Category Archives: पाखण्ड खंडिनी

स्वामी दयानन्द सरस्वती जी की मूर्ति सही या गलत : आचार्य सोमदेव जी

जिज्ञासा  समाधान – ११९

– आचार्य सोमदेव

जिज्ञासा:- आदरणीय सम्पादक महोदय सादर नमस्ते। निवेदन यह है कि मैंने आर्य समाज मन्दिर में महर्षि दयानन्द जी का एक स्टेचू (बुत) जो केवल मुँह और गर्दन का है जिसका रंग गहरा ब्राउन है, रखा देखा है। पूछने पर पता चला कि यह किसी ने उपहार में दिया है। आप कृपया स्पष्ट करें कि क्या महर्षि का स्टेचू भेंट में लेना, बनाना और भेंट देना आर्य समाज के सिद्धान्त के अनुरूप है? जहाँ तक मेरा मानना है महर्षि ने अपनी प्रतिमा बनाने की सख्त मनाही की थी। कृपया स्पष्ट करें।

धन्यवाद, सादर।

– डॉ. पाल

समाधान:- महर्षि दयानन्द ने अपने जीवन मेंं कभी सिद्धान्तों से समझौता नहीं किया। वे वेद की मान्यतानुसार अपने जीवन को चला रहे थे और सम्पूर्ण विश्व को भी वेद की मान्यता के प्रति लाना चाहते थे। वेद ईश्वर का ज्ञान होने से वह सदा निभ्र्रान्त ज्ञान रहता है, उसमें किसी भी प्रकार के पाखण्ड अन्धविश्वास का लेश भी नहीं है। वेद ही ईश्वर, धर्म, न्याय आदि के विशुद्ध रूप को दर्शाता है। वेद में परमेश्वर को सर्वव्यापक व निराकार कहा है। प्रतिमा पूजन का वेद में किसी भी प्रकार का संकेत नहीं है। महर्षि दयानन्द ने वेद को सर्वोपरि रखा है। महर्षि दयानन्द समाज की अवनति का एक बड़ा कारण निराकार ईश्वर की उपासना के स्थापना पर प्रतिमा पूजन को मानते हैं। जब से विशुद्ध ईश्वर को छोड़ प्रतिमा पूजन चला है तभी से मानव समाज कहीं न कहीं अन्धविश्वास और पाखण्ड में फँसता चला गया। जिस मनुष्य समुदाय में पाखण्ड अन्धविश्वास होता है वह समुदाय धर्म भीरु और विवेक शून्य होता चला जाता है। सृष्टि विरुद्ध मान्यताएँ चल पड़ती हैं, स्वार्थी लोग ऐसा होने पर भोली जनता का शोषण करना आरम्भ कर देते हैं।

महर्षि दयानन्द और अन्य मत सम्प्रदाय में एक बहुत बड़ा मौलिक भेद है। महर्षि व्यक्ति पूजा से बहुत दूर हैं और अन्य मत वालों का सम्प्रदाय टिका ही व्यक्ति पूजा पर है। महर्षि ईश्वर की प्रतिमा और मनुष्य आदि की प्रतिमा पूजन का विरोध करते हैं, किन्तु अन्य मत वाले इस काम से ही द्रव्य हरण करते हैं। इस व्यक्ति पूजा के कारण समाज में अनेक प्रकार के अनर्थ हो रहे हैं। इसी कारण बहुत से अयोग्य लोग गुरु बनकर अपनी पूजा करवा रहे हैं। जीते जी तो अपनी पूजा व अपने चित्र की भी पूजा करवाते ही हैं, मरने के बाद भी अपनी पूजा करवाने की बात करते हैं और भोली जनता ऐसा करती भी है। इससे अनेक प्रकार के अनर्थ प्रारम्भ हो जाते हैं। महर्षि दयानन्द ने जो अपना चित्र न लगाने की बात कही है, वह इसी अनर्थ को देखते हुए कही है। महर्षि विचारते थे कि इन प्रतिमा पूजकों से प्रभावित हो मेेरे चित्र की भी पूजा आरम्भ न कर दें। इसी आशंका के कारण महर्षि ने अपने चित्र लगाने का निषेध किया था।

यदि हम आर्य महर्षि के सिद्धान्तों के अनुसार चल रहे हैं, प्रतिमा पूजन आदि नहीं कर रहे हैं तो महर्षि के चित्र आदि लगाए जा सकते हैं रखे जा सकते हैं। चित्र वा मूर्ति रखना अपने आप में कोई दोष नहीं है। दोष तो उनकी पूजा आदि करने में हैं। महर्षि मूर्ति के विरोधी नहीं थे, महर्षि का विरोध तो उसकी पूजा करने से था। यदि महर्षि केवल चित्र वा मूर्ति के विरोधी होते तो अपने जीवन काल में इनको तुड़वा चुके होते, किन्तु महर्षि के जीवन से ऐसा कहीं भी प्रकट नहीं होता कि कहीं महर्षि दयानन्द ने मूर्तियों को तुड़वाया हो। अपितु यह अवश्य वर्णन मिलता है कि जिस समय महर्षि फर्रुखाबाद में थे, उस समय फर्रुखाबाद बाजार की नाप हो रही थी। सडक़ के बीच में एक छोटा-सा मन्दिर था, जिसमें लोग धूप दीप जलाया करते थे। बाबू मदनमोहन लाल वकील ने स्वामी जी से कहा कि मैजिस्ट्रेट आपके भक्त हैं, उनसे कहकर इस मठिया को सडक़ पर से हटवा दीजिये। स्वामी जी बोले ‘‘मेरा काम लोगों के मनो से मूर्तिपूजा को निकालना है, ईंट पत्थर के मन्दिरों को तोडऩा-तुड़वाना मेरा लक्ष्य नहीं है।’’ यहाँ महर्षि का स्पष्ट मत है कि वे मूर्ति पूजा के विरोधी थे, न कि मूर्ति के।

आर्य समाज का सिद्धान्त निराकार, सर्वव्यापक, न्यायकारी आदि गुणों से युक्त परमेश्वर को मानना व उसकी उपासना करना तथा ईश्वर वा किसी मनुष्य की प्रतिमा पूजन न करना है। इस आधार पर महर्षि का स्टेचू भेंट लेना देना आर्य समाज के सिद्धान्त के विपरीत नहीं, सिद्धान्त विरुद्ध तब होगा जब उस स्टेचू की पूजा आरम्भ हो जायेगी। आर्य समाज का सिद्धान्त चित्र की नहीं चरित्र की पूजा अर्थात् महापुरुषों के आदर्शों को देखना अपनाना है।

कि सी भी महापुरुष के चित्र वा स्टेचू को देखकर हम उनके गुणों, आदर्शों, उनकी योग्यता विशेष का विचार करते हैं तो स्टेचू का लेना-देना कोई सिद्धान्त विरुद्ध नहीं है। जब हम उपहार में पशुओं वा अन्य किन्हीं का स्टेचू भेंट कर सकते हैं तो महर्षि का क्यों नहीं कर सकते?

घर में जिस प्रकार की वस्तुएँ या चित्र आदि होते हैं उनका वैसा प्रभाव घर में रहने वालों पर पड़ता है। जब फिल्मों में काम करने वाले अभिनेता अभिनेत्रियों के भोंडे कामुकतापूर्ण चित्र वा प्रतिमाएँ रख लेते हैं, लगा लेते हैं तो घर में रहने वाले बड़े वा बच्चों पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है आप स्वयं अनुमान लगाकर देख सकते हैं। इसके विपरीत महापुरुषों क्रान्तिकारियों के चित्र घर में होते हैं तो घर वालों पर और बाहर से आने वालों पर कैसा प्रभाव पड़ता होगा। घर में रहने वालों की विचारधारा को घर में लगे हुए चित्र व वस्तुएँ बता देती हैं। अस्तु।

महर्षि ने अपनी प्रतिमा बनाने का विरोध किया था, वह क्यों किया इसका कारण ऊपर आ चुका है। स्टेचू, चित्र आदि का भेंट में लेना-देना आर्य समाज के सिद्धान्त के विरुद्ध नहीं है। यह लिया-दिया जा सकता है, कदाचित् इसकी पूजा वा अन्य दुरुपयोग न किया जाय तो। इसमें इसका भी ध्यान रखें कि पुराण प्रतिपादित कल्पित देवता जो कि चार-आठ हाथ व चार-ेपाँच मुँह वाले वा अन्य किसी जानवर के  रूप में हों उनसे लेने देने से बचें।

– ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर

ब्रह्माकुमारी का सच : आचार्य सोमदेव जी

जिज्ञासा– मैं परोपकारी का लगभग ३० वर्षों से नियमित पाठक हूँ। आपसे मैं आशा करता हूँ कि तथाकथित असामाजिक तत्वों व संगठनों द्वारा आर्यसमाज व महर्षि दयानन्द की विचारधारा पर किए जा रहे हमलों व षड्यन्त्रों का आप जवाब ही नहीं देते, उन्हें शास्त्रार्थ के लिए चुनौती देने में भी सक्षम हैं। ऐसी मेरी मान्यता है। ऐसे ही एक पत्र मेरे (आर्यसमाज सोजत) पते पर दुबारा डाक से प्राप्त हुआ है। इस पत्र की फोटो प्रति मैं आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह पत्र ब्रह्माकुमारी संस्था से जुड़ा किसी व्यक्ति का है, मैंने उससे फोन पर बात भी की है तथा उसे कठोर शब्दों में आमने-सामने बैठकर चर्चा के लिए चुनौती दी है। परन्तु फोन पर उसने कोई जवाब नहीं दिया।
आपकी जानकारी हेतु पत्र की फोटो प्रति पत्र के साथ संलग्न है। पत्र लिखने वाले ने नीचे अपना नाम के साथ चलभाष संख्या भी लिखी है। कृपया आपकी सेवा में प्रस्तुत है –
धर्माचार्य जानते हैं कि वे भगवान् से कभी नहीं मिले, वे यह भी जानते हैं कि वेदों शास्त्रों द्वारा भगवान् को नहीं जाना जा सकता, फिर यह किस आधार से भगवान् को सर्वव्यापी कहते हैं? कुत्ते बिल्ली में भी भगवान् हैं, ऐसा कहकर, भगवान् की ग्लानि क्यों करते हैं? यदि इन्हें कोई कुत्ता कहे तो कैसा लगेगा? धर्माचार्य यह भी कहते हैं कि सब ईश्वर इच्छा से होता है। जरा सोचे! कि क्या छः माह की बच्ची से बलात्कार, ईश्वर इच्छा से होता है? क्या यही है ईश्वर इच्छा? अरे मूर्खों, निर्लज्जों, राम का काम, रामलीला करना है या रावण लीला? राम की आड़ में रावण लीला करने वाले राक्षसों, सम्भल जाओ, क्योंकि राक्षसों से धरती को मुक्त कराने राम आए हैं।
-अर्जुन, दिल्ली, मो.-०९२१३३२४१३४
– हीरालाल आर्य, मन्त्री आर्यसमाज सोजत नगर, जि. पाली, राज.-३०६१०४
समाधान– वर्तमान में भारत देश के अन्दर हजारों गुरुओं ने मत-सम्प्रदाय चला रखे हैं, जो कि प्रायः वेद विरुद्ध हैं। ईसाई, मुस्लिम, जैन, बौद्ध, नारायण सम्प्रदाय, रामस्नेही सम्प्रदाय, राधास्वामी, निरंकारी, धन-धन सतगुरु (सच्चा सौदा), हंसा मत, जय गुरुदेव, सत्य साईं बाबा, आनन्द मार्ग, ब्रह्माकुमारी आदि मत ये सब वेद विरोधी हैं। सबके अपने-अपने गुरु हैं, ये सम्प्रदायवादी ईश्वर से अधिक मह व अपने सम्प्रदाय के प्रवर्तक को देते हैं, वेद से अधिक मह व अपने सम्प्रदाय की पुस्तक को देते हैं।
आपने ब्रह्माकुमारी के विषय में जानना चाहा है। ब्रह्माकुमारी मत वाले हमारे प्राचीन इतिहास व शास्त्र के घोर शत्रु हैं। इस मत के मानने वाले १ अरब ९६ करोड़ ८ लाख, ५३ हजार ११५ वर्ष से चली आ रही सृष्टि को मात्र ५ हजार वर्ष में समेट देते हैं। ये लाखों वर्ष पूर्व हुए राम आदि के इतिहास को नहीं मानते हैं। वेद आदि किसी शास्त्र को नहीं मानते, इसके प्रमाण की तो बात ही दूर रह जाती है। वेद में प्रतिपादित सर्वव्यापक परमेश्वर को न मान एक स्थान विशेष पर ईश्वर को मानते हैं। अपने मत के प्रवर्तक लेखराज को ही ब्रह्मा वा परमात्मा कहते हैं।
इनके विषय में स्वामी विद्यानन्द जी ने अपने ग्रन्थ सत्यार्थ भास्कर में विस्तार से लिखा है, उसको हम यहाँ दे रहे हैं।
‘‘ब्रह्माकुमारी मत- दादा लेखराज के नाम से कुख्यात खूबचन्द कृपलानी नामक एक अवकाश प्राप्त व्यक्ति ने अपनी कामवासनाओं की तृप्ति के लिए सिन्ध में ओम् मण्डली नाम से एक संस्था की स्थापना की थी। सबसे पहले उसने कोलकाता से मायादेवी नामक एक विधवा का अपहरण किया। उसी के माध्यम से उसने अन्य अनेक लड़कियों को अपने जाल में फंसाया। इलाहाबाद के एक साप्ताहिक के द्वारा पोल खुलने पर सन् १९३७ में लाहौर में रफीखां पी.सी.एस. की अदालत में मुकदमा चला। मायादेवी ने अपने बयान में बताया कि ‘‘गुरु जी ने हमसे कहा कि तुम जनता में जाकर कहो कि मैं गोपी हूँ और ये भगवान् कृष्ण हैं। मैं बड़ी पापिनी हूँ। मैंने कितनी कुँवारी लड़कियों को गुमराह किया है। कितनी ही बहनों को उनके पतियों से दूर किया है……’’ (आर्य जगत् जालन्धर २३ जुलाई १९६१)। कलियुगी कृष्ण ने अदालत में क्षमा मांगी और भाग निकला। १३ अगस्त, १९४० में उसने बिहार में डेरा डाल दिया। चेले-चेलियाँ आने लगे। एक दिन एक बूढ़े हरिजन की युवा पत्नी धनिया को लेकर भाग खड़े हुए। फिर मुकदमा चला। धनिया ने अपने बयान में कहा- ‘‘इस गुरु महाराज ने हमें कहा था कि मैं आपका पति हूँ। ब्रह्माजी ने मुझे आपके लिए भेजा है।’’ इसी प्रकार नाना प्रकार के अनैतिक कर्म करते हुए दादा लेखराज हैदराबाद (सिन्ध) में जम गये और देवियों को गोपियाँ बनाकर रासलीलाएँ रचाने लगे। रासलीला की ओर से होने वाले व्यभिचार का पता जब प्रसिद्ध विद्वान्, ओजस्वी वक्ता और समाजसेवी साधु टी.एल. वास्वानी को चला तो वे उसके विरुद्ध मैदान में कूद पड़े। इससे सामान्यतः देशभर में और विशेषतः सिन्ध में तहलका मच गया। ओम् मण्डली के काले कारनामे खुलकर सामने आने लगे। यहाँ पर भी मुकदमा चला। पटना के ‘योगी’ पत्र से ‘सरस्वती’ (भाग ३९, संख्या खण्ड ६१, मई १९३८) का यह विवरण द्रष्टव्य है- ‘‘ओम् मण्डली पर पिकेटिंग शुरू हो गई है। सी.पी.सी. की धारा १०७ के अनुसार सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत में पिकेटिंग करवाने वालों के साथ ओम् मण्डली के संस्थापक और चार अन्य सदस्यों पर मुकदमा चल रहा है।’’ दादा लेखराज को कारावास का दण्ड मिला।
भारत विभाजन के बाद से ब्रह्माकुमारी मत का मुख्यालय आबू पर्वत पर है। जनवरी १९६९ में दादा लेखराज की मृत्यु के बाद से दादी के नाम से चर्चित प्रकाशमणि इस सम्प्रदाय की प्रमुख रही हैं। वर्तमान में इस संस्था या सम्प्रदाय की लगभग दो हजार से अधिक शाखाएँ संसार के अनेक देशों में स्थापित हैं। मैट्रिक तक पढ़ी प्रकाशमणि आबू से विश्वभर में फैले अपने धर्म साम्राज्य का संचालन करती रही। समस्त साधक या साधिकाएँ, प्रचारक या प्रचारिकाएँ ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारी कहाती हैं। प्रचारिकाएँ प्रायः कुमारी होती हैं। विवाहित स्त्रियाँ अपने पतियों को छोड़कर या छोड़ी जाकर इस सम्प्रदाय में साधिकाएँ बन सकती हैं। ये भी ब्रह्माकुमारी ही कहाती हैं। पुरुष, चाहे विवाहित अथवा अविवाहित, ब्रह्मकुमार ही कहाते हैं। ब्रह्माकुमारियों के वस्त्र श्वेत रेशम के होते हैं। …..प्रचारिकाएँ विशेष प्रकार का सुर्मा लगाती हैं, जो इनकी सम्मोहन शक्ति को बढ़ाने में सहायक होता है। सात दिन की साधना में ही वे साधकों को ब्रह्म का साक्षात्कार कराने का दावा करती हैं।
अनुभवी लोगों के अनुसार –
‘तप्तांगारसमा नारी घृतकुम्भसमः पुमान्’
अर्थात् स्त्री जलते हुए अंगारे के समान और पुरुष घी के घड़े के समान है। दोनों को पास-पास रखना खतरे से खाली नहीं है।
गीता में लिखा है
– यततो ह्यापि कौन्तये पुरुषस्य विपश्चितः।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः।।
अर्थात् यत्न करते हुए विद्वान् पुरुष के मन को भी इन्द्रियाँ बलपूर्वक मनमानी की ओर खींच ले जाती हैं।
भर्तृहरि ने कहा है-
विश्वामित्र पाराशरप्रभृतयो वाताम्बुपर्णाशनास्तेऽपि
स्त्रीमुखपङ्कजे सुललितं दृष्ट्वैव मोहंगता।
अन्नं घृतदधिपयोयुतं भुञ्जति ये मानवाः,
तेषामिन्द्रियनिग्रहो यदि भवेद्विन्ध्यस्तरेत्सागरम्।।
अर्थात्- विश्वामित्र, पाराशर आदि महर्षि जो प ाों, वायु और जल का ही सेवन करते थे, वे भी स्त्री के सुन्दर मुखकमल को देखते ही मुग्ध हो गये थे। फिर घी, दुग्ध, दही आदि से युक्त अन्न खाने वाले मनुष्य यदि इन्द्रियों को वश में कर लें तो विन्ध्यपर्वत समुद्र में तैरने लगे।
इसलिए भगवान् मनु ने एकान्त कमरे में भाई-बहन के भी सोने का निषेध किया है।
वस्तुतः ब्रह्माकुमारों और कुमारियों का समागम मध्यकालीन वाममार्गियों के भैरवी चक्र जैसा ही प्रतीत होता है। दादा लेखराज तो ब्रह्माकुमारियों के साथ आलिंगन करते, मुख चूमते तथा…..। भक्तों का कहना है कि ब्रह्माकुमारियाँ तो उनकी पुत्रियों के समान हैं और दादा उनके पिता के समान। जैसे बच्चे उचक कर पिता की गोद में जा बैठते हैं, वैसे ही ब्रह्माकुमारियाँ दादा लेखराज की गोद में जा बैठती थीं और वे उन्हें पिता के समान प्यार करते थे।
बिठाकर गोद में हमको बनाकर वत्स सेते हैं, जरा सी बात है।
बनाने को हमें सच्चा समर्पण माँग लेते हैं।
हमें स्वीकार कर वस्तुतः सम्मान देते हैं।
लोकलाज कुल मर्यादा का, डुबा चलें हम कूल किनारा।
हमको क्या फिर और चाहिए, अगर पा सकें प्यार तुम्हारा।।
– भगवान् आया है, पृ. ५०, ५१, ६९
इनके धर्मग्रन्थ ‘सच्ची गीता’ पृष्ठ ९६ पर लिखा है-
‘‘बड़ों में भी सबसे बड़ा कौन है, जो सर्वोत्तम ज्ञान का सागर और त्रिकालदर्शी कहा जाता है। मेरे गुण सर्वोत्तम माने जाते हैं। इसलिए मुझे पुरुषो ाम कहते हैं।’’
पुरुषो ाम शब्द की दो निरुक्तियाँ होती हैं- एक है-
‘पुरुषेषु उ ामः इति पुरुषो ामः।’
जो व्यक्ति परस्त्रियों के साथ रमण करता है, उन्हें अपनी गोद में बैठाता है और उनके….. उसे इन अर्थों में तो पुरुषो ाम नहीं कहा जा सकता।
दूसरी निरुक्ति-
‘पुरुषेषु ऊतस्तेषु उ ाम इति पुरुषो ामः’
के अनुसार दादा लेखराज को पुरुषो ाम मानने में किसी को कोई आपति नहीं होनी चाहिए।
आश्चर्य की बात है कि अपनी सभाओं और सम्मेलनों में देश-परदेश के राजनेताओं, शासकों, न्यायाधीशों, पत्रकारों, शिक्षा शास्त्रियों तक को आमन्त्रित करने वाली ब्रह्माकुमारी संस्था मूल सिद्धान्तों, दार्शनिक मान्यताओं तथा कार्यकलापों को ये अभ्यागत लोग नहीं जानते। हो सकता है, वे ब्रह्माकुमारियों के….. खिंचे चले आते हों। आज तक निश्चित रूप से यह पता नहीं चल सका कि इस संस्था के करोड़ों रुपये के बजट को पूरा करने के लिए यह अपार राशि कहाँ से आती है। कहा जाता है कि ब्रह्माकुमारियाँ ही अपने घरों को लूट कर लाती हैं। पर उतने से काम बनता समझ में नहीं आता। कुछ स्वकल्पित चित्रों और चार्टों तथा रटी-रटाई श दावली में अपने मन्तव्यों का परिचय देने वाली ब्रह्माकुमारियाँ और ब्रह्मकुमार राजयोग, शिव, ब्रह्मा, कृष्ण, गीता आदि की बातें तो करते हैं, परन्तु सुपठित व्यक्ति जल्दी ही भाँप जाता है कि महर्षि पतञ्जलि द्वारा प्रतिपादित राजयोग तथा व्यासरचित गीता का तो ये क, ख, ग भी नहीं जानते। ये विश्वशान्ति और चरित्र निर्माण के लिए आडम्बरपूर्ण आयोजन करते हैं, शिविर लगाते हैं, कार्यशालाएँ संचालित करते हैं, किन्तु उनमें से किसी का भी कोई प्रतिफल दिखाई नहीं देता।’’
पाठक, ब्रह्माकुमारी के मूल संस्थापक के चरित्र को इस लेख से जान गये होंगे, आज के रामपाल और उस समय के लेखराज में क्या अन्तर है? आर्यसमाज सदा से ही गलत का विरोधी रहा है, आज भी है। ब्रह्माकुमारी वाले अपने मूल सिद्धान्तों के लिए आर्यसमाज से चर्चा वा शास्त्रार्थ करना चाहे, तो आर्यसमाज सदा इसके लिए तैयार है।
आपने जो इनका पत्र संकलित कर भेजा है उसी से ज्ञात हो रहा है कि ये वेद-शास्त्र के निन्दक व वेदानुकूल ईश्वर को न मानने वाले हैं।
– ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर

चाँदापुर शास्त्रार्थ का भय-भूत: – राजेन्द्र ‘जिज्ञासु’

चाँदापुर शास्त्रार्थ का भय-भूत:- एक आर्य भाई ने यह जानकारी दी है कि आपने ऋषि-जीवन की चर्चा करते हुए पं. लेखराम जी के अमर-ग्रन्थ के आधार पर चाँदापुर शास्त्रार्थ की यह घटना क्या दे दी कि शास्त्रार्थ से पूर्व कुछ मौलवी ऋषि के पास यह फरियाद लेकर आये कि हिन्दू-मुसलमान मिलकर शास्त्रार्थ में ईसाई पादरियों से टक्कर लें। आप द्वारा उद्धृत प्रमाण तो एक सज्जन के लिये भय का भूत बन चुका है। न जाने वह कितने पत्रों में अपनी निब घिसा चुका है। अब फिर आर्यजगत् साप्ताहिक में वही राग-अलापा है। महाशय चिरञ्जीलाल प्रेम जैसे सम्पादक अब कहाँ? कुछ भी लिख दो। सब चलता है। इन्हें कौन समझावे कि आप पं. लेखराम जी और स्वामी श्रद्धानन्द जी के सामने बौने हो। कुछ सीखो, समझो व पढ़ो।

मेरा निवेदन है कि इनको अपनी चाल चलने दो। आपके लिये एक और प्रमाण दिया जाता है। कभी बाबा छज्जूसिंह जी का ग्रन्थ ‘लाइफ एण्ड टीचिंग ऑफ स्वामी दयानन्द’ अत्यन्त लोकप्रिय था। इस पुस्तक के सन् १९७१ के संस्करण में डॉ. भवानीलाल जी भारतीय ने इसका गुणगान किया था। जो प्रमाण पं. लेखराम जी का मैंने दिया है, उसी चाँदापुर शास्त्रार्थ उर्दू को बाबा छज्जूसिंह जी ने अपने ग्रन्थ में उद्धृत किया है। पं. लेखराम जी को झुठलाने के लिये नये कुतर्क गढक़र कोई कुछ भी लिख दे, इन्हें कौन रोक सकता है। सूर्य निकलने पर आँखें मीचकर सूर्य की सत्ता से इनकार करने वाले को क्या कह सकते हैं। अब भारतीय जी को क्या कहते हैं? यह देख लेना।

सच्ची रामायण का खंडन भाग-२२

*सच्ची रामायण का खंडन भाग-२२*
*अर्थात् पेरियार द्वारा रामायण पर किये आक्षेपों का मुंहतोड़ जवाब*
*-कार्तिक अय्यर*
नमस्ते मित्रों!हम एक बार फिर उपस्थित हुये हैं *भगवान श्रीराम पर किये आक्षेपों का खंडन*
आगे २२ वें आक्षेप से समीक्षा प्रारंभ करते हैं:-
*आक्षेप-२२-* इसका सार है कि अपने पास वन में आये हुये भरत से रामने कहा-” हे भरत! क्या तुम प्रजा द्वारा खदेड़ भगाए हुए हो? क्या तुम अनिच्छा से हमारे बाप की सेवा करने आये हो? (अयोध्याकांड १००)( पेरियार ने १०० की जगह १००० लिखा है।यदि ये मुद्रण दोष है तो भी चिंतनीय है)
*समीक्षा-* हम चकित हैं कि इस प्रकार से बेधड़क झूठ बोलकर किसी लेखक की पुस्तक हाई कोर्ट से बाइज्जत बरी हो जाती है।
इस सर्ग में श्रीराम ने भरत से यह बिल्कुल नहीं पूछा कि “क्या तुम जनता द्वारा खदेड़ कर भाग आए हुए हो ” ।अब भला राजा भरत को कौन खदेड़ेगा ?राजा भरत माता पिता मंत्रियों और सेना सहित श्री राम से मिलने के लिए आए थे। क्या कोई खदेड़ा हुआ व्यक्ति सेना के साथ आता है? “क्या तुम अनिच्छा से हमारे बाप की सहायता सहायता करने आए”- न ही यह प्रश्न भी श्री राम ने नहीं किया।भला भरत जैसा पितृ भक्त अपने पिता की ‘अनिच्छा’ से सेवा क्यों करेगा? और वन में आकर पिता की कौन सी सेवा की जाती है ?यह पेरियार साहब का श्री राम पर दोषारोपण करने का उन्मत्त प्रलाप है यह देखिए अयोध्या कांड सर्ग १०० में मात्र यह लिखा है कि:-
क्व नु तेऽभूत् पिता तात यदरण्यं त्वमागतः ।
न हि त्वं जीवतस्तस्य वनमागन्तुमर्हसि ॥ ४ ॥
“तात ! पिताजी कहां थे कि तुम इस वनमें निकलकरआये हो? वे यदि जीवित होते तो तुम वनमें नहीं आ सकते थे॥ ४ ॥ “
चिरस्य बत पश्यामि दूराद् भरतमागतम् ।
दुष्प्रतीकमरण्येऽस्मिन् किं तात वनमागतः ॥ ५ ॥
’मैं दीर्घ काल केबाद दूरसे (नानाके घर से ) आये भरतको आज इस वनमें देख रहा हूं, परंतु इसका शरीर बहुत दुर्बल हो गया है।तात ! तुम किसलिये इस बुरे वनमें आये हो ? ॥ ५ ॥
देखा यहां पर मात्र इतना ही उल्लेख है आपकी कही वही कपोल कल्पित बातें यहां बिल्कुल भी नहीं है।
*आक्षेप-२३-*राम ने भरत से पुनः कहा कि ,”जब तुम्हारी मां का मनोरथ सिद्ध हो गया, क्या वो प्रसन्न है?”(अयोध्याकांड सर्ग १००)
*समीक्षा-* इस बात का अयोध्याकांड सर्ग 100 में बिल्कुल भी उल्लेख नहीं है विसर्ग में तो श्रीराम अपनी तीनो माताओं की कुशल क्षेम पूछ रहे हैं देखियेे प्रमाण:-
तात कच्चिच्च कौसल्या सुमित्रा च प्रजावती ।
सुखिनी कच्चिदार्या च देवी नंदति कैकयी ॥ १० ॥
’बंधो ! माता कौसल्या सुखमें है ना ? उत्तम संतान होनेवाली सुमित्रा प्रसन्न हैे ना ? और आर्या कैकेयी देवीभीआनंदित है ना ? ॥ १० ॥’
देखिये, श्रीराम वनवास भेजने वाली अपनी विमाता कैकेयी को भी ‘आर्या’ तथा ‘देवी’ कहकर संबोधित करते हैं।
 यदि आप की कही हुई बाक मान भी ली जाये तो भी इससे श्रीराम पर क्या आक्षेप आता है?कैकेयी राम के वनवास और भरत के राज्य प्राप्ति पर तो प्रसन्न ही होगी।इसमें भला क्या संदेह है?यह प्रश्न पूछकर श्रीराम ने कौन सा पाप कर दिया?
*आक्षेप-२४-* इसका सार है:- भरत ने कहा कि उन्होंने सिंहासन के लिये स्वत्व का त्याग कर दिया,तब श्रीराम ने कैकेयी के पिता को दशरथ के वचन देने की बात कही। (अयोध्याकांड सर्ग १०७)
*समीक्षा-* हम पीछे सिद्ध कर चुके हैं कि कैकेयी के पिता को दशरथ ने कोई वचन नहीं दिया था।अतः यह आक्षेप निर्मूल है।
परंतु अभी तो भरत को सिंहासन मिल ही गया न?अब यदि दुर्जनतयातोष इस वचन को सत्य मान भी लें तो भरत को तो राज्य मिल ही गया है! एक तरह से दशरथ का दिया वचन सत्य ही हुआ। फिर भला इस पर क्या आपत्ति।
*आक्षेप-२५-*इसका सार है, कि भरत रामजी की पादुकायें लेकर लौटे,उन्होंने अयोध्या में प्रवेश न किया नंदिग्राम में निवास,तपस्वी जीवन करके क्षीणकाय होना इत्यादि वर्णन है।आक्षेप ये है कि “रामने ऐसे सज्जन और पर संदेह किया”।
तत्पश्चात वनवास से लौटकर हनुमान जी द्वारा अपने आगमन की सूचना देने का उल्लेख किया है।यह वचन सुनकर भरत अत्यंत प्रसन्न होकर श्रीराम के स्वागत को चल पड़े। यहां महोदय ने टिप्पणी की है कि,” संपूर्ण भोगोपभोग पूर्ण अयोध्या को त्यागकर राम के स्वागत के लिये दौड़ कर जाना अत्यंत दुष्कर था”।
*समीक्षा-* हम समझ नहीं पा रहे हैं कि आप किस प्रकार के प्राणी है ।यहां भला कहां लिखा है कि श्रीराम ने भारत के ऊपर संदेह किया ?वे तो उन्हें प्राणों के समान प्रिय मानते थे इसलिए उनको राजनीति का उपदेश देकर अयोध्या में राज्य करने हेतु वापस भेज दिया। यदि श्रीराम का भारत के ऊपर संदेह होता तो उन्हें ना तो राजनीति का उपदेश करते और ना अयोध्या में राज्य करने के लिए भेजते ।हम समझ नहीं पा रहे हैं कि आप कैसे बेसिर-पैर के आरोप लगा रहे हैं।
आप की दूसरी आपत्ति है कि समस्त भागों को त्याग करके तपस्वी जीवन बिताते भरत जी श्री राम के आगमन की सूचना पाते ही अचानक दौड़ कर उनका स्वागत करने हेतु कैसे पहुंच गए ।क्यों महाशय! शंका करने की क्या बात है श्रीराम भी १४ वर्ष तक वनवास में रहे वह भी मात्र कंद-फल-मूल खाकर।फिर भी उन्होंने अपने तपोबल और ब्रह्मचर्यबल से १४००० राक्षसों समेत खर-दूषण का नाश कर दिया।बालि जैसे योद्धा को एक बाण में ही मार गिराया।लंका में घुसकर कुंभकर्ण और रावण को मार गिराया।उनको तो मांस और राजसी भोग भोगने वाले राक्षस लोग भी पराजित ना कर सके तो इसमें भला क्या संदेह है कि राज्य  को छोड़कर कोई तपस्वी जीवन जिए और किसी के स्वागत के लिए भागकर जा भी ना पाए। यदि श्रीराम 14 वर्ष तक वन में रहकर राक्षसों का संहार कर सकते हैं तो भरत जी के लिए मात्र उनके स्वागत के लिए दौड़े दौड़े चले आना सामान्य सी बात है ।रामायण में यह थोड़े ही लिखा है कि भरतजी कुछ नहीं खाते थे।वे राजसी भोग छोड़कर ऋषि-मुनियों योग्य आहार करते थे।
आपने इसका पता भी “उत्तरकांड १२७” लिखा है।क्योंजी!उत्तरकांड में राम जी वापस आये थे?इसका सही पता युद्ध कांड सर्ग १२७ है।ऐसी प्रमाणों की अशुद्धि चिंताजनक है।आप केवल सर्ग लिखकर गपोड़े हांक देते हैं पर उन्हें खोलकर पढ़ा होता तो आधे से अधिक आक्षेप न करते। युद्ध कांड सर्ग १२७ में यह लिखा है कि भरत उपवास से दुर्बल हो गये थे:-
उपवासकृशो दीनः चीरकृष्णाजिनाम्बरः ।
भ्रातुरागमनं श्रुत्वा तत्पूर्वं हर्षमागतः ॥ २० ॥
परंतु यह नहीं लिखा कि उनमें श्रीराम का स्वागत करने की भी शक्ति न थी। वे तो उस समय राजा थे।वे पैदल थोड़े ही गये थे!वे पूरे गाजे-बाजे हाथी-घोड़े के साथ उनके दर्शन करने चले।
यहां वर्णन है कि भरत जी ने स्वागत के लिये घोड़े और रथ सजाये थे:-
प्रत्युद्ययौ तदा रामं महात्मा सचिवैः सह ।
अश्वानां खुरशब्दैश्च रथनेमिस्वनेन च ॥ २१ ॥
क्या आपको लगता है कि राजा पैदल किसी का स्वागत करने जायेगा? वे राजसी भोग न खाकर ऋषि मुनियों का भोजन करते थे।उपवास का अर्थ नहीं कि निर्जला व्रत कर लिया।उपवास में भी फलाहार किया जाता है।आपका यह आक्षेप मूर्खतापूर्ण है।
*आक्षेप-२६-* संक्षेप में श्री राम का मां सीता के चरित्र पर संदेह करने उनकी अग्निपरीक्षा लेने का वर्णन है श्रीराम के कारण सीता को दुख भोगना पड़ा साथ ही उनके गर्भवती पाए जाने पर उन्हें वन में छोड़ने का आरोप लगाया है।
*आक्षेप-* हम डंके की चोट पर कहते हैं की मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने मां सीता को कभी वन में नहीं भेजा।यह बात उत्तर कांड में लिखी है,जोकि पूरा का पूरा प्रक्षिप्त है। अतः श्री राम पर आरोप नहीं लग सकता यह प्रश्न अग्निपरीक्षा का तो महोदय उस प्रसंग में पौराणिक पंडितों ने काफी मिलावट की है बारीकी से अवलोकन करने से यह विदित होता है कि श्री राम ने समस्त विश्व के आंगन में मां सीता के पावन तन चरित्र को सिद्ध करने के लिए ऐसा किया था इस वर्णन में संक्षेप में है कि जब विभीषण ने मां सीता को अलंकृत करके श्रीराम की सेवा में भेजा तब श्री राम ने उनको कहा कि तुम बहुत समय तक राक्षस के घर में रह कर आई हूं अतः मैं तुम्हें स्वीकार नहीं कर सकता तुम चाहो तो सुग्रीव लक्ष्मण या विभीषण के यहां रहो या जहां इच्छा हो वहां जाओ परंतु मैं तुम्हें ग्रहण नहीं करूंगा ऐसा आप स्वयं का अपमान होते देख मां सीता ने ओजस्वी वाणी में श्रीराम को उत्तर दिया उसके बाद उन्होंने अपने पति द्वारा त्यागे जाने पर चिता में भस्म होने का निश्चय किया उनके आदेश पर लक्ष्मण ने चिता सजा दी जब मां सीता सीता की अग्नि की परिक्रमा करते हुए जैसे ही उसने प्रवेश करने वाली थी श्री रामचंद्र ने उनको रोक लिया पता तथा सबके सामने उनके पवित्र होने की साक्षी दी यदि वह ऐसा नहीं करते तो लोगापवाद हो जाता कि रघुकुल नंदन राम अत्यंत का व्यक्ति है जिसने दूसरे के यहां आ रही अपनी स्त्री को ऐसे ही स्वीकार कर लिया।
अतः यह आवश्यकता था।
यह अग्नि का गुण है कि चाहे जो भी हो,वह उसे जला देती है।फिर चाहे मां सीता हो या अन्य कोई स्त्री उसका अग्नि में जलना अवश्यंभावी है। जिस स्त्री को अग्नि ना जला पाए वह पतिव्रता है -यह कदापि संभव नहीं है , तथा हास्यास्पद,बुद्धिविरुद्ध बात है।यह अग्नि का धर्म है कि उसमें प्रवेश करने वाला हर व्यक्ति जलता है ।पुराणों में तो होलि का नाम की राक्षसी का उल्लेख है ।उसे भी अग्नि में ना जलने का वरदान था ।तो क्या इसे वह प्रति पतिव्रता हो जाएगी?? दरअसल अपने पति द्वारा त्यागी जाने पर मां सीता ने अपने प्राणों को तिनके की तरह त्यागने का निश्चय किया।उनके अग्निसमाधि लेने के निश्चय से सिद्ध हो गया कि श्री राम के सिवा उनके मन में सपने में भी किसी अन्य पुरुष की प्रति (पति समान)प्रेम भाव नहीं था।मां सीता क अतः मां सीता को चिता के पास जाने से रोक कर श्रीराम ने समस्त विश्व के सामने उनकी पवित्रता को प्रमाणित कर दिया जो स्त्री अपने पति द्वारा त्यागे जाने पर एक क्षण भी जीना पसंद नहीं करती तथा अपने शरीर को अग्नि में झुककर मरना चाहती है उसका चरित्र अवश्य ही असंदिग्ध एवं परम पवित्र है इस तथ्य से मां सीता का चरित्र पावनतम था।
     हां ,हम आपको बता दें कि इस प्रसंग में ब्रह्मा विष्णु आदि देवताओं का तथा महाराज दशरथ का स्वर्ग से आकर सीता की पवित्रता की साक्षी देना तथा ब्रह्मा जी का श्रीराम से उनके मूल रूप के बारे में पूछना और श्री राम की ईश्वर होने का वर्णन तथा स्तुति करना यह सारे प्रसंग पौराणिक पंडितों ने श्री राम पर ईश्वरत्व का आरोप करने के लिए  लिखे हैं। इन्हें हटाकर अवलोकन करने से अग्नि परीक्षा की पूरी कथा स्पष्ट हो जाती है।
(अधिक जानकारी के लिये आर्यसमाज के विद्वान स्वामी जगदीश्वरानंदकृत रामायण की टीका को पढ़ें)
 हम आपके सामने इसके प्रमाण रखते हैं अवलोकन कीजिए।
यत् कर्तव्यं मनुष्येण धर्षणां प्रतिमार्जता ।
तत् कृतं रावणं हत्वा मयेदं मानकाङ्‌क्षिणा ।। १३ ।।
अपने तिरस्कारका बदला लेने हेतु मनुष्यका जो कर्तव्य है वो सब मैंने अपने मानके रक्षण की अभिलाषा से रावणका वध करके पूर्ण कर दिया है॥१३॥
कः पुमान् हि कुले जातः स्त्रियं परगृहोषिताम् ।
तेजस्वी पुनरादद्यात् सुहृल्लोभेन चेतसा ।। १९ ।।
ऐसा कौन कुलीन पुरुष होगा, जो तेजस्वी होकर भी दूसरे के घरमें रही स्त्रीके केवल” ये मेरेसाथ बहुत दिवस रहकर सौहार्द स्थापित कर चुकी है इस लोभसे उसके मनसे ग्रहण कर सकेगा ? ॥१९॥
यदर्थं निर्जिता मे त्वं सोऽयमासादितो मया ।
नास्ति मे त्वय्यभिष्वङ्गो यथेष्टं गम्यतामिति ।। २१ ।।
इसलिये जिस उद्देश्यसे मैंने तुमको जीता था वो सिद्ध हो गया है।मेरे कुलके कलंक का मार्जन हो चुका है। अब मेरी तुम्हारेप्रति ममता अथवा आसक्ति नहीं है इसलिये तुम जहां जाना चाहो वहां जा सकती हो॥२१॥
और साथ ही कहा कि तुम चाहे भरत,शत्रुघ्न, या विभीषण के यहां चली जाओ,या जहां इच्छा हो वहां जाओ-
शत्रुघ्ने वाथ सुग्रीवे राक्षसे वा विभीषणे ।
निवेशय मनः सीते यथा वा सुखमात्मना ।। २३ ।।
(युद्ध कांड ११५)
फिर मां सीता फूट-फूटकर रोने लगीं और हृदय स्पर्शी वाणी में श्रीराम को उत्तर दिया:-
‘स्वामी आप साधारण पुरुषों की भांति ऐसे कठोर और अनुचित वचन क्यों कह रहे हैं? मैं अपने शील की शपथ करके कहती हूं आप मुझ पर विश्वास रखें प्राणनाथ हरण करके लाते समय रावण ने मेरे शरीर का अवश्य स्पर्श किया था किंतु उस समय में परवश थी ।इसके लिए तो मैं दोषी ठहरा ही नहीं जा सकती ;मेरा हृदय मेरे अधीन है और उस पर स्वप्न में भी किसी दूसरे का अधिकार नहीं हुआ है।फिर भी यदि आपको यही करना था तो जब हनुमान को मेरे पास भेजा था उसी समय मेरा त्याग कर दिया होता ताकि तब तक मैं अपने प्राणों का ही त्याग कर देती।’
( युद्ध कांड सर्ग ११६ श्लोक ५-११ का संक्षेप)
मां सीती ने लक्ष्मण से कहा:-
अप्रीतस्य गुणैर्भर्त्रा त्यक्ताया जनसंसदि ।
या क्षमा मे गतिर्गन्तुं प्रवेक्ष्ये हव्यवाहनम् ।। १९ ।।
एवमुक्तस्तु वैदेह्या लक्ष्मणः परवीरहा ।
अमर्षवशमापन्नो राघवं समुदैक्षत ।। २० ।।
‘ लक्ष्मण! इस मिथ्यापवाद को लेकर मैं जीवित रहना नहीं चाहती।मेरे दुःख की निवृत्ति के लिये तुम मेरे लिये चिता तैयार कर दो।मेरे प्रिय पति ने मेरे गुणों से अप्रसन्न होकर जनसमुदाय में मेरा त्याग किया है।अब मैं इस जीवन का अंत करने के लिये अग्नि में प्रवेश करूंगी।’
जानकी जी के वचन सुनकर तथा श्रीराम का संकेत पाकर लक्ष्मण ने चिता सजा दी।मां सीता पति द्वारा परित्यक्त होकर अग्नि में अपना शरीर जलाने के लिये उद्यत हुईं।
एवमुक्त्वा तु वैदेही परिक्रम्य हुताशनम् ।
विवेश ज्वलनं दीप्तं निःशंकेनान्तरात्मना ।। २९ ।।
ऐसा कहकर वैदेहीने अग्निकी परिक्रमा की और निशंक चित्तसे वे उस प्रज्वलित अग्निमें प्रवेश करने को उद्यत हुईं। ॥२९॥
जनश्च सुमहांस्तत्र बालवृद्धसमाकुलः ।
ददर्श मैथिलीं दीप्तां प्रविशन्तीं हुताशनम् ।। ३० ।।
बालक और वृद्धों से भरे हुये उस महान्‌ जनसमुदायने उन दीप्तिमती मैथिलीको जलती अग्नि प्रवेश करते हुये (घुसने को उद्यत होते )देखा ॥३०॥
इसके बाद मां सीता की अग्नि में कूद जाने ,अग्निदेव के प्रकट होकर उन्हें उठाकर लाने का वर्णन है ।वहीं पर ब्रम्हा ,शिव, कुबेर ,इंद्र ,वरुण आदि बड़े बड़े देवता उपस्थित हो जाते हैं उस समय ब्रह्मा जी श्री राम और सीता के रहस्य की बहुत सी बातें कहते हैं।वहां पर श्रीराम के ऊपर ईश्वरत्व का आरोप है। हमारा मानना है कि यह सारे प्रसंग पौराणिक पंडितों ने मिलाएं हैं , अतः हम उनको प्रक्षिप्त मानकर उल्लेख नहीं करेंगे। हमारा मत में  जब मां सीता अग्नि में प्रवेश करने को उद्यत थी उसी समय श्रीराम को उन की पवित्रता का भान हो गया था और फिर श्रीराम ने यह वचन कहे:-
अवश्यं त्रिषु लोकेषु न सीता पापमर्हति ।
दीर्घकालोषिता हीयं रावणान्तःपुरे शुभा ।।  ।।
बालिशः खलु कामात्मा रामो दशरथात्मजः ।
इति वक्ष्यन्ति मां सन्तो जानकीमविशोध्य हि ।।
अनन्यहृदयां भक्तां मच्चित्तपरिवर्तिनीम् ।
अहमप्यवगच्छामि मैथिलीं जनकात्मजाम् ।।
प्रत्ययार्थं तु लोकानां त्रयाणां सत्यसंश्रयः ।
उपेक्षे चापि वैदेहीं प्रविशन्तीं हुताशनम् ।।
इमामपि विशालाक्षीं रक्षितां स्वेन तेजसा ।
रावणो नातिवर्तेत वेलामिव महोदधिः ।।
न हि शक्तः स दुष्टात्मा मनसा ऽपि हि मैथिलीम् ।
प्रधर्षयितुमप्राप्तां दीप्तामग्निशिखामिव ।।
नेयमर्हति चैश्वर्यं रावणान्तःपुरे शुभा ।
अनन्या हि मया सीता भास्करेण प्रभा यथा ।।
विशुद्धा त्रिषु लोकेषु मैथिली जनकात्मजा ।
न हि हातुमियं शक्या कीर्तिरात्मवता यथा ।।
(युद्ध कांड सर्ग ११८ श्लोक १४-२०)
लोक दृष्टि में सीता की पवित्रता की परीक्षा आवश्यक थी क्योंकि यह बहुत समय तक रावण के अंतः पुर में रही हैं। यदि मैं जानकी की परीक्षा ना करता तो लोग यही कहते कि दशरथ पुत्र राम बड़ा ही मूर्ख और कामी है।जनक नंदिनी सीता का मन अनन्य भाव से मुझे में लगा रहता है और यह मेरे ही चित्त का अनुसरण करने वाली है। यह बात मैं भी जानता हूं यह अपने तेज से स्वयं ही सुरक्षित है इसलिए समुद्र जिस प्रकार अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं कर सकता उसी प्रकार रावण इसका कुछ बिगाड़ नहीं सकता था ।जिस प्रकार प्रज्ज्वलित अग्निशिखा का कोई स्पर्श नहीं कर सकता उसी प्रकार दुष्ट रावण अपने मन से भी इस पर अधिकार नहीं कर सकता था ।यह तो उसके लिए सर्वथा अप्राप्य थी। रावण के अंतः पुर में रहने पर भी इसका किसी प्रकार तिरस्कार नहीं हो सकता था क्योंकि प्रभाव जैसे सूर्य से अभिन्न है उसी प्रकार इसका मूल्य से कोई भेद नहीं है ।जनक दुलारी सीता तीनों लोकों में पवित्र है इसलिए आत्माभिमानी पुरुष जैसे कीर्ति का लोभ नहीं छोड़ सकते, वैसे ही मैं इसका त्याग नहीं कर सकता।’
इससे सिद्ध है कि केवल लोगों के सामने मां सीता को निर्दोष और पवित्र सिद्ध करने के लिए अग्नि परीक्षा ली गई ।वस्तुतः श्रीराम जानते थे कि मां सीता महान सती और पतिव्रता स्त्री हैं। अतः पेरियार साहब का आक्षेप निर्मूल है कि भगवान श्री राम माता सीता के चरित्र पर संदेह करते थे वह तो मानते थे। कि जिस प्रकार से सूर्य प्रभाव से अभिन्न है उसी प्रकार से उनमें और मां सीता में कोई भेद नहीं। अस्तु।
लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद मित्रों।कृपया इसे अधिक से अधिक शेयर करें अगले भाग में आगे के आक्षेपों को की समीक्षा की जाएगी।
।।मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र की जय।।
।।योगेश्वर श्री कृष्ण चंद्र की जय।।
।।ओ३म्।।
नोट : इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आर्यमंतव्य  टीम  या पंडित लेखराम वैदिक मिशन  उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है. |

सच्ची रामायण का खंडन भाग-२१

*सच्ची रामायण का खंडन भाग-२१*
*अर्थात् पेरियार द्वारा रामायण पर किये आक्षेपों का मुंहतोड़ जवाब*
*-कार्तिक अय्यर*
नमस्ते मित्रों । *श्रीराम पर किये आक्षेपों के खंडन में* आगे बढ़ते हैं।पेरियार आगे लिखते हैं:-
*आक्षेप-१५-* वनवास में जब कभी राम को निकट भविष्य के दुख पूर्ण समय से सामना करना पड़ा तो उसने यही कहा कि अब कैकेई की इच्छा पूर्ण होगी अब वह संतुष्ट हुई होगी।
*आक्षेप-१६-* राम ने लक्ष्मण से वनवास में कहा था कि क्योंकि हमारे बाप वृद्धत्व निर्बल हो गए हैं और हम लोग यहां आ गए हैं अब भारत अपनी स्त्री सहित बिना किसी विरोध के अयोध्या पर शासन कर रहा होगा ।इस बात को उसकी राजगद्दी और भारत के प्रति ईर्ष्या की स्वाभाविक तथा निराधार अभिलाषा प्रकट होती है।(अयोध्याकांड ५३)
*आक्षेप-१७-* जब कैकेयी ने राम से कहा -,”हे राम!राजा ने मुझे तुम्हारे पास तुम्हें यह बताने के लिए भेजा है कि भरत को राजगद्दी मिलेगी और तुम्हें वनवास ।तब राम ने उससे कहा कि ,”राजा ने मुझसे यह कभी नहीं कहा कि मैं भरत को राजगद्दी दूंगा।” (अयोध्या कांड 19 अध्याय)
*आक्षेप-१८-* उसने अपने पिता को मूर्ख और पागल कहा था। (अ.कां। ५३ अ.)
आक्षेप 16 और 17 के स्पष्टीकरण में ललई सिंह यादव ने प्रमाण दिया  है-
अयोध्याकांड ५३/१-२ “सौभाग्यवती स्त्री मांडवी का पति और रानी केकेई का पुत्र भारत की सूखी है क्योंकि वह सम्राट की तरह कौशल प्रदेश को भोगेगा।पिताजी वृद्ध है और मैं अकेला वन को चला आया हूं अतएव राज्य का सारा सुख अकेले भरत को मिलेगा।”
फिर इसी सर्ग के ५३/८-१७ का प्रमाण देकर राम ने दशरथ को कामी,मूर्ख आदि कहने का वर्णन है।
*समीक्षा-*  निराधार आरोप लगाने की कला में पेरियार जी अभ्यस्त हैं।इनके आक्षेपों की भला क्या समीक्षा करूं?
१:- यह ठीक है कि वनवास में श्रीराम का समय दुख पूर्ण था
 और उनका यह कहना कि अब कैकेई की इच्छा पूर्ण हो गई -इसमें गलत क्या है क्या भा़रत को राज्य और राम को वनवास मिलने से कैकेयी की इच्छा पूरी नहीं हुई थी?
२:- आक्षेप १६ की पुष्टि के लिये ललई सिंह अयोध्याकांड ५३/१-२ का प्रमाण देते हैं।वैसे पुस्तक में प्रमाण भी मुद्रणदोष सहित दिये हैं। १-२ की जगह १-१२ लिखा है,जो चिंतनीय है।
तो इसका उत्तर यह है कि इस सर्ग में श्रीराम ने लक्ष्मण को अयोध्या वापस भेजने और उनकी परीक्षा लेने के लिये ये बातें कहीं थीं।उनके मन में द्वेष या ईर्ष्या नहीं थी, क्योंकि वे तो अपने भाइयों के लिये ही राज्य चाहते थे,न कि खुद के सुखोपभोग के लिये। श्रीराम जब वनवास से लौट रहे थे,तब उन्होंने श्रीहनुमानजी से कहा था कि-“यदि १४ वर्षों तक राज्यसंचालन करने के बाद भी यदि भरत और आगे भी राजा बने रहना चाहते हैं तो,यही ठीक रहेगा।”
सङ्गत्या भरतः श्रीमान् राज्येनार्थी स्वयं भवेत् ।
प्रशास्तु वसुधां कृत्स्नां अखिलां रघुनन्दनः ॥ १७ ॥
“यदि कैकेयीकी संगति और चिरकालतक संसर्ग होनेसे श्रीमान्‌ भरत स्वतः राज्य प्राप्त करने की इच्छा करते हैं तो रघुनंदन भरत खुशी खुशी समस्त भूमण्डलपर  राज्य राज्य कर सकते हैं।”(मुझे ये राज्य लेने की इच्छा नहीं। ऐसी स्थितीमें हम अन्यत्र कहीं जाकर तपस्वी जीवन व्यतीत करेंगे।) ॥१७॥(युद्ध कांड सर्ग १२५)
देखा !श्रीराम का कितना उज्जवल चरित्र था!वे कितने निर्लोभ,त्यागी और तपस्वी थे! जिन श्रीराम का ऐसा महान चरित्र हो वे कभी अपने भ्राता से ईर्ष्या और द्वेष नहीं कर सकते । वे तो भरत के लिए राज्य त्यागने के लिए भी तैयार हैं। इससे सिद्ध है कि आपके दिए प्रमाण में श्री राम के मूल विचार व्यक्त नहीं होते वे विचार केवल लक्ष्मण की परीक्षा और उन्हें अयोध्या लौट आने के लिए ही थे।
३:- आपने ५३/८-१७ का पता लिखकर श्रीराम द्वारा दशरथ को मूर्ख आदि कहने का उल्लेख किया है।इसका स्पष्टीकरण भी २ के जैसा ही है । वैसे यह श्रीराम के मूलविचार नहीं थे,ये तो लक्ष्मण के लिये कहे थे। इसमें कुछ गलत नहीं है कि दशरथ काम के वशीभूत होकर कैकेयी के वरदानों के आगे विवश हो गये।यह भी ठीक है कि उस समय उनकी बुद्धि भ्रमित हो गई थी।कुछ समय के लिये मौर्ख्य ने उनकी बुद्धि को घेर लिया था।इसमें श्रीराम अपने पिता को अपशब्द नहीं कह रहे हैं , केवल वस्तुस्थिति प्रकट कर रहे हैं।ऐसा करना गाली देना नहीं होता।
*आक्षेप-१९-*उसने अपने पिता से प्रार्थना की थी,कि “जब तक मैं वनवास से वापस न लौट आऊं – तब तक तुम अयोध्या का राज्य करते रहो और किसी को राजगद्दी पर न बैठने दो।” इस प्रकार उसने भरत के सिंहासनारूढ होने से अड़चन लगा दी।”(अयोध्याकांड ३४)
*समीक्षा-* झूठ झूठ झूठ!ऐसा सफेद झूठ बोलने में भी शर्म नहीं आई? क्या पता था कि कोई  स्वाध्यायी रामयण पढ़कर आपके झूठ की धज्जियां उड़ा सकता है?  हमें समझ नहीं आता कि इस झूठ के पुलिंदे को हाईकोर्ट के न्यायाधीशों ने निर्दोष कैसे घोषित कर दिया? आश्चर्य है!
पेरियार साहब!आपके दिये सर्ग  ३४ में कहीं नहीं लिखा कि रामने दशरथ से कहा कि -“मेरे वन से वापस आने तक किसी को गद्दी पर न बैठने दो” और इस तरह भरत के सिंहासन पाने में अड़चन लगा दी।
उल्टा इस सर्ग में तो श्रीराम स्वयं भरत को राज्यगद्दी देने का अनुमोगन करते हैं।लीजिये,प्रमाणों का अवलोकन करें:-
भवान् वर्षसहस्राय पृथिव्या नृपते पतिः ।
अहं त्वरण्ये वत्स्यामि न मे राज्यस्य काङ्‌क्षिता ॥ २८ ॥
“महाराज ! आप सहस्रों(अनेक) वर्षों तक इस पृथ्वीके अधिपति होकर रहें। मैं तो अब वनामें ही निवास करूंगा। मुझे राज्य लेनेकी इच्छा नहीं।॥२८॥
नव पञ्च च वर्षाणि वनवासे विहृत्य ते ।
पुनः पादौ ग्रहीष्यामि प्रतिज्ञान्ते नराधिप ॥ २९ ॥
“नरेश्वर ! चौदह वर्षों तक वनमें घूम फिरकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करके मैं पुनःआपके युगल चरणों को मस्तक नवाऊंगा ॥२९॥(अयोध्याकांड सर्ग ३४)
हम डबल चैलेंज देकर कहते हैं कि रामायण में रामजी ने कहीं नहीं कहा कि-” मेरे आने तक किसी को गद्दी पर बैठने मत देना।”अपने कहे शब्द निकालकर दिखावें अन्यथा चुल्लू भर पानी में डूब मरें।
आपके चेले ललई ने भी इसका कोई स्पष्टीकरण न दिया।होगा तब देंगे न!
 इस सर्ग में इसके विपरीत श्रीराम भरत को गद्दी देने की बात करते हैं:-
मा विमर्शो वसुमती भरताय प्रदीयताम् ॥ ४४ ॥
“आपके मन में कुछ भी अन्यथा विचार आना उपयोगी नहीं। आप  सारी पृथ्वी भरतको दे दीजिये।”
अब क्या ख्याल है महाशय!कहिये,कि आपने झूठा आक्षेप लगाकर श्रीराम कीचड़ उछालने का दुष्प्रयत्न किया जो सर्ग खोलते ही ध्वस्त हो गया।
*आक्षेप-२०-*राम ने यह कहकर सत्यता व न्याय का गला घोंटा,कि,”यदि मुझे क्रोध आया तो मैं स्वयं अपने शत्रुओं को मारकर या कुचलकर स्वयं राजा बन सकता हूं-किंतु मैं यह सोचकर रुक जाता हूं,कि प्रजा मुझसे घृणा करने लगेगी।”(अयोध्याकांड ५३)
*समीक्षा-*इस सर्ग के २५,२६
श्लोक में श्रीराम ने कहा था:-
एको ह्यहमयोध्यां च पृथिवीं चापि लक्ष्मण ।
तरेयमिषुभिः क्रुद्धो ननु वीर्यमकारणम् ॥ २५ ॥
’लक्ष्मण !यदि मैं कुपित हुआ तो अपने बाणों से अकेला अयोध्यापुरी तथा समस्त भूमण्डल पर निष्कण्टक बनकर आपने अधिकारमें ला सकता हूं, परंतु पारलौकिक हितसाधनमें बल पराक्रम कारण  नहीं होता। (इसलिये मैं ऐसा नहीं करता।) ॥२५॥
अधर्मभयभीतश्च परलोकस्य चानघ ।
तेन लक्ष्मण नाद्याहमात्मानमभिषेचये ॥ २६ ॥
’निष्पाप लक्ष्मण ! मैं अधर्म और परलोकके भयसे रह जाता हूं, इसलिये आज अयोध्या के राज्यापर अपना अभिषेक नहीं कराता’॥२६।।
‘शत्रुओं को मारकर कुचल कर राजा कर सकता हूं’- ये आपके घर का आविष्कार है जिससे आप श्री राम के मुख से भरत को उनका शत्रु सिद्ध कर सकें। परंतु आप की चाल यहां नहीं चलेगी महोदय 53 वें सर्ग में  श्रीराम ने लक्ष्मण से वे बातें कही हैं जो उनको वापस आयोध्या भेजने तथा परीक्षा लेने के लिए कही है। यह श्रीराम के मूल विचार नहीं है अतः इस पर आक्षेप करना ठीक नहीं वैसे अवलोकन किया जाए तो इन श्लोकों में कोई दोष नहीं है यह बात बिल्कुल सत्य है कि श्री राम पूरी त्रिलोकी को अपने बाणों के बल से जीत सकते थे। परंतु धर्म और परलोक के लिए उन्होंने ऐसा प्रयास नहीं किया। इस पर भला क्या आरोप लगाया जा सकता है ?यदि श्रीराम ने स्वयं बानो द्वारा बलपूर्वक अपना राज्य प्राप्त किया होता तब उन पर दोष लग सकता था ,परंतु कहने मात्र से दोष क्यों लगेगा? यह तो वस्तुस्थिति है ।उन्होंने तो देवताओं को पराजित करने वाले रावण और कुंभकर्ण तक का मर्दन किया ऐसे वीर योद्धा के लिए मात्र अयोध्या की गद्दी प्राप्त करना हंसी खेल है ।परंतु श्रीराम धर्म की मर्यादा का पालन करते हुए भी यह अनुचित प्रयास नहीं करना चाहते थे ,इसीलिए तो श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता हैं।अतः उन्होंने ऐसा कहकर सत्य और न्याय का गला नहीं घोंटा। हां,मूलनिवासियों के तथाकथित पूज्य आदर्श रावण ने पति और देवर अनुपस्थिति में मां जानकी सीता को कपट संन्यासी बनकर उनका हरण कर लिया।रावण के इस कृत्य पर क्या कहना है आपका?
*आक्षेप-२१-* उसने अपनी स्त्री सीता से कहा कि  -“तुम बिना रुचि जाने भरत के लिए जो भोजन बनाती हो,वह आगे चलकर हमारे लिये लाभदायक रहेगा।” (अयोध्याकांड २६)
*समीक्षा-* हे परमेश्वर! देख,ये लोग किस तरह झूठे और निराधार आरोप लगाकर भगवान श्रीराम को कलंकित करने का दुष्प्रयास कर रहे हैं।क्या इन पर तेरा दंड नहीं चलेगा? अवश्य चलेगा और धूर्त लोग भागते दिखाई देंगे।
पेरियार साहब!लगता है जानबूझकर  झूठे आरोप लगाते हैं ताकि पुस्तक का आकार बढ़ जाए। परंतु आपके दिए हुए सर्ग में श्रीराम ने मां सीता से ऐसी कोई भी बात नहीं कही। आप यह सिद्ध करना चाहते हैं कि मां सीता भरत के लिये भोजन में उनकी रुचि के विरुद्ध सामग्रियां बनाती थीं। एक तो भगवती सीता श्री राम की पत्नी थीं ,कोई दासी नहीं थी जो भोजन बनाया करती थीं। राजा महाराजाओं के महलों में खानसामें और बावर्ची रहते हैं जो 56 प्रकार के भोग बनाना जानते हैं ।क्या अयोध्या के सभी बावर्चियों ने आत्महत्या कर ली थी जो मां सीता को भरत के लिए भोजन बनाना पड़े!एक तो सीता भोजन बनाए वह भी भरत के लिए उसकी रुचि के विरुद्ध, परंतु अपने पति के लिए भोजन ना बनाएं।वाह वाह!! क्या कहने!कम से कम झूठ तो ढंग से बोला करें । भला इस प्रकार की बुद्धि विरुद्ध वाद को कौन बुद्धिमान व्यक्ति मानेगा? हम डबल चैलेंज के साथ कहते हैं कि रामायण में मांसीता के मुख से कहे जाने वाले ऐसे शब्दों को हू-ब-हू निकाल कर दिखावें वरना चुल्लू भर पानी मिथ्या भाषण का प्रायश्चित करें।
सर्ग २३ में तो श्रीराम मां सीता को अपनी अनुपस्थिति में भरत के प्रति उचित व्यवहार करने का उपदेश देते हैं।
इस सर्ग में श्रीराम ने सीता जी से भरत के विषय में निम्नलिखित बातें कहीं उनका संक्षिप्त उल्लेख करते हैं:-
१:- श्लोक २५- भरत के सामने मेरे गुणों की प्रशंसा ना करना।
२:- श्लोक २६-भरतके समक्ष सखियों के साथ भी बारंबार मेरी चर्चा ना करना।
३:- श्लोक २७:- राजा ने उन्हें सदा के लिए युवराज पद दे दिया है अब वही राजा होंगे।
४:-श्लोक ३३:- भारत और शत्रुघ्न मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय है अतः तुम्हें इन दोनों को विशेष कहा आपने भाई और पुत्र के समान देखना और मानना चाहिये।
५:-श्लोक ३४- भरत की इच्छा के विरुद्ध कोई काम नहीं करना क्योंकि इस समय वह मेरे देश और कुल के राजा हैं।
६:-श्लोक ३७:- तुम भरत के अनुकूल बर्ताव करती हुई धर्म एवं सत्यव्रत में तत्पर रहकर यहां निवास करो।
कहिए महाराज! यहां पर आप की कही हुई कपोलकल्पित बातें कहां हैं?आप कभी भी श्रीराम को भरत का शत्रु सिद्ध नहीं कर सकते ।वस्तुतः तीनों भाई श्रीराम के लिए प्राणों के समान प्रिय थे।इसलिए अपने अभाव में वह मां जानकी को भरत के अनुकूल बरतने का उपदेश करते हैं ।साथ ही भरत और शत्रुघ्न को भाई और पुत्र के समान मानने का आदेश देते हैं ।यहां न तो मां सीता के भरत के लिए भोजन बनाने का उल्लेख है और न ही उसे भरत की रुचि के विरुद्ध बनाने का।
कुल मिलाकर आपका किया हुआ आक्षेप रामायण में कहीं नहीं सिद्ध होता।आपको रामायण के नाम से झूठी बातें लिखते हुए शर्म आनी चाहिए। झूठे पर परमात्मा के धिक्कार है!
………क्रमशः ।
मित्रों !पूरा लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद। कृपया इसे अधिक से अधिक शेयर करें। अगले लेख में श्रीराम पर किए गए अगले सात आक्षेपों का खंडन किया जाएगा।
।।मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र की जय।।
।।योगेश्वर भगवान कृष्ण चंद्र की जय।।
।।ओ३म्।।
नोट : इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आर्यमंतव्य  टीम  या पंडित लेखराम वैदिक मिशन  उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है. |

सच्ची रामायण का खंडन भाग-२०

सच्ची रामायण का खंडन भाग-२०
*अर्थात् पेरियार द्वारा रामायण पर किये आक्षेपों का मुंहतोड़ जवाब*
*- कार्तिक अय्यर*
नमस्ते मित्रों! पिछले लेख में हमने *भगवान श्रीराम* पर किये ६ आक्षेपों का खंडन किया।अब आगे के आक्षेपों में पेरियार  साहब के आक्षेपों का स्पष्टीकरण और शब्द प्रमाण ललई सिंह यादव ने *”सच्ची रामायण की चाबी”*में दिया है।हम दोनों को साथ में उद्धृत करके उनकी आलोचना कर रहे हैं।पाठकगण हमारी समीक्षा पढ़कर आनंद उठायें।आगे-
*आक्षेप-७-* उसने शोक प्रकट करते हुए अपनी माता से कहा था कि ऐसा प्रबंध किया गया है  कि मुझे राज्य से हाथ धोना पडेंगा ।राजवंशीय भोग विलास एवं स्वादिष्ट मांस की थालियां छोड़कर मुझे वन में जाना होगा। मुझे वनवास जाना होगा और वन के कंद मूल खाने पड़ेंगे। (अयोध्या कांड अध्याय  २०)
*आक्षेप-८-* राम ने भारी हृदय से अपनी माता व स्त्री से कहा था कि जो गद्दी मुझे मिलनी चाहिए थी वह मेरे हाथों से निकल गई और मेरे वनवास के जाने के लिए प्रबंध किया गया है।(अयोध्याकांड २०,२६,१४)
*आक्षेप-९-* राम ने लक्ष्मण के पास जाकर पिता दशरथ को दोषी तथा दंडनीय बताते हुए कहा -“क्या कोई ऐसा भी मूर्ख होगा जो अपने उस पुत्र को वनवास दे जो सब है उस की आज्ञाओं का पालन करता रहा?”(अयोध्याकांड अध्याय ५३)
इसका स्पष्टीकरण देते हुये ललई सिंह ने वाल्मीकीय रामायण सर्ग २०/२८,२९ का प्रमाण देकर लिखा है कि श्रीराम ने अपनी माता से कहा कि -” मैं तो दंडकारण्य जाने को तैयार हूं फिर इस आसन से क्या सरोकार अब तो मेरे लिए बिस्तर मुनियों वाले आसन का समय उपस्थित हुआ है अब मैं सभी सांसारिक लोगों का त्याग करके 14 वर्ष तक कंदमूल खाते हुए मुनियों के साथ रह कर मुनियों के साथ जीवन बिताऊंगा।”
स्पष्टीकर :- सांसारिक भोग का अर्थ है राजवंशीय भोग विलास और स्वादिष्ट मांस की थालियां।
*समीक्षा-*
१:- पेरियार साहब लोगों और तथ्यों को तोड़ मरोड़ का आक्षेप लगाने की कला में निपुण हैं। कृपया बताइए श्री राम ने शोक प्रकट करते हुए कहा यह कौन से शब्दों का अर्थ है रामायण में तो शोक प्रकट करना लिखा ही नहीं है अपितु रामायण में तो लिखा है कि राज्य अभिषेक की घोषणा के समय एवं वनवास जाते समय श्री राम के मुख्य मंडल पर कोई विकार नहीं आया हम पिछले आक्षेप ६ के उत्तर में यह प्रमाण दे चुके हैं (अयोध्याकांड १९/३२,३३)।
ललई सिंह की भी परीक्षा कर लेते हैं:-
देखिये,अयोध्याकांड सर्ग २०
देवि नूनं न जानीषे महद् भयमुपस्थितम् ।
इदं तव च दुःखाय वैदेह्या लक्ष्मणस्य च ॥ २७ ॥
श्रीराम ने देनी कौसल्या से कहा- ‘देवि ! निश्चितही तुमको पता नहीं कि तुमको महान भय उपस्थित हुआ है।इस समय मैं जो बात बताने वाला हूं वह सुनकर तुमको, सीताकोऔर लक्ष्मणको भी दुःख होगा, तथापि मैं बताऊंगा॥२७॥
गमिष्ये दण्डकारण्यं किमनेनासनेन मे ।
विष्टरासनयोग्यो हि कालोऽयं मामुपस्थितः ॥ २८ ॥
अब तो मैं दण्डकारण्य को जाऊंगा, इसलिये ऐसे बहुमूल्य आसनों की मुझे क्या आवश्यकता है ? अब मेरे लिये  कुश की चटाई पर बैठने का समय आया है ॥२८॥
चतुर्दश हि वर्षाणि वत्स्यामि विजने वने ।
कन्दमूलफलैर्जीवन् हित्वा मुनिवदामिषम् ॥ २९ ॥
मैं राजभोग्य वस्तुओं का त्याग करके मुनियों के समान कंद, मूल और फलों से जीवन-निर्वाह करते हुये चौदह वर्षों तक निर्जन वनमें निवास करूंगा ॥२९॥
भरताय महाराजो यौवराज्यं प्रयच्छति ।
मां पुनर्दण्डकारण्यं विवासयति तापसम् ॥ ३० ॥
महाराज युवराज पद भरतको दे रहे हैं और मुझे तपस्वी बनाकर दण्डकारण्य जाने की आज्ञा दी है॥३०॥
कहिये महाशय! श्लोक २९ में तो केवल इतना लिखा है कि श्री राम ने देवी कौशल्या को वनवास जाने का समाचार दिया यहां कहीं भी नहीं लिखा कि श्रीराम ने शोक प्रकट किया। हां, श्रीराम ने यह अवश्य कहा कि यह बात सुनकर कौशल्या लक्ष्मण और सीता को दुख अवश्य होगा।
श्लोक २९  में श्री राम कहते हैं कि राजवंशीय भोग त्याग कर मुझे ऋषि मुनियों की तरह कंद मूल और फल खाने होंगे। यहां  पर स्वादिष्ट मांस की थालियां यह अर्थ कहां से उठा लाए?शायद कुंभकर्ण को उठाने के लिये राक्षसों ने लाये होंगे-उसके धोखे में श्रीराम पर आरोप लिख दिया। प्रतीत होता है कि “आमिष” से शब्द से आपको भ्रम हुआ होगा। आपने मान रखा है कि आमिष का अर्थ हर जगह मांस ही होगा परंतु यह सत्य नहीं है आमिष का अर्थ राजसी भोग भी होता है। और यहां पर आम इसका यही अर्थ रहना समीचीन है। देखिये,इसी सर्ग में कौसल्या देवी श्रीराम को लड्डू,खीर आदि देती हैं,देखो-
देवकार्यनिमित्तं च तत्रापश्यत् समुद्यतम् ।
दध्यक्षतघृतं चैव मोदकान् हविषस्तथा ॥ १७ ॥
लाजान् माल्यानि शुक्लानि पायसं कृसरं तथा ।
समिधः पूर्णकुम्भांश्च ददर्श रघुनन्दनः ॥ १८ ॥
रघुनंदन ने देखा कि वहां देवकार्यके लिये(अग्निहोत्र) बहुत सी सामग्री संग्रह करके रखी हुई थी।दही, अक्षत, घी, मोदक, हविष्य, धान्य की लाही, (शुभ्र) सफेद माला, खीर, खिचडी, समिधा और भरे हुयेकलश – ये सब वहां दृष्टिगोचर हुये ॥१७-१८॥
श्रीराम ने इनको ही “आमिष” खाने से मना किया और कहा कि मैं इनको नहीं खा सकता;अब तो केवल मैं कंद-मूल-फल का ही सेवन कर सकता हूं।अब प्रश्न है कि वहां तो मांस था ही नहीं तो श्रीराम आमिष किसे कह रहे हैं?देखिये,आमिष शब्द के कई अर्थ हैं जिसमे एक अर्थ है– राजभोग ! देखिये— मेदिनी कोष – आकर्षणेपि पुन्सि स्यादामिषं पुन्नपुन्सकम् ! भोग्य वस्तुनि संभोगेप्युत्कोचे पललेपि च !! —यहा भोग्यवस्तु भी आमिष शब्द का अर्थ बतलायी गयी है और वह भोग्य वस्तु है– खीर तथा लड्डू आदि !उसे ही श्रीरामने आमिष कहकर नहीं खाया।अतः सिद्ध है कि श्रीराम मांसाहार न तो पहले करते थे न बाद में।दरअसल उस समय आर्य मांसाहार करते ही न थे।
यह वचन भी उन्होंने शमभाव में कहा है शोक में नहीं। इससे सिद्ध है कि श्री राम पर मांस भक्षण, शोक करने ,भारी हृदय से राज्य छिनने की बात कहनेके आरोप मिथ्या हैं शोक तो अयोध्यावासी, भरत, कौसल्या, दशरथ ,लक्ष्मण, सीता आदि ने व्यक्त किया था श्रीराम तो संभव में स्थित थे।स्पष्टीकरण मैं ललई सिंह ने स्वादिष्ट मांस की खा लिया जो लिखा है वह पूर्णतः गलत है।
ललई सिंह ने जो उत्तरकांड ४२/१७-२२का प्रमाण देकर श्रीराम का मद्यपान,अप्सराओं नृत्य आदि लिखा है,वो उत्तरकांड के प्रक्षिप्त होने से अप्रामाणिक है। अयोध्याकांड २६/२१-२३ में श्रीराम का मां सीता को वनवास की सूचना देना लिखा है।आपके दिये उद्धरण में आक्षेप लायक कुछ नहीं है।यहां श्रीराम कोई शोक नहीं कर रहे,केवल सूचना दे रहे हैं।हां,आपने अयोध्याकांड सर्ग ५३/१०उद्धृत किया है कि,”हे लक्ष्मण! संसार में ऐसा कौन अपढ़(मूर्ख)मनुष्य भी भला कौन होगा -जो अपनी स्त्री के लिये मेरे जैसे आज्ञाकारी पुत्र को त्याग देगा?”इसका स्पष्टीकरण यह है कि यह श्रीराम के मूलविचार नहीं थे। इस सर्ग के
श्लोक ६सेश्लोक २६ तक श्रीरामचद्रने जो बातें कही हैं वो लक्ष्मणकी परीक्षा लेने के लिये और उनको अयोध्या में वापस भेजने के लिये कही हैं,वास्तविकता में उनकी ऐसी मान्यता न थी।यही बात यहां सब(व्याख्याकारों) टीकाकारों ने स्वीकार की है। अतः श्रीराम के ऊपर यहां कोई आप सेव नहीं हो सकता है कि कैकेयी, भरत,दशरथ आदि के प्रति श्री राम की ऐसी भावना नहीं थी यह हम आगे स्पष्ट करेंगे।
*आक्षेप-१०-* इसका सार है कि श्रीराम ने अनेक स्त्रियों से अपने ऐंद्रिक विषयों की तृप्ति के लिये विवाह किया।यहां तक कि नौकरों की स्त्रियों को भी न छोड़ा।मन्मथ दातार आदि अपने साक्षियों का उल्लेख करके यह आक्षेप किया है।
आइटम नं ९ के शीर्षक से ललई सिंह ने इसके स्पष्टीकरण में निम्न प्रमाण दिये हैं,वे संक्षेप में लिखते हैं:-
१:-विमलसूचरि रचित पउमचरिउ में सुग्रीव का रामजी को १३ कन्यायें भेंट करना।उत्तरचरित में लक्ष्मण की १६००० और राम की ८००० पत्नियां लिखी हैं।
२:-गुणभद्र कृत उत्तरपुराण में लक्ष्मण की १६००० और राम की ८००० रानियों का उल्लेख।
३:-भुषुंडि रामायण में सहस्रों पत्नियां,खोतानी रामायण में सीता का राम लक्ष्मण दोनों की स्त्री होनाइत्यादि।
४:- कामिल बुल्के की रामकथा का संदर्भ देकर लिखा वाल्मीकि ने अपनी रचना में यत्र-तत्र राम की एक से अधिक पत्नियों का उल्लेख किया है।दो प्रमाण दिये हैं:-
पहला:- अयोध्याकांड सर्ग ८/१२-“हृष्टा खलु भविष्यंति रामस्य परमा स्त्रियः”-मंथरा ने कहा कि राम के अभिषेक के बाद उनकी स्त्रियां फूली नहीं समायेंगी।”
दूसरा-“युद्ध कांड २१/३ समुद्र तट पर प्रयोपवेशन के वर्णन में अनेकधा परम नारियों की भुजाओं से पुष्ट राम की बांह का उल्लेख ।
*समीक्षा-* हम यह डंके की चोट पर कहते हैं कि मां सीता को छोड़कर भगवान श्री राम की और कोई पत्नी नहीं थी। आपने जो चार बिंदुओं में प्रमाण दिए हैं उन से सिद्ध नहीं होता कि श्री राम की एक से अधिक पत्नियां थी सबसे पहले तो पउमचरिउ, उत्तरपुराण,भुषुंडि रामायण आदि  नवीन ग्रंथों का हम प्रमाण नहीं मानते क्योंकि यह सब अनार्ष होने से अप्रमाणिक हैं। वैसे भी इनमेंजोे 16000 और 8000 रानियां होना असंभव गप्पें भरी पड़ी हैं। हमें केवल वाल्मीकीय रामायण आर्ष होने प्रामाणिक है इसीलिए उसके जो आपने दो प्रमाण दिए हैं उन पर विचार करते हैं:-
पहला,अयोध्याकांड ८/१२:-
हृष्टाः खलु भविष्यन्ति रामस्य परमाः स्त्रियः ।
अप्रहृष्टा भविष्यन्ति स्नुषास्ते भरतक्षये ॥ १२ ॥
श्रीरामाके अंतःपुर की परम सुंदर स्त्रियां- सीतादेवी और उनकी सखियां निश्चितही खूब प्रसन्न होंगी और भरतके प्रभुत्वका नाश होने से तेरी बहुयें(और अंतःपुर की स्त्रियां) शोकमग्न होंगी॥१२॥
यहां पर “परमा स्त्रियः” का अर्थ नागेश भट्ट और अन्य टीकाकारों ने “मां सीता और उनकी सहेलियां”किया है।जो कि बिलकुल उपयुक्त है।क्योंकि राम लक्ष्मण की सीता और उर्मिला के सिवा अन्य कियी स्त्री का नाम तक वाल्मीकीय रामायण में नहीं है।
 हम पेरियार कंपनी को चैलेंज देते हैं, कि श्रीराम और लक्ष्मण की एक से अधिक स्त्रियों के नाम वाल्मीकि रामायण से निकालकर दिखायें अन्यथा चुल्लू भर पानी में डूब मरें।
दूसरा,युद्ध कांड २१/३:-मणिकाञ्चनकेयूर मुक्ताप्रवरभूषणैः ।
भुजैः परमनारीणां अभिमृष्टमनेकधा ॥ ३ ॥
अयोध्या में रहते समय मातृकोटिकी अनेक उत्तम नारियों ने मणि और स्वर्णसे बने केयूर वैसे ही  मोती के श्रेष्ठ आभूषणों से विभूषित अपने कर-कमलों द्वारा स्नान-मालिश आदि करते समय अनेक बार श्रीरामकी इस भुजा को सहलाीे, दबाती थीं॥३॥
यहां “परमनारी” श्रीराम के बचपन की धाइयों एवं परिचारिकाओं का वाचक है,जिन्होंने स्नान एवं मालिश के समय सहलाया व दबाया था।नागेश भट्टादि टीकाकार भी यही अर्थ करते हैं। वरना कौन मानेगा कि रामजी की रानियों ने उनको नहलाया और मालिश की,वो भी उनके बचपन में!क्या बचपन में ही बहुत से विवाह कर रखे थे?
हां,एक बात बताते जाइये।यदि श्रीराम की अनेक स्त्रियां थीं तो वनवास के समय केवल सीताजी को क्यों समाचार दिया? और उन्हींको साथ क्यों ले गये?एक सीता ने वन जाने के लिये इतना हठ किया,यदि ८००० रानियां थीं तो बाकी ७९९९ रानियां तो विलाप करके और वन जाने का हठ करके रामजी की जान खा जातीं।उनका कहीं वर्णन नहीं है।और यदि कई स्त्रियां थीं तो केवल एक सीता के लिये “हे सीते!”,” हाय सीते!” करते क्यों फिरे और रावण से दुश्मनी करली? इतना जोखिम उठाने की जगह खाली हाथ लौट जाते। ८००० में से एक गई तो कौन सा तूफान आ गया? कई सुंदर स्त्रियां रही होंगी,उनमें से एक को मुख्य महिषी बना देते!
  पाठकगण! सिद्ध है कि श्रीराम एकपत्नीकव्रत थे।यहां तक कि *”उत्तरकांड का प्रणेता प्रक्षेप कर्ता भी उनको एकपत्नीकव्रत मानता है।उत्तरकांड लेखक भी मानता है कि श्रीराम ने सीता त्याग के बाद सीता की जगह किसी और को रानी नहीं बनाया,अपितु सीताजी की स्वर्ण प्रतिमाओं का यज्ञ में प्रयोग किया।
श्रीराम आपकी तरह एक से अधिक विवाह करने वाले न थे।जितेंद्रिय एवं संयमी थे।(पेरियार की दो पत्नियां थीं)।
हम पेरियार मंडली को डबल चैलेंज देते हैं कि सीताजी के अलावा वाल्मीकीय रामायण में से रामजी की किसी और पत्नी का नाम भी निकालकर दिखावें अन्यथा मुंह काला करके चुल्लू भर पानी में डूब मरें।
ऐसे इंद्रियविजयी पर विलासी होने का आक्षेप लगाना मानसिक दिवालियापन,हठ और धूर्तपना है।
*अतिरिक्त प्रमाण*:-
श्रीराम के एकपत्नीकव्रत पर कुछ अन्य साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं:-
१:-उत्तरकांड का प्रणेता और मिलावट कर्ता भी श्रीराम को एकपत्नीकव्रत ही मानता है:-
इष्टयज्ञो नरपतिः पुत्रद्वयसमन्वितः ॥ ७ ॥
न सीतायाः परां भार्यां वव्रे स रघुनन्दनः ।
यज्ञे यज्ञे च पत्‍न्यौर्थं जानकी काञ्चनी भवत् ॥ ८ ॥
यज्ञ पूरा करके रघुनंदन राजा श्रीराम अपने दोनों पुत्रों के साथ रहने लगे।उन्होंने सीता के अतिरिक्त दूसरी किसी भी स्त्रीसे विवाह नहीं किया। प्रत्येक यज्ञमें जब भी धर्मपत्‍नीकी आवश्यकता होती श्रीरघुनाथ सीताकी सुवर्णमयी प्रतिमा बनाकर उसका प्रयोग करते थे ॥७-८॥(उत्तरकांड सर्ग ७७)
२:-आनंदरामायण विलासखंड ७ “अन्य सीतां विनाSन्या स्त्री कौशल्या सदृशी मम। न क्रियते परा पत्नी मनसाSपि न चिंतये।।”
श्रीराम कहते हैं कि सीता को छोड़कर सारी स्त्रियां मेरे लिये मां कौसल्या के समान है।किसी और को पत्नी करना तो दूर,मैं पराई स्त्री के बारे में चिंतन तक नहीं कर सकता।
३:- रामाभिराम टीकाकार श्रीनागेश भट्ट ने अयोध्याकांड ८/१२ में परमा स्त्रियः का यह अर्थ किया है:-
“स्त्रियः इति बहुचनेन सीतासख्या इत्यर्थः” अर्थात् परम स्त्रियों का तात्पर्य सीता जी की सखियों आदि से है।
४:- युद्ध कांड २१/३ का अर्थ श्रीनागेश भट्ट ने में परमनारियों का अर्थ एकपत्नीकव्रत होने से अन्य पत्नियों का अभाव माना है। यहां इसका अर्थ “भुजैरकनेधा स्नपलंकरणादिकालेsभिमृष्टम् स्पृष्टम” यानी उत्तम धाइयां श्रीराम को स्नान कराने,आभूषण धारण कराने आदि के समय अपनी दिव्य तथा अलंकृत भुजाओं से उनकी भुजा का स्पर्श करती थीं,इससे है सिद्ध है कि श्रीराम की सीताजी के सिवा और कोई पत्नी न थीं।
५:
इस विषय पर अभी इतना ही पर्याप्त है।
*आक्षेप-११-* यद्यपि राम के प्रति कैकई का प्रेम संदेह युक्त नहीं था किंतु राम का प्रेम कैकेयी के प्रति बनावटी था।
*आक्षेप-१२-* राम कहकर के प्रति स्वाभाविक एवं सच्चा होने का बहाना करता रहा और अंत में उसने कहकर पर दुष्ट स्त्री होने का आरोप लगाया। अयोध्याकांड ३१,५३
*आक्षेप-१३-* यद्यपि कैकेई दुष्टतापूर्ण पूर्ण तथा नीच विचारों से रहते थे तथापि राम ने उस पर दोषारोपण किया कि वह मेरी माता के साथ नीचता का व्यवहार कर सकती है। (अयोध्या कांड ३१,५३)
*आक्षेप-१४-* राम ने कहा कि कैकेयी ही मेरे बाप को मरवा सकती है इस प्रकार उसने कैकई पर दोषारोपण किया।(अयोध्याकांड ५३)
इस पर ललई सिंह ने स्पष्टीकरण किया है:-
१:-अयोध्याकांड सर्ग ३१/१३,१७ देकर आपने लिखा है कि -“राजा अश्वपति की पुत्री के के राज्य कर अपने दुखिया सौतों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करेगी।”
(सा हि राज्यमिदं प्राप्य नृपस्याश्वपतेः सुता ।
दुःखितानां सपत्‍नीनां न करिष्यति शोभनम् ॥ १३ ॥ )[नोट:-ललई जी ने संस्कृत श्लोक नहीं दिया है,यह हम ही हर जगह प्रस्तुत कर रहे हैं।]
२:- अयोध्याकांड ५३/६,७,१४ का प्रमाण देकर लिखा है कि श्रीराम के अनुसार कैकेयी उनके पिता को मरवा देगी,पूरा राज्य हस्तगत कर लेगी इत्यादि।
*समीक्षा-* १:-महाशय आप इस सर्ग का अवलोकन करेंगे तो आपको ज्ञात होगा कि लक्ष्मण श्री राम और सीता का संवाद सुन लेते हैं और श्रीराम से वनवास जाने का आग्रह करते हैं परंतु राम जी उनको कई प्रकार से मनाने की कोशिश करते हैं परंतु अंततः उन्हें लक्ष्मण को साथ वन में जाने की आज्ञा देनी पड़ी।राम लक्ष्मण को अयोध्या में ही रहकर सुमित्रा ,कौशल्या, पिता दशरथ आदि की सेवा के लिए नियुक्त करना चाहते हैं। यह श्लोक श्रीराम ने लक्ष्मण को अयोध्या में रोकने के लिए ही कहा था यह आवश्यक नहीं कि श्रीराम के मन में भी यही भावना थी। देखा जाए तो श्रीराम का यह कथन बिल्कुल भी अनुचित नहीं है ,क्योंकि राज्य मिल जाने के बाद कैकेई अपनी सौतों को पीड़ा पहुंचा सकती थी।मंथरा ने स्वयं कहा था कि कैकेई ने कौशल्या के साथ बहुत बार अनुचित व्यवहार किया था इसे संक्षेप में लिखकर हम कैकेई के चरित्र चित्रण में इसका विस्तार करेंगे और प्रमाणों के साथ सत्य को स्पष्ट करेंगे। फिलहाल इतना जानना चाहिए श्री राम उक्त कथन बिल्कुल भी अनुचित या गलत नहीं है। उनका कथन धरातल की सच्चाई ही प्रकट करता है।
२:- सर्ग 53 का स्पष्टीकरण हम पीछे दे चुके हैं इस सर्ग में श्रीराम ने लक्ष्मण को वापस अयोध्या लौट आने के लिए लक्ष्मण जी की बातों को दोहराया है । श्रीराम के मन में ऐसी भावनाएं नहीं थीं। इस संदर्भ में अभी इतना ही।
……..क्रमशः।
मित्रों! पूरी पोस्ट पढ़ने के लिये धन्यवाद।कृपया अधिकाधिक शेयर करें। अगले लेख में आगे के आक्षेपों का उत्तर दिया जायेगा।
।।मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र की जय।।
।।योगेश्वर कृष्ण चंद्र की जय।।
।।ओ३म्।।
नोट : इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आर्यमंतव्य  टीम  या पंडित लेखराम वैदिक मिशन  उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है. |

वेदों में मांसाहार: गौरव आर्य

ved me mansahar

 

जी हाँ बिलकुल सही शीर्षक है मुसलमानों को अत्यंत लुभावना लगता होगा यह शीर्षक पढ़कर मुझे भी लगता है में जब भी ऐसे शीर्षक पढ़ता हूँ मुझे प्रसन्नता होती है और विश्वास बिना पढ़े पहले ही हो जाता है की अब मुझे मुसलमानों और वामियों की मुर्खता पढने को मिलेगी और यही होता है, चलिए आप भी पढ़िए और आनन्द उठाइये और सोशल मिडिया पर हर तरफ भेजिए जिससे इन मूर्खों का पर्दाफास हो सके

मांसाहार के समर्थक मुसलमान, वामपंथी और जिह्वा स्वाद के आगे बेबस हिन्दू सनातन धर्म पर मांस भक्षण का आरोप लगाते है और ऐसे ऐसे प्रमाण देते है जिनमें सच्चाई १% भी नहीं होती वेसे तो इन आरोपों में इनकी बुद्धि बिलकुल नहीं होती है क्यूंकि जो कौम भेड़चाल की आदि हो जो परजीवियों सा व्यवहार करें वह कौम दूसरों के लगाये आरोपों का ही उपयोग कर अपनी वाहवाही करवाने में लगी रहती है

 

ऐसे ही कुछ मूर्खों का पाला हमसे पड़ा जिनके आरोप पढ़कर हंसी आती है

चलिए आपको कुछ आरोप और उनके प्रति हमारे (पण्डित लेखराम वैदिक मिशन द्वारा) दिए जवाबों से आपको भी अवगत करवाते है

 

मुस्लिम:- जो लोग इस्लाम मे जानवरोँ की कुर्बानी की आलोचना करते हैं उन्हें अपने वेदों को भी पढ लेना चाहिए :-

वेदों मे मनुष्य बलि का जिक्र :-

देवा यदयज्ञ————पुरूषं पशुम।।
यजुर्वेद ( 31 / 15)
अर्थात : = देवताओं ने पुरूषमेध किया और पुरूष नामक पशु वध का किया ।

 

सनातनी:- पहले तो सच सच बताना ये अर्थ करने वाला गधा कौन था यदि भाष्य करना इतना सरल होता तो आज गल्ली गल्ली जेसे पंक्चर वाले बैठे है वेसे ही भाष्यकार बैठे होते

मुसलमानों की यही कमी है की इनका दिमाग घुटनों में होता है

देवा यद्यज्ञं आया तो मतलब देवताओं ने यज्ञ किया पुरुषं आया तो ! ओह हा पुरुषमेध यज्ञ किया, पशुम आया तो अच्छा पुरुष नाम का पशु था |

सच में तुम लोगों की मुर्खता का कोई सानी नहीं है

http://www.onlineved.com/yajur-ved/?language=2&adhyay=31&mantra=15

इस लिंक पर जाकर सही अर्थ पढो मूर्खों कही भी मनुष्य हत्या जैसी बात नहीं है

मुस्लिम:- कोई इस वेद भाष्य को गलत साबित करके दिखाए ।

सनातनी:- लो कर दिया गलत साबित जाओ कुछ नया लाओ मूर्खों

मुस्लिम:- हिंदू धर्म ग्रंथो मे एक भी धर्म ग्रंथ ऐसा नही है जहां जीव हत्या और कुर्बानी का जिक्र मौजूद ना हो पढो :-

वेद , महाभारत , मनुस्मृति, रामायण मे मांस भक्षण और जीव हत्या :-

1 जो मांस नहीं खाएगा वह 21 बार पशु योनी में पैदा होगा-मनुस्मृति (5/35)

सनातनी:- यह श्लोक प्रक्षिप्त है यानी बाद में मिलाया हुआ है मनु प्राणी मात्र की हत्या के विरोधी थे, यह मिलावट सनातन धर्म को और महाराज मनु के लिखे संविधान को समाप्त करने के उद्देश्य से किया गया वामपंथियों का काम है

 

मुस्लिम:- 2 यजुर्वेद (30/15) मे घोडे की बलि कुर्बानी की जाती थी ।

सनातनी:- पुरे मन्त्र में घोडा गधा नहीं दिखा
लगता है जाकिर नाइक के गुण आ गये है जिसे वेदों में हर जगह मोहम्मद दिखता है लिंक देखो पूरा भाष्य पदार्थ के अर्थ सहित

http://www.onlineved.com/yajur-ved/?language=2&adhyay=30&mantra=15

मुस्लिम:- रामायण मे राम और दशरथ द्वारा हिरण का शिकार और मांस भक्षण देखे 🙁 वाल्मिकी रामायण अयोध्या कांड (52/89) गीता प्रेस गोरखपुर प्रकाशन )

सनातनी:- अयोध्याकाण्ड में किसी हिरण को मारने और मांस भक्षण का प्रमाण नहीं

हाँ एक बार जंगली हाथी को मारने के प्रयास में गलती से बाण एक मनुष्य को अवश्य लगा जिसका राजा दशरथ को बहुत दुःख हुआ और उन्होंने उस कर्म को अपना पाप माना और उसी पाप के फलस्वरूप उन्होंने अपना देह त्याग दिया

वास्तव में मूर्खों का सानी कोई नहीं अरे मूर्खों प्रमाण तो सही दिया करो
यह अरण्यकाण्ड के सताईसवे सर्ग में आया हुआ है और इसमें कही मांस भक्षण जैसी बात ही नहीं है वह हिरण भी मारीच राक्षष था जिसने हिरण का रूप धारण कर रखा था जैसे आजकल बहरूपिये रूप धारण करते है वेसे ही

मुस्लिम:- 3 ऋषि वामदेव ने कुत्ते का मांस खाया (मनुस्मृति 10/106)

सनातनी:- यह श्लोक भी प्रक्षिप्त है

मुस्लिम:- ऋग्वेद मे (1/162/10)

सनातनी:- http://www.onlineved.com/rig-ved/?language=2&mandal=1&sukt=162&mantra=10

मुस्लिम:- ऋग्वेद (1/162 /11) मे घोडे की कुर्बानी का जिक्र है ।

सनातनी:- http://www.onlineved.com/rig-ved/?language=2&mandal=1&sukt=162&mantra=11

 

इन दोनों मन्त्रों में कही घोडा नहीं है समझ नहीं आता है ये औरत के मुह वाले घोड़े खच्चर (मेराज) का असर तो नहीं रह गया अभी तक दिमाग में

ये लो मुसलमानों तुम्हारे बेसर पैर के घटिया आरोपों का जवाब

अब जाओं और कुछ नया लाओं जो तुम्हारे जीव हत्यारे मत की इज्जत बचा सके