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HADEES : POSTURE DURING PRAYER

POSTURE DURING PRAYER

Muslim prayer is not carried on in one tranquil posture, sitting or standing; it is accompanied by many bodily movements.  These have been codified on the basis of the practice and precepts of Muhammad.  There are many ahAdIs on the subject.  One narrator saw Muhammad �raising his hands opposite the shoulders at the time of beginning the prayer and before bowing down and after coming back to the erect position after bowing, but he did not raise them between two prostrations� (758).  Another saw his �hands lifted opposite to ears.� He also saw that the Prophet �then wrapped his hands in his cloth and placed his right hand over his left hand.  And when he was about to bow down, he brought out his hands from the cloth, and then lifted them. . . . And when prostrated, he prostrated between the two palms� (792).

Muhammad was commanded by Allah that �he should prostrate on the seven bones and he was forbidden to fold back the hair and clothing.� The seven bones are: �The hands, the knees, and the extremities of the feet and the forehead� (991).  But he asked his followers to �observe moderation in prostration� and not to stretch out [their] forearms on the ground like a dog� (997).

Originally the practice had been to put one�s hands together, palm to palm, and then to put them between one�s thighs.  But later on this practice was abrogated and the followers were �commanded to place them [hands] on the knees� (1086-1092).

Another precaution: �People should avoid lifting their eyes towards the sky while supplicating in prayer, otherwise their eyes would be snatched away� (863).

author : ram swarup

वे दिल जले

वे दिल जले

बीसवीं शताज़्दी के पहले दशक की बात है। अद्वितीय शास्त्रार्थमहारथी पण्डित श्री गणपतिजी शर्मा की पत्नी का निधन हो गया। तब वे आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब के उपदेशक थे। आपकी पत्नी के निधन को अभी एक ही सप्ताह बीता था कि आप कुरुक्षेत्र के मेला सूर्याग्रहण पर वैदिक धर्म के प्रचारार्थ पहुँच गये। सभी को यह देखकर बड़ा अचज़्भा हुआ कि यह विद्वान् भी

कितना मनोबल व धर्मबल रखता है। इसकी कैसी अनूठी लगन है। उस मेले पर ईसाई मिशन व अन्य भी कई मिशनों के प्रचारशिविर लगे थे, परन्तु तत्कालीन पत्रों में मेले का जो वृज़ान्त छपा

उसमें आर्यसमाज के प्रचार-शिविर की बड़ी प्रशंसा थी। प्रयाग के अंग्रेजी पत्र पायनीयर में एक विदेशी ने लिखा था कि आर्यसमाज का प्रचार-शिविर लोगों के लिए विशेष आकर्षण रखता था और आर्यों को वहाँ विशेष सफलता प्राप्त हुई।

आर्यसमाज के प्रभाव व सफलता का मुज़्य कारण ऐसे गुणी विद्वानों का धर्मानुराग व वेद के ऊँचे सिद्धान्त ही तो थे।

HADEES : BLESSINGS FOR MUHAMMAD

BLESSINGS FOR MUHAMMAD

When men hear the mu�azzin, they should repeat what he says and invoke blessings on Muhammad.  They should �beg from Allah al-WasIla for me, which is a rank in Paradise fitting for only one of Allah�s servants.  If any one who asks that I be given the WasIla, he will be assured of my intercession,� says Muhammad (747).

In a variation on this theme, if a man who hears a caller responds by testifying that he is �satisfied with Allah as my Lord, with Muhammad as Messenger, and with Islam as dIn [religion] his sins would be forgiven� (749).

In seeking blessings for himself, Muhammad does not forget his wives and progeny.  �Apostle of Allah, how should we bless you?� Muhammad is asked.  He replies: �O Allah! bless Muhammad, and his wives and his offspring. . . . He who blesses me once, Allah would bless him ten times� (807. 808).

author : ram swarup

हदीस : शारीरिक व्यापार

शारीरिक व्यापार

अब मुहम्मद हमें शौच-गृह ले चलते हैं। वे अपने अनुयायियों को मलमूत्र विसर्जन के समय ”किबला (यानी मक्का की मस्जिद) की तरह मुंह करने से मना करते हैं। साथ ही दाहिने हाथ से सफाई करने का या पत्थर के तीन टुकड़ों से कम इस्तेमाल करने“ का भी निषेध है (504)।

 

मलत्याग के बाद ”विषम बार“ सफाई जरूरी है और ”गोबर या हड्डी“ से सफाई नहीं करनी चाहिए (460)। इसकी बाबत एक किस्सा है। मुहम्मद ने एक बार एक रात जिन्नों के साथ गुजारी। वे उन्हें कुरान सुनाते रहे। जब जिन्नों ने उनसे अपने आहार के बारे में पूछा, तो मुहम्मद ने उन्हें बतलाया-”वह हर हड्डी जिसे अल्लाह का नाम सुनाया गया है, तुम्हारे लिए है। जैसे ही वह तुम्हारे हाथ लगेगी, उस पर गोश्त चढ़ जाएगा। और ऊंटों का गोबर तुम्हारे जानवरों का चारा है।“ इसीलिए उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा-”इन चीजों से इस्तिन्जा मत करो, क्योंकि ये तुम्हारे भाइयों का आहार है“ (903)।

 

उन्होंने अपने अनुयायियों से यह भी कहा है-”जब तुममें से कोई शौचगृह में प्रविष्ट हो, तो उसे अपने लिंग को दाहिने हाथ से नहीं छूना चाहिए“ (512)।

 

आयशा हमें बतलाती हैं कि ”अल्लाह के रसूल को हर काम दाहिनी तरफ से शुरू करना प्रिय था, मसलन जूते पहनने में, कंघा करने में, और प्रक्षालन में“ (515)।

author : ram swarup

मेरे साथ बहुत लोग थे

मेरे साथ बहुत लोग थे

पन्द्रह-सोलह वर्ष पुरानी बात है। अजमेर में ऋषि-मेले के अवसर पर मैंने पूज्य स्वामी सर्वानन्दजी से कहा कि आप बहुत वृद्ध हो गये हैं। गाड़ियों, बसों में बड़ी भीड़ होती है। धक्के-पर-धक्के पड़ते हैं। कोई चढ़ने-उतरने नहीं देता। आप अकेले यात्रा मत किया करें।

स्वामीजी महाराज ने कहा-‘‘मैं अकेला यात्रा नहीं करता।  मेरे साथ कोई-न-कोई होता है।’’

मैंने कहा-‘‘मठ से कोई आपके साथ आया? यहाँ तो मठ का कोई ब्रह्मचारी दीख नहीं रहा।’’

स्वामीजी ने कहा-‘‘मेरे साथ गाड़ी में बहुत लोग थे। मैं अकेला नहीं था।’’

यह उज़र पाकर मैं बहुत हँसा। आगे ज़्या कहता? बसों में, गाड़ियों में भीड़ तो होती ही है। मेरा भाव तो यही था कि धक्कमपेल में दुबला-पतला शरीर कहीं गिर गया तो समाज को बड़ा अपयश मिलेगा। मैं यह घटना देश भर में सुनाता चला आ रहा हूँ।

जब लोग अपनी लीडरी की धौंस जमाने के लिए व मौत के भय से सरकार से अंगरक्षक मांगते थे। आत्मा की अमरता की दुहाई देनेवाले जब अंगरक्षकों की छाया में बाहर निकलते थे तब यह संन्यासी सर्वव्यापक प्रभु को अंगरक्षक मानकर सर्वत्र विचरता था। इसे उग्रवादियों से भय नहीं लगता था। आतंकवाद के उस काल में यही एक महात्मा था जो निर्भय होकर विचरण करता

था। स्वामीजी का ईश्वर विश्वास सबके लिए एक आदर्श है। मृत्युञ्जय हम और किसे कहेंगे? स्वामी श्रद्धानन्दजी महाराज ‘अपने अंग-संग सर्वरक्षक प्रभु पर अटल विश्वास’ की बात अपने

उपदेशों में बहुत कहा करते थे। स्वामी श्रद्धानन्दजी महाराज के उस कथन को जीवन में उतारनेवाले स्वामी सर्वानन्दजी भी धन्य थे। प्रभु हमें ऐसी श्रद्धा दें।

 

HADEES : ATTACKS ON NON-MUSLIMS

ATTACKS ON NON-MUSLIMS

AzAn became a great indicator.  Where it was heard, it meant that everything was not kufr (infidelity).  �The Messenger of Allah used to attack the enemy when it was dawn.  He would listen to the AzAn; so if he heard an AzAn, he stopped� (745).  This the commentator finds greatly virtuous in Muhammad.  �The greatest contribution made by the Holy Prophet in the sphere of warfare is that he elevated it from – the surface of reckless murder or slaughter to the level of humanized struggle for the uprooting of evil in society.  The Holy Prophet, therefore, did not allow his Companions to take the enemy unawares under the cover of darkness of night� (note 600).

author : ram swarup