All posts by Rishwa Arya

यह मनु कौन थे: पण्डित गंगा प्रसाद उपाध्याय

यह मनु कौन थे यह कहना कठिन है । जिस प्रकार उपनिषत कारो तथा दर्शनकारो के विषय में बहुत कम ज्ञात है उसी प्रकार मनु के विषय में हम कुछ नही जानते । कही कही तो मनु को केवल धर्म शास्त्र का रचियता बताया गया है और कही कही समस्त सृष्टि की उत्पति ही मनु से बताइ्र्र गई है । आघ्र्य जैसी प्राचीन जाति क साहित्य मे इस प्रकार की कठिनाइयो का होना स्पाभाविक है । इसी शताब्दी के भीतर दयानन्द नाम मे दो व्यक्ति हुये एक आयर्य समाज के संस्थापक और दूसरे सनातमर्ध मंडल के कायर्यकर्ता । इन दोनो के विचारो में आकाश पाताल का भेद है । परन्तु यह बहुत ही संभव है कि कुछ दिनो पश्चात एक के वचन दूसरे के समझ लिये जाॅये । इसी प्रकार प्रतीत ऐसा होता है कि कही तो मनु शब्द ईश्वर का वाचक था कही वेदिक ऋषि का कही धर्मशास्त्र के रचियता का और कही संभव है अन्य किसी का भी । इन सब को किसी प्रकार समय की प्रगति ने मिला – जुला दिया और आगे आने वाले लोगो के लिए विवेक  करना कठिन हो गया । जितने भाष्य मनुस्मृति क इस समय प्राप्य है वह सब मेधातिथि से लेकर आज तक के आधुनिक या पौराणिक युग के ही समझने चाहिए । इसीलिए इनके आधार किसी विशेष निष्चय तक पहुॅचना दुस्तर है । शतपथ ब्राह्मण (13।4।3।3) में आता है

मनुर्वेपस्वतो राजेत्याह तस्य मनुष्या विशः

अर्थात मनु वैवस्वत राजा है और मनुष्य उसकी प्रजा है इससे प्रतीत होता है कि मनु वैवस्वत कोई राजा था । या यह भी संभव है कि राजा को ही यहाॅ विशेष गुणों के कारण मनुवैवस्वत कहा है ।

मेधातिथि ने अपने भाष्य के आरंभ मे मनु के विषय में लिखा है:-

मनुर्नाम कश्चित पुरूष विशेषोअनके वेद शाखा अघ्ययन विज्ञानानुष्ठान तथा स्मृति -परंपरा के लिए प्रसिद्ध हो गया।

यह एक हानि -शून्य कथन है और इतना मानने मे किसी को भी संकोच नही हो सकता । क्योकि जिस मनु की इतनी प्रसिद्धि है वह अवश्य ही कोई विद्वान पुरूष रहा होगा और उसने वेदाचार और लोकाचार का पूर्ण ज्ञान पा्रप्त कर लिया होगा।

मनु स्मृति का वैदिक साहित्य में प्रमाण : पण्डित गंगा प्रसाद उपाध्याय

मानव धर्मशास्त्र का वैदिक साहित्य में बहुत गोरव है । आयर्य जाति की सम्यता का मानव धर्मशास्त्र के मनुस्मृति का वैदिक साथ एक घनिष्ट संबंध हो गया है । हम चाहे मनु तथा मनुस्मुति के विषय में पुछे गये अनेको प्रश्नो का समाधान न कर सके तो भी यह अवश्य मानना पडता है कि मनु अवश्य ही कोई महा पुरूष था जिसके उपदेश आयर्य सभ्यता के निमार्ण तथा जीवन – स्थिति के लिए बडे भारी साधक सिद्ध हुए और उन पर विद्वानों की अब तक श्रद्धा चली आती है ।

निरूक्तकार यास्क ने दायभाग के विषय में मनु को प्रमाण माना है:-

अविशेषेण मिथुनाः पुत्रा दायादा इति तदेतद झक श्लोकभ्याम्भ्यक्त । अगादंगात्सम्भवसि हदयाधिजायते । आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम । अविशेषण पु़त्राण दाये भवति धर्मतः मिथुनानां विसर्गादो मनुः स्वायम्भुवोब्रवीत

बिना भेद के स्त्री और पुमान दोनो प्रकार के पुत्र (अर्थात लडकी और लडका दोनो ) दायाभाग के अधिकारी होते है यह बात ऋचा और श्लोक से कही गई । अंग अंग से उत्पन होता है हद्रय से उत्पन होता है इसलिए पुत्र आत्मा ही है वह सौ वर्ष तक जीवे (यह ऋचा हुई )। धर्म अर्थात कानून की दृष्टि से दोनो प्रकार के पुत्रो (अर्थात लडका और लडकी दोनो ) के दाया भाग मिलता है ऐसा सृष्टि की आदि मे स्वायभुव मनु ने कहा मनु ने कहा है (यह श्लोक हुआ )

निरूत्तकार को यहाॅ प्रमाण देना था कि दायभाग का अधि-कारी जैसा लडका है वैसा ही लडकी । उनहोने पुत्र शब्द दोनो के लिए प्रयोग किया है । इसमे उनहोने दो प्रमाण दिये है एक श्रुति का और दूसरा स्मृति का । अंग शतम श्रुति है । अवि शेषेणा बव्रवीत तक श्लोक है । और श्लोक मे स्वसयंभुवो मनु   उल्लेख है । आयर्यो के लिए श्रुति और स्मृति यही दोनो मुख्य प्रमाण। यही बात कवि कालिदास ने रधुवशमें उपमा के रूप मे दी है

श्रुतेरिवार्थ स्मृतिरन्वगच्छत अर्थात स्मृति श्रुति का अनुकरण करती है । मेधातिति ने मनु-माघ्य के आरम्भ में लिखा है:-

ऋचो यूजूषि सामानि मन्त्रा आथर्वण्श्चये ।

महषिभिस्तु तत प्रोक्त स्मातं तु मनुरब्रवीत ।।

अर्थात ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद तथा अर्थवेद का उपदेश ऋषियो ने किया था परन्तु स्मृति धर्म (का) उपदेश मनु ने किया । महाभारत शान्ति पर्व मे लिखा है कि

ऋषीनुवाच तान सर्वानदश्य: पुरूषोत्तम:

कृत शत-सहस्त्र हि श्लोकानामिदमृमतमम ।।

लोकतन्त्रस्य कत्स्नस्य यस्माद धर्म:प्रवर्तते।

 

तस्मात प्रवश्रयते धर्मान मनुः स्वायंभुव। स्वयं

 

स्वयंभुवेषु धर्मषु शास्त्रे चैशनसे कुते ।

बृहस्पतिमते चैव लोकेषु प्रतिचारिते ।।,

अर्थात निराकार परमात्मा ने उन ऋषियो को शत-सहस्त्र श्लोक का उत्तम ज्ञान दिया जिस पर कि संसार का समस्त धर्म स्थित है । स्वंय इन धर्मो का उपदिेश किया । और मनु के उस उपदेश के आधार पर ब्रहस्पति और उशनस ने अपनी अपनी स्मृतियाॅ बनाई ।,

मनु नाम की महत्ता : पण्डित गंगाप्रसाद उपाध्याय

वैदिक साहित्ष्किो के मार्ग मे इस प्रकार की सहस्त्रो अडचने है जिनका अधिक उल्लेख यहाॅ नही करना

मनु नाम की महता  चाहिए । परन्तु इसमे भी सन्देह नही कि कोई न कोई विद्वान मनु हो गये है जिनहोने आचार (Moral Laws) और व्यवहार (Juris-prudence) के सम्बन्ध मे नियम बनाये जिनका नाम मानव धर्म शास्त्र या मनुस्मृति पड गया । मनु नाम की महता अन्य देशो के प्राचिन इतिहास से भी विदित होती है । सर विलियम जोन्स (Sir W.Jones) लिखते है:-

“We cannot but admit that Minos Mnekes or Mneuis have only Greek terminations but that the crude noun is composed of the same radical letters both in greek and Sanskrit”

अर्थात यूनानी भाषा के माइनोस आदि शब्द संस्कृत के मनु शब्द के ही विकृत रूपा है।

Leaving others to determine whether our Menus ¼or Menu in the nominative½ the son of Brahma was the same personage with minos the son of jupitar and legislator of the Cretsans ¼who also is supposed to be the same with Mneuis spoken of as the first Law giver receiving his laws from thw Egyp-tian deity Hermes and Menes the first king of the Egyptians ½ remarks :-

“ Dara Shiloha was persuaded and not without sound reason that the first Manu of the Brahmanas could be no other person than the progenitor of makind to whom jews, Christians and mussulmans unite in giving the name of adam “ ¼Quoted by B.Guru Rajah Rao in his Ancient Hindu Judicature½

बी0 गुरू राजाराउ ने अपनी पुस्तक । Ancient Hindu Judicature मे लिखा है कि यदि हम यह अनुसधान दूसरो के लिए छोड दे कि ब्रहा का पुत्र मनु वही है जिसे कोटवालों का धर्म शास्त्र रचियता माइनौस ज्यूपीटर का पुत्र कहा जाता हे (ओर जिसके विषय मे कहा जाता है कि यह वहर म्नयूयस था जिसने मिश्र देश के देवता हमीज से धर्मशास्त्र सीखा और जो मिक्ष देश के देवता हर्मीज से धर्मशास्त्र सीखा और जो मिश्र देश का पहला राजा बना) तो भी जोन्स के इस उद्धरण पर अवश्य ध्यान देना चाहिए कि दाराशिकोह का यह विचार कुछ अनुचित न था कि ब्राह्मणो का आदि मनु वही है जो मनुष्य जाति का पूर्वज समझा जाता है और जिसको यहूदि ईसाई और मुसलमान आदम के नाम से पुकारते है।

इन उद्धरणो में कहाॅ मे कहाॅ तक सचाई है इसमे भिन्न भिन्न मत हो सकते है । परन्तु क्या यह आश्चर्य की बात नही है कि प्राचीन जितने कानून बनाने वाले हुए उनके सब युगो के नाम मनु शब्द से इतना सादृश्य रखते थे । इसके हमारी समक्ष मे दो कारण हो सकते । एक तो यह कि मनु के उपदेश ही दूसरे देशो में किसी न किसी साधन द्वारा और किसी न किसी रूप में गये हो और संस्कृत नाम मनु का ही उन भाषाओ मे विकृत रूपा हो गया हो । दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि मनु का नाम कानून बनाने के लिए इतना प्रसिद्ध हो गया हो कि वह भारतवर्ष मे व्यक्तिवाचक और अन्य देशो मे जातिवाचक बन गया हो अर्थात अन्य देशीय कानून बनाने वालो ने भी अपने को इसी प्रसिद्ध नाम से सम्बोधित करने मे गोरव समक्षा हो । जैसे शेक्सपियर कहलवाना गौरव समझे । दोनो दशाओं मे मनु की प्रसिद्धि स्वीकार करनी पडती है ।

वेद में मनु शब्द : पण्डित गंगा प्रसाद उपाध्याय

मनु शब्द भिन्न 2 विभकित्यो मे ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद तथा अर्थवर्वेद में कई स्थलो पर प्रयुक्त  हुआ

वेद मे मनु शब्द है  और इसलिए कई विद्वानो का ऐसा मत है  कि जिस मनु का वेदो में उल्लेख है उसी के उपदेश मनुस्मृति मे वणित है । यह मत प्राचिन वेदाचाययो के कथनो से अनुकुलता नही रखता । इसमे सन्देह नही कि मनुस्मृति के लेखको का वेदो से समंबध जोड देने मे मनुस्मृति के गौरव में आधिक्य हो जाता है । इसी गोरव को दृष्टि में रखकर कई विद्वानो ने मनुस्मृति के लेखक के विषय में वेदो के पन्ने पलटने का यत्र किया उदाहरण के लिए ऋग्वेद 1।80।16अ1।114।2 तथा 2।33। 13 मे मनु और पिता दो शब्द साथ साथ आये है। इससे लोगो ने यह अनुमान किया है कि यह वही प्रजापति मनु है जिनहोने सृष्टि को उत्पन किया तथा मनुस्मृति की नीव डाली । परन्तु यह मत उन लोगो को स्वीकार नही हो सकता जो वेदो को ईश्वर जो वेदों को ईश्वर की और मानते है और जिनको वेदो मे इतिहास मानने से इनकार है । इस कोटि मे प्राचिन उपषित्कार दर्शनकार नैहत्क वैयाकरण तथा शंकरा चायर्य आदि मध्यकालीन विद्वान भी सम्मिलित है स्वामी दया-नन्द का जो स्पष्ट मत है कि वेदो मे किसी पुरूष-विशेष का उल्लेख नही है । आजकल के यूरोपियन संस्कृतज्ञ तथा उनके अनुयायी भारतीय विद्वानसें का तो दृष्टिकोण ही ऐतिहासिक है। यह लोग पत्येक वैदिक ग्रन्थ को उसी दृष्टि से देखते है और उनको अपने मत की पुष्टी में पुष्कल सामग्री प्राप्त हो जाती है ।उनका यह मत कहाॅ तक ठीक है इस पर हम यहाॅ विचार नही कर सकते  । परन्तु इसमें भी सन्देह नही कि केवन पिता और मनु दो शब्दो को साथ साथ देखकर उनसे किसी विशेष पुरूष का अथ्र्र ले लेना युक्ति -संगत नही है जब तक कि ऐसा करने के लिए अन्य पुष्कल प्रमाण न हों । यदि निरक्तकार यास्काचार्य का मत ठीक है कि वेदो में समस्त पद यौगिक है तो मानना पडेगा कि किसी विशेष पुरूष का नाम मनु होने से पूर्व यह शब्द अपने यौगिक अर्थ में बहुत काल तक प्रचलित रह चुका होगा । यह बात आजकल की समस्त व्यक्ति वाचक संज्ञाओं से भी सिद्ध होती है । चाहे किसी व्यक्ति का नाम चुन लीजिए । पहले वह अवश्य ही यौगिक रहा होगा । और बहुत दिनो पश्चात व्यक्यिाॅ उस नाम से प्रसिद्ध हुई होगी इसलिए इसमें कुछ भी अनुचित नही है कि मनु शब्द का वेद मुत्रो में यौगिक अर्थ लिया जाये । यजुवैद 5।16 में आये हुए मनवे शबद का अर्थ उव्वट ने यजमानय और महीधर ने मनुते जानातीत मनुज्ञानवान यजमान किया है। इसी प्रकार यदि ऋग्वेद में भी मनु का अंर्थ ज्ञानवान किया जाय तो क्या अनथ होगा। फिर ऋग्वेद के जिन तीन मंत्रो  की आद्यैर हमने ऊपर संकेत किया है उनमे से पहले (1।8016) में मनु पिता और अर्थवा मनुष्पिता ) तीनो शब्द आये है जिनमे से एक विशेयष्य और अन्य विशेष्ण है । ऋग्वेद 1।114।2 मे अर्थवा का न नाम है न संबध 2।33।13 मे मनु पिता का भेषजा अर्थात ओषधियो से संबध है । इस प्रकार अर्थवा या मनु या प्रजापति शब्दो से ऐतिहासिक पुरूषो का सम्बन्ध जोडना एक ऐसी अटकल है जिस पर आधुनिक विद्वान लटठ हो रहे है । आजकल का युग अटकल युग है जिसको शिष्ट भाषा मे aAge of hypotheses कह सकते है हमारा यहाॅ केवल इतना ही कथन है कि वेदों मे आये हुए मनु और मनुस्मृति के आदि गृन्थकार से कुछ सम्बध नही है । ऋग्वेद 8।3013 में  पार्थना की गई –

मा नः पथः पित्रयान मानवादधिदूरे नैष्ट परावत

अर्थात हम (पित्रयात मानवात पथः) अपने पूर्वजों के बुद्धि-पूर्वक मार्ग से विचलित न हो । इससे भी कुछ विद्धानो ने यह अनुमान किया है कि मानवात पथः का अर्थ है मनु महाराज क बताये मार्ग से । (vide Principles of Hindu law vol I by jogendra chamdra Ghos and P.V Kane History of Dharma shastra )

ऋृग्वेद 10।63।7 मे (येभ्यो होत्रां प्रथमामायेजे मनुः) कुछ लोगो के विचार से किसी मनु-विशेष का उल्लेख है जिसने सबसे प्रथम यज्ञ किया था । परन्तु इन दोनों मंत्रो में मनु का अर्थ विचारवान या ज्ञानवान पुरूष क्यो न लिया जाए और क्यों यह मान लिया जाय कि अमुक व्यक्ति की और ही संकेत है इसके लिये अटकल के सिवाय और क्या हेतू हो सकता कोई ऐसी ऐतिहासिक घटनाये हमारे ज्ञान में नही है जिनसे बाधित होकर हम यहाॅ मनु शब्द को विशेष व्यक्ति का नाम मान ले । फिर यह तो बडी ही हास्यप्रद बात होगी कि मनु वेदो के गीत गावें और वेद मनु के । क्यो न वेद में आये हुए मनु का अर्थ ईश्वर ही लिया जाए जैसा कि मनुस्मृति के निम्न श्लोक से विदित हैः-

एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम ।

इन्द्रमेके परे पा्रणमपरे ब्रहाशाश्वतम ।।

(अघ्याय 12।123)

अर्थात कुछ लोग ईश्वर को अग्रि नाम से पुकारते है कुछ मनु नाम से कुछ प्रजापति नाम से कुछ इन्द्र नाम से कुछ प्राण नाम से और कुछ ब्रहा शाश्वत नाम से ।

कुछ लोग कह सकते है कि ऋृग्वेद के कुछ मंत्रो का ऋषि भी तो मनु था । क्या यह वही मनु नही था जिसने मनुस्मृति के विचारो का प्रचार किया। यह अवश्य एक मीमासनीय प्रश्र है। कुछ लोग ऋषियो को मंत्रो का कर्ता मानते है और कुछ केवल द्रष्टा । यास्काचार्य का तो यही मत है ।  कि ऋषि मंत्रो के द्रष्टा मात्र थे और चादर की दृष्टि से उनका नाम वैदिक सूक्तो के आरम्भ में लिखा चला आता है । जो लोग इन ऋषियो को मत्रो के कर्ता मानते है उनके लिए कठिनाई यह अवश्य होगी कि अग्रिम वायु आदित्य और अगिरा की क्या स्थिति होगी । सायणाचार्य ने ऋृषियो को मत्रो के कर्ता मानते उनके लिये एक कठिनाई यह अवश्य होगी कि अग्रिम वायु आदित्य और अंगिरा की क्या स्थिति होगी ।सायणाचार्य ने ऋग्वेद भाष्य की उपक्रमणिका मे स्पष्ट लिखा है कि

जीवविशेषेरग्रिवाटवादित्यैवेदानामुत्पादितत्वात ।

ऋग्वेद एपाग्रेरजायत । यजुवेदो वायो। समवेद

आदियादिति श्रुतेरीश्वरस्पारन्यादि प्ररेकत्वेन निर्मातृत्व द्रष्टव्यम।।

अर्थात अग्रिम वायु आदित्य नामी जीव विशेषो से वेदों का आविर्भाव हुआ । यदि मनु किसी मंत्र का कर्ता भी होत तो भी अन्य पुष्ट प्रमाणो के अभाव में यह कहना कठिन था कि जिस मनु ने अमुक वेद – मत्र बनाया उसीने मानव धर्म शास्त्र का आरंम्भ  किया ।  इसी प्रकार तैतरीय संहिता 2।2।50।2 मे लिखा है  कि यदै कि च मनुरवदत तदृ भेषजम और ताण्डय ब्राह्मण 23।6।।17 का वचन है कि मनुवै सत किचावदत तद भेषज भेषजतरयै अर्थात मनु ने जो कुछ कहा वह औषधि है । इन वाक्यो से भी हमारे प्रष्न पर कुछ अधिक प्रकाश नही पडता । ऋग्वेद 2।33।13 मे मनु का भेषज से कुछ सम्बन्ध है परन्तु ऊपर दो वाक्यों में भेषज शब्द का वास्तविक अर्थ न लेकर आलंकारिक अर्थ लिया गया है और उन स्थलो पर यह स्पष्ट नही है कि मनु के किसी वचन और उन स्थलों पर यह स्पष्ट नही है कि मनु के किसी वचन की और संकेत है ।

डॉ अम्बेडकर के साहित्य में किस मनु का विरोध है?: डॉ. सुरेन्द्र कुमार

(अ) प्राचीन मनुओं से भिन्न है डॉ. अम्बेडकर का मनु

    डॉ. अम्बेडकर के साहित्य का मनु का समर्थनात्मक एवं सकारात्मक पहलू गत पृष्ठों में दिखाया गया है किन्तु दूसरा पहलू यह भी है कि उन्होंने अपने साहित्य में अनेक स्थलों पर ‘मनु’ का नाम लेकर कटु आलोचनााी की है। ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि यदि वे किसी मनु का समर्थन कर रहे हैं तो आलोचना किस ‘मनु’ की कर रहे हैं?

इसका उत्तर उन्होंने स्वयं दिया है। डॉ0 अम्बेडकर के अनुयायी और मनु-विरोधियों को उस पर गभीरता से ध्यान देना चाहिए। उन्होंने मनुस्मृति-विषयक एक नयी मान्यता स्वीकृत की है। उस मान्यता को लेकर मतभेद हो सकता है, किन्तु उन्होंने इस स्वीकृति में यह स्पष्ट कर दिया कि मैं किस व्यक्ति का विरोध कर रहा हूँ। उनकी मान्यता है कि वर्तमान में उपलध मनुस्मृति आदिकालीन मनु द्वारा रचित नहीं है, अपितु पुष्यमित्र शुङ्ग (ई0 पूर्व 185) के काल में ‘मनु सुमति भार्गव’ नाम के व्यक्ति ने इसको रचा है और उस पर अपना छद्म नाम ‘मनु’ लिख दिया है। वही सुमति भार्गव उनकी निन्दा और आलोचना का केन्द्र है। इस बात को उन्होंने दो स्थलों पर स्वयं स्पष्ट किया है। वे लिखते हैं-

(क) ‘‘प्राचीन भारतीय इतिहास में ‘मनु’ आदरसूचक संज्ञा थी। इस संहिता (मनुस्मृति)को गौरव प्रदान करने के उद्देश्य से मनु को इसका रचयिता कह दिया गया। इसमें कोई शक नहीं है कि यह लोगों को धोखे में रखने के लिए किया गया। जैसी कि प्राचीन प्रथा थी, इस संहिता को भृगु के वंश नाम से जोड़ दिया गया।……..इसमें हमें इस संहिता के लेखक के परिवार के नाम की जानकारी मिलती है। लेखक का व्यक्तिगत नाम इस पुस्तक में नहीं बताया गया है, जबकि कई लोगों को इसका ज्ञान था। लगभग चौथी शतादी में नारद स्मृति के लेखक को मनुस्मृति के लेखक का नाम ज्ञात था। नारद के अनुसार ‘सुमति भार्गव’ नाम के एक व्यक्ति थे जिन्होंने मनु-संहिता की रचना की।……इस प्रकार मनु नाम ‘सुमति भार्गव’ का छद्म नाम था और वह ही इसके वास्तविक रचयिता थे’’ (अंबेडकर वाङ्मय, भाग 7, पृ. 151)।

एक अन्य पुस्तक में वे लिखते हैं-‘‘मनु के काल-निर्धारण के प्रसंग में मैंने संदर्भ देते हुए बताया था कि मनुस्मृति का लेखन ईसवी पूर्व 185, अर्थात् पुष्यमित्र की क्रान्ति के बाद सुमति भार्गव के हाथों हुआ था।’’ (वही, भाग 7, पृ. 116)

(ग) ‘‘पाणिनि ईसा से 300 वर्ष पहले हुआ। मनु ईसा के 200 वर्ष पूर्व हुआ।’’ (वही, खंड 6, पृ0 59)

(घ) ‘‘मनु एक कर्मचारी था जिसे ऐसे दर्शन की स्थापना के लिए रखा गया था जो ऐसे वर्ग के हितों का पोषण करे जिस समूह में वह पैदा हुआ था और जिसका महामानव (ब्राह्मण) होने का हक उसके गुणहीन होने के बावजूदाी न छीना जाए।’’ (वही, खंड म्, पृ0 155)

उक्त उद्धरणों की समीक्षा से ये निष्कर्ष सामने आता है कि सृष्टि का आदिकालीन मनु स्वायंभुव या मनु वैवस्वत किसी के कर्मचारी नहीं थे, वे स्वयं चक्रवर्ती राजा (राजर्षि) थे। डॉ. अम्बेडकर का यह कथन उन पर लागू नहीं होता। अतः स्पष्ट है कि यह कथन मनु नामधारी सुमति भार्गव के लिए है जो ई0 पूर्व 185 में राजा पुष्यमित्र शुङ्ग का कर्मचारी था। इस प्रकार डॉ. अम्बेडकर प्राचीन मनुओं का विरोध नहीं करते अपितु वे वस्तुतः पुष्यमित्र-कालीन मनु छद्म नामधारी सुमति भार्गव का विरोध करते हैं।

(ङ) ‘‘बौद्ध धर्म के पतन के कारणों से सबन्धित तथ्यों को उस ब्राह्मण साहित्य से छान-बीन कर एकत्र किया जाना चाहिए, जो पुष्यमित्र की राजनीतिक विजय के बाद लिखा गया था। इस साहित्य को छह भागों में बांटा जा सकता है-(1) मनुस्मृति, (2) गीता, (3) शंकराचार्य का वेदान्त, (4) महाभारत, (5) रामायण और (6) पुराण।’’ (वही, खंड 7, ब्राह्मण साहित्य, पृ0 115)

डॉ0 अम्बेडकर यदि उपलध मनुस्मृति को ईसा पूर्व 185 की रचना मानते हैं और उसे ‘मनु’ छद्म नामधारी सुमति भार्गव रचित मानते है तो प्राचीन मनुओं ने कौन सा धर्मशास्त्र रचा? यह प्रश्न शेष रहता है। उसका उत्तराी उन्होंने स्वयं दिया है। उनका कहना है-

(च) ‘‘वर्तमान मनुस्मृति से पूर्व दो अन्य ग्रन्थ विद्यमान थे। इनमें से एक ‘मानव अर्थशास्त्र’ अथवा ‘मानवराजशास्त्र’ अथवा ‘मानव राजधर्मशास्त्र’ के नाम से एक पुस्तक बतायी जाती थी। एक अन्य पुस्तक ‘मानव गृह्यसूत्र’ के नाम से जानी जाती थी।’’ (वही, भाग 7, पृ. 152)

इस प्रकार स्पष्ट हुआ कि डॉ. अम्बेडकर ने अपने आदिपुरुषों और आदि विधिप्रणेताओं प्राचीन-मनुओं और उन द्वारा रचित साहित्य की आलोचना नहीं की है उन्होंने 185 ईस्वी पूर्व पुष्यमित्र शुङ्ग के काल में ‘मनु’ छद्म नामधारी सुमति भार्गव और उनके द्वारा रचित जाति-पांति विधायक स्मृति की आलोचना की है।

(आ) शोध निष्कर्ष

    पाश्चात्य लेखकों की समीक्षा से प्रभावित होकर डॉ. अम्बेडकर ने मनुस्मृति का काल 185 ई0पृ0 माना और इसका आद्य रचयिता ‘सुमति भार्गव मनु’ को माना। प्राचीन वैदिक ग्रन्थों की परपरा का ज्ञान तथा उनका गभीर अध्ययन न होने के कारण डॉ0 अम्बेडकर इस विषय का तथ्यात्मक चिन्तन नहीं कर सके । उनसे यह भूल हुई है। गत पुष्ट प्रमाणों के आधार पर वास्तविकता यह है कि मनुस्मृति मूलतः स्वायभुव मनु की रचना है। यह आदिकालीन है। जैसा कि एक स्थान पर डॉ0 अम्बेडकर ने स्वयं लिखा है-

    ‘‘इससे प्रकट होता है केवल मनु ने विधान बनाया। जो स्वायभुव मनु था।’’(अंबेडकर वाङ्मय, खंड 8, पृ0 283)

इस मनु तथा इसके धर्मशास्त्र का उल्लेख प्राचीनतम संहिताग्रन्थों, ब्राह्मणग्रन्थों, आरण्यकों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत, गीता, बौद्धसाहित्य, जैनसाहित्य, पुराणों और प्राचीन शिलालेखों में आता है जो ईसापूर्व की कृतियां हैं। अतः मनुस्मृति को मूलतः और पूर्णतः सुमति भार्गव की आद्य रचना मानना एक ऐतिहासिक भूल है तथा साहित्यिक परपरा के विपरीत है। वंश-परपरा और काल-परपरा की कसौटी पर भी यह स्थापना गलत सिद्ध होती है।

डॉ0 अम्बेडकर ने जिस सुमति भार्गव का उल्लेख किया है,उन्होंने लिखा है कि उसकी चर्चा नारद-स्मृति में आती है। यह अनुमान विश्वास किये जाने योग्य है कि बौद्ध धर्म के हृास के बाद, ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुङ्ग (185 ई0) के द्वारा अपने राजा की हत्या करके स्वयं को राजा घोषित करने के उपरान्त, उसके द्वारा जब ब्राह्मणवाद की पुनः स्थापना हुई, तब सुमति भार्गव ने मनुस्मृति में पर्याप्त परिवर्तन-परिवर्धन किये हों और उसका एक नया संस्करण तैयार किया हो जिसमें वर्णव्यवस्था पर जन्मना जातिवाद की स्थापना करने की कोशिश की गयी है। यही कारण है कि मनुस्मृति में दोनों सिद्धान्तों का विधान करने वाले परस्पर-विरोधी श्लोक साथ-साथ पाये जाते हैं।

डॉ0 अम्बेडकर यदि इस पक्ष का विशेष विचार कर लेते कि मनुस्मृति में एक ओर गुण-कर्म-योग्यता पर आधारित व्यवस्था वाले, शूद्र और नारियों के पक्षधर, न्यायपूर्ण श्लोक हैं, जिनका कि स्वयं उन्होंनेाी समर्थन किया है तथा दूसरी ओर जाति-पांति, ऊंच-नीच, छूत-अछूत वर्णक एवं पक्षपातपूर्ण श्लोक हैं; किसी विद्वान् की रचना में यह दोष संभव नहीं है, फिर मनुस्मृति में क्यों हैं? तब उन्हें स्वतः उत्तर मिल जाता कि इसमें बाद के लोगों ने प्रक्षेप किये हैं। डॉ0 अम्बेडकर ने वेदों में पुरुष-सूक्त को प्रक्षिप्त माना, रामायण, महाभारत, गीता, पुराणों में प्रक्षेप होना स्वीकार किया, किन्तु मनुस्मृति में प्रक्षेपों का होना नहीं माना। यह न केवल आश्चर्यपूर्ण है, अपितु रहस्यमय भी है!! उन्होंने ऐसा क्यों नहीं स्वीकार किया, यह विचारणीय है ! उन्होंने इस विसंगति का उत्तर भी नहीं दिया कि मनुस्मृति में प्रकरणविरोधी और परस्परविरोधी श्लोक क्यों हैं? यदि वे इस बात का उत्तर देने को उद्यत होते तो उन्हें प्रक्षेपों की सच्चाई को स्वीकार करना ही पड़ता। फिर उन्हें मनु का ‘विरोध के लिए विरोध’ करने का विचार त्यागना पड़ता। यदि ऐसा होता तो क्या ही अच्छा होता!

(इ) संदेश-सार

अस्तु, इस विषय को और अधिक लंबा न करके डॉ0 अम्बेडकर की पूर्वोक्त मान्यताओं पर आते हैं जिनसे हमें ये संदेश मिलते हैं-

  1. डॉ0 अम्बेडकर का नाम लेकर बात-बात पर मनु एवं मनुस्मृति का विरोध करने और मनुवाद का नारा देने वाले उनके अनुयायियों का कर्त्तव्य बनता है कि उनकी इस विषयक स्पष्ट मान्यता आने के बाद अब उसे ईमानदारी से स्वीकार करें और आचरण में लायें। उन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि वे आदिपुरुष मनु का नहीं, अपितु छद्म नामधारी सुमति भार्गव का विरोध कर रहे हैं।

अब उन्हें ‘मनु’ और ‘मनुवाद’ शदों का प्रयोग छोड़कर ‘सुमति भार्गव’ और ‘सुमति भार्गववाद’ शदों का प्रयोग करना चाहिए। क्योंकि ‘मनु’ प्रयोग से भ्रान्ति फैलती है और निर्दोष आदि-पुरुषों का देश-विदेश में अपमान होता है। ऐसा करना अपने आदिपुरुषों के साथ अन्याय है। इस बात को यदि हम इस प्रकार समझें तो बात आसानी से समझ में आ जायेगी। जैसे, आज कोई व्यक्ति ‘अम्बेडकर ’ छद्म नाम रखकर जाति-पांति, ऊंच-नीच आदि कुप्रथाओं का समर्थक ग्रन्थ लिख दे, तो उसे संविधान प्रस्तोता अम्बेडकर का ग्रन्थ कहना और उस विचारधारा को ‘अम्बेडकर वाद’ कहना अनुचित होगा, उसी प्रकार जाति-पांति विषयक श्लोकों को ‘मनुरचित’ कहना या ‘मनुवाद’ कहना अनुचित है। क्योंकि आदिकालीन मनुओं के समय जाति-पांति नहीं थी, और जाति-पांति जब चली तब उन मनुओं का अस्तित्व नहीं था।

  1. उन्हें यह स्पष्ट बताना चाहिए कि हम उस ‘मनु’ छद्मनामधारी सुमति भार्गव रचित स्मृति के उन अंशों का विरोध कर रहे हैं जिसमें जातिवाद का वर्णन है और जो 185 ईसवी पूर्व लिखे गये थे। डॉ0 अम्बेडकर ने इसी सुमति भार्गव का विरोध किया है। साथ ही यह स्पष्ट कर दिया जाना चाहिए कि उन द्वारा प्रयुक्त ‘मनु’ नाम इसी व्यक्ति का छद्म नाम है।
  2. डॉ0 अम्बेडकर ने शूद्रों के भी ‘‘आदरणीय’’ ‘‘आदिपुरुष’’ मनु या मनुओं का कहीं भी विरोध कर उन्हें अपमानित नहीं किया, अपितु तत्कालीन व्यवस्था की प्रशंसा ही की है। डॉ0 अम्बेडकर का लक्ष्य यह नहीं था। डॉ0 अम्बेडकर के अनुयायियों को भी अपने ‘आदिपुरुष’ मनुओं का विरोध त्याग देना चाहिए।
  3. डॉ0 अम्बेडकर ने जिस छद्म नामधारी ‘मनु’ का विरोध किया है उस पर आरोप है कि उसने शूद्रों के लिए अत्याचार और अन्यायपूर्ण तथा अमानवीय व्यवस्थाएं निर्मित कीं, जिनके कारण शूद्र पिछड़ते चले गये और दलित हो गये। कोई कितनी भी निन्दा करे किन्तु जब भी दो विचारधाराओं में टकराव होता है तब विजेता विजित पर बदले की भावना से या आक्रोश में अमानवीय व्यवहार करता है और विपक्षी का भरसक दमन करता है। गत कुछ सहस्रादियों में ऐसा यदि ब्राह्मणों ने शूद्रों के साथ किया तो शूद्रों ने ब्राह्मणों के भी साथ किया। डॉ0 अम्बेडकर ने माना है कि‘‘इसके पश्चात् मौर्य हुए जिन्होंने ईसा पूर्व 322 से ईसा पूर्व 183 शतादी तक शासन किया, वे भी शूद्र थे।’’ ‘‘इस प्रकार लगभग 140 वर्षों तक मौर्य साम्राज्य रहा, ब्राह्मण दलित और दलितवर्गों की तरह रहे। बेचारे ब्राह्मणों के पास बौद्ध साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह करने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं था। यही विशेष कारण था, जिससे पुष्यमित्र ने मौर्यसम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह का नेतृत्व किया। (वही, भाग 7, ‘शूद्र और प्रतिक्रान्ति’, पृ0 323, ब्राह्मणवाद की विजय, पृ0 149)

(5) जोकुछ हुआ, वह वैचारिक वर्गसंघर्ष का परिणाम था। अपने-अपने समय में दोनों ने एक-दूसरे को ‘दलित’ बनाने में कोई कसर नहीं रखी। लेकिन दोनों को आज उस अतीत को भुलाकर लोकतान्त्रिक ढंग से रहना होगा। आज भारत में लोकतन्त्र-प्रणाली है और शासन-प्रशासन एक नये संविधान के अनुसार चलता है। इस प्रणाली में सभी समुदायों और महापुरुषों के लिए समान स्थान है। बात-बात पर किसी समुदाय या महापुरुष का विरोध करना और असहनशीलता का प्रदर्शन करना, कदापि उचित नहीं माना जा सकता। इससे एक नये वर्गसंघर्ष की आशंका बढ़ती जायेगी जो समरसता, सुधारीकरण की प्रक्रिया और लोकतन्त्र-प्रणाली के लिए अशुभ सिद्ध होगी।

  1. जो लोग अपने को ‘शूद्र’ समझते हैं और आी तक किसी कारण से स्वयं को ‘शूद्रकोटि’ में मानकर मानवीय स्वाभाविक अधिकारों से वंचित रखा हुआ है, मनु को धर्मगुरु मानने वाला और मनु के सिद्धान्तों तथा व्यवस्थाओं पर चलने वाला महर्षि दयानन्द द्वारा प्रवर्तित ‘आर्यसमाज’ योग्यतानुसार किसी भी वर्ण में दीक्षित होने का उनका आह्वान करता है और उन्हें व्यावहारिक अवसर देता है। जब आज का संविधान नहीं बना था, उससे बहुत पहले महर्षि दयानन्द ने मनुस्मृति के आदेशों के परिप्रेक्ष्य में छूत-अछूत, ऊंच-नीच, जाति-पांति, नारी-शूद्रों को न पढ़ाना, बाल-विवाह, अनमेल-विवाह, बहु-विवाह, सतीप्रथा, शोषण आदि को समाजिक बुराइयां घोषित करके उनके विरुद्ध संघर्ष का आह्वान किया था। नारियों के लिए गुरुकुल और विद्यालय खोले। अपनी शिक्षा संस्थाओं में कथित शूद्रों को प्रवेश दिया। परिणामस्वरूप वहां से शिक्षित सैकड़ों दलित युवक-युवतियां संस्कृत एवं वेद-शास्त्रों के विद्वान् स्नातक बन चुके हैं।

दलित जाति के लोग क्यों भूलते हैं कि उनकी अस्पृश्यता को मिटाने के लिए मनु के अनुगामी ऋषि दयानन्द के शिष्य कितने ही आर्यसमाजी स्वयं ‘अस्पृश्य’ बन गये थे, किन्तु उन्होंने अस्पृश्यता के विरुद्ध संघर्ष को नहीं छोड़ा। आज आर्यसमाज का वह संघर्ष स्वतन्त्रभारत का आन्दोलन बन चुका है। आज भी आर्यसमाज का प्रमुख लक्ष्य जातिभेद-उन्मूलन और सबको शिक्षा का समान अधिकार दिलाना है। दलित जन आर्यसमाज की शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश लेकर भेदभाव रहित परिवेश में वेदादिशास्त्रों का अध्ययन कर सकते हैं। आर्यसमाज सिद्धान्त और मानवीय, दोनों आधारों पर दलित एवं पिछड़े वर्गों का स्वाभाविक हितैषी है। जो दलित या अन्य लेखक दलितोत्थान में आर्यसमाज के योगदान से अनभिज्ञ रहकर आर्यसमाज पर भी संदेहात्मक प्रतिक्रिया करते हैं, यह उनकी अकृतज्ञता ही कही जायेगी।

बुद्धिमानी इसी में है कि दोनों को मिलकर अमानवीय व्यवस्थाओं, सामाजिक कुप्रथाओं, रूढ़- परपराओं तथा कुरीतियों के विरुद्ध प्रयत्न जारी रखने चाहियें। बहुत-सी कुप्रथाएं नष्ट-ा्रष्ट हो चुकी हैं, शेष भी हो जायेंगी। परस्पर आरोप-प्रत्यारोप में उलझने तथा प्रतिशोधात्मक मानसिकता अपनाने के बजाय, आइए, उस रूढ़-विचारधारा के विरुद्ध मिलकर संघर्ष करें। जिस विचारधारा ने संस्कृति और मानवता को कलंकित किया है, समाज को विघटित किया है, राष्ट्र को खण्डित किया है और जिसने असंय लोगों के जीवन को असमानता के नरक में धकेल कर नारकीय जीवन जीने को विवश किया है। आइए, उस नरक को स्वर्ग में बदलने का संकल्प लें।

 

डॉ अम्बेडकर के लेखन में परस्परविरोध: डॉ. सुरेन्द्र कुमार

डॉ0 अम्बेडकर ने शंकराचार्य की आलोचना करते हुए उनके लेखन में परस्परविरोधी कथन माने हैं। उन्होंने उन परस्परविरोधों के आधार पर शंकराचार्य के कथनों को अप्रामाणिक कहकर अमान्य घोषित किया है और यह कटु टिप्पणी की है कि जिसके लेखन में परस्परविरोध पाये जाते हैं, उसे ‘‘पागल’’ ही कहा जायेगा। (अम्बेडकर वाङ्मय, खंड 8, पृ0 289)

आश्चर्य का विषय है कि स्वयं डॉ0 अम्बेडकर के ग्रन्थ परस्परविरोधी कथनों से भरे पड़े हैं और पुनरुक्तियों की तो कोई गणना ही नहीं है। यह स्वीकृत तथ्य है कि परस्परविरोध नामक दोष से युक्त कथन न तो प्रमाण-कोटि में आता है, न मान्य होता है, और न आदरणीय। न्यायालय में भी उसको प्रमाण नहीं माना जाता। बुद्धिमानों में ऐसा त्रुटिपूर्ण लेखन समानयोग्य नहीं होता। ऐसे लेखन को पढ़कर पाठक जहां दिग्भ्रमित होता है वहीं उससे उसे निश्चयात्मक ज्ञान नहीं होता। ऐसा लेखन तब होता है जब लेखक अस्थिरचित्त हो, अनिर्णय की स्थिति में हो, अथवा भावुकताग्रस्त हो। पाठक इन बातों का निर्णय अग्रिम उल्लेखों को स्वयं पढ़कर करें।

डॉ0 अम्बेडकर के लेखन को, विशेषतः इस अध्याय में उद्धृत संदर्भों को पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि वे दो प्रकार की मनः- स्थिति में जीते रहे। जब उनका समीक्षात्मक मन उन पर प्रभावी होता था तो वे तर्कपूर्ण मत प्रकट करते थे, और जब प्रतिशोधात्मक मन प्रभावी होता था तो वे सारी मर्यादाओं को तोड़कर कटुतम शदों का प्रयोग करने लगते थे। उनका व्यक्तित्व बहुज्ञसपन्न किन्तु दुविधापूर्ण, समीक्षक किन्तु पूर्वाग्रहग्रस्त, चिन्तक किन्तु भावुक, सुधारक किन्तु प्रतिशोधात्मक था।

यहां परस्परिविरोधों को उद्धृत करने का मुय प्रयोजन यह भी दिखाना है कि डॉ0 अम्बेडकर ने अपने ग्रन्थों में मनुस्मृति के जिन श्लोकार्थों को प्रमाण रूप में उद्धृत किया है, उनमें परस्परविरोधी विधान हैं। एक श्लोकार्थ जो विधान कर रहा है, दूसरा उसके विपरीत विधान कर रहा है। डॉ0 अम्बेडकर ने दोनों तरह के श्लोकों को प्रमाण मानकर उद्धृत किया है। ऐसी स्थिति में ये प्रश्न उपस्थित होते हैं जिनका समाधान पाठकों को चाहिए-

  1. परस्परविरोधी श्लोकार्थ और मत, डॉ0 अम्बेडकर के लेखन में दोनों ही हैं। उनका ज्ञान डॉ0 अम्बेडकर को कैसे नहीं हुआ? उन्होंने दोनों को प्रस्तुत करते समय परस्परविरोध दोष पर ध्यान क्यों नहीं दिया? अथवा उनको स्वीकार क्यों नहीं किया?
  2. क्या कभी दोनों परस्परविरोधी वचन प्रामाणिक हो सकते हैं?
  3. क्या उनसे उनके लेखन की प्रामाणिकता नष्ट नहीं हुई है?
  4. परस्परविरोधी श्लोकार्थ मिलने पर क्या डॉ0 अम्बेडकर को मनु के किसी एक श्लोक को प्रक्षिप्त नहीं मानना चाहिए था? दोनों मौलिक कैसे माने जा सकते हैं?

यदि डॉ0 अम्बेडकर परस्परविरोध को स्वीकार कर एक को प्रक्षिप्त स्वीकार कर लेते तो उनकी मनुसबन्धी सारी आपत्तियों का निराकरण स्वतः हो जाता। न गलत निष्कर्ष प्रस्तुत होते, न उनका लेखन विद्वानों में अप्रमाणिक कोटि का माना जाता, न विरोध का बवंडर उठाना पड़ता। देखिए परस्परविरोधों के कुछ उदाहरण-

(1) क्या महर्षि मनु जन्मना जाति का जनक है?

आश्चर्य तो यह है कि इस बिन्दु पर डॉ0 अम्बेडकर के तीन प्रकार के परस्परविरोधी मत मिलते हैं। देखिए-

(अ)    मनु ने जाति का विधान नहीं बनाया अतः वह जाति का जनक नहीं

(क) ‘‘एक बात मैं आप लोगों को बताना चाहता हूं कि मनु ने जाति के विधान का निर्माण नहीं किया न वह ऐसा कर सकता था। जातिप्रथा मनु से पूर्व विद्यमान थी। वह तो उसका पोषक था।’’ (अम्बेडकर वाङ्मय, खंड 1, पृ0 29)

(ख) ‘‘कदाचित् मनु जाति के निर्माण के लिए जिमेदार न हो, परन्तु मनु ने वर्ण की पवित्रता का उपदेश दिया है।………वर्णव्यवस्था जाति की जननी है और इस अर्थ में मनु जातिव्यवस्था का जनक न भी हो परन्तु उसके पूर्वज होने का उस पर निश्चित ही आरोप लगाया जा सकता है।’’ (वही खंड 6, पृ0 43)

(आ) जाति-संरचना ब्राह्मणों ने की

(क) ‘तर्क में यह सिद्धान्त है कि ब्राह्मणों ने जाति-संरचना की।’’ (वही, खंड 1, पृ0 29)

(ख) ‘‘वर्ण-निर्धारण करने का अधिकार गुरु से छीनकर उसे पिता को सौंपकर ब्राह्मणवाद ने वर्ण को जाति में बदल दिया।’’ (वही, खंड 7, पृ0 172)

(इ) मनु जाति का जनक है

(क) ‘‘जाति-व्यवस्था का जनक होने के कारण विभिन्न जातियों की उत्पत्ति के लिए मनु को स्पष्टीकरण देना होगा।’’ (वही, खंड 6, पृ0 57)

(ख) ‘‘मनु ने जाति का सिद्धान्त निर्धारित किया है।’’ (वही, खंड 7, पृ0 228)

(ग) ‘‘वर्ण को जाति में बदलते समय मनु ने अपने उद्देश्य की कहीं व्याया नहीं की।’’ (वही, खंड 7, पृ0 168)

(2) चातुर्वर्ण्य व्यवस्था प्रशंसनीय या निन्दनीय

(अ) चातुर्वर्ण्य व्यवस्था प्रशंसनीय

(क) ‘‘प्राचीन चातुर्वर्ण्य पद्धति में दो अच्छाइयां थीं, जिन्हें ब्राह्मणवाद ने स्वार्थ में अंधे होकर निकाल दिया। पहली, वर्णों की आपस में एक दूसरे से पृथक् स्थिति नहीं थी। एक वर्ण का दूसरे वर्ण में विवाह, और एक वर्ण का दूसरे वर्ण के साथ भोजन, दो बातें ऐसी थी जो एक-दूसरे को आपस में जोड़े रखती थीं। विभिन्न वर्णों में असामाजिक भावना के पैदा होने के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी, जो समाज के आधार को ही समाप्त कर देती है।’’ (अंबेडकर वाङ्मय, खंड 7, पृ0 218)

(ख) ‘‘यह कहना कि आर्यों में वर्ण के प्रति पूर्वाग्रह था जिसके कारण इनकी पृथक् सामाजिक स्थिति बनी, कोरी बकवास होगी। अगर कोई ऐसे लोग थे जिनमें वर्ण के प्रति कोई पूर्वाग्रह नहीं था, तो वह आर्य थे।’’ (अंबेडकर वाङ्मय, खंड 7, पृ0 320)

(ग) ‘‘वर्ण-व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इन चारों वर्णों में शूद्र चौथा वर्ण है। यदि समाज केवल चार वर्णों में विभक्त मात्र रहता तो चातुर्वर्ण्यव्यवस्था में कोई आपत्ति न होती।’’ (शूद्रों की खोज, प्राक्कथन, पृ0 1)

(घ) ‘‘ब्राह्मणवाद ने समाज के आधार के रूप में वर्ण की मूल संकल्पना को किस प्रकार गलत और घातक स्वरूप दे दिया।’’ (वही, खंड 7, पृ0 169)

(ङ) ‘‘ब्राह्मणवाद ने प्रमुखतः जो कार्य किया, वह अन्तर्जातीय विवाह और सहभोज की प्रणाली को समाप्त करना था, जो प्राचीन काल में चारों वर्णों में प्रचलित थी।’’ (वही, खंड 7, पृ0 194)

(च) ‘‘बौद्ध पूर्व समय में चातुर्वर्ण्य व्यवस्था एक उदार व्यवस्था थी और उसमें गुंजाइश थी। चातुर्वर्ण्य व्यवस्था में जहां चार विभिन्न वर्गों के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया गया था, वहां इन वर्गों में आपस में विवाह सबन्ध करने पर कोई निषेध नहीं था। किसी भी वर्ण का पुरुष विधिपूर्वक दूसरे वर्ण की स्त्री के साथ विवाह कर सकता था।’’ (वही, खंड 7, पृ0 175)

(आ) चातुर्वर्ण्य व्यवस्था निन्दनीय

(क) ‘‘चातुर्वर्ण्य से और अधिक नीच सामाजिक संगठन की व्यवस्था कौन-सी है, जो लोगों को किसी भी कल्याणकारी कार्य करने के लिए निर्जीव तथा विकलांग बना देती है। इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं है।’’ (वही, खंड 6, पृ0 95)

(ख) ‘‘कोई व्यक्ति जो जन्मजात जड़बुद्धि या मूर्ख नहीं है, चातुर्वर्ण्य को समाज का आदर्श रूप कैसे स्वीकार कर सकता है?’’ (वही, खंड 1, ‘रानाडे, गांधी और जिन्ना’ पृ0 263)

(ग) ‘‘चातुर्वर्ण्य के ये प्रचारक बहुत सोच-समझकर बताते हैं कि उनका चातुर्वर्ण्य जन्म के आधार पर नहीं बल्कि गुण के आधार पर है। यहां पर पहले ही मैं बता देना चाहता हूं कि भले ही यह चातुर्वर्ण्य गुण के आधार पर हो, किन्तु यह आदर्श मेरे विचारों से मेल नहीं खाता।’’ (वही, खंड 1, पृ0 81)

(3) वेदों की चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था

(अ) वेदों का चातुर्वर्ण्य उत्तम और समानजनक-

(क) ‘‘शूद्र आर्यं समुदाय के अभिन्न, जन्मजात और समानित सदस्य थे। यह बात यजुर्वेद में उल्लिखित एक स्तुति से पुष्ट होती है।’’ (वही, खंड 7, पृ0 322)

(ख) ‘‘शूद्र आर्य समुदाय का सदस्य होता था और वह उसका समानित अंग था।’’ (वही, खंड 7, पृ0 322)

(ग) ‘‘मैं मानता हूं कि स्वामी दयानन्द व कुछ अन्य लोगों ने वर्ण के वैदिक सिद्धान्त की जो व्याया की है, बुद्धिमत्तापूर्ण है और घृणास्पद नहीं है। ’’ (वही, खंड 1, पृ0 119)

(घ) ‘‘चातुर्वर्ण्य की वैदिक पद्धति जाति व्यवस्था की अपेक्षा उत्तम थी।’’ (वही, खंड 7, पृ0 218)

(ङ) ‘‘वेद में वर्ण की धारणा का सारांश यह है कि व्यक्ति वह पेशा अपनाए, जो उसकी स्वाभाविक योग्यता के लिए उपयुक्त हो।…….वह (वैदिक वर्णव्यवस्था) केवल योग्यता को मान्यता देती है। वर्ण के बारे में महात्मा (गांधी) के विचार न केवल वैदिक वर्ण को मूर्खतापूर्ण बनाते हैं, बल्कि घृणास्पदाी बनाते हैं।……वर्ण और जाति दो अलग-अलग धारणाएं हैं।’’ (वही, खंड 1, पृ0 119)

(आ)   वेदों का चातुर्वर्ण्य समाज-विभाजन और असमानता का जनक-

(क) ‘‘यह निर्विवाद है कि वेदों ने चातुर्वर्ण्य के सिद्धान्त की रचना की है, जिसे पुरुषसूक्त नाम से जाना जाता है। यह दो मूलभूत तत्त्वों को मान्यता देता है। उसने समाज के चार भागों में विभाजन को एक आदर्श योजना के रूप में मान्यता दी है। उसने इस बात को भी मान्यता प्रदान की है कि इन चारों भागों के सबन्ध असमानता के आधार पर होने चाहिएं।’’ (अम्बेडकर वाङ्मय, खंड 6, पृ0 105)

(ख) ‘‘जातिप्रथा, वर्णव्यवस्था का नया संस्करण है, जिसे वेदों से आधार मिलता है।’’ (वही, खंड 9, पृ0 160)

(4) वर्णव्यवस्था और जातिव्यवस्था का सबन्ध

(अ) जातिव्यवस्था, वर्णव्यवस्था का विकृत रूप है

(क) ‘‘कहा जाता है कि जाति, वर्ण-व्यवस्था का विस्तार है। बाद में मैं बताऊंगा कि यह बकवास है। जाति वर्ण का विकृत स्वरूप है। यह विपरीत दिशा में प्रसार है। जात-पात ने वर्ण-व्यवस्था को पूरी तरह विकृत कर दिया है।’’ (वही, खंड 6, पृ0 181)

(ख) ‘‘जातिप्रथा चातुर्वर्ण्य का, जो कि हिन्दू का आदर्श है, एक भ्रष्ट रूप है।’’ (वही, खंड 1, पृ0 263)

(ग) ‘‘अगर मूल वर्ण पद्धति का यह विकृतीकरण केवल सामाजिक व्यवहार तक सीमित रहता, तब तक तो सहन हो सकता था। लेकिन ब्राह्मण धर्म इतना कर चुकने के बाद भी संतुष्ट नहीं रहा। उसने इस चातुर्वर्ण्य पद्धति के परिवर्तित तथा विकृत रूप को कानून बना देना चाहा।’’ (वही, खंड 7, पृ0 216)

(आ) जातिव्यवस्था, वर्णव्यवस्था का विकास है

(क) ‘‘वर्णव्यवस्था जाति की जननी है।’’ (वही, खंड 6, ‘हिन्दुत्व का दर्शन’ पृ0 43)

(ख) ‘‘कुछ समय तक ये वर्ण केवल वर्ण ही रहे। कुछ समय के बाद जो केवल वर्ण ही थे, वे जातियां बन गईं और ये चार जातियां चार हजार बन गईं। इस प्रकार आधुनिक जाति-व्यवस्था प्राचीन वर्ण-व्यवस्था का विकास मात्र है।’’

‘‘निस्ंसदेह यह जाति व्यवस्था का ही विकास है। लेकिन वर्ण व्यवस्था के अध्ययन द्वारा कोईाी जाति-व्यवस्था के विचार को नहीं समझ सकता है। जाति का वर्ण से पृथक् अध्ययन किया जाना चाहिए।’’ (वही, खंड 6, पृ0 176)

(5) शूद्र आर्य या अनार्य?

(अ) शूद्र मनुमतानुसार आर्य थे

(क) ‘‘धर्मसूत्रों की यह बात कि शूद्र अनार्य हैं, नहीं माननी चाहिए। यह सिद्धान्त मनु तथा कौटिल्य के विपरीत है।’’ (शूद्रों की खोज, पृ0 42)

(ख) ‘‘आर्य जातियों का अर्थ है चार वर्ण-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। दूसरे शदों में मनु चार वर्णों को आर्यवाद का सार मानते हैं।’’….[ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः त्रयो वर्णाः’’ (मनु0 10.04)] यह श्लोक दो कारणों से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। एक तो यह कि इसमें शूद्रों को दस्यु से भिन्न बताया गया है। दूसरे, इससे पता चलता है कि शूद्र आर्य हैं।’’ (अंबेडकर वाङ्मय, खंड 8, पृ0 217)

(आ) शूद्र मनुमतानुसार अनार्य थे

(क) ‘‘मनु शूद्रों का निरूपण इस प्रकार करता है, जैसे वे बाहर से आने वाले अनार्य थे।’’ (वही, खंड 7, पृ0 319)

(6) शूद्रों का वेदाध्ययन-अधिकार

(अ) वेदों में समानपूर्वक शूद्रों का अधिकार था

(क) ‘‘वेदों का अध्ययन करने के बारे में शूद्रों के अधिकारों के प्रश्न पर ‘छान्दोग्य उपनिषद्’ उल्लेखनीय है।…….एक समय ऐसा भी था, जब अध्ययन के सबन्ध में शूद्रों पर कोई प्रतिबन्ध नहीं था।’’ (वही, खंड 7, पृ0 324)

(ख) ‘‘केवल यही बात नहीं थी कि शूद्र वेदों का अध्ययन कर सकते थे। कुछ ऐसे शूद्र थी थे, जिन्हें ऋषि-पद प्राप्त था और जिन्होंने वेदमन्त्रों की रचना की। कवष एलूष नामक ऋषि की कथा बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। वह एक ऋषि था और ऋग्वेद के दसवें मंडल में उसके रचे हुए अनेक मन्त्र हैं।’’ (वही, खंड 7, पृ0 324)

(ग) ‘‘शतपथ ब्राह्मण में ऐसा प्रमाण मिलता है कि शूद्र सोम यज्ञ कर सकता था।’’ (वही, खंड 7, पृ0 324)

(घ) ‘‘ऐसेाी प्रमाण हैं कि शूद्र स्त्री ने ‘अश्वमेध’ नामक यज्ञ में भाग लिया था।’’ (वही, खंड 7, पृ0 325)

(ङ) ‘‘जहां तक उपनयन संस्कार और यज्ञोपवीत धारण करने का प्रश्न है, इस बात का कहीं कोई प्रमाण नहीं मिलता कि यह शूद्रों के लिए वर्जित था। बल्कि ‘संस्कार गणपति’ में इस बात का स्पष्ट प्रावधान है और कहा गया है कि शूद्र उपनयन के अधिकारी हैं।’’ (वही, खंड 7, पृ0 325-326)

(आ) वेदों में शूद्रों का अधिकार नहीं था

(क) ‘‘वेदों के ब्राह्मणवाद में शूद्रों का प्रवेश वर्जित था, लेकिन भिक्षुओं के बौद्ध धर्म के द्वार शूद्रों के लिए खुले हुए थे।’’ (वही, खंड 7, पृ0 197)

(7) शूद्र का सेवाकार्य स्वेच्छापूर्वक

(अ) शूद्र सेवाकार्य में स्वतन्त्र है

(क) ‘‘ब्रह्मा ने शूद्रों के लिए एक ही व्यवसाय नियत किया है-विनम्रता पूर्वक तीन अन्य वर्णों अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करना [मनु0 1.91]।’’ (अंबेडकर वाङ्मय, खंड 7, पृ0 318, 201, 231; खंड 6, पृ0 62, 142; खंड 9, पृ0 105, 109, 177, खंड 13, पृ0 30 आदि)

(ख) ‘‘यदि कोई शूद्र (जो ब्राह्मणों की सेवा से अपना जीवन-निर्वाह नहीं कर पाता है) जीविका चाहता है तब वह क्षत्रिय की सेवा करे या वह किसी धनी वैश्य की सेवा कर अपना जीवन-निर्वाह करे (मनु0 10.121)।’’ (वही, खंड 9, पृ0 116, 177; खंड 6, पृ0 152;)

(आ) शूद्र को केवल ब्राह्मण की सेवा करनी है

(क) ‘‘परन्तु शूद्र को ब्राह्मण की सेवा करनी चाहिए [10.122]।’’ (वही, खंड 6, पृ0 61, 152; खंड 9, पृ0 177)

(ख) ‘‘ब्रह्मा ने ब्राह्मणों की सेवा के लिए ही शूद्रों की सृष्टि की है [मनु0 8.413]।’’ (वही, खंड 7, पृ0 200; खंड 9, पृ0 177,)

(ग) ‘‘ब्राह्मणों की सेवा करना शूद्र के लिए एकमात्र उत्तम कर्म कहा गया है क्योंकि इसके अतिरिक्त वह जो कुछ करेगा, उसका उसे कोई फल नहीं मिलेगा (मनु0 10.123)।’’ (वही, खंड 9, पृ0 113, 177; खंड 6, पृ0 98; खंड 7, पृ0 234)

(8) शूद्र वेतनभोगी सेवक या पराधीन?

(अ) शूद्र को उचित वेतन और जीविका दें

(क) ‘‘शूद्र की क्षमता, उसका कार्य तथा उसके परिवार में उस पर निर्भर लोगों की संया को ध्यान में रखते हुए वे लोग उसे अपनी पारिवारिक संपत्ति से उचित वेतन दें (मनु0 10.124)।’’ (अंबेडकर वाङ्मय, खंड 6, पृ0 62, 152; खंड 7, पृ0 201, 234, 318; खंड 9, पृ0 116, 178)

(ख) ‘‘वेद में वर्ण की धारणा का सारांश यह है कि व्यक्ति वह पेशा अपनाए जो उसकी स्वाभाविक योग्यता के लिए उपयुक्त हो।’’ (वही, खंड 1, पृ0 119)

(आ) शूद्र गुलाम था

(क) ‘‘मनु ने गुलामी को मान्यता प्रदान की है। परन्तु उसने उसे शूद्र तक ही सीमित रखा।’’ (वही, खंड 6, पृ0 45)

(ख) ‘‘अपने अन्न का शेष भाग और उसके साथ ही पुराने कपड़े अनावश्यक अनाज और अपने घर का साज-सामान उसे देना चाहिए (मनु0 10.125)।’’ (वही, खंड 6, पृ0 62, 152; खंड 7, पृ0 201, 234, 318; खंड 9, पृ0 116, 178)

(ग) ‘‘प्रत्येक ब्राह्मण शूद्र को दास कर्म करने के लिए बाध्य कर सकता है, चाहे उसने उसे खरीद लिया हो अथवा नहीं, क्योंकि शूद्रों की सृष्टि ब्राह्मणों का दास बनने के लिए ही की है [मनु0 8.413]।’’ (वही, खंड 7, पृ0 318)

(घ) ‘‘उनका (शूद्रों का) भोजन आर्यों के भोजन का उच्छिष्ट अंश होगा (मनु0 5.140)।’’ (वही, खंड 9, पृ0 113)

(9) मनु की दण्डव्यवस्था कौन-सी है?

(अ) ब्राह्मण सबसे अधिक दण्डनीय और शूद्र सबसे कम

‘‘यदि पिता, शिक्षक, मित्र, माता, पत्नी, पुत्र, घरेलू पुरोहित, अपने-अपने कर्त्तव्य का दृढ़ता व सच्चाई के साथ निष्पादन नहीं करते हैं तो इनमें से किसी को भी राजा द्वारा बिना दंड के नहीं छोड़ा जाना चाहिए।’’ (मनु0 8.335,336) (अंबेडकर वाङ्मय, खंड 6, पृ0 61, 156 तथा खंड 7, 250)

(ख) ‘‘चोरी करने पर शूद्र को आठ गुना, वैश्य को सोलह गुना, और क्षत्रिय को बत्तीस गुना पाप होता है। ब्राह्मण को चौंसठ गुना या एक सौ गुना या एक सौ अठाईस गुना तक, इनमें से प्रत्येक को अपराध की प्रकृति की जानकारी होती है [मनु0 8.337, 338]।’’ (वही, खंड 7, पृ0 163)

(आ) ब्राह्मण दण्डनीय नहीं है, शूद्रादि अधिक दण्डनीय

(क) ‘‘पुरोहित वर्ग के व्यभिचारी को प्राणदंड देने की बजाए उसका अपकीर्तिकर मुंडन करा देना चाहिए तथा इसी अपराध के लिए अन्य वर्गों को मृत्युदंड तक दिया जाए (मनु0 8.379)।’’ (वही, खंड 6, पृ0 49)

(ख) ‘‘(राजा) किसी भी ब्राह्मण का वध न कराए, चाहे उस ब्राह्मण ने साी अपराध क्यों न किए हों, वह ऐसे (अपराधी को) अपने राज्य से निष्कासित कर दे और उसे (अपनी) समस्त सपत्ति और अपना (शरीर) सकुशल ले जाने दे (मनु0 8.380)। (अम्बेडकर वाङ्मय खंड 9, पृ0 115 तथा खंड 6, पृ0 49, 150 तथा खंड 7, पृ0 161)’’

(ग) ‘‘लेकिन न्यायप्रिय राजा तीन निचली जातियों (वर्णों) के व्यक्तियों को आर्थिक दंड देगा और उन्हें निष्कासित कर देगा, जिन्होंने मिथ्या साक्ष्य दिया है, लेकिन ब्राह्मण को वह केवल निष्कासित करेगा (मनु0 8.123, 124)।’’ (वही खंड 7, पृ0 161, 245)

(घ) ‘‘कोई भी ब्राह्मण जिसने चाहे तीनों लोकों के मनुष्यों की हत्याएं क्यों न की हों, उपनिषदों के साथ-साथ ऋक्, यजु या सामवेद का तीन बार पाठ कर साी पापों से मुक्त हो जाता है। (मनु0 11.261-262)।’’ (वही, खंड 7, पृ0 158)

(10) शूद्र का ब्राह्मण बनना

(अ) आर्यों में शूद्र ब्राह्मण बन सकता था

(क) ‘‘इस प्रक्रिया में यह होता था कि जो लोग पिछली बार केवल शूद्र होने के योग्य बच जाते थे, ये ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य होने के लिए चुन लिए जाते थे, जब कि पिछली बार जो लोग ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य होने के लिए चुने गए होते थे, वे केवल शूद्र होने के योग्य होने के कारण रह जाते थे। इस प्रकार वर्ण के व्यक्ति बदलते रहते थे।’’ (वही, खंड 7, पृ0 170)

(ख) ‘‘अन्य समाजों के समान भारतीय समाज भी चार वर्णों में विभाजित था।…….इस बात पर विशेष ध्यान देना होगा कि आरंभ में यह अनिवार्य रूप से वर्ग विभाजन के अन्तर्गत व्यक्ति दक्षता के आधार पर अपना वर्ण बदल सकता था और इसीलिए वर्णों को व्यक्तियों के कार्य की परिवर्तनशीलता स्वीकार्य थी।’’ (वही, खंड 1, पृ0 31)

(ग) ‘‘जिस प्रकार कोई शूद्र ब्राह्मणत्व को और कोई ब्राह्मण शूद्रत्व को प्राप्त होता है, उसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य से उत्पन्न शूद्र भी क्षत्रियत्व और वैश्यत्व को प्राप्त होता है (मनुस्मृति 10.65)’’ (वही, खंड 13, पृ0 85)

(घ) ‘‘प्रत्येक शूद्र जो शुचिपूर्ण है, जो अपने से उत्कृष्टों का सेवक है, मृदुभाषी है, अहंकाररहित है, और सदा ब्राह्मणों के आश्रित रहता है, वह उच्चतर जाति प्राप्त करता है (मनु0 9.335)’’ (वही, खंड 9, पृ0 117)

(आ) आर्यों में शूद्र ब्राह्मण नहीं बन सकता था

(क) ‘‘आर्यों के समाज में शूद्र अथवा नीच जाति का मनुष्य कभी ब्राह्मण नहीं बन सकता था।’’ (अम्बेडकर वाङ्मय, खंड 7, पृ0 93)

(ख) ‘‘वैदिक शासन में शूद्र ब्राह्मण बनने की कभी आकांक्षा नहीं कर सकता था।’’ (वही, खंड 7, पृ0 197)

(ग) ‘‘उच्च वर्ण में जन्मे और निम्न वर्ण में जन्मे व्यक्ति की नियति उसका जन्मजात वर्ण ही है।’’ (वही, खंड 6, पृ0 146)

(11) ब्राह्मण कौन हो सकता था?

(अ) वेदों का विद्वान् ब्राह्मण होता था

(क) ‘‘स्वयंभू मनु ने ब्राह्मणों के कर्त्तव्य वेदाध्ययन, वेद की शिक्षा देना, यज्ञ करना, अन्य को यज्ञ करने में सहायता देना और अगर वह धनी है, तब दान देना और अगर निर्धन है, तब दान लेना निश्चित किए (मनु0 1.88)।’’ (अंबेडकर वाङ्मय, खंड 7, पृ0 230; खंड 6, पृ0 142; खंड 9, पृ0 104; खंड 13, पृ0 30)

(ख) ‘‘वेदों का अध्ययन-अध्यापन, यज्ञ करना, अन्य को यज्ञ करने में सहायता देना, यदि पर्याप्त सपत्ति है तब निर्धनों को दान देना, यदि स्वयं निर्धन है तब पुण्यशील व्यक्तियों से दान लेना, ये छह कर्त्तव्य प्रथम उत्पन्न वर्ण (ब्राह्मणों) के हैं (मनु0 10.75)।’’ (वही, खंड 7, पृ0 160, 231; खंड 6, पृ0 142; खंड 9, पृ0 113)

(ग) ‘‘वर्ण के अधीन कोई ब्राह्मण मूढ़ नहीं हो सकता। ब्राह्मण के मूढ़ होने की संभावना तभी हो सकती है, जब वर्ण जाति बन जाता है, अर्थात् जब कोई जन्म के आधार पर ब्राह्मण हो जाता है।’’ (वही, खंड 7, पृ0 173)

(आ) वेदाध्ययन से रहित मूर्खाी ब्राह्मण होता था

(क) ‘‘कोई भी ब्राह्मण जो जन्म से ब्राह्मण है अर्थात् जिसने न तो वेदों का अध्ययन किया है और न वेदों द्वारा अपेक्षित कोई कर्म किया है, वह राजा के अनुरोध पर उसके लिए धर्म का निर्वचन कर सकता है अर्थात् न्यायाधीश के रूप में कार्य कर सकता है, लेकिन शूद्र यह कभीाी नहीं कर सकता, चाहे वह कितना ही विद्वान् क्यों न हो (मनु0 8.20)।’’ (वही, खंड 7, पृ0 317; खंड 9, पृ0 109, 176; खंड 13, 30)

(ख) ‘‘जिस प्रकार शास्त्रविधि से स्थापित अग्नि और सामान्य अग्नि दोनों ही श्रेष्ठ देवता हैं, उसी प्रकार चाहे वह मूर्ख हो या विद्वान्, दोनों ही रूपों में श्रेष्ठ देवता है (मनु0 9.317)।’’ (वही, खंड 7, पृ0 230; खंड 6, पृ0 155; 101)

(12) मनुस्मृति विषयक मान्यता

(अ) मनुस्मृति धर्मग्रन्थ और नीतिशास्त्र है

(क) ‘‘इस प्रकार मनुस्मृति कानून का ग्रन्थ है…….चूंकि इसमें जाति का विवेचन है जो हिन्दू धर्म की आत्मा है, इसलिए यह धर्मग्रन्थ है।’’ (वही, खंड 7, पृ0 226)

(ख) ‘‘मनुस्मृति को धर्मग्रन्थ के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।’’ (वही, खंड 7, पृ0 228)

(ग) ‘‘अगर नैतिकता और सदाचार कर्त्तव्य है, तब निस्संदेह मनुस्मृति नीतिशास्त्र का ग्रन्थ है।’’ (वही, खंड 7, पृ0 226)

(आ) मनुस्मृति धर्मग्रन्थ और नीतिशास्त्र नहीं है

(क) ‘‘यह कहना कि मनुस्मृति एक धर्मग्रन्थ है, बहुत कुछ अटपटा लगता है।’’ (वही, खंड 7, पृ0 226)

(ख) ‘‘हम कह सकते हैं कि मनुस्मृति नियमों की एक संहिता है। यह कथन अन्य स्मृतियों के बारे मेंाी सच है। यह न तो नीतिशास्त्र है और न ही कोई धार्मिक ग्रन्थ है।’’ (वही, खंड 7, पृ0 224)

(13) समाज में पुजारी की आवश्यकता

(अ) पुजारी आवश्यक था बौद्ध धर्म के लिए

(क) बौद्ध धर्म के समर्थन में डॉ0 अम्बेडकर लिखते हैं-‘‘धर्म की स्थापना केवल प्रचार द्वारा ही की जा सकती है। यदि प्रचार असफल हो जाए तो धर्म भी लुप्त हो जाता है। पुजारी वर्ग, वह चाहे जितना भी घृणास्पद हो, धर्म के प्रवर्तन के लिए आवश्यक होता है। धर्म, प्रचार के आधार पर ही रह सकता है। पुजारियों के बिना धर्म लुप्त हो जाता है। इस्लाम की तलवार ने (बौद्ध) पुजारियों पर भारी आघात किया। इससे वह या तो नष्ट हो गया या भारत के बाहर चला गया।’’ (वही, खंड 7, पृ0 108)

(आ) हिन्दू धर्म में पुजारी नहीं हो

हिन्दू धर्म का विरोध करते हुए वे लिखते हैं-

(क) ‘‘अच्छा होगा, यदि हिन्दुओं में पुरोहिताई समाप्त की जाए।’’ (वही, खंड 1, पृ0 101)

डा. अम्बेडकर द्वारा मनु के श्लोकों के अशुद्ध अर्थ करके उनसे विरोधी निष्कर्ष निकालना : डॉ. सुरेन्द्र कुमार

डॉ. अम्बेडकर द्वारा मनु के श्लोकों का अशुद्ध अर्थ करना और उन अशुद्ध अर्थों के आधार पर अशुद्ध और मनु-विरोधी निष्कर्ष प्रस्तुत करना, इन दोनों ही कारणों से डॉ0 साहब के लेखन की प्रामणिकता नष्ट हुई है। वे अर्थ, चाहे अनजाने में किये गये हैं अथवा जान बूझकर, वे संस्कृत भाषा और उसके व्याकरण के अनुसार अशुद्ध हैं। संस्कृत भाषा का साधारण ज्ञाता भी तुरन्त समझ लेता है कि वे अर्थ गलत हैं। बुद्धिमानों में अशुद्ध लेखन कभी मान्य नहीं होता। यद्यपि डॉ0 अम्बेडकर कृत अशुद्ध अर्थ पर्याप्त संया में हैं, तथापि यहां स्थालीपुलाक न्याय से कुछ ही श्लोकार्थ उद्घृत करके उनका सही अर्थ और समीक्षा दी जा रही है। इस लेखन से दो संकेत मिलते हैं-या तो दूसरों के अनुवादों पर निर्भरता के कारण और स्वयं संस्कृत ज्ञान न होने कारण ये अशुद्धियां हुई हैं, या राजनीतिक लक्ष्य से विरोध करने के लिए जान-बूझकर कर उन्होंने अशुद्ध अर्थ किये हैं। पाठक देखें-

(1)    अशुद्ध अर्थ करके मनु के काल में भ्रान्ति पैदा करना और मनु को बौद्ध-विरोधी सिद्ध करना :-

(क)    पाखण्डिनो विकर्मस्थान् वैडालव्रतिकान् शठान्।      

       हैतुकान् वकवृत्तींश्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत्॥ (4.30)

    डॉ0 अम्बेडकर कृत अर्थ :-‘‘वह (गृहस्थ) वचन से भी विधर्मी, तार्किक (जो वेद के विरुद्ध तर्क करे) को समान न दे।’’ ‘‘मनुस्मृति में बौद्धों और बौद्ध धर्म के विरुद्ध स्पष्ट व्यवस्थाएं दी गई हैं।’’(अम्बेडकर वाङ्मय, ब्राह्मणवाद की विजय, पृ0 153)

    शुद्ध अर्थ :-‘पाखण्डियों, विरुद्ध कर्म करने वालों अर्थात् अपराधियों, बिल्ली के समान छली-कपटी जनों, धूर्तों, कुतर्कियों, बगुलाभक्त लोगों का, अपने घर आने पर, वाणी सेाी सत्कार न करे।’

    समीक्षा-इस श्लोक में आचरणहीन लोगों की गणना है और उनका वाणी से भी आतिथ्य न करने का निर्देश है। यहां ‘विकर्मी अर्थात् विरुद्ध कर्म करने वालों’ का बलात् विधर्मी अर्थ कल्पित करके फिर उसका अर्थ बौद्ध कर लिया है। विकर्मी का ‘विधर्मी’ अर्थ किसी भी प्रकार नहीं बनता। ऐसा करके सभी भाष्यकार और डॉ. अम्बेडकर , मनु को बौद्धों से परवर्ती और बौद्ध-विरोधी सिद्ध करना चाहते हैं। यह कितनी बेसिरपैर की कल्पना है!! बुद्ध से हजारों पीढ़ी पूर्व उत्पन्न मनु की स्मृति में परवर्ती बौद्धों की चर्चा कैसे हो सकती है? ऐसे अशुद्ध अर्थ बुद्धिमानों में कभी मान्य नहीं हो सकते।

(ख) या वेदबाह्याः स्मृतयः याश्च काश्च कुदृष्टयः।

सर्वास्ता निष्फलाः प्रेत्य तमोनिष्ठा हि ताः स्मृताः॥ (12.95)

अर्थ-डॉ0 अम्बेडकर कृत जो वेद पर आधारित नहीं हैं, मृत्यु के बाद कोई फल नहीं देतीं, क्योंकि उनके बारे में यह घोषित है कि वे अंधकार पर आधारित हैं। ‘‘मनु के शदों में विधर्मी बौद्ध धर्मावलबी हैं।’’ (वही, पृ0 158)

शुद्ध अर्थ-‘वेदोक्त’ सिद्धान्तों के विरुद्ध जो मान्यताएं, ग्रन्थ हैं (असुरों, नास्तिकों आदि के बनाये हुए), और जो कोई कुसिद्धान्त हैं, वे सब श्रेष्ठ फल से रहित हैं। वे परलोक और इस लोक में अज्ञानान्धकार एवं दुःख में फंसाने वाले हैं।’

समीक्षा-इस श्लोक के किसी शद से यह भासित नहीं होता कि इसमें बौद्ध धर्म का खण्डन है। जब मनु के समय में ही वर्णबाह्य अनार्य, असुर आदि लोग थे, तो उनकी भिन्न विचारधाराएं भी थीं, जो वेद विरुद्ध थीं। उनको छोड़कर इसे बौद्धों से जोड़ना अपनी अज्ञानता और पूर्वाग्रह को दर्शाना है। ऐसा करके साी लेखक, चाहे वे पाश्चात्य हैं या भारतीय, मनु के स्थितिकाल के विषय में भ्रम फैला रहे हैं और मनुस्मृति के भावों को स्वेच्छाचारिता एवं दुर्भावना-पूर्वक विकृत कर रहे हैं। इसे कहते हैं विरोध के लिए सत्य को तिलांजलि देना!

(ग)    कितवान् कुशीलवान् क्रूरान् पाखण्डस्थांश्च मानवान्।

       विकर्मस्थान् शौण्डिकांश्च क्षिप्रं निर्वासयेत् पुरात्। (9.225)

    डॉ. अम्बेडकर कृत अर्थ :-‘‘जो मनुष्य विधर्म का पालन करते हैं……. राजा को चाहिए कि वह उन्हें अपने साम्राज्य से निष्कासित कर दे।’’(वही, खंड 7, ब्राह्मणवाद की विजय, पृ0152)

    शुद्ध अर्थ :-‘जुआरियों, अश्लील नाच-गान करने वालों, अत्याचारियों, पाखण्डियों, विरुद्ध या बुरे कर्म करने वालों, शराब बेचने वालों को राजा अपने राज्य से शीघ्रातिशीघ्र निकाल दे।’

समीक्षा :- संस्कृत पढ़ने वाला छोटा बच्चा भी जानता है कि कर्म, सुकर्म,विकर्म, दुष्कर्म, अकर्म इन शदों में कर्म ‘क्रिया’ या ‘आचरण’ का अर्थ देते है। इस श्लोक में ‘‘विकर्मस्थ’’ का अर्थ है-विपरीत, या विरुद्ध कर्म करने वाले लोग अर्थात् बुरे या निर्धारित कर्मों के विपरीत कर्म करने वाले लोग। इसमें कर्म का ‘धर्म’ अर्थ नहीं है। किन्तु डॉ0 अम्बेडकर ने यहा बलात् ‘धर्म’ अर्थ करके ‘विधर्मी’ यह अनर्थ किया है। ऐसा करके अनर्थकर्त्ता का प्रयोजन यह है कि वह विधर्मी से ‘बौद्धधर्मी’ मनमाना अर्थ लेना चाहता है और फिर मनु तथा मनुस्मृति को बौद्ध धर्म के बाद का ग्रन्थ बताकर मनु को बौद्धविरोधी सिद्ध करना चाहता है, जबकि पूर्वप्रदत्त प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है कि ‘मनुस्मृति’ बौद्धकाल से बहुत पहले की रचना है। क्या मनुविरोधियों का यही तटस्थ और कथित ऐतिहासिक एवं सत्य अनुसन्धान है?

(2)    अशुद्ध अर्थ करके मनु को ब्राह्मणवादी कहकर बदनाम करना

(क) सैनापत्यं च राज्यं च दण्डेनतृत्वमेव च।

         सर्वलोकाघिपत्यं च वेदशास्त्रविदर्हति॥ (12.100)

डॉ0 अम्बेडकर कृत अर्थ :-‘‘राज्य में सेनापति का पद, शासन के अध्यक्ष का पद, प्रत्येक के ऊपर शासन करने का अधिकार ब्राह्मण के योग्य है।’’ (वही, पृ0 148)

    शुद्ध अर्थ :-‘सेनापति का कार्य, राज्यप्रशासन का कार्य, दण्ड और न्याय करने का कार्य, चक्रवर्ती सम्राट् होना, इन कार्यों को भली-भांति करने की योग्यता वेदशास्त्रों का विद्वान् ही रखता है। अर्थात् वही इन पदों के योग्य है।’

    समीक्षा :-पाठक देखें कि मनु ने इस श्लोक में कहीं भी ब्राह्मण पद का प्रयोग नहीं किया है। वेद-शास्त्रों के विद्वान् तो क्षत्रिय और वैश्य भी होते थे। मनु स्वयं राजर्षि था और अपने समय का सर्वोच्च वेदशास्त्रज्ञ था [द्रष्टव्य मनु0 1.4]। यहां भी क्षत्रिय की योग्यता वर्णित की है। ब्राह्मण शद बलात् श्लोकार्थ में जोड़ लिया है। इसका लक्ष्य यह है कि इससे मनुस्मृति को ब्राह्मणवादी शास्त्र कहकर बदनाम करने का अवसर मिले। इसमें ‘वेदशास्त्रविद्’ शद है जिसका अर्थ स्पष्टतः ‘वेदशास्त्रों का विद्वान्’ होता है मनु की व्यवस्था के अनुसार ये क्षत्रिय के कार्य हैं (देखिए 1.89 श्लोक)। अतः यहां ‘वेदशास्त्रों का विद्वान् क्षत्रिय’ अर्थ है। ब्राह्मण अर्थ करना मनुमत के विरुद्ध भी है क्योंकि मनुमतानुसार ये ब्राह्मण के कार्य हैं ही नहीं। इस प्रकार पक्षपातपूर्ण और अशुद्ध अर्थ करना किसी भी लेखक व समीक्षक के लिए उचित नहीं है।

(ख) कार्षापणं भवेद्दण्ड्यो यत्रान्यः प्राकृतो जनः।

         तत्र राजाावेद्दण्ड्यःसहस्रमिति   धारणा॥ (8.336)

    डॉ0 अम्बेडकर कृत अर्थ :-‘‘जहां निम्न जाति का कोई व्यक्ति एक पण से दण्डनीय है, उसी अपराध के लिए राजा एक सहस्र पण से दण्डनीय है और वह यह जुर्माना ब्राह्मणों को दे या नदी में फेंक दे, यह शास्त्र का नियम है।’’ (वही, हिन्दू समाज के आचार-विचार पृ0 250)

शुद्ध अर्थ :- जिस अपराध में साधारण मनुष्य एक कार्षापण (= पैसा) से दण्डित किया जाये, उसी अपराध में राजा को एक हजार पैसा (हजार गुणा) दण्ड होना चाहिए। यह दण्ड का मान्य सिद्धान्त है।

समीक्षा :-अर्थ में काले अक्षरों में अंकित वाक्य मनमाने ढंग से कल्पित हैं, जो श्लोक के किसी पद से नहीं निकलते। यह अनर्थ मनु को ब्राह्मणवादी होने का भ्रम फैलाने के लिए या फिर नदी में फैंकने की बात कहकर उसे मूर्ख और अन्धविश्वासी दिखाने के लिए किया गया है। एक ऊंचे आदर्शात्मक विधान को भी किस प्रकार निम्न स्तर का दिखाने की कोशिश है! पाठक इस रहस्य पर विचार करें।

(ग)    शस्त्रं द्विजातिभिर्ग्राह्यं धर्मो यत्रोपरुध्यते।

       द्विजातीनां च वर्णानां विप्लवे कालकारिते॥       (8.348)

    डॉ. अम्बेडकर कृत अर्थ :-‘‘जब ब्राह्मणों के धर्माचरण में बलात् विघ्न होता हो, तब द्विज शस्त्रास्त्र ग्रहण कर सकते हैं,और तब भी जब किसी समय द्विज वर्ग पर कोई भंयकर विपत्ति आ जाए।’’ (वही, हिन्दू समाज के आचार विचार, पृ0 250)

    शुद्ध अर्थ :-‘जब द्विजातियों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों) के धर्मपालन में बाधा उत्पन्न की जा रही हो और किसी समय या किसी परिस्थिति के कारण उनमें विद्रोह उत्पन्न हो गया हो, तो उस समय द्विजों को भी शस्त्रधारण कर लेना चाहिए।’

समीक्षा :-पाठक ध्यान दें, इस श्लोक के अर्थ में ब्राह्मण शद बलात् प्रक्षिप्त किया है क्योंकि इस श्लोक में ब्राह्मण शद है ही नहीं। बहुवचन में स्पष्टतः तीनों द्विजातियों का उल्लेख है। यहां भी वही पूर्वाग्रह है मनु को ब्राह्मणवादी सिद्ध करने का। ‘‘विप्लवे’’ का यहां ‘विपत्ति’ अर्थ अशुद्ध है, सही अर्थ ‘विद्रोह’ है।

(3)    अशुद्ध करके शूद्र के वर्णपरिर्वतन के सिद्धान्त को झुठलाना।

(क) शुचिरुत्कृष्टशुश्रूषुः   मृदुवागानहंकृतः।

         ब्राह्मणाद्याश्रयो नित्यमुत्कृष्टां जातिमश्नुते॥    (9.335)

    डॉ0 अम्बेडकर कृत अर्थ :-‘‘प्रत्येक शूद्र जो शुचिपूर्ण है, जो अपने से उत्कृष्टों का सेवक है, मृदुभाषी है, अहंकार रहित है और सदा ब्राह्मणों के आश्रित रहता है, (अगले जन्म में) उच्चतर जाति प्राप्त करता है।’’ (वही, खंड 9, अराजकता कैसे जायज है,पृ0117)

    शुद्ध अर्थ :-‘जो शूद्र तन-मन से शुद्ध-पवित्र है, अपने से उत्कृष्टों की संगति में रहता है, मधुरभाषी है, अहंकाररहित है और जो सदा ब्राह्मण आदि उच्च तीन वर्णों के सेवाकार्य में रहता है, वह उच्च वर्ण को प्राप्त कर लेता है।’

    समीक्षा :-यह मनु का वर्णपरिर्वतन का महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है जिसमें शूद्र द्वारा उच्च वर्ण की प्राप्ति का वर्णन है। इसका अभिप्राय यह है कि मनु की वर्णव्यवस्था गुण ,कर्म, योग्यता पर आधारित है जो पूर्णतः आपत्तिरहित है। डॉ. अम्बेडकर ने इतने आदर्श सिद्धान्त का भी अनर्थ करके उसे विकृत कर दिया। इसमें दो अनर्थ किये गये हैं, एक-श्लोक में इसी जन्म में उच्च वर्ण प्राप्ति का वर्णन है, अगले जन्म का कहीं उल्लेख नहीं है। डॉ0 अम्बेडकर ने उच्चजाति की प्राप्ति अगले जन्म में वर्णित की है जो असंभव और मनमानी कल्पना है। दूसरा-श्लोक में ‘ब्राह्मण आदि’ तीन वर्णों के आश्रय का कथन है किन्तु उन्होंने केवल ब्राह्मणों का नाम लेकर इस सिद्धान्त को भी ब्राह्मणवादी पक्षपात में घसीटने की कोशिश की है। इतना उत्तम सिद्धान्त भी उन्हें नहीं सुहाया, महान् आश्चर्य है !!

(4)    अशुद्ध अर्थ करके जातिव्यवस्था का भ्रम पैदा करना

(क) ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः त्रयो वर्णाः द्विजातयः।    

         चतुर्थ एक जातिस्तु शूद्रः नास्ति तु पंचमः॥ (10.4)

    डॉ0 अम्बेडकर कृत अर्थ :-‘‘इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि मनु चातुर्वर्ण्य का विस्तार नहीं चाहता था और इन समुदायों को मिलाकर पंचम वर्ण की व्यवस्था के पक्ष में नहीं था, जो चारों वर्णों से बाहर थे।’’(वही खंड 9, ‘हिन्दू और जातिप्रथा में उसका अटूट विश्वास,’ पृ0 157-158)

    शुद्ध अर्थ :-‘आर्यों की वर्णव्यवस्था में विद्यारूपी दूसरा जन्म होने के कारण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ये तीन वर्ण द्विजाति कहलाते हैं। विद्याध्ययन रूपी दूसरा जन्म न होने के कारण ‘एकमात्र जन्मवाला’ चौथा वर्ण शूद्र है। पांचवां कोई वर्ण नहीं है।’

    समीक्षा :-गुण, कर्म, योग्यता पर अधारित मनु की वर्णव्यवस्था की परिभाषा देने वाला और शूद्र को आर्य तथा सवर्ण सिद्ध करने वाला यह सिद्धान्ताी डॉ0 अम्बेडकर को नहीं भाया। दुराग्रह एवं कुतर्क के द्वारा उन्होंने इसको भी विकृत करने की कोशिश कर डाली। डॉ0 अम्बेडकर द्वारा विचारित अर्थ इस श्लोक में दूर-दूर तक भी नहीं है। मनु का यह आग्रह कहीं भी नहीं रहा कि आर्येतर जन वर्णव्यवस्था में समिलित न हों। उन्होंने तो ‘‘एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः। स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः॥’’ (2.20) श्लोक में पृथ्वी के साी वर्गो के लोगों का आह्वान किया है कि वे यहां आयें और अपने-अपने योग्य चरित्र-कर्त्तव्यकर्म की शिक्षा प्राप्त करें। अतः डॉ0 अम्बेडकर का कथन मनु की मान्यता और व्यवस्था के विपरीत है। इस श्लोक में मनु ने केवल आर्यों की वर्णव्यवस्था के चार समुदायों को परिभाषित किया है। अन्य कोई आग्रह या निषेध नहीं है। आश्चर्य है कि इस श्लोक की आलोचना करते समय डॉ0 अम्बेडकर अपने दूसरे स्थान पर किये प्रशंसात्मक अर्थ को भी भूल गये और परस्पर विरोधी लेखन पर बैठे। वहां उन्होंने इस श्लोक के आधार पर शूद्रों को आर्य माना है (अंबेडकर वाङ्मय, खंड 8, पृ0 226; उद्धृत इस पुस्तक के पृ0 219 पर) सरकार की नौकरी व्यवस्था में चार समुदाय हैं- प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी। इस पर कोई आपत्ति करे कि ‘इसका मतलब सरकार पांचवें वर्ग को नौकरी ही नहीं देना चाहती,’ तो ऐसा ही बालपन का तर्क डॉ0 अम्बेडकर का है। चार वर्णों में जब विश्व के सभी जन समाहित हो जायेंगे तो पांचवें वर्ण की आवश्यकता ही कहां रहेगी?

(5) अशुद्ध अर्थ करके मनु को स्त्री-विरोधी कहना

(क) न वै कन्या न युवतिर्नाल्पविद्यो न बालिशः।

         होता स्यादग्निहोत्रस्य नार्तो नासंस्कृतस्तथा॥ (11.36)

    डॉ0 अम्बेडकर कृत अर्थ :-‘‘स्त्री वेदविहित अग्निहोत्र नहीं करेगी।’’ (वही, नारी और प्रतिक्रान्ति, पृ0333)

    शुद्ध अर्थ :-‘कन्या, युवती, अल्पशिक्षित, मूर्ख, रोगी और संस्कारों से हीन व्यक्ति, ये किसी अग्निहोत्र में होता नामक ऋत्विक् बनने के अधिकारी नहीं हैं।’

    समीक्षा :-इस श्लोक का इतना अनर्थ कर दिया कि डॉ0 अम्बेडकर कृत अर्थ में इसका न अर्थ है और न भाव। यहां केवल कन्या और युवती को ऋत्विक्=‘यज्ञ कराने वाली’ न बनाने का कथन है, अग्निहोत्र-निषेध का नहीं। न ही सारी स्त्री जाति के लिए यज्ञ का निषेध है। यह अनर्थ मनु को स्त्री-विरोधी सिद्ध करने के लिए किया गया है। इसको निष्पक्ष और सत्य शोध कैसे कहा जा सकता है?

(ख)     पित्राार्त्रा सुतैर्वापि नेच्छेद्विरहमात्मनः।

         एषां हि विरहेण स्त्री गर्ह्ये कुर्यादुभे कुले॥ (5.149)

    डॉ0 अम्बेडकर कृत अर्थ :-‘‘स्त्री को अपने पिता, पति या पुत्रों से अलग रहने की इच्छा नहीं करनी चाहिए, इनको त्यागकर वह दोनों परिवारों (उसका परिवार और पति का परिवार) को निंदित कर देती है। स्त्री को अपना पति छोड़ देने का अधिकार नहीं मिल सकता।’’ (वही पृ 203)

    शुद्ध अर्थ :-‘स्त्री को अपने पिता,पति या पुत्रों से अलग रहने की इच्छा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इनसे पृथक् बिल्कुल अकेली रहने से (बलात्कार, अपहरण आदि अपराध की आशंका होने से) दोनों कुलों की निन्दा होने का भय रहता है।’

    समीक्षा :-इस श्लोक में कहीं नहीं लिखा कि ‘‘स्त्री को अपना पति छोड़ देने का अधिकार नहीं मिल सकता।’’ श्लोक में स्त्रियों के लिए परामर्श- मात्र है कि स्त्रियां पिता, पति, पुत्र से अलग न रहें’’ श्लोकार्थ में उक्त निष्कर्ष स्वेच्छा से बलात् निकाला गया है जो श्लोक के विपरीत और मनुविरुद्ध है। मनु ने विशेष परिस्थितियों में पति-पत्नी को पृथक् हो जाने का अधिकार दिया है (9.74-81; द्रष्टव्य पृ0 167-168)। इस अनर्थ के द्वारा मनु को स्त्री-निन्दक सिद्ध करने का प्रयास है।

(ग) सदा प्रहृष्टया भाव्यं गृहकार्येषु दक्षया।

         सुसंस्कृतोपस्करया व्यये चामुक्तहस्तया॥       (5.150)

    डॉ. अम्बेडकर कृत अर्थ :-‘‘उसे सर्वदा प्रसन्न, गृह कार्य में चतुर, घर में बर्तनों को स्वच्छ रखने में सावधान तथा खर्च करने में मितव्ययी होना चाहिए।’’ (वही, पृ0 205)

    शुद्ध अर्थ :-‘पत्नी को सदा प्रसन्नमन रहना चाहिए, गृहकार्यों में चतुर, घर तथा घरेलू सामान को स्वच्छ-सुन्दर रखने वाली और खर्च करने में मितव्ययी होना चाहिए।’

    समीक्षा :-‘‘सुसंस्कृत-उपस्करया’’ का ‘‘बर्तनों को स्वच्छ रखने वाली’’ अर्थ अशुद्ध है। ‘उपस्कर’ का अर्थ केवल बर्तन नहीं होता। यह संकीर्ण अर्थ करके स्त्री के प्रति मनु की संकीर्ण मनोवृत्ति दिखाने का प्रयास है। यहां ‘संपूर्ण घर व सारा घरेलू सामान’ अर्थ है, जो पत्नी के निरीक्षण में हुआ करता है।

(6) अशुद्ध अर्थों से विवाह-विधियों को विकृत करना

(क)(ख)    आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतिशीलवते स्वयम्।

          आहूय दानं कन्यायाः ब्राह्मो धर्मः प्रकीर्तितः॥ (3.27)

          यज्ञे तु वितते सयगृत्विजे कर्म कुर्वते।

          अलंकृत्य सुतादानं दैवं धर्मं प्रचक्षते॥(3.28)

          एकं गोमिथुनं द्वे वा वरादादाय धर्मतः।

          कन्याप्रदानं विधिविदार्षो धर्मः स उच्यते॥ (3.29)

    डॉ0 अम्बेडकर कृत अर्थ :-‘‘ब्राह्म विवाह के अनुसार किसी वेदज्ञाता को वस्त्रालंकृत पुत्री उपहार में दी जाती थी। दैव विवाह था जब कोई पिता अपने घर यज्ञ करने वाले पुरोहित को दक्षिणास्वरूप अपनी पुत्री दान कर देता था॥ आर्ष विवाह के अनुसार वर, वधू के पिता को उसका मूल्य चुका कर प्राप्त करता था।’’ (वही, खंड 8, उन्नीसवीं पहेली पृ0 231)

    शुद्ध अर्थ :-‘वेदज्ञाता और सदाचारी विद्वान् को कन्या द्वारा स्वयं पसन्द करने के बाद उसको घर बुलाकर वस्त्र और अलंकृत कन्या को विवाहविधिपूर्वक देना ‘ब्राह्म विवाह’ कहाता है॥’

‘आयोजित विस्तृत यज्ञ में ऋत्विज् कर्म करने वाले विद्वान् को अलंकृत पुत्री का विवाहविधिपूर्वक कन्यादान करना ‘दैव विवाह’ कहाता है॥’

‘एक अथवा दो जोड़ा गायों का धर्मानुसार वर पक्ष से लेकर विवाहविधिपूर्वक कन्या प्रदान करना ‘आर्ष विवाह’ है।’ आगे 3.53 में गाय का जोड़ा लेना मनु मतानुसार वर्जित है॥

    समीक्षा :-वैदिक व्यवस्था में विवाह एक प्रमुख संस्कार है और प्रत्येक संस्कार यज्ञीय विधिपूर्वक सपन्न होता है। मनु ने 5.152 में विवाह में यज्ञीयविधि का विधान किया है। संस्कार की पूर्णविधि करके कन्या को पत्नी के रूप में ससमान प्रदान किया जाता है। इन श्लोकों में उन्हीं विवाहविधियों का निर्देश है। डॉ0 अम्बेडकर ने उन सभी विधियों को अर्थ से निकाल दिया और कन्या को ‘उपहार’, ‘दक्षिणा’, ‘मूल्य’ में देने का अशुद्ध अर्थ करके समानित नारी से एक ‘वस्तु-मात्र’ बना दिया। श्लोकों में यह अर्थ किसी भी दृष्टिकोण से नहीं बनता। आर्ष विवाह में गाय का जोड़ा वैदिक संस्कृति में एक श्रद्धापूर्ण प्रतीक मात्र है। उसे वर और कन्या का मूल्य बता दिया गया है। क्या वर व कन्या का मूल्य ‘एक जोड़ा गाय’ ही है? कितना अनर्थ किया है!!

अनुवादक को जब भाषा, शैली, उसकी गभीरता और परपरा का सटीक ज्ञान नहीं होता तो उससे इसी प्रकार की भूलें हो जाती हैं। ‘कन्यादान’ का अर्थ तो आज भी ‘विवाह संस्कार करके कन्या देना’ परपरा में है। यह परपरा संस्कृत के इन्हीं श्लोकों से आयी है। पता नहीं डॉ0 अम्बेडकर ने उनकोाी गलत क्यों प्रस्तुत किया?

उपर्युक्त उदाहरण देकर यह स्पष्ट किया गया है कि भाषा, शदशैली और वैदिक परपरा की वास्तविकता के ज्ञान के अभाव में कैसी-कैसी भयंकर भूलें डॉ0 अम्बेडकर से हुई हैं, और कैसे गलत निष्कर्ष प्रस्तुत हुए हैं। इन श्लोकों में मनु बिल्कुल ठीक थे, किन्तु उन्हें गलत रूप में प्रस्तुत किया गया है। डॉ0 अम्बेडकर के साहित्य में ऐसी दर्जनों भूलें या दुराग्रह और भी हैं। विस्तारभय से यहां उनकी समीक्षा नहीं की जा रही है। यदि उक्त अनर्थ नहीं किये जाते तो डॉ0 अम्बेडकर की आलोचना वस्तुतः निष्पक्ष मानी जा सकती थी, किन्तु अब वह अशुद्ध, दुराग्रहपूर्ण और अप्रामाणिक हो गयी है।