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संध्या क्या ?,क्यों ?,कैसे ?

संध्या क्या ?,क्यों ?,कैसे ? डा. अशोक आर्य
आर्य समाज की स्थापना से बहुत पूर्व जब से यह जगत् रचा गया है , तब से ही इस जगत् में संध्या करने की परम्परा अनवरत रूप से चल रही है | बीच में एक युग एसा आया जब वेद धर्म से विमुख हो कर कार्यों का प्रचलन आरम्भ हुआ तो संध्या को भी लोग भुलाने लगे किन्तु स्वामी दयानंद सरस्वती जी का हम पर महान् उपकार है , जो हम पुन: वेद धर्म के अनुगामी बने तथा संध्या से न केवल परिचित ही हुए अपितु संध्या करने भी लगे |
संध्या क्या है ?
सृष्टि क्रम में एक निर्धारित समय पर परम पिता परमात्मा का चिंतन करना ही संध्या कहलाता है | इससे स्पष्ट है कि दिन के एक निर्धारित काल में जब हम अपने प्रभु को याद करते हैं , उसका गुणगान करते हैं , उसके समीप बैठ कर उसका कुछ स्मरण करते हैं , बस इस का नाम ही संध्या है |
संध्या कब करें ?
ऊपर बताया गया है कि एक निश्चित समय पर प्रभु स्मरण करना ही संध्या है | यह निश्चित समय कौन सा है ? यह निश्चित समय कालक्रम से सृष्टि बनाते समय ही प्रभु ने निश्चित कर दिया था | यह समय है संधि काल
| संधिकाल से अभिप्राय: है जिस समय दिन व रात का मिलन होता है तथा जिस समय रात और दिन का मिलन होता है , उस समय को संधि काल कहते
हैं | इस से स्पष्ट होता है कि प्रात: के समय जब आकाश मे हल्के हल्के तारे दिखाई दे रहे हों, सूर्य निकलने की तैयारी में हो , इस समय को हम प्रात:कालीन संध्या काल कहते हैं | प्रात:काल का यह समय संध्या का समय माना गया है | इस समय ही संध्या का करना उपयोगी है |
ठीक इस प्रकार ही सायं के समय जब दिन और रात्री का मिलन होने वाला होता है , सूर्य अस्ताचाल की और गमन कर रहा होता है किन्तु अभी तक आधा ही अस्त हुआ होता है | आकाश लालिमा से भर जाता है | इस समय को हम सायं कालीन संध्या समय के नाम से जानते हैं | सायं कालीन संध्या के लिए यह समय ही माना गया है | इस समय ही संध्या के आसन पर बैठ कर हमें संध्या करना चाहिए |
गायत्री जप ही संध्या
वास्तव में गायत्री जप का ही दूसरा नाम संध्या है किन्तु इस गायत्री जप के लिए भी कुछ विधियां बनाई गई है ,जिन्हें करने के पश्चात् ही गायत्री का यह जप आरम्भ किया जाता है | गायत्री जप के लिए भी कुछ लोग यह मानते हैं कि यह जप करते हुए कभी उठना , कभी बैठना तथा कभी एक पाँव पर खडा होना , इस प्रकार के आसन बदलते हुए गायत्री का जप करने को कहा गया है | हम यह सब ठीक नहीं मानते | हमारा मानना है कि गायत्री जप के लिए हम एक स्थिर आसन पर बैठ कर गायत्री मन्त्र का जाप करें | यह विधि ही ठीक है अन्य सब विधियां व्यवस्थित न हो कर ध्यान को भंग करने वाली ही हैं |
संध्या के प्रकार
कुछ लोग कहते हैं कि ब्राह्मण की संध्या भिन्न होती है जबकि ठाकुर लोग कुछ अलग प्रकार की संध्या करते है | इन लोगों ने ऋग्वेदियों की संध्या अलग बना ली है तो सामवेदियों की संध्या कुछ भिन्न ही बना ली है | यह सब विचारशून्य लोग ही कर सकते हैं | परमपिता परमात्मा सब के लिए एक ही उपदेश करता है , सब के लिए उसका आशीर्वाद भी एक ही प्रकार का है तो फिर संध्या अलग अलग कैसे हो सकती है ? अत: संध्या के सब मन्त्र सब समुदायों , सब वर्गों तथा सब जातियों के लिए एक ही हैं |
जाप के पूर्व शुद्धि
ऊपर बताया गया है कि गायत्री जाप का नाम ही संध्या है किन्तु इस जाप से पूर्व शुद्धि का भी विधान दिया गया है | प्रभु उपदेश करते हैं कि हे जीव ! यदि तू मुझे मिलने के लिए संध्या के आसन पर आ रहा है तो यह ध्यान रख कि तूं शुद्ध पवित्र हो कर इस आसन पर बैठ | इस शुद्धि के लिए शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धि, चित और अहंकार , यह छ: प्रकार की शुद्धि आवश्यक है | इस निमित आचमन से शरीर की शुद्धि , अंग स्पर्श से सब अंगों की शुद्धि, मार्जन से इन्द्रियों की शुद्धि, प्राणायाम से मन की शुद्धि, अघमर्षण से बुद्धि की शुद्धि ,मनसा परिक्रमा से चित की शुद्धि तथा उपस्थान से अहंकार की शुद्धि की जानी चाहिए |
शुद्धि कैसे ?
अब प्रश्न उठता है की यह शुद्धि कैसे की जावे ? इस के लिए बताया गया है कि हम प्रतिदिन दो काल स्नान करके अपने शरीर को शुद्ध करें | अपने अन्दर को शुद्ध करने के लिए राग, द्वेष, असत्य आदि दुरितों को त्याग दें | कुशा व हाथ से मार्जन करें | ओ३म् का उच्चारण करते हुए तीन बार लंबा श्वास लें तथा छोड़ें , यह प्राणायाम है | सब से अंत में गायत्री का गायन करते हुए शिखा को बांधें |

इस प्रकार यह पांच क्रियाएं करके मन व आत्मा को शांत स्थिति में लाया जावे | यह शांत स्थिति बनाने के पश्चात् संध्या के लिए छ: अनुष्ठान किया जावें ,जो इस प्रकार हैं :
संध्या के लिए छ: अनुष्ठान
१. शरीर को असत्य से दूर
शरीर को असत्य से दूर करने के लिए संध्या में बताये गए प्रथम मन्त्र ओ३म् शन्नो देवी रभिष्टये आपो भवन्तु पीतये शंयो राभिस्रवंतु न: का उच्चारण करने के पश्चात् तीन आचमन करें |
२. मार्जन पूर्वक इन्द्रियों की शुद्धि
ओ३म् वाक् वाक् ओ३म प्राण: प्राण: आदि मन्त्र से अंगों की शुद्धि करें | ओ३म भू: पुनातु शिरसि आदि मन्त्र से प्रभु के नामों का अर्थ करते हुए मार्जन पूर्वक इन्द्रियों की शुद्धि करें |
३. प्राणायाम से मन शांत
कम से कम तीन तथा अधिक से अधिक ग्यारह प्राणायाम कर अपने मन को शांत करें |
४. बुद्धि की शुद्धि तथा बोले मन्त्रों के अर्थ चिंतन
ओ३म् ऋतं च आदि इन तीन मन्त्रों से अपनी बुद्धि को समझाते हुए शुद्ध करें तथा पुन: शन्नो देवी मन्त्र को बोलते हुए अब तक जो मन्त्र हमने बोले हैं , उन सब के अर्थ को देखें तथा अर्थों पर चिंतन करें |
५. चित को सुव्यवस्थित करें
ओ३म् प्राची दिग अग्नि आदि इन छ: मन्त्रों का गायन करते हुए अपने चित को सुव्यवस्थित करें |
६. अहंकार तत्व
ओ३म् उद्वयं से ले कर ताच्च्क्शुर्देवहितं तक के मंत्रों का गायन करते हुए अहंकार तत्व से अपनी स्थिति का सम्पादन करें |
प्रधान जप
यह छ: अनुष्ठान करने के पश्चात् हम इस स्थिति में आ जाते हैं की अब हम प्रधान जप अर्थात गायत्री का जाप कर सकें | अत: अब हम गायत्री का जप करते हैं |
समर्पण
गायत्री का जप करते हुए हम स्वयं को उस पिता के पास पूरी तरह से समर्पित करने के लिए बोलते हैं , हे इश्वर दयानिधे भवत्क्रिप्यानेण जपोपास्नादि कर्मणा धर्मार्थ का मोक्षानाम सद्यसिद्धिर्भवेण | इस प्रकार हम समग्रतया उस प्रभु को समर्पित हो जाते हैं |
नमस्कार
अंत में हम उस परमात्मा को नमस्ते करते हुए अपने आज के कर्तव्य को पूर्ण करते हुए संध्या का यह अनुष्ठान पूर्ण करते हैं |
जाप की विधि
गायत्री का जाप एक आसन पर बैठ कर ऊँचे उच्चारण से किया जावे |
ध्यान के समय मौन जाप की प्रथा है किन्तु अकेले में जाप करते समय ऊँचे स्वर से किया जाता है | कुछ लोग मौन जाप का कहते है तो कुछ उच्च स्वर में जबकि कुछ का मानना है कि यह जाप इतनी मद्धम स्वर में किया जावे कि मुख से निकला शब्द केवल अपने कान तक ही जावे | इस सम्बन्ध में स्वामी जी ने संस्कार विधि में मौन जाप का विधान ही दिया है |
हम संध्या करते समय यह सब ध्यान में रखते हुए ऊपर बताये अनुसार ही संध्या करें तो उपयोगी होगा |
डा. अशोक आर्य

महर्षि दयानन्दकृत यजुर्वेद भाष्य में ईश्वर-स्वरूप :-डॉ. कृष्णपाल सिंह

इषे त्वोर्जे त्वा वायवस्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणऽआप्यायध्वमघ्न्याऽइन्द्राय भागं प्रजावतीरनमीवाऽअयक्ष्मा मा वस्तेन ईशत माघशंसो ध्रुवाऽअस्मिन् गोपतौस्यात वह्वीर्यजमानस्य पशून् पाहि।

-यजु. १। १

इस मन्त्र के प्रतिपाद्य विषय का निर्देश करते हुए महर्षि दयानन्द ने लिखा है कि ‘अथोत्तमकर्मसिद्धयर्थमीश्वरः प्रार्थनीय इत्युपदिश्यते’ अर्थात् उत्तम कर्म की सिद्धि के लिये ईश्वर की प्रार्थना अवश्य करनी चाहिये, इस बात का मन्त्र में उपदेश है। मन्त्र का ऋषि परमेष्ठी प्रजापति है और देवता सविता-ईश्वर है। वेद चार हैं जिनमें ऋग्वेद स्तुति प्रधान है जैसा कि ऋषियों ने कहा है कि ‘ऋग्भिःस्तुवन्ति’ अर्थात् ऋचाओें=ऋग्वेदीय मन्त्रों के साधर्म्य और वैधर्म्य के द्वारा उनकी स्तुति अर्थात् गुणानुवाद का यथार्थ कथन किया जाता है। आचार्य यास्क ने निरुक्त शास्त्र में लिखा है कि ‘यजुभिर्यजन्ति’अर्थात् यजु. मन्त्रों के द्वारा यज्ञ-कर्म का निरूपण किया गया है। यजुर्वेद में कर्म का प्राधान्य है अर्थात् क्रिया प्रधान है। यजुर्वेदीय मन्त्रों से कर्म-क्रिया का सम्पादन होता है।

अतएव क्रिया-कर्मप्रधान वेद के प्रथम मन्त्र में ही कहा गया है कि ‘प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे’ अर्थात् श्रेष्ठ कर्मों का सम्पादन करो। महर्षि याज्ञवल्क्य ने शतपथ में कहा है कि ‘यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म’ यज्ञ अर्थात् परोपकार करना ही श्रेष्ठ कर्म है। परोपकारार्थमिदं शरीरम्। इस वेद में विभिन्न स्थानों पर श्रेष्ठ कर्म करने का उपदेश है। जैसे यजुर्वेद के ४० वें अध्याय में कहा है कि ‘कुर्वन्नेवेहकर्माणिजिजीविषेच्छतं समाः’ अर्थात् इस संसार में मनुष्य जब तक जीवित रहे, तब तक शुभकर्म करते हुए जीने की इच्छा करे। क्योंकि यह शरीर भस्म होने वाला है। अपनी शक्ति (सामर्थ्य) का स्मरण कर, अपने कार्यों का स्मरण कर, ओ३म् पद वाच्य ब्रह्म-परमात्मा का स्मरण कर। इस प्रकार सम्पूर्ण यजुर्वेद अर्थात् आद्यन्तमध्य में भी श्रेष्ठ कर्म करने की प्रेरणा देता है। प्रकृत मन्त्र में परमात्मा ने आशीर्वाद रूप में कहा है कि श्रेष्ठ कर्म करते हुए इस जगत् में खूब उन्नति प्राप्त करो। ‘आप्यायध्वम् अघ्न्याः’ अर्थात् अहिंसित कर्म करते हुए समग्र ऐश्वर्य को प्राप्त करो। ‘यजमानस्य पशून्पाहि’ कहकर मन्त्र में यजमान के पशुओं की रक्षा करने का उपदेश यह कह रहा है कि वेद में सर्वथा हिंसा का निषेध है। मनुष्य की आजीविका के साधन भी अहिंसनीय होने की प्रेरणा है। इस लिये वेद में श्रेष्ठ कर्म करने की बात कही है और हिंसादि दुष्ट कर्म का निषेध जानना चाहिये।

परन्तु आज सम्पूर्ण संसार मांसाहार की ओर जा रहा है जो कि हिंसा का मार्ग है। वेद प्राणियों की हिंसा न करने की प्रेरणा दे रहा है। हे प्रभु! आप ही उन सब मनुष्यों के हृदय में परपीड़ा समझने का ज्ञान प्रदान कर, जिससे हिंसा कर्म संसार से समाप्त हो जाये। मन्त्र में सविता परमात्मा सकल जगत् अर्थात् दृश्यादृश्य, स्थूल-सूक्ष्म जगत् का उत्पादक, समग्र ऐश्वर्ययुक्त अपनी परमकृपा से सब प्राणियों को अन्न जलादि पदार्थों की प्राप्ति कराता है। वही सब जगत् की रक्षा करता है। उसकी रक्षा एवं कृपा के बिना किसी भी पदार्थ वा प्राणी का रक्षण कठिन है। वह सबको प्राणप्रिय है। उसकी प्राण-शक्ति के आधार पर समस्त प्राणी-जगत् तथा भौतिक जगत् के पदार्थ अपनी-अपनी सत्ता में स्थित दृष्टिगोचर हो रहे हैं। इसके अभाव में कोई वस्तु अपने स्वरूप में स्थित नहीं रह सकती। यह प्राण-शक्ति ओषधि-वनस्पतियों अन्यधात्वादि औषधियों में परिपूर्ण होने से आरोग्यवर्धक होकर प्राणियों के दुःख दूर कर उन्हें आनन्दित करती है। यह सब उस सविता परमात्मा की महती कृपा है।

महर्षि दयानन्दकृत मन्त्रार्थःहे मनुष्यो! यह (सविता) सब जगत् का उत्पादक, सकल ऐश्वर्य सम्पन्न जगदीश्वर (देवः) सब सुखों के दाता, सब विद्याओं का प्रकाशक भगवान् है (वायवस्थ) जो हमारे (वः) और तुम्हारे प्राण, अन्तःकरण और इन्द्रियाँ हैं एवं सब क्रियाओं की प्राप्ति के हेतु स्पर्शगुण वाले भौतिक प्राणादि हैं, उनको (श्रेष्ठतमाय) अत्यन्त श्रेष्ठ यज्ञ (कर्मणे) जो सबके उपकार के लिये कर्त्तव्य कर्म हैं, उससे (प्रार्पयतु) अच्छे प्रकार सयुक्त करें। हम लोग (इषे) अन्न, उत्तम इच्छा तथा विज्ञान की प्राप्ति के लिये सविता देवरूप (त्वा) तुझे विज्ञानरूप परमेश्वर को तथा (ऊर्जे) पराक्रम एवं उत्तम रस की प्राप्त्यर्थ (भागम्) सेवनीय धन और ज्ञान के पात्र (त्वा) अनन्त पराक्रम तथा आनन्द रस से भरपूर सदा आपकी शरण चाहते हैं। हे मनुष्यो! ऐसे होकर तुम (आप्यायध्वम्) उन्नति को प्राप्त करो और हम उन्नति प्राप्त कर रहे हैं। हे परमेश्वर! आप कृपा करके हमें   (इन्द्राय) परमेश्वर की प्राप्ति के लिये और (श्रेष्ठतमाय) अत्यन्त श्रेष्ठ यज्ञ (कर्मणे) कर्म करने के लिये इन (प्रगावतीः) बहुत प्रजावाली (अघ्न्याः) बढ़ने योग्य, अहिंसनीय, गौ, इन्द्रियाँ, पृथिवी आदि और जो पशु हैं, उनसे सदैव (प्रार्पयतु) संयुक्त कीजिये।

हे परमात्मन्! आपकी कृपा से हमारे मध्य में कोई (अघशंसः)पाप का प्रशंसक पापी और (स्तेनः) चोर (मा ईशत) कभी उत्पन्न न हो और आप इस (यजमानस्य) जीव के एवं परमेश्वर और सर्वोपकारक धर्म के उपासक विद्वान् के (पशून्) गौ, घोड़े, हाथी आदि लक्ष्मी वा प्रजा की (पाहि) सदा रक्षा कीजिये, क्योंकि (वः) उन गौओं और इन पशुओं को (अघशंस) पापी (स्तेनः) चोर (मा+ईशत) हनन करने में समर्थ न हो। जिससे (अस्मिन्) इस (गोपतौ) पृथिवी आदि की रक्षा के इच्छुक धार्मिक मनुष्य एवं गोस्वामी के पास (बह्वीः) बहुत सी गौवें (ध्रुवा) स्थिर सुखकारक (स्यात्) होवें।

मन्त्र का भावार्थ महर्षिकृतःमनुष्य सदा धर्मयुक्त पुरुषार्थ के आश्रय से, ऋग्वेद के अध्ययन से गुण और गुणी को जानकर सब पदार्थों के प्रयोग से पुरुषार्थ सिद्धि के लिये उत्तम क्रियाओं से संयुक्त रहें। जिससे ईश्वर की कृपा से सबके सुख और ऐश्वर्य की वृद्धि होवे, शुभ कर्मों से प्रजा की रक्षा और शिक्षा सदा करें। जिससे कोई रोगरूप विघ्न और चोर प्रबल न हो सके और प्रजा सब सुखों को प्राप्त होवे। जिसने यह विचित्र सृष्टि रची है, उस जगदीश्वर का आप सदैव धन्यवाद करें। ऐसा करने से आपकी दयालु ईश्वर कृपा करके सदा रक्षा करेगा।

ईश्वर स्वरूप दर्शनःइस मन्त्र में सविता=ईश्वर सम्पूर्ण जगत् का उत्पादक, सकल ऐश्वर्य सम्पन्न होने से सविता नाम से कहा गया है और सर्वसुख प्रदाता, सर्वदुःख विनाशक, सर्व विद्याओं का प्रकाशक होने से ‘देव’ कहा गया है।

परमेश्वर की प्रार्थना इस प्रकार करेंःमन्त्र में कहा गया है कि हे सविता देव! आप हमारे प्राण, अन्तःकरण और समग्र इन्द्रियों को सर्वोत्कृष्ट यज्ञ कर्म में लगाइये। हे जगदीश्वर! हमक लोग अन्न बल, पराक्रम, विज्ञानादि की प्राप्ति के लिये आपका ही आश्रय करते हैं, क्योंकि आप ही सब प्रकार के परम ऐश्वर्य के प्रदाता हैं। हे दयानिधे परमेश्वर! आपकी परम कृपा से हमारे गौ, हस्ति आदि पशु, इन्द्रिय तथा पृथिवीस्थ सभी पदार्थ अनमीवा अर्थात् रोग रहित होवें। आपकी महती कृपा से हमारे मध्य कोई भी चोर, पापी कभी उत्पन्न न हो। हे परमेश्वर! आप ईश्वरोपासक, धर्मात्मा, विद्वान्, परोपकारी के गौ आदि विभिन्न पशुओं लक्ष्मी तथा प्रजा की सदैव रक्षा कीजिये।

महर्षि द्वारा अन्यत्र की गई व्याख्याः ‘इषे त्वोर्जे’ इस मन्त्र को संस्कारविधि के ‘स्वस्तिवाचन’ में रखा गया है। ‘गोकरुणा निधि’ में इस मन्त्र की सम्पूर्ण व्याख्या न करके कुछ अंश की व्याख्या इस प्रकार है-यजुर्वेद के प्रथम मन्त्र में परमात्मा की आज्ञा है कि ‘अघ्न्या यजमानस्य पशून् पाहि’हे पुरुष! तू इन पशुओं को कभी मत मार और यजमान् अर्थात् सबके सुख देने वाले जनों के सम्बन्धी पशुओं की रक्षा कर, जिनसे तेरी भी पूरी रक्षा होवे और इसीलिये ब्रह्मा से लेके आज पर्यन्त आर्य लोग पशुओं की हिंसा में पाप और अधर्म समझते थे और अब भी समझते हैं। इनकी रक्षा में अन्न भी मंहगा नहीं होता, क्योंकि दूध आदि केअधिक होने से दरिद्रों को भी खान-पान में मिलने पर न्यून ही अन्न खाया जाता है और अन्न के कम खाने से मल भी कम होता है, मल के न्यून होने से दुर्गन्ध भी न्यून होता है, दुर्गन्ध के स्वल्प होने से वायु और वृष्टि-जल की शुद्धि भी विशेष होती है। उससे रोगों की न्यूनता होने से सबको सुख बढ़ता है। इससे यह ठीक है कि गो आदि पशुओं के नाश होने से राजा और प्रजा का नाश हो जाता है, क्योंकि जब पशु न्यून होते हैं, तब दूध आदि पदार्थ और खेती आदि कार्यों की भी कटौती होती है।

कतिपय विशिष्ट पद और उनका अर्थः-

(१) इषेः- यह मन्त्र का प्रथम ही पद है। आचार्य यास्क ने निघण्टु (२/७) में ‘इषम्’ पद को अन्न नामों में पढ़ा है। ‘इषति’ पद निघण्टु २/१४ में गत्यर्थक धातुओं में पढ़ा है और इस धातु से क्विप् सर्वापहारी प्रत्यय करने से ‘इष्’ शब्द बनता है। इस पद का अर्थ महर्षि ने ‘अन्नविज्ञानयोः प्राप्तये’अर्थात् अन्न विशान की प्राप्ति के लिये, यह किया है।

(२) ऊर्जेः- महर्षि याज्ञवल्क्य ने शतपथ ब्राह्मण ५/१/२/८ में ऊर्ग्रस वचन से ‘ऊर्क’ का अर्थ ‘रस’ किया गया है। इसलिये महर्षि दयानन्द ने ‘ऊर्जो’ का अर्थ ‘पराक्रमोत्तमरसलाभाय’अर्थात् पराक्रम एवं उत्तम रस की प्राप्ति के लिये, यहकिया है।

(३) देवः- आचार्य यास्क ने निरुक्त ७/१५ में देव शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा है कि ‘देवो दानाद्वा दीपनाद्वा द्योतनाद्वा द्युस्थानो भवतीति वा’इसकी व्याख्या महर्षि ने ऋ. भा. भूमिका के वेद-विषय विचार प्रकरण में की है। दान देने से देव नाम पड़ता है और दान कहते हैं ‘किसी वस्तु के विषय में अपने स्वामित्व को छोड़ते हुए दूसरे के स्वामित्व को उत्पन्न करना।’ दीपन कहते हैं प्रकाश करने को। द्योतन कहते हैं सत्योपदेश को। इनमें से दान का दाता मुख्य ईश्वर ही है कि जिसने जगत् को सब पदार्थ दे रखे हैं। तथा विद्वान् मनुष्य भी विद्यादि पदार्थों को देने वाले होने से देव कहाते हैं। दीपन अर्थात् सब मूर्तिमान् द्रव्यों का प्रकाश करने से सूर्यादि लोकों का नाम भी देव है। द्योतन-माता, पिता, आचार्य और अतिथि भी पालन विद्या और सत्योपदेशादि के करने से देव कहाते हैं, वैसे ही सूर्यादि लोकों का भी जो प्रकाश करने वाला है, वह ईश्वर सब मनुष्यों को उपासना करने योग्य इष्टदेव है, अन्य कोई नहीं। इसमें कठोपनिषद् का भी प्रमाण है कि सूर्य, चन्द्रमा, तारे, विद्युत (बिजली) और अग्नि ये सब परमेश्वर में प्रकाश नहीं कर सकते, किन्तु इन सबका प्रकाश करने वाला वही है, क्योंकि परमेश्वर के प्रकाश से ही सूर्यादि सब जगत् प्रकाशित हो रहा है। इसमें यह जानना चाहिये कि इईश्वर से भिन्न कोई पदार्थ स्वतन्त्र प्रकाश करने वाला नहीं है, इससे एक परमेश्वर ही मुख्य देव हैं।

इसी प्रकार महर्षि ने सत्यार्थ प्रकाश प्रथम समुल्लास में देव शब्द के विषय में लिखा है कि ‘दिवु क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युति-स्तुति-मोद-मद-स्वप्न-कान्ति-गतिषु’ इस धातु से देव शब्द सिद्ध होता है। क्रीडा जो शुद्ध, जगत् को क्रीडा कराने विजिगीषा= धार्मिकों को जिताने की इच्छायुक्त, व्यवहार=सब चेष्टा के साधनोपसाधनों का दाता, द्युति=स्वयं प्रकाश स्वरूप, सबका प्रकाशक, स्तुति=प्रशंसा के योग्य, मोद=आप आनन्दस्वरूप और दूसरों को आनन्द देने हारा, मद-मदोन्मत्तो का ताड़ने हारा, कान्ति=कामना के योग्य और गति=ज्ञानस्वरूप है, इसलिये उस परमेश्वर का नाम ‘देव’ है।

अथवा ‘यो दीव्यति क्रीडति स देवः’ जो अपने स्वरूप में आनन्द से आप ही क्रीडा करे अथवा किसी के सहाय के बिना क्रीडावत् सहज स्वभाव से सब जगत् को बनाता वा सब क्रीडाओं का आधार है, ‘यो विजिगीषते स देवः’ जो सबका जीतने हारा स्वयं अजेय अर्थात् जिसको कोई भी न जीत सके, ‘यो व्यवहारयति स देवः’ जो न्याय और अन्यायरूप व्यवहारों का जनाने हारा और उपदेष्टा, ‘यश्चराचरं जगत् द्योतयति स देवः’ जो सबका प्रकाशक, ‘यःस्तूयते स देवः’ जो सब मनुष्यों की प्रशंसा के योग्य और निन्दा के योग्य आनन्द कराता, जिसको दुःख का लेश भी न हो, ‘यो मोद्यति स देवः’ जो सदा हर्षित, शोकरहित और दूसरों को हर्षित करने और दुःखों से पृथक् रखने वाला, ‘यः स्वापयति स देवः’ जो प्रलय के समय अव्यक्त में सब जीवों को सुलाता, ‘यः कामयते काम्यते वा स देवः’। जिसके सब सत्यकाम और जिसकी प्राप्ति की कामना सब शिष्ट करते हैं, तथा ‘यो गच्छति गम्यते वा स देवः’ जो सबमें व्याप्त और जानने के योग्य है, इससे उस परमेश्वर का नाम देव है। जैसा कि अथर्ववेद १०/८/३२ में कहा गया है कि ‘देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति’ अर्थात् देव= परमेश्वर का काव्य देखो, न मरता है न जीर्ण होता है। इसी प्रकार श्वेताश्वतरोपनिषद् (६/११) में कहा गया है कि ‘एको देवः सर्वभूतेषुगूढ़ सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा’अर्थात् देव=परमात्मा (ईश्वर) एक है, सब पदार्र्थों में गुप्त रूप से विद्यमान् है, वह सर्वव्यापक और सब भूतों का अन्तरात्मा है।

अघ्न्याः आचार्य यास्क ने ‘अघ्न्या’ शब्द को निघण्टु २/११ में ‘गो’ नामों में पढ़ा है, इसलिये महर्षि ने इसका अर्थ ‘वर्धयितुमर्हा हन्तुमनर्हा गाव इन्द्रियाणि पृथिव्यादयः पशवश्च’अर्थात् बढ़ाने योग्य, अहिंसनीय गौ, इन्द्रियाँ, पृथिवी आदि और जो पशु हैं।

पशून्ः महर्षि याज्ञवल्क्य ने शतपथ ब्राह्मण १/६/३/३६ में पशु का अर्थ ‘श्रीर्हि पशः’ कहकर, पशु का अर्थ ‘श्री’ कहा है। तथा शतपथ १/४/६/१७ के अनुसार पशु का अर्थ प्रजा किया है। इन अर्थों के परिप्रेक्ष्य में महर्षि ने ‘पशून्’ पद का अर्थ ‘गौ, घोड़े, हाथी आदि लक्ष्मी वा प्रजा की सदा रक्षा कीजिये, यह किया है।

योगेश्वर कृष्ण: -डॉ. आर.के.चौहान

योगेश्वर श्रीकृष्ण सा चरित्र मानव इतिहास में ढूँढ पाना असम्भव है। शास्त्र और शस्त्र अर्थात् ज्ञान और कर्म की क्षमताओं का अद्भुत समन्वय और वह भी न्याय एवं धर्म-आधारित साम्राज्य स्थापनार्थ महाभारत के अतिरिक्त अन्यत्र दृष्टिगोचर नहीं होता। महर्षि व्यास सारे महाभारत में एक मात्र श्री कृष्ण को ही ऐसे व्यक्ति के रूप में चित्रित करते हैं-जो न कभी टूटता है, न झुकता है। श्री कृष्ण न पछताते हैं, न रोते हैं और न कभी जय-पराजय की चिन्ता करते हैं, परन्तु उन्हें अपने पुरुषार्थ, कर्त्तव्य और नीतिमत्ता में इतना अधिक विश्वास है कि वे अर्जुन को गीता में यहाँ तक आश्वासन देते हैं कि मेरी योजना में और विश्वरूप की व्यापकता में भीष्म, द्रोण, दुर्योधन, कर्ण और दुःशासन आदि सब पहले से ही मरे पड़े हैं, तुझे केवल निमित्त मात्र बनना है।……युद्धिष्ठिर से लेकर धृतराष्ट्र और भीष्मपितामह तक सभी लोग टूटते हैं, परन्तु कृष्ण कभी नहीं टूटते। वे अनासक्त भाव से घटनाओं का संचालन करते हैं। पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए मनुष्य में जिस नरत्व की आवश्यकता है, वह श्री कृष्ण में साक्षात् अवतरित हुआ है, इसीलिए वे नरोत्तम, पुरुषोत्तम और नर से नारायण बनने की क्षमता रखते हैं।

यही कारण है कि बंगला लेखक बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने ‘कृष्ण-चरित्र’ में लिखा कि-‘कृष्ण सर्वगुण सम्पन्न हैं। इनकी सब वृत्तियों का सर्वांगसुन्दर विकास हुआ है। ये सिंहासनासीन होकर भी उदासीन हैं, धनुर्धारी होकर भी धर्मवेता हैं, राजा होकर भी पण्डित हैं, शक्तिमान् होकर भी प्रेममय हैं। यह वही आदर्श है जिससे युद्धिष्ठिर ने धर्म सीखा और अर्जुन जिसका शिष्य हुआ। जिसके चरित्र के समान महामहिमामण्डित चरित्र मनुष्य भाषा में कभी वर्णित नहीं हुआ।’ उधर यशस्वी वक्ता, लेखक एवं पत्रकार क्षितीश वेदालंकार के अनुसार-‘श्री कृष्ण के समान प्रगल्भ, बुद्धिशाली, कर्त्तव्यवान्, प्रज्ञावान्, व्यवहारकुशल, ज्ञानी एवं पराक्रमी पुरुष आज तक संसार में नहीं हुआ। यह कथन अतिशयोक्ति नहीं माना जाना चाहिए। वे ध्येयवादी के साथ व्यवहारवादी भी थे और इन दोनों की सीमाओं के निपुण ज्ञाता थे। सत्यनिष्ठ के समान ही वे कुशल राजनीतिज्ञ अर्थात् राजधर्म के उपदेशक थे। वे गृहस्थ जीवन के प्रेमी होने के साथ-साथ अत्यन्त संयमी और योगविद्या पारंगत योगेश्वर भी थे।…….श्री कृष्ण भारत की संस्कृति और राष्ट्रधर्म के मूर्तिमान् प्रतीक हैं। जिस राष्ट्रधर्म की ओर हम संकेत करना चाहते हैं, उसका मूल-आधार महाभारत और उसके द्वारा प्रतिपादित श्री कृष्ण का चरित्र ही है।’ युग-प्रवर्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में लिखा-‘देखो! श्री कृष्ण का इतिहास महाभारत में अत्युत्तम है। उनका गुण, कर्म, स्वभाव और चरित्र आप्तपुरुषों के सदृश है। जिसमें कोई अधर्म का आचरण भी कृष्ण जी ने जन्म से मरणपर्यन्त बुरा काम कभी किया हो, ऐसा नहीं लिखा।’ महर्षि व्यास ने उन्हें धर्म का पर्याय बताया-‘यतो कृष्णस्ततो धर्मः यतो धर्मस्ततो जयः।’

उक्त उद्धरणों में वर्णित श्री कृष्ण के चरित्र की सम्पुष्टि महारभारत एवं समकालीन ग्रन्थों से होती है, जिसका संक्षिप्त परिचय यहाँ प्रस्तुत करना उपयुक्त होगा। मथुरा के निरंकुश राजा मामा कंस की जेल में कै द माता-पिता देवकी एवं वसुदेव का पुत्र कृष्ण यमुनापार गोकुल में यशोदा मय्या और नन्दबाबा की वात्सल्यमयी गोद में खेला और पला। भाई बलराम और गोकुल गोपाल-मण्डल के स्नेह और दुलार से मेधावी होनहार बालक कृष्ण को सब का प्यारा बना दिया। मक्खन, दूध, घी सम्पन्न गोपालक यदुवंशी समाज का मल्लयुद्ध एवं शस्त्र प्रेमी होना स्वाभाविक था। किशोर बलराम और कृष्ण युवा होने तक इन कलाओं में न केवल पारंगत हो गए वरन् उनके सतत् प्रयास से गोवंश सम्वर्धन पारस्परिक सौहार्द और समृद्धि का आधार बन गया। युवा पीढ़ी बल, शौर्य एवं पुरुषार्थ पाकर सुख-समृद्धि की राह पर अग्रसर हुई। प्रचलित गुरुकुल परम्परा के अन्तर्गत विद्याध्ययन ने कृष्ण में सौम्य, तार्किक एवं विचारशील व्यक्तित्व का विकास कर दिया।

शिक्षा समाप्ति पर युद्धकुशल यादव समाज की आपसी कलह और मगधराज जरासन्ध के संरक्षण में मथुरा में कंस की निरंकुशता की बात समझ में आई। अपनी व्यवहार-कुशलता और नीतिमत्ता से प्रथम यादव कुल का वैमनस्य मिटाया, पश्चात् भाई बलराम एवं युवा मित्र-मण्डल की सहायता से आतताई कंस का वध कर नाना उग्रसेन को मथुरा के सिंहासन पद पर आसीन किया। कंस के मरने पर अपनी दो बेटियों के विधवा हो जाने से नाराज जरासन्ध ने बार-बार आक्रमण करके यादवों के नाक में दम कर दिया। जरासन्ध की विशाल सेना का सामना करने में अक्षम यादव कुल की राजधानी मथुरा से स्थानान्तरित कर द्वारका के सुरक्षित स्थान पर स्थापित की।

अपनी फूफी कुन्ती के वीर पुत्रों पांडवों के वनवास समाप्ति पर मिले खाडंव वन को साफ करवा कर इन्द्रप्रस्थ जैसे सुनियोजित, अत्याधुनिक और सुन्दर नगर का निर्माण कराया और युद्धिष्ठिर को सिंहासनासीन किया। नीति-निपुण कृष्ण ने भारत के बड़े भाग पर राज कर रहे विशाल सेनाऔर धन-बल सम्पन्न मगधराज जरासन्ध को अर्जुन और भीम के साथ गुप्तवेश में मगध पहुँचकर द्वंद्व-युद्ध के लिए राजी किया। भीम ने जरासंध को उसके मर्म के भेद का लाभ उठाकर मार गिराया और असम्भव को सम्भव कर दिखाया। मगधराज का भार जरासन्ध के बेटे को सौंपकर उससे मित्रता सन्धि की और जरासन्ध द्वारा कै द ८६ राजाओं को मुक्त करके उनसे मित्रता सम्बन्ध बनाए।

प्रबन्ध कला में निपुण एवं दूरदर्शी श्रीकृष्ण से सलाह कर युद्धिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ रचा। लक्ष्य था प्रभावक्षेत्र बढ़ाकर सुशासन अर्थात् न्याय एवं धर्म आधारित सर्वजन प्रिय पांडवराज भारत-भू पर स्थापित करना। अर्जुन और भीम जैसे महाबली योद्धाओं के पौरुष तथा अपनी अद्भुत नीति कुशलता से भारत के अनेक राज्यों से मैत्री सन्धियाँ की तथा इन्द्रप्रस्थ साम्राज्य का प्रभावक्षेत्र एवं वर्चस्व बढ़ाया। राजसूय यज्ञ में प्रचलित अर्घ्यपरम्परा के अनुसार सभा में उपस्थित सर्वाधिक वयोवृद्ध, ज्ञानवृद्ध तथा अनुभववृद्ध भीष्म पितामह ने अर्घ्य लेने का अधिकारी श्रीकृष्ण को उद्घोषित किया और कहा-‘हम कृष्ण के शौर्य पर मुग्ध हैं। ब्राह्मणों में ज्ञान की पूजा होती है, क्षत्रियों में वीरता की, वैश्यों में धन की और शूद्रों में आयु की। यहाँ मैं किसी राजा को नहीं देखता, जिसे कृष्ण ने अपने अतुल तेज से न जीता हो। वेद-वेदांग का ज्ञान और बल पृथ्वी के तल पर इनके समान किसी और में नहीं। इनका दान, इनका कौशल, इनकी शिक्षा और ज्ञान, इनकी शक्ति, इनकी शालीनता, इनकी नम्रता, धैर्य और सन्तोष अतुलनीय हैं। ये ऋत्विज हैं, गुरु हैं, स्नातक हैं और लोकप्रिय राजा हैं। ये सब गुण एक पुरुष में मानो मूर्त्त हो गए हैं। इसलिए इन्हें ही अर्घ्य दिया गया है।’ यह सुनकर चेदीराज शिशुपाल जो रुक्मणी के कृष्ण से विवाह को लेकर दुःखी था क्रोध में आग-बबूला हो गया और भीष्म सहित कृष्ण को बहुत कुछ भला-बुरा कह गया। संयत श्री कृष्ण ने सब कुछ सुना और सह गए। युद्धिष्ठिर ने शिशुपाल को शान्त करने का भरसक प्रयास किया, किन्तु वह न माना और श्री कृष्ण को सम्बोधित कर बोला-तू राजा नहीं दास है, वीर नहीं कायर है। दम है तो हमसे युद्ध कर। अन्ततः श्री कृष्ण ने उसकी चुनौती को स्वीकार करते हुए अपने सुदर्शन चक्र के एक ही वार से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।

यज्ञ सम्पन्न हुआ। सब लोग अपने-अपने घरों को लौट गए, किन्तु इस घटना का विपरीत प्रभाव अनेक राजाओं के हृदय पर पड़ा। दुर्योधन तो पांडवों से पहले ही ईर्ष्या करता था। हाथ लगी अनुकूल परिस्थिति का लाभ उठाने से भला कैसे चूकता? दुर्योधन ने जुआ खेलने में माहिर, शातिर दिमाग अपने मामा गांधारनरेश शकुनी के साथ मिलकर हस्तिनापुर में द्यूतक्रीड़ा कार्यक्रम आयोजित करके इसमें युद्धिष्ठिर को फँसा लिया। युधिष्ठिर न केवल राज-पाठ बल्कि अपने भाइयों समेत खुद को ही नहीं और द्रोपदी को भी जूए में हार गया। द्रोपदी का भरी सभा में अपमान किया गया, जिसकी भर्त्सना महात्मा विदुर और श्री कृष्ण के अतिरक्ति कोई अन्य करने का साहस न कर पाया। करते भी कैसे? ‘राजा परं दैवतम्’के सिद्धान्त से जो बन्धे थे। उस काल की सर्वोच्च स्थान प्राप्त इस परम्परा का दुरुपयोग होते देख श्री कृष्ण सदृश आप्तपुरुष ने जनहित में उसे तोड़ने में जरा भी संकोच नहीं किया।

पांडवों को बारह वर्ष वनवास एवं एक वर्ष का अज्ञातवास भोगना पड़ा, जिसकी समाप्ति पर पांडवों को उनका राज्य दिलाने के लिए सन्धि प्रस्ताव लेकर श्री कृष्ण हस्तिनापुर आए। प्रथम आदरपूर्वक धृतराष्ट्र, भीष्म, द्रोणादि बड़ों से और फिर गांधारी से मिले। वनवास की शर्त पूरी होने पर पांडवों को उनका राज्य लौटाने के लिए दुर्योधन को समझाने को कहा। युद्ध में उसके अपने ही कुल का नाश होने की बात कही। सबने दुर्योधन को समझाया, किन्तु हठी दुर्योधन ने किसी की एक न सुनी। तब श्री कृष्ण सन्धि-प्रस्ताव प्रस्तुत करने के लिए राज्यसभा में उपस्थित हुए। अपने ही भाईयों के लिए उनकी न्यायसंगत बात मानकर दुर्योधन को महायुद्ध टालने की बात कही। उन्होंने कहा-युद्ध होने की स्थिति में न केवल अनगिनत योद्धा युद्ध की अग्नि में भस्म हो जाएँगे, बल्कि असंख्य परिवार भी बरबाद हो जाएँगें। अतः समझदारी से काम लेकर इस महाविनाश की विभीषिका से सबको बचाया जा सकता है, परन्तु दुर्योधन था कि टस से मस न हुआ। तब श्री कृष्ण ने महाबली पांड़वों के हाथों मरने के लिए तैयार रहने की चेतावनी दे डाली। परिणाम सम्भावित ही रहा। धार्मिक, सिद्धान्तवादी एवं सत्यनिष्ठ बड़ों के मन में दुर्योधन के हठ पर ग्लानिपूर्ण उपेक्षाभाव उपजा, तो जन-साधारण के मन में कुलद्रोही तथा अन्यायी दुर्योधन के प्रति रोषपूर्ण जनसंहार का भय। युद्ध में महाकाल बन जाने वाले अर्जुन और भीम के विचार ने कौरव दल के शीर्ष योद्धाओं का भी आत्मविश्वास हिला दिया।अतः समय, स्थान एवं परिस्थितियों को अपनी समझ और नीतिकौशल से सत्यपक्ष के अनुकूलकर लेने की कला में दक्ष श्रीकृष्ण जहाँ सन्धि करवाने के प्रयास की औपचारिकता से निवृत्त हुए, वहाँ सन्धिवार्ता की असफलता का ठीकरा अनैतिक, अन्यायी, कुलघाती एवं जनसंहारक दुर्योधन के सिर पर फोड़ने में भी सफल रहे। सबकी जुबान पर दुर्योधन की हठधर्मिता और पाँडवों के प्रति सहानुभूति की चर्चा थी तथा मन में सम्भावित भयंकर महायुद्ध की विभीषिका का डर। ऐसे में यदि कोई तनाव-मुक्त एवं स्थिर था तो स्थितप्रज्ञ योगेश्वर कृष्ण।

युद्ध घोषित हो जाने पर स्वयं को महारथी अर्जुन के रथ का सारथी बनाकर दुर्योधन की ओर से लड़ने वाली यादव सेना पर हथियार न उठाने की स्थिति उत्पन्न कर दी। भाई बलराम को युद्ध से विमुख करके तीर्थयात्रा पर चले जाने को प्रेरित किया। इस प्रकार महाभारत युद्ध में पांडव-पक्ष का संरक्षक होकर नीति, धर्म, शास्त्र एवं शस्त्रों के समन्वय का ऐसा अभेद्य चक्रव्यूह रचा कि विरोधी दल के संख्या में कहीं अधिक सैन्यबल और एक से एक शक्तिशाली योद्धाओं के होते हुए भी पांडव दल को मुकाबले की टक्कर का बनाकर खड़ा कर दिया।

जिसका कुशल सारथी श्री कृष्ण परिस्थितियों को सम्भालकर यहाँ तक लाया था, मोहग्रस्त हो वह धनुर्धारी अर्जुन युद्धभूमि में कर्त्तव्यविमुख होकर वैराग्यपूर्ण ज्ञान की बातें करने लगा। अतः अचानक एक नई और विकट स्थिति सामने आ खड़ी हुई। पर भला माधव ने कठिनाइयों से कब मुँह मोड़ा। अपनों को मारने के पाप के भय से थरथराते अर्जुन को पूछा-इन अजर-अमर आत्माओं को मार सकते हो क्या? नहीं, तुम्हारा गांडीव मात्र नश्वर शरीरों का विच्छेद कर सकता है, अमर आत्माओं का नहीं, परन्तु समस्या का यह दार्शनिक समाधान अर्जुन के मन को विषाद से न निकाल पाया। तब युद्ध में क्षत्रिय का धर्म आतताई, अधर्मी शत्रु का विनाश करके विजय पाकर अधर्म, असत्य एवं अन्याय का प्रतिकार करना बताकर पार्थ के पौरुष को जगाया। इस व्यावहारिक एवं कर्म-प्रधान समाधान ने हतोत्साहित अर्जुन के रक्त में जोश का भरपूर संचार किया, किन्तु श्री कृष्ण ने देखा कि उसके मुख पर शंका की कुछ रेखाएँ अभी भी शेष थीं। अन्ततः मानव मनोविज्ञान के मर्मज्ञ योगेश्वर कृष्ण ने अर्जुन के चित्तपटल पर जगत् का समष्टीरूप चित्रित करके कालप्रवाह से हो रही घटनाओं की अवश्यमभावीयता में भागीदार बनकर निमित्त बनने का विकल्प प्रस्तुत करते हुए कहा कि युद्धभूमि में लड़ते हुए मर जाने पर स्वर्गसुख पाओगे और जीतने पर हस्तिनापुर का राज्य। जादू का सा असर हुआ। अर्जुन ने झट-से अपना गांडीव सम्भाल लिया और युद्ध करने को तत्पर हो गया। यह चमत्कार ज्ञान, कर्म, दर्शन, मनोविज्ञान आदि विद्याओं में पारंगत केवल योगीराज श्रीकृष्ण ही कर सकते थे। अतः उक्त परिस्थितियों के आलोक में गीता में उन्होंने योग को नया अर्थ प्रदान किया यह कहते हुए-‘योगः कर्मसु कौशलम्’

उनका वेदोपनिषत् शास्त्र आधारित ज्ञान, मानव मनोविज्ञान आधारित वक्तृत्व, अमर गीता सन्देशरूप में प्रदीप्त हुआ, जो मनुष्य मात्र के लिए कालजयी मार्ग-दर्शक हो गया। महाभारत जैसे महाविनाशकारी युद्ध में उपजी विकट परिस्थितियों का न्यायसंगत, धर्मानुसार तथा यथायोग्य व्यवहार-पूर्वक समाधान किया। अन्ततः परिणाम, धर्म, न्याय और सत्य के पक्ष में रहा। अन्याय, अधर्म एवं प्रचलित रूढ़ि आधारित प्रजाविरोधी साम्राज्य समाप्त करके न्याय, धर्म और जनहितैषी साम्राज्य की समस्त भारत-भू पर स्थापना की। लाला लाजपत राय ने अपनी पुस्तक ‘योगीराज श्रीकृष्ण’ में उनके लिए लिखा-‘‘जिसने अपने जीवन-काल में धर्म का पालन किया है और धर्म ही के अनुसार धर्म और न्याय के शत्रुओं का नाश किया है।’’ संस्कृत कवि माघ ने अपने ग्रन्थ ‘शिशुपालवध’ में लिखा कि महाभारत युद्धोपरान्त अश्वमेघ के समापन पर महाराज युद्धिष्ठिर स्वीकार करते हैं-‘हे (एतदूढ़गुरुभार) कठिन, भारी भार सम्भाले (श्रीकृष्ण) आप की कृपा का यह कितना बड़ा चमत्कार है कि आज से (सारा) भारत वर्ष मेरे अधिकार में है।’ गीताकार के शब्दों में संजय ने सच कहा था-

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवानीतिर्मतिर्मम।।

प्राचीन एवं अर्वाचीन अन्वेशक लेखकों के आलेख महाभारत के नायक, महामानव श्री कृष्ण के तथ्यात्मक जीवन-चरित्र को प्रकाश में लाने का सुखद प्रयास है। अन्ध श्रद्धालु हृदयों में सदियों से जमती आ रही मैल को धो डालना प्रबुद्ध जनों का पुनीत कर्त्तव्य है ताकि शुद्ध, पवित्र एवं श्रेष्ठतम श्री कृष्ण चरित्र मानव मात्र के सम्मुख उपस्थित होकर अनुकरणीय बन जाए। सत्य, न्याय और धर्म आधारित राज्य व्यवस्था समस्त भारत भूमि पर स्थापित हो जाए। और हर कृष्ण-भक्त यज्ञमय, योगमय एवं कृष्णमय हो जाए।

शाश्वत-स्वर: – धर्मवीर

सत्यधर्माय दृष्टये

धर्म संसार का अनिवार्य संचालक तत्त्व है। कोई भी व्यक्ति संसार में मिलना कठिन है, जिसके मन में विश्वास न हो। विश्वास और आस्था ही धर्म है। हो सकता है यह विश्वास किसी का जड़ के प्रति हो, दूसरे का चेतन के प्रति, एक का साकार के प्रति तो दूसरे का निराकार के प्रति। इस विश्वास के कारण ही मनुष्य जीवित है। यह धर्म ही मनुष्य के जीवन का आधार है, इसलिये धर्म चेतन का आधार है। धर्म मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता है। इसके बिना जीवन चल नहीं सकता, लेकिन सहज नहीं लगता कि धर्म क्या ऐसी मजबूरी हो सकता है, जिसके बिना जीवन का आधार समाप्त हो सके। भोजन मनुष्य के जीवन का आधार है, क्या धर्म भी भोजन की भांति अनिवार्य है? स्थूल रूप से ऐसा लगता नहीं परन्तु विचारकों की दृष्टि में इसका भी उतना ही महत्त्व है, जितना कि जीवन के आधार भोजन का। भोजन वित्त है, भोजन हिरण्य है, इसीलिये तो शोषण का हथियार है। संसार में शोषण का आधार आज अर्थ है। शोषण का साधन आज सत्ता है-शक्ति है, इसलिये बल आज शारीरिक बल का धनी शोषणकर्त्ता बन बैठता है।

इसी प्रकार आज धर्म को मार्क्सवाद से आधुनिक विचार तक शोषण का स्रोत माना जाता रहा है। यही आधार है कि धर्म मनुष्य की बड़ी मजबूरी है, अनिवार्य आवश्यकता है, तभी शोषण का साधन बन सकता है। जो वस्तु पोषण का, प्रगति का जितना बड़ा आधार होगी, शोषण के लिये वह उतनी ही सक्षम भी होगी।

अर्थ अन्न का प्रतीक है, जीवन धारण का प्रमुख व प्रथम साधन है इसलिये अर्थ को माध्यम बनाकर समाज का निर्देशन किया जा सकता है और किया जाता है। सब स्वीकार करते हैं, जीवन को सम्पूर्ण और सुखी बनाने के लिये राष्ट्र, समाज और व्यक्ति को आर्थिक दासता से मुक्त करना ही होगा। इसी प्रकार बल की दासता से, सत्ता की दासता से भी मुक्त हुये बिना नैतिक और मर्यादित आचरण के लिये मनुष्य के पास उपयुक्त वातावरण नहीं मिल पाता और यही स्थिति धर्म के साथ है। मनुष्य के शारीरिक, बौद्धिक विकास का लक्ष्य आत्मा का विकास है और इस लक्ष्य के आधार को ही धर्म कहा जाता है। प्रत्येक शरीर के लिये, बुद्धि के लिये, भावना के लिये सब आवश्यकताओं की भाँति धर्म की भी आवश्यकता है। मनुष्य मिथ्या विश्वास कर सकता है, अन्धविश्वास कर सकता है, धर्मान्ध हो सकता है परन्तु धर्मरहित नहीं हो सकता। इसलिये प्रत्येक व्यक्ति को धर्म का वास्तविक स्वरूप जानना चाहिये और जानना आवश्यक है।

जो धर्म नहीं जानता, वास्तविक धर्म नहीं पहचानता अथवा स्वार्थ पूर्ति को ही धर्म स्वीकार करता है तो वह धर्म के द्वारा ही अपने स्वार्थ को सहज पूरा करता है, क्योंकि ऐसा करके मनुष्य को उसकी आवश्यकता पूर्ति का आभास कराता है। जो आवश्यकता की पूर्ति करता है, वह उसका उपभोग कर सकता है, इस कारण धर्म का उपयोग संसार में सबसे अधिक किया जा रहा है। धर्म के नाम पर किसी से कुछ भी कराया जा सकता है, इस कारण धर्म अनिवार्यता है, मजबूरी है, इसलिए शोषण का आधार है। जैसे राज्य के शोषण को दूर करने के लिये राज्य को सर्वथा समाप्त नहीं किया जा सकता, जैसे अर्थ के शोषण से मुक्त होने के लिये मनुष्य भूखा और नंगा नहीं रह सकता, उसी प्रकार धर्म के शोषण से बचने के लिये मनुष्य अधार्मिक या अविश्वासी नहीं बन सकता। धर्म को त्यागा नहीं जा सकता, वह आवश्यकता है। हानि केवल तब होती है, जब विष को औषध समझ लिया जावे और अभक्ष्य को भक्ष्य। अतः वेद कहता है, जानने योग्य केवल एक वस्तु है और उसी के लिये सारा प्रयत्न करना चाहिए- वह है सत्य धर्म।

अधर्म के आवरण में धर्म छिप गया है, छिप जाता है, छिपा दिया जाता है, उसी आवरण के भेदन में सारा प्रयत्न करना है। वह आवरण आसानी से भेदन योग्य नहीं है, यह कार्य सरल होता तो वेद में ईश्वर से शक्ति की प्रार्थना करने की आवश्यकता न होती, यह आवरण बड़ा दृढ़, बड़ा रमणीय है, मोहक है, सत्य के ऊपर सबसे कठिन आवरण है, तो मोह का, मूढ़ता का है, मिथ्यापन है, इस कारण हम जो मानते हैं और जितना जानते हैं, उसी को सब समझ लेते हैं, उसी को सत्य समझ लेते हैं- उसके बिना छूटे और बिना टूटे अन्तर्निहित सत्य का साक्षात्कार सम्भव नहीं होता। हम सत्य का साक्षात् बिना किये सत्य से भय खाते हैं, यह सत्य का ही प्रभाव है। संसार का समग्र असत्य सत्य कहकर ही प्रचारित किया जा सकता है और किया जाता है। संसार का सारा अधर्म-धर्म के नाम पर ही चल सकता है। इस संसार में आज तक कोई भी ऐसा व्यक्ति, विचार या दर्शन नहीं बन सका जो असत्य को, अधर्म को, पाखण्ड को अधर्म के नाम पर चला सका हो, यही सबसे बड़ी आवश्यकता धर्म के रूप में, सत्य के रूप में हमारे सम्मुख आती है। शास्त्रकार धर्म को सत्य और सत्य को ही धर्म कहते हैं। स्वामी दयानन्द का धर्म और सत्य पर्यायवाची हैं। अतः शास्त्रकार सत्य को धर्म के विशेषण के रूप में प्रत्युक्त करता है, धर्म तो सभी हैं परन्तु सत्य धर्म सब नहीं है, इसीलिये इनमें अन्तर्विरोध है, मोह है और कलह है। सत्य सब है, समग्र है। जिसके पास सब है, उसे भय कहाँ, उसमें कलह कहाँ? जहाँ कलह है, विरोध है, वहाँ अधर्म है। यह धर्म का भय है, जो हम बुद्धि से अधर्म को स्वीकार करते हैं और वाणी से धर्म के महत्त्व को बखानते हैं। ये दोहरे मूल्य, दोहरी आचार पद्धति हमारी अधूरी सत्य निष्ठा को इंगित करती है। जो अधूरा है, वह असन्तुष्ट है, कभी इधर भागता है, कभी उधर, कभी ऐसा करता है, कभी वैसा- यह चंचलता बिना सत्य ज्ञान के, बिना सत्य धर्म के समाप्त नहीं हो सकती। हम सत्य के मूल्य को आंक नहीं पाते तभी तो महर्षि दयानन्द द्वारा राज्य, वैभव, समृद्धि का त्यागना बहुत बड़ा समझते हैं, क्योंकि हम सत्य को उससे मूल्यवान नहीं समझ पाये। हमारी दृष्टि आज भी भौतिक सम्पत्ति को मूल्यवान सिद्ध करने में लगी है। जब हम वास्तविकता से परिचित हो जायेंगे, तब सब वस्तुएँ नगण्य ही जावेंगी। तब हमारे मन में धर्म के ह्रास की चिन्ता भी नहीं होगी, तब तो केवल कर्त्तव्य पूर्ण करने में सुख और शान्ति का अनुभव हो सकेगा। जब हम धर्म की, ईमानदारी की संसार में कमी का उल्लेख करते हैं, तो वास्तविक चिन्ता यह होती है कि कहीं हम सांसारिक मूल्यों में पिछड़ तो नहीं जायेंगे? संसार के इतने लोग झूठे तो नहीं हो सकते, जो सत्य को छोड़कर भाग रहे हैं, धर्म के नाम पर अधर्म कर रहे हैं, इसलिए हम चिन्तित हैं धर्म के लिये, सत्य के लिये, न्याय के लिये। परन्तु सत्य इतना दुर्बल और शक्तिहीन होता तो दुनिया के लोगों द्वारा कभी का नष्ट कर दिया गया होता, आज सत्य का समर्थन करने का साहस किसी में नहीं होता। परन्तु वस्तविकता इससे विपरीत है। सत्य के कारण केवल दण्ड-कमण्डलधारी सारी दुनिया से लोहा लेना चाहता है। सुकरात विष का प्याला पीना चाहता है फिर उस सत्य के लिये हम क्या अधर्म करेंगे, जब उक्त सत्य को हम जीवित रखने का दम्भ कर सकते हैं? सत्य का सहारा मिल जाये, धर्म का अवलम्बन प्राप्त हो जावे तो हम निर्द्वन्द्व और निर्भय अवश्य हो सकते हैं। फिर हम सत्य के जिज्ञासुओं को पाकर प्रसन्न हो जाते हैं, आँखों को मार्ग दिखाने का प्रयत्न कर सकते हैं, मूढ़ व्यक्ति जो अधर्म को धर्म समझता है, उसकी तो उपेक्षा करने वाले चिकित्सक बन सकते हैं, तभी तो आचार्य चरक ने कहा है-

मैत्रीकारुण्यमार्तेषु शक्ये प्रीतिरुपेक्षणम्।

प्रकृतिस्थेषु भूतेषु वैद्यवृत्तिश्चतुर्विधा।।

वेदों में राष्ट्र की संकल्पना एवं राष्ट्रीय एकता का स्वरुप: संदीप कुमार उपाध्याय

  • राष्ट्र का स्वरुप एवं प्रकृति

 

 

विश्व के प्राचीनतम साहित्यों में राष्ट्र या देश के प्रति सुंदर उद्गारों की अभिव्यक्ति की झलक यत्र-तत्र स्पष्ट दिखाई पड़ती है | राष्ट्र शब्द एक सुनिर्दिष्ट अर्थ और भावना का प्रतीक है | जिस प्रकार यजुर्वेद ने राष्ट्र के कल्याण की कामना कितने सुंदर शब्दों में की है –

आ राष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्योऽतिव्याधी महारथो जायताम्‌[1]

अर्थात् हमारे राष्ट्र में क्षत्रिय, वीर, धनुषधारी, लक्ष्यवेधी और महारथी हों | अथर्ववेद में भी राष्ट्र के धन-धान्य दुग्ध आदि से संवर्धन प्राप्ति की कामना की गई है-

अभिवर्धताम् पयसाभि राष्ट्रेण वर्धताम् [2]

राष्ट्र से संबंधित शब्दों का प्रयोग वैदिक साहित्य में अत्यधिक किया गया है | जैसे साम्राज्य, स्वराज्य, राज्य, महाराज्य आदि | इन सब में राष्ट्र शब्द ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं | राष्ट्र शब्द से आशय उस भूखंड विशेष से हैं जहां के निवासी एक संस्कृति विशेष में आबद्ध होते हैं | एक सुसमृद्ध राष्ट्र के लिए उस का स्वरुप निशित होना आवश्यक है | कोई भी देश एक राष्ट्र तभी हो सकता है जब उसमें देशेतरवासियों को भी आत्मसात करने की शक्ति हो | उनकी अपनी जनसंख्या, भू-भाग, प्रभुसत्ता, सभ्यता, संस्कृति, भाषा, साहित्य, स्वाधीनता और स्वतंत्रता तथा राष्ट्रीय एकता आदि समस्त तत्त्व हों, जिसकी समस्त प्रजा अपने राष्ट्र के प्रति आस्थावान हो | वह चाहे किसी भी धर्म, जाति तथा प्रांत का हो | प्रांतीयता और धर्म संकुचित होते हुए भी राष्ट्र की उन्नति में बाधक नहीं होते हैं क्योंकि राष्ट्रीयएकता राष्ट्र का महत्वपूर्ण आधारतत्व है, जो नागरिकों में प्रेम, सहयोग, धर्म, निष्ठा कर्तव्यपरायणता, सहिष्णुता तथा बंधुत्व आदि गुणों का विकास करता है| तथा धर्म तथा प्रांतीयता गौण हो जाती है | तब राष्ट्र ही सर्वोपरि होता हैं | इन गुणों के विकास से ही राष्ट्र स्वस्थ तथा शक्तिशाली होता है |

 

  • राष्ट्र की विषय वस्तु एवं क्षेत्र

 

राष्ट्र के संगठन हेतु किन्ही निश्चित तत्त्वों की आवश्यकता नहीं| समान जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति, भूभाग की अपेक्षा उनमें साथ साथ रहने की इच्छा तथा एकता की भावना होना अति आवश्यक है | अतः राष्ट एक कल्पना है जिस कल्पना का आधार होता है -मानवीय एकता | राष्ट्र वह भावना हैं जो एकत्व की ओर प्रेरित करती है | राष्ट्रीय के लिए जनसंख्या, भूभाग,, सरकार, प्रभुसत्ता आवश्यक नहीं, इसके लिए आवश्यक मिट्टी से प्यार|

 

जो भरा नहीं है भावों से जिसमें बहती रसधार नहीं।  वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।[3]

  • राष्ट्र निर्माण के तत्व

 

तत्वों की अनिश्चितता होते हुए भी राष्ट्र के निर्माण हेतु अधोलिखित तत्वों  की आवश्यकता पड़ती है

  • जनसंख्या

 

             जनसंख्या राष्ट्र का मुख्य तत्त्व है | जब तक राष्ट्र में प्रयाप्त जनसंख्या नहीं होगी तब तक राष्ट्र को संगठित नहीं किया जा सकता क्योंकि राष्ट्र का प्राणतत्त्व है – राष्ट्रीय भावना, जो कि लोगों के परस्पर मिलकर एक साथ रहने से तथा विचारों के आदान-प्रदान, प्रेम, सहयोग की भावना, सभ्यता और संस्कृति आदि के द्वारा पल्लवित तथा पुष्पित होती है| यह तभी संभव है जब जनसंख्या का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता, शांतिमय जीवन तथा जियो और जीने दो की भावना से ओत-प्रोत हो |

 

  • भौगोलिकता

 

           राष्ट्र की आध्यात्मिकता की भावना को दृडता प्रदान करने में भौगोलिकता का अपना विशेष महत्व है क्योंकि भौगोलिकता हि मनुष्य को एकत्व की शिक्षा प्रदान करती है | एक भूभाग पर बसा हुआ जनसमूह स्वाभाविक रुप से राष्ट्रीय एकता की दृढ- बंधन में बंध जाता है क्योंकि उसकी समान जाती, भाषा, धर्म , परंपरा, सभ्यता, संस्कृति, साहित्य आचार-विचार तथा भाव आदि सामान होने के कारण उन से प्रेरित होकर ही वह दूसरों के दुख में अपना दुख तथा दूसरों के सुख में अपना सुख समझता है |

 

  • भाषा

 

             प्रत्येक राष्ट्र के संगठन हेतु भाषा का होना अति आवश्यक है क्योंकि भाषा रहित राष्ट्र गूंगे व्यक्ति के समान होता है जिसकी अपनी कोई भाषा, शैली, भाव तथा विचार नहीं होते | अत: राष्ट्र को सुसंगठित करने हेतु राष्ट्र की एक राष्ट्रीय भाषा होनी चाहिए जो संपूर्ण राष्ट्र में बोली जाए तथा जिसके माध्यम से ही राष्ट्रीय स्तर पर समस्त कार्य की जाएं तथा राष्ट्र अपनी शासन व्यवस्था को सुचारु रुप से संचालित कर सके| भाषा ही ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा हम अपने भावों, विचारों तथा अनुभवों को व्यक्त कर सकते हैं तथा दूसरों के भाव विचारों तथा अनुभवों को समझ सकते हैं | भाषा के माध्यम से ही मानव जाति ने न केवल समाज के रूप में अपितु राष्ट्र रूप में गुम्फित कर लिया है | इस प्रकार राष्ट्र, संगठन तथा राष्ट्रीयता को दृढ़ता प्रदान करने में भाषा अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है |

 

  • धर्म

 

             मनुष्य स्वेच्छा से जो कुछ धारण करता है वही धर्म है और धर्म का राष्ट्र के संगठन में अपना महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि धर्म ही मनुष्य को मानवता से जोड़ता है और मानवता मनुष्यता से | जब मनुष्य के मन में ही सुखी जीवो को अधिक सुखी और दुखी जीवो को सुखी बनाने का भाव जागृत होता है, तब उसके द्वारा किये गए प्रत्येक कल्याणकारी कार्य उसका धर्म होते हैं | यही धर्म उसे राष्ट्र की भावनात्मक शक्ति राष्ट्रीयता से जोड़ता है जो राष्ट्र को सुसंगठित करता है |

 

  • शासन व्यवस्था

 

                   सुसंगठित राष्ट्र के संचालन हेतु शासन व्यवस्था की आवश्यकता होती है जिसकी अभाव में राष्ट्र में अराजकता, वैमनस्य आदि व्याप्त हो जाते हैं जिससे सब अपनी मनमानी करने लगते हैं | जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत चरितार्थ होने लगती है | अतः समस्त मानव जाति तथा राष्ट्र उन्नति के मूल उद्देश्य की पूर्ति हेतु शासन व्यवस्था की महती आवश्यकता पड़ती है, जिससे राष्ट्र का गौरव तथा उसकी स्वतंत्रता सदैव बनी रहती है |

 

  • सभ्यता और संस्कृति

 

                 सभ्यता और संस्कृति राष्ट्र संगठन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है| किसी भी राष्ट्र की पहचान उसकी सभ्यता तथा संस्कृति ही होती है जिसके द्वारा ही वह अन्य राष्ट्रों के समक्ष अपनी पहचान बनाए रखता है| सभ्यता और संस्कृति ही मनुष्य को आध्यात्मिक तथा मनोवैज्ञानिक तथ्यों से सम्बद्ध करती है और राष्ट्रीयता की भावना को साकार करती है | इस प्रकार संस्कृति ही धार्मिक, आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक तथा विश्व बंधुत्व की भावना को प्रवाहित करने वाली नदी है जिस का उद्गम स्थान राष्ट्र है |

 

  • साहित्य

 

                           साहित्य भी राष्ट्र संगठन को अत्यधिक प्रभावित करता है | साहित्य के द्वारा ही व्यक्ति स्वयं को समाज में समायोजित करने योग्य बनाता है | समाज में समायोजित व्यक्ति ही अपना, अपने परिवार का, नगर का, देश तथा समाज का कल्याण कर सकता है | इस प्रकार साहित्य व्यक्ति पर समाज पर, राष्ट्र पर अपना विशेष प्रभाव डालता है जिससे राष्ट्र की आंतरिक भावनात्मक शक्ति को तथा राष्ट्रीय एकता को बल मिलता है |

 

  • राष्ट्रीय एकता एवम अखंडता के आधार तत्व

 

 

वसुधैव कुटुम्बकम् भारतीय संस्कृति का एक आदर्श है | इस आदर्श की संकल्पना वैदिक है | हमारे धर्म ग्रंथों में इसको उल्लिखित किया गया है | हमारे वैदिक ऋषियों ने समग्र मानवता को एक माना है, सब के कल्याण की कामना की है यथा-

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया

सर्वे भद्राणि पश्यन् तु मा कश्चिद् दुख भाग भवेत् |[4]

           ऋग्वेद के निम्न मंत्र में भी मानव मात्र की मता की झलक स्पष्ट दिखाई पड़ती है

अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते सं भ्रातरो वावृधुः सौभगाय।

युवा पिता स्वपा रुद्र एषां सुदुघा पृश्निः सुदिना मरुद्भ्यत्।।[5]

वेदो में वर्णित समता, सहृदयता और स्नेह का यह आदर्श अधिकांशत: मानव जाति के संदर्भ में प्रतिष्ठित हुआ है | यही भावना आगे चलकर उपनिषद और गीता में विस्तृत हुई है| परम एकत्व के आदर्श के अंतर्गत समस्त प्राणियों और वनस्पतियों तक के प्रति अधिक समभाव प्रकट किया गया है| राष्ट्रीय एकता एक ऐसी भावना है जिसके अनुसार राष्ट्र के समस्त निवासी एक दूसरे के प्रति सद्भावना रखते हुए राष्ट्र की उन्नति हेतु परस्पर मिलकर कार्य करते हैं | वस्तुतः यह एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जो राष्ट्र का एकीकरण करते हुए उसके निवासियों में पारस्परिक बंधुत्व और राष्ट्र के प्रति निजत्व का भाव जागृत करते हुए राष्ट्र को सुसंगठित और सशक्त बनाती है | इस प्रकार राष्ट्रीय एकता भाषा, धर्म, जाति, संप्रदाय, संस्कृति और सभ्यता की भिन्नता होते हुए भी उन्हें एकता के सूत्र में बांधकर राष्ट्र को सुदृढ़ बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देती है |

राष्ट्रीय एकता राष्ट्र रूपी शरीर में आत्मा के समान है जिस प्रकार आत्मा विहीन शरीर प्रयोजनहीहो जाता है उसी प्रकार राष्ट्र भी राष्ट्रीय एकता के अभाव में टूट जाता है | हमारा देश भारत एक ऐसा ही देश है जहां भाषा, धर्म, जाति, संप्रदाय, संस्कृति और सभ्यता आदि कि भिन्नता पायी जाती है| लेकिन फिर भी यह एक गौरवशाली राष्ट्र है और राष्ट्रीय एकता इसकी मौलिक विशेषता है|

भारत आज जातिवाद आतंकवाद एवं सांप्रदायिकता की आग में इस तरह धनुष रहा है कि उसके लिए रास्ते एकता के जल की बूंदे खोज पाना अत्यधिक कठिन प्रति हो रहा है आज भारत में किसी भी समय सांप्रदायिक दंगे हो जाना सामान्य बात हो गई है क्योंकि राष्ट्र धर्म से बढ़कर है इस भावना का नागरिकों में लोक सा होता जा रहा है इसी कारण वह स्वयं को हिंदू मुसलमान सिख इसाई आधी पहले समझता है और भारतीय बाद में व्यक्ति प्राचीन काल से ही व्यक्तिगत धर्म जाति और संस्कारों से बढ़कर अपने राष्ट्र को महत्व दिया जाता रहा है परंतु आज भारत में इसके विपरीत बडी हो रहा है इस प्रकार दुर्भाग्यपूर्ण दंगो के निवारण का एक मात्र साधन राष्ट्रीय एकता की रक्षा ही है जिसकी अभाव में भारत राष्ट्र ने अपने अतीत में बहुत ही भैया वह स्त्रियों का सामना किया है इतिहास साक्षी है कि भारतीयों की आपसी फूट के कारण ही बाहर से आए आक्रमण कार्यो और अंग्रेजों ने वर्षों तक भारतवासियों को परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ रखा परतंत्रता कि इन बेड़ियों को काटने के लिए भारत के समस्त नागरिकों को जाति धर्म प्रांतीय ता से ऊपर उठकर एकजुट होना पड़ा तब कहीं कड़े संघर्ष के पश्चात भारत में स्वाधीनता की सूर्य का उदय हुआ |

  • वेदों में राष्ट्रीय एकता

 

प्रत्येक राष्ट्र के लिए यह आवश्यक है कि वहां की नागरिकों में राष्ट्रभक्ति की भावना का संचार होना चाहिए | मातृभूमि को अपनी जन्मदात्री मां के सदृश मानने वाले राष्ट्रभक्त ही राष्ट्र के वास्तविक भक्त होते हैं | उनमें आपस में बंधुत्व की भावना सदा जागृत रहनी चाहिए | जो राष्ट्र का संचालन करते हैं उनका विद्वान होना आवश्यक है | सारे राष्ट्र की निष्ठाएवं विश्वास unameउनमें होनी चाहिए और उन्हें भी पितासदृश संरक्षण देकर सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए |नागरिकों में इस प्रकार की उदात्त भावना उस दिशा में ही संभव है जबकि प्रत्येक व्यक्ति में परस्पर समभाव हो और कोई किसी को ज्येष्ठ या कनिष्ठ ना समझे जैसे कि ऋग्वेद में कहा गया है-

ते अज्येष्ठा अकनिष्ठास उद्भिदो ऽमध्यमासो महसा वि वाव्र्धुः |  सुजातासो जनुषा पर्श्निमातरो दिवो मर्या आ नो अछा जिगातन ||[6]

                       अर्थात राष्ट्र भक्तों में किसी प्रकार की ज्येष्ठता एवं कनिष्ठता की भावना नहीं होने चाहिए | सभी को अपने सdद्प्रयत्नो से राष्ट्र की उन्नति के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए |

सामूहिक हित की भावना से ही सबकी उन्नति संभव है और सभी की उन्नति से ही राष्ट्र की दृढ़ता बढ़ती है | उसकी एकता और अखंडता और मजबूत होती है|

इळा सरस्वती मही तिस्रो देवीर्मयोभुवः |  बर्हिः सीदन्त्वस्रिधः ||[7]

अर्थात राष्ट्रभक्तों में समानता की भावना आवश्यक बताते हुए इस तथ्य को निरूपित किया गया है कि प्रत्येक राष्ट्र की भाषा, संस्कृति एवं भूमि ही सुखप्रदाता एवं श्रेयस्कर देवता है | इनकी ही उन्नति करने से वास्तविक राष्ट्रीय उन्नति संभव हो सकती है और राष्ट्रीय उन्नति से ही सामूहिक सुख प्राप्त हो सकता है|

शत्रुओं से राष्ट्र की रक्षा सबसे अहम बात है क्योंकि शत्रु ही सदैव एक संगठित राष्ट्र के टुकड़े करने के लिए उसकी अखंडता पर प्रहार करने के लिए अवसर खोजा करते हैं | इन राष्ट्रों के शत्रुओं से प्रहरियों को सदैव सावधान रहना चाहिए क्योंकि यह राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं इसी परिप्रेक्ष्य में ऋग्वेद में उल्लिखित है

परेह्यभीहि धर्ष्णुहि न ते वज्रो नि यंसते |  इन्द्र नर्म्णं हि ते शवो हनो वर्त्रं जया अपोर्चन्न नु स्वराज्यम् |[8]

अर्थात स्वराज्य शासन की प्रतिष्ठा अविचल रखने के लिए आवश्यक है कि शत्रु का विनाश किया जाए | जिस प्रकार सूर्य को मेघ के हनन में कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता अपितु सहज रुप से ही उस का हनन हो जाता है इसी प्रकार राष्ट्रप्रेमी भक्तों की इस प्रकार सुव्यवस्था हो की शत्रुओं का बिना किसी चेष्ठा के ही नाश हो जावे | ऋग्वेद में राष्ट्रे जागृयाम वयम् के द्वारा राष्ट्र की एकता और अखंडता के प्रति सजगता का भाव मानवमात्र में सदैव विद्यमान रहने का आदेश प्राप्त होता है | प्रत्येक व्यक्ति अपने राष्ट्र के प्रति कर्तव्य बोध से परिचित होता था | राष्ट्र की रक्षा का दायित्व मात्र राजा का ही नहीं होता अपितु उसके लिए प्रजाजनों के प्रयास भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं

मा त्वद्राष्ट्रमधिभ्रशत्[9]

अर्थात् राष्ट्रीय जनसमूह तुमसे गिरे नहीं | इस राष्ट्र के ना गिरने का अभिप्राय इसकी एकता और अखंडता से ही है |सामवेद में भी देश की एकता एवं अखंडता के आधारतत्त्वो की उपस्थिति स्पष्ट परिलक्षित है | देश के नागरिकों में विद्यमान देशप्रेम की भावना, मातृभूमि के प्रति अगाध श्रद्धा ही उन्हें प्राणोत्सर्ग के लिए उत्प्रेरित करती है | देश में विद्यमान इसी भावना को सामवेद के निम्न मंत्र में वर्णित किया गया है

आ बुन्दं वृत्रहा ददे जातः पृच्चद्वि मातरम् ।

क उग्राः के ह शृण्विरे ॥[10]

 

अर्थात् शास्त्रविद्या में चतुर योद्धा शस्त्र हाथ में लेकर मातृभूमि से पूछे कि कौनकौन देशद्रोही सुने जाते हैं | इससे स्पष्ट हो जाता है कि सच्चा राष्ट्रप्रेमी देश में देशद्रोह की भावना रखने वालों को सहन नहीं कर सकता है क्योंकि वह राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं | सच्ची मातृभूमि ही वह भावना है जो कि राष्ट्र की एकता और अखंडता की आधारशिला है| इसी भावना की उपस्थिति एक राष्ट्र को और अधिक दृढ़ता प्रदान कर सकती है |

अथर्ववेद में स्वराज्य की कल्पना की गई है वह अथर्ववेद में उल्लिखित है-

 

नाम नाम्ना जोहवीति पुरा सूर्यात्पुरोषसः । यदजः प्रथमं संबभूव स ह तत्स्वराज्यमियाय यस्मान् नान्यत्परमस्ति भूतम् [11]

 

इस मंत्र के द्वारा राष्ट्र की संचालन विधि को उत्तम ढंग से किस तरह प्रयोग किया जा सकता है, उसका वर्णन किया गया है | राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता के लिए राज्य संचालन की विधि से ही प्रजा संतुष्ट रहती है| और राष्ट्र के प्रति सद्भाव सद्विचार मनुष्य तभी रख पाता है जबकि वह अपने आप को सुरक्षित एवं शांतिपूर्ण राजनैतिक स्थितियों में पाता है | राष्ट्रभक्तों या देश के वासियों के लिए कुछ कर्तव्य निर्धारित किए जाते हैं जिसमें राष्ट्र की एकता और अखंडता का अस्तित्व सुरक्षित रहता है | दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि स्वराज्य में ही राष्ट्र की एकता एवं अखंडतका अस्तित्व सुरक्षित रहती है क्योंकि स्वशासन से ही स्वराष्ट्र का अस्तित्व बना रह सकता है | विदेशी शासन में चाहे जितनी भी उत्तम व्यवस्था क्यों ना हो स्वशासन से से किसी भी स्थिति में श्रेष्ठ नहीं हो सकता है |

अथर्ववेद में

माता भूमि पुत्रोऽहम पृथिव्या[12]

के द्वारा भूमि को माता तथा उस पर रहने वालों को उसके पुत्र कहा गया है |

मातृभूमि के आदर्श भक्तों में कुछ गुणों का होना अत्यंत आवश्यक है अथर्ववेद में कहा गया है
सत्यं बृहद ॠतं उग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति” ।[13]

अर्थात् जिस राष्ट्र में देशभक्त, सत्यनिष्ठ, प्रचंड छात्रतेज, धर्मानुष्ठान एवं कर्तव्यपालन के गुणों से युक्त प्रत्येक शुभ कार्य को दक्षता पूर्वक संपन्न करते हैं तथा यथार्थ ज्ञान के प्रति समर्पण की भावना रखते हैं| मातृभूमि या राष्ट्र के पालन पोषण करने में समर्थ होते हैं | वही अपना भूत वर्तमान और भविष्य में सब तरह से पोषित करने वाली मातृभूमि की रक्षा करके उसकी उन्नति के विस्तृत स्थान एवं अवसर प्रदान करें|

  • राष्ट्रीय एकता में साधक तत्व

 

 

  • संस्कृति

 

             भारतीय संस्कृति में ऐसा गुण है कि उसने मानव में सदैव मानवता का गुण समाहित किया है | हमारे वैदिक साहित्य, काव्य, रामायण और श्रीमद्भगवद्गीता सभी ने भारतीयों के मन मस्तिष्क में नैतिक, आध्यात्मिक और सदाचार का ऐसा समावेश किया है कि उसको वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा सदैव साकार होती दृष्टिगोचर होती है |म्पूर्ण भारत में हम कहीं भी रहे वेद, पुराण, उपनिषद, रामायण और गीता सभी भाषाओं में उपलब्ध है | उनके आदर्शों के अनुयाई देशभर में निवास करते हैं यह संस्कृति हमें एकता के सूत्र में बांधे रखती है |

 

 

  • संविधान में निष्ठा

 

           स्वतंत्रता के बाद हमारे संविधान का निर्माण किया गया जिसमें भारत के सभी वर्गों के लोगों का प्रतिनिधित्व था | देश ने सभी लोगों को आत्मसात कर लिया था | जो अल्पसंख्यक थे, शरणार्थी थे या विदेशी थे उनके वर्ग के अनुसार ही उन्हें प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया | सबको धर्म की स्वतंत्रता प्रदान की गई अपने लिए व्यवसाय के चुनाव की पूर्ण स्वतंत्रता दी गई | सभी धर्मों को सम्मान की दृष्टि से देखा गया | राष्ट्र में कहीं भी निवास करने की एवं संपत्ति अर्जित करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई | ऐसे संविधान की छाया में जीवन व्यतीत करने वालों में वैमनस्यता जैसी भावना आने का प्रश्न ही कहां उठता है ?

  • धर्मनिरपेक्षता

 

           हमारा राष्ट्र एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और ऐसे राष्ट्र में धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता | हम जब सभी धर्म वालों को सम्मान की दृष्टि से देखेंगे तो आपस में प्रेम और सद्भाव में वृद्धि अवश्य ही होगी | सभी धर्मों के लोग अपने पूजा स्थलों के निर्माण, पूजापद्धति अपनाने और अपने धार्मिक उत्सवों को पूर्ण करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं | एक हिंदू मुसलमान को ईद पर बधाई देता है तो मुसलमान दीपावली और होली पर प्रेम से सम्मिलित होते हैं | जहां इतने विशाल हृदय के लोग हो वहां एकता पर प्रश्न चिह्न कहां लगाया जाए ?

  • लोकतांत्रिक व्यवस्था

 

         स्वतंत्रता के बाद देश में संघात्मक लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया गया इसमें देश में व्याप्त विविधता का पूर्ण रुप से सम्मान किया गया है | सभी वर्गों को अपनी सरकार चयन का अधिकार प्रदान किया गया है | शासन में उनकी अपनी भागीदारी से उनमें देश के प्रति निष्ठा में वृद्धि होती है | अपनी बात कहने का अधिकार उन्हें संविधान से प्राप्त है |

 

  • अनेकता में एकता

 

           भारत एक विशाल देश है उसमें अनेकता होना स्वभाविक है | इसके बाद भी समग्र रुप से दृष्टिपात किया जाए तो इस अनेकता में भी एकता का सूत्र बंधा हुआ है| सदियों से यहां विभिन्न धर्म है लेकिन सब में एक दूसरे के प्रति सम्मान है | सामाजिक व्यवस्था में खानपान में प्रादेशिक रूप में विभिन्नता है, लेकिन दक्षिणवर्ती भारतीय व्यवस्थाएं उत्तर भारत में लोकप्रिय है | संपूर्ण राष्ट्र की भौगोलिक स्थितियां भिन्न भिन्न है फिर भी प्राचीन काल से ही यह राष्ट्र एकता के सूत्र में बंधा हुआ है |

  • स्वतंत्रता संग्राम

 

           भारत की आजादी के लिए जो महासंग्राम लड़ा गया था तब इस पर शहीद होने वाले वीर हिंदू, मुस्लिम, सिख, पारसी, जैन और बौद्ध सभी लोग थे| उस महायज्ञ में सब ने अपने अपने प्राणों की आहुति दी थी | अब स्वतंत्र भारत की खुली हवा में हमने सांस ली है कोई नहीं भूलता है उन बलिदानों को| भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद की बलिदान गाथा आज भी नौजवानों को एक स्वर में जय हिंद और भारत माता की जय का लगाने के लिए पर्याप्त है | यह सभी तत्व है जिससे लाखों विभिन्नताओं के बाद भी यदि देश पर संकट आता है तो पूरा राष्ट्र एक स्वर में संकट का जवाब देने के लिए तैयार रहता है | पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक सिर्फ एक भारत अखंड राष्ट्र के रूप में स्थाई राष्ट्र है |

 

 

 

 

  • राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता के बाधक तत्व

 

                                भारत एक ऐसा राष्ट्र है जहां विभिन्नता में एकता पाई जाती है फिर भी यह विभिन्नता कहीं-कहीं अपना संकुचित दृष्टिकोण इस तरह से अपनाने लगती है कि देश में विभिन्न दृष्टिकोण आपस में ही संघर्ष करने लगते हैं और जब यह विघटनकारी तत्व पनपने लगते हैं तो देश की राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता के लिए खतरा पैदा हो जाता है |

  • जाति

 

             हमारे देश में विभिन्न धर्मों के साथ विभिन्न जातियां निवास करती हैं | जिनमें कुछ उच्च और कुछ निम्न कहलाती हैं | सदियों से उच्च जातियों ने निम्न जातियों का शोषण किया है सिर्फ हिंदू ही नहीं अपितु मुसलमान, सिक्ख और इसाई भी अनेक जातियों में बटें हुए हैं | स्वतंत्रता के बाद संविधान द्वारा सबको समान अधिकार दिया गया है जातिगत राजनीतिक दलों के निर्माण के कारण जातीय तनाव में वृद्धि हुई है | जातिभेद संकीर्णता के द्योतक हैं और जातियों के मध्य द्वेष और वैमनस्य बढ़ाते हैं | यह स्थितियां राष्ट्र की एकता एवं अखंडता में बाधक सिद्ध होती है |

 

  • सांप्रदायिकता

 

                सांप्रदायिकता हमारे विद्वानों, धर्मगुरुओं और दार्शनिकको ने एक ही ईश्वर के अस्तित्व को  स्वीकार किया है चाहे वे ईश्वर कहें या खुदा कहें अथवा यीशु कहें किसी ने भी कभी भी दूसरे धर्म के प्रति विद्वेश रखने की बात स्वीकार नहीं की है | सांप्रदायिकता धर्म का संकुचित दृष्टि कोण हैं | संसार में विविध धर्म के मूलभूत सिद्धांतों को सभी ने  स्वीकार किया है यथा प्रेम, सेवा, परोपकार, सच्चाई, समता, नैतिकता, अहिंसा और पवित्रता आदि  सभी धर्मों में मान्य हैं | सच्चा धर्म कभी एक दूसरे से घृणा करना या वैर करना नहीं सिखाता | लेकिन धर्म की नाम पर राजनीति करने वालों ने धर्म के नाम पर दीवार घड़ी की है और यह दीवार देश की एकता में बाधक बन सकती है |

  • भाषावाद

 

    1.                  भारत एक बहुभाषी राष्ट्र है यहां अनेक भाषाएं विभाषाये और बोलियां प्रचलित हैं | यद्यपि स्वतंत्र भारत में हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित किया गया है | लेकिन भाषायी संकीर्णता भी अपना सिर उठाने लगी है | भाषा के आधार पर राज्यों की मांग सिर उठाने लगी है | हिंदी के विरोध में उर्दू और अन्य प्रादेशिक भाषाएं भी विवाद का कारण बन कर मानव मानव के मध्य भे पैदा कर रही है, और यह विभेद राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए बाधक साबित हो रहे हैं |
  • क्षेत्रवाद

 

    1.                        एक संघराष्ट्र के लिए उसके प्रांत एक अभिन्न अंग होते हैं | संघ में सभी प्रांतों को बराबर अधिकार प्रदान किए गए हैं | अंग्रेजों ने हमें सिर्फ धर्म के आधार पर ही नहीं बांटा अपितु पक्षेत्रीय आधार पर भी बांट दिया | कभी प्रान्त को लेकर, कभी भाषा को लेकर, प्रांतीयता की बात होने लगती है और यह प्रांत स्वराज्य की मांग भी करते हैं | जो संघ के शासन में रहने से इनकार करते हैं इन मांगों को स्वीकार नहीं किया जा सकता है |
  • राजनैतिक क्षुद्रता

 

    1.                    राष्ट्र के लिए सर्वाधिक घातक देश में राजनैतिक क्षुद्रता का होना है | अपने स्वार्थसिद्धि के लिये ये लोगो के प्राण लेने के लिये भी तत्पर रहते है | भारत में दो चार राजनैतिक दलों को छोड़कर शेष सभी देश का अहित करने में तत्पर रहते है | अब तो राजनीती में घटियेपन्न की भी प्रतियोगिता होने लगी है की अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए कोन निम्न से भी निम्नस्तर को छू सकता है | अब राजनीती में एक से बढ़कर एक निम्न स्तर के लोग आ गये है जो खाते भारत का है और गीत दुश्मन देशों के गाते है | अतः देश की प्रजा को बचाए रखने के लिए ऐसे राजनैतिक दलों से भी सावधान रहने की आवश्यकता है |
  • आर्थिक विषमता

 

    1.                    देश में व्याप्त आर्थिक विषमता थी राष्ट्रीय एकता और अखंडता के मार्ग में बाधक बन जाती है जो लोग अत्यधिक निर्धन हैं या अभावग्रस्त हैं जिन्हें दिनभर ड़ी मेहनत के बाद भी पेट भर भोजन नहीं मिलता वे अपने मालिको या बड़े-बड़े बंगलो में सुख सुविधाओं से युक्त जीवन जीने वालों के प्रति ईर्ष्या का भाव रखे तो स्वभाविक नहीं कर कहा जा सकता है | आर्थिक विषमता ने वर्गसंघर्ष के सिद्धांत को जन्म दिया है| यह आर्थिक विषमता सदैव ही राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए है |
  • आतंकवादी गतिविधिया                      सारांश रूप में कहा जा सकता है कि आज की विषम परिस्थितियों में राष्ट्रीय एकता एवम् अखंडता को भारतीय समाज में जीवित रखने का प्रयास ही एक ज्वलन्त समस्या है | हमारा देश इस समय ऐसी भयावह स्थिति का सामना कर रहा है जिसका समुचित एवं सार्थक समाधान यदि शीघ्र नहीं हो सका तो भारतीय समाज को विघटित होने से बचा पाना बहुत ही कठिन हो जाएगा | कुछ बाह्य एवम आंतरिक शक्तियों द्वारा अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए धार्मिक संकीर्णता के आधार पर मनुष्य को बांटने वाली राजनीति की जा रही है | मानव कल्याण की भावनाओं को त्याग कर उच्च मूल्यों से विमुख होकर आज धर्म पर आधारित राजनीति को बढ़ावा दिया जा रहा है | राष्ट्रीय एकता एवम् धर्मनिरपेक्षता के विपरीत भारतीय समाज के विभिन्न वर्ण अपनीअपनी व्यक्तिगत, धार्मिक, क्षेत्रीय एवं जातीय विचारधाराओं तथा मान्यताओं के आधार पर देश को बांटने के प्रयास कर रहे हैं | ऐसी विषम परिस्थितियों का सामना करने के लिए राष्ट्रीय एकता एवम् धर्म –निरपेक्षता की परम आवश्यकता है |

 

  1.                  देश में आतंकवादी गतिविधियों ने संपूर्ण राष्ट्र की जड़ों को हिला दिया है कभी कश्मीर में सामूहिक हत्या का तांडव होता है| कभी बिहार में गांव उजाड़ दिया जाता है कभी मुजफ्फरनगर तो कभी सहारनपुर तो कभी पश्चिम बंगाल ये सब स्थान कहीं ना कहीं आतंकवादी गतिविधियों के केंद्र बनते जा रहे हैं |इन सब का अर्थ क्या समझा जा सकता है ? हम अखंड राष्ट्र में निर्भीक जीवन व्यतीत कर रहे हैं ? हम अपने ही देश में डर-डर कर जी रहे हैं ? यह सब देश की राष्ट्रीय एकता एवम अखंडता के लिए अभिशाप है

शोध छात्र गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार उत्तराखंड, ९८९९८७५१३०, sandeep.gurukul@gmail.com

 

यजुर्वेद २८/२२

अथर्ववेद ६/७८/२

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त

संस्कृत परिचायिका, पृष्ठ ५९ (मुख्यतः पद्मपुराण से )

ऋग्वेद 5।60।5

ऋग्वेद ५/५९/६

ऋग्वेद १/१३/९

ऋग्वेद १/८०/३

यजुर्वेद ७.२०

सामवेद २/२१६

अथर्ववेद १०/७/३१

अथर्ववेद १२.१.१२

अथर्ववेद १२.१.१

 

 

[1] यजुर्वेद २८/२२

[2] अथर्ववेद ६/७८/२

[3] राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त

 

[4] संस्कृत परिचायिका, पृष्ठ ५९ (मुख्यतः पद्मपुराण से )

[5]  ऋग्वेद 5।60।5

[6] ऋग्वेद ५/५९/६

[7] ऋग्वेद १/१३/९

[8] ऋग्वेद १/८०/३

[9] यजुर्वेद ७.२०

[10] सामवेद २/२१६

[11] अथर्ववेद १०/७/३१

[12] अथर्ववेद १२.१.१२

[13] अथर्ववेद १२.१.१

वेद एक है अथवा चार? डॉ धर्मवीर

प्रस्तुत सम्पादकीय प्रो. धर्मवीर जी का अन्तिम सम्पादकीय है, यह एक शोधपरक लेख है। इसको पढ़कर आचार्यश्री की विद्वत्ता स्पष्ट दिखाई देती है। अब वे हमारे मध्य में नहीं हैं, पर उनके दार्शनिक जीवनोपयोगी उपदेश परोपकारी के पाठकों को मिलते रहेंगे।                                                                 -सम्पादकहिन्दू समाज में एक मान्यता है कि वेद पहले एक ही था। महर्षि व्यास ने उसके चार भाग करके चार वेद बनाये। इसलिये बहुत सारे लोग महर्षि वेद व्यास को वेदों का कर्त्ता मानते हैं। वेद के एक होने और चार होने का क्या आधार है? इस पर विचार करने पर इसके अनुसार हर कल्प में व्यास के होने और वेद के विभाजन से वेद-व्याख्यान के रूप में ब्राह्मण एवं शाखा ग्रन्थों का उल्लेख होना संगत है।

वस्तुस्थिति से वेद के विषय और जिन ऋषियों पर वेद का प्रकाश हुआ है, उनका उल्लेख प्रारम्भ से ही देखने में आता है-

. महीधर अपने यजुर्वेद-भाष्य के आरम्भ में लिखता है-

तत्रादौ ब्रह्मपरम्परया प्राप्तं वेदं वेदव्यासो मन्दमतीन् मनुष्यान् विचिन्त्य तत्कृपया चतुर्धा व्यस्य ऋग्यजुः सामाथर्वाख्यांश्चतुरो वेदान् पैल वैशम्यायनजैमिनिसुमन्तुभ्यः क्रमादुपदिदेश।

अर्थात् ब्रह्मा की परम्परा से प्राप्त वेद को मनुष्यों की सुविधा के लिये व्यास ने चार भागों में बाँट कर अपने चार शिष्य पैल, वैशम्पायन, जैमिनि व सुमन्तु को उपदेश किया।

. महीधर से पूर्ववर्ती तैत्तिरीय संहिता के भाष्यकार भट्ट भास्कर ने अपने भाष्य के आरम्भ में लिखा है-

पूर्वं भगवता व्यासेन जगदुपकारार्थमेकीभूय स्थिता वेदाः व्यस्ताः शाखाश्च परिछिन्नाः।

अर्थात् पहले जो वेद एक रूप में थे, जगदुपकार के लिये व्यास ने उनका विभाग किया और शाखाओं में बाँटा।

. भट्ट भास्कर से पूर्व निरुक्त के भाष्यकार आचार्य दुर्ग ने निरुक्त १/२० की वृत्ति में लिखा है-

वेदं तावदेकं सन्तमतिमहत्त्वाद् दुरध्येयमनेकशाखा भेदेन समाम्नासिषुः। सुखग्रहणाय व्यासेन समाम्नातवन्तः।।

अर्थात् वेद एक होने से बड़ा और अध्ययन में कठिन होने के कारण सुविधा के लिये व्यास ने शाखा-भेद से उसके अनेक विभाग किये।

इस कथन का मूल विष्णु पुराण में इस प्रकार मिलता है-

जातुकर्णोऽभवन्मत्तः कृष्णद्वैयापनस्ततः।

अष्टाविंशतिरित्येते वेदव्यासाः पुरातनाः।।

एको वेदश्चतुर्धा तु यैः कृतो द्वापरादिषु।

– विष्णु पुराण ३/३/१९-२०

इसी प्रकार मत्स्य पुराण में उल्लेख मिलता है-

वेदश्चैकश्चतुर्धा तु व्यख्यते द्वापरादिषु।

– मत्स्य पुराण १४४/११

अर्थात् प्रत्येक द्वापर के अन्त में एक ही वेद चतुष्पाद चार भागों में विभक्त किया जाता है। पुराण के अनुसार अब क्यों कि अट्ठाईसवाँ कलियुग चल रहा है, तो यह वेद विभाजन २८ बार हो चुका है। इन सभी विभाग करने वालों का नाम व्यास ही होता है।

श्वेताश्वतर उपनिषद् में-

यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो

वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै।।

-६/१८

जो प्रथम ब्रह्मा को उत्पन्न करता है और उसके लिये वेदों को दिलवाता है।

वेदान्त दर्शन का भाष्य करते हुए शङ्कराचार्य लिखते हैं-

ईश्वराणां हिरण्यगर्भादीनां वर्तमानकल्पादौ प्रादुर्भवतां परमेश्वरानुगृहीतानां सुप्तप्रबुद्धवत् कल्पान्तर-व्यवहारानुसन्धानोपपत्तिः। तथा च श्रुतिः-यो ब्रह्माणम्।।

– वेदान्त सूत्र भाष्य १/३/३० तथा १/४/१

आचार्य शंकर वेदात्पत्ति हिरण्यगर्भ से कहते हैं, उनके मत में हिरण्यगर्भ ब्रह्मा है। इस ब्रह्मा की बुद्धि में कल्प के आदि में परमेश्वर की कृपा से वेद प्रकाशित होते हैं।

वेदान्त सूत्र के शांकर भाष्य की व्याख्या करते हुए श्री गोविन्द ने इस प्रकार लिखा है-

पूर्वं कल्पादौ सृजति तस्मै ब्रह्मणे प्रहिणोति= गमयति= तस्य बुद्धौ वेदानाविर्भावयति।

– वेदा. १/३/३०

इसी सूत्र की व्याख्या पर आनन्दगिरि ने लिखा है-

वि पूर्वो दधातिः करोत्यर्थः।

पूर्वं कल्पादौ प्रहिणोति ददाति।

इन सभी स्थानों पर वेद का बहुवचन में प्रयोग किया गया। अतः चारों वेद की उत्पत्ति प्रारम्भ से ही है। व्यास द्वारा चार भागों में विभक्त किया गया, यह कथन सत्य नहीं है।

. सर्वप्रथम वेद में ही चार वेदों का उल्लेख पाया जाता है। ऋग्वेद में-

तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतः ऋचः सामानि जज्ञिरे

छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद् यजुस्तस्मादजायत।।

– १०/९०

. इसी प्रकार यजुर्वेद के पुरुषाध्याय में भी सभी वेदों का उल्लेख मिलता है।

. सामवेद में वेद का उल्लेख मिलता है।

. अथर्ववेद का मन्त्र ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के वेदात्पत्ति प्रकरण में ऋषि दयानन्द ने उद्धृत किया है।

अथर्वाङ्गिरसो मुखम्।

. ब्राह्मण ग्रन्थों में-

अग्नेर्ऋग्वेदोः वायो यजुर्वेदः सूर्यात् सामवेदः।

. उपनिषदों में चारों वेदों की चर्चा आती है। बृहदारण्यक में याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद में –

तस्य निश्वसितमेतद् ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदो अथर्ववेदः।

छान्दोग्य में सनत्कुमार और नारद के संवाद में नारद सनत्कुमार को अपनी विद्या का परिचय देते हुए कहते हैं-

ऋग्वेदं भगवोऽध्योमि,

यजुर्वेदमध्येमि सामवेदमथर्ववेदं।

तैत्तिरीय शिक्षा वल्ली में साम की चर्चा है-

साम्ना शंसन्ति यजुभिर्ययजन्ति।

मुण्डक में अथर्ववेद का विस्तार से उल्लेख मिलता है-

ब्रह्मा देवानां….।

यहाँ पर ब्रह्म विद्या को अथर्व विद्या का विषय बताया है और ऋषियों की लम्बी परम्परा का उल्लेख किया है।

. रामायण में किष्किन्धा काण्ड में राम-लक्ष्मण के साथ हनुमान् के प्रसंग में लक्ष्मण राम से हनुमान् की योग्यता का वर्णन करते हुए कहते हैं-

नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः।

नासामवेदविदुषः शक्यमेवं प्रभाषितुम्।।

नूनं व्याकरणं कत्स्नमनेन बहुधा श्रुतम्।

बहुव्याहरतानेन न किंचिदपशब्दितम्।।

न मुखे नेत्रयोर्वोपि ललाटे च भ्रुवोस्तथा।

अन्येष्वपि च गात्रेषु दोषः संविदितः क्वचित् अस्थिरमसिन्दिरधमविलम्बितमद्रुतम्।

उरःस्थं कण्ठगं वाक्यं वर्तते मध्यगे स्वरे।।

संस्कार क्रम सम्पन्नामद्रुतामविलम्बिताम्।

उच्चारयति कल्याणीं वाचं हृदयहरिणीम्।।

अनया चित्रया वाचा त्रिस्थानव्यञ्जनस्थया कस्य नाराध्यते चित्तमुद्यतासेररेरपि।।

– कि.का. ३/२८-३३

अत्राभ्युदाहरन्तीमां गाथां नित्यं क्षमावहाम्।

गीताः क्षमावतां कृष्णे काश्यपेन महात्मना।।

क्षमा धर्मः क्षमा यज्ञः क्षमा वेदाः क्षमा श्रुतम्।

यस्तमेवं विजानाति स सर्वं क्षन्तुर्महति।।

– महाभारत वन पर्व २९/३८-३९

इन श्लोकों में महाराज युधिष्ठिर द्रौपदी को उपदेश दे रहे हैं, महात्मा कश्यप की गाई गाथा का उल्लेख कर बता रहे हैं, क्षमा ही वेद हैं, यहाँ वेद का बहुवचन में प्रयोग किया गया है।

ऋचो बह्वृच मुख्यैश्च प्रेर्यमाणाः पदक्रमैः।

शुश्राव मनुजव्याघ्रो विततेष्विह कर्मसु।।

अथर्ववेदप्रवराः पूर्वयाज्ञिकसंमताः।

संहितामीरयन्ति स्म पदक्रमयुतां तु ते।।

-महाभारत आदि पर्व अ. ६४/३१, ३३

जब दुष्यन्त कण्व के आश्रम में प्रवेश करते हैं, तब आश्रम के वातावरण में ऋग्वेद के विद्वान् पद और क्रम से ऋचाओं का पाठ कर रहे थे। अथर्ववेद के विद्वान् पद व क्रम युक्त संहिता का पाठ पढ़ रहे थे।

इससे पता लगता है कि दुष्यन्त के काल में अथर्ववेद संहिता का क्रम पाठ व पद पाठ पढ़ा जाता था।

महाभारत के अनेक प्रसंग हैं, जिनमें वेदों के लिये बहुवचन का प्रयोग मिलता है।

पुरा कृतयुगे राजन्नार्ष्टिषेणो द्विजोत्तमः।

वसन् गुरुकुले नित्यं नित्यमध्ययने रतः।।

तस्य राजन् गुरुकुले वसतो नित्यमेव च।

समाप्तिं नागमद्विद्या नापि वेदा विशांपते।।

– महा. शल्य पर्व अध्याय ४१/३-४

अर्थात् प्राचीन काल में कृतयुग में आर्ष्टिषेण गुरुकुल में पढ़ता था, तब वह न विद्या समाप्त कर सका, न ही वेदों को समाप्त कर सका।

वेदैश्चतुर्भिः सुप्रीताः प्राप्नुवन्ति दिवौकसः।

हव्यं कव्यं च विविधं निष्पूर्तं हुतमेव च।।

– महा. द्रोण पर्व अध्याय ५१/२२

अर्थात् राम के राज्य में चारों वेद पढ़े हुये विद्वान् लोग थे।

ब्रह्मचर्येण कृत्स्नो मे वेदः श्रुतिपथं गतः।

– महा. आदि पर्व ७६/१३

इसमें ययाति ने देवयानी से कहा है- मैंने ब्रह्मचर्य पूर्वक सम्पूर्ण वेदों को पढ़ा है।

राज्ञश्चाथर्ववेदेन सर्वकर्माणि कारयेत्।

– महा. शान्ति पर्व ७/५

भीष्म ने उशना का प्राचीन श्लोक उद्धृत कर राजा पुरोहित से अथर्ववेद द्वारा सारे कार्य करावे। यहाँ अथर्ववेद का स्पष्टतः उल्लेख है।            – धर्मवीर

संस्कृत वाङ्ग्मय में यमों के अंतर्गत अहिंसा का स्वरूप

संस्कृत वाङ्ग्मय में यमों  के अंतर्गत अहिंसा का स्वरूप

संदीप कुमार उपाध्याय[1]

 

मानव जीवन के साथ ही दैवी और आसुरी वृत्तियों का संघर्ष सर्गारंभ से चला आ रहा है | जीवन -संग्राम में आसुरी वृत्तियों के विजय होने पर क्लेशों का समुद्र उमड़ पड़ता है | यह क्लेश मानव को काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार आदि विविध रूपों में व्यथित करते हैं | इन के वशीभूत होकर मनुष्य जब अन्य प्राणियों को कष्ट देने के लिए संनद्ध होता है तो उस वृत्ति का ही नाम हिंसा है | परंतु साधक जब आसुरी वृतियों की प्रबल विरोधिनी सेनाओं के द्वारा दैवी वृत्तियों को विजयी बना लेता है , तो देवी वृत्तियों के विशाल साम्राज्य में सात्विकता, शांति, श्रद्धा, प्रेम, उत्साह आदि आध्यात्मिक सुखद राज्यों की स्वतः  स्थापना हो जाती है | इन्हीं दैवी वृत्तियों की जननी एवं कोशिका वृत्ति का नाम है अहिंसा |

आसुरी (हिंसात्मक) वृत्तियां साधक को विविध कष्टों से दुखित करने के साथ ही अध्यात्म- प्रसाद से वंचित रखती हैं , अतः श्रुति भगवती  को कल्याण भावना से शिक्षा देती है कि सोम स्वरूप परमेश्वर को चाहने वाले साधकों  तुम किसी की हिंसा मत करो |[2] हिंसा न करने का हेतु बताते हुए आगे कहा है- हिंसक वृत्ति वाला व्यक्ति मोक्ष रूपी अनुपम संपदा को कदापि पा नहीं सकता |[3] इसके विपरीत जो अन्याय अनीति से स्वार्थवश किसी की हिंसा नहीं करते, वही धर्मात्मा, शक्तिशाली होकर निर्भयता से विजय पाते हैं ,[4] अतः वेद का संदेश है कि योगाभिलाषी अहिंसा का पालन करें, अन्य राजपुरुष आदि उनकी रक्षा करते हुए अहिंसा-वृति का आचरण करें |[5]

हिंसा का निषेध

वेदों में हिंसा न करने  तथा अहिंसा का  परिपालन करने के विषय को  अतिसूक्ष्मता  एवं  व्यापकता से प्रस्तुत किया गया है | साधना के लिए उद्यत  साधक जब गंभीरता से दृष्टिपात करता है तो उसे सारा प्राणि-जगत हिंसा से परिपूर्ण, जीव ही जीव का घातक दिखाई देता है | ऐसी स्थिति में जीव, जीव का भोजन बना हुआ है, सबल निर्बल को ही खा रहा है, पीड़ा दे रहा है, दुखित कर रहा है |  ये दुखित करने की भावनाएं गुण-कर्म तथा स्वभाव में आ चुकी हैं |  इनसे मानव स्वयं दुखी है और दूसरों को भी कष्ट देने के लिए तैयार रहता है| इस अवस्था में सुख कहां ? साधक यह विचार कर सर्वप्रथम इन दुरितों को दूर करने की प्रार्थनाएं करता है कि- हे सविता देव ! हमारे संपूर्ण दुर्गुण दुर्व्यसन और दुखों को दूर कर दीजिए| [6] हे इंद्र हिंसा कराने वाले काम, क्रोध द्वेष आदि  के अधीन हमें ना होने दीजिए | [7] द्वेष  की भावना ही सब प्रकार की हिंसा की मूल है, इनके विनष्ट हुए बिना साधक आगे बढ़ नहीं सकता, इसलिए विनम्र हो पुनः निवेदन करता है- प्रभु आप संपूर्ण देश युक्त कर्मों को हम से पृथक कर दीजिए |[8] हिंसा से पृथक रहने की अवस्था तभी आती है जब मनुष्य हिंसा के दुष्परिणामों को भली-भांति जान लेता है | क्योंकि पहले अज्ञान एवं कुसंगवश दुष्कर्मों में फंस जाता है, पुनः उनसे छुटकारा पाना कठिन समझकर परमेश्वर से विनय करता है, साथ ही लोक में अपने से वरिष्ठ विद्वानों से प्रार्थना करता है कि- विद्वान पुरुषों ! अत्याचार करनेवाले, दान ना देने वाले तथा दुख देने वाले देषभावों को हमसे दूर करके कल्याण का मार्ग प्रशस्त करो |[9] हिंसा करना तो दूर रहा, वैदिक साधक  तो हिंसक का संसर्ग भी नहीं चाहता| उसकी सदा यह भावना रहती है कि जैसे विद्वान लोग हिंसा रहित मित्र के घर जाते रहते हैं, उन्हीं का अनुसरण मैं करूं |[10] द्वेष ही हिंसा का जनक है, द्वेषी व्यक्ति योग मार्ग में अग्रसर नहीं हो सकता| अद्वेषि  होना योगी की प्रथम पहचान है| वेद का दृढ  सिद्धांत है कि अद्वेषि ही परमात्म प्रसाद को पा सकता है | [11] अतः वेदों में द्वेष युक्त कर्म तथा द्वेष   त्याग की भावना से ओतप्रोत अनेक ऋचाए मिलती हैं |[12] ऐश्वर्याभिलाषी साधक मोह, क्रोध, मत्सर, काम, मद  एवं लोभ  इन छह राक्षसी वृतियों को क्रमसः  उल्लू, भेड़िया, कुत्ता, चकवा या कबूतर, गरुण और गिद्ध की दुर्वृतियों  वाला जानकर पत्थर से पीसने के समान समूल मसल दे | [13] अर्थात आगे से, पीछे से, नीचे से, ऊपर से, सब ओर से ऐसे राक्षसी भावों को सर्वथा समाप्त कर दे| [14]

हिंसा से बचने के उपाय

वैदिक संहिताओं में हिंसा, अहिंसा विषय के विधि और निषेध  पर मंत्र मिलते हैं | वेद के रहस्य में गुढ  तत्वों को विद्वान योगी ही भली भांति हृदयंगम कर सकता है| वैदिक अहिंसा के मूल में सदा प्राणियों के अवैध व्याघात का अभाव जन कल्याण की भावना तथा ईश्वरीय न्याय व्यवस्था विद्यमान हैं | वेद का संकेत है कि- ऐसा साधक, ईश्वर के सर्वोकारक मार्ग से कभी पृथक न हो| हिंसा रहित श्रेष्ठ कर्म योग यज्ञ का अनुष्ठान करता रहे तथा अपने अंदर शत्रुता की भावनाओं को तथा दान न  देने की भावनाओं को ठहरने ना दे  | [15]

राजा तथा राज पुरुषों का कर्तव्य है कि अहिंसा व्रत सेवी योगी पुरुषों की सब प्रकार से रक्षा करें| यदि कोई नराधम उन्हें कष्ट दे तो राजा उसे विविध कष्ट दे | संतप्त करें|[16] हिंसक से प्रेम न करें |[17] उसकी अधोगति कर दे |[18] पुनरपि वह हिंसा के स्वभाव को नहीं त्यागे तो  देश से बाहर निकाल दे[19] या मार दे |[20]

 

दंड विधान हिंसा नहीं

वेद में जहां प्राणी मात्र को मित्र की[21] दृष्टि से देखने के बार बार निर्देश दिए गए हैं ,वहां वेद[22] विद्वान-द्वेषी, मांस भक्षी, क्रूर प्रकृतिवाले ,प्रत्येक कार्य में कुतर्क करने वाले-कुकर्मी एवं पाप की प्रशंसा करने वालों को विशेष मन्यु बल से संतप्त करने, बाण से बीन देने, बंधन में डाल दंड देने तथा अंग भंग करने या मार देने तक के आदेश मिलते हैं | [23] जो वीर पुरुष क्रूर हिंसक ओं को मारता है उसके लिए प्रतापी(शुक्रशोचिः)[24] अमर, पवित्र, शुद्ध करने वाला ,स्तुति करने योग्य, अग्नि के समान तेजस्वी, मित्र, विप्र, सखा आदि विशेषण का प्रयोग किया गया है| शत्रुनाशन प्रसंग[25] में यदि कोई गौ,अश्व या प्रिय पुरुष को मारता है तो उसे शीशे की गोली से बीन्धने  का विधान है|  इस प्रकार हिंसको  के नाश का अन्यत्र[26] भी स्पष्ट विधान किया गया है| वस्तुतः आसुरी वृतियों से उत्पन्न हिंसक कर्मों के विनाश के लिए किया गया दंड विधान अहिंसा के परम उत्तम सिद्धांत की रक्षा के लिए ही है| इसीलिए शत्रु नाशक पुरुषों को मित्र =सखा कहा गया है|

वेद की अहिंसा की रक्षिका हिंसा के सूक्ष्म रहस्य को ना समझ कर मध्यवर्ती काल में पशु पक्षियों की हिंसा को वेद सम्मत मानने का प्रयास किया गया जिससे वेद के प्रति जन साधारण को गिलानी तक हो गई| परंतु वेद का स्पष्ट मत यही है कि अधार्मिक पाप वृतियों के जनक दुर्गुणों तथा घातक मनुष्यों का मानव कल्याण के लिए अवश्य वध करने योग्य है, अर्थात पापियों को दंड देना हिंसा नहीं ; वेद में किया गया दंड विधान अहिंसा की रक्षा के लिए है|[27]

 

अहिंसा पालन के प्रकार

वैदिक उपासना के मार्ग पर अग्रसर उपासक विविध प्रकार से व्यवहार में अहिंसा का पालन करने को उद्यत रहता है| वह अहिंसा सेवी अन्य उपासक बंधुओं के साथ सूर्य चंद्रमा के समान सदैव  कल्याण तथा अहिंसा के पथ पर चलने की कामना करता है|[28] अहिंसा के पालन का संकुचित क्षेत्र नहीं होना चाहिए| इसलिए वेद  अहिंसा का पालन, प्राणी मात्र को मित्र की दृष्टि से देखकर, करने का निर्देश करता है|[29] अहिंसा धर्म का पालन सत्य वक्ता, अहिंसा सेवी विद्वान के संसर्ग में ही हो सकता है |[30] अतः अहिंसा का पालक ऐसे विद्वानों का अपने यहां आह्वान करता है[31]

अहिंसा का पालन किसी समय विशेष में करने से सिद्धि नहीं होती, इसलिए महर्षि दयानंद सरस्वती मंत्र के भावार्थ में स्पष्ट करते हैं कि जो म नियमों से युक्त होकर कार्य सिद्धि के लिए दिन रात प्रयत्न करते हैं वह उत्तम होते हैं दैनिक व्यवहार में दिन रात अहिंसा का पालन करते हुए साधक आत्मिक साहस को प्राप्त कर सकता है| अहिंसनीय[32] व्यवहारों में परमात्मा विशेष रूप से प्रोत्साहित करता है| परमात्मा[33] हिंसा रहित योग यज्ञों का सम्राट है| वह अहिंसा[34] से परिपूर्ण स्तुति प्रार्थना को ही स्वीकार करता है|  साधक अहिंसा का पालन करते करते जब अपनी इंद्रियों को अहिंसा में अभ्यस्त बना लेता है तब परमात्मा प्राप्ति का मार्ग उसके लिए प्रशस्त हो जाता है साधक इंद्रियों की हिंसक अग्नि का सयम करके प्रभु प्रेम को प्राप्त करते हैं |[35]

वेदों में प्रयुक्त अध्वर:[36] अथर्वा[37] अदभा[38] अनेहस्[39]  अघ्नता[40] अघ्न्या आदि  पद अहिंसा पालन का स्पष्ट संकेत करते हैं|  वेदों में अहिंसा विषयक पर्याप्त निरूपण होते हुए भी पाश्चात्य विद्वानों ने तथा उनके अनुयाई भारतीय विद्वानों ने अपनी पुस्तकों में यह मत प्रकट किया है कि भारत में आर्य लोग गौ मांस भक्षण करते थे|

मैकडानल  और कीथ अपनी पुस्तक वैदिक इंडेक्स में लिखते हैं कि वैदिक काल के भारतीयों का मांस के संबंध में भोजन का पता उन जानवरों की सूची से चलता है जो यज्ञ में मारे जाते थे ,जो मनुष्य खाते हैं वहीं देवताओं को बलि देते हैं, भेड़ बकरी और बैल पुस्तक में दूसरे स्थान पर लिखा है कि वैदिक काल में मांस सर्वसाधारण का भोजन था| वेद पर लगाए गए इस प्रकार के अनेक आरोपों का मुख्य कारण है वेदों को प्रकरणशः  समझने की योग्यता का अभाव वेदों को स्वयं न पढ़कर अन्यों के भाष्यो पर विश्वास करना तथा पाश्चात्य विद्वानों द्वारा वेद की निंदा कर भारतीयों को वैदिक धर्म के प्रति ग्लानि उत्पन्न करने की व्यापक योजना|  अहिंसा के विरुद्ध लिखने वाले इन पश्चिमी विद्वानों का कई वैदिक विद्वानों ने युक्ति एवं प्रमाण पूर्वक निराकरण किया है |

इस प्रसंग में इतना अवश्य विचारणीय  है कि जब वेदों में सर्व साधारण के लिए सामान्य रूप से अहिंसा लिखी है पुनः हिंसा के लिए वेदो को समर्थक मानना नितांत अज्ञता  एवं धृष्टता है इस प्रकार जब जनसाधारण के लिए वेद अहिंसाव्रत के पालन का विधान करता है तो सात्विक गुण अभिलाषी साधक के लिए हिंसा का प्रश्न हि नहीं होता |

 

अहिंसा के भेद

वैदिक संहिताओं में अहिंसा तथा हिंसा के अनेक स्वरूप हैं उनको प्रमुख रुप से 3 भेदों में विभक्त कर सकते हैं शारीरिक अंगों से हिंसा ना करना ,वाणी से असत्य और कटु वचन ना बोलना तथा मन से विद्वेष ना करना, अहिंसा है | इस तरह वेदों में मन, वाणी एवं शरीर तीनो से ही अहिंसा पालन के निर्देश मिलते हैं संक्षेप से यहां अनुशीलन किया गया है

मानसिक अहिंसा  – मननात्मक शक्ति, बुद्धि के विकृत होने पर तामसिक गुण की अधिकता से मनुष्य हिंसा में प्रवृत्त होता है और शस्त्र आघात या अन्य साधनों से मनुष्य तथा पशुओं को नष्ट करना चाहता है|[41] ऐसे अनिष्ट चिंतक को श्रुति  में दुर्मति:[42] दुहार्द अर्थात दुष्ट मति वाला दुष्ट हृदय वाला दुरात्मा कहा गया है|  इसी प्रकार ज्ञान के द्वेषी  को ब्रह्मद्विषः  विचार एवं द्रोही के लिए द्रुह पद का प्रयोग है| इन शब्दों का संबंध मानसिक हिंसा से है मानसिक हिंसा में संलग्न मनुष्य निश्चिंत शांत नहीं रह सकता इसीलिए उपासक वेद के शब्दों में प्रार्थना करता है कि हे प्रभु सुमनस्कता  और दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए हम सदैव विद्वानों की संगति करते रहें | विद्वानों का कर्तव्य है कि वह अहिंसा से पूर्ण कार्यों की रक्षा करें एवं परस्पर प्रीति बढ़ाकर अहिंसा धर्म की वृद्धि करें| विद्वानों के लिए वेद का आदेश है कि विद्वान ऐसी बुद्धि को उत्पन्न करें जिससे समाज में बल की वृद्धि तथा योग कर्मों में प्रगति हो सके| अहिंसा व्रत के पालन से साधक मोक्ष मार्ग का पथिक तभी बन सकता है जबकि वह योगाभ्यास के द्वारा प्राणी मात्र में परमात्मा की अनुभूति करता है| वह परमात्मा में सब जड़ चेतन आदि को समझता है ऐसे सम्यक दर्शन में उसे किसी प्रकार का संदेह नहीं रहता वह सुख दुख हानि लाभ में अपने आत्मा के समान सब प्राणियों को देखता हुआ धार्मिक वृत्ति से मोक्ष को प्राप्त होता है मानसिक अहिंसा का पालन सर्वोपरी कठिन है अतः वैदिक साधना से भी मानसिक अहिंसा के अनुकूल व्यवहार करें, इसका पालन बड़ी गंभीरता से व्यवहार को शुद्ध करने से होता है |

 

वाचिक अहिंसा-  जो व्यक्ति कठोर भाषण के द्वारा दूसरों को कष्ट पहुंचाते हैं या वाणी द्वारा द्रोह प्रकट करते हैं वेद में उन्हें द्रोघवाच:[43] कहा गया है | इसे हम वाचिक हिंसा कह सकते हैं | जो असत्य वचनों से दूसरे को धमकाता, झिड़कता है और अहिंसक को हिंसक कहता है अपने को सत्यवादी एवं धर्मात्मा सिद्ध करता है सर्वज्ञ परमात्मा उसकी आत्मा को निर्बल करता है| असत्य बोलने या गाली देने वालों के लिए प्रजा रक्षक राजा दंड विधान करें| वाचिक अहिंसा के साधक को आवश्यक है की स्तुति करने वाली उपदेश द्वारा ज्ञान प्रदान करने वाली तथा ईड़ा सरस्वती और महि तीन अहिंसानिय वाणियों को सदा प्राप्त करें |

अहिंसा व्रत के पालक ऐसा संयम करें जिससे दिव्य गुणयुक्त महात्माओं के सम्मुख प्रतिज्ञा पूर्वक घोषणा कर सके कि भगवान ना तो हम हिंसा करते ना घात पात करते हैं ना ही वाग्व्यवहार से परस्पर विरोध करते हैं | मंत्र के अनुसार आचरण करते हुए तिनकों के समान तुच्छ निर्बल साथियों के साथ भी एकमत होकर मिलकर वेगपूर्वक कार्य करते हैं[44] उपासना काल में किसी की हिंसा करने वाली प्रार्थना भी ना करें | परमेश्वर के समीप उपस्थित होकर उन्हें अहिंसा जनक स्तुति प्रार्थना तथा क्रियाओं द्वारा व्रत पालन का संकल्प लें जो सत्य सिद्ध हो|[45]

उपासक परिवार में रहकर किस प्रकार वाचिक अहिंसा का आचरण करें इसका सुंदर परिशीलन अथर्ववेद में किया गया है| पति पत्नी पारस्परिक संभाषण में मधु के समान मधुर और शांतिदायक वाणी बोलें |[46] पुत्र माता पिता के साथ अनुकूल मन वाले होकर वर्तनी वाले हो| भाई भाई आपस में द्वेष  न करें|[47] बहन बहन आपस में द्वेष न करें  |इसी प्रकार बहन भाई भी अहिंसा व्रत के पालक होकर सदैव मीठी एवं कल्याणकारिणी वाणी बोलें  |जिस प्रकार विद्वान योगी पुरुष आपस में विद्वेष नहीं करते उसी प्रकार घर के सभी सदस्यों का

प्रेम- पूर्ण व्यवहार हो |[48] सभी अपने से बड़ों का आदर करें, ए मन होकर रहें, कभी पृथक न हो, मिलकर संसिद्धि अर्थात कार्यो को पूरा करने का यत्न करें, एक आधार बनाकर आचरण करें, एक दूसरों के प्रति सरल, मीठा, प्रेम पूर्वक बोले इस तरह साथ-साथ  उद्योग करने वालों को परमात्मा एकमन वाले तथा पवित्र मन की शक्ति से युक्त करता है |[49]

शारीरिक अहिंसा–   जो मन और वाणी से हिंसा के भाव निकाल देगा वह शारीरिक हिंसा नहीं कर सकता | वेदों में मन वाणी से अहिंसा व्रत के साथ ही शारीरिक अहिंसा पालन के विशेष निर्देश उपलब्ध होते हैं| ईर्ष्या, द्वेष, लोभ आदि के वशीभूत हो किसी को शारीरिक कष्ट देना, अंग-भंग करना या प्राण हरण कर लेना शारीरिक हिंसा का क्षेत्र है; इसके त्याग को शारीरिक अहिंसा कहा गया है| यथा- शारीरिक हिंसा को के लिए वेद मंत्रों में अत्रिणः[50] रिपुः[51] एवं हस्तघ्न[52]  आदि शब्दों के प्रयोग मिलते हैं| ऐसे शारीरिक हिंसाको को  दंड देने तथा शरीर से दुर्बल कर देने का विधान वेदों में किया गया है | शारीरिक अहिंसा-व्रत की पालना के लिए शारीरिक हिंसा का निषेध किया है कि प्रजाओं को शरीर के द्वारा कोई न मारे| साधक स्वयं शारीरिक कष्ट नहीं देता वर्ण कष्ट देने वालों के प्रति प्रभु से प्रार्थना करता है कि हे परमेश्वर यह सभी हिंसक मनुष्य हमारे शत्रु बनकर वैर  भाव ना रखें तथा हमारे शरीरों का नाश न करें अपितु हम परस्पर मैत्री का व्यवहार करते रहें| अहिंसा दोनों पक्षों से स्थिर होती है |वेद का स्पष्ट आदेश है कि साधक न कभी दूसरों से हिंसित  हो न स्वयं दूसरों की हिंसा करें| किसी स्थान विशेष पर भी हिंसा ना करें, अहिंसा के कार्यों में ही विद्वानों का सहयोग मांगे\[53]

अहिंसा पूर्वक धन संचय-

                          साधक जीविकोपार्जन के लिए जो भी कार्य करता है उस में हिंसा का आश्रय लेकर दूसरों को कष्ट पहुंचा कर, झूठी प्रशंसा से या छल कपट से धोखा देकर धन संचय करता है| तो वह धन मोक्षधन की प्राप्ति नहीं कराता| हिंसा से प्राप्त धन राज्यश्री और उत्तम सामर्थ्य प्राप्त नहीं करा सकता| अतः साधक परमेश्वर से याचना करता है कि मुझे तो वह धन प्राप्त कराइए जिससे मैं भवसागर से पार जा सकूं और आपके  दिव्य स्वरुप में विद्यमान अनासक्ति, परोपकार तथा मोक्षधन पा सकूँ | उसे  पता है कि अहिंसक ही उत्तम धन और पुत्रों को प्राप्त करता है| [54] नचिकेता तथा मैत्रेयी  ने इस सांसारिक धन्नो को नश्वर समझ कर अविनश्वर मोक्ष धन के कामना की थी| नारद को समझाते हुए सनत कुमार ने इस परम धन को भूमा कहा है| अतः सुख चाहने वाला उपासक अहिंसा से उपार्जित वित्त पर संतोष करें |

सार्वभौम अहिंसा

वैदिक संघिता ओं में अहिंसा की शिक्षा ग्रहण करने का क्षेत्र विशाल है| चेतन मात्र से अहिंसा जन्य सुख शांति की कामना के साथ साथ प्रकृतिस्थ अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चंद्र, नक्षत्र, विद्युत, पर्वत, समुद्र , दिशा, दिन-रात, ऋतु, क्षेत्र, अन्नादि औषधी, वनस्पति, मन, बुद्धि, प्राण आदि  से सुख तथा शांति की कामना की गई है| यह तभी संभव है जब साधक परमाणु से लेकर परमात्मा तक के सूक्ष्म तथा महान तत्वों का ज्ञान वेदादिशास्त्र के अध्ययन से प्राप्त करें |साधक प्रकृति के पदार्थों, मनुष्य, गौ  आदि पशुओं से सुख एवं उनकी कामना करता है|  विज्ञ साधक इस ज्ञान से संपन्न हो विचारता है कि प्रकृति का प्रत्येक तत्व अहिंसक होकर परोपकार में तल्लीन हैं| पुनः मैं भी क्यों ना इन से शिक्षा ग्रहण कर अहिंसा व्रत का पालन करूं| मैं किसी प्राणी विशेष को किसी स्थान विशेष में क्यों मारूं यह तो मेरे लिए हितकारी है, प्रजापति की प्रजा हैं ,जब मैं इन्हें जीवनदान नहीं  दे सकता तो इन्हें विनष्ट करने का भी तो मुझे अधिकार नहीं ,अतः सर्वथा  ही  अहिंसा पालनीय हैं |

अहिंसा का फल

सामवेदीय ऋचा में कहा गया है कि अहिंसनीय योगयज्ञ के द्वारा भक्ति रस का पान करता हुआ साधक विश्व बंधुत्व की भावना को प्राप्त कर लेता है उसे ब्रह्मांड में किसी से भय नहीं रहता| साधक वेद के शब्दों में प्रार्थना करता है कि अंतरिक्ष से. द्युलोक से, पृथ्वी लोक से, आगे, पीछे, ऊपर, नीचे से, हमें अभय प्राप्त हो| उसकी कामना होती है कि मुझे मित्र से, शत्रु से, परिचित से, अपरिचित से, रात में और दिन में अभय प्राप्त हो, सारी दिशाएं मेरी मित्र बन जाएं[55]  साधक अभय प्राप्ति की कामना करता हुआ जब अहिंसा व्रत को सिद्ध कर लेता है तो शचीपति परमात्मा उसे आगे, पीछे से ,शत्रुओं से अभय कर देता है, अहिंसा सिद्ध साधक के लोक परलोक दोनों कल्याणकारी हो जाते हैं| अहिंसा वृत्ति ही धर्म पूर्वक राज्य करते हैं उत्तम सदगृहस्थ भी जीवन को क्रोध रहित होकर अहिंसा सेवी  होकर भगा सकता है अहिंसा व्रत के आधार पर ही धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष चारों को प्राप्त किया जा सकता है| परमात्मा का यह व्रत है कि वह  हिंसा रहित को ही प्रथम अंगीकार करता है, अन्य पुरुषों द्वारा भी वही सत्कार के योग्य है, योग दर्शन में कहा है कि अहिंसा की प्रतिष्ठा होने पर उपासक के पास रहने वाले सब प्राणियों का पारस्परिक वैर -भाव समाप्त हो जाता है| शेष योग- अंगो की आधारशिला अहिंसा है इसका परिपालन अपरिहार्य एवं सर्व प्राथमिक है,इसी हेतु महर्षि पतंजलि ने अहिंसा को प्रथम स्थान दिया है वस्तुतः सत्यवादी यम तथा नियमों का अनुष्ठान अहिंसा की सिद्धि के लिए होता है, यदि कोई असत्यभाषण, चौर-कर्म, व्यभिचार आदि करता है तो मानो वह हिंसा करता है और यदि सत्यादी  का दृढ़ता  से अनुष्ठान करता है तो समझो वह अहिंसा व्रत का ही पालन कर रहा है|

[1] शोध छात्र गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार उत्तराखंड ,९८९९८७५१३०

[2] मा स्त्रेध सोमिनः | ऋग्वेद ७ /३२/९

[3] न स्रेधन्तं रयिर्नशत् |  ऋग्वेद ७ /३२/९ , सामवेद  ८६८

 

[4] तरणिरिज्जयति क्षेति पुण्यति न देवासः कवत्नवे || ऋग्वेद ७ /३२/९

 

[5] मा हिंसी: पुरुषः जगत् | यजुर्वेद १६/३

[6] ओम विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव | ऋग्वेद ५ /८२/५  यजुर्वेद ३०/३

 

[7] मा न इन्द्र पीयत्नवे मा शर्धते परादा| सामवेद १८०६

[8] विश्वा द्वेषासि प्रमुमुग्ध्यस्मत्  | ऋग्वेद ४/०१ /४

 

 

[9] अपामीवामप विश्वामनाहुतिमपारातिं —–स्वस्तये || ऋग्वेद १० /६३ /१२

 

[10] ऋग्वेद ५ /६४ /३

 

[11] अद्वेषो हस्तयोर्दधे | ऋग्वेद १ /२४ /४

 

[12] ऋग्वेद ५ /८७  /८

 

[13] उलूकयातुं ———रक्ष इंद्र | ऋग्वेद ७ /१०४ /२२

 

[14] प्राक्तो अपाक्तो अधरादुदाक्तोभि जहि रक्षसः पर्वतेन | अथर्ववेद  8/4/11

[15] मा प्र गाम पथो वयं मा यज्ञादिन्द्र सोमिनः |

मान्तः स्थुर्नो अरातयः                                              ऋग्वेद १० /५७  /१

 

[16] तप्तं रक्ष उब्जतम् | अथर्ववेद   8/4/1

[17]  ब्रह्मद्विषे ——द्वेषो धत्तम् | अथर्ववेद   8/4/1

 

[18] अथर्ववेद   8/4/15

 

[19] अथर्ववेद   8/4/21

 

[20] अथर्ववेद   8/4/13

 

[21] मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे| यजुर्वेद ३६/१८

[22] ब्रह्मद्विषे क्रव्यादे घोरचक्षसे द्वेषो …….किमीदिने | अथर्ववेद   8/4/2

 

[23] अथर्ववेद   8/4/1-15

 

[24] अथर्ववेद   8/3/20,२२,२६

 

[25] यदि नो गां हंसियद्यश्वं यदि पूरुषम् |

तं त्वा सीसेन विध्यामा यथा नोऽसो अवीरहा || अथर्ववेद   1 /16/4

 

[26] अथर्ववेद   2/14/

 

[27] अथर्ववेद   8/3/12

 

[28] स्वस्ति पन्था मनुचरेम ——–| ऋग्वेद 5/५१/15

[29] यजुर्वेद ३६/१८

[30] ऋग्वेद ०३/०९/०१

[31]  यजुर्वेद ३३/७३

[32]  ऋग्वेद ८/१०२/०७

[33] सामवेद १७

[34] सामवेद ३२

[35] सामवेद ३८

[36] यजुर्वेद 2/८

[37] ऋग्वेद १/८०/16

[38] ऋग्वेद ५/८६/५

[39] ऋग्वेद 1/१८५/3

 

[40] ऋग्वेद ५/५१ /15

 

[41] अथर्ववेद 3/२८/१

[42] ऋग्वेद १/१३१/7

[43] अथर्ववेद  ८/४/१४

[44] ऋग्वेद 1/13/9

[45] अस्मे ता त इन्द्र सन्तु सत्या हिन्सन्तीरूप्स्प्रिशः || ऋग्वेद 10/२२/13

[46] अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमना 😐 अथर्ववेद 3/३०/2

[47]  मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा | अथर्ववेद 3/३०/3

[48] अथर्ववेद 3/३०/४

[49] अथर्ववेद 3/३०/५

[50]अथर्ववेद ८/४/१

[51] अथर्ववेद ८/४/१0

 

[52] यजुर्वेद १८/७३

[53] ऋग्वेद 6/५४/७

[54] सामवेद ८६८

[55] अथर्ववेद १९/15/५-6