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मास्टर आत्माराम अमृतसरी और डॉ0 अम्बेडकर: डॉ. कुशलदेव शाश्त्री

बात अंग्रेजों के शासनकाल की है। डॉ0 अम्बेडकरजी (1891-1956) दलितों के नेता के रूप में उभर चुके थे। दलितों के पृथक् निर्वाचन क्षेत्र की भी उन्होंने माँग की थी। इस माँग के विरोध में 20 सितम्बर, 1932 को महात्मा गान्धीजी ने आमरण अनशन किया था। अनशन विषयक इस प्रसंग का विश्लेषण करते हुए पं0 गंगाप्रसादजी उपाध्याय ने लिखा था कि-‘ डॉ0 अम्बेडकरजी को प्रथम शरण तो आर्यसमाज में ही मिली थी। (जीवन चक्र प्रकाशक-कला प्रेस इलाहाबाद, संस्करण-1954)। पर उपाध्यायजी ने वहाँ उन घटना-प्रसंगों या काल का उल्लेख नहीं किया है, जिससे इस जिज्ञासा की तृप्ति हो कि ’बाबासाहब अम्बेडकर जीवन में पहली बार कब और कैसे आर्यसमाज के सम्पर्क में आये ?‘

लगभग पन्द्रह साल तक डॉ0 अम्बेडकर के सम्पर्क में रहने वाले श्री चांगदेव भवानराव खैरमोडे ने सन् 1952 में डॉ0 भीमराव अम्बेडकर का चरित्र लिखा था। उस चरित्र का अध्ययन करते समय पता चला कि सर्वप्रथम सन् 1913 में बड़ोदरा निवास-काल में डॉ0 अम्बेडकर आर्य विद्वान पं0 आत्मारामजी अमृतसरी और आर्यसमाज बड़ोदरा के सम्पर्क में आये थे।

पं0 आत्मारामजी (1866-1938) मूलतः अमृतसर के निवासी थे। आर्य विद्वान् पं0 गुरुदत्तजी विद्यार्थी की प्रेरणा से उन्होंने अंग्रेज सरकार की नौकरी न करने का संकल्प किया था। सन् 1811 में उन्होंने दयानन्द हाईस्कूल लाहौर में अध्यापन किया और उसी समय वे पंजाब आर्य प्रतिनिधि सभा, लाहौर के उपमन्त्री (1894) भी बने। सन् 1897 में हुतात्मा पं0 लेखरामजी का बलिदान हो जाने के पश्चात् पं0 आत्मारामजी ने उनके द्वारा पूरे भारवर्ष में घूमकर संकलित की गई स्वामी दयानन्द विषयक जीवन सामग्री को सूत्रबद्ध कर एक बृहद् ग्रन्थ का रूप प्रदान किया। तथाकथित शूद्रों को वैदिकधर्मी बनाकर भरी सभा में उनके कर-कमलों से उन्होंने अन्न और जल भी ग्रहण किया था। समय-समय पर उन्होंने पौराणिकों और मौलवियों से शास्त्रार्थ भी किए थे। (आर्यसमाज का इतिहास: सत्यकेतु विद्यालंकार)। बड़ोदरा राज्य की ओर से न्याय विभाग के लिए विविध भाषाओं में कोश बनाये गये थे। उसके हिन्दी विभाग की जिम्मेदारी आपको ही सौंपी गई थी। यह ग्रन्थ ’श्री सयाजी शासन कल्पतरु‘ के नाम से प्रकाशित हुआ था। (डॉ0 बाबासाहेब अम्बेडकर: डॉ0 सूर्यनारायण रणसुभे: राधाकृष्ण प्रकाशन दिल्ली संस्करण/1992)। मौलिक और अनूदित कुल मिलाकर उन्होंने लगभग बीस ग्रन्थ लिखे थे।

   जब दलितों को विधर्मी बनते देख बड़ोदरा नरेश ने अपनी रियासत में दलितोद्धार के कार्य को प्रभावशाली बनाने का संकल्प किया, तब उन्होंने स्वामी दयानन्द के शिष्य आर्य सन्यासी स्वामी नित्यानन्द ब्रह्मचारी (1860-1914) से ऐसे व्यक्ति की माँग की जो उच्चवर्णीय होते हुए भी दलितों में ईमानदारी से कार्य कर सके, तो उस समय स्वामी नित्यानन्द जी ने मास्टर आत्माराम जी से अनुरोध किया। तदनुसार पं0 आत्मारामजी ने सन् 1908 से 1917 तक बड़ोदरा रियासत में और तत्पश्चात् कोल्हापुर रियासत में दलितोद्धार का कार्य किया। दलितों में उनके द्वारा किये गये कार्य की महात्मा गाँधी, कर्मवीर विट्ठल रामजी शिंदे, श्री जुगल किशोर बिड़ला, इन्दौर नरेश तुकोजीराव होल्कर आदि ने मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की है। (आदर्श दम्पत्ति: सुश्री सुशीला पण्डिता)।

बड़ोदरा नरेश सयाजीराव गायकवाड़ को दलितोद्धार के कार्य में सफलता उस समय से प्राप्त हुई जब उन्होंने पं0 आत्मारामजी को अपनी रियासत के छात्रावासों का अध्यक्ष और पाठशालाओं का निरीक्षक नियुक्त किया था। बड़ोदरा रियासत में शूद्रातिशूद्रों के लिए जो सैकड़ों पाठशालाएँ स्थापित की गई थीं, उनमें लगभग बीस हजार बालक बालिकाओं ने शिक्षा ग्रहण की थी। बड़ोदरा में उन्होंने आर्य कन्या महाविद्यालय की भी स्थापना की थी।

कोल्हापुर नरेश राजर्षि शाहू महाराज जब बड़ोदरा पधारे तो पं0 आत्मारामजी के कार्यों से बहुत ही प्रभावित हुए और उन्हें शीघ्र ही कोल्हापुर आने का निमन्त्रण दे गये। 1918 में जब पं0 आत्माराम कोल्हापुर पधारे तो शाहू महाराज ने उन्हें अपना मित्र ही नहीं, अपितु धर्मगुरु भी माना और अपनी रियासत को आर्यधर्मी बनाने के लिए उनके कर-कमलों से जनवरी 1918 में आर्यसमाज की स्थापना की। कोल्हापुर की राजाराम महाविद्यालय आदि शिक्षण संस्थाओं को भी उन्होंने संचालन हेतु आर्य संस्थाओं को सौंप दिया। इस प्रकार गुजरात की बड़ोदरा और महाराष्ट्र की कोल्हापुर रियासत के माध्यम से पं0 आत्माराम जी ने सामाजिक और शैक्षिक क्षेत्र में कार्य करते हुए दलितोद्धार की दृष्टि से उल्लेखनीय भूमिका निभायी थी।

 

लाला लाजपतराय और डॉ0 अम्बेडकर: डॉ. कुशलदेव शाश्त्री

डॉ0 बाबासाहब अम्बेडकरजी का मराठी में बृहद् जीवन चरित्र लिखने वाले डॉ0 चांगदेव भवानराव खैरमोडे के मतानुसार राष्ट्रीय नेताओं में लाला लाजपतराय डॉ0 अम्बेडकरजी को अपने बहुत नजदीक प्रतीत होते थे। उनकी दृष्टि में तिलक, गोखले और गान्धी अपने-अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण थे, पर वे उन्हें उतने नजदीक के महसूस नहीं होते थे, जितने कि लाला लाजपतराय। इसका एक कारण यह था कि लालाजी और अम्बेडकरजी का सन् 1913 से 1916 की कालावधि में अमरीका निवासकाल में घनिष्ठ सम्बन्ध आ चुका था तथा उन्हें इस बात का विश्वास हो चुका था कि लालाजी जैसे राजनीति में गरम दल से सम्बद्ध हैं, वैसे ही धार्मिक और समाज-सुधार के क्षेत्र में भी कट्टर क्रियाशील सुधारक हैं। सन् 1914 में लालाजी ने अपना अधिकांश समय कोलंबिया विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में बिताया था। तब उन्हें अपने सामने की मेज पर उनसे भी पहले आकर बैठा और उनके बाद ग्रंथालय से बाहर जानेवाला एक भारतीय विद्यार्थी दिखलाई दिया। उन्होंने जब उत्सुकतावश स्वयं उसका परिचय प्राप्त किया, तब उन्हें यह पता चला कि वह विद्यार्थी भीमराव अम्बेडकर था। उसका परिचय पाकर तथा उसके गहन ज्ञान को देखकर उन्हें अतिशय आनन्द हुआ था।

खैरमोडेजी ने अपने चरित्र ग्रन्थ में अम्बेडकरजी द्वारा लिखा-‘स्वर्गीय लाला लाजपतराय‘ लेख उद्धृत करने से पूर्व इस श्रद्धांजलि परक लेख लिखने से पहले डॉ0 अम्बेडकरजी की जो मनोदशा थी उसका वर्णन करने हुए लिखा है कि-

लाला लाजपतराय जी (1865-1928) की मृत्यु का समाचार सुनकर डॉ0 बाबासाहब अम्बेडकर अत्यन्त ही व्यथित हो गये। (स्वामी श्रद्धानन्द के बलिदान को छोड़कर अन्य) किसी भी राष्ट्रीय नेता की मृत्यु से पूर्व और पश्चात् वे इतने व्यथित नहीं हुए थे। उसी रात उन्होंने ’बहिष्कृत भारत सभा‘ की ओर से सार्वजनिक शोक सभा का आयोजन किया था। उसमें लालाजी पर भाषण करते समय उनकी आँखों से आँसू टपक रहे थे। उन्होंने अपने समस्त सार्वजनिक जीवन में किसी भी राष्ट्रीय नेता की मृत्यु के बाद शोक सभा का आयोजन नहीं किया था और न ही श्रद्धांजलि परक शोक सभा में भाषण दिया था। नत्थूराम गोड़से की तीन गोलियों से दि0 30-1-1948 को महात्माजी का खून हुआ, तब भी डॉ0 बाबासाहब गान्धीजी के विषय में या उनकी मृत्यु के विषय में एक शब्द भी नहीं बोले थे।”

लालाजी के बलिदान पर डॉ0 बाबासाहबजी ने जो श्रद्धांजलि लिखित रूप में अभिव्यक्त की थी, उसे इसी पुस्तक के परिशिष्ट चार में यथावत् अविकल रूप से दिया गया है

स्वामी श्रद्धानन्द और डॉ0 अम्बेडकर : डॉ. कुशलदेव शाश्त्री

जातिनिर्मूलन और दलितोद्धार के सन्दर्भ में आर्यसमाज के प्रामाणिकतापूर्ण ठोस-क्रियाकलापों से डॉ0 अम्बेडकर अत्यन्त ही प्रभावित थे। स्वामी दयानन्द के अनुयायी गुरुकुल कांगड़ी के संस्थापक स्वामी श्रद्धानन्द (1856-1926) के सन्दर्भ में वे अपनी रचना ’व्हासॉट कांग्रेस एण्ड गाँधी हैव डन टू दि अन्टचेबल्स‘ में लिखते हैं कि ’स्वामी श्रद्धानन्द दलितों के सर्वश्रेष्ठ सहायक और समर्थक थे।‘ अस्पृश्यता-निवारण से सम्बन्धित (कांग्रेस की) समिति में रहकर यदि उन्हें स्थिरता से काम करने का अवसर मिल पाता तो निःसन्देह एक बहुत बड़ी योजना आज हमारे सामने विद्यमान होती।“

स्वामी श्रद्धानन्दजी के निधन का समाचार पाकर डॉ0 अम्बेडकर जी की उपस्थिति में जो शोक प्रस्ताव पारित हुआ, उसकी शब्दावली इस प्रकार है-”स्वामी श्रद्धानन्दजी की अमानवीय हत्या का समाचार पाकर इस सभा को (अर्थात्-बहिष्कृत वर्ग, कुलाबा जिला परिषद्, प्रथम अधिवेशन, 19-20 मार्च 1927 को) अतिशय दुःख हुआ है। हमारा यह अनुरोध है कि उनके द्वारा बनाई गई योजना के अनुसार हिन्दू जाति अस्पृश्यता का निर्मूलन करे।“

जात-पाँत तोड़क मण्डल का आर्यसमाज से आत्मीय सम्बन्ध: डॉ. कुशलदेव शाश्त्री

शायद बहुत ही कम लोगों को यह मालूम हो कि आर्यसमाज के जो प्रमुख कार्यकत्र्ता थे, वे जातपाँत तोड़क मण्डल के भी कार्यकत्र्ता थे। वैधानिक दृष्टि से हमारे कुछेक मित्रों का यह कथन ठीक है कि जात-पाँत तोड़क मण्डल एक स्वतन्त्र संस्था है और उसका आर्यसमाज से कोई सम्बन्ध नहीं है। पर गहराई से देखा जाए तो जात-पाँत तोड़क मण्डल और आर्यसमाज का अविभाज्य सा आत्मीय सम्बन्ध था। इस मण्डल के अधिकांश सभासद वैदिक मतावलम्बी थे।

मण्डल के संस्थापक सन्तराम बी0 ए0 (1887-1988) स्वामी दयानन्द की लकीर के फकीर या पूर्णतः दयानन्द के अनुयायी न भी हों, पर दयानन्द के व्यक्तित्व और कृतित्त्व के ˗प्रति वे नतमस्तक थे। सन् 1971-72 में मराठवाड़ा विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में संतराम बी0 ए0 लिखित स्वामी दयानन्द नामक एक प्रदीर्घ चरित्र लेख पढ़ाया जाता था। संतराम बी0 ए0 के लिए अपने ’मण्डल के बाद सबसे निकटतम और आत्मीय अगर कोई संस्था थी, तो वह आर्यसमाज थी।‘

श्री संतराम बी0 ए0 की ओर से डॉ0 अम्बेडकर के साथ जो 27.3.1937 को पत्र व्यवहार हुआ, उसमें डॉ0 अम्बेडकर के अध्यक्षीय भाषण पर तीव्र असन्तोष करने वाले जो चार या पाँच व्यक्तियों के नाम दिये गये हैं, उनमें क्रमशः प्रथम तीन व्यक्ति तो मेरी जानकारी के अनुसार सुप्रसिद्ध अखिल भारतीय आर्यसमाजी नेता हैं। जिनके नाम हैं-भाई परमानन्द (1876-1947), महात्मा हंसराज (1864-1938) और डॉ0 गोकुलचन्द नारंग एम0 ए0, पी0 एच0 डी0, डी0 लिट् (1878-1969)।

भाई परमानन्द बचपन में ही आर्यसमाजी बन गये थे, लाहौर के दयानन्द हाईस्कूल व कॉलेज के वे स्नातक थे। दयानन्द कॉलेज लाहौर में आप प्राध्यापक भी रहे और दयानन्द एँग्लो वैदिक (डी0 ए0 वी0) शिक्षण संस्था के आदेश पर आप प्रचारक के रूप में विदेश गये और आर्यसमाज का प्रचार-प्रसार किया ये वे ही भाई परमानन्द हैं, जिन्हें आजन्म काले पानी की सजा हुई थी। जो सरदार भगत सिंह के दादापिता के आत्मीय सखास्नेही थे, तथा लाहौर के राष्ट्रीय महाविद्यालय में सुखदेवभगतसिंह आदि क्रान्तिकारियों के प्राध्यापक थे।

दूसरा नाम है महात्मा हंसराज का, जो दयानन्द कॉलेज (डी0 ए0 वी0) लाहौर के प्राचार्य थे और जिन्होंने किसी प्रकार का पारिश्रमिक न लेते हुए 26 वर्ष (1886-1912) तक उक्त शिक्षण संस्था की सेवा की थी और जीवन के 26 वर्ष आर्यसमाजी आन्दोलन के लिए समर्पित किये थे।

तीसरे महानुभाव डॉ0 गोकुलचन्द नारंग भी भाई परमानन्द के शिष्य और डी0 ए0 वी0 शिक्षण संस्था के विद्यार्थी थे। आप स्वामी श्रद्धानन्द द्वारा स्थापित ’भारतीय शुद्धि सभा‘ (1923) की कार्यकारिणी के सभासद थे। पं0 इन्द्र विद्यावाचस्पति लिखित ’आर्यसमाज का इतिहास‘ का आपने प्राक्कथन लिखा है। इन्द्रजी ने इन्हें

आर्यजाति का ज्ञानवृद्ध-वयोवृद्ध नेता कहा है। आप डी0 ए0 वी0 कॉलेज लाहौर और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में भी प्राध्यापक रहे।

20 फरवरी 1925 में मुम्बई के डॉ0 कल्याणदास देसाई की अध्यक्षता में जातपाँत तोड़क मण्डल का जो वार्षिक अधिवेशन हुआ था। उस अधिवेशन को सम्बोधित करने वाले अधिकांश व्यक्ति आर्यसमाजी ही थे। जिनमें स्वामी श्रद्धानन्द, पं0 घासीराम (1873-1934), स्वामी मुनीश्वरानन्द, स्वामी सत्यदेव आदि उल्लेखनीय हैं। इस अधिवेशन में जो प्रस्ताव पास हुआ था, उससे भी इस मण्डल पर आर्यसमाज की छाप या प्रभुत्व की बात स्पष्ट होती है, प्रस्ताव निम्न प्रकार है

”इस मण्डल की सम्मति में आजकल जो वर्ण-व्यवस्था प्रचलित है, वह बुरी है, इसलिए आवश्यक है कि खान-पान और विवाह विषयक बन्धनों को उठा दिया जाए, इसलिए यह मण्डल प्रत्येक आर्य युवक-युवती को प्रेरणा देता है कि विवाह आदि के कार्यों में जो मौजूदा बन्धन है, उन्हें जान-बूझकर तोड़ें और जात-पाँत के बाहर विवाह करें।“

 

आर्यसमाज और जात-पाँत तोड़क मण्डल के आपसी सम्बन्ध को स्पष्ट करते हुए डॉ0 सत्यकेतु विद्यालंकार लिखते हैं-’बीसवीं सदी के प्रथम चरण (सन् 1921) में लाहौर में जात-पाँत तोड़क मण्डल की स्थापना हुई, जिसके ˗प्रमुख नेता सन्तराम बी0 ए0 थे। यद्यपि यह मण्डल आर्यसमाज के संगठन के अन्तर्गत नहीं था, पर इसका संचालन आर्यसमाजियों द्वारा ही किया जा रहा था। यह मण्डल जातपाँत तोड़कर विवाह सम्बन्ध स्थापित करने के लिए आन्दोलन करता था।

स्पष्ट है कि आर्यसमाज और जात-पाँत तोड़क मण्डल वैधानिक दृष्टि से दो स्वतन्त्र संस्थाएँ होते हुए भी विचारधारा की दृष्टि से जात-पाँत तोड़क मण्डल आर्यसमाज का ही पर्यायवाची या एक पोषक भाग था। आर्यसमाज ने अपने प्रारम्भिक काल से ही जातिनिर्मूलन और दलितोद्धार में विशेष दिलचस्पी ली थी। डॉ0 अम्बेडकर भी अपने ढंग विशेष से इन अभियानों में विशेष अभिरुचि रखते थे। इन कार्यक्रमों के सन्दर्भ में विचार साम्य होने के कारण ही जात-पाँत तोड़क मण्डल के माध्यम से श्री संतराम जी बी0 ए0 ने डॉ0 अम्बेडकरजी को ’मण्डल‘ के वार्षिक अधिवेशन (1936) की अध्यक्षता के लिए आमन्त्रित किया था। लेकिन ने जाने वे कौन से कारण रहे कि तत्कालीन कतिपय आर्यसमाजी डॉ0 अम्बेडकरजी के विचारों को यथावत् सुनने की सहनशीलता का भी परिचय नहीं दे सके। काश यदि वे डॉ0 अम्बेडकरजी के विचारों को धीरज से सुन लेते। मतभेदों के बावजूद अपनी आग्रही भूमिका को एक ओर रखकर उदारमतवादियों के लिए खुलकर चर्चा करने का वातावरण बनाना जरूरी होता है, पर तत्कालीन आर्यसमाजी उस प्रकार की खुली चर्चा का वातावरण बनाने में असमर्थ रहे। यदि वे समर्थ होते तो, आज उन्हें कमसेकम इस बात का तो श्रेय मिलता कि डॉ0 अम्बेडकरजी को अपने अधिवेशन की अध्यक्षता करने का पहला अवसर सर्वप्रथम उन्होंने ही दिया था। अब तो इतिहास में आर्यसमाज केवल एक अयशस्वी निमन्त्रक या संयोजक बनकर रह गया है। इतिहासकार इतना ही कह सकेगा कि डॉ0 अम्बेडकरजी को अपने वार्षिक अधिवेशन की अध्यक्षता करने का एकमात्र निमन्त्रण यदि किसी ने दिया था तो वह आर्यसमाजियों ने, पर वह भी मूर्तरूप धारण न कर सका, अयशस्वी रहा। डॉ0 अम्बेडकरजी के शब्दों में-”मेरा विश्वास है-यह पहला अवसर है जबकि स्वागत समिति ने अध्यक्ष की नियुक्ति को समाप्त कर दिया, क्योंकि वह अध्यक्ष के विचारों को स्वीकार नहीं करती थी।“

चर्चित अध्यक्षीय भाषण में डॉ0 अम्बेडकरजी ने शास्त्रों के साथ वेद की भी आलोचना की थी, जो तत्कालीन वेद प्रामाण्यवादी आर्यसमाजियों को सहन नहीं हुई। सम्भवतः इसीलिए आर्यसमाज बच्छोवाली लाहौर के पूर्व प्रधान श्री हरभगवान् ने अपने 14 अप्रैल, 1937 के पत्र में डॉ0 अम्बेडकरजी को लिखा था कि-”हममें से कुछ हैं, जो चाहते हैं कि अधिवेशन बगैर किसी अप्रिय घटना के साथ सम्पन्न हो, इसलिए वे चाहते हैं कि-कम-से-कम वेद शब्द इस समय के लिए छोड़ दिया जाए।“ स्मरण रहे इस अध्यक्षीय भाषण में डॉ0 अम्बेडकरजी ने अपने भावी धर्मांतरण का संकेत देते हुए यह घोषणा कर दी थी कि ’हिन्दू के रूप में मेरा यह अन्तिम भाषण होगा।‘ वेद की तथाकथित आलोचना और भविष्य में धर्मांतरण का संकेत, ये दोनों ही तथ्य ऐसे थे कि जिन्हें सहजता से सहन कर पाना आर्यसमाज के लिए असम्भव था। दोनों पक्ष अपने-अपने स्थान पर अडिग रहे। डॉ0 अम्बेडकर अपने विचारों पर दृढ़ थे और किसी प्रकार के समझौते के लिए तैयार न थे और उन्होंने बिना लाग लपेट के स्पष्ट कर दिया था-“मैं अल्पविराम तक परिवर्तित करने के लिए तैयार नहीं हूँ, मैं अपने भाषण पर किसी प्रकार के सेंसर की अनुमति नहीं दूँगा।” इसके अतिरिक्त जात-पाँत तोड़क मण्डल के प्रतिनिधि को उन्होंने यह भी लिखा था कि-”यदि आप में से कोई भी थोड़ा संकेत करता कि आप मुझे अध्यक्ष चुनकर जो सम्मान दे रहे हैं। उसके बदले मुझे धर्मांतरण (हिन्दू से बौद्ध) के कार्यक्रम में अपने विश्वास का परित्याग करना होगा, तो मैं आपसे स्पष्ट शब्दों में कह देता कि मैं आपसे मिलनेवाले सम्मान से अधिक अपने विश्वास की परवाह करता हूँ।“

जातिनिर्मूलन और वर्ण-व्यवस्था विषयक दृष्टिकोण: कुशलदेव शास्त्री

डॉ0 अम्बेडकरजी की एक सुप्रसिद्ध पुस्तक है-’जातिनिर्मूलन‘, जिसके प्रारम्भ में लिखा गया है-”डॉ0 बाबासाहब अम्बेडकर द्वारा जात-पाँत-तोड़क मण्डल लाहौर के सन् 1936 के वार्षिक अधिवेशन के लिए तैयार किया गया भाषण, लेकिन जो दिया नहीं गया, क्योंकि स्वागत समिति ने इस आधार पर कि भाषण में व्यक्त विचार अधिवेशन को स्वीकार नहीं होंगे, अधिवेशन समाप्त कर दिया।” चर्चित अध्यक्षीय भाषण में डॉ0 अम्बेडकरजी ने जन्मना नहीं किन्तु कर्मणा वर्ण-व्यवस्था की वकालत करने वाले आर्यसमाजियों से असहमति प्रकट की है और उसे अव्यावहारिक, काल्पनिक और त्याज्य माना है। डॉ0 अम्बेडकर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इन लेवलों को छो़ड़ देने का आग्रह करते हैं। इस प्रकार का लेबल लगाने का आग्रह उन्हें निरर्थक और अनावश्यक प्रतीत होता है, उनका कहना है कि बिना इन लेबलों के भी व्यक्ति की योग्यता का अहसास हो जाता है, फिर इन लेबलों की क्या आवश्यकता है ?

    डॉ0 अम्बेडकरजी के इस अध्यक्षीय भाषण के साथ जो परिशिष्ट जोड़ा गया है, उसमें महात्मा गाँधी की तुलना में उन्होंने ”स्वामी दयानन्द द्वारा अनुमोदित वर्ण-व्यवस्था की बुद्धिगम्य और निरुपद्रवी” कहा है। डॉ0 अम्बेडकरजी के शब्दों में –

”महात्मा गान्धी जिस वर्ण-व्यवस्था का समर्थन करते हैं, क्या वह वैदिक वर्ण-व्यवस्था है या स्वामी दयानन्द जिस वर्ण-व्यवस्था का अनुमोदन करते हैं वह वैदिक वर्ण-व्यवस्था है ? स्वामी दयानन्द और उनके अनुयायी आर्यसमाजियों के अनुसार वर्ण की वैदिक मान्यताओं का सार है-ऐसे व्यवसायों को अपनाना जो व्यक्ति के स्वाभाविक योग्यता के अनुरूप हों। महात्मा गान्धी के वर्ण का सार है-अपने पूर्वजों के व्यवसाय को अपनाना, चाहे स्वाभाविक योग्यता न भी हो। महात्मा गान्धी की वर्ण-व्यवस्था और जाति-व्यवस्था में मुझे कोई फर्क नहीं दिखाई देता। वहाँ तो वर्ण जाति का समानार्थी है। सार रूप में गान्धीजी का वर्ण और जाति इन दोनों का तात्पर्य पूर्वजों के व्यवसाय को अपनाना है। कुछ लोग सोच सकते हैं कि महात्मा ने बहुत प्रगति की है, पर मेरी दृष्टि में महात्मा गान्धी प्रगति से दूर हैं और परस्पर विरोधी धारणाओं से पीड़ित हैैं। वर्ण की वैदिक मान्यताओं को इस प्रकार की व्याख्या देकर उन्होंने जो विशिष्ट था उसको हास्य बना दिया है। जब मैं वैदिक वर्ण-व्यवस्था को भाषणों में दिये कारणों से अस्वीकार करता हूँ, तो मुझे स्वीकार करना होगा कि वर्ण का वैदिक दर्शन जो स्वामी दयानन्द और कुछ अन्यों ने दिया है, वह समझदारीपूर्ण और बगैर हानिकारक है, क्योंकि वह व्यक्ति विशेष का समाज में स्थान निर्धारित करने के लिए जन्म को निर्णायक तथ्य नहीं मानता। वह केवल गुण को स्वीकार करता है। जबकि महात्मा गान्धी का वर्ण-व्यवस्था के प्रति दृष्टिकोण न केवल वैदिक वर्ण-व्यवस्था को फालतू की वस्तु बना देता है, अपितु घृणित भी बना देता है। वर्ण और जाति परस्पर भिन्न मान्यताएँ हैं। वर्ण गुणाश्रित सिद्धान्त है, तो जाति जन्माश्रित सिद्धान्त है। वस्तुतः वर्ण और जाति ये समानार्थी नहीं, अपितु विलोमार्थी शब्द हैं।“ इससे पूर्व सितम्बर सन् 1927 में तमिलनाडु के दलितोद्धारक श्री ई0 वी0 रामस्वामी नायकर जी भी (1879- ) श्री महात्मा गान्धीजी से मिलकर उनकी जन्मना वर्ण-व्यवस्था विषयक दृष्टिकोण से अपनी तीव्र असहमति और चिन्ता व्यक्त कर चुके थे।

 

     इस प्रकार स्पष्ट है कि महात्मा गान्धी की तुलना में स्वामी दयानन्द प्रतिपादित वर्ण-व्यवस्था से डॉ0 अम्बेडकर सहमत हैं और इसीलिए उन्होंने उसे ’बुद्धिगम्य और निरुपद्रवी‘ कहा है। पुनरपि डॉ0 अम्बेडकर ने अपने मूल भाषण में वर्ण-व्यवस्था को अस्वीकारणीय और अव्यावहारिक माना है।

 

हम जब आर्यसमाज के 133 वर्ष के इतिहास पर दृष्टि डालते हैं, तो इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि गुण-कर्म-स्वभावानुसार वर्ण-व्यवस्था को व्यावहारिक रूप देने में वह 75 प्रतिशत असमर्थ रहा है और जब तक वह इसे क्रियात्मक रूप देने में पूर्णतया समर्थ नहीं होता, तब तक जमाना डॉ0 अम्बेडकर के स्वर में स्वर मिलाकर कहेगा कि वर्ण-व्यवस्था, अव्यावहारिक, काल्पनिक और त्याज्य है। लेकिन इसके साथ ही जातिनिर्मूलन के सन्दर्भ में डॉ0 अम्बेडकर और उनके अनुयायियों से जमाने का भी एक सवाल रहेगा, वह यह कि क्या एक धर्म का परित्याग कर दूसरे धर्म को अंगीकार करने से जातिगत भेद-भाव का उन्मूलन हो जाता है ? क्योंकि डॉ0 अम्बेडकरजी ने अपने चर्चित अध्यक्षीय भाषण में कहा है कि-”धार्मिक भावनाओं का उन्मूलन किये बिना जाति-व्यवस्था को तोड़ना सम्भव नहीं है।“ निःसन्देह जातिगत भेद-भाव को नष्ट करने का डॉ0 अम्बेडकर ने यथामति-यथाशक्ति पूर्ण प्रयास किया और सम्भवतः एतदर्थ उन्होंने हिन्दू मत का परित्याग कर बौद्ध सम्प्रदाय को स्वीकार किया, दीक्षा ली, उनके अनेक अनुयायी भी बौद्ध बने, पर बड़े दुःख के साथ कहना पड़ता है कि न तो आर्यसमाज की कर्मणा वर्ण-व्यवस्था के रहते जातिगत भेदभाव पूर्णतया समाप्त हुआ और न ही डॉ0 अम्बेडकर द्वारा प्रदत्त धर्मान्तरण के प्रयोग से जाति-पाँति का विष समाप्त हुआ। (जाति-पाँति को लेकर जिस दलित वर्ग के सन्दर्भ में मनुस्मृति का विरोध किया गया, किया जाता है। क्या उस दलित वर्ग में आपस में जाति-पाँति टूटी ? क्या उनका आपसी छुआछूत पूरी तरह नष्ट हुआ ? यदि नहीं तो आपसी विवाह सम्बन्ध होना तो बहुत दूर की बात है।-सम्पादक) बुद्ध, मूर्तिपूजा के विरोधी थे। आज बौद्ध ही महात्मा बुद्ध और डॉ0 अम्बेडकर की मूर्तियों की पूजा कर रहे हैं। हिन्दुओं की तरह बौद्ध सम्प्रदाय से भी मूर्ति नहीं हट पाई। फर्क इतना ही है कि हिन्दू अनेक मूर्तियों की पूजा करते हैं, तो बौद्ध एक-दो प्रतिमाओं की। हिन्दू दीप जलाते हैं, तो बौद्ध मोमबत्ती। हिन्दुओं को केसरी रंग प्यारा है, तो बौद्धों को नीला। एक ने केसरी टोपी पहनी है तो दूसरे ने नीली। यहाँ बाह्म क्रियाओं में तो परिवर्तन हुआ है, पर मूल प्रवृत्ति अब भी ज्यों की त्यों है। रंग बदले हैं, पर अन्तर्मन नहीं बदला। आत्मा का कायाकल्प नहीं हुआ। दयानन्द और अम्बेडकर के अपने-अपने प्रयत्नों के बावजूद जातिगत भेद-भाव आज भी यथावत् विद्यमान है। क्या यह ठीक है कि जाति वही होती है, जो जाते-जाते भी नहीं जाती ? पता नहीं समूल जाति-पाँति का उन्मूलन कब हो पाएगा ? शायद ज्ञान भिन्न और क्रिया भिन्न होने से समाज इस विडम्बनात्मक स्थिति में पहुँच गया है, जातियाँ क्या टूटेंगी ? जबकि समाज अभी अपनी उपजातियाँ तोड़ पाने का भी साहस नहीं बटोर पा रहा है। जातिनिर्मूलन का एक मात्र अचूक उपाय अन्तर्जातीय विवाह है, जिसका समर्थन डॉ0 अम्बेडकर ने भी किया है। इस ˗प्रकार के अन्तर्जातीय विवाह एक पीढ़ी तक ही नहीं, अपितु सात-सात पीढ़ियों तक होंगे, तभी जातिगत भेद-भाव का समूल सर्वनाश होगा। इसके सिवाय अन्य कोई उपाय कारगर प्रतीत नहीं होता।

 

डॉ0 अम्बेडकर ने जात-पाँत तोड़क मण्डल के वार्षिक अधिवेशन (1936) की अध्यक्षता के सन्दर्भ में लिखा है कि-”यह मेरे जीवन का निश्चित ही पहला अवसर है, जबकि मुझे सवर्ण हिन्दुओं के अधिवेशन की अध्यक्षता करने के लिए आमंत्रित किया गया हो (और मेरे लिखित अध्यक्षीय भाषण के वैचारिक मतभेदों के कारण अधिवेश नही स्थगित कर दिया गया हो।) मुझे खेद है कि इसका अन्त दुःखान्त हुआ।“

जातिगत भेदभाव के कारण किराये का घर पाना भी दुर्लभ: कुशलदेव शास्त्री

भारत की नस-नाड़ियों में जातीयता का विष इतना अधिक भरा हुआ है कि तथाकथित निम्न जाति के व्यक्तियों को मकान-मालिक किराये से भी अपने घर नहीं देते। प्रगतिशील महाराज श्री सयाजीराव गायकवाड़ की सेवा में रहते हुए भी मकान मालिकों की इस संकीर्ण प्रवृत्ति के कारण डॉ0 अम्बेडकरजी को असाधारण मानसिक यातनाएँ सहन करनी पड़ी थीं, पर जो बात बड़ोदा में हुई वह मुम्बई में नहीं हुई। मुम्बई के भाटिया लोगों पर आर्यसमाज का विशेष प्रभाव होने के कारण डॉ0 अम्बेडकरजी को मुम्बई में आवासीय यातनाओं के दौर से नहीं गुजरना पड़ा।

 

    8-12-1923 से 2-9-1930 तक लिखे अनेक पत्रों से यह पता चलता है कि लगभग सात वर्ष तक डॉ0 अम्बेडकरजी के पत्र व्यवहार का पता परल मुम्बई स्थित ’दामोदर ठाकरसी हॉल‘ ही रहा। यह ठाकरसी घराना प्रगतिशील आर्यसमाजी और सुसंस्कृत था। दामोदर ठाकरसी के पिता श्री मूलजी ठाकरसी स्वामी दयानन्द जी की उपस्थिति में स्थापित विश्व की सर्वप्रथम ’आर्यसमाज मुम्बई‘ की कार्यकारिणी के सभासद थे। प्रारम्भ में आर्यसमाज और थियोसॉफिकल सोसाइटी में जो ऐक्य स्थापित हुआ, उसका अधिकांश श्रेय मूलजी ठाकरसी को है, क्योंकि थियोसॉफिकल सोसाइटी के संस्थापक कर्नल अल्कासॉट और मैडम ब्लैवेट्स्की को स्वामी दयानन्दजी का परिचय सर्वप्रथम मूलजी ठाकरसी ने ही दिया था। मूलजी ठाकरसी के सुपुत्र नारायण ठाकरसी को तो विश्व की सर्वप्रथम आर्यसमाज का सर्वप्रथम उपाध्यक्ष होने का श्रेय प्राप्त है। मूलजी ठाकरसी के पौत्र श्री विट्ठलदास ने तो अपनी माताजी नाथीबाई दामोदर के स्मरणार्थ कर्वे विद्यालय को तत्कालीन 15 लाख रुपये प्रदान किये थे। आज इस विद्यालय ने विश्वविद्यालय का रूप धारण कर लिया है, जिसे हम सब लोग ’एस0 एन0 डी0 टी0 यूनिवर्सिटी‘ के रूप में जानते हैं। सम्भवतः अन्य अनेक ज्ञात अज्ञात कारणों के अतिरिक्त ठाकरसी परिवार के आर्यसमाजी संस्कारों में दीक्षित होने के कारण बड़ौदा में डॉ0 अम्बेडकर को जिस प्रकार आवास विषयक यातनाएँ भोगनी पड़ीं, वैसी मुम्बई में नहीं। ’भारतीय बहिष्कृत समाज सेवक संघ‘ की ओर से महार बंधुओं को ’महार वतन बिल‘ के संबंध में सावधान करते हुए निवेदन निकाला था, उसके अन्त में डॉ0 अम्बेडकरजी ने अपना स्पष्ट पता देते हुए लिखा है-’दामोदर मूलजी ठाकरसी हॉल-परल-मुम्बई‘ इस प्रकार लगभग सात वर्ष तक डॉ0 अम्बेडकरजी के पत्र व्यवहार का पता ’परल-मुम्बई स्थित दामोदर ठाकरसी हॉल‘ ही रहा।

डॉ अम्बेडकर का वैदिक संस्कारों की ओर झुकाव : कुशलदेव शास्त्री

स्वामी दयानन्द और आर्यसमाज की वेदनिष्ठा तो जाहिर है। आर्यसमाज का तीसरा नियम है-’वेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परमधर्म है।‘ आर्यसमाजों में समस्त संस्कार वैदिक पद्धति से ही सम्पन्न होते हैं। कुछ अन्य भी ’सनातन‘ संगठन हैं, जो वैदिक संस्कारों के प्रति अनन्य आस्था अभिव्यक्त करते हैं।

माननीय डॉ0 अम्बेडकर के ’बहिष्कृत भारत‘ नामक साप्ताहिक मराठी समाचार पत्र के 12, अप्रैल-1929 के अंक में पृष्ठ सात पर यह संक्षिप्त समाचार प्रकाशित हुआ था -’समाज-समता-संघ का नया उपक्रम।‘ महार समाज में वैदिक विवाह पद्धति सुदृढ़ की जाएगी-स्मरण रहे इसी महार कुल में डॉ0 अम्बेडकर का जन्म हुआ था।

उपरोक्त चर्चित अंक के ही पृष्ठ 8 पर, एक सम्पन्न वैदिक विवाह संस्कार की चर्चा करते हुए यह स्पष्ट किया गया था कि-

”यह विवाह हिन्दू मिशनरी सोसाइटी के संस्थापक श्री गजानन भास्कर वैद्य (1856-1921) की संकलित वैदिक पद्धति से सम्पन्न किया गया। उक्त समाचार के अन्त में यह शुभकामना की गई है कि अस्पृश्य समाज वैदिक पद्धति का प्रचलन कर उन पर लगाये गये अस्पृश्यता के कलंक को नष्ट करने में समर्थ हो।“

   यह जानकर आश्चर्य होता है कि 29 जून, 1929 को वैदिक पद्धति से सम्पन्न श्री केशव गोविन्दराव आड़रेकर के विवाह में डॉ0 अम्बेडकरजी अपनी सहधर्मिणी के साथ उपस्थित थे। यह विवाह ’समाज-समता-संघ‘ के तत्त्वाधान में तथा आचार्य-पुरोहित श्री सुन्दररावजी वैद्य की देख-रेख में सम्पन्न हुआ था। वर-वधू के माता-पिता रूढ़िवादी होते हुए भी माननीय डॉ0 अम्बेडकर के सुधार सम्बन्धी दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर ही वैदिक पद्धति से विवाह करवाने के लिए तैयार हुए थे। यह विवाह परल (मुम्बई) स्थित दामोदर मूलजी ठाकरसी हॉल में सम्पन्न हुआ था। श्री सुरवाडे के अनुसार ‘दलित समाज में वैदिक पद्धति से सम्पन्न यह पहला विवाह था।‘ अम्बेडकर-दम्पत्ति के अतिरिक्त इस विवाह में श्री रा0 ब0 बोले, डॉ0 सोलंकी, श्री कमलाकर चित्रे आदि गणमान्य सज्जन समुपस्थित थे।

  डॉ0 अम्बेडकरजी के 6, सितम्बर-1929 के ’बहिष्कृत भारत‘ में यह समाचार भी प्रकाशित हुआ था कि ’मनमाड़ के महारों (दलितों) ने श्रावणी मनायी।‘ 26 व्यक्तियों ने यज्ञोपवीत धारण किये। यह समारोह मनमाड़ रेल्वे स्टेशन के पास डॉ0 अम्बेडकरजी के मित्र श्री रामचन्द्र राणोजी पवार नांदगांवकर के घर में सम्पन्न हुआ था।

इन समाचारों से स्पष्ट है कि माननीय डॉ0 अम्बेडकरजी का अपने जीवन के पूर्वार्द्ध में उपनयन-विवाह आदि वैदिक संस्कारों की ओर भी यत्किंचित् झुकाव अवश्य ही रहा और अपने पत्रों में भी वे वैदिक संस्कार विषयक समाचारों को प्रकाशनार्थ स्थान अवश्य देते थे।