असरदार और ताकतवर ढंग से जवाब चाहता है पाकिस्तान शिवदेव आर्य गुरुकुल-पौन्धा, देहरादून Mobi.- 08810005096

भारत एक शान्तिप्रिय व सद्व्यवहार को बढ़ावा देने वाला देश है। जो प्रति क्षण प्रत्येक की उन्नति में स्वयं की उन्नति को स्वीकार करता है। शायद इसी कारण से भारत की ओर से पाकिस्तान के साथ दोनों देशों में शान्ति बनायें रखने के लिए वार्ता करने की कोशिश की जाती रही है। लिखित रूप से भी कई बार वार्तायें हो चुकी हैं किन्तु कोई ठोस हल नहीं निकल पा रहा है। पाकिस्तान अपना छद्म भरा चहरा कुछ काल के लिए तो छुपा लेता है किन्तु अत्यल्प काल में ही अपने असली विषैले रूप में आ जाता है।

जैसे अभी पाकिस्तान  के वजीर-ए-आजम नवाज शरीफ ने कुछ दिनों पहले हमारे प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के साथ रूस में बैठ कर कुछ खास ऐलानों पर हस्ताक्षर किये। जिस ऐलान में कहा गया था कि दहशदगर्दी को खत्म करने के लिए दोनों मुल्क उद्यत हैं और इसका कोई रंग नहीं होता, किन्तु नवाज़ शरीफ ने अपने देश पहुॅंचते ही अपना बयान बदल कर खूनी कलम चला दी। ऐसे अविश्वनीय देश के लिखे या कहे वादों पर जो यकीन या विश्वास करता है तो वह खुद ही एक तमाशा बनने लग जाता है। क्या जनवरी २॰॰४ में अटल बिहारी वाजपेयी को पकड़ाये गये उस कागज का कोई वजूद नहीं है, जिसमें परवेज मुशर्रफ ने लिखा था कि पाकिस्तान के जेरे साया वाली जमीन का प्रयोग भारत के खिलाफ दहशदगर्दी के लिए किसी कीमत पर नहीं होगा? क्या सन् १९७२ में शिमला समझौते में लिखे गये वो वाक्यांश जिनमें जुल्फिकार अली भुट्टो ने इंदिरा गांधी को लिख कर दिया था कि कश्मीर मसले के हल के लिए दोनों देश के नीति-नियन्ता सही वक्त पर बातचीत की मेज पर बैठेंगे? और तो और २00६ में डाॅ. मनमोहन सिंह को परवेश मुशर्रफ ने यहाॅं तक लिख कर दे दिया था कि दोनों मुल्क दहशदगर्दी के खात्मे के लिए मिलकर साथ देंगे और इसके लिए एक नया नेटवर्क तैयार करेंगे? किन्तु प्रत्येक बार भारत  को धोखेबाजी के सिवाए और मिला ही क्या है?

अब हमारे प्रधानमन्त्री पर दबाव बनाया जा रहा है कि पाकिस्तान से बात करें। अरे कोई समझता क्यों  नहीं? अब भी कोई कसर शेष रह गयी है? जिस देश ने अपना इमान बेच दिया हो, उससे किस मुख से बात की जाए। हमेशा की तरह वह अपनी बात से मुकर जाता है। जिस देश को बात ही करनी नहीं आती उससे बात करके क्या लाभ?  जैसे जुलाई मास में कहा गया था कि पाकिस्तान की ओर से कोई संघर्ष विराम का उल्लंघन नहीं किया जायेगा। किन्तु पाकिस्तानी सेना ईद-उल -फितर जैसे सुख-समृध्दि के पर्व पर भी खूनी जंग करने और शान्ति के माहौल को और बिगाड़ने से बाज नहीं आता।

इसका जीता जागता उदाहरण हमें जम्मू-कश्मीर के राजौरी और पुंछ सैक्टर में मिला, जहाॅं पाकिस्तानी सेना और रेंजरों ने छोटे-छोटे आग्नेयास्त्रों के जरिये कई  भारतीय चैकियों को निशाना बना कर  १८ जुलाई शनिवार को फिर से संघर्ष विराम का उल्लंघन किया गया।  अमृतसर के पास वाघा-अटारी सीमा पर त्यौहारों के दौरान एक-दूसरे को मिठाई देने की परम्परा का पाकिस्तानी रेंजरों ने निर्वाह करने से मना कर दिया अर्थात् उन्होंने सीमा सुरक्षा बल द्वारा भेंट की गई मिठाई लेने से मना कर दिया। इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि पाकिस्तान शान्ति के वातावरण की इच्छा नहीं रखता, अब शठ्ये शाठ्यं समाचरेत् इस सूक्ति को साकार करने का अवसर आ गया है।

पाकिस्तान ने भारत को अस्थिर व कमजोर करने के लिए एक और कदम शुरु किया है, जो आतंकवाद है। आतंकवाद की भारत में फैली विष बेल का जन्मदाता और कोई नहीं बल्कि यही पाकिस्तान है। अब यह बात तो निश्चित हो चुकी है कि पाकिस्तान के अस्तित्व को खतरा है। पाक के नापाक दिन शुरू हो गये हैं। उसे सबक सिखाने के लिए  ५६ इंच के सीने वाला अनोखा व्यक्तित्व आ चुका है। जब पाप की अति हो जाती है तब पापों के विध्वंस करने के लिए कोई भगवान् थोडे़ ही आते हैं बल्कि हममें से ही किसी एक को सामना करना पडता है।

शायद पाकिस्तान भारत को भूल गया है, जिस दिन पाकिस्तान के छक्के छुडा दिये थे। सन् १९७१ में हमारे भारतीय  नौजवान फौजी भाईयों ने कमाल ही कर दिया था। बांग्लादेश विभाजन के दौरान उनके ९०  हजार फौजियों को बंधक बना लिया था, यह देख उस देश के होश उड़ गये थे, और वह हमारे पैरों में गिड़गिड़ा कर नाक रगड़ रहा था। हम भी बड़े दयावान् हैं, हमे उनकी दशा को देखकर दया आ गयी और उन सब बन्दी बनाये गये सैनिकों को मुक्त कर दिया। यह देख सम्पूर्ण विश्व आश्चर्यचकित रह गया।

सीमा पर बढ़े तनाव और उसके चलते दोनों आरे के कुछ लोगों के मारे जाने के बीच भारत की ओर से केन्दीय गृह मन्त्री श्री राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान को कड़ी चेतावनी दी कि बिना उकसावे के फायरिंग और सीमा पार आतंकवाद का ‘असरदार और ताकतवर ढंग से’ जवाब दिया जाएगा।

दहशदगर्दी को अपना हथियार बनाने वाली पाकिस्तानी फौजों को उनकी सही यथार्थता (औकात)  बताने की जरूरत पड़ सकती है। इन फौजों को हम किसी मुल्क की फौज कैसे कह सकते हैं, जो सिर्फ मजहब पर ईमान लाकर लड़ाईयाॅं लडती हो? हमें ध्यान रखना होगा कि सीरिया की इस्लामी स्टेट (आईएस) के दहशदगर्दों और पाकिस्तान की फौजों में ज्यादा अन्तर नहीं है। इसलिए बातचीत के नतीजे कुछ भी  हो नहीं सकते। कितनी बार हम पाक के नापाक इरादों से भरे कागजी पन्नों को पढ़ चुके हैं, काजगों में तो कुछ भी लिख देते हैं, किन्तु आज भारत को सावधान होना  पडे़गा, पाकिस्तान को करारा वाचिक जवाब न देकर   सीधा कार्यान्वयन हो तो ज्यादा उचित रहेगा। एक ऐसे ही क्षण की प्रतिक्षा प्रत्येक देशवासी काफी लम्बे समय से कर रहें हैं।

स्तुता मया वरदा वेदमाता-12

ज्यायस्वन्तश्चित्तिनो मा वि यौष्ट संराधयन्तः सधुराश्चरन्तः

अन्योऽन्यस्मै वल्गु वदन्त एत सध्रीचीनान्वः संमनसस्कृणोमि।।

– अथर्व. 3/30/5

परमेश्वर कहता है मनुष्यों इस घर में रहने के लिए रहने वालों के हृदय विशाल होने चाहिए। मनुष्य का दिल बड़ा होने पर ही सबका उसमें समायोजन  हो सकता है। मनुष्य शरीर से लबा-चौड़ा होने पर हृदय भी उसका विशाल हो यह अनिवार्य नहीं है। आकार प्रकार में छोटे लगने वाले मनुष्य का दिल बड़ा हो सकता है, बड़े शरीर का मन छोटा हो सकता है। मनुष्य को उसके पास विद्यमान सामग्री थोड़ी लगती है, तब उसका हृदय संकुचित होता है। उसे भय लगता है मेरी वस्तु समाप्त हो जायेगी। मैं दरिद्र या अभावग्रस्त हो जाऊँगा। मनुष्य संकुचित विचारों वाला होता है, तब स्वार्थी बन जाता है। उसका स्व का घेरा छोटा होता है। व्यक्ति का स्व जितना छोटा होगा, मनुष्य उतना ही अधिक अन्याय और पक्षपात करता है। जब वह अपने को केवल अपने तक सीमित करता है, तब वह अपने से अधिक नहीं सोच पाता। घर परिवार में रहता हुआ भी व्यक्ति केवल अपनी चिन्ता करता है, अपने परिवार के अन्य सदस्यों के विषय में नहीं सोचता। मनुष्य स्वार्थी होता है, तो वह अपनी वस्तुओं का उपयोग केवल स्वयं करता है। ऐसे में एक मानसिकता ऐसे लोगों में देखी जाती है। वह अकेले ही भोजन करता है। वह दूसरे से भयभीत होकर औरों से छिपकर भोजन करना पसन्द करते हैं। साधनों का अपने लिये ही संग्रह करता है। मनुष्य अपने संस्कारों से व्यवहार करता है। यह संस्कार उसके पहले विचारों का परिणाम होता है। इन संस्कारों को श्रेष्ठ बनाकर सुधारा जा सकता है। यह विद्या व ज्ञान के प्राप्त करने से किया जाता है। इसके साथ उदार लोगों के संसर्ग से साधु-सन्तों के उपदेश से चित्त के संस्कारों में अन्तर लाया जा सकता है। मनुष्य के मन में विचारों की उदारता से ही मनुष्य सबको साथ लेकर चल सकता है। सब मनुष्य एक से नहीं होते हैं। सब अच्छे नहीं होते तो सब बुरे नहीं होते। मनुष्य के अन्दर अच्छा बुरा बनने की अपार सभावना होती है। अतः मनुष्य को बुराई से बचाकर अच्छाई की ओर ले जाने का प्रयत्न करना चाहिए, इसका उपाय है जो अपने से कम है उसको साथ लेकर चलना इसके लिए मनुष्य को सहनशील होना पड़ता है। अपनी वस्तु उनको बांटनी पड़ती है, जिनके पास नहीं है। जो अभाव-ग्रस्त है, उसकी सेवा सहायता करना, हमारे द्वारा तभी सभव है जब हमारा हृदय विशाल हो।

मनुष्य के विस्तार की सीमा उसके विचारों के साथ घटती बढ़ती है। एक मनुष्य जो केवल अपने लिए सोचता था, उससे वह बड़ा है, जो अपने परिवार के लिए सोचता है। परिवार में कोई पति-पत्नी बच्चे को ही अपना परिवार समझता है, तो दूसरा माता-पिता को भी समिलित करता है। तीसरा अपने माता-पिता जी अपने भाई-बहन, उनके परिवार सगे सबन्धियों को भी अपने परिवार में मानता है। इसमें कितने बड़े रूप में अपने परिवार को स्वीकार करना चाहिए। उसका एक ही नियम है, विचारों की दृ`िष्टि से सभी मनुष्य और प्राणिमात्र मनुष्य के परिवार में आते हैं। साधनों के विचार से जितने अधिक साधन जिसके पास है, वह अपने परिवार केा उतना विस्तार दे सकता है, उतना बड़ा बना सकता है। कम साधन होने पर परिवार के कर्त्तव्य, उत्तरदायित्व के साथ निश्चित होते हैं, परिवार में सदस्यों की आवश्यकता और साधनों की प्राप्ति और उनके वितरण में मनुष्य के हृदय की विशालता का पता चलता है। संकुचित हृदय बहुत साधन होने पर भी देने में भरोसा नहीं करता। विशाल हृदय कम साधन होने पर भी वितरण में कष्ट अनुभव नहीं करता। हृदय की विशालता का अभिप्राय अपना सब कुछ सब में बांट देना नहीं है। अपने परिवार के लिए साधन जुटाना अपने बच्चों को पढ़ाना-लिखाना व्यक्ति का कर्त्तव्य है। उनको छोड़कर अन्य को पढ़ाना ये हृदय की विशालता नहीं है। अपनों के प्रति उत्तरदायित्व का निर्वाह करते हुए भी दूसरे का सहयोग करना, न कर पाने की स्थिति में सहयोग की भावना रखना, हृदय की विशालता का परिचायक है। सहयोग, सहानुभूति, समर्थन मनुष्य के विशाल हृदय का परिचायक है।

मन्त्र में परिवार को साथ लेकर चलने के लिये सन्देश दिया है। उपाय बताया है ज्यायस्व अन्तश्चित्तिनो बनना है। ज्यायस्व बनने का अर्थ है- समर्थ बनना। समर्थ कैसे बन सकते हैं, उसके लिए वेद कहता है- अन्तश्चित्तिनः बनना होगा। बड़े बनने का उपाय है, चित्त को अन्दर से विकसित करना है। चित्त को अन्दर से विकसित करने का उपाय चित्त को विद्या से युक्त करना, चित्त को सज्ञान करना-कराना। सामान्य प्रकृति के प्राणी में संकोच, स्वार्थ संकीर्णता होती है, विद्या, शास्त्र अध्ययन, उपदेश से ही इस संकीर्णता को स्वार्थ को दूर किया जा सकता है, इसीलिए वेद ने कहा परिवार में समझ को विकसित करके मनुष्य को हृदय बड़ा करना होगा, कहा गया है-

ज्यायस्वान्ताश्चित्तिनो।।

 

सूर्य नमस्कारः सर्वोत्तम व्यायाम भी, धर्म भी : डॉ धर्मवीर

प्रधानमन्त्री मोदी के प्रयासों से इक्कीस जून का दिन योग दिवस के रूप में मनाने की घोषणा हुई। कुछ लोगों को क्योंकि मोदी के नाम से ही चिड़ है, अतः मोदी का नाम आते ही उनका मुंह कड़वा हो जाता है। फिर योग दिवस का सबन्ध मोदी के नाम से जुड़ गया तो योग भी उनके लिए कड़वा हो गया और वे थूकने के लिये मजबूर हैं। ऐसे लोगों का कहना है कि योग हिन्दुओं का है। योग साप्रदायिक है। सूर्य नमस्कार नहीं करेंगे क्योंकि मुसलमान खुदा के अतिरिक्त किसी के सामने सिर नहीं झुकाता। उनको …….. और स्पष्टीकरण देने वालों की भी कमी नहीं। लोग कहते हैं योग धार्मिक नहीं। सूर्य नमस्कार व्यायाम है, धर्म नहीं। ये बेचारे जानते नहीं कि हमारे सब किये जाने वाले काम धर्म ही होते हैं। जिस-जिस बात को हम धर्म मानते हैं, क्या ईसाई और मुसलमान उनको करना छोड़ देंगे या उनको मानना छोड़ देंगे? हम सत्य बोलना धर्म समझते हैं, आप सत्य बोलना-छोड़ना पसन्द करेंगे या झूठ बोलना स्वीकार करना चाहेंगे? हमारे यहाँ कौन-सा भला काम है जिसकी धर्म में गणना नहीं की गई। हमारे यहाँ माता-पिता की, गुरुजनों की, पीड़ितों की, असमर्थों की सेवा और रक्षा करना धर्म है। इनसे पूछो, ये क्या अपने बड़ों को, महापुरुषों को, देवी-देवताओं को, भगवानों को जूते मारने का विधान करेंगे। हमारे यहाँ जीवन की हर क्रिया श्रेष्ठ रूप में की जा सके, अतः धर्म के साथ जोड़ा गया है, फिर तो आपको हमारा धर्म स्वीकार करना पड़ेगा या मृत्यु को अपनाना पड़ेगा। इच्छा आपकी है, आप कौन सा विकल्प स्वीकार करेंगे? अतः यह तर्क कि योग, सूर्य नमस्कार, व्यायाम करना हिन्दू धर्म है, अतः हम ऐसा नहीं करेंगे। हमारे यहाँ जीना धर्म है, तो क्या आप मरोगे। यह सब आपकी अज्ञानता और राजनीतिक धूर्तता है।

सूर्य नमस्कार एक सर्वांगीण व्यायाम है। इससे न केवल शरीर स्वस्थ होता है अपितु मानसिक, बौद्धिक विकास भी होता है। पशु-पक्षी और प्राणी, जो वनों में स्वतन्त्रता से विचरते हैं, उन्हें भोजन और सुरक्षा के लिए बहुत परिश्रम करना पड़ता है, अतः पृथक् से व्यायाम की आवश्यकता नहीं होती। मनुष्य बहुत कम परिश्रम से या बिना परिश्रम के ही भोजन सामग्री और सुविधायें प्राप्त कर लेता है। अतः उसका परिश्रम भी कम हो गया। परिश्रम कम होने से शरीर की क्रियायें प्रभावित होती हैं। इससे मनुष्य का जीवन चक्र प्रभावित होता है। उसका शरीर रोग, दुर्बलतादि से प्रभावित होने लगता है। जैसे व्यय और संचय में सन्तुलन बिगड़ जाये या प्राप्ति अधिक हो जाये तो संग्रह बढ़ता जाता है, उसकी प्रकार मनुष्य बिना श्रम के भोजन करता रहता है तो मनुष्य के शरीर में भोजन का संग्रह होने लगता है। शरीर में चर्बी जमा होने लगती है। अधिक खाने से पाचन तन्त्र पर अधिक भार पड़ने से वह बिगड़ने लगता है, मनुष्य रोगी हो जाता है, उसके अन्दर आलस्य, प्रमाद के कारण शिथिलता आती है। जीवन रोगयुक्त भार बन कर दुःख का कारण बन जाता है। जीवन व्यर्थ लगने लगता है। अतः आज की परिस्थिति में शुद्ध अन्न, जल, हवा की आवश्यकता है, उसी प्रकार व्यायाम के द्वारा शरीर सक्रिय व स्वस्थ रखने की आवश्यकता है।

इस तथ्य को ध्यान में रखकर विद्यालयों-महाविद्यालयों में छात्रों के लिये व्यायाम और खेलों की व्यवस्था की जाती है। ये व्यायाम और खेल बहुत साधन, स्थान और समय माँगते हैं। ये सब उपाय समाज में सबको सुलभ नहीं होते, अतः शरीर को स्वस्थ रखने के लिए ऐसा विकल्प चाहिए जो सबको सदा सभी स्थानों पर सुलभ हो। सूर्य नमस्कार इस प्रकार का व्यायाम है, जो सबके लिए सब स्थानों पर सुलभ है। अन्य व्यायाम जैसे कोई खेल खेलने के लिए मैदान या खेल के स्थान की आवश्यकता होती है। कुश्ती के लिए साथी और अखाड़े की जरूरत होती है। तैरने के लिए तालाब, पानी की आवश्यकता होती है। दण्ड-बैठक करने के लिए एकान्त स्थान या व्यायामशाला की सुविधा अपेक्षित है। घूमने के लिए शुद्ध हवा का लबा-चौड़ा स्थान चाहिए। क्रिकेट, फुटबाल, हॉकी, कबड्डी आदि सभी खेलों की सुविधा सबको प्राप्त नहीं होती। ये सभी व्यायाम शरीर की मांसपेशियों को पुष्ट करते हैं, शरीर को बलवान बनाते हैं परन्तु आन्तरिक भाग पर बहुत प्रभावशाली नहीं होते।

सूर्य नमस्कार इन सब प्रश्नों का एक मात्र समाधान है। व्यायाम करने से शरीर के विशेष अंगों पर प्रभाव पड़ता है, वहाँ सूर्य नमस्कार करने से पाँच संस्थान पर पूरा प्रभाव पड़ता है, आँतें-यकृत-प्लीहा (जिगर, तिल्ली) आदि। इनसे अग्निमान्ध, अजीर्ण, मलावरोध आदि उदर रोग के निवारण में सहायता मिलती है। सूर्य नमस्कार में श्वास-प्रश्वास की विशेष क्रिया होती है जिससे हृदय तथा फेफड़ों का व्यायाम होता है तथा खाँसी, दमा जैसे रोगों में लाभ होता है। इसके अतिरिक्त नाड़ी संस्थान, कमर, रीड की हड्डी का भी व्यायाम सूर्य नमस्कार करने से ठीक हो जाता है। इस प्रकार सभी देशी-विदेशी व्यायामों में सूर्य नमस्कार सबसे श्रेष्ठ व्यायाम है। यह व्यायाम बालक-वृद्ध-युवा-स्त्री सभी वर्ग के व्यक्तियों को करना सभव है। सभी को इससे लाभ प्राप्त होता है। आयु और सामर्थ्य के अनुसार इसे कम अधिक कर सकते हैं। इसे कहीं भी, किसी भी आयु का व्यक्ति प्रारभ कर सकता है और आजीवन इसे करता रह सकता है।

सूर्य नमस्कार में नमस्कार शद का ग्रहण इसलिये किया गया है क्योंकि इस आसन को करते हुए साष्टांग नमस्कार की मुद्रा बनती है। अष्टांग नमस्कार में मस्तक, छाती, दो हाथ, दो घुटने, दो पैर, इनके साथ दृष्टि, वाणी, मन भी इसी क्रिया में लगे होते हैं। इस नमस्कार मुद्रा को सूर्योदय के समय किया जाता है, इसलिये इसे सूर्य नमस्कार कहते हैं। इस आसन को सूर्योदय के समय करने से इस व्यायाम का समय निश्चित होता है तथा सूर्य की रश्मियों का लाभ व्यायामकर्त्ता को मिलता है। आजकल की जीवन पद्धति में नगरों में कार्य करने वाले और भीड़ भरे मकानों में रहने वाले और वातानुकूलित कक्षों में दिन का अधिक समय बिताने वाले लोग सूर्य के प्रकाश से वञ्चित हो जाते हैं। सूर्य के प्रकाश के सेवन के अभाव से चिकित्सकों का मानना है कि मनुष्य के शरीर में विटामिन डी की कमी हो जाती है, अतः प्रत्येक मनुष्य को प्रतिदिन सूर्य की धूप का सेवन करना चाहिए। सूर्य नमस्कार करने से उदय होते हुए सूर्य की किरणें सूर्य नमस्कार करने वाले को सहज मिलती हैं। जिससे अतिरिक्त स्वास्थ्य लाभ होता है। भारतीय जीवन शैली में जिन वस्तुओं का मनुष्य उपयोग करता है, उनके प्रति समान प्रकाशन के लिए देवता का भाव दिया जाता है। इसलिये सूर्य को देव कहकर सूर्य के बारह नामों का उपयोग करके बारह बार उसका उच्चारण करते हैं। वेद के सूर्य विषयक मन्त्र के छोटे-छोटे खण्ड कर, उनके प्रारभ में ओम तथा अन्त में नमः जोड़कर मन्त्र बनाया गया है। ऐसा करने से एक कार्य उपासना में बदल जाता है। व्यायाम उपासना बन जाती है। किसी को मन्त्र से चिड़ है तो वह यह व्यायाम बिना मन्त्र के कर सकता है। इसमें आग्रह-दुराग्रह की कोई बात नहीं है।

सूर्य नमस्कार करने की पद्धति है, व्यक्ति को प्रातःकाल सूर्योदय के पूर्व व्यक्ति को हल्के, ढ़ीले कपड़े पहनने चाहिए, खाली पेट, सामान्य दिनचर्या के कार्य करके सूर्य नमस्कार की क्रिया करनी चाहिए। इस सूर्य नमस्कार में पहली स्थिति अवस्थान है, इस पहली मुद्रा में पहली स्थिति बनती है। दूसरी स्थिति जानु आसन, जिसमें सिर घुटनों पर लगता है। तीसरे आसन में दोनों हाथ आगे रखकर दृष्टि ऊपर होती है, इसे ऊर्ध्वेक्षण कहते हैं। चौथी स्थिति में पूरे शरीर का हाथ पैर पर सन्तुलन बनाया जाता है, इसे तुलितवपु आसन कहते हैं। पाँचवी स्थिति साष्टांग दण्डवत् की स्थिति होती है। छठे आसन में हाथों पर सिर ऊपरकर कमर को मोड़कर पीछे की ओर देखने का प्रयत्न होता है। कशेरूका संकोच का आसन है। सातवां आसन हाथ पैर के आधार पर ऊपर उठने से और सामने झुकने से रीढ की हड्डी के जोड़ खुलते हैं।

आठवें आसन के रूप में दोनों हाथों के मध्य पैर को लाकर ऊपर की ओर देखना पुनः ऊर्ध्वेक्षण है। नौवें आसन के रूप में खड़े होकर फिर जानु आसन की स्थिति बनती है। इसमें हथेलियाँ भूमि पर और सिर घुटनों पर होता है। दसवीं स्थिति पुनः हाथ जोड़ कर अंगूठे, हृदय के साथ लगाते हुए नमस्कार की मुद्रा बनती है। इन आसनों का एक चक्र एक सूर्य नमस्कार होता है।

इस प्रकार इन आसनों के करने से गर्दन, छाती, कमर, पैर, पेट, जांघे, पिण्डलियाँ, स्नायु, पाचन तन्त्र, पीठ, गला, गर्दन, यकृत, तिल्ली, फेफड़े, पृष्ठवंश, आदि मजबूत होते हैं। सूर्य नमस्कार करने से इच्छा शक्ति दृढ़ होती है, मनोबल बढ़ता है। दृष्टि शक्ति बढ़ती है। मन्त्रपाठ से वाणी की शक्ति बढ़ती है। इस प्रकार सूर्य नमस्कार एक सर्वांगीण व्यायाम है। सूर्य नमस्कार श्वास-प्रश्वास के साथ किया जाता है, इस तरह व्यायाम के साथ इसमें प्राणायाम की क्रिया भी होती है। पहले आसन में श्वास के अन्दर लेने से पूरक, दूसरे में रोककर रखने से कुभक होता है। तीसरे आसन में पूरक, कुभक तथा चौथे आसन में कुभक, फिर पाँचवें आसन में कुभक और रेचक प्राणायाम होता है। छठे आसन में फिर पूरक कुभक, सातवें में कुभक, आठवें में कुभक, नवम में कुभक के साथ एक किया जाता है। इस प्रकार पूरे सूर्य नमस्कार आसनों के साथ प्राणायाम की क्रिया जुड़ी होने से इसका लाभ अनेक गुणा बढ़ जाता है। सूर्य नमस्कार से जितना लाभ होता है, उतना लाभ किसी अन्य व्यायाम से नहीं होता।

भारतीय परपरा में एक अद्भुत विशेषता है, सामान्य से लगने वाले कामों से महत्त्वपूर्ण बातों का स्मरण करना तथा बड़े-बड़े लाभ के कामों को सिद्ध करना। इसलिये सूर्य नमस्कार में आसनों को सूर्य से जोड़ा है, सूर्य संसार का सबसे प्रथम और विशाल ऊर्जा का समुद्र है। मानव एवं प्राणी जगत् वनस्पतियों से ऊर्जा प्राप्त करता है और आज का वैज्ञानिक जानता है, सभी वनस्पति जगत् सूर्य से ऊर्जा प्राप्त करता है। सभी प्राणी वनस्पतियों को खाकर ऊर्जावान् बनते हैं। अतः मनुष्यों को भी सूर्य से ऊर्जा लेनी चाहिए। इसी उद्देश्य से सूर्य की रचना की गई है। वैदिक साहित्य में सूर्य को औषधियों का राजा कहा गया है। विदेशी लोगों को सूर्य का पर्याप्त प्रकाश नहीं मिलता, वे सूर्य स्नान की योजना करते हैं। सूर्य का प्रकाश न मिलने से वनस्पतियाँ पीली पड़कर नष्ट हो जाती है। मनुष्य भी सूर्य के प्रकाश के अभाव में निस्तेज होता है। सूर्य के प्रकाश और गर्मी के न मिलने से मनुष्य के शरीर से पसीना नहीं निकलता, शरीर के छिद्र न खुलने से शरीर को पर्याप्त प्राण वायु नहीं मिल सकता। इसलिए मनुष्य को अपने दैनिक जीवन में सूर्य के प्रकाश का सेवन करना चाहिए तथा व्यायाम करके शरीर की त्वचा को प्राणवायु प्राप्त करने में सक्षम बनाना चाहिए। जो पशु, गाय आदि सूर्य के प्रकाश में विचरण करते हैं, घास खाते हैं, उनके शरीर में सूर्य-किरणों के प्रभाव से उनके दूध में स्वर्ण का प्रभाव उत्पन्न होता है। मनुष्यों को भी प्रातः-सायं खुले शरीर से सूर्य के प्रकाश में भ्रमण करना चाहिए। सूर्य से लाभ प्राप्त करने के लिये ये पद्धति बनाई गई है, उसमें मूर्ति पूजा या जड़ पूजा की भावना करना नितान्त अज्ञान है। इस व्यायाम से स्वास्थ्य की वृद्धि होती है, रोगों का निवारण होता है और सब व्यायामों में बहुत धन व्यय होता है परन्तु सूर्य नमस्कार एक ऐसा व्यायाम है जिसमें एक पैसा भी खर्च नहीं होता। इसे धनी-निर्धन सभी स्वेच्छा पूर्वक कर सकते हैं। सूर्य नमस्कार करने वाला कभी रोगी नहीं हो सकता, जिन लोगों ने सूर्य नमस्कार का अयास किया है, उन लोगों का अनुभव है, इसके करने से पीठ और कमर के दर्द से छुटकारा मिलता है। पेट के कष्ट नहीं होते, महिलाओं को भी उनके रोगों में अत्यन्त लाभ मिलता है। बालक इस व्यायाम को करते हैं तो उनके बल, बुद्धि के साथ, उनके शरीर की लबाई भी आश्चर्यजनक रूप से बढ़ती देखी गई है। सूर्य नमस्कार का विरोध धार्मिक स्तर पर अज्ञानमूलक है और राजनीतिक स्तर पर एक धूर्तता पूर्ण कार्य है। इसके विरोध से राष्ट्र की स्वास्थ्य रूपी सपत्ति का नाश होगा, अतः इसे बिलकुल मान्यता नहीं देनी चाहिए। शरीर के स्वस्थ रखने का मूलमन्त्र है- भोजन, विश्राम और संयम अर्थात् उचित मात्रा में सात्विक भोजन समय पर करना, यथा समय  सोना, जागना और व्यायाम, संयम करना। अतः आचार्य चरक ने ठीक ही कहा है-

आहारो निद्रा ब्रह्मचर्यम् त्रय उपस्तभा शरीरस्य।

– धर्मवीर

अज्ञान से ज्ञान की ओर – आचार्य शिवकुमार आर्य

जो एकत्व भाव से सभी को देखता है, उसको मोह तथा शोक नहीं होता है-

यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः।

तत्र को मोहः कः शोकऽएकत्वमनुपश्यतः।।

यजु. 40-7

पदार्थ – (यस्मिन्) जिसमें-जिसके हृदय में। (सर्वाणि भूतानि) सभी प्राणी (आत्मा एव) आत्मा ही (अभूत) हैं (विजानतः) जानते हैं (तत्र) उसके हृदय में (कः मोहः) कैसा मोह (कः शोकः) कैसा शोक (एकत्वम्) एकता को (अनुपश्यतः) देखने वाले को।

अर्थ- जो सभी प्राणियों को आत्मा ही समझकर सब में एक जैसा अनुभव करता है, ऐसे व्यक्ति को कभी कोई मोह तथा शोक नहीं होता है। इन दोनों मन्त्रों में एक क्रम का वर्णन किया हैं। मनुष्य और अन्य प्राणियों में तीन प्रकार के रोग होते हैं। पहले का नाम है विचिकित्सा, दूसरे का नाम है मोह और तीसरे का नाम शोक है, परन्तु इन सभी दुःख निकायों का एक ही उपाय या समाधान है, जिसे कहते हैं समत्व। समत्व को व्यवहार के स्तर लाने के लिए प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार तथा यथायोग्य सभी के साथ व्यवहार करना चाहिए।

इन तीन प्रकार की व्यावहारिक भूलों के कारण मनुष्यों को अनेक कष्ट उठाने पड़ते हैं। इसी प्रकरण को योग शास्त्र में बड़े अच्छे प्रकार से स्पष्ट किया है-

‘‘मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां-

सुख-दुःख पुण्यापुण्यविषयाणाम् भावनातश्चित्तः प्रसादनम्’’

– योग. द. समाधिपाद-33

इस योगदर्शन के सूत्र में चित्त को प्रसन्न करने के चार उपाय बताये हैं। सुखी जनों को देखकर या मिलकर प्रसन्न होना तथा दीन-दुखियों को देखकर करुणा के भाव रखना चाहिये और इनको सहयोग प्रदान करना चाहिए। इसी प्रकार से सज्जन मनुष्य या पुण्यात्माओं में मुदिता (हर्ष) के भाव रखने चाहिये। चौथा है अपुण्यात्मा, अर्थात् दुष्ट, अधर्मी। उसके प्रति सज्जन जनों को सदैव उपेक्षा के भाव रखने चाहिये, क्योंकि दुष्ट व्यक्ति से दोस्ती तथा दुश्मनी-दोनों ही दुःखदायी होती हैं। इसी प्रकार से जो प्रतिपाद्य विषय है, उसमें एकता के स्थान पर अनेकता आती है, क्योंकि भिन्न-भिन्न वस्तु व व्यक्ति के स्वभाव अथवा गुणों को देखकर उसी प्रकार की वृत्ति बदलती है, तभी मानव सुखी व प्रसन्न चित्त रह सकता है, जब वह वस्तु के यथार्थ स्वरूप को देखे। सभी को सम दृष्टि से देखना तो सदैव अशान्ति का कारण होगा। वस्तुतः वेदमन्त्र प्रतिपादित ‘‘एकत्व’’ किसी अन्य बात को ही कह रहा है। जिस एकत्व के भाव से लोग मोह, शोकादि सभी अन्तर विकारों से शान्त या संयत हो जाते हैं, वह एकत्व क्या है? यह सर्वाधिक विचारणीय बिन्दु है। जो भौतिकवाद तथा आध्यात्मवाद के विषय को समता में लाने तथा अनेकता में ही एकता को स्थिर करने का नाम एकत्व या समत्व है। जैसे एक सन्तरे के फल में विभिन्न प्रकार के तत्त्व अथवा रसों के होने पर भी समत्व है, इसी प्रकार अन्य पदार्थों में अनेकता में एकता है। मानव शरीर में दस इन्द्रियाँ तथा चार अन्तःकरण हैं। मन, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार ये सभी मिलकर आत्मिक शान्ति को एक रूप में प्रकट करते हैं। मन तथा इन्द्रियों की अनेक क्रियाएँ एक ही सुखानुाूति को जन्म देती हैं तथा भिन्न-भिन्न, क्षणिक सुख बड़े सुखों में परिणित हो जाते हैं। इसी तरह समस्त जीवन के कर्म एक फल में समाहित हो जाते हैं। आत्मवत्- जो देखने का दृष्टिकोण है, वह यह नहीं कहता कि अच्छी-बुरी वस्तु या व्यक्ति को यथार्थ में मत देखो। आत्मवत् दर्शन का अभिप्राय है कि सभी जड़-चेतन व आत्मा-परमात्मा के यथार्थ स्वरूप को जानो तथा जानकर विषमता को हटाकर समता स्थापित करो। भिन्न-ािन्न पदार्थों का अपना-अपना एकत्व या समत्व है। उसी प्रकार से स्वयं आत्म तत्त्व की भी समसन्तुलन व एक अवस्था है। जो पदार्थ अपनी सच्ची शन्ति को भंग न कर सके और उस वस्तु के क्षणिक संसर्ग सुख के वशीभूत न हों, वह यथार्थ में एकत्व का स्वरूप है। समत्व को लाने के लिए इस आत्मा को न जाने कितने जन्म धारण करने पड़ेंगे। क्योंकि भौतिक वस्तुओं में तो सदैव एकत्व व समानता होती ही नहीं है, क्योंकि इन पदार्थों में एक रूपता सदैव रहती ही नहीं। ये सर्वदा बदलते रहते हैं। जैसे-शीत काल में वायु शीतल अनुभव होती है, परन्तु वही वायु ग्रीष्म ऋतु में गर्म प्रतीत होती है। जैसे व्यवहार में अभी एक व्यक्ति हमारा मित्र है, किन्तु वही व्यक्ति कुछ काल बाद हमारा दुश्मन बन जाता है। जिस भोजन से हमें जीवन मिल रहा है, वही भोजन अब विषम हो गया है और नाना प्रकार के रोग उत्पन्न कर रहा है। इस पंचभौतिक शरीर को कितने प्रयत्नों से पाला-पोषा था, किन्तु अब तो इसने जीवन जीने से स्पष्ट मना कर दिया। जो सभी सांसारिक सुखों का अधिकरण था, वही अंग-प्रत्यंग से शिथिल हो चुका है। वह अब नवीनीकरण चाहता है। वह सभी सुखों के स्थान पर दुःख देना प्रारभ कर देता है, अतः ध्यान देने योग्य बात यह है कि सुख-दुःख तथा शान्ति-अशान्ति कोई वस्तुनिष्ठ नहीं है। इनमें तो एकान्तिक नियम स्थापित किया ही नहीं जा सकता है, जिसके लिए वेद में उपदेश दिया जा रहा है। वस्तुतः कोई संशय तथा रोग व्यर्थ नहीं है, किन्तु उनका जो उत्पन्न होना है, उसका समुचित उपाय करना आवश्यक है। इसके आगे एक और समस्या है, उसे मोह कहते हैं। मोह और प्रेम के अन्तर को जानना भी बहुत जरूरी है, क्योंकि इनके मौलिक भेद को जाने बिना सन्देह दूर नहीं हो सकता है, प्रायः मोह के दीवाने लोग प्रेम को अन्यत्र स्थानों पर घसीटते हैं और मोह पिपासा को तृप्त करते हैं, किन्तु सच्चे प्रेम के अभाव में सच्ची शन्ति नहीं मिलती है। आधुनिक कवियों ने मोहमयी वासनाओं को प्रेम के रूप में प्रस्तुत किया है। यह सच्चे प्रेम के साथ घोर अन्याय है। मोह तथा प्रेम में मौलिक अन्तर है, प्रेम निःस्वार्थ विवेकपूर्वक होता है, किन्तु मोह किसी विशेष स्वार्थयुक्त तथा विवेकशून्य होता है। ‘‘मुह-वैचित्ये’’ इस धातु से मोह शद सिद्ध होता है। इसका अर्थ है चित्त का विचलित होना या विभ्रम होना। इसी प्रकार ‘‘प्रीञ्-तर्पणे’’ धातु से प्रेम शद सिद्ध होता है, जिसका अर्थ होगा- तृप्ति, तो इन दोनों शदों के पृथक्-पृथक् अर्थ हैं। जिसमें क्षणिक सुख है अपितु दुःख अधिक है, उसे मोह कहते हैं। दूसरा है प्रेम, जो स्थायी सुख तथा समत्व का कारण है। क्योंकि मोह का उत्पत्ति स्थान स्नेह है। शास्त्र कहता है कि ‘‘नास्ति मोहसमासवः’’ -महाभारत, अर्थात् मोह के समान कोईाी मादक द्रव्य नहीं है। जैसे अहंकार का मनुष्य के ऊपर प्रकोप होता है, तब वह विवेक शून्य हो जाता है, उसी प्रकार जब मनुष्य के ऊपर मोह का आक्रमण होता है, तब भी वह मोहान्धकार में अन्धा हो जाता है। एक माँ अपने अबोध बच्चे के दोषों को छिपाती है, क्यों? जिससे उसका पिता उसे दण्ड न दे सके। यह उस माँ का मोह संयुक्त अज्ञान है। उसी मोह के साथ अन्य दोष भी जुड़ जाते हैं। धृतराष्ट्र का अपने पुत्रों के प्रति अत्यन्त मोह था। जिससे वह सत्यासत्य का निर्णय न कर सका और एकाीषण युद्ध का कारण बना। ‘‘मोहः पापीयान्’’ की उक्ति यहाँ सार्थक सिद्ध होती है। इस मोह की कई प्रकार की शाखाप्रशाखायें होती हैं। जैसे माता-पिता, पति-पत्नी भाई-बहन, पुत्र, पौत्र, धन, धान्य तथा भवन-भोजनादि। इसके अतिरिक्त शरीर तथा प्राणों का मोह अतीव प्रगाढ़ होता है। जिस शरीर में आत्मा ने लबे समय तक वास किया है, उसके प्रति अब अत्यधिक मोह जाग्रत हो जाता है, जबकि जिसका संयोग हुआ है, उसका वियोग भी अवश्यंभावी है, क्योंकि-

जरा मृत्यु हि भूतानां खादितारौ वृकाविव।

बलिनां दुर्बलानाञ्च हृस्वानां महतामपि।।

ये बुढ़ापा तथा मृत्युरूपी दो भेड़िये हैं, जो निरन्तर मानव शरीरों को खाये जा रहे हैं। बलवान, दुर्बल या छोटा-बड़ा कोई भी हो, सभी को ये खाने वाले हैं। मनुष्य की अति आसक्ति प्रायः पदलिप्सा होती है, जिसे शास्त्रों में लोकेषणा के रूप में उद्धृत किया है। मोह के लघु बन्धनों को छोड़ने के बाद यह लोक प्रतिष्ठा का मोह बाँध ही लेता है, जिससे बड़े-बड़े त्यागी तपस्वी लोग भी नहीं बच पाते हैं। विषय को विषाद करने के लिए एक कवि ने रूपक अलंकार के रूप में एक सुन्दर आयान दिया है। वह यहाँ प्रस्तुत है- आत्मा जब इस शरीर में आती है, तभी से पति-पत्नी सन्तान, चलाचल सपत्ति और पद के मोह में फँस जाता हैं उसकी स्थिति एक भँवरे के समान होती है, जो एक कमल की सुगन्ध के सुगन्घि पर मुग्ध हो जाता है और उसी फूल में अपना आवास बना लेता है। प्रतिदिन के गमनागमन की परेशानी को दूर करने के लिए उस फूल में बैठ जाता है, किन्तु रात्रि के समय पुष्प पराग के अन्दर बैठकर यहविचार करता है कि-

रात्रिगमिष्यति भविष्यति सुप्रभातम्।

भास्वानुदिष्यति हसिष्यति पंकज श्रीः।।

इत्थं विचिन्तयति शोकगते द्विरेफे।

हा हन्त, हन्त! नलिनीं गज उज्जहार।।

अर्थात् वह मनोरथ करता है कि रात्रि बीतेगी और सुन्दर प्रभात होगा, सूर्य उदित होगा, कमल खिलेंगे लेकिन उस भँवरे के मनोरथ पर जो तुषारापात हुआ, वह अत्यन्त दुःख भरा था। रात्रि के समय वहाँ एक जंगली हाथी आया और उसने जल पीकर जो उत्पात किया वह शदों में कहना कठिन है। उस मदान्ध गज ने सरोवर स्थित उस कमल वन को कुचल डाला और उन्हीं जिस कमल पुष्प में भौंरा बैठा हुआ था, वह भी कुचला गया। अतः इस मानव की दशा वैसी ही होती है, जैसे कि उस मूर्ख भौंरे की हुई। इसीलिए मोह के स्वार्थ रूपी अन्धकार से निकलकर ‘प्रेम’ प्रकाश में आना चाहिये, जिससे संसार के बन्धन छूट सकें। इति।

-महर्षि कपिल आर्ष गुरुकुल (वैदिक आश्रम), कोलायत, बीकानेर, राज. चलभाष- 9413144029, 9166323384

टूटे पुतले-एक कहानी – महेन्द्र आर्य

मुन्नी अपनी नयी गुड़िया से बहुत खुश थी। वह अपनी गुड़िया को नए-नए कपड़े पहनाती, उसके बाल बनाती और उसे अपने पास सुलाती। इतना ही नहीं उसने अपनी सहेली के गुड्डे के साथ उसका याह ही रचा डाला। अपने सुख-दुःख की बातें गुड़िया से करती। कभी गुस्सा आता तो वह गुड़िया को डांट भी देती, हाँ, बाद में उसे सॉरी बोल देती।

एक दिन गजब हो गया। छोटे भाई बबलू ने नाराज होकर उसकी गुड़िया तोड़ दी। मुन्नी के दुःख और क्रोध का ठिकाना नहीं रहा। वह बबलू पर चिल्लाई। इतने से उसका मन शान्त नहीं हुआ तो एक चांटा बबलू को रसीद कर दिया। बबलू रोते-रोते माँ के पास गया। माँ ने मुन्नी को धमकाया और उसके कान खींचे। मुन्नी ने कहा- बबलू ने उसकी प्यारी गुड़िया तोड़ दी, उसे कुछ कहने की जगह, मुझे क्यों डांटा जा रहा है। माँ ने कहा गुड़िया तोड़ दी, उसके लिए उसे डाँट मिलनी ठीक थी, लेकिन उसे इतनी छोटी गलती पर चांटा नहीं मारना चाहिए। गुड़िया का क्या है, बाजार से खरीद कर लाये थे, दूसरी आ जायेगी। बात रफा-दफा हो गयी।

5-7 साल बाद की एक घटना। दादी अपने पूजा घर में बैठकर भगवान जी की पूजा कर रही थी। दादी जी दिन में कम से कम 8-10 घंटे पूजा घर में बिताती। दिनचर्या शुरु होती भगवान जी को सुबह जगाने से लेकर। फिर वह भगवान जी को स्नान करवाती, धुले हुए कपड़े पहनाती, नाश्ते का भोग लगाती, झूला झुलाती। दोपहर का भोजन खिला कर भगवान जी को सुला देती।

उस दिन यही भगवान जी के सोने का समय था। बबलू बाहर से क्रिकेट खेल कर लौटा। उसके हाथ में क्रिकेट का बल्ला और भारी वाली गेंद थी। खेल की मस्ती में उसने गेंद को बल्ले से मार दिया। फिर कुछ ऐसा हुआ जिससे घर में एक तूफान खड़ा हो गया। बबलू की गेंद सीधी पूजा घर में गयी और भगवान जी की मूर्ति से टकराई। गेंद की चोट से मूर्ति का सर टूटकर अलग हो गया। दादी जी बिलकुल पगला गयी। बुरी तरह चिल्लाने लगी आज मेरी जीवन भर की तपस्या नष्ट हो गयी। मेरे ही घर में मेरे भगवान जी को चमड़े की गेंद से खंडित कर दिया। मैं कहाँ जाऊँ। लड़के ने मेरे लिए नर्क के द्वार खोल दिए।

माँ ने ये सब देखा तो अपना आपा खो दिया। लगी बुरी तरह बबलू को पीटने। बबलू डर के मारे सहमा हुआ तो था ही, माँ के इस आक्रमण से रोने लगा। उधर से पापा आ गए, उन्होंने जब सारा दृश्य देखा तो उनका भी पारा चढ़ गया। उन्होंने भी बबलू को 2 तमाचे लगा दिए।

ये सारा दृश्य मुन्नी देख रही थी। उससे नहीं रहा गया। उसने बीच में पड़कर बबलू को बचाया। उसे अपने पीछे छुपा कर जोर से बोली- क्यों पीट रहे हैं आप इसको? क्या बिगाड़ा है इसने?

दादी चिल्लाई- तुहें दिख नहीं रहा, इसने भगवान जी को तोड़ दिया। फिर भी पूछती है क्या बिगाड़ा है?

मुन्नी ने कहा- इसने सिर्फ एक पुतले को तोड़ा है, और वह भी जानबूझ कर नहीं।

माँ ने कहा- मुन्नी, देखती नहीं दादी जी रोज कितने प्यार से भगवान जी को तैयार करती है, भोग लगाती है और उनकी पूजा करती है। भगवान जी को एक पुतला कहके तुम उनका अपमान कर रही हो।

मुन्नी ने अपने उसी तेवर में कहा- आखिर क्या फर्क है, दादी जी के भगवान जी में और मेरी गुड़िया में? दोनों ही बाजार से खरीदकर लाये गए थे, दोनों ही टूटने वाली वस्तु से बने थे। जितना मैं मेरी गुड़िया से प्यार करती थी, उतना ही दादी अपनेागवान जी से करती थी। दोनों ही बबलू के हाथों टूट गयी। लेकिन दोनों बातों में इतना फर्क क्यों? मेरी गुड़िया मेरे लिए दादी जी के भगवान से कम नहीं थी, लेकिन फिर भी आप मुझ पर नाराज हुए जब मैंने बबलू को तमाचा मारा। आपका कहना सही था, एक गुड़िया थी उसकी जगह दूसरी आ जायेगी। फिर आज आप सभी की सोच क्यों बदल गयी? क्योंकि आपने इस पुतले को भगवान का नाम दे दिया और अगर यही भगवान थे तो फिर अपनी रक्षा क्यों नहीं कर पाये, एक मामूली गेंद की चोट से और एक मामूली चोट से बिखर भी गए। ये तो आम इंसान से भी कमजोर निकले। ऐसे भगवान जी की प्रार्थना से हमें क्या मिलेगा?

पापा ने प्यार से कहा- बेटी, बात तो तुहारी ठीक है, लेकिन इसमें दादी जी की आस्था का सवाल है।

मुन्नी ने प्यार से कहा- पापा, दादी जी की आस्था और मेरी बचपन की आस्था में कोई अंतर नहीं है। मैंने अपनी गुड़िया से भावनात्मक रिश्ता जोड़ लिया था, वैसे ही दादी जी ने अपने भगवान की मूर्ति से भावनात्मक रिश्ता जोड़ लिया था। दोनों के लिए ये एक मनोरंजन था।

दादी ने कहा- मुन्नी, तू सचमुच कितनी बड़ी हो गयी है। ये बातें कई बार मेरे दिमाग में भी आती हैं, क्या मैं सचमुच भगवान की पूजा कर रही हूँ या बुढ़ापे में अपना मन बहला रही हूँ। मेरे पास समय बिताने के लिए कोई काम नहीं है। मुझे लगता है कि मैं जैसे बचपन में तेरे पापा को प्यार से नहलाती-धुलाती, खाना खिलाती, सुलाती- वैसा ही एक अनुभव मैंने इस मूर्ति के साथ शुरु कर दिया। लेकिन ये सारा अनुभव एक तरफा था, मूर्ति की तरफ से कभी कोई प्रतिक्रिया नहीं थी।

बबलू रुआंसा होकर बोला-दादी माँ! मुझे माफ कर दीजिये। आज के बाद मैं कभी कोई तोड़-फोड़ नहीं करुँगा। कभी आपके भगवान जी को कोई चोट नहीं लगने दूँगा।

दादी ने प्यार से बबलू को अपने पास खींचा। बोली- बेटा भगवान को चोट तुमने नहीं पहुँचाई, बल्कि हम सबने पहुँचाई है। तुहारी एक छोटी-सी गलती पर हम सबने तिल का ताड़ बना दिया। आज के बाद यहाँ कोई भगवान जी नहीं आएंगे। मेरे भगवान हो तुम सब। मेरा प्यार अब मैं एक मूर्ति पर नहीं लुटाऊँगी। मेरा प्यार हैं मेरे पोते और पोती के लिए।

दादी ने परिवार के सभी सदस्यों को अपनी बाँहों में भर लिया।                       – मुबई

 

बच्चों का व्यापार – आचार्य अखिल विनय

जर्मनी में ‘बच्चों का केटलॉग’ छापकर बच्चे बेचने का धंधा किया जाता है। उसमें छपा रहता है कि तीन सप्ताह में ‘बच्चा’ लिया जा सकता है। वैसे जर्मनी में किसी बच्चे को गोद लेने में दो-ढाई साल तक का समय लगता है। जर्मन माता-पिता की निःसंतान बने रहने की समस्या को दूर करने में बच्चों का व्यापार करने वाली हॉलैण्ड की संस्थाएँ अग्रणी हैं।

बच्चे पैदा करके बेचने वाली एक फर्म के बारे में कोलबो का समाचार छाप कर ‘‘बाल साहित्य समीक्षा’’ (पृष्ठ 9, जून 1987) ने एक महत्त्वपूर्ण बात बतायी है कि किस प्रकार ‘शिशु फार्म’ पर छापा मार कर पुलिस ने 26 बच्चे और बारह र्गावती महिलाएँ बरामद कीं। स्वीडन की महिला लुदरस्ट्राम श्रीलंका से बच्चों का व्यापार करती थी। कितना अमानवीय कृत्य है यह! पैसा कमाने के लिए कानूनी तरीके से बच्चे पैदा करके उनका निर्यात किया जाना भर्त्सना के योग्य है।

किन्तु बच्चे बेचने का यह कार्य श्रीलंका ही नहीं, भारत, बंग्लादेश और थाईलैंड से भी होता है। पश्चिम जर्मनी की पत्रिका ‘डेर स्पेगल’ ने इस रहस्य का उद्घाटन किया, जिसकी चर्चा ‘इंडिया टूडे’ (जनवरी 15, 1943) में की गयी थी। प्रायः हर सप्ताह जर्मनी के फ्रेंकफुर्त नगर के विमानतल पर हीरों के हार पहने जर्मनी महिलाएँ, मुबई से उठाये गये बच्चों को छाती से चिपटाये वहाँ उतरती हैं। मुबई, कलकत्ता, कोलबो या थाइलैंड की झोपड़ पट्टियों में निरन्तर बढ़ने वाले ऐसे बच्चे हैं, जो विदेश ले जाये जाते हैं।

पिछले दिनों जर्मन चर्च संगठन ने ऐसे एक सर्वेक्षण में पाया था कि अकेले कलकत्ता के अनाथगृहों में पचास हजार ऐसे बच्चे थे।ाारत में ऐसे अनाथ बच्चों की संया कितनी ज्यादा होगी, इसका सहज ही अंदाज लग सकता है। एजेंटों और बिचोलियों की मदद से बच्चों की बिक्री का यह व्यापार खूब पनप रहा है। मध्यमवर्गीय निःसंतान लोग इस प्रकार अपनी तमन्ना पूरी करते हैं, क्योंकि उन्हें सफेद वर्ण का दत्तक बालक मिलता नहीं। पश्चिम यूरोप-विशेषकर पश्चिम जर्मनी में यह धंधा खूब पनप रहा है। प्रायः एक बच्चा रुपये 44000/- में, एक निःसंतान जर्मन दपति को मिलता है।

कहा जाता है कि बच्चों के ऐसे अवैध व्यापार में जर्मनी ही नहीं, निकटवर्ती हॉलैण्ड की कुछ एजेंसियों का भी हाथ है। ऐसी ही एक संस्था का नाम है- लैश, जो बच्चों को जल्दी उपलध कराती है। किन्तु सवाल यह उठता है कि बच्चे खरीदें क्यों जाते हैं? क्या गोद नहीं ले सकते? कारण स्पष्ट है कि गोद लेने की कार्रवाई में ढाई साल तक का समय लग सकता है, जबकि एजेंसियों के मार्फत बच्चे खरीदने में केवल ढाई सप्ताह लगते हैं। ये एजेंसियाँ अश्वेत बच्चों के आकर्षक फोटो देकर अपने ‘केटलॉग’ छापती हैं और निःसंतान धनी जर्मनी दपतियों को आकृष्ट करती हैं।

पश्चिम जर्मनी की प्रमुख पत्रिका ‘डेर स्पीगले’ में पत्रकार स्वांट्जे स्ट्रेडर ने बच्चे बेचने की इस प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए बताया है कि हॉलैण्ड की संस्था ‘लैश’ के डाइरेक्टर- डभास हॉर्डिक संतान के इच्छुक जर्मन दपतियों को बच्चों की पसन्दगी के लिए कोलबो ले जाते हैं और वहीं सौदा होता है।

हॉलैण्ड की संस्था ‘लैश’ की ही भाँति, इस धन्धे में संलग्न कुछ संस्थाएँ आस्ट्रेलिया, स्केंडिनेविया और स्वीट्जरलैण्ड की हैं, जो बच्चों का व्यापार चलाती हैं। खरीदे गए ऐसे बच्चों को गोद लेने के लिए जर्मनी का कानून इजाजत नहीं देता, किन्तु उन्हीं बच्चों का प्रथम प्रार्थनापत्र अस्वीकृत होने के बावजूद दूसरी बार निवेदन करने पर ‘‘सेकन्ड एडॉप्शन’’ कानून के आधार पर उसे स्वीकृति प्राप्त हो जाती है। यही कारण है कि बच्चों का यह अवैध व्यापार चल रहा है।

मासूम बच्चों की आँखों, गुर्दों व दिल का निर्यात-

‘बाल साहित्य समीक्षा’ (जून 1987 के अंक में, पृष्ठ 4 पर) द्वारा एक समाचार छापा गया है कि दिसबर 86 में हाँसराजू की पुलिस ने सेन पेड्रोसुला में चार मकानों पर छापे मारकर 13 बच्चों को मुक्त कराया। गिरतार लोगों में से पाँच ने स्वीकार किया कि वे बच्चों को चुराकर या गरीब परिवार वालों से खरीदकर अमेरिका भेजते थे, जहाँ प्रत्येक बच्चा दस हजार डालर में बिकता है।

इस तरह का जघन्य कृत्य भारत के भी बच्चों के साथ किया जा रहा है। दैनिक ‘‘इंडियन एक्सप्रेस’’ के 20 अगस्त 1947 में छपा था कि आंध्रप्रदेश के बटपला में इस तरह बच्चों के गुर्दे तथा दिल निकालकर बेचने वाला गिरोह सक्रिय है। तेनाली के निकटवर्ती गाँव कर्लापलेम के 16 वर्षीय श्रीनिवास राव ने बताया कि जब वह एक बस में सफर कर रहा था, विषाक्त रूमाल सुँघाकर एक व्यक्ति बेहोश करके उसे नेल्लोर के पास रेलगाड़ी से ले गया और बाद में उसे मारुति कार में ले जाया गया। श्रीनिवास राव को एक निर्जन स्थल में रखा गया, जहाँ 15 दूसरे बच्चे थे। उसे पता चला कि उस दल के लोगों ने 50 बच्चों की हत्या की और उन्हें भी जान से मारेंगे। उस दल में नौ व्यक्ति हैं और बंदूकधारी पहरा देते हैं। वह अन्य युवकों की मदद से जान बचाकर भागा। चार घंटे जंगल में भटकने के बाद एक छोटे स्टेशन पर पहुँचा और किसी प्रकार घर लौटा। दूसरे 15 बच्चे कमजोरी की वजह से भागने में सफल नहीं हो सके।

श्रीनिवास राव के पिता ने इस दल की क्रूर कार्रवाइयों की सूचना पुलिस को दी और बटपला के पास चंदोलू पुलिस स्टेशन में उनकी शिकायत दर्ज है। वहाँ के सब-इंस्पेक्टर जी.आय. नेयलू उस मामले की जाँच कर रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि धन कमाने के लिए बच्चों के अवयव बेचने का जघन्य कृत्य लैटिन अमरीकी देशों में ही नहीं, भारत में भी हो रहा है। भारत सरकार को चाहिए कि वह इस दिशा में शीघ्र और ठोस कदम उठाये।

बाल साहित्य समीक्षा (मासिक)

कानपुर (उत्तरप्रदेश)

सितबर, सन 1987

ईश्वर की दया और न्यायः – राजेन्द्र जिज्ञासु

ईश्वर की दया और न्यायः सहस्रों वर्षों के पश्चात् संसार में पहला विचारक, दार्शनिक, ऋषि महर्षि दयानन्द ही ऐसा धर्माचार्य आया, जिसने यह जटिल गुत्थी सुलझाई कि ईश्वर की दया तथा न्याय पर्याय हैं। दोनों का प्रयोजन एक ही है। आस्तिक लोग ईश्वर को दयालु तो मानते ही हैं, परन्तु अन्यायी न मानते हुए भी मतवादी ईश्वर के दया व न्याय इन दो गुणों की संगति नहीं लगा पाते थे। पूर्व व पश्चिम में तार्किक लोगों ने एक प्रश्न उठाया कि संसार में सबसे बड़ा दुःख मौत है। यदि ईश्वर है तो उसके संसार में मृत्यु रूपी दुःख का होना उसकी क्रूरता को दर्शाता है। वह दयालु परमात्मा नहीं हो सकता। यही प्रश्न इन दिनों किसी ने महाराष्ट्र यात्रा में पूछ लिया।

एक बार काशी प्रयाग के पण्डितों को एक ऐसे ही व्यक्ति ने यह प्रश्न उठाकर परेशान कर दिया। तब जन्माभिमानी ब्राह्मणों को महर्षि के शिष्य पं. गंगाप्रसादजी उपाध्याय की शरण लेनी पड़ी थी। उपाध्याय जी ने प्रश्नकर्त्ता से कहा- मृत्यु का होनााी ईश्वर की दया को दर्शाता है, न कि क्रूरता को। यदि संसार में जन्मे प्राणियों की मृत्यु न होती, तो धरती तल पर नये जन्मे व्यक्तियों को खड़े होने को भी स्थान न मिलता। यदि हमारे पूर्वज न मरते तो फिर हमारे सिर पर सैंकड़ों व्यक्ति खड़े भी न हो सकते। उपाध्याय जी के उत्तर ने प्रश्न करने वाले को सर्वथा निरुत्तर व शान्त कर दिया।

इस्लाम में पहली बार एक विचारक नेाुलकर लिखा है- ‘‘वह रब भी है और आदिल और रहीम भी (न्यायकारी तथा दयालु भी)’’ यह और महर्षि के दया व न्याय का प्रयोजन एक ही है। इस घोष को सुनकर इस्लामी विद्वान् ने यह सिद्धान्त स्वीकार किया है। यह लेखक दया का अर्थ पाप को क्षमा होना नहीं मानता। इस लेखक ने यह लिखने का साहस दिखाया है कि ‘‘संसार में प्रत्येक कर्म का एक फल है, जो किसी भी अवस्था में उससे पृथक् नहीं हो सकता’’। यह वैचारिक क्रान्ति है। यह वैदिक इस्लाम है। ईश्वर की दया व न्याय पर विचार करने व समझने से उपरोक्त प्रश्न जैसे सब प्रश्नों के उत्तर मिल जाते हैं।

आर्य सामाजिक साहित्य में घुसते दोषः अति उत्साही लेखकों के कारण तथा कुछ लेखकों व प्रकाशकों के प्रमाद से आर्य सामाजिक साहित्य में आपत्तिजनक दोष घुस रहे हैं। महाराष्ट्र यात्रा में एक आर्यााई ने ‘निर्णय के तट पर’ ग्रन्थ का पाँचवाँ भाग दिखाया। मुझे यह देखकर दुःख हुआ कि इसमें भी ऋषि के शास्त्रार्थ बहालगढ़ से छपे ग्रन्थ से उद्धरण लेकर दिये गये हैं, सो इनमें क ई दोष व भयङ्कर दोष घुस गये हैं। विषय पर अधिकार न होने से सपादकों ने पं. लेखराम जी सरीखे अद्वितीय शास्त्रार्थ महारथी द्वारा संग्रहीत ऋषि के शास्त्रार्थों को दोषयुक्त बना दिया है।

जालंधर में महर्षि का मौलवी अहमद अहसन से शास्त्रार्थ हुआ था। मकी पर मक्खी मारने वालों ने यहाँ मौलवी अहमद हुसैन कर दिया है। भूल स्वीकार करने का साहस कोई करता नहीं। गड़बड़ संक्रामक रोग बनकर फैल रही है। मिलान करने से और भी कई चूक मिलेंगी। ईसाइयों की एक प्रसिद्ध पुस्तक का नाम ही कुछ-का-कुछ छप रहा है। सावधान होने की आवश्यकता है। शास्त्रार्थों में प्रतिपक्षियों के महर्षि के बारे कहे गये कुछ कथन प्रमुाता से प्रचारित, करने की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता, यथा चाँदापुर के शास्त्रार्थ में पादरी जी ने कहाः-

‘‘सुनो भाई मौलवी साहबो! कि पण्डित जी इसका उत्तर हजार प्रकार से दे सकते हैं। हम और तुम हजारों मिलकर भी इनसे बात करें तो भी पण्डित जी (ऋषि दयानन्द) बराबर उत्तर दे सकते हैं।’’

आशा है, आर्यजन मेरी विनती पर ध्यान देंगे।

हिन्दू तथा हिन्दुत्ववादीः देश में हिन्दू समाज की स्थति पूर्ववत् दयनीय है। देश जाति हित चिन्तकों को बहुत जागरूक होकर धर्म रक्षा, जाति रक्षा के लिए बहुत सूझबूझ से सक्रिय होना होगा। हिन्दुत्ववादी के वक्तव्यों से भ्रमित होकर अति आशावादी व प्रमादी होना आत्मघाती नीति होगी। हिन्दू की दुर्बलता उसके अंधविश्वास तथा अनेकेश्वरवाद है। नागपुर का एक समाचार आँखें खोलने वाला है। एक उच्च शिक्षित हिन्दू अनेक भगवानों के हिन्दू चिन्तन पर विधर्मियों के पंजे में फँसकर……..। एक आर्यवीर को इसकी जानकारी मिली। ईशकृपा से उस परिवार की रक्षा हो गई। इस सेवक से भी अब उसका सपर्क हो जायेगा। हिन्दुत्ववादी नयी-नयी घोषणायें करने में मस्त हैं। शिवाजी के महाराष्ट्र में अनेक सुपठित परिवार अनेकेश्वरवाद की हिन्दुत्व फिलॉसफी से ऊबकर ईसाई मत में इन्हीं दिनों चले गये। आर्यवीर लगे हैं। देखिये, क्या परिणाम निकलता है, जब हिन्दुत्व के महानायक स्वामी विवेकानन्द की पुस्तक प्रभुदूत ईसा पादरियों के हाथ में हो तो फिर अशोक सिंघल ऐसे अभियान को कैसे रोक सकता है? गीता-गीता पर सर्मन सुनने को मिलने लगे हैं। काशी (रामनगर) से विधर्मियों ने गीता के पुनर्जन्म की धज्जियाँ उड़ा दीं। हिन्दुत्ववादी गीता प्रवचनकर्त्ता सब मौन रहे। किसी से उत्तर न बन पाया। परोपकारी ने ऐसे सब लेखकों व कान्ति मासिक को उपयुक्त उत्तर देकर धर्म रक्षा की। विवेकानन्द स्वामी के नाम लेवाओं तथा गीता के गोरखपुर प्रेस की नींद तो जगाने पराी न टूटी। लेखक ने गोरखपुर जाकर उन्हें चेताया कि उत्तर दो परन्तु…… । हिन्दुओं का उपास्य कौन है? दर्शन क्या है? इसका उत्तर मिलना चाहिये।

– वेद सदन, अबोहर-252226 (पंजाब)