के चित्र आदि लगाए जा सकते हैं रखे जा सकते हैं। चित्र वा मूर्ति रखना अपने आप में कोई दोष नहीं है। दोष तो उनकी पूजा आदि करने में हैं। महर्षि मूर्ति के विरोधी नहीं थे, महर्षि का विरोध तो उसकी पूजा करने से था। यदि महर्षि केवल चित्र वा मूर्ति के विरोधी होते तो अपने जीवन काल में इनको तुड़वा चुके होते, किन्तु महर्षि के जीवन से ऐसा कहीं भी प्रकट नहीं होता कि कहीं महर्षि दयानन्द ने मूर्तियों को तुड़वाया हो। अपितु यह अवश्य वर्णन मिलता है कि जिस समय महर्षि फर्रुखाबाद में थे, उस समय फर्रुखाबाद बाजार की नाप हो रही थी। सडक़ के बीच में एक छोटा-सा मन्दिर था, जिसमें लोग धूप दीप जलाया करते थे। बाबू मदनमोहन लाल वकील ने स्वामी जी से कहा कि मैजिस्ट्रेट आपके भक्त हैं, उनसे कहकर इस मठिया को सडक़ पर से हटवा दीजिये। स्वामी जी बोले ‘‘मेरा काम लोगों के मनो से मूर्तिपूजा को निकालना है, ईंट पत्थर के मन्दिरों को तोडऩा-तुड़वाना मेरा लक्ष्य नहीं है।’’ यहाँ महर्षि का स्पष्ट मत है कि वे मूर्ति पूजा के विरोधी थे, न कि मूर्ति के।

आर्य समाज का सिद्धान्त निराकार, सर्वव्यापक, न्यायकारी आदि गुणों से युक्त परमेश्वर को मानना व उसकी उपासना करना तथा ईश्वर वा किसी मनुष्य की प्रतिमा पूजन न करना है। इस आधार पर महर्षि का स्टेचू भेंट लेना देना आर्य समाज के सिद्धान्त के विपरीत नहीं, सिद्धान्त विरुद्ध तब होगा जब उस स्टेचू की पूजा आरम्भ हो जायेगी। आर्य समाज का सिद्धान्त चित्र की नहीं चरित्र की पूजा अर्थात् महापुरुषों के आदर्शों को देखना अपनाना है।

कि सी भी महापुरुष के चित्र वा स्टेचू को देखकर हम उनके गुणों, आदर्शों, उनकी योग्यता विशेष का विचार करते हैं तो स्टेचू का लेना-देना कोई सिद्धान्त विरुद्ध नहीं है। जब हम उपहार में पशुओं वा अन्य किन्हीं का स्टेचू भेंट कर सकते हैं तो महर्षि का क्यों नहीं कर सकते?

घर में जिस प्रकार की वस्तुएँ या चित्र आदि होते हैं उनका वैसा प्रभाव घर में रहने वालों पर पड़ता है। जब फिल्मों में काम करने वाले अभिनेता अभिनेत्रियों के भोंडे कामुकतापूर्ण चित्र वा प्रतिमाएँ रख लेते हैं, लगा लेते हैं तो घर में रहने वाले बड़े वा बच्चों पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है आप स्वयं अनुमान लगाकर देख सकते हैं। इसके विपरीत महापुरुषों क्रान्तिकारियों के चित्र घर में होते हैं तो घर वालों पर और बाहर से आने वालों पर कैसा प्रभाव पड़ता होगा। घर में रहने वालों की विचारधारा को घर में लगे हुए चित्र व वस्तुएँ बता देती हैं। अस्तु।

महर्षि ने अपनी प्रतिमा बनाने का विरोध किया था, वह क्यों किया इसका कारण ऊपर आ चुका है। स्टेचू, चित्र आदि का भेंट में लेना-देना आर्य समाज के सिद्धान्त के विरुद्ध नहीं है। यह लिया-दिया जा सकता है, कदाचित् इसकी पूजा वा अन्य दुरुपयोग न किया जाय तो। इसमें इसका भी ध्यान रखें कि पुराण प्रतिपादित कल्पित देवता जो कि चार-आठ हाथ व चार-ेपाँच मुँह वाले वा अन्य किसी जानवर के  रूप में हों उनसे लेने देने से बचें।

– ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर

ईश्वर की सिद्धि में प्रत्यक्षादि प्रमाण सिद्ध नहीं हैं

ईश्वर की सिद्धि में प्रत्यक्षादि प्रमाण सिद्ध नहीं हैं

(सत्यार्थ प्रकाश द्वादश समुल्लास के आधार पर खण्डन)

– ब्र. राजेन्द्रार्य

पिछले अंक का शेष भाग……

निराकार होते हुए कैसे कार्य करता है – प्रश्नः जब परमेश्वर के श्रोत्र-नेत्रादि इन्द्रियां नहीं हैं, फिर वह इन्द्रियों का काम कैसे कर सकता है?

उत्तरः स्वामी दयानन्द उपनिषद् का वचन उद्धृत करते हुए लिखते हैं-

अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः।

स वेत्ति विश्वं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्रथं पुरुषं महान्तम्।।

– श्वेताश्वतरोपनिषद् अ. 3/मं. 19

परमेश्वर के हाथ नहीं, परन्तु अपनी शक्तिरूप हाथ से सबका रचन, ग्रहण करता, पग नहीं परन्तु व्यापक होने से सबसे अधिक वेगवान्, चक्षु का गोलक नहीं परन्तु सबको यथावत् देखता, श्रोत्र नहीं तथापि सबकी बातें सुनता, अन्तःकरण नहीं, परन्तु सब जगत् को जानता है और उसको अवधि सहित जानने वाला कोई भी नहीं। उसी को सनातन, सबसे श्रेष्ठ, सब में पूर्ण होने से पुरुष कहते हैं। वह इन्द्रियों और अन्तःकरण के बिना अपने सब काम अपने सामर्थ्य से करता है।17

ईश्वर निष्क्रिय और निर्गुण नहीं – प्रश्नः उसको बहुत से मनुष्य निष्क्रिय और निर्गुण कहते हैं।

उत्तर :

न तस्यकार्य्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चायधिकश्चदृश्यते।

परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च।।

– श्वेताश्वतरोपनिषद् अ. 6/ मं. 8

परमात्मा से कोई तद्रूप कार्य और उसको करण अर्थात् साधकतम दूसरा अपेक्षित नहीं। न कोई उसके तुल्य और अधिक है। सर्वोत्तम शक्ति अर्थात् उसमें अनन्त ज्ञान, अनन्त बल और अनन्त क्रिया है वह स्वाभाविक अर्थात् सहज उसमें सुनी जाती है। जो परमेश्वर निष्क्रिय होता तो जगत् की उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय न कर सकता। इसलिये वह विभु तथापि चेतन होने से उसमें क्रिया भी है।18

निष्क्रिय हो तो जगत् को कैसे बनावेदेखो, जैसे वर्तमान् समय में जीव पाप-पुण्य करता, सुख-दुःख भोगता है, वैसे ईश्वर कभी नहीं होता। जो ईश्वर क्रियावान न होता, तो जगत् को कैसे बना सकता? जैसा कि कर्मों को प्राग भाववत् अनादि सान्त मानते हो, तो कर्म समवाय सबन्ध से नहीं रहेगा। जो समवाय सबन्ध से नहीं, वह संयोगज हो के अनित्य होता है।

– सत्यार्थप्रकाशः, द्वादश समुल्लासः

सृष्टि का उत्पादक – नास्तिकः जब परमात्मा शाश्वत अनादि चिदानन्द ज्ञानस्वरूप है, तो जगत् के प्रपञ्च और दुःख में क्यों पड़ा? आनन्द छोड़ दुःख का ग्रहण ऐसा काम कोई साधारण मनुष्य भी नहीं करता, (फिर) ईश्वर ने क्यों किया?

आस्तिकः परमात्मा किसी प्रपञ्च और दुःख में नहीं गिरता, न अपने आनन्द को छोड़ता है, क्योंकि प्रपञ्च और दुःख में गिरना, जो एकदेशी हो उसका हो सकता है, सर्वदेशी का नहीं। जो अनादि चिदानन्द ज्ञानस्वरूप परमात्मा जगत को न बनावे, तो अन्य कौन बना सके? जगत् बनाने का सामर्थ्य जीव में नहीं, और जड़ में स्वयं बनने का सामर्थ्य नहीं। इससे यह सिद्ध हुआ कि परमात्मा ही जगत् को बनाता और सदा आनन्द में रहता है। जैसे परमात्मा परमाणुओं से सृष्टि करता है, वैसे माता-पिता रूप निमित्त कारण से भी उत्पत्ति का प्रबन्ध नियम उसी ने किया है।20

वेदादि शास्त्रों में अनेकत्र सृष्टि को उत्पन्न करने वाले चेतन तत्त्व ब्रह्म का प्रतिपादन किया है। यह विविध सृष्टि जिससे उत्पन्न होती है जिसके द्वारा धारण की जाती है और अन्त में जब यह नहीं रहती, अपने कारण रूप में लीन हो जाती है, इस सबका जो अध्यक्ष-नियन्ता सर्वव्यापक परमेश्वर वही इसकी वास्तविकता को जानता है।21 यह प्राणी-अप्राणी रूप जगत् जिससे  उत्पन्न होता, उत्पन्न होकर जिसके आश्रय जीता और जिसके द्वारा अन्त में लीन होता, उसको जानने की इच्छा करो वह ब्रह्म है।22

संभवतः वेद और उपनिषद् के इसी अभिप्राय को महर्षि वेद व्यास ने- जन्माद्यस्य यतः। वेदान्त दर्शन 1/1/2 के रूप में सूत्रबद्ध किया है। यहाँ यह स्पष्ट है कि जिसकी उत्पत्ति होती है, वह जगत् है और जो उससे भिन्न है, वह उसकी उत्पत्ति में निमित्त कारण है।23

आचार्य कपिल ने भी कहा है-

सहि सर्ववित् सर्वकर्त्ता। – सांखय दर्शन 3/56

ईश्वर ही सर्वज्ञ सृष्टिकर्त्ता है, सर्वशक्तिमान् = जो सृष्टि रचना में किसी अन्य की शक्ति उधार नहीं लेता, न इन्द्रियादि साधनों की अधीनता रखता है, अपितु ‘‘सर्वशक्तिमत्ता’’ से आभयन्तरीय (भीतर से) इक्षणशक्ति द्वारा समस्त विश्व-ब्रह्माण्ड की अद्भुत रचना करता है।

स्वामी दयानन्द सरस्वती अपने ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाशः अष्टम समुल्लास में लिखते हैं-

देखो! शरीर में किस प्रकार की ज्ञानपूर्वक सृष्टि रची है जिसको विद्वान् लोग देखकर आश्चर्य मानते हैं। भीतर हाड़ों के जोड़, नाड़ियों का बन्धन, मांस का लेपन, चमड़ी का ढक्कन, प्लीहा, यकृत, फेफड़ा, पंखा, कला  का स्थापन, रुधिर शोधन, प्रचालन, विद्युत का स्थापन, जीव का संयोजन, शिरोरूप मूलरचन, लोम नखादि का स्थापन, आँख की अतीव सूक्ष्म शिरा का तारवत् ग्रन्थन, इन्द्रियों के मार्गों का प्रकाशन, जीव के जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति अवस्था के भोगने के लिये स्थान विशेषों का निर्माण, सब धातु का विभाग करण, कला, कौशल स्थापनादि अद्भुत् सृष्टि को बिना परमेश्वर के कौन कर सकता है?24

समस्त वैज्ञानिक ईश्वर को सृष्टिकर्त्ता, सुव्यवस्थापक नहीं मानते, यह कहना भी असत्य है। सर ऑलिवर लाज और आईंस्टीन महोदय का कथन है-

I believe in god – who reveals himself in orderly  harmony of the universe

अर्थात् मैं ऐसे ईश्वर में विश्वास करता हूँ जो अपने आपको सांसारिक सुव्यवस्था के रूप में प्रकट करता है।25

कर्मफल दाताईश्वरीय व्यवस्था से ही जीव कर्मफलों को भोगते हैं। प्रकरण रत्नाकर के दूसरे भाग आस्तिक-नास्तिक के संवाद के प्रश्नोत्तर के अन्तर्गत इस सिद्धान्त की पुष्टि की गई है, जिसको बड़े-बड़े जैनियों ने अपनी सममति के साथ माना और मुबई में छपवाया है।

नास्तिकः ईश्वर की इच्छा से कुछ नही होता जो कुछ होता है, वह कर्म से।

आस्तिकः जो सब कर्म से होता है तो कर्म किससे होता है? जो कहो जीव आदि से होता है तो जिन श्रोत्रादि साधनों से कर्म जीव करता है, वे किन से हुए? जो कहो कि अनादिकाल और स्वभाव से होते हैं तो अनादि का छूटना असमभव होकर तुमहारे मत में मुक्ति का अभाव होगा। जो कहो कि प्रागभाववत् अनादि सान्त हैं तो बिना यत्न के सब कर्म निवृत्त हो जायेंगे । यदि ईश्वर फलदाता न हो तो पाप के फल दुःख को जीव अपनी इच्छा से कभी नहीं भोगेगा। जैसे चोर आदि चोरी का फल दण्ड अपनी इच्छा से नहीं भोगते, किन्तु राज्य व्यवस्था से भोगते हैं, वैसे ही परमेश्वर के भुगाने से जीव पाप और पुण्य के फलों को भोगते हैं, अन्यथा कर्मसङ्कर हो जायेंगे, अन्य के कर्म अन्य को भोगने पड़ेंगे। – सत्यार्थप्रकाशः द्वादश समुल्लासः पृ. 447

ईश्वर पापों को कभी क्षमा नहीं करता – प्रश्नः ईश्वर अपने भक्तों के पापों को क्षमा करता है वा नहीं?

उत्तरः नहीं। क्योंकि जो पाप क्षमा करे तो उसका न्याय नष्ट हो जाय, और मनुष्य महापापी हो जायें। क्योंकि क्षमा की बात सुन ही के उनको पाप करने में निर्भयता और उत्साह हो जाये। जैसे राजा अपराध को क्षमा कर दे, तो वे उत्साह पूर्वक अधिक-अधिक बड़े-बड़े पाप करें, क्योंकि राजा अपना अपराध क्षमा कर देगा और उनको भी भरोसा हो जाए कि राजा से हम हाथ जोड़ने आदि चेष्टा कर अपने अपराध छुड़ा लेंगे और जो अपराध नहीं करते, वे भी अपराध करने से न डर कर पाप करने में प्रवृत्त हो जाएँगे। इसलिए सब कर्मों का फल यथावत् देना ही ईश्वर का काम है क्षमा करना नहीं।

ईश्वर की सिद्धि में प्रत्यक्षादि प्रमाण – प्रश्नः- आप ईश्वर-ईश्वर कहते हो, परन्तु उसकी सिद्धि किस प्रकार करते हो?

उत्तरःसब प्रत्यक्षादि प्रमाणों से।

प्रश्नःईश्वर में प्रत्यक्षादि प्रमाण कभी नहीं घट सकते।

उत्तरः इन्द्रियार्थ सन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेशयमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्।

– न्यायदर्शन 1/1/4

अर्थात् जो श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा, घ्राण और मन का, शद, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, सुख-दुःख  सत्यासत्य विषयों के साथ सबन्ध होने से ज्ञान उत्पन्न होता है, उसको प्रत्यक्ष कहते हैं, परन्तु वह निर्भ्रम हो।

अब विचारना चाहिए कि इन्द्रियों और मन से गुणों का प्रत्यक्ष होता है, गुणी का नहीं। जैसे चारों त्वचा आदि इन्द्रियों से स्पर्श, रूप, रस और गन्ध का ज्ञान होने से गुणी जो पृथिवी उसका आत्मायुक्त मन से प्रत्यक्ष किया जाता है, वैसे इस प्रत्यक्ष सृष्टि में रचना विशेष आदि ज्ञानादि गुणों के प्रत्यक्ष होने से परमेश्वर का भी प्रत्यक्ष है।26

इस प्रकार स्वामी दयानन्द ने अपने ग्रन्थों में ईश्वर सिद्धि के सन्दर्भ में वेद, उपनिषद्, तर्क आदि प्रमाणों के आधार पर बहुत विस्तार से लिखा है। इस प्रसंग में महर्षि की जो मौलिक देन है, वह यह है कि वह प्रत्यक्षादि प्रमाणों से ईश्वर की सिद्धि करते हैं।

प्रत्यक्ष के बारे में वे स्वीकार करते हैं कि जब जीवात्मा शुद्ध अन्तःकरण से युक्त योग समाधिस्थ होकर आत्मा और परमात्मा का विचार करने में तत्पर होता है, उसको उसी समय आत्मा और परमात्मा दोनों प्रत्यक्ष होते हैं। परमात्मा का यह प्रत्यक्ष केवल आत्मा युक्त मन से होता है, उसमें बाह्य इन्द्रियाँ कारण नहीं होतीं। ईश्वरकी सिद्धि में प्रत्यक्ष प्रमाण की स्वीकृति ऋषि दयानन्द के मौलिक और वैचारिक क्रान्तिकारी चिन्तन का परिणाम है।

स्वामी दयानन्द का ईश्वर विषयक एक-एक चिन्तन किसी दार्शनिक वैज्ञानिक की खोज से कम नहीं है। यथा जड़ पदार्थ कभी परमात्मा नहीं हो सकता और परमात्मा कभी जड़ नहीं हो सकता।

लक्षण प्रमाणायां वस्तु सिद्धिर्नतुप्रतिज्ञा मात्रेण।

सन्दर्भः

  1. (1) सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उन सबका आदि मूल परमेश्वर है।

– आर्य समाज का प्रथम नियम

(2) ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्त्ता है, उसी की उपासना करनी योग्य है।

– आर्य समाज का द्वितीय नियम

  1. सत्यार्थप्रकाशः द्वादश समुल्लासः पृष्ठ 426, 428
  2. सत्यार्थप्रकाशः द्वादश समुल्लासः पृष्ठ 428
  3. सत्यार्थप्रकाशः सप्तम समुल्लासः पृष्ठ 175
  4. (1)एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानााहुः।

इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्।।

– ऋग्वेद 1/164/64

(2) भुवनस्य यस्यपतिरेक एव नमस्यः ।

– अथर्ववेद 2/2/1

(3) ‘‘न द्वितीयो न तृतीयश्चतुर्थो नाप्युच्यते। न पंचमो न षष्ठः सप्तमो नाप्युच्यते। नाष्टमो न नवमो दशमो नाप्युच्यते। स एक एव सकवृदेक एव।’’

– अथर्ववेद (13/4/2) 16 से 18 मन्त्र

(4) ‘‘भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्’’।

– यजुर्वेद 13/4

  1. सत्यार्थप्रकाशः, सप्तम समुल्लासः पृष्ठ 176
  2. सत्यार्थप्रकाशः, सप्तम समुल्लासः पृष्ठ 193
  3. वही, पृष्ठ 193
  4. ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका, ईश्वर प्रार्थना विषयः पृष्ठ 3
  5. सत्यार्थ प्रकाशः अष्टम समुल्लासः पृष्ठ 211
  6. वही, पृष्ठ 211
  7. सत्यार्थप्रकाशः सप्तम समुल्लासःपृष्ठ 178
  8. ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका, वेद विषय विचारः पृष्ठ 33
  9. सत्यार्थप्रकाशः, सप्तम समुल्लासः पृष्ठ 180
  10. वही, पृष्ठ 180
  11. सत्यार्थप्रकाशः, सप्तम समुल्लासः पृष्ठ 187
  12. वही, पृष्ठ 187
  13. दार्शनिक संयोग दो प्रकार का मानते हैं। एक संयोगज और दूसरा समवायिक। समवाय सबन्ध गुण-गुणी में, कर्म-कर्मवान् में, अवयव-अवयवी में और जाति-व्यक्ति में रहता है। यह सबन्ध नित्य होता है। – युधिष्ठिर मीमांसक, स.प्र. (शतादी संस्करण) पृष्ठ 665
  14. सत्यार्थप्रकाशः द्वादश समुल्लासः पृष्ठ 449
  15. इयं विसृष्टियति आबभूव यदिवादधे यदि वा न वेद।। – ऋग्वेद 10/129/7
  16. यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति।

यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद्विजिज्ञासस्व तद् ब्रह्म।।

– तैत्तिरीयोपनिषद् 3/1

  1. तत्त्वमसि, स्वामी विद्यानन्द सरस्वती, पृष्ठ 44
  2. सत्यार्थप्रकाशः अष्टम् समुल्लासः पृष्ठ 226
  3. विद्यार्थियों की दिनचर्या, स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती, पृष्ठ 38
  4. सत्यार्थ प्रकाशः, सप्तम समुल्लासः पृष्ठ 178

– आर्य समाज शक्तिनगर, सोनभद्र (उ.प्र.)

सत्यार्थ प्रकाश की अनमोल वचन

एक धन, दूसरे बन्धु कुटुम्ब कुल, तीसरी अवस्था, चौथा उत्तम कर्म और पांचवीं श्रेष्ठ विद्या ये पांच मान्य के स्थान हैं। परन्तु धन से उत्तम बन्धु, बन्धु से अधिक अवस्था, अवस्था से श्रेष्ठ कर्म और कर्म से पवित्र विद्या वाले उत्तरोत्तर अधिक माननीय हैं॥

क्योंकि चाहै सौ वर्ष का भी हो परन्तु जो विद्या विज्ञानरहित है वह बालक और जो विद्या विज्ञान का दाता है उस बालक को भी वृद्ध मानना चाहिये। क्योंकि सब शास्त्र आप्त विद्वान् अज्ञानी को बालक और ज्ञानी को पिता कहते हैं॥

अधिक वर्षों के बीतने, श्वेत बाल के होने, अधिक धन से और बड़े कुटुम्ब के होने से वृद्ध नहीं होता। किन्तु ऋषि महात्माओं का यही निश्चय है कि जो हमारे बीच में विद्या विज्ञान में अधिक है वही वृद्ध पुरुष कहाता है॥

ब्राह्मण ज्ञान से, क्षत्रिय बल से, वैश्य धनधान्य से और शूद्र जन्म अर्थात् अधिक आयु से वृद्ध होता है॥

शिर के बाल श्वेत होने से बुढ्ढा नहीं होता किन्तु जो युवा विद्या पढ़ा हुआ है उसी को विद्वान् लोग बड़ा जानते हैं॥

और जो विद्या नहीं पढ़ा है वह जैसा काष्ठ का हाथी; चमड़े का मृग होता है वैसा अविद्वान् मनुष्य जगत् में नाममात्र मनुष्य कहाता है॥

इसलिये विद्या पढ़, विद्वान् धर्मात्मा होकर निर्वैरता से सब प्राणियों के कल्याण का उपदेश करे। और उपदेश में वाणी मधुर और कोमल बोले। जो सत्योपदेश से धर्म की वृद्धि और अधर्म का नाश करते हैं वे पुरुष धन्य हैं॥

-सत्यार्थ प्रकाश

संन्यास ग्रहण की आवश्यकता क्या है?

प्रश्न : संन्यास ग्रहण की आवश्यकता क्या है?

उत्तरः जैसे शरीर में शिर की आवश्यकता है वैसे ही आश्रमों में संन्यासाश्रम की आवश्यकता है। क्योंकि इसके बिना विद्याधर्म कभी नहीं बढ़ सकते और दूसरे आश्रमों को विद्या ग्रहण गृहकृत्य और तपश्चर्यादिका सम्बन्ध होने से अवकाश बहुत कम मिलता है। पक्षपात छोड़कर वर्त्तना दूसरे आश्रमों को दुष्कर है। जैसा संन्यासी सर्वतोमुक्त होकर जगत का उपकार करता है, वैसा अन्य आश्रमी नहीं कर सकता। क्योंकि संन्यासी को सत्यविद्या से पदार्थों के विज्ञान की उन्नति का जितना अवकाश मिलता है उतना अन्य आश्रमी को नहीं मिल सकता। परन्तु जो ब्रहमचर्य से संन्यासी होकर जगत को सत्य शिक्षा करके जितनी उन्नति कर सकता है उतनी गृहस्थ वा वानप्रस्थ आश्रम करके सन्यासाश्रमी नहीं कर सकता।

प्रश्नः ‘संन्यासी सर्वकर्म्मविनाशी’ और अग्नि तथा धातु को स्पर्श नही करते। यह बात सच्ची है वा

नहीं?

उत्तरः नहीं। ‘सम्यग नित्यमास्ते यस्मिन् यद्वा सम्यग न्यस्यन्ति दुःखानि कर्माणि येन स सन्यासः स प्रशस्तो विद्यते यस्य स सन्यासी’। जो ब्रहम और उसकी आज्ञा में उपविष्ट अर्थात स्थित और जिससे दुष्ट कर्मों का त्याग किया जाय संन्यास, वह उत्तम स्वभाव जिसमें हो वह संन्यासी कहाता है। इसमें सुकर्म का कर्ता और दुष्ट कर्मों का विनाशक करने वाला संन्यासी कहाता है।

प्रश्नः अध्यापन और उपदेश गृहस्थ किया करते हैं, पुनः संन्यासी का क्या प्रयोजन?

उत्तरः सत्योपदेश सब आश्रमी करें और सुनें परन्तु जितना अवकाश और निष्पक्षपातता संन्यासी को होती है उतनी गृहस्थों को नहीं । हाँ! जो ब्राहमण है उनका यही काम है कि पुरुष पुरुषों को और स्त्री स्त्रियों को सत्योपदेश और पढ़ाया करें। जितना भ्रमण का अवकाश संन्यासी को मिलता है उतना गृहस्थ ब्राहमणादिको को कभी नहीं मिल सकता। जब ब्राहमण वेद विरुद्ध आचरण करें तब उनका नियन्ता संन्यासी होता है। इसलिये संन्यास का होना उचित है।

– सत्यार्थ प्रकाश से उद्धृत

उत्तरः जैसे शरीर में शिर की आवश्यकता है वैसे ही आश्रमों में संन्यासाश्रम की आवश्यकता है। क्योंकि इसके बिना विद्याधर्म कभी नहीं बढ़ सकते और दूसरे आश्रमों को विद्या ग्रहण गृहकृत्य और तपश्चर्यादिका सम्बन्ध होने से अवकाश बहुत कम मिलता है। पक्षपात छोड़कर वर्त्तना दूसरे आश्रमों को दुष्कर है। जैसा संन्यासी सर्वतोमुक्त होकर जगत का उपकार करता है, वैसा अन्य आश्रमी नहीं कर सकता। क्योंकि संन्यासी को सत्यविद्या से पदार्थों के विज्ञान की उन्नति का जितना अवकाश मिलता है उतना अन्य आश्रमी को नहीं मिल सकता। परन्तु जो ब्रहमचर्य से संन्यासी होकर जगत को सत्य शिक्षा करके जितनी उन्नति कर सकता है उतनी गृहस्थ वा वानप्रस्थ आश्रम करके सन्यासाश्रमी नहीं कर सकता।

प्रश्नः ‘संन्यासी सर्वकर्म्मविनाशी’ और अग्नि तथा धातु को स्पर्श नही करते। यह बात सच्ची है वा

नहीं?

उत्तरः नहीं। ‘सम्यग नित्यमास्ते यस्मिन् यद्वा सम्यग न्यस्यन्ति दुःखानि कर्माणि येन स सन्यासः स प्रशस्तो विद्यते यस्य स सन्यासी’। जो ब्रहम और उसकी आज्ञा में उपविष्ट अर्थात स्थित और जिससे दुष्ट कर्मों का त्याग किया जाय संन्यास, वह उत्तम स्वभाव जिसमें हो वह संन्यासी कहाता है। इसमें सुकर्म का कर्ता और दुष्ट कर्मों का विनाशक करने वाला संन्यासी कहाता है।

प्रश्नः अध्यापन और उपदेश गृहस्थ किया करते हैं, पुनः संन्यासी का क्या प्रयोजन?

उत्तरः सत्योपदेश सब आश्रमी करें और सुनें परन्तु जितना अवकाश और निष्पक्षपातता संन्यासी को होती है उतनी गृहस्थों को नहीं । हाँ! जो ब्राहमण है उनका यही काम है कि पुरुष पुरुषों को और स्त्री स्त्रियों को सत्योपदेश और पढ़ाया करें। जितना भ्रमण का अवकाश संन्यासी को मिलता है उतना गृहस्थ ब्राहमणादिको को कभी नहीं मिल सकता। जब ब्राहमण वेद विरुद्ध आचरण करें तब उनका नियन्ता संन्यासी होता है। इसलिये संन्यास का होना उचित है।

– सत्यार्थ प्रकाश से उद्धृत

ईश्वर की सिद्धि में प्रत्यक्षादि प्रमाण सिद्ध नहीं हैं

ईश्वर की सिद्धि में प्रत्यक्षादि प्रमाण सिद्ध नहीं हैं

(सत्यार्थ प्रकाश द्वादश समुल्लास के आधार पर खण्डन)

– ब्र. राजेन्द्रार्य

चारवाक, बौद्ध, जैन आदि नास्तिक मतों का मानना है कि ईश्वर की सिद्धि प्रत्यक्षादि प्रमाणों से सिद्ध नहीं हो सकती। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपने वैचारिक क्रान्तिकारी ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाशः द्वादश समुल्लास में ईश्वर के दार्शनिक स्वरूप एवं वैज्ञानिक विवेचन के आधार पर नास्तिकों की इस मान्यता का खण्डन किया है। ईश्वर प्रत्यक्ष न होने की जिस युक्ति के भरोसे नास्तिकों के सब सम्प्रदाय और आधुनिक वैज्ञानिक गण फूले नहीं समा रहे थे, स्वामी दयानन्द ने उनकी जड़ ही काट दी। महर्षि ने कहा कि ईश्वर का प्रत्यक्ष होता है। ईश्वर का प्रत्यक्ष कैसे होता है, एतद् विषयक स्वामी जी की मान्यता के विचार यहाँ पर उद्धृत हैं-

ईश्वर का लक्षण वा स्वरूप – स्वामी दयानन्द सरस्वती ने लगभग अपने सभी ग्रन्थों में ईश्वर के विषय में कुछ न कुछ अवश्य लिखा है। आर्य समाज के प्रथम व द्वितीय नियम में भी ईश्वर की चर्चा की हे। ऋषि दयानन्द ने अपने ग्रन्थों में ईश्वर विषयक ऐसे अनेक मतों का निराकरण किया है, जिसमें ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया जाता है या अन्यथा रूप में स्वीकार किया जाता है। नास्तिक मूर्धन्य चारवाक की चर्चा करते हुए वे लिखते हैं-‘‘कोई एक बृहस्पति नामा पुरुष हुआ था जो वेद, ईश्वर और यज्ञादि उत्तम कर्मों को नहीं मानता था। उसके अनुसार लोकसिद्ध राजा ही परमेश्वर है।’’ ईश्वर विषयक इस चारवाक मत का निराकरण करते हुए स्वामी दयानन्द लिखते हैं- ‘‘यद्यपि राजा को ऐश्वर्यवान और प्रजा पालन में समर्थ होने से श्रेष्ठ मानें तो ठीक है, परन्तु जो अन्यायकारी पापी राजा हो, उसको भी परमेश्वरवत् मानते हो तो तुम्हारे जैसा कोई भी मूर्ख नहीं।’’ स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपने ग्रन्थों में ईश्वर के गुणों के वर्णन के सन्दर्भ में अनेक वेद मन्त्र प्रमाण स्वरूप प्रस्तुत किये हैं। उनमें से कुछ प्रमाण यहाँ पर उद्धृत हैं-

ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः।

यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते।।

– ऋग्वेद १/१६४/३९

अर्थात् जो सब दिव्य गुण-कर्म-स्वभाव-विद्यायुक्त, और जिसमें पृथिवी सूर्य्यादि लोक स्थित हैं, और जो आकाश के समान व्यापक, सब देवों का देव परमेश्वर है, उसको जो मनुष्य न जानते न मानते और उसका ध्यान नहीं करते, वे नास्तिक मन्दमति सदा दुःख सागर में डूबे ही रहते हैं। इसलिये सर्वदा उसी को जानकर सब मनुष्य सुखी होते हैं।

प्रश्नः वेद में ईश्वर अनेक हैं, इस बात को तुम मानते हो वा नहीं?

उत्तरः नहीं मानते, क्योंकि चारों वेदों में ऐसा कहीं नहीं लिखा, जिससे अनेक ईश्वर सिद्ध हों, किन्तु यह तो लिखा है कि ईश्वर एक है।

ईशा वास्यमिद ं  सर्वंयत्किञ्च जगत्याञ्जगत्।

तेन व्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम्।।

– यजुर्वेद ४०/१

हे मनुष्य! जो कुछ इस संसार में जगत् है, उस सब में व्याप्त होकर (जो उसका) नियन्ता है वह ईश्वर कहाता है। उससे डर कर तू अन्याय से किसी के धन की आकांक्षा मत कर। उस अन्याय के त्याग और न्यायाचरण रूप धर्म से अपने आत्मा से आनन्द को भोग।

परमेश्वर का जैसा गुण-कर्म-स्वभाव है, वैसा ही जानकर मानना ही ज्ञान-विज्ञान कहाता है, उल्टा अज्ञान है। महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र में कहा है-

क्लेश कर्मविपाकाशयैर परामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः।

-योगदर्शन १/२४

जो अविद्यादि क्लेश, कुशल-अकुशल, इष्ट-अनिष्ट और मिश्र फलदायक कर्मों की वासना से रहित है, वह सब जीवों से विशेष ईश्वर कहाता है।

स्वामी दयानन्द ईश्वर के स्वरूप का उल्लेख इस प्रकार करते हैं-

‘ईश्वर’ कि जिसके ब्रह्म परमात्मादि नाम हैं, जो सच्चिदानन्दादि लक्षणयुक्त है, जिसके गुण, कर्म, स्वभाव पवित्र हैं। जो सर्वज्ञ, निराकार, सर्वव्यापक, अजन्मा, अनन्त, सर्वशक्तिमान, दयालु, न्यायकारी , सब सृष्टि का कर्त्ता, धर्त्ता, हर्त्ता, सब जीवों को कर्मानुसार सत्य न्याय से फलदाता आदि लक्षणयुक्त है, उसी को परमेश्वर मानता हॅूँ।

जीव और ईश्वर का स्वरूप गुण-कर्म-स्वभाव -प्रश्नः जीव और ईश्वर का स्वरूप गुण-कर्म-स्वभाव कैसा है?

उत्तरः दोनों चेतन स्वरूप हैं। स्वभाव दोनों का पवित्र, अविनाशी और धार्मिकता आदि है, परन्तु परमेश्वर के सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय, सब को नियम में रखना, जीवों को पाप पुण्यों के फल देना आदि धर्मयुक्त कर्म हैं और जीव के सन्तानोत्त्पति, उनका पालन, शिल्प विद्या आदि अच्छे बुरे कर्म हैं। ईश्वर के नित्यज्ञान, आनन्द, अनन्त बल आदि गुण हैं और जीव के-

इच्छाद्वेष प्रयत्नसुख दुःख ज्ञानान्यात्मनो लिङ्गमिति।

-न्याय दर्शन १/१/१०

प्राणापाननिमेषोन्मेषजीवनमनोगतीन्द्रिया

न्तरविकाराः सुख-दुःखे

इच्छाद्वेष प्रयत्नाश्चात्मनो लिङ्गानि।

– वैशेषिक दर्शन ३/२/४

‘इच्छा’ = पदार्थों की प्राप्ति की अभिलाषा, ‘द्वेष’ = दुःखादि की अनिच्छा वैर, ‘पुरुषार्थ’ =बल, ‘सुख’ = आनन्द, ‘दुःख’ =विलाप, अप्रसन्नता, ‘ज्ञान’=विवेक पहिचानना ये तुल्य हैं। परन्तु वैशेषिक में ‘प्राण’= प्राणवायु को बाहर निकालना, ‘अपान’ = प्राणवायु को भीतर लेना, ‘निमेष’ =आँख को मींचना, ‘उन्मेष’ = आँख को खोलना, ‘जीवन’  = प्राण का धारण करना, ‘मन’ = निश्चय स्मरण और अहंकार करना, ‘गति’= चलना, ‘इन्द्रिय’= सब इन्द्रियों को चलाना, ‘अन्तरविकार’= भिन्न-भिन्न क्षुधा-तृषा, हर्ष-शोकादि युक्त होना (ये विशेष हैं।) ये जीवात्मा के गुण परमात्मा (के गुणों) से भिन्न हैं। इन्हीं से आत्मा की प्रतीति करनी, क्योंकि वह स्थूल नहीं है।

जब तक आत्मा देह में होती है, तभी तक ये गुण प्रकाशित रहते हैं और जब आत्मा शरीर छोड़ चली जाती है, तब ये गुण शरीर में नहीं रहते। जिसके होने से जो हो और न होने से न हो, वे गुण उसी के होते हैं। जैसे दीप और सूर्यादि के न होने से प्रकाशादि का न होना और होने से होना, वैसे जीव और परमात्मा का विज्ञान गुण द्वारा होता है।

ईश्वर अनादि हैईश्वर भूत, वर्तमान, भविष्यत तीनों कालों के बन्धन में न आने के कारण अनुत्पत्ति धर्मक है, अतः अनादि और जो वस्तु अनादि होती है, वह अमरणधर्मा होती है और जो अमृत होती है, वह अनन्त होती है। अनादि अनन्त को ही ‘‘सत्’’ कहते हैं। स्वामी दयानन्द ने अथर्ववेद के मन्त्र को उद्धृत करते हुए ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका१० में कहा है-

यो भूतञ्च भव्यञ्च सर्वं यश्चाधितिष्ठति स्वर्यस्य

च केवलं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः।

– अथर्ववेद १०/८/१

अर्थ- यो भूत, भविष्यति, वर्तमानान् कालान् सर्वं जगच्चाधितिष्ठति सर्वाधिष्ठाता सन् कालादूर्ध्वं विराजमानोऽस्ति। दयानन्दर्षि।।

प्रश्नः ईश्वर सादि है वा अनादि?

उत्तरः अनादि। अर्थात् जिसका आदि कोई कारण वा समय न हो, उसको अनादि कहते हैं।

अनादि पदार्थ तीन हैं- एक ईश्वर, द्वितीय जीव, तीसरा प्रकृति, अर्थात् जगत् का कारण। इन्हीं को नित्य भी कहते हैं। जो नित्य पदार्थ हैं, उनके-गुण-कर्म स्वभाव भी नित्य हैं। ईश्वर, जीव और प्रकृति के अनादित्व में वेदादिशास्त्रों के निम्न प्रमाण उद्धृत हैं-

द्वा सुपर्णा सयुजासखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।

तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नयो अभि चाकशीति।।१।।

– ऋग्वेद १/१६४/२०

शाश्वतीभ्यः समाभ्यः।। २।।  – यजुर्वेद ४०/८

(द्वा) जो ब्रह्म और जीव दोनों (सुपर्णा) चेतनता और पालनादि गुणों से सदृश (सयुजा) व्याप्य-व्यापक भाव से संयुक्त (सखाया) परस्पर मित्रतायुक्त सनातन अनादि हैं और (समानम्) वैसा ही (वृक्षम्) अनादि मूलरूप कारण और शाखारूप कार्ययुक्त वृक्ष अर्थात् जो स्थूल होकर प्रलय में छिन्न-भिन्न हो जाता है, वह तीसरा अनादि पदार्थ। इन तीनों के गुण, कर्म और स्वभाव भी अनादि हैं। (तयोरन्यः) इन जीव और ब्रह्म में से एक जो जीव है, वह इस वृक्ष रूप संसार में पाप-पुण्य रूप फलों को (स्वाद्वत्ति) अच्छे प्रकार भोक्ता  है और दूसरा परमात्मा कर्मों के फलों को (अनशन्) न भोगता हुआ चारों ओर अर्थात् भीतर-बाहर सर्वत्र प्रकाशमान हो रहा है। जीव से ईश्वर, ईश्वर से जीव और दोनों से प्रकृति भिन्न स्वरूप; तीनों अनादि हैं।। १।।

(शाश्वतीभ्यः०) अर्थात् अनादि सनातन जीवरूप प्रजा के लिए वेद द्वारा परमात्मा ने सब विद्याओं का बोध किया है।।२।।

अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः

प्रजाः सृजमानां स्वरूपाः।

अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां

भुक्त भोगामजोऽन्यः।।

– श्वेताश्वतर उपनिषद् ४/५

प्रकृति, जीव और परमात्मा तीनों अज अर्थात् जिनका जन्म कभी नहीं होता और न कभी ये जन्म लेते अर्थात् ये तीन सब जगत् के कारण हैं। इनका कारण कोई नहीं। इस अनादि प्रकृति का भोग अनादि जीव करता हुआ फँसता है और उसमें परमात्मा न फँसता और न उसका भोग करता है।१२

ईश्वर का व्यापकत्व – प्रश्नः ईश्वर व्यापक है, वा किसी देश-विशेष में रहता है?

उत्तरः व्यापक है। क्योंकि जो एक देश में रहता तो सर्वान्तर्यामी सर्वज्ञ, सर्वनियन्ता, सब का सृष्टा, सब का धर्त्ता और प्रलय कर्त्ता नहीं हो सकता। अप्राप्त देश में कर्त्ता की क्रिया का होना असम्भव है।१३

इस विषय में स्वामी दयानन्द ने ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका में ऋग्वेद का निम्न मन्त्र उद्धृत किया है-

तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः।

दिवीव चक्षुराततम्।।

– ऋग्वेद १/२२/२०

व्यापक जो परमेश्वर है उसका अत्यन्त उत्तम आनन्दस्वरूप जो प्राप्ति होने के योग्य अर्थात् जिसका नाम मोक्ष है, उसको विद्वान् लोग सब काल में देखते हैं। वह कैसा है कि सब में व्याप्त हो रहा है और उसमें देश, काल और वस्तु का भेद नहीं है अर्थात् उस देश काल में था और इस काल में नहीं,उस वस्तु में है और इस वस्तु में ंनहीं, ऐसा नहीं है। इसी कारण से वह पद सब जगह में सबको प्राप्त होता है, क्योंकि वह ब्रह्म सब ठिकाने परिपूर्ण है। इसमें यह दृष्टान्त है कि जैसे सूर्य का प्रकाश आवरणरहित आकाश में व्याप्त होता है, इसी प्रकार परब्रह्म पद भी स्वयं प्रकाश, सर्वत्र व्याप्तवान् हो रहा है। उस पद की प्राप्ति से कोई भी प्राप्ति उत्तम नहीं है, इसलिये चारों वेद उसी की प्राप्ति कराने के लिये विशेष करके प्रतिपादन कर रहे हैं।१४

ईश्वर सर्वशक्तिमान है – प्रश्नः ईश्वर सर्वशक्तिमान है, वा नहीं?

उत्तरः है। परन्तु जैसा तुम सर्वशक्तिमान शब्द का अर्थ जानते हो, वैसा नहीं। किन्तु ‘सर्वशक्तिमान’ शब्द का यही अर्थ है कि ईश्वर अपने काम उत्पत्ति, पालन, प्रलय आदि और सब जीवों के पुण्य-पाप की यथायोग्य व्यवस्था करने में किंचित् भी किसी की सहायता नहीं लेता, अर्थात् अपने अनन्त सामर्थ्य से ही सब अपना काम पूर्ण कर लेता है।१५

ईश्वर निराकार है, साकार नहीं – प्रश्नः ईश्वर साकार है वा निराकार?

उत्तरः निराकार। क्योंकि जो साकार होता तो व्यापक नहीं हो सकता। जब व्यापक न होता तो सर्वज्ञादि गुण भी ईश्वर में न घट सकते। क्योंकि परिमित वस्तु में गुण-कर्म-स्वभाव भी परिमित रहते हैं तथा शीतोष्ण क्षुधा-तृषा और रोग-दोष छेदन-भेदन आदि से रहित नहीं हो सकता, इससे यही निश्चित है कि ईश्वर निराकार है। जो साकार हो तो उसके नाक, कान, आँख आदि अवयवों का बनाने हारा दूसरा होना चाहिये। क्योंकि जो संयोग से उत्पन्न होता है, उसको संयुक्त करने वाला निराकार चेतन अवश्य होना चाहिये।१६                        शेष भाग अगले अंक में….