Category Archives: पाखण्ड खंडिनी

सच्ची रामयण का खंडन भाग-१७

सच्ची रामयण का खंडन भाग-१७*
*अर्थात् पेरियार द्वारा रामायण पर किये आक्षेपों का मुंहतोड़ जवाब*
*-कार्तिक अय्यर*
नमस्ते मित्रों! आगे पेरियार साहब के साक्षी आयंगर साहब के आक्षेपों का उत्तर गतांक से आगे-
*आक्षेप-२१-प्रश्न-७-* इन पापों ने दशरथ द्वारा भारत को गति देने के असंभव वचनों को निरस्त कर दिया।
*समीक्षा-* कृपया बताइए कि महाराज दशरथ ने कौन से पाप कर दिए ? क्या कह कई को इनाम के रूप में वरदान देना पाप है ? क्या कहती का परंपरा के विरुद्ध मूर्खतापूर्ण और स्वार्थपूर्ण वरदान मांगना  पाप नहीं था।सच कहो तो यह नहीं कहा जा सकता कि उनके लिए वचन निरस्त हो गए क्योंकि श्रीराम ने फिर भी अपने पिता को सच्चा साबित करने के लिए भारत का राज्य ग्रहण और वनवास स्वीकार कर लिया। राजा दशरथ के असंभव वचनों को श्री राम ने संभव करके दिखा दिया।
*आक्षेप-२२-प्रश्न-८-* वशिष्ठ ने परामर्श दिया था कि इक्ष्वाकु वंशी य परंपरा अनुसार परिवार के जेष्ठ पुत्र को राजगद्दी मिलनी चाहिए किंतु कैकई के प्रेम में पागल दशरथ ने
उस परामर्श को लात मारकर अलग कर दिया।
*समीक्षा-* यह सत्य है कि महाराज दशरथ कैकई से बहुत प्रेम करते थे और यह भी सत्य है कि इक्ष्वाकु वंश की परंपरा के अनुसार परिवार का ज्येष्ठ पुत्र ही राजा बनता है इसीलिए कैकई का वरदान मांगना अनुचित था। सच कहें तो महाराज दशरथ ने अपने वंश की परंपरा को लात मार कर अलग नहीं किया था वह तो अंत तक कैकई से कहते रहे कि यह वरदान देने में मैं असमर्थ हूं क्योंकि उन्होंने श्रीराम के राज्याभिषेक की घोषणा भरी सभा में की थी और उसके विरुद्ध कैकेई ने वरदान मांग ली है। जब श्रीराम महाराज दशरथ और कैकई से मिलने गए थे तब कह के ही नहीं वरदान की बात श्रीराम से कही थी और कहा था कि महाराज ने तुमको 14 वर्ष का वनवास दिया है;श्रीराम ने बहुत अच्छा कहकर आज्ञा शिरोधार्य कर ली।महाराज दशरथ अंत तक श्री राम के वनवास का विरोध करते रहे उन्होंने कैकेई को समझाने की कोशिश की उसको कई दुर्वचन भी कहे किंतु वह अपनी बात से नहीं डिग्गी और अंततः श्री राम ने अपने पिता को सत्य सिद्ध करने के लिए वनवास स्वीकार कर लिया। इस प्रकार से महाराज दशरथ को आप प्यार में अंधा है पागल नहीं कह सकते इक्ष्वाकु वंश की परंपरा यह भी थी भले ही प्राण चले जाएं किंतु दिया हुआ वचन खाली नहीं जाना चाहिए राज्य अभिषेक की घोषणा से बढ़ कर दिया हुआ वचन था इसलिए घोषणा से ऊपर वचन को माना गया।
*आक्षेप-२३-प्रश्न-९-* दशरथ को अपनी मूर्खता का प्रायश्चित तथा कुछ मूल्य चुकाना चाहिए था; इसके विपरीत उसने कैकई को श्राप दिया।
*समीक्षा-* हम चकित है कि कैकेई के पारितोषिक रूप में उसे दिए गए दो वरदानों को आप पागलपन और मूर्खता कैसे बता रहे हैं ।वरदान देना महाराज दशरथ का कर्तव्य था और वरदान मांगना कैकई का अधिकार था। कैकई ने रघु कुल की परंपरा के विरुद्ध प्रजा महाराज जनपत राजाओं की इच्छाओं के विरुद्ध वरदान मांगा ।उसको सत्य सिद्ध करने के लिए श्री राम वनवास को चले गए अपने पुत्र का वियोग सहन कर लिया क्या महाराज दशरथ ने कम मूल्य चुकाया? महाराज दशरथ ने घोषणा के विरुद्ध श्री राम को वनवास दे दिया कैकई को प्रसन्न करने के लिए भारत को सिंहासन दे दिया। क्या महाराज दशरथ ने अपने वचन पूरे करके भी कम मूल्य चुका है सच कहें तो कैकई को मूर्खतापूर्ण वरदान मांगने के लिए प्रायश्चित करना था परंतु उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया और आप ऐसे महिला की तरफदारी कर रहे हैं आपकी बुद्धि पर शोक करने के अलावा और क्या किया जा सकता है।
*आक्षेप-२४-प्रश्न-१०-* वह भूल गया कि मैं कौन और क्या हूं तथा मेरी स्थिति क्या है और कैकई के पैरों पर गिर पड़ा।पड़ा।
*समीक्षा-* महाराज दशरथ को अपनी गरिमा का पूरा ध्यान था ।कैकेई से वार्तालाप करते समय वह एक चक्रवर्ती राजा नहीं ,अपितु एक पति थे। पति-पत्नी एक-दूसरे के आधे शरीर माने जाते हैं ।यदि महाराज दशरथ ने कैकई के चरण छू भी लिए तो इस पर आपको क्या तकलीफ है? मुहावरे के रूप में कहा जाता है कि “मैं तेरे हाथ जोड़ता, हूं तेरे पैर पड़ता ह”ूं पर सच में कोई हाथ पांव नहीं पड़ता।यहां भी मुहावरे दार भाषा ही समझनी चाहिये और महाराज ने कैकई के चरण पकड़ भी रही है तो इसमें कोई दोष नहीं एक तरफ तो आप लोग महिलाओं के अधिकारों की वकालत करते हैं और जब महाराज दशरथ अपनी पत्नी के चरणों में झुक कर महिला उत्थान कर रहे है तो उनको नामर्द बताते हैं इस दोगलेपन के लिए क्या कहा जाए!
*आक्षेप-२५-प्रश्न-११-* सुमंत्र और वशिष्ठ दशरथ के वचनों से अवगत थे। कैकेई के प्रति के वचनों की ओर संकेत कर सकते थे ।दशरथ को सचेत कर डालते थे। राम को राजगद्दी ना देने का परामर्श देसकते थे।- पर उन्होंने ऐसा नहीं किया
*समीक्षा-* यह स्पष्ट उल्लेख नहीं है कि कैकेई के प्रति दिए गए वचन के बारे में महर्षि वशिष्ठ और सुमंत्र को पता था। यदि मान भी लें तो भी महाराज दशरथ को सचेत करके वह क्या कर सकते थे? उनको थोड़े मालूम था कि कैकेयी उनसे श्री राम का वनवास और भरत के लिये राज्य मांग लेगी। आपका प्रश्न ही मूर्खतापूर्ण है !कैकेयी कुछ और भी मांग सकती थी।
और वशिष्ठ और सुमंत्र श्रीराम को राजगद्दी ना देने का परामर्श भला किसलिए करेंगे ?ऊपर आप ही स्वीकार कर चुके हैं कि इक्ष्वाकु कुल की परंपरा के अनुसार ज्येष्ठ पुत्र को राज्य मिलता था और केकई के पिता को महाराज दशरथ ने उससे उत्पन्न पुत्र को राजगद्दी देने का कोई वचन नहीं दिया यह हम पहले आक्षेप के उत्तर में ही सिद्ध कर चुके हैं। तो इस प्रकार का परामर्श वे महाराज दशरथ को कैसे दे सकते थे? वैसे भी वचन तो दशरथ ने दिए थे,उन्हें पूर्ण करने का दायित्व उनका था यहां वशिष्ठ और सुमंत्र भला क्या कर सकते थे? इस विषय में हस्तक्षेप करने का उन्हें क्या अधिकार था? आप का तो प्रश्न ही अशुद्ध है ।लगता है भंग की तरंग में ही यह प्रश्न लिख मारा है।
*आक्षेप-२६-प्रश्न-१२-* वशिष्ठ ने जो कि ,भविष्यवक्ता थे राम राज्य- तिलकोत्सव के शुभ-अवसर  को शीघ्रता से निश्चय कर दिया-यद्यपि वह भलीभांतु जानता था ,कि यह योजना निष्फल हो जायेगी।
*समीक्षा-* आयंगर साहब कितने बेतुके आक्षेप लगा रहे हैं हम इस बात पर आश्चर्य चकित हैं!” वशिष्ठ जी भविष्यवक्ता थे और वे जानते थे कि राज्याभिषेक की तैयारी निष्फल हो जाएगी”- जरा बताइए कि वाल्मीकि रामायण में इसका उल्लेख कहां है ?बिना प्रमाण दिये सुनी-सुनाई बात लिख मारी।सच कहें तो वाल्मीकि रामायण में इस बात की गंध तक नहीं है। यह महाशय का अपने घर का गपोड़ा है।यह ते सत्य है कि ज्योतिष और पदार्थ विद्या  द्वारा सूर्य-ग्रहण,मौसम,ऋतुचक्र,दैवीय आपदाआदि का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है,परंतु किसी का भविष्य देखना सर्वथा असंभव और निराधार गप्प है।वाल्मीकि रामायण में इसका वर्णन न होने से आक्षेप निर्मूल सिद्ध हुआ।
*आक्षेप-२७-प्रश्न-१३-* कैकेई अपना न्याय संगत स्वत्व  एवं अधिकार मांगती रही किंतु सिद्धार्थ सुमंत्र और वशिष्ठ उसे विपरीत परामर्श देने उसके पास दौड़ गए। इस पर निष्फल होने पर उन्होंने उसे फटकारा।
*समीक्षा-* यह सत्य है कि महाराज दशरथ से वरदान मांगना कैकेई का अधिकार था, किंतु उसका प्रजा की रुचि के और रघु कुल की परंपरा के विरुद्ध वरदान मांगना अनुचित था। सिद्धार्थ सुमंत्र और महर्षि वशिष्ठ ने कैकेई को यही बात समझाने का प्रयास किया कि रघु कुल की परंपरा के विरुद्ध श्री राम को वनवास और भारत को राज्य देना गलत है ।परंतु मूढ़मति कैकेयी फिर भी ना मानीऔर इस कारण केवल उन तीनों ने ही नहीं ,अपितु सारी प्रजा ने कैकई को धिक्कारा हम इन तीनों को दोषी मान सकते हैं पर क्या आप अयोध्या की जनता भी दोषी है?जो स्त्री अपने अधिकृत वचनों का अनैतिक और अनुचित प्रयोग करेगी,उसका इसी प्रकार तिरस्कार किया जायेगा।ऐसी किसी स्त्री को कोई फूलमाला न पहनावेगा।
क्रमशः…….
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मित्रों! अगली पोस्ट में अंतिम ७ आक्षेपों का उत्तर देकर *दशरथ महाराज* विषय का समापन करेंगे और उसके बाद श्रीराम पर लगे आक्षेपों का खंडन करेंगे।
आप लोगों का हमारी लेख श्रृंखला को पसंद एवं शेयर करने के लिये हमारी ओर से बहुत-बहुत आभार।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र की जय।
योगेश्वर कृष्ण चंद्र जी की जय।
।।ओ३म्।।
नोट : इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आर्यमंतव्य  टीम  या पंडित लेखराम वैदिक मिशन  उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है. |

पेरियार रचित सच्ची रामायण का खंडन भाग-१६

पेरियार रचित सच्ची रामायण का खंडन भाग-१६
*अर्थात् पेरियार द्वारा रामायण पर किये आक्षेपों का मुंहतोड़ जवाब*
*-कार्तिक अय्यर*
नमस्ते मित्रों! आगे पेरियार साहब ने किसी श्रीनिवास आयंगर की पुस्तक “अयोध्या कांड पर टिप्पणी” का प्रमाण देकर दशरथ पर १२ आक्षेप लगाये हैं।जैसे ऊतनाथ वैसे भूतनाथ! जैसे पेरियार साहब वैसे उनके साक्षी! अब आयंगर जी के आक्षेपों पर हमारी आलोचनायें पढें और आनंद लें:-
*आक्षेप-१५- प्रश्न-१*दशरथ ने बिना विचार किये कैकेयी को दो वरदान देने की भूल की।
*समीक्षा*- आप इसे महाराज दशरथ की भूल कैसे कह सकते हैं?देवासुर संग्राम में कैकेयी ने महाराज दशरथ की जान बचाई थी।इसलिये प्रसन्न होकर दशरथ जी ने उसे दो वरदान दिये।कैकेयी अपने काम के लिये पारितोषिक की अधिकारिणी थी। दशरथ ने उनको वरदान दिये कैकेयी ने कहा कि समय आने पर मांग लूंगी।हम मानते हैं कि कैकेयी को उसी समय वरदान मांगते थे और दशरथ को भी उसी समय पूर्ण करना था।पर दो वरदान देना गलत नहीं कहा जा सकता।हां,कैकेयी का मूर्खतापूर्ण वरदान मांगना अवश्य भूल थी।
*आक्षेप-१६-प्रश्न-२* कैकेयी के विवाह करने के पूर्व दशरथ ने उससे उत्पन्न पुत्र को राजगद्दी देने की भूल की।
*समीक्षा-*हम पहले बिंदु के उत्तर में सिद्ध कर चुके हैं कि महाराज दशरथ ने कैकेयी के पिता को ऐसा कोई वचन नहीं दिया था।अतः आक्षेप निर्मूल है।इक्ष्वाकुकुल की परंपरानुसार ज्येष्ठ पुत्र ही राजा बनता था।इसके विरुद्ध राजा दशरथ ऐसा अन्यथा वचन नहीं दे सकते।
*आक्षेप-१७-प्रश्न-३* साठ वर्ष का दीर्घ समय व्यतीत कर चुकने के पश्चात भी अपने पशुवत विचारों का दास बने रहने के दुष्परिणाम स्वरूप अपनी प्रथम स्त्री कौसल्या तथा द्वितीय स्त्री सुमित्रा के साथ वह व्यवहार न कर सका जिनकी वो अधिकारिणी थीं।
*समीक्षा-* यह आक्षेप निर्मूल है। महाराज दशरथ पशुवत विचारों के नहीं थे,अपितु महान मानवीय विचारों के स्वामी थी।उनके गुणों का वर्णन हम पीछे कर चुके हैं।क्या ६० वर्ष के बाद वानप्रस्थ की इच्छा करना और अपने ज्येष्ठ पुत्र को राजगद्दी देना भी पशुवत व्यवहार है?,यदि उनका व्यवहार पशुवत था तो उनको मरते दम तक राज्य भोग करना था पर उन्होंने ऐसा नहीं किया।महाराज दशरथ जितेंद्रिय, वेदज्ञ,अश्वमेधादि यज्ञ करने वाले और श्रेष्ठ प्रजापालक थे। उनके पशुवत कहने वाले स्वयं पशुओं के बड़े भाई हैं ।
आपको प्रमाण देना चाहिये कि दशरथ ने कौसल्या और सुमित्रा से यथायोग्य व्यवहार नहीं किया। वे सभी रानियों से यथायोग्य प्रेम करते थे।यह ठीक है कि कैकेयी से उनका विशेष स्नेह था पर यह सत्य नहीं कि उन्होंने कौसल्या और सुमित्रा से यथायोग्य व्यवहार नहीं किया। क्या कौसल्या के पुत्र श्रीराम को राजगद्दी देना कौसल्या का सम्मान नहीं है?क्या पुत्रेष्टि यज्ञ की खीर का अतिरिक्त भाग सुमित्रा को देना उनका उनके प्रति प्रेम सिद्ध नहीं करता?आपका आक्षेप निर्मूल है।
*आक्षेप-१८-प्रश्न-४-*कैकेयी को दिये मूर्खतापूर्ण वचनों से उससे कैकेयी से अपनी खुशामद करवाई।
*समीक्षा-*कैकेयी को वरदान देना राजा का कर्तव्य था और कैकेयी को यह पारितोषिक मिलने का अधिकार था।वरदान देना मूर्खता नहीं अपितु कैकेयी द्वारा अनुचित वर मांगना मूर्खतापूर्ण था।कैकेयी कोे दिये वरदानों को पूरा करने में असमर्थ होने से राजा दशरथ ने उसे अवश्य मनाया,समझाया कि वो ऐसे अन्यथा वरदान न माने।क्या एक पति अपनी पत्नी को मना भी नहीं सकता?क्या इसे भी आप खुशामद कहेंगे?आपको भला पति-पत्नी के मामले के बीच में टीका-टिप्पणी करने क्या अधिकार है?राजा दशरथ का कैकेयी के चरण पकड़ने आदि का पीछे उत्तर दे चुके हैं।
*आक्षेप-१९-प्रश्न-५-*अपनी प्रज्ञा के समक्ष राम को राजतिलक करने की घोषणा कैकेयी व उसके पिता को दिये वचनों का उल्लंघन है।
*समीक्षा-*हम चकित हैं कि आप कैसे बेहूदा आक्षेप लगा रहे हैं!हम पहले सिद्ध कर चुके हैं कि राजा दशरथ ने कैकेयी के पिता कोई वचन नहीं दिया।और राम दी के राजतिलक की घोषणा पहले हुई।उसके बाद में कैकेयी ने यह वरदान मांगे कि ,”राम को दंडकारण्य में वास मिले और जिन सामग्रियों से राम का राज्याभिषेक होने वाला था उनसे भरत का राज्याभिषेक हो।”
कैकेयी के वरदानों के बाद राम राज्याभिषेक की घोषणा की बात कहना मानसिक दीवालियापन और रामायण से अनभिज्ञता दर्शाता है।
पेरियार साहब! आपका *”हुकुम का इक्का तो चिड़ी का जोकर निकला”* श्रीमन्!नकल के लिये भी अकल की जरूरत पड़ती है जो आप जैसे अनीश्वरवादियों से छत्तीस का आंकड़ा रखती है।
*आक्षेप-२०-प्रश्न-६-*कैकेयी की स्वेच्छानुसार उसे दिये गये वरदानों के फल-स्वरूप राम को गद्दी देने की अपनी पूर्ण घोषणा से वह निराश हो गया।
*समीक्षा-*राजा दशरथ ने   श्रीराम को गद्दी देने की भरी सभी में घोषणा की थी। अयोध्या की जनता,मंत्रीगण और समस्त जनपदों के राजा भी इसके पक्ष में थे।ऐसे में कैकेयी ने मूर्खतापूर्ण वरदान मांगे जिसमें राम को वनवास देना भी एक वचन था।महाराज दशरथ ने पहले भरी सभा में राज्याभिषेक की घोषणा की थी कि श्रीराम को राजगद्दी मिलेगी।कैकेयी के वरदान के कारण उनकी घोषणा मिथ्या हो जाती।अयोध्या की जनता भी अपने होने वाले शासक से वंचित हो जाती ।दशरथ का बहुत अपयश होता।वैसे भी,१४वर्ष तक पुत्र से वियोग के दुख के पूर्वाभास के कारण ऐसा कौन पिता होगा जो निराश न होगा?अतः आक्षेप पूर्णरूपेण अनर्गल है।
…………क्रमशः
पूरी पोस्ट पढ़ने के लिये धन्यवाद।कृपया अधिकाधिक शेयर करें। अगले लेख में अगले ७ प्रश्नों का उत्तर दिया जायेगा।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र की जय।
योगेश्वर कृष्ण चंद्र जी की जय।
नोट : इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आर्यमंतव्य  टीम  या पंडित लेखराम वैदिक मिशन  उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है. |

पेरियार रचित सच्ची रामायण का खंडन भाग-१५

*पेरियार रचित सच्ची रामायण का खंडन भाग-१५*
*अर्थात् पेरियार द्वारा रामायण पर किये आक्षेपों का मुंहतोड़ जवाब*
*-कार्तिक अय्यर*
नमस्ते पाठकों!अब तक सच्ची रामायण खंडन संबंधी १४ पोस्ट आपने मनोयोग से पढ़ी और प्रचारित की।अब १५वीं पोस्ट में आपका स्वागत है। दशरथ शीर्षक द्वारा महाराज दशरथ पर किये आक्षेपों के क्रम में आज आक्षेप बिंदु १० से १४ तक का खंडन किया जायेगा।
*आक्षेप-१०* …..जब अंत में अंत में दशरथ के सारे प्रयास निष्फल हो गए तब दशरथ ने राम को अपने पास बुलाकर कानों में चुपके से कहा मेरा कोई बसना चलने के दुष्परिणाम स्वरूप अब मैं भारत को राज तिलक करने को तैयार हो गया हूं ।अब तुम्हारे ऊपर कोई बंधन नहीं है तुम मुझे गद्दी से उतार कर अयोध्या के राजा हो सकते हो। इत्यादि।
*समीक्षा*- यह ठीक है कि राजा दशरथ ने श्रीराम से यह बात कही। श्री रामचंद्र राजगद्दी के असली अधिकारी थे,(ज्येष्ठ पुत्र होने से)। कैकेई के पिता को वचन वाली बात हम झूठी सिद्ध कर चुके हैं यही नहीं अयोध्या की जनता, मंत्रिमंडल और राजा महाराजा ,जनपद सब श्रीराम को राजा बनाना चाहते थे। क्योंकि भरी सभा में घोषणा करने के बाद भी राजा दशरथ अपना वचन निभाने के कारण श्री राम को वनवास देते हैं उनकी श्री राम को गति देने की प्रतिज्ञा मिथ्या हो जाएगी। महाराज दशरथ वृद्ध हो चुके थे, अतः श्री राम का अधिकार था कि दशरथ को गद्दी से उठाकर स्वयं राज गद्दी पर विराजमान हो जाए ।महाराज दशरथ ने कैकई को जो दो वरदान दिए थे उनको पूर्ण करने का दायित्व उन पर था श्री राम को वनवास दे ने का वचन महाराज दशरथ ने दिया था,श्रीराम उसे मानने के लिए बाध्य नहीं थे अतः श्री राम बलपूर्वक राजगद्दी पर अधिकार कर सकते थे और कोई उनका विरोध भी नहीं करता और ना ही कोई अधर्म होता। परंतु श्रीराम ने अपने पिता को सत्यवादी सिद्ध करने के लिए हंसते-हंसते बनवास ग्रहण कर लिया,देखिये:-
अहं राघव कैकेय्या वरदानेन मोहितः ।
अयोध्यायां त्वमेवाद्य भव राजा निगृह्य माम् ॥ २६ ॥
‘राघव ! मैं कैकेयीको दिये वर के कारण मोह में पड़नहीं।
। तुम मुझे कैद करके स्वतः अयोध्या के  राजा बन जाओ ॥२६॥(अयोध्याकांड ३४-२६)
उत्तर मैं श्रीराम ने कहा:-
भवान् वर्षसहस्राय पृथिव्या नृपते पतिः ।
अहं त्वरण्ये वत्स्यामि न मे राज्यस्य काङ्‌क्षिता ॥ २८ ॥
“महाराज ! आप सहस्रों(अर्थात् अनेक) वर्षों तक इस पृथ्वीके अधिपति होकर रहें ।मैं तो अब वनमें ही  निवास करूंगा।मुझे राज्य लेने की इच्छा नहीं ॥२८॥
नव पञ्च च वर्षाणि वनवासे विहृत्य ते ।
पुनः पादौ ग्रहीष्यामि प्रतिज्ञान्ते नराधिप ॥ २९ ॥
“नरेश्वर ! चौदह वर्षों तक वन में घूम-फिरकर आपकी प्रतिज्ञा पूरी करके बादमें मैं पुनः आपके युगल चरणों में  मस्तक नवाऊंगा ॥२९॥(अयोध्याकांड सर्ग ३४)
यह था श्रीराम का आदर्श!
*आक्षेप-११* सभी प्रयत्न निष्फल हो चुकने के बाद दशरथ ने सुमंत्र को आज्ञा दी की कोषागार का संपूर्ण धन खेतों का अनाज व्यापारी प्रजापत वेश्याएं राम के साथ वन में भिजवाने का प्रयत्न करो।(अयोध्याकांड ३६)
*आक्षेप-१२* कैकेई नहीं इस पर भी आपत्ति प्रकट की और विवादास्पद पर उपस्थित करके दशरथ को असमंजस में डाल दिया -“तुम केवल देश चाहते हो ना कि उसकी पूरी संपत्ति” ।
*समीक्षा*- यह सत्य है कि महाराज दशरथ ने श्रीराम के साथ समस्त कोषागार का धन व्यापारी ,अन्न भंडार, नर्तकियां(देहव्यापार वाली वेश्यायें नहीं,अपितु परिचारिकायें)आदि भेजने की बात कही। अयोध्याकांड सर्ग ३६ श्लोक १-९ में यह वर्णन है। कैकेयी ने इस बात का विरोध भी किया और श्रीराम ने भी इन सबको अस्वीकार कर दिया ।महाराज दशरथ पुत्रवियोग के कारण विषादग्रस्त स्थिति में थे।उनके पुत्रों और बहू को वन में कोई दुविधा न हो इसके लिये वे सब उपयोगी सामान श्रीराम को देना चाहते थे।एक पिता अपनी संतान को सब सुख-सुविधायें देना चाहता है। अपने जीवन भर की जमा-पूंजी वह अपने पुत्र के लिये ही संचित करता है।पुत्रवियोग से विषादग्रस्त होकर उन्होंने यदि ऐसी बात कह भी दी तो भी इसमें आपत्ति योग्य कुछ भी नहीं है।
देखिये-
अनुव्रजिष्याम्यहमद्य रामं
     राज्यं परित्यज्य सुखं धनं च ।
सर्वे च राज्ञा भरतेन च त्वं
     यथासुखं भुङ्क्ष्व चिराय राज्यम् ॥ ३३ ॥
‘अब मैं भी ये राज्य, धन और सुख छोड़कर रामके पीछे-पीछे निकल जाऊंगा।ये सब लोगभी उनके ही साथ जायेंगे। तू अकेली राजा भरत के साथ चिरकालपर्यंत सुखपूर्वक राज्य भोगती रह’ ॥३३॥
अब राजा ने यहां अपनी आज्ञा वापस लेली।साथ ही समस्त अयोध्या वासी श्री राम के पीछे चल पड़े।श्रीराम ने भी समस्त सेना आदि लेने से मना कर दिया:- अयोध्याकांड सर्ग ३७
त्यक्तभोगस्य मे राजन् वने वन्येन जीवतः ।
किं कार्यमनुयात्रेण त्यक्तसङ्गस्य सर्वतः ॥ २ ॥
‘राजन् ! मैं भोगों का परित्याग कर चुका हूं। मुझे जंगलके फल-मूलों से  जीवन-निर्वाह करना है।यदि मैंने सब प्रकारसे  अपनी आसक्ति नहीं छोड़ीे तो मुझे सेनाका क्या प्रयोजन है?॥२॥इत्यादि।
लीजिये,अब संतुष्टि हुई?श्रीरान ने भी ऐश्वर्य लेने से मना कर दिया।केवल वल्कल वस्त्र और कुदाली मांगी-
सर्वाण्येवानुजानामि चीराण्येवानयन्तु मे ॥ ४ ॥
खनित्रपिटके चोभे समानयत गच्छत ।
चतुर्दश वने वासं वर्षाणि वसतो मम ॥ ५ ॥ (अयोध्याकांड सर्ग ३७)
अब तसल्ली हुई महाशय? यहां महाराज दशरथ पर कोई दोष नहीं आता।
*आक्षेप-१३* दशरथ ने कोषागार में रखे हुए सभी आभूषण सीता सौंप दिये।
*समीक्षा*-क्यों महाशय?सीता जी को आभूषण और वस्त्र देने में आपको क्या आपत्ति है?क्या वनवास सीताजी को मिला था?वनवास केवल श्री राम को मिला था,मां सीता पतिव्रता होने के कारण उनके साथ जा रही थीं।यदि वे आभूषण ले भी जायें तो क्या दोष है?
महाराज दशरथ कैकेयी से कहते हैं:-
चीराण्यपास्याज्जनकस्य कन्या
     नेयं प्रतिज्ञा मम दत्तपूर्वा ।
यथासुखं गच्छतु राजपुत्री
     वनं समग्रा सह सर्वरत्‍नैः ॥ ६ ॥
‘जनकनंदिनी आपने चीर-वस्त्र उतारे। ‘ये इस रूपमें वनामें जाये’ ऐसी कोईभी प्रतिज्ञा मैंने प्रथम नहीं की;और किसीको ऐसा वचनभी नहीं दिया। इसलिये राजकुमारी सीता संपूर्ण वस्त्रालंकारों से संपन्न होकर सब प्रकार के रत्‍नों के साथ, जिस प्रकार से वो सुखी रह सकेगी, उस प्रकारसे वनको जा सकती हैं॥६॥(अयोध्याकांड ३८)
वासांसि च वरार्हाणि भूषणानि महान्ति च ।
वर्षाण्येतानि सङ्ख्याय वैदेह्याः क्षिप्रमानय ॥ १५ ॥
‘(सुमंत्र से)आप वैदेही सीताके धारण करने योग्य बहुमूल्य वस्त्र और महान आभूषण,जो चौदह वर्षोंतक पर्याप्त हों ऐसे, चुनकर शीघ्र ले आइये’ ॥१५॥
व्यराजयत वैदेही वेश्म तत् सुविभूषिता ।
उद्यतोंऽशुमतः काले खं प्रभेव विवस्वतः ॥ १८ ॥
उन आभूषणों से विभूषित होकर वैदेही, प्रातःकाली उदय मान अंशुमाली सूर्यकी प्रभा आकाश को जिस प्रकार प्रकाशित करतीे है उसी प्रकार सुशोभित होने लगी॥१८॥
(अयोध्याकांड सर्ग ३९)
अतः आपका आक्षेप निर्मूल है।सीता वन को वल्कल वस्त्र पहनकर जाये ऐसी कोई प्रतिज्ञा राजा दशरथ ने नहीं थी।इसलिये सीताजी को आभूषण और वस्त्र देने में कोई दोष नहीं।
*आक्षेप १४*- राम और सीता को वनवास भेजने के कारण दशरथ ने कैकई के ऊपर गालियों की बौछार कर दी।किंतु दशरथ को राम के साथ लक्ष्मण को वनवास भेजने में कोई बेचैनी नहीं हुई। लक्ष्मण की स्त्री का कहीं कोई वर्णन नहीं।
*समीक्षा*- राजा दशरथ को अपने चारों पुत्रों से बराबर स्नेह था परंतु श्रीराम उनको चारों में अत्यंत प्रिय थे।श्री राम यदि वनवास जाते तो उनके अनुचर होने के कारण लक्ष्मण जी भी स्वतः उनके साथ चलेंगे-यह राजा दशरथ को मालूम था।इसलिये उन्होंने श्रीराम को रोकने की कोशिश की।यदि श्रीराम वनको न जाते तो लक्ष्मण और मां सीता भी अयोध्या में ही रहते,कहीं न जाते।श्रीराम को रोकने से लक्ष्मण स्वतः रुक जाते क्योंकि वे “श्रीराम के शरीर के बाहर विचरण करने वाले प्राण थे” ।अतः जितनी बेचैनी उनको श्रीराम के वन जाने में थी,उतनी ही लक्ष्मण और मां सीता के प्रति भी थी।उसमें भी श्रीराम की उनको अधिक परवाह थी क्यों कि उनके जाने पर एक तो उनकी घोषणा मिथ्या हो जाती और साथ ही पुत्र वियोग और अयोध्या को अपने प्रिय राजा का वियोग भी सहना पड़ता।अतः श्रीराम के प्रति भी दशरथ को लक्ष्मण जितनी ही परवाह थी।
लक्ष्मण जी की स्त्री-उर्मिला का वर्णन वनगमन के समय वाल्मीकीय रामायण में नहीं है।पर इससे क्या फर्क पड़ता है? रामायण के प्रधान नायक श्रीराम है,लक्ष्मण जी तो उनके सहायक नायक हैं।इसलिये उनके गौण होने से उर्मिला वर्णन नहीं है। निश्चित ही उर्मिला ने अपने पति की अनुपस्थिति में ब्रह्मचर्य पालन करके भोगों से निवृत्ति कर ली होगी।कई रामकथाओं में यह वर्णन है भी।
पाठकगण!पूरी पोस्ट पढ़ने के लिये धन्यवाद।कृपया अधिकाधिक शेयर करें।
अगली पोस्ट में हम पेरियार साहब द्वारा किन्हीं “श्रीनिवास आयंगर” के १२ आक्षेपों का खंडन आरंभ करेंगे,जिनका संदर्भ वादी ने दिया है।आक्षेप क्या हैं,पेरियार साहब ने अपने आक्षेपों को ही अलग रूप से दोहराया है और कुछ नये आक्षेप हैं।इनका उत्तर हम अगले लेख में देना प्रारंभ करेंगे ।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र की जय।
योगेश्वर कृष्ण चंद्र की जय।
नोट : इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आर्यमंतव्य  टीम  या पंडित लेखराम वैदिक मिशन  उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है. |

विधिहीन यज्ञ और उनका फल: – स्वामी मुनीश्वरानन्द सरस्वती त्रिवेदतीर्थ

स्वामी मुनीश्वरानन्द सरस्वती त्रिवेदतीर्थ आर्यसमाज के शीर्ष विद्वान् रहे हैं। आपके द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘विधिहीन यज्ञ और उनका फल’ यज्ञ सबन्धी कुरीतियों पर एक सशक्त प्रहार है। इसी पुस्तक का कुछ अंश यहाँ पाठकों के अवलोकनार्थ प्रकाशित है।           -सपादक

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज की मान्यता है कि श्री कृष्ण जी एक आप्त पुरुष थे। यज्ञ के विषय में इस आप्त पुरुष का कहना है कि-

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्,

श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।।

-गीता 17/13

  1. विधिहीनं यज्ञं तामसं परिचक्षते।
  2. असृष्टान्नं यज्ञं तामसं परिचक्षते।
  3. मन्त्रहीनं यज्ञं तामसं परिचक्षते।
  4. अदक्षिणं यज्ञं तामसं परिचक्षते।
  5. श्रद्धा विरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।

इन पाँच प्रकार के दोषों में से किसी एक, दो, तीन, चार या पाँचों दोषों से युक्त यज्ञ तामसी कहा जाता है। तामसी कर्म अज्ञानमूलक होने से परिणाम में बुद्धिभेदजनक तथा पारस्परिक राग, द्वेष, कलह, क्लेशादि अनेक बुराइयों का कारण होता है।

प्रस्तुत लेख में हम ‘विधिहीनं यज्ञं तामसं परिचक्षते।’ इस एक विषय पर स्वसामर्थ्यानुसार कुछ विचार प्रस्तुत कर रहे हैं।

  1. श्री कृष्ण जी का कहना है कि विधिहीन यज्ञ तामसी होता है। विधि के अनुसार सबसे प्रथम स्थान यजमान का है। जो ‘यष्टुमिच्छति’ यज्ञ करना चाहता है। यज्ञ का सपूर्ण संभार तथा व्यय यजमानकर्तृक होता है। अग्नि यजमान की, अग्निशाला (यज्ञशाला) यजमान की, हविर्द्रव्य यजमान का। ऋत्विज् यजमान के। उनका मधुपर्कादि से सत्कार करना तथा उनकी उत्तम भोजन व्यवस्था यजमान कर्त्तृक। उनका शास्त्रानुसार दक्षिणा द्रव्य यजमान का। इतनी व्यवस्था के साथ अग्न्याधान से पूर्णाहुति तक का पूरा अनुष्ठान ऋत्विजों की देखरेख में यजमान करता है। यजमान इस सामर्थ्य से युक्त होना चाहिये। अपरं च पूर्णाहुति के बाद उपस्थित जनता से पूर्णाहुति के नाम से तीन-तीन आहुतियाँ डलवाना पूर्णरूपेण नादानी और अज्ञानता है। इसका विधि से कोई सबन्ध न होने से यह भी एक विधिविरुद्ध कर्म है, जिसे साहसपूर्वक बन्द कर देना चाहिए। इस आडबर से युक्त यज्ञ भी तामसी होता है। क्या आर्यसमाज संगठन के यजमान तथा ऋत्विक् कर्म कराने वाले विद्वान् इस व्यवस्था तथा यजमान सबन्धी इस विधि-विधान के अनुसार यज्ञ करते-कराते हैं। जब पकड़कर लाया हुआ यजमान तथा विधिज्ञान शून्य ऋत्विक् इन बातों को छूते तक नहीं तो केवल विधिविरुद्ध आहुति के प्रकार ‘ओम् स्वाहा’ के लिए ही मात्र आग्रह करना कौनसी बुद्धिमत्ता है। इस उपेक्षित वृत्त को देखकर यही कहा जायेगा कि ऋत्विक् कर्मकर्त्ता सभी विद्वान् इन विधिहीन यज्ञों के माध्यम से केवल दक्षिणा द्रव्य प्राप्त कर अपने आप को धन्य मानते हैं तथा यजमान अपने आप को पूर्णकाम समझता है, विधिपूर्वक अनुष्ठान की दृष्टि से नहीं।

ऐसे यजमान और ऋत्विक् सबन्धी-ब्राह्मण में महाराज जनमेजय के नाम से एक उपायान में कहा गया है कि-

‘अथ ह तं व्येव कर्षन्ते यथा ह वा इदं निषादा वा सेलगा वा पापकृतो वा वित्तवन्तं पुरुषमरण्ये गृहीत्वा कर्त (गर्त) मन्वस्य वित्तमादाय द्रवन्ति, एवमेव त ऋत्विजो यजमानं कर्त्तमन्वस्य वित्तमादाय द्रवन्ति यमनेवं विदोयाजयन्ति। अनेवं विदो अभिषेक प्रकारं (अनुष्ठान प्रकारं वा) अजानन्त ऋत्विजोयं क्षत्रियं (यजमान वा) याजयन्ति। तं क्षत्रियं (यजमानं वा) विकर्षन्त्येव विकृष्टमपकृष्टं कुर्वन्त्येव। तत्रेदं निदर्शनमुच्यते।’ – ए.ब्रा. 37/7

सायण भाष्यः निषादा नीचजातयो मनुष्याः। सेलगाश्चौराः। इडाऽन्नं तया सह वर्त्तन्त इति सेडा।

शेषााग पृष्ठ संया 39 पर…..

पृष्ठ संया 6 का शेष भाग…..

धनिकास्तान् धनापहारार्थं गच्छन्तीति सेलगाश्चौराः। पाप कृतो हिंसा कारिणः। त्रिविधाः दुष्टाः पुरुषा वित्तवन्तं बहुधनोपेतं पुरुषमरण्यमध्ये गृहीत्वा कर्त्तमन्वस्य कश्मिेश्चिदन्ध कूपादि रूपे गर्त्तेतं प्रक्षिप्य तदीयं धनमपहृत्य द्रवन्ति पलायन्ते। एवमेवानभिज्ञा ऋत्विजो यजमानं नरक रूपं कर्त्तमन्वस्य नरकहेतो दुरनुष्ठानेऽवस्थाप्य दक्षिणारूपेण तदीयं द्रव्यमपहृत्य स्वगृहेषु गच्छन्ति। अनेन निदर्शनेन ऋत्विजामनुष्ठान परिज्ञानाभावं निन्दति।

डॉ. सुधाकर मालवीय कृत हिन्दी अनुवादः- इस प्रकार (अभिषेक प्रकार को या अनुष्ठान प्रकार को न जानने वाले ऋत्विज् जिस क्षत्रिय के लिए या जिस यजमान के लिए यजन करते हैं, तो वे उस क्षत्रिय वा यजमान का अपकर्ष भी करते हैं, जिस प्रकार नीच जाति के ये निषाद, चोर और (हिंसा करने वाले शिकारी आदि) पापी पुरुष बहुधन से युक्त पुरुष को अरण्य के मध्य पकड़कर (किसी अन्ध कूपादि) गड्ढे में फेंककर उसके धन का अपहरण करके पलायित हो जाते हैं, उसी प्रकार ये अनुष्ठान प्रकार से अनभिज्ञ ऋत्विज् लोग यजमान को नरकरूप (विधिहीन) अनुष्ठान में स्थापित करके दक्षिणारूपी उसके धन का अपहरण करके अपने घर चले जाते हैं।

आर्यसमाज के क्षेत्र में अनुष्ठीयमान यज्ञों में यह पहले प्रकार का विधिहीनता-रूपी दोष सर्वत्र रहता है। इस प्रकार हमारे ये यज्ञ तामसी कोटि के हो जाते हैं। हमारे ये पारायण-यज्ञ जहाँ से चलकर आर्यसमाज में आए हैं, वहाँ पूर्ण रीति से इनका विधि-विधान लिखा हुआ है। हमारे विद्वान् उसे देखना या उधर के तज्ज्ञ विद्वानों से सपर्क करना भी उचित नहीं समझते। हमारी स्थिति तो सन्त सुन्दरदास के कथनानुसार-

पढ़े के न बैठ्यो पास अक्षर बताय देतो,

बिनहु पढ़े ते कहो कैसे आवे पारसी।

इस पद्यांश जैसी है। संस्कार विधि यद्यपि हिन्दी भाषा में है, पर फिर भी इसे समझना आसान काम नहीं है। गुरुचरणों में बैठ, पढ़कर ही समझा जा सकता है। हमारा पुरोहित समुदाय ऐसा करना आवश्यक नहीं समझता तो फिर विधिपूर्वक अनुष्ठान कैसे हो सकते हैं और कैसे कर्मकाण्ड में एकरूपता आ सकती है।

ये वेद पारायण-यज्ञ (संहिता स्वाहाकार होम) जहाँ से हमने लिए हैं, वहाँ इनके अनुष्ठान के लिए विधिविधान का उल्लेख करते हुए अपने समय के ब्राह्मण, आरण्यक, श्रौत और गृह्य सूत्रों के उद्भट विद्वान् स्वर्गीय श्री पं. अण्णा शास्त्री वारे (नासिक) अपने ग्रन्थ ‘संहिता स्वाहाकार प्रयोग प्रदीप’ में लिखते हैं कि-

‘तत्र कात्यायनप्रणीतशुक्लयजुर्विधान सूत्रं, सर्वानुक्रमणिकां च अनुसृत्य संहितास्वाहाकार होमे प्रतिऋग्यजुर्मन्त्रे आदौ प्रणवः अन्ते स्वाहाकारश्च। मध्ये यथानायं मन्त्रः। प्रणवस्य स्वाहाकारस्य च पृथक् विधानात् मन्त्रेण सह सन्ध्याभावः। मन्त्र मध्ये स्वाहाकारे सति तत्रैवाहुतिः पश्चान्मन्त्र समाप्तिः। न पुनर्मन्त्रान्ते स्वाहोच्चारणमाहुतिश्च।। – पृ. 240

अर्थः संहिता स्वाहाकार होम विषय में कात्यायन प्रणीत शुक्ल यजुर्विधान सूत्र और सर्वानुक्रमणिका का अनुसरण करते हुए संहिता स्वाहाकार होम में प्रत्येक ऋग्यजुर्मन्त्र के आदि में प्रणव (ओम्) तथा अन्त में स्वाहाकार, मध्य में संहिता में पढ़े अनुसार मन्त्र। मन्त्र और स्वाहाकार के पृथक् विधान होने से इनकी मन्त्र के साथ सन्धि नहीं होती। मन्त्र के बीच में स्वाहाकार आने पर वहीं आहुति देकर पश्चात् मन्त्र समाप्त करना चाहिए। फिर से मन्त्र के अन्त में स्वाहाकार का उच्चारण कर आहुति नहीं देनी चाहिये।

प्रणव और स्वाहाकार का मन्त्र से पृथक् विधान होने से मन्त्रान्त में ओम् स्वाहा उच्चारण कर आहुति देना नहीं बनता। कात्यायन भिन्न अन्य सभी ऋषि-महर्षियों का भी ऐसा ही मत है। उदाहरणस्वरूप प्रस्तुत प्रमाण का अवलोकन कीजिए-

सर्व प्रायश्चित्तानि जुहुयात्

स्वाहाकारान्तैर्मन्त्रैर्न चेत् मन्त्रे पठितः।

– आश्वलायन श्रौतसूत्र 1/11/10

पेरियार रचित सच्ची रामायण की पोलखोल भाग-१४

पेरियार रचित सच्ची रामायण की पोलखोल भाग-१४*
*अर्थात् पेरियार द्वारा रामायण पर किये आक्षेपों का मुंहतोड़ जवाब*
*-कार्तिक अय्यर*
नमस्ते मित्रों! पेरियार साहब के खंडन के १४वें भाग में आपका स्वागत है।आगे दशरथ नामक लेख के ६वें बिंदु के आगे जवाब दिया जायेगा।
*आक्षेप-६* राम की मां कौसल्या भी अपने देवी-देवता को मनाया करती थी कि मेरे पुत्र राम को राजगद्दी मिले।
*समीक्षा*- हम चकित हैं कि पेरियार साहब कैसे बेहूदे आक्षेप लगा रहे हैं!श्रीराम की मां देवी कौसल्या काल्पनिक देवी देवताओं से नहीं,परमदेव परमेश्वर की पूजा करती थीं।वे परमदेव परमात्मा से प्रार्थना करती थीं कि श्रीराम राजा बने तो इसमें हर्ज क्या है?कोई भी मां अपने पुत्र का हित ही चाहेगी।केवल मां ही नहीं,अपितु महाराज दशरथ, समस्त प्रजा और राजा आदि सब चाहते थे कि श्रीराम राजा बनें।इसमें भला आक्षेप योग्य कौन सी बात है?आक्षेप तो तब होता जब देवी कौसल्या भरत के अहित के लिये परमात्मा से प्रार्थना करतीं।परंतु उनका चरित्र ऐसा न था।
*आक्षेप ७*- पुरोहितों और पंडितों को सूचना तथा उनके परामर्श के बिना और कैकेयी, भरत,शत्रुघ्न आदि को बिना आमंत्रित किये बिना दशरथ ने राजातिलक का शीघ्र प्रतिबंध कर दिया(अयोध्याकांड अध्याय १)
*समीक्षा*-हे परमेश्वर! ये झूठ-धोखा आखिर कब तक चलेगा?ये धूर्त मिथ्यीवादी कब तक तांडव करते रहेंगे!क्या इन पर तेरे न्याय का डंडा न चलेगा?अवश्य ही चलेगा और ये लोग भागते दिखेंगे।
यदि दशरथ जी ने किसी को आमंत्रित नहीं किया था तो क्या समारोह ऐसे ही आयोजित हो गया?आपने कभी वाल्मीकीय रामायण की सूरत भी देखी है? रामायण में अध्याय नहीं सर्गों का विभाग है। अयोध्या कांड के प्रथम सर्ग को ही पढ़ लेते तो ये आक्षेप न करते।
प्रथम सर्ग में पूरा वर्णन है कि किस तरह महाराज दशरथ ने समस्त मंत्रिमंडल और अनेक राजाओं को राजसभा में आमंत्रित करके श्रीराम के राज्याभिषेक की घोषणा की।लीजिये,अवलोकन कीजिये:-
इत्येवं विविधैस्तैस्तैरन्यपार्थिवदुर्लभैः ।
शिष्टैरपरिमेयैश्च लोके लोकोत्तरैर्गुणैः ॥ ४१ ॥
तं समीक्ष्य महाराजो युक्तं समुदितैः गुणैः ।
निश्चित्य सचिवैः सार्धं यौवराज्यममन्यत ॥ ४२ ॥
इस प्रकार से विचार करके तथा अपने पुत्र श्रीराम इनके नाना प्रकारके विलक्षण, सज्जनोचित, असंख्य और लोकोत्तर गुणों से, जो अन्य राजाओं में दुर्लभ थे, विभूषित देखकर राजा दशरथा मंत्रियों के बराबर सलाह करके उनको युवराज बनाने का निश्चय किया ॥४१-४२॥
दिव्यन्तरिक्षे भूमौ च घोरमुत्पातजं भयम् ।
संचचक्षेऽथ मेधावी शरीरे चात्मनो जराम् ॥ ४३ ॥
बुद्धिमान महाराज दशरथने मंत्रियों को स्वर्ग, अंतरिक्ष तथा भूतल पर दृष्टिगोचर होनेवाले उत्पातोंके घोर भय सूचित किये और आपने शरीर में वृद्धावस्था के आगमन की बात बताई. ॥४३॥
पूर्णचन्द्राननस्याथ शोकापनुदमात्मनः ।
लोके रामस्य बुबुधे सम्प्रियत्वं महात्मनः ॥ ४४ ॥
पूर्ण चंद्रमा के समान मनोहर मुख वाले महात्मा श्रीराम समस्त प्रजा को  प्रिय थे। लोक में उनके सर्वप्रिय थे। राजाके आंतरिक शोक को दूर करनेवाले थे ये बातें राजाने अच्छे से जानी थीं॥४४॥
आत्मनश्च प्रजानां च श्रेयसे च प्रियेण च ।
प्राप्तकालेन धर्मात्मा भक्त्या त्वरितवान् नृपः ॥ ४५ ॥
तब उपयुक्त समय आनेपर धर्मात्मा राजा दशरथने अपने और प्रजाके कल्याण के लिये मंत्रियों को श्रीरामाके राज्याभिषेक के लिये शीघ्र तैयारी करने की आज्ञा दी। इस उतावलेपन के कारण उनके हृदय के प्रेम और प्रजाके अनुराग ही कारण था ॥४५॥
नानानगरवास्तव्यान् पृथग्जानपदानपि ।
समानिनाय मेदिन्यां प्रधानान् पृथिवीपतिः ॥ ४६ ॥
उन भूपालों ने भिन्न भिन्न नगरों में निवास करनेवाले प्रधान- प्रधान पुरूषों को  तथा अन्य जनपदों के सामंत राजाओं को  मंत्रियों के  द्वारा अयोध्या में  बुला लिया॥४६॥
(अयोध्या कांड सर्ग १)
इसके आगे महाराज दशरथ सबको संबोधित करते हैं और स्वयं राज्य त्यागकर श्रीराम के राज्याभिषेक की घोषणा की:-
अनुजातो हि मां सर्वैर्गुणैः श्रेष्ठो ममात्मजः ।
पुरन्दरसमो वीर्ये रामः परपुरञ्जयः ॥ ११ ॥
मेरे पुत्र श्रीराम मुझसे भी  सर्व गुणों में श्रेष्ठ हैं।शत्रुओं के नगरों पर विजय प्राप्त करने वाले श्रीराम बल-पराक्रम में देवराज इंद्र समान हैं ॥११॥
तं चन्द्रमिव पुष्येण युक्तं धर्मभृतां वरम् ।
यौवराज्ये नियोक्तास्मि प्रीतः पुरुषपुङ्‍गवम् ॥ १२ ॥
पुष्य- नक्षत्रसे युक्त चंद्रमाके समान समस्त कार्य साधनमें कुशल तथा धर्मात्माओं में श्रेष्ठ उन पुरुषश्रेष्ठ रामको मैं कल प्रातःकाल पुष्य नक्षत्र में युवराजका पद पर नियुक्त करूंगा॥१२॥
(अयोध्या कांड सर्ग २)
*आक्षेप ८*- आगे अयोध्याकांड अध्याय १४ का संदर्भ देकर लिखा है कि दशरथ ने राम से गुप्त रुप से कहा था कि भारत के लौट आने के पहले राम का राज्याभिषेक हो जाए तो भारत शांतिपूर्वक इसे जो पहले हो चुका है स्वीकार कर लेगा इत्यादि।
*समीक्षा*- बेईमानी की हद कर दी! अयोध्या कांड सर्ग १४ में न तो श्रीराम से राजा दशरथ श्रीराम से आपके लिखी बात कहते हैं न उसमें भरत का जिक्र करते हैं।इस सर्ग में कैकेयी ,जो अपने वचन मान चुकी है,उन्हें मनवाने के लिये कटिबद्ध है।वो कई तरह के कटुवचन कहकर राजा दशरथ को संतप्त करती है।फिर सुमंत्र आकर राजा दशरथ को राम राज्याभिषेक की पूरी तैयार होने का समाचार देते हैं।यहां आपके कपोलकल्पित लेख का कोई निशान नहीं है।हां,यह ठीक है कि इसके पहले राजा दशरथ श्रीराम से कहते हैं कि “यद्यपि भरत धर्मात्मा और बड़े भाई का अनुगामी है,फिर भी मनुष्यों का चित्त प्रायः स्थिर नहीं रहता।इसलिये अपना राज्याभिषेक शीघ्रातिशीघ्र करा लो।”इसका स्पष्टीकरण पहले दे चुके हैं।
*आक्षेप ९*- कैकई ने हठ किया कि उसका पुत्र राजा बनाया जाए और इसकी सुरक्षा का विश्वास दिलाने के लिए राम को वनवास भेज दिया जाए- तो दशरथ उसे मनाने के लिए उसके पैरों पर गिर पड़ा और  उस से प्रार्थना करने लगा कि ” मैं तुम्हारी इच्छानुसार कोई भी तुच्छतम कार्य करने के लिए तैयार हूं- राम को वनवास भेजने का हठ न करो।(अयोध्याकांड सर्ग १२)
*समीक्षा*-  राजा दशरथ ने कैकेयी द्वारा देवासुर संग्राम में अपनी प्राणरक्षा के कारण उसे दो वरदान दिये थे।उसने दो वरदानों द्वारा भरत का राज्याभिषेक तथा श्रीराम का वनवास मांगा।कैकेयी ने समस्त प्रजा,मंत्रिमंडल की मंशा के विरूद्ध श्रीराम का वनवास और भरत का राज्याभिषेक मांगा,ये वरदानों का मूर्खतापूर्ण प्रयेग किया।राजा दशरथ अपने रामराज्याभिषेक की घोषणा के विरुद्ध वरदान देने को राजी नहीं हुये।राजा दशरथ ने कैकेयी को मनाने की बहुत कोशिश की,पर वो नहीं मानी।
अञ्जलिं कुर्मि कैकेयि पादौ चापि स्पृशामि ते ।
शरणं भव रामस्य माधर्मो मामिह स्पृशेत् ॥ ३६ ॥
कैकेयी ! मैं हाथ  जोड़ता हूं और तेरे पैर पड़ता हूं।तू राम को  शरण दे।जिसके कारण  मुझे पाप नहीं लगेगा॥३६॥(अयोध्या कांड सर्ग १२)
यहां राजा दशरथ ने अनुनय-विनय के लिये मुहावरे के रूप में कहा।जैसे कहा जाता है कि,”मैं तेरे हाथ जोड़ता हूं,पैर पड़ता हूं।”पर सत्य में कोई पैर नहीं पकड़ता।वैसा ही यहां समझें।और यदि राजा दशरथ ने कैकेयी के पैर सचमें पड़ भी लिये तो भी कौन सी महाप्रलय आ गई?राजा दशरथ उस समय राजा नही,एक पति थे।यदि वे अपनी पत्नी के पांव भी पड़ ले तो क्या बुरा है?भारतीय संस्कृति में पति-पत्नी एक-दूसरे के आधे शरीर माने जाते हैं।यदि पति पत्नी के और पत्नी पति के पांव पड़ें तो आपके हर्ज क्या है? एक तो आप जैसे लोग महिला-उत्थान का,स्त्रियों के अधिकारों की बात करते हैं और राजा दशरथ का अपनी पत्नी के पांव पड़ना नामर्दी समझते हैं!हद है  दोगलेपन की!
पूरा लेख पढ़ने के लिये धन्यवाद।यहां तक हमने ९वें बिंदु तक का खंडन किया।आगे १०से १४वें आक्षेपों तक का खंडन किया जायेगा।कृपया अधिकाधिक शेयर करें।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र की जय।
योगेश्वर कृष्ण चंद्र जी की जय।
नोट : इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आर्यमंतव्य  टीम  या पंडित लेखराम वैदिक मिशन  उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है. |

पेरियार रचित सच्ची रामायण खंडन भाग-१३

*पेरियार रचित सच्ची रामायण खंडन भाग-१३*
*अर्थात् पेरियार द्वारा रामायण पर किये आक्षेपों का मुंहतोड़ जवाब*
-कार्तिक अय्यर
पाठकगण! सादर नमस्ते।पिछली पोस्ट में हमने दशरथ शीर्षक के पहले बिंदु का खंडन किया।अब आगे:-
*आक्षेप २* :-  किसी डॉ सोमसुद्रा बरेथियर का नाम लेकर लिखा है कि उनकी पुस्तक “कैकेयी की शुद्धता और दशरथ की नीचता” ने मौलिक कथा की कलई खोल दी।
*समीक्षा*:- *अंधी देवी के गंजे पुजारी!* जैसे आप वैसे आपके साक्षी! हमें किसी सोमसुद्रा के स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं है। हमारे लिये वाल्मीकीय रामायण ही काफी है।और उसके अनुसार दशरथ महाराज का चरित्र उत्तम था और कैकेयी ने मूर्खतापूर्ण वरदान मांगकर नीचता का परिचय दिया।जिसके लिये मात्र सुमंत्र,दशरथ,वसिष्ठ, अन्य नगर वासियों ने ही नहीं,अपितु उसके पुत्र भरत ने भी उसकी भर्त्सना की।इसके लिये अयोध्याकांड के सर्ग ७३ और ७४ का अवलोकन कीजिये।और अपने सोमसुद्रा साहब की पुस्तक को रोज़ शहद लगाकर चाटा करिये।
*आक्षेप ३* राजा दशरथ के उक्त प्रभाव से राम और उसकी मां कौसल्या अनभिज्ञ न थी।वृद्ध राजा ने राम को प्रकट रूप से बताया था कि राम राज्यतिलकोत्सव के समय कैकेयी के पुत्र भरत का अपने नाना के घर जाना शुभसंकेत है।(अध्याय १४)अयोध्या में बिना कभी वापस आये दस वर्ष के दीर्घकाल तक भरत का अपने नाना के यहां रहने का कोई आकस्मिक कारण नहीं था इत्यादि । मंथरा का उल्लेख करके लिखा है कि उसके अनुसार “दशरथ ने अपनी पूर्व निश्चित योजना द्वारा भरत को उसके नाना के यहां भेज दिया था। और कहा है कि इससे भरत अयोध्या के निवासियों की सहानुभूति पाने में असमर्थ हो गये थे। भारत की यह धारणा थी कि भारत का राज्याभिषेक के किस समय उसके नाना के यहां पठवा देने से मुझे (दशरथ को)लोगों से शत्रुता बढ़ जायेगी।
*समीक्षा* हद है! केवल सर्ग १४ लिखकर छोड़ दिया।न श्लोक लिखा न उसका अर्थ दिया।खैर! पहले इस पर चर्चा करते हैं कि राजा दशरथ ने भरत को जबरन उसके नाना के यहां भेजा था या वे अपनी इच्छा से अपने ननिहाल गये थे।देखिये:-
कस्यचित् अथ कालस्य राजा दशरधः सुतम् ॥१-७७-१५॥ भरतम् कैकेयी पुत्रम् अब्रवीत् रघुनंदन ।
अयम् केकय राजस्य पुत्रो वसति पुत्रक ॥१-७७-१६॥ त्वाम् नेतुम् आगतो वीरो युधाजित् मातुलः तव ।
श्रुत्वा दशरथस्य एतत् भरतः कैकेयि सुतः ॥१-७७-१७॥ गमनाय अभिचक्राम शत्रुघ्न सहितः तदा ।
आपृच्छ्य पितरम् शूरो रामम् च अक्लिष्ट कर्मणम् ॥१-७७-१८॥ मातॄः च अपि नरश्रेष्ट शत्रुघ्न सहितो ययौ ।
युधाजित् प्राप्य भरतम् स शत्रुघ्नम् प्रहर्षितः ॥१-७७-१९॥ स्व पुरम् प्रविवेशत् वीरः पिता तस्य तुतोष ह ।
गते च भरते रामो लक्ष्मणः च महाबलः ॥१-७७-२०॥ पितरम् देव संकाशम् पूजयामासतुः तदा ।
“कुछ काल के बाद रघुनंदन राजा दशरथ ने अपने पुत्र कैकेयीकुमार भरत से कहा-।बेटा!ये तुम्हारे मामा केकयराजकुमार युधाजित तुम्हें लेने के लिये आये हैं *और कई दिनों से यहां ठहरे हुये हैं*।” *दशरथ जी की यह बात सुनकर कैकेयीकुमार भरत ने उस समय शत्रुघ्न के साथ मामा के यहां जाने का विचार किया।वे नरश्रेष्ठ शूरवीर भरत अपने पिता राजा दशरथ,अनायास ही महान् कर्म करने वाले श्रीराम तथा सभी माताओं से पूछकर उनकी आज्ञा ले शत्रुघ्न के साथ वहां से चल दिये।शत्रुघ्न सहित भरत को साथ लेकर वीर युधाजित् ने बड़े हर्ष के साथ अपने नगर में प्रवेश किया,इससे उनके पिता को बड़ा संतोष हुआ।भरत के चले जाने के बाद महाबली श्रीराम और लक्ष्मण अपने देवेपम पिताजी की सेवा करने लगे।”
 इससे सिद्ध है कि भरत को जबरन दशरथ ने ननिहाल नहीं पठवाया।भरत के मामा युधाजित ही उनके लेने आये थे और कई दिनों तक उनसे मिलने के लिये रुके थे। वे १० वर्ष तक वहां रहें इससे आपको आपत्ति है? वे चाहे दस साल रहें या पूरा जीवन।
रहा सवाल कि “राजा ने क्यों कहा कि भरत इस नगर के बाहर अपने मामा के यहां निवास कर रहा है ,तब तक तुम्हारा अभिषेक मुझे उचित प्रतीत होता है। इसका उत्तर हैथे। अर्थात्:-
” यद्यपि भरत सदाचारी,धर्मात्मा,दयालु और जितेंद्रिय है तथापि मनुष्यों का चित्त प्रायः स्थिर नहीं रहता-ऐसा मेरा मत है।रघुनंदन!धर्मपरायण पुरुषों का भी मन विभिन्न कारणों से राग-द्वेषादिसे संयुक्त हो जाता है।२६-२७।।”
तात्पर्य यह कि राजा पूरी राजसभा में रामराज्याभिषेक की घोषणा कर चुके थे।
अयोध्या कांड सर्ग २ श्लोक १०:-
सोऽहं विश्रममिच्छामि पुत्रं कृत्वा प्रजाहिते ।
सन्निकृष्टानिमान् सर्वाननुमान्य द्विजर्षभान् ॥२-२-१०॥
अर्थात्:-” यहां बैठे इम सभी श्रेष्ठ द्विजोंकी अनुमति लेकर प्रजाजनों के हित के कार्य में अपने पुत्र श्रीराम को नियुक्त करके मैं राजकार्य से विश्राम लेना चाहता हूं।”
 दशरथ चाहते थे कि श्रीराम का अभिषेक बिना किसी विघ्न-बाधा के हो। भरत यद्यपि धर्मात्मा और श्रीराम के अनुगामी थे तो भी राग-द्वेषादिसे मनुष्य का स्वभाव बदल जाता है।नहीं तो भरतमाता कैकेयी ही भरत को राजा बनाने का हठ कर सकती थी क्यों कि वह स्वार्थी और स्वयं को बुद्धिमान समझती थी-यह स्वयं भरत ने माना है।साथ ही,भरत का ननिहाल कैकयदेश बहुत दूर और दुर्गम स्थान पर था।वहां से उन्हें आने में ही काफी समय लग जाता और शुभ घड़ी निकल जाती।इक्ष्वाकुकुल की परंपरा थी चैत्रमास में ही राज्याभिषेक होता था क्योंकि चैत्रमास ही संसवत्सर का पहला दिन है और ऋतु के भी अनुकूल है।पुष्य नक्षत्र का योग भरत के आने तक टल जाता इसलिये राजा दशरथ ने यह बात कही।अन्यथा भरत को दूर रखने का कोई कारण न था।क्योंकि भरत भी मानते थे कि इक्ष्वाकुवंश की परंपरानुसार ज्येष्ठ पुत्र ही राजा बनता है।साथ ही भरत को राजगद्दी देने की प्रतिज्ञा भी झूठी और मिलावट है यह हम सिद्ध कर चुके हैं।
रहा प्रश्न मंथरा का,तो महाशय!मंथरा जैसी कपटबुद्धि स्त्री की बात आप जैसे लोग ही मान सकते हैं। मंथरा ने कहा था कि दशरथ ने जानबूझकर भरत को ननिहाल भेज दिया ताकि वो अयोध्या की जनता ही सहानुभूति न हासिल कर सके।महाशय!यदि भरत को राजगद्दी दी जानी थी और वे राज्य के अधिकारी थे,तो फिर उनको १० वर्ष तक ननिहाल में रहने की भला क्या आवश्यकता थी?उन्हें कुछ समय ननिहाल में बिताकर बाकी समय अयोध्या में रहकर जनता का विश्वास जीतना था।पर ऐसा नहीं हुआ।इससे पुनः सिद्ध होता है कि भरत के नाना को राजा दशरथ ने कोई वचन नहीं दिया। सबसे बड़ी बात,भरत अपनी स्वेच्छा से ननिहाल गये थे।तब दशरथ पर आरोप लगाना कहां तक उचित है?अयोध्या की जनता,समस्त देशों के राजा और जनपद,मंत्रिमंडल सब चाहते थे कि श्रीराम राजा बने।मंथरा ने वो सारी बातें कैकेयी को भड़काने के लिये कहीं थीं।
और एक बात।भरत पहले से जानते थे कि दशरथ श्री राम का ही अभिषेक करेंगे,उनका नहीं।जब वे अयोध्या लौटे और महाराज के निधन का समाचार उन्हें मिला तब वे कहते हैं:-
अभिषेक्ष्यति रामम् तु राजा यज्ञम् नु यक्ष्यति ।
इति अहम् कृत सम्कल्पो हृष्टः यात्राम् अयासिषम् ॥२-७२-२७॥
“मैंने तो सोचा था कि महाराज श्रीरामजी का राज्याभिषेक करेंगे यह सोचकर मैंने हर्ष के साथ वहां से यात्रा आरंभ की थी।”
कैकयराज के वचन की बात यहां भी मिथ्या सिद्ध हुई।
यदि आप मंथरा की बात का प्रमाण मानते हैं तो क्या मंथरा द्वारा श्रीराम का गुणगान मानेंगे?-
“प्रत्यासन्नक्रमेणापि भरतस्तैव भामिनि ।
राज्यक्रमो विप्रकृष्टस्तयोस्तावत्कनीयसोः ॥२-८-७॥
विदुषः क्षत्रचारित्रे प्राज्ञस्य प्राप्तकारिणः ।८।।
(अयोध्या कांड सर्ग ७।७-८)
” उत्पत्ति के क्रम से श्रीराम के बाद ही भरत का राज्यपर अधिकार हो सकता है।लक्ष्मण और शत्रुघ्न तो छोटे भाई हैं।श्रीराम समस्त शात्रों के ज्ञाता,विशेषतः क्षत्रियचरित्र के पंडित हैं और समयोचित कर्तव्य का पालन करने वाले हैं।”
यहां मंथरा स्वयं स्वीकार कर रही है कि श्रीराम ही ज्येष्ठ होने से राज्याधिकारी हैं। यदि कोई कैकयराज वाली प्रतिज्ञा होती तो कैकेयी ऐसा न कहती ।साथ ही वो श्रीराम के गुणों का उल्लेख भी करती है।क्या पेरियार साहब मंथरा की इस बात से सहमत होंगे?
अतः राजा दशरथ ने भरत को ननिहाल भेजकर कोई छल नहीं किया। वे बूढ़े हो जाने से अपना राज्य श्रीराम को देना चाहते थे।
*आक्षेप ४* एक दिन पूर्व ही दशरथ ने अगले दिन रामराज्याभिषेक की झूठी घोषणा करवा दी।
*समीक्षा*:- या बेईमानी तेरा आसरा!क्या इसी का नाम ईमानदारी है।
*पता नहीं यों झूठ बोल कैसे रह जाते हैं जिंदा।*
*ऐसे छल पर तो स्वयं छलों का बाप भी होगा शर्मिंदा।।*
महाराज दशरथ ने एक दिन पूर्व ही अगले दिन रामराज्याभिषेक की घोषणा पूरी राजसभा एवं श्रेष्ठ मंत्रियों के समक्ष की थी।सारे नगरवासी हर्षोल्लास के साथ अलगे दिन रामराज्याभिषेक की प्रतीक्षा कर रहे थे।सुमंत्र तो इतने लालायित थे कि रातभर सोये नहीं।राजा दशरथ ने श्रीराम और मां सीता को भी कुशा पर सोने तथा उपवास रखने का उपदेश दिया था।इतना सब होने के बाद भी राज्याभिषेक की घोषणा झूठी कैसे हो गई?हां,कैकेयी ने दो वरदान मांगकर रामजी का वनवास और भरत का राज्याभिषेक वह भी उन सामग्रियों से,जो रामाभिषेक के लिये रखीं थी का वरदान मांगकर अवश्य ही घोषणा का कबाड़ा कर दिया वरना सारी अयोध्या श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी कर चुकी थी।इसे झूठा कहना दिवालियापन है।बिना प्रमाण किये आक्षेप पर अधिक न लिखते हुये केवल एक प्रमाण देते हैं:-
इति प्रत्यर्च्य तान् राजा ब्राह्मणानिद मब्रवीत् ।
वसिष्ठं वामदेवं च तेषामेवोपशृण्वताम् ॥२-३-३॥
चैत्रः श्रीमानयं मासः पुण्यः पुष्पितकाननः ।
यौवराज्याय रामस्य सर्वमेवोपकल्प्यताम् ॥२-३-४॥
यतस्त्वया प्रजाश्चेमाः स्वगुणैरनुरञ्जिताः ॥२-३-४०॥
तस्मात्त्वं पुष्ययोगेन यौवराज्यमवाप्नुहि ।४१।।
(अयोध्या कांड सर्ग ३ )
 “राजासभा में उपस्थित सभी सभासदों की प्रत्यर्चना करके(ज्ञात हो कि इसके पूर्व के सर्ग में राजा दशरथ राजसभा में श्रीराम के राज्याभिषेक की चर्चा करते हैं और सभी श्रीराम के राज्याभिषेक के लिये खुशी खुशी हामी भर देते हैं,इस विषय को आगे विस्तृत करेंगे) राजा दशरथ वामदेव,वसिष्ठ आदि श्रेष्ठ ब्राह्मणों से बोले-“यह चैत्रमास अत्यंत श्रेष्ठ और पुण्यदायक है।इसमें वन-उपवन पुष्पित हो जाते हैं।अतः इसी मास में श्रीराम के राज्याभिषेक के लिये उपयुक्त है।
राजा दशरथ श्रीराम से कहते हैं-” हे राम!प्रजा तुम्हारे सारे गुणों के कारण तुमको राजा बनाना चाहती है।कल पुष्य नक्षत्र के समय तुम्हारा राज्याभिषेक होगा।”
इससे सिद्ध है कि अगले दिव राज्यतिलकोत्सव की घोषणा करना झूठ नहीं था।पूरी राजसभा,मंत्रियों और अयोध्यावासियों को इसका पता था और धूमधाम से राज्याभिषेक की तैयारी कर रही थी।
*आक्षेप ५* यद्यपि वसिष्ठ व अन्य गुरुजन भली भांति और स्पष्टतया जानते थे कि भरत राजगद्दी का उत्तराधिकारी है-तो भी चतुर,धूर्त व ठग लोग राम को गद्दी देने की मिथ्या हामी भर रहे थे।
*समीक्षा*:- वसिष्ठ आदि गुरुजन सत्यवादी,नीतिज्ञ एवं ज्ञानी थे।उनका चरित्र चित्रण हम पीछे कर चुके हैं।भरत राजगद्दी के अधिकारी नहीं थे और श्रीराम ज्येष्ठ पुत्र होने से सर्वथा राज्याधिकारी थे-यह बात महर्षि वसिष्ठ और सुमंत्र जानते थे।इसका प्रमाण बिंदु १ के उत्तर में दे चुके हैं।कोई भी मंत्री या ऋत्विक भरत के राज्याधिकारी होने की बात नहीं करता।सब यही कहते हैं कि श्रीराम ही राज्याधिकारी हैं।भरत को राजगद्दी वाले वचन का प्रक्षिप्त होना हम बिंदु १ में सिद्ध कर चुके हैं। वाह महाराज! धूर्त,ठग और जाने क्या क्या!बड़े मधुर शब्दों की अमृत वर्षा की है आपने।आपके दिये पुष्प हम आपकी ही झोली में डालते हैं।ऐसा प्रमाणहीन और निराधार बातें करते और गालियां देते आपको लज्जा नहीं आती!शोक है!
क्रमशः ।
पाठकगण! पूरी पोस्ट पढ़ने के लिये धन्यवाद।कृपया अधिकाधिक शेयर करें।
यहां तक हम पांचवे आक्षेप तक समीक्षा कर चुके हैं।अगले लेख में आगे के ६-९ बिंदुओं का खंडन करेंगे।
नमस्ते।
मर्यादा पुरुषोत्तम सियावर श्रीरामचंद्र की जय।
योगेश्वर कृष्ण चंद्र जी की जय।
।।ओ३म्।।
*पेरियार रचित सच्ची रामायण की पोलखोल भाग-१४*
*अर्थात् पेरियार द्वारा रामायण पर किये आक्षेपों का मुंहतोड़ जवाब*
*-कार्तिक अय्यर*
नमस्ते मित्रों! पेरियार साहब के खंडन के १४वें भाग में आपका स्वागत है।आगे दशरथ नामक लेख के ६वें बिंदु के आगे जवाब दिया जायेगा।
*आक्षेप-६* राम की मां कौसल्या भी अपने देवी-देवता को मनाया करती थी कि मेरे पुत्र राम को राजगद्दी मिले।
*समीक्षा*- हम चकित हैं कि पेरियार साहब कैसे बेहूदे आक्षेप लगा रहे हैं!श्रीराम की मां देवी कौसल्या काल्पनिक देवी देवताओं से नहीं,परमदेव परमेश्वर की पूजा करती थीं।वे परमदेव परमात्मा से प्रार्थना करती थीं कि श्रीराम राजा बने तो इसमें हर्ज क्या है?कोई भी मां अपने पुत्र का हित ही चाहेगी।केवल मां ही नहीं,अपितु महाराज दशरथ, समस्त प्रजा और राजा आदि सब चाहते थे कि श्रीराम राजा बनें।इसमें भला आक्षेप योग्य कौन सी बात है?आक्षेप तो तब होता जब देवी कौसल्या भरत के अहित के लिये परमात्मा से प्रार्थना करतीं।परंतु उनका चरित्र ऐसा न था।
*आक्षेप ७*- पुरोहितों और पंडितों को सूचना तथा उनके परामर्श के बिना और कैकेयी, भरत,शत्रुघ्न आदि को बिना आमंत्रित किये बिना दशरथ ने राजातिलक का शीघ्र प्रतिबंध कर दिया(अयोध्याकांड अध्याय १)
*समीक्षा*-हे परमेश्वर! ये झूठ-धोखा आखिर कब तक चलेगा?ये धूर्त मिथ्यीवादी कब तक तांडव करते रहेंगे!क्या इन पर तेरे न्याय का डंडा न चलेगा?अवश्य ही चलेगा और ये लोग भागते दिखेंगे।
यदि दशरथ जी ने किसी को आमंत्रित नहीं किया था तो क्या समारोह ऐसे ही आयोजित हो गया?आपने कभी वाल्मीकीय रामायण की सूरत भी देखी है? रामायण में अध्याय नहीं सर्गों का विभाग है। अयोध्या कांड के प्रथम सर्ग को ही पढ़ लेते तो ये आक्षेप न करते।
प्रथम सर्ग में पूरा वर्णन है कि किस तरह महाराज दशरथ ने समस्त मंत्रिमंडल और अनेक राजाओं को राजसभा में आमंत्रित करके श्रीराम के राज्याभिषेक की घोषणा की।लीजिये,अवलोकन कीजिये:-
इत्येवं विविधैस्तैस्तैरन्यपार्थिवदुर्लभैः ।
शिष्टैरपरिमेयैश्च लोके लोकोत्तरैर्गुणैः ॥ ४१ ॥
तं समीक्ष्य महाराजो युक्तं समुदितैः गुणैः ।
निश्चित्य सचिवैः सार्धं यौवराज्यममन्यत ॥ ४२ ॥
इस प्रकार से विचार करके तथा अपने पुत्र श्रीराम इनके नाना प्रकारके विलक्षण, सज्जनोचित, असंख्य और लोकोत्तर गुणों से, जो अन्य राजाओं में दुर्लभ थे, विभूषित देखकर राजा दशरथा मंत्रियों के बराबर सलाह करके उनको युवराज बनाने का निश्चय किया ॥४१-४२॥
दिव्यन्तरिक्षे भूमौ च घोरमुत्पातजं भयम् ।
संचचक्षेऽथ मेधावी शरीरे चात्मनो जराम् ॥ ४३ ॥
बुद्धिमान महाराज दशरथने मंत्रियों को स्वर्ग, अंतरिक्ष तथा भूतल पर दृष्टिगोचर होनेवाले उत्पातोंके घोर भय सूचित किये और आपने शरीर में वृद्धावस्था के आगमन की बात बताई. ॥४३॥
पूर्णचन्द्राननस्याथ शोकापनुदमात्मनः ।
लोके रामस्य बुबुधे सम्प्रियत्वं महात्मनः ॥ ४४ ॥
पूर्ण चंद्रमा के समान मनोहर मुख वाले महात्मा श्रीराम समस्त प्रजा को  प्रिय थे। लोक में उनके सर्वप्रिय थे। राजाके आंतरिक शोक को दूर करनेवाले थे ये बातें राजाने अच्छे से जानी थीं॥४४॥
आत्मनश्च प्रजानां च श्रेयसे च प्रियेण च ।
प्राप्तकालेन धर्मात्मा भक्त्या त्वरितवान् नृपः ॥ ४५ ॥
तब उपयुक्त समय आनेपर धर्मात्मा राजा दशरथने अपने और प्रजाके कल्याण के लिये मंत्रियों को श्रीरामाके राज्याभिषेक के लिये शीघ्र तैयारी करने की आज्ञा दी। इस उतावलेपन के कारण उनके हृदय के प्रेम और प्रजाके अनुराग ही कारण था ॥४५॥
नानानगरवास्तव्यान् पृथग्जानपदानपि ।
समानिनाय मेदिन्यां प्रधानान् पृथिवीपतिः ॥ ४६ ॥
उन भूपालों ने भिन्न भिन्न नगरों में निवास करनेवाले प्रधान- प्रधान पुरूषों को  तथा अन्य जनपदों के सामंत राजाओं को  मंत्रियों के  द्वारा अयोध्या में  बुला लिया॥४६॥
(अयोध्या कांड सर्ग १)
इसके आगे महाराज दशरथ सबको संबोधित करते हैं और स्वयं राज्य त्यागकर श्रीराम के राज्याभिषेक की घोषणा की:-
अनुजातो हि मां सर्वैर्गुणैः श्रेष्ठो ममात्मजः ।
पुरन्दरसमो वीर्ये रामः परपुरञ्जयः ॥ ११ ॥
मेरे पुत्र श्रीराम मुझसे भी  सर्व गुणों में श्रेष्ठ हैं।शत्रुओं के नगरों पर विजय प्राप्त करने वाले श्रीराम बल-पराक्रम में देवराज इंद्र समान हैं ॥११॥
तं चन्द्रमिव पुष्येण युक्तं धर्मभृतां वरम् ।
यौवराज्ये नियोक्तास्मि प्रीतः पुरुषपुङ्‍गवम् ॥ १२ ॥
पुष्य- नक्षत्रसे युक्त चंद्रमाके समान समस्त कार्य साधनमें कुशल तथा धर्मात्माओं में श्रेष्ठ उन पुरुषश्रेष्ठ रामको मैं कल प्रातःकाल पुष्य नक्षत्र में युवराजका पद पर नियुक्त करूंगा॥१२॥
(अयोध्या कांड सर्ग २)
*आक्षेप ८*- आगे अयोध्याकांड अध्याय १४ का संदर्भ देकर लिखा है कि दशरथ ने राम से गुप्त रुप से कहा था कि भारत के लौट आने के पहले राम का राज्याभिषेक हो जाए तो भारत शांतिपूर्वक इसे जो पहले हो चुका है स्वीकार कर लेगा इत्यादि।
*समीक्षा*- बेईमानी की हद कर दी! अयोध्या कांड सर्ग १४ में न तो श्रीराम से राजा दशरथ श्रीराम से आपके लिखी बात कहते हैं न उसमें भरत का जिक्र करते हैं।इस सर्ग में कैकेयी ,जो अपने वचन मान चुकी है,उन्हें मनवाने के लिये कटिबद्ध है।वो कई तरह के कटुवचन कहकर राजा दशरथ को संतप्त करती है।फिर सुमंत्र आकर राजा दशरथ को राम राज्याभिषेक की पूरी तैयार होने का समाचार देते हैं।यहां आपके कपोलकल्पित लेख का कोई निशान नहीं है।हां,यह ठीक है कि इसके पहले राजा दशरथ श्रीराम से कहते हैं कि “यद्यपि भरत धर्मात्मा और बड़े भाई का अनुगामी है,फिर भी मनुष्यों का चित्त प्रायः स्थिर नहीं रहता।इसलिये अपना राज्याभिषेक शीघ्रातिशीघ्र करा लो।”इसका स्पष्टीकरण पहले दे चुके हैं।
*आक्षेप ९*- कैकई ने हठ किया कि उसका पुत्र राजा बनाया जाए और इसकी सुरक्षा का विश्वास दिलाने के लिए राम को वनवास भेज दिया जाए- तो दशरथ उसे मनाने के लिए उसके पैरों पर गिर पड़ा और  उस से प्रार्थना करने लगा कि ” मैं तुम्हारी इच्छानुसार कोई भी तुच्छतम कार्य करने के लिए तैयार हूं- राम को वनवास भेजने का हठ न करो।(अयोध्याकांड सर्ग १२)
*समीक्षा*-  राजा दशरथ ने कैकेयी द्वारा देवासुर संग्राम में अपनी प्राणरक्षा के कारण उसे दो वरदान दिये थे।उसने दो वरदानों द्वारा भरत का राज्याभिषेक तथा श्रीराम का वनवास मांगा।कैकेयी ने समस्त प्रजा,मंत्रिमंडल की मंशा के विरूद्ध श्रीराम का वनवास और भरत का राज्याभिषेक मांगा,ये वरदानों का मूर्खतापूर्ण प्रयेग किया।राजा दशरथ अपने रामराज्याभिषेक की घोषणा के विरुद्ध वरदान देने को राजी नहीं हुये।राजा दशरथ ने कैकेयी को मनाने की बहुत कोशिश की,पर वो नहीं मानी।
अञ्जलिं कुर्मि कैकेयि पादौ चापि स्पृशामि ते ।
शरणं भव रामस्य माधर्मो मामिह स्पृशेत् ॥ ३६ ॥
कैकेयी ! मैं हाथ  जोड़ता हूं और तेरे पैर पड़ता हूं।तू राम को  शरण दे।जिसके कारण  मुझे पाप नहीं लगेगा॥३६॥(अयोध्या कांड सर्ग १२)
यहां राजा दशरथ ने अनुनय-विनय के लिये मुहावरे के रूप में कहा।जैसे कहा जाता है कि,”मैं तेरे हाथ जोड़ता हूं,पैर पड़ता हूं।”पर सत्य में कोई पैर नहीं पकड़ता।वैसा ही यहां समझें।और यदि राजा दशरथ ने कैकेयी के पैर सचमें पड़ भी लिये तो भी कौन सी महाप्रलय आ गई?राजा दशरथ उस समय राजा नही,एक पति थे।यदि वे अपनी पत्नी के पांव भी पड़ ले तो क्या बुरा है?भारतीय संस्कृति में पति-पत्नी एक-दूसरे के आधे शरीर माने जाते हैं।यदि पति पत्नी के और पत्नी पति के पांव पड़ें तो आपके हर्ज क्या है? एक तो आप जैसे लोग महिला-उत्थान का,स्त्रियों के अधिकारों की बात करते हैं और राजा दशरथ का अपनी पत्नी के पांव पड़ना नामर्दी समझते हैं!हद है  दोगलेपन की!
पूरा लेख पढ़ने के लिये धन्यवाद।यहां तक हमने ९वें बिंदु तक का खंडन किया।आगे १०से १४वें आक्षेपों तक का खंडन किया जायेगा।कृपया अधिकाधिक शेयर करें।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र की जय।
योगेश्वर कृष्ण चंद्र जी की जय।

नोट : इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आर्यमंतव्य  टीम  या पंडित लेखराम वैदिक मिशन  उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है. |

*पेरियार रचित सच्ची रामायण खंडन भाग-१२*

*पेरियार रचित सच्ची रामायण खंडन भाग-१२*
*अर्थात् पेरियार द्वारा रामायण पर किये आक्षेपों का मुंहतोड़ जवाब*
-कार्तिक अय्यर
पाठकगण! सादर नमस्ते।पिछली पोस्ट में हमने दशरथ शीर्षक के पहले बिंदु का खंडन किया।अब आगे:-
*आक्षेप २* :-  किसी डॉ सोमसुद्रा बरेथियर का नाम लेकर लिखा है कि उनकी पुस्तक “कैकेयी की शुद्धता और दशरथ की नीचता” ने मौलिक कथा की कलई खोल दी।
*समीक्षा*:- *अंधी देवी के गंजे पुजारी!* जैसे आप वैसे आपके साक्षी! हमें किसी सोमसुद्रा के स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं है। हमारे लिये वाल्मीकीय रामायण ही काफी है।और उसके अनुसार दशरथ महाराज का चरित्र उत्तम था और कैकेयी ने मूर्खतापूर्ण वरदान मांगकर नीचता का परिचय दिया।जिसके लिये मात्र सुमंत्र,दशरथ,वसिष्ठ, अन्य नगर वासियों ने ही नहीं,अपितु उसके पुत्र भरत ने भी उसकी भर्त्सना की।इसके लिये अयोध्याकांड के सर्ग ७३ और ७४ का अवलोकन कीजिये।और अपने सोमसुद्रा साहब की पुस्तक को रोज़ शहद लगाकर चाटा करिये।
*आक्षेप ३* राजा दशरथ के उक्त प्रभाव से राम और उसकी मां कौसल्या अनभिज्ञ न थी।वृद्ध राजा ने राम को प्रकट रूप से बताया था कि राम राज्यतिलकोत्सव के समय कैकेयी के पुत्र भरत का अपने नाना के घर जाना शुभसंकेत है।(अध्याय १४)अयोध्या में बिना कभी वापस आये दस वर्ष के दीर्घकाल तक भरत का अपने नाना के यहां रहने का कोई आकस्मिक कारण नहीं था इत्यादि । मंथरा का उल्लेख करके लिखा है कि उसके अनुसार “दशरथ ने अपनी पूर्व निश्चित योजना द्वारा भरत को उसके नाना के यहां भेज दिया था। और कहा है कि इससे भरत अयोध्या के निवासियों की सहानुभूति पाने में असमर्थ हो गये थे। भारत की यह धारणा थी कि भारत का राज्याभिषेक के किस समय उसके नाना के यहां पठवा देने से मुझे (दशरथ को)लोगों से शत्रुता बढ़ जायेगी।
*समीक्षा* हद है! केवल सर्ग १४ लिखकर छोड़ दिया।न श्लोक लिखा न उसका अर्थ दिया।खैर! पहले इस पर चर्चा करते हैं कि राजा दशरथ ने भरत को जबरन उसके नाना के यहां भेजा था या वे अपनी इच्छा से अपने ननिहाल गये थे।देखिये:-
कस्यचित् अथ कालस्य राजा दशरधः सुतम् ॥१-७७-१५॥ भरतम् कैकेयी पुत्रम् अब्रवीत् रघुनंदन ।
अयम् केकय राजस्य पुत्रो वसति पुत्रक ॥१-७७-१६॥ त्वाम् नेतुम् आगतो वीरो युधाजित् मातुलः तव ।
श्रुत्वा दशरथस्य एतत् भरतः कैकेयि सुतः ॥१-७७-१७॥ गमनाय अभिचक्राम शत्रुघ्न सहितः तदा ।
आपृच्छ्य पितरम् शूरो रामम् च अक्लिष्ट कर्मणम् ॥१-७७-१८॥ मातॄः च अपि नरश्रेष्ट शत्रुघ्न सहितो ययौ ।
युधाजित् प्राप्य भरतम् स शत्रुघ्नम् प्रहर्षितः ॥१-७७-१९॥ स्व पुरम् प्रविवेशत् वीरः पिता तस्य तुतोष ह ।
गते च भरते रामो लक्ष्मणः च महाबलः ॥१-७७-२०॥ पितरम् देव संकाशम् पूजयामासतुः तदा ।
“कुछ काल के बाद रघुनंदन राजा दशरथ ने अपने पुत्र कैकेयीकुमार भरत से कहा-।बेटा!ये तुम्हारे मामा केकयराजकुमार युधाजित तुम्हें लेने के लिये आये हैं *और कई दिनों से यहां ठहरे हुये हैं*।” *दशरथ जी की यह बात सुनकर कैकेयीकुमार भरत ने उस समय शत्रुघ्न के साथ मामा के यहां जाने का विचार किया।वे नरश्रेष्ठ शूरवीर भरत अपने पिता राजा दशरथ,अनायास ही महान् कर्म करने वाले श्रीराम तथा सभी माताओं से पूछकर उनकी आज्ञा ले शत्रुघ्न के साथ वहां से चल दिये।शत्रुघ्न सहित भरत को साथ लेकर वीर युधाजित् ने बड़े हर्ष के साथ अपने नगर में प्रवेश किया,इससे उनके पिता को बड़ा संतोष हुआ।भरत के चले जाने के बाद महाबली श्रीराम और लक्ष्मण अपने देवेपम पिताजी की सेवा करने लगे।”
 इससे सिद्ध है कि भरत को जबरन दशरथ ने ननिहाल नहीं पठवाया।भरत के मामा युधाजित ही उनके लेने आये थे और कई दिनों तक उनसे मिलने के लिये रुके थे। वे १० वर्ष तक वहां रहें इससे आपको आपत्ति है? वे चाहे दस साल रहें या पूरा जीवन।
रहा सवाल कि “राजा ने क्यों कहा कि भरत इस नगर के बाहर अपने मामा के यहां निवास कर रहा है ,तब तक तुम्हारा अभिषेक मुझे उचित प्रतीत होता है। इसका उत्तर हैथे। अर्थात्:-
” यद्यपि भरत सदाचारी,धर्मात्मा,दयालु और जितेंद्रिय है तथापि मनुष्यों का चित्त प्रायः स्थिर नहीं रहता-ऐसा मेरा मत है।रघुनंदन!धर्मपरायण पुरुषों का भी मन विभिन्न कारणों से राग-द्वेषादिसे संयुक्त हो जाता है।२६-२७।।”
तात्पर्य यह कि राजा पूरी राजसभा में रामराज्याभिषेक की घोषणा कर चुके थे।
अयोध्या कांड सर्ग २ श्लोक १०:-
सोऽहं विश्रममिच्छामि पुत्रं कृत्वा प्रजाहिते ।
सन्निकृष्टानिमान् सर्वाननुमान्य द्विजर्षभान् ॥२-२-१०॥
अर्थात्:-” यहां बैठे इम सभी श्रेष्ठ द्विजोंकी अनुमति लेकर प्रजाजनों के हित के कार्य में अपने पुत्र श्रीराम को नियुक्त करके मैं राजकार्य से विश्राम लेना चाहता हूं।”
 दशरथ चाहते थे कि श्रीराम का अभिषेक बिना किसी विघ्न-बाधा के हो। भरत यद्यपि धर्मात्मा और श्रीराम के अनुगामी थे तो भी राग-द्वेषादिसे मनुष्य का स्वभाव बदल जाता है।नहीं तो भरतमाता कैकेयी ही भरत को राजा बनाने का हठ कर सकती थी क्यों कि वह स्वार्थी और स्वयं को बुद्धिमान समझती थी-यह स्वयं भरत ने माना है।साथ ही,भरत का ननिहाल कैकयदेश बहुत दूर और दुर्गम स्थान पर था।वहां से उन्हें आने में ही काफी समय लग जाता और शुभ घड़ी निकल जाती।इक्ष्वाकुकुल की परंपरा थी चैत्रमास में ही राज्याभिषेक होता था क्योंकि चैत्रमास ही संसवत्सर का पहला दिन है और ऋतु के भी अनुकूल है।पुष्य नक्षत्र का योग भरत के आने तक टल जाता इसलिये राजा दशरथ ने यह बात कही।अन्यथा भरत को दूर रखने का कोई कारण न था।क्योंकि भरत भी मानते थे कि इक्ष्वाकुवंश की परंपरानुसार ज्येष्ठ पुत्र ही राजा बनता है।साथ ही भरत को राजगद्दी देने की प्रतिज्ञा भी झूठी और मिलावट है यह हम सिद्ध कर चुके हैं।
रहा प्रश्न मंथरा का,तो महाशय!मंथरा जैसी कपटबुद्धि स्त्री की बात आप जैसे लोग ही मान सकते हैं। मंथरा ने कहा था कि दशरथ ने जानबूझकर भरत को ननिहाल भेज दिया ताकि वो अयोध्या की जनता ही सहानुभूति न हासिल कर सके।महाशय!यदि भरत को राजगद्दी दी जानी थी और वे राज्य के अधिकारी थे,तो फिर उनको १० वर्ष तक ननिहाल में रहने की भला क्या आवश्यकता थी?उन्हें कुछ समय ननिहाल में बिताकर बाकी समय अयोध्या में रहकर जनता का विश्वास जीतना था।पर ऐसा नहीं हुआ।इससे पुनः सिद्ध होता है कि भरत के नाना को राजा दशरथ ने कोई वचन नहीं दिया। सबसे बड़ी बात,भरत अपनी स्वेच्छा से ननिहाल गये थे।तब दशरथ पर आरोप लगाना कहां तक उचित है?अयोध्या की जनता,समस्त देशों के राजा और जनपद,मंत्रिमंडल सब चाहते थे कि श्रीराम राजा बने।मंथरा ने वो सारी बातें कैकेयी को भड़काने के लिये कहीं थीं।
और एक बात।भरत पहले से जानते थे कि दशरथ श्री राम का ही अभिषेक करेंगे,उनका नहीं।जब वे अयोध्या लौटे और महाराज के निधन का समाचार उन्हें मिला तब वे कहते हैं:-
अभिषेक्ष्यति रामम् तु राजा यज्ञम् नु यक्ष्यति ।
इति अहम् कृत सम्कल्पो हृष्टः यात्राम् अयासिषम् ॥२-७२-२७॥
“मैंने तो सोचा था कि महाराज श्रीरामजी का राज्याभिषेक करेंगे यह सोचकर मैंने हर्ष के साथ वहां से यात्रा आरंभ की थी।”
कैकयराज के वचन की बात यहां भी मिथ्या सिद्ध हुई।
यदि आप मंथरा की बात का प्रमाण मानते हैं तो क्या मंथरा द्वारा श्रीराम का गुणगान मानेंगे?-
“प्रत्यासन्नक्रमेणापि भरतस्तैव भामिनि ।
राज्यक्रमो विप्रकृष्टस्तयोस्तावत्कनीयसोः ॥२-८-७॥
विदुषः क्षत्रचारित्रे प्राज्ञस्य प्राप्तकारिणः ।८।।
(अयोध्या कांड सर्ग ७।७-८)
” उत्पत्ति के क्रम से श्रीराम के बाद ही भरत का राज्यपर अधिकार हो सकता है।लक्ष्मण और शत्रुघ्न तो छोटे भाई हैं।श्रीराम समस्त शात्रों के ज्ञाता,विशेषतः क्षत्रियचरित्र के पंडित हैं और समयोचित कर्तव्य का पालन करने वाले हैं।”
यहां मंथरा स्वयं स्वीकार कर रही है कि श्रीराम ही ज्येष्ठ होने से राज्याधिकारी हैं। यदि कोई कैकयराज वाली प्रतिज्ञा होती तो कैकेयी ऐसा न कहती ।साथ ही वो श्रीराम के गुणों का उल्लेख भी करती है।क्या पेरियार साहब मंथरा की इस बात से सहमत होंगे?
अतः राजा दशरथ ने भरत को ननिहाल भेजकर कोई छल नहीं किया। वे बूढ़े हो जाने से अपना राज्य श्रीराम को देना चाहते थे।
*आक्षेप ४* एक दिन पूर्व ही दशरथ ने अगले दिन रामराज्याभिषेक की झूठी घोषणा करवा दी।
*समीक्षा*:- या बेईमानी तेरा आसरा!क्या इसी का नाम ईमानदारी है।
*पता नहीं यों झूठ बोल कैसे रह जाते हैं जिंदा।*
*ऐसे छल पर तो स्वयं छलों का बाप भी होगा शर्मिंदा।।*
महाराज दशरथ ने एक दिन पूर्व ही अगले दिन रामराज्याभिषेक की घोषणा पूरी राजसभा एवं श्रेष्ठ मंत्रियों के समक्ष की थी।सारे नगरवासी हर्षोल्लास के साथ अलगे दिन रामराज्याभिषेक की प्रतीक्षा कर रहे थे।सुमंत्र तो इतने लालायित थे कि रातभर सोये नहीं।राजा दशरथ ने श्रीराम और मां सीता को भी कुशा पर सोने तथा उपवास रखने का उपदेश दिया था।इतना सब होने के बाद भी राज्याभिषेक की घोषणा झूठी कैसे हो गई?हां,कैकेयी ने दो वरदान मांगकर रामजी का वनवास और भरत का राज्याभिषेक वह भी उन सामग्रियों से,जो रामाभिषेक के लिये रखीं थी का वरदान मांगकर अवश्य ही घोषणा का कबाड़ा कर दिया वरना सारी अयोध्या श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी कर चुकी थी।इसे झूठा कहना दिवालियापन है।बिना प्रमाण किये आक्षेप पर अधिक न लिखते हुये केवल एक प्रमाण देते हैं:-
इति प्रत्यर्च्य तान् राजा ब्राह्मणानिद मब्रवीत् ।
वसिष्ठं वामदेवं च तेषामेवोपशृण्वताम् ॥२-३-३॥
चैत्रः श्रीमानयं मासः पुण्यः पुष्पितकाननः ।
यौवराज्याय रामस्य सर्वमेवोपकल्प्यताम् ॥२-३-४॥
यतस्त्वया प्रजाश्चेमाः स्वगुणैरनुरञ्जिताः ॥२-३-४०॥
तस्मात्त्वं पुष्ययोगेन यौवराज्यमवाप्नुहि ।४१।।
(अयोध्या कांड सर्ग ३ )
 “राजासभा में उपस्थित सभी सभासदों की प्रत्यर्चना करके(ज्ञात हो कि इसके पूर्व के सर्ग में राजा दशरथ राजसभा में श्रीराम के राज्याभिषेक की चर्चा करते हैं और सभी श्रीराम के राज्याभिषेक के लिये खुशी खुशी हामी भर देते हैं,इस विषय को आगे विस्तृत करेंगे) राजा दशरथ वामदेव,वसिष्ठ आदि श्रेष्ठ ब्राह्मणों से बोले-“यह चैत्रमास अत्यंत श्रेष्ठ और पुण्यदायक है।इसमें वन-उपवन पुष्पित हो जाते हैं।अतः इसी मास में श्रीराम के राज्याभिषेक के लिये उपयुक्त है।
राजा दशरथ श्रीराम से कहते हैं-” हे राम!प्रजा तुम्हारे सारे गुणों के कारण तुमको राजा बनाना चाहती है।कल पुष्य नक्षत्र के समय तुम्हारा राज्याभिषेक होगा।”
इससे सिद्ध है कि अगले दिव राज्यतिलकोत्सव की घोषणा करना झूठ नहीं था।पूरी राजसभा,मंत्रियों और अयोध्यावासियों को इसका पता था और धूमधाम से राज्याभिषेक की तैयारी कर रही थी।
*आक्षेप ५* यद्यपि वसिष्ठ व अन्य गुरुजन भली भांति और स्पष्टतया जानते थे कि भरत राजगद्दी का उत्तराधिकारी है-तो भी चतुर,धूर्त व ठग लोग राम को गद्दी देने की मिथ्या हामी भर रहे थे।
*समीक्षा*:- वसिष्ठ आदि गुरुजन सत्यवादी,नीतिज्ञ एवं ज्ञानी थे।उनका चरित्र चित्रण हम पीछे कर चुके हैं।भरत राजगद्दी के अधिकारी नहीं थे और श्रीराम ज्येष्ठ पुत्र होने से सर्वथा राज्याधिकारी थे-यह बात महर्षि वसिष्ठ और सुमंत्र जानते थे।इसका प्रमाण बिंदु १ के उत्तर में दे चुके हैं।कोई भी मंत्री या ऋत्विक भरत के राज्याधिकारी होने की बात नहीं करता।सब यही कहते हैं कि श्रीराम ही राज्याधिकारी हैं।भरत को राजगद्दी वाले वचन का प्रक्षिप्त होना हम बिंदु १ में सिद्ध कर चुके हैं। वाह महाराज! धूर्त,ठग और जाने क्या क्या!बड़े मधुर शब्दों की अमृत वर्षा की है आपने।आपके दिये पुष्प हम आपकी ही झोली में डालते हैं।ऐसा प्रमाणहीन और निराधार बातें करते और गालियां देते आपको लज्जा नहीं आती!शोक है!
क्रमशः ।
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यहां तक हम पांचवे आक्षेप तक समीक्षा कर चुके हैं।अगले लेख में आगे के ६-९ बिंदुओं का खंडन करेंगे।
नमस्ते।
मर्यादा पुरुषोत्तम सियावर श्रीरामचंद्र की जय।
योगेश्वर कृष्ण चंद्र जी की जय।
।।ओ३म्।।

नोट : इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आर्यमंतव्य  टीम  या पंडित लेखराम वैदिक मिशन  उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है. |