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ईश्वर कहाँ रहता है ? : आचार्य सोमदेव जी

शंका:- क्या ईश्वर संसार में किसी स्थान विशेष में, किसी काल विशेष में रहता है? क्या ईश्वर किसी जीव विशेष को किसी समुदाय विशेष के कल्याण के लिए और दुष्टों का नाश करने के लिए भेजता है?

समाधान- ईश्वर इस संसार के स्थान विशेष वा काल विशेष में नहीं रहता। परमेश्वर संसार के प्रत्येक स्थान में विद्यमान है। जो परमात्मा को एक स्थान विशेष पर मानते हैं, वे बाल बुद्धि के लोग हैं। वेद ने परमेश्वर को सर्वव्यापक कहा है। वेदानुकूल सभी शास्त्रों में भी परमात्मा को सर्वव्यापक कहा गया है। एक स्थान विशेष पर परमेश्वर को कोई सिद्ध नहीं कर सकता , न ही शब्द प्रमाण से और न ही युक्ति तर्क से। हाँ, ईश्वर शब्द प्रमाण और युक्ति तर्क से विभु= सर्वत्र व्यापक तो सिद्ध हो रहा है, हो सकता है। वेद में कहा-

एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुष:।

पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।

– य. ३१.३

इस पुरुष की इतनी महिमा है कि यह सारा ब्रह्माण्ड परमेश्वर के एक अंश में है, अर्थात् वह ईश्वर इस समस्त ब्रह्माण्ड में समाया हुआ अनन्त है। यह समस्त जगत् परमात्मा के एक भाग में है, अन्य तीन भाग तो परमात्मा के अपने स्वरूप में प्रकाशित हैं अर्थात् परमात्मा अनन्त है, सर्वत्र विद्यमान है, उसको किसी एक स्थान पर नहीं कह सकते।

नहि त्वा रोदसी उभे ऋघायमाणमिन्वत:।

जेष: स्वर्वतीरप: सं गा अस्मश्यं धूनुहि।।

– ऋ. १.१०.८

इस मन्त्र के भावार्थ में महर्षि लिखते हैं – ‘‘जब कोई पूछे कि ईश्वर कितना बड़ा है तो उत्तर यह है कि जिसको सब आकाश आदि बड़े-बड़े पदार्थ भी घेरे में नहीं ला सकते, क्योंकि वह अनन्त है। इससे सब मनुष्यों को उचित है कि उसी परमात्मा को सेवन, उत्तम-उत्तम कर्म करने और श्रेष्ठ पदार्थों की प्राप्ति के लिए उसी से प्रार्थना करते रहें। जब जिसके गुण और कर्मों की गणना कोई नहीं कर सकता, तो कोई अंत पाने को समर्थ कैसे हो सकता है? और भी -’’

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापाविद्धम्।

कविर्मनीषी परिभू: स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्य: समाभ्य:।।

– य. ४०.८

इस मन्त्र में परमेश्वर को सब में व्याप्त कहा है। इस व्याप्ति से ज्ञात हो रहा है कि परमात्मा किसी एक स्थान विशेष पर नहीं अपितु सर्वत्र है। इस प्रकार परमेश्वर के सर्वत्र व्यापक स्वरूप को सिद्ध करने के लिए शास्त्र के हजारों प्रमाण दिये जा सकते हैं। कोई भी प्रमाण ऐसा उपलब्ध नहीं होता जो परमात्मा को एकदेशीय सिद्ध करता हो।

युक्ति से भी कोई परमात्मा को किसी स्थान विशेष पर सिद्ध नहीं कर सकता। आज विज्ञान का युग है, वैज्ञानिकों ने समस्त पृथिवी, समुद्र, आकाश आदि को देख डाला है। जिन किन्हीं का भगवान् समुद्र, पहाड़ आकाश आदि में होता तो अब तक वह भगवान् वैज्ञानिकों के हाथ में होता। जो लोग ईश्वर को ऊपर सातवें वा चौथे आसमान अथवा इससे कहीं और ऊपर मानते हैं, वे यह सिद्ध नहीं कर सकते कि कौन-सा आसमान ऊपर है, कौन-सा आसमान नीचे, क्योंकि प्रमाण सिद्ध यह पृथिवी गोल है। इस गोल पृथिवी पर लगभग चारों और मानव आदि प्राणी रहते हैें।

जो मनुष्य भारत में रहते हैं, अर्थात् पृथिवी के  ऊपरी भाग पर रहते हैं, उनका आसमान उनके सिर के ऊपर और जो मनुष्य अमेरिका आदि देशों में है, अर्थात् पृथिवी के निचले भाग में रहते हैं, उनका आकाश (आसमान) भारत आदि देश में रहने वालों की अपेक्षा विपरीत होगा अर्थात् भारत वालों के पैरों में आकाश होगा। ऐसा ही पृथिवी के अन्य स्थानों पर रहने वाले मनुष्यों का आकाश जाने । पृथिवी के चारों ओर आकाश है, आसमान है, पृथिवी पर रहने वाले मनुष्यों के सिर जिस ओर होंगे, उनका आसमान उसी ओर होगा।

ऐसा विचार करने पर जो परमात्मा को आसमान में मानते हैं, वे भी एक स्थान विशेष पर सिद्ध नहीं कर सकते। इस विचार से भी परमात्मा सर्वत्र ही सिद्ध होगा, इसलिए परमात्मा सब स्थानों पर विद्यमान है, न कि किसी एक स्थान विशेष पर।

स्थान विशेष की कल्पना ब्रह्माकुमारी मत वालों की भी है। उनका कहना है कि यदि ईश्वर को सर्वव्यापक मानते हैं तो ईश्वर गन्दगी में शौच आदि में भी होगा, यदि ऐसा होगा तो ईश्वर भी गन्दा हो जायेगा। इन ब्रह्माकुमारी वालों ने ईश्वर को कितना कमजोर बना दिया? इन ब्रह्माकुमारी वालों को यह नहीं पता कि यह गंदगी भौतिक है और ईश्वर अभौतिक।

परमेश्वर के अभौतिक और सदा पवित्र होने से परमेश्वर के ऊपर इस गंदगी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। हमारे ऊपर भी जो प्रभाव पड़ता है, वह इसलिये क्योंकि हमारे पास भौतिक शरीर इन्द्रियाँ आदि हैं, इनसे रहित होने पर हम जीवात्माओं पर भी उस गंदगी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ईश्वर तो सर्वथा इनसे रहित है तो ईश्वर पर इस गंदगी का प्रभाव कैसे पड़ेगा? इसलिए मलिनता से बचाने के लिए ईश्वर को एक स्थान विशेष पर मानना अज्ञानता ही है।

इसी प्रकार ईश्वर किसी काल विशेष में होता हो ऐसा नहीं है, परमेश्वर तो सदा सभी कालों में वर्तमान रहता है। काल विशेष में होने की कल्पना अवतारवादी कर सकते हैं, जो कि उनकी यह मान्यता सर्वथा असंगत है। वर्तमान, भूत एवं भविष्यकाल की आवश्यकता हम जीवों की अपेक्षा से है। परमेश्वर के लिए तो सदा वर्तमान रहता है, भूत-भविष्य परमात्मा के लिए नहीं है। परमात्मा सदा एक रस रहता है।

परमात्मा किसी जीव विशेष को किसी समुदाय विशेष की रक्षा वा दुष्टों के नाश के लिए भेजता हो- ऐसा भी नहीं है। यह कल्पना भी अवतारवादियों की है। परमात्मा तो जीवों के कर्मानुसार उनको जन्म देता है। जो जीव विशेष संस्कार युक्त होते हैं, वे जगत् के कल्याण और दुष्टों के नाश में प्रवृत्त होते हैं। ऐसा करने पर परमात्मा उनको आनन्द-उत्साह आदि प्रदान करता है, किन्तु ऐसा कदापि नहीं है कि परमात्मा ने किसी जीव विशेष को इस कार्य में लगााया हो। यदि ऐसा मानेंगे तो जीव की स्वतन्त्रता न रहेगी। ऐसा मानने पर सिद्धान्त की हानि होगी। कर्म फल व्यवस्था की सिद्धि ठीक से न हो पायेगी।

यदि कोई आत्मा किसी समुदाय की रक्षा करे तो दोष की भागी हो जायेगी, क्योंकि ऐसा कदापि नहीं हो सकता कि पूरे समुदाय में सभी लोग एक जैसे धर्मात्मा हो, उस समुदाय में उलटे लोग भी हो सकते हैं। समुदाय में होने से उनकी भी रक्षा करनी पड़ेगी जो कि न्याय न हो सकेगा। परमेश्वर न्यायकारी है, उसके द्वारा भेजी गई आत्मा को भी न्याय करना चाहिए जो कि वह कर न सकेगी।

अधिकतर लोगों की मान्यता है कि परमेश्वर किसी आत्मा को न भेजकर स्वयं अवतार लेते हैं । ऐसा करके परमात्मा सज्जनों की रक्षा और दुर्जनों का नाश करते हैं। इस प्रकार की मान्यता भी ईश्वर स्वरूप से विपरीत, वेद-शास्त्र के प्रतिकूल है, क्योंकि ईश्वर विभु है, अनन्त है, वह अनन्त प्रभु एक छोटे से सान्त शरीर में कैसे आ सकता है? परमेश्वर जन्म मरण से परे है, फिर शरीर में आकर जन्म-मृत्यु को कैसे प्राप्त कर सकता है? परमेश्वर का अवतार मानने पर इस प्रकार की अनेक दोषयुक्त बातों को मानना पड़ेगा।

अवतारवादियों का अवतार मानने का मुख्य आधार ये दो श्लोक हैं-

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।

इन श्लोकों में अवतार लेने का कारण बतायाकि जब-जब धर्म की हानि होगी, तब-तब धर्म के उत्थान और अधर्म के नाश के लिए तथा श्रेष्ठों के परित्राण =रक्षा और दुष्टों के नाश के लिए ईश्वर अवतार लेता है। अब यहाँ विचारणीय यह है कि जिस परमात्मा ने बिना शरीर के इस सब ब्रह्माण्ड को रच डाला, हम सब प्राणियों के शरीरों की रचना की है, उस परमात्मा को कुछ क्षुद्र, दुष्ट व्यक्तियों को मारने के लिए शरीर धारण करना पड़े, यह बात बुद्धिग्राह्य नहीं है। इससे तो ईश्वर का ईश्वरत्व न रहकर ईश्वर का बहुत लघुत्व सिद्ध हो रहा है। यदि परमात्मा को यही करना है तो वह इस प्रकार के कार्य बिना शरीर के भी कर सकता है, क्योंकि वह पूर्ण समर्थ है।

गीता के उपरोक्त श्लोकों में अवतार का कारण हमने देखा, अब देवी भागवत पुराण में अवतार लेने का कारण देखिये। वहाँ लिखा है-

शपामि त्वां दुराचारं किमन्यत् प्रकरोमिते।

विधुरोहं कृत: पाप त्वयाऽहं शापकारणात्।।

अवतारा मृत्युलोके सन्तु मच्छापसंभवा:।

प्रापो गर्भभवं दु:ख भुक्ष्व पापाज्जनार्दन।।

देवी भागवत के इन श्लोकों में अवतार का कारण धर्म की रक्षा वा अधर्म के नाश करने के लिए नहीं कहा, अपितु भृगु का शाप कहा है। अर्थात् महर्षि भृगु ने विष्णु को दुराचार कर्म के कारण शाप दिया, उनके शाप के प्रभाव  से विष्णु का मृत्य ुलोक में अवतार हुआ। गीता के और देवी भागवत पुराण में अवतार के कारणों में परस्पर विरोध है। और देखिये-

बौद्धरूपस्त्वयं जात: कलौ प्राप्ते भयानके।

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वेदधर्मपरायन् विप्रान् मोहयामास वीर्यवान्।

निर्वेदा कर्मरहितास्त्रवर्णा तामासान्तरे।।

यहाँ गीता से सर्वथा विपरीत अवतार का कारण कहा है। गीता धर्म की रक्षा को कारण कहती है और यहाँ तो धर्म के नाश के लिए अवतार ले लिया, अर्थात् भागवत पुराण कहता है- भगवान ने बुद्ध का अवतार लेकर, सबको विरुद्ध उपदेश देकर नास्तिक बनाया तथा वेद मार्ग का नाश किया। यहाँ ये अवतारवादियों के ग्रन्थ परस्पर विरुद्ध कथन कर रहे हैं।

यथार्थ में तो ईश्वर के किसी भी रूप में जन्म धारण करने की कल्पना ही युक्ति व शास्त्र विरुद्ध है, क्योंकि ईश्वर को किसी भी प्रकार के सहारे की आवश्यकता नहीं, चाहे वह सहारा किसी शरीर का हो अथवा किसी अन्य प्राणी का। परमेश्वर अपने सब कार्य करने में समर्थ है, उसको कोई अवतार लेने की आवश्यकता नहीं है।

वेद में ईश्वर को ‘‘अकायमव्रणमस्नाविरम्’’ कहा है। वह परमात्मा सूक्ष्म और स्थूल शरीर के बन्धन से रहित है, अर्थात् इन बन्धनों में नहीं पड़ता। श्वेताश्वतर उपनिषद् मेंऋषि ने कहा-

वेदाहमेतमजरं पुराणं सर्वात्मानं सर्वगतं विभुत्वात्।

जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यस्य ब्रह्मवादिनो हि प्रवदन्ति नित्यम्।।

– ४.२१

अर्थात् वह परमात्मा अजर है, पुरातन (सनातन) है, सर्वान्तर्यामी है, विभु और नित्य है। ब्रह्मवादी सदा उसका बखान करते हैं। वह कभी जन्म नहीं लेता।

उपरोक्त सभी प्रमाणों से सिद्ध हो रहा है कि परमात्मा जीव के कर्मानुसार उसके भोग के लिए शरीर स्थान, समुदाय आदि देता है न कि अपनी इच्छा से किसी का नाश वा रक्षा के लिए उसको भेजता है और ऐसे ही स्वयं भी अवतार लेकर कुछ नहीं करता, अर्थात् स्वयं शरीर धारण करके किसी की रक्षा वा नाश नहीं करता।

सम्भूत्या अमृतम् अश्नुते: – आचार्य उदयवीर शास्त्री

विद्या-अविद्या और सम्भूति-असम्भूति पदों के माध्यम से यजुर्वेद के ४०वें अध्याय एवं तदनुरूप ईशावास्य उपनिषद् में आध्यात्मिकता का विशद विवेचन हुआ है। १२, १३ मन्त्रों में सम्भूति-असम्भूति अथवा सम्भव-असम्भव पदों का प्रयोग हुआ है, परन्तु १४ मन्त्र में ‘असम्भूति’ पद का प्रयोग न कर, उसके स्थान पर ‘विनाश’ पद का प्रयोग हुआ है। ‘सम्भूति’ का अर्थ है, उत्पन्न हुआ पदार्थ। इसके विपरीत ‘असम्भूति’ का अर्थ है- न उत्पन्न हुआ पदार्थ। अर्थात् समस्त भौतिक-अभौतिक जगत् का मूल उपादान कारण तत्त्व, जो कभी उत्पन्न नहीं होता, न उसका सर्वथा विनाश होता है। पर वह महत्-अहंकार आदि रूप से यथाक्रम परिणत होता रहता है। इस प्रकार उसका यह परिणाम-प्रवाह अनादि अनन्त है।

उसी ‘असम्भूति’ शब्द को मन्त्र १४ में ‘विनाश’ पद से कहा। विनाश पद का अर्थ है-

वि-विविधानिवस्तूनि अनेकानेक जगदू्रपाणि,

नश्यन्ति-अदर्शनतां यान्ति यस्मिन् स विनाश: प्रधानमित्यर्थ:।

मूल उपादान तत्त्व के लिये अधिक व्यवहृत दो पद हैं- प्रकृति और प्रधान। सर्ग अर्थात् रचना की भावना को अभिव्यक्त करने की दिशा में विशेष रूप से ‘प्रकृति’ पद का प्रयोग होता है। रचना से भिन्न प्रलय भावना अभिव्यक्त करने में ‘प्रधान’ पद का। प्रस्तुत मन्त्र में इसी भावना से प्रधान पर्याय ‘विनाश’ पद का प्रयोग हुआ है।

प्रकृति से परिणत-महत् से लगाकर समस्त प्राकृतिक जगत् सम्भूति है। इसकी चरम परिणति ‘मानवदेह’ है। मानव-देह का यह विशेष उत्तर है, इसे शेष समग्र सम्भूति समुदाय में से छांट कर अलग कर लिया गया है।

जब हम यह कहते हैं कि वे घोर अन्धकार में पड़ते हैं, जो प्रकृति की उपासना करते हैं तथा वे और भी अधिक घोर अन्धकार में पड़ते हैं, जो ‘सम्भूति’ में रमण करते हैं। यहाँ ‘सम्भूति’ पद अपनी विशेषता को लेकर मुख्य रूप में ‘मानवदेह’ के लिये प्रयुक्त हुआ है। यहाँ यह ध्यान देने की बात है कि असम्भूति के साथ ‘उपासते’ क्रियापद दिया है। यहाँ मानव-देह के अतिरिक्त शेष समग्र सम्भूति भी उपास्य रूप में असम्भूति के अन्तर्गत है। इनकी उपासना से मृत्यु अर्थात् संसार में होने वाले शीत-ताप, भूख-प्यास, आघात-विघात, यातायात आदि दु:खों से पार पाया जा सकता है। यह भी भूलना नहीं चाहिये कि असम्भूति की उपासना भी मानव-देह के माध्यम से ही सम्भव है। इसलिये जो सम्भूति में रमण करते हैं, अर्थात् मानव-देह के साज-शृंगार मात्र में लगे रहते हैं, ‘ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्’ के उसूलों पर ही अमल करते हैं, मानव-देह का सदुपयोग नहीं करते, वे और अधिक घोर अन्धकार में पड़ेंगे ही, क्योंकि न वे मानव-देह से असम्भूति की उपासना करते हैं, न मानव-देह माध्यम से अध्यात्ममार्गीय अनुष्ठानों का आचरण करते हैं। इसलिये अधिभूत एवं अध्यात्म दोनों प्रकार के लाभों से वञ्चित रह जाते हैं। यही स्थिति उनके घोरतर-घोरतम अन्धकार में पड़े रहने की है। फलत: प्रस्तुत प्रसंग में- प्रकृति परिणत पदार्थों के सम्भूति पद से ग्राह्य होने पर भी प्रकृति की चरम-परिणति ‘मानव-देह’ ही सम्भूति-पद वाच्य समझना चाहिये। इसी तथ्य को लक्ष्य कर कहा है- सम्भूत्या अमृतमश्नुते। सम्भूति से अर्थात् मानवदेह रूप माध्यम से अध्यात्म ज्ञान प्राप्त कर योगाङ्गानुष्ठान द्वारा आत्म-साक्षात्कार से अमृत-मोक्ष की प्राप्ति होती है। प्रस्तुत प्रसंग में विद्या-अविद्या आदि यह पारिभाषिक जैसे हैं। व्याख्याकारों ने विद्या का अर्थ ज्ञान-काण्ड और अविद्या का अर्थ यज्ञ-याग आदि कर्मकाण्ड किया है। वस्तुत: विद्या पद अध्यात्म विषयक जानकारी को कहता है। तात्पर्य है- आत्म-तत्त्व का साक्षात्कार, यही अमृत प्राप्ति का एकमात्र साधन है और वह मानवदेह (सम्भूति) रूप साधन द्वारा ही प्राप्त होता है, उससे अतिरिक्त अन्य कोई माध्यम या साधन उसका सम्भव नहीं। इस प्रकार विद्या या सम्भूति इनको मिलाकर ही अर्थ करने से उक्त मन्त्रों का प्रतिपाद्य पूरा होता है।

अविद्या का अर्थ है, विद्या से विपरीत। विद्या यदि अध्यात्म ज्ञान है, जो अधिभूत ज्ञान अविद्या है। प्रकृति और प्रकृति से परिणत पदार्थों का अन्तिम स्तर तक प्राप्त ज्ञान, जिसे आधिभौतिक विज्ञान कहा जाता है और जो आज प्राय: अपने चरम उत्कर्ष पर है, सब अविद्या की कोटि में आता है।

मन्त्रों में बताया ‘अविद्यया मृत्युं तीत्त्र्वा’ ‘विनाशेन मृत्युं तीत्त्र्वा’ अविद्या से मृत्यु को पार करके तथा विनाश से मृत्यु को पार करके। तात्पर्य हुआ- अविद्या अथवा विनाश से मृत्यु को पार किया जा सकता है अर्थात् मृत्यु से पार पाने का साधन अविद्या अथवा विनाश है। गत पंक्तियों में स्पष्ट किया गया है कि प्रस्तुत प्रसंग में विनाश पद का प्रयोग समस्त जगत् में मूल उपादान कारण त्रिगुणात्मक प्रधान के लिये है। प्रकृति और प्रकृति से परिणत पदार्थों की यथावत् जानकारी और उसके अनुसार उनका यथावत् उपयोग करना ही भौतिक विज्ञान है। इसी को यहाँ ‘अविद्या’ पद से कहा है। अविद्या या विनाश से मृत्यु को पार कैसे किया जा सकता है? इसे समझने के लिये यह जान लेना आवश्यक होगा कि प्रस्तुत प्रसंग में ‘मृत्यु’ पद का तात्पर्य क्या है? इसका लोक प्रसिद्ध अर्थ है- आत्मा का देह से वियोग हो जाना। उस अवस्था में आत्मा कोई कार्य कर नहीं पाता। उसे किसी भी प्रकार का कार्य करने के लिये देह धारण करना आवश्यक है। परन्तु मानव जीवन देह धारण किये हुए भी कभी ऐसी स्थितियाँ उसके सामने आ जाती हैं कि उनसे बाधित होनकर मानव का जीवन जीवन नहीं रह जाता, वह मरण प्राय: हो जाता है, कुछ भी करने के लिये अपने आपको असमर्थ पाता है, वे स्थितियाँ कौन-सी हैं? संसार का अनुभव बताता है, वे स्थितियाँ हैं-ताप त्रय। ताप त्रय से त्रस्त मानव जीवन के रस को खो बैठता है। सभी दार्शनिक आचार्यों ने ताप त्रय को विस्तार से स्पष्ट करने और उनसे बचने के उपायों को जानने के लिये मानव को प्रेरित किया है। वे ताप त्रय क्या हैं? संक्षेप में पढिय़े-

‘ताप’ का अर्थ- दु:ख, तपाने वाले या दु:खाने वाले जितने प्रसंग संसार में आते है, आचार्यों ने उन सबका समावेश तीन वर्गों में कर दिया है १. आध्यात्मिक, २. आधिभौतिक, ३. आधिदैविक।

१. आध्यात्मिक ताप- दो प्रकार का है- १. दैहिक, २. मानस

पहला है देह में वात, पित्त, कफ आदि के विकार तथा अन्य विविध कारणों से देह में रोग व्याधियों का उत्पन्न होना। दूसरा है- काम, क्रोध, राग, द्वेष, मोह आदि मानसिक विकारों से जनित दु:ख। इनको दूर करने के उपाय हैं- आयुर्वेदादि पद्धति से चिकित्सा, संयत जीवन, नियमित एवं व्यवस्थित आहार-विहार, व्यवस्थित दिनचर्या, ऋतु अनुसार अपेक्षित व्यायाम आदि। उन सब उपायों की जानकारी अविद्या क्षेत्र के अन्तर्गत आती है। अविद्या का अर्थ अज्ञान नहीं है।

२. आधिभौतिक ताप- वे हैं, जो अन्य प्राणियों द्वारा प्राप्त होते हैं। सांप, बिच्छू, ततैया, मक्खी, मच्छर आदि से होने वाले दु:ख इसी के अन्तर्गत हैं। बैल ने सींग मार दिया, गाय ने लात मार दी, घोड़े के खुर से पैर दब गया, आदि दु:ख भी इसी में आते हैं। किसी ने थप्पड़ मारा, गाली दी, लाठी मारी, छुरा घोंपा, गोली चलाई आदि से होने वाले ताप भी इसी बीच हैं। छोटे-बड़े राष्ट्रों में युद्ध होते हैं, जिनसे अनेक प्रकार के दु:ख राष्ट्र के सामने आते हैं, उन सबका समावेश इसी वर्ग में है। इन सभी मार्गों से प्राप्त दु:खों के निराकरण व प्रतिरोध करने के उपाय आधिभौतिक विषयक जानकारी प्रस्तुत करती है, इस प्रकार के किसी भी स्तर का कोई ऐसा दु:ख नहीं है, जिसको दूर करने का उपाय भौतिक जानकारी ने न सुझाया हो।

३. आधिदैविक ताप- वे हैं, जो आकस्मिक या नियमित दैवीय घटनाओं से प्राप्त होते हैं। सब जानते हैं, जेठ की दु:खभरी गर्मी बढ़ जाने तथा पूस-माह में ठण्ड बढ़ जाने से वे दिन दु:खद होते हैं। अचानक नदी में बाढ़ आ जाने, भूकम्प होने, सार्वत्रिक रोग आदि फैल जाने से तथा तटवर्ती समुद्रों में तूफान आ जाने एवं विद्युत्पात आदि से जो दु:ख होते हैं, वे सब इसी वर्ग के अन्तर्गत हैं।

दैवीं घटनाओं पर मानव बहुत सीमित नियन्त्रण कर पाया है, फिर भी यथामति यथाशक्ति उपाय किये जाते हैं। नदियों पर बड़े-बड़े बांधों का बनाया जाना उसी का एक अंग है। इससे वर्षा का अतिरिक्त जल एक जगह दृढ़ता के साथ संगृहीत कर लिया जाता है, इससे बाढ़ आने का अन्देशा कम हो जाता है तथा उस एकत्रित जल का विद्युत्-उत्पादन, कृषि-भूमि सिंचन आदि अनेक रूपों में सदुपयोग किया जाता है।

भूकम्प, तू$फान आदि के विषय में अग्रिम सूचना प्राप्त कर लेना भी उनसे आंशिक बचाव का उपाय है। यह सब भौतिक विज्ञान का फल है। इस विवरण से हमने यह समझा कि मन्त्रों में ‘मृत्यु’ पद का प्रयोग उन सांसारिक दु:खों के लिये हुआ है, जो शास्त्रीय परिभाषा में ‘ताप त्रय’ के नाम से जाने जाते हैं। इनसे पार पाने का साधन प्राकृत तत्त्वों का यथार्थ ज्ञान और उसका सदुपयोग है, जो आज भौतिक-विज्ञान के नाम से सर्वविदित है। मन्त्रों में इसी को विनाश एवं अविद्या पदों से कहा है। इस प्रकार मानवदेह रूप अनिवार्य माध्यम के द्वारा सांसारिक दु:खों को पार करता हुआ व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार कर अमृत को प्राप्त कर लेता है। मानव देह की अनिवार्यता के कारण ही सबसे अन्त में ‘सम्भूत्या अमृतमश्नुते’ कहा गया है।

अमृत-प्राप्ति की यह प्रक्रिया या पद्धति बताई गई। अब प्रलयकाल का अवसान होने को है, सर्ग सद्य प्रारम्भ होने को है, उस अवसर पर आत्मा मानवदेह प्राप्ति की भावना को लक्ष्य कर चेतन प्रकाश स्वरूप प्रभु से प्रार्थना करता है-

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।

तत् त्वं पूषन्नपावृणु, सत्यधर्माय दृष्टये।।

हिरण्मय-ज्योतिर्मय-तेजोमय पात्र से सत्य का, प्रवाहरूप में सदा रहने वाले सद्रूप जगत् का मुख प्रारम्भ अपिहितम्- आच्छादित है, ढका हुआ है। तात्पर्य है, समस्त विश्व चाहे यह कारण रूप है अथवा कार्य रूप में, वह सदा सर्वान्तर्यामी, सर्वव्यापक परमात्मा का जहाँ तक अस्तित्व है, उसी में सीमित रहता है। परमात्मा से छूटा कोई स्थान नहीं है, इसलिये उसके बाहर……. विश्व के या विश्व के किसी अंश के होने का प्रश्न ही नहीं उठता। वेद में अन्यत्र (पुरुषसूक्त) कहा, यदि परमात्मा के सर्वव्यापकत्व को चार भागों में विभक्त करने की कल्पना की जाय, तो समस्त विश्व अनन्तानन्त लोक-लोकान्तर उसके एक भाग में ही सीमित रह जाते हैं। इस प्रकार चेतन परमात्मा द्वारा सम्पूर्ण जगत् ढका हुआ है, अपने अन्दर समेटा हुआ है। इस पर भी विश्व अपने रूप में सदा सत्य है।

इसी भाव को प्रस्तुत उपनिषद् के प्रारम्भ में लिखे सन्दर्भ ‘पूर्णमद: पूर्णमिदं’ द्वारा अभिव्यक्त किया गया है। अदस्- वह परोक्ष परमात्म-चेतन पूर्ण है। इदम्- यह प्रत्यक्ष दृश्यमान् जगत् पूर्ण है। अपने-अपने अस्तित्व में दोनों पूर्ण है। जिसका जो कार्य है, उसके लिये किसी को एक-दूसरे से उधार नहीं लेना पड़ता, न अदस् कभी इदम् होता है और न आंशिक मात्र भी इदम् कभी अदस्। ये दोनों अपनी जगह अपने अस्तित्व में पूर्ण हैं, क्योंकि इदम् सर्वव्यापक अदस् में सीमित होते हुए भी पृथक् है, इसलिये अदस् पूर्ण में से इदम् पूर्ण का उदञ्चन कर लिया जाता है- ‘पूर्णात् पूर्णमुदच्यते’ इदम् पूर्ण परिणत कर लिया जाता है, अदस् अपरिणत रह जाता है। सन्दर्भ के उत्तराद्र्ध से इसी भाव को अभिव्यक्त किया- ‘पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।’

फलत: जगत् का मूल उपादान तत्त्व त्रिगुणात्मक प्रधान प्रलय काल में परमात्मा की गोद में सोता रहा। अब प्रलय का अवसान है। अब प्रभु की प्रेरणा से प्रकृति का मुख खुल जाता है। त्रिगुण सन्दर्भों में क्षोभ होगा, अन्योन्य मिथुन होकर सर्ग प्रारम्भ हो जायेगा। प्राणि सर्ग में मानवदेह प्राप्त कर आत्मा अपने अपरिहार्य उपादेय की प्राप्ति के लिये प्रयत्नशील हो उठेगा। इस भावना से प्रभु के प्रति प्रार्थना करता है-

तत् त्वं पूषन्नपावृणु, सत्यधर्माय दृष्टये।

जिस व्यवहार्य सत्य जगत् को तुमने अभी तक ढका हुआ है, हे पूषन्! सबका पोषण करने वाले प्रभु! अब उसे ‘अपावृणु’- खोल दो। प्रश्न होता है, क्यों खोल दिया जाय? उसे खुलवा कर क्या करोगे? उत्तर आया- ‘सत्य धर्माय दृष्टये’ सत्य धर्म की जानकारी के लिये, क्योंकि सर्ग रचना के अनन्तर मानव देह प्राप्त होने पर ही सत्यधर्म-अध्यात्म-अधिभूत धर्मों की जानकारी सम्भव है, उसी के आधार पर परम पद प्राप्त हो सकता है।

सर्ग के अनन्तर आत्मा को मानव देह प्राप्त हो गया। शास्त्रीय पद्धति के अनुसार योगाङ्गों के अनुष्ठान एवं औपनिषद् उपासनाओं द्वारा आत्मा ने अपने चैतन्य रूप का साक्षात्कार कर लिया है। उसके फलस्वरूप वह प्रभु के कल्याणतम् आनन्दस्वरूप का अनुभव कर रहा है। तब प्रभु से प्रार्थना करता है-

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह।

पूषन्! सबका पोषण करने वाले जगदुत्पादक परमात्मन्!

एकर्षे! एक मात्र सर्वज्ञ वेदोत्पादक प्रभो!

यम! समस्त विश्व का नियन्त्रण करने वाले, अखिल लोक-लोकान्तरों के नियामक, व्यवस्थापक! सर्वान्तर्यामिन्! सर्वशक्तिमान् प्रभो!

सूर्य- सर्वत्र प्रसृत! सर्वव्यापक! अपरिणामिन्! परमात्मन्! इस पद का यहाँ वही अर्थ अपेक्षित है, जो प्रस्तुत उपनिषद् की चौथी कण्डिका (अनेजदेक) में विवृत किया गया है।

प्राजापत्य! सब प्रजाओं-जड़ चेतन के पालक एवं स्वामिन्! अब

व्यूह- मूल स्रोत से जो अनेकानेक विविध धाराओं में संसार प्रवाहित किया था, उसे सीमित कर लो,

रश्मीन् समूह- जैसे सूर्य दिन का कार्य सम्पन्न हो जाने पर रश्मियों को समेट लेता है, ऐसे ही हे प्रभो! मूल स्रोत से प्रवाहित इन सब सहस्र-सहस्र विविध जगती धाराओं को मेरी ओर से समेट लो, अब इन धाराओं की मुझे अपेक्षा नहीं है। मेरे लिये जो प्राप्तव्य था, वह प्राप्त कर लिया है।

प्रश्न उभरा, अभी दुहाई दे रहा था, इस हिरण्मय पात्र से ढके सत्य के मुँह को खोलो, जब वह सत्य व्यवहार्य जगत् प्रसृत कर दिया,  तब इसे समेटने के लिये हल्ला मचा रहा है, जो प्राप्तव्य था, वह तूने इसमें क्या पा लिया? उत्तर आया- यत्ते कल्याणतमं रूपं तत्ते पश्यामि

जो तुम्हारा सर्वोच्च कल्याणमय रूप है, उस तुम्हारे कल्याणमय रूप को साक्षात् देख रहा हूँ। यही तो मानव जीवन का प्राप्तव्य अन्तिम लक्ष्य है। उसे प्राप्त कर लिया है। तब उस अवस्था का अबाधित अनुभव बताया-

योऽसावसौ पुरुष: सोऽहमस्मि

जो वह दूर-अति दूर प्रकृति सम्पर्क से अभिभूत मेरे लिये सर्वथा अन्तर्हित पुरुष था, यह अब साक्षात् दीख रहा है। उसके आनन्द स्वरूप का अनुभव कर रहा हूँ, तब वैसा ही तो मैं हूँ। जीवात्मा-परमात्मा के चैतन्यरूप में कोई अन्तर नहीं होता। अन्तर चैतन्य का नहीं है, वह इस प्रकार का है- परमात्मा सर्वत्र है, जीवात्मा अल्पज्ञ है ‘ज्ञ’ दोनों हैं, अथवा ‘ज्ञता’ दोनों में समान है, केवल विषयस्तर वा ग्राह्य स्तर का भेद है। अभी तक प्राकृत धाराओं में प्रवाहित आत्मा इन्द्रिय-ग्राह्य विषयों में आप्लावित रहा। अब उपयुक्त उपायों के अनुष्ठान से अपने शुद्ध चैतन्यरूप का साक्षात्कार कर लिया है, प्रकृति का गहरा परदा बीच से हट गया है। इसी दशा में प्रभु का- आनन्दरूप प्रभु का- साक्षात् दर्शन हो रहा है। तब आत्मद्रष्टा जीवन्मुक्त अपना अनुभव बताता है, वह मैं हूँ, अर्थात् जो वह है, वैसा ही मैं हूँ। अत्यन्त सादृश्य तादात्म्य का प्रयोग सर्वशास्त्र सम्मत है। इससे जीवात्मा-परमात्मा की एकता या अभिन्नता करना पूर्णत: अशास्त्रीय होगा।

इस प्रकार जहाँ कहीं जीवात्मा-परमात्मा की एकता या अभिन्नता का उल्लेख आपातत: दृष्टिगोचर होता है, वहाँ सर्वत्र उसे औपचारिक ही समझना चाहिये। ऐसे प्रयोग- मुख को चन्द्र कहने के समान- सर्वत्र भेदमूलक ही सम्भव हैं। अन्यथा-

निरीक्ष्य विद्युन्नयनै: पयोदो मुखं निशायामभिसारिकाया:।

धारानिपातै: सह किन्नु वान्तश्चन्द्रोऽयमित्यात्र्ततरं ररास:।।

क्या यहाँ अद्वैतवादी सचमुच चन्द्र को मेघ की जलधाराओं के साथ भूमि पर गिरा समझेगा? वस्तुत: यहाँ मुख और चन्द्र के अति सादृश्य का ही द्योतन् है। जलधाराओं के साथ चन्द्र कभी भूमि पर नहीं आ सकता। दोनों का भेद स्पष्ट है। चन्द्र अपनी जगह है, मुख अपनी जगह। इसी प्रकार जीवात्मा परमात्मा का परस्पर स्पष्ट भेद होने पर भी ‘योऽसावसौ पुरुष: सोऽहमस्मि’ सन्दर्भ द्वारा मोक्षदशा में दोनों के तादात्म्य का अतिदेश उनके अति सादृश्य को ही अभिव्यक्त करता है। फलत: जीवात्मा परमात्मा के अभेद वर्णनों में सर्वत्र यही व्यवस्था समझनी चाहिये। विषय का उपसंहार करता है-

‘वायुरनिलममृतम्-अथेदं भस्मान्तं शरीरम्।’

प्राण वायु से उपलक्षित, ‘अनिलम्’ निर्दोष, निर्विकार, अपरिणामी, आत्मतत्त्व ‘अमृतम्’ अमृत है, अमरणधर्मा है और यह शरीर भस्म हो जाने तक है। तात्पर्य है, इस नश्वर शरीर में चेतनतत्त्व अपरिणामी है, जब तक शरीर में वह तत्त्व बैठा है, शरीर संचालित रहता है। आत्मा का वियोग हो जाने पर शरीर भस्म कर दिया जाता है। आत्मा अपने कर्मों के अनुसार अगली योनियों को प्राप्त होता है। इसी को मन्त्र के अन्तिम भाग से कहा-

क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर।

मानव देह को प्राप्त कर आत्मा प्रकृति सम्पर्क में डूबा हुआ इस यथार्थ को बार-बार भूल जाता है कि इस देह को सावधानतापूर्वक सदुपयोग करना अभीष्ट है। मन्त्र एकाधिक बार कहकर इसी तथ्य को समझा रहा है, हे क्रतो! कत्र्तव्यनिष्ठ आत्मन्! ‘कृतं स्मर’ अपने किये का स्मरण कर। कर्मों के अनुष्ठान में तूने मानव देह का सदुपयोग किया? यही देह अमृत प्राप्ति का माध्यम है। जिसने इसे समझा, उसने पाया, जिसने न समझा, उसने खोया।

परमेश्वर का मुख्य नाम ‘ओ३म’ ही क्यों?: आचार्य धर्मवीर

यह लेख आचार्य धर्मवीर जी द्वारा बिलासपुर (छत्तीसगढ़) में दि. २६/०६/२००१ को दिया गया व्याख्यान है, इस व्याख्यान में ईश्वर के स्वरूप और उसके नाम ओ३म् का विवेचन बड़ी ही दार्शनिक शैली से किया गया है।

-सम्पादक

ओ३मï् भूर्भुव: स्व:। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयातïï्।।

आज हम परमेश्वर के मुख्य नाम ‘ओ३मï्’ पर चर्चा करेंगे। बड़ा ही प्रसिद्ध नाम है। गायत्री-मन्त्र बोलते समय सबसे पहले  ‘ओ३मïï्’ शब्द आता है, पहले हम ‘ओ३मï्’ का स्मरण करते हैं। स्वामी जी इसका अर्थ करते हुए लिखते हैं कि ‘‘यह परमेश्वर का मुख्य और निज नाम है।’’ इसमें तीन चीजें ध्यान देने योग्य हैं- एक तो मुख्य, दूसरा निज और तीसरा है नाम। ये कोई विशेषण नहीं हैं।

सामान्यत: हम किसी से प्रश्न करते हैं कि आप कहाँ गये थे? वह कहता है कि भगवानï् के दर्शन करने, लेकिन भगवानï् तो कोई नाम नहीं होता, क्योंकि जो सबके साथ लगता है, वह नाम नहीं होता, सर्वनाम होता है। हम भगवानï् राम कहते हैं, भगवानï् कृष्ण कहते हैं, भगवती दुर्गा कहते हैं, भगवान् दयानन्द या भगवान् हनुमान कहते हैं। इस दृष्टि से देखा जाये तो सभी भगवान् हैं। समझ में नहीं आता कि आप कौन-से भगवान् की बात कर रहे हैं? आग्रहपूर्वक पूछने से पता लगा कि आप भगवान् राम की बात कर रहे हैं। जब हम राम की बात करते हैं तो राम का एक स्वरूप हमारे सामने आता है। राम की एक मूर्ति हमारे सामने आती है। उसमें एक धनुष होता है, एक ओर लक्ष्मण होता है, एक ओर सीता होती है। हमको पता चलता है कि यह राम है। बहुत सारे शब्दों के बहुत सारे अर्थ होते हैं, उन शब्दों का प्रयोग हम जब किसी प्रसंग में करते हैं, तब हमें उसका अर्थ मालूम पड़ता है। उदाहरण के लिए हम कहें कि ‘‘खाली है’’। अब बर्तन भी खाली होता है और दिमाग भी खाली होता है, लेकिन खाली होने में हमें कोई संदेह नहीं होता कि इस खाली का यहाँ पर अर्थ क्या होगा। ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है कि जिस भाषा पर हमारा अधिकार है, जिस भाषा का हम अच्छी तरह प्रयोग करते हैं, जो भाषा हमें अच्छी तरह आती है, उसमें संदेह नहीं होता। लेकिन हम यदि अंग्रेजी या संस्कृत पढ़ रहे हों और उसे अच्छी तरह नहीं जानते हों तो उस शब्द का कोष में अर्थ देखना पड़ता है और जब कोष में अर्थ देखते हैं तो हमारी संगति नहीं बैठती। उदाहरण के लिए अग्नि शब्द का अर्थ स्वामी जी भगवान् करते हैं, वह हमें कुछ जमता नहीं, जँचता नहीं। कोष देखते हैं तो वहाँ पर अग्नि का अर्थ आग या फायर लिखा मिलता है। अब भगवान् अर्थ कहाँ से आ गया, यह हमारी समझ से परे है। हमें संदेह होता है कि कहीं गलती है समझने-समझाने में। इसका मुख्य कारण यह है कि हमारा भाषा पर अधिकार नहीं है, इसलिए हमारे मस्तिष्क में कोष के अर्थ आते हैं, प्रसंग के अर्थ, उस पर घटित होने वाले अर्थ नहीं आते। जब किसी शब्द के अर्थ का निर्णय करना हो तो उसके आस-पास का प्रसंग देखना पड़ता है।

जब हम यह कहते हैं कि हम राम के दर्शन करने गये थे तो राम कहने के साथ उसका चित्र हमारे मन में उभरता है, निश्चित रूप से उभरता है। जिसका चित्र उभरता है, हम उसी के दर्शन करने गये थे। उसी के बारे में हम जानते हैं कि उसका पिता दशरथ है, उसकी माता कौशल्या है, उसका भाई लक्ष्मण है, उसकी पत्नी सीता है, वह अयोध्या का राजा है, उसका रावण के साथ युद्ध हुआ था। इसके अतिरिक्त और कोई बात हमारे ध्यान में नहीं आती। हाँ, राम नाम के बहुत से लोग हैं, वह याद आ सकते हैं, जैसे- परशुराम इत्यादि, किन्तु यदि हम केवल राम कहते हैं या दशरथ, सीता, अयोध्या  से सम्बन्धित राम कहते हैं तो हमें केवल एक ही राम याद आता है। राम भगवान् है, इसमें कोई दो राय नहीं हैं, किन्तु हम जिस अर्थ में मानते हैं, केवल उस अर्थ में। जब हम भगवान् कहते हैं तो उसका अर्थ उस चित्र में घटना चाहिए।

हम भगवान् को ऐसा मानते हैं कि वह सब जगह है, सबका है लेकिन राम कहने पर ऐसा होता नहीं है। भगवान् कहने से जो रूप सामने आता है, राम कहने से उससे भिन्न रूप सामने आता है, हरि कहने से उससे भिन्न रूप ध्यान में आता है। दुनिया में जितने भी व्यक्ति हुए हैं, उनका कोई नाम अवश्य है। हमें एक बात और ध्यान में रखनी चाहिए कि बिना नाम के हमारा व्यवहार नहीं चल सकता। दुनिया में कुछ भी हो, सभी का कुछ न कुछ नाम अवश्य है। दुनिया की किसी भी वस्तु का, चाहे वह वास्तविक हो या काल्पनिक, भूत हो या भविष्य, जड़ हो या चेतन, हमें उसका नाम रखना ही पड़ता है। नामकरण करने के बाद उसे हम व्यवहार में ला सकते हैं और नाम क्योंकि आरोपित है, अर्थातï् हमने अपनी मर्जी से चस्पा कर रखा है, जैसे कोर्ट का आदेश किसी दुकान में चस्पा रहता है तो पता चलता है कि इसकी नीलामी होने वाली है, इससे पहले मालूम नहीं पड़ता। वैसे ही हम किसी पर नाम चस्पा करते हैं, यदि ऐसा नहीं होता तो हमारे पैदा होने के साथ हमारा कुछ नाम अवश्य होता। नाम हमारी मर्जी का होता है। गरीब का हम अमीरदास नाम रख सकते हैं, करोड़पति का गरीबदास नाम रख सकते हैं, क्योंकि यह हमारी मर्जी से चलता है। तो नाम हमारे द्वारा दिया गया है और हमारी मर्जी से चलता है, लेकिन यदि हम परमेश्वर को नाम दें तो क्या हो? क्योंकि अक्सर यह देखा गया है कि नाम देने वाला पहले होता है, जिसका नाम रखा जाता है, वह बाद में होता है। अब कल्पना करें कि राम को किसी ने नाम दिया, किसने दिया? दशरथ ने दिया, विश्वामित्र ने दिया, वशिष्ठ ने दिया और ये राम से पहले हुए, राम इनके बाद है। इससे साफ है कि जिसका नाम रखा, वह बाद में हुआ और जिसने नाम रखा, वह पहले हुआ। क्या भगवान् ऐसा है? ओ३मï् नाम क्या हमने रखा है? इसका उत्तर स्वामी जी ने दिया कि यह निज नाम है, उसका अपना नाम है, क्योंकि वह हमारे बाद में नहीं हुआ है, बल्कि हम बाद में हुए हैं। निज उसका अपना है और वह पहले से है। जब कभी हम एक दूसरे को मिलते हैं तो नाम बतलाना पड़ता है, क्योंकि बिना बतलाए तो समझ में नहीं आता है, तो परमेश्वर को भी अपना नाम बतलाना होगा और वह  नाम कहाँ बतलाया है? उसके तो बतलाने का एक ही शास्त्र है, वह है वेद। ‘‘ओ३मï् खं ब्रह्म।’’ ‘‘ओ३मï् क्रतोस्मर।’’ ऐसा कई जगह बतलाया है। वेद में आया है कि उसका नाम ओ३मï् है और ओ३मï् नाम केवल उसका है, क्योंकि ओ३मï् कहते ही हमें राम की तरह, हनुमान की तरह कोई मूर्ति ध्यान में नहीं आती। आ सकती है, बशर्ते कि हम किसी मूर्ति के ऊपर ओ३मï् लिखकर चिपका दें और हम उसके दर्शन करते रहें तो हमें शायद यह भ्रम हो जाये कि यह ओ३मï् है, लेकिन इतिहास में ऐसा अब तक हुआ नहीं है। एक बात हमारे समझने की है कि राम कहने से एक चित्र ध्यान में आया, शिव कहने से दूसरी घटना ध्यान में आई अर्थातï् दुनिया के जितने देवी देवता हैं, जिन्हें हम भगवान् मानते हैं, उन सबका एक विशेष चित्र है और वह दूसरे से भिन्न हैं। दोनों का स्टेटस, दोनों की स्थिति, दोनों की शक्ति, सामथ्र्य, योग्यता यदि एक है, तो उनके अलग-अलग चित्र क्यों हैं?

अलग-अलग चित्र हंै, अलग-अलग इतिहास है, अलग-अलग स्थान है। इसका मतलब उनकी अलग अलग सत्ता है तो यह अलग-अलग होना जो है, वह हमारी समस्या का हल नहीं है। उनका कभी होना और कभी नहीं होना, यह समस्या का हल नहीं करता। वकील मुझे सुलभ है, डॉक्टर मुझे सुलभ है तो वह मेरे काम आता है। मैं बीमार हूँ, मेरा डॉक्टर बाहर गया है तो मेरे काम नहीं आता है। मेरी पेशी है, मेरा वकील छुटï्टी पर है तो मेरा काम नहीं चलता है। भगवान् ऐसा चाहिए जो कभी मेरे से दूर न हो, मेरे से अलग न हो, मेरे से ओझल न हो, लेकिन ये जितने देव हैं, जितने भगवान् हैं, जितने मान्यता के पुरुष हैं, ये सब किसी समय में रहे हैं, उनसे पहले नहीं थे और उनके बाद नहीं हैं। उन सबकी मृत्यु कैसे हुई, कब हुई, उसका एक इतिहास हम पढ़ते, सुनते, जानते हैं, इसलिए उसका नाम शिव है। वह भगवान् विशेषण के साथ तो भगवान् है, किन्तु शिव अपने-आपमें भगवान् नहीं है। राम विशेषण के साथ तो भगवान् है, लेकिन राम रूप में भगवान् नहीं है, इसलिए यह बात बड़ी सीधी-सी है। फिर ओ३मï् का इससे क्या अंतर है, यह सोचने की बात है। इसके आगे स्वामी जी कहते हैं कि यह मुख्य नाम है। यदि बहुत सारे हों, तब उनमें से किसी को मुख्य किसी को गौण, किसी को आम, किसी को खास कह सकते हैं। यदि एक ही हो तो खास नहीं कह सकते। किसी के एक से ज्यादा नाम हो भी सकते हैं, ऐसा देखने में भी आता है।

हम घर में बच्चे को किसी नाम से पुकारते है, स्कूल में दूसरे नाम से पुकारते हैं। उन नामों को हम परिस्थिति से, गुणों से, सम्बन्धों से रखते हैं, लेकिन जब उसका नाम पूछा जाता है तो वह यह नहीं कहता कि मेरा नाम मामा जी है या चाचा जी है। वह बोलता है कि मेरा नाम अमुक है, जो उसका रजिस्टर में है, जो उसका स्कूल में है, जो निर्वाचन की नामावली में है, जो उसका सरकारी कागजों में है, उसको हम नाम कहते है, तो परमेश्वर के भी बहुत सारे नाम हो सकते हैं और इतने सारे हो सकते हैं कि हम परमेश्वर को कभी जड़ बना लेते हैं, कभी चेतन भी बना लेते हैं, कभी मूर्ति भी बना लेते हैं। जब कभी हम बहुत भक्ति के आवेश में होते हैं, तो एक श्लोक पढ़ा करते हैं – त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं ममï देव देव। उसे माँ भी कहते हैं, उसे पिता भी कहते हैं, उसे बन्धु, सखा सभी कहते हैं, अर्थातï् जितने सहायता के कारण हंै उनसे उसे पुकारते हैं, इसलिए यह कहना पड़ा कि परमेश्वर का मुख्य नाम ओ३मï् है। स्वामी जी ने सत्यार्थ प्रकाश में लगभग १०८ नामों की चर्चा की है और उन्होंने यह कहा है कि यह तो समुद्र में बूँद जैसा है, अर्थातï् जितनी वस्तुएँ इस दुनिया में हंै, उनके जितने गुण-धर्म हो सकते हैं, उनकी योग्यता, उसका स्वरूप हो सकता है, वह सबके सब परमेश्वर में हैं, इसलिए वह सारे शब्द परमेश्वर के वाचक हो सकते हैं, लेकिन उसका मुख्य नाम ये सब नहीं हो सकते। राम उसका नाम हो सकता है, गणेश उसका नाम हो सकता है, लेकिन उसका मुख्य नाम और एक ही नाम यदि कोई हो सकता है तो वह ओ३मï् ही हो सकता है। इसका पहला प्रमाण हमें वेद से मिलता है, दूसरा प्रमाण हमें वेद के बाद के ग्रन्थों से मिलेगा। वेद के बाद के ग्रन्थ को हम शास्त्र कहते हैं, उपनिषदïï् कहते हैं, दर्शन कहते हैं, आरण्यक कहते हैं। सभी उपनिषदों में इसकी पर्याप्त चर्चा है।

कठोपनिषदï् में इसकी विशेष चर्चा है। कठोपनिषदï् में जो चर्चा है, उसमें मुख्य बात यह है कि नाम के साथ उसका रूप भी घटना चाहिए। हमारे नाम और रूप, गुण इत्यादि में सम्बन्ध नहीं होता, लेकिन परमेश्वर में एक विशेष बात है- उसका नाम, जो उसने स्वयं रखा है, वह हमारी तरह अवैज्ञानिक नहीं होगा, अनपढ़ों जैसा नहीं होगा, अनुचित-सा नहीं होगा अर्थातï् बहुत अच्छा होगा। नाम के बारे में एक बार किसी ने शोध किया कि आर्यसमाज से पहले कैसे नाम रखे जाते थे और बाद में कैसे रखे जाते गये, उदाहरण के लिए मिर्चूमल, पंजमल, कोठूमल इत्यादि, किन्तु ऐसे लोगों का जब आर्यसमाज के साथ सम्बन्ध बना तो ये लोग वेदप्रकाश, धर्मप्रकाश इत्यादि नाम लिखने लगे।

स्वामी जी ने एक जगह लिखा है कि हम गुणों से भ्रष्ट हो गये तो कोई बात नहीं, किन्तु नाम से तो न हों। परमेश्वर के नाम में यह विशेषता होनी चाहिए कि वह और उसके गुण समान हों।

मनुस्मृति में लिखा है कि इस दुनिया में सबसे अन्त में मनुष्य पैदा हुआ, क्योंकि मनुष्य सबसे मुख्य है। जो मुख्य होता है, वह सबसे अन्त में आता है। किसी समारोह में मुख्य अतिथि पहले नहीं आता है, यदि आ जाता है तो गड़बड़ हो जाती है। एक समारोह में मुख्य अतिथि पहले आ गये तो मंत्री जी बोले- यह तो गड़बड़ हो गया, आप ऐसे कैसे आ गये? वह बोले- आ गये तो आ गये। मंत्री बोले-ऐसे नहीं होगा, हमारे जुलूस का क्या होगा? हम आपको फिर दोबारा लेकर आयेंगे।

मनुष्य इस संसार में सबसे बाद में आया है, सबसे मुख्य है, और क्योंकि मुख्य है, इसलिए उसका संसार से मुख्यता का सम्बन्ध है। एक प्रकार से सारा संसार उसके लिए ही है। इसे हम यदि ध्यान में रखेंगे तो हमें सारा विचार, सारा दर्शन समझ में आ जायेगा।

शेष भाग अगले अंक में…..

आर्यसमाज का वेद-सम्बन्धी उत्तरदायित्व: स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती

पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय के सुपुत्र स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती आर्यसमाज के विद्वान् नेता एवं प्रतिष्ठित वैज्ञानिक थे। उनकी वैज्ञानिक योग्यता का एक उदाहरण यह है कि वे ‘वल्र्ड साइन्स कॉन्फ्रैन्स’ के अध्यक्ष रहे हैं। उनकी लेखनी बड़ी बेबाक, मौलिक एवं सुलझी हुई थी। उनके द्वारा दिये गये विचार हमारे लिये आत्मचिन्तन के प्रेरक हैं। उनकी प्रत्येक बात पर सहमति हो- ये अनिवार्य नहीं है, परन्तु उनके विचार आर्यसमाज की वर्तमान व भावी पीढ़ी को झकझोरने वाले हैं। -सम्पादक

१. आप सम्भवतया मेरे विचारों से सहमत न होंगे, यदि मैं कहँू कि ऋषि दयानन्द के सपनों का आर्यसमाज  उस दिन मर गया, जिस दिन किन्हीं कारणों से स्वामी श्रद्धानन्द महात्मा गाँधी और काँग्रेस को छोडक़र महामना मालवीय-वादी हिन्दू महासभा के सक्रिय अंग बन गए। श्रद्धानन्द जी का गाँधी और कांग्रेस से अलग होना इतना दोष न था, पर हिन्दू महासभा की विचारधारा का पोषक हो जाना आर्यसमाज की मृत्यु थी। अगर सत्यार्थप्रकाश के ११ वें समुल्लास को फिर से ऋषि आज लिखते तो वे आज के आर्यसमाज को भी हिन्दुओं का एक सम्प्रदाय मानकर इसकी गतिविधियों की उसी प्रकार आलोचना करते जिस प्रकार अन्य हिन्दू सम्प्रदायों की उन्होंने की है। इसमें से आज प्राय: सभी इस बात को स्वीकार करेंगे कि आर्य समाज आज हिन्दुओं के अनेक सम्प्रदायों में से एक सम्प्रदाय है, अर्थात् वह सम्प्रदाय जो वेद और यज्ञों के नारे पर जीवित  हो।

२. शायद हिन्दुओं के अन्य सम्प्रदायों की अपेक्षा आज का आर्यसमाज इन हिन्दुओं का वह सम्प्रदाय है, जो सबसे ज्यादा वेद की दुहाई देता है। यों तो तुलसीदासजी विष्णु के अवतार राम का चरित्र लिखने में पदे-पदे आगम-निगम की दुहाई देने में संकोच नहीं करते थे, पर आज का आर्यसमाज वैदिक संहिताओं की अन्य हिन्दू सम्प्रदायों की अपेक्षा सबसे अधिक दुहाई देता है।

३. स्वामी दयानन्द से पूर्व के भारतीय पण्डितों ने वेद की आज तक रक्षा की, और लेखन-मुद्रण-प्रकाशन की सुविधा न होते हुए भी उन्होंने वैदिक संहिताओं के पाठों को सुरक्षित रखा। वैदिक साहित्य की यह सुरक्षा भारतीयों का बहुत बड़ा चमत्कार माना जाता है।

४. मैं कई वर्ष हुए (संन्यास से पूर्व) लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम की सैर कर रहा था, म्यूजियम के पुस्तकालय कक्ष में मैंने बाइबिल पर एक अद्भुत व्याख्यान सुना- वक्ता महोदय हम श्रोताओं को म्यूजियम के विविध कक्षों में ले गये। उन्होंने हमें बाइबिल की वे सुरक्षित प्रतियाँ साक्षात् करायीं जो तीसरी-चौथी-पाँचवीं सदी से लेकर १८वीं-१९वीं सदी की हस्तलिखित या मुद्रित थीं।

तब से मेरी इच्छा रही है कि ऋग्वेद की भी वे हस्तलिखित प्रतियाँ देखूँ जो पुरानी हैं। आपको आश्चर्य होगा-भूमण्डल के साहित्यों में सबसे पुराना ऋग्वेद है, पर इसकी हस्तलिखित प्रति शायद १३वीं-१४वीं शती से पूर्व की भी नहीं है। वेदों की हस्तलिखित प्रतियों पर मैं कभी फिर लिखूँगा पर निस्सन्देह, यह साहित्य आज तक सुरक्षित है, जो अनुक्रमणियाँ हमें प्राप्त हैं, वे बहुत पुरानी नहीं है। जैसे यजुर्वेद का सर्वानुक्रम सूत्र, शौनक का अनुवाकानुक्रमणी (ऋग्वेद की) या ऋक्-सर्वानुक्रमणी। शतपथ ब्राह्मण (१०/४/२/२३) में यहाँ तक उल्लेख है कि वेदों के समस्त अक्षरों की संख्या १२००० बृहती छन्दों की अक्षर संख्या के बराबर है अर्थात् १२,०००&३६=४,३२,००० अक्षर। (सातवलेकरजी ने ऋग्वेद के अक्षरों की संख्या एक संस्करण में दी है। वह संख्या ३,९४,२२१ है।)

५. जैसा मैं कह चुका हँू, आज का आर्यसमाज हिन्दुओं का ही वेदानुरागी सम्प्रदाय है। हिन्दुओं के अन्य सम्प्रदाय धीरे-धीरे अब वेद को छोड़ते जा रहे हैं या वेद से दूर जा रहे हैं। मेरे ऊपर शताधिकवर्षीय उदासी स्वामी गंगेश्वरानन्दजी का स्नेह रहा है। उन्होंने चारों वेद संहिताओं को एक जिल्द में सुन्दर अक्षरों में छपाया है। यह पाठ की दृष्टि से निर्दोष माना जा सकता है। स्वामीजी भारत से बाहर भी द्वीपद्वीपान्तरों में इस ‘वेद भगवान्’ को ले गये हैं और वहाँ इसकी निष्ठापूर्वक प्रतिष्ठा की है। स्वामी जी को हिन्दुओं से एक ही शिकायत है। कोई हिन्दू अब वेद में रुचि नहीं लेता-जो व्यक्ति लेते प्रतीत होते हैं, वे प्रत्यक्ष या परोक्ष में आर्यसमाज के हैं। सायण के दृष्टिकोण से पृथक् यदि किसी का कोई अन्य दृष्टिकोण है, तो वह आर्यसमाज की विचारधारा से पोषित या प्रभावित है।

६. वेद जीवन का प्रेरणास्रोत है। ऋषि दयानन्द से पूर्व मध्यकालीन युग में (ऐतरेय, शतपथ आदि के काल में कात्यायन, याज्ञवल्क्य, महीधर, उव्वट आदि के काल में) वैदिक संहितायें केवल कर्मकाण्ड की प्रेरिका रह गयीं। उसका परिणाम वही हुआ, जो समस्त सम्प्रदायों में कर्मकाण्ड का हुआ करता है-विनाश और सर्वथा विनाश। कर्मकाण्डी व्यक्ति (नेता या पुरोहित) तो यही समझता रहता है कि धर्म की ‘प्रतिष्ठा’ उसके कर्मकाण्ड के कारण है, पर वस्तुत: कर्मकाण्ड के परोक्ष में जो विनाश का अंकुऱ है, वह पनपता आता है। श्रीपाद दामोदर सातवलेकर हिन्दू सम्प्रदाय के अन्तिम वेदानुरागी व्यक्ति थे (आदरणीय स्वामी गंगेश्वरानन्दजी का राग केवल मंत्रभाग से है, न कि व्यक्तिगत या समाजगत नवनिर्माण से।)

७. १८ वीं शती के प्रारम्भ से यूरोपीय विद्वानों ने वेद में रुचि ली और वैदिक साहित्य पर उनकी तपस्या सराहनीय है। (क) उन्होंने भारतवर्ष से इस साहित्य की हस्तलिखित प्रतियाँ उपलब्ध कीं और इन प्रतियों को अपने पुस्तकालयों में कुशलता से सुरक्षित रखा। (ख) यूरोपीय (बाद को अमरीकी) विद्वानों ने वैदिक व्याकरण, प्रातिशाख्य, वैदिक छन्द, वैदिक स्वरों का अच्छा अध्ययन किया, (ग) छोटे-छोटे संकलनों पर भी ये वर्षों अध्ययनशील रहे, (घ) अध्ययन की एक नयी परम्परा को उन्होंने जन्म दिया, (ञ) अपने देश में इन सम्पादित ग्रन्थों को नागरी और रोमन लिपियों में अति शुद्ध छपवाने का भी प्रयत्न किया। उन्होंने (रॉथ-बण्टलिंक के ग्रन्थों के समान) बड़े-बड़े कोश तैयार किए, (च) अध्ययन की सुविधा के लिए अनेक प्रकार के तुलनात्मक विश्वकोश भी तैयार हुए।

८. धीरे-धीरे भारतवर्ष में भी पाश्चात्य परम्परा पर अध्ययन और अनुशीलन करने के कुछ केन्द्र खुल गए (शब्दानुक्रमणीय पर कार्य स्वामी नित्यानन्द और स्वामी विश्वेश्वरानन्द जी ने प्रारम्भ किया)। इन केन्द्रों में सर विलियम जोन्स की एशियाटिक सोसायटी कलकत्ता, उसकी बम्बई वाली शाखा, गायकवाड़ संस्थान बड़ौदा, भाण्डारकर इन्स्टीट्यूट-पूना और विश्वबन्धु जी वाला विख्यात इन्स्टीट्यूट होशियारपुर और संस्कृत कॉलेज काशी ने भी अच्छा काम किया।

९. यह मैं पीछे कह चुका हँू कि पुरानी परम्परा के हिन्दू विद्वान् वेद को छोड़ बैठे हैं और उनके हाथ से आर्यसमाज के विद्वानों ने वेद को एक प्रकार से छीन लिया है। अत: ऐसी स्थिति में आर्यसमाज की जनता का उत्तरदायित्व वेद के सम्बन्ध में बढ़ गया है। मैंने एक बार सान्ताक्रूज की आर्यसमाज में भी यह बात कही थी। यह उत्तरदायित्व निम्र दृष्टियों से महत्त्व का है-

१. मन्त्रों का उच्चारण

२. मन्त्रों का विनियोग

३. कर्मकाण्ड में मन्त्रों का प्रयोग

४. मन्त्रों के छोटे बड़े संकलन

५. मन्त्रों के भाष्य

पिछले वर्ष मैं नैरोबी गया था-मैंने वहाँ के आर्यसमाज में स्पष्ट कहा था-दिल्ली की हवा से नैरोबी आर्यसमाज को बचाओ। बम्बई की हवा से भी विदेशी आर्यसमाजों को हमें बचाना होगा।

इन देशों में किसी से भी पूछो-तुमने यह अशुद्ध उच्चारण कहाँ सीखा-वे यह उत्तर देते हैं-हम दिल्ली या बम्बई गये थे-हमने वहाँ ऐसा ही देखा या सुना था। ओं भूर्भव:, ओजो अस्तु-यह तो दिल्ली और बम्बई की हवा के साधारण उदाहरण हैं।

कई स्थानों पर जब मैं स्वस्तिवाचन और शान्ति प्रकरण के टेप सुनता हँू, उनको सुनकर यह स्पष्ट लगता है कि ये टेप मेरे ऐसे अज्ञ उपदेशकों या पंडितों के हैं, जिन्हें न ऋक् पाठ आता है न यजु: पाठ-साम के मन्त्रों का पाठ सामवेद का परिहास या उपहास है, जिसे आप किसी भी अवसर पर स्वस्तिवाचन (अग्र आ याहि वीतये) या शान्तिकरण (स न: पवस्व शं गवे) पाठ के अवसर पर सुन सकते हैं।

ऋषि दयानन्द ने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में स्पष्ट लिखा है कि ऋग्वेद के स्वरों का उच्चारण द्रुत अर्थात् शीघ्र वृत्ति में होता है। दूसरी-मध्यम वृत्ति, जैसे कि यजुर्वेद के स्वरों का उच्चारण ऋग्वेद के मन्त्रों से दूने काल में होता है। तीसरी विलम्बित वृत्ति है, जिसमें प्रथम वृत्ति से तिगुना काल लगता है, जैसा कि सामवेद के स्वरों के उच्चारण वा गान में, फिर इन्हीं तीनों वृत्तियों के मिलाने से अथर्ववेद का भी उच्चारण होता है, परन्तु इसका द्रुत वृत्ति में उच्चारण अधिक होता है।

मैंने दक्षिण भारत के पंडितों को ऋग्वेद का यथार्थ उच्चारण करते देखा है, किन्तु आर्यसमाज के लोगों के उच्चारणों पर आप विश्वास नहीं कर सकते। उच्चारण या तो गुरुमुख से सीखे जा सकते हैं, या परिवार की परम्परा से।

आर्यसमाज में नित्य नये विनियोग बनते जा रहे हैं। सबसे पुराना विनियोग शान्तिपाठ का है (द्यौ: शान्ति:), ‘त्र्यंबकं यजामहे’ की भी बीमारी चल पड़ी है। मरने के बाद संस्कारविधि के प्रतिकूल शान्ति-यज्ञ चल गए हैं, जिनमें शान्तिकरण के मन्त्र पढऩा अनिवार्य सा हो गया है। प्रत्येक अग्रिहोत्र का नाम यज्ञ पड़ गया है, जिसके बाद ‘यज्ञरूप प्रभो’ वाला भजन अवश्य गाना चाहिए। ऐसी नयी प्रथा चल पड़ी है। ऋग्वेद के अन्तिम सूक्त (दशम मंडल, १९१ वाँ सूक्त) का नाम संगठन-सूक्त रख दिया गया है। ऋग्वेद के इस सूक्त के प्रथम मन्त्र का देवता अग्रि है। शेष तीन मन्त्रों का देवता ‘संज्ञानम्’ है। समाज के साप्ताहिक अधिवेशनों में संगठन सूक्त के नाम पर चारों मन्त्र पढ़े जाने लगे हैं। क्या हम संगठन सूक्त का नाम ‘संज्ञान-सूक्त’ नहीं रख सकते?

इस प्रसंग में संज्ञान-सूक्त में केवल तीन ही मन्त्र हैं-(१) संगच्छध्वं (२) समानो मन्त्र:. और (३) समानी व आकूति:. प्रथम मन्त्र संसमिद्युवसे. मन्त्र तो इस प्रसंग में पढऩा ही नहीं चाहिये।

आगे के वेदप्रेमी हमारा अनुकरण करेंगे, अत: हमें सावधानी बरतनी चाहिए।

जिज्ञासा समाधान – आचार्य सोमदेव

जिज्ञासा १- ‘‘जिज्ञासा-समाधान’’ में एक जिज्ञासा का हल चाहिए। हवन करते हैं तो अन्त में बलिवैश्वदेवयज्ञ में पके चावल भात की दस आहुतियाँ चढ़ाते हैं। कहीं-कहीं भात न होने के कारण फल या प्रसाद की ही आहुतियाँ दे देते हैं और कहीं-कहीं सिर्फ घी की दस आहुतियाँ चढ़ा देते हैं। बलिवैश्वदेवयज्ञ तो प्रतिशाम में करना चाहिए। वर्तमान जगत् में कम घी होता है। आपकी राय क्या है?

– सोनालाल नेमधारी

जिज्ञासा २- महर्षि मनु द्वारा लिखित भूतयज्ञ का मन्त्र-

‘‘शुनां च पतितानां………पापरोगीणाम्। वायसानों……..भुवि।।’’

को अर्थसहित पढ़ा। आर्य गुटका में लिखित अर्थ के अनुसार कुत्ता, पतित, चांण्डाल, पापरोगी, काक के स्थान पर कोयल, चाण्डाल के स्थान पर महात्मा इत्यादि को महत्त्व नहीं दिया। उन सब कुत्ता, पतित वगैरह का उस समय समाज में क्या स्थान था? वे किस प्रकार से अधिक उपयोगी थे या उपयोगी समझे जाते थे? हमारे वेद-शास्त्रों के अनुसार चाण्डाल, पतित, पापरोगी, काक का वास्तविक अर्थ क्या है। क्योंकि आधुनिक समाज में इन शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाता।

– डॉ. वेदप्रकाश गुप्ता

समाधान १- बलिवैश्वदेवयज्ञ गृहस्थाश्रमी को अवश्य करना चाहिए। यह यज्ञ पाकशाला की अग्रि में करना होता है। इसके दो भाग हैं- एक अग्रि में आहुति देना, दूसरा कुछ प्राणी विशेष के लिए भोजन में से भाग निकालकर उनको देना। जो अग्रि में आहुति दी जाती हैं, वे आहुतियाँ घर में बने भोजन में से दी जाती हैं। इसके लिए महर्षि लिखते हैं-

यदन्नं पक्वमक्षारलवणं भवेत्तेनैव

बलिवैश्वदेवकर्म काय्र्यम्।

– ऋ.भा.भू.।

जो पका हुआ, क्षार और लवण से रहित अन्न है, उसकी आहुति देवें। यह बलिवैश्वदेवयज्ञ पके अन्न से ही करने का विधान है। इस विषय में महर्षि संस्कारविधि में भी लिखते हैं-‘‘……घृतमिश्रित भात की, यदि भात न बना हो तो क्षार और लवणान्न को छोड़ के जो कुछ पाक में बना हो, उसकी दश आहुति करें।’’ यहाँ मुख्य रूप से भात की आहुति देने को कहा है और यदि भात न हो तो दूसरा विकल्प अन्य दूसरा पका हुआ अन्न कहा है।

बलिवैश्वदेवयज्ञ को श्रद्धा से करने वाला व्यक्ति ऋषि के अनुसार भात बनायेगा या बनवायेगा, तब आहुति देगा अथवा अन्य मिष्ट अन्न की आहुति देगा, यह ऋषि की मान्यता के अनुसार आदर्श रीति है। हाँ, कभी ऐसी परिस्थिति है कि कोई पक्व अन्न है ही नहीं और हम बलिवैश्वदेवयज्ञ करना चाहते हैं तो घी की आहुति भी दी जा सकती है, ऐसा करने से लाभ ही होगा।

आपने कहा ‘‘भात न होने पर फल या प्रसाद की आहुति दे देते हैं।’’ इस विषय में हमने ऋषि का मन्तव्य रख दिया है।

यह यज्ञ प्रतिदिन प्रात: करना होता है, प्रतिशाम नहीं। हाँ, यदि किसी कारणवश प्रात: नहीं कर पाये तो सायं किया जा सकता है। ये कहना कि ‘‘वर्तमान जगत् में घी कम होता है’’ उचित नहीं, क्योंकि जैसे पहले घी का उत्पादन होता था, आज भी हो रहा है। यदि हम यज्ञ करना चाहते हैं, यज्ञ के प्रति श्रद्धा है तो घी का उत्पादन बढ़ा लेंगे, प्राप्त कर ही लेंगे। अस्तु।

बलिवैश्वदेवयज्ञ के विषय में थोड़ा और लिखते हैं। वेद व ऋषियों ने इस यज्ञ का वर्णन किया है। महर्षि मनु कहते हैं-

वैश्वदेवस्य सिद्धस्य गृहेऽग्नौ विधिपूर्वकम्।

आभ्य: कुर्यात् देवाताभ्यो ब्राह्मणो होममन्वहम्।।

ब्राह्मण एवं द्विज व्यक्ति पाकशाला की अग्रि विधिपूर्वक सिद्ध हुए बलिवैश्वदेवयज्ञ के भाग वाले भोजन का प्रतिदिन ईश्वरीय दिव्यगुणों के चिंतनपूर्वक आहुति देकर हवन करे।

अहरहर्बलिमित्ते हरन्तोऽश्वायेव तिष्ठते घासमग्रे।

रायस्पोषेण समिषा मदन्तो मा ते अग्रे प्रतिवेशा रिषाम।।

– अथर्व. १९.५५.७

यह अथर्ववेद का मन्त्र भी बलिवैश्वदेवयज्ञ-विषयक आहुति देने का निर्देश कर रहा है। आहुति देने वाला यह बलिवैश्वदेवयज्ञ का प्रथम भाग है।

समाधान २- बलिवैश्वदेवयज्ञ का दूसरा भाग असहाय प्राणियों के लिए अपने भोजन में से कुछ भाग निकालकर उनको देना है। महर्षि मनु लिखते हैं-

शुनां च पतितानां च श्वपचां पापरोगिणाम्।

वायसानां कृमीणां च शनकैर्निर्वपेद् भुवि।।

– मनु. ३.९२

अर्थात् कुत्तों, कंगालों, कुष्ठी आदि रोगियों, काक आदि पक्षियों और चींटी आदि कृमियों के लिए भी छ: भाग अलग-अलग बाँट के दे देना और उनकी प्रसन्नता करना अर्थात् सब प्राणियों को मनुष्यों से सुख होना चाहिए। ऋ.भा.भू.

महर्षि मनु ने ये जो प्राणी गिनाये हैं, ये व कुछ अन्य भी मनुष्यों के आश्रित रहते हैं। आपने कहा कुत्ते के स्थान पर गाय क्यों नहीं? यहाँ गाय का निषेध भी नहीं है। दूसरी बात, गाय को जितनी सरलता से चारा आदि मिल जाता है, उतनी सरलता से ग्राम्य या गली के कुत्तों को नहीं मिलता। इस प्रकार के प्राणी मनुष्यों पर आश्रित रहते हैं, इसलिए कुत्ते का कथन है।  कोयल का भोजन प्राय: जंगली होता है, वह कौवे की भाँति घर का भोजन नहीं करती और यहाँ कौवा कहने से कोयल आदि अन्य पक्षियों का निषेध भी नहीं है, कौवा तो उपलक्षण मात्र है। ऐसे ही पतित और अन्यों की बात जानें।

पतित का तात्पर्य कंगाल आदि से है। जो कंगाल है, उनका भरण-पोषण बलिवैश्वदेवयज्ञ के द्वारा गृहस्थ लोग करें। कुष्ठ आदि रोगयुक्त असहाय जो मनुष्य हैं, उनको भोजन आदि कराना श्रेष्ठकर्म ही कहलायेगा। रही बात इनके स्थान पर महात्मा आदि की, तो इनके लिए ऋषियों ने अतिथियज्ञ का पृथक् विधान कर रखा है। इनका आदर सत्कार उस यज्ञ के माध्यम से होता ही जाता है।

इनके जैसे पहले अर्थ थे, वैसे आज भी हैं। कौवा कौवा ही है, कोई और अर्थ इसका नहीं है। चाण्डाल, जो श्मशान भूमि आदि में सेवाकार्य करता था। पतित से कंगाल असहाय आदि और पापरोगी अर्थात् कुष्ठरोग आदि से ग्रसित व्यक्ति। इनको सहयोग, सहायता करना, भोजन आदि से प्रसन्न करना बलिवैश्वदेवयज्ञ का दूसरा भाग कहलाता है। अलम्।

परमेश्वर व्यापक अन्तर्यामी परमैश्वर्यवान् यथार्थश्रोता: -डॉ. कृष्णपाल सिंह

उपप्रयन्तोऽअध्वरं मन्त्रं वोचेमाग्रये।

आरेऽअस्मे च शृण्वते।।

-यजु. ३/११

प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि गौतम है और देवता अग्रि=जगदीश्वर है। मन्त्र का विषय निरूपित करते हुए महर्षि दयानन्द ने लिखा है कि ‘अथेश्वरेण स्वस्वरूपमुपदिश्यते’ अर्थात् इस मन्त्र में ईश्वर ने अपने स्वरूप का उपदेश किया है। ईश्वर का स्वरूप कैसा है? इस बात का ज्ञान हमें इस मन्त्र द्वारा होता है। मन्त्र में परमेश्वर को यथार्थ श्रोता कहा गया है। वह सबकी स्तुतियों, प्रार्थनाओं, याचनाओं को यथार्थरूप में सुनता है। यह विचारणीय है कि उसके सुनने के साधन क्या हैं और कैसे सुनता है? क्या ईश्वर को सुनने के साधन हम जीवात्माओं के समान श्रोत्रादि हैं? इसका सीधा उत्तर नहीं में है।

जीवात्माओं को तो शरीर, ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ और अन्त:करण चतुष्टय प्राप्त हैं। उन्हीं के द्वारा जीवात्मा अपना सब व्यवहार सम्पादित करता है, परन्तु परमेश्वर को जीवात्मा जैसे शरीरादि की आवश्यकता नहीं है। वह तो इन साधनों के बिना सब कार्य बड़ी कुशलता से निष्पादित करता है, क्योंकि वह अशरीरी (निराकार), सर्वज्ञ, सर्वव्यापक सर्वान्तर्यामी तथा परमैश्वर्यवान् है। अब यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि परमेश्वर श्रोत्रादि साधन के बिना कैसे सुनता है? सुनना तो श्रोत्रेन्द्रिय से ही होता है, फिर श्रोत्रेन्द्रिय के बिना सुनना कैसे हो सकता है? इस आशंका का समाधान यह है कि वह व्यापक और सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् होने से सब कुछ देखता, सुनता, जानता है।

‘यत्तददृश्यम्’ इस मुण्डकोपनिषद् के वचन से यह विदित होता है कि वह अदृश्य, निराकारादि स्वरूप वाला है। महर्षि ने यह वचन ऋ. भा. भूमिका के वेद विषय विचार के अन्तर्गत उद्धृत किया है। वहाँ प्रकरण वेद और ईश्वर का है। इस वचन के साथ और भी अनेक वेद, शास्त्रों, उपनिषदों के प्रमाणों को प्रस्तुत किया है। मुण्डकोपनिषद् के इस वचन के अतिरिक्त अन्य सभी प्रमाणों का अर्थ संस्कृत एवं भाषाभाष्य में उपलब्ध होता है, परन्तु मुण्डकोपनिषद् के उद्धृत वचन का न तो संस्कृत में और न ही भाषाभाष्य में अर्थ मिलता है। सम्भवत: सुगमार्थ (सरलार्थ) होने से अर्थ नहीं किया होगा। ऐसा भूमिका में अन्यत्र भी दृष्टिगोचर होता है, जैसे ऋ. भा. भूमिका के सृष्टिविद्या विषय के अन्तर्गत ‘न मृत्युरासीत्’ इत्यादि मन्त्र सुगमार्थ हैं इसलिये इनकी व्याख्या भी यहाँ नहीं करते, किन्तु भाष्य में करेंगे। अत: मुण्डकोपनिषद् के वचन को सरलार्थ (सुगमार्थ) मानकर वहाँ अर्थ न दिया होगा।

पं. युधिष्ठिर मीमांसक जी ने उक्त मुण्डकोपनिषद् के वचन के अर्थ विषय में भावार्थ यथास्थान कोष्ठक के अन्दर बढ़ाते हुए लिखा है कि ‘यत्तददृश्यम्’ अर्थात् उस ब्रह्मा का ज्ञानेन्द्रियों से ग्रहण नहीं होता, हस्त से पकड़ा नहीं जा सकता, उसका कोई गोत्र वा वर्ण नहीं, वह नेत्र और कर्णरहित है, उसके हाथ और पाँव नहीं, वह नित्य है, व्यापक है, सर्वान्तर्यामी है, सुसूक्ष्म है, नाशरहित है……।

अतएव इस औपनिषदिक वचन से विदित होता है कि परमेश्वर निराकार, चक्षुरादि इन्द्रियरहित होने पर भी सबका दृष्टा, श्रोता है, क्योंकि वह सर्वगत अर्थात् सर्वत्र व्याप्त होने से सब कुछ देखता सुनता व जानता है। बृहदारण्यकोपनिषद् में महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि हे गार्गी! उस अक्षर ब्रह्म के विषय में विद्वान् लोग कहते हैं कि वह ‘अस्थूलम् अनणु…….अचक्षुम्…….अश्रोत्रम्’…….. इत्यादि विशेषणयुक्त है। अचक्षुकम् का अभिप्राय यह है कि वह अविनाशी, सर्वज्ञ अक्षर ब्रह्मं चक्षुरादि इन्द्रियों से भिन्न होने से ‘अचक्षुकम्’ कहा है। वह सर्वगत (व्यापक) होने से बिना चक्षु के सब कुछ देखता है। चक्षु का अर्थ पंचमहायज्ञ विधि में लिखा है कि

‘एष एवैतेषां प्रकाशकलात् बाह्याभ्यन्तरयो:

चक्षु:’ ‘चक्षु:’ ‘सर्वदृक्’

अर्थात् वह परमात्मा बाहर और अन्दर सबका द्रष्टा है। विश्वतश्चक्षु: पद का अर्थ करते हुए महर्षि दयानन्द ने लिखा है कि ‘सर्वस्मिञ्जगति चक्षुर्दर्शनं यस्य स:’ अर्थात् सब जगत् पर चक्षु-दृष्टि रखने वाला है।

परमेश्वर का कर्तृत्व:- सत्यार्थ प्रकाश में परमेश्वर के कर्तृत्व को समझाते हुए उन्होंने लिखा है कि

पूर्व.- जब परमेश्वर के श्रोत्र, नेत्र आदि इन्द्रियाँ नहीं है, फिर वह इन्द्रियों का काम कैसे कर सकता है?

उत्तर-अपाणिपादो जवनोग्रहीता पश्यत्यचक्षु: स शृणोत्यकर्ण:।

स वेत्ति विश्वं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्रं पुरुषं पुराणम्।।

यह उपनिषद् (श्वेता ३-१९) का वचन है। परमेश्वर के हाथ नहीं, परन्तु अपने शक्तिरूप हाथ से सब रचन, ग्रहण करता, पग नहीं, परन्तु व्यापक होने से सब अधिक वेगवान्, चक्षु का गोलक नहीं, परन्तु  सबको यथावत् देखता, श्रोत्र नहीं तथापि सबकी बात सुनता, अन्त:करण नहीं परन्तु सब जगत् को जानता है और उसको अवधि सहित जानने वाला कोई भी नहीं। उसी को सनातन, सबसे श्रेष्ठ, सबमें पूर्ण होने से पुरुष कहते हैं। वह इन्द्रियों और अन्त:करण से होने वाले काम अपने सामथ्र्य से करता है।

वह ब्रह्म अश्रोत्र है। अक्षर, ब्रह्म, श्रोत्र-भिन्न है। तुलसीदास ने उक्त वचन का काव्यानुवाद करते हुए कहा है कि ‘बिनु पग चलै सुनै बिनु काना’ प्रकृत वेदमन्त्र तो यह भाव ‘शृण्वते’ पद से अभिव्यक्त कर रहा है कि विज्ञान स्वरूप, सबका अन्तर्यामी, व्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर सबके अन्दर-बाहर व्याप्त हो रहा है। उसकी व्याप्ति के बिना कोई वस्तु नहीं है। अग्रिस्वरूप परमेश्वर सूक्ष्मातिसूक्ष्म होने से सबको देखता, जानता व सुनता है। इसलिये सब मनुष्यों को वेदमन्त्रों द्वारा उसकी स्तुति-प्रार्थना-उपासना करनी चाहिये।

वर्तमान समय में पाखण्ड का बोलबाला है। ईश्वर की उपासना में भी ढोंग चल रहा है। जो अविद्वान् व अयोगी हंै, वे लोग ही ईश्वर की पूजा (उपासना) आदि का मूर्ति रचकर प्रपंच करते हुए भोली जनता का पाखण्ड से द्रव्यहरण कर रहे हैं। इसी प्रकार यज्ञादि में भी नाना प्रकार का आडम्बर (ढोंग) का बाहुल्य हो रहा है। अवैदिक कृत्यों का समाज में बहुत प्रचार होता जा रहा है। यज्ञों में वेदमन्त्रों के स्थान पर मनुष्य रचित ग्रन्थों के श्लोकों, वाक्यों को पढक़र आहुतियाँ दी जा रही हैं। इस प्रकार यज्ञीय पाखण्ड फैल रहा है। यजुर्वेद का यह मन्त्र यह बतला रहा है कि यज्ञीय सब शुभकर्म वेद-मन्त्रों के द्वारा ही सम्पादित करने चाहिएँ।

महर्षि दयानन्दकृृत मन्त्रार्थ:

(अध्वरम्) क्रियामय यज्ञ को (उप प्रयन्त:) उत्तमरीति से सम्पादित (निष्पादित) करते हुए और जानते हुए हम लोग (अस्मे) हमारे (आरे) दूर और (च) चकार से समीप भी (शृण्वते) यथार्थ सत्यासत्य को सुनने वाले (अग्रये) विज्ञानस्वरूप अन्तर्यामी जगदीश्वर के लिये (मन्त्रम्) विज्ञान के निमित्त वेदमन्त्रों को (वोचेम) उच्चारण करें। अर्थात् वेदमन्त्रों से जगदीश्वर की स्तुति करें।

भावार्थ:- मनुष्यों को वेदमन्त्रों के साथ ईश्वर की स्तुति का यज्ञानुष्ठान करके एवं जो ईश्वर अन्दर और बाहर व्यापक होकर सब सुन रहा है, उससे डरकर अधर्म करने की कभी इच्छा भी न करें। जब मनुष्य इस ईश्वर को जानता है, तब यह उसके समीपस्थ तथा जब इसको नहीं जानता, तब दूरस्थ होता है, ऐसा समझें।

ईश्वरस्वरूप दर्शन:- प्रस्तुत मन्त्र का देवता अग्रि=जगदीश्वर है। परमेश्वर अग्रि के समान सर्वत्र सबके अन्दर और बाहर व्यापक हो रहा है। इसी कारण उसको अन्तर्यामी कहा जाता है। विज्ञानस्वरूप होने के कारण वह सबकी सुनता व सब कुछ जानता है। इस कारण उससे डरकर अधर्म, पापाचरण कभी न करना चाहिए। जब मनुष्य ईश्वर को अच्छी प्रकार जानता है, तब वह उसके समीप होता है और जब ईश्वर के  स्वरूप को नहीं जानता अथवा ईश्वर को नहीं जानता, तब वह उससे दूर होता है।

विशिष्ट पद विचार:- १. आरे:- आचार्य यास्क ने इस पद को निघण्टु ३/३६ में ‘दूर’ नामों में पढ़ा है। इस कारण महर्षि ने इस पद का अर्थ ‘दूर’ किया है।

२. अध्वर:- निरुक्त शास्त्र में यास्काचार्य ने इस ‘अध्वरम्’ पद की निरुक्ति करते हुए लिखा है कि

‘अध्वर इति यज्ञनाम ध्वरति हिंसाकर्मा तत्प्रतिषेध:’

अर्थात् ‘अध्वर’ यह यज्ञ नाम है। जिसका अर्थ हिंसा-रहित कर्म है। चारों वेदों में यज्ञ के पर्याय अथवा कहीं-कहीं विशेषण के रूप में अध्वर पद का प्रयोग पाया जाता है।

शिक्षा समानता का आधार है: -धर्मवीर

मनुष्य का व्यवहार जड़ वस्तुओं से भी होता है तथा चेतन पदार्थों से भी होता है। जड़ वस्तुओं से व्यवहार करते हुए वह जैसा चाहता है, वैसा व्यवहार कर सकता है। जड़ वस्तु को तोडऩा चाहता है, तोड़ लेता है, जोडऩा चाहता है, जोड़ लेता है, फेंकना चाहता है, फेंक देता है, पास रखना चाहता है, पास रख लेता है। वह पत्थर को भगवान् बनाकर उसकी पूजा करने लगता है, वह पत्थर उसका भगवान् बन जाता है। व्यक्ति उस पत्थर को अपनी सीढिय़ों पर लगाकर उन पर जूते रखता है, उसे उसमें भी कोई आपत्ति नहीं होती। अत: जड़ वस्तु के साथ मनुष्य का व्यवहार अपनी इच्छानुसार होता है, अपनी मरजी से होता है, जड़ वस्तु क ी कोई मरजी इसमें काम नहीं करती।

चेतन पदार्थों से मनुष्य सर्वथा अपनी इच्छानुकूल व्यवहार नहीं कर सकता। चेतन में पशु-पक्षी आदि प्राणियों के साथ अपना व्यवहार बलपूर्वक करता है। यद्यपि प्राणियों में चेतन पदार्थों में इच्छा होती है, उन्हें अच्छा बुरा लगता है, परन्तु मनुष्य अपनी इच्छा उन पर थोपता है। उन्हें अपनाता है, दूर करता है, प्रेम करता है, हिंसा करता है, उसमें अपनी इच्छा को ऊपर रखता है। दूसरे प्राणी प्रतिकार करते हैं, प्रतिक्रिया करते हैं, परन्तु जितना उनका सामथ्र्य है, वे उतने ही सफल हो सकते हैं। अधिकांश में मनुष्य अपने बल से उनको अपने वश में करने का प्रयास करता है और सफल रहता है।

मनुष्य का मनुष्य के साथ इस प्रकार व्यवहार करना संभव नहीं होता। मनुष्य अज्ञानी, दुर्बल, निर्धन भी हो सकता है, इसके विपरीत ज्ञानवान्, सबल और साधन सम्पन्न भी हो सकता है। इस कारण मनुष्यों का परस्पर व्यवहार किसी एक प्रकार का या एक नियम से होने वाला नहीं होता। जो मनुष्य दुर्बल या निर्धन है, उसे अपने साधनों से मनुष्य अपने अनुकूल करने का प्रयास करता है, परन्तु जो कुछ समझ सकते हैं, उनको वश में करने के लिए ये उपाय निरर्थक हो जाते हैं। ज्ञानवान् व्यक्ति को अपने अनुकूल बनाने के लिए मनुष्य दो उपाय काम में लाता है। यदि वह किसी का अपने लिए उपयोग करना चाहता है अपने स्वार्थ के लिए उन्हें काम में लेना चाहता है तो वह उनको बहकाता है, भडक़ाता है और अपना स्वार्थ सिद्ध करता है।

इन सबसे अलग भी एक उपाय मनुष्य अपनाता है, जिनसे वह दूसरे मनुष्यों को अपने अनुकूल बनाता है। यह परिस्थिति मनुष्य की सबसे ऊँची स्थिति होती है, जब वह अपनी बुद्धि और अपने ज्ञान से दूसरे को अपने साथ चलने के लिए सहमत कर लेता है। इसमें किसी का स्वार्थ नहीं होता। इस प्रकार सबका हित सबका लाभ मुख्य उद्देश्य होता है।

यह उपाय सबसे उत्तम होने के साथ-साथ सबसे कठिन भी है। जहाँ जड़ वस्तु मनुष्य की इच्छा के विरुद्ध नहीं चल सकती, पशु-पक्षी उसके बल से उसके बन्धन में पड़े रह सकते हैं, परन्तु मनुष्य ज्ञानवान् या साधन सम्पन्न होकर दूसरे मनुष्य के विरुद्ध चला जाता है। इसलिए एक कम बुद्धि और कम सामथ्र्य वाले व्यक्ति को अपने आधीन रखने का प्रयास करता है। वह यह प्रयास भी करता है कि उसके आधीन काम करने वाला उससे कम बना रहे। इसी भावना ने समाज में कुछ वर्गों को कमजोर बनाकर रखा है।

आज समाज में स्त्री और शूद्रों की स्थिति इसी भावना का परिणाम है। जो लोग सबको ज्ञान का अधिकारी नहीं मानते वे दूसरे पक्ष के ज्ञानवान् होने से डरते हैं। क्योंकि जो मनुष्य शिक्षित, समर्थ और स्वावालम्बी होता है, ऐसे मनुष्य को आधीन बनाकर रखना संभव नहीं है। अत: समाज के समर्थ लोगों ने स्त्री और शूद्र कहकर कमजोर लोगों को कमजोर बनाये रखने की व्यवस्था की और अपनी इच्छा को धर्म, समाज और शासन का नाम देकर कमजोर वर्ग को मानने, स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। आज जितने एक तरफा बन्धन हंै, उन पर लादे गये हैं। जैसे पर्दा, अशिक्षा, स्वतन्त्रता का अभाव। पिछले दिनों अफगानिस्तान में महिलाओं को शिक्षा से वञ्चित कर बुर्के मेें रहने के लिए बाध्य किया गया, कोई अंग बाहर दिखने पर उसे काट दिया गया। यह नृशंसता धर्म, सिद्धान्त और समाजिक व्यवस्था के नाम पर की गई, जो दूसरे पक्ष की अज्ञानता और दुर्बलता के कारण संभव है।

इसके विपरीत मनुष्य मनुष्य होने के नाते समान अधिकार और कत्र्तव्य का उत्तरदायी है। इस आदर्श को वैदिक-धर्म स्वीकार करता है। वेद मनुष्यों को पारस्परिक व्यवहार और सम्बन्ध समानता के आधार पर स्थापित करने का उपदेश देता है। वैदिक-धर्म ने सभी मनुष्यों को शिक्षा का अधिकार दिया है तथा समानता से कत्र्तव्य पालन करने की भी प्रेरणा की है। आचार्य शिष्य को अपने समान बनाने की इच्छा रखता है, पति-पत्नी परस्पर एक दूसरे को समान मानने की प्रतिज्ञा करते हैं। विवाह संस्कार की यह विधि ध्यान देने योग्य है-

मम व्रते ते हृदयं दधामि मम चित्तमनुचित्तं तेऽस्तु।

मम वाचमेकमना जुषस्व प्रजापतिस्त्वा नियुनक्तु मह्यम्।

विवाह संस्कार में वर-वधू एक-दूसरे के हृदय पर हाथ रखकर प्रतिज्ञा करते हैं, हम परस्पर एक दूसरे के व्रतों, कार्यों कत्र्तव्यों का बोध करेंगे, उनके पालन में सहयोगी बनेंगे, ऐसा करने के लिए परस्पर संवाद बनाकर रखेंगे, एक दूसरे की बात को ध्यान से सुनेंगे, गम्भीरता से लेंगे, इसके पालन में प्रभु से सहायता की याचना करेंगे।

यही मन्त्र उपनयन-वेदारम्भ संस्कार में आचार्य शिष्य को कहते हैं।

यहां किसी को बलपूर्वक अपनी बात मनवाने का प्रयास नहीं है, अपितु बात के औचित्य को समझकर उस बात को स्वीकार करने और सहमत होने का प्रयास है। इसके लिए दोनों पक्षों को समझदार और शिष्ट होना आवश्यक है।

समानता के अधिकार को वैदिक-धर्म कहाँ तक स्वीकार करता है, उसके लिए विवाह संस्कार का सप्तपदी प्रकरण ध्यान  देने योग्य है, सप्तपदी की सात प्रतिज्ञाओं में अन्तिम और सप्तम प्रतिज्ञा है-

सरखे सप्तपदी भव….।

हम गृहस्थ जीवन में सखा=मित्र बनकर रहेंगे। किसी को भी ‘‘मैं बड़ा हँू’’ यह कहना नहीं पड़ेगा। अत: दोनों एक दूसरे को अपने से बड़ा मानने की पहल करेंगे। ऐसा तभी संभव होगा, जब दोनों शिक्षित हों और दोनों समझदार हों। इस समझदारी की पराकाष्ठा में वैदिक नारी कहती है-मेरे पुत्र शत्रु पर विजय पाने वाले हैं। मेरी पुत्री भी उन्हीं के समान तेजस्विनी है। वह किसी का भी मुकाबला करने में समर्थ है। पति उसका प्रशंसक है-

मम पुत्रा: शत्रुहणोऽथो में दुहिता विराट्।

उताहमस्मि संजया पत्यौ में श्लोक उत्तम:।।

-धर्मवीर

विधिहीन यज्ञ और उनका फल: – स्वामी मुनीश्वरानन्द सरस्वती त्रिवेदतीर्थ

स्वामी मुनीश्वरानन्द सरस्वती त्रिवेदतीर्थ आर्यसमाज के शीर्ष विद्वान् रहे हैं। आपके द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘विधिहीन यज्ञ और उनका फल’ यज्ञ सम्बन्धी कुरीतियों पर एक सशक्त प्रहार है। इसी पुस्तक का कुछ अंश यहाँ पाठकों के अवलोकनार्थ प्रकाशित है।           -सम्पादक

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज की मान्यता है कि श्री कृष्ण जी एक आप्त पुरुष थे। यज्ञ के विषय में इस आप्त पुरुष का कहना है कि-

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्,

श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।।

-गीता १७/१३

१. विधिहीनं यज्ञं तामसं परिचक्षते।

२. असृष्टान्नं यज्ञं तामसं परिचक्षते।

३. मन्त्रहीनं यज्ञं तामसं परिचक्षते।

४. अदक्षिणं यज्ञं तामसं परिचक्षते।

५. श्रद्धा विरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।

इन पाँच प्रकार के दोषों में से किसी एक, दो, तीन, चार या पाँचों दोषों से युक्त यज्ञ तामसी कहा जाता है। तामसी कर्म अज्ञानमूलक होने से परिणाम में बुद्धिभेदजनक तथा पारस्परिक राग, द्वेष, कलह, क्लेशादि अनेक बुराइयों का कारण होता है।

प्रस्तुत लेख में हम ‘विधिहीनं यज्ञं तामसं परिचक्षते।’ इस एक विषय पर स्वसामथ्र्यानुसार कुछ विचार प्रस्तुत कर रहे हैं।

१. श्री कृष्ण जी का कहना है कि विधिहीन यज्ञ तामसी होता है। विधि के अनुसार सबसे प्रथम स्थान यजमान का है। जो ‘यष्टुमिच्छति’ यज्ञ करना चाहता है। यज्ञ का सम्पूर्ण संभार तथा व्यय यजमानकर्तृक होता है। अग्नि यजमान की, अग्निशाला (यज्ञशाला) यजमान की, हविद्र्रव्य यजमान का। ऋत्विज् यजमान के। उनका मधुपर्कादि से सत्कार करना तथा उनकी उत्तम भोजन व्यवस्था यजमान कत्र्तृक। उनका शास्त्रानुसार दक्षिणा द्रव्य यजमान का। इतनी व्यवस्था के साथ अग्न्याधान से पूर्णाहुति तक का पूरा अनुष्ठान ऋत्विजों की देखरेख में यजमान करता है। यजमान इस सामथ्र्य से युक्त होना चाहिये। अपरं च पूर्णाहुति के बाद उपस्थित जनता से पूर्णाहुति के नाम से तीन-तीन आहुतियाँ डलवाना पूर्णरूपेण नादानी और अज्ञानता है। इसका विधि से कोई सम्बन्ध न होने से यह भी एक विधिविरुद्ध कर्म है, जिसे साहसपूर्वक बन्द कर देना चाहिए। इस आडम्बर से युक्त यज्ञ भी तामसी होता है। क्या आर्यसमाज संगठन के यजमान तथा ऋत्विक् कर्म कराने वाले विद्वान् इस व्यवस्था तथा यजमान सम्बन्धी इस विधि-विधान के अनुसार यज्ञ करते-कराते हैं। जब पकडक़र लाया हुआ यजमान तथा विधिज्ञान शून्य ऋत्विक् इन बातों को छूते तक नहीं तो केवल विधिविरुद्ध आहुति के प्रकार ‘ओम् स्वाहा’ के लिए ही मात्र आग्रह करना कौनसी बुद्धिमत्ता है। इस उपेक्षित वृत्त को देखकर यही कहा जायेगा कि ऋत्विक् कर्मकत्र्ता सभी विद्वान् इन विधिहीन यज्ञों के माध्यम से केवल दक्षिणा द्रव्य प्राप्त कर अपने आप को धन्य मानते हैं तथा यजमान अपने आप को पूर्णकाम समझता है, विधिपूर्वक अनुष्ठान की दृष्टि से नहीं।

ऐसे यजमान और ऋत्विक् सम्बन्धी-ब्राह्मण में महाराज जनमेजय के नाम से एक उपाख्यान में कहा गया है कि-

‘अथ ह तं व्येव कर्षन्ते यथा ह वा इदं निषादा वा सेलगा वा पापकृतो वा वित्तवन्तं पुरुषमरण्ये गृहीत्वा कर्त (गर्त) मन्वस्य वित्तमादाय द्रवन्ति, एवमेव त ऋत्विजो यजमानं कत्र्तमन्वस्य वित्तमादाय द्रवन्ति यमनेवं विदोयाजयन्ति। अनेवं विदो अभिषेक प्रकारं (अनुष्ठान प्रकारं वा) अजानन्त ऋत्विजोयं क्षत्रियं (यजमान वा) याजयन्ति। तं क्षत्रियं (यजमानं वा) विकर्षन्त्येव विकृष्टमपकृष्टं कुर्वन्त्येव। तत्रेदं निदर्शनमुच्यते।’ – ए.ब्रा. ३७/७

सायण भाष्य:- निषादा नीचजातयो मनुष्या:। सेलगाश्चौरा:। इडाऽन्नं तया सह वत्र्तन्त इति सेडा।

धनिकास्तान् धनापहारार्थं गच्छन्तीति सेलगाश्चौरा:। पाप कृतो हिंसा कारिण:। त्रिविधा: दुष्टा: पुरुषा वित्तवन्तं बहुधनोपेतं पुरुषमरण्यमध्ये गृहीत्वा कत्र्तमन्वस्य कश्मिेश्चिदन्ध कूपादि रूपे गत्र्तेतं प्रक्षिप्य तदीयं धनमपहृत्य द्रवन्ति पलायन्ते। एवमेवानभिज्ञा ऋत्विजो यजमानं नरक रूपं कत्र्तमन्वस्य नरकहेतो दुरनुष्ठानेऽवस्थाप्य दक्षिणारूपेण तदीयं द्रव्यमपहृत्य स्वगृहेषु गच्छन्ति। अनेन निदर्शनेन ऋत्विजामनुष्ठान परिज्ञानाभावं निन्दति।

डॉ. सुधाकर मालवीय कृत हिन्दी अनुवाद:- इस प्रकार (अभिषेक प्रकार को या अनुष्ठान प्रकार को न जानने वाले ऋत्विज् जिस क्षत्रिय के लिए या जिस यजमान के लिए यजन करते हैं, तो वे उस क्षत्रिय वा यजमान का अपकर्ष भी करते हैं, जिस प्रकार नीच जाति के ये निषाद, चोर और (हिंसा करने वाले शिकारी आदि) पापी पुरुष बहुधन से युक्त पुरुष को अरण्य के मध्य पकडक़र (किसी अन्ध कूपादि) गड्ढे में फेंककर उसके धन का अपहरण करके पलायित हो जाते हैं, उसी प्रकार ये अनुष्ठान प्रकार से अनभिज्ञ ऋत्विज् लोग यजमान को नरकरूप (विधिहीन) अनुष्ठान में स्थापित करके दक्षिणारूपी उसके धन का अपहरण करके अपने घर चले जाते हैं।

आर्यसमाज के क्षेत्र में अनुष्ठीयमान यज्ञों में यह पहले प्रकार का विधिहीनता-रूपी दोष सर्वत्र रहता है। इस प्रकार हमारे ये यज्ञ तामसी कोटि के हो जाते हैं। हमारे ये पारायण-यज्ञ जहाँ से चलकर आर्यसमाज में आए हैं, वहाँ पूर्ण रीति से इनका विधि-विधान लिखा हुआ है। हमारे विद्वान् उसे देखना या उधर के तज्ज्ञ विद्वानों से सम्पर्क करना भी उचित नहीं समझते। हमारी स्थिति तो सन्त सुन्दरदास के कथनानुसार-

पढ़े के न बैठ्यो पास अक्षर बताय देतो,

बिनहु पढ़े ते कहो कैसे आवे पारसी।

इस पद्यांश जैसी है। संस्कार विधि यद्यपि हिन्दी भाषा में है, पर फिर भी इसे समझना आसान काम नहीं है। गुरुचरणों में बैठ, पढक़र ही समझा जा सकता है। हमारा पुरोहित समुदाय ऐसा करना आवश्यक नहीं समझता तो फिर विधिपूर्वक अनुष्ठान कैसे हो सकते हैं और कैसे कर्मकाण्ड में एकरूपता आ सकती है।

ये वेद पारायण-यज्ञ (संहिता स्वाहाकार होम) जहाँ से हमने लिए हैं, वहाँ इनके अनुष्ठान के लिए विधिविधान का उल्लेख करते हुए अपने समय के ब्राह्मण, आरण्यक, श्रौत और गृह्य सूत्रों के उद्भट विद्वान् स्वर्गीय श्री पं. अण्णा शास्त्री वारे (नासिक) अपने ग्रन्थ ‘संहिता स्वाहाकार प्रयोग प्रदीप’ में लिखते हैं कि-

‘तत्र कात्यायनप्रणीतशुक्लयजुर्विधान सूत्रं, सर्वानुक्रमणिकां च अनुसृत्य संहितास्वाहाकार होमे प्रतिऋग्यजुर्मन्त्रे आदौ प्रणव: अन्ते स्वाहाकारश्च। मध्ये यथाम्नायं मन्त्र:। प्रणवस्य स्वाहाकारस्य च पृथक् विधानात् मन्त्रेण सह सन्ध्याभाव:। मन्त्र मध्ये स्वाहाकारे सति तत्रैवाहुति: पश्चान्मन्त्र समाप्ति:। न पुनर्मन्त्रान्ते स्वाहोच्चारणमाहुतिश्च।।  – पृ. २४०

अर्थ:- संहिता स्वाहाकार होम विषय में कात्यायन प्रणीत शुक्ल यजुर्विधान सूत्र और सर्वानुक्रमणिका का अनुसरण करते हुए संहिता स्वाहाकार होम में प्रत्येक ऋग्यजुर्मन्त्र के आदि में प्रणव (ओम्) तथा अन्त में स्वाहाकार, मध्य में संहिता में पढ़े अनुसार मन्त्र। मन्त्र और स्वाहाकार के पृथक् विधान होने से इनकी मन्त्र के साथ सन्धि नहीं होती। मन्त्र के बीच में स्वाहाकार आने पर वहीं आहुति देकर पश्चात् मन्त्र समाप्त करना चाहिए। फिर से मन्त्र के अन्त में स्वाहाकार का उच्चारण कर आहुति नहीं देनी चाहिये।

प्रणव और स्वाहाकार का मन्त्र से पृथक् विधान होने से मन्त्रान्त में ओम् स्वाहा उच्चारण कर आहुति देना नहीं बनता। कात्यायन भिन्न अन्य सभी ऋषि-महर्षियों का भी ऐसा ही मत है। उदाहरणस्वरूप प्रस्तुत प्रमाण का अवलोकन कीजिए-

सर्व प्रायश्चित्तानि जुहुयात्

स्वाहाकारान्तैर्मन्त्रैर्न चेत् मन्त्रे पठित:।

– आश्वलायन श्रौतसूत्र १/११/१०

आयु को निश्चित मानना वेद विरुद्ध है: -ब्र. वेदव्रत मीमांसक

परोपकारी मासिक, वर्ष २४, अङ्क ११, आश्विन २०३१ वि. में श्री पं. फूलचन्द शर्मा निडर भिवानी वालों का ‘आयु को निश्चित न मानने वालों से कुछ प्रश्र’ शीर्षक एक लेख छपा है। उसमें उन्होंने आयु निश्चित सिद्ध करने का प्रयत्न किया है।

आर्य विद्वानों में आयु निश्चित है अथवा अनिश्चित। इस विषय में मतभेद है। एक वर्ग वाले मानते हैं कि आयु निश्चित है और दूसरे वर्ग वाले कहते हैं कि अनिश्चित है। इस विषय में दो-बार शास्त्रार्थ हुआ। दूसरी बार का शास्त्रार्थ ‘दयानन्द सन्देश’ वर्ष २, अङ्क ९, १० के विशेषाङ्क के रूप में प्रकाशित हुआ, जिसको देखने से दोनों पक्ष वालों के मूलभूत विचार स्पष्ट होते हैं।

किसी बात को सिद्ध करने के लिए प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन नामक पञ्च अवयवों की आवश्यकता होती है। इन्हीं को प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द और प्रमाण कहा जाता है। किसी वस्तु की सिद्धि में हेतु प्रमुख होता है। हेतु के प्रबल होने से पक्ष सिद्ध होता है। हेतु के न होने से अथवा हेत्वाभास से पक्ष सिद्ध नहीं होता। हेतुओं और हेत्वाभासों पर न्यायशास्त्र में अतिसूक्ष्मता से विचार किया गया है। प्रमाणों के द्वारा वस्तु की परीक्षा करना न्याय कहलाता है। महर्षि वात्स्यायन ने न्याय १/१/१ पर लिखा है ‘‘प्रत्यक्षागमाश्रितमनुमानं सा अन्वीक्षा। प्रत्यक्षागमाभ्यामीक्षितस्यान्वीक्षणमन्वीक्षा तथा प्रवर्तत इत्यान्वीक्षिकी न्यायविद्या न्यायशास्त्रम्। यत्पुनरनुमानं प्रत्यक्षागमविरुद्धं न्यायाभास: स इति।’’ प्रत्यक्ष और आगम पर आश्रित अनुमान को अन्वीक्षा क हते हैं। प्रत्यक्ष और आगम के द्वारा ईक्षित का पश्चात् ईक्षण अन्वीक्षा है। उसको लेकर जो प्रवृत्त हो, उसको आन्वीक्षिकी, न्यायविद्या, न्यायशास्त्र कहते हैं। जो अनुमान प्रत्यक्ष तथा आगम के विरुद्ध हो, वह न्याय नहीं अपितु न्यायाभास है।

श्री निडर जी आयु के विषय में सत्यासत्य का निर्णय नहीं करना चाहते, क्योंकि वे कहते हैं ‘‘मैं तो न्यायशास्त्र नहीं जानता। न्यायशास्त्र के बिना ही मैं आयु को निश्चित सिद्ध कर दूँगा।’’ भला जो व्यक्ति प्रतिज्ञा को नहीं जानता, हेतु क ो नहीं जानता, हेत्वाभास को नहीं जानता, उदाहरण को नहीं जानता, उपनय और निगमन को नहीं जानता, छल, जाति, निग्रह स्थान को नहीं जानता, वह सत्यासत्य का निर्णय कैसे कर सकता है?

आर्यसमाज सोनीपत का उत्सव हो रहा था। निडर जी के ज्येष्ठ पुत्र मन्त्री थे। मञ्च पर मैं था और निडर जी भी थे। मुझे देखकर आपने मञ्च से यह घोषणा की-ब्रह्मचारी जी उपस्थित हैं। उत्सव भी चल रहा है। आयु विषय पर शास्त्रार्थ हो जाए तो अच्छा रहे। मैंने उसी समय उसको स्वीकार कर लिया, किन्तु आर्यसमाज के अधिकारियों ने शास्त्रार्थ का आयोजन नहीं किया। मैं अब भी निडर जी से अथवा और किसी भी अन्य विद्वान् से इस विषय पर वाद करने को उद्यत हँू। न्यायशास्त्र अनुमोदित प्रक्रिया के अनुसार शास्त्रार्थ हो। यदि न्यायशास्त्र के विरुद्ध कोई वाद करना चाहे तो सत्यासत्य का निर्णय नहीं हो सकता।

यदि निडर जी जब कभी इस विषय पर लेख लिखें, न्यायानुसार ही लिखें तो विद्वानों में मान्य हो, किन्तु उनके लेख में प्रत्यक्षागम विरुद्ध अनुमान होता है।

आयु के निश्चित न होने में अनेक प्रमाण हैं, उन सबको लिखने की, आवश्यकता नहीं है। उनमें से स्थालीपुलाक न्याय से कुछ प्रस्तुत किय जाते हैं-

१. त्र्यायुषं जमदग्रे: कश्यपस्य त्र्यायुषं यद्देवेषु त्र्यायुषं तन्नो अस्तु त्र्यायुषम् (यजु. ३५/१५)

भावार्थ-ये परमेश्वरेण व्यवस्थापितां धर्मानोल्लङ्घन्ते अन्यायेन परपदार्थान् न स्वीकुर्वन्ति ते अरोगा: सन्त: शतं वर्षाणि जीवितुं शक्रुवन्ति नेतरे ईश्वराज्ञा भङ्क्तार:। ये पूर्णेन ब्रह्मचर्येण विद्या अधीत्य धर्ममाचरन्ति तान् मृत्युर्मध्येनाऽप्रोतीति।

भाषार्थ-जो लोग परमेश्वर के नियम का कि धर्म का आचरण करना और अधर्म का आचरण छोडऩा चाहिए- उल्लङ्घन नहीं करते, अन्याय से दूसरों के पदार्थों को नहीं लेते, वे नीरोग हो कर सौ वर्ष तक जी सकते हैं, ईश्वराज्ञा विरोधी नहीं। पूर्ण ब्रह्मचर्य से विद्या पढ़ कर धर्म का आचरण करते हैं, उनको मृत्यु मध्य में प्राप्त नहीं होती।

२. ‘‘अग्र आयूंषि पवस आसुवोर्जमिषंचन:। आरे बाधस्वदुच्छुनाम्’’ (यजु. ३५/१५)

भावार्थ-ये मनुष्या: दुष्टाचरणदुष्टसङ्गौ विहाय परमेश्वराप्तयो: सेवां कुर्वन्ति ते धनधान्य युक्ता: सन्तो दीर्घायुषो भवन्ति।

भाषार्थ-जो मनुष्य दुष्टाचरण दुष्ट सङ्ग छोड़ परमेश्वर और आप्तों की सेवा करते हैं, वे धन-धान्य से युक्त हो दीर्घायु को प्राप्त करते हैं।

३. ‘‘परं मृत्यो अनुपरे कि पन्थां यस्ते अन्य इतरो देवयानात् चक्षुष्मते शृण्वते ते ब्रवीमि मा न: प्रजां रीरिषो मोत वीरान्’’ (यजु. २५/७)

भावार्थ-मनुष्यैर्यावज्जीवनं तावद्विद्वन्मार्गेण गत्वा परमायुर्लब्धव्यम् कदाचित् विना ब्रह्मचर्येण स्वयंवरं कृत्वा अल्पायुषी: प्रजा नोत्पादनीया।

भाषार्थ-मनुष्यों को चाहिए कि जीवनपर्यन्त विद्वानों के मार्ग से चलकर उत्तम अवस्था को प्राप्त हों और ब्रह्मचर्य पर्यन्त बिना स्वयंवर विवाह करके कभी न्यून अवस्था की प्रजा सन्तानों को न उत्पन्न करे।

४. ‘‘भद्रं कर्णेभि: शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्ष-भिर्यजत्रा: स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवां सस्तनुभिव्र्यशेमहि देवहितं यदायु:’’  -(यजु. २५/२१)

भावार्थ-यदि मनुष्या: विद्वत्सङ्गे विद्वांसो भूत्वा सत्यंशृणुयु: सत्यं पश्येयु: जगदीश्वरं स्तुयुस्तर्हि ते दीर्घायुष: भवेयु:।

भाषार्थ-जो मनुष्य विद्वानों के सङ्ग में विद्वान् होकर सत्य सुनें, सत्य देखें और जगदीश्वर की स्तुति करें तो वे बहुत अवस्थावाले हों।

५. ‘‘अतिमैथुनेन ये वीर्यक्षयं कुर्वन्ति तर्हि ते सरोगा: निर्बुद्धयो भूत्वा दीर्घायुष: कदापि न भवन्ति’’

अतिमैथुन करके जो वीर्य का नाश करते हैं, वे रोगयुक्त निर्बुद्धि हो दीर्घायुवाले कभी नहीं होते। (यजु. २५/२२ ऋ.द.भाष्य)

६. ‘‘यथा रशनया बद्धा प्राणिन: इतस्तत: पलायितुं न शक्नुवन्ति तथा युक्त्या धृतमायुरकाले न क्षीयते न पलायते।’’

जैसे डोर से बन्धे हुए प्राणी इधर-उधर भाग नहीं सकते, वैसे युक्ति से धारण की हुई आयु अकाल में नहीं जाती। (यजु. २२/२ ऋ. द. भाष्य)

७. मनुष्या: आलस्यं विहाय सर्वस्य द्रष्टारं न्यायाधीशं परमात्मानं कत्र्तुमर्हा तदाज्ञा च मत्वा शुभानि कर्माणि कुर्वन्तो अशुभानि त्यजन्तो ब्रह्मचर्येण विद्यासुशिक्षे प्राप्योपस्थेन्द्रयनिग्रहेण वीर्यमुन्नीयाल्पमृत्यं ध्रन्तु। युक्ताहारविहारेण शतवार्षिकमायु प्राप्नुवन्तु। यथा मनुष्या: सुकर्मसु चेष्टन्ते तथा तथा पापकर्मतो बुद्धिर्निवर्तते। विद्या आयु: सुशीलता च वर्धन्ते।

मनुष्य आलस्य को छोड़ कर सब देखनेहारे न्यायाधीश परमात्मा और करने योग्य उसकी आज्ञा को मानकर शुभ कर्मों को करते हुए और अशुभ कर्मों को छोड़ते हुए ब्रह्मचर्य के सेवन से विद्या और अच्छी शिक्षा को पाकर उपस्थेन्द्रिय के रोकने से पराक्रम को बढ़ाकर अल्पायु को हटावें। युक्ताहार विहार से सौ वर्ष क ी आयु को प्राप्त होवें। जैसे-जैसे मनुष्य सुकर्मों में चेष्टा करते हैं, वैसे-वैसे ही पापकर्म से बुद्धि की निवृत्ति होती, विद्या आयु और सुशीलता बढ़ती है। यजु. ४०/२

८. अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन:। चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम् ।। मनु. २/१२१।।

जो सदा नम्र, सुशील, विद्वान् और वृद्धों की सेवा करता है, उसके आयु, विद्या, कीर्ति और बल ये चार सदा बढ़ते हैं और जो ऐसा नहीं करते उनके आयु आदि नहीं बढ़ते।

९. दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दित:। दु:खभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च।। मनु.

जो दुष्टाचारी पुरुष होता है, वह सर्वत्र व्याधित अल्पायु होता है।

१०. आचाराल्लभते ह्यायु:।। मनु.

धर्माचरण ही से दीर्घायु प्राप्त होती है।

११. हितोपचारमूलं जीवितमतो विपर्ययो हि मृत्यु:। चरक, वि. १-४१।।

जीवन हितकारी चिकित्सा पर है। इसके विरुद्ध चिकित्सा ठीक न होने पर मृत्यु होती है।

१२. द्विविधा तु खलु भिषजो भवन्ति अग्रिवेश। प्राणानां हि एके अभिसरा: हन्तारो रोगाणाम्। रोगाणां हि एके अभिसरो हन्तार: प्राणानामिति ।। चरक।।

हे अग्निवेश, दो प्रकार के वैद्य होते हैं, एक तो प्राणों को प्राप्त कराने वाले और रोगों को मारने वाले और दूसरे वे जो रोगों के लाने वाले और प्राणों को नष्ट करने वाले।

१३. अनशनं आयुह्र्रासकराणाम्।। चरक।।

आयु के ह्रास करनेवाले अनेक कारणों में से अनशन-भोजन न करना सब से प्रबल कारण है।

१४. ब्रह्मचर्यमायुष्याणाम्।। चरक।।

आयु के बढ़ाने वाले अनेक साधनों में से ब्रह्मचर्य सर्वोकृष्ट साधन है।

१५. जिसमें उपकारी प्राणियों की हिंसा अर्थात् जैसे एक गाय के दूध, घी, बैल, गाय आदि उत्पन्न होने से एक पीढ़ी में ४७५६०० मनुष्यों को सुख पहुँचता है, वैसे पशुओं को न तो मारें न मरने दें।

इन स्पष्ट प्रमाणों के लिखने के पश्चात् इनकी व्याख्या की आवश्यता नहीं। निडर जी वा अन्य आयु को निश्चत मानने वाले इन प्रमाणों को छूना ही नहीं चाहते। अतिविस्तृत वैदिक साहित्य में इन प्रमाणों के विरुद्ध आयु को निश्चित मानने वाला एक भी प्रमाण नहीं। आयु को निश्चित माननेवाले इन प्रमाणों के विरुद्ध युक्ति का आश्रय लेते हैं।

आयु को निश्चित माननेवाले ‘‘सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगा:’’ (योग. २-१३) इस एक मात्र सूत्र को उपस्थित करते हैं, किन्तु आयु को निश्चित बतलाने वाला इसमें एक शब्द भी नहीं। आयु और आयु की इयत्ता दोनों भिन्न-भिन्न हैं। आयु से जीवनकाल मात्र अभिप्रेत होता है, इयत्ता नहीं। आयु शब्द का अर्थ इयत्तापरक मानना अप्रामाणिक है।

मनुष्य की आयु को पहले कोई भी निश्चित नहीं कर सकता-यह एक उदाहरण से स्पष्ट हो जायेगा। मिट्टी के एक घड़े को लीजिए। उसकी आयु कोई नहीं बतला सकता, न ही कोई जान सकता है कि कितने काल तक सुरक्षित रहेगा और कब टूट-फूट जायेगा? निश्चितवादी यह कहते हैं कि मिट्टी के घड़़े में और शरीर में समानता नहीं है, किन्तु सूक्ष्मता से देखें तो समानता दिखती है। (पूर्व पक्ष के अनुसार जैसे मनुष्य की आयु निश्चित होती है, वैसे घड़े की भी निश्चित ही है। उनके पक्ष में यह दृष्टान्त ही नहीं बनेगा।) वास्तव में शरीर में मिट्टी के घड़े में कोई अन्तर नहीं। यदि कुछ अन्तर है तो यही है कि जीव शरीर के भीतर रहकर शरीर का प्रयोग करता है। शरीर का एवं घड़े का प्रयोग चेतन ही करता है। पूर्व पक्षानुसार घड़ा और शरीर दोनों भाग साधन हैं, इसीलिए दृष्टान्त विषम नहीं है। शरीर की आयु क्षण-क्षण में परिवर्तित होती है। यदि संयम से नीरोग रहता है तो शरीर दीर्घकाल तक रहने योग्य बनता है। असंयम से रोगी बनता रहता है तो शरीर की शक्ति क्षीण होती है। शरीर में दीर्घकाल तक रहने का सामथ्र्य न्यून होता जाता है। इस रूप में आयु घटती है। पौष्टिक आहार से आयु बढ़ती है, नीरस आहार से आयु घटती है। राग, द्वेष, ईष्र्या, चिन्ता, भय, शोक आदि से आयु घटती है तो आनन्द, उत्साह, मैत्री, निश्चिन्तता, धैर्य आदि से आयु बढ़ती है। इसका अपलाप नहीं किया जा सकता। जीव कर्म करने में स्वतन्त्र होने से उसके कर्मानुसार क्षण-क्षण में उसकी आयु परिवर्तित होती रहती है। यह कहना अयुक्त है कि परमात्मा पहले ही निश्चित आयु देता है।

निडर जी ने लिखा है कि ‘‘महर्षि दयानन्द से भी अधिक कोई ब्रह्मचारी हुआ क्या? तो आदित्य ब्रह्मचर्य के अनुसार उनकी चार सौ वर्ष की आयु क्यों न हुई? वे उन्सठ वर्ष की आयु में ही क्यों चले गए।’’

इससे प्रतीत होता है कि निडर जी अपने पक्ष के व्यामोह के कारण से सत्यासत्य के जानने में असमर्थ हैं। क्या निडर जी यह सिद्ध कर सकते हैं कि महर्षि दयानन्द सरस्वती को ५९ वर्ष ही जीवित रहना था? उनके अनुसार स्वामी दयानन्द जी की आयु निश्चित करते समय विषदाता को भी निश्चित किया होगा और समय पर विष देने के लिए भेजा भी होगा। स्वामी श्रद्धानन्द जी की आयु निश्चित करते समय मुसलमान के हाथ से गोली खाकर मरना भी निश्चित किया होगा। पं. लेखराम जी की आयु निश्चित की होगी। हत्यारे को भी निश्चित किया होगा। परमात्मा ने भारतवालों के लिए यह लिखा होगा कि अंग्रेजों के द्वारा पद दलित होकर नाना दु:खों को भोगते रहेंगे।

निडर जी ने वेदों में विद्यमान प्रार्थनाओं को झूठा लिख दिया है। वास्तव में निडर जी का यह लेख साहसमात्र है। यदि ऐसे व्यक्ति वेद पर लेखनी उठावें तो वेद के साथ अनर्थ के अतिरिक्त कुछ नहीं होगा। क्या परमात्मा ने मनुष्यों के लिए जो आशीर्वाद दिया है, वा मनुष्यों को प्रार्थना का आदेश दिया है, यह सारा व्यर्थ है? निडर जी ने यह आक्षेप किया है कि ‘यदि ईश्वर किसी की प्रार्थना या अशीर्वाद को सुनने लगे तो ईश्वर का कोई भी न्याय या व्यवस्था नहीं चल सकती।’

इससे प्रतीत होता है कि प्रार्थना का अर्थ निडर जी ने समझा ही नहीं। परमात्मा ने प्रार्थना कराने का आदेश दिया है, असम्भव के लिए नहीं। असम्भव की प्रार्थना का उपदेश करना अल्पज्ञ का काम है, सर्वज्ञ का नहीं।

निडर जी ने आयु को अनिश्चित मानना मूर्खता का काम लिखा है। यदि निडर जी निष्पक्ष होकर विचार करें तो ज्ञात हो जायेगा कि उनकी मान्यता वेद-विरुद्ध, वैदिक-साहित्य के विरुद्ध है। आश्चर्य इस बात का है कि वे अपनी मान्यता को सत्य मानते हैं, वेदानुकूल मानते हैं, जबकि उनकी विचारने की शैली अदार्शनिक है। न्याय विरुद्ध है। परमात्मा उनको दार्शनिक प्रक्रिया से विचारने की शक्ति दे।

 

पर्यावरण की समस्या – उसका वैदिक समाधान: डॉ धर्मवीर

जब मनुष्य को जैसी आवश्यकता होती है, जैसी इच्छा करता है। यदि उसकी वह इच्छा पूरी हो जाती है तो सुख अनुभव करता है, इच्छा के पूरा होने में बाधाएँ आती हैं तो दु:ख अनुभव करता है, इसलिए आवश्यकता, इच्छा और समाधान के क्रम में सन्तुलन बना रहना चाहिए। सन्तुलन बनाये रखना प्राकृतिक नियम है। प्रकृति अपने स्वाभाविक क्रम में सन्तुलन की प्रक्रिया को निरन्तर जारी रखती है। वर्षा का जल भूमि पर गिरकर तथा अन्य तत्त्वों के साथ मिलकर अशुद्ध होता है। मनुष्यों, पशुओं, प्राणियों के द्वारा उपयोग में लिया जाकर उत्सर्जित पदार्थों के संयोग से मलिनता को प्राप्त होता है और बहकर नाली, नाले, नदी बनकर समुद्र में मिल जाता है या तालाबों में एकत्रित हो जाता है। प्रकृति इस अशुद्ध जल को वाष्पित करके पुन: शुद्ध कर देती है। मनुष्य शुद्ध तत्त्व जलवायु, पृथ्वी, अग्नि, आकाश के माध्यम से प्राप्त करता है, परिणामस्वरूप मनुष्यों से प्राप्त अशुद्धता को प्रकृति अपने नियम से शुद्ध कर देती है। इस प्रकार मनुष्य जो प्रकृति से प्राप्त करता है, वह उसका शुद्ध रूप होता है तथा जो प्रकृति को देता है, उसमें विकृति होती है। विकृति की मात्रा जब प्राकृतिक नियम से दूर होना कठिन हो, तब समस्या का जन्म होता है। प्रकृति में विषमता की मात्रा अधिक होने पर वर्षा का जल भी दूषित होने लगता है। इसी प्रकार वायु, भूमि और ध्वनि से प्रदूषण बढक़र प्रकृति के सन्तुलन को बिगाड़ देता है, परिणामस्वरूप मनुष्यों व अन्य प्राणियों के लिए प्रकृति से उन्हें आवश्यक तत्त्व प्राप्त नहीं हो पाते, इस अभाव की स्थिति को हम पर्यावरण प्रदूषण कहते हैं।

प्रश्न उठता है कि प्रकृति में असन्तुलन क्यों उत्पन्न हुआ? दो कारण हो सकते हैं- प्रथम प्रकृति की क्षमता का घट जाना, दूसरा मनुष्यों द्वारा प्रकृति की क्षमता से अधिक का उपयोग करना। इसमें प्रथम कारण सम्भव नहीं, क्योंकि प्रकृति अपनी पूर्ण क्षमता के साथ हमारे सामने हैं। प्राणियों द्वारा विशेषकर मनुष्यों द्वारा प्रयोग में लाये जाने पर प्राकृतिक तत्त्वों की न्यूनाधिकता हम अनुभव करते हैं, इसलिए प्रकृति से सामंजस्य बैठाने के लिए प्रकृति को कुछ नहीं करना, जो कुछ करना है मनुष्य को ही करना है। ऐसी स्थिति में प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने वालों की संख्या अधिक होगी तो आवश्यक तत्त्व अधिक मात्रा में अपेक्षित हैं। उन्हें कैसे पूरा किया जाए? उनकी पूर्ति के लिए एक तरीका तो यह है कि उपभोक्ताओं की संख्या कम की जाए। यह मानवीय पक्ष नहीं हो सकता है, फिर इसका निर्णय कौन करेगा कि इस संसार में जीवित रहने का अधिकार किसे है और किसे नहीं, तो प्रकृति के अनुसार योग्यतम की विजय का सिद्धान्त स्वीकार करने पर मनुष्य और पशु में कोई अन्तर नहीं रहेगा, इसलिए मनुष्यता का पक्ष है कि जो प्राप्त है, उसका सम्यक् विभाजन और प्रदूषण पर अंकुश। यही पर्यावरण की समस्या का सम्भव समाधान है।

पर्यावरण की समस्या पहले विचार में उत्पन्न होती है, पश्चात् व्यवहार में, इस कारण मनुष्य का प्रकृति से सम्बन्ध आदिकाल से चला आ रहा है और यथार्थ है, इस कारण अन्य बातों के विचार के साथ प्रकृति से उसके सम्बन्धों पर भी उसने विचार किया हो, यह स्वाभाविक है। जिस प्रकार आज की परिस्थितियों ने मनुष्य को सोचने के लिए बाध्य किया है, उसी प्रकार पहले भी कोई प्रसंग आया हो, जब मनुष्य को इस दिशा में सोचने की आवश्यकता अनुभव हुई हो। पुराना चिन्तन पुरातन साहित्य में सुलभ है। भारतीय साहित्य की विशाल सम्पदा आज भी हमें प्राप्त है। उस अनुभव से आज हम अपने ज्ञान को समृद्ध करते हैं। पर्यावरण के विषय में यत्र-तत्र विचार बिखरे मिलते हैं। उन विचारों को लेकर यदा-कदा समाचार पत्रों में लेख भी प्रकाशित होते हैं। इस प्रकार यदि इन विचारों को संग्रह कर व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया जा सके तो आज की इस ज्वलन्त समस्या के समाधान में निश्चित सहायता मिल सकती है।

भारतीय चिन्तक और पाश्चात्य चिन्तन परम्परा में मौलिक अन्तर है। पाश्चात्य चिन्तन पहले लाभ के अवसरों का पूर्ण दोहन करने में विश्वास करता है, फिर उत्पन्न समस्या के समाधान का उपाय खोजता है। जैसे लाभ प्राप्त करना ध्येय होने से कुछ लोग ही उससे सम्पन्न होंगे, परन्तु  उसके दुष्प्रभाव और हानियाँ अधिक होंगी और अधिक लोगों को प्रभावित करेंगी, उसका समाधान बड़े स्तर पर अधिक व्यय-साध्य होता है। इसके विपरीत प्राचीन भारतीय मनीषी आवश्यकता के लिए स्वीकार करने और समाज की आवश्यकता के लिए उत्पादन करने को महत्त्व देते थे, इससे विभाजन और वितरण विके्रन्द्रित होता है, अत: सभी लोग समस्या के समाधान में सहभागी हो सकते हैं। पर्यावरण की समस्या के समाधान में भी सबकी सहभागिता आवश्यक है। इस बात को पुष्ट और प्रमाणित कर समाज को उत्तरदायित्व से अवगत कराना इस कार्य का उद्देश्य है। पर्यावरण की समस्या से परिचित व्यक्ति अपने स्तर पर भी समाधान में योगदान कर सकता है। उसे अपने प्राचीन साहित्य के तथ्य, उसका ध्यान इस ओर आकर्षित करने और उद्देश्य की ओर प्रेषित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं, क्योंकि इस देश की जनता में प्राचीन मर्यादा की स्थापना करने वाले पुरुषों ने पाप-पुण्य, धर्माधर्म के नाम से समाज में जो प्रथाएँ प्रचलित की हैं, उनके मूल में इस प्रकार की समस्याओं का समाधान निहित है।

विष्णु धर्मसूत्र में लिखा है कि जो व्यक्ति इस जन्म में जितने वृक्ष लगाता है, वे उसे परलोक में सन्तान के रूप में मिलते हैं-

वृक्षा रोपयितुर्वृक्षा: परलोके पुत्रा: भवन्ति

वराह पुराण में लिखा है- वृक्ष लगाने वाला नरक में नहीं जाता-

अश्वत्थमेकं पियुमन्दमेकं

न्यग्रोधमेकं दश पुष्प जाती:।

द्वे द्वे तथा दाडिम मातुलुंगे

पंचाम्र रोपी नरकं न याति।।