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ईश्वर कहाँ रहता है ? : आचार्य सोमदेव जी

शंका:- क्या ईश्वर संसार में किसी स्थान विशेष में, किसी काल विशेष में रहता है? क्या ईश्वर किसी जीव विशेष को किसी समुदाय विशेष के कल्याण के लिए और दुष्टों का नाश करने के लिए भेजता है?

समाधान- ईश्वर इस संसार के स्थान विशेष वा काल विशेष में नहीं रहता। परमेश्वर संसार के प्रत्येक स्थान में विद्यमान है। जो परमात्मा को एक स्थान विशेष पर मानते हैं, वे बाल बुद्धि के लोग हैं। वेद ने परमेश्वर को सर्वव्यापक कहा है। वेदानुकूल सभी शास्त्रों में भी परमात्मा को सर्वव्यापक कहा गया है। एक स्थान विशेष पर परमेश्वर को कोई सिद्ध नहीं कर सकता , न ही शब्द प्रमाण से और न ही युक्ति तर्क से। हाँ, ईश्वर शब्द प्रमाण और युक्ति तर्क से विभु= सर्वत्र व्यापक तो सिद्ध हो रहा है, हो सकता है। वेद में कहा-

एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुष:।

पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।

– य. ३१.३

इस पुरुष की इतनी महिमा है कि यह सारा ब्रह्माण्ड परमेश्वर के एक अंश में है, अर्थात् वह ईश्वर इस समस्त ब्रह्माण्ड में समाया हुआ अनन्त है। यह समस्त जगत् परमात्मा के एक भाग में है, अन्य तीन भाग तो परमात्मा के अपने स्वरूप में प्रकाशित हैं अर्थात् परमात्मा अनन्त है, सर्वत्र विद्यमान है, उसको किसी एक स्थान पर नहीं कह सकते।

नहि त्वा रोदसी उभे ऋघायमाणमिन्वत:।

जेष: स्वर्वतीरप: सं गा अस्मश्यं धूनुहि।।

– ऋ. १.१०.८

इस मन्त्र के भावार्थ में महर्षि लिखते हैं – ‘‘जब कोई पूछे कि ईश्वर कितना बड़ा है तो उत्तर यह है कि जिसको सब आकाश आदि बड़े-बड़े पदार्थ भी घेरे में नहीं ला सकते, क्योंकि वह अनन्त है। इससे सब मनुष्यों को उचित है कि उसी परमात्मा को सेवन, उत्तम-उत्तम कर्म करने और श्रेष्ठ पदार्थों की प्राप्ति के लिए उसी से प्रार्थना करते रहें। जब जिसके गुण और कर्मों की गणना कोई नहीं कर सकता, तो कोई अंत पाने को समर्थ कैसे हो सकता है? और भी -’’

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापाविद्धम्।

कविर्मनीषी परिभू: स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्य: समाभ्य:।।

– य. ४०.८

इस मन्त्र में परमेश्वर को सब में व्याप्त कहा है। इस व्याप्ति से ज्ञात हो रहा है कि परमात्मा किसी एक स्थान विशेष पर नहीं अपितु सर्वत्र है। इस प्रकार परमेश्वर के सर्वत्र व्यापक स्वरूप को सिद्ध करने के लिए शास्त्र के हजारों प्रमाण दिये जा सकते हैं। कोई भी प्रमाण ऐसा उपलब्ध नहीं होता जो परमात्मा को एकदेशीय सिद्ध करता हो।

युक्ति से भी कोई परमात्मा को किसी स्थान विशेष पर सिद्ध नहीं कर सकता। आज विज्ञान का युग है, वैज्ञानिकों ने समस्त पृथिवी, समुद्र, आकाश आदि को देख डाला है। जिन किन्हीं का भगवान् समुद्र, पहाड़ आकाश आदि में होता तो अब तक वह भगवान् वैज्ञानिकों के हाथ में होता। जो लोग ईश्वर को ऊपर सातवें वा चौथे आसमान अथवा इससे कहीं और ऊपर मानते हैं, वे यह सिद्ध नहीं कर सकते कि कौन-सा आसमान ऊपर है, कौन-सा आसमान नीचे, क्योंकि प्रमाण सिद्ध यह पृथिवी गोल है। इस गोल पृथिवी पर लगभग चारों और मानव आदि प्राणी रहते हैें।

जो मनुष्य भारत में रहते हैं, अर्थात् पृथिवी के  ऊपरी भाग पर रहते हैं, उनका आसमान उनके सिर के ऊपर और जो मनुष्य अमेरिका आदि देशों में है, अर्थात् पृथिवी के निचले भाग में रहते हैं, उनका आकाश (आसमान) भारत आदि देश में रहने वालों की अपेक्षा विपरीत होगा अर्थात् भारत वालों के पैरों में आकाश होगा। ऐसा ही पृथिवी के अन्य स्थानों पर रहने वाले मनुष्यों का आकाश जाने । पृथिवी के चारों ओर आकाश है, आसमान है, पृथिवी पर रहने वाले मनुष्यों के सिर जिस ओर होंगे, उनका आसमान उसी ओर होगा।

ऐसा विचार करने पर जो परमात्मा को आसमान में मानते हैं, वे भी एक स्थान विशेष पर सिद्ध नहीं कर सकते। इस विचार से भी परमात्मा सर्वत्र ही सिद्ध होगा, इसलिए परमात्मा सब स्थानों पर विद्यमान है, न कि किसी एक स्थान विशेष पर।

स्थान विशेष की कल्पना ब्रह्माकुमारी मत वालों की भी है। उनका कहना है कि यदि ईश्वर को सर्वव्यापक मानते हैं तो ईश्वर गन्दगी में शौच आदि में भी होगा, यदि ऐसा होगा तो ईश्वर भी गन्दा हो जायेगा। इन ब्रह्माकुमारी वालों ने ईश्वर को कितना कमजोर बना दिया? इन ब्रह्माकुमारी वालों को यह नहीं पता कि यह गंदगी भौतिक है और ईश्वर अभौतिक।

परमेश्वर के अभौतिक और सदा पवित्र होने से परमेश्वर के ऊपर इस गंदगी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। हमारे ऊपर भी जो प्रभाव पड़ता है, वह इसलिये क्योंकि हमारे पास भौतिक शरीर इन्द्रियाँ आदि हैं, इनसे रहित होने पर हम जीवात्माओं पर भी उस गंदगी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ईश्वर तो सर्वथा इनसे रहित है तो ईश्वर पर इस गंदगी का प्रभाव कैसे पड़ेगा? इसलिए मलिनता से बचाने के लिए ईश्वर को एक स्थान विशेष पर मानना अज्ञानता ही है।

इसी प्रकार ईश्वर किसी काल विशेष में होता हो ऐसा नहीं है, परमेश्वर तो सदा सभी कालों में वर्तमान रहता है। काल विशेष में होने की कल्पना अवतारवादी कर सकते हैं, जो कि उनकी यह मान्यता सर्वथा असंगत है। वर्तमान, भूत एवं भविष्यकाल की आवश्यकता हम जीवों की अपेक्षा से है। परमेश्वर के लिए तो सदा वर्तमान रहता है, भूत-भविष्य परमात्मा के लिए नहीं है। परमात्मा सदा एक रस रहता है।

परमात्मा किसी जीव विशेष को किसी समुदाय विशेष की रक्षा वा दुष्टों के नाश के लिए भेजता हो- ऐसा भी नहीं है। यह कल्पना भी अवतारवादियों की है। परमात्मा तो जीवों के कर्मानुसार उनको जन्म देता है। जो जीव विशेष संस्कार युक्त होते हैं, वे जगत् के कल्याण और दुष्टों के नाश में प्रवृत्त होते हैं। ऐसा करने पर परमात्मा उनको आनन्द-उत्साह आदि प्रदान करता है, किन्तु ऐसा कदापि नहीं है कि परमात्मा ने किसी जीव विशेष को इस कार्य में लगााया हो। यदि ऐसा मानेंगे तो जीव की स्वतन्त्रता न रहेगी। ऐसा मानने पर सिद्धान्त की हानि होगी। कर्म फल व्यवस्था की सिद्धि ठीक से न हो पायेगी।

यदि कोई आत्मा किसी समुदाय की रक्षा करे तो दोष की भागी हो जायेगी, क्योंकि ऐसा कदापि नहीं हो सकता कि पूरे समुदाय में सभी लोग एक जैसे धर्मात्मा हो, उस समुदाय में उलटे लोग भी हो सकते हैं। समुदाय में होने से उनकी भी रक्षा करनी पड़ेगी जो कि न्याय न हो सकेगा। परमेश्वर न्यायकारी है, उसके द्वारा भेजी गई आत्मा को भी न्याय करना चाहिए जो कि वह कर न सकेगी।

अधिकतर लोगों की मान्यता है कि परमेश्वर किसी आत्मा को न भेजकर स्वयं अवतार लेते हैं । ऐसा करके परमात्मा सज्जनों की रक्षा और दुर्जनों का नाश करते हैं। इस प्रकार की मान्यता भी ईश्वर स्वरूप से विपरीत, वेद-शास्त्र के प्रतिकूल है, क्योंकि ईश्वर विभु है, अनन्त है, वह अनन्त प्रभु एक छोटे से सान्त शरीर में कैसे आ सकता है? परमेश्वर जन्म मरण से परे है, फिर शरीर में आकर जन्म-मृत्यु को कैसे प्राप्त कर सकता है? परमेश्वर का अवतार मानने पर इस प्रकार की अनेक दोषयुक्त बातों को मानना पड़ेगा।

अवतारवादियों का अवतार मानने का मुख्य आधार ये दो श्लोक हैं-

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।

इन श्लोकों में अवतार लेने का कारण बतायाकि जब-जब धर्म की हानि होगी, तब-तब धर्म के उत्थान और अधर्म के नाश के लिए तथा श्रेष्ठों के परित्राण =रक्षा और दुष्टों के नाश के लिए ईश्वर अवतार लेता है। अब यहाँ विचारणीय यह है कि जिस परमात्मा ने बिना शरीर के इस सब ब्रह्माण्ड को रच डाला, हम सब प्राणियों के शरीरों की रचना की है, उस परमात्मा को कुछ क्षुद्र, दुष्ट व्यक्तियों को मारने के लिए शरीर धारण करना पड़े, यह बात बुद्धिग्राह्य नहीं है। इससे तो ईश्वर का ईश्वरत्व न रहकर ईश्वर का बहुत लघुत्व सिद्ध हो रहा है। यदि परमात्मा को यही करना है तो वह इस प्रकार के कार्य बिना शरीर के भी कर सकता है, क्योंकि वह पूर्ण समर्थ है।

गीता के उपरोक्त श्लोकों में अवतार का कारण हमने देखा, अब देवी भागवत पुराण में अवतार लेने का कारण देखिये। वहाँ लिखा है-

शपामि त्वां दुराचारं किमन्यत् प्रकरोमिते।

विधुरोहं कृत: पाप त्वयाऽहं शापकारणात्।।

अवतारा मृत्युलोके सन्तु मच्छापसंभवा:।

प्रापो गर्भभवं दु:ख भुक्ष्व पापाज्जनार्दन।।

देवी भागवत के इन श्लोकों में अवतार का कारण धर्म की रक्षा वा अधर्म के नाश करने के लिए नहीं कहा, अपितु भृगु का शाप कहा है। अर्थात् महर्षि भृगु ने विष्णु को दुराचार कर्म के कारण शाप दिया, उनके शाप के प्रभाव  से विष्णु का मृत्य ुलोक में अवतार हुआ। गीता के और देवी भागवत पुराण में अवतार के कारणों में परस्पर विरोध है। और देखिये-

बौद्धरूपस्त्वयं जात: कलौ प्राप्ते भयानके।

&&&

वेदधर्मपरायन् विप्रान् मोहयामास वीर्यवान्।

निर्वेदा कर्मरहितास्त्रवर्णा तामासान्तरे।।

यहाँ गीता से सर्वथा विपरीत अवतार का कारण कहा है। गीता धर्म की रक्षा को कारण कहती है और यहाँ तो धर्म के नाश के लिए अवतार ले लिया, अर्थात् भागवत पुराण कहता है- भगवान ने बुद्ध का अवतार लेकर, सबको विरुद्ध उपदेश देकर नास्तिक बनाया तथा वेद मार्ग का नाश किया। यहाँ ये अवतारवादियों के ग्रन्थ परस्पर विरुद्ध कथन कर रहे हैं।

यथार्थ में तो ईश्वर के किसी भी रूप में जन्म धारण करने की कल्पना ही युक्ति व शास्त्र विरुद्ध है, क्योंकि ईश्वर को किसी भी प्रकार के सहारे की आवश्यकता नहीं, चाहे वह सहारा किसी शरीर का हो अथवा किसी अन्य प्राणी का। परमेश्वर अपने सब कार्य करने में समर्थ है, उसको कोई अवतार लेने की आवश्यकता नहीं है।

वेद में ईश्वर को ‘‘अकायमव्रणमस्नाविरम्’’ कहा है। वह परमात्मा सूक्ष्म और स्थूल शरीर के बन्धन से रहित है, अर्थात् इन बन्धनों में नहीं पड़ता। श्वेताश्वतर उपनिषद् मेंऋषि ने कहा-

वेदाहमेतमजरं पुराणं सर्वात्मानं सर्वगतं विभुत्वात्।

जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यस्य ब्रह्मवादिनो हि प्रवदन्ति नित्यम्।।

– ४.२१

अर्थात् वह परमात्मा अजर है, पुरातन (सनातन) है, सर्वान्तर्यामी है, विभु और नित्य है। ब्रह्मवादी सदा उसका बखान करते हैं। वह कभी जन्म नहीं लेता।

उपरोक्त सभी प्रमाणों से सिद्ध हो रहा है कि परमात्मा जीव के कर्मानुसार उसके भोग के लिए शरीर स्थान, समुदाय आदि देता है न कि अपनी इच्छा से किसी का नाश वा रक्षा के लिए उसको भेजता है और ऐसे ही स्वयं भी अवतार लेकर कुछ नहीं करता, अर्थात् स्वयं शरीर धारण करके किसी की रक्षा वा नाश नहीं करता।

इस्लाम का चमत्कार (अंधविश्वास) : पं॰ श्री चमूपतिजी एम॰ ए॰

चमत्कार

ईमान के दो साधन हैं—एक बुद्धि, दूसरा सीधा विश्वास, प्रकृति की पुस्तक दोनों के लिए खुली है।

प्रातःकाल सूर्योदय, सायंकाल सूर्यास्त, दिन व रात्रि का क्रम ऊषा की रंगीनी, बादलों का उड़ना, किसी बदली में से किरणों का छनना, इन्द्रधनुष बन जाना, पर्वतों की गगन चुम्बी चोटियाँ, सागर की असीम गहराई, वहाँ बर्फ के तोदे व दुर्ग, उछलती कूदती लहरों का शोर, बुद्धि देख-देखकर आश्चर्यचकित है। भूमि पर तो चेतन प्राणी हैं ही, वायु व जल में भी एक और ही विराट् संसार बसा हुआ है।

विज्ञान के पण्डित नित नए अनुसंधान करके नित नए नियमों का पता लगा रहे हैं और इन नियमों के कारण प्रकृति के ऊपर अधिकार प्राप्त करते जाते हैं। जो घटनाएँ पहले अत्यन्त आश्चर्यजनक लगतीं थीं। वह इन नियमों के प्रकाश में साधारण-सी घटनाएँ बनकर रह जाती हैं। मनुष्य यह देखकर दंग है कि पानी आकाश से कैसे बरसता है? वैज्ञानिक एक हण्डिया में पानी डालकर उसे आँच देता है। पानी सूखता है, उड़ता है। वैज्ञानिक उस उड़ते पानी को ठण्डी नली में से गुज़ारता है और उड़ती हुई भाप को फिर पानी बना देता है। यह पानी कण-कण होकर फिर गिर पड़ता है। वैज्ञानिक कहता है यही वर्षा होने का रहस्य है। हमने चमत्कार समझा था, परमात्मा की कुदरत का विशेष रहस्य माना था। वैज्ञानिक ने वही चमत्कार छोटे स्तर पर स्वयं करके दिखा दिया। हमारा आश्चर्य समाप्त हो गया। हम इन्द्रधनुष पर लट्टू थे। वैज्ञानिक ने त्रिकोण के एक शीशे में ही एक छोटा-सा इन्द्रधनुष उत्पन्न कर दिया। हम इसे साधारण बात समझ बैठे। वैज्ञानिक बुद्धिमान् था हमारी सरलता पर हँसा और कहा मेरी शक्ति प्रथम तो सीमा में छोटी है। साधारण है। भला इस इन्द्रधनुष की उस आकाश में फैले हुए इन्द्रधनुष से तुलना ही क्या? जो आकाश के एक भाग में छा जाता है? मेरे कण भर जल से कोई खेत हरियाले हो सकते हैं या झीलें भर सकती हैं? वे भण्डार प्रभु के ही

हैं जिनका संसार प्रार्थी है, याचक है। फिर मेरी खोजें और आविष्कार

तो परमात्मा की रचनाओं की नकल मात्र हैं, वह उसी भण्डार

की एक बानगी है जो वस्तु वर्तमान संसार में पहले से ही विद्यमान

है। मैं उसे देखता हूँ उसकी दशा का चित्र अपनी बुद्धि में उतारता हूँ

और अपनी सामर्थ्य के अनुसार इस भण्डार से एक छोटी-सी बानगी

प्राप्त करता हूँ और उस पर परमात्मा के ही नियमों का प्रयोग करके

कहीं इन्द्रधनुष का खिलौना कहीं पानी व भाप की गुड़िया बना लेता

हूँ। यह प्रकृति के नियमों का छोटा-सा भाग जो मेरी छोटी-सी

बुद्धि में आता है परमात्मा को सर्वशक्तिमान् व पूर्ण ज्ञान का

स्वामी सिद्ध करता है। यदि उसके सामर्थ्य का प्रकटीकरण बिना

किसी नियम के होता तो मनुष्य को अपने प्रयास की सफलता का

विश्वास करना कठिन हो जाता। उस खेती में जिससे हम सबका पेट

पालन होता है, क्या कुछ कम चमत्कार है। एक दाने के लाखों व

करोड़ों दाने हो जाते हैं। परमात्मा ही तो इन्हें बढ़ाता है। हम

उससे लाभ उठा लेते हैं। इसमें यदि नियम व व्यवस्था न हो तो

कोई किस भरोसे पर बीज बोए। उसे पानी दे और फ़सल काटे?

यह है बुद्धि के द्वारा ईश्वर पर विश्वास, अज्ञानी व्यक्ति बुद्धि से कोरा

है उसे प्रतिदिन की खेती में परमात्मा का हाथ दिखाई देना कठिन है।

सूरज व चाँद के तमाशे उसकी दृष्टि में परमात्मा की शक्ति के खेल

नहीं? परमात्मा और उसके साथ उसके प्यारों की शक्ति का

प्रदर्शन किसी प्रकृति नियम के विपरीत चमत्कार के द्वारा होना चाहिए।

1[1. मुस्लिम विचारक डॉ॰ गुलाम जैलानी बर्क ने प्रचलित इस्लाम से हटकर यह लिखा है, “अल्लाह का सबसे बड़ा चमत्कार यह सृष्टि—यह रचना है।” देखिये ‘दो कुरान’ पृष्ठ 622। पं॰ गंगाप्रसाद उपाध्याय जी ने लिखा है, “The occurence of an unnatural phenomenon is a contradiction of terms. If it occurs, it is natural, if it is natural it must occur. Then is it anti natural? No who can defy nature successfully.” Superstition अर्थात् चमत्कार यदि स्वाभाविक है तो चमत्कार नहीं यदि सृष्टि नियम विरुद्ध हैं तो हो नहीं सकते।  —‘जिज्ञासु’]

इस लड़कपन के विचार ने अज्ञानी लोगों के दिलों में चमत्कारों की सृष्टि की है। वह उन्हीं लोगों को प्रभु तक पहुँचा हुआ     मानते हैं जिनसे कोई करामात चमत्कार या प्रकृति के नियम विरुद्ध काम सम्बन्धित हो। कुछ सम्प्रदायों की आधारशिला ही इन्हीं चमत्कारी कहानियों पर है। स्वयं चमत्कार करना कठिन है, क्योंकि उसके मार्ग में प्रकृति के नियम बाधक हैं इसलिए इन मतों की पुस्तकों में चमत्कारों की असम्भवता को कुछ स्वीकार किया गया है, जैसे कि इञ्जील में वर्णन है—

“उस ईसा ने ठण्डा सांस लिया और कहा यह पीढ़ी चमत्कार चाहती है? मैं तुम्हें सच कहता हूँ इस पीढ़ी को चमत्कार नहीं दिखाया जाएगा”1। —(मरकस आयत 8-12)

[1. डॉ॰ जेलानी ने भी अपनी पुस्तकों में चमत्कारों की चर्चा करते हुए यही प्रमाण दिये हैं।   —‘जिज्ञासु’]

और कुरान में भी आया है—

व कालू लौला उन्ज़िला इलैहे आयातुन मिन रब्बिही कुल 1 इन्नमल आपातो इन्दल्लाहे व इन्नमा इन्ना नजीरुन मुबीन॰ लो लमयक फिहिम अन्ना अंजलना अलैकल किताबो, तुतला अलैहिम इन्ना फ़ीजालिका लरहमता व ज़िकरालि कौमिय्योमिनून।

—(सूरते अनकबूत आयत 50-51)

और कहते हैं क्यों नहीं उतरीं उस पर उसके रब की ओर से निशानियाँ। पास अल्लाह के हैं और निश्चत ही मैं डराने वाला हूँ, प्रकट और क्या उनके लिये यह पर्याप्त नहीं कि हमने तुम पर पुस्तक उतारी है जो पढ़ी जाती है उन पर और उसमें कृपा है और वर्णन है मौमिनों के लिए।

परन्तु पूर्ववर्तियों के सम्बन्ध में चमत्कारों की कहानियाँ सुनाने में कोई कानून बाधक नहीं। इसलिए ऐसी पुस्तकों के अपने काल के चमत्कारों का लाख इन्कार हो, पूर्वकालीन कालों के पैग़म्बरों के साथ चमत्कार जोड़ दिए गए हैं। काल बीतने पर श्रद्धालुओं ने वैसे ही और उनसे बढ़-चढ़कर विचित्र चमत्कारों के सम्बन्ध अपने पथ-प्रदर्शकों के साथ जोड़ दिए हैं। चमत्कार वास्तव में प्रभु की सत्ता की स्वीकृति नहीं इन्कार हैं।

परमात्मा नित्य है, अनादि है तो उसकी शक्ति का प्रदर्शन भी नित्य है, शाश्वत है, क्षण-क्षण में होता है। परमात्मा का ज्ञान पूर्ण है। उसका ज्ञान जैसे प्रकृति के नियम हैं। जहाँ यह नियम टूटे समझो परमात्मा का ज्ञान भंग हुआ। परमात्मा के नियम व कार्य में परिवर्तन होना असम्भव है। उसके ज्ञान व कार्य का प्रदर्शन नित्य प्रति के कार्यों में हो रहा है। उनका साँचा पलटने की सद्बुद्धि को आवश्यकता नहीं। हाँ जिन लोगों की मान्यता ही यह है कि वह कानून से भी ऊपर हों जिस पर तर्क ननुनच न कर सके, वह परमात्मा को भी एक बड़ा, सारे संसार को घेरे हुए, मनमौजी राजा कल्पना कर सकते हैं। जिसकी इच्छा का भरोसा नहीं।

अपनी या अपने प्यारों के लिए किसी समय कुछ कर गुज़रे। किसी पर दिल आ गया उसे रिझाने के लिए कुछ भी कर देना उससे दूर नहीं। आजकल राजाओं का युग नहीं रहा। सो परमात्मा की भी कल्पना परिवर्तित हो रही है।

वेद की दृष्टि में परमात्मा के नियम परमात्मा की पवित्र आज्ञाएँ हैं। उनका उल्लंघन (नऊज़ो बिल्लाह—परमात्मा की शरणागति) करके परमात्मा अपना निषेध उल्लंघन करेगा यह असम्भव है। परमात्मा के प्यारे वे हैं जिनका जीवन विज्ञान के नियमों व आध्यात्मिकता के साँचे में ढल जाता है।

1[ 1. नियम नियन्ता के होने का एक बहुत बड़ा प्रमाण होता है। अनियमितता कहीं भी हो यही सिद्ध करती है कि यहाँ कोई नियन्ता नहीं। यह सृष्टि नियमों में बंधी है जो अटल Eternal हैं। ऋत व सत्य को वेद भूमि का आधार मानता है। इन नियमों के टूटने का कोई प्रश्न ही नहीं है। —‘जिज्ञासु’]

जिनका सदाचार ही उनकी महानता है। वे नियमों का उल्लंघन नहीं करते उसके ज्ञान का प्रचार करते हैं। उनकी भक्ति बुद्धि के साथ वाणी का रूप धारण करके उसका प्रकाश करती है जिसका पवित्र नाम वेद है।

इसके विपरीत कुरान शरीफ़ में स्थान-स्थान पर चमत्कारों का वर्णन आया है। हम नीचे कुछ पैग़म्बरों के सम्बन्ध में कुरान शरीफ़ की साक्षी प्रस्तुत करेंगे जिससे प्रकट हो कि उनकी महानता की आधारशिला कुरान की दृष्टि में उनके चरित्र पर नहीं चमत्कारों पर है। कुरान शरीफ़ के कुछ पैग़म्बरों के चरित्र पर एक संक्षिप्त आलोचना पिछले अध्याय में हो चुकी है।

आचार व आध्यात्मिकता की परिपूर्णता विद्यमान होने की दशा में किसी व्यक्ति का जीवन  चमत्कारों की अपेक्षा नहीं रखता। मनुष्यों के लिए लाभदायक व सृष्टि के नियमों के या ऐसा कहो कि परमात्मा की इच्छा के रंग में रंगी हुई कार्य प्रणाली सर्वश्रेष्ठ चमत्कार है। जो ऋषि दयानन्द व उनके पूर्ववर्ती वेद के ऋषियों के भाग में आया है। अन्य महापुरुष भी इस श्रेष्ठता से रिक्त नहीं होंगे, परन्तु हमें यहाँ उन महापुरुषों के वर्णन से तात्पर्य है कि जो उनके अनुयायियों के कथानकों के द्वारा हम तक पहुँचे हैं।

इस अध्याय में हमें देखना यह होगा कि इन महापुरुषों के चमत्कार कल्पना के कितने निकट हैं? यदि कल्पना करो कि उनकी सत्यता को क्षणभर के लिए स्वीकार भी कर लिया जाए तो इससे वर्तमान काल का मानव समाज क्या लाभ उठा सकता है? माननीय पैग़म्बरों के आचार के परिपालन का द्वार इस्लाम के भाग्य लेखों के नियमों के हाथों बन्द है। क्योंकि हम वैसे ही कर्म करने पर विवश हैं जैसे प्रारम्भ से हमारे भाग्य लेखक ने लिख दिए हैं फिर आश्चर्यप्रद चमत्कार तो—

र्इं सआदत बज़ोरे बाज़ू नेस्त,

ता न बख्शद ख़ुदाए बिख्शन्दा 1 ।

[1. अर्थात् यह पुण्य अथवा सामर्थ्य भुजा बल से प्राप्त नहीं होता। जब तक विधाता की कृपा न हो—इसकी प्राप्ति असम्भव है।   —‘जिज्ञासु’]

यह चमत्कार हमारे किस काम के? अभी तो हमें इन करामातों, चमत्कारों के तथाकथित वर्णनों पर दृष्टिपात करना चाहिए। सम्भव है, इसमें हमारे सदुपयोग की भी कोई बात निकल आवे—

हम दृष्टान्त के रूप में इन पैग़म्बरों के कुछ चमत्कारों की संक्षिप्त जाँच पड़ताल किए लेते हैं—

(1) हज़रत मूसा, (2) हज़रत ईसा, (3) हज़रत इब्राहिम, (4) हज़रत सालिह, (5) हज़रत नूह, (6) हज़रत मुहम्मद।

हज़रत मूसा

हज़रत मूसा की कहानी कुरान शरीफ़ में बार-बार दोहराई गई है। हम कुछ ऐसे प्रमाणों पर सन्तोष करेंगे जिनसे इन हज़रत के किए हुए कार्यों या उनकी कहानी में वर्णित प्रकृति नियम विरुद्ध कारनामों पर प्रकाश पड़ सके।

मनुष्य बन्दर बन गए

सूरते बकर में फ़रमाया है— वलकद अनिमतुमल्लज़ीना अइतिदू मिनकुम फ़िस्सबते फ़कुलनालहुम कूनू किरदतन ख़ासिईन। फ़जअलनाहा नकालन लिमा बेनायर्देहा वमा ख़लफ़हा।

—(सूरते बकर आयत 65-66)

इसकी व्याख्या तफ़सीरे जलालैन में इस प्रकार की गई है—

सचमुच सौगन्ध है कि तुम जानते हो उनको जिन्होंने (प्रतिबन्ध लगाने पर भी) शनिवार के दिन (मछली का शिकार करके) सीमा का उल्लंघन किया (वह लोग ईला के रहने वाले थे) सो हमने उनसे कहा कि तुम बन्दर बन जाओ रहमत (प्रभु कृपा) से दूर (सो वह) हो गए और तीन दिन बाद मर गए। फिर हमने (इस दण्ड को) उनके काल के पश्चात् और बाद में आने वाले लोगों के लिए मार्गदर्शन का साधन कर दिया। —जलालैन

शरीरों का अविलम्ब परिवर्तन प्रकृति के किस नियम के अनुसार हुआ? हज़रत डारविन को कठिनाई थी कि बन्दर की पूँछ मनुष्य शरीर में आकर लुप्त कैसे हो गई? पाठक वृन्द! कुरान की कठिनाई यह है कि दुम (पूँछ) कैसे उत्पन्न हो गई? मज़हब में तर्क का प्रवेश नहीं।

मृत शरीर बोल उठा

व इज़ा कतलतुम नफ़सन फ़द्दर अतुम फ़ोहा बल्लाहो मुख़- रिजुन मा कुन्तुम तकतिमूना, फ़कुलना अज़रिबहो विबाज़िहा। कज़ालिका यहयल्लाहो अलमूता व युरीकुम आयतिही लअल्लकुम तअकिलून। —(सूरते बकर आयत 73)

जबकि तुमने एक आदमी को मारा फिर उसमें झगड़ा किया और अल्लाह प्रकट करने वाला है। इस बात को जिसको तुम छुपाते थे। फिर हमने कहा कि इस (वध किए गए) से इस (गाय) की (शाब्दिक अर्थ हैं इस गाय) का एक टुकड़ा जीभ या दुम की हड्डी मारो उन्होंने मारा और वह जीवित हो गया और अपने चाचा के बेटों के बारे में कहा कि उन्होंने मुझे मारा है यह कहकर मर गया।  अल्लाह ताला इसी प्रकार मृत शरीरों को जीवित करेगा वह तुमको अपनी शक्ति की निशानियाँ दिखाता है कि तुम विचार कर समझो। —जलालैन

गाय का एक टुकड़ा लगने से मुर्दा जी उठा न जाने मरा क्या लगने से? पर मरते तो लोग नित्यप्रति हैं। चमत्कार जीने में था। बंकिमचन्द्र बंगाल के प्रसिद्ध उपन्यासकार मजिस्ट्रेट थे। एक मुकदमें में वास्तविक परिस्थिति का पता नहीं लग रहा था। आपने मुर्दे का स्वांग भरा। लाश बनकर पड़े रहे और उस पर कपड़ा डाल दिया गया। अपराधी भी वहीं थे। बातों-बातों में निःसंकोच सारी घटना सच-सच कह गए। मुर्दा जलाने से पूर्व ही जी उठा और न्यायालय में घटना की साक्षी दे गया। कुछ ऐसी ही दशा इन आयतों में लिखी हुई तो नहीं? यह अन्तर अवश्य है कि बंकिम फिर जीवित ही रहे तीन दिन पश्चात् मरे नहीं।

डण्डे का चमत्कार

व इजस्तस्का मूसालिकौमिही, फकूलनाजरिव बिअसाक- लहजरा फन्फजरत मिनहा इसनता अशरा ऐनन।

—(सूरते बकर आयत 73)

जब कि (उस जंगल में) मूसा ने अपनी जाति के लिए पानी माँगा सो हमने कहा कि अपनी लाठी पत्थर पर मार (यह वही पत्थर था जो मूसा के कपड़े ले भागा था) नरम (चौकोन जैसा आदमी का सिर) सो उसने मारा बस 12 जल के स्रोत (चश्मे) (जितने वह गिरोह थे) उसमें से निकलकर बहने लगे। —जलालैन

डण्डा अजगर बन गया

फ़लका असाहो, फ़इज़ाहिया सअबानुन मुवीनुन, वनज़ आयदुहू फ़इज़ाहिया बैज़ा अनलिन्नाज़िरीन।

—(सूरत ऐरा फ आयत 107)

बस मूसा ने अपनी लाठी डाली सो अचानक वह बड़ा अजगर साँप बन गई और (मूसा ने) अपना हाथ (कपड़ों में से) निकाला और वह चमकता हुआ प्रकाशमान प्रकट हुआ देखने वालों की दृष्टि में (यद्यपि उस हाथ की यह रंगत न थी। गेहुआ रंग था)।

—जलालैन

पतला साँप

व अलके असाका फ़लम्मा राअहा तहतज़्जुन कअन्नहा जानुन ववलामु दब्बिरन वलम यअकिब या मूसा ला तख़िफ़।

—(सूरते नहल आयत 10)

और अपनी लाठी डाल (सो मूसा ने) अपनी लाठी डाली (उसने) जब उस लाठी को देखा कि दौड़ती है जैसे पतला साँप। मूसा पीठ फेरकर भागा और पीछे को न लौटा (अल्ला ताला ने फ़रमाया) ए मूसा तू इससे भयभीत न हो।

—जलालैन

वेदान्त में भ्रमवश रस्सी को साँप समझने का वर्णन तो प्रायः होता है, यहाँ न जाने भ्रम था या वास्तविक दशा थी?

टिड्डियों जुंओं व मैढकों का मेंह

लोग हज़रत मूसा के भक्त न बने बस फिर क्या था?

नहनोलका बिमोमिनीना फ़अरसलना अलैहुम त्तूफ़ानावल जरादा वलकमला वज़्ज़फ़ादिए वद्दम्मा आयतिन मुफ़स्सिलातिन।

—(सूरते आराफ 132-133)

हम कभी तेरा विश्वास न करेंगे और ईमान न लाएँगे (सो मूसा ने उनको शाप दिया) फिर हमने उन पर पानी का तूफ़ान भेजा (कि सात दिन तक पानी उनके घर में पानी भरा रहा। जो बैठे हुए आदमी के हलक तक पहुँचता था) और भेजा टिड्डियों को (सात दिन की उनकी खेती व फल खा गए और (भेजा) जुओं को (या वह कीड़ा जो अनाज में पैदा हो जाता है) या चिचड़ी को जो उसने टिड्डियों का बचा हुआ खाया और कुछ शेष न छोड़ा और भेजा उन पर मैंढक (कि वह उनके घरों व खानों में भर गए) और रक्त को (उनके पानी में) और यह निशानियाँ प्रकट (भेजी)।

किसी की समझ में यह चमत्कार न आए तो इसका इलाज वही है जो इस आयत के अनुसार ईमान न लाने वालों का हुआ। अर्थात् पानी का तूफ़ान, टिड्डियों, जूएँ, रक्त व मैंढक, इस भय के होते कौन हैं जो ईमान न लाए?

नदी दो टुकड़े

आगे फ़रमाया है—

फ़ग़रकनाहुम फ़िलयम्मा बिइन्नहुम कज़्ज़बू बूआया तिनाव  कानू अनहा ग़ाफ़िलीन।

—(सूरते आराफ आयत 136)

फिर डुबा दिया (उनको शोर नदी में) इस कारण से कि वह निश्चय ही हमारे आदेश को झुठलाते थे और (हमारी निशानियों से) अज्ञान रखते थे कुछ सोच विचार नहीं करते थे। —जलालैन

व जावज़ना विनब्यिय इसराईल लवहरा।

—(सूरते आराफ आयत 138)

और हमने बनी इसराईल को नदी से पार कर दिया।

इस घटना का विवरण इससे पूर्व निम्न आयत में वर्णन हो चुका है।

व इज़ा फ़रकना बिकुलमुल बहरा फ़अन्जयतकुम व अग़रकना आले फ़िरओन व अन्तुम तंज़रुना।

—(बकर आयत 50)

जबकि हमने तुम्हारे (बनी इसराईल के) कारण दरिया को चीरा (ताकि तुम शत्रुता से भागकर इसमें दाखिल हो जाओ) सो हमने तुमको डूबने न दिया और फिरऔन की जाति को डुबो दिया (फ़िरऔन सहित) और तुम देखते थे (उनके ऊपर दरिया के मिल जाने पर)।

—जलालैन

आजकल की पनडुब्बी नौकायें इससे भी कहीं अधिक चमत्कार1 दिखा रही हैं। [1. डॉ॰ ग़ुलाम जैलानी बर्क ने अपनी पुस्तक दो कुरान पृष्ठ 322 पर नील नदी का फटना, लाठी का सर्प बनना आदि चमत्कारों को झुठला दिया है। —‘जिज्ञासु’]

  1. हज़रत मसीह

हज़रत ईसा मसीह को मुसलमान वह महत्ता नहीं देते जो ईसाई लोग देते हैं, परन्तु हज़रत मसीह से भी कुछ चमत्कार कुरान में ही जोडे़ गये हैं। जैसा कि सूरते बकर आयत 87 में वर्णन है।

व आतैना ईसा इब्ने मरयमल बय्यनाते व अय्यदनाही बिरुहिलकुदस।

और मरियम के पुत्र ईसा को कई चमत्कार दिए (जीवित करना मृतकों का और अन्धें व जन्मजात कोढी को निरोग करना) और उनको सामर्थ्य दी जिबरईल से (जहाँ ईसा चलते, जिबरईल उनके साथ होते थे)।

—जलालैन

बिना पिता के सन्तानोत्पत्ति

व इज़ा कालतिलमलाइकतो या मरयमो इन्नल्लाहा इस्तफ़ाका व तहरका वस्तफ़ाका अलानिसाइल आलमीन।

—(आले इमरान 39)

जब फ़रिश्ते बोले ए मरियम! अल्लाह ने तुझे पसन्द किया व शुद्ध बनाया (टिप्पणी में है—पुरुष के निकट होने से पवित्र किया) और पसन्द किया तुझको सब संसार की स्त्रियों से।

—जलालैन

व जकरा फ़िल कितावे मरियमा इज़म्बतजतामिन अहलिहा मकानन शरकिय्यन। फ़त्तरवजत मिन दूनिहिम हिजाबन फ़अर सलना इलैहा रुहना फ़तमस्सला लहवशरन सविय्यन। कालत इन्नो अऊजो बिर्रहमाने मिन्काइन कुन्ता नकिय्य्न। काला इन्नमा अनारसूलो रब्बिकालिअहल लका ग़ुलामन ज़किय्यन॰ कालत अन्नी यकूनोली ग़ुलामुन वलम यमसइनि बशरुन वलम अकोवगिय्यन काला कज़ालिका काला रब्बुका हुवा अलय्या हय्यनुन व लि नजअहु आयतुन लिन्नासे………फ़हमलतहू फ़न्तब्जत बिहीमकानन कसिय्यन।

—(मरयम 16-20)

याद करो कुरान में कथा मरियम की जबकि वह पृथक् हुई अपने घर वालों से एक मकान के कोने में जो पूर्व दिशा में था (वहाँ जाकर) घर के लोगों के सामने परदा छोड़ दिया (ताकि कोई न देखे यह परदा इसलिए छोड़ा था कि अपने सिर या कपड़ों से जूं निकालती थी या मासिक धर्म के पश्चात् स्नान करती थी पवित्र होकर) सो भेजा हमने उनकी ओर अपनी रूह (आत्मा, जिबरईल) को। सो वह हो गया आदमी पूरे हाथ पैर वाला सुन्दर (जबकि मरियम अपने कपड़े पहन चुकी थी) मरियम बोली, निःसन्देह मैं तुझसे ख़ुदा की शरण माँगती हूँ यदि तू कोई पवित्र हृदय पुरुष है (तू मेरे शरण माँगने से पृथक् रह) जिबरईल ने कहा—बात यह है कि मैं तेरे परमात्मा का भेजा हुआ हूँ कि तुमको एक पवित्र बेटा प्रदान करूँ (जो पैग़म्बर होगा) मरियम ने कहा—मेरे पुत्र कैसे होगा।

यद्यपि किसी पुरुष ने विवाह करके हाथ नहीं लगाया और न मैं व्यभिचारिणी हूँ…….. जिबरईल ने कहा—(यह बात अवश्य होने वाली है, अर्थात् बिना पिता के पुत्र अवश्य उत्पन्न होगा) तेरा परमात्मा कहता है कि यह काम मेरे लिए सरल है (इस प्रकार कि जिबरईल मेरे आदेश से तेरे अन्दर फूँक मारे तू उससे गर्भवती हो जाए)……..और हम उसको अवश्य पैदा करेंगे ताकि बनाएँ उसको अपने सामर्थ की निशानी…..फिर मरियम गर्भवती हुई और चली गई (गर्भवती होने के कारण अपने घर वालों से) दूर।

—जलालैन

फ़रिश्ते आजकल बात भी नहीं करते। प्राचीनकाल में करते थे। परमात्मा के सन्देश लाते और उसके आदेशों का पालन करने में भाँति-भाँति के पुरस्कार प्रदान कर जाते थे। हज़रत मरियम को बिना पति के सन्तान दी। हज़रत यहया को बिना शक्ति के पुत्र दिया। इस विज्ञान के युग में अल्लाह मियाँ व उसके फ़रिश्ते सब वैज्ञानिक हो गए हैं। मजाल है कोई बात प्रकृति के नियमों के विरुद्ध कर जावें।

वल्लती अहसनत फ़रजहा फ़नफ़रवना फ़ीहा मिनरुहिनावजअलनांहां व अबनाहा आयतुन लिल आलमीन।

—(सूरते अम्बिया 88)

और स्मरण करो मरियम को जिसने अपनी योनि को (बुरे काम से) सुरक्षित रखा सो हमने अपनी रूह (आत्मा) फूँकी (अर्थात् जिबरईल ने उसके कुर्ते के गिरेबान में फूँक मारी जिससे उसको ईसा का गर्भ रह गया) और हमने मरियम को और उसके पुत्र को मनुष्यों, जिन्नों (भूतों) व फ़रिश्तों (देवताओं) के लिए एक निशानी बनाया। (क्योंकि मरियम ने ईसा को बिना पति के जन्म दिया)। —जलालैन

हज़रत इब्राहिम

कटे पशु जीवित किए

हज़रत इब्राहीम एक पुराने ईश्वरीय दूत हैं। हज़रत मुहम्मद का दावा है कि इस्लाम हज़रत इब्राहिम का ही धर्म है। उनके प्रकृति के नियमों के विरुद्ध चमत्कारों का वर्णन सूरते बकर में इस प्रकार है—

व इज़ा काला इब्राहीमो रब्बे अरनी कैफ़ा यहयुलमौता काला अवलय तौमिनो। काला बला वलाकिन लियमय्यिनाकलबी। काला फ़ख़ुज़ अरबअतन मिनत्तैरे फ़सर हुन्ना इलैका, सुम्मा अजअल अलाकुल्ले जबलिन मिनहुन्ना जुजअन सुम्मा अदउहुन्ना यातीन का सइयन व अलमी इन्नाल्लाहो अज़ीज़न हकीम। —(सूरते बकर आयत 260)

इब्राहिम ने कहा—ए मेरे प्रभु मुझको दिखला कि तू मुर्दों को कैसे जीवित कर देगा (अल्लाह ने उनसे फ़रमाया) क्या तुझको इस पर विश्वास नहीं? (कि मेरे अन्दर सामर्थ है कि मुर्दों को जीवित कर दूँ)……..(इब्राहीम ने) कहा कि मैंने निसन्देह विश्वास किया तेरी शक्ति पर……..यह मैंने तुझसे इसलिए पूछा कि आँख से देखकर पूरे हृदय को सन्तोष प्राप्त कर लूँ और विरोधियों से तर्क कर सकूँ (अल्लाह ने) फ़रमाया, अब तू चार पंछी पकड़…….और उनको अपने पास इकट्ठा कर और उनको काटकर उनके पंख गोश्त मिलाकर फिर अपनी ज़मीन के पहाड़ों में से प्रत्येक पहाड़ पर एक-एक टुकड़ा उनका रख दे फिर उनको अपनी ओर बुला वे दौड़कर आएँगे और जान ले कि अल्लाह शासक है (किसी बात से कमज़ोर नहीं उसका काम सुदृढ़ व पक्का है) सो इब्राहिम ने मोर, करगस, कौवा और मुर्ग पकड़ा और उनका मांस व पर काटकर मिला दिए और उनके सिर अपने पास रख लिए और उनको बुलाया सो तमाम टुकड़े उड़कर जिसका जो टुकड़ा था उसमें जा मिला। यहाँ तक कि पूरे होकर अपने-अपने सिरों से मिल गए।

—जलालैन

हज़रत सालिह

अल्लाह मियाँ की ऊँटनी

कौम समूद के पैग़म्बर सालिह के सम्बन्ध में सूरते हूद में आया है कि उन्होंने फ़रमाया—

वया कौमे हाजिही नाक तुल्लाहे लकुम आयतुन फजरुहा ताकुल फिलअरजे ल्लाहेवला तमस्सूहा बिसूइन फयारवुजकुम अजाबुन करीबुन फअकरुहा, फकाला तमत्तऊफी दारिकुम सलासता अय्यामिन जालिका व अदुन गैरो मकजूबिन।

—(सूरते हूद आयत 63)

और ए मेरी कौम यह अल्लाह की ऊँटनी है तुम्हारे लिए निशानी अतः इसे छोड़ दो फिर से अल्लाह की भूमि पर और इसके साथ किसी प्रकार का बुरा व्यवहार मत करो नहीं तो तुम पर बहुत बड़ा दण्ड आएगा। सो उन्होंने उसके पैर काटे (अर्थात् एक कज़ाज़ नामक व्यक्ति ने उस कौम के कहने पर ऊँटनी के पैर काट डाले)  (सालिह ने) फ़रमाया ज़िन्दा रहो तुम अपने घरों में तीन दिन फिर तुम वध कर दिए जाओगे।

—जलालैन

सूरते बनी इसराईल में कहा है—

व आतैना समूदुन्नाकतामब्सिरतुन फ़ज़लमू बिहा।

—(बनी इसराईल 58)

हमने समूद की ओर ऊँटनी को भेजा वह प्रकट निशानी थी सो उन्होंने उसका इन्कार किया। (अतः वे नष्ट हो गए)

तफ़सीरे हुसैनी में इस आयत की व्याख्या में कहा है—

समूद अज़ सालिह मोजिज़ा तलब करदन्द व ख़ुदाए बराए एशां अज़ संग नाका बेरूं आवुरद।

समूद ने सालिह से चमत्कार माँगा और ख़ुदा ने उनके लिए पत्थर से ऊँटनी उत्पन्न कर दी।

सूरते शुअरा में फ़रमाया है—

काला हाज़िही नाकतुन लहा शिरबुन वलकुम शिरबो योमिन मालूम।

—(सूरते शुअरा)

कहा यह ऊँटनी है उसके लिए पानी का एक भाग निश्चित है और तुम्हारे लिए एक निश्चित दिन का भाग।

—जलालैन

मूज़िहुल कुरान में इसी स्थान पर फ़रमाया है—

वह छूटी फिरती….जिस सरोवर पर पानी को जाती सब पशु वहाँ से भागते तब यह निश्चित कर दिया गया कि एक दिन पानी पर वह जाए एक दिन औरों के पशु जाएँ।

सूरते शमस में यह वार्ता इस प्रकार वर्णन की गई है—

फ़कालालहुम रसूलुल्लाहे नाकतुल्लाहे व सकयाहा फ़कज़िबूहा फ़अकरुहा फ़दमदमा अलै हुम रब्बुहुम बिज़नबिहिम फसब्वाहा।

—(सूरते शमस आयत 13-14)

फिर कहा उनको अल्लाह के रसूल ने सावधान हो अल्लाह की ऊँटनी से और उसके पानी पीने की बारी से फिर उसको उन्होंने झुठला दिया फिर वह काट मारी और फिर उल्टा मारा, उन पर उनके रब ने उनके पाप से फिर बराबर कर दिया।

—जलालैन

भला यह ऊँटनी क्या हुई! पत्थर से निकली और उसका अधिकार यह कि जिस दिन वह पानी पीए और पशु न पीवें आखिर अल्ला मियाँ की जो हुई। यह भी अच्छा हुआ कि पत्थर से कोई मनुष्य नहीं निकला नहीं तो मनुष्यों के लिये पानी का अकाल हो जाता। कोई पूछे कि इस चमत्कार से मनुष्य का क्या बना? और दयालु परमात्मा का क्या?

हज़रत नूह

लगभग हज़ार बरस जिए

सूरते अनकबूत में हज़रत नूह का वर्णन हुआ है। फ़रमाया है—

वलकद अरसलना नूह न इला कौमिहि फ़लबिसा फ़ीहिम अलफ़ा सनतिन इल्ला ख़मसीना आमन।

—(अनकबूत आयत 14)

और हमने भेजा नूह को उनकी कौम के पास। फिर रहे वे उनमें 50 कम 1 हज़ार बरस तक।

तफ़सीरे हुसैनी में इस आयत पर कहा है—

नूह चहल साल मबऊसशुद व नह सदपंजाह साल ख़लक रा बख़ुदा दावत करद। बाद अज़ तूफ़ान शस्त साल ज़ीस्त दर अहकाफ़ अज़ दहब नकल कुनन्द कि उम्रे नूह हज़ार व चहार सद साल बूद, साहब ऐनुलमआनी फ़रमूद कि सी सद व हफ़्ताद साल मबऊस शुद व नो सद व पंजाह साल दावत करद, बाद अज़ तूफ़ान सी सद व पंजाह साल ज़ीस्त।

नूह अलैहस्सलाम चालीस साल की आयु में पैग़म्बर हुए और नौ सौ पचास वर्ष तक लोगों को ख़ुदा का सन्देश देते रहे। तूफ़ान के पश्चात् साठ वर्ष जीवित रहे। अहकाफ़ में वह बसे रिवायत (वर्णनवार्ता) है कि नूह अलैहस्सलाम की आयु एक हज़ार चार सौ वर्ष थी। लेखक ऐनुलमआनी फ़रमाते हैं कि तीन सौ सत्तर साल की आयु में पैग़म्बर हुए नौ सौ पचास साल प्रचार किया और तूफ़ान के पश्चात् 3 सौ पचास साल जीवित रहे।

हज़रत नूह की आयु कुछ भी हो उनकी प्रचार की अवधि का प्रारम्भ पचास वर्ष स्वयं कुरान में वर्णित है। इस प्रचार का प्रभाव यह कि थोड़े गिने-चुने लोगों के उनके साथियों के अतिरिक्त कोई भी सन्मार्ग पर नहीं आया और सब को तूफ़ान की बलि होना पड़ा।   सारी सृष्टि अल्लाह की बनाई और बनाई भी वैसी जैसी अल्लाह को स्वीकार था। अल्लाह ने कुछ को जन्नत के लिए कुछ को दोज़ख़ के लिए पहले से ही चुन लिया था फिर हज़रत नूह को कष्ट देने की क्या आवश्यकता थी? यदि दिया ही था तो कुछ परिणाम निकलना चाहिए था।

हज़रत मुहम्मद

चाँद तोड़ दिया

हज़रत मुहम्मद ने चमत्कार दिखाने से इन्कार तो किया था, परन्तु अनुयायियों के आग्रह से विवश हो गए हैं। सूरते कमर में आया है—

बक्तरबत स्साअता वन्शक्कलकमरो।

निकट आ गया प्रलय दिन और फट गया चाँद (चाँद के दो टुकड़े होना)। हज़रत का चमत्कार हुआ जिसकी माँग काफ़िरों के द्वारा की गई थी। आपने उसकी ओर संकेत किया। और वह दो टुकड़े हो गया।

चाँद अरब का था क्या?—कोई प्रश्न कर सकता है कि वह चाँद अरब का था या इस चमत्कार को देखने वालों का कोई विशेष चाँद था? या यही चाँद था जो संसार की सभी जातियों के लिए सामान्य है? यदि सामान्य था तो क्या कारण है कि अरब के बाहर के लोग इस चमत्कार के साक्षी न हुए। वास्तव में यह चमत्कार ज्योतिष विद्या के इतिहास में कुछ कम महत्त्व का नहीं था कि हज़रत मुहम्मद की घटना उनके लेखकों के अतिरिक्त किसी और का ध्यान न खींचती। अपना-अपना भाग्य है इस गौरव से और लाभान्वित न हुए!

सूरते बनी इसराईल में कहा है—

सुबहानल्लज़ी असराबि अब्दिही लैलन मिनल मस्जिदल अकसा अल्लजी बरकना हौलहू लिनरीहू मिन आतेना।

—(सूरते बनी इसराईल आयत 71)

पवित्र है वह सत्ता कि अपने बन्दे को (मुहम्मद साहब को) रात में मस्जिदे हराम (अर्थात् मक्का) से मस्जिदे आकसा (बैतुल मुकद्दस-पवित्र घर) की ओर ले गया……जिसकी हर ओर से हमने बरकत दी……..कि उसको विचित्रताएँ व चिह्न दिखलाए…. आपकी भेंटें पैग़म्बरों से हुई व आपको आसमानों की ओर चढ़ाया………वास्तव में हज़रत सलअम ने फ़रमाया कि मेरे पास बुराक लाया गया कि वह एक सफ़ेद जानवर है गधे से बड़ा व खच्चर से छोटा उसके पैर वहाँ तक पड़ते हैं जहाँ तक उसकी दृष्टि पड़े सो मैं उस पर सवार हुआ। वह मुझको ले गया। यहाँ तक कि मैं बैतुल मुकद्दस पहुँचा। वहाँ मैंने अपनी सवारी को उस हलके (घर) में बाँधा जिसमें और पैग़म्बर अपनी सवारियाँ बाँधते थे।

—जलालैन

इसके पश्चात् आसमानों पर जाने का वर्णन है, द्वार खटखटाया जाता है, प्रश्न होता है कौन? हज़रत जिबरईल फरमाते हैं हज़रत मुहम्मद? पूछा जाता है। क्या वह पैग़म्बर हो गए? स्वीकारात्मक उत्तर मिलने पर द्वार खोल दिया जाता है। इस प्रकार विभिन्न आसमानों पर विभिन्न सम्मानीय पैग़म्बरों की भेंट के पश्चात्—

फिर मैं पहुँचा सदर तुलमुन्तहा (सर्वोच्च गन्तव्य स्थल) तक। उसके पत्ते ऐसे जैसे हाथी के कान और उसके फल ऐसे जैसे मटका। जब उस बेरी के वृक्ष को घेर लिया, अल्लाह के आदेश से उस वस्तु ने जिसने घेर लिया वह आश्चर्यचकित हो गया।…..आपने फ़रमाया मेरी ओर जो ईश्वरीय सन्देश मिला है वह प्रकट करने योग्य नहीं…….।

—जलालैन

हज़रत की उम्मत (समुदाय) पर पचास नमाजें  फर्ज़ हुर्इं। हज़रत वापिस लौटे, परन्तु सम्मानीय पैग़म्बरों ने समझाया1[1. नोट—यहाँ मूसा का वर्णन ।] बोझ तुम्हारे अनुयाइयों से सहन न हो सकेगा। हज़रत बार-बार ख़ुदा की सेवा में गए और वहाँ से लौटे अन्त में नमाज़ों की संख्या पाँच करा ली। हज़रत मूसा ने इसमें भी कमी कराने का परामर्श दिया तो फ़रमाया—

“मैं अनेक बार अपने रब के पास जा चुका हूँ अब मुझको लज्जा आती है। इस हदीस को बुख़ारी व मुस्लिम ने उद्धृत किया है और यह शब्द मुस्लिम के हैं।”

—जलालैन

इसमें सन्देह नहीं कि इस चमत्कारी यात्रा के विवरण कुरान के भाष्यों में लिखे हुए हैं। स्वयं कुरान में मस्जिद हराम से मस्जिदे अकसा तक एक रात में जाना वर्णन किया है। वह उस समय   कि यह  चमत्कार था, परन्तु आज गुब्बारों व विमानों का युग है। इस समय इसे कौन चमत्कार मान सकता है?

चमत्कार और भी बहुत से हैं, परन्तु यहाँ जैसे बहुतों में से कुछ नमूने के रूप में दिए हैं केवल कुछ चुने गए हैं। पाठक के लिए विचारणीय बात यह है कि क्या इन चमत्कारों से परमात्मा की किसी विशेष शक्ति का आभास होता है जो सृष्टि की कल को सामान्यतया चलाने से अधिक कठिन है? क्या इन चमत्कारों से परमात्मा के प्यारों की किसी विशेष महानता का आभास होता है जिससे उनकी पदवी बुद्धिमानों की दृष्टि में ऊँची हो? कहीं इन प्रकृति नियम के विरुद्ध कर्मों से यह तो प्रकट नहीं होता कि प्रकृति का नियम बेदाद नगरी अन्यायी नगरी का सा कानून है जो तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है।

यहाँ कर्मों की इतनी परवाह नहीं जितनी अपने प्यारों की प्रतिष्ठ व अपमान की है। लोगों ने एक मार्गदर्शक का कहना नहीं माना। बिना यह विचारे कि वह उपदेशक कैसे चरित्र का है। लोगों के लिए खून की वर्षा, नूह का तूफ़ान और न जाने क्या-क्या तैयार है। लोगों को अपना श्रद्धालु बनाने के लिए उपाय क्या-क्या प्रयोग किए जा सकते हैं। जादूगरी, डण्डे को साँप बना दिया। क्या इसी को धर्म व सत्य का प्रचार कहते हैं? इन खेलों से कहीं महान् गौरवशाली सच्चे कार्य सृष्टि-रचना में दिन-रात हो रहे हैं।

क्या बिना बाप के सन्तान उत्पन्न होने में परमात्मा की महानता का अनुमान होता है और माता- पिता दोनों के होते सन्तानोत्पत्ति होने में परमात्मा का कोई हाथ नहीं? बूढ़े के बच्चा हो जाना परमात्मा का चमत्कार है और युवक के पुत्र होना परमात्मा की कारीगरी का खण्डन है? ऊँटनी ने हज़रत सालिह के व्यक्तित्व में किस बड़प्पन की वृद्धि की? सच्चाई यह है कि परमात्मा पर विश्वास की निर्भरता यदि नित्य प्रति के साधारण कार्यों व घटनाओं पर रखो तो आज भी स्थिर रहेगा कल भी और जो किसी बीते काल के चमत्कारी कथानकों पर निर्भरता ठहरी तो जिस समय के लोग कहानियों से ऊपर उठकर वर्तमान परिस्थितियों के अभिलाषी हुए जैसे आज कल हैं उस काल में नास्तिकता ही नास्तिकता का सिक्का बैठ जाएगा। मनुष्य चरित्र से पूजा जा सकता है तथा परमात्मा अपने नियमों की सुदृढ़ता व अटलता से। जिसे न उसके (मत के अनुयायी) अपने तोड़ सकें न पराये ही।

सच्चे-राम को ईश्वर बताने की झूठी-बैसाखी क्यों?:- – पं. आर्य प्रहलाद गिरि

सीधे-सच्चे हिंदुओं को ईसाई बनाने के लिये कमर कसकर भारत में आये फादर कामिल बुल्के भी अप्रक्षिप्त वाल्मीकि रामायण में मर्यादा पुरुषोत्तम राजा रामचंद्र, सती सीता, महावीर हनुमान, भाई भरतादि के त्यागपूर्ण जीवन-चरित्रों को पढ़ते हैं, तो वेदकालीन प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति का ऐसा उत्कृष्ट सुंदरतम -स्वर्णिम सुखद दृश्य देखतेे ही चिल्ला उठते हैं।

जिस तरह सैकड़ों शेक्सपियर भी रामचरितमानस-सा विश्व का सुंदरतम महाकाव्य नहीं रच सकते, उसी तरह राम-सा दिव्य महामानव (देवात्मा, देवदूत, बोधिसत्व-तथागत, तीर्थंकर, पैगंबर, प्रभुपुत्र, फरिश्ता) भी कोई हमें इतिहास के किसी पन्ने पर नहीं दिखला सकता। ऐसा इसलिये भी कि-

राम, तुम्हारा चरित्र स्वयं ही काव्य है।

कोई कवि बन जाये, सहज संभाव्य है।।

-राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त

समुद्र को भी बांध देने वाले युगपुरुष हमारे राम मानव-धर्म के उच्चादर्शों पर इसलिये भी चलते रहे कि इनके ही पूर्वज राजर्षि मनु दुनिया वालों के सामने सगर्व घोषणा कर चुके थे-

एतत् देश प्रसूतस्य सकाशात् अग्र जन्मन:।

स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्व मानवा:।।

– (२.२०)

-धरती माता के सारे द्वीप-द्वीपान्तरों पर बसने वाले हर तरह के लोग इसी आर्यावर्त देश के अगुओं (नेताओं, प्रतिनिधियों) से अपने-अपने अनुकूल उन्नत चारित्रिक सभ्यता-संस्कृति को सीखते रहें।

किन्तु आज दुनिया को छोड़ें, हिन्दू कहलाने वाले हम आर्यवंशी लोग भी अपने पूर्वज राम को ईश्वर (अन अनुकरणीय, सिर्फ चर्चा करने योग्य) कहकर इनके विचारों-व्यवहारों से कुछ भी नहीं सीखते। राम का नाम ले-लेकर बेधडक़ रावण-पथ पर बढ़ते जा रहे हैं। गले में ही नहीं, मंदिरों में भी राम के चित्र सजाकर रावण की ही चरित्रोपासना में जुटे हुए हैं। अत: राम-विमुखों की जो दशा होनी चाहिये, वही दुर्दशा महाभारत युद्ध के बाद से आज तक हमारी होती जा रही है।

हल्दीघाटी में घास की रोटी खाकर भी जब मुगलों के प्रहारों को तपस्वी महाराणा प्रताप अपने तलवार से माँ भारत-भारती की रक्षा कर रहे थे, उसी समय उसी काम को सारी मुसीबतों को सहते हुए बड़ी बहादुरी, बुद्धिमानी और कुशलता से संत कवि गोस्वामी तुलसीदास भी अपनी सफल लेखनी से, काशी से भागकर अयोध्या में कर रहे थे। काल्पनिक ही सही, यदि श्रीमद्भागवत गीता को मौर्य गुप्तकाल में न लिखा जाता, तो सारे हिन्दू बौद्ध बन गये होते, और बामियान की विशााल बुद्ध-मूर्ति की तरह सारे बौद्धों को मिटा देना अरबी आक्रांताओं के लिये अत्यन्त सरल था। इसी तरह स्वराष्ट्र-धर्मरक्षक महात्मा तुलसीदास भी सरल और रोचक भाषा-शैली में शैव-वैष्णव का कलह मिटाते हुए रामचरितमानस को लिखकर अयोध्या के ही राजा राम को पूर्ण ब्रह्म परमात्मा बताने और सिर्फ हरिभजन को ही असली यज्ञ-पूजा बताने में यदि सफल न हो पाते, तो उस समय हमें मुहम्मदी, नमाजी और कुरानी बन जाना ही पड़ता।

जिस तरह हम राष्ट्र-धर्म-रक्षक चाणक्य, शंकराचार्य, गुरु गोविंद सिंह, शिवाजी, दयानन्द, सुभाष, सावरकर, पटेलादि के उपकारों को नही भूलते, त्यों ही गीताकार और मानसकार को भी भारतीय वैदिक संस्कृति रक्षा हेतु ‘भारत-रत्न’ पुरस्कार जैसा कुछ न कुछ अविस्मरणीय-सम्मान तो मिलना ही चाहिये। भले ही इनके बनाये ये साहित्यिक-हथियार आज कुछ मोर्चों पर अनुपयुक्त, अप्रासंगिक हो गये हों, तथापि सेवानिवृत्तों (रिटायर्ड्स) की भाँति ये सादर पेंशन पाने के अधिकारी तो हैं ही।

अभी के लिये ‘सत्यार्थ-प्रकाश’ अत्यन्त अमोघ-औषधि व बुद्धिवर्धक टॉनिक है। जो वाल्मीकि रामायण और महाभारत की तरह ही श्री राम और श्रीकृष्ण को एक आदर्श महात्मा ही साबित करता है, परमात्मा नहीं।

पचास साल पहले तक अक्सर लोग कृतज्ञ-भावुकतावश डॉक्टरों को दूसरा भगवान् कह बैठते थे। आज भी हम त्यागियों-परोपकारियों-सहायकों को देवदूत-फरिश्ता-भगवान् कह देते हैं। इसी तरह हम अग्रि, आदित्य, वायु, अंगिरा, इंद्र, ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती, मनु, भगीरथ, परशुराम, राम, कृष्ण, व्यास, गौतम, कणाद, कपिल, पतंजलि आदि वैज्ञानिकों-ऋषियों को (देव-देवी) तो कह सकते हैं, किन्तु परमात्मा कदापि नहीं, क्योंकि वेदानुसार परमात्मा न तो जन्मता-मरता है और न किसी आकार में कभी बंधता है। तथा उसी निराकार एक अखंड अनंत ब्रह्म-ओ३म् से प्रकाश पा-पाकर अनेकों ब्रह्मा, विष्णु, लक्ष्मी, शंकरादि जन्मते-मिटते रहते हैं (मानस-१.१४१.३) यही ज्ञान-प्रकाश पूर्ण सच्चिदानन्द ईश्वर, ध्यान-योग, प्रार्थना, प्राणायाम, हवन, परोपकार, सच्चाई, ज्ञान, ईमानदारी, सदाचार आदि द्वारा ही सभी मनुष्यों का परमोपास्य है। राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, ईसा, मूसा, मुहम्मद, नानक, कबीर, दयानन्दादि भी इसी ईश्वर के उपासक रहे हैं। इन महान् ऐतिहासिक ईश्वर-भक्तों को ही ईश्वर मान लेना और इनकी मूर्ति को सजीव समझकर लड्डू-पेड़ादि खिलाने-पिलाने, सुलाने-जगाने का अभिनय करना-करवाना भारी मूर्खता या धूर्तता है। यह सिर्फ नास्तिकता ही नहीं, महापुरुषों का अपमान भी है।

राम और कृष्ण का मन्दिर बनाकर उनको खिलाने-पहनाने हेतु भीख-चंदा माँगना, इन्हीं की मूर्तियों के सामने यजमानों से झूठ बोलना, तंग करना साबित करता है कि ये निरक्षर पंडे लोग भी इन मूर्तियों को चेतन नहीं समझते। राम के प्राणप्रिय, वीर, वेदज्ञ, ब्रह्मचारी,शाकाहारी हनुमान जी को बंदरमुखी बना देने से भी इन पंडों को संतोष न हुआ तो अब ये बाघ, गीदड़, गधा, सूअर केे मुख लगाकर पंचमुखी हनुमान को पुजवाने के दुस्साहस में लग गये हैं।

हमारे धार्मिक महापुरुषों के पुश्तैनी दलाल बन चुकेे पंडे लोग भली भांति जानते हैं कि जो भगवान् मीर कासिम से लेकर महमूद गजनी, मुहम्मद गौरी, सिंकदर लोदी, तैमूरलंग, औरंगजेब, कालापहाड़ का कुछ भी बिगाड़ न सका, वो मुझे क्या दंड देगा। सचमुच मंदिरों के सारे भगवान् इन पंडे-पुजारियों के सारे तमाशों के मौन समर्थक ही बने रहते हैं।

हमारे प्रबुद्ध पाठको! यदि आप विश्व मानवता के प्रेरणा-पुरुष श्रीराम को कृतज्ञतावश प्रणाम करने भर की रस्म निभाना चाहें, तब तो ये मंदिर स्मारक ठीक हैं।

किन्तु यदि आप सफल सामाजिक जिंदगी जीने हेतु श्रीराम का सही संपूर्ण दर्शन करना चाहते हों, तो आप को ध्यान से वाल्मीकि रामायण ही पढऩी होगी। इस रामायण में कहीं नहीं लिखा है कि राम ईश्वर हैं, बल्कि राम जी भी ‘ओ३म्’ और गायत्री मन्त्र (ओं विश्वानि देव सवितर् दुरितानि परासुव, यद् भद्रं तन्न आसुव) की जपोपासना, ध्यान-योग, प्राणायाम करने वाले सत्यवादी आर्यपुत्र ही थे। उनका देवी कौशल्या के गर्भ से जन्म और एक सौ ग्यारह वर्ष बाद सरयू में डूबने (जल-समाधि) से मृत्यु हुई थी। चूँकि आर्यों में किसी व्यक्ति की कृति-कीर्ति ही याद रखी जाती थी। उसकी चित्र-मूर्ति या मृत्यु-तिथि (पुण्यतिथि) नहीं मनायी जाती थी, इसीलिये राम की भी न कोई चित्रमूर्ति रही, न पुण्यतिथि का उल्लेख, सीता-हरण से काफी दु:खी होकर राम खुद ही लक्ष्मण से कहते हैं-‘भाई, पूर्वजन्म में जरूर मुझसे कोई भारी अपकर्म हुआ होगा, जो इस जन्म में पिता की मृत्यु, भाई भरत का बिछोह और सीताहरण जैसी मार्मिक-पीड़ाएँ झेलनी पड़ रही हैं।’ – (३.३६.४)

वस्तुत: एक चक्रवर्ती राजपुत्र होकर भी सीता-राम का आर्योत्तम जीवन आदि से अंत तक आदर्शों का रिकॉर्ड बनाने के ही दु:खों में बीतता चला गया।

धर्म पे चल के दिखलाने में ही अपना सुख माना।

निज का सुख तजने के सिवा जो और स्वाद क्या जाना।।

बुद्ध और मुगलकालीन धर्म-संकटों से जन-सामान्य को स्वधर्म में बांधे रखने हेतु ही राम की ईश्वरीय-चमत्कारिक कथाएँ गढ़ी गयीं थीं, ताकि बुद्ध और मुहम्मद से राम और कृष्ण ही सर्वाधिक श्रेष्ठ-प्रभावी सबको लगें। किन्तु आज के कम्प्यूटर-युग में उन सब तर्कहीन बातों से अन्य धर्म के पैगम्बरों का क्या-क्या उपहास हो रहा है, ये मुझे नहीं देखना है। मुझे तो अपने राम के उज्ज्वल चरित्र पर झूठ का गंदा चोगा पहनाये रखने वाले अपने धूर्त धर्माचार्यों-पुरोहितों पर क्रोध तथा अपने धर्मांध-अंधभक्त यजमानों की मूर्खता पर ग्लानि हो रही है। गंगा की तरह गंदे हो गये रामायण के चरित्रों की भी सफाई अब कब होगी? श्री राम की चारित्रिक मूर्ति निर्मल होते ही रामजन्म-भूमि पर ही नहीं, बाबर की भी जन्मभूमि पर भव्य रामालय बन जायेगा।

ईश्वर भक्त-राम को ईश्वर मान लेना-राष्ट्रसपूत गाँधी को राष्ट्रपिता कहने जैसा ही पाप है।

अब न कहेगा जग कि कर्ण को ईश्वरीय भी बल था।

जीता इसीलिये कि उसके पास कवच-कुंडल था।।

– (रश्मिरथी-दिनकर)

इंद्र को अपना चमत्कारी-कवच-कुंडल दे देने के बाद जब कर्ण गर्व से ऐसा बोल सकता है, तब हमारे श्रेष्ठतम राम क्यों नहीं कह सकते-

ईश्वर कह-कह के रे पंडों। मुझे मंदिर में न बंद करो।

ले-ले मेरा नाम वंशजों। रावण-सा ना काम करो।।

युगों-युगों तक प्रेरणा देते रहने हेतु ही जीने वाला यदि मैं सचमुच सच्चा राम रहा हँू तो मुझे ईश्वर कहलाने की झूठी बैसाखी लेकर पूजित होने की जरुरत नहीं है। मैं सदा मनुष्य ही रहा, मुझे नहीं चाहिये पापी-पाखंडियों-सा ईश्वर होने का अवैध-मुखौटा।

 

 

सम्भूत्या अमृतम् अश्नुते: – आचार्य उदयवीर शास्त्री

विद्या-अविद्या और सम्भूति-असम्भूति पदों के माध्यम से यजुर्वेद के ४०वें अध्याय एवं तदनुरूप ईशावास्य उपनिषद् में आध्यात्मिकता का विशद विवेचन हुआ है। १२, १३ मन्त्रों में सम्भूति-असम्भूति अथवा सम्भव-असम्भव पदों का प्रयोग हुआ है, परन्तु १४ मन्त्र में ‘असम्भूति’ पद का प्रयोग न कर, उसके स्थान पर ‘विनाश’ पद का प्रयोग हुआ है। ‘सम्भूति’ का अर्थ है, उत्पन्न हुआ पदार्थ। इसके विपरीत ‘असम्भूति’ का अर्थ है- न उत्पन्न हुआ पदार्थ। अर्थात् समस्त भौतिक-अभौतिक जगत् का मूल उपादान कारण तत्त्व, जो कभी उत्पन्न नहीं होता, न उसका सर्वथा विनाश होता है। पर वह महत्-अहंकार आदि रूप से यथाक्रम परिणत होता रहता है। इस प्रकार उसका यह परिणाम-प्रवाह अनादि अनन्त है।

उसी ‘असम्भूति’ शब्द को मन्त्र १४ में ‘विनाश’ पद से कहा। विनाश पद का अर्थ है-

वि-विविधानिवस्तूनि अनेकानेक जगदू्रपाणि,

नश्यन्ति-अदर्शनतां यान्ति यस्मिन् स विनाश: प्रधानमित्यर्थ:।

मूल उपादान तत्त्व के लिये अधिक व्यवहृत दो पद हैं- प्रकृति और प्रधान। सर्ग अर्थात् रचना की भावना को अभिव्यक्त करने की दिशा में विशेष रूप से ‘प्रकृति’ पद का प्रयोग होता है। रचना से भिन्न प्रलय भावना अभिव्यक्त करने में ‘प्रधान’ पद का। प्रस्तुत मन्त्र में इसी भावना से प्रधान पर्याय ‘विनाश’ पद का प्रयोग हुआ है।

प्रकृति से परिणत-महत् से लगाकर समस्त प्राकृतिक जगत् सम्भूति है। इसकी चरम परिणति ‘मानवदेह’ है। मानव-देह का यह विशेष उत्तर है, इसे शेष समग्र सम्भूति समुदाय में से छांट कर अलग कर लिया गया है।

जब हम यह कहते हैं कि वे घोर अन्धकार में पड़ते हैं, जो प्रकृति की उपासना करते हैं तथा वे और भी अधिक घोर अन्धकार में पड़ते हैं, जो ‘सम्भूति’ में रमण करते हैं। यहाँ ‘सम्भूति’ पद अपनी विशेषता को लेकर मुख्य रूप में ‘मानवदेह’ के लिये प्रयुक्त हुआ है। यहाँ यह ध्यान देने की बात है कि असम्भूति के साथ ‘उपासते’ क्रियापद दिया है। यहाँ मानव-देह के अतिरिक्त शेष समग्र सम्भूति भी उपास्य रूप में असम्भूति के अन्तर्गत है। इनकी उपासना से मृत्यु अर्थात् संसार में होने वाले शीत-ताप, भूख-प्यास, आघात-विघात, यातायात आदि दु:खों से पार पाया जा सकता है। यह भी भूलना नहीं चाहिये कि असम्भूति की उपासना भी मानव-देह के माध्यम से ही सम्भव है। इसलिये जो सम्भूति में रमण करते हैं, अर्थात् मानव-देह के साज-शृंगार मात्र में लगे रहते हैं, ‘ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्’ के उसूलों पर ही अमल करते हैं, मानव-देह का सदुपयोग नहीं करते, वे और अधिक घोर अन्धकार में पड़ेंगे ही, क्योंकि न वे मानव-देह से असम्भूति की उपासना करते हैं, न मानव-देह माध्यम से अध्यात्ममार्गीय अनुष्ठानों का आचरण करते हैं। इसलिये अधिभूत एवं अध्यात्म दोनों प्रकार के लाभों से वञ्चित रह जाते हैं। यही स्थिति उनके घोरतर-घोरतम अन्धकार में पड़े रहने की है। फलत: प्रस्तुत प्रसंग में- प्रकृति परिणत पदार्थों के सम्भूति पद से ग्राह्य होने पर भी प्रकृति की चरम-परिणति ‘मानव-देह’ ही सम्भूति-पद वाच्य समझना चाहिये। इसी तथ्य को लक्ष्य कर कहा है- सम्भूत्या अमृतमश्नुते। सम्भूति से अर्थात् मानवदेह रूप माध्यम से अध्यात्म ज्ञान प्राप्त कर योगाङ्गानुष्ठान द्वारा आत्म-साक्षात्कार से अमृत-मोक्ष की प्राप्ति होती है। प्रस्तुत प्रसंग में विद्या-अविद्या आदि यह पारिभाषिक जैसे हैं। व्याख्याकारों ने विद्या का अर्थ ज्ञान-काण्ड और अविद्या का अर्थ यज्ञ-याग आदि कर्मकाण्ड किया है। वस्तुत: विद्या पद अध्यात्म विषयक जानकारी को कहता है। तात्पर्य है- आत्म-तत्त्व का साक्षात्कार, यही अमृत प्राप्ति का एकमात्र साधन है और वह मानवदेह (सम्भूति) रूप साधन द्वारा ही प्राप्त होता है, उससे अतिरिक्त अन्य कोई माध्यम या साधन उसका सम्भव नहीं। इस प्रकार विद्या या सम्भूति इनको मिलाकर ही अर्थ करने से उक्त मन्त्रों का प्रतिपाद्य पूरा होता है।

अविद्या का अर्थ है, विद्या से विपरीत। विद्या यदि अध्यात्म ज्ञान है, जो अधिभूत ज्ञान अविद्या है। प्रकृति और प्रकृति से परिणत पदार्थों का अन्तिम स्तर तक प्राप्त ज्ञान, जिसे आधिभौतिक विज्ञान कहा जाता है और जो आज प्राय: अपने चरम उत्कर्ष पर है, सब अविद्या की कोटि में आता है।

मन्त्रों में बताया ‘अविद्यया मृत्युं तीत्त्र्वा’ ‘विनाशेन मृत्युं तीत्त्र्वा’ अविद्या से मृत्यु को पार करके तथा विनाश से मृत्यु को पार करके। तात्पर्य हुआ- अविद्या अथवा विनाश से मृत्यु को पार किया जा सकता है अर्थात् मृत्यु से पार पाने का साधन अविद्या अथवा विनाश है। गत पंक्तियों में स्पष्ट किया गया है कि प्रस्तुत प्रसंग में विनाश पद का प्रयोग समस्त जगत् में मूल उपादान कारण त्रिगुणात्मक प्रधान के लिये है। प्रकृति और प्रकृति से परिणत पदार्थों की यथावत् जानकारी और उसके अनुसार उनका यथावत् उपयोग करना ही भौतिक विज्ञान है। इसी को यहाँ ‘अविद्या’ पद से कहा है। अविद्या या विनाश से मृत्यु को पार कैसे किया जा सकता है? इसे समझने के लिये यह जान लेना आवश्यक होगा कि प्रस्तुत प्रसंग में ‘मृत्यु’ पद का तात्पर्य क्या है? इसका लोक प्रसिद्ध अर्थ है- आत्मा का देह से वियोग हो जाना। उस अवस्था में आत्मा कोई कार्य कर नहीं पाता। उसे किसी भी प्रकार का कार्य करने के लिये देह धारण करना आवश्यक है। परन्तु मानव जीवन देह धारण किये हुए भी कभी ऐसी स्थितियाँ उसके सामने आ जाती हैं कि उनसे बाधित होनकर मानव का जीवन जीवन नहीं रह जाता, वह मरण प्राय: हो जाता है, कुछ भी करने के लिये अपने आपको असमर्थ पाता है, वे स्थितियाँ कौन-सी हैं? संसार का अनुभव बताता है, वे स्थितियाँ हैं-ताप त्रय। ताप त्रय से त्रस्त मानव जीवन के रस को खो बैठता है। सभी दार्शनिक आचार्यों ने ताप त्रय को विस्तार से स्पष्ट करने और उनसे बचने के उपायों को जानने के लिये मानव को प्रेरित किया है। वे ताप त्रय क्या हैं? संक्षेप में पढिय़े-

‘ताप’ का अर्थ- दु:ख, तपाने वाले या दु:खाने वाले जितने प्रसंग संसार में आते है, आचार्यों ने उन सबका समावेश तीन वर्गों में कर दिया है १. आध्यात्मिक, २. आधिभौतिक, ३. आधिदैविक।

१. आध्यात्मिक ताप- दो प्रकार का है- १. दैहिक, २. मानस

पहला है देह में वात, पित्त, कफ आदि के विकार तथा अन्य विविध कारणों से देह में रोग व्याधियों का उत्पन्न होना। दूसरा है- काम, क्रोध, राग, द्वेष, मोह आदि मानसिक विकारों से जनित दु:ख। इनको दूर करने के उपाय हैं- आयुर्वेदादि पद्धति से चिकित्सा, संयत जीवन, नियमित एवं व्यवस्थित आहार-विहार, व्यवस्थित दिनचर्या, ऋतु अनुसार अपेक्षित व्यायाम आदि। उन सब उपायों की जानकारी अविद्या क्षेत्र के अन्तर्गत आती है। अविद्या का अर्थ अज्ञान नहीं है।

२. आधिभौतिक ताप- वे हैं, जो अन्य प्राणियों द्वारा प्राप्त होते हैं। सांप, बिच्छू, ततैया, मक्खी, मच्छर आदि से होने वाले दु:ख इसी के अन्तर्गत हैं। बैल ने सींग मार दिया, गाय ने लात मार दी, घोड़े के खुर से पैर दब गया, आदि दु:ख भी इसी में आते हैं। किसी ने थप्पड़ मारा, गाली दी, लाठी मारी, छुरा घोंपा, गोली चलाई आदि से होने वाले ताप भी इसी बीच हैं। छोटे-बड़े राष्ट्रों में युद्ध होते हैं, जिनसे अनेक प्रकार के दु:ख राष्ट्र के सामने आते हैं, उन सबका समावेश इसी वर्ग में है। इन सभी मार्गों से प्राप्त दु:खों के निराकरण व प्रतिरोध करने के उपाय आधिभौतिक विषयक जानकारी प्रस्तुत करती है, इस प्रकार के किसी भी स्तर का कोई ऐसा दु:ख नहीं है, जिसको दूर करने का उपाय भौतिक जानकारी ने न सुझाया हो।

३. आधिदैविक ताप- वे हैं, जो आकस्मिक या नियमित दैवीय घटनाओं से प्राप्त होते हैं। सब जानते हैं, जेठ की दु:खभरी गर्मी बढ़ जाने तथा पूस-माह में ठण्ड बढ़ जाने से वे दिन दु:खद होते हैं। अचानक नदी में बाढ़ आ जाने, भूकम्प होने, सार्वत्रिक रोग आदि फैल जाने से तथा तटवर्ती समुद्रों में तूफान आ जाने एवं विद्युत्पात आदि से जो दु:ख होते हैं, वे सब इसी वर्ग के अन्तर्गत हैं।

दैवीं घटनाओं पर मानव बहुत सीमित नियन्त्रण कर पाया है, फिर भी यथामति यथाशक्ति उपाय किये जाते हैं। नदियों पर बड़े-बड़े बांधों का बनाया जाना उसी का एक अंग है। इससे वर्षा का अतिरिक्त जल एक जगह दृढ़ता के साथ संगृहीत कर लिया जाता है, इससे बाढ़ आने का अन्देशा कम हो जाता है तथा उस एकत्रित जल का विद्युत्-उत्पादन, कृषि-भूमि सिंचन आदि अनेक रूपों में सदुपयोग किया जाता है।

भूकम्प, तू$फान आदि के विषय में अग्रिम सूचना प्राप्त कर लेना भी उनसे आंशिक बचाव का उपाय है। यह सब भौतिक विज्ञान का फल है। इस विवरण से हमने यह समझा कि मन्त्रों में ‘मृत्यु’ पद का प्रयोग उन सांसारिक दु:खों के लिये हुआ है, जो शास्त्रीय परिभाषा में ‘ताप त्रय’ के नाम से जाने जाते हैं। इनसे पार पाने का साधन प्राकृत तत्त्वों का यथार्थ ज्ञान और उसका सदुपयोग है, जो आज भौतिक-विज्ञान के नाम से सर्वविदित है। मन्त्रों में इसी को विनाश एवं अविद्या पदों से कहा है। इस प्रकार मानवदेह रूप अनिवार्य माध्यम के द्वारा सांसारिक दु:खों को पार करता हुआ व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार कर अमृत को प्राप्त कर लेता है। मानव देह की अनिवार्यता के कारण ही सबसे अन्त में ‘सम्भूत्या अमृतमश्नुते’ कहा गया है।

अमृत-प्राप्ति की यह प्रक्रिया या पद्धति बताई गई। अब प्रलयकाल का अवसान होने को है, सर्ग सद्य प्रारम्भ होने को है, उस अवसर पर आत्मा मानवदेह प्राप्ति की भावना को लक्ष्य कर चेतन प्रकाश स्वरूप प्रभु से प्रार्थना करता है-

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।

तत् त्वं पूषन्नपावृणु, सत्यधर्माय दृष्टये।।

हिरण्मय-ज्योतिर्मय-तेजोमय पात्र से सत्य का, प्रवाहरूप में सदा रहने वाले सद्रूप जगत् का मुख प्रारम्भ अपिहितम्- आच्छादित है, ढका हुआ है। तात्पर्य है, समस्त विश्व चाहे यह कारण रूप है अथवा कार्य रूप में, वह सदा सर्वान्तर्यामी, सर्वव्यापक परमात्मा का जहाँ तक अस्तित्व है, उसी में सीमित रहता है। परमात्मा से छूटा कोई स्थान नहीं है, इसलिये उसके बाहर……. विश्व के या विश्व के किसी अंश के होने का प्रश्न ही नहीं उठता। वेद में अन्यत्र (पुरुषसूक्त) कहा, यदि परमात्मा के सर्वव्यापकत्व को चार भागों में विभक्त करने की कल्पना की जाय, तो समस्त विश्व अनन्तानन्त लोक-लोकान्तर उसके एक भाग में ही सीमित रह जाते हैं। इस प्रकार चेतन परमात्मा द्वारा सम्पूर्ण जगत् ढका हुआ है, अपने अन्दर समेटा हुआ है। इस पर भी विश्व अपने रूप में सदा सत्य है।

इसी भाव को प्रस्तुत उपनिषद् के प्रारम्भ में लिखे सन्दर्भ ‘पूर्णमद: पूर्णमिदं’ द्वारा अभिव्यक्त किया गया है। अदस्- वह परोक्ष परमात्म-चेतन पूर्ण है। इदम्- यह प्रत्यक्ष दृश्यमान् जगत् पूर्ण है। अपने-अपने अस्तित्व में दोनों पूर्ण है। जिसका जो कार्य है, उसके लिये किसी को एक-दूसरे से उधार नहीं लेना पड़ता, न अदस् कभी इदम् होता है और न आंशिक मात्र भी इदम् कभी अदस्। ये दोनों अपनी जगह अपने अस्तित्व में पूर्ण हैं, क्योंकि इदम् सर्वव्यापक अदस् में सीमित होते हुए भी पृथक् है, इसलिये अदस् पूर्ण में से इदम् पूर्ण का उदञ्चन कर लिया जाता है- ‘पूर्णात् पूर्णमुदच्यते’ इदम् पूर्ण परिणत कर लिया जाता है, अदस् अपरिणत रह जाता है। सन्दर्भ के उत्तराद्र्ध से इसी भाव को अभिव्यक्त किया- ‘पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।’

फलत: जगत् का मूल उपादान तत्त्व त्रिगुणात्मक प्रधान प्रलय काल में परमात्मा की गोद में सोता रहा। अब प्रलय का अवसान है। अब प्रभु की प्रेरणा से प्रकृति का मुख खुल जाता है। त्रिगुण सन्दर्भों में क्षोभ होगा, अन्योन्य मिथुन होकर सर्ग प्रारम्भ हो जायेगा। प्राणि सर्ग में मानवदेह प्राप्त कर आत्मा अपने अपरिहार्य उपादेय की प्राप्ति के लिये प्रयत्नशील हो उठेगा। इस भावना से प्रभु के प्रति प्रार्थना करता है-

तत् त्वं पूषन्नपावृणु, सत्यधर्माय दृष्टये।

जिस व्यवहार्य सत्य जगत् को तुमने अभी तक ढका हुआ है, हे पूषन्! सबका पोषण करने वाले प्रभु! अब उसे ‘अपावृणु’- खोल दो। प्रश्न होता है, क्यों खोल दिया जाय? उसे खुलवा कर क्या करोगे? उत्तर आया- ‘सत्य धर्माय दृष्टये’ सत्य धर्म की जानकारी के लिये, क्योंकि सर्ग रचना के अनन्तर मानव देह प्राप्त होने पर ही सत्यधर्म-अध्यात्म-अधिभूत धर्मों की जानकारी सम्भव है, उसी के आधार पर परम पद प्राप्त हो सकता है।

सर्ग के अनन्तर आत्मा को मानव देह प्राप्त हो गया। शास्त्रीय पद्धति के अनुसार योगाङ्गों के अनुष्ठान एवं औपनिषद् उपासनाओं द्वारा आत्मा ने अपने चैतन्य रूप का साक्षात्कार कर लिया है। उसके फलस्वरूप वह प्रभु के कल्याणतम् आनन्दस्वरूप का अनुभव कर रहा है। तब प्रभु से प्रार्थना करता है-

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह।

पूषन्! सबका पोषण करने वाले जगदुत्पादक परमात्मन्!

एकर्षे! एक मात्र सर्वज्ञ वेदोत्पादक प्रभो!

यम! समस्त विश्व का नियन्त्रण करने वाले, अखिल लोक-लोकान्तरों के नियामक, व्यवस्थापक! सर्वान्तर्यामिन्! सर्वशक्तिमान् प्रभो!

सूर्य- सर्वत्र प्रसृत! सर्वव्यापक! अपरिणामिन्! परमात्मन्! इस पद का यहाँ वही अर्थ अपेक्षित है, जो प्रस्तुत उपनिषद् की चौथी कण्डिका (अनेजदेक) में विवृत किया गया है।

प्राजापत्य! सब प्रजाओं-जड़ चेतन के पालक एवं स्वामिन्! अब

व्यूह- मूल स्रोत से जो अनेकानेक विविध धाराओं में संसार प्रवाहित किया था, उसे सीमित कर लो,

रश्मीन् समूह- जैसे सूर्य दिन का कार्य सम्पन्न हो जाने पर रश्मियों को समेट लेता है, ऐसे ही हे प्रभो! मूल स्रोत से प्रवाहित इन सब सहस्र-सहस्र विविध जगती धाराओं को मेरी ओर से समेट लो, अब इन धाराओं की मुझे अपेक्षा नहीं है। मेरे लिये जो प्राप्तव्य था, वह प्राप्त कर लिया है।

प्रश्न उभरा, अभी दुहाई दे रहा था, इस हिरण्मय पात्र से ढके सत्य के मुँह को खोलो, जब वह सत्य व्यवहार्य जगत् प्रसृत कर दिया,  तब इसे समेटने के लिये हल्ला मचा रहा है, जो प्राप्तव्य था, वह तूने इसमें क्या पा लिया? उत्तर आया- यत्ते कल्याणतमं रूपं तत्ते पश्यामि

जो तुम्हारा सर्वोच्च कल्याणमय रूप है, उस तुम्हारे कल्याणमय रूप को साक्षात् देख रहा हूँ। यही तो मानव जीवन का प्राप्तव्य अन्तिम लक्ष्य है। उसे प्राप्त कर लिया है। तब उस अवस्था का अबाधित अनुभव बताया-

योऽसावसौ पुरुष: सोऽहमस्मि

जो वह दूर-अति दूर प्रकृति सम्पर्क से अभिभूत मेरे लिये सर्वथा अन्तर्हित पुरुष था, यह अब साक्षात् दीख रहा है। उसके आनन्द स्वरूप का अनुभव कर रहा हूँ, तब वैसा ही तो मैं हूँ। जीवात्मा-परमात्मा के चैतन्यरूप में कोई अन्तर नहीं होता। अन्तर चैतन्य का नहीं है, वह इस प्रकार का है- परमात्मा सर्वत्र है, जीवात्मा अल्पज्ञ है ‘ज्ञ’ दोनों हैं, अथवा ‘ज्ञता’ दोनों में समान है, केवल विषयस्तर वा ग्राह्य स्तर का भेद है। अभी तक प्राकृत धाराओं में प्रवाहित आत्मा इन्द्रिय-ग्राह्य विषयों में आप्लावित रहा। अब उपयुक्त उपायों के अनुष्ठान से अपने शुद्ध चैतन्यरूप का साक्षात्कार कर लिया है, प्रकृति का गहरा परदा बीच से हट गया है। इसी दशा में प्रभु का- आनन्दरूप प्रभु का- साक्षात् दर्शन हो रहा है। तब आत्मद्रष्टा जीवन्मुक्त अपना अनुभव बताता है, वह मैं हूँ, अर्थात् जो वह है, वैसा ही मैं हूँ। अत्यन्त सादृश्य तादात्म्य का प्रयोग सर्वशास्त्र सम्मत है। इससे जीवात्मा-परमात्मा की एकता या अभिन्नता करना पूर्णत: अशास्त्रीय होगा।

इस प्रकार जहाँ कहीं जीवात्मा-परमात्मा की एकता या अभिन्नता का उल्लेख आपातत: दृष्टिगोचर होता है, वहाँ सर्वत्र उसे औपचारिक ही समझना चाहिये। ऐसे प्रयोग- मुख को चन्द्र कहने के समान- सर्वत्र भेदमूलक ही सम्भव हैं। अन्यथा-

निरीक्ष्य विद्युन्नयनै: पयोदो मुखं निशायामभिसारिकाया:।

धारानिपातै: सह किन्नु वान्तश्चन्द्रोऽयमित्यात्र्ततरं ररास:।।

क्या यहाँ अद्वैतवादी सचमुच चन्द्र को मेघ की जलधाराओं के साथ भूमि पर गिरा समझेगा? वस्तुत: यहाँ मुख और चन्द्र के अति सादृश्य का ही द्योतन् है। जलधाराओं के साथ चन्द्र कभी भूमि पर नहीं आ सकता। दोनों का भेद स्पष्ट है। चन्द्र अपनी जगह है, मुख अपनी जगह। इसी प्रकार जीवात्मा परमात्मा का परस्पर स्पष्ट भेद होने पर भी ‘योऽसावसौ पुरुष: सोऽहमस्मि’ सन्दर्भ द्वारा मोक्षदशा में दोनों के तादात्म्य का अतिदेश उनके अति सादृश्य को ही अभिव्यक्त करता है। फलत: जीवात्मा परमात्मा के अभेद वर्णनों में सर्वत्र यही व्यवस्था समझनी चाहिये। विषय का उपसंहार करता है-

‘वायुरनिलममृतम्-अथेदं भस्मान्तं शरीरम्।’

प्राण वायु से उपलक्षित, ‘अनिलम्’ निर्दोष, निर्विकार, अपरिणामी, आत्मतत्त्व ‘अमृतम्’ अमृत है, अमरणधर्मा है और यह शरीर भस्म हो जाने तक है। तात्पर्य है, इस नश्वर शरीर में चेतनतत्त्व अपरिणामी है, जब तक शरीर में वह तत्त्व बैठा है, शरीर संचालित रहता है। आत्मा का वियोग हो जाने पर शरीर भस्म कर दिया जाता है। आत्मा अपने कर्मों के अनुसार अगली योनियों को प्राप्त होता है। इसी को मन्त्र के अन्तिम भाग से कहा-

क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर।

मानव देह को प्राप्त कर आत्मा प्रकृति सम्पर्क में डूबा हुआ इस यथार्थ को बार-बार भूल जाता है कि इस देह को सावधानतापूर्वक सदुपयोग करना अभीष्ट है। मन्त्र एकाधिक बार कहकर इसी तथ्य को समझा रहा है, हे क्रतो! कत्र्तव्यनिष्ठ आत्मन्! ‘कृतं स्मर’ अपने किये का स्मरण कर। कर्मों के अनुष्ठान में तूने मानव देह का सदुपयोग किया? यही देह अमृत प्राप्ति का माध्यम है। जिसने इसे समझा, उसने पाया, जिसने न समझा, उसने खोया।

ऋषि दयानन्द की कल्पना के यज्ञ – होतर्यज- स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती

भारतीय स्वातन्त्र्य के अनन्तर का आर्यसमाज कई दृष्टियों से १९४९ से पूर्व के आर्यसमाज से आगे भी है और कई दृष्टियों से यह ऋषि दयानन्द के स्वप्नों से पीछे हटता जा रहा है।

यह आवश्यक है कि इसमें से कतिपय बुद्धिजीवी व्यक्ति प्रति तीसरे या पाँचवें वर्ष स्वयं अपनी स्थिति का सिंहावलोकन कर लिया करें। अपने सामाजिक और व्यक्तिगत निर्देशन के लिए एक ‘ब्ल्यू-प्रिन्ट’ तैयार कर लिया करें।

आर्यसमाज जीवित और उदात्त संस्था है- अनेक राजनीतिक दल पनपते रहेंगे, मरते रहेंगे, अपना कलेवर बदलते रहेंगे। अनेक बाबा-गुरु-अवतार-भगवान्-माताएँ आती रहेंगी, जाती रहेंगी, पर जो जितना ही स्वामी दयानन्द के दृष्टिकोण के निकट रहेगा, उतना ही आर्यसमाज का महत्त्व बढ़ता जावेगा। हिन्दुओं के अनेक रूप हमारे सामने आर्यमाज का विरोध करने के लिए आये, पर वे चले नहीं, बदलते गये, क्योंकि ये मूत्र्तिपूजा, अवतारवाद, रूढिय़ों, अन्धविश्वासों, वर्गभेदों, देशभेदों, जातिभेदों आदि पर निर्भर थे। आर्यसमाज के कार्यकत्र्ताओं को समझना चाहिए कि वे धरती के पुत्र हैं, सब नदी-नदियाँ उनके लिए एक-सी पवित्र हैं। उनको ईश्वर, ईश्वर के स्वरूप, ईश्वरीय-ज्ञान, ईश्वरीय-व्यवस्था और मानव-मात्र की श्रेष्ठता और समवेत कर्मठता में आस्था है- वे सत्य और ऋत के उपासक हैं। इस स्वरूप का आर्यसमाज सदा जीवित रहेगा। आगे की मानवता न पैगम्बरों पर एक होने वाली है, न धर्म और न सम्प्रदायों पर, न मन्दिरों-मस्जिदों या गिरजों पर, वेद-वेदांगों पर ही एक होगी, भौतिक विज्ञान, रसायन शास्त्र, विकासवान् ज्ञान-विज्ञान के विविध शास्त्र (वेदांग-उपांग) समस्त मानव के एक होंगे। (भारतीय ज्योतिष, चीन देश की केमिस्ट्री, भारतीय रसायन, यूनान की ज्यामिति, इस प्रकार के भौगोलिक शब्द मिट जायेंगे)।

वेद-वेदांग के ऋषि एक होंगे, चाहे आइन्स्टाइन हो, मैक्स प्लांक हो, प्रो. रमन् या रामानुजन् हों, चाहे मैडम क्यूरी हों- इन ऋषियों के नाम पर सबको गर्व होगा। ये ऋषि जो भी मार्ग-निर्देशन करेंगे, उनके संकेतों पर यज्ञों का निर्माण होगा।

यज्ञेन कल्पन्ताम्। (यजु. अध्याय १८), यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवा:। (यजु. ३१/१६), यज्ञो यज्ञेन कल्पताम्। (१८/२९)- इन वाक्यों के नूतनतम अर्थ हमें धीरे-धीरे समझ में आवेंगे। मैं अभी करनाल (हरियाणा) में अपनी दाहिनी आँख नई करवा के आया हूँ, डॉ. जे.के. पसरीचा की यज्ञस्थली में मानो ‘चक्षुर्यज्ञेन कल्पताम्’ (यजु. १८/२९) का यज्ञ कराया हो। कुछ मास पूर्व मैंने बम्बई के हिन्दूजा-अस्पताल में प्रोस्टेट-ऑपरेशन द्वारा अपने जीवन की नई आयु प्राप्त की थी (आयुर्यज्ञेन कल्पताम्)। ऋषि दयानन्द की दृष्टि में यह सब यज्ञ है। इन यज्ञों में भाग लेने वाले ही ऋत्विक्, होता, अध्वर्यु हैं। इसी प्रकार के होताओं को दृष्टि में रखकर यजुर्वेद, अध्याय २१ के ४८-५८ मन्त्रों में बार-बार ‘दधुरिन्द्रियं वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज’ और इससे पूर्व ‘पय: सोम: परिस्रुता घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज’ (मन्त्र २९-४७), यजुर्वेद संहिता में पठित है।

स्वामी दयानन्द की कल्पना के यज्ञ क्या है, यह समझना हो तो यजुर्वेद अध्याय २१ के मन्त्रों के भावार्थ देखिये। ये यज्ञ काष्ठाग्नि में घृत और हव्य डालना नहीं हैं।

मन्त्र २९- येऽस्य संसारस्य मध्ये साधनोपसाधनै: पृथिव्यादिविद्यां जानन्ति, ते सर्व उत्तमान् पदार्थान् प्राप्नुवन्ति।।

मन्त्र ३०- ये संगन्तारो विद्यासुशिक्षासहितां वाचं प्राप्य पथ्याहारविहारैर्वीर्यं वद्र्धयित्वा पदार्थविज्ञानं प्राप्यैश्वर्यं वर्धयन्ति ते जगद्भूषका भवन्ति।।

मन्त्र ३१- ये निर्लज्जान् दण्डयन्ति प्रशंसनीयान् स्तुवन्ति जलेन सहौषधं सेवन्ते ते बलाऽऽरोग्ये प्राप्यैश्वर्यवन्तो जायन्ते।।

मन्त्र ३२- मनुष्या ब्रह्मचर्येण शरीरात्मबलं विद्वत्सेवया विद्यापुरुषार्थेनैश्वर्यं प्राप्य पथ्यौषधसेवनाभ्यां रोगान्हत्वारोग्यमाप्नुयु:।।

मन्त्र ३३- यदि मनुष्या विद्यासंगतिभ्यां सर्वेभ्य: पदार्थेभ्य उपकारान् गृöीयुस्तर्हि वाय्वग्निवत्सर्वविद्यासुखानि व्याप्नुयु:।।

मन्त्र ३४- ये मनुष्या: सर्वदिग्द्वाराणि सर्वर्तुसुखकराणि गृहाणि निर्मिमीरंस्ते पूर्णसुखं प्राप्नुयु:। नैतेषामाभ्युदयिकसुखन्यूनता कदाचिज्जायेत।।

मन्त्र ३५- हे मनुष्या:! यथाहर्निशं सूर्याचन्द्रमसौ सर्वं प्रकाशयतो रूप-यौवनसम्पन्ना: पत्न्य: पतिं परिचरन्ति च यथा वा पाकविद्याविद्विद्वान् पाककर्मोपदिशति तथा सर्वप्रकाशं सर्वपरिचरणं च कुरुत भोजनपदार्थांश्चोत्तमतया निर्मिमीध्वम्।।

मन्त्र ३६- हे विद्वांसो यथा सद्वैद्या: स्त्रिय: कार्याणि साधयितुमहर्निशं प्रयतन्ते यथा वा वैद्या रोगान्निवाय्र्यं शरीरबलं वर्धयन्ति तथा वत्र्तित्वा सर्वैरानन्दितव्यम्।।

इसी प्रकार की प्रेरणायें और उद्बोधन अन्य मन्त्रों में भी हैं (होतर्यज)- मनुष्यै: पुरुषार्थेन लक्ष्मी: प्राप्तव्या (३८), विद्यया वह्निशान्त्या विद्वांसं पुरुषार्थेन प्रज्ञां न्यायेन राज्यं च प्राप्यैश्वर्यं वद्र्धयन्ति ते ऐहिकपारमार्थिके सुखे प्राप्नुवन्ति। (३९), ये…..विद्यां विज्ञाय गवादीन् पशून् संपाल्य सर्वोपकारं कुर्वन्ति ते वैद्यवत्प्रजादु:खध्वंसका जायन्ते। (४०), ये कृषिकरणाद्यायैतान्वृषभान्युञ्जन्ति ते धनधान्ययुक्ता जायन्ते।। (४१)

ऋषि दयानन्द की कल्पना उदात्त समाज के निर्माण की थी, जिसमें सभी शास्त्रों की विद्यायें विकसित हों, सभी विषयों के ज्ञाता हों और सभी प्रकार के सर्वोपयोगी संस्थान हों। उनकी दृष्टि में यजुर्वेद का २१वाँ अध्याय इन्हीं प्रेरणाओं का स्रोत है। आज आर्यसमाज के यज्ञ और हमारे याज्ञिक आर्यसमाज को भटका रहे हैं और हमारे पुरोहित और विद्वान् हमें फिर उस ओर ढकेलने में कटिबद्ध हैं, जिस ओर से ऋषि हमें बचाना चाहते थे।

महर्षि ने वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज (२१/४८-५८) मन्त्रों के भावार्थों में भी उदात्त प्रेरणायें दी हैं-

मन्त्र ४८- यथा विदुषी ब्रह्मचारिणी कुमारी स्वार्थं हृद्यं पतिं प्राप्यानन्दति तथा विद्यासृष्टिपदार्थबोधं प्राप्य भवद्भिरप्यानन्दितव्यम्।।

मन्त्र ५०- ये पुरुषार्थिनो मनुष्या: सूर्यचन्द्रसन्ध्यावन्नियमेन प्रयतन्ते सन्धिवेलायां शयनाऽऽलस्यादिकं विहायेश्वरस्य ध्यानं कुर्वन्ति ते पुष्कलां श्रियं प्राप्नुवन्ति।।

मन्त्र ५३- यथा विद्वत्सु विद्वांसौ सद्वैद्यो सत्क्रियया सर्वानरोगीकृत्य श्रीमत: सम्पादयतो यथा वा विदुषां वाग्विद्यार्थिनां स्वान्ते प्रज्ञामुन्नयति तथाऽन्यैर्विद्याधने संचयनीये।।

मन्त्र ५८- ये मनुष्या ईश्वरनिर्मितानेतन्मन्त्रोक्तयज्ञादीन् पदार्थान् विद्ययोपयोगाय दधति ते स्विष्टानि सुखानि लभन्ते।।

यजुर्वेद के १८वें अध्याय में ‘यज्ञेन कल्पताम्’ पद मन्त्र १-१७ और २९ में बराबर प्रयुक्त हैं, जिनमें भी ऋषि दयानन्द ने यज्ञ के कर्मोदात्त और कर्म-प्रेरक अर्थ दिए हैं- कर्मकाण्डी अर्थ नहीं। स्वामी दयानन्द की कल्पना का आर्य परिवार रूढि़ अर्थों में याज्ञिक नहीं है, जैसा कि हमारे पुरोहितों, कर्मकाण्डियों और तथाकथित याज्ञिकों ने भटका रखा है। स्मरण रखना चाहिए कि वेदमन्त्रों से राष्ट्र शब्द संकलित करके उनसे काष्ठाग्नि में घृतादि की आहुतियाँ डलवा देना राष्ट्रभृत् यज्ञ नहीं है। जिन मन्त्रों में अक्षि या चक्षु शब्द प्रयोग हुए हों, उन्हें संकलित करके आहुतियाँ दिला देना नेत्र-यज्ञ या चक्षु-यज्ञ का उपहास मात्र होगा।

मैं अपने युवकों और बुद्धिजीवियों से आग्रह करूँगा कि यदि आप मेरी कही हुई बातों में कुछ तथ्य समझते हों, तो आपको आर्यसमाज के परिवारों में प्रचलित वर्तमान यज्ञों की कुप्रथा को रोकने के लिए कुछ सक्रिय कदम उठाने होंगे, नहीं तो कैन्सर की तरह बढ़ता हुआ यह कर्मकाण्ड हमें मध्यकालीन हिन्दुओं की तरह ही विकृत और पथभ्रष्ट कर देगा। आर्यसमाज में यज्ञ के रूप में फैला हुआ यह कैन्सर चालीस-पचास वर्ष ही पुराना है, अभी तो हम इसकी रोकथाम कर सकते हैं, अन्यथा आगे रोकना कठिन होगा।

मेरी आयु ८५ वर्ष है, आगे की बात ईश्वर जाने, इसीलिए कुछ तीखे उपाय बता रहा हूँ, हो सकता है कि मेरे मित्रों को और आर्यसमाज के वर्तमान कर्णधारों को शायद ये पसन्द न आवें। कुछ उपाय ये हैं-

१. विद्वान् युवकों को चाहिए कि वर्तमान यज्ञों के विरुद्ध उचित वातावरण तैयार करें (प्यार और स्नेह से)

२. जहाँ-कहीं भी ये कैंसर-यज्ञ हों, उनका सक्रिय विरोध करें।

३. स्वामी दयानन्द ने दो ग्रन्थ हमें व्यावहारिक महत्त्व के दिए हैं- पंचमहायज्ञविधि और संस्कारविधि। संस्कारविधि का सामान्य प्रकरण केवल १६ संस्कारों और नवशस्येष्टि-संवत्सरेष्टि एवं शालानिर्माण विधि के लिए है। कर्मकाण्ड एवं विनियोगों को यहीं तक सीमित रक्खें।

४. भारतवर्ष में कैंसर-यज्ञ चलने लगे हैं और इनकी छूत देश के बाहर भी फैलने लगी है। हमें चाहिए कि वह हवा देश के बाहर न जावे।

(मैं वेदपारायण यज्ञ और मृत्युञ्जय यज्ञों को कैन्सर-यज्ञ कहता हूँ।)

५. लोगों को बतावें कि जो हम विद्या-संस्थायें खोलते हैं (चाहे गुरुकुल शैली की या कॉलेज शैली की) ये संस्थायें ही हमारी यज्ञस्थली हैं, हमारे सभी चिकित्सालय, अनाथाश्रम, सेवागृह, फैक्टरियाँ, पशुधन-विस्तारशालायें- इन सबको आर्यसमाज यज्ञ मानता है। दीनदु:खियों की सहायता के लिए, दुर्भिक्ष-पीडि़तों और बाढ़ से सन्तप्त व्यक्तियों की सहायता के लिए जो भी कुछ हम करेंगे, वह सब यज्ञ है।

आर्यसमाज के प्रारम्भिक युग में लाला मुन्शीराम, लाला लाजपतराय, लाला हंसराज आदि मनीषियों ने ऐसा ही किया था। वे हमारे महान् याज्ञिक थे, कर्मयोगी थे। आज हम कर्मयोगी नहीं कर्मकाण्डी पैदा कर रहे हैं। मिशनरी नहीं, पुरोहित मण्डली तैयार कर रहे हैं।

युवकों से मेरा आग्रह है कि जहाँ-कहीं भी कर्मकाण्डियों द्वारा वेदपारायण यज्ञ होता देखें, मृत्युञ्जय-यज्ञ देखें, वर्षा के निमित्त यज्ञ करते-कराते देखें, उनके विरुद्ध सक्रिय विरोध और रोष प्रकट करें।

महर्षि दयानन्द का जन्म १८२४ ई. में हुआ था। उनकी द्वितीय जन्मशती २०२४ ई. में मनाई जायेगी। तब तक हमें अपने कैन्सर-यज्ञों को दूर कर देना चाहिए। अगली शती के लिए वर्तमान आर्यसमाज के सामने जीता-जागता गौरवमय कार्यक्रम होना चाहिए। केवल नारे, लंगर और जलूसों से काम न चलेगा।

मूर्तिपूजा अवैदिक होने पर भी हमारे देश से दूर क्यों नहीं हुई, क्योंकि यह पण्डितों, पुरोहितों, शंकराचार्यों और महन्तों की जीविका बन गई है। आर्यसमाज के कर्मकाण्डी यज्ञ भी जीविका के साधन बन गये, तो आप आगे इन्हें बन्द न कर सकेंगे।

पुनरोदय: – देवनारायण भारद्वाज ‘देवातिथि’

सुन्दर नर तन मन मधुवन को।

प्रभुवर! पुन: पुन: दो हम को।।

सुखकर दीर्घ आयु फिर पायें,

फिर प्राणों का ओज जगायें।

फिर से आत्मबोध अपनायें।

मंगल दृष्टिकोण के धन को।

प्रभुवर! पुन: पुन: दो हम को।।१।।

होवें सक्षम श्रोत्र हमारें,

तज कर जग को प्रेय पुकारें।

फिर से साधन श्रेय सुधारें।।

विज्ञान विमल के दर्पण को।

प्रभुवर! पुन: पुन: दो हम को।।२।।

दु:ख दुरित दूर उर करो मधुर,

हो हृदय अहिंसक सर्व सुखर।

हे जठर अनल हे वैश्वानर।।

कर्मठ ललाम नव परपन को।

प्रभुवर! पुन: पुन: दो हम को।।१।।

स्रोत- पुनर्मन: पुनरायुर्मऽआगन्पुन: प्राण:,

पुनरात्मामऽआगन्पुनश्चक्षु: पुन:

श्रोत्रंमऽआगन्। वैश्वानरोऽअदब्ध

स्तनूपाऽअग्निर्न: पातु दुरितादवद्यात्।।

– (यजु. ४.१५)

कयामत की रात : पं॰ श्री चमूपतिजी एम॰ ए॰

 

कयामत की रात

 

एकदम अल्लाह को क्या सूझा?—पिछले अध्याय में अल्लाताला के न्याय के रूपों को तो एक दृष्टि से देख ही लिया गया! क्या ठीक हिसाब किया जाता है। अब हम इस न्याय की कार्य पद्धति देखेंगे। इसके लिए कयामत के दिन पर एक गहरी दृष्टि डाल जाना आवश्यक है, क्योंकि न्याय का दिन वही है।

मुसलमानों की मान्यता है कि सृष्टि का प्रारम्भ है। सृष्टि एक दिन प्रारम्भ हुई थी। पहले अल्लाह के अतिरिक्त सर्वथा अभाव था। एक दिन ख़ुदा ने क्या किया कि अभाव का स्थान भाव ने ले लिया। किसी के दिल में विचार आ सकता है कि इससे पूर्व अल्लाह मियाँ क्या करते थे? उनके गुण क्या करते थे? जो काम पहले कभी न किया था वह अकस्मात सूझा कैसे? क्या यह अल्लामियाँ के जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन नहीं था कि पहले अकेले विद्यमान थे और अब अपनी सत्ता में किसी और को भी सम्मिलित कर लिया? एकत्व से उकता गए थे क्या? वृद्धावस्था कुछ मनोरंजन चाहती थी? कुछ हो संसार पैदा हो गया।

इसमें असमान तत्त्व भी रख दिए। क्योंकि उसके बिना संसार का कारोबार न चलता था। असमानता में क्या नियम कार्य करता था? प्रकटरूप से अल्लाह मियाँ की इच्छा के अतिरिक्त और कोई नियम बरता ही नहीं गया। यह भी हुआ। हज़रत ने आत्माएँ उत्पन्न कीं। उनको काम करने की सामर्थ ही नहीं प्रदान की। कार्य भी निश्चित कर दिए। किसी के भाग्य लेख में पवित्रता लिखी गई। किसी के भाग्य में पाप करना। पाप कर्म का साधन शैतान को निश्चित किया गया। दोज़ख़ भर देने का निर्णय ख़ुदाई न्यायालय से प्रारम्भ से ही कर दिया गया था, इसमें जाने वाले, जलने वाले सब निश्चित हैं।

परन्तु अब एक दिन आना है जब अल्लामियाँ न्याय की कुर्सी को शोभा प्रदान करेंगे और कर्मों का फल दिया जाएगा। हम परेशान हो रहे हैं कि कर्म किसके? बदला क्यों? परन्तु अल्लाह मियाँ की इच्छा है कि करे कराए तो आप ही परन्तु बदला हमें दे। दे दें। इसके लिए दरबार लगाना क्या आवश्यक है? भाग्य लेख तो हमारा प्रारम्भ से ही निश्चित है फिर इस दिन नूतन क्या होगा? यदि इस दरबार लगाने का नाम ही न्याय है तो हमारा विनम्र निवेदन है कि यह न्याय का स्वांग एक ही दिन क्यों किया जाता है? कहीं इससे अल्लामियाँ के न्याय के गुण में अस्थाई होने का दोष तो लागू नहीं होगा 1?

[1. डॉ॰ जेलानी पहले मुस्लिम विचारक हैं जो अल्लाह द्वारा प्रतिपल न्याय देना मानते हैं। देखिये उनकी पुस्तक ‘अल्लाह की आयत’।   —‘जिज्ञासु’]

कयामत से पूर्व इस गुण का कोई प्रयोग नहीं और इसके पश्चात् भी कोई प्रयोग की अवस्था नहीं होगी।

ख़ैर आइए! इस दरबार का दर्शन करें। इस दरबार की भूमिका रूप में अवस्थाएँ बयान की गई हैं—

व तरल जिबाला तहसबहा जामिदतुन वहिया तमरुमर्रा अस्सहाबे।

—(सूरते नमल आयत 88)

और देखेगा तू पहाड़ों को कि अनुभव करेगा तू उनको जमे हुए और वह चलेंगे बादलों की भाँति।

व इज़ा रुज्जतिल अरज़ो रज्जन, व बुस्सतिल जवालो बुस्सन।

—(सूरते वाकिया आयत 4-5)

जब हिलाई जाएगी भूमि भली प्रकार और टुकड़े हों पहाड़ टूटकर।

व इज़श्शमसो कुर्रिरत व इज़न्नजूमो उन्कदिरत व इजल जवालो सुय्यरत व इज़स्समाओ कुशितत।

—(सूरते तकवीर आयत 1-2-3,11)

जब सूरज को लपेटा जाएगा और तारे गदले हो जाएँगे और जब पहाड़ चलेंगे और जब आसमान की खाल उतारी जाएगी।

सूरज लपेट दिया गया तो प्रकाश न हो सकेगा रात हो जायेगी। इसी विचार से स्वामी दयानन्द कयामत का दिन नहीं ‘रात’ लिखते हैं। अन्तिम आयत पर जलालैन ने लिखा है—

जैसे बकरी का चमड़ा उतारा जाता है।

व इज़स्समाउन्कतरनो, व इज़लकवाकिबो उन्तरसरत व इज़ल बिहार फुज्जिरत व इज़ल कबूरो बुइसरत।

—(सूरते इनफ़ितार आयत 1-4)

जब आसमान फट जावे, जब तारे झड़ जाएँ जब दरिया चीरे जाएँ, जब कबरें उठाई जाएँ।

कबरों का अर्थ यहाँ भाष्यकारों ने कबरों में लेटे मुर्दे किया है। वे मुर्दे शरीरों के साथ उठेंगे या इसके बिना1 ?

[1. अब श्री फारूकी आदि ने ये अर्थ बदल दिये हैं।   —‘जिज्ञासु’]

उठना बिना शरीर के क्या होगा? इस्लाम के अनुयायियों का सिद्धान्त यही है कि शरीर के साथ उठेंगे। वह शरीर कहाँ से आएगा? शरीर तो जर्जरित हो चुका और वह कब्र में मिलजुल गया। अब कब्र का उठना या शरीर का उठना एक ही बात है। और जो कबरें इससे पूर्व नष्ट हो चुकेंगी वह? कुछ होगा। यह हुई कब्रों की बात। अब तारे। ऊपर तो तारों को गदला (बुझे हुए) ही किया था, यहाँ झाड़ दिया है और दरिया चीरने से न जाने, क्या आशय है?

वजउश्शमसे व लकमरे।

—(शूरते कयामत आयत 9)

और इकट्ठा किया जाएगा सूरज और चाँद।

इस पर तफ़सीरे हुसैनी में लिखा है—

यानी एशां रा बयक दीगर मज्तमअ साख्ता दर दरिया अफ़गन्द।

अर्थात् इन दोनों को इक्ट्ठा करके दरिया में डाल देंगे।

क्या उस चीरे हुए दरिया में? लीजिए अब तो प्रकाश का कोई साधन न रहा। सूरज का ही लपेटा जाना (इसके अर्थ कुछ भी हों) प्रकाश को समाप्त हो जाने के लिए पर्याप्त है, क्योंकि चाँद भी तो सूरज से ही प्रकाश पाता है। परन्तु यहाँ सूरज चाँद सितारे सब कुछ झड़ गया है। कोई लपेटा गया है, कोई दरिया में डाल दिया है। इसी कयामत के दिन को रात ही नहीं घुप अन्धेरी रात कहना चाहिए। यह सब निशानियाँ लिखते हुए हम एक बात भूल गए वह है नरसघे का फूँका जाना। वह पहली बार तो इन सारी अवस्थाओं के प्रकट होने से पहले बजेगा और एक बार कब्रों के उठने पर।

वनफ़ख़ा फ़िस्सूरे फ़इजाहुम मिनल अजदाते इलारब्वहुम यन्सिलून।

—(सूरते यासीन आयत 51)

और फूँका जाएगा नरसघा। फिर अचानक वह कबरों में से अपने परवरदिगार (परमात्मा) की ओर दौड़ेंगे।

इस आयत से तो यह स्पष्ट हो जाता है कि सारी कब्र न दौड़ेगी उसका एक भाग शरीर बनकर दौड़ेगा। परन्तु हम तो यह देख रहे हैं कि एक कब्र क्या कब्रिस्तान के कब्रिस्तान नष्ट होते जाते हैं। उनके स्थान पर शहर बस रहे हैं। यह और बात है कि पहले पहल कब्रों के खुदने से रोग फैलने की आशंका होती है। वैज्ञानिकों की सम्मति है कि मुर्दे गाड़ने की रस्म स्वास्थ्य के नियमों के विरुद्ध है। इसी बात को ध्यान में रखकर योरोप व अमरीका में मुर्दे जलाने का रिवाज बढ़ रहा है। मुर्दों के उठने की भी एक योजना बताई है—

वल्लाहल्लज़ी अरसलर्रीहा फ़तुशीरो सहाबन फ़सुकानहू इलाबलदिन मय्यतिन फ़अहयैनाबिहिल अरज़ा बादो मौतिहा कज़ालिकन्नशूर।

—(सूरते फ़ातिर आयत 8-9)

और अल्लाह वह है जिसने भेजा हवाओं को, फिर उठाया बादलों को, फिर हाँक लाते हैं उसको शहरों की ओर फिर जीवित किया हमने उससे ज़मीन को उसकी मृत्यु के पश्चात्। इस प्रकार मुर्दे उठाए जाएँगे।

मिश्कात किताब फ़तन बाब नफ़ख़ फ़िस्सूर में लिखा है—

काला व लैसा मिनल इन्साने शैउन लायबली इल्लल उज़मा वाहिदहू व हुवा अजबुज़्ज़नबो व मिनहू यरकिबुल ख़लका योमिल कयामते।

कहा और नहीं मनुष्य में कोई ऐसी वस्तु जो पुरानी न हो जाए। एक हड्डी के अतिरिक्त और वह रीढ़ की हड्डी के नीचे की हड्डी है और इससे संसार की रचना होती है कयामत के दिन।

कहा जाता है कि यह हड्डी कयामत के दिन गले सड़े बिना सुरक्षित रहेगी। यह बीज का काम देगी जिससे सारा शरीर नवीन बनाया जायेगा। यह काम चालीस दिन की वर्षा से होगा जो अल्लाहताला भेजेगा। जो भूमि को आठ बलिश्त तक ढाँप लेगी और उसके इस काम से शरीर पौधों की भाँति उग आएँगे।

यह कयामत का प्रारम्भ है इसकी अवधि दो सूरतों में वर्णन की है—

सूरते सजदा में कहा है—

फ़ीयोमिन काना मिकदारहू अलफ़ा सिनत्तिन मिम्मात अदून।

—(सूरते सजदा आयत 4)

एक दिन में जिसकी मात्रा हज़ार वर्ष है तुम्हारे गणित से।

तफ़सीरे जलालैन में इस आयत पर लिखा है—

आशय हज़ार वर्ष के दिन से कयामत का दिन है। परन्तु सूरते मआरिज़ में हम एक और अवधि पाते हैं—

तअरजुल मलाइकतो वर्रुहो इलैहे फ़ीयोमिन काना मिकदारहू रवमसीना अलफ़ा सनतिन…….योमा यरवरजूना मिनल अजदाते सिराअनकअन्नहुम इलानुसुबिन युविफ़्फ़ज़ून।

—(सूरते मआरिज आयत 4)

चढ़ते हैं फ़रिश्ते और रूहें तरफ़ उसके उस दिन में जिसकी अवधि है पचास हज़ार साल………जिस दिन निकलेंगे कब्रों से दौड़ते हुए जैसे किसी निशानी पर दौड़ते हैं।

इन दो संख्याओं के मतभेद का निवारण कैसे हो? पहली संख्या के साथ गुण की वृद्धि की है और वह संख्या तुम्हारी गिनती के अनुसार है सम्भव है जो अवधि मनुष्यों की गिनती में एक हज़ार वर्ष होती है वह किसी और सृष्टि की गिनती में पचास हज़ार साल हो जाती हो।

गुत्थी सुलझा ली गई—तफ़सीरे जलालैन में इस गाँठ को यह कहकर खोला है—

दूसरी सूरत में पचास हज़ार साल फ़रमाया है यह लम्बाई कयामत की काफ़िरों को अनुभव होगी।

इन पचास हज़ार वर्षों में होगा क्या? मूजिह कुरान तो पचास हज़ार पर कहता है, जब से मुर्दे निकलेंगे जब तक दोज़ख़ बहिश्त भर जाएँगे।

तफ़सीरे हुसैनी में इस स्थान पर लिखा है—

दर अरसा हाए कयामत पंजाह मौतन व मौकफ़ ख़्वाहद बूद, व ख़लायक रा दर हर मौकफ़े हज़ार साल वाज़ दारन्द, व बयाने मवाकिफ़ दर जवाहरुत्तफ़ासीर अस्त।

कयामत के मैदान में पचास पड़ाव व ठहराव होंगे। लोगों को हर ठहराव पर पचास हज़ार साल रोका जाएगा। इन ठहरावों का वर्णन जवाहरुत्तफ़ासीर में है।

अब जरा कयामत की कार्यवाही के विवरण का दर्शन करें। चालीस दिन की बरसात से पौधों की भाँति कब्रों से उत्पन्न हुए मुर्दा मनुष्य दौड़कर न्यायालय के स्थान पर पहुँच चुके हैं। प्रत्येक को उसके भाग्य का पर्चा मिलता है। इसीलिए सूरते बनी इसराईल में आया है—

व कुल्ला इन्सानिन अलज़मनाहू ताइरतुन फ़ीउनकिही व युख़रजोलहु योमल कयामते किताबन यलकाहो मन्शूरन।

—(सूरते बनी इसराईल आयत 13)

और प्रत्येक व्यक्ति के लिए लगा दिया है हमने कर्म लेख उसका बीच उसकी गर्दन के और निकालेंगे हम उसके लिए कयामत के दिन एक पुस्तक (के रूप में) देखेगा उसको खुला हुआ।

इस पर तफ़सीरे जलालैन में लिखा है—

मुजाहिद ने कहा कि कोई बच्चा ऐसा नहीं जिसकी गर्दन में उसके एक कागज होता है उसमें यह लिखा होता है कि यह सौभाग्यशाली है या दुर्भाग्यशाली (अभागा)।

तफ़सीरे हुसैनी में इस वाक्य की भूमिका में लिखा है—

दर ज़ादुलमसीर अज़ मुज़ाहिद नकल मे कुनद।

जादुलमसीर में मुजाहिद से यह उद्धृत हुआ है।

इस कथन के बाद लिखा है—

यानी आँचे तकदीर करदा अन्द अज़ रोज़े अज़ल अज़ किरदारे ओ, लाज़िम साख्ता अन्द दर गर्दने ओ यानो ओ रा चारा नेस्त अज़ां।

अर्थात् जो भाग्य आरम्भ के दिन से उसके लिए कर्मों के लिए निश्चित कर दिए वह उसकी गर्दन में लटका दिया, अर्थात् उससे वह बच नहीं सकता।

दर ऐनुलमआनी गुफ़्ता कि तायर1 आं किताब अस्त कि रोज़े कयामत परां-परां बदस्ते बन्दा आयद।

1 [1. तायर शब्द का अर्थ पक्षी है। यह पक्षी रूपी पुस्तक कैसी होगी इसकी कल्पना करना अति कठिन है। न जाने इसके पृष्ठ कितने होंगे? —‘जिज्ञासु’]

तायर रूपी पुस्तक—ऐनुलमआनी में कहा है कि तायर  वह किताब है जो कयामत के दिन उड़ती-उड़ती बन्दे के हाथ आएगी।

प्रत्येक व्यक्ति के कर्म प्रारम्भ से ही नियत हैं। अटल भाग्य ने कर्मों का लेख बना दिया। इसमें हेर-फेर तो हो नहीं सकता। इसके अनुसार ही प्रत्येक व्यक्ति ने कार्य किया होगा। अब वह कर्मों का लेखा उसके हाथ में दे दिया जाता है।

व वज़अलकिताबा।

—(सूरते ज़मर आयत 67)

और रखे जाएँगे कर्म के हिसाब।

इस कर्म लेख के हिसाब में भी बहिश्त व जन्नत में जाने वालों में परस्पर अन्तर होगा। अतः सूरते हाका में कहा है—

कअम्मा मनओ किताबहु वियमोनिही फ़यकूली अकरऊ किताबहु व अम्मामन ऊती किताबहु बिशमालिही फ़यकूलो यालैतनी लमऊते किताबिहा।

—(सूरते हाका आयत 19 व 25)

तब जिसके दाएँ हाथ में उसका कर्मों का लेखा दिया जाएगा वह कहेगा लीजिए पढ़ो मेरा कर्म-लेख………..और जिसको कर्मों का लेखा बाएँ हाथ में दिया जाएगा वह कहेगा ऐ काश! न मिलता मेरा कर्मों का लेखा।

इस देने के ढंग से ही निर्णय का पता तो लग ही गया। अब आगे और कार्यवाही से क्या लाभ? दोज़ख़ वाले दोज़ख़ के लिए बहिश्त वाले बहिश्त के लिए तैयार हो गए। परन्तु कानून व्यवस्था फिर व्यवस्था है। इसे अल्लामियाँ भी निरस्त नहीं करते।

इधर तो इन भाग्य लेखों को नित्य कहा है। अब कहते हैं—

वल्लाहो यकतुबो मायुबेतून।

—(सूरते निसा आयत 81)

और अल्लाह लिखता है जो यह ठहराते हैं।

तफ़सीरे हुसैनी में इस पर लिखा है—

ख़ुदा मे नवीसद दरलोहे महफ़ूज़ या किरामुल कातिबीन ब अमरे ख़ुदा मे नवीसन्द।

ख़ुदा लोहे महफ़ूज़ में लिखता है या लिखने वालों में सम्मानीय ख़ुदा की आज्ञा से लिखते हैं।

नित्य लेख की पुष्टि की जाती है? या नया लेख लिखा जाता है? सम्भवतः पैंसिल के लेख पर स्याही या कोई रंग चढ़ाया जाता हो। इस प्रकार के स्मरण लेख रखने की उन्हें आवश्यकता होती है जिन्हें भूल जाने का भय हो, संसार का ज्ञान रखने वाले अल्लामियाँ को इतना दफ्तर रखने की क्या आवश्यकता पड़ी है? व्यर्थ की लेखकों में श्रेष्ठों की मेहनत। इतनी मात्रा में लेखन सामग्री का अपव्यय क्यों किया जाता है?

फिर यह भी तो आवश्यक नहीं कि स्मृतियाँ कर्मों का सही रोज़नामचा हों। क्योंकि एक और जगह फ़रमाया है—

व यमहू अल्लाहो मायशाओ।

—(सूरते रअद आयत 39)

और मिटा देता है अल्लाह जो चाहता है।

तफ़सीरे हुसैनी में इस आयत पर लिखा है—

आंचे अज़ बन्दा सादिर शुवद अज़ अकवालो अफ़आल हमा रा वनवीसन्द आं दफ्तर रा बमवमाकिफ़ अरज़ रसानन्द, हक्के सुबहानहू कोलो फ़ेले कि सवाबो व ख़ताए बदां मुतफ़र्रअनेस्त महव कुनद व बाकी रा मसबत बिगुज़ारद या सैय्याते ताइब रा महव कुनद।

जो कुछ बन्दे से काम होता है उसका लेखा वाणियों व कर्मों की दशा में वह सब लिखते हैं और उस रजिस्टर को पेश करते हैं। ख़ुदा-वन्द उस वाणी व कर्म को कि कोई पुरस्कार या दण्ड उससे कल्पनीय नहीं मिटा देते हैं व शेष को लिखा रहने देते हैं या तौबा करने वाले की बुराइयों को मिटा देते हैं।

जब यह शासकीय अधिकार भी काम में आते रहते हैं तो लिखना व्यर्थ है, परन्तु हाँ, कचहरी की परम्परा का पालन होना चाहिए। अल्लामियाँ ने स्वयं या फ़रिश्तों ने लिखा और अल्लामियाँ ने संशोधन करके पुष्टि कर दी, परन्तु कचहरियों में तो साक्षी भी होते हैं। अल्लाहमियाँ की कचहरी बिना साक्षियों के कैसे रहे? फ़रमाया है—

योमा नदऊ कुल्ला अनासिन बिइमामिहिम।

—(बनी इसराईल आयत 71)

जिस दिन बुलाएंगे सब मनुष्यों को उनके इमाम पेशवा मार्गदर्शकों के सहित।

बजाआ बिन्नबीयिन्ना व श्शुहदाए कज़ाबैनहुम बिलहक्के।

—(सूरते ज़ुमर आयत 69)

और लाए जाएँगे पैग़म्बर और साक्षी और निर्णय किया जाएगा उनमें न्याय से।

तफ़सीरे हुसैनी में लिखा है कि साक्षियों से तात्पर्य—

मुराद उम्मते मुहम्मद अस्त।

तात्पर्य हज़रत मुहम्मद की उम्मत से है।

परन्तु नहीं, साक्षी कुछ और भी है—

व योमा तशहदो अलैहिम अलसनतहुम व ऐदिहिम व औजलहुम बिमा कानूयअमलून।

—(सूरते नूर आयत 24)

जिस दिन साक्षी देंगी उन पर उनकी वाणियाँ और उनके हाथ और उनके पाँव। जिनसे वह काम करते थे।

व तशहदो अरजलहुम बिमा कानूयकसिबून।

—(सूरते यासीन आयत 65)

और गवाही देंगे पाँव उनके जो कुछ वह कमाते थे।

हत्ताइज़ामाजाऊहा शहिदा अलैहिम समउहुम व अवसारिूहुम व जलूदुहुम बिमाकानूयअमलून। वा कालूलजुलूदहुम लिमा शाहिदा तुम अलैना कालू अन्तकनल्लाहुल्लज़ी अन्तका कुल्लाशैअन।

—(सूरते हम सजदा आयत 20-21)

यहाँ तक कि जब जाएँगे पास उसके, साक्षी देंगे उन पर कान उनके और आँखें उनकी और चमड़े उनके, जो कुछ करते थे और वह कहेंगे अपने चमड़ों से क्यों साक्षी दी तुमने हमारे ऊपर। वह कहेंगे बुलवाया हमको अल्लाह ने जिसने बुलवाया प्रत्येक वस्तु को।

एक एक अंग बोलेगा!—यह अन्तिम साक्षियाँ खूब रहीं, शरीरों के यह अंग कबर की मिट्टी में मिट्टी हो चुके। रहा केवल रीढ़ की हड्डी का निचला भाग। इस पर वर्षा पड़ने से शरीर उगेगा। कयामत की कचहरी में पहुँचे तो इन अंगों को वाणी भी मिल गई, क्या यह वही अंग नहीं जो संसार में थे? परन्तु अब तो मिट्टी नहीं रही। बनाएँगे किससे? यदि यह सारी वाक्य रचना केवल अलंकारिक है तो वह तो नित्य प्रति हो ही रहा है।

अपराधी की आँखें अपराध की स्वीकृति तो देती हैं? कयामत में विशेष क्या होना है? चमड़ा कहता है। मुझे बुलवाता है अल्लाह मियाँ। क्या वही बात बुलवाता है जो चाहता है या बोलने की स्वतन्त्रता है? स्वतन्त्रता न रही तो साक्षी विश्वसनीय न रही। अल्लाहमियाँ की इच्छा हो तो क्या स्वयं कर्त्ता अपने अपराध को स्वीकार करने को तैयार नहीं? वह विचारा तो बाएँ हाथ में कर्मों का लेखा मिलते ही काँप गया था। फिर और साक्षी की आवश्यकता क्या पड़ी थी? क्या केवल औपचारिकता पूरा करनी थी? यह तो केवल कम ज्ञान वालों के लिए होता है।

सर्वज्ञ का अपना ज्ञान पर्याप्त है फिर यहाँ तो प्रत्येक के कार्यों का लेखा स्वयं बना दिया है प्रारम्भ से ही जिससे बाल बराबर भी इधर-उधर नहीं हो सकता। इसके बाद ख़ुदा के अपने हिसाब रखने वाले निश्चित हैं। वे इस बात के उत्तरदायी हैं कि जो कुछ भी नित्य सत्ता का लेख है वह पूरी तरह कार्यान्वित हुआ है। सम्भव है कि वह दूसरा रजिस्टर तैयार करते हों जिसकी लोहे महफ़ूज़ से मिलान की जाती हो फिर अल्लामियाँ अपने पवित्र हाथों से उसमें घट बढ़ करते हैं।

नबियों व उनके समुदाय की साक्षी अलग है। फिर प्रत्येक कर्त्ता को वाणी प्रदान की जाती है और वह कर्त्ता की इच्छा के विरुद्ध पर्चा फड़वा देते हैं। साक्षी के विषय का स्वयं निर्णय देते हैं या कोई और? इसमें सन्देह है।

कचहरी की कार्यवाही पूरी है। हाँ! कमी है तो केवल वकील की व युक्ति की, भला सर्वज्ञ न्यायकारी को इसकी क्या आवश्यकता है? मगर फिर दूसरे प्रावधानों की क्या आवश्यकता? और यदि यह आवश्यकता का प्रश्न एक बार चल पड़े तो फिर प्रारम्भ में ही अभाव से भाव में लाने की क्या आवश्यकता? पाप कराने की भी अच्छे भले अल्लामियाँ को क्या आवश्यकता? प्रारम्भ से अन्त काल तक अल्लामियाँ की इच्छा के चमत्कार हैं। यदि अब इन साक्षियों के पश्चात् कर्त्ता को बोलने की आज्ञा हो तो वह कहे— मुझसे अल्लाह ताला ने कराया है जो सबसे कराता है—

वही कातिल वही मुख़बिर वही मुन्सिफ़ भी।

अकरिबा मेरे करें ख़ून का दावा किस पर॥1

[1. अर्थात् हत्यारा भी वही है, सूचना देने वाला भी वही है और इस अपराध के निर्णय के लिए न्यायाधीश भी उसीको बनाया जाता है। मेरे सगे-सम्बन्धी मेरी हत्या का केस किस पर करें? उर्दू के इस प्रसिद्ध पद्य का अर्थ देना हमने आवश्यक जाना।     —‘जिज्ञासु’]

अंगों ने साक्षी देने को दे दी, अब उन पर भी ‘फ़तवा’ ख़ुदाई आदेश लागू होता है। फ़रमाया है—

कल्लइल्लन लम यन्तही लनसफ़अन, नासियतुन काज़िबतिन ख़ातियतिन।

—(सूरते अलक आयत 15-16)

निश्चय ही हम उसको पेशानी के साथ घसीटेंगे वह पेशानी जो अपराधी व झूठी है।

दण्ड की विचित्र प्रक्रिया!—ऊपर मनुष्य को उसके अंगों से पृथक् कर दिया था। अनुमान हुआ था कि आर्य दर्शन की भाँति कुरान शरीफ़ भी मानव को चेतन कर्त्ता और उसके अंगों को अचेतन साधन निर्धारित करता है, परन्तु पेशानी (सिर का अग्र भाग) को दण्ड दिये जाने से अनुमान होता है कि सम्भव है नास्तिकों के सिद्धान्त के अनुसार यहाँ भी मस्तिष्क को कर्त्ता मानते हों।

क्योंकि आत्मा का स्वरूप कुरान शरीफ़ में वर्णन नहीं किया गया। यदि पेशानी भी शरीर के दूसरे अंगों की भाँति आत्मा से पृथक् है तो इस विचारी को दण्ड के लिए क्यों चुना गया? क्या दण्ड देते समय दूसरे अंगों को जो सरकारी साक्षी बने थे बरी कर दिया जाएगा? सांसारिक न्यायालयों में यह परम्परा है ख़ुदाई न्यायालय में भी सम्भव है ऐसा ही हो।

इस दशा में नरक की पीड़ा उठाने वाले मनुष्य का रूप व दशा क्या होगी? वाणी छूट गई, कान नहीं, आँखें निरस्त, चमड़ा अलग हो गया। पाँव भी गये। पेशानी भी बिना चमड़े की होगी जो घसीटी जायेगी। यदि कुछ अंगों को इसलिए छुट्टी मिल जाए कि उन्होंने सत्य साक्षी दी है और कुछ इसलिए कि उनका दुरुपयोग हुआ है तो दण्ड की पात्र केवल आत्मा ही रह जाए जो दर्शन के अनुसार उचित है, अचेतन के दण्ड के क्या अर्थ?