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विधि, निषेध, सिद्धानुवाद और अर्थवाद का विचार: पण्डित भीमसेन शर्मा

अब विधि, निषेध, अनुवाद वा सिद्धानुवाद और अर्थवाद, जिनका उद्देश्य चतुर्थ संख्या में लिख चुके हैं, उनका विचार किया जाता है। इनमें विधि नाम आज्ञा (हुक्म) का है कि ऐसा करो, और ऐसा मत करो, यह निषेध है, सो भी विधि के साथ ही लग जाता है। अनुवाद- कही बात वा विषय को ह्लि र से कहना। सिद्धानुवाद- एक अनुवाद का ही भेद है। जो वस्तु वा कार्य लोक की वर्त्तमान परिपाटी के अनुसार वा स्वभाव से संसार में होता है, उसका कहना सिद्धानुवाद कहाता है। वेद और वेदानुकूल शास्त्रों में जिसके लिये कहा गया कि यह इस प्रकार कर्त्तव्य कहा है, वह कर्म और उस कर्म के सेवन से संचित हुए शुभ संस्कार भी धर्मसंज्ञक हैं, यह पूर्व भी कह चुके हैं, तिससे सिद्ध हुआ कि जिसके करने वा न करने की आज्ञा दी गयी, उसका वैसा ही करना वा न करना धर्म कहाता है। शुभ की विधानपूर्वक निषिद्ध की निषेधपूर्वक करने, न करने की आज्ञा देना ही धर्म है। जैसे जिससे दुःखी हो उससे भी मर्मच्छेदन करने वाले, कठोर वाक्य न बोले, यहां मर्मच्छेदन न करना भी धर्म ही है। अथवा ‘कठोर मर्मच्छेदक वाक्य न बोले चाहे दुःखी भी हो’ यह वाक्य अधर्म को हटाने वाला होने से     धर्मशास्त्र वा धर्मशासक है। ऐसा होने से विधिवाक्य ही धर्म को जताने वाले हो सकते हैं, अन्य नहीं, यह सिद्ध हुआ।

श्रेष्ठ लोगों के माने हुए वा बनाये हुए गद्य-पद्यक्रम वाक्य समुदायों से बने वेदादि सम्पूर्ण शास्त्रों में मुख्यकर तीन प्रकार के ही वाक्य प्राप्त होते हैं। सो न्यायदर्शन वात्स्यायनभाष्य1 में लिखा है कि एक जो प्ररेणा करने वाले वाक्य हैं, उन्हीं को नियामक वा आज्ञा भी कहते हैं। जैसे ‘स्वर्ग- सुखविशेष की कामना रखने वाला पुरुष अग्निहोत्र करे’ यह विधिवाक्य है।

द्वितीय प्रकार के अर्थवाद वाक्य कहाते हैं। विधि वा आज्ञा के अर्थ नाम प्रयोजन को कहने वाले होने से उनका नाम अर्थवाद है। इस अर्थवाद के अवान्तर भेद चार हैं। स्तुति, निन्दा, परकृति और पुराकल्प। विधि के ह्ल ल को दिखाने वाली प्रशंसा स्तुति कहाती है। विधि के ह्ल ल को दिखाने से कर्त्ता को प्रतीति या विश्वास हो सकता है कि इसको करना चाहिये, निष्ह्ल ल नहीं है। अच्छा ह्ल ल दिखा देने से कर्ता की श्रद्धा भी होती है, इसी कारण स्तुति ही उस कार्य में प्रवृत्ति कराती है, क्योंकि अच्छा ह्ल ल सुनकर कार्य में मनुष्य प्रवृत्त होता है। अनिष्ट ह्ल ल कहना निन्दा कहाती है, उस दुष्ट काम से होने वाले निकृष्ट ह्ल ल के दिखाने से कर्त्ता की अरुचि हो जावे, जिससे निन्दित बुरे काम को न करे। जैसे कि ‘गौ को नहीं मारना चाहिए’ यह विधि है, गौ के मारने से जो बुरा ह्ल ल होगा उसका दिखाना और ‘गौ रक्षणीय है’ इस विधिवाक्य पर गौ की रक्षा से जो अच्छा ह्ल ल होगा उसका दिखाना निन्दा-स्तुतिरूप अर्थवाद कहाता है। अन्य किसी ने अच्छा वा बुरा किया उसको वैसा ह्ल ल मिला, यह दृष्टान्त दिखाना परकृति है। जैसे ‘सत्य बोलना चाहिये और मिथ्या बोलना नहीं चाहिये’। ये दोनों विधिवाक्य हैं, सत्य बोलने में यह-यह लाभ और मिथ्या बोलने में ऐसी-ऐसी हानि वा बुराई है। देखो युधिष्ठिर सत्य बोलने से ऐसे प्रतिष्ठित धर्मात्मा कहाये और एक बार मिथ्या बोलने से उनको अमुक बुरा ह्ल ल मिला, यह परकृति है। और इतिहास सम्बन्धी विधि पुराकल्प कहाता है। अर्थात् परम्परा से अनेक शुभ कर्म होते आते हैं, उनको परम्परा के प्रमाण से कर्त्तव्य ठहराना पुराकल्प कहाता है। ये चारों प्रकार के अर्थवाद विधि की पुष्टि करते हैं वा सेवक के तुल्य हैं। परन्तु विधिवाक्य ही मुख्य प्रधान हैं। जिस कर्त्तव्य की विधि- आज्ञा वेद में नहीं उनके अर्थवाद भी नहीं आते। क्योंकि अर्थवाद विधि के आश्रय चलते हैं।

अब तीसरे प्रकार के अनुवाद वाक्य हैं। अनुवाद दो प्रकार का होता है। एक तो शब्द को द्वितीय बार बोलना शब्दानुवाद और अर्थ नाम वाच्य को द्वितीय बार कहना अर्थानुवाद कहाता है। अनुवाद शब्द का मुख्य अर्थ यही है कि कहे को फिर से कहना। अब यह शटा है कि जिसको एक बार विधान कर चुके वा एक शब्द बोलकर जिसकी आज्ञा दे चुके उसको ह्लि र क्यों कहते हैं ? इसका     समाधान यह है कि जिसको द्वितीय बार कहा जाता है वह अति प्रशस्त वा अवश्य कर्त्तव्य कार्य माना जाता है अर्थात् द्वितीय बार कहने से विधि की प्रशंसा होती है। जिसका अनुवाद किया जाय उस कर्म को निस्सन्देह उत्तम वा कल्याण का मार्ग समझ कर करना चाहिये। जैसे शास्त्रों में तीन प्रकार के वाक्य आते हैं वैसे ही लोक के व्यवहार में सर्वसाधारण (जिन्होंने शास्त्र नहीं पढ़ा) भी इन्हीं तीन प्रकार के वाक्यों से व्यवहार करते हैं। यथा- ‘भात पकाओ वा रोटी बनाओ’ इत्यादि विधि वाक्य कहाते हैं। क्योंकि आयु, तेज, बल, सुख और स्मरणशक्ति की वृद्धि तत्काल पकाये अन्न के भोजन से होती है यह अर्थवाद। ‘पकाईये-पकाईये वा जाओ-जाओ, बैठो-बैठो, वा शीघ्र-शीघ्र पकाईये’ इत्यादि अनुवाद कहाता है। यह सब न्यायदर्शन के वात्स्यायनभाष्य का आशय लिखा है। इन तीनों सूत्रों (२.२.६२-६४) पर जितना भाष्य था वह सब हमने यहां नहीं लिखा, किन्तु प्रसग् के अनुसार जितना प्रयोजन था उतना लिखा है, शेष छोड़ दिया है। उक्त तीन प्रकार के वाक्य प्रायः ब्राह्मणादि वेद सम्बन्धी पुस्तकों में आते और संघटित होते हैं। तथा परकृति और पुराकल्प नामक दोनों अर्थवाद ब्राह्मण पुस्तकों में ही घटते हैं। किन्तु अपौरुषेय सनातन वेद में नहीं घटते। अनुवाद शब्द का अर्थ जैसा वात्स्यायन ऋषि भाष्यकार ने दिखाया है वैसा वेद सम्बन्धी ब्राह्मण ग्रन्थों में प्रायः आता है।

और सिद्धानुवाद वा भूतानुवाद यह भी एक प्रकार का अनुवाद है। यह लोक में भी प्रसिद्ध है और शास्त्रों में भी इसका प्रचार दीखता है। जब तीन वा चार प्रकार के वाक्य हैं तो एक विधिवाक्यों के सार्थक होने से अन्यों का व्यर्थ होना प्राप्त हुआ और यही बात पूर्वमीमांसा1 में भी कही है कि वेद के आज्ञारूप वाक्यों से कर्त्तव्य का उपदेश होने से जिसमें कर्त्तव्य का उपदेश नहीं उन अक्रियार्थ वाक्यों की अनर्थकता होगी। इस कारण विधिवाक्यों को अनित्य समझना चाहिये। ऐसा पूर्व पक्ष करके वहीं उत्तर दिया है कि विधिवाक्यों के साथ अर्थवाद वाक्यों का एक कार्य में योगरूप सम्बन्ध रहने से अर्थवादादि व्यर्थ नहीं किन्तु सार्थक हैं क्योंकि कोई सुखभोग चाहने वाला पुरुष अर्थवाद के बिना आज्ञा का सेवन वा निषिद्ध का त्याग नहीं कर सकता। और ह्ल लभोग से विरक्त पुरुष को भी अर्थवाद अवश्य जानना चाहिये क्योंकि विहित का सेवन करे अन्य का नहीं, यह भी अर्थवाद से ही जताया जाता है, इससे वहां भी अर्थवाद सार्थक हैं।

अब इस मानवधर्मशास्त्र में ‘वेद सम्बन्धी पुण्य के उत्पन्न कराने वाले कर्मों से ब्राह्मणादि तीनों वर्णों के शरीरों के संस्कार करने चाहियें जिससे इस जन्म और जन्मान्तर में पवित्रता होती है।’२ यह विधि तथा सामान्य से किसी कार्य का     विधान कर पीछे उसकी प्रशंसा वा ह्ल ल दिखाना अर्थवाद है। जैसे- ‘गर्भाधानादि संस्कारों में होने वाले होम और मन्त्रपूर्वक धारण किये चिह्नों से द्विजों- ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के बीज सम्बन्धी वा गर्भ सम्बन्धी मलिनता के सब दोष छूट जाते हैं।’३ अर्थात् संस्कारों में ओषधियों का भी कहीं-कहीं प्रयोग किया है, उससे तथा अन्य पवित्रता के उपाय संस्कारों में होने से अपवित्रता दूर होती है। यह पूर्वोक्त विधि पर अर्थवाद तथा ‘कल्याण चाहने वाले पिता आदि पुरुषों को श्रेष्ठ धर्मज्ञा स्त्रियों का सत्कार और उनको भूषित करना चाहिये’१ यह विधि वा आज्ञा है। इसी पर ‘जिन घरों में सती स्त्रियों की पूजा होती है वहां श्रेष्ठ सज्जन लोग निवास कर प्रसन्न होते हैं। और जिन घरों में स्त्रियों का सत्कार नहीं वहां श्रेष्ठ लोग दुःखी होकर नहीं ठहरते अर्थात् विरक्तादि हो जाते हैं’२। तथा ‘अति भोजन न करे, झूठे कहीं न जावे। दुःख प्राप्ति में भी मर्मभेदी वचन न कहे, दूसरों से वैर विरोध करने में बुद्धि न लगावे।’३ इत्यादि कथन बुराई से बचने की आज्ञारूप विधि है तथा ‘आलस्य निद्रा को छोड़कर धर्म के मूल श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण का सेवन करे।’४ इत्यादि सीधा कर्तव्य का विधान है। इस उक्त प्रकार से अर्थवाद वाक्य विधिवाक्य की ही रक्षा और पुष्टि करतें है। सिद्धानुवाद रूप वचन जो अनुवाद सम्बन्धी वाक्यों के अन्तर्गत हैं, उनका प्रयोग मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रों और वेदों में मिलता है। वेद में लिखा है कि- ‘सूर्य एक बिना किसी का सहाय लेकर अपनी कक्षा में डोलता और चन्द्रमा बार-बार घटता-बढ़ता अग्नि पाले का औषध और भूमि सब से बड़ा खेत है।’५ इत्यादि सिद्ध बातों का कथन है किन्तु कुछ नवीनता नहीं, इससे इसका नाम सिद्धानुवाद है। धर्मशास्त्रों में सृष्टि का वर्णन सिद्धानुवाद वा भूतानुवाद है। स्वाभाविक वर्तमान द्रव्य, गुण, कर्मों का विभाग पूर्वक दिखाना भी सिद्धानुवाद का विषय है। और जब सिद्ध को ही जानने के विचार से कहते हैं तब वहां भी विधि ही जानना चाहिये। तथा- ‘चेतन का अन्न- भक्ष्य, जड़, दांत वाले प्राणियों के बिना दांत वाले, हाथ वालों के बिना हाथ वाले और शूरवीर सिंहादि प्राणियों का भक्ष्य- अन्न डरपोक प्राणी हैं।६ ‘सत्त्वगुण को   धारण करने वाले देवता, रजोगुण को धारण करने वाले मनुष्य और तमोगुणधारी जीव-जन्तु-पशु-पक्षी आदि योनि को प्राप्त होते हैं।’७ इस प्रकार तीन गुणों के भेद से मुख्य कर तीन भेद वाले सब प्राणी हैं। गुणों के अवान्तर भेद एक-एक में अनेक होने से योनियों में अवान्तर भेद पड़ते हैं। इत्यादि अनेक वचन सिद्धानुवादपरक आते हैं। स्वाभाविक सिद्धानुवाद इसलिये कहा जाता है कि उसमें विधि-निषेध की उदासीनता समझी जावे, क्योंकि जो गुणादि स्वाभाविक अच्छा बुरा है उसमें कुछ हेर-ह्ले र न हो सकने से विधि-निषेधरूप प्रयत्न करना कदापि सह्ल ल नहीं हो सकता। स्वाभाविक गुणादि उस वस्तु की पूर्ण आयु तक रहता है और कहीं-कहीं शुभ-अशुभ लोक के वर्त्ताव को जताकर [कि ऐसा-ऐसा करने वाले ऐसा-ऐसा फल भोगते हैं) विधि-निषेध की ओर मनुष्यों को झुकाने के लिए सिद्धानुवाद कहे जाते हैं, वैसे शीत वा पाले की ओषधि जो जानता है वही शीत सम्बन्धी दुःख से बच सकता है। सब सिद्ध वस्तु को सब कोई नहीं जानता। इसलिये शास्त्रकार उनको जताने के अर्थ सिद्धानुवाद कहते हैं कि जिससे सृष्टि के क्रमानुकूल गुणकर्मों का बोध हो जावे, जिससे उसके अनुसार वर्त्ताव करके मनुष्यों को सुख प्राप्त हो और दुःखों से बचें, यही सिद्धानुवाद का प्रयोजन है। अब यह सिद्ध हो गया कि वाक्य समुदायरूप सब मान्यशास्त्रों में चार ही प्रकार के वाक्य हैं।

ये तीन वा चार प्रकार के वाक्य जो दिखाये गये, इससे शास्त्रों के अभिप्राय अच्छे प्रकार और शीघ्र बुद्धि में जम जाते हैं। इस प्रकार वाक्यविभाग न दिखाया जाय तो ठीक-ठीक सिद्धान्त का बोध नहीं हो सकता, इसलिये वाक्यविभाग दिखाना आवश्यक है। जहां-जहां इस पुस्तक में जो-जो वाक्य आवेंगे वहां भाष्य में विधि आदि करके लिख दिया जायगा कि यह विधि, अर्थवाद वा अनुवाद अथवा सिद्धानुवाद है। जिससे सर्वसाधारण लोगों को ज्ञात हो जायगा कि धर्मशास्त्र बनाने वाले ने हमको अमुक-अमुक आज्ञा दी है तथा अमुक-अमुक अर्थवाद आदि से उसको सार्थक ठहराया है। इस विषय पर अधिक लेख बढ़ सकता था परन्तु प्रयोजनमात्र समझाना उचित समझ कर अधिक नहीं बढ़ाया गया।

धर्म शब्द के अर्थ का विचार: पण्डित भीमसेन शर्मा

अब सामान्य धर्म शब्द पर कुछ विचार करना आवश्यक इसलिये समझा गया कि हमको धर्मशास्त्र की मीमांसा करना है तो प्रथम जान लेना चाहिए कि धर्म किस वस्तु का नाम है ? वस्तु शब्द से यहाँ वाच्यमात्र का विचार है किन्तु द्रव्य का पर्यायवाचक वस्तु शब्द नहीं लेना है। प्रयोजन यह है कि धर्मशब्द का शाब्दिक वा लाक्षणिक अर्थ क्या है ? अर्थात् व्याकरण के नियमानुसार मनुष्य जिसको     धारण करें, वह धर्म है। ऐसा होने पर वेदादि शास्त्रों में जिसका निषेध किया गया, ऐसे चोरी आदि दुष्कर्म को भी कोई धारण करता वा कर सकता है तो क्या उसको भी धर्म कहना ठीक हो सकता है ? ऐसा विरुद्ध निश्चय वा सन्देह हो सकने से इसका यह समाधान कहा जाता है- धृञ् धारणे1 इस धातु से कर्म कारक वा भाव में उणादि मन् प्रत्यय2 हुआ है। सामान्य वा विशेष मनुष्य अथवा चराचर सब वस्तुमात्र जिसको धारण करते, जिसके आधार होते अथवा मनुष्य वा प्राणी-अप्राणियों से जो धारण किया जाता अर्थात् उनको धारण करने पड़ता है, वह धर्म कहाता है। यह धर्म का शाब्दिक अर्थ है। कदाचित् किसी प्रकार अन्य कारकों में भी मन् प्रत्यय हो सके, परन्तु प्रधानता से भाव और कर्म का ही अर्थ मिल सकता है। भाव अर्थ में प्रत्यय करने से धृति- धैर्य, क्षमा आदि धारणरूप हैं। इस कारण इनका भी नाम धर्म हो सकेगा।

और कर्म का अर्थ आगे स्वयमेव लिखा गया है। सब शास्त्रों में जातिशब्द, गुणशब्द और क्रियाशब्द ये तीन ही प्रकार के शब्द माने गये हैं। नैयायिक लोग इन्हीं को द्रव्य, गुण, कर्म शब्दों से व्यवहार में लाते हैं। इसमें धर्मशब्द द्रव्य, गुण और कर्म तीनों का नाम जिस किसी प्रकार व्यवहार में आया दीख पड़ता है। परन्तु प्रधानता से धर्मशब्द गुण और कर्म का वाचक है, अधिक कर इसी दो प्रकार का व्यवहार आता है। इसी कारण व्याकरण अष्टाध्यायी के अर्द्धर्चादिगण3 में     धर्मशब्द का पाठ करने से विद्वान् लोग पुंस्, नपुंसक दोनों लिग् होना मानते हैं। और जहाँ कर्म का वाचक धर्मशब्द है, वहीं प्रायः इसका नपुंसकपन प्रतीत होता है। जैसे यजुर्वेद के ३१वें अध्याय में ‘यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्॰’ यहाँ धर्मशब्द कर्म का पर्याय वाचक है। नपुंसकलिग् में धर्मशब्द का प्रयोग बहुत न्यून आता है, किन्तु प्रायः पुल्ँिलग् में ही लोक-वेद में प्रयोग किया वा लिखा जाता है, वह गुणवाचक वा स्वभाववाचक धर्मशब्द है। सब प्रकार का धर्मशब्द सुखहेतु गुण, कर्म वा द्रव्य का वाचक अभीष्ट है, किन्तु दुःखहेतु गुणादि का वाचक नहीं। जहाँ दुःख का हेतु धर्मशब्द आता है, वहाँ उसमें नञ् अव्यय संयुक्त करके अधर्म कहते हैं। वहाँ सुख से विरुद्ध दुःख का हेतु गुण, स्वभाव, द्रव्य वा कर्म अधर्मशब्द का वाच्यार्थ यथासम्भव जानना चाहिये। और जहाँ पर्युदासार्थ वाचक नञ् अव्यय होता है, वहाँ धर्म से भिन्न धर्म के तुल्य वस्तु का वाचक अधर्मशब्द जानना चाहिये। उसी को विचारशील लोग धर्माभास भी कहते हैं कि जो ऊपर से धर्म के तुल्य प्रतीत हो, परन्तु वास्तव में धर्म न हो।

संसार में मनुष्य से लेकर चींटी पर्यन्त सब प्राणी सुख की ही इच्छा रखते हैं। कोई कदापि दुःख को नहीं चाहता। इसी कारण शास्त्र की आज्ञा से विरुद्ध दुष्ट कर्म का धारण कोई नहीं करता, क्योंकि स्वभाव से ही इसका विरोध है। इसलिये धर्म वही है जिसका धारण, स्वीकार वा स्वभाव से मिलाप हो जावे। जैसे प्रकृति के अनुकूल सुख देने वाले वस्तु का भोजन किया जाय तो वह उदर में जाकर ठहरता वा धारण किया जाता और वहां के धातु उस आहार को अपने तुल्य बनाने का यत्न करते हैं, अर्थात् ठहराते हैं। जैसे मित्र को मित्र प्राप्त होकर प्रसन्नता का कारण होता है, वैसे ही अपने प्रिय सुखप्रद को पाकर धर्मात्मा सुखी वा आनन्दित होता है। यही धारण का लक्षण है। और जैसे भोजनादि के साथ वा अकस्मात् प्रमादादि से पेट में मक्खी आदि विरुद्ध वस्तु चला जाये तो नहीं धारण होता- नहीं ठहरता वा पचता किन्तु वमन का कारण हो जाता है, क्योंकि पक्वाशय उसका   धारण नहीं करता। यदि उसका धारण हो और वमनादिक न हो वा चित्त न बिगड़े, ग्लानि न हो अर्थात् कदाचिद् विरुद्ध खाया मक्खी आदि वमन का हेतु न हो और किसी प्रकार पच भी जावे, तो दुःख के हेतु रोगादि विकारों को अवश्य उत्पन्न करता है। कदाचित् अज्ञान से खाया मक्खी आदि किसी विशेष रोग का कारण न हो तो भी ग्लानि अवश्य उत्पन्न होती है। प्रयोजन यह है कि अनुकूल हितकारी भोजन के तुल्य मक्खी आदि पेट में कदापि न ठहरेगा। तथा जैसे मनुष्य अपने अनुकूल भार को अपनी इच्छा से उठाता है, वह उसको छोड़ता नहीं भले ही उसमें क्लेश हो और जिस भार का उठाना भार नहीं जान पड़ता वही धारण करना है और जहां भार वा दुःख जान पड़े और किसी की लज्जा, शटा, भय वा लोभादि के कारण उठाना पड़े, वह धारण न होने से धर्म नहीं किन्तु अधर्म है। और अन्तरात्मा सदा सत्य को धारण करता है, किन्तु बनावटी मिथ्या को वाणी द्वारा कहते हुए संकुचित होता वा लज्जा, शटा करता है, इस कारण जहां ऐसा होता है, वह     धर्म नहीं और सत्य ही धर्म है। इसी प्रकार निषिद्ध चोरी, व्याभिचारादि दुष्ट कर्म को कोई पुरुष धारण नहीं करता, किन्तु सुख के हेतु अनुकूल को प्रसन्नता से     धारण करता है। निषिद्ध कर्म का सेवन काम, क्रोधाादि के वशीभूत होकर किया जाता है, किन्तु विरुद्ध दुष्ट कर्म बुद्धि से कोई नहीं सेवता अर्थात् चोरी आदि पाप का करने वाला भी उसको पुण्य नहीं मान सकता। चोर निर्भय होकर चोरी आदि कदापि नहीं करता। यदि चोर किसी प्रकार परोपकार में लगे धर्मात्मा के तुल्य चोरी करने में लज्जा-शटा-भयों को छोड़कर प्रवृत्त हो तो विरुद्ध कर्म का भी धारण हो सकने से धर्म कहना प्राप्त हो, सो तो कदापि सम्भव नहीं। तिस से धर्म है धारण किया वा कराया जाता है और जो धारण किया जाता है वही धर्म है इससे व्याकरणानुकूल अर्थ करना ही ठीक है।

इससे यह सिद्ध हुआ कि अनुकूल हितकारी का ही धारण होता है किन्तु प्रतिकूल का नहीं। इस कारण हितकारी गुण-कर्मों को ही धर्म कहना वा मानना सिद्धान्त है। क्योंकि अपने-अपने हितकारी को ही सब लोग स्वीकार करते हैं, किन्तु अपने विरोधी दुःखदायी को कोई नहीं चाहता। और स्वभाव का नाम भी   धर्म है। सो अपनी-अपनी सत्ता को सब चराचर वस्तु धारण करते ही हैं। इस सत्ता को ही भाव भी बोलते हैं कि जिस भाव अर्थ के बोधक व्याकरण में त्व-तल् प्रत्यय१ नियत किये जाते हैं। जैसे ब्राह्मणत्व, क्षत्रियत्व वा मनुष्यत्व, पशुत्व, पक्षित्व, एकता इत्यादि शब्दों में ब्राह्मणादि के मुख्य धर्म में त्व आदि प्रत्यय हुआ है। इस अंश में महाभाष्यकार पतञ्जलि ऋषि ने लिखा है कि- ‘यस्य गुणस्य भावाद् द्रव्ये शब्दनिवेशस्तदभिधाने, तस्मिन् गुणे वक्तव्ये प्रत्ययेन भवितव्यम्।’2 अर्थात् ब्राह्मणपदवाच्य व्यक्ति वा जाति में जिस प्रधान गुण की विद्यमानता होने से ब्राह्मणादि पद का प्रयोग वा व्यवहार किया जाता है, उस गुण वा शक्ति का नाम धर्म समझना चाहिये। जिन-जिन शास्त्रों में अर्थात् छह दर्शनों में धर्म-धर्मी के प्रसग् का वर्णन आता है, उन-उन में शक्ति-शक्तिमान् वा गुण-गुणी का व्याख्यान समझा जाता है। और योगशास्त्र के विभूति पाद में भी लिखा है कि- शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी।।14।। भाष्यम्- योग्यतावच्छिन्ना धर्मिणः शक्तिरेव धर्मः।। इत्यादि।। इस योगसूत्र का अभिप्राय यह है कि भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान धर्म वा गुणों के साथ रहने वाला धर्मी वा शक्तिमान् वा गुणी कहाता है। धर्म तीन प्रकार के कालभेद से माने जाते हैं। जो अपनी तरुणावस्था को व्यतीत कर शान्त, तिरोभूत, अप्रकट वा नष्ट हो गया वह भूतधर्म शान्त कहाता है। तथा विरोधी के तिरोहित (दब) जाने वा नष्ट हो जाने से और अपने उत्तेजक हेतुओं से उत्तेजित हुआ धर्म वा गुण वर्त्तमान उदित धर्म कहाता है। तथा भविष्य काल में प्रकट होने वाला गुण अव्यपदेश्य है क्योंकि उसका अनुभव किये बिना वर्णन नहीं किया जा सकता कि इस वर्त्तमान अवस्था के लौटने पर ऐसा होगा। इसीलिये उसका नाम अव्यपदेश्य माना गया है। प्रत्येक वस्तु में इसी तीन प्रकार की दशा के साथ गुण वा धर्म ठहरता है। अपनी योग्यता के साथ अन्य गुण वा धर्मों से पृथक् हुई धर्मी पदार्थ की शक्ति का ही नाम धर्म है, यह व्यासभाष्य का तात्पर्य है। सब वस्तु में सब प्रकार की योग्यता नहीं रहती, इसलिये योग्यता ही सब     धर्म वा शक्तियों की अवच्छेदक- भेदक मानी जाती है। और जिसका जिसके साथ मेल होना वा करना उपयोगी है, उसके साथ उसकी योग्यता समझी जाती है यही योग्यता शब्द का अर्थ है। ऊपर लिखे महाभाष्य और योगसूत्र का एक ही आशय धर्मशब्द पर है, जैसा कि पूर्व से लिखा गया।

पूर्व जो तीन काल के भेद से गुण, धर्म वा शक्ति के तीन भेद कहे गये हैं, उनको लौकिक वा शास्त्रसम्बधी व्यवहार में फैलाकर देखा जाय तो ठीक-ठीक ऐसा ही प्रतीत होता है, जैसे जो पहले से मित्र रहा वह शत्रु और जिसके साथ कुछ सम्बन्ध नहीं रहा वह पुरुष वा स्त्री मित्र बन जाती है। यह धर्मों का परिणाम सदा होता रहता है। अर्थात् सब पदार्थ, सब देश, काल और अवस्थाओं में सबके सर्वथा अनुकूल वा सर्वथा प्रतिकूल नहीं रहते किन्तु जो किसी देश, काल वा वस्तु, अवस्था के सम्बन्ध से अनुकूल हो गया, वही देशादि के लौट-फेर से प्रतिकूल हो जाता है। इसी प्रकार प्रतिकूल हुआ वस्तु कभी अनुकूल भी हो जाता है, यह सब धर्मों का परिणाम है। अभिप्राय यह है कि जिसका परिणाम लौट-पौट होता रहता है, उस गुण का नाम धर्म है। इस पर एक शटा यह रह सकती है कि यदि लौटता रहता है तो उसका नाम स्वभाव क्यों रखा गया, अर्थात् स्वभाव उसी को मानते हैं जिसमें भेद न पड़े। और सनातन धर्म क्या माना जावेगा कि जब धर्मों का सदा परिणाम होता रहता है तो सनातन धर्म कोई क्यों ठहर सकता है ? यद्यपि ये दोनों प्रश्न ऐसे हैं जिन पर कितना ही लिखा जाय पार मिलना दुस्तर है तथापि अतिसूक्ष्मता से इनका समाधान लिखा जाता है-

स्वभाव शब्द का अर्थ यह है कि अपना भाव अर्थात् अपना कारण। अपने कारण से जो गुण कार्य में यथार्थ रूप से चला आता है उसको स्वाभाविक कहते हैं। जैसे दूध का श्वेत गुण दही, मट्ठा आदि सब में यथावत् बना रहता है वा जैसे कपास की श्वेतता रूई, सूत, वस्त्र आदि सब उत्तर-उत्तर कार्य में चली आती है। तो यहां श्वेतता गुण स्वाभाविक माना जाता है, परन्तु दूध, दही, मठा आदि में कोई काला वा अन्य ऐसा रंग डाल सकते हैं कि जिससे उसकी श्वेतता मिट जाय वा जैसे कपड़े को नील आदि से रंग देना, इससे स्वाभाविक को भी कोई लोग अनित्य मानते हैं, परन्तु यह पक्ष इसलिये ठीक नहीं कि वह स्वाभाविक रंग नष्ट नहीं होता किन्तु तिरोभूत (दब) हो जाता है। इसका दृष्टान्त धोबी है कि यदि शिल्पक्रिया प्रवीण धोबी हो तो बनावटी- ऊपर से चढाये पक्के रंग को भी छुड़ा कर ह्लि र उसी श्वेत स्वाभाविक गुण को निकाल देता है। इससे अनुमान होता है कि स्वाभाविक गुण नष्ट नहीं होता, किन्तु तिरोहित (दब) हो जाता है और धोबी के दृष्टान्त को धर्मसम्बन्ध में भी ठीक लगा सकते हैं कि यदि अच्छा धर्मात्मा उपदेशक गुरु मिल जावे जो सब प्रकार से शुद्ध और प्रवीण हो वह काम-   क्रोधादि से लगे दुर्गुणों को छुड़ाकर चेतन आत्मा के स्वाभाविक शुद्ध भावों को प्रकाशित कर देता है। और कदाचित् शिल्पकुशल धोबी न मिले कि जो वस्त्र पर हुए नीलादि रंग को छुड़ा सके तो भी स्वाभाविक को अनित्य न मानना चाहिए। क्योंकि सूर्य का तेज वा प्रकाश स्वाभाविक है, उसके आवरक अन्तरिक्षस्थ मेघ वा धूलि को हम नहीं हटा सकते, तो भी वह अनित्य नहीं। इसी प्रकार यहां भी जानो कि मनुष्यादि में कारण के सम्बन्ध से जो गुण आता है, वही स्वाभाविक है, और उसके कभी तिरोभूत हो जाने वा अन्तर्धान हो जाने वा किसी अज्ञानी के अनित्य मान लेने पर भी वह अनित्य नहीं होता। पर नित्य-अनित्य का विचार लोक में सापेक्ष चलता है। किसी की अपेक्षा कोई नित्य माना जाता है, जिसके स्वरूप में कभी भेद न पड़े किन्तु अनादि, अनन्त काल तक एकरस रहे, ऐसा तो एक परमेश्वर है। और नित्य सन्ध्या वा अग्निहोत्र करता है, ऐसा कहना सापेक्ष अर्थात् जो एक-दो दिन करके छोड़ दे, उसकी अपेक्षा यहां नित्य शब्द का प्रयोग है। किन्तु यह तो सभी जानते हैं कि अति बाल्यावस्था में काई भी सन्ध्याग्निहोत्रादि नहीं करता उत्पत्ति से पहले भी नहीं करता था मरने के पश्चात् भी न करेगा। बीच-बीच में भी कभी-कभी छोड़ने पड़ता है, तो वैसा नित्य अर्थ नहीं तो भी नित्य माना वा कहा जाता है। इसी प्रकार सापेक्ष नित्य वस्तुओं में एक साथ अनित्यता-नित्यता दोनों रहती हैं। परन्तु ठीक नित्य मानने में प्रवाह से किन्हीं को नित्य ठहरा सकते हैं। इसलिये स्वभाव का लौट जाना- तिरोभूत हो जाना मात्र है। और जिसका वस्तुतः लौट जाना होता है, वह स्वभाव नहीं है। किन्तु संयोगी गुण है।

अब रहा सनातन धर्म, सो उसमें भी यही विचार है। उसके तिरोहित हो जाने वा अन्य विरोधी के प्रबल हो जाने से उसका सनातनपन नहीं बिगड़ता। वह सदा कर्त्तव्य उपयोगी ह्ल ल दाता है, इसलिये सनातन कहाता है। यद्यपि अपवाद विषय में उत्सर्ग का प्रवेश नहीं होता१, तो भी वह बहुव्यापी होने से उत्सर्ग वा सामान्य ही कहाता है। जैसे भारतवर्ष का एक राजा हो वह दस-पांच ग्राम का सब     अधिकार किसी को दे देवे, तो भारतवर्ष का राजा कहाना उसका बिगड़ नहीं सकता। इसी प्रकार आपत्काल में सनातन धर्म के किसी अंश का पूरा उपयोग न रहे तो उसका सनातन होना खण्डित नहीं हो सकता। इस अंश का विशेष विचार उत्तम-मध्यम धर्मों में किया जायगा।

यह सब लेख स्वभाव वा गुण को धर्म मानने पर लिखा गया यद्यपि संस्कृत में ऐसा विचार नहीं है तो भी भाषा में समझने वाले अधिक जानकर बढ़ाया गया।

अब प्रकृत यह है कि जब कहा जावे कि यह सज्जन मनुष्य धर्मात्मा है, वहां जिसके चेतनतायुक्त अन्तःकरण में दया कोमलता, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच और इन्द्रियों का वश में करना आदि रूप से धर्म कर्त्तव्य वृत्ति के साथ अवस्थित हैं ऐसा अर्थ करना चाहिये। अथवा शास्त्रों में कहे शुभ कर्र्मों के अनुष्ठान से उत्पन्न होने वाले पुण्यरूप संचित शुभ संस्कार जिसके मन में अवस्थित हैं, वह धर्मात्मा कहाता है। ‘श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन् हि मानव॰’2 [श्रुति-स्मृति में कहा   धर्म…..] ऐसे प्रसग् में श्रौत, स्मार्त्त कर्म ही धर्म कहाता है। कहीं केवल सत्य का ही नाम धर्म है ‘अथातो धर्मजिज्ञासा3 इस मीमांसासूत्र के अनुसार वेदस्थ परमेश्वर की आज्ञा ही धर्म है अर्थात् वेद में जो विधिवाक्य हैं, वे साक्षात् धर्म के बोधक हैं।४ अर्थवाद और अनुवाद वाक्यों की विधिवाक्य के साथ एकवाक्यता होने से सार्थक होते हैं। अतः ये सहकारी कारण हैं। ‘अथातो धर्मं व्याख्यास्यामः’5 इस वैशेषिक सूत्र में विधि-आज्ञा रूप वेदोक्त धर्म का ही ग्रहण है। इस उक्त प्रकार से पूर्वमीमांसादि षट्शास्त्रों वा षड्दर्शनों में धर्म की शिक्षा वा उपदेश प्रत्यक्ष है। इस कारण उनको धर्मशास्त्र मानना वा कहना सार्थक हुआ।

कहीं लिखा है कि ‘विहितक्रियया साध्यो धर्मः’ अर्थात् विधान किये कर्म के सेवन से सिद्ध होने वाला धर्म है, इत्यादि स्थल में आत्मा भी धर्मशब्द का अर्थ हो सकता है। क्योंकि आत्मा भी विहितानुकूल कर्म करने से ही प्राप्त हो सकता है। मरने पर ‘धर्मस्तमनुगच्छति, धर्मं शनैः सञ्चिनुयात्’ अर्थात् धर्म ही उसके साथ जाता है, धर्म का धीरे-धीरे संचय करें, इत्यादि स्थलों में शुभ कर्मों के सेवन से उपार्जन किया वासनारूप में बंधा पुण्यरूप संचित शुभ कर्म ही धर्म कहाता है। कहीं ‘ज्ञेयस्य ज्ञानं ध्येयस्य ध्यानम्’ अर्थात् ज्ञेय वस्तु का ज्ञान और ध्येय वस्तु का ध्यान करना भी धर्म ही कहाता है। यह उक्त सब धर्म दो प्रकार का है एक संसारी और द्वितीय परमार्थसम्बन्धी। जगत् में सुखभोग के अर्थ जिसका सेवन किया जाता है ऐसा शुभ आचरणरूप वेदोक्त कर्म लौकिक धर्म है। और ह्ल लभोग की अपेक्षा छोड़कर उदासीन वृत्ति से सर्वशक्तिमान् सबके उपास्य ईश्वर की आज्ञा का पालनमात्र अपना कर्त्तव्य वा प्रयोजन मानकर सेवन किया ज्ञान, ध्यानादि परमार्थसम्बन्धी धर्म कहाता है। यह दोनों प्रकार का धर्म श्रौत, स्मार्त्त भेद से और दो प्रकार का होता है। अर्थात् लौकिक श्रौत, स्मार्त्त और वैदिक श्रौत, स्मार्त्त। यद्यपि सब शास्त्रों का धर्म ही मुख्य कर विषय है, क्योंकि जहां कहीं अधर्म को हटाने के उपाय कहे हैं, वह भी धर्म के प्रचार में उपयोगी होने से धर्म है। तथा जो कुछ कर्त्तव्य मानकर उपदेश किया गया वह सब धर्म है, क्योंकि जो सदा कर्त्तव्य वा ग्राह्य हो अर्थात् सुख का कारण हो वह धर्म और जो त्यागने योग्य दुःख का कारण निषिद्ध है उसका त्याग भी धर्म है। इस प्रकार वेद, उपवेद, ब्राह्मण, उपनिषद्, छह वेदाग्, छह शास्त्र और स्मृति आदि सब सत् शास्त्रों में कर्त्तव्य का विधान और निषिद्ध का त्याग ही मुख्य कर दिखाया गया है। तो भी इस मानवधर्मशास्त्र का मुख्य कर यही विषय है। इससे सामान्य कर उक्त लक्षण वाला धर्म ही इस मानवधर्मशास्त्र में कहा गया है, यह सिद्ध हुआ। इस धर्म विषय का इतना लेख बहुत सूक्ष्म है, सो कुछ तो आगे शेष होगा और कुछ उपयागी समझ कर लिखा गया, वैसे इस महान् विषय का समाप्त होना दुस्तर था।

सामान्यकर शास्त्र के विषय का विचार : पण्डित भीमसेन शर्मा

तीसरी कोटि में सामान्यकर शास्त्र के विषय को विचारना चाहिए यह लिख चुके हैं। वात्स्यायन ऋषि ने न्यायसूत्र के भाष्य में लिखा है कि ‘परस्पर सम्बद्ध प्रयोजनीय सुख के हेतु साधनों का जिसमें उपदेश किया जाय, वह शास्त्र है।’ इसी के अनुसार शास्त्र के विषय का विचार किया जाता है। प्रथम तो जानना अति आवश्यक है कि सब शास्त्र सुख तथा सुख के साधनों को प्राप्त करने की इच्छा और दुःख तथा दुःख के कारणों को छोड़ने की इच्छा को आगे कर बनाये गये, बनाये जाते और बनाये जावेंगे। इसमें सुख, सुख के कारण; दुःख, दुःख के कारण और इनकी प्राप्ति वा त्याग के भिन्न-भिन्न होने वा नाना प्रकार होने और कर्त्ताओं के भेद से शास्त्र अनेक होते हैं। और नीच प्रकृति वालों ने जो वेदविरुद्ध पुस्तक बनाये जिनमें प्रायः तमोगुण सम्बन्धी विषयों का वर्णन है। वे भी दुःख और दुःख के साधनों को प्राप्त होने की इच्छा से बनाये गये ऐसा नहीं कह सकते क्योंकि सब कोई पुरुष अपने वा अन्य के लिये दुःख तथा दुःख के साधनों को नहीं चाहता। यद्यपि कोई दुष्ट नीच प्रकृति वाला मनुष्य अपने से प्रतिकूल अन्य के लिये दुःख वा दुःख के कारणों का सञ्चय करते हैं तो भी उसके लिये संसारी व्यवहार के लिये यत्न करते हैं किन्तु वैसी द्वेषबुद्धि रखकर शास्त्र बनाने से वह प्रयोजन सिद्ध होना सुगम नहीं प्रतीत होता। और जो दूसरे के मत खण्डन करना रूप उद्देश वा प्रयोजन को लेकर शास्त्र बनाया जाता है वहाँ भी अपने मत में दोष देने वाले हेतुओं के खण्डन से अपने दुःख का निवारण तथा अपने मत के गुणों के प्रकाशित करने से अपने को सुख पहुँचाना ही मुख्य प्रयोजन है। अर्थात् सब स्थलों में विचार कर देखा जाय तो अविद्याग्रस्त पुस्तक भी केवल किसी को दुःख मात्र पहुँचाने के लिये नहीं बनाये जा सकते। हां किसी समुदाय वा निज को उससे भले ही दुःख हो इसके अनेक कारण हो सकते हैं। अर्थात् सब शास्त्रों के बनाने वालों का मुख्य प्रयोजन वा विषय यही होता है कि कारणों के सहित दुःख को हटाकर सुख और सुख के साधन धनादि वस्तु प्राप्त हों। परन्तु अपना दुःख हटाकर सुख प्राप्ति का उपाय रचना सर्वत्र प्रधान रहता है, और जहाँ केवल परोकार दृष्टि से शास्त्र बनाया जाता है किन्तु उसमें किसी प्रकार के स्वार्थ का उद्देश नहीं रखा जाता वहाँ भी उस कर्म के द्वारा ईश्वर की व्यवस्था से शुभ फल की प्राप्ति होना ही स्वार्थ सिद्धि प्रयोजन है। यदि कहीं साधनों सहित सुख की प्राप्ति और दुःख को निर्मूल हटाने के लिये भी बनाया शास्त्र उस अंश में बनाने वाले के अविद्वान् होने से दुराचार का प्रवृत्त करने वाला ग्रन्थ हो जावे तो भी दुःख वा दुःख के साधनों को लेकर ग्रन्थ बनाया ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि ऐसा मन में रखकर कोई पुरुष बनाने के लिये प्रवृत्त नहीं होता इसलिये उक्त सिद्धान्त ही श्रेष्ठ है। और अज्ञानी लोगों के बनाये ग्रन्थों को शास्त्र भी इसलिये नहीं कह सकते कि वेदमूलक शिक्षा उनमें नहीं पायी जाती। और जहाँ-जहाँ वेदमूलक शिक्षा प्राप्त होती है, वहाँ-वहाँ सुखों की प्राप्ति और दुःखों के हटाने की इच्छा प्रकट दीख पड़ती है। इसलिये सब शास्त्रों का सामान्य कर सुखों की प्राप्ति और दुःखों के हटाने का कारण ही विषय वा प्रयोजन है। उसमें अवान्तर- भीतरी- अन्तरग् भेद बहुत हैं। सबके तुल्य इस मानव धर्मशास्त्र का भी सामान्य कर वही विषय है।

यद्यपि प्राणी और सुख-दुःखादि के साधनों के नाना प्रकार होने से विषयों के भी अनेक भेद होना सुगमता से ही कहा जा सकता है, तो भी सब शास्त्रों के तीन भागों में विभक्त होने से मुख्य विषय तीन ही हैं। सो न्यायसूत्र के भाष्य में वात्स्यायन ऋषि ने लिखा है कि “मन्त्र और ब्राह्मण का विषय यज्ञ, लोक के व्यवहार की व्यवस्था करना धर्मशास्त्र का विषय और संसारी मनुष्यों के वर्त्ताव वा चरित्रों का वर्णन करना वा इस जगत् की उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय का वर्णन करना इतिहास-पुराणों का विषय है।”१ इसका तात्पर्य यह है कि कर्म, उपासना और ज्ञान यही मुख्य कर वेद का विषय है। यज्ञ शब्द प्रत्येक कर्मादि के साथ सम्बन्ध रखता है। जैसे- विधियज्ञ, योगयज्ञ वा ज्ञानयज्ञ इत्यादि। योग और उपासना शब्द वास्तव में एकार्थ ही हैं। कर्म दो प्रकार का है- एक धर्म के लिये किया धर्मसम्बन्धी, द्वितीय शिल्प की सिद्धि के लिये धनसम्बन्धी कर्म है। यद्यपि इससे भिन्न अन्य कर्म भी कामादि के लिये होते हैं, तो भी मुख्य ये ही दो हैं। सब कर्म मन, वाणी और शरीर इन तीनों से ही उत्पन्न होते हैं। इसलिये उनके तीन भेद हैं। और सुख का हेतु शुभ कर्म तथा दुःख का हेतु अशुभ कर्म ये अन्य दो प्रकार हैं। वेदोक्त कर्म प्रायः सबका उपयोगी और स्मार्त्त कर्म वैदिक की अपेक्षा स्वार्थ साधक है। कर्म, उपासना और ज्ञान में सब विषय अन्तर्गत हैं। कोई इससे भिन्न विषय नहीं जिसका अन्य शास्त्र में विलक्षण वर्णन हो और इन तीनों का मूल वेद से है। इसलिये वेद सब विद्या और धर्मों का भण्डार है यह कहना सत्य है। ऐसा होने पर भी यदि कोई कहे कि फिर वेद से भिन्न धर्मशास्त्र का कौन विषय है ? तो उत्तर यह देना चाहिए कि वेद से भिन्न धर्मशास्त्र का विषय हमको इष्ट भी नहीं, किन्तु वेद से भिन्न उचित उपदेश का नाम धर्मशास्त्र है। जैसे मूल रूप व्याख्येय से व्याख्यान सदैव भिन्न और मिला रहता है, वैसे ही धर्मशास्त्र का विषय वेद से भिन्न-अभिन्न दोनों है। कर्म-उपासना-ज्ञानों से भिन्न कोई विषय धर्मशास्त्रों में नहीं है। इस कारण वेद से भिन्न विषय न हुआ। और कर्मादि के अवान्तर भेद होने से भिन्न है। इसी से यह व्यवहार करना बनता है कि यह श्रौत वा वैदिक तथा यह स्मार्त्त कर्म है। वेद में जो साक्षात् कहा गया वह वैदिक और वेद में जिसका मूल रूप से संकेत मात्र सूचना से उपदेश किया और स्मृतियों में जिसको कर्त्तव्य मानकर स्पष्ट विस्तार पूर्वक उपदेश किया वह स्मार्त्त कर्म कहा गया।

संसार में मनुष्य वेद की आज्ञा से विरुद्ध और उसके अनुकूल दोनों प्रकार से जगत् का प्रबन्ध चलाने के अर्थ कर्म कर सकता है। उसमें वेद की आज्ञा के पुष्ट करने वाले व्यवहार को करे, किन्तु किसी दशा में वेद से विरुद्ध आचरण न करे, यह धर्मशास्त्र का अभिप्राय है। क्योंकि यद्यपि वेद से विरुद्ध और अनुकूल दोनों प्रकार का व्यवहार हो सकता है, तो भी वेद के अनुकूल करने में कल्याण और विरुद्ध करने में अकल्याण वा दुःख प्राप्त होना सम्भव है। इसी विषय पर व्याकरण-महाभाष्यकार पतञ्जलि ऋषि ने भी लिखा है कि- एवं क्रियमाणमभ्युदयकारि भवतीति।1 अर्थात् वेद की आज्ञा के अनुकूल करना कल्याण का हेतु होता है। और इस प्रकार किया हुआ व्यवहार वेद के अनुकूल तथा इस प्रकार वेद से विपरीत होगा, यही विषय मुख्यकर धर्मशास्त्रों में वर्णन किया गया है। वेद के अनुकूल किया व्यवहार ही सुख का देने और दुःख का नाश करने वाला होता है।

अब एक शटा लोगों को और भी उपस्थित हो सकती है कि जब सब शास्त्र तीनों ही प्रकारों में हैं। जैसा कि पूर्व [श्रुति, स्मृति, इतिहासादि नाम से] लिखे गये, तो छह दर्शन२ और उपवेद३ आदि ग्रन्थों की क्या दशा होगी ? अर्थात् क्या षड्दर्शनादि शास्त्र नहीं, और हैं तो इनका विषय क्या है ? आजकल सामान्यकर शास्त्र शब्द के व्यवहार करने से मुख्य तो ये ही समझे जाते हैं, वेद तथा स्मृतियाँ वैसे शास्त्र नहीं समझे जाते ? इसका उत्तर यह है कि वेदार्थ का विशेष प्रचार करने के लिये वा वैदिक सिद्धान्त में पड़ने वाले विघ्नों को हटाने के लिये ऋषि-महर्षि- महात्मा लोगों ने जो-जो शास्त्र वेद का आशय लेकर परोपकारार्थ बनाये वे सब   धर्मशास्त्र वा स्मृति शब्द करके लोक में वा शास्त्रकारों की मार्यादा में प्रचरित हैं किन्तु मनुस्मृति आदि [कि जिनको आजकल लोग १८ वा २८ स्मृति कहते हैं] पद्य ग्रन्थों में स्मृति शब्द रूढि रूप से बंधा नहीं है, किन्तु कपिल की स्मृति सांख्य शास्त्र, योगस्मृति- पातञ्जल योगशास्त्र इत्यादि शब्दों से शटर स्वामी ने भी शारीरक मीमांसा में व्यवहार किया है। और वैसे ही अन्य सूत्रकार वा भाष्यकार स्मृति शब्द से व्यवहार करते ही हैं, यह बात विद्वानों को छिपी नहीं है। और मुख्य कर तो शास्त्र एक वेद है पर उसके व्याख्यान रूप भी ग्रन्थ स्मृति नामक शास्त्र है। इसलिये दो प्रकार के शास्त्र मुख्य कहे जाते हैं। एक श्रुति- वेद, द्वितीय स्मृति धर्मशास्त्र हैं। किन्तु इतिहास-पुराण वास्तविक शास्त्र नहीं हैं। किसी समयविशेष में उत्पन्न हुए मुख्य शिष्ट सज्जन पुरुषों का चरित्र वर्णन करने से इतिहास-पुराण किसी प्रकार साधारण बुद्धि वाले मनुष्यों को बोधित करते हैं। इससे वे सर्वथा व्यर्थ नहीं हैं। परन्तु उन इतिहासादि में जो धर्मसम्बन्धी उपदेश हैं वे यदि वेदमूलक हैं तो वे अंश धर्मशास्त्रों में अन्तर्गत हो जायेंगे। और यदि वेद से विपरीत हों तो वे अंश त्यागने योग्य हैं। यह सब विद्वानों वा शास्त्रकारों के सम्मत है।     धर्म का सेवन और अधर्म का त्याग करने वालों के लिये इतिहास-पुराण एक दृष्टान्त रूप हैं। अर्थात् सप्रयोजन होना हम खण्डित नहीं करते। अब इस सब कथन से सिद्ध हो चुका कि कर्म-उपासना-ज्ञान ही सामान्य कर सब शास्त्रों का विषय है। उन कर्मादि के उपदेश का मूल वेद है और ऋषियों के बनाये स्मृति नामक ग्रन्थ व्याख्यान रूप हैं। और इन कर्म-उपासना-ज्ञान को ही धर्म कहते हैं।

कब और किसने इस मनुस्मृति को पुस्तकाकार में बनाया ? पण्डित भीमसेन शर्मा

मनु कौन है इसका प्रतिपादन करके अब द्वितीय प्रकरण का विचार किया जाता है कि किस समय, किसलिये, किस पुरुष ने यह धर्मशास्त्र बनाया ? लोक में मनुस्मृति वा मानव धर्मशास्त्र नाम से यह पुस्तक प्रचरित है। इसका अभिप्राय यह है कि मनु अर्थात् ब्रह्मा ने सृष्टि के आरम्भ में सब वेदों का अनुसन्धान- पूर्वापर विचार करके संसार के व्यवहार की व्यवस्था करने और अच्छे आचरणों का प्रचार करने के लिये सूत्रादि रूप वाक्यों में धर्म का उपदेश किया, किन्तु उस समय कुछ भी विषय पुस्तकाकार से लिखा नहीं गया था। उस उपदेश को शास्त्र करके मानना वा कहना विरुद्ध इसलिये नहीं है कि शास्त्रशब्द का व्यवहार लेखनक्रिया की अपेक्षा नहीं रखता। महर्षि वात्स्यायन जी ने न्याय सूत्र के भाष्य में शास्त्र का लक्षण भी यही किया है कि ‘परस्पर सम्बन्ध रखने वाले अर्थसमूह का उपदेश शास्त्र है।’१ इससे लिखे वा छपे पुस्तक का नाम शास्त्र नहीं आता। मनु नाम ब्रह्मा जी ने वेद के अर्थ का अनुसन्धान करके वेद को मूल मानकर व्यवहार की व्यवस्था करने के लिये जो विचार किया वह मनुस्मृति कहाती है। और मनु नाम ब्रह्मा जी ने सृष्टि के आरम्भ में कहा मानव धर्म उसका उपदेश जिसमें है, वह पद और वाक्यादि रूप मानवधर्म शास्त्र कहाता है। अथवा मनु जी के अनुभव से सिद्ध हुआ मानवधर्म, वह जिसमें कहा गया, वह मानवधर्मशास्त्र कहाता है। प्रोक्तार्थ में प्रत्यय करने से प्रतीत होता है कि मानवधर्म का मूल वेद है। क्योंकि किसी सनातन धर्मशास्त्र का आश्रय लेकर शास्त्र बनाया जाय, उसी में प्रोक्त प्रत्यय होता है। इसी कारण प्रोक्ताधिकार२ के पीछे ‘कृते ग्रन्थे3 प्रकरण पाणिनि ने रखा है। और प्र उपसर्ग पूर्वक वचधातु४ से सिद्ध हुए प्रयोगों की पढ़ाने, प्रचार करने, विशेष लुप्त हुए शास्त्रों को निकाल कर चलाने और प्रकारान्तर से व्याख्यान कर सबको जताने, अर्थ में यथासम्भव प्रवृत्ति होती है। यह महाभाष्यकार पतञ्जलि महर्षि का आशय५ प्रोक्ताधिकार के व्याख्यान से प्रतीत होता है। ऐसा मानने से ही वेदों की संहिता के माध्यन्दिनीय और वाजसनेयी आदि नाम निर्दोष बन सकते हैं। अर्थात् माध्यन्दिन, वाजसनेय आदि ऋषियों के नाम से वेद की संहिताएं प्रसिद्ध हैं। इसका अभिप्राय यही है कि जिन-जिन ऋषि जनों ने उन-उन संहिताओं का विशेषकर अध्यापन वा उपदेश आदि द्वारा प्रचार कराया उन-उन के नाम से वे-वे पुस्तक प्रचरित हो गये। किन्तु उन पुस्तकों को ऋषियों ने बनाया नहीं। यदि प्रोक्त अधिकार को नवीन कृत्य माना जावे तो ‘कृते ग्रन्थे’ प्रकरण पुनरुक्त होने से व्यर्थ हो जावे, इस कारण प्रोक्त का वही अर्थ ठीक है कि जो ऊपर लिखा गया है।

पहले सृष्टि के आरम्भ में गुरु-शिष्य की निरन्तर चलने वाली परम्परा के साथ वाक्य, पद और मन्त्ररूप से ही वेदों के उपदेश का प्रचार चलता था। एक ने अपने गुरु से यथावत् सुनकर अन्य अपने शिष्यों को किया। इस प्रकार वेद और धर्मशास्त्र सम्बन्धी सूत्रादि रूप वाक्य सब पढ़ने-पढ़ाने वालों को कण्ठस्थ रहते थे। और शास्त्र के कण्ठस्थ होने से पढ़ने-पढ़ाने वालों को विद्या का जैसा ह्ल ल होना सम्भव है वैसा पुस्तकस्थ पाठ से नहीं हो सकता। इस पर किसी विचारशील पुरुष ने कहा है कि- ‘पुस्तक में पड़ी विद्या और पराये हाथ में गया धन, ये दोनों ही समय पर उपयोगी नहीं होते।’1 इससे विचारशीलों को जान लेना चाहिये कि कण्ठस्थ करना सर्वोत्तम है। ऐसा विचार के ही उस समय के लोगों ने लिखने की प्रवृत्ति नहीं चलाई थी। क्योंकि यदि पुस्तकें लिखी जावें तो विद्यार्थी ‘पुस्तकस्थ अपने पाठ को यथावकाश हम देख सकते हैं’, ऐसा मानकर शास्त्र को कण्ठस्थ न करेंगे, ऐसा विचार के लेखन प्रक्रिया का चलाना हानिकारक समझते थे। और यह कदापि कहना ठीक नहीं बनता कि उस समय के लोगों को लिखने का सामान नहीं मिला अथवा उनको लेखन क्रिया ज्ञात नहीं थी। क्योंकि वेद द्वारा परमेश्वर ने सब क्रियाओं का उपदेश पहले ही किया है।२ जैसी लिखने की परिपाटी इस समय है वैसी पहले न हो, यह हो सकता है, तो भी अभाव नहीं कह सकते। क्योंकि अभाव से भाव नहीं होता। किन्तु संसार के कार्यों का प्रकार बदलता रहता है। इसी के अनुसार पूर्वकाल में अन्य प्रकार का लिखना था। अर्थात् पुस्तकें नहीं लिखी जाती थीं, तो भी भित्ति आदि पर प्रतिबिम्ब रखना, वस्त्रों पर अनेक चित्र काढ़ना या छापना वा किसी में मोहर लगाना वा किसी को अटित करना इत्यादि सब काम लिखने के अन्तर्गत ही समझे जाते हैं। और जब पूर्वकाल सृष्टि के आरम्भ में ही अकारादि वर्णों की आकृति विद्वान् लोगों ने बनाई, तो ह्लि र लेखन- क्रिया नहीं थी, यह कहना ठीक नहीं, किन्तु अपने ही कथन को काटना है। अब यह प्रकरणान्तर है इसलिये इस पर विशेष न लिखकर मुख्य प्रकरण की बात करनी चाहिये। अर्थात् पहले सृष्टि के आरम्भ में शास्त्रों को पुस्तकाकार में लिखने की प्रवृत्ति नहीं थी, यह बहुत कारणों से प्रतीत होता है।

सृष्टि के आरम्भ में शास्त्र भी बहुत नहीं थे, किन्तु वेद से भिन्न कोई ही शास्त्र बना था, उन थोड़ों का कण्ठस्थ करना भी सहज ही था। और जो वेद से भिन्न धर्मसूत्रादि रूप से शास्त्र बने थे, वे छोटे-छोटे थे, इस कारण उनका कण्ठस्थ करना सुलभ था। पीछे जब धीरे-धीरे समय के अनुसार व्यवहार चलाने और वेद के आशय का विशेष प्रचार कराने के लिए आवश्यकता के अनुसार विद्वान् लोगों ने अन्य शास्त्र बनाये तब अनेक शास्त्रों के बढ़ जाने से कण्ठस्थ करना दुस्तर था, इस कारण क्रमशः विद्याधर्मादि का न्यून सेवन हो सकने की शटा से आगे होने वाले शक्तिहीन पुरुषों के उपकार के लिए बने हुए शास्त्र पुस्तकाकार किये गये।१ पहले समय में सत्त्व गुण के प्रचार की अधिकता से रजोगुणी पुरुष बहुत नहीं थे।२ और सत्त्वगुणी पुरुषों का यह स्वाभाविक धर्म है कि वे अपना नाम प्रसिद्ध करने के लिए विशेष प्रयत्न न करके अन्य प्रथमोपदेष्टा पुरुषों के नाम से ही अपने निमित्तमात्र कामों को भी प्रचरित करते थे। वैसे ही यह मनुस्मृति सृष्टि के आरम्भ में सूत्रादिस्थ वाक्यरूपों से मनु जी ने उपदेश की, उसके पीछे भृग जी ने अपने शिष्यों को उपदिष्ट की और भृगु जी ने ही पद्यरूप से क्रमबद्ध आकार में बनायी।

कोई लोग कहते हैं कि भृगु के किसी शिष्य ने यह पुस्तक बनाया और ऐसा मानने पर ही ‘स्वयम्भुवे0’ [अमित तेज वाले स्यम्भू ब्रह्मा जी को नमस्कार करके, मनु के द्वारा प्रणीत विविध शाश्वत धर्मों को कहूँगा।] यह प्रारम्भ में धरा गया किन्हीं-किन्हीं पुस्तकों में प्राप्त होने वाला श्लोक सार्थक हो सकता है। सो यदि इस पक्ष को सत्य माना जावे कि भृगु के किसी शिष्य का बनाया यह मनुस्मृति पुस्तक है, तो जिनका मत है कि भृगुप्रोक्त यह संहिता है, वह विरुद्ध पड़ेगा। और यह श्लोक भी सब पुस्तकों में नहीं मिलता। इससे इसका एकदेशी होना सिद्ध ही है। तथा व्यूलर ने भी यही कहा है कि कहीं-कहीं मिलने वाला यह श्लोक पीछे किन्हीं लोगों ने मिलाया है। यदि यह श्लोक पहले से होता तो सब पुस्तकों में मिलना चाहिए था। इससे अधिकांश सम्मति के अनुसार मेरी भी सम्मति यही है कि यह पुस्तक भृगु का बनाया है और ‘स्वयम्भुवे0’ यह श्लोक किन्हीं का पीछे से मिलाया हुआ है। भृगु के द्वारा बनाया होने पर भी सृष्टि के आरम्भ में मनु ही इस धर्म के आशय के प्रवर्त्तक हैं, कि जिसको मैंने श्लोकबद्ध किया। मेरा कुछ इनमें नवीन कृत्य नहीं, ऐसा मन में विचार के उन्होंने मनु के नाम से ही प्रचरित की, और यह बात सत्य भी है। क्योंकि ऐसा होने पर ही वेदों को ईश्वर का वाक्य कह सकते हैं अर्थात् ईश्वर का ज्ञान मात्र वेद हैं, उसने पुस्तकाकार वेद नहीं बनाये। किन्तु महर्षि लोगों ने पुस्तकाकार किये हैं। तो भी परमात्मा से वेद उत्पन्न हुए, ऐसा कहा वा माना जाता है। किन्तु किसी महर्षि ने वेद बनाये, ऐसा प्रसिद्ध नहीं। इसी प्रकार मनु नामक ब्रह्मा ने इसका स्मरण किया और भृगु ने विशेषदशा में पद्यरूपाकार से बनाया। तो भी जैसा मनु ने स्मरण किया था, वही आशय पुस्तकाकार में लाया गया, इसलिये इस पुस्तक को मनुस्मृति कहना वा मानना ठीक ही है, किन्तु निरर्थक नहीं। तथा अन्य स्मृतियों का पीछे बनना, आधुनिक होना, उन-उन के आशयों और उनमें इसी का अनुवाद दीख पड़ने से प्रतीत होता है। और यह मनुस्मृति पुरानी है, तो भी जहां-तहां बीच-बीच में इतिहासादि सम्बन्धी अनेक श्लोक किन्हीं मतवादियों ने मिला दिये हैं, इससे अत्यन्त नवीन प्रतीत होती है। ऐसी ही बातों को देखकर व्यूलर साहब को भी भ्रान्ति हो गई, जिससे उन्होंने इसको अतिनवीन ठहराया है। उनको भ्रान्ति होने में अनुमान से यह भी कारण जान पड़ता है कि जैसे ईसाई मत अतिनवीन है, इससे थोड़ा इधर-उधर तक का समाचार उन्होंने लगा पाया है। जैसे दो-तीन सहस्र वर्ष से पूर्व हमारे मत या कुटुम्ब के नाम तक का पता नहीं, वैसे ही अन्य भी कोई मत पहले नहीं था। इन लोगों के मत वा सिद्धान्त से चार, पांच वा छह सहस्र वर्षों के पूर्व सृष्टि भी नहीं थी और न कोई शास्त्र था। परन्तु यह उन लोगों का विचार ठीक नहीं, क्योंकि इस आर्यावर्त्त देश में सूर्यसिद्धान्त नामक एक पुस्तक है जो वर्तमान इस चतुर्युगी के त्रेतायुग में बनाया गया। उसमें स्पष्ट लिखा है कि इस अट्ठाईसवीं चतुर्युगी में से अब तक केवल सद्युग बीत गया। उस पुस्तक को बने कई लाख वर्ष बीत गये। इसी प्रकार उससे भी अत्यन्त प्राचीन पुस्तकें इस देश में हैं। तथा काल का परिमाण, काल के अवयवों का वर्णन और कल्प तथा प्रलयादि का वर्णन सूर्यसिद्धान्तादि आर्यों के पुस्तकों में मिलता है। उससे सिद्ध है कि इस सृष्टि को उत्पन्न हुए अरब से ऊपर-ऊपर वर्ष बीत चुके हैं। तब से लेकर क्या मनुष्य विद्या, धर्म आदि से रहित ही थे, और ऐसा कथन कोई बुद्धिमान् मान सकता है ? कदापि नहीं। यदि कोई सनातन ईश्वर माना जावे, तो उसने सृष्टि के आरम्भ में ही मनुष्यों को कुछ ज्ञान दिया, ऐसा मानना चाहिये। अन्यथा परमेश्वर में दोष आवेगा। और परमेश्वर के किसी काम में भूल है नहीं। इससे सिद्ध हुआ कि मनुस्मृति भी सृष्टि के आरम्भ से ही रूपान्तर में थी, वह कुछ काल पीछे भृगु ने पद्यरूप में बनायी। तब मनु जी के अभिप्रायानुकूल होने से मनुस्मृति नाम रखा गया। इस आर्यावर्त्त देश में पहले श्लोक बनाने की परिपाटी वा ज्ञान नहीं था यह भी किसी का मानना वा कहना सम्भव नहीं। क्योंकि वेद में सब प्रकार की छन्दरचना प्रत्यक्ष दीखती है। जब वेद में परमेश्वर ने श्लोक बनाने की प्रक्रिया पहले ही दिखा दी है, तो उन्हीं वेदों के पढ़ने-पढ़ाने-जानने और प्रचार करने वाले ब्रह्मादि लोग श्लोक-रचना की रीति न जानते हों, यह कदापि सम्भव नहीं। परन्तु यह सत्य है कि प्रायः उस समय के लोग आजकल के तुल्य श्लोक-रचना नहीं करते थे। उसका अभिप्राय यह था कि बहुत अर्थ जिसमें से निकले ऐसा छोटा शास्त्र बने, ऐसी लाघवबुद्वि से थोड़े अक्षरों तथा गम्भीर वा बहुत अर्थ वाले सूत्ररूप ग्रन्थों को प्रायः रचते थे। जिससे विद्यार्थी लोग ब्रह्मचर्य आश्रम के समय में ही सब शास्त्रों को पढ़ सकें। पर तो भी सर्वथा पद्यरचना का अभाव नहीं था, अर्थात् कोई-कोई श्लोकबद्ध भी शास्त्र बनाते थे। जैसे भृगु जी ने यह स्मृति बनायी वा जैसे त्रेतायुग में सूर्यसिद्धान्त पद्यरूप से बनाया गया। अब यह सिद्ध हो गया कि सृष्टि के आरम्भ में वेद के आश्रय से सांसारिक व्यवहार को ठीक व्यवस्था चलाने के लिये सूत्रादि वाक्यरूपों से मनु जी ने इस स्मृति का उपदेश किया, उसके पीछे भृगु ने श्लोकरूप से बनाया। जैसे इस समय बनने वाले पुस्तकों में संवत्सर का नाम रखा जाता है कि अमुक संवत् में अमुक पुरुष ने यह पुस्तक बनाया, वैसी परिपाटी पहले नहीं थी और कदापि हो तो भी किन्हीं लोगों ने पीछे नष्ट कर दी। इसी से किस संवत् में यह पुस्तक बना, यह कहना नहीं बन सकता। तो भी अनुमान से हम जान सकते हैं कि इस कल्प में संसार की उत्पत्ति होने के पश्चात् परमेश्वर से वेद का उपदेश पाकर अन्य शास्त्र बनने से पूर्व ही मनु जी ने पहले इस धर्मशास्त्र का उपदेश किया। उस समय यह धर्मशास्त्र पुस्तकाकार से नहीं लिखा था। पीछे अनुमान से दो सौ वर्ष के भीतर भृगु जी ने श्लोक रूप से बनाया। उसके पीछे कुछ काल बीतने पर किन्हीं अन्य ऋषि लोगों ने पुस्तकाकार किया। उससे पूर्व श्लोकरूप का ही निरन्तर चलने वाली गुरु-शिष्य की पठन-पाठन प्रणाली से प्रचार था। और प्रचार के अनुसार ही पहले लिखी गयी। पीछे कहीं-कहीं बीच में किन्हीं लोगों ने कुछ-कुछ मिला दिया यही इस प्रसग् में मुख्य और दृढ़ सिद्धान्त है।

और यदि किसी प्रकार व्यूलर साहब आदि के कहने के अनुसार किसी ने दो सहस्र वर्ष के भीतर ही इस धर्मशास्त्र को बनाया, ऐसा सिद्धान्त ठीक हो तो भी हमारा मत यह है कि यदि इस पुस्तक में अन्य स्मृतियों की अपेक्षा गम्भीराशय के साथ पक्षपात को छोड़ के वेदानुकूल वर्णाश्रमादि धर्म का वर्णन किया गया है और अन्य-अन्य प्राप्त होने वाली स्मृतियों में वैसा धर्म का उपदेश नहीं प्राप्त होता है तो वेद के अनुकूल होना ही इस मानवधर्मशास्त्र की उत्तमता में हेतु होगा। यह सब सज्जनों का मत है कि जो वेदानुकूल है, वही श्रेष्ठ है। और यदि किसी प्रकार इसका नवीन बनना सिद्ध हो जावे, तो भी मनुस्मृति नाम रखना विरुद्ध नहीं है। क्योंकि कारण के बिना जब कोई कार्य नहीं होता तो मनु जी ने उपदेश किया सूत्रादि वाक्याकार पुरातन धर्म गुरु-शिष्य की परम्परा से प्रचरित चला आता था, उसी के आश्रय से किसी विद्वान् ने श्लोकरूप से बनाया उसमें भी आदि कर्त्ता मनु की प्रधानता से मनुस्मृति कहना सम्भव है। और इसको आधुनिक मानना हमारा पक्ष नहीं है किन्तु अन्य लोगों के समयानुसार किसी प्रकार कोई इसको आधुनिक मान लें तो भी समूलक वा वेदमूलक होने से प्रशंसा के योग्य अवश्य माननी चाहिये, यह अभिप्राय है। और मैंने तो अपनी सम्मति पूर्व ही लिख दी है।

वे मनु कौन थे जिन्होंने इस धर्मशास्त्र का उपदेश किया ? पण्डित भीमसेन शर्मा

वे मनु कौन थे, जिन्होंने सबसे पहले धर्मशास्त्र का उपदेश मनुष्यों को दिया ? इस विषय में- मनु नामक कोई निज (खास) मनुष्य थे जो वेद की अनेक शाखाओं के पढ़ने, जानने और उनमें लिखे अनुसार आचरण करने में तत्पर और स्मृतियों की परम्परा से प्रसिद्ध हैं, यह मेधातिथि का लेख है। कुल्लूक भट्ट कहते हैं कि सम्पूर्ण वेदों के अर्थ आदि का मनन, विचार करने से उनका नाम मनु हुआ। नन्दन कहते हैं कि स्वायम्भुव का नाम मनु है। और गोविन्दराज ने लिखा है कि सम्पूर्ण वेद के अर्थ आदि को जानने से मनु संज्ञा को प्राप्त हुए, शास्त्रों की परम्परा से सब विद्वान् जिनके नाम को बराबर सुनते, जानते आये और परमेश्वर ने संसार की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करने के लिए जिनको नियत किया, ऐसे महर्षि का नाम मनु था। और व्यूलर साहब (इंग्लेण्ड देश निवासी जिन्होंने अंग्रेजी में मनुस्मृति पर भाष्य किया है) लिखते हैं कि कहीं तो ब्रह्मा का पौत्र मनु लिखा, कहीं मनु को प्रजापति माना गया, तथा कहीं (७.४२) मनु नाम राजा था ऐसा लिखा है, और कहीं (१२.१२३) मनु को साक्षात् ब्रह्म करके लिखा है, इसी मनुस्मृति में, ऐसे परस्पर विरुद्ध अनेक प्रकार के लेख हैं, जिससे यह निश्चय हो सकना कठिन है कि इस धर्मशास्त्र का बनाने वाला मनु कौन था। परन्तु व्यूलर साहब ने आगे यह भी लिखा है कि इस देश में सर्वोपरि धर्म का जानने वाला कोई मनु पहले हुआ जिसके नाम से ही धर्म की प्रशंसा चली आती है।

इस प्रसग् में इत्यादि प्रकार के लेख अलग-अलग लोगों के मिलते हैं, जिनमें सबकी एक सम्मति नहीं जान पड़ती। इस विषय में मैं अपनी सम्मति से निश्चय सिद्धान्त लिखता हूं, उसको सुनना चाहिये। सृष्टि के प्रारम्भ में पहले कल्प के अच्छे संस्कारों से जिनका आत्मा शुद्ध था, पहले जन्मों में अभ्यास की हुई विद्या से वेदार्थ के जानने में जिनकी बुद्धि तीव्र थी, पहले कल्प में सेवन किये पुण्य के समुदाय से जिनका अन्तःकरण शुद्ध था, इसी कारण तेजधारी चारों वेदों के ज्ञाता, सब संसार और परमार्थ के कर्त्तव्य को ठीक-ठीक जानने वाले मनुष्यों में सूर्य के तुल्य तेजस्वी तपस्या और योगाभ्यास करने में तत्पर विचारशील मनु नामक महर्षि हुए, उन्हीं का दूसरा नाम ब्रह्मा भी था, यह बात अनेक प्रमाणों वा कारणों से निश्चित सिद्ध है। इसी कारण उन मनु का स्वायम्भुव नाम भी विशेष कर घटता है, क्योंकि स्वयम्भू नाम परमेश्वर का इसलिए माना जाता है कि वह सृष्टि रचने के अर्थ स्वयमेव प्रकट होता है, अर्थात् सृष्टि के लिए उसको कोई प्रेरणा वा उद्यत नहीं करता। प्रलयदशा में रचना के सम्बन्धी कार्यों के न रहने से रचने से पहले रचना के आरम्भ का उद्योग करना ही उसका प्रकट होना कहाता है। इसी से उसको स्वयम्भू कहते हैं। चारों वेदों के जानने वाले देहधारी मनुष्य का तो स्वयम्भू नाम नहीं हो सकता, क्योंकि उस ब्रह्मा की उत्पत्ति परमेश्वर से अनेक ग्रन्थों में दिखाई गई है। यदि उन ब्रह्मा की स्वयमेव उत्पत्ति होती, तो परमात्मा के बिना अन्य मनुष्यादि की भी उत्पत्ति हो सकना सम्भव है (इस प्रसग् में अनेक लोगों का ऐसा मत है कि परमात्मा ने स्वयमेव ब्रह्मरूप बनकर संसार को उत्पन्न किया। इस अंश पर यहां विशेष विचार इसलिए नहीं लिखता कि यह प्रकरणान्तर है, और प्रकरणान्तर पर विचार चल जाने से मुख्य प्रकरण छूट जाता है, परन्तु इतना अवश्य कहता हूं कि परमेश्वर परस्पर विरुद्ध दो धर्मों को धारण कभी नहीं करता, वह सदा निराकार है, साकार कभी नहीं होता। वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वभाव है, कभी शरीरादि में बद्ध नहीं होता, इसीलिये वेद में उसको अकाय१ लिखा है। तथा योगभाष्य में व्यास जी ने लिखा है कि- ‘वह सदैव मुक्त और सदा अनन्तशक्ति रहता है’२, शरीर धारण करे तो मनुष्यों के तुल्य शरीर में बद्ध और अल्पशक्ति अवश्य हो जावे, क्योंकि शरीर के परिच्छिन्न वा अन्तवाला होने से शरीर कदापि अमर्यादशक्ति वाला नहीं हो सकता। इत्यादि कारणों से स्वयम्भू का वैसा अर्थ करना ठीक नहीं हो सकता। किन्तु वही अर्थ ठीक है जो पूर्व लिखा गया) और परमेश्वर के बिना यदि अन्य मनुष्यादि की उत्पत्ति हो जावे, तो निरीश्वरवाद भी आ सकता है, क्योंकि फिर किसी ईश्वर की आवश्यकता नहीं रहेगी। और ब्रह्मा को मनु मानने से ही प्रथमाध्याय के इक्यावनवें (५१) श्लोक पर पं॰ नन्दन का किया व्याख्यान अच्छा प्रतीत होता है। क्योंकि वहां अचिन्त्यपराक्रम शब्द से नन्दन ने परमेश्वर का ग्रहण किया है तथा अन्य भाष्यकारों की सम्मति से ब्रह्म का ग्रहण होना प्रतीत होता है। परन्तु परमेश्वर का ग्रहण होना ही अति उचित है, इसी से मनु नाम ब्रह्मा का रचने वाला परमेश्वर हो सकता है। और यदि किन्हीं लोगों के मतानुसार चार वेदों के जानने वाले देहधारी ब्रह्मा का पौत्र मनु माना जावे तो परमेश्वर ने मनु को उत्पन्न किया, यह कहना व्यर्थ हो जायगा। क्योंकि मनु ब्रह्मा के पौत्र हुए तो उनके उत्पादक पिता विराट् हुए। यदि कहा जावे कि परमेश्वर ही सबको जन्म-मरण देता है, इस कारण ब्रह्मा का पौत्र होने पर भी परमेश्वर ने उत्पन्न किया, कह सकते हैं और पिता निमित्तमात्र है तो ठीक है, परन्तु मनु को ही परमेश्वर ने उत्पन्न किया, यह कैसे ? क्या अन्यों को नहीं किया और उस श्लोक का यह तात्पर्य नहीं हो सकता, क्योंकि वहां मैथुनी सृष्टि का प्रसग् नहीं है, किन्तु ईश्वर ने जैसे सबको रचा वैसे ही मुझको भी बनाया, यह कथन है। इसलिए ब्रह्मा का ही नाम मनु रखना उचित है, क्योंकि उस पक्ष में यह कोई विवाद नहीं उठता। और अचिन्त्यपराक्रम शब्द से जो भाष्यकार लोग ब्रह्मा का ग्रहण करना चाहते हैं, उनके मत में देहधारी ब्रह्मा से परमात्मा में कुछ विशेषता सिद्ध नहीं हो सकती, क्योंकि जब ब्रह्मा ही अनन्तशक्तिधारी हो गये तो उनके उत्पादक पिता में क्या अधिकता रही, और शरीरधारी का अनन्तशक्ति होना ठीक भी नहीं अर्थात् असम्भव है। तथा भाष्यकारों के सम्पूर्ण वेद को जाने से वा मनन करने से मनु नाम हुआ इत्यादि वचन ब्रह्मा को ही मनु मानने पर सार्थक हो सकते हैं। क्योंकि सृष्टि के आरम्भ में ही एक साथ सम्पूर्ण वेदार्थ को जानने, समझने वाले दो पुरुष नहीं हो सकते।

तथा प्रजापति शब्द भी ब्रह्मा का विशेषण प्रायः दीख पड़ता है, सो ब्रह्मा को मनु मानने पर मनु का विशेषण प्रजापति सहज में हो सकेगा। अन्यथा सन्देह पड़ना सम्भव है कि दोनों का नाम प्रजापति क्यों रखा गया ? ब्रह्मा को प्रजापति इसलिए कहा गया कि वे विद्या और धर्म की व्यवस्था चलाकर प्रजा की रक्षा करते थे। वेद के अर्थ की वृद्धि अर्थात् प्रचार बढ़ाने से ब्रह्मा और वेद के आशयों का अन्तःकरण में मनन करने से एक ही पुरुष का मनु नाम जगत् में विख्याति को प्राप्त हुआ। एक वस्तु के अनेक नाम होना लोक में भी प्रसिद्ध ही है। अर्थात् यह शटा नहीं हो सकती कि एक के दो नाम क्यों रखे गये ? एक वस्तु के अनेक नाम अनेक गुणों के होने से रखे जाते तथा उन एक-एक नामों से उस-उस प्रकार के गुण लोकव्यवहार में जताये जाते हैं। इसी धर्मशास्त्र में जो वचन इस सिद्धान्त से विरुद्ध जान पड़ेंगे उनका समाधान यथावसर किया जायगा।

एक शब्द एक ही वस्तु का वाचक हो यह भी नियम नहीं दीखता। जैसे देवदत्त संज्ञा बहुत मनुष्यों की एक समय वा समयान्तर में हुई, होती और होगी। इसी प्रकार मनु यह नाम अन्य वाच्य पुरुषों का भी हुआ है और होगा। वाच्य वस्तुओं के उत्पत्ति-विनाश धर्मयुक्त होने से नाम भी पहिये के तुल्य लौट-पौट होते रहते हैं। मनु नामक कोई राजा भी हुआ। जिसका नाम इसी पुस्तक के सप्तमाध्याय१ में आया है। यदि वेद में मनु नाम राजा का आवे तो वहां मनु नामक परमेश्वर ही राजा माना जाएगा। क्योंकि इसी पुस्तक के अध्याय बारह में मनु नाम परमेश्वर का आया है कि उसी एक सर्वनियन्ता के मनु, अग्नि और प्रजापति आदि नाम हैं।२ सब चराचर जगत् को तात्त्विक रूप से जानता है इसलिए उसका नाम मनु है। ऐसा मानकर ही मनु शब्द से मनुष्य और मानुष शब्द बने हैं “मनोर्जातावञ्यतौ षुक् च”3 इस पाणिनिकृत सूत्र में अपत्य अर्थ अपेक्षित नहीं है, किन्तु जाति होने से सिद्ध शब्द रुढ़ि माने जावेंगे। उनमें स्वरादि का ज्ञान कराने के लिए जिस किसी प्रकार सिद्धि दिखाई है। उस सिद्धि करने का अभिप्राय यह है कि मनु नामक परमेश्वर ने विचार करने की सामग्री से धर्म-अधर्म का विवेक करने के लिए रचा समुदाय मनुष्य वा मानुष जाति कहाती है।४ अपत्य अर्थ की यहां अपेक्षा नहीं, यह काशिकाकार जयादित्य5 आदि का भी सम्मत है। यदि आदि पुरुष देहधारी मनु से मनुष्य अर्थ में प्रत्यय है, ऐसा किसी का मत हो तो अपत्य अर्थ में प्रत्यय की उत्पत्ति अवश्य माननी चाहिए। सो यह सृष्टि के आरम्भ में परमेश्वर की ओर से यदि एक ही कोई पुरुष उत्पन्न किया गया माना जावे तो उसी के सन्तान सब आगे होने वाले प्राणी हों। इस प्रकार मानने से मनुष्य और मानुष शब्द जातिवाचक मनु के सन्तान सार्थक हो सकते हैं। परन्तु यह वेद से विरुद्ध है। अथर्ववेद6 में लिखा है कि पितृ, देव, मनुष्य, पशु आदि अनेक-अनेक प्राणी परमेश्वर से प्रथम उत्पन्न हुए। इसी प्रकार अन्य वेदों7 में भी सैकड़ों प्रमाण मिलते हैं, कि जिनमें परमेश्वर से बहुत मनुष्यादि की उत्पत्ति स्पष्ट दिखायी गयी है। और उपनिषदों8 में भी स्पष्ट लिखा है कि उस परमेश्वर से अनेक प्रकार के सूर्य, चन्द्रमादि देव अनेक मनुष्य, पशु और पक्षी आदि उत्पन्न हुए। इससे यह सिद्ध और सत्य है कि सृष्टि के आरम्भ में बहुत से मनुष्यादिकों की एक साथ उत्पत्ति हुई। और विचारपूर्वक ध्यान देने से भी यही प्रतीत होता है कि परमेश्वर ने प्रत्येक वस्तु आरम्भ में अनेक बनाये। यदि एक वस्तु वा मनुष्य को बनाता तो इतनी बड़ी पृथिवी पहले शून्य ही होती और एक मनुष्य से इतनी वृद्धि भी लाखों वर्षों में नहीं हो सकती। जैसे एक मनुष्य से कुछ सृष्टि बढ़ेगी वैसे जन्म के साथ मरण भी लगा है, ह्लि र ऐसी दशा में सप्तद्वीपा वसुमती१ पर एक मनुष्य के सन्तानों का इतना फैलाव होना दुस्तर है। इसलिए अनेक मनुष्यों की उत्पत्ति प्रारम्भ में मानना ठीक सिद्ध है। और जब यह सिद्ध हो चुका कि सृष्टि के आरम्भ में बहुत मनुष्य रचे गये तो मनु नामक पुरुष के सन्तानों की ही मनुष्य संज्ञा हो, अन्य के सन्तानों की न होनी चाहिये सो यह कदापि ठीक नहीं हो सकता कि किसी गोत्र के पुरुष ही मनुष्य कहावें और सबका नाम मनुष्य न पड़े। इसलिए सृष्टि के आरम्भ में एक साथ बहुत मनुष्यादिकों की उत्पत्ति हुई, यह वेदोक्त सिद्धान्त ही ठीक है और परमेश्वर के वाची मनु शब्द से ही मनुष्य, मानुष शब्दों का बनना ठीक है। और जहां पुरुष वाचक मनु शब्द से अपत्य अर्थ में प्रत्यय होता है तब “तस्यापत्यम्”2 इस पाणिनीय सूत्र से अण् प्रत्यय होकर मनु के सन्तानों का नाम मानना पड़ता है। ऐसा होने पर जो लोग मनुष्य का पर्यायवाची मानकर मानव शब्द का प्रयोग करते हैं, वहां अज्ञान ही कारण जान पड़ता है। क्योंकि मनुष्य शब्द के तुल्य मानव शब्द जातिवाचक नहीं है। किन्तु सृष्टि के आरम्भ में वा पीछे हुए मनु नामक पुरुष के कुल में उत्पन्न हुए पुत्र-पौत्रादि का नाम मानव हो सकता है। कोशकारों3 ने भी अपने-अपने पुस्तकों में मानव शब्द को मनुष्य पर्याय बुद्धि से रखा है, इसलिए वहां भी भ्रान्ति ही जाननी चाहिये। जाति अर्थ में अण् और यत् प्रत्यय के ही विधान करने से मानव शब्द में अजाति में अण् प्रत्यय का होना अर्थापत्ति से ही सिद्ध है। और जो मानव शब्द धर्म या धर्मशास्त्रादि का विशेषण है, वहां “तस्येदम्”4 सूत्र से सामान्य सम्बन्धार्थ में अण् प्रत्यय जानना चाहिए। मनु शब्द साधारण मनुष्य का भी नाम हो सकता है, यह लिख भी चुके हैं। अधिकांश में इसी पक्ष का आश्रय लेकर महाभाष्कार ने यह कारिका पढ़ी है कि-

अपत्ये कुत्सिते मूढे मनोरौत्सर्गिकः स्मृतः।

नकारस्य च मूर्द्धन्यस्तेन सिध्यति माणवः।।5

‘मनु शब्द से निन्दित अपत्य अर्थ में अण् प्रत्यय और नकार को मूर्द्धन्य णकारादेश हो जाता है। जिससे माणव शब्द बनता है।’ इससे मनु नामक पुरुष के निन्दित सन्तान की माणव संज्ञा है। मानव शब्द किसी प्रकार गोत्र जाति के तुल्य अवान्तर जाति का वाचक हो जावे तो कभी एक प्रकार की उत्पत्ति वाले एक जाति कहाते हैं, जैसे मनुष्य, पशु, पक्षी आदि इस जातिलक्षण को मानकर सिद्ध किये मनुष्य, मानुष शब्दों की अपेक्षा मानव शब्द का जातिवाचक नहीं होना ही कह सकते हैं।

और यदि माणव शब्द में परमेश्वरवाची मनु शब्द से ही निन्दित अपत्य अर्थ में अण् प्रत्यय हो तो भी कोई दोष नहीं। इसी प्रकार मनुष्य, मानुष शब्दों से भी अपत्य अर्थ मानने पर भी दोष नहीं। क्योंकि हम सब उसी सर्वशक्तिमान् परमात्मा के सन्तान ही हैं। वह हमारा पिता है, सृष्टि के आरम्भ में हम सबको उसी ने उत्पन्न कर रक्षा की, उस समय वही हमारा माता-पिता था, इस कारण उत्पादक और रक्षक होने से वह सबका पिता है। ऋग्वेद के प्रथम मण्डल1 के अस्सीवें सूक्त के सोलहवें मन्त्र में ‘मनुष्पिता’ इत्यादि शब्दों से सब चराचर जगत् का पिता मनु है, ऐसा स्पष्ट कहा है। इसी प्रकार अन्य शाखा ब्राह्मणों2 में भी सैकड़ों प्रमाण ऐसे मिलते हैं, जिनसे सबका उत्पादक मनु नामक परमात्मा ही सिद्ध होता है।

उस परमेश्वर की सृष्टि में सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म आदि का सामान्य प्रकार से मनन करने वाले स्त्री-पुरुष मनुष्य और अपने कर्त्तव्य से पतित हुए, निन्दित मनुष्य माणव कहाते हैं। ऐसा होने पर कोशकर्त्ताओं3 ने माणव शब्द को बालक का पर्याय वाचक कहा है सो उनका लेख प्रामादिक प्रतीत होता है, क्योंकि बालकों को निन्दित इसलिये नहीं ठहरा सकते कि जो उस काम के करने में समर्थ होकर न करे, वह निन्दित कहाता है परन्तु बालक लोग धर्म-अधर्म का विवेक करने का सामर्थ्य ही नहीं रखते, इसलिये माणव शब्द का प्रयोग धर्महीन पशुओं के समान वर्त्ताव करने वाले निन्दित मनुष्यों में करना चाहिए। कोई कहे कि बालक भी अज्ञानी का नाम है, वैसे माणव भी मान लिया जाय तो यह किसी प्रकार बन सकता है, परन्तु बालक शब्द अज्ञानी का वाचक वास्तव में नहीं, किन्तु गौण प्रयोग है कि बालक भी अज्ञानी होता है। इसलिये जवान होकर भी अज्ञानी रहे, तो बालक के तुल्य अज्ञानी वा अनधिकारी माना जाता है।४ इस प्रकार यहां माणव शब्द बालक के साथ गौणार्थ में भी नहीं लिया जा सकता, क्योंकि बालकों का निन्दित होना स्थिर नहीं और कोई बाल्यावस्था में निन्दित होकर भी आगे सम्हल जाते हैं, इस कारण निन्दित कहना ठीक नहीं और वही पूर्वोक्त पक्ष ठीक है। इस उक्त प्रकार से समय और अवसर के अनुसार बहुतों का नाम मनु आता है। परन्तु जो धर्म की व्यवस्था करने वालों में सबका गुरु धर्म के उपदेशकों में मुख्य मनु हुआ उसी का नाम ब्रह्मा भी था। मैत्रायणीय ब्राह्मणोपनिषद्5 और तैत्तिरीय कृष्णयजुःसंहिता1 में मनु और ब्रह्म एक ही के नाम हैं, यह स्पष्टता से दिखाया गया है। इसलिये विद्वान् लोगों को विचारना चाहिये कि पहले हुए शिष्ट लोगों के अनुकूल यह सिद्धान्त है। किन्तु मैंने नवीन कल्पित नहीं मान लिया है। यदि कोई कहे कि यहां स्मृति के प्रसग् मे भी ब्रह्मा नाम से ही व्यवहार क्यों नहीं किया गया, जिससे सन्देह ही न होता ? इसका उत्तर यह है कि उस पुरुष ने वेद के अर्थ का मनन, स्मरण किया, इससे मनु नाम रखा गया। शटा के भय से कोई काम रोके नहीं जाते। जिस-जिस का सेवन किया जाता वा शास्त्र बनाया जाता है उन सबमें थोड़ी बुद्धि वालों को सन्देह हुआ करते हैं, विद्वान् लोग ओषधि से रोग के तुल्य सिद्धान्तरूप वचनों से सन्देहों को निवृत्त कर देते हैं। और मनुस्मृति का ब्रह्मस्मृति नाम भी है, परन्तु उसका विशेष प्रचार उस नाम से नहीं है। अब यह सिद्ध हो गया कि मनु नाम से प्रसिद्ध ब्रह्मा है, उसी ने इस धर्मशास्त्र का उपदेश सृष्टि के आरम्भ में किया। इसलिए यह विषय समाप्त हो जाता है।

मानवधर्म शास्त्र का सार: पण्डित भीमसेन

विद्या यस्य सनातनी सुविमला, दुःखौघविध्वंसिनी।

वेदाख्या प्रथितार्थधर्मसुगमा, कामस्य विज्ञापिका।

मुक्तानामुपकारिणी सुगतिदा, निर्बाधमानन्ददा।

तस्यैवानुदिनं वयं सुखमयं भर्गः परं धीमहि।।1।।

यस्माज्जातमिदं विश्वं यस्मिंश्च प्रतिलीयते।

यत्रेदं चेष्टते नित्यं   तमानन्दमुपास्महे।।2।।

यदेव वेदाः पदमामनन्ति तपांसि यस्यानुगतास्तपन्ति।

शास्त्रं यदाप्तुं मुनयः पठन्ति, तस्यैव तेजः सुधियानुचिन्त्यम्।।3।।

दिक्कालाकाशभेदेषु परिच्छेदो न विद्यते।

यस्य चिन्मात्ररूपस्य नमस्तस्मै महात्मने।।4।।

सर्वासां सत्यविद्यानां मूलं वेदो निरुच्यते।

तस्यापि कारणं ब्रह्म तेन सृष्टौ प्रचारितः।।5।।

तस्य वेदस्य तत्त्वं हि मनुना परमर्षिणा।

तपः परं समास्थाय योगाभ्यासगतात्मना।।6।।

सारांशमखिलं बुद्ध्वा लोकानां हितकाम्यया।

धर्मः सनातनः स्मृत आपद्धधर्मश्च कालिकः।।7।।

प्रचाराधिक्यमापन्नः पुरा धर्मः सनातनः।

आसीदास्थाय सत्यां तां गुरुशिष्यपरम्पराम्।।8।।

या पश्चाज्छललोभाभ्यां मोहेन कलहेन वा।

अविद्योपासनेनापि   ब्रह्मचर्यादिवर्जनात्।।9।।

स्वार्थसाधनरागेण धर्मस्य परिवर्जनात्।

अधर्मसेवनेनापि नष्टा सत्या परम्परा।।10।।

तदा नानामतान्यासन् मनुष्याणामितरेतरम्।

श्रौतस्मार्त्तस्य धर्मस्य नाशस्तेनाभवत्पुनः।।11।।

स्वस्य स्वस्य मतस्यैव प्रचाराय पुनस्तदा।

विरुद्धपक्षसंसक्तैर्ग्रन्थानां निर्मितिः कृता।।12।।

ये च वेदानुगा ग्रन्थाः शुद्धा दृष्टा मतानुगैः।

तत्रापि सज्जितं वाक्यं स्वमतस्यैव पोषकम्।।13।।

तस्माच्च शुद्धग्रन्थानामार्षाणां श्रौतधर्मिणाम्।

धृतवर्णाश्रमतत्त्वानामद्य प्राप्तिः सुदुर्लभा।।14।।

यादृशाश्चोपलभ्यन्ते ग्रन्थाः परमर्षिनामतः।

तत्रापि निर्मितं भाष्यं तैरेव स्वमतानुगम्।।15।।

धर्मस्य वर्णनं तत्र सम्यङ् नैवोपलभ्यते।

मतवादं पुरस्कृत्य पक्षपातश्च वर्णितः।।16।।

तर्केणानुसन्धानं   मनूक्तं   नोपलभ्यते।

श्रौतस्मार्त्तस्य धर्मस्य तेषु भाष्येषु पश्यतः।।17।।

अतोऽहं बहुभिराज्ञप्तः सज्जनैर्धर्मवेदिभिः।

स्वयं चाप्यनुसन्धाय दृष्ट्वा च धर्मविप्लवम्।।18।।

मानवस्यास्य शास्त्रस्य वेदानामनुगामिनः।

भाष्यारम्भं करोम्यद्य लोकानां हितमाचरन्।।19।।

भियःषुग्वे1त्यपादाने2 निष्पन्ना षुगभावतः।

तादृशी यस्य सेनास्ति तन्नाम्नेदं वितायते।।20।।

यद्यप्येतादृशी शक्तिर्मयि मन्दे न विद्यते।

तथापि तर्त्तुमिच्छामि सत्यप्लवेन सागरम्।।21।।

सत्यो हि जगदाधारस्तस्य चैवानुचिन्तनात्।

सत्यधर्मप्रचाराय बुद्धिं मे प्रेरयिष्यति।।22।।

नराणामल्पशक्तित्वात्सर्वज्ञो नास्ति कश्चन।

विद्याब्धिवेदमूलेन विना चिन्मात्रमूर्त्तिना।।23।।

तस्मात्क्वापि विरुद्धं चेत्प्रमादादिसुदूषितम्।

गुणानुरागिभिस्त्याज्यं ज्ञात्वा नीचैरुपासितम्।।24।।

अब प्रस्तावना लिखने के पश्चात् मानव धर्मशास्त्र की मुख्य भूमिका का प्रारम्भ किया जाता है। इसलिये शिष्ट लोगों की परिपाटी अर्थात् ऋषि-महर्षि लोगों की आज्ञानुसार कि सब शुभ कार्यों के प्रारम्भ में सबके स्वामी परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना वा ध्यान करना चाहिये कि जिससे उसकी कृपा होकर बुद्धि निर्मल वा शुद्ध हो सकती है। इसी कारण उस कार्य का अच्छा बन जाना सम्भव है। इसलिये हमको भी प्रथम परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना करनी चाहिये, इस कारण पहले मग्लाचरण किया है।

सब दुःखों के समुदाय का ध्वंस- नाश करने वाली, जिसके होने से धनादि पदार्थ और सुगम रीति से धर्म प्राप्त हो सकता है, जिसमें धर्मानुकूल स्त्री सम्बन्ध रूप काम की आज्ञा है। जो ठीक-ठीक तत्त्वज्ञान होने से मुक्तों का उपकार करने वाली उसके अनुकूल चलने वाले संसारी जनों को जन्मान्तर में अच्छी गति देने वाली और सब बाधाओं से रहित आनन्द की दाता निर्मल शुद्ध सनातन वेद नामक जिसकी विद्या संसार में प्रकट हुई है, उसके सुखस्वरूप सर्वोत्तम ज्ञानमय तेज का हम लोग प्रतिदिन ध्यान वा धारणा करें।।१।। जिस सर्वनियन्ता परमेश्वर से यह प्रत्यक्ष चित्र-विचित्र अनेक प्रकार की शिल्पविद्या का दिखाने वाला जगत् उत्पन्न हुआ, जिसमें नियमपूर्वक स्थित होकर चेष्टा करता और जिसमें सब लय हो जाता है, उस आनन्द स्वरूप ब्रह्म की हम लोग उपासना करें।।२।। जिसके अधिकार या महत्त्व का सब वेद वर्णन करते अर्थात् कहीं साक्षात् और कहीं परम्परा से सब वेदों में जिसका वर्णन है, और जिसको प्राप्त होने की इच्छा से जिज्ञासु लोग तप करते तथा जिसको प्राप्त होने के लिए ऋषि-मुनि जन वेदाादि शास्त्रों को पढ़ते हैं, विचारशील पुरुषों को उसी के तेज का चिन्तन करना चाहिये।।३।। दिशा, काल और आकाश के भेदों में जिसका परिच्छेद नहीं अर्थात् किसी निज पूर्वादि दिशा, किसी निज क्षणादि काल और किसी निज अवकाश में जो नहीं रहता, किन्तु सब दिशा, काल और अवकाशों में विद्यमान है, उस चेतनमात्र स्वरूप सर्वव्याप्त परमेश्वर को हमारा नमस्कार प्राप्त हो।।४।। सब सत्य विद्याओं का मूल वेद माना जाता है, उस वेद का भी मूल कारण ब्रह्म है क्योंकि उसी परमेश्वर ने संसार में वेदों का प्रचार कराया।।५।। योगाभ्यास में तत्पर महर्षि मनु महाराज ने प्रबल उत्कृष्ट तप का आशय लेकर और उस वेद का मुख्य सारांश अभिप्राय जानकर संसार के उपकार की कामना से सनातन धर्म का तथा समयानुकूल आपत्काल में सेवने योग्य आपद्धर्म का स्मरण अर्थात् वेद से विचारकर प्रकट किया है।।६,७।। वह सनातन धर्म पूर्वकाल में गुरु-शिष्य की उस सत्य परम्परा के आश्रय से   अधिक कर प्रचरित था। अर्थात् पूर्वकाल में सृष्टि के आरम्भ से पुस्तकों के बिना ही वेदादिस्थ विद्या और धर्म के उपदेश में सृष्टि की निरन्तर चलने वाली प्रणाली से चलते थे।।८।। जो परम्परा पीछे छल, कपट, लोभ, मोह, कलह, अविद्या के सेवन, ब्रह्मचर्यादि के छोड़ने, स्वार्थ साधन में तत्पर होने, धर्म के छोड़ देने और अधर्म का सेवन करने से वह सत्य परम्परा नष्ट हो गई।।९,१०।। उस समय परस्पर मनुष्यों में नाना प्रकार के मत चले उससे वैदिक और स्मार्त्त धर्म का और भी नाश हुआ।।११।। उस समय परस्पर विरुद्ध मतों में आसक्त लोगों ने अपने-अपने मत का प्रचार करने के लिए अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार ग्रन्थों का निर्माण किया।।१२।। और मतवादी लोगों ने जो वेदानुकूल शुद्ध ग्रन्थ देखे, उनमें भी अपने-अपने मत के पोषक वाक्य मिला दिये।।१३।। इसी कारण से जिनमें वर्णाश्रम धर्म का स्पष्ट आशय धरा गया था, ऐसे वैदिक धर्म के ऋषिप्रणीत शुद्ध ग्रन्थों का मिलना अब दुर्लभ हो गया।।१४।। शुद्ध ग्रन्थों में मतवादियों ने इसलिए अपने-अपने मत के पोषक वचन मिलाये कि जिससे हमारा मत निर्मूल न समझा जावे, किन्तु प्रतिष्ठित वेदमूलक ग्रन्थों में मिल जाने से सनातन माना जावे और हमको कोई न पकड़ सके। अब जैसे कुछ ग्रन्थ ऋषियों के नाम से मिलते हैं, उन पर भी उन्हीं लोगों ने अपने-अपने मत की पुष्टिपरक व्याख्या बनाई। यद्यपि व्याख्या करने वालों का भीतरी अभिप्राय यह नहीं था कि हम इस शास्त्र में अपना मत घुसेड़ें, तो भी उन-उन का अन्तःकरण उस-उस मत के रंग से रंगा होने के कारण वैसे ही भाष्य भी बनाये गये।।१५।। उन भाष्यों में ठीक-ठीक धर्म का वर्णन जैसा होना चाहिये, प्राप्त नहीं होता। और कहीं-कहीं अपने-अपने मत के आश्रय से पक्षपात भी वर्णन किया गया है।।१६।। इस मानवधर्मशास्त्र में तर्कपूर्वक धर्म का निर्णय करने के लिए “यस्तर्केणानुसन्धत्ते0”1 इत्यादि वचनों में स्पष्ट आज्ञा लिखी है, उसके अनुसार वेद सम्बन्धी और धर्मशास्त्र सम्बन्धी धर्म का वर्णन उन भाष्यों में देखने वाले को प्राप्त नहीं होता, जिससे आजकल के धर्म का निर्णय चाहने वाले मनुष्यों को सन्तोष हो।।१७।। इसी से अनेक धर्मज्ञ और सज्जन लोगों ने मुझको आज्ञा वा सम्मति दी तथा मैंने भी विचार किया कि वास्तव में ऐसी दशा होने से मुझको इस पर यथाशक्ति विचार करना चाहिये और मैंने यह भी विचारा कि ऐसा न करने से अब दिन-दिन धर्म की हानि होती जाती है। धर्मशास्त्र में आज्ञा है कि- ‘धर्म की हानि होती हो तो ब्राह्मण भी शस्त्र को ग्रहण करें।’२ और ‘विद्वानों का शस्त्र वाणी वा विद्या ही है कि जिससे अधर्म का ध्वंस हो सकता है।’३

इत्यादि प्रकार के विचार से लोक का उपकार होना मानकर मैं अब वेदों के अनुयायी इस मानव धर्मशास्त्र के भाष्य का प्रारम्भ करता हूं।।१८,१९।। बीसवें श्लोक में मेरा नाम (भीमसेन शर्मा) व्याकरण के अनुसार दिखाया गया है।।२०।। यद्यपि मुझ मन्दबुद्धि में ऐसी शक्ति नहीं है जो वेदानुकूल धर्म का ठीक-ठीक निर्णय कर सकूं, तो भी सत्यरूप नौका के आश्रय से इस मानव धर्मशास्त्र रूप समुद्र के पार होना चाहता हूं।।२१।। और वही सब जगत् का आधार सर्वान्तर्यामी परमेश्वर ही मुख्य कर सत्य है, उसका स्मरण, ध्यान, स्तुति, प्रार्थनादि करने से सत्य धर्म का प्रचार होने के लिए वह परमेश्वर मेरी बुद्धि को अवश्य प्ररेणा करेगा।।२२।। सब विद्याओं का सागर जो वेद उसके कर्त्ता चेतनमात्र स्वरूप एक परमेश्वर को छोड़कर अन्य कोई भी सर्वज्ञ नहीं है, किन्तु सभी मनुष्य अल्पज्ञ हैं। इस कारण मेरे भाष्य में प्रमादादि से कहीं विरुद्ध वा दूषित लेख किन्हीं महाशयों वा विद्वानों को जान पड़े तो गुणानुरागी लोगों को वह दोष छोड़ देना चाहिये, क्योंकि अच्छे लोगों का स्वाभाविक धर्म यही है कि वे दूसरे के गुणों को अच्छा समझ के उसके सहकारी बनते हैं। और कोई दोष जान पड़ता है तो छोड़ देते हैं, क्योंकि दोषों का ग्रहण करना नीच पुरुषों का काम है। और यह भी हो सकता है कि जैसे प्रमादाादि से मेरा लेख कहीं दूषित हो जाये, वैसे प्रमादादि के होने से मेरे निर्दोष लेख को भी कोई विरुद्ध मान सकता है, इसलिये विचारशीलों को उचित है कि यदि कहीं विरुद्ध जान पड़े तो प्रथम मुझसे ही पूछ देखें, यदि भूल होगी तो मैं स्वयं मान लूंगा। और वह ठीक हो जायगा।।२३,२४।।

मारा हुआ धर्म कहीं तुम्हें न मार दें !

ओ३म्

मारा हुआ धर्म कहीं तुम्हें न मार दें !

जिस प्रकार प्राणों के बिना मनुष्य जीवित नहीं रह सकता, उसी प्रकार धर्म (नैतिक आचरण) के बिना मनुष्य का भी कोई महत्त्व नहीं।

धर्म आचरण की वस्तु है।धर्म केवल प्रवचन और वाद-विवाद का विषय नहीं।केवल तर्क-वितर्क में उलझे रहना धार्मिक होने का लक्षण नहीं है।धार्मिक होने का प्रमाण यही है कि व्यक्ति का धर्म पर कितना आचरण है। व्यक्ति जितना-जितना धर्म पर आचरण करता है उतना-उतना ही वह धार्मिक बनता है।’धृ धारणे’ से धर्म शब्द बनता है, जिसका अर्थ है धारण करना।

तैत्तिरीयोपनिषद् के ऋषि के अनुसार ―
*धर्मं चर !*―(तै० प्रथमा वल्ली, ११ अनुवाक)

अर्थात् तू धर्म का आचरण कर !
इसमें धर्म का आचरण करने की बात कही गई है, धर्म पर तर्क-वितर्क और वाद-विवाद करने की बात नहीं कही गई ।

निर्व्यसनता नैतिकता को चमकाती है।आध्यात्मिकता सोने पर सुहागे का काम करती है।नैतिकता+निर्व्यसनता+आध्यात्मिकता का समन्वय ही वास्तव में मनुष्य को मनुष्य बनाता है।

धर्म मनुष्य में शिवत्व की स्थापना करना चाहता है।वह मनुष्य को पशुता के धरातल से ऊपर उठाकर मानवता की और ले जाता है और मानवता के ऊपर उठाकर उसे देवत्व की और ले-जाता है।यदि कोई व्यक्ति धार्मिक होने का दावा करता है और मनुष्यता और देवत्व उसके जीवन में नहीं आ पाते, तो समझिए कि वह धर्म का आचरण न करके धर्म का आडम्बर कर रहा है।

*मनु महाराज के अनुसार धर्म की महिमा*

वैदिक साहित्य में धर्म की बहुत महिमा बताई गई है।मनु महाराज ने लिखा है―

*नामुत्र हि सहायार्थं पितामाता च तिष्ठतः ।*
*न पुत्रदारं न ज्ञातिर्धर्मस्तिष्ठति केवलः ।।*
―(मनु० ४/२३९)
*अर्थात्―*परलोक में माता, पिता, पुत्र, पत्नि और गोती (एक ही वंश का) मनुष्य की कोई सहायता नहीं करते।वहाँ पर केवल धर्म ही मनुष्य की सहायता करता है।

*एकः प्रजायते जन्तुरेक एव प्रलीयते ।*
*एकोऽनुभुङ्क्ते सुकृतमेक एव च दुष्कृतम् ।।*
―(मनु० ४/२४०)
*अर्थ―*जीव अकेला ही जन्म लेता है और अकेला ही मृत्यु को प्राप्त होता है।अकेला ही पुण्य भोगता है और अकेला ही पाप भोगता है।

*एक एव सुह्रद्धर्मो निधनेऽप्यनुयाति यः ।*
*शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यद्धि गच्छति ।।*
―(मनु० ८/१७)
*अर्थ―*धर्म ही एक मित्र है जो मरने पर भी आत्मा के साथ जाता है; अन्य सब पदार्थ शरीर के नष्ट होने के साथ ही नष्ट हो जाते हैं।

*मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्ठसमं क्षितौ ।*
*विमुखा बान्धवा यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति ।।*
―(मनु० ४/२४१)
*अर्थ―*सम्बन्धी मृतक के शरीर को लकड़ी और ढेले के समान भूमि पर फेंककर विमुख होकर चले जाते हैं, केवल धर्म ही आत्मा के साथ जाता है।

*धर्मप्रधानं पुरुषं तपसा हतकिल्विषम् ।*
*परलोकं नयत्याशु भास्वन्तं खशरीरिणम् ।।*
―(मनु० ४/२४३)
*अर्थ―*जो पुरुष धर्म ही को प्रधान समझता है, जिसका धर्म के अनुष्ठान से पाप दूर हो गया है, उसे प्रकाशस्वरुप और आकाश जिसका शरीरवत् है, उस परमदर्शनीय परमात्मा को धर्म ही शीघ्र प्राप्त कराता है।

धर्म के आचरण पर मनु महाराज ने बहुत बल दिया है―
*अधार्मिको नरो यो हि यस्य चाप्यनृतं धनम् ।*
*हिंसारतश्च यो नित्यं नेहासौ सुखमेधते ।।*
―(मनु० ४/१७०)
*अर्थ―*जो अधर्मी, अनृतभाषी, अपवित्र व अनुचित रीत्योपार्जक तथा हिंसक है, वह इस लोक में सुख नहीं पाता।

*न सीदन्नपि धर्मेण मनोऽधर्मे निवेशयेत् ।*
*अधार्मिकाणां पापानामाशु पश्यन्विपर्ययम् ।।*
―(मनु० ४/१७१)
*अर्थ―*धर्माचरण में कष्ट झेलकर भी अधर्म की इच्छा न करे, क्योंकि अधार्मिकों की धन-सम्पत्ति शीघ्र ही नष्ट होती देखी जाती है।

*नाधर्मश्चरितो लोके सद्यः फलति गौरिव ।*
*शनैरावर्तमानस्तु कर्तुर्मूलानि कृन्तति ।।*
―(मनु० ४/१७२)
*अर्थ―*संसार में अधर्म शीघ्र ही फल नहीं देता, जैसे पृथिवी बीज बोने पर तुरन्त फल नहीं देती।वह अधर्म धीरे-धीरे कर्त्ता की जड़ों तक को काट देता है।

*अधर्मेणैधते तावत्ततो भद्राणि पश्यति ।*
*ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति ।।*
―(मनु० ४/१७४)
*अर्थ―*अधर्मी प्रथम तो अधर्म के कारण उन्नत होता है और कल्याण-ही-कल्याण पाता है, तदन्नतर शत्रु-विजयी होता है और समूल नष्ट हो जाता है।

*धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।*
*तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ।।*
―(मनु० ८/१५)
*अर्थ―*मारा हुआ धर्म मनुष्य का नाश करता है और रक्षा किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।इसलिए धर्म का नाश नहीं करना चाहिए, ऐसा न हो कि कहीं मारा हुआ धर्म हमें ही मार दे !

*वृषो हि भगवान् धर्मस्तस्य यः कुरुते ह्यलम् ।*
*वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद्धर्मं न लोपयेत् ।।*
―(मनु० ८/१६)
*अर्थ―*ऐश्वर्यवान् धर्म सुखों की वर्षा करने वाला होता है।जो कोई उसका लोप करता है, देव उसे नीच कहते हैं, इसलिए मनुष्य को धर्म का लोप नहीं करना चाहिए।

*चला लक्ष्मीश्चला प्राणाश्चलं जीवितयौवनम् ।*
*चलाचले हि संसारे धर्म एको हि निश्चलः ।।*

*अर्थ―*धन, प्राण, जीवन और यौवन―ये सब चलायमान हैं। इस चलायमान संसार में केवल एक धर्म ही निश्चल है।

प्रश्न उठता है कि जिस धर्म की इतनी महिमा कही गई है, वह धर्म क्या है ? इस सन्दर्भ में मनु महाराज का श्लोक ध्यान देने योग्य है―

*धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।*
*धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ।।*
―(मनु० ६/९२)
*अर्थ―*धीरज, हानि पहुँचाने वाले से प्रतिकार न लेना, मन को विषयों से रोकना, चोरी न करना, मन को राग-द्वेष से परे रखना, इन्द्रियों को बुरे कामों से बचाना, मादक द्रव्य का सेवन न करके बुद्धि को पवित्र रखना, ज्ञान की प्राप्ति, सत्य बोलना और क्रोध न करना―ये धर्म के दस लक्षण हैं।

भूपेश  आर्य