कुरान समीक्षा : गैर मुस्लिमों से जिहाद का हुक्म

गैर मुस्लिमों से जिहाद का हुक्म

क्या इससे साबित नहीं है कि कुरान फिसाद फैलाने वाली पुस्तक है? दुनियां में लडाई झगड़े कराना ही क्या कुरान का उद्देश्य नहीं था जिसमें ऐसी-ऐसी फिसादी आयतें हदी हुई हैं।

देखिये कुरान में कहा गया है कि-

या अय्युहन्नबिय्यु जाहिदिल्………….।।

(कुरान मजीद पारा २८ सूरा तह्रीम रूकू २ आयत ९)

ऐ पैगम्बर काफिरों और मुनाफिकों से जिहाद कर और उन पर सख्ती कर, उनका ठिकाना तो नरक है और वह बुरी जगह है।

समीक्षा

संसार को किसी मजहबी किताब में अपने से भिन्न विचारधारा रखने वालों से लड़ने उन पर जुल्म करने का उपदेश नहीं मिलेगा बल्कि सभी के साथ प्रेम शान्ति से रहने के उपदेश मिलेंगे।

किन्तु दूसरों पर जुल्म करने की जहरीली आज्ञायें केवल कुरान में मिलेंगी। कुरान विश्व शान्ति का खुला शत्रु है इस आयत से साफ जाहिर है।

कुरान समीक्षा : कसमें तोड़ डालने का आदेश

कसमें तोड़ डालने का आदेश

लोगों अर्थात् मुसलमानों को झूठ बोलना झूठी कस्में खाने को उत्साह, प्रोत्साहन देना, आदि का हुक्म देकर खुदा ने इस्लाम को दुनियां में बदनाम क्यों किया है। यदि लोग मुसलमानों का विश्वास न करें उन्हें झूठा लगे तो वे गलत क्यों होंगे?

देखिये कुरान में कहा गया है कि-

कद् फ-र-जल्लाहु लकुम् तहिल्ल…….।।

(कुरान मजीद पारा २८ सूरा तह्रीम रूकू १ आयत २)

तुम लोगों के लिए खुदा ने तुम्हारी कसमों को तोड़ डालने का हुक्म दे रखा है और अल्लाह ही तुम्हारा मददगार और हिकमत वाला है।

समीक्षा

मुसलमानों को अमल कुरान के अनुसार रहता है सभी को यह समझ लेना चाहिए और कस्मों पर विश्वास करके धोखा नहीं खाना चाहिए। ऊपर की आयत से स्पष्ट है कि अरबी खुदा-कुरान और मुसलमान सहसा विश्वास योग्य नहीं है कसमें वायदों को तोड़ डालना इस्लामी सभ्यता का नमूना है।

सब मिल के नारी-नर करो उच्चार ओउम् का |

सब मिल के नारी-नर करो उच्चार ओउम् का |
आकाश , सूर्य , चन्द्र में , उडूगन में ओउम् है |
जल में, पवन में , दामिनी में , घन में ओउम् है |
गिरी , कन्दरा में , वाटिका में , वन में ओउम् है |
लोचन में ओउम्, तन में ओउम्, मन में ओउम् है |
व्यापक है अखिल विश्व में विस्तार ओउम् का |
सब मिल के नारी-नर करो उच्चार ओउम् का | १ |
ध्रुव ने बड़े ही प्रेम से इस नाम को ध्याया |
प्रहलाद ने इसी से अमित नेह लगाया |
क्रोधित हो असुर ने उसे बहु भाँति सताया |
भय , अग्नि व पर्वत से गिराने का दिखाया |
त्यागा न किन्तु भक्त ने आधार ओउम् का |
सब मिल के नारी-नर करो उच्चार ओउम् का | २ |
इस नाम के प्रताप दयानंद हुए सबल |
वैदिक विवेक सत्य के सांचे में गए ढल |

“नव वर्ष” : शिवदेव आर्य, गुरुकुल पौन्धा

सृष्टि विवेचनम्
यहाँ पर्व मनाने की परम्परा में नववर्ष का पर्व विशेष महत्व रखता है, क्योंकि सृष्टि की उत्पत्ति चैत्र मास शुक्ला प्रतिपदा को स्वीकार की जाती है। किसी कवि ने कहा है कि-

चैत्रे मासि जगद् ब्रह्म ससर्ज प्रथमेऽहनि।
शुक्लपक्षे समग्रे तु सदा सूर्योदये सति।।

सृष्टि किसे कहते हैं इस विषय में स्वामी दयानन्द सरस्वती जी महाराज आर्योद्देश्यरत्नमाला में कहते हैं कि- ‘जो कर्ता की रचना से कारण द्रव्य किसी संयोग विशेष से अनेक प्रकार कार्यरूप होकर वर्तमान में व्यवहार करने योग्य होती है, वह सृष्टि कहाती है।’ इसी बात को स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश में कहते हैं कि ‘सृष्टि उसको कहते हैं जो पृथक्द्रव्यों को ज्ञान, युक्तिपूर्वक मेल होकर नानारूप बनना।’
हम सभी इस सिध्दान्त से अवगत हैं कि किसी भी वस्तु का निर्माणकर्ता अवश्य होता है। निर्माणकर्ता पहले होता है और निर्मितवस्तु पश्चात् होती है। परमेश्वर सृष्टिकर्ता है और उसने जीवों के कल्याण के लिए यह सृष्टि बनायी। सृष्टि के सृजन से पूर्व मूल प्रकृति सत्व-रज-तम की साम्यावस्था में होती है।
सत्यार्थप्रकाश में स्वामी दयानन्द सरस्वती जी कहते हैं कि – अनादि नित्य स्वरूप सत्व, रजस् और तमो गुण की एकावस्था रूप प्रकृति से उत्पन्न जो परम सूक्ष्म पृथक्-पृथक् तत्वायव विद्यमान हैं, उन्हीं का प्रथम ही जो संयोग का प्रारम्भ है, संयोग विशेषों से अवस्थान्तर दूसरी इसकी अवस्था को सूक्ष से स्थूल, स्थूल से बनते बनाते विविधरूप बनी है, इसी से संसर्ग होने से सृष्टि कहाती है।

इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न।
यो अस्याध्यक्ष: परमे व्योमन्त्सो अंग वेद यदि वा न वेदग॥

[ ऋग्वेद १०-१२९-७ ]

इस ऋग्वेदीय मन्त्र के आधार पर कहा गया है कि जिस परमेश्वर के द्वारा रचने से जो नाना प्रकार का जगत् उत्पन्न हुआ है,वही इस जगत् का धारणकर्ता, संहर्ता व स्वामी है।

अद्भ्यः सम्भृतः पृथिव्यैरसाच्च विश्वकर्मणः समवत्रताग्रे।
अस्य त्वष्टा विदधद्रपमेति तन्मत्र्यस्य देवत्वमाजानमग्रे॥

[ यजु ३१-१७ ]

तेन पुरुषेण पृथिव्यै पृथिव्युत्त्पत्यर्थमद्भ्यो रसः सं भृतः संगृह्य तेन पृथिवी रचिता। एवमग्निरसेनाग्नेः सकाशादाप उत्पादिताः। अग्निश्च वायोः सकाशाद्वायुराकाशादुत्पादित आकाशः प्रकृतेः प्रकृतिः स्वसामथ्र्याच्च। विश्वं सर्वं कर्म क्रियमाणमस्य स विश्वकर्मा, तस्य परमेश्वरस्य सामर्थ्यमध्ये कारणाख्येग्रे सृष्टेः प्राग्जगत् समवत्र्तत वत्र्तमानमासीत्। तदानीं सर्वमिदं जगद् कारणभूतमेव नेदृशमिति। तस्य सामर्थ्यस्यांशान् गृहीत्वा त्वष्टा रचनकत्र्तेदं सकलं जगद्विदधत्।

[ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, सृष्टिविद्याविषयः ]

अर्थात् परमपिता परमेश्वर ने पृथिवी की उत्पति के लिए जल से सारांश रस को ग्रहण करके, पृथिवी और अग्नि के परमाणुओं को मिला के पृथिवी रची है। इसी प्रकार अग्नि के परमाणु के साथ जल के परमाणुओं को मिलाकर जल को रचा एवं वायु के परमाणुओं के साथ अग्नि के परमाणुओं से वायु रचा है। वैसे ही अपने सामर्थ्य से आकाश को भी रचा है, जो कि सब तत्वों के ठहरने का स्थान है। इस प्रकार परमपिता परमेश्वर ने सूर्य से लेकर पृथ्वी पर्यन्त सम्पूर्ण जगत् को रचा है।

सृष्टि उत्पत्ति विषय को अंगीकार कर  ऋग्वेद में इसका निरुपण इसप्रकार किया गया है कि –

ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत।
ततो रात्र्यजायत ततः समुद्र्रो अणवः।।
समुद्रार्दणवादधि संवत्सरो अजायत।
अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी।।

अर्थात् प्रदीप्त आत्मिक तप के तेज से ऋत और सत्य नामक सार्वकालिक और सार्वभौमिक नियमों का प्रथम प्रादुर्भाव हुआ। तत्पश्चात् प्रलय की रात्रि हो गई। किन्हीं भाष्यकार के मत से यहां रात्रि शब्द अहोरात्र का उपलक्षण है और वे उस से प्रलय का ग्रहण न करके इसी कल्प की आदि सृष्टि के ऋतुओं सत्य के अनन्तर अहोरात्र का अविर्भाव मानते हैं। फिर मूलप्रकृति में विकृति होकर  उसके अन्तरिक्षस्थ समुद्र के प्रकट होने (उसके क्षुब्ध होने) के पश्चात् विश्व के वशीकर्ता विश्वेश्वर ने अहोरात्रों को करते हुए संवत्सर को जन्म दिया। इससे ज्ञात होता है कि – आदि सृष्टि में प्रथम सूर्योदय के समय भी संवत्सर और अहोरात्रों की कल्पना पर ब्रह्म के अनन्त ज्ञान में विद्यमान थी। उनके जन्म देने का यहां यहीं अभिप्राय प्रतीत होता है कि वेदोपदेश द्वारा इस संवत्सरारम्भ और उसके मन कल्पना का ज्ञान सर्वप्रथम मन्त्र द्रष्टा ऋषियों को हुआ वा यों कहिये कि – प्रत्येक सृष्टिकल्प के आदि में यथा निमय होता है और उन्होंने यह जान लिया कि – इतने अहोरात्रों के पश्चात् आज के दिन नवसंवत्सर के आरम्भ का नियम है और उसी के अनुसार प्रतिवर्ष संवत्सरारम्भ होकर वर्ष, मास और अहोरात्र की कालगणना संसार में प्रचलित हुई।
भारतीय संवत् के मासों के नाम आकाशीय नक्षत्रों के उदयास्त से सम्बन्ध रखते है। यही बात तिथि अंश (दिनांक) के सम्बन्ध में भी है। वे भी सूर्य-चन्द्र की गति पर आश्रित हैं। विक्रम-संवत्  अपने अंग-उपागों के साथ र्पूणतः वैज्ञानिक सत्य पर स्थित है। विक्रम-संवत् विक्रमादित्य के बाद से प्रचलित हुआ। विक्रम-संवत् सूर्य सिध्दान्त पर आधारित है। वेद-वेदांगमर्मज्ञों  के अनुसार सूर्य सिध्दान्त का मान ही सदैव भ्रमहीन एवं सर्वश्रेष्ठ है। सृष्टि संवत् के प्रारम्भ से लेकर आज तक की गणनाएं की जाएं तो सूर्य-सिध्दान्त के अनुसार एक भी दिवस का अन्तर नहीं होगा। सौर मंडल को ग्रहों, नक्षत्रों आदि की गति एवं स्थिति पर हमारे दिन, महीने और वर्ष पर आधारित हैं।
स्वामी दयानन्द सरस्वती जी सत्यार्थप्रकाश के अष्टम समुल्लास में कहते हैं कि-‘आदि सृष्टि मैथुनी नहीं होती, क्योंकि जब स्त्री पुरुष के शरीर परमात्मा बनाकर उनमें जीवों का संयोग कर देता है, तदनन्तर मैथुनी सृष्टि चलती है।’
सृष्टि और प्रलय को शास्त्रों में ब्रह्मदिन-ब्रह्मरात्री के नाम से जाना जाता है, ये दिन-रात के समान निरन्तर अनादि काल से चले आ रहे हैं। सृष्टि और प्रलय का समय बराबर माना है, इसमें कोई विवाद नहीं है। इसी प्रक्रिया को स्वामी जी कुछ इसप्रकार परिभाषित करते हैं कि – जैसे दिन के पूर्व रात और रात के पूर्व दिन, तथा दिन के पीछे रात और रात के पीछे दिन बराबर चला आता है, इसी प्रकार सृष्टि के पूर्व प्रलय और प्रलय के पूर्व  सृष्टि तथा सृष्टि के पीछे प्रलय और प्रलय के आगे सृष्टि अनादि काल से चक्र चला आता है। इसकी आदि वा अन्त नहीं, किन्तु जैसे दिन वा रात का आरम्भ और अन्त देखने में आता है, उसी प्रकार सृष्टि और प्रलय का आदि अन्त होता रहता है। क्योंकि जैसे परमात्मा, जीव, जगत् का कारण तीन स्वरूप से अनादि हैं, जैसे जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और वर्तमान प्रवाह से अनादि हैं, जैसे नदी का प्रवाह वैसा ही दीखता है, कभी सूख जाता है, कभी नहीं दीखता फिर बरसात में दीखता और उष्ण काल में नहीं दीखता ,ऐसे व्यवहारों को प्रवाहरूप जानना चाहिए, जैसे परमेश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव अनादि हैं, वैसे ही उसके जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय करना भी अनादि है जैसे कभी ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव का आरम्भ और अन्त नहीं इसी प्रकार उसके कर्तव्य कर्मों का भी आरम्भ और अन्त नहीं।
सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय यह अनवरत चलने वाला चक्र है। ऋषिवर देव दयानन्द जी ऋग्वेदादिभाष्याभूमिका के वेदोत्पत्ति विषय में लिखते हैं कि-
सृष्टि के वर्तमान होने का नाम दिन और प्रलय होने का नाम रात्रि है। यह जो वर्तमान ब्राह्मदिन है इसके (१९६०८५२९७६) एक अर्ब, छानवे करोड़, आठ लाख, बावन हजार, नव सौ, छहत्तर वर्ष इस सृष्टि की तथा वेदों की उत्पत्ति में व्यतीत हुए हैं और (२३३३२२७०२४) दो अर्ब तैंतीस करोड़, बत्तीस लाख, सत्ताइस हजार, चैबीस वर्ष इस सृष्टि को भोग करने के बाकी रहे हैं। इन में से अन्त का यह चैबीसवां वर्ष भोग रहा है। आगे आने वाले भोग के वर्षों में से एक-एक कांटाते जाना और गत वर्षों में क्रम से एक वर्ष मिलाते जाना चाहिए, जैसे आज पर्यन्त कांटाते बढ़ाते आए हैं।’
[ वेदोत्पत्ति विषय, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ]

ऋषि का अनुसरण करते हुए वर्तमान विक्रमी सम्वत् २०७४ को हम इस प्रकार से देखें-
१ सृष्टि = १४ मन्वन्तर
१ मन्वन्तर = ७१ चतुर्युग
१ चतुर्युग =  सतयुग (१७,२८,०००)
त्रेतायुग (१२,९६,०००)
द्वापरयुग (८,६४,०००)
कलियुग (४,३२,०००)
कुलयोग = ४३,२०,०००
७१ चतुर्युग (४३,२०,००० × ७१) = ३०,६७,२०,००० वर्ष
१४ मन्वन्तर (३०,६७,२०,००० × १४) = ४,२९,४०,८०,००० वर्ष

(१४ मन्वन्तर – स्वायम्भुव, स्वारोचिष, औत्तमि, तामस, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सावर्णि, दक्षसावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, धर्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, देवसावर्णि तथा इन्द्रसावर्णि)

कुल सृष्टि की आयु    = ४,२९,४०,८०,००० वर्ष
सृष्टि की वर्तमान आयु = १,९६,०८,५३,११८ वर्ष
इस प्रकार वर्तमान सृष्टि की आयु कुल आयु से कांटाने पर  सृष्टि की आयु  २,३३,३२,२६,८८२ अभी शेष रहती है। यह वैवस्वत् नामक सातवाएं मन्वन्तर वर्तमान में चल रहा है।    अनेक आचार्य १४ मन्वन्तरों की १५ सन्धिकाल के अवधि की गणना पृथक् करते हैं जिसके आधार पर वर्तमान सृष्टिसंवत् १,९६,०८,५३,११८ में ७ सन्धिकाल की आयु (७ × १७,२८,०००) १,२०,९६,००० मिलाकर १,९७,२९,४९,११८ सृष्टिसंवत् स्वीकारते हैं।
प्रत्येक संवत्सर अर्थात् वर्ष को २ अयन (उत्तरायण एवं दक्षाणायन), ६ ऋतु (वसन्त, गीष्म, वर्षा, शरद्, शिशिर, हेमन्त), १२ मास (चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन), २ पक्ष (शुक्ल एवं कृष्ण), ७ दिवस (रविवार, चन्द्रवार या सोमवार, भौमवार या मंगलवार, बुधवार, बृहस्पतिवार या गुरुवार, शुक्रवार, शनिवार), १ अहोरात्र (दिन) अर्थात् ८ प्रहर में विभक्त किया गया।
परमपिता परमेश्वर ने सृष्टि का निर्माण व इसको नियमित रूप से चलाये रखा है। उस परमेश्वर को जानने वाले हम लोग होवें। इसीलिए वेद हमें बार-बार उपदेश देता है कि-

हिरण्यगर्भ: समवर्त्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत्।
स दधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।।

[ ऋग्वेद १०/१२९/१ ]
अर्थात् हिरण्यगर्भ जो परमेश्वर है, वही एक सृष्टि के पहिले वर्तमान था, जो इस सब जगत् का स्वामी है और वहीं पृथिवी से लेके सूर्यपर्यन्त सब जगत् को रच के धारण कर रहा है। इसलिए उसी सुखस्वरूप परमेश्वर देव की ही हम लोग उपासना करें, अन्य की नहीं।

सभी सहृदय पाठकों को भारतीय नववर्ष विक्रमी संवत् २०७४ एवं सृष्टिसंवत् १,९६,०८,५३,११८ तथा होलिकोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं।

– शिवदेव आर्य
गुरुकुल-पौन्धा, देहरादून
मो—8810005096

चिंतन , मनन ही मन का कार्य

ओउम
चिंतन , मनन ही मन का कार्य
डा. अशोक आर्य
मानव का मन ही उसके सब क्रिया कलापों का आधार है | शुद्ध व पवित्र मन से सब कार्य उतम होते हैं तथा जिसका मन अशुद्ध होता है , जिसका मन अपवित्र होता है उसके कार्य भी अशुद्ध व अपवित्र ही होते हैं | मानव का मुख्य उद्देश्य भगवद प्राप्ति है , जो शुद्ध मन से ही संभव है | सब प्रकार के ज्ञान प्राप्ति का स्रोत भी शुद्ध मन ही होता है | मानव में विवेक की जाग्रति का आधार भी मन की शुद्धता ही होती है | यह शुद्ध मन ही होता है, जिससे शुद्ध कार्य होता है तथा उसके द्वारा किये जा रहे शुद्ध कार्यों के कारण उसकी मित्र मंडली में उतामोतम लोग जुड़ते चले जाते हैं | यह सब मित्र ही उसकी ख्याति , उसकी कीर्ति, उसके यश को सर्वत्र पहुँचाने का कारण होते हैं | अथर्ववेद के प्रस्तुत मन्त्र में इस विषय पर ही चर्चा की गयी है : –
मनसा सं कल्पयति , तद देवां अपि गच्छति |
अथो ह ब्राह्माणों वशाम, उप्प्रयान्ति याचितुम ||
मन से ही मनुष्य संकल्प करता है | वह माह देवों अर्ह्थात ज्ञानेन्द्रियों तक जाता है | इसलिए विद्वान लोग बुद्धि को माँगने के लिए देवों अर्थात गुरु के पास जाते हैं |
इस मन्त्र में बताया गया है कि मन का मुख्य कार्य मनन है , चिंतन है , सोच – विचार है | जब मानव अपना कार्य पूर्ण चिंतन से ,पूर्ण मनन से , पूर्ण रूपेण सोच. विचार कर करता है तो उसे सब प्रकार की सफलताएं, सब प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है | इन सुखों को पा कर मनुष्य की प्रसन्नता में वृद्धि होती है तथा उसकी आयु भी लम्बी होती है | यह मनन व चिंतन मन का केवल कार्य ही नहीं है अपितु मन का धर्म भी है | जब हम कहते हैं कि यह तो हमारा कार्य था जो हम ने किया किन्तु कार्य में मानव कई बार उदासीन होकर उसे छोड़ भी बैठता है | इसलिए मन्त्र कहता है कि यह मन का केवल कार्य ही नहीं धर्म भी है तो यह निश्चित हो जाता है कि धर्म होने के कारण मन के लिए अपनी प्रत्येक गति विधि को आरम्भ करने से पूर्व उस पर मनन चिंतन आवश्यक भी होता है |
मनन चिंतन पूर्वक जो भी कार्य किया जाता है , उसकी सफलता में कुछ भी संदेह नहीं रह जाता | मनन चिंतन से उस कार्य में जो भी नयुन्तायें दिखाई देती हैं , उन सब का निवारण कर, उन्हें दूर कर लिया जाता है | इस प्रकार सब गतिविधियों व सब तरह की व्यवस्थाओं को परिमार्जित कर उन्हें शीशे की भाँती साफ़ बना कर उससे जो भी कार्य लिया जाता है , उसकी सफलता में कुछ भी संदेह शेष नहीं रह पाता | परिणाम
स्वरूप प्रत्येक कार्य में सफलता निश्चित हो जाती है | अत: मन के प्रत्येक कार्य को करने से पूर्व उसके मनन व चिंतन रूपी धर्म का पालन आवश्य ही करना चाहिए अन्यथा इस की सफलता में , इस के सुचारू रूपेण पूर्ति में संदेह ही होता है |
मन के कार्यों को संचालन के लिए जब धर्म को स्वीकार कर लिया गया है तो यह भी निश्चित है कि इस के संचालन का भी तो कोई साधन होगा ही | इस विषय पर विचार करने से पता चलता है कि इसके संचालन के लिए ज्ञानेन्द्रियाँ ही प्रमुख भूमिका निभाती है | ज्ञानेन्द्रियों को मन का भोजन भी कहा जा सकता है | जब तक किसी कार्य को करने सम्बन्धी ज्ञान ही नहीं होगा तब तक उस कार्य की सम्पन्नता में, सफलता पूर्वक पूर्ति में संदेह ही बना रहेगा | जब तक मानव की क्षुधा ही शांत न होगी तब तक वह कोई भी कार्य करने को तैयार नहीं होता | अत: मन का भोजन ज्ञान है , जिसे पा कर ही वह उस कार्य को करने को अग्रसर होता है | इस लिए ज्ञानेन्द्रियों को मन का भोजन कहा है | इन ज्ञानेन्द्रियों से मन दो प्रकार का सहयोग प्राप्त करता है | प्रथम तो ज्ञानेन्द्रियों के सहयोग से मन वह सब सामग्री एकत्रित करता है , जो उस कार्य की सम्पन्नता में सहायक होती है दूसरा इस सामग्री को एकत्र करने के पश्चात प्रस्तुत सामग्री को किस प्रकार संगठित करना है , किस प्रकार जोड़ना है तथा किस प्रकार उस कार्य की सपन्नता के लिए उस सामग्री का प्रयोग करना है , यह सब कुछ भी उसे मन ही बताता है | अत: बिना सोच विचार , चिन्तन ,मन व मार्ग दर्शन के मन कुछ भी नहीं कर पाता, चाहे इस निमित उपयुक्त सामग्री उसने प्राप्त कर ली हो | अत: किसी भी कार्य को संपन्न करने के लिए साधन स्वरूप सामग्री का एकत्र करना तथा उस सामग्री को संगठित कर उस कार्य को पूर्ण करना ज्ञानेन्द्रियों का कार्य है | इस लिए ही मनको प्रत्येक कार्य का धर्म व ज्ञानेन्द्रियों को प्रत्येक कार्य को करने का साधन अथवा भोजन कहा गया है कहा गया है |
इस जगत में परमपिता परमात्मा ने अनेक प्रकार के फल ,फूल, नदियाँ नाले, जीव जंतु ,स्त्री पुरुष को बनाया है, पैदा किया है , उत्पन्न किया है | इन सब के सम्बन्ध में मन जो कुछ भी देखता व सुनता है, वह सब देखने व सुनने के पश्चात ज्ञानेन्द्रियों के पास जाता है | मन द्वारा कुछ भी निर्णय लेने के लिए जब यह सब सामग्री, सब द्रश्य बुद्धि को दे दिये जाते हैं तो बुद्धि सब को जांच , परख कर जो भी निर्णय लेती है, वह उस निर्णय से मन को अवगत करा देती है तथा आदेश भी देती है कि अब यह कार्य करणीय है | अब मन पुन: ज्ञानेन्द्रियों को अपने निर्णय से अवगत कराते हुए आदेश देता है कि प्रस्तुत कार्य की परख हो चुकी है | यह कार्य उतम है , करने योग्य है , इस को तत्काल सम्पन्नं किया जावे | इस आदेश के साथ मन ज्ञानेन्द्रियों को यह भी बताता है कि इस कार्य को किस रूप में संपन्न करना है ? इस प्रकार मन अपने प्रत्येक कार्य को संपन्न करने के लिए ज्ञानेन्द्रियों का सहयोग प्राप्त करता है तथा उनके सहयोग से ही सब कार्य संपन्न करता है | मन के संकल्प क्या हैं तथा उस कार्य के विकल्प क्या हैं यह सब ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा ही निर्धारित किये जाते हैं , प्रस्तुत किये जाते है | अत: ज्ञानेन्द्रियों के साह्योग से ही मन के सब कार्यों को व्यवस्थित कर उनकी दिशा निर्धारित की जाती है तथा इन के द्वारा ही उन्हें सम्पन्नं किया जाता है |
इस सब से जो बात स्पष्ट होती है वह यह है कि प्रत्येक कार्य को करने के लिए मन चुन कर उस पर ज्ञानेन्द्रियाँ मनन व चिन्तन कर अपने सुझावों के साथ मन को लौटा देती हैं | मन उस पर निर्णय लेकर उसे करने के अनुमोदन के साथ पुन: करने का आदेश देते हुए पुन: ज्ञानेन्द्रियों को लौटा देता है तथा ज्ञानेन्द्रियाँ उस आदेश का पालन करते हुए उस कार्य को संपन्न ती है | अत: कोई भी कार्य करने से पूर्व उस पर मनन चिन्तन सुचारू रूप से होता है तब ही वह उतम प्रकार से सफल हो पाता है |

डा.अशोक आर्य

मनु शूद्र अर्थात् दलित विरोधी नहीं थे – डॉ रामकृष्ण आर्य (वरुणमुनि वानप्रस्थी)

(ख) मनु शूद्र अर्थात् दलित विरोधी नहीं थे। विचार करें कि मनुस्मृति में शूद्रों की क्या स्थिति है ?

आजकल की दलित पिछड़ी और जनजाति कही जानेवाली जातियों को मनु ने शूद्र नहीं कहा है, अपितु जो पढ़ने-पढ़ाने का पूर्ण अवसर देने के बाद भी न पढ़ सके और केवल शारीरिक श्रम से ही समाज की सेवा करे, वह शूद्र है। (मनु0 1/90)।

मनु प्रत्येक मनुष्य को समान शिक्षाध्ययन करने का समान अवसर देते हैं। जो अज्ञान, अन्याय, अभाव में से किसी एक भी विद्या को सीख लेता है, वही मनु का द्विज अर्थात् विद्या का द्वितीय जन्मवाला है। परन्तु जो अवसर मिलने के बाद भी शिक्षा ग्रहण न कर सके, अर्थात् द्विज न बन सके वह एक जाति जन्म (मनुष्य जाति का जन्म) में रहनेवाला शूद्र है। दीक्षित होकर अपने वर्णों के निर्धारित कर्मों को जो नहीं करता, वह शूद्र हो जाता है, और शूद्र कभी भी शिक्षा ग्रहण कर ब्राह्मणादि के गुण, कर्म, योग्यता प्राप्त कर लेता है, वह ब्राह्मणादि का वर्ण प्राप्त कर लेता है। प्रत्येक व्यक्ति जन्म से शूद्र होता है। संस्कार में दीक्षित होकर ही द्विज बनता है (स्कन्दपुराण)। इस प्रकार मनुकृत शूद्रों की परिभाषा वर्तमान शूद्रों और दलितों पर लागू नहीं होती। (10/4, 65 आदि)।

(2) शूद्र अस्पृश्य नहीं-मनु ने शूद्रों के लिए उत्तम, उत्कृष्ट और शुचि जैसे विशेषणों का प्रयोग किया है, अतः मनु की दृष्टि में शूद्र अस्पृश्य नहीं है। (मनु0 9/335) शूद्रों को द्विजाति वर्णों के घरों पर भोजन आदि कार्य करने का निर्देश दिया है। (मनु0 1/91, 9/334-335)। शूद्र, अतिथि और भृत्य (शूद्र) को पहले भोजन कराया जाए। (मनु0 3/112, 116)। क्या आज के वर्णरहित समाज में शूद्र नौकर को पहले भोजन कराया जाता है ? इस प्रकार मनु शूद्र को निन्दित अथवा घृणित नहीं मानते थे।

(3) शूद्र को सम्मान व्यवस्था में छूट-मनु की सम्मान व्यवस्था में सम्मान गुण, योग्यता के अनुसार होकर विद्यमान अधिक सम्मानीय होता है। पर वृद्ध शूद्र को सर्व˗प्रथम सम्मान देने का निर्देश दिया गया है। (मनु0 2/111, 112, 130, 137)।

(4) शूद्र को धर्म पालन की स्वतन्त्रता – मनु ने शूद्रों को धार्मिक कार्य करने की पूरी स्वतन्त्रता दी है। (मनु0 10/126) इतना ही नहीं यह भी कहा है कि शूद्र से भी उत्तम धर्म को ग्रहण कर लेना चाहिए।

(5) दण्ड-व्यवस्था में शूद्र को सबसे कम दण्ड-मनु ने शूद्र को सबसे कम दण्ड, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण को उत्तरोत्तर अधिक दण्ड, परन्तु राजा को सबसे अधिक दण्ड देने का विधान किया है। (मनु0 8/337-338, 338, 347)।

(6) शूद्र दास नहीं-शूद्र दास, गुलाम अर्थात् बन्धुआ मजदूर नहीं है। सेवकों/भृत्यों को पूरा वेतन देने का आदेश दिया है और उनका अनावश्यक वेतन न काटा जाए, ऐसा निर्देश है। (7/125, 126, 8/216)।

(7) शूद्र सवर्ण हैं-मनु ने शूद्र सहित चारों वर्णों को सवर्ण माना है। चारों वर्णों से भिन्न असवर्ण हैं। (मनु0 10/4, 45) पर बाद का समाज शूद्र को असवर्ण कहने लग गया। उसी प्रकार मनु ने शिल्पी-कारीगर को वैश्य वर्ण में माना है, पर बाद में समाज इन्हें भी शूद्र कहने लगा (मनु0 3/64, 9/329, 10/99, 120)। इस प्रकार मनु की व्यवस्थाएँ न्यायपूर्ण हैं। उन्होंने न शूद्र और न किसी और के साथ अन्याय और पक्षपात किया है।

(8) मनु और डॉ0 बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर-आधुनिक संविधान निर्माता और राष्ट्र निर्माता तथा भूतपूर्व महामहिम राष्ट्रपति श्री वेंकटरमण के शब्दों में ’आधुनिक मनु‘ डॉ0 भीमराव अम्बेडकर द्वारा मनुस्मृति का विरोध और उसे दलितों पर अत्याचार कराने की जिम्मेवार तथा जात-पाँत व्यवस्था को जननी मानने का सवाल है। जन्मना जात-पाँत, ऊँच-नीच, छुआछूत जैसी कुप्रथाओं के कारण अपने जीवन में उन्होंने जिन उपेक्षाओं, असमानताओं यातनाओं और अन्यायों को भोगा था, उस स्थिति में कोई भी स्वाभिमानी शिक्षित वही करता जो उन्होंने किया। क्योंकि यह सत्य है कि उस समय तक मनुस्मृति का शोधपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन होकर उसमें समय-समय पर किये गये प्रक्षेपों पर कोई शोध कार्य नहीं हुआ था। जिससे उन्हें प्रक्षिप्त और मौलिक श्लोकों में भेद करने का कोई स्रोत नहीं मिला, फिर भी उन्होंने मनु द्वारा प्रतिपादित गुण-कर्म-योग्यता आधारित वर्ण व्यवस्था और महर्षि दयानन्द और अन्यों के द्वारा उसकी की गई व्याख्या की प्रशंसा की है।

(ग) क्या मनु नारी जाति के विरोधी थे ? मनुस्मृति के स्वयं के प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि मनु नारी जाति के विरोधी नहीं थे। कतिपय प्रमाण प्रस्तुत हैं-जिस परिवार में नारियों का सत्कार होता है, वहाँ देवता-दिव्य गुण, दिव्य सन्तान आदि प्राप्त होते हैं। जहाँ ऐसा नहीं होता, वहाँ सभी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। (मनु0 3/56)। नारियाँ घर का सौभाग्य, आदरणीया, घर का प्रकाश, घर की शोभा, लक्ष्मी, संचालिका, मालकिन, स्वर्ग और संसार यात्रा का आधार हैं। (मनु0 9/11, 26, 28, 5/150) स्त्रियों के आधीन सबका सुख है। उनके शोकाकुल रहने से कुल क्षय हो जाता है। (3/55, 62)। पति से पत्नी और पत्नी से पति सन्तुष्ट होने पर ही कल्याण संभव है। (9/101-102)। सन्तान उत्पत्ति के द्वारा घर का भाग्योदय करनेवाली गृह की आभा होती है। शोभा-लक्ष्मी और नारी में कोई अन्तर नहीं है। (9/26) मनु सम्पूर्ण सृष्टि में वेद के बाद पहले संविधान निर्माता हैं। जिन्होंने पुत्र और पुत्री की समानता घोषित कर उसे वैधानिक रूप दिया। (9/130)। पुत्र-पुत्री को पैतृक सम्पत्ति में समान अधिकार प्रदान किया। (9/131)। यदि कोई स्त्रियों के धन पर कब्जा कर लेता है तो वे चाहे बन्धु-बान्धव ही क्यों न हों, उन्हें चोर के सदृश दण्ड देने का विधान किया गया है। (9/212, 3/52, 8/2, 29)। स्त्री के प्रति किये गये अपराधों में कठोरतम दण्ड का प्रावधान मनु ने किया है। (8/323, 9/232, 8/352, 4/180, 8/275, 9/4)। कन्याओं को अपना योग्य पति चुनने की स्वतन्त्रता, विधवा को पुनर्विवाह करने का अधिकार दिया है। साथ में दहेज निषेध करते हुए कहा गया है कि कन्याएँ भले ही ब्रह्मचारिणी रहकर कुँवारी रह जाएँ, परन्तु गुणहीन दुष्ट पुरुष से विवाह न करें। (9/90-91, 176, 56-63, 3/51-54, 9/89)। मनु ने नारियों को पुरुषों के पारिवारिक, धार्मिक, सामाजिक और राष्ट्रीय कार्यों में सहभाग माना है। (9/11, 28, 96, /4, 3/28)। मनु ने सभी को यह निर्देश दिया है कि नारियों के लिए पहले रास्ता छोड़ दें, नव विवाहिता, कुमारी, रोगिणी, गर्भिणी, वृद्धा आदि स्त्रियों को पहले भोजन कराकर पति-पत्नी को साथ भोजन करना चाहिए। (2/138, 3/114, 116)। मनु नारियों को अमर्यादित स्वतन्त्रता देने के पक्षधर नहीं हैं तथा उनकी सुरक्षा करना पुरुषों का कत्र्तव्य मानते हैं (5/149, 9/5-6)। उपर्युक्त विश्लेषपूर्वक प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि मनु स्त्री और शूद्र विरोधी नहीं है। वे न्यायपूर्ण हैं और पक्षपात रहित हैं।

मनु और मनुस्मृति पर आक्षेप: एक विचार: डॉ0 रामकृष्ण आर्य (वरुणमुनि वानप्रस्थी)

राजर्षि मनु वेदों के बाद सर्वप्रथम धर्म प्रवक्ता, मानव मात्र के पूर्वज राजधर्म और विधि (कानून) के सर्वप्रथम प्रणेता थे। उनके द्वारा रचित धर्मशास्त्र संसार का सर्वप्रथम और सर्वश्रेष्ठ धर्मशास्त्र है, जिसे मनुस्मृति के नाम से जाना जाता है। इस मनुस्मृति में बिना किसी पक्षपात के मानवमात्र को उन्नति के समान अवसर प्रदान करनेवाली एक उत्तम वैज्ञानिक और अद्वितीय समाज-व्यवस्था का प्रतिपादन किया गया है, जिसे वर्ण-व्यवस्था कहा जाता है। जोकि मनुष्य मात्र के गुण, कर्म और स्वभाव पर आधारित है। मनु की यह सबसे बड़ी विशेषता है कि वे जन्म के आधार पर किसी मनुष्य को उच्च या नीच नहीं मानते।

मनुस्मृति का वर्तमान स्वरूप

स्वायम्भुव मनु मनुस्मृति के प्रवक्ता हैं। प्रवक्ता इसलिए कि मनुस्मृति मूलतः प्रवचन है, जिसे मनु के प्रारम्भिक शिष्यों ने संकलित कर एक विधिवत् शास्त्र या ग्रन्थ का रूप दिया। मनुस्मृति में कुल 12 अध्याय और 2685 श्लोक हैं। मनुस्मृति सहित प्राचीन ग्रन्थों का आज जो वैज्ञानिक अध्ययन हो रहा है, उसके अनुसार मनुस्मृति में 1214 श्लोक मौलिक और 1471 श्लोक प्रक्षिप्त सिद्ध होते हैं।

भारत और विदेशों में मनुस्मृति की प्रतिष्ठा

वेद के बाद यदि किसी ग्रन्थ की भारत और भारत से बाहर विदेशों में सर्वत्र अत्यधिक प्रतिष्ठा है, तो वह ग्रन्थ मनुस्मृति है। विस्तारभय से हम उसका वर्णन करने में असमर्थ हैं। ऐसे विश्वप्रसिद्ध ’लागिवर‘ एवं समाज-व्यवस्था प्रणेता पर पता नहीं किस स्वार्थ के वशीभूत होकर आक्षेप और आरोप लगाये जा रहे हैं, जो चिन्तनीय हैं।

मनु और मनुस्मृति पर आक्षेप

मनु और मनुस्मृति पर आक्षेप तीन प्रकार से लगाये जा रहे हैं। (क) मनु ने जन्म पर आधारित जात-पाँत व्यवस्था का निर्माण किया। (ख) उस व्यवस्था में मनु ने शूद्रों, अर्थात् दलितों के लिए अमानवीय और पक्षपातपूर्ण विधान किये, जबकि सवर्णों, विशेष रूप से ब्राह्मणों को विशेषाधिकार दिये गये। इस प्रकार मनु शूद्र विरोधी थे। (ग) मनु नारी जाति के विरोधी थे। उन्होंने नारी को पुरुष के समान अधिकार ही नहीं दिये, अपितु नारी जाति की घोर निन्दा भी की है।

 

आक्षेपों पर विचार

(क) मनु ने जन्माधारित जात पाँत व्यवस्था का निर्माण नहीं किया, अपितु गुण-कर्म स्वभाव आधारित वर्ण-व्यवस्था का निर्माण किया जिसका मूल ऋ0 10/90/11-12, यजुः0 31/10-11 और अथर्व0 19/6/5-6 में पाया जाता है। मनु वेद को परम प्रमाण मानते हैं। इस वर्ण-व्यवस्था को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार समुदायों में व्यवस्थित किया गया है। ब्राह्मण-ज्ञान का आदान-प्रदान करनेवाला प्रधान व्यक्ति और उसका समुदाय। क्षत्रिय – समाज की रक्षा का भार उठानेवाला, वीरता, गुण, प्रधान व्यक्ति और उसका समुदाय। वैश्य – कृषि, उद्योग, व्यापार, अर्थ, धन, सम्पत्ति का अर्जन, वितरण करनेवाला प्रधान गुणवाला व्यक्ति और उसका समुदाय। शूद्र – जो पढ़ने लिखाने से भी पढ़-लिख नहीं सके ऐसा शारीरिक श्रम करनेवाला प्रधान व्यक्ति और उसका समुदाय मिलकर वर्ण व्यवस्था की संरचना करते हैं। (मनुस्मृति-1/31, 87-91, 10-45)। मनु ने अपनी मनुस्मृति के वर्णों के अतिरिक्त जन्माधारित जातियों, गोत्रों आदि का कहीं भी उल्लेख नहीं किया है। इतना ही नहीं मनु ने तो भोजनार्थ समय कुल, गोत्र पूछने और बतानेवाले को ’वमन करके खानेवाल‘ इस निंदित विशेषण से विशेषित किया है। (मनु0 3/109)।

 

जति-व्यवस्था वर्ण-व्यवस्था से उल्टी

जति-व्यवस्था में जन्म से ऊँचे-नीचे को महत्व दिया है, गुण-कर्म और योग्यता को नहीं। ब्राह्मणादि के घर जन्म लेनेवाला ब्राह्मणादि ही कहलाता है चाहे उसमें ब्राह्मणादि के गुण, कर्म, और योग्यता न हो तथा शूद्र के घर जन्म लेनेवाला शूद्र ही कहलाता है चाहे उसमें सम्पूर्ण गुण, कर्म, योग्यता ब्राह्मणादि के क्यों न हों।

मनु शूद्र अर्थात् दलित विरोधी नहीं थे

(ख) मनु शूद्र अर्थात् दलित विरोधी नहीं थे। विचार करें कि मनुस्मृति में शूद्रों की क्या स्थिति है ?

आजकल की दलित पिछड़ी और जनजाति कही जानेवाली जातियों को मनु ने शूद्र नहीं कहा है, अपितु जो पढ़ने-पढ़ाने का पूर्ण अवसर देने के बाद भी न पढ़ सके और केवल शारीरिक श्रम से ही समाज की सेवा करे, वह शूद्र है। (मनु0 1/90)।

मनु प्रत्येक मनुष्य को समान शिक्षाध्ययन करने का समान अवसर देते हैं। जो अज्ञान, अन्याय, अभाव में से किसी एक भी विद्या को सीख लेता है, वही मनु का द्विज अर्थात् विद्या का द्वितीय जन्मवाला है। परन्तु जो अवसर मिलने के बाद भी शिक्षा ग्रहण न कर सके, अर्थात् द्विज न बन सके वह एक जाति जन्म (मनुष्य जाति का जन्म) में रहनेवाला शूद्र है। दीक्षित होकर अपने वर्णों के निर्धारित कर्मों को जो नहीं करता, वह शूद्र हो जाता है, और शूद्र कभी भी शिक्षा ग्रहण कर ब्राह्मणादि के गुण, कर्म, योग्यता प्राप्त कर लेता है, वह ब्राह्मणादि का वर्ण प्राप्त कर लेता है। प्रत्येक व्यक्ति जन्म से शूद्र होता है। संस्कार में दीक्षित होकर ही द्विज बनता है (स्कन्दपुराण)। इस प्रकार मनुकृत शूद्रों की परिभाषा वर्तमान शूद्रों और दलितों पर लागू नहीं होती। (10/4, 65 आदि)।

(2) शूद्र अस्पृश्य नहीं-मनु ने शूद्रों के लिए उत्तम, उत्कृष्ट और शुचि जैसे विशेषणों का प्रयोग किया है, अतः मनु की दृष्टि में शूद्र अस्पृश्य नहीं है। (मनु0 9/335) शूद्रों को द्विजाति वर्णों के घरों पर भोजन आदि कार्य करने का निर्देश दिया है। (मनु0 1/91, 9/334-335)। शूद्र, अतिथि और भृत्य (शूद्र) को पहले भोजन कराया जाए। (मनु0 3/112, 116)। क्या आज के वर्णरहित समाज में शूद्र नौकर को पहले भोजन कराया जाता है ? इस प्रकार मनु शूद्र को निन्दित अथवा घृणित नहीं मानते थे।

(3) शूद्र को सम्मान व्यवस्था में छूट-मनु की सम्मान व्यवस्था में सम्मान गुण, योग्यता के अनुसार होकर विद्यमान अधिक सम्मानीय होता है। पर वृद्ध शूद्र को सर्व˗प्रथम सम्मान देने का निर्देश दिया गया है। (मनु0 2/111, 112, 130, 137)।

(4) शूद्र को धर्म पालन की स्वतन्त्रता – मनु ने शूद्रों को धार्मिक कार्य करने की पूरी स्वतन्त्रता दी है। (मनु0 10/126) इतना ही नहीं यह भी कहा है कि शूद्र से भी उत्तम धर्म को ग्रहण कर लेना चाहिए।

(5) दण्ड-व्यवस्था में शूद्र को सबसे कम दण्ड-मनु ने शूद्र को सबसे कम दण्ड, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण को उत्तरोत्तर अधिक दण्ड, परन्तु राजा को सबसे अधिक दण्ड देने का विधान किया है। (मनु0 8/337-338, 338, 347)।

(6) शूद्र दास नहीं-शूद्र दास, गुलाम अर्थात् बन्धुआ मजदूर नहीं है। सेवकों/भृत्यों को पूरा वेतन देने का आदेश दिया है और उनका अनावश्यक वेतन न काटा जाए, ऐसा निर्देश है। (7/125, 126, 8/216)।

(7) शूद्र सवर्ण हैं-मनु ने शूद्र सहित चारों वर्णों को सवर्ण माना है। चारों वर्णों से भिन्न असवर्ण हैं। (मनु0 10/4, 45) पर बाद का समाज शूद्र को असवर्ण कहने लग गया। उसी प्रकार मनु ने शिल्पी-कारीगर को वैश्य वर्ण में माना है, पर बाद में समाज इन्हें भी शूद्र कहने लगा (मनु0 3/64, 9/329, 10/99, 120)। इस प्रकार मनु की व्यवस्थाएँ न्यायपूर्ण हैं। उन्होंने न शूद्र और न किसी और के साथ अन्याय और पक्षपात किया है।

(8) मनु और डॉ0 बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर-आधुनिक संविधान निर्माता और राष्ट्र निर्माता तथा भूतपूर्व महामहिम राष्ट्रपति श्री वेंकटरमण के शब्दों में ’आधुनिक मनु‘ डॉ0 भीमराव अम्बेडकर द्वारा मनुस्मृति का विरोध और उसे दलितों पर अत्याचार कराने की जिम्मेवार तथा जात-पाँत व्यवस्था को जननी मानने का सवाल है। जन्मना जात-पाँत, ऊँच-नीच, छुआछूत जैसी कुप्रथाओं के कारण अपने जीवन में उन्होंने जिन उपेक्षाओं, असमानताओं यातनाओं और अन्यायों को भोगा था, उस स्थिति में कोई भी स्वाभिमानी शिक्षित वही करता जो उन्होंने किया। क्योंकि यह सत्य है कि उस समय तक मनुस्मृति का शोधपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन होकर उसमें समय-समय पर किये गये प्रक्षेपों पर कोई शोध कार्य नहीं हुआ था। जिससे उन्हें प्रक्षिप्त और मौलिक श्लोकों में भेद करने का कोई स्रोत नहीं मिला, फिर भी उन्होंने मनु द्वारा प्रतिपादित गुण-कर्म-योग्यता आधारित वर्ण व्यवस्था और महर्षि दयानन्द और अन्यों के द्वारा उसकी की गई व्याख्या की प्रशंसा की है।

(ग) क्या मनु नारी जाति के विरोधी थे ? मनुस्मृति के स्वयं के प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि मनु नारी जाति के विरोधी नहीं थे। कतिपय प्रमाण प्रस्तुत हैं-जिस परिवार में नारियों का सत्कार होता है, वहाँ देवता-दिव्य गुण, दिव्य सन्तान आदि प्राप्त होते हैं। जहाँ ऐसा नहीं होता, वहाँ सभी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। (मनु0 3/56)। नारियाँ घर का सौभाग्य, आदरणीया, घर का प्रकाश, घर की शोभा, लक्ष्मी, संचालिका, मालकिन, स्वर्ग और संसार यात्रा का आधार हैं। (मनु0 9/11, 26, 28, 5/150) स्त्रियों के आधीन सबका सुख है। उनके शोकाकुल रहने से कुल क्षय हो जाता है। (3/55, 62)। पति से पत्नी और पत्नी से पति सन्तुष्ट होने पर ही कल्याण संभव है। (9/101-102)। सन्तान उत्पत्ति के द्वारा घर का भाग्योदय करनेवाली गृह की आभा होती है। शोभा-लक्ष्मी और नारी में कोई अन्तर नहीं है। (9/26) मनु सम्पूर्ण सृष्टि में वेद के बाद पहले संविधान निर्माता हैं। जिन्होंने पुत्र और पुत्री की समानता घोषित कर उसे वैधानिक रूप दिया। (9/130)। पुत्र-पुत्री को पैतृक सम्पत्ति में समान अधिकार प्रदान किया। (9/131)। यदि कोई स्त्रियों के धन पर कब्जा कर लेता है तो वे चाहे बन्धु-बान्धव ही क्यों न हों, उन्हें चोर के सदृश दण्ड देने का विधान किया गया है। (9/212, 3/52, 8/2, 29)। स्त्री के प्रति किये गये अपराधों में कठोरतम दण्ड का प्रावधान मनु ने किया है। (8/323, 9/232, 8/352, 4/180, 8/275, 9/4)। कन्याओं को अपना योग्य पति चुनने की स्वतन्त्रता, विधवा को पुनर्विवाह करने का अधिकार दिया है। साथ में दहेज निषेध करते हुए कहा गया है कि कन्याएँ भले ही ब्रह्मचारिणी रहकर कुँवारी रह जाएँ, परन्तु गुणहीन दुष्ट पुरुष से विवाह न करें। (9/90-91, 176, 56-63, 3/51-54, 9/89)। मनु ने नारियों को पुरुषों के पारिवारिक, धार्मिक, सामाजिक और राष्ट्रीय कार्यों में सहभाग माना है। (9/11, 28, 96, /4, 3/28)। मनु ने सभी को यह निर्देश दिया है कि नारियों के लिए पहले रास्ता छोड़ दें, नव विवाहिता, कुमारी, रोगिणी, गर्भिणी, वृद्धा आदि स्त्रियों को पहले भोजन कराकर पति-पत्नी को साथ भोजन करना चाहिए। (2/138, 3/114, 116)। मनु नारियों को अमर्यादित स्वतन्त्रता देने के पक्षधर नहीं हैं तथा उनकी सुरक्षा करना पुरुषों का कत्र्तव्य मानते हैं (5/149, 9/5-6)। उपर्युक्त विश्लेषपूर्वक प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि मनु स्त्री और शूद्र विरोधी नहीं है। वे न्यायपूर्ण हैं और पक्षपात रहित हैं।

मनुस्मृति में प्रक्षेप

मनु के वैदिक वर्ण-व्यवस्था गुण, कर्म, योग्यता के सिद्धान्त पर आधारित श्लोक मौलिक और जन्माधारित जात-पाँत, पक्षपात विधायक सभी श्लोक ˗प्रक्षिप्त हैं। मनु के समय जातियाँ नहीं बनी थीं। इसलिए उन्होंने जातियों की गिनती नहीं दर्शाई। यही कारण है कि वर्ण संस्कारों (वर्ण संकरों) से सम्बन्धित श्लोक ˗प्रक्षिप्त सिद्ध होते हैं। मनु की दण्ड-व्यवस्था एक जनरल कानून है, मौलिक है, इसके विरुद्ध पक्षपातपूर्ण कठोर दण्ड-व्यवस्था विधायक श्लोक प्रक्षिप्त हैं। वर्ण-व्यवस्था के अन्तर्गत शूद्र विषयक श्लोक मौलिक, शेष जन्मना शूद्र निर्धारक छुआछूत, ऊँच-नीच अधिकारों का हरण और शोषण विधायक श्लोक प्रक्षिप्त हैं। नारियों के सम्मान, समानता, स्वतन्त्रता और शिक्षा विषयक श्लोक मौलिक हैं, इसके विपरीत प्रक्षिप्त हैं।

उपसंहार

यह सत्य है कि आम लोग और अनेक परम्परावादी विद्वान, सन्त, महात्मा आदि उसी प्रक्षिप्त श्लोकों सहित मनुस्मृति को आज भी प्रामाणिक मानकर जन्माधारित जाति-व्यवस्था ईश्वर द्वारा प्रदत्त स्वीकार कर उससे ग्रसित हैं। आज भी वे स्त्री और शूद्र को अपने बराबरी का दिल से अधिकार नहीं देना चाहते, परन्तु आर्यसमाज जो जन्माधारित जाति-प्रथा में तनिक भी विश्वास नहीं करता और प्रारम्भ से ही दलितों का सच्चा हितैषी रहा है-प्रक्षिप्त श्लोकों रहित मनुस्मृति को ही प्रामाणिक मानता है और गुण, कर्म, योग्यता आधारित वर्ण-व्यवस्था का समर्थक है। यह बात पृथक् है कि आज वर्ण-व्यवस्था की पुनः स्थापना असम्भव-सी प्रतीत होती है, क्योंकि जात-पाँत के रहते वर्ण-व्यवस्था लागू नहीं हो सकती, इसलिए भले ही वर्णव्यवस्था को पुनः स्थापना न हो, परन्तु जात-पाँत टूटकर जात-पाँत रहित समाज बनना चाहिए। ताकि फिर किसी को वह गैर बराबरी और छुआछूत की यातना न भोगनी पड़े, जो इस देश के आधुनिक संविधान निर्माता और आधुनिक मनु, डॉ0 अम्बेडकर और तथाकथित शूद्रातिशूद्रों और दलितों को भोगनी पड़ी थीं।

अन्त में हमारा निवेदन है कि प्रक्षिप्त श्लोकों के आधार पर मनु और मनुस्मृति पर भ्रमवश मनमाने आरोप-प्रत्यारोप लगाना अनुचित है। प्राचीन और विशुद्ध मनुस्मृति ग्रन्थ स्वाध्याय करने योग्य हैं। पक्षपात और पूर्वाग्रह रहित होकर शोधपूर्वक मनुस्मृति का अध्ययन करेंगे, तो यह भ्रान्ति मिट जाएगी कि मनु जात-पाँत के जन्मदाता और दलित तथा नारी विरोधी थे। मनु और मनुस्मृति के विरोध में लड़ाई बन्द होनी चाहिए, क्योंकि वास्तव में हम सब मानवतावादी हैं।