Category Archives: पाखण्ड खंडिनी

जब मुस्लिम महिलाएं शादी बचाने के लिए अजनबी के साथ सोती हैं

जब मुस्लिम महिलाएं शादी बचाने के लिए अजनबी के साथ सोती हैं

 

 

  • जब मुस्लिम महिलाएं शादी बचाने के लिए अजनबी के साथ सोती हैं

    एक न्यूज रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ मुस्लिम महिलाएं तलाक के बाद अपनी शादी बचाने के लिए मोटी रकम देकर ‘हलाला’ विवाह करती हैं. कुछ मुस्लिमों के द्वारा माने जाने वाले ‘हलाला’ परंपरा में तलाक के बाद महिला अगर पहले पति के पास जाना चाहती है तो उसे किसी दूसरे पुरुष से शादी करनी पड़ती है और फिर उसे तलाक देना होता है.

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    बीबीसी लंदन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, डिजिटल एज में हलाला सर्विस देने के नाम पर कई ऑनलाइन एकाउंट चल रहे हैं. किसी अजनबी के साथ हलाला विवाह करने के लिए महिलाएं से सर्विस एजेंसी पैसे मांगती है और उस शख्स के साथ उसे सोना भी पड़ता है.

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    हालांकि, काफी मुस्लिम हलाला को गलत मानते हैं. लंदन के इस्लामिक शरिया काउंसिल भी इस परंपरा का कड़ा विरोध करती है.

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    हालांकि, काफी मुस्लिम हलाला को गलत मानते हैं. लंदन के इस्लामिक शरिया काउंसिल भी इस परंपरा का कड़ा विरोध करती है.

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    रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि ऑनलाइन एजेंसी सर्विस देने के लिए महिलाओं से 2 लाख रुपए तक चार्ज करते हैं. ऐसी ही एक सर्विस देने वाले शख्स ने यह भी बताया कि एक बार हलाला होने के बाद एक पुरुष महिला को तलाक देने से इनकार करने लगा.

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    कई बार हलाला के तहत महिलाओं को कई मर्दों के साथ भी सोना पड़ता है. उनका यौन शोषण भी होता है.

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    लंदन के इस्लामिक शरिया काउंसिल की खोला हसन कहती हैं कि हलाला पाखंड है. यह सिर्फ पैसा बनाने के लिए किया जाता है.

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    खोला हसन यह भी कहती हैं कि महिलाओं को इससे बचाने के लिए काउंसिलिंग मुहैया कराई जानी चाहिए.

    source:http://aajtak.intoday.in/gallery/muslim-women-sleep-stranger-save-marriage-4-11853.html

जात-पाँत तोड़क मण्डल का आर्यसमाज से आत्मीय सम्बन्ध: डॉ. कुशलदेव शाश्त्री

शायद बहुत ही कम लोगों को यह मालूम हो कि आर्यसमाज के जो प्रमुख कार्यकत्र्ता थे, वे जातपाँत तोड़क मण्डल के भी कार्यकत्र्ता थे। वैधानिक दृष्टि से हमारे कुछेक मित्रों का यह कथन ठीक है कि जात-पाँत तोड़क मण्डल एक स्वतन्त्र संस्था है और उसका आर्यसमाज से कोई सम्बन्ध नहीं है। पर गहराई से देखा जाए तो जात-पाँत तोड़क मण्डल और आर्यसमाज का अविभाज्य सा आत्मीय सम्बन्ध था। इस मण्डल के अधिकांश सभासद वैदिक मतावलम्बी थे।

मण्डल के संस्थापक सन्तराम बी0 ए0 (1887-1988) स्वामी दयानन्द की लकीर के फकीर या पूर्णतः दयानन्द के अनुयायी न भी हों, पर दयानन्द के व्यक्तित्व और कृतित्त्व के ˗प्रति वे नतमस्तक थे। सन् 1971-72 में मराठवाड़ा विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में संतराम बी0 ए0 लिखित स्वामी दयानन्द नामक एक प्रदीर्घ चरित्र लेख पढ़ाया जाता था। संतराम बी0 ए0 के लिए अपने ’मण्डल के बाद सबसे निकटतम और आत्मीय अगर कोई संस्था थी, तो वह आर्यसमाज थी।‘

श्री संतराम बी0 ए0 की ओर से डॉ0 अम्बेडकर के साथ जो 27.3.1937 को पत्र व्यवहार हुआ, उसमें डॉ0 अम्बेडकर के अध्यक्षीय भाषण पर तीव्र असन्तोष करने वाले जो चार या पाँच व्यक्तियों के नाम दिये गये हैं, उनमें क्रमशः प्रथम तीन व्यक्ति तो मेरी जानकारी के अनुसार सुप्रसिद्ध अखिल भारतीय आर्यसमाजी नेता हैं। जिनके नाम हैं-भाई परमानन्द (1876-1947), महात्मा हंसराज (1864-1938) और डॉ0 गोकुलचन्द नारंग एम0 ए0, पी0 एच0 डी0, डी0 लिट् (1878-1969)।

भाई परमानन्द बचपन में ही आर्यसमाजी बन गये थे, लाहौर के दयानन्द हाईस्कूल व कॉलेज के वे स्नातक थे। दयानन्द कॉलेज लाहौर में आप प्राध्यापक भी रहे और दयानन्द एँग्लो वैदिक (डी0 ए0 वी0) शिक्षण संस्था के आदेश पर आप प्रचारक के रूप में विदेश गये और आर्यसमाज का प्रचार-प्रसार किया ये वे ही भाई परमानन्द हैं, जिन्हें आजन्म काले पानी की सजा हुई थी। जो सरदार भगत सिंह के दादापिता के आत्मीय सखास्नेही थे, तथा लाहौर के राष्ट्रीय महाविद्यालय में सुखदेवभगतसिंह आदि क्रान्तिकारियों के प्राध्यापक थे।

दूसरा नाम है महात्मा हंसराज का, जो दयानन्द कॉलेज (डी0 ए0 वी0) लाहौर के प्राचार्य थे और जिन्होंने किसी प्रकार का पारिश्रमिक न लेते हुए 26 वर्ष (1886-1912) तक उक्त शिक्षण संस्था की सेवा की थी और जीवन के 26 वर्ष आर्यसमाजी आन्दोलन के लिए समर्पित किये थे।

तीसरे महानुभाव डॉ0 गोकुलचन्द नारंग भी भाई परमानन्द के शिष्य और डी0 ए0 वी0 शिक्षण संस्था के विद्यार्थी थे। आप स्वामी श्रद्धानन्द द्वारा स्थापित ’भारतीय शुद्धि सभा‘ (1923) की कार्यकारिणी के सभासद थे। पं0 इन्द्र विद्यावाचस्पति लिखित ’आर्यसमाज का इतिहास‘ का आपने प्राक्कथन लिखा है। इन्द्रजी ने इन्हें

आर्यजाति का ज्ञानवृद्ध-वयोवृद्ध नेता कहा है। आप डी0 ए0 वी0 कॉलेज लाहौर और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में भी प्राध्यापक रहे।

20 फरवरी 1925 में मुम्बई के डॉ0 कल्याणदास देसाई की अध्यक्षता में जातपाँत तोड़क मण्डल का जो वार्षिक अधिवेशन हुआ था। उस अधिवेशन को सम्बोधित करने वाले अधिकांश व्यक्ति आर्यसमाजी ही थे। जिनमें स्वामी श्रद्धानन्द, पं0 घासीराम (1873-1934), स्वामी मुनीश्वरानन्द, स्वामी सत्यदेव आदि उल्लेखनीय हैं। इस अधिवेशन में जो प्रस्ताव पास हुआ था, उससे भी इस मण्डल पर आर्यसमाज की छाप या प्रभुत्व की बात स्पष्ट होती है, प्रस्ताव निम्न प्रकार है

”इस मण्डल की सम्मति में आजकल जो वर्ण-व्यवस्था प्रचलित है, वह बुरी है, इसलिए आवश्यक है कि खान-पान और विवाह विषयक बन्धनों को उठा दिया जाए, इसलिए यह मण्डल प्रत्येक आर्य युवक-युवती को प्रेरणा देता है कि विवाह आदि के कार्यों में जो मौजूदा बन्धन है, उन्हें जान-बूझकर तोड़ें और जात-पाँत के बाहर विवाह करें।“

 

आर्यसमाज और जात-पाँत तोड़क मण्डल के आपसी सम्बन्ध को स्पष्ट करते हुए डॉ0 सत्यकेतु विद्यालंकार लिखते हैं-’बीसवीं सदी के प्रथम चरण (सन् 1921) में लाहौर में जात-पाँत तोड़क मण्डल की स्थापना हुई, जिसके ˗प्रमुख नेता सन्तराम बी0 ए0 थे। यद्यपि यह मण्डल आर्यसमाज के संगठन के अन्तर्गत नहीं था, पर इसका संचालन आर्यसमाजियों द्वारा ही किया जा रहा था। यह मण्डल जातपाँत तोड़कर विवाह सम्बन्ध स्थापित करने के लिए आन्दोलन करता था।

स्पष्ट है कि आर्यसमाज और जात-पाँत तोड़क मण्डल वैधानिक दृष्टि से दो स्वतन्त्र संस्थाएँ होते हुए भी विचारधारा की दृष्टि से जात-पाँत तोड़क मण्डल आर्यसमाज का ही पर्यायवाची या एक पोषक भाग था। आर्यसमाज ने अपने प्रारम्भिक काल से ही जातिनिर्मूलन और दलितोद्धार में विशेष दिलचस्पी ली थी। डॉ0 अम्बेडकर भी अपने ढंग विशेष से इन अभियानों में विशेष अभिरुचि रखते थे। इन कार्यक्रमों के सन्दर्भ में विचार साम्य होने के कारण ही जात-पाँत तोड़क मण्डल के माध्यम से श्री संतराम जी बी0 ए0 ने डॉ0 अम्बेडकरजी को ’मण्डल‘ के वार्षिक अधिवेशन (1936) की अध्यक्षता के लिए आमन्त्रित किया था। लेकिन ने जाने वे कौन से कारण रहे कि तत्कालीन कतिपय आर्यसमाजी डॉ0 अम्बेडकरजी के विचारों को यथावत् सुनने की सहनशीलता का भी परिचय नहीं दे सके। काश यदि वे डॉ0 अम्बेडकरजी के विचारों को धीरज से सुन लेते। मतभेदों के बावजूद अपनी आग्रही भूमिका को एक ओर रखकर उदारमतवादियों के लिए खुलकर चर्चा करने का वातावरण बनाना जरूरी होता है, पर तत्कालीन आर्यसमाजी उस प्रकार की खुली चर्चा का वातावरण बनाने में असमर्थ रहे। यदि वे समर्थ होते तो, आज उन्हें कमसेकम इस बात का तो श्रेय मिलता कि डॉ0 अम्बेडकरजी को अपने अधिवेशन की अध्यक्षता करने का पहला अवसर सर्वप्रथम उन्होंने ही दिया था। अब तो इतिहास में आर्यसमाज केवल एक अयशस्वी निमन्त्रक या संयोजक बनकर रह गया है। इतिहासकार इतना ही कह सकेगा कि डॉ0 अम्बेडकरजी को अपने वार्षिक अधिवेशन की अध्यक्षता करने का एकमात्र निमन्त्रण यदि किसी ने दिया था तो वह आर्यसमाजियों ने, पर वह भी मूर्तरूप धारण न कर सका, अयशस्वी रहा। डॉ0 अम्बेडकरजी के शब्दों में-”मेरा विश्वास है-यह पहला अवसर है जबकि स्वागत समिति ने अध्यक्ष की नियुक्ति को समाप्त कर दिया, क्योंकि वह अध्यक्ष के विचारों को स्वीकार नहीं करती थी।“

चर्चित अध्यक्षीय भाषण में डॉ0 अम्बेडकरजी ने शास्त्रों के साथ वेद की भी आलोचना की थी, जो तत्कालीन वेद प्रामाण्यवादी आर्यसमाजियों को सहन नहीं हुई। सम्भवतः इसीलिए आर्यसमाज बच्छोवाली लाहौर के पूर्व प्रधान श्री हरभगवान् ने अपने 14 अप्रैल, 1937 के पत्र में डॉ0 अम्बेडकरजी को लिखा था कि-”हममें से कुछ हैं, जो चाहते हैं कि अधिवेशन बगैर किसी अप्रिय घटना के साथ सम्पन्न हो, इसलिए वे चाहते हैं कि-कम-से-कम वेद शब्द इस समय के लिए छोड़ दिया जाए।“ स्मरण रहे इस अध्यक्षीय भाषण में डॉ0 अम्बेडकरजी ने अपने भावी धर्मांतरण का संकेत देते हुए यह घोषणा कर दी थी कि ’हिन्दू के रूप में मेरा यह अन्तिम भाषण होगा।‘ वेद की तथाकथित आलोचना और भविष्य में धर्मांतरण का संकेत, ये दोनों ही तथ्य ऐसे थे कि जिन्हें सहजता से सहन कर पाना आर्यसमाज के लिए असम्भव था। दोनों पक्ष अपने-अपने स्थान पर अडिग रहे। डॉ0 अम्बेडकर अपने विचारों पर दृढ़ थे और किसी प्रकार के समझौते के लिए तैयार न थे और उन्होंने बिना लाग लपेट के स्पष्ट कर दिया था-“मैं अल्पविराम तक परिवर्तित करने के लिए तैयार नहीं हूँ, मैं अपने भाषण पर किसी प्रकार के सेंसर की अनुमति नहीं दूँगा।” इसके अतिरिक्त जात-पाँत तोड़क मण्डल के प्रतिनिधि को उन्होंने यह भी लिखा था कि-”यदि आप में से कोई भी थोड़ा संकेत करता कि आप मुझे अध्यक्ष चुनकर जो सम्मान दे रहे हैं। उसके बदले मुझे धर्मांतरण (हिन्दू से बौद्ध) के कार्यक्रम में अपने विश्वास का परित्याग करना होगा, तो मैं आपसे स्पष्ट शब्दों में कह देता कि मैं आपसे मिलनेवाले सम्मान से अधिक अपने विश्वास की परवाह करता हूँ।“

कर्मफल और मुक्ति का विचार : पण्डित भीमसेन शर्मा

अब संक्षेप से कर्मफलों का विचार किया जाता है। धर्म वा अधर्म का संचय कराने वाले शास्त्रों में कर्त्तव्य बुद्धि से विधान किये वा छोड़ने के लिये निषिद्ध किये शुभ-अशुभ अच्छे-बुरे दो प्रकार के कर्म हैं। उनके फल भी वैसे ही शुभ-अशुभरूप होते हैं। वे कर्म मन, वाणी और शरीर में उत्पन्न होने से तीन प्रकार के हैं। मानस कर्मों का फल मन से, वाचिकों का वाणी से और शरीर से होने वाले कर्मों का फल शरीर से ही इस जन्म में वा जन्मान्तर में मनुष्य भोगता है। इन्द्रियादि साधन और भोग के आधार शरीर के साथ रहने पर ही जीवात्मा का कर्त्ता-भोक्ता होना विद्वान् लोग स्वीकार करते हैं और इसी से केवल आत्मा के भोक्ता होने का निषेध भी करते हैं। वात्स्यायन ऋषि ने न्यायभाष्य में लिखा है कि- ‘शरीररहित आत्मा को कुछ भोग नहीं होता’१ और केवल शरीरादि भी सुख-दुःखादि के   साधन नहीं हो सकते अर्थात् इन्द्रिय और शरीर के द्वारा मनुष्य को सुख-दुःख का भोग प्राप्त होता है। जब धर्म का अधिक सेवन करता है तो सर्वोत्तम स्वर्गनामक सुख को प्राप्त होता और अधर्म के अधिक सेवन से नरकनामक विशेष दुःख पाता है। कर्मों से ही प्राणियों के शरीरों में प्रधान सत्त्वादि गुण और उनके अवयवरूप अवान्तर भेद प्रत्येक शरीर में भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हैं। इसीलिये मनु ने बारहवें अध्याय में कहा है कि- ‘ज्ञानरूप सत्त्वगुण अज्ञानस्वरूप तमोगुण और रागद्वेषरूप रजोगुण माना है। अर्थात् इस शरीर में कर्मभेद से न्यूनाधिकभाव को प्राप्त हुए सत्त्वादिगुण व्याप्त रहते हैं।’२ कर्म के भेद से ही ऊंच-नीच अधिकारों और ऊंच-नीच योनियों में लिग्शरीर के सहित जीवात्मा प्रतिक्षण भ्रमते रहते हैं। इसीलिये मनु ने बारहवें अध्याय में कहा है कि- ‘इस जीवात्मा की अपने कर्म से ही अनेक प्रकार की दशा संसार में देख तथा धर्म और अधर्म के मेल को छोड़कर केवल धर्म में मन को धारण करे।’३ जिन-जिन शुभ वा अशुभ कर्मों का सेवन मनुष्य वर्त्तमान जन्म में करता है, उन कर्मों का यदि उसी शरीर में फलभोग नहीं होता तो उसको जाति कि कैसे कुल में जन्म होना, अवस्था कितनी और कैसा भोग हो यह तीन प्रकार का फल जन्मान्तर में होता है। इन्हीं फलरूप जाति आदि का विशेष विस्तार मनु आदि महर्षियों ने अपने अनुभव से किया है कि ऐसा-ऐसा कर्म करने से जन्मान्तर में अमुक-अमुक जाति वा योनि में जन्म होता है। सो यह बुद्धि के पार पहुंचे ज्ञान से देखने वाले लोकोत्तर पण्डित लोगों को वर्त्तमान प्रत्यक्ष शरीरों में किन्हीं लक्षण वा चिह्नों को देखकर भूतपूर्व उनके कारणों का यथार्थ अनुमान कर लेना कुछ आश्चर्य नहीं है कि- यह जीवात्मा इससे पूर्वजन्म में अमुक योनि वा जाति में रहकर अमुक कर्म करता रहा उस कर्म का यह जाति आदि रूप इस समय फल प्राप्त हुआ है। ऐसे परोक्ष विषयों का ठीक-ठीक अनुभव योगी लोग ही कर सकते हैं। कोई सन्ध्या वा पढ़ाने आदि ब्राह्मणादि के नित्य कर्म हैं और कोई गर्भाधानादि नैमित्तिक हैं। भोजन से नित्य क्षुधा की निवृत्ति के समान नित्यकर्म का फल भी नित्य-नित्य ही प्राप्त होता जाता है और नैमित्तिक गर्भाधानादि कर्मों का पुत्रोत्पत्ति आदि नैमित्तिक ही फल होता है। उत्तम, मध्यम, निकृष्ट इन तीन प्रकार के कर्मों का फल भी वैसा ही त्रिविध होता है। उत्तम कोटि के कर्मों का फल स्वर्गनामक, निकृष्ट का नरक और मध्यम का सुख-दुःख मिला हुआ रजोगुणसम्बन्धी फल होता है। तमोगुण में पड़ने वाले कृमि- कीटादि नीच कर्मों के नरक फल गामी होते और सत्त्वगुणी प्राणियों को प्रायः स्वर्गसुख के भागी वा निवासी जानना चाहिये।

कोई लोग संसारी प्रत्यक्षदशा से विलक्षण अदृश्य और परोक्ष नरक-स्वर्ग हैं अर्थात् किसी निज स्थान का नाम नरक और स्वर्ग है, ऐसा मानते हैं। हम लोग उन नरक-स्वर्गों के परोक्ष होने का खण्डन न करके प्रत्यक्ष भी नरक-स्वर्गों का ग्रहण करते हैं। वैसे बहुत लोक और उनके विशेष स्थान परोक्ष हैं वहां सुखविशेष के हेतु स्वर्गस्थान और दुःखविशेष के हेतु नरकस्थान भी हैं कि जैसे पृथिवी पर स्वर्गनाम सुखविशेष के हेतु और नरकनाम दुःखविशेष के भोगस्थान प्रत्यक्ष दीखते हैं। इसी प्रकार अन्य सब परोक्ष लोक-लोकान्तरों में भी स्वर्ग-नरक होना बन सकता है परन्तु यह नहीं हो सकता कि स्वर्ग-नरक किसी एक ही स्थल में हों और सर्वत्र न हों। जैसे सम्प्रति प्रत्येक नगर वा जिलों में बन्धागार (जेलखाना) बनाये जाते हैं वैसे ही सुख-दुःख की सामग्री सर्वत्र जानो। सब सुखों के भोगों की सामग्री जहां विद्यमान है ऐसे स्थानों में बसते स्वर्गरूप सुख का अनुभव करने वाले विद्याबुद्धिसम्पन्न पुरुष देव कहाते हैं। इसी से कहा है कि- ‘यज्ञ करने वा वेद पढ़ने वाले ज्ञानी लोग जो कि सत्त्वगुण की मध्यावस्था में रहते हैं वे ही देवता हैं। मुक्ति भी कर्मों से ही सिद्ध होती है।’१ इससे मुक्ति पाने के लिये भी मनुष्य को फलभोग की आशा छोड़कर धर्म का ही सेवन करना चाहिये। फलप्राप्ति की इच्छा छोड़कर सेवन किये कर्मों से उत्पन्न होने पर भी मुक्ति कर्मफल से पृथक् नहीं रह सकती क्योंकि अकस्मात् भी कर्मों का फल मिलता है। चाहना का बन्धन मानें तो बुरे कर्म के दुःखफल की चाहना कोई नहीं रखता। यद्यपि मुक्ति में दुःख के विरोधी किसी सुख का भोग नहीं है तो भी दुःख के अभाव का नाम सुख होने से मुक्त को अत्यन्त सुख होना कह सकते हैं। जैसे प्रक्षालन- धोने आदि कर्म से वस्त्रादि के मल की निवृत्ति और निर्मलता की प्राप्ति कर्म का ही फल है, ऐसा शिष्ट लोग मानते हैं। वैसे ही अन्तःकरण में रहने वाली पाप की वासना और उनसे होने वाले दुःख की विशेष निवृत्ति भी मनु आदि धर्मशास्त्र में कहे वर्णाश्रम धर्म का बहाना और कामना को छोड़कर सेवन करने से हो सकती है। इसी सर्वोत्तम मनुष्य की दशा को विचारशील मुक्ति कहते हैं। सो इसी धर्मशास्त्र के बारहवें अध्याय में कहा है कि- ‘वेदोक्त कर्म दो प्रकार का है- संसार में वा जन्मान्तर में जिसके फल की इच्छा हो जिससे देवाधिकार प्राप्त हो सके वह प्रवृत्त कर्म और द्वितीय केवल निष्काम ज्ञानपूर्वक ईश्वर की उपासनादि कर्म निवृत्त कहाता है, इसी का फल मुक्ति है।’१ ऐसा होने पर जो लोग मुक्ति को कर्म का फल नहीं मानते उनका उत्तर आ जाता है। वेद का अभ्यास करने में यत्न करता रहे इस कथन से उस संन्यासदशा के उपयोगी कर्मों के करने का विधान और अतिवृद्ध होने वा गृहादि के न होने से अग्निहोत्रादि कर्मों का त्याग सूचित किया है। यहां कर्मफलों का विवेचन संक्षेप से किया गया और विद्वानों को थोड़ा कथन ही बहुत होता है।

जो विषय हमने उपोद्घात के आरम्भ में उद्देशमात्र गिनाये हैं उन सबका क्रमानुसार संक्षेप से विचार किया। अब उपोद्घात समाप्त किया जाता है। बारहवें अध्याय में प्रक्षिप्त श्लोक कोई नहीं दीखता। अब आगे प्रतिज्ञा के अनुसार मानव धर्मशास्त्र के

एकादश अध्याय के प्रक्षिप्त श्लोकों का विचार : पण्डित भीमसेन शर्मा

अब ग्यारहवें अध्याय के प्रक्षिप्त श्लोकों का विचार किया जाता है। इसमें पहले चालीसवां श्लोक प्रक्षिप्त है। इस पद्य में ‘बहुत धन के व्यय से पूरा होने योग्य यज्ञ को थोड़े धन से आरम्भ नहीं करना चाहिये’ इस विधिवाक्य का अर्थवाद कहा है। सो असम्भव है और अर्थवाद सम्भव होना चाहिये। क्योंकि यज्ञ कोई चेतन पदार्थ नहीं किन्तु जड़ है इससे इन्द्रियादि का नाश नहीं कर सकता और इस अर्थवाद में कहा यही है कि- इन्द्रिय, यश, स्वर्ग, आयु, कीर्त्ति, प्रजा-सन्तान और पशुओं को थोड़ी दक्षिणा वाला यज्ञ नष्ट कर देता है।’१, सो ठीक नहीं। यद्यपि यज्ञादि कर्मों में जो दक्षिणा ऋत्विजादि को दी जाती है वह परिश्रम का फल (मेहनताना) है उसका लेन-देन नियमानुसार होना चाहिये। जैसे वकील आदि का मेहनताना उस काम और वकीलादि की योग्यतानुसार नियत होता है। किन्तु यह दान में नहीं गिना जायेगा। दान में दान लेने वाले से दाता का उपकार कुछ भी अपेक्षित नहीं किन्तु दक्षिणा में पूरा अपेक्षित है इसी से जहां-जहां ब्राह्मण को दान लेना बुरा कहा है, उससे दक्षिणा का निषेध नहीं हो सकता। इसी कारण जिस कार्य में परिश्रम का फल ठीक नहीं दिया जाता उसमें विघ्न होते हैं तथापि वह यज्ञादि कर्म जड़ होने से यजमान की कुछ हानि नहीं कर सकता किन्तु जिनका परिश्रम का फल ठीक नहीं मिलता वे ही विघ्न करते और कर सकते हैं। तथा उक्त श्लोक में यश और कीर्त्ति दोनों पर्यायवाचक पद एक साथ पढ़े हैं इस पुनरुक्ति दोष से भी उक्त श्लोक प्रक्षिप्त प्रतीत होता है। यद्यपि इस पुनरुक्ति का समाधान कुल्लूकभट्ट ने किया है तथापि वह सन्तोषजनक नहीं। और जब ऋत्विज् आदि को दक्षिणा देना उनके परिश्रम का फल है तो उसके दिये बिना उस कार्य की पूर्ति वा उससे फलप्राप्ति होना भी असम्भव है। यदि कोई वर्त्तमान समय में वकीलादि को इतना द्रव्य न देवे जितना उनको राजद्वार (अदालत) में कार्यसिद्ध होने के लिये देना चाहिये तो उस पुरुष का वह कार्यसिद्ध हो जावे, यह सम्भव नहीं है। अर्थात् जैसी और जितनी सामग्री वा व्यय से जो कार्य सिद्ध हो सकता है तो उस      अधूरे सामान वा व्यय से वह कार्य कदापि ठीक सिद्ध नहीं हो सकता। इसी प्रकार अल्पदक्षिणा वाला यज्ञ भी ठीक सुफल नहीं होता है, इस कारण अल्पदक्षिणा वाला यज्ञ नहीं करना चाहिये, यही अर्थवाद ठीक है। और जब यह अर्थवाद ठीक है तो वह इन्द्रियादि के नाश का अर्थवाद विरुद्ध हो गया। इसी से वह श्लोक प्रक्षिप्त है। इसके आगे बयालीसवां और तैतालीसवां (४२,४३) दो श्लोक प्रक्षिप्त हैं। इन श्लोकों में शूद्र से धन लेकर अग्निहोत्र करने वाले की निन्दा है। परन्तु ध्यान देकर देखा जावे तो धनाभाव में अग्निहोत्र न करने की अपेक्षा शूद्रादि नीच पुरुषों से भी धन लेकर अग्निहोत्र का सेवन करना चाहिये, यह निन्दित काम नहीं किन्तु जो इस ग्यारहवें अध्याय के उन्नीसवें (१९) श्लोक में कहा है कि- ‘जो नीचों से धन लेकर और श्रेष्ठों को देता है वह अपने को पवित्र करके उन दोनों को दुःख के पार कर देता है।’१ इस कथन से भी वह विरुद्ध है। अर्थात् शूद्र भी असाधु है उससे धन लेकर अग्निहोत्ररूप श्रेष्ठकर्म में लगाना शुभ काम है। अग्निहोत्र सबका उपकारक होने से महोत्तम कर्म है उसमें लगाया धन क्यों नीच वा निन्दित काम हुआ। जो कोई जिससे मांगने आदि द्वारा धनादि को लेकर कार्य करता है, वह काम उसी कर्त्ता का होता है किन्तु द्रव्यदाता का नहीं। और जब    धनदाता पुरुष धनादि देकर भृत्यों के तुल्य पुरोहितादि से काम कराता है तब वे पुरोहितादि शूद्रों के ऋत्विज् हो सकते हैं। शूद्र से धन लेकर यज्ञ करने में यदि धनदाता शूद्र को भी कुछ थोड़ा फल प्राप्त हो तो हमारी क्या हानि है ? अर्थात् अन्य की सुखसामग्री का उदय नहीं सह सकने वाले ही मत्सरता के दोष से दूषित होते हैं। शूद्र के धन से यज्ञ करने में शूद्र का भी कल्याण हो तो और भी अच्छा है कि एक काम से दो फल हुए।

आगे ११८,११९,१२१ ये तीन श्लोक प्रक्षिप्त हैं। अवकीर्णी का लक्षण ही जब एक सौ बीसवें श्लोक में कहा है फिर उसका असम्बद्ध व्रत करना पहले से ही कैसे हो जावे ? जिस ब्रह्मचारी ने जानकर व्यभिचार कर लिया हो उसको अवकीर्णी कहते हैं, उसका मुख्य प्रायश्चित्त १२२,१२३ श्लोकों में ठीक-ठीक कहा है। और होम करने आदि के सामान्य नियम तो आगे इसी ग्यारहवें अध्याय में कहे अनुसार मानने चाहियें। वहां जो-जो जप-होमादि प्रायश्चित्त में कहे हैं वे ग्रहण करने चाहियें। काणे गदहे को मारकर उसके मांस का होम करना तो राक्षसों का ही काम है उसका वेदमतानुयायियों को सदा ही त्याग कर देना चाहिये।

आगे १७४वां श्लोक प्रक्षिप्त जान पड़ता है। क्योंकि स्नान करना नित्य का काम होने से प्रायश्चित्त नहीं है। सो स्नान तो मनुष्य को करना ही चाहिये, सामान्यकर शास्त्र की आज्ञानुसार अपनी स्त्री से मैथुन करने वाले को चाहिये कि मैथुन के पश्चात् स्नान करे तभी शुद्धि होती है। इसी प्रयोजन से यदि यह भी श्लोक हो तो पुनरुक्त है। और जो महानीच शास्त्रविरुद्ध वा जिसके लिये शास्त्र में विधान नहीं, ऐसा पुंसिमैथुनादि दुष्ट कर्म है उसकी स्नान कर लेने मात्र से शुद्धि नहीं हो सकती। और इस १७४वें श्लोक से पूर्व १७३वें श्लोक में अयोनि पद करके पुंसिमैथुनादि का सम्भव प्रायश्चित्त कहा ही है। इससे वह श्लोक प्रक्षिप्त ही है।

आगे १८२,१८३ दो श्लोक प्रक्षिप्त हैं। यहां शुद्धि करने वा मानने का प्रकरण नहीं है किन्तु आगे और पीछे केवल प्रायश्चित्त का प्रकरण है। शुद्धिप्रकरण पञ्चमाध्याय में है वहां यथासम्भव सब कहा ही है। पतितों की जीवितदशा में ही मरे के तुल्य क्रिया करना ठीक नहीं, क्योंकि महापातकी आदि पतित लोग यदि अपनी इच्छा से प्रायश्चित्त का आचरण नहीं करते तो वे राजदण्ड भोगने योग्य हैं अर्थात् राजा उनको बलात्कार पूर्वक दण्ड देवे, उस राजदण्ड से जब वे चिह्नयुक्त हो जावेंगे तो उनको मरा समझना नहीं हो सकता सो कहा भी है कि- ‘राजा के शासन से दण्ड के चिह्न को प्राप्त होकर सर्वत्र घूमा करें।’१ इस प्रकरणविरुद्ध और असम्भव होने आदि कारण से ये उक्त दोनों श्लोक प्रक्षिप्त हैं। आगे २०६,२०७ ये दो पद्य प्रक्षिप्त हैं, इसी आशय के दो श्लोक चतुर्थाध्याय में हैं। उनको भी हम ने प्रक्षिप्त ही ठहराया है। और यह अन्याय है कि जो किसी के गाली देने पर मार डालने का दण्ड दिलाना वैसे यहां भी अतिसूक्ष्म अपराध का अधिक दण्ड कहा है। इसी अध्याय में २०८वें श्लोक में उसी अपराध का सम्भव प्रायश्चित्त कहा है। इसलिये उक्त दोनों पद्य प्रक्षिप्त हैं। आगे २६१वां पद्य प्रक्षिप्त है। यह विषय जो इसमें कहा है, असम्भव है। यदि सब हत्या का ऋग्वेद पढ़नामात्र प्रायश्चित्त हो जावे तो ब्रह्महत्यादि महापातकों के अधिक कर बड़े-बड़े पृथक् प्रायश्चित्त कहना व्यर्थ हो जावे। और यह कहना असम्भव वा असग्त भी है कि वेद पढ़ लेने से सब पाप छूट जावें। इसलिये उक्त पद्य प्रक्षिप्त ही है। इस प्रकार इस ग्यारहवें अध्याय के दो सौ पैंसठ श्लोकों से १२ श्लोक प्रक्षिप्त हैं और शेष दो सौ त्रेपन श्लोक शुद्ध जानने चाहियें।

प्रायश्चित्त का विचार : पण्डित भीमसेन शर्मा

अब संक्षेप से प्रायश्चित्तविषय का विवेचन किया जाता है। प्रायश्चित्त यह शब्द कर्मविशेष का नाम है कि दुष्ट कर्मों के सेवन से उत्पन्न हुई व्याकुलता वा विषमता की निवृत्ति के लिये वेदवेत्ता विद्वानों की आज्ञा से मनुष्य जिसका सेवन करते हैं वह प्रायश्चित्त कर्म कहाता है। प्राय शब्द से परे चित्त या चित्ति शब्द को वार्त्तिक१ से सुट् का आगम होकर यह प्रायश्चित्त शब्द बनता है। सो इसका ऐसा ही विद्वानों ने लाक्षणिक अर्थ भी माना है कि- ‘प्रायः नाम तप और चित्त नाम निश्चय करके युक्त कर्म का नाम प्रायश्चित्त है। चित्त को सम करने के लिये अर्थात् चित्त की विषमता मेटने के लिये जो दिया वा बताया जाता और जिसका सेवन विशेष आन्दोलन के साथ विद्वानों की सभा कराती है वह कर्म प्रायश्चित्त कहाता है।२ इन श्लोकों में सभा के द्वारा कराने की आज्ञा दिखाने से ज्ञात होता है कि राज्यसभा के तुल्य वेदवेत्ता विद्वानों की सभा ने देश-कालादि का विचार करके करने को कहा कर्म प्रायश्चित्त कहाता है। अर्थात् राजदण्ड के तुल्य प्रायश्चित्त भी एक प्रकार का दण्डभोग है। इसी कारण यदि न्यायपूर्वक अपराधानुकूल ही दुष्ट कर्म का फल राजदण्ड भोग लिया हो तो पीछे इस जन्म वा जन्मान्तर में दुष्ट कर्म का बुरा फल नहीं मिलेगा। किन्तु वह अपराधी उस पाप से फिर छूट जाता है। वैसे ही यथार्थ रीति से प्रायश्चित्त कर लेने पर वह अपराधी उस पाप से छूट जाता है जो चोर, डाकू आदि पापकर्म करके उसका दुःख फल भोगना नहीं चाहते उनको राजा बलपूर्वक दण्डादि द्वारा वश में रखकर निर्बल धर्मात्माओं की रक्षा करे। और जो धर्मात्मा हैं वे किसी प्रकार अज्ञान वा दुःसग् में पड़ के भ्रम से पाप कर लेवें अर्थात् उनसे बुरा काम बन पड़े तो पीछे उसकी बुराई को सोचने से यदि मन ग्लानि को प्राप्त हो तो विद्वानों की सम्मति से उनको स्वयमेव दण्डभोगरूप प्रायश्चित्त का सेवन कर लेना चाहिये वा यों कहिये कि धर्मात्मा लोग बुरा काम बन जाने से स्वयमेव उसका दुःख फल भोगकर शुद्ध होना पसन्द करते हैं। यही प्रायश्चित्त और राजदण्ड में भेद है।

प्रायश्चित्त किस दशा में वा किसको करना चाहिये सो दिखाते हैं कि-  ‘वेदादिशास्त्रों में ब्राह्मणादि वर्णों के जो सन्ध्यादि कर्म विहित हैं उनको न करने वाला तथा निन्दित वा जिनके लिये वेदादि में निषेध किया है कि ऐसा काम न करना वैसे पापकर्म का आचरण करने वाला और इन्द्रियों के भोगविषय में लम्पट वा आसक्त, ये तीन प्रकार के मनुष्य ही विशेषकर प्रायश्चित्त करने योग्य होते हैं।’१ इस प्रायश्चित्त के दो भेद हैं- ‘एक तो बिना इच्छा किये स्वभाव से वा अज्ञान से दुष्ट कर्म का सेवन किया जाता अथवा कर्त्तव्य का त्याग किया जाता है, वहां द्वितीय ज्ञानपूर्वक किये की अपेक्षा प्रायश्चित्त थोड़ा किया जाता है। और जो इच्छापूर्वक वा जानकर बुरा काम किया जाता है उसमें पूर्व की अपेक्षा शास्त्रकारों ने अधिक प्रायश्चित्त कहा है।’२ तात्पर्य यह है कि ज्ञानपूर्वक किया कर्म जितना संस्कार को बिगाड़ने वाला होता है वैसा अज्ञान से किया कर्म नहीं हो सकता। क्योंकि अज्ञान से किये काम का हृदयादि के साथ वैसा पूरा प्रवेश नहीं होता जैसा कि ज्ञान से किये का होता है। इसी कारण इन दोनों प्रकार के कर्मों में भिन्न-भिन्न प्रायश्चित्त कहा है, सो ठीक ही मन्तव्य है।

इस मानव धर्मशास्त्र के इसी ग्यारहवें अध्याय में एक-एक ब्रह्महत्यादि महापातक वा उपपातक के अनेक प्रकार के प्रायश्चित्त दिखाये हैं। उसमें      अधिकारियों का भेद, देश का भेद और काल का भेद भी कारण हैं। सब अवस्थाओं, सब काल वा सब देश में सब लोग एक प्रकार का प्रायश्चित्त नहीं कर सकते। जवान, बलवान् और स्वस्थ मनुष्य जैसा दुःख सह सकता है वैसा वृद्ध, निर्बल और रोगी वा बालक नहीं सह सकता। इस कारण इनके प्रायश्चित्त वा दण्ड में भेद होना चाहिये। लक्षाधीश मनुष्य पर एक सहस्र मुद्रा का दण्ड जितना उसको दुःखदायी होगा उतना ही सहस्रपति को दस मुद्रा के दण्ड से क्लेश हो जायेगा और सर्वथा निर्धन दरिद्री मनुष्य को एक मुद्रा का दण्ड भी लक्षाधीश की अपेक्षा विशेष दुःखदायी होगा। इसी प्रकार लोक में अनेक प्रकार के अधिकारी हैं, उनकी योग्यता देखकर जैसे राजदण्डादि की न्यूनाधिक व्यवस्था करनी चाहिये वैसे ही प्रायश्चित्त में भी जानो, परन्तु यह काम सामयिक विद्वानों का है। सब देशों और सब कालों में भी सब काम नहीं हो सकते, इस कारण भी प्रायश्चित्तों में भेद किया है और करना ही चाहिये। जहां ब्रह्महत्या वा सुरापानादि महापातकों में आत्मघातरूप वधदण्ड ही प्रायश्चित्त लिखा है, वह उत्सर्ग है। कहीं किसी ब्रह्महत्या करने वाले के शरीर का बना रहना कई कारणों से अत्यन्त उपयोगी वा उचित है तो वहां वधदण्डरूप प्रायश्चित्त न कर, करा के अन्य प्रकार का प्रायश्चित्त करा लेना चाहिये। इत्यादि प्रकार एक-एक अपराध पर अनेक प्रायश्चित्त कहना सार्थक ही है।

मनुष्य जैसे कर्म का सेवन करता है वैसी ही उसके हृदय में वासना संचित होती है, उन्हीं वासनाओं का नाम संचित पाप वा पुण्य है अर्थात् पाप-पुण्यों का आधार मन ही है। जैसे ओषधि के सेवन से रोगों की निवृत्ति हो सकती है वैसे ही प्रायश्चित्त से निकृष्टसंस्काररूप पापों की निवृत्ति हो जाती है। अथवा जैसे दीपक से अन्धकार की, राग से द्वेष की और विद्या से अज्ञान वा मोह की निवृत्ति होती है वैसे प्रायश्चित्त से पापों की निवृत्ति जानो। सो योगभाष्य में कहा भी है कि- ‘जिस जन्मान्तर में फल देने वाले संचित कर्म का फल नियत नहीं कि अमुक देश, काल वा अवस्था में ऐसा फल अमुक पुरुष को अवश्य होगा। वैसे अनियतविपाककर्म की तीन दशाएं होती हैं। एक तो फलीभूत होने से उस संचितकर्म का नाश हो जाना, द्वितीय अपने साथी प्रधान पाप वा पुण्य के साथ मिल जाना और तृतीय नियत जिसका फल है ऐसे संचितकर्म के साथ दबा रहना, इनके उदाहरण ये हैं कि जैसे विद्याध्ययन कर लेने से जड़ता वा मूर्खता छूट जाती है विद्वत्ता और मूर्खता दोनों एक काल में एक शरीर में नहीं ठहर सकती वैसे जब प्रायश्चित्तादिरूप शुभ, पुण्य सूर्य का उदय हृदय में होता है तब अन्धकाररूप पाप का तत्काल नाश हो जाता है। द्वितीय जैसे जौ आदि अन्न के साथ घास के दाने पड़े रहते हैं परन्तु जौ बोया, जौ काटा, जौ धरा है इत्यादि व्यवहार जौ का ही होता है उसमें घास के दाने मिल कर पड़े रहने पर भी कुछ हानि नहीं करते इसी प्रकार थोड़ा पाप वा पुण्य अपने विरोधी पुण्य वा पाप के साथ मिला पड़ा रहता है कुछ हानि नहीं कर सकता केवल प्रधान का ही भोग वा व्यवहार होता है। तथा तृतीय प्रधान अपने विरोधी कर्म से तब तक दबा पड़ा रहे जब तक विरोधी की निर्बलता और उसकी प्रबलता देश-काल-वस्तु भेद से न हो।’१ इस प्रकार अनियतफल वाले दुष्ट कर्म के दण्डभोगरूप औषध से निवारण के लिए ही विशेषकर प्रायश्चित्तों की प्रवृत्ति है। और जो जन्मान्तर में नियत फल देने वाला संचितकर्म है उसकी असाध्य रोग के तुल्य प्रायश्चित्त से भी निवृत्ति नहीं हो सकती। पर वहां भी प्रायश्चित्त करना इस कारण निष्फल नहीं कि जब शुभकर्मरूप प्रायश्चित्त से उसके मन का सन्तोष वा दृढ़ता हो जाने से पाप का फल भोगने के समय में दुःख कम व्यापेगा। जैसे वही दुःख निर्बल और बलवान् को न्यूनाधिक व्यापता है। अथवा जैसे विद्वान्, अविद्वान् दो पुरुषों पर एक ही दुःख आकर पड़े तो अविद्वान् की अपेक्षा विद्वान् बहुत कम क्लेशित होता है, वैसे ही जिसने प्रायश्चित्त कर लिया है उसका मन प्रबल वा दृढ़ हो जाने से बड़े-बड़े दुःखों को छोटा-छोटा मानकर सहज में भोगकर पार हो जाता है।

तथा पाप न छूटने में प्रायश्चित्त करना इसलिये भी सार्थक है कि पुण्य कर्म के साथी प्रायश्चित्त के संचित हो जाने से शुभ फल होगा ऐसा विचारकर यथावसर सबको प्रायश्चित्त करना चाहिये, यही धर्मशास्त्रकारों का आशय है। सो यह प्रायश्चित्त दण्डभोगरूप ही है। यदि कोई पुरुष किन्हीं ऐसे नवीन दुष्ट कर्मों को करे जिनका प्रायश्चित्त धर्मशास्त्र में विशेष कुछ नहीं कहा तो वहां सामयिक विद्वानों को चाहिये कि देश, काल और वस्तु के अनुकूल नवीन प्रायश्चित्त की कल्पना कर लेवें। इसीलिये इस मानव धर्मशास्त्र के ग्यारहवें अध्याय में कहा भी है कि- ‘जिनके प्रायश्चित्त नहीं कहे गये ऐसे पापों से मुक्त होने के लिये शक्ति और पाप को देखकर प्रायश्चित्त की व्यवस्था बांध लेनी चाहिये।’१ इसीलिये बारहवें अध्याय में कहा है कि- ‘दस वा तीन वेदवेत्ता सदाचारी धर्मात्मा विद्वानों की सभा जिसको निश्चित करे उसको प्रायश्चित्तादिरूप से सभी लोग कर्त्तव्य निश्चित धर्म मानें कोई भी उसका उल्लंघन न करे।’२ इत्यादि। और धर्मशास्त्रकारों ने जिस अपराध में जो प्रायश्चित्त कहा हो वह भी विद्वानों की सभा की सम्मति से ही सबको सेवना चाहिये। इस प्रकरण में यह कोई न समझे कि प्रायश्चित्त से पाप छूटने का सिद्धान्त खड़ा करने से बिना भोग किये पाप छूट जायेंगे तो ‘मनुष्य के द्वारा किये गये शुभ अथवा अशुभ कर्म का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है।’३ यह सिद्धान्त कट जावे क्योंकि प्रायश्चित्त भी एक प्रकार का दण्डभोग है, यह लिख चुके हैं। इसलिये कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ता है, यही सिद्धान्त ठीक है। जल और स्थलादिक में स्नान वा दर्शन करना मानव धर्मशास्त्र के अनुकूल प्रायश्चित्त नहीं है किन्तु वह शास्त्र के सिद्धान्त से विरुद्ध नवीन कल्पना है। यहां संक्षेप से प्रायश्चित्त के विषय में कहा गया है, इसकी विशेष व्याख्या भाष्य में देखनी चाहिये।

दशम अध्याय के प्रक्षिप्त श्लोकों का विचार : पण्डित भीमसेन शर्मा

अब दश्माध्याय के प्रक्षिप्त श्लोकों की समीक्षा करते हैं। प्रथम छियासीवें से चौरानवें तक नौ श्लोक प्रक्षिप्त जान पड़ते हैं। मीठे आदि रस से युक्त गुडादि द्रव्यों, गौ-अश्व आदि पशुओं, रंगे वस्त्रों और टसरी-रेशमी और ऊनी वस्त्रों के बेचने में क्या दोष है ? इसका कुछ कारण नहीं दीखता। श्वेत वस्त्र और वन के पशु बेचने में दोष क्यों नहीं है ? यह उसी श्लोक बनाने वाले से पूछना चाहिये। जब वन के पशु बेचने का भी निषेध किया आरण्यांश्च पशून् सर्वान् तो जो मनुष्य सम्बन्धी पशु हैं पशवो ये च मानुषाः जैसे गौ-घोड़ादि। यहां मानुष विशेषण व्यर्थ पड़ता है। यह परस्पर का विरोध भी इन श्लोकों के प्रक्षिप्त होने को प्रकट करता है। किसी वस्तु का उपार्जन अधर्म से कर सकते हैं उसका बेचना अवश्य अधर्म का उत्पादक होगा, उस वस्तु के बेचने से अपनी जाति से पतित होना भी ठीक सग्त हो जाता है जैसे मांस का बेचना जाति से पतित होने का हेतु है। परन्तु लाख और लवण के बेचने में ऐसा बड़ा दोष कौन है ? जिस कारण शीघ्र पतित हो जाता हो यह नहीं दीखता। यदि किसी वस्तु के बेचने में शरीर की मलिनता और अपने वेदोक्त सन्ध्यादि कर्मों का विशेष त्याग वा हानि होती हो तो उस तेल आदि वस्तु को यावच्छक्य नहीं बेचना चाहिये। परन्तु तिल बेचने में कोई दोष नहीं दीखता। व्याकरण महाभाष्य में भी कहा है कि- ‘तेल और मांस न बेचना चाहिये, सो पृथक् निकाला हुआ तेल और मांस ही नहीं बेचा जाता परन्तु जिसमें तेल और मांस व्यापक वा मिला है ऐसे तेल के उपादान सरसों वा गौ आदि पशुओं के बेचने में वह दोष नहीं माना जाता अर्थात् सरसों वा गौ आदि के बेचने से तेल और मांस का बेचना नहीं लिया जाता।’३ यद्यपि यहां तिलों के बेचने की आज्ञा स्पष्टतः नहीं है तथापि तेल के बेचने का निषेध दिखाने और जिससे तेल निकलता है उसका विधान जताने से तिल के बेचने का विधान आ जाता है। जैसा निष्कृष्ट तिल का बेचना यहां कहा है वैसा महाभाष्यकार को भी इष्ट होता तो तिल के बेचने का भी निषेध करते। यदि कोई कहे कि वह व्याकरण है उसमें    धर्मशास्त्र की व्याख्या क्यों होगी, सो नहीं। हमारे यहां सब ऋषियों ने जिस-जिस विषय के पुस्तक बनाये हैं उन सबमें प्रसग्वशात् धर्म-अधर्म का भेद वा कर्त्तव्याकर्त्तव्य का विचार अवश्य दिखलाया है। और गौओं के बेचने की तो स्पष्ट आज्ञा है सो (पशवो ये च०) ‘ग्राम के पशु न बेचने चाहियें’१ इत्यादि कथन के साथ विरुद्ध पड़ता है। इससे अनुमान होता है कि महाभाष्य बनने के समय वे उक्त श्लोक मानवधर्मशास्त्र में नहीं थे किन्तु पीछे किसी ने मिलाये हैं। इस प्रकार ये उक्त नौ श्लोक विरुद्ध और असग्त होने से प्रक्षिप्त जान पड़ते हैं, ऐसा बुद्धिमानों को विचारना चाहिये।

तिस के आगे एक सौ एकवें श्लोक से लेकर आठ श्लोक प्रक्षिप्त प्रतीत होते हैं। इन श्लोकों में निन्दित प्रतिग्रह अर्थात् दान लेने की प्रशंसा दिखाई है, सो पूर्वापर से विरुद्ध है। चतुर्थाध्याय में लिखा है कि- ‘उचित दान लेने से भी ब्राह्मण का ब्रह्मतेज घट जाता है।’२ तथा इसी दशवें अध्याय में लिखा है कि- ‘दान लेना नीच वा निकृष्ट काम है और दान लेने वाले ब्राह्मण का परलोक बिगड़ जाता है।’३ इत्यादि अनेक स्थलों में अनेक बार कहने से शुद्ध प्रतिग्रह को भी दान न लेने की अपेक्षा दूषित ठहराया है। फिर यहां लिखा है कि- ‘पवित्र को दोष लगता है यह धर्मानुकूल नहीं बनता।’४ यह कहना कैसे ठीक होवे ? यदि निकृष्टदान लेने आदि दुष्ट कर्मों से ब्राह्मण का तेज घट जाना सत्य है तो पवित्र दूषित होता है यह मानना चाहिये। क्योंकि दुष्ट कर्मों से ब्राह्मणपन का बिगड़ना ही पवित्र का दूषित होना है। इस प्रकार जब पवित्र दूषित होता है तो यह कहना कि- ‘पवित्र को दोष नहीं लगता’४ व्यर्थ वा निरर्थक हो गया। यदि पवित्र को दोष नहीं लगता तो किसको लगता है ? क्योंकि अपवित्र तो स्वयमेव दूषित ही है, फिर कौन दूषित होता है? और यह युक्ति से भी विरुद्ध है जो कि पवित्र को दोष न लगे। वास्तव में पवित्र ही दूषित होता और जो अपवित्र है वही पवित्र बन जाता है। यदि पवित्र दूषित न हो तो ब्राह्मणादि ऊंच वर्णों का दुष्ट कर्मादि के सेवन से अपने ऊंच अधिकार वा जाति से पतित होना भी न बन सके और ऐसा होने पर शुभ-अशुभ विशेष कर्मों के सेवन से ब्राह्मणादि वर्णों की उत्तमता-निकृष्टता जताने में तत्पर- ‘शूद्र ब्राह्मण हो जाता और ब्राह्मण शूद्रत्व को प्राप्त हो जाता है।’५ इत्यादि धर्मशास्त्र के वाक्य व्यर्थ हो जावेंगे। इस कारण वे उक्त श्लोक प्रक्षिप्त हैं। इन श्लोकों में पौराणिक इतिहास भी असग्त हैं। क्योंकि यद्यपि आपत्काल में जिस किसी प्रकार प्राण की रक्षा मनुष्य को करनी चाहिये यह कहना किसी प्रकार ठीक है किन्तु सर्वथा ठीक नहीं है। कोई कर्म ऐसा हो सकता है कि जिसको करने की अपेक्षा प्राण का त्याग देना ही शास्त्रकारों ने उत्तम कहा और युक्ति से भी ठीक जान पड़ता है। आपत्काल में भी मनुष्य का मांसभक्षण करने की अपेक्षा प्राणत्याग करके मर जाना ही अच्छा है। तथा महाभारतादि में लिखा है कि- ‘अपना जीवन बचाने के लिये भी      धर्म को न त्यागे अर्थात् शरीर भले ही नष्ट हो जावे, मर जाना स्वीकार कर ले, पर धर्म का त्याग कदापि न करे।’१ इत्यादि प्रकार धर्मशास्त्रों में प्रायः प्रमाण मिलते हैं। वेदधर्मानुयायी आर्य लोगों का सनातन काल से यही सिद्धान्त दृढ़ चला आता है कि शरीर तो वैसे भी घटादि के समान अनित्य हैं पर धर्म नित्य है जो मरने पश्चात् जीवात्मा के साथ जाकर जन्मान्तर में भी सुख पहुंचाता है फिर अनित्य वस्तु की रक्षा के लिये नित्यधर्म का त्याग कदापि नहीं करना चाहिये। और जो ऐसा करता है उससे अधिक मूर्ख वा नास्तिक कौन होगा ? वेदविरोधी मनुष्यों का प्रायः यही सिद्धान्त रहता है कि किसी प्रकार का अधर्म क्यों न हो पर प्राण की रक्षा सर्वोपरि है। इसीलिये उनका नाम असुर है। इसलिये आपत्काल में भी मनुष्य को विशेष अधर्म का उपार्जन न करना चाहिये किन्तु उस समय थोड़े धर्म के सेवन से निर्वाह कर्त्तव्य है। इस प्रकार ये आठ श्लोक भी प्रक्षिप्त हैं। इस दसवें अध्याय में सब एक सौ इकत्तीस श्लोक हैं, जिनमें सत्रह प्रक्षिप्त और एक सौ चौदह (११४) श्लोक शुद्ध जानने चाहियें।

आपद्धर्म का विचार : पण्डित भीमसेन शर्मा

अब आपद्धर्मविषय का विचार किया जाता है। धर्म दो प्रकार का है- एक सनातन धर्म और दूसरा आपद्धर्म कहाता है। स्वस्थदशा में सेवने योग्य वेदादि शास्त्रों में कर्त्तव्य मानकर मनुष्यों के लिये कहा गया सनातनधर्म है। जब सनातन धर्म के सेवने से मनुष्य का निर्वाह नहीं हो सकता वा सनातन धर्म के सेवन में असमर्थ हो जाता है उस समय में जिस प्रकार निर्वाह करने के लिये धर्मशास्त्रकारों ने आज्ञा दी है वह आपद्धर्म है। जिस-जिस ब्राह्मणादि वर्ण के जो-जो अध्यापनादि धर्म सम्बन्धी कर्म धर्मशास्त्र में कहे हैं, उनका सेवन करना यदि किसी प्रकार देश, काल वा वस्तु के भेद से असम्भव हो तो भी सर्वथा अज्ञानान्धकाररूप अधर्म के गड्ढे में न गिरना चाहिये किन्तु आपद्धर्मरूप स्वल्पधर्म के सेवन से भी निर्वाह करना अच्छा है। जैसे उत्सर्ग करने पर अपवाद स्वयमेव प्रवृत्त होता है अर्थात् सामान्यकर किसी बात के कहने पर विशेषता स्वयमेव खड़ी हो जाती है जैसे    धर्मशास्त्र वा वैद्यकशास्त्र में सब काल में सबके लिये सामान्य कर दिन में सोने का निषेध है। परन्तु अपवादरूप से विधान करने पड़ा कि रात को जागने की दशा में ग्रीष्म ऋतु और अजीर्णतादि रोगों में नियत काल तक मनुष्य को दिन में सोना चाहिये। ऐसे अपवादों को कोई रोक नहीं सकता अर्थात् जहां सामान्य की प्रवृत्ति होना दुस्तर हो जाती है वा हो सकने पर उससे विशेष हानि होना सम्भव होता है तब अपवाद दशा खड़ी की जाती है वा करने पड़ती है। वैसे ही आपत्काल स्वयमेव आया करते हैं। उस समय जो कर्त्तव्य है वही आपद्धर्म है। सनातनधर्म में बाधा डालने वाला आपद्धर्म हो ऐसी शटा नहीं करनी चाहिये। जैसे अपने वर्ण की एक स्त्री के साथ द्विजों का विवाह होना सनातनधर्म है और विधवाओं का आपत्काल में नियोग होना आपद्धर्म है। उस नियोग की गर्भहत्या वा लोक में व्यभिचार द्वारा बुराई फैलने आदि की अपेक्षा उत्तमता और धर्म मानना हो सकता है कि जो एक स्त्री के साथ नियोग होकर सन्तानोत्पत्ति होने से नियुक्त दोनों स्त्री-पुरुषों की एक सन्तान में प्रीति बढ़ती है। विवाह की अपेक्षा वा विधवा स्त्री को  ब्रह्मचर्य (पतिव्रत) धर्म धारण करके जन्म व्यतीत कर देने की अपेक्षा नियोग की उत्तमता नहीं है। इसी कारण जो स्त्री वा पुरुष सनातनधर्म के सेवन से निर्वाह कर सकता है उसके लिये नियोग नहीं है। यदि नियोग कर लूंगी ऐसा मानकर कोई स्त्री अपने पति को मार डाले तो भी नियोग करना दूषित नहीं होता क्योंकि जिस बुराई से बचने और इष्ट की प्राप्ति के लिये जो काम किया जाता है उससे वैसा प्रयोजन सिद्ध न करके कोई विरुद्ध काम करे तो वह करने वाले को दोष है। जैसे बाल काटने के लिये छुरा बनाया गया है उससे कोई हाथ आदि काट ले तो यह छुरा के बनने में वा बनाने वाले का दोष नहीं किन्तु यह उसी काटने वाले कर्त्ता का दोष है। इसी प्रकार नियोग जिस प्रयोजन के लिये है उससे विरुद्ध करे तो यह नियोग का दोष नहीं किन्तु उस स्त्री का दोष है। क्योंकि यदि नियोगरूप अवलम्ब उसको ज्ञात न हो तो वह अन्य पुरुष के साथ भाग जाने आदि बुद्धि से भी पति को मार सकती वा उससे विरोध कर सकती है। और कदाचित् नियोग करने में कोई दोष ही हो तो भी नियोग की अकर्त्तव्यता नहीं सिद्ध हो सकती। जैसे ‘हिरण चर जाने के भय से जौ-गेहूं आदि का बोना नहीं रोक दिया जाता’ वैसे यहां भी दोष के भय से नियोग को नहीं रोक सकते किन्तु जैसे हिरणों से खेत बचाने के अनेक उपाय किये जाते हैं वैसे नियोग आदि आपत्काल के धर्म में भी जो-जो दोष जान पड़े उसको हटाने को उपाय करना चाहिये और विपत्ति के समय में आपद्धर्म का तो सेवन अवश्य करना चाहिये। नियोग यहां केवल आपद्धर्म के उदाहरण में दृष्टान्तरूप से लिखा है। ब्राह्मणादि वर्ण जब अपने-अपने कर्मों से जीविका करने में असमर्थ होते हैं तब उनको अपने-अपने से नीच वर्ण के कर्मों से जीविका करनी चाहिये यह भी आपद्धर्म है सो लिखा भी है कि- ‘ब्राह्मण आपत्काल में क्षत्रिय के धर्म से जीविका करे क्योंकि यही उसका समीपी है। यदि अपने और क्षत्रिय के दोनों धर्म से जीविका न कर सके तो खेती और गोरक्षा आदि वैश्य की जीविका से निर्वाह करे।’१ और- ‘खेती को ब्राह्मण यत्न से छोड़ दे’२ यह कहना किसी अन्य का मत है किन्तु मनु का नहीं। खेती करना ऐसा बुरा नहीं कि जैसा लोग मानते हैं। पाराशर स्मृति में खेती का विधान लिखा है।३ तथा अन्य क्षत्रियादि को भी वैश्यादि की वृत्ति से आपत्काल में निर्वाह करना चाहिये। आगे आपत्काल के विषय पर महाभारत में शान्तिपर्वान्तर्गत आपद्धर्मानुशासन नामक एक अवान्तरपर्व है, वहां आपत्काल में सेवने योग्य धर्मों का साधन और दृष्टान्तों के सहित प्रायः विस्तार से व्याख्यान किया है। उसमें सारांश यह है कि- आपत्काल में निर्वाह के लिये मनुष्य को नीतिज्ञ और लोक के व्यवहार में चतुर होना चाहिये तब वह अपना सुख से निर्वाह कर सकता है। उसी आपद्धर्म के प्रकरण में यह भी लिखा है कि- ‘जिसके साथ जो मनुष्य जैसा बर्त्ताव करता है उसके साथ वैसा ही बर्त्ताव करना धर्म है। अर्थात् छली, कपटी वा दुष्ट मनुष्य के साथ छल कपट और दुष्टता करना तथा श्रेष्ठ, सज्जन धर्मात्मा पुरुषों से धर्मानुकूल वर्त्तना यह दोनों प्रकार का धर्म है।’१ यद्यपि छल-कपटादि करना वास्तव में धर्म नहीं तथापि छल-कपटादिरूप कांटों से धर्माङ्कुर की रक्षा होती हो तो वे धर्म के सहकारी कारण होने से धर्म माने जावेंगे। यह भी आपत्काल में ही धर्म है सदा नहीं। ‘पराया धन हर लेना और अन्याय से किसी को दुःख देने की निष्ठा को सदा छोड़कर वेदोक्त पञ्चमहायज्ञादि नित्यकर्म और गर्भाधानादि नैमित्तिक कर्म में प्रीति रखते हुए मन, वाणी और शरीर सम्बन्धी दस दोषों को छोड़कर दस लक्षण वाले दयादि नामक धर्म का नित्य नियम से सेवन करते हुए ब्राह्मणादि वर्णों को न्यायपूर्वक ही किसी प्रकार की जीविका से आपत्काल में निर्वाह करना चाहिये।’२  ‘विद्या, शिल्पकारी, नौकरी, सेवा, गोरक्षा, किसी प्रकार की दुकान करना, खेती, सन्तोष, भिक्षा मांगना, ब्याज- सूद लेना ये दस काम जीविका अर्थात् अन्न-धनादि की प्राप्ति के हेतु हैं।’३ इन दस जीविका के हेतुओें में से सब धर्मानुकूल नहीं हैं किन्तु- ‘दाय नाम अपना भाग वा हिस्सा, दुकान आदि का लाभ तथा बेचना, लड़ाई में जीतना, सूद लेना, कृषि, गोरक्षा और शिल्पकारी ये तीनों कर्मयोग में लिये जायेंगे, अच्छा दान लेना ये ही सात प्रकार की प्राप्ति धर्मानुकूल हैं।’४ क्रय के अन्तर्गत होने से भृति भी धर्मानुकूल है। शिल्पकारी, गोरक्षा और कृषि कर्मयोग के अन्तर्गत हैं अतः वे भी धर्मानुकूल हैं। सेवा, सन्तोष कर बैठ रहना और भिक्षा मांगना ये तीनों धर्मानुकूल नहीं किन्तु धर्म से विरुद्ध हैं। यद्यपि सेवा और भिक्षा मांगने की अपेक्षा धैर्य रखकर बैठ रहना अच्छा है तथापि निकम्मापन से लेकर किसी के वस्तु को भोगना अच्छा नहीं। इसी कारण आपत्काल में भी ब्राह्मणादि को इन तीनों का सेवन नहीं करना चाहिये। शिल्पकारी और खेती आदि कर्मों को कोई लोग ब्राह्मणादि के करने योग्य नहीं कहते सो ठीक नहीं क्योंकि पूर्वोक्त प्रकार से मनु जी ने स्वयमेव उनका धर्मानुकूल होना स्वीकार किया है। अर्थात् इन कर्मों का करना अधर्म नहीं। यदि कोई लोग ब्राह्मणादि के विद्याभ्यासादि बड़े-बड़े कर्मों में हानि देखकर शिल्प वा खेती आदि के न करने का प्रतिपादन करते हैं तो ठीक है जो बड़ा काम कर सकता है जिससे अपना वा संसार का बड़ा उपकार होता है तो उसको छोटा काम न करना चाहिये। परन्तु बड़े काम से निर्वाह करना किसी कारण नहीं हो सकता तो छोटे से निर्वाह करना चाहिये, इससे शिल्पकारी वा खेती आदि का अधर्म होना सिद्ध नहीं होता। स्वस्थ दशा में जब ब्राह्मणादि लोग विद्याभ्यास और अध्यापनादि अपने-अपने कर्मों से निर्वाह कर सकते हैं तब उनको शिल्प वा खेती आदि से जीविका नहीं करनी चाहिये, यह सर्वसम्मत है और आपत्काल में खेती आदि करना भी धर्मानुकूल ही है, यह सिद्धान्तपक्ष जानो। भिक्षा मांगना, किसी की नौकरी करना, सन्तोष कर बैठ रहना, गाड़ी वा इक्का चलाना अनेक प्रकार के छल-प्रपञ्च रचना इत्यादि की अपेक्षा खेती और शिल्पादि से निर्वाह करना बहुत ही उत्तम है। कोई लोग खेती करने में जीवहिंसा मानते हैं, परन्तु खेती की अपेक्षा गाड़ी-इक्का चलाने आदि में हिंसा अधिक है। तथा नौकरी की अपेक्षा खेती में स्वतन्त्रता और प्रसन्नता भी अधिक है।