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डॉ अबेडकर द्वारा प्रस्तुत जातीय वर्णपरिवर्तन के उदाहरण: डॉ सुरेन्द्र कुमार

(क) ‘‘पतित जातियों में मनु ने उन्हें समिलित किया है जिन क्षत्रियों ने आर्य अनुष्ठान त्याग दिए थे, जो शूद्र बन गए थे और ब्राह्मण पुरोहित जिनके यहां नहीं आते थे। मनु ने इनका उल्लेख इस प्रकार किया है-पौड्रक, चोल, द्रविड़, काबोज, यवन, शक, पारद, पल्हव, चीन, किरात, दरद।’’ (अंबेडकरवाङ्मय, खंड 8, पृ0 218)

(ख) ‘‘दस्यु आर्य सप्रदाय के सदस्य थे किन्तु उन्हें कुछ ऐसी धारणाओं और आस्थाओं का विरोध करने के कारण ‘आर्य’ संज्ञा से रहित कर दिया गया, जो आर्यसंस्कृति का आवश्यक अंग थी।’’ (वही, खंड 7, पृ0 321)

(ग) ‘‘सेन राजाओं के सबन्ध में इतिहासकारों में मतभेद है। डॉ0 भंडारकर का कहना है कि ये सब ब्राह्मण थे, जिन्होंने क्षत्रियों के सैनिक व्यवसाय को अपना लिया था।’’ (डॉ0 अम्बेडकर वाङ्मय खंड 7, पृ0 106)

डॉ0 अम्बेडकर मनु के उदाहरणों तथा ऐतिहासिक उदाहरणों द्वारा समुदाय या जाति के वर्णपरिवर्तन को ऐतिहासिक सत्य स्वीकार करते हैं। ये उदाहरण जन्मना जातिवादी व्यवस्था के विरुद्ध हैं। स्पष्ट है कि मनु की व्यवस्था जातिवादी नहीं थी। फिर मनु पर जातिवादी होने का निराधार आक्षेप लगाकर उनका विरोध क्यों?

समुदायों के वर्णपरिवर्तन एवं वर्णबहिष्कार के उदाहरण: डॉ सुरेन्द्र कुमार

(क) व्यक्तिगत उदाहरणों के अतिरिक्त, इतिहास में पूरी जातियों का अथवा जाति के पर्याप्त भाग का वर्णपरिवर्तन भी मिलता है। महाभारत में और मनुस्मृति में कुछ पाठभेद के साथ पाये जाने वाले निन-उद्धृत श्लोकों से ज्ञात होता है कि निन जातियां पहले क्षत्रिय थीं किन्तु अपने क्षत्रिय-कर्त्तव्यों के त्याग के कारण और ब्राह्मणों द्वारा बताये शास्त्रोक्त प्रायश्चित्त न करने के कारण वे शूद्रकोटि में अथवा वर्णबाह्य परिगणित हो गयीं-

शनकैस्तु   क्रियालोपादिमा क्षत्रियजातयः।

वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च॥

पौण्ड्रकाश्चौड्रद्रविडाः काबोजाः यवनाः शकाः।

पारदाः पह्लवाश्चीनाः किराताः दरदाः खशाः॥

(मनु0 10.43-44)

    अर्थात्-अपने निर्धारित कर्त्तव्यों का त्याग कर देने के कारण और फिर ब्राह्मणों द्वारा बताये प्रायश्चित्तों को न करने के कारण धीरे-धीरे ये क्षत्रिय जातियां शूद्र कहलायीं- पौण्ड्रक, औड्र, द्रविड़, कबोज, यवन, शक, पारद, पह्लव, चीन, किरात, दरद, खश॥ महाभारत अनु0 35.17-18 में इनके अतिरिक्त मेकल, लाट, कान्वशिरा, शौण्डिक, दार्व, चौर, शबर, बर्बर जातियों का भी उल्लेख है।

(ख) बाद तक भी वर्णपरिवर्तन के उदाहरण इतिहास में मिलते हैं। जे.विलसन और एच.एल. रोज के अनुसार राजपूताना, सिन्ध और गुजरात के पोखरना या पुष्करण ब्राह्मण और उत्तरप्रदेश में उन्नाव जिला के आमताड़ा के पाठक और महावर राजपूत वर्णपरिवर्तन से निन जाति से ऊंची जाति के बने (देखिए, हिन्दी विश्वकोश भाग 4, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी)

वर्णपतन तथा वर्णबहिष्कार के उदाहरण: डॉ सुरेन्द्र कुमार

(क) मर्यादापुरुषोत्तम राम के पूर्वज सम्राट् रघु का ‘प्रवृद्ध’ नामक एक पुत्र था। नीच कर्मों के कारण उसे ‘राक्षस’ घोषित किया गया था और इस प्रकार वह वर्णों से पतित हो गया था।

(ख) राम के ही पूर्वज सगर का एक पुत्र ‘असमंजस्’ था। उसके अन्यायपूर्ण कर्मों के कारण उसे क्षत्रिय से शूद्र घोषित करके राज्याधिकार से वंचित कर राज्य से बहिष्कृत कर दिया था। (भागवतपुराण 6.8.14-19; महाभारत, वनपर्व 107)।

(ग) लंका का राजा रावण पुलस्त्य ऋषि के वंश में उत्पन्न होने के कारण ब्राह्मणोपेत क्षत्रिय था। अन्यायी और दुराचारी होने के कारण उसे ‘राक्षस’ घोषित किया गया। (वाल्मीकि-रामायण, बाल एवं उत्तरकांड)

(घ) सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी क्षत्रियों के मूल पुरुष सातवें मनु वैवस्वत, जो एक चक्रवर्ती राजा थे, उनके पुत्र पृषध्र से किसी कारण गोवध हो गया। वैदिक काल में गोवध महापाप माना जाता था। इस पाप के दण्डस्वरूप उसको शूद्र घोषित कर दिया गया था। (भागवत0 8.13.3,9.1.12, 2.3-14; वायु0 64.30, 85.4, 86.1; विष्णु0 3.1.34, 4.1.7, 17 आदि)।

वर्णपरिवर्तन के ऐतिहासिक उदाहरण: डॉ सुरेन्द्र कुमार

वर्णव्यवस्था में वर्णपरिवर्तन के ऐतिहासिक उदाहरण

    भारतीय इतिहास में वर्णपरिवर्तन या वर्णपतन के सैंकड़ों ऐतिहासिक उदाहरण मिलते हैं जिनसे वर्णव्यवस्था में वर्णपरिवर्तन की स्वतन्त्रता तथा वर्णपतन की दण्डात्मकता का परिज्ञान होता है। यहां कुछ प्रमुख उदाहरण दिये जा रहे हैं-

(अ) व्यक्तिगत वर्णपरिवर्तन के ऐतिहासिक उदाहरण

  1. मनुस्मृति के प्रवक्ता मनु स्वायंभुव के कुल में भी वर्ण-परिवर्तन हुए हैं। ब्राह्मण वर्णधारी महर्षि ब्रह्मा का पुत्र मनु स्वायंभुव स्वयं भी राजा बनने के कारण, ब्राह्मण से क्षत्रिय बना। मनुस्मृति के आद्यरचयिता इसी मनु स्वायंभुव के बड़े पुत्र राजा प्रियव्रत के दस पुत्र थे जो जन्म से क्षत्रिय थे। उनमें से सात क्षत्रिय राजा बने। तीन ने ब्राह्मण वर्ण को स्वीकार किया और तपस्वी बने। उनके नाम थे-महावीर, कवि और सवन (भागवतपुराण अ0 5)।
  2. दासी का पुत्र ‘कवष ऐलूष’ शूद्र परिवार का था। वह विद्वान् ब्राह्मण बनके मन्त्रद्रष्टा ऋषि कहलाया। इस ऋषि द्वारा अर्थदर्शन किये गये सूक्त आज भी ऋग्वेद के दशम मण्डल में (सूक्त 31-33) मिलते हैं, जिन पर ऋषि के रूप में इसी का नाम अंकित है। (ऐतरेय ब्राह्मण 2.19; सांयायन ब्राह्मण 12.1-3)
  3. इसी प्रकार शूद्रा का पुत्र कहा जाने वाला वत्स काण्व भी पढ़-लिख कर ऋग्वेद के मन्त्रों का अर्थद्रष्टा ऋषि बना। (पंच0 ब्रा0 8.6.1; 14.6.6)
  4. सत्यकाम जाबाल अज्ञात कुल का था। वह अपनी सत्यवादिता एवं प्रखर बुद्धि के कारण महान् और प्रसिद्ध ऋषि बना। (बृहदारण्यक उप0 4.1.6; छान्दोग्य उप0 4.4-6; पंचविश ब्राह्मण 8.6.1)।
  5. निन कुल-परिवार में उत्पन्न हुआ मातंग अपनी विद्वत्ता के कारण ब्राह्मण एवं ऋषि बना। (महाभारत, अनु0 3.19)
  6. (कुछ कथाओं के अनुसार) वाल्मीकि निन कुल में उत्पन्न हुए, किन्तु वे ब्रह्मर्षि और महाकवि बने। (स्कंद पुराण, वै0 21)।
  7. विदुर दासी के पुत्र थे। वे महात्मा बने और राजा धृतराष्ट्र के महामन्त्री रहे। (महाभारत, आदिपर्व 100, 101, 135-137 अ0)
  8. पांचाल-राजा भर्याश्व का एक पुत्र मुद्गल राजा था, जो क्षत्रिय था। बाद में यह और इसके वंशज ब्राह्मण बन गये। इसके वंशज ब्राह्मण आज भी ‘मौद्गल ब्राह्मण’ कहलाते हैं (भागवतपुराण-9.21; वायु पुराण 99.198)
  9. कान्यकुज के राजा विश्वरथ राज्य को त्याग कर क्षत्रिय से ब्राह्मण बने और फिर ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त किया और ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के नाम से प्रसिद्ध हुए। उनके अनेक पुत्रों में से कुछ क्षत्रिय ही रहे तो कुछ ब्राह्मण बन गये, जो आज कौशिक ब्राह्मण कहाते हैं। (वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड 51-56 अध्याय)।
  10. इसी प्रकार दीर्घतमा नामक ऋषि के कई पुत्र थे, उनमें से कुछ ब्राह्मण बने तो कुछ क्षत्रिय। उनके वंशजों को ‘वालेय ब्राह्मण’ और ‘वालेय क्षत्रिय’ कहा जाता है। (विष्णुपुराण 4.18; भागवत पुराण 9.20)।
  11. चक्रवर्ती क्षत्रिय राजा मनु वैवस्वत (सातवां मनु) का नाभानेदिष्ट नामक पुत्र ब्राह्मण बना (ऐतरेय ब्राह्मण 5.14)। उसके लिए ‘ब्राह्मण’ संबोधन प्राप्त होता है (महाभारत 1.75.3)। यह ऋग्वेद के 1.61-62 सूक्तों का मन्त्रद्रष्टा ऋषि है (ऐतरेय ब्राह्मण 5. 14)।
  12. क्षत्रिय राजा मनु के इसी पुत्र का पुत्र नाभाग (किसी के मतानुसार दिष्ट राजा का पुत्र) वैश्य बना (भागवत0- 9.2.23, 28; मार्कण्डेय0 128.32; विष्णु0 4.1.19)। मुनि प्रभाति ने इसे पुनः क्षत्रिय वर्ण की दीक्षा दी थी।
  13. क्षत्रिय मनु वैवस्वत के पुत्र नरिष्यन्त के वंश में उत्पन्न देवदत्त का एक पुत्र अग्निवेश्य हुआ। यह ‘कनीन’ और ‘जातूकर्ण्य’ नामक ब्राह्मण ऋषि प्रसिद्ध हुआ। ब्राह्मणों में ‘आग्निवेश्य’ वंशीय ब्राह्मण इसी के वंशज हैं। (भागवत0-9.2.19; ब्रह्माण्ड0 3.47.49)
  14. वैवस्वत मनु के सूर्यवंश प्रवर्तक ज्येष्ठपुत्र राजा इक्ष्वाकु के वंश में पच्चीसवीं पीढ़ी में युवनाश्व राजा का ‘हरित’ नामक पुत्र हुआ। यह क्षत्रिय से ब्राह्मण बन गया। ‘हारित’ ब्राह्मणों का वंश इसी से प्रचलित हुआ (विष्णु0 4.3.5; ब्रह्माण्ड0 4.1.85)।
  15. चन्द्रवंशी चक्रवर्ती सम्राट् ययाति के दूसरे पुत्र पुरु के वंश में अप्रतिरथ राजा का पुत्र कण्व हुआ। उसका पुत्र मेधातिथि (दूसरा नाम प्रस्कण्व) ब्राह्मण बना। ‘काण्वायन’ ब्राह्मण इसी मेधातिथि के वंशज हैं। ये सभी ब्राह्मण वर्ण में दीक्षित हो गये थे (विष्णु0 4.19.2,20; भागवत0 9.20.1)
  16. वीतहव्य नामक एक प्रसिद्ध राजा ब्राह्मण बन गया था। भृगु ऋषि ने इस राजा को ब्राह्मणत्व की दीक्षा दी थी (महाभारत, अनुशासन पर्व, अ0 30.57-58)
  17. राजा प्रतीप के तीन पुत्र हुए-देवापि, शान्तनु और महारथी। इनमें से देवापि ब्राह्मण बन गया और शान्तनु तथा महारथी (बाल्हीक) क्षत्रिय राजा बने। (महाभारत, आदि0 94.61; विष्णु0 4.22.7; भागवत0 9.22.14-17)।

ऐसे वर्णपरिवर्तन के उदाहरणों से प्राचीन भारतीय इतिहास भरा पड़ा है। ये उदाहरण मनु की और वैदिक वर्णव्यवस्था की पुष्टि करते हैं कि वह कर्म पर आधारित थी, जन्म पर नहीं।

अनार्यों को आर्य बनाने सबन्धी डॉ अबेडकर का मत: डॉ सुरेन्द्र कुमार

(क) ‘‘आर्यों ने हमेशा अनार्यों को आर्य बनाने का प्रयत्न किया अर्थात् उन्हें आर्य संस्कृति का अनुयायी बनाने का प्रयत्न किया।’’ (वही, खंड 7, पृ. 326)

(ख) ‘‘आर्य न केवल अपने ढंग से इच्छुक अनार्यों को अपनी जीवनपद्धति में परिवर्तित कर रहे थे, जो आर्यों की यज्ञ-संस्कृति और चातुर्वर्ण्य सिद्धान्त और यहां तक कि वे उनके वेदों तक के विरोधी थे।’’ (वही, खंड 7, पृ0 327)

इन श्लोकार्थों को पढ़कर कौन पाठक यह मानने के लिए विवश नहीं होगा कि ‘डॉ. अबेडकर मनुस्मृति में वर्णपरिवर्तन का विधान मानते हैं।’ यदि वे अन्यत्र अपने ही इन कथनों के विरुद्ध कुछ कहते हैं तो इसका अभिप्राय है कि उनके लेखन में परपरविरोध है। उक्त श्लोकार्थ डॉ0 अबेडकर ने प्रमाण के रूप उद्धृत किये हैं। किसी भी लेखक के द्वारा किसी संदर्भ को प्रमाण रूप में उद्धृत करने का भाव यह होता है कि लेखक उनको प्रामाणिक मानता है। यहां मनु के वर्णपरिवर्तन के सिद्धान्त को भी डॉ0 अबेडकर ने स्वीकार कर लिया है। वर्णपरिवर्तन का निर्दोष सिद्धान्त है, स्वतन्त्रता और उदारता का सिद्धान्त है, जो सर्वथा आपत्तिरहित है। यह जातिव्यवस्था में संभव नहीं होता। फिर भी मनु का विरोध क्यों? इसका उत्तर उपर्युक्त संदर्भों के परिप्रेक्ष्य में डॉ0 अबेडकर को देना चाहिए था, अथवा अब उनके अनुयायियों को देना चाहिए।

डॉ अबेडकर का वर्णपरिवर्तन समर्थक मत: डॉ सुरेन्द्र कुमार

डॉ. अबेडकर ने अपनी समीक्षाओं में वर्णव्यवस्था में वर्णपरिवर्तन के सिद्धान्त को स्वीकार करके उसे उत्तम व्यवस्था माना है और जातिव्यवस्था से भिन्न अपितु परस्परविरोधी व्यवस्था माना है। इस विषयक डॉ0 अबेडकर के उद्धरण पूर्व उद्धृत किये जा चुके हैं। यहां वर्णपरिवर्तन विषयक उनके मन्तव्यों को तथा मनुस्मृति के उन श्लोकार्थों को उद्धृत किया जाता है जिन्हें डॉ0 अबेडकर ने अपने ग्रन्थों में प्रमाण रूप में प्रस्तुत किया है-

(क) ‘‘अन्य समाजों के समान भारतीय समाज भी चार वर्णों में विभाजित था, ये हैं-1. ब्राह्मण या पुरोहित वर्ग, 2. क्षत्रिय या सैनिक वर्ग 3. वैश्य अथवा व्यापारिक वर्ग, 4. शूद्र तथा शिल्पकार और श्रमिक वर्ग। इस बात पर विशेष ध्यान देना होगा कि आरंभ में यह अनिवार्य रूप से वर्ग-विभाजन के अन्तर्गत व्यक्ति की दक्षता के आधार पर अपना वर्ण बदल सकता था और इसीलिए वर्णों को व्यक्तियों के कार्य की परिवर्तनशीलता स्वीकार्य थी’’

(डॉ0 अबेडकर वाङ्मय, खंड 1, पृ 30)

(ख) ‘‘इस बात की पुष्टि के लिए परपरा के आधार पर पर्याप्त प्रमाण हैं, जिनका उल्लेख धार्मिक साहित्य में हुआ है……… इस परपरा के अनुसार किसी भी व्यक्ति के वर्ण का निश्चय करने का काम अधिकारियों के एक दल द्वारा किया जाता था, जिन्हें ‘मनु’ और ‘सप्तर्षि’ कहते थे। व्यक्तियों के समूह में से ‘मनु’ उनका चुनाव करता था, जो क्षत्रिय और वैश्य होने के योग्य होते थे और ‘सप्तर्षि’ उन व्यक्तियों को चुनते थे जो ब्राह्मण होने के योग्य होते थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य होने के लिए ‘मनु’ और ‘सप्तर्षियों’ द्वारा व्यक्तियों का चुनाव करने के बाद बाकी व्यक्ति जो नहीं चुने जा सकते थे, वे शूद्र कहलाते थे।…….हर चौथे वर्ष अधिकारियों का नया दल नया चुनाव करने के लिए नियुक्त होता था, जिसकी पद संज्ञा वही ‘मनु’ और ‘सप्तर्षि’ होती थी। इस प्रक्रिया में यह होता था कि जो लोग पिछली बार केवल शूद्र होने के योग्य बच जाते थे, वे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य होने के लिए चुने गये होते थे, वे केवल शूद्र होने के योग्य होने के कारण रह जाते थे। इस प्रकार वर्ण के व्यक्ति बदलते रहते थे।’’     (वही, खंड 7, पृ0 170)

(ग) ‘‘जिस प्रकार कोई शूद्र ब्राह्मणत्व को और कोई ब्राह्मण शूद्रत्व को प्राप्त होता है, उसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य से उत्पन्न शूद्र भी क्षत्रिय और वैश्यत्व को प्राप्त होता है।’’ [मनु0 10.65] (वही, खंड 13, पृ0 85)

(घ) ‘‘प्रत्येक शूद्र जो शुचिपूर्ण है, जो अपने से उत्कृष्टों का सेवक है, मृदुभाषी है, अहंकाररहित है, और सदा ब्राह्मणों के आश्रित रहता है, वह उच्चतर जाति प्राप्त करता है।’’ [मनु0 9.335] (वही, खंड 9, पृ0 117)

(ङ)  ‘‘बड़ों के साथ सबन्ध करता हुआ और नीचों का त्याग करता हुआ ब्राह्मण श्रेष्ठता को पाता है। इसके विरुद्ध आचरण करता हुआ शूद्रता को पाता है।’’ [मनु0 4.245] (वही, खंड 6, पृ0 144)

(च) ‘‘लेकिन जो प्रातःकाल इसका खड़े होकर और संध्या समय में बैठकर पाठ नहीं करता है, उसे शूद्र समझकर प्रत्येक द्विज कर्म से बहिष्कृत कर देना चाहिए।’’ [मनु0 2.103] (वही, खंड 7, पृ0 245)

(छ) ‘‘कोई द्विज यदि वेदाध्ययन नहीं करता है और अन्य (सांसारिक ज्ञान) के अध्ययन में रत रहता है तो वह शीघ्र ही, अपितु अपने जीवन काल में ही शूद्र की स्थिति प्राप्त करता है और उसके बाद उसकी सन्तति भी (मनुस्मृति 2.168)। (वही, खंड 8, पृ0 209, 256 तथा अन्य)

सवर्ण-असवर्ण जातियों में गोत्रों की एकरूपता का कारण ‘वर्णपरिवर्तन’: डॉ सुरेन्द्र कुमार

भारत की गोत्रपद्धति नृवंश के इतिहास पर प्रकाश डालने वाली अद्भुत परपरा है। इससे मूलपिता तथा मूल परिवार का ज्ञान होता है। वर्तमान में ब्राह्मण-जातियों, क्षत्रिय-जातियों, वैश्य-जातियों और दलित-जातियों में समान रूप से पाये जाने वाले गोत्र, उस ऐतिहासिक वंश-परपरा के पुष्ट प्रमाण हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि वे सभी एक ही पिता के वंशज हैं। पहले वर्णव्यवस्था में जिसने गुण-कर्म-योग्यता के आधार पर जिस वर्ण का चयन किया, वे उस वर्ण के कहलाने लगे। बाद में विभिन्न कारणों के आधार पर उनका ऊंचा-नीचा वर्णपरिवर्तन होता रहा। किसी क्षेत्र में किसी गोत्र-विशेष का व्यक्ति ब्राह्मण वर्ण में रह गया, तो कहीं क्षत्रिय, तो कहीं शूद्र कहलाया। कालक्रमानुसार जन्म के आधार पर उनकी जाति रूढ़ और स्थिर हो गयी।

आज हम देखते हैं कि सब वर्णों के गोत्र प्रायः सभी जातियों में हैं। कौशिक ब्राह्मण भी हैं, क्षत्रिय भी। कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण भी हैं, राजपूत भी, पिछड़ी जाति वाले भी। वसिष्ठ ब्राह्मण भी हैं, दलित भी। दलितों में राजपूतों और जाटों के अनेक गोत्र हैं। सिंहल-गोत्रीय क्षत्रिय भी हैं, बनिये भी। राणा, तंवर, गहलोत-गोत्रीय जाटाी हैं, राजपूत भी। राठी-गोत्रीय जन जाट भी हैं, बनिये भी। गोत्रों की यह एकरूपता सिद्ध करती है कि कभी ये लोग एक पिता के वंशज या एक वर्ण के थे। व्यवस्थाओं और परिस्थितियों ने उनको उच्च-निन स्थिति में ला दिया और जन्मना जातिवाद ने उसे सुस्थिर कर दिया।

हीन कर्मों से वर्णपतन : डॉ सुरेन्द्र कुमार

(क) उत्तमानुत्तमान् गच्छन् हीनान् हीनांश्च वर्जयन्।

    ब्राह्मणः   श्रेष्ठतामेति   प्रत्यवायेन   शूद्रताम्॥ (4.245)

    अर्थ-ब्राह्मण-वर्णस्थ व्यक्ति श्रेष्ठ-अतिश्रेष्ठ व्यक्तियों का संग करते हुए और नीच-नीचतर व्यक्तियों का संग छोड़कर अधिक श्रेष्ठ बनता जाता है। इसके विपरीत आचरण से पतित होकर वह शूद्र बन जाता है, अर्थात् ब्राह्मणत्व का बोधक श्रेष्ठाचरण होता है, जब तक श्रेष्ठाचरण है तो वह ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी है। निन वर्ण का आचरण होने पर वही ब्राह्मण शूद्र कहलाता है।

(ख) न तिष्ठति तु यः पूर्वां नोपास्ते यश्च पश्चिमाम्।

    स शूद्रवद् बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः॥ (2.103)

    अर्थ-जो द्विज अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य प्रातःकालीन संध्या नहीं करता और जो सायंकालीन संध्या भी नहीं करता। वह शूद्र के समान है, उसको द्विजों के सभी अधिकारों या कर्त्तव्यों से बहिष्कृत कर देना चाहिए अर्थात् उसे ‘शूद्र’ घोषित कर देना चाहिए।

(ग) योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्।

    स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः॥ (2.168)

    अर्थ-जो द्विज अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य वेदाध्ययन का त्याग कर अन्य विद्याओं में ही परिश्रम करता रहता है, वह जीते-जी अपने आश्रित परिजनों के सहित शूद्रता को प्राप्त हो जाता है। क्योंकि, उसका ब्राह्मणत्व प्रदान करने वाला वेदाध्ययन छूटने से उसके आश्रित परिजनों का भी छूट जाता है, अतः वह परिवार शूद्र कहलाता है।

(घ)     यो न वेत्त्यभिवादस्य विप्रः प्रत्यभिवादनम्।

         नाभिवाद्यः स विदुषा यथा शूद्रस्तथैव सः॥     (2.126)

    अर्थ-‘जो द्विजाति अािवादन के उत्तर में अभिवादन करना नहीं जानता अर्थात् अभिवादन का विधिवत् उत्तर नहीं देता, बुद्धिमान् को उसे अभिवादन नहीं करना चाहिए, क्योंकि जैसा शूद्र होता है वह वैसा ही है। अर्थात् उसको शूद्र समझना चाहिए, चाहे वह किसी भी उच्चवर्ण का हो।’ इससे यह भी संकेत मिलता है कि शिक्षितों की परपरा को न जानने वाला अशिक्षित व्यक्ति शूद्र होता है। निष्कर्ष यह है कि शूद्रत्व मुयतः अशिक्षा पर आधारित होता है।

(ङ) अब वर्णपतन का एक महत्त्वपूर्ण प्रमाण लीजिए। मनु की कर्मणा वर्णव्यवस्था में केवल वर्णपरिवर्तन और वर्णपतन ही नहीं होता था अपितु बालक या युवक वर्णव्यवस्था से बाह्य भी हो जाता था अर्थात् आर्यत्व से ही पतित हो जाता था। मनु की कर्मणा वर्णव्यवस्था में शिक्षा का बहुत महत्त्व था और उसे सर्वोच्च प्राथमिकता थी। निर्धारित आयु में उपनयन संस्कार न कराने वाला और किसी वर्ण की शिक्षा-दीक्षा न प्राप्त करने वाला युवक आर्य वर्णों से बहिष्कृत कर दिया जाता था और उसके सभी वैधानिक व्यवहार वर्जित हो जाते थे। जन्म से वर्ण मानने पर ऐसा विधान करना संभव नहीं हो सकता, अतः यह कर्म पर आधारित वर्णव्यवस्था की प्रक्रिया थी-

अत ऊर्ध्वं त्रयोऽप्येते यथाकालमसंस्कृताः।

सावित्रीपतिता व्रात्याः भवन्त्यार्यविगर्हिताः।। (2.39)

नैतैरपूतैर्विधिवदापद्यपि   हि कर्हिचित्।

ब्राह्मान्यौनांश्च सबन्धानाचरेद् ब्राह्मणः सह॥ (2.40)

    अर्थ-निर्धारित अधिकतम आयु में भी शिक्षाप्राप्ति के लिए उपनयन संस्कार न कराने वाले युवक सावित्रीव्रत से पतित (उपनयन के अधिकार से वंचित) हो जाते हैं। ये ‘व्रात्य’ आर्यों द्वारा निन्दित एवं बहिष्कृत होते हैं। कोई भी द्विज इन पतितों के साथ वैधानिक अध्ययन-अध्यापन एवं विवाह सबन्धों को न रखे।’

आर्य वर्णव्यवस्था से बहिष्कृत या पतित ये व्यक्ति यदि पुनः किसी वर्ण में शिक्षार्थ दीक्षित होना चाहते थे तो उसका अवसर भी उन्हें प्राप्त था। ये प्रायश्चित्त करके वर्णव्यवस्था में समिलित हो सकते थे (मनु0 11.191-192, 212-214)।

शूद्र द्वारा उच्च वर्ण की प्राप्ति का मनुप्रोक्त विधान: डॉ सुरेन्द्र कुमार

वैदिक अर्थात् मनु की वर्णव्यवस्था और जातिव्यवस्था में एक बहुत बड़ा अन्तर यह है कि व्यक्ति को आजीवन वर्णपरिवर्तन की स्वतन्त्रता होती है। वर्णव्यवस्था में वर्णपरिवर्तन हो सकता है जबकि जातिव्यवस्था में जहां जन्म हो गया, जीवनपर्यन्त वही जाति रहती है। मनु की व्यवस्था वर्णव्यवस्था थी, क्योंकि उसमें व्यक्ति को आजीवन वर्ण-परिवर्तन की स्वतन्त्रता थी। इस विषय में पहले मनुस्मृति का एक महत्त्वपूर्ण श्लोक प्रमाणरूप में उद्धृत किया जाता है जो सभी सन्देहों को दूर कर देता है-

(अ)    शूद्र से ब्राह्मणादि और ब्राहमण से शूद्र आदि बनना-

शूद्रो ब्राह्मणताम्-एति, ब्राहमणश्चैति शूद्रताम्।

क्षत्रियात् जातमेवं तु विद्याद् वैश्यात्तथैव च॥ (10.65)

    अर्थात्-‘ब्राह्मण के गुण, कर्म, योग्यता को ग्रहण करके शूद्र, ब्राह्मण बन जाता है और हीन कर्मों से ब्राह्मण शूद्र बन जाता है। इसी प्रकार क्षत्रियों और वैश्यों से उत्पन्न सन्तानों में भी वर्णपरिवर्तन हो जाता है।

(आ) शूद्र द्वारा उच्च वर्ण की प्राप्ति का मनुप्रोक्त विधान-

(क) श्रेष्ठ गुणों को ग्रहण और श्रेष्ठाचरण का पालन करके शूद्र उच्च वर्णों-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य का अधिकारी बन जाता है-

    शुचिरुत्कृष्टशुश्रूषुः       मृदुवागनहंकृतः।

    ब्राह्मणाद्याश्रयो नित्यमुत्कृष्टां जातिमश्नुते॥       (9.335)

    अर्थ-तन और मन से शुद्ध-पवित्र रहने वाला, उत्कृष्टों के सान्निध्य में रहने वाला, मधुरभाषी, अहंकार से रहित, अपने से उत्तम वर्णों-वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मणों के यहां सेवाकार्य करने वाला शूद्र अपने से उत्कृष्ट=वैश्य, क्षत्रिय या ब्राह्मण वर्ण को प्राप्त कर लेता है, अर्थात् वह जिस वर्ण की योग्यता अर्जित कर लेगा उसी वर्ण को धारण करने का अधिकारी बन जायेगा। (यहां जाति शब्द का अर्थ ‘वर्ण’ है। प्रमाण के लिए इसी अध्याय में देखिए-‘मनुस्मृति में जाति शब्द वर्ण और जन्म का पर्याय’ शीर्षक पृ0 90-91 पर)

(ख) मनुस्मृति में, उपर्युक्त सिद्धान्त को नष्ट करने के लिए इससे पहले एक श्लोक प्रक्षिप्त कर दिया है जिसमें यह दिााया गया है कि वर्णपरिवर्तन सातवीं पीढ़ी में होता है। ऐसा विचार मनु की मान्यता के विरुद्ध है। पीढ़ियों का हिसाब संभव भी नहीं है।

वर्णपरिवर्तन के उदाहरण भी भारतीय प्राचीन इतिहास में मिलते हैं और इस सिद्धान्त की पुष्टि-परपरा भी। मनुस्मृति के उक्त श्लोकों के भावों को यथावत् वर्णित करने वाले श्लोक महाभारत में भी उपलध होते हैं। यहां उस प्रसंग की कुछ पंक्तियां उद्धृत की जा रही हैं जिनसे मनुस्मृति की परपरा की पुष्टि होती है-

‘‘कर्मणा दुष्कृतेनेह स्थानाद् भ्रश्यति वै द्विजः।’’

‘‘ब्राह्मण्यात् सः परिभ्रष्टः क्षत्रयोनौ प्रजायते।’’

‘‘स द्विजो वैश्यतां याति वैश्यो वा शूद्रतामियात्।’’

‘‘एभिस्तु कर्मभिर्देवि,   शुभैराचरितैस्तथा।’’

शूद्रो ब्राह्मणतां याति वैश्यः क्षत्रियतां व्रजेत्।

(महाभारत, अनुशासन पर्व अ0 143, 7, 9, 11, 26)

    अर्थात्-दुष्कर्म करने से द्विज वर्णस्थ अपने वर्णस्थान से पतित हो जाता है।……क्षत्रियों जैसे कर्म करने वाला ब्राह्मण भ्रष्ट होकर क्षत्रिय वर्ण का हो जाता है।……..वैश्य वाले कर्म करने वाला द्विज वैश्य और इसी प्रकार शूद्र वर्ण का हो जाता है। हे देवि! इन अच्छे कर्मों के करने और शुभ आचरण से शूद्र, ब्राह्मणवर्ण को प्राप्त कर लेता है और वैश्य, क्षत्रिय वर्ण को। इसी प्रकार अन्य वर्णों का भी परस्पर वर्ण-परिवर्तन हो जाता है।

(ग) महाभारत का एक अन्य श्लोक जो दो स्थानों पर आया है मनुस्मृति की कर्माधारित वर्णव्यवस्था की पुष्टि करता है तथा कर्मानुसार वर्णपरिवर्तन के सिद्धान्त को प्रस्तुत करता है-

शूद्रे तु यत् भवेत् लक्ष्म द्विजे तच्च न विद्यते।

न वै शूद्रो भवेत् शूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मणः॥

(वनपर्व 180.19; शान्तिपर्व 188.1)

    अर्थात्-शूद्र में जो लक्षण या कर्म होते हैं वे ब्राह्मण में नहीं होते। ब्राह्मण के कर्म और लक्षण शूद्र में नहीं होते। यदि शूद्र में शूद्र वाले लक्षण न हों तो वह शूद्र नहीं होता और ब्राह्मण में ब्राह्मण वाले लक्षण न हों तो वह ब्राह्मण नहीं होता। अभिप्राय यह है कि लक्षणों और कर्मों के अनुसार ही व्यक्ति उस वर्ण का होता है जिसके लक्षण या कर्म वह ग्रहण कर लेता है।

(घ) यह परपरा सूत्र-ग्रन्थों में भी मिलती है। आपस्तब धर्मसूत्र में बहुत ही स्पष्ट शदों में उच्च-निन वर्णपरिवर्तन का विधान किया है-

धर्मचर्यया जघन्यो वर्णः पूर्वं पूर्वं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तौ।

अधर्मचर्यया पूर्वो वर्णो जघन्यं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तौ॥

(1.5.10-11)

    अर्थ-निर्धारित धर्म के आचरण से निचला वर्ण उच्च वर्ण को प्राप्त कर लेता है, उस-उस वर्ण की वैधानिक दीक्षा लेने के बाद। इसी प्रकार अधर्माचरण करने पर उच्च वर्ण निचले वर्ण में चला जाता है, आचरण के अनुसार वर्णपरिवर्तन की वैधानिक स्वीकृति या घोषणा होने के बाद।

वर्णों के नामों का अर्थ एवं व्युत्पत्ति-डॉ सुरेन्द्र कुमार

व्याकरण की भाषा में कहें तो वर्णों के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र नाम यौगिक पद हैं और गुणवाचक हैं। इन नामों में ही इनके कर्त्तव्यों का संकेत निहित है। वैदिक संस्कृत के इन शदों की रचना और व्युत्पत्ति इस प्रकार है-

    (क) ब्राह्मण-‘ब्रह्मन्’ पूर्वक ‘अण्’ प्रत्यय के योग से ‘ब्राह्मण’ पद बनता है। ब्रह्म के वेद, ईश्वर, ज्ञान आदि अर्थ हैं।        ब्रह्मणा वेदेन परमेश्वरस्य उपासनेन सह वर्तमानः ब्राह्मणः=ब्रह्म अर्थात् वेदपाठी, परमेश्वर के उपासक और ज्ञानी गुण वाले वर्ण या व्यक्ति को ‘ब्राह्मण’ कहा जाता है। जिसमें ये गुण नहीं, वह ब्राह्मण नहीं है।

    (ख) क्षत्रिय-‘क्षत’ पूर्वक ‘त्रै’ धातु से ‘उ’ प्रत्यय होकर ‘क्षत्र’ पद बनता है। क्षत्र ही क्षत्रिय कहलाता है। ‘क्षदति रक्षति जनान् सः क्षत्रः’ = जो प्रजा की सुरक्षा, संरक्षा करता है, उस गुणवाले को ‘क्षत्रिय’ या ‘क्षत्रियवर्ण’ कहते हैं। आज उसे राजा, राजनेता, सेनाधिकारी या सैनिक कहते हैं।

    राजन्य-यह क्षत्रिय का पर्याय है। ‘राजन्’ पूर्वक ‘यत्’ प्रत्यय से यह सिद्ध होता है। प्रजाओं की रक्षा करने वाले ‘राजन्य’ कहलाते हैं। ये प्रजाओं की रक्षा के लिए सदा उद्यत रहते हैं।

    (ग) वैश्य-‘विश’ से ‘यत्’ और ‘अण्’ प्रत्यय होकर ‘वैश्य’ पद की रचना होती है। ‘विशति पण्यविद्यासु सः वैश्यः’ = जो वाणिज्य विद्याओं में प्रविष्ट रहता है, संलग्न रहता है, उस गुण वाले को वैश्यवर्ण या वैश्य कहते हैं। आज उसे व्यापारी कहते हैं। जिसमें ये गुण नहीं वह वैश्य नहीं कहला सकता।

    (घ) शूद्र-‘शु अव्यय पूर्वक ‘द्रु गतौ’ धातु से’ ‘ड’ प्रत्यय के योग से ‘शूद्र’ बनता है ‘शु द्रवति इति’= जो स्वामी की आज्ञा से इधर-उधर आता-जाता है अर्थात् जो सेवा या श्रम का कार्य करता है। अथवा, ‘शुच्-शोके’ धातु से औणादिक ‘रक्’ प्रत्यय और च को द होकर शूद्र शब्द बनता है [उणादि0 2.19]। ‘शोच्यां स्थितिमापन्नः’ = जो अपनी निन जीवन स्थिति से चिन्तायुक्त रहता है कि मैं निन वर्ण का क्यों रहा, उच्च वर्ण का क्यों नहीं हुआ! इस कारण चतुर्थ वर्ण का नाम ‘शूद्र’ है। यह ‘एक-जाति’ अर्थात् एक जन्म वाला (दूसरे ‘विद्या जन्म’ से रहित) होने से अनपढ़ या विधिपूर्वक अशिक्षित होता है। आज उसे सेवक, चाकर, परिचारक, अर्दली, श्रमिक, सर्वेंट, पीयन आदि कहते हैं। विधिवत् शिक्षित और उपर्युक्त तीन वर्णों का कार्य करने वाले शूद्र नहीं कहे जा सकते

    (ङ) डॉ0 अबेडकर का मत-डॉ0 अबेडकर ने मनुस्मृति के श्लोक ‘‘वैश्यशूद्रौ प्रयत्नेन स्वानि कर्माणि कारयेत्’’ (8.418) का अर्थ करते हुए शूद्र का ‘मजदूर’ अर्थ स्वीकार किया है-

‘‘राजा आदेश दे कि व्यापारी तथा मजदूर अपने-अपने कर्त्तव्यों का पालन करें।’’ (अबेडकर वाङ्मय, खंड 6, पृ. 61)

डॉ0 अबेडकर का यह सही अर्थ है। ऐसी मान्यता स्वीकार कर लेने पर ‘शूद्र’ शब्द को घृणास्पद मानने का कोई औचित्य नहीं।