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विधिहीन यज्ञ और उनका फल: – स्वामी मुनीश्वरानन्द सरस्वती त्रिवेदतीर्थ

स्वामी मुनीश्वरानन्द सरस्वती त्रिवेदतीर्थ आर्यसमाज के शीर्ष विद्वान् रहे हैं। आपके द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘विधिहीन यज्ञ और उनका फल’ यज्ञ सम्बन्धी कुरीतियों पर एक सशक्त प्रहार है। इसी पुस्तक का कुछ अंश यहाँ पाठकों के अवलोकनार्थ प्रकाशित है।           -सम्पादक

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज की मान्यता है कि श्री कृष्ण जी एक आप्त पुरुष थे। यज्ञ के विषय में इस आप्त पुरुष का कहना है कि-

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्,

श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।।

-गीता १७/१३

१. विधिहीनं यज्ञं तामसं परिचक्षते।

२. असृष्टान्नं यज्ञं तामसं परिचक्षते।

३. मन्त्रहीनं यज्ञं तामसं परिचक्षते।

४. अदक्षिणं यज्ञं तामसं परिचक्षते।

५. श्रद्धा विरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।

इन पाँच प्रकार के दोषों में से किसी एक, दो, तीन, चार या पाँचों दोषों से युक्त यज्ञ तामसी कहा जाता है। तामसी कर्म अज्ञानमूलक होने से परिणाम में बुद्धिभेदजनक तथा पारस्परिक राग, द्वेष, कलह, क्लेशादि अनेक बुराइयों का कारण होता है।

प्रस्तुत लेख में हम ‘विधिहीनं यज्ञं तामसं परिचक्षते।’ इस एक विषय पर स्वसामथ्र्यानुसार कुछ विचार प्रस्तुत कर रहे हैं।

१. श्री कृष्ण जी का कहना है कि विधिहीन यज्ञ तामसी होता है। विधि के अनुसार सबसे प्रथम स्थान यजमान का है। जो ‘यष्टुमिच्छति’ यज्ञ करना चाहता है। यज्ञ का सम्पूर्ण संभार तथा व्यय यजमानकर्तृक होता है। अग्नि यजमान की, अग्निशाला (यज्ञशाला) यजमान की, हविद्र्रव्य यजमान का। ऋत्विज् यजमान के। उनका मधुपर्कादि से सत्कार करना तथा उनकी उत्तम भोजन व्यवस्था यजमान कत्र्तृक। उनका शास्त्रानुसार दक्षिणा द्रव्य यजमान का। इतनी व्यवस्था के साथ अग्न्याधान से पूर्णाहुति तक का पूरा अनुष्ठान ऋत्विजों की देखरेख में यजमान करता है। यजमान इस सामथ्र्य से युक्त होना चाहिये। अपरं च पूर्णाहुति के बाद उपस्थित जनता से पूर्णाहुति के नाम से तीन-तीन आहुतियाँ डलवाना पूर्णरूपेण नादानी और अज्ञानता है। इसका विधि से कोई सम्बन्ध न होने से यह भी एक विधिविरुद्ध कर्म है, जिसे साहसपूर्वक बन्द कर देना चाहिए। इस आडम्बर से युक्त यज्ञ भी तामसी होता है। क्या आर्यसमाज संगठन के यजमान तथा ऋत्विक् कर्म कराने वाले विद्वान् इस व्यवस्था तथा यजमान सम्बन्धी इस विधि-विधान के अनुसार यज्ञ करते-कराते हैं। जब पकडक़र लाया हुआ यजमान तथा विधिज्ञान शून्य ऋत्विक् इन बातों को छूते तक नहीं तो केवल विधिविरुद्ध आहुति के प्रकार ‘ओम् स्वाहा’ के लिए ही मात्र आग्रह करना कौनसी बुद्धिमत्ता है। इस उपेक्षित वृत्त को देखकर यही कहा जायेगा कि ऋत्विक् कर्मकत्र्ता सभी विद्वान् इन विधिहीन यज्ञों के माध्यम से केवल दक्षिणा द्रव्य प्राप्त कर अपने आप को धन्य मानते हैं तथा यजमान अपने आप को पूर्णकाम समझता है, विधिपूर्वक अनुष्ठान की दृष्टि से नहीं।

ऐसे यजमान और ऋत्विक् सम्बन्धी-ब्राह्मण में महाराज जनमेजय के नाम से एक उपाख्यान में कहा गया है कि-

‘अथ ह तं व्येव कर्षन्ते यथा ह वा इदं निषादा वा सेलगा वा पापकृतो वा वित्तवन्तं पुरुषमरण्ये गृहीत्वा कर्त (गर्त) मन्वस्य वित्तमादाय द्रवन्ति, एवमेव त ऋत्विजो यजमानं कत्र्तमन्वस्य वित्तमादाय द्रवन्ति यमनेवं विदोयाजयन्ति। अनेवं विदो अभिषेक प्रकारं (अनुष्ठान प्रकारं वा) अजानन्त ऋत्विजोयं क्षत्रियं (यजमान वा) याजयन्ति। तं क्षत्रियं (यजमानं वा) विकर्षन्त्येव विकृष्टमपकृष्टं कुर्वन्त्येव। तत्रेदं निदर्शनमुच्यते।’ – ए.ब्रा. ३७/७

सायण भाष्य:- निषादा नीचजातयो मनुष्या:। सेलगाश्चौरा:। इडाऽन्नं तया सह वत्र्तन्त इति सेडा।

धनिकास्तान् धनापहारार्थं गच्छन्तीति सेलगाश्चौरा:। पाप कृतो हिंसा कारिण:। त्रिविधा: दुष्टा: पुरुषा वित्तवन्तं बहुधनोपेतं पुरुषमरण्यमध्ये गृहीत्वा कत्र्तमन्वस्य कश्मिेश्चिदन्ध कूपादि रूपे गत्र्तेतं प्रक्षिप्य तदीयं धनमपहृत्य द्रवन्ति पलायन्ते। एवमेवानभिज्ञा ऋत्विजो यजमानं नरक रूपं कत्र्तमन्वस्य नरकहेतो दुरनुष्ठानेऽवस्थाप्य दक्षिणारूपेण तदीयं द्रव्यमपहृत्य स्वगृहेषु गच्छन्ति। अनेन निदर्शनेन ऋत्विजामनुष्ठान परिज्ञानाभावं निन्दति।

डॉ. सुधाकर मालवीय कृत हिन्दी अनुवाद:- इस प्रकार (अभिषेक प्रकार को या अनुष्ठान प्रकार को न जानने वाले ऋत्विज् जिस क्षत्रिय के लिए या जिस यजमान के लिए यजन करते हैं, तो वे उस क्षत्रिय वा यजमान का अपकर्ष भी करते हैं, जिस प्रकार नीच जाति के ये निषाद, चोर और (हिंसा करने वाले शिकारी आदि) पापी पुरुष बहुधन से युक्त पुरुष को अरण्य के मध्य पकडक़र (किसी अन्ध कूपादि) गड्ढे में फेंककर उसके धन का अपहरण करके पलायित हो जाते हैं, उसी प्रकार ये अनुष्ठान प्रकार से अनभिज्ञ ऋत्विज् लोग यजमान को नरकरूप (विधिहीन) अनुष्ठान में स्थापित करके दक्षिणारूपी उसके धन का अपहरण करके अपने घर चले जाते हैं।

आर्यसमाज के क्षेत्र में अनुष्ठीयमान यज्ञों में यह पहले प्रकार का विधिहीनता-रूपी दोष सर्वत्र रहता है। इस प्रकार हमारे ये यज्ञ तामसी कोटि के हो जाते हैं। हमारे ये पारायण-यज्ञ जहाँ से चलकर आर्यसमाज में आए हैं, वहाँ पूर्ण रीति से इनका विधि-विधान लिखा हुआ है। हमारे विद्वान् उसे देखना या उधर के तज्ज्ञ विद्वानों से सम्पर्क करना भी उचित नहीं समझते। हमारी स्थिति तो सन्त सुन्दरदास के कथनानुसार-

पढ़े के न बैठ्यो पास अक्षर बताय देतो,

बिनहु पढ़े ते कहो कैसे आवे पारसी।

इस पद्यांश जैसी है। संस्कार विधि यद्यपि हिन्दी भाषा में है, पर फिर भी इसे समझना आसान काम नहीं है। गुरुचरणों में बैठ, पढक़र ही समझा जा सकता है। हमारा पुरोहित समुदाय ऐसा करना आवश्यक नहीं समझता तो फिर विधिपूर्वक अनुष्ठान कैसे हो सकते हैं और कैसे कर्मकाण्ड में एकरूपता आ सकती है।

ये वेद पारायण-यज्ञ (संहिता स्वाहाकार होम) जहाँ से हमने लिए हैं, वहाँ इनके अनुष्ठान के लिए विधिविधान का उल्लेख करते हुए अपने समय के ब्राह्मण, आरण्यक, श्रौत और गृह्य सूत्रों के उद्भट विद्वान् स्वर्गीय श्री पं. अण्णा शास्त्री वारे (नासिक) अपने ग्रन्थ ‘संहिता स्वाहाकार प्रयोग प्रदीप’ में लिखते हैं कि-

‘तत्र कात्यायनप्रणीतशुक्लयजुर्विधान सूत्रं, सर्वानुक्रमणिकां च अनुसृत्य संहितास्वाहाकार होमे प्रतिऋग्यजुर्मन्त्रे आदौ प्रणव: अन्ते स्वाहाकारश्च। मध्ये यथाम्नायं मन्त्र:। प्रणवस्य स्वाहाकारस्य च पृथक् विधानात् मन्त्रेण सह सन्ध्याभाव:। मन्त्र मध्ये स्वाहाकारे सति तत्रैवाहुति: पश्चान्मन्त्र समाप्ति:। न पुनर्मन्त्रान्ते स्वाहोच्चारणमाहुतिश्च।।  – पृ. २४०

अर्थ:- संहिता स्वाहाकार होम विषय में कात्यायन प्रणीत शुक्ल यजुर्विधान सूत्र और सर्वानुक्रमणिका का अनुसरण करते हुए संहिता स्वाहाकार होम में प्रत्येक ऋग्यजुर्मन्त्र के आदि में प्रणव (ओम्) तथा अन्त में स्वाहाकार, मध्य में संहिता में पढ़े अनुसार मन्त्र। मन्त्र और स्वाहाकार के पृथक् विधान होने से इनकी मन्त्र के साथ सन्धि नहीं होती। मन्त्र के बीच में स्वाहाकार आने पर वहीं आहुति देकर पश्चात् मन्त्र समाप्त करना चाहिए। फिर से मन्त्र के अन्त में स्वाहाकार का उच्चारण कर आहुति नहीं देनी चाहिये।

प्रणव और स्वाहाकार का मन्त्र से पृथक् विधान होने से मन्त्रान्त में ओम् स्वाहा उच्चारण कर आहुति देना नहीं बनता। कात्यायन भिन्न अन्य सभी ऋषि-महर्षियों का भी ऐसा ही मत है। उदाहरणस्वरूप प्रस्तुत प्रमाण का अवलोकन कीजिए-

सर्व प्रायश्चित्तानि जुहुयात्

स्वाहाकारान्तैर्मन्त्रैर्न चेत् मन्त्रे पठित:।

– आश्वलायन श्रौतसूत्र १/११/१०

आयु को निश्चित मानना वेद विरुद्ध है: -ब्र. वेदव्रत मीमांसक

परोपकारी मासिक, वर्ष २४, अङ्क ११, आश्विन २०३१ वि. में श्री पं. फूलचन्द शर्मा निडर भिवानी वालों का ‘आयु को निश्चित न मानने वालों से कुछ प्रश्र’ शीर्षक एक लेख छपा है। उसमें उन्होंने आयु निश्चित सिद्ध करने का प्रयत्न किया है।

आर्य विद्वानों में आयु निश्चित है अथवा अनिश्चित। इस विषय में मतभेद है। एक वर्ग वाले मानते हैं कि आयु निश्चित है और दूसरे वर्ग वाले कहते हैं कि अनिश्चित है। इस विषय में दो-बार शास्त्रार्थ हुआ। दूसरी बार का शास्त्रार्थ ‘दयानन्द सन्देश’ वर्ष २, अङ्क ९, १० के विशेषाङ्क के रूप में प्रकाशित हुआ, जिसको देखने से दोनों पक्ष वालों के मूलभूत विचार स्पष्ट होते हैं।

किसी बात को सिद्ध करने के लिए प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन नामक पञ्च अवयवों की आवश्यकता होती है। इन्हीं को प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द और प्रमाण कहा जाता है। किसी वस्तु की सिद्धि में हेतु प्रमुख होता है। हेतु के प्रबल होने से पक्ष सिद्ध होता है। हेतु के न होने से अथवा हेत्वाभास से पक्ष सिद्ध नहीं होता। हेतुओं और हेत्वाभासों पर न्यायशास्त्र में अतिसूक्ष्मता से विचार किया गया है। प्रमाणों के द्वारा वस्तु की परीक्षा करना न्याय कहलाता है। महर्षि वात्स्यायन ने न्याय १/१/१ पर लिखा है ‘‘प्रत्यक्षागमाश्रितमनुमानं सा अन्वीक्षा। प्रत्यक्षागमाभ्यामीक्षितस्यान्वीक्षणमन्वीक्षा तथा प्रवर्तत इत्यान्वीक्षिकी न्यायविद्या न्यायशास्त्रम्। यत्पुनरनुमानं प्रत्यक्षागमविरुद्धं न्यायाभास: स इति।’’ प्रत्यक्ष और आगम पर आश्रित अनुमान को अन्वीक्षा क हते हैं। प्रत्यक्ष और आगम के द्वारा ईक्षित का पश्चात् ईक्षण अन्वीक्षा है। उसको लेकर जो प्रवृत्त हो, उसको आन्वीक्षिकी, न्यायविद्या, न्यायशास्त्र कहते हैं। जो अनुमान प्रत्यक्ष तथा आगम के विरुद्ध हो, वह न्याय नहीं अपितु न्यायाभास है।

श्री निडर जी आयु के विषय में सत्यासत्य का निर्णय नहीं करना चाहते, क्योंकि वे कहते हैं ‘‘मैं तो न्यायशास्त्र नहीं जानता। न्यायशास्त्र के बिना ही मैं आयु को निश्चित सिद्ध कर दूँगा।’’ भला जो व्यक्ति प्रतिज्ञा को नहीं जानता, हेतु क ो नहीं जानता, हेत्वाभास को नहीं जानता, उदाहरण को नहीं जानता, उपनय और निगमन को नहीं जानता, छल, जाति, निग्रह स्थान को नहीं जानता, वह सत्यासत्य का निर्णय कैसे कर सकता है?

आर्यसमाज सोनीपत का उत्सव हो रहा था। निडर जी के ज्येष्ठ पुत्र मन्त्री थे। मञ्च पर मैं था और निडर जी भी थे। मुझे देखकर आपने मञ्च से यह घोषणा की-ब्रह्मचारी जी उपस्थित हैं। उत्सव भी चल रहा है। आयु विषय पर शास्त्रार्थ हो जाए तो अच्छा रहे। मैंने उसी समय उसको स्वीकार कर लिया, किन्तु आर्यसमाज के अधिकारियों ने शास्त्रार्थ का आयोजन नहीं किया। मैं अब भी निडर जी से अथवा और किसी भी अन्य विद्वान् से इस विषय पर वाद करने को उद्यत हँू। न्यायशास्त्र अनुमोदित प्रक्रिया के अनुसार शास्त्रार्थ हो। यदि न्यायशास्त्र के विरुद्ध कोई वाद करना चाहे तो सत्यासत्य का निर्णय नहीं हो सकता।

यदि निडर जी जब कभी इस विषय पर लेख लिखें, न्यायानुसार ही लिखें तो विद्वानों में मान्य हो, किन्तु उनके लेख में प्रत्यक्षागम विरुद्ध अनुमान होता है।

आयु के निश्चित न होने में अनेक प्रमाण हैं, उन सबको लिखने की, आवश्यकता नहीं है। उनमें से स्थालीपुलाक न्याय से कुछ प्रस्तुत किय जाते हैं-

१. त्र्यायुषं जमदग्रे: कश्यपस्य त्र्यायुषं यद्देवेषु त्र्यायुषं तन्नो अस्तु त्र्यायुषम् (यजु. ३५/१५)

भावार्थ-ये परमेश्वरेण व्यवस्थापितां धर्मानोल्लङ्घन्ते अन्यायेन परपदार्थान् न स्वीकुर्वन्ति ते अरोगा: सन्त: शतं वर्षाणि जीवितुं शक्रुवन्ति नेतरे ईश्वराज्ञा भङ्क्तार:। ये पूर्णेन ब्रह्मचर्येण विद्या अधीत्य धर्ममाचरन्ति तान् मृत्युर्मध्येनाऽप्रोतीति।

भाषार्थ-जो लोग परमेश्वर के नियम का कि धर्म का आचरण करना और अधर्म का आचरण छोडऩा चाहिए- उल्लङ्घन नहीं करते, अन्याय से दूसरों के पदार्थों को नहीं लेते, वे नीरोग हो कर सौ वर्ष तक जी सकते हैं, ईश्वराज्ञा विरोधी नहीं। पूर्ण ब्रह्मचर्य से विद्या पढ़ कर धर्म का आचरण करते हैं, उनको मृत्यु मध्य में प्राप्त नहीं होती।

२. ‘‘अग्र आयूंषि पवस आसुवोर्जमिषंचन:। आरे बाधस्वदुच्छुनाम्’’ (यजु. ३५/१५)

भावार्थ-ये मनुष्या: दुष्टाचरणदुष्टसङ्गौ विहाय परमेश्वराप्तयो: सेवां कुर्वन्ति ते धनधान्य युक्ता: सन्तो दीर्घायुषो भवन्ति।

भाषार्थ-जो मनुष्य दुष्टाचरण दुष्ट सङ्ग छोड़ परमेश्वर और आप्तों की सेवा करते हैं, वे धन-धान्य से युक्त हो दीर्घायु को प्राप्त करते हैं।

३. ‘‘परं मृत्यो अनुपरे कि पन्थां यस्ते अन्य इतरो देवयानात् चक्षुष्मते शृण्वते ते ब्रवीमि मा न: प्रजां रीरिषो मोत वीरान्’’ (यजु. २५/७)

भावार्थ-मनुष्यैर्यावज्जीवनं तावद्विद्वन्मार्गेण गत्वा परमायुर्लब्धव्यम् कदाचित् विना ब्रह्मचर्येण स्वयंवरं कृत्वा अल्पायुषी: प्रजा नोत्पादनीया।

भाषार्थ-मनुष्यों को चाहिए कि जीवनपर्यन्त विद्वानों के मार्ग से चलकर उत्तम अवस्था को प्राप्त हों और ब्रह्मचर्य पर्यन्त बिना स्वयंवर विवाह करके कभी न्यून अवस्था की प्रजा सन्तानों को न उत्पन्न करे।

४. ‘‘भद्रं कर्णेभि: शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्ष-भिर्यजत्रा: स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवां सस्तनुभिव्र्यशेमहि देवहितं यदायु:’’  -(यजु. २५/२१)

भावार्थ-यदि मनुष्या: विद्वत्सङ्गे विद्वांसो भूत्वा सत्यंशृणुयु: सत्यं पश्येयु: जगदीश्वरं स्तुयुस्तर्हि ते दीर्घायुष: भवेयु:।

भाषार्थ-जो मनुष्य विद्वानों के सङ्ग में विद्वान् होकर सत्य सुनें, सत्य देखें और जगदीश्वर की स्तुति करें तो वे बहुत अवस्थावाले हों।

५. ‘‘अतिमैथुनेन ये वीर्यक्षयं कुर्वन्ति तर्हि ते सरोगा: निर्बुद्धयो भूत्वा दीर्घायुष: कदापि न भवन्ति’’

अतिमैथुन करके जो वीर्य का नाश करते हैं, वे रोगयुक्त निर्बुद्धि हो दीर्घायुवाले कभी नहीं होते। (यजु. २५/२२ ऋ.द.भाष्य)

६. ‘‘यथा रशनया बद्धा प्राणिन: इतस्तत: पलायितुं न शक्नुवन्ति तथा युक्त्या धृतमायुरकाले न क्षीयते न पलायते।’’

जैसे डोर से बन्धे हुए प्राणी इधर-उधर भाग नहीं सकते, वैसे युक्ति से धारण की हुई आयु अकाल में नहीं जाती। (यजु. २२/२ ऋ. द. भाष्य)

७. मनुष्या: आलस्यं विहाय सर्वस्य द्रष्टारं न्यायाधीशं परमात्मानं कत्र्तुमर्हा तदाज्ञा च मत्वा शुभानि कर्माणि कुर्वन्तो अशुभानि त्यजन्तो ब्रह्मचर्येण विद्यासुशिक्षे प्राप्योपस्थेन्द्रयनिग्रहेण वीर्यमुन्नीयाल्पमृत्यं ध्रन्तु। युक्ताहारविहारेण शतवार्षिकमायु प्राप्नुवन्तु। यथा मनुष्या: सुकर्मसु चेष्टन्ते तथा तथा पापकर्मतो बुद्धिर्निवर्तते। विद्या आयु: सुशीलता च वर्धन्ते।

मनुष्य आलस्य को छोड़ कर सब देखनेहारे न्यायाधीश परमात्मा और करने योग्य उसकी आज्ञा को मानकर शुभ कर्मों को करते हुए और अशुभ कर्मों को छोड़ते हुए ब्रह्मचर्य के सेवन से विद्या और अच्छी शिक्षा को पाकर उपस्थेन्द्रिय के रोकने से पराक्रम को बढ़ाकर अल्पायु को हटावें। युक्ताहार विहार से सौ वर्ष क ी आयु को प्राप्त होवें। जैसे-जैसे मनुष्य सुकर्मों में चेष्टा करते हैं, वैसे-वैसे ही पापकर्म से बुद्धि की निवृत्ति होती, विद्या आयु और सुशीलता बढ़ती है। यजु. ४०/२

८. अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन:। चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम् ।। मनु. २/१२१।।

जो सदा नम्र, सुशील, विद्वान् और वृद्धों की सेवा करता है, उसके आयु, विद्या, कीर्ति और बल ये चार सदा बढ़ते हैं और जो ऐसा नहीं करते उनके आयु आदि नहीं बढ़ते।

९. दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दित:। दु:खभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च।। मनु.

जो दुष्टाचारी पुरुष होता है, वह सर्वत्र व्याधित अल्पायु होता है।

१०. आचाराल्लभते ह्यायु:।। मनु.

धर्माचरण ही से दीर्घायु प्राप्त होती है।

११. हितोपचारमूलं जीवितमतो विपर्ययो हि मृत्यु:। चरक, वि. १-४१।।

जीवन हितकारी चिकित्सा पर है। इसके विरुद्ध चिकित्सा ठीक न होने पर मृत्यु होती है।

१२. द्विविधा तु खलु भिषजो भवन्ति अग्रिवेश। प्राणानां हि एके अभिसरा: हन्तारो रोगाणाम्। रोगाणां हि एके अभिसरो हन्तार: प्राणानामिति ।। चरक।।

हे अग्निवेश, दो प्रकार के वैद्य होते हैं, एक तो प्राणों को प्राप्त कराने वाले और रोगों को मारने वाले और दूसरे वे जो रोगों के लाने वाले और प्राणों को नष्ट करने वाले।

१३. अनशनं आयुह्र्रासकराणाम्।। चरक।।

आयु के ह्रास करनेवाले अनेक कारणों में से अनशन-भोजन न करना सब से प्रबल कारण है।

१४. ब्रह्मचर्यमायुष्याणाम्।। चरक।।

आयु के बढ़ाने वाले अनेक साधनों में से ब्रह्मचर्य सर्वोकृष्ट साधन है।

१५. जिसमें उपकारी प्राणियों की हिंसा अर्थात् जैसे एक गाय के दूध, घी, बैल, गाय आदि उत्पन्न होने से एक पीढ़ी में ४७५६०० मनुष्यों को सुख पहुँचता है, वैसे पशुओं को न तो मारें न मरने दें।

इन स्पष्ट प्रमाणों के लिखने के पश्चात् इनकी व्याख्या की आवश्यता नहीं। निडर जी वा अन्य आयु को निश्चत मानने वाले इन प्रमाणों को छूना ही नहीं चाहते। अतिविस्तृत वैदिक साहित्य में इन प्रमाणों के विरुद्ध आयु को निश्चित मानने वाला एक भी प्रमाण नहीं। आयु को निश्चित माननेवाले इन प्रमाणों के विरुद्ध युक्ति का आश्रय लेते हैं।

आयु को निश्चित माननेवाले ‘‘सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगा:’’ (योग. २-१३) इस एक मात्र सूत्र को उपस्थित करते हैं, किन्तु आयु को निश्चित बतलाने वाला इसमें एक शब्द भी नहीं। आयु और आयु की इयत्ता दोनों भिन्न-भिन्न हैं। आयु से जीवनकाल मात्र अभिप्रेत होता है, इयत्ता नहीं। आयु शब्द का अर्थ इयत्तापरक मानना अप्रामाणिक है।

मनुष्य की आयु को पहले कोई भी निश्चित नहीं कर सकता-यह एक उदाहरण से स्पष्ट हो जायेगा। मिट्टी के एक घड़े को लीजिए। उसकी आयु कोई नहीं बतला सकता, न ही कोई जान सकता है कि कितने काल तक सुरक्षित रहेगा और कब टूट-फूट जायेगा? निश्चितवादी यह कहते हैं कि मिट्टी के घड़़े में और शरीर में समानता नहीं है, किन्तु सूक्ष्मता से देखें तो समानता दिखती है। (पूर्व पक्ष के अनुसार जैसे मनुष्य की आयु निश्चित होती है, वैसे घड़े की भी निश्चित ही है। उनके पक्ष में यह दृष्टान्त ही नहीं बनेगा।) वास्तव में शरीर में मिट्टी के घड़े में कोई अन्तर नहीं। यदि कुछ अन्तर है तो यही है कि जीव शरीर के भीतर रहकर शरीर का प्रयोग करता है। शरीर का एवं घड़े का प्रयोग चेतन ही करता है। पूर्व पक्षानुसार घड़ा और शरीर दोनों भाग साधन हैं, इसीलिए दृष्टान्त विषम नहीं है। शरीर की आयु क्षण-क्षण में परिवर्तित होती है। यदि संयम से नीरोग रहता है तो शरीर दीर्घकाल तक रहने योग्य बनता है। असंयम से रोगी बनता रहता है तो शरीर की शक्ति क्षीण होती है। शरीर में दीर्घकाल तक रहने का सामथ्र्य न्यून होता जाता है। इस रूप में आयु घटती है। पौष्टिक आहार से आयु बढ़ती है, नीरस आहार से आयु घटती है। राग, द्वेष, ईष्र्या, चिन्ता, भय, शोक आदि से आयु घटती है तो आनन्द, उत्साह, मैत्री, निश्चिन्तता, धैर्य आदि से आयु बढ़ती है। इसका अपलाप नहीं किया जा सकता। जीव कर्म करने में स्वतन्त्र होने से उसके कर्मानुसार क्षण-क्षण में उसकी आयु परिवर्तित होती रहती है। यह कहना अयुक्त है कि परमात्मा पहले ही निश्चित आयु देता है।

निडर जी ने लिखा है कि ‘‘महर्षि दयानन्द से भी अधिक कोई ब्रह्मचारी हुआ क्या? तो आदित्य ब्रह्मचर्य के अनुसार उनकी चार सौ वर्ष की आयु क्यों न हुई? वे उन्सठ वर्ष की आयु में ही क्यों चले गए।’’

इससे प्रतीत होता है कि निडर जी अपने पक्ष के व्यामोह के कारण से सत्यासत्य के जानने में असमर्थ हैं। क्या निडर जी यह सिद्ध कर सकते हैं कि महर्षि दयानन्द सरस्वती को ५९ वर्ष ही जीवित रहना था? उनके अनुसार स्वामी दयानन्द जी की आयु निश्चित करते समय विषदाता को भी निश्चित किया होगा और समय पर विष देने के लिए भेजा भी होगा। स्वामी श्रद्धानन्द जी की आयु निश्चित करते समय मुसलमान के हाथ से गोली खाकर मरना भी निश्चित किया होगा। पं. लेखराम जी की आयु निश्चित की होगी। हत्यारे को भी निश्चित किया होगा। परमात्मा ने भारतवालों के लिए यह लिखा होगा कि अंग्रेजों के द्वारा पद दलित होकर नाना दु:खों को भोगते रहेंगे।

निडर जी ने वेदों में विद्यमान प्रार्थनाओं को झूठा लिख दिया है। वास्तव में निडर जी का यह लेख साहसमात्र है। यदि ऐसे व्यक्ति वेद पर लेखनी उठावें तो वेद के साथ अनर्थ के अतिरिक्त कुछ नहीं होगा। क्या परमात्मा ने मनुष्यों के लिए जो आशीर्वाद दिया है, वा मनुष्यों को प्रार्थना का आदेश दिया है, यह सारा व्यर्थ है? निडर जी ने यह आक्षेप किया है कि ‘यदि ईश्वर किसी की प्रार्थना या अशीर्वाद को सुनने लगे तो ईश्वर का कोई भी न्याय या व्यवस्था नहीं चल सकती।’

इससे प्रतीत होता है कि प्रार्थना का अर्थ निडर जी ने समझा ही नहीं। परमात्मा ने प्रार्थना कराने का आदेश दिया है, असम्भव के लिए नहीं। असम्भव की प्रार्थना का उपदेश करना अल्पज्ञ का काम है, सर्वज्ञ का नहीं।

निडर जी ने आयु को अनिश्चित मानना मूर्खता का काम लिखा है। यदि निडर जी निष्पक्ष होकर विचार करें तो ज्ञात हो जायेगा कि उनकी मान्यता वेद-विरुद्ध, वैदिक-साहित्य के विरुद्ध है। आश्चर्य इस बात का है कि वे अपनी मान्यता को सत्य मानते हैं, वेदानुकूल मानते हैं, जबकि उनकी विचारने की शैली अदार्शनिक है। न्याय विरुद्ध है। परमात्मा उनको दार्शनिक प्रक्रिया से विचारने की शक्ति दे।

 

पर्यावरण की समस्या – उसका वैदिक समाधान: डॉ धर्मवीर

जब मनुष्य को जैसी आवश्यकता होती है, जैसी इच्छा करता है। यदि उसकी वह इच्छा पूरी हो जाती है तो सुख अनुभव करता है, इच्छा के पूरा होने में बाधाएँ आती हैं तो दु:ख अनुभव करता है, इसलिए आवश्यकता, इच्छा और समाधान के क्रम में सन्तुलन बना रहना चाहिए। सन्तुलन बनाये रखना प्राकृतिक नियम है। प्रकृति अपने स्वाभाविक क्रम में सन्तुलन की प्रक्रिया को निरन्तर जारी रखती है। वर्षा का जल भूमि पर गिरकर तथा अन्य तत्त्वों के साथ मिलकर अशुद्ध होता है। मनुष्यों, पशुओं, प्राणियों के द्वारा उपयोग में लिया जाकर उत्सर्जित पदार्थों के संयोग से मलिनता को प्राप्त होता है और बहकर नाली, नाले, नदी बनकर समुद्र में मिल जाता है या तालाबों में एकत्रित हो जाता है। प्रकृति इस अशुद्ध जल को वाष्पित करके पुन: शुद्ध कर देती है। मनुष्य शुद्ध तत्त्व जलवायु, पृथ्वी, अग्नि, आकाश के माध्यम से प्राप्त करता है, परिणामस्वरूप मनुष्यों से प्राप्त अशुद्धता को प्रकृति अपने नियम से शुद्ध कर देती है। इस प्रकार मनुष्य जो प्रकृति से प्राप्त करता है, वह उसका शुद्ध रूप होता है तथा जो प्रकृति को देता है, उसमें विकृति होती है। विकृति की मात्रा जब प्राकृतिक नियम से दूर होना कठिन हो, तब समस्या का जन्म होता है। प्रकृति में विषमता की मात्रा अधिक होने पर वर्षा का जल भी दूषित होने लगता है। इसी प्रकार वायु, भूमि और ध्वनि से प्रदूषण बढक़र प्रकृति के सन्तुलन को बिगाड़ देता है, परिणामस्वरूप मनुष्यों व अन्य प्राणियों के लिए प्रकृति से उन्हें आवश्यक तत्त्व प्राप्त नहीं हो पाते, इस अभाव की स्थिति को हम पर्यावरण प्रदूषण कहते हैं।

प्रश्न उठता है कि प्रकृति में असन्तुलन क्यों उत्पन्न हुआ? दो कारण हो सकते हैं- प्रथम प्रकृति की क्षमता का घट जाना, दूसरा मनुष्यों द्वारा प्रकृति की क्षमता से अधिक का उपयोग करना। इसमें प्रथम कारण सम्भव नहीं, क्योंकि प्रकृति अपनी पूर्ण क्षमता के साथ हमारे सामने हैं। प्राणियों द्वारा विशेषकर मनुष्यों द्वारा प्रयोग में लाये जाने पर प्राकृतिक तत्त्वों की न्यूनाधिकता हम अनुभव करते हैं, इसलिए प्रकृति से सामंजस्य बैठाने के लिए प्रकृति को कुछ नहीं करना, जो कुछ करना है मनुष्य को ही करना है। ऐसी स्थिति में प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने वालों की संख्या अधिक होगी तो आवश्यक तत्त्व अधिक मात्रा में अपेक्षित हैं। उन्हें कैसे पूरा किया जाए? उनकी पूर्ति के लिए एक तरीका तो यह है कि उपभोक्ताओं की संख्या कम की जाए। यह मानवीय पक्ष नहीं हो सकता है, फिर इसका निर्णय कौन करेगा कि इस संसार में जीवित रहने का अधिकार किसे है और किसे नहीं, तो प्रकृति के अनुसार योग्यतम की विजय का सिद्धान्त स्वीकार करने पर मनुष्य और पशु में कोई अन्तर नहीं रहेगा, इसलिए मनुष्यता का पक्ष है कि जो प्राप्त है, उसका सम्यक् विभाजन और प्रदूषण पर अंकुश। यही पर्यावरण की समस्या का सम्भव समाधान है।

पर्यावरण की समस्या पहले विचार में उत्पन्न होती है, पश्चात् व्यवहार में, इस कारण मनुष्य का प्रकृति से सम्बन्ध आदिकाल से चला आ रहा है और यथार्थ है, इस कारण अन्य बातों के विचार के साथ प्रकृति से उसके सम्बन्धों पर भी उसने विचार किया हो, यह स्वाभाविक है। जिस प्रकार आज की परिस्थितियों ने मनुष्य को सोचने के लिए बाध्य किया है, उसी प्रकार पहले भी कोई प्रसंग आया हो, जब मनुष्य को इस दिशा में सोचने की आवश्यकता अनुभव हुई हो। पुराना चिन्तन पुरातन साहित्य में सुलभ है। भारतीय साहित्य की विशाल सम्पदा आज भी हमें प्राप्त है। उस अनुभव से आज हम अपने ज्ञान को समृद्ध करते हैं। पर्यावरण के विषय में यत्र-तत्र विचार बिखरे मिलते हैं। उन विचारों को लेकर यदा-कदा समाचार पत्रों में लेख भी प्रकाशित होते हैं। इस प्रकार यदि इन विचारों को संग्रह कर व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया जा सके तो आज की इस ज्वलन्त समस्या के समाधान में निश्चित सहायता मिल सकती है।

भारतीय चिन्तक और पाश्चात्य चिन्तन परम्परा में मौलिक अन्तर है। पाश्चात्य चिन्तन पहले लाभ के अवसरों का पूर्ण दोहन करने में विश्वास करता है, फिर उत्पन्न समस्या के समाधान का उपाय खोजता है। जैसे लाभ प्राप्त करना ध्येय होने से कुछ लोग ही उससे सम्पन्न होंगे, परन्तु  उसके दुष्प्रभाव और हानियाँ अधिक होंगी और अधिक लोगों को प्रभावित करेंगी, उसका समाधान बड़े स्तर पर अधिक व्यय-साध्य होता है। इसके विपरीत प्राचीन भारतीय मनीषी आवश्यकता के लिए स्वीकार करने और समाज की आवश्यकता के लिए उत्पादन करने को महत्त्व देते थे, इससे विभाजन और वितरण विके्रन्द्रित होता है, अत: सभी लोग समस्या के समाधान में सहभागी हो सकते हैं। पर्यावरण की समस्या के समाधान में भी सबकी सहभागिता आवश्यक है। इस बात को पुष्ट और प्रमाणित कर समाज को उत्तरदायित्व से अवगत कराना इस कार्य का उद्देश्य है। पर्यावरण की समस्या से परिचित व्यक्ति अपने स्तर पर भी समाधान में योगदान कर सकता है। उसे अपने प्राचीन साहित्य के तथ्य, उसका ध्यान इस ओर आकर्षित करने और उद्देश्य की ओर प्रेषित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं, क्योंकि इस देश की जनता में प्राचीन मर्यादा की स्थापना करने वाले पुरुषों ने पाप-पुण्य, धर्माधर्म के नाम से समाज में जो प्रथाएँ प्रचलित की हैं, उनके मूल में इस प्रकार की समस्याओं का समाधान निहित है।

विष्णु धर्मसूत्र में लिखा है कि जो व्यक्ति इस जन्म में जितने वृक्ष लगाता है, वे उसे परलोक में सन्तान के रूप में मिलते हैं-

वृक्षा रोपयितुर्वृक्षा: परलोके पुत्रा: भवन्ति

वराह पुराण में लिखा है- वृक्ष लगाने वाला नरक में नहीं जाता-

अश्वत्थमेकं पियुमन्दमेकं

न्यग्रोधमेकं दश पुष्प जाती:।

द्वे द्वे तथा दाडिम मातुलुंगे

पंचाम्र रोपी नरकं न याति।।

वेदों में मांसाहार: गौरव आर्य

ved me mansahar

 

जी हाँ बिलकुल सही शीर्षक है मुसलमानों को अत्यंत लुभावना लगता होगा यह शीर्षक पढ़कर मुझे भी लगता है में जब भी ऐसे शीर्षक पढ़ता हूँ मुझे प्रसन्नता होती है और विश्वास बिना पढ़े पहले ही हो जाता है की अब मुझे मुसलमानों और वामियों की मुर्खता पढने को मिलेगी और यही होता है, चलिए आप भी पढ़िए और आनन्द उठाइये और सोशल मिडिया पर हर तरफ भेजिए जिससे इन मूर्खों का पर्दाफास हो सके

मांसाहार के समर्थक मुसलमान, वामपंथी और जिह्वा स्वाद के आगे बेबस हिन्दू सनातन धर्म पर मांस भक्षण का आरोप लगाते है और ऐसे ऐसे प्रमाण देते है जिनमें सच्चाई १% भी नहीं होती वेसे तो इन आरोपों में इनकी बुद्धि बिलकुल नहीं होती है क्यूंकि जो कौम भेड़चाल की आदि हो जो परजीवियों सा व्यवहार करें वह कौम दूसरों के लगाये आरोपों का ही उपयोग कर अपनी वाहवाही करवाने में लगी रहती है

 

ऐसे ही कुछ मूर्खों का पाला हमसे पड़ा जिनके आरोप पढ़कर हंसी आती है

चलिए आपको कुछ आरोप और उनके प्रति हमारे (पण्डित लेखराम वैदिक मिशन द्वारा) दिए जवाबों से आपको भी अवगत करवाते है

 

मुस्लिम:- जो लोग इस्लाम मे जानवरोँ की कुर्बानी की आलोचना करते हैं उन्हें अपने वेदों को भी पढ लेना चाहिए :-

वेदों मे मनुष्य बलि का जिक्र :-

देवा यदयज्ञ————पुरूषं पशुम।।
यजुर्वेद ( 31 / 15)
अर्थात : = देवताओं ने पुरूषमेध किया और पुरूष नामक पशु वध का किया ।

 

सनातनी:- पहले तो सच सच बताना ये अर्थ करने वाला गधा कौन था यदि भाष्य करना इतना सरल होता तो आज गल्ली गल्ली जेसे पंक्चर वाले बैठे है वेसे ही भाष्यकार बैठे होते

मुसलमानों की यही कमी है की इनका दिमाग घुटनों में होता है

देवा यद्यज्ञं आया तो मतलब देवताओं ने यज्ञ किया पुरुषं आया तो ! ओह हा पुरुषमेध यज्ञ किया, पशुम आया तो अच्छा पुरुष नाम का पशु था |

सच में तुम लोगों की मुर्खता का कोई सानी नहीं है

http://www.onlineved.com/yajur-ved/?language=2&adhyay=31&mantra=15

इस लिंक पर जाकर सही अर्थ पढो मूर्खों कही भी मनुष्य हत्या जैसी बात नहीं है

मुस्लिम:- कोई इस वेद भाष्य को गलत साबित करके दिखाए ।

सनातनी:- लो कर दिया गलत साबित जाओ कुछ नया लाओ मूर्खों

मुस्लिम:- हिंदू धर्म ग्रंथो मे एक भी धर्म ग्रंथ ऐसा नही है जहां जीव हत्या और कुर्बानी का जिक्र मौजूद ना हो पढो :-

वेद , महाभारत , मनुस्मृति, रामायण मे मांस भक्षण और जीव हत्या :-

1 जो मांस नहीं खाएगा वह 21 बार पशु योनी में पैदा होगा-मनुस्मृति (5/35)

सनातनी:- यह श्लोक प्रक्षिप्त है यानी बाद में मिलाया हुआ है मनु प्राणी मात्र की हत्या के विरोधी थे, यह मिलावट सनातन धर्म को और महाराज मनु के लिखे संविधान को समाप्त करने के उद्देश्य से किया गया वामपंथियों का काम है

 

मुस्लिम:- 2 यजुर्वेद (30/15) मे घोडे की बलि कुर्बानी की जाती थी ।

सनातनी:- पुरे मन्त्र में घोडा गधा नहीं दिखा
लगता है जाकिर नाइक के गुण आ गये है जिसे वेदों में हर जगह मोहम्मद दिखता है लिंक देखो पूरा भाष्य पदार्थ के अर्थ सहित

http://www.onlineved.com/yajur-ved/?language=2&adhyay=30&mantra=15

मुस्लिम:- रामायण मे राम और दशरथ द्वारा हिरण का शिकार और मांस भक्षण देखे 🙁 वाल्मिकी रामायण अयोध्या कांड (52/89) गीता प्रेस गोरखपुर प्रकाशन )

सनातनी:- अयोध्याकाण्ड में किसी हिरण को मारने और मांस भक्षण का प्रमाण नहीं

हाँ एक बार जंगली हाथी को मारने के प्रयास में गलती से बाण एक मनुष्य को अवश्य लगा जिसका राजा दशरथ को बहुत दुःख हुआ और उन्होंने उस कर्म को अपना पाप माना और उसी पाप के फलस्वरूप उन्होंने अपना देह त्याग दिया

वास्तव में मूर्खों का सानी कोई नहीं अरे मूर्खों प्रमाण तो सही दिया करो
यह अरण्यकाण्ड के सताईसवे सर्ग में आया हुआ है और इसमें कही मांस भक्षण जैसी बात ही नहीं है वह हिरण भी मारीच राक्षष था जिसने हिरण का रूप धारण कर रखा था जैसे आजकल बहरूपिये रूप धारण करते है वेसे ही

मुस्लिम:- 3 ऋषि वामदेव ने कुत्ते का मांस खाया (मनुस्मृति 10/106)

सनातनी:- यह श्लोक भी प्रक्षिप्त है

मुस्लिम:- ऋग्वेद मे (1/162/10)

सनातनी:- http://www.onlineved.com/rig-ved/?language=2&mandal=1&sukt=162&mantra=10

मुस्लिम:- ऋग्वेद (1/162 /11) मे घोडे की कुर्बानी का जिक्र है ।

सनातनी:- http://www.onlineved.com/rig-ved/?language=2&mandal=1&sukt=162&mantra=11

 

इन दोनों मन्त्रों में कही घोडा नहीं है समझ नहीं आता है ये औरत के मुह वाले घोड़े खच्चर (मेराज) का असर तो नहीं रह गया अभी तक दिमाग में

ये लो मुसलमानों तुम्हारे बेसर पैर के घटिया आरोपों का जवाब

अब जाओं और कुछ नया लाओं जो तुम्हारे जीव हत्यारे मत की इज्जत बचा सके

संध्या क्या ?,क्यों ?,कैसे ?

संध्या क्या ?,क्यों ?,कैसे ? डा. अशोक आर्य
आर्य समाज की स्थापना से बहुत पूर्व जब से यह जगत् रचा गया है , तब से ही इस जगत् में संध्या करने की परम्परा अनवरत रूप से चल रही है | बीच में एक युग एसा आया जब वेद धर्म से विमुख हो कर कार्यों का प्रचलन आरम्भ हुआ तो संध्या को भी लोग भुलाने लगे किन्तु स्वामी दयानंद सरस्वती जी का हम पर महान् उपकार है , जो हम पुन: वेद धर्म के अनुगामी बने तथा संध्या से न केवल परिचित ही हुए अपितु संध्या करने भी लगे |
संध्या क्या है ?
सृष्टि क्रम में एक निर्धारित समय पर परम पिता परमात्मा का चिंतन करना ही संध्या कहलाता है | इससे स्पष्ट है कि दिन के एक निर्धारित काल में जब हम अपने प्रभु को याद करते हैं , उसका गुणगान करते हैं , उसके समीप बैठ कर उसका कुछ स्मरण करते हैं , बस इस का नाम ही संध्या है |
संध्या कब करें ?
ऊपर बताया गया है कि एक निश्चित समय पर प्रभु स्मरण करना ही संध्या है | यह निश्चित समय कौन सा है ? यह निश्चित समय कालक्रम से सृष्टि बनाते समय ही प्रभु ने निश्चित कर दिया था | यह समय है संधि काल
| संधिकाल से अभिप्राय: है जिस समय दिन व रात का मिलन होता है तथा जिस समय रात और दिन का मिलन होता है , उस समय को संधि काल कहते
हैं | इस से स्पष्ट होता है कि प्रात: के समय जब आकाश मे हल्के हल्के तारे दिखाई दे रहे हों, सूर्य निकलने की तैयारी में हो , इस समय को हम प्रात:कालीन संध्या काल कहते हैं | प्रात:काल का यह समय संध्या का समय माना गया है | इस समय ही संध्या का करना उपयोगी है |
ठीक इस प्रकार ही सायं के समय जब दिन और रात्री का मिलन होने वाला होता है , सूर्य अस्ताचाल की और गमन कर रहा होता है किन्तु अभी तक आधा ही अस्त हुआ होता है | आकाश लालिमा से भर जाता है | इस समय को हम सायं कालीन संध्या समय के नाम से जानते हैं | सायं कालीन संध्या के लिए यह समय ही माना गया है | इस समय ही संध्या के आसन पर बैठ कर हमें संध्या करना चाहिए |
गायत्री जप ही संध्या
वास्तव में गायत्री जप का ही दूसरा नाम संध्या है किन्तु इस गायत्री जप के लिए भी कुछ विधियां बनाई गई है ,जिन्हें करने के पश्चात् ही गायत्री का यह जप आरम्भ किया जाता है | गायत्री जप के लिए भी कुछ लोग यह मानते हैं कि यह जप करते हुए कभी उठना , कभी बैठना तथा कभी एक पाँव पर खडा होना , इस प्रकार के आसन बदलते हुए गायत्री का जप करने को कहा गया है | हम यह सब ठीक नहीं मानते | हमारा मानना है कि गायत्री जप के लिए हम एक स्थिर आसन पर बैठ कर गायत्री मन्त्र का जाप करें | यह विधि ही ठीक है अन्य सब विधियां व्यवस्थित न हो कर ध्यान को भंग करने वाली ही हैं |
संध्या के प्रकार
कुछ लोग कहते हैं कि ब्राह्मण की संध्या भिन्न होती है जबकि ठाकुर लोग कुछ अलग प्रकार की संध्या करते है | इन लोगों ने ऋग्वेदियों की संध्या अलग बना ली है तो सामवेदियों की संध्या कुछ भिन्न ही बना ली है | यह सब विचारशून्य लोग ही कर सकते हैं | परमपिता परमात्मा सब के लिए एक ही उपदेश करता है , सब के लिए उसका आशीर्वाद भी एक ही प्रकार का है तो फिर संध्या अलग अलग कैसे हो सकती है ? अत: संध्या के सब मन्त्र सब समुदायों , सब वर्गों तथा सब जातियों के लिए एक ही हैं |
जाप के पूर्व शुद्धि
ऊपर बताया गया है कि गायत्री जाप का नाम ही संध्या है किन्तु इस जाप से पूर्व शुद्धि का भी विधान दिया गया है | प्रभु उपदेश करते हैं कि हे जीव ! यदि तू मुझे मिलने के लिए संध्या के आसन पर आ रहा है तो यह ध्यान रख कि तूं शुद्ध पवित्र हो कर इस आसन पर बैठ | इस शुद्धि के लिए शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धि, चित और अहंकार , यह छ: प्रकार की शुद्धि आवश्यक है | इस निमित आचमन से शरीर की शुद्धि , अंग स्पर्श से सब अंगों की शुद्धि, मार्जन से इन्द्रियों की शुद्धि, प्राणायाम से मन की शुद्धि, अघमर्षण से बुद्धि की शुद्धि ,मनसा परिक्रमा से चित की शुद्धि तथा उपस्थान से अहंकार की शुद्धि की जानी चाहिए |
शुद्धि कैसे ?
अब प्रश्न उठता है की यह शुद्धि कैसे की जावे ? इस के लिए बताया गया है कि हम प्रतिदिन दो काल स्नान करके अपने शरीर को शुद्ध करें | अपने अन्दर को शुद्ध करने के लिए राग, द्वेष, असत्य आदि दुरितों को त्याग दें | कुशा व हाथ से मार्जन करें | ओ३म् का उच्चारण करते हुए तीन बार लंबा श्वास लें तथा छोड़ें , यह प्राणायाम है | सब से अंत में गायत्री का गायन करते हुए शिखा को बांधें |

इस प्रकार यह पांच क्रियाएं करके मन व आत्मा को शांत स्थिति में लाया जावे | यह शांत स्थिति बनाने के पश्चात् संध्या के लिए छ: अनुष्ठान किया जावें ,जो इस प्रकार हैं :
संध्या के लिए छ: अनुष्ठान
१. शरीर को असत्य से दूर
शरीर को असत्य से दूर करने के लिए संध्या में बताये गए प्रथम मन्त्र ओ३म् शन्नो देवी रभिष्टये आपो भवन्तु पीतये शंयो राभिस्रवंतु न: का उच्चारण करने के पश्चात् तीन आचमन करें |
२. मार्जन पूर्वक इन्द्रियों की शुद्धि
ओ३म् वाक् वाक् ओ३म प्राण: प्राण: आदि मन्त्र से अंगों की शुद्धि करें | ओ३म भू: पुनातु शिरसि आदि मन्त्र से प्रभु के नामों का अर्थ करते हुए मार्जन पूर्वक इन्द्रियों की शुद्धि करें |
३. प्राणायाम से मन शांत
कम से कम तीन तथा अधिक से अधिक ग्यारह प्राणायाम कर अपने मन को शांत करें |
४. बुद्धि की शुद्धि तथा बोले मन्त्रों के अर्थ चिंतन
ओ३म् ऋतं च आदि इन तीन मन्त्रों से अपनी बुद्धि को समझाते हुए शुद्ध करें तथा पुन: शन्नो देवी मन्त्र को बोलते हुए अब तक जो मन्त्र हमने बोले हैं , उन सब के अर्थ को देखें तथा अर्थों पर चिंतन करें |
५. चित को सुव्यवस्थित करें
ओ३म् प्राची दिग अग्नि आदि इन छ: मन्त्रों का गायन करते हुए अपने चित को सुव्यवस्थित करें |
६. अहंकार तत्व
ओ३म् उद्वयं से ले कर ताच्च्क्शुर्देवहितं तक के मंत्रों का गायन करते हुए अहंकार तत्व से अपनी स्थिति का सम्पादन करें |
प्रधान जप
यह छ: अनुष्ठान करने के पश्चात् हम इस स्थिति में आ जाते हैं की अब हम प्रधान जप अर्थात गायत्री का जाप कर सकें | अत: अब हम गायत्री का जप करते हैं |
समर्पण
गायत्री का जप करते हुए हम स्वयं को उस पिता के पास पूरी तरह से समर्पित करने के लिए बोलते हैं , हे इश्वर दयानिधे भवत्क्रिप्यानेण जपोपास्नादि कर्मणा धर्मार्थ का मोक्षानाम सद्यसिद्धिर्भवेण | इस प्रकार हम समग्रतया उस प्रभु को समर्पित हो जाते हैं |
नमस्कार
अंत में हम उस परमात्मा को नमस्ते करते हुए अपने आज के कर्तव्य को पूर्ण करते हुए संध्या का यह अनुष्ठान पूर्ण करते हैं |
जाप की विधि
गायत्री का जाप एक आसन पर बैठ कर ऊँचे उच्चारण से किया जावे |
ध्यान के समय मौन जाप की प्रथा है किन्तु अकेले में जाप करते समय ऊँचे स्वर से किया जाता है | कुछ लोग मौन जाप का कहते है तो कुछ उच्च स्वर में जबकि कुछ का मानना है कि यह जाप इतनी मद्धम स्वर में किया जावे कि मुख से निकला शब्द केवल अपने कान तक ही जावे | इस सम्बन्ध में स्वामी जी ने संस्कार विधि में मौन जाप का विधान ही दिया है |
हम संध्या करते समय यह सब ध्यान में रखते हुए ऊपर बताये अनुसार ही संध्या करें तो उपयोगी होगा |
डा. अशोक आर्य

महर्षि दयानन्दकृत यजुर्वेद भाष्य में ईश्वर-स्वरूप :-डॉ. कृष्णपाल सिंह

इषे त्वोर्जे त्वा वायवस्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणऽआप्यायध्वमघ्न्याऽइन्द्राय भागं प्रजावतीरनमीवाऽअयक्ष्मा मा वस्तेन ईशत माघशंसो ध्रुवाऽअस्मिन् गोपतौस्यात वह्वीर्यजमानस्य पशून् पाहि।

-यजु. १। १

इस मन्त्र के प्रतिपाद्य विषय का निर्देश करते हुए महर्षि दयानन्द ने लिखा है कि ‘अथोत्तमकर्मसिद्धयर्थमीश्वरः प्रार्थनीय इत्युपदिश्यते’ अर्थात् उत्तम कर्म की सिद्धि के लिये ईश्वर की प्रार्थना अवश्य करनी चाहिये, इस बात का मन्त्र में उपदेश है। मन्त्र का ऋषि परमेष्ठी प्रजापति है और देवता सविता-ईश्वर है। वेद चार हैं जिनमें ऋग्वेद स्तुति प्रधान है जैसा कि ऋषियों ने कहा है कि ‘ऋग्भिःस्तुवन्ति’ अर्थात् ऋचाओें=ऋग्वेदीय मन्त्रों के साधर्म्य और वैधर्म्य के द्वारा उनकी स्तुति अर्थात् गुणानुवाद का यथार्थ कथन किया जाता है। आचार्य यास्क ने निरुक्त शास्त्र में लिखा है कि ‘यजुभिर्यजन्ति’अर्थात् यजु. मन्त्रों के द्वारा यज्ञ-कर्म का निरूपण किया गया है। यजुर्वेद में कर्म का प्राधान्य है अर्थात् क्रिया प्रधान है। यजुर्वेदीय मन्त्रों से कर्म-क्रिया का सम्पादन होता है।

अतएव क्रिया-कर्मप्रधान वेद के प्रथम मन्त्र में ही कहा गया है कि ‘प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे’ अर्थात् श्रेष्ठ कर्मों का सम्पादन करो। महर्षि याज्ञवल्क्य ने शतपथ में कहा है कि ‘यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म’ यज्ञ अर्थात् परोपकार करना ही श्रेष्ठ कर्म है। परोपकारार्थमिदं शरीरम्। इस वेद में विभिन्न स्थानों पर श्रेष्ठ कर्म करने का उपदेश है। जैसे यजुर्वेद के ४० वें अध्याय में कहा है कि ‘कुर्वन्नेवेहकर्माणिजिजीविषेच्छतं समाः’ अर्थात् इस संसार में मनुष्य जब तक जीवित रहे, तब तक शुभकर्म करते हुए जीने की इच्छा करे। क्योंकि यह शरीर भस्म होने वाला है। अपनी शक्ति (सामर्थ्य) का स्मरण कर, अपने कार्यों का स्मरण कर, ओ३म् पद वाच्य ब्रह्म-परमात्मा का स्मरण कर। इस प्रकार सम्पूर्ण यजुर्वेद अर्थात् आद्यन्तमध्य में भी श्रेष्ठ कर्म करने की प्रेरणा देता है। प्रकृत मन्त्र में परमात्मा ने आशीर्वाद रूप में कहा है कि श्रेष्ठ कर्म करते हुए इस जगत् में खूब उन्नति प्राप्त करो। ‘आप्यायध्वम् अघ्न्याः’ अर्थात् अहिंसित कर्म करते हुए समग्र ऐश्वर्य को प्राप्त करो। ‘यजमानस्य पशून्पाहि’ कहकर मन्त्र में यजमान के पशुओं की रक्षा करने का उपदेश यह कह रहा है कि वेद में सर्वथा हिंसा का निषेध है। मनुष्य की आजीविका के साधन भी अहिंसनीय होने की प्रेरणा है। इस लिये वेद में श्रेष्ठ कर्म करने की बात कही है और हिंसादि दुष्ट कर्म का निषेध जानना चाहिये।

परन्तु आज सम्पूर्ण संसार मांसाहार की ओर जा रहा है जो कि हिंसा का मार्ग है। वेद प्राणियों की हिंसा न करने की प्रेरणा दे रहा है। हे प्रभु! आप ही उन सब मनुष्यों के हृदय में परपीड़ा समझने का ज्ञान प्रदान कर, जिससे हिंसा कर्म संसार से समाप्त हो जाये। मन्त्र में सविता परमात्मा सकल जगत् अर्थात् दृश्यादृश्य, स्थूल-सूक्ष्म जगत् का उत्पादक, समग्र ऐश्वर्ययुक्त अपनी परमकृपा से सब प्राणियों को अन्न जलादि पदार्थों की प्राप्ति कराता है। वही सब जगत् की रक्षा करता है। उसकी रक्षा एवं कृपा के बिना किसी भी पदार्थ वा प्राणी का रक्षण कठिन है। वह सबको प्राणप्रिय है। उसकी प्राण-शक्ति के आधार पर समस्त प्राणी-जगत् तथा भौतिक जगत् के पदार्थ अपनी-अपनी सत्ता में स्थित दृष्टिगोचर हो रहे हैं। इसके अभाव में कोई वस्तु अपने स्वरूप में स्थित नहीं रह सकती। यह प्राण-शक्ति ओषधि-वनस्पतियों अन्यधात्वादि औषधियों में परिपूर्ण होने से आरोग्यवर्धक होकर प्राणियों के दुःख दूर कर उन्हें आनन्दित करती है। यह सब उस सविता परमात्मा की महती कृपा है।

महर्षि दयानन्दकृत मन्त्रार्थःहे मनुष्यो! यह (सविता) सब जगत् का उत्पादक, सकल ऐश्वर्य सम्पन्न जगदीश्वर (देवः) सब सुखों के दाता, सब विद्याओं का प्रकाशक भगवान् है (वायवस्थ) जो हमारे (वः) और तुम्हारे प्राण, अन्तःकरण और इन्द्रियाँ हैं एवं सब क्रियाओं की प्राप्ति के हेतु स्पर्शगुण वाले भौतिक प्राणादि हैं, उनको (श्रेष्ठतमाय) अत्यन्त श्रेष्ठ यज्ञ (कर्मणे) जो सबके उपकार के लिये कर्त्तव्य कर्म हैं, उससे (प्रार्पयतु) अच्छे प्रकार सयुक्त करें। हम लोग (इषे) अन्न, उत्तम इच्छा तथा विज्ञान की प्राप्ति के लिये सविता देवरूप (त्वा) तुझे विज्ञानरूप परमेश्वर को तथा (ऊर्जे) पराक्रम एवं उत्तम रस की प्राप्त्यर्थ (भागम्) सेवनीय धन और ज्ञान के पात्र (त्वा) अनन्त पराक्रम तथा आनन्द रस से भरपूर सदा आपकी शरण चाहते हैं। हे मनुष्यो! ऐसे होकर तुम (आप्यायध्वम्) उन्नति को प्राप्त करो और हम उन्नति प्राप्त कर रहे हैं। हे परमेश्वर! आप कृपा करके हमें   (इन्द्राय) परमेश्वर की प्राप्ति के लिये और (श्रेष्ठतमाय) अत्यन्त श्रेष्ठ यज्ञ (कर्मणे) कर्म करने के लिये इन (प्रगावतीः) बहुत प्रजावाली (अघ्न्याः) बढ़ने योग्य, अहिंसनीय, गौ, इन्द्रियाँ, पृथिवी आदि और जो पशु हैं, उनसे सदैव (प्रार्पयतु) संयुक्त कीजिये।

हे परमात्मन्! आपकी कृपा से हमारे मध्य में कोई (अघशंसः)पाप का प्रशंसक पापी और (स्तेनः) चोर (मा ईशत) कभी उत्पन्न न हो और आप इस (यजमानस्य) जीव के एवं परमेश्वर और सर्वोपकारक धर्म के उपासक विद्वान् के (पशून्) गौ, घोड़े, हाथी आदि लक्ष्मी वा प्रजा की (पाहि) सदा रक्षा कीजिये, क्योंकि (वः) उन गौओं और इन पशुओं को (अघशंस) पापी (स्तेनः) चोर (मा+ईशत) हनन करने में समर्थ न हो। जिससे (अस्मिन्) इस (गोपतौ) पृथिवी आदि की रक्षा के इच्छुक धार्मिक मनुष्य एवं गोस्वामी के पास (बह्वीः) बहुत सी गौवें (ध्रुवा) स्थिर सुखकारक (स्यात्) होवें।

मन्त्र का भावार्थ महर्षिकृतःमनुष्य सदा धर्मयुक्त पुरुषार्थ के आश्रय से, ऋग्वेद के अध्ययन से गुण और गुणी को जानकर सब पदार्थों के प्रयोग से पुरुषार्थ सिद्धि के लिये उत्तम क्रियाओं से संयुक्त रहें। जिससे ईश्वर की कृपा से सबके सुख और ऐश्वर्य की वृद्धि होवे, शुभ कर्मों से प्रजा की रक्षा और शिक्षा सदा करें। जिससे कोई रोगरूप विघ्न और चोर प्रबल न हो सके और प्रजा सब सुखों को प्राप्त होवे। जिसने यह विचित्र सृष्टि रची है, उस जगदीश्वर का आप सदैव धन्यवाद करें। ऐसा करने से आपकी दयालु ईश्वर कृपा करके सदा रक्षा करेगा।

ईश्वर स्वरूप दर्शनःइस मन्त्र में सविता=ईश्वर सम्पूर्ण जगत् का उत्पादक, सकल ऐश्वर्य सम्पन्न होने से सविता नाम से कहा गया है और सर्वसुख प्रदाता, सर्वदुःख विनाशक, सर्व विद्याओं का प्रकाशक होने से ‘देव’ कहा गया है।

परमेश्वर की प्रार्थना इस प्रकार करेंःमन्त्र में कहा गया है कि हे सविता देव! आप हमारे प्राण, अन्तःकरण और समग्र इन्द्रियों को सर्वोत्कृष्ट यज्ञ कर्म में लगाइये। हे जगदीश्वर! हमक लोग अन्न बल, पराक्रम, विज्ञानादि की प्राप्ति के लिये आपका ही आश्रय करते हैं, क्योंकि आप ही सब प्रकार के परम ऐश्वर्य के प्रदाता हैं। हे दयानिधे परमेश्वर! आपकी परम कृपा से हमारे गौ, हस्ति आदि पशु, इन्द्रिय तथा पृथिवीस्थ सभी पदार्थ अनमीवा अर्थात् रोग रहित होवें। आपकी महती कृपा से हमारे मध्य कोई भी चोर, पापी कभी उत्पन्न न हो। हे परमेश्वर! आप ईश्वरोपासक, धर्मात्मा, विद्वान्, परोपकारी के गौ आदि विभिन्न पशुओं लक्ष्मी तथा प्रजा की सदैव रक्षा कीजिये।

महर्षि द्वारा अन्यत्र की गई व्याख्याः ‘इषे त्वोर्जे’ इस मन्त्र को संस्कारविधि के ‘स्वस्तिवाचन’ में रखा गया है। ‘गोकरुणा निधि’ में इस मन्त्र की सम्पूर्ण व्याख्या न करके कुछ अंश की व्याख्या इस प्रकार है-यजुर्वेद के प्रथम मन्त्र में परमात्मा की आज्ञा है कि ‘अघ्न्या यजमानस्य पशून् पाहि’हे पुरुष! तू इन पशुओं को कभी मत मार और यजमान् अर्थात् सबके सुख देने वाले जनों के सम्बन्धी पशुओं की रक्षा कर, जिनसे तेरी भी पूरी रक्षा होवे और इसीलिये ब्रह्मा से लेके आज पर्यन्त आर्य लोग पशुओं की हिंसा में पाप और अधर्म समझते थे और अब भी समझते हैं। इनकी रक्षा में अन्न भी मंहगा नहीं होता, क्योंकि दूध आदि केअधिक होने से दरिद्रों को भी खान-पान में मिलने पर न्यून ही अन्न खाया जाता है और अन्न के कम खाने से मल भी कम होता है, मल के न्यून होने से दुर्गन्ध भी न्यून होता है, दुर्गन्ध के स्वल्प होने से वायु और वृष्टि-जल की शुद्धि भी विशेष होती है। उससे रोगों की न्यूनता होने से सबको सुख बढ़ता है। इससे यह ठीक है कि गो आदि पशुओं के नाश होने से राजा और प्रजा का नाश हो जाता है, क्योंकि जब पशु न्यून होते हैं, तब दूध आदि पदार्थ और खेती आदि कार्यों की भी कटौती होती है।

कतिपय विशिष्ट पद और उनका अर्थः-

(१) इषेः- यह मन्त्र का प्रथम ही पद है। आचार्य यास्क ने निघण्टु (२/७) में ‘इषम्’ पद को अन्न नामों में पढ़ा है। ‘इषति’ पद निघण्टु २/१४ में गत्यर्थक धातुओं में पढ़ा है और इस धातु से क्विप् सर्वापहारी प्रत्यय करने से ‘इष्’ शब्द बनता है। इस पद का अर्थ महर्षि ने ‘अन्नविज्ञानयोः प्राप्तये’अर्थात् अन्न विशान की प्राप्ति के लिये, यह किया है।

(२) ऊर्जेः- महर्षि याज्ञवल्क्य ने शतपथ ब्राह्मण ५/१/२/८ में ऊर्ग्रस वचन से ‘ऊर्क’ का अर्थ ‘रस’ किया गया है। इसलिये महर्षि दयानन्द ने ‘ऊर्जो’ का अर्थ ‘पराक्रमोत्तमरसलाभाय’अर्थात् पराक्रम एवं उत्तम रस की प्राप्ति के लिये, यहकिया है।

(३) देवः- आचार्य यास्क ने निरुक्त ७/१५ में देव शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा है कि ‘देवो दानाद्वा दीपनाद्वा द्योतनाद्वा द्युस्थानो भवतीति वा’इसकी व्याख्या महर्षि ने ऋ. भा. भूमिका के वेद-विषय विचार प्रकरण में की है। दान देने से देव नाम पड़ता है और दान कहते हैं ‘किसी वस्तु के विषय में अपने स्वामित्व को छोड़ते हुए दूसरे के स्वामित्व को उत्पन्न करना।’ दीपन कहते हैं प्रकाश करने को। द्योतन कहते हैं सत्योपदेश को। इनमें से दान का दाता मुख्य ईश्वर ही है कि जिसने जगत् को सब पदार्थ दे रखे हैं। तथा विद्वान् मनुष्य भी विद्यादि पदार्थों को देने वाले होने से देव कहाते हैं। दीपन अर्थात् सब मूर्तिमान् द्रव्यों का प्रकाश करने से सूर्यादि लोकों का नाम भी देव है। द्योतन-माता, पिता, आचार्य और अतिथि भी पालन विद्या और सत्योपदेशादि के करने से देव कहाते हैं, वैसे ही सूर्यादि लोकों का भी जो प्रकाश करने वाला है, वह ईश्वर सब मनुष्यों को उपासना करने योग्य इष्टदेव है, अन्य कोई नहीं। इसमें कठोपनिषद् का भी प्रमाण है कि सूर्य, चन्द्रमा, तारे, विद्युत (बिजली) और अग्नि ये सब परमेश्वर में प्रकाश नहीं कर सकते, किन्तु इन सबका प्रकाश करने वाला वही है, क्योंकि परमेश्वर के प्रकाश से ही सूर्यादि सब जगत् प्रकाशित हो रहा है। इसमें यह जानना चाहिये कि इईश्वर से भिन्न कोई पदार्थ स्वतन्त्र प्रकाश करने वाला नहीं है, इससे एक परमेश्वर ही मुख्य देव हैं।

इसी प्रकार महर्षि ने सत्यार्थ प्रकाश प्रथम समुल्लास में देव शब्द के विषय में लिखा है कि ‘दिवु क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युति-स्तुति-मोद-मद-स्वप्न-कान्ति-गतिषु’ इस धातु से देव शब्द सिद्ध होता है। क्रीडा जो शुद्ध, जगत् को क्रीडा कराने विजिगीषा= धार्मिकों को जिताने की इच्छायुक्त, व्यवहार=सब चेष्टा के साधनोपसाधनों का दाता, द्युति=स्वयं प्रकाश स्वरूप, सबका प्रकाशक, स्तुति=प्रशंसा के योग्य, मोद=आप आनन्दस्वरूप और दूसरों को आनन्द देने हारा, मद-मदोन्मत्तो का ताड़ने हारा, कान्ति=कामना के योग्य और गति=ज्ञानस्वरूप है, इसलिये उस परमेश्वर का नाम ‘देव’ है।

अथवा ‘यो दीव्यति क्रीडति स देवः’ जो अपने स्वरूप में आनन्द से आप ही क्रीडा करे अथवा किसी के सहाय के बिना क्रीडावत् सहज स्वभाव से सब जगत् को बनाता वा सब क्रीडाओं का आधार है, ‘यो विजिगीषते स देवः’ जो सबका जीतने हारा स्वयं अजेय अर्थात् जिसको कोई भी न जीत सके, ‘यो व्यवहारयति स देवः’ जो न्याय और अन्यायरूप व्यवहारों का जनाने हारा और उपदेष्टा, ‘यश्चराचरं जगत् द्योतयति स देवः’ जो सबका प्रकाशक, ‘यःस्तूयते स देवः’ जो सब मनुष्यों की प्रशंसा के योग्य और निन्दा के योग्य आनन्द कराता, जिसको दुःख का लेश भी न हो, ‘यो मोद्यति स देवः’ जो सदा हर्षित, शोकरहित और दूसरों को हर्षित करने और दुःखों से पृथक् रखने वाला, ‘यः स्वापयति स देवः’ जो प्रलय के समय अव्यक्त में सब जीवों को सुलाता, ‘यः कामयते काम्यते वा स देवः’। जिसके सब सत्यकाम और जिसकी प्राप्ति की कामना सब शिष्ट करते हैं, तथा ‘यो गच्छति गम्यते वा स देवः’ जो सबमें व्याप्त और जानने के योग्य है, इससे उस परमेश्वर का नाम देव है। जैसा कि अथर्ववेद १०/८/३२ में कहा गया है कि ‘देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति’ अर्थात् देव= परमेश्वर का काव्य देखो, न मरता है न जीर्ण होता है। इसी प्रकार श्वेताश्वतरोपनिषद् (६/११) में कहा गया है कि ‘एको देवः सर्वभूतेषुगूढ़ सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा’अर्थात् देव=परमात्मा (ईश्वर) एक है, सब पदार्र्थों में गुप्त रूप से विद्यमान् है, वह सर्वव्यापक और सब भूतों का अन्तरात्मा है।

अघ्न्याः आचार्य यास्क ने ‘अघ्न्या’ शब्द को निघण्टु २/११ में ‘गो’ नामों में पढ़ा है, इसलिये महर्षि ने इसका अर्थ ‘वर्धयितुमर्हा हन्तुमनर्हा गाव इन्द्रियाणि पृथिव्यादयः पशवश्च’अर्थात् बढ़ाने योग्य, अहिंसनीय गौ, इन्द्रियाँ, पृथिवी आदि और जो पशु हैं।

पशून्ः महर्षि याज्ञवल्क्य ने शतपथ ब्राह्मण १/६/३/३६ में पशु का अर्थ ‘श्रीर्हि पशः’ कहकर, पशु का अर्थ ‘श्री’ कहा है। तथा शतपथ १/४/६/१७ के अनुसार पशु का अर्थ प्रजा किया है। इन अर्थों के परिप्रेक्ष्य में महर्षि ने ‘पशून्’ पद का अर्थ ‘गौ, घोड़े, हाथी आदि लक्ष्मी वा प्रजा की सदा रक्षा कीजिये, यह किया है।

योगेश्वर कृष्ण: -डॉ. आर.के.चौहान

योगेश्वर श्रीकृष्ण सा चरित्र मानव इतिहास में ढूँढ पाना असम्भव है। शास्त्र और शस्त्र अर्थात् ज्ञान और कर्म की क्षमताओं का अद्भुत समन्वय और वह भी न्याय एवं धर्म-आधारित साम्राज्य स्थापनार्थ महाभारत के अतिरिक्त अन्यत्र दृष्टिगोचर नहीं होता। महर्षि व्यास सारे महाभारत में एक मात्र श्री कृष्ण को ही ऐसे व्यक्ति के रूप में चित्रित करते हैं-जो न कभी टूटता है, न झुकता है। श्री कृष्ण न पछताते हैं, न रोते हैं और न कभी जय-पराजय की चिन्ता करते हैं, परन्तु उन्हें अपने पुरुषार्थ, कर्त्तव्य और नीतिमत्ता में इतना अधिक विश्वास है कि वे अर्जुन को गीता में यहाँ तक आश्वासन देते हैं कि मेरी योजना में और विश्वरूप की व्यापकता में भीष्म, द्रोण, दुर्योधन, कर्ण और दुःशासन आदि सब पहले से ही मरे पड़े हैं, तुझे केवल निमित्त मात्र बनना है।……युद्धिष्ठिर से लेकर धृतराष्ट्र और भीष्मपितामह तक सभी लोग टूटते हैं, परन्तु कृष्ण कभी नहीं टूटते। वे अनासक्त भाव से घटनाओं का संचालन करते हैं। पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए मनुष्य में जिस नरत्व की आवश्यकता है, वह श्री कृष्ण में साक्षात् अवतरित हुआ है, इसीलिए वे नरोत्तम, पुरुषोत्तम और नर से नारायण बनने की क्षमता रखते हैं।

यही कारण है कि बंगला लेखक बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने ‘कृष्ण-चरित्र’ में लिखा कि-‘कृष्ण सर्वगुण सम्पन्न हैं। इनकी सब वृत्तियों का सर्वांगसुन्दर विकास हुआ है। ये सिंहासनासीन होकर भी उदासीन हैं, धनुर्धारी होकर भी धर्मवेता हैं, राजा होकर भी पण्डित हैं, शक्तिमान् होकर भी प्रेममय हैं। यह वही आदर्श है जिससे युद्धिष्ठिर ने धर्म सीखा और अर्जुन जिसका शिष्य हुआ। जिसके चरित्र के समान महामहिमामण्डित चरित्र मनुष्य भाषा में कभी वर्णित नहीं हुआ।’ उधर यशस्वी वक्ता, लेखक एवं पत्रकार क्षितीश वेदालंकार के अनुसार-‘श्री कृष्ण के समान प्रगल्भ, बुद्धिशाली, कर्त्तव्यवान्, प्रज्ञावान्, व्यवहारकुशल, ज्ञानी एवं पराक्रमी पुरुष आज तक संसार में नहीं हुआ। यह कथन अतिशयोक्ति नहीं माना जाना चाहिए। वे ध्येयवादी के साथ व्यवहारवादी भी थे और इन दोनों की सीमाओं के निपुण ज्ञाता थे। सत्यनिष्ठ के समान ही वे कुशल राजनीतिज्ञ अर्थात् राजधर्म के उपदेशक थे। वे गृहस्थ जीवन के प्रेमी होने के साथ-साथ अत्यन्त संयमी और योगविद्या पारंगत योगेश्वर भी थे।…….श्री कृष्ण भारत की संस्कृति और राष्ट्रधर्म के मूर्तिमान् प्रतीक हैं। जिस राष्ट्रधर्म की ओर हम संकेत करना चाहते हैं, उसका मूल-आधार महाभारत और उसके द्वारा प्रतिपादित श्री कृष्ण का चरित्र ही है।’ युग-प्रवर्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में लिखा-‘देखो! श्री कृष्ण का इतिहास महाभारत में अत्युत्तम है। उनका गुण, कर्म, स्वभाव और चरित्र आप्तपुरुषों के सदृश है। जिसमें कोई अधर्म का आचरण भी कृष्ण जी ने जन्म से मरणपर्यन्त बुरा काम कभी किया हो, ऐसा नहीं लिखा।’ महर्षि व्यास ने उन्हें धर्म का पर्याय बताया-‘यतो कृष्णस्ततो धर्मः यतो धर्मस्ततो जयः।’

उक्त उद्धरणों में वर्णित श्री कृष्ण के चरित्र की सम्पुष्टि महारभारत एवं समकालीन ग्रन्थों से होती है, जिसका संक्षिप्त परिचय यहाँ प्रस्तुत करना उपयुक्त होगा। मथुरा के निरंकुश राजा मामा कंस की जेल में कै द माता-पिता देवकी एवं वसुदेव का पुत्र कृष्ण यमुनापार गोकुल में यशोदा मय्या और नन्दबाबा की वात्सल्यमयी गोद में खेला और पला। भाई बलराम और गोकुल गोपाल-मण्डल के स्नेह और दुलार से मेधावी होनहार बालक कृष्ण को सब का प्यारा बना दिया। मक्खन, दूध, घी सम्पन्न गोपालक यदुवंशी समाज का मल्लयुद्ध एवं शस्त्र प्रेमी होना स्वाभाविक था। किशोर बलराम और कृष्ण युवा होने तक इन कलाओं में न केवल पारंगत हो गए वरन् उनके सतत् प्रयास से गोवंश सम्वर्धन पारस्परिक सौहार्द और समृद्धि का आधार बन गया। युवा पीढ़ी बल, शौर्य एवं पुरुषार्थ पाकर सुख-समृद्धि की राह पर अग्रसर हुई। प्रचलित गुरुकुल परम्परा के अन्तर्गत विद्याध्ययन ने कृष्ण में सौम्य, तार्किक एवं विचारशील व्यक्तित्व का विकास कर दिया।

शिक्षा समाप्ति पर युद्धकुशल यादव समाज की आपसी कलह और मगधराज जरासन्ध के संरक्षण में मथुरा में कंस की निरंकुशता की बात समझ में आई। अपनी व्यवहार-कुशलता और नीतिमत्ता से प्रथम यादव कुल का वैमनस्य मिटाया, पश्चात् भाई बलराम एवं युवा मित्र-मण्डल की सहायता से आतताई कंस का वध कर नाना उग्रसेन को मथुरा के सिंहासन पद पर आसीन किया। कंस के मरने पर अपनी दो बेटियों के विधवा हो जाने से नाराज जरासन्ध ने बार-बार आक्रमण करके यादवों के नाक में दम कर दिया। जरासन्ध की विशाल सेना का सामना करने में अक्षम यादव कुल की राजधानी मथुरा से स्थानान्तरित कर द्वारका के सुरक्षित स्थान पर स्थापित की।

अपनी फूफी कुन्ती के वीर पुत्रों पांडवों के वनवास समाप्ति पर मिले खाडंव वन को साफ करवा कर इन्द्रप्रस्थ जैसे सुनियोजित, अत्याधुनिक और सुन्दर नगर का निर्माण कराया और युद्धिष्ठिर को सिंहासनासीन किया। नीति-निपुण कृष्ण ने भारत के बड़े भाग पर राज कर रहे विशाल सेनाऔर धन-बल सम्पन्न मगधराज जरासन्ध को अर्जुन और भीम के साथ गुप्तवेश में मगध पहुँचकर द्वंद्व-युद्ध के लिए राजी किया। भीम ने जरासंध को उसके मर्म के भेद का लाभ उठाकर मार गिराया और असम्भव को सम्भव कर दिखाया। मगधराज का भार जरासन्ध के बेटे को सौंपकर उससे मित्रता सन्धि की और जरासन्ध द्वारा कै द ८६ राजाओं को मुक्त करके उनसे मित्रता सम्बन्ध बनाए।

प्रबन्ध कला में निपुण एवं दूरदर्शी श्रीकृष्ण से सलाह कर युद्धिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ रचा। लक्ष्य था प्रभावक्षेत्र बढ़ाकर सुशासन अर्थात् न्याय एवं धर्म आधारित सर्वजन प्रिय पांडवराज भारत-भू पर स्थापित करना। अर्जुन और भीम जैसे महाबली योद्धाओं के पौरुष तथा अपनी अद्भुत नीति कुशलता से भारत के अनेक राज्यों से मैत्री सन्धियाँ की तथा इन्द्रप्रस्थ साम्राज्य का प्रभावक्षेत्र एवं वर्चस्व बढ़ाया। राजसूय यज्ञ में प्रचलित अर्घ्यपरम्परा के अनुसार सभा में उपस्थित सर्वाधिक वयोवृद्ध, ज्ञानवृद्ध तथा अनुभववृद्ध भीष्म पितामह ने अर्घ्य लेने का अधिकारी श्रीकृष्ण को उद्घोषित किया और कहा-‘हम कृष्ण के शौर्य पर मुग्ध हैं। ब्राह्मणों में ज्ञान की पूजा होती है, क्षत्रियों में वीरता की, वैश्यों में धन की और शूद्रों में आयु की। यहाँ मैं किसी राजा को नहीं देखता, जिसे कृष्ण ने अपने अतुल तेज से न जीता हो। वेद-वेदांग का ज्ञान और बल पृथ्वी के तल पर इनके समान किसी और में नहीं। इनका दान, इनका कौशल, इनकी शिक्षा और ज्ञान, इनकी शक्ति, इनकी शालीनता, इनकी नम्रता, धैर्य और सन्तोष अतुलनीय हैं। ये ऋत्विज हैं, गुरु हैं, स्नातक हैं और लोकप्रिय राजा हैं। ये सब गुण एक पुरुष में मानो मूर्त्त हो गए हैं। इसलिए इन्हें ही अर्घ्य दिया गया है।’ यह सुनकर चेदीराज शिशुपाल जो रुक्मणी के कृष्ण से विवाह को लेकर दुःखी था क्रोध में आग-बबूला हो गया और भीष्म सहित कृष्ण को बहुत कुछ भला-बुरा कह गया। संयत श्री कृष्ण ने सब कुछ सुना और सह गए। युद्धिष्ठिर ने शिशुपाल को शान्त करने का भरसक प्रयास किया, किन्तु वह न माना और श्री कृष्ण को सम्बोधित कर बोला-तू राजा नहीं दास है, वीर नहीं कायर है। दम है तो हमसे युद्ध कर। अन्ततः श्री कृष्ण ने उसकी चुनौती को स्वीकार करते हुए अपने सुदर्शन चक्र के एक ही वार से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।

यज्ञ सम्पन्न हुआ। सब लोग अपने-अपने घरों को लौट गए, किन्तु इस घटना का विपरीत प्रभाव अनेक राजाओं के हृदय पर पड़ा। दुर्योधन तो पांडवों से पहले ही ईर्ष्या करता था। हाथ लगी अनुकूल परिस्थिति का लाभ उठाने से भला कैसे चूकता? दुर्योधन ने जुआ खेलने में माहिर, शातिर दिमाग अपने मामा गांधारनरेश शकुनी के साथ मिलकर हस्तिनापुर में द्यूतक्रीड़ा कार्यक्रम आयोजित करके इसमें युद्धिष्ठिर को फँसा लिया। युधिष्ठिर न केवल राज-पाठ बल्कि अपने भाइयों समेत खुद को ही नहीं और द्रोपदी को भी जूए में हार गया। द्रोपदी का भरी सभा में अपमान किया गया, जिसकी भर्त्सना महात्मा विदुर और श्री कृष्ण के अतिरक्ति कोई अन्य करने का साहस न कर पाया। करते भी कैसे? ‘राजा परं दैवतम्’के सिद्धान्त से जो बन्धे थे। उस काल की सर्वोच्च स्थान प्राप्त इस परम्परा का दुरुपयोग होते देख श्री कृष्ण सदृश आप्तपुरुष ने जनहित में उसे तोड़ने में जरा भी संकोच नहीं किया।

पांडवों को बारह वर्ष वनवास एवं एक वर्ष का अज्ञातवास भोगना पड़ा, जिसकी समाप्ति पर पांडवों को उनका राज्य दिलाने के लिए सन्धि प्रस्ताव लेकर श्री कृष्ण हस्तिनापुर आए। प्रथम आदरपूर्वक धृतराष्ट्र, भीष्म, द्रोणादि बड़ों से और फिर गांधारी से मिले। वनवास की शर्त पूरी होने पर पांडवों को उनका राज्य लौटाने के लिए दुर्योधन को समझाने को कहा। युद्ध में उसके अपने ही कुल का नाश होने की बात कही। सबने दुर्योधन को समझाया, किन्तु हठी दुर्योधन ने किसी की एक न सुनी। तब श्री कृष्ण सन्धि-प्रस्ताव प्रस्तुत करने के लिए राज्यसभा में उपस्थित हुए। अपने ही भाईयों के लिए उनकी न्यायसंगत बात मानकर दुर्योधन को महायुद्ध टालने की बात कही। उन्होंने कहा-युद्ध होने की स्थिति में न केवल अनगिनत योद्धा युद्ध की अग्नि में भस्म हो जाएँगे, बल्कि असंख्य परिवार भी बरबाद हो जाएँगें। अतः समझदारी से काम लेकर इस महाविनाश की विभीषिका से सबको बचाया जा सकता है, परन्तु दुर्योधन था कि टस से मस न हुआ। तब श्री कृष्ण ने महाबली पांड़वों के हाथों मरने के लिए तैयार रहने की चेतावनी दे डाली। परिणाम सम्भावित ही रहा। धार्मिक, सिद्धान्तवादी एवं सत्यनिष्ठ बड़ों के मन में दुर्योधन के हठ पर ग्लानिपूर्ण उपेक्षाभाव उपजा, तो जन-साधारण के मन में कुलद्रोही तथा अन्यायी दुर्योधन के प्रति रोषपूर्ण जनसंहार का भय। युद्ध में महाकाल बन जाने वाले अर्जुन और भीम के विचार ने कौरव दल के शीर्ष योद्धाओं का भी आत्मविश्वास हिला दिया।अतः समय, स्थान एवं परिस्थितियों को अपनी समझ और नीतिकौशल से सत्यपक्ष के अनुकूलकर लेने की कला में दक्ष श्रीकृष्ण जहाँ सन्धि करवाने के प्रयास की औपचारिकता से निवृत्त हुए, वहाँ सन्धिवार्ता की असफलता का ठीकरा अनैतिक, अन्यायी, कुलघाती एवं जनसंहारक दुर्योधन के सिर पर फोड़ने में भी सफल रहे। सबकी जुबान पर दुर्योधन की हठधर्मिता और पाँडवों के प्रति सहानुभूति की चर्चा थी तथा मन में सम्भावित भयंकर महायुद्ध की विभीषिका का डर। ऐसे में यदि कोई तनाव-मुक्त एवं स्थिर था तो स्थितप्रज्ञ योगेश्वर कृष्ण।

युद्ध घोषित हो जाने पर स्वयं को महारथी अर्जुन के रथ का सारथी बनाकर दुर्योधन की ओर से लड़ने वाली यादव सेना पर हथियार न उठाने की स्थिति उत्पन्न कर दी। भाई बलराम को युद्ध से विमुख करके तीर्थयात्रा पर चले जाने को प्रेरित किया। इस प्रकार महाभारत युद्ध में पांडव-पक्ष का संरक्षक होकर नीति, धर्म, शास्त्र एवं शस्त्रों के समन्वय का ऐसा अभेद्य चक्रव्यूह रचा कि विरोधी दल के संख्या में कहीं अधिक सैन्यबल और एक से एक शक्तिशाली योद्धाओं के होते हुए भी पांडव दल को मुकाबले की टक्कर का बनाकर खड़ा कर दिया।

जिसका कुशल सारथी श्री कृष्ण परिस्थितियों को सम्भालकर यहाँ तक लाया था, मोहग्रस्त हो वह धनुर्धारी अर्जुन युद्धभूमि में कर्त्तव्यविमुख होकर वैराग्यपूर्ण ज्ञान की बातें करने लगा। अतः अचानक एक नई और विकट स्थिति सामने आ खड़ी हुई। पर भला माधव ने कठिनाइयों से कब मुँह मोड़ा। अपनों को मारने के पाप के भय से थरथराते अर्जुन को पूछा-इन अजर-अमर आत्माओं को मार सकते हो क्या? नहीं, तुम्हारा गांडीव मात्र नश्वर शरीरों का विच्छेद कर सकता है, अमर आत्माओं का नहीं, परन्तु समस्या का यह दार्शनिक समाधान अर्जुन के मन को विषाद से न निकाल पाया। तब युद्ध में क्षत्रिय का धर्म आतताई, अधर्मी शत्रु का विनाश करके विजय पाकर अधर्म, असत्य एवं अन्याय का प्रतिकार करना बताकर पार्थ के पौरुष को जगाया। इस व्यावहारिक एवं कर्म-प्रधान समाधान ने हतोत्साहित अर्जुन के रक्त में जोश का भरपूर संचार किया, किन्तु श्री कृष्ण ने देखा कि उसके मुख पर शंका की कुछ रेखाएँ अभी भी शेष थीं। अन्ततः मानव मनोविज्ञान के मर्मज्ञ योगेश्वर कृष्ण ने अर्जुन के चित्तपटल पर जगत् का समष्टीरूप चित्रित करके कालप्रवाह से हो रही घटनाओं की अवश्यमभावीयता में भागीदार बनकर निमित्त बनने का विकल्प प्रस्तुत करते हुए कहा कि युद्धभूमि में लड़ते हुए मर जाने पर स्वर्गसुख पाओगे और जीतने पर हस्तिनापुर का राज्य। जादू का सा असर हुआ। अर्जुन ने झट-से अपना गांडीव सम्भाल लिया और युद्ध करने को तत्पर हो गया। यह चमत्कार ज्ञान, कर्म, दर्शन, मनोविज्ञान आदि विद्याओं में पारंगत केवल योगीराज श्रीकृष्ण ही कर सकते थे। अतः उक्त परिस्थितियों के आलोक में गीता में उन्होंने योग को नया अर्थ प्रदान किया यह कहते हुए-‘योगः कर्मसु कौशलम्’

उनका वेदोपनिषत् शास्त्र आधारित ज्ञान, मानव मनोविज्ञान आधारित वक्तृत्व, अमर गीता सन्देशरूप में प्रदीप्त हुआ, जो मनुष्य मात्र के लिए कालजयी मार्ग-दर्शक हो गया। महाभारत जैसे महाविनाशकारी युद्ध में उपजी विकट परिस्थितियों का न्यायसंगत, धर्मानुसार तथा यथायोग्य व्यवहार-पूर्वक समाधान किया। अन्ततः परिणाम, धर्म, न्याय और सत्य के पक्ष में रहा। अन्याय, अधर्म एवं प्रचलित रूढ़ि आधारित प्रजाविरोधी साम्राज्य समाप्त करके न्याय, धर्म और जनहितैषी साम्राज्य की समस्त भारत-भू पर स्थापना की। लाला लाजपत राय ने अपनी पुस्तक ‘योगीराज श्रीकृष्ण’ में उनके लिए लिखा-‘‘जिसने अपने जीवन-काल में धर्म का पालन किया है और धर्म ही के अनुसार धर्म और न्याय के शत्रुओं का नाश किया है।’’ संस्कृत कवि माघ ने अपने ग्रन्थ ‘शिशुपालवध’ में लिखा कि महाभारत युद्धोपरान्त अश्वमेघ के समापन पर महाराज युद्धिष्ठिर स्वीकार करते हैं-‘हे (एतदूढ़गुरुभार) कठिन, भारी भार सम्भाले (श्रीकृष्ण) आप की कृपा का यह कितना बड़ा चमत्कार है कि आज से (सारा) भारत वर्ष मेरे अधिकार में है।’ गीताकार के शब्दों में संजय ने सच कहा था-

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवानीतिर्मतिर्मम।।

प्राचीन एवं अर्वाचीन अन्वेशक लेखकों के आलेख महाभारत के नायक, महामानव श्री कृष्ण के तथ्यात्मक जीवन-चरित्र को प्रकाश में लाने का सुखद प्रयास है। अन्ध श्रद्धालु हृदयों में सदियों से जमती आ रही मैल को धो डालना प्रबुद्ध जनों का पुनीत कर्त्तव्य है ताकि शुद्ध, पवित्र एवं श्रेष्ठतम श्री कृष्ण चरित्र मानव मात्र के सम्मुख उपस्थित होकर अनुकरणीय बन जाए। सत्य, न्याय और धर्म आधारित राज्य व्यवस्था समस्त भारत भूमि पर स्थापित हो जाए। और हर कृष्ण-भक्त यज्ञमय, योगमय एवं कृष्णमय हो जाए।