भगवानों की सूची जारी करोः- प्रा राजेन्द्र जिज्ञासु

राजनेताओं की धार्मिकता व भक्ति भावना देख-देख कर आश्चर्य होता है। लोकसभा के चुनाव के दिनों काशी में गंगा स्नान और गंगा जी की आरती की प्रतियोगिता देखी गई। केजरीवाल भी धर्मात्मा बनकर साथियों सहित गंगा में डुबकियाँ लगाते हुए मोदी को गंगा की आरती में सम्मिलित होने के लिए ललकार रहा था। अजमेर की कबर-यात्रा पर एक-एक करके कई नेता पहुँचे। चुनाव समाप्त होते ही दिग्विजय के गुरु स्वरूपानन्द जी ने साई बाबा भगवान् का विवाद छेड़ दिया। सन्तों का सम्मेलन होने लगा। स्वरूपानन्द जी संघ परिवार विरोधी माने जाते हैं। इन्हें हिन्दू हितों का ध्यान आ गया। हिन्दुओं को जोड़ने व हिन्दुओं की रक्षा के लिए कभी कोई आन्दोलन छेड़ा?

क्या ब्राह्मणेतर कुल में जन्मे किसी व्यक्ति को अपना उत्तराधिकारी  बनाने का साहस आप में है? क्या दलित वर्ग में जन्मे किसी भक्त से जल लेकर आचमन कर सकते हैं?

हिन्दुओं के कितने भगवान् हैं? यह उमा जी ने चर्चा छेड़ी है। संघ परिवार को और स्वरूपानन्द जी को हिन्दुओं के भगवानों की अपनी-अपनी सूची जारी करनी चाहिये। यह भी बताना होगा कि भगवान् एक है या अनेक? भगवानों की संख्या निश्चित है या घटती-बढ़ती रहती है। अमरनाथ यात्रा वाले अब लिंग की बजाय ‘बर्फानी बाबा’ का शोर मचाने लगे हैं। यात्री बम-बम भोले रटते हुए ‘ऊपर वाले’ की दुहाई देते हैं। क्या भगवान् सर्वत्र नहीं? ऊपर ही है? यह संघ व स्वरूपानन्द जी को स्पष्ट करना चाहिये। अमरनाथ यात्री टी.वी. में बता रहे थे कि ऊपर वाले की कृपा से हमें कुछ नहीं होगा। यदि भगवान् ऊपर ही है तो ‘ईशावास्य’ यह ऋचा ही मिथ्या हो गई। प्रभु कण-कण में है- यह मान्यता निरर्थक हो गई। हिन्दुओं को हिन्दू साधु, आचार्य, सन्त भ्रमित कर रहे हैं। धर्म रक्षा व धर्म प्रचार कैसे हो? एकता का कोई सूत्र तो हो।

मन्नतें पूरी होती हैंः साई बाबा विवाद में उमा जी ने यह भी कहा है कि अनेक भक्तों की मन्नतें साई बाबा ने पूरी कीं। मन्नतें पूरी करने वाले देश में सैकड़ों ठिकाने हैं। उमा जी जैसे भक्तों को राम मन्दिर निर्माण, कश्मीर के हिन्दुओं का पुनर्वास, धारा ३७०, निर्धनता निवारण, आतंकवाद से छुटकारे के लिए मन्नत माँग कर देश में सुख चैन का युग लाना चाहिए।

मन्नतों का अन्धविश्वास फैलाकर देश को डुबोया जा रहा है। केदारनाथ, बद्रीनाथ यात्रा की त्रासदी को कौन भूल सकता है? मन्नतें माँगने गये सैकड़ों भक्त जीवित घरों को नहीं लौटे। कई भगवान् बाढ़ में बह गये। इससे क्या सीखा? आँखें फिर भी न खुलीं।

भावुकता से अन्धे होकरः जामपुर (पश्चिमी पंजाब) में एक आर्य कन्या ने आर्यसमाज के सत्संग में एक कविता सुनाई। उसकी एक पंक्ति थी-

मेरी मिट्टी से बूये वफ़ा आयेगी।

अर्थात् मरने के पश्चात् मेरी कबर से निष्ठा की गन्ध आयेगी। पं. चमूपति जी ने वहीं बोलते हुए कहा, क्या शिक्षा दे रहे हो? क्या मेरी यह पुत्री मुसलमान के रूप में मरना चाहती है? चिता की, दाहकर्म की बजाय कबर की बात जो कर रही है। बोलते और लिखते समय अन्धविश्वास तथा भ्रामक विचार फैलाने से बचने के लिए सद्ग्रन्थों के आधार पर ही कुछ लिखना-बोलना चाहिए।

आर्यसमाज की हानिः संघ का गुरु दक्षिणा उत्सव था। संघ वाले स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी के पास अपने कार्यक्रम की अध्यक्षता करने का प्रस्ताव लेकर आये। लोकैषणा से कोसों दूर महाराज ने यह कहकर उनकी विनती ठुकरा दी कि इसमें आर्यसमाज की हानि है।

उन्होंने पूछा, ‘क्या हानि है?’

स्वामी जी ने कहा, ‘मेरी अध्यक्षता में आप जड़ पूजा करेंगे। झण्डे को गुरु मानकर दक्षिणा चढ़ायेंगे, इससे आर्यसमाज में क्या सन्देश जायेगा?’

आर्यसमाज अपनी मर्यादा, अपने इतिहास को भूलकर योगेश्वर नामधारी थोथेश्वरों को अपना पथ प्रदर्शक मानकर भटक रहा है। एक योग गुरु ने मिर्जापुर में मजार पर चादर चढ़ाई। कोई गंगा की आरती उतार रहा है तो कोई म.प्र. जाकर मूर्ति पर जल चढ़ा रहा है।

ऋषि ने लिखा है, उसी की उपासना करनी योग्य है। यही वेदादेश है।

 

 

महर्षि के मिशन के सबसे पहले ब्राह्मणेतर शास्त्रार्थ महारथी राव बहादुरसिंह- प्रा राजेंद्र जिज्ञासु

राव बहादुरसिंह मसूदा-इतिहास के लुप्त पृष्ठः-

महर्षि दयानन्द जी की जीवनी लिखने वाले पुराने विद्वान् लेखकों ने मसूदा राजस्थान के राव बहादुरसिंह जी की अच्छी चर्चा की है, परन्तु उन पर कुछ विशेष खोज करने का उद्यम न तो मसूदा के किसी गवेषक ने किया और न ही राजस्थान के आर्यों ने राव जी की ठोस सेवाओं तथा व्यक्तित्व के अनुरूप ही करणीय पुरुषार्थ किया। वास्तव में ऐसे कार्य धन से ही नहीं होते। इनके लिए पण्डित लेखराम की आग, स्वामी स्वतन्त्रानन्द की ललक और इतिहासकार पं. विष्णुदत्त  जैसी लगन चाहिए। हमने राव बहादुरसिंह की विशेष देन तथा आर्यसमाज के इतिहास में उनके स्थान का नये सिरे से मूल्याङ्कन करके ऋषि जीवन तथा ‘परोपकारी’ पाक्षिक में कुछ नया प्रकाश डाला है।
हमारी खोज अभी जारी है। महर्षि के मिशन के सबसे पहले ब्राह्मणेतर शास्त्रार्थ महारथी राव बहादुरसिंह थे। परोपकारिणी सभा के निर्माण, दयानन्द आश्रम आदि की स्थापना तथा सभा के आरम्भिक काल के उत्सवों के आयोजन में आपने दिल खोलकर दान दिया। आपके दान से परोपकारिणी सभा तथा राजस्थान का आर्यसमाज ही लाभान्वित नहीं हुआ, वरन अन्य-अन्य प्रदेशों के समाजों व संस्थाओं को भी आपने उदारतापूर्वक दान दिया-
१. देशहितैषी मासिक को उस युग में ६५/- रु. दान दिये।
२. आर्यसमाज मन्दिर अजमेर के लिये ४००/- रु. प्रदान किये।
३. आर्य अनाथालय फीरोजपुर को १५०/- रु. दिये।
४. फर्रुखाबाद की पाठशाला के लिए १००/- रु. दिये।
५. आर्यसमाज शिमला (हिमाचल) के मन्दिर निर्माण के लिए ५०/- रु. दिये।
६. स्वामी आत्मानन्द जी को उस युग में १००/- रु. भेंट किये।
उनके एक और बड़े दान की फिर चर्चा की जायेगी। जब दयानन्द आश्रम की स्थापना के उत्सव पर देशभर से भारी संख्या में आर्यगण पधारे, तब एक समय के भोजन का सब व्यय आपने दिया था।

बाइबल में परिवर्तन – राजेन्द्र जिज्ञासु

सत्यार्थप्रकाश की वैचारिक क्रान्तिःभले ही ईसाई मत, इस्लाम व अन्य-अन्य वेद विरोधी मतों की सर्विस के लिए कुछ व्यक्ति आर्यसमाज का विध्वंस करने के लिए सब पापड़ बेल रहे हैं, परन्तु महर्षि दयानन्द का अमर ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश निरन्तर अन्धकार का निवारण करके ज्ञान उजाला देकर वैचारिक क्रान्ति कर रहा है। पुराने आर्य विद्वान् अपने अनुकूल व प्रतिकूल प्रत्येक लेख व कथन पर ध्यान देते थे। अब वर्ष में एक बार जलसा करवाकर संस्थाओं की तृप्ति हो जाती है। ऋषि जीवन व ऋषि मिशन विषयक खोज में उनकी रुचि ही नहीं।

लीजिये संक्षेप में वैचारिक क्रान्ति के कुछ उदाहरण यहाँ देते हैंः-

पहले बाइबिल का आरम्भ इन शब्दों से होता थाः-

१. “In the beginning God created the heaven and the earth. And the earth was waste and void, and the darkness was upon the face of the deep and the spirit of god moved upon the face of the waters.”

अब ऋषि की समीक्षा का चमत्कार देखिये। अब ये दो आयतें इस प्रकार से छपने लगी हैंः-

“In the beginning God created the heavens and the earth. Now the earth was formless and empty, darkness was over the surface of the deep, and the spirit of god was hovering over the waters.”

प्रबुद्ध विद्वान् इस परिवर्तन पर गम्भीरता से विचार करें। हम आज इस परिवर्तन की समीक्षा नहीं स्वागत ही करते हैं। इस अदल-बदल से ऋषि की समीक्षा सार्थक ही हो रही है, क्या हुआ जो (पोल) से आपका पिण्ड ऋषि ने छुड़ा दिया। ऋषि का प्रश्न तो ज्यों का त्यों बना हुआ है।

“And God said, Behold, I have given you every herb yelding seed, which is upon the face of all the earth, and every tree, in which is the fruit of a tree yielding seed; to you it shall be for meat: and to every beast of the earth, and to every fowl of the air and to every thing that creepth upon the earth, wherein there is life, I have given every herb for meat: and it was so.”

पाठकवृन्द! यह बाइबिल की उत्पत्ति की पुस्तक के प्रथम अध्याय की आयत संख्या २९, ३० हैं। सत्यार्थप्रकाश के प्रकाश में हमारे विद्वान् मास्टर आत्माराम आदि इनकी चर्चा शास्त्रार्थों में करते आये हैं। अब ये आयतें अपने नये स्वरूप में ऐसे हैं। इन पर विचार कीजियेः-

Then God said, “I give you every seed-bearing plant on the face of the whole earth and every tree that has fruit with seed in it. They will be yours for food. And to all the beasts of the earth and all the birds in the sky and all the creatures that move on the ground-everything that has the breath of life in it- I give every green plant for food.”

ये दोनों अवतरण बाइबिल के हैं। दोनों का मिलान करके देखिये कि सत्यार्थप्रकाश की वैचारिक क्रान्ति के कितने दूरगामी परिणाम निकले हैं। हम इस नये परिवर्तन, संशोधन की क्या समीक्षा करें? हम हृदय से इस वैचारिक क्रान्ति का स्वागत करते हैं। ऋषि की कृपा से ईसाइयत के माथे से मांस का कलंक धुल गया। मांसाहार का स्थान शाकाहार को दे दिया गया है। मनुष्य का भोजन अन्न, फल और दूध को स्वीकार किया गया है। यह मनुजता की विजय है। यह सत्य की विजय है। यह ईश्वर के नित्य अनादि सिद्धान्तों की विजय है। यह क्रूरता, हिंसा की पराजय है। यह विश्व शान्ति का ईश्वरीय मार्ग है। बाइबिल के इस वैदिक रंग पर सब ईसाई बन्धुओं को हमारी बधाई स्वीकार हो।

अल्लाह की रजिस्टर्ड डाक गुम – प्रा राजेंद्र जिज्ञासु

महर्षि दयानन्द ने प्रबल युक्तियों से यह सिध्ध किया है कि ईश्वर के गुण कर्म व स्वभाव नहीं बदलते. ईश्वर नित्य है उसका ज्ञान भी नित्य है . महर्षि के इस कालजयी ग्रन्थ व उनकी समीक्षाओं का ही यह प्रभाव है की मौलाना अख़लाक़ हुसैन जी ने अपनी पुस्तक “ वैदिक धर्म और इस्लाम “ में एक से अधिक बार वेद को ईश्वर प्रदत्त ज्ञान स्वीकार किया है . यह भी लिखा है कि वेद का आविर्भाव सृष्टि के आदि में हुआ . आपने चारों वेदों के नाम भी इस पुस्तक में दिए हैं और जिन चार ऋषियों की ह्रदय गुहा में एक एक वेद का प्रकाश हुआ मौलाना ने उनके नाम भी ठीक ठीक दिए हैं . इस्लामी साहित्य से वेद के ईश्वरीय ज्ञान होने के आपने कई प्रमाण दिए हैं . उक्त पुस्तक में एक से अधिक बार आपने वेद को ईश्वरीय वाणी लिखा है .

हम डॉ जेलानी की पुस्तक से ये प्रमाण दे चुके हैं कि धर्म अनादि होता है और समय समय पर धर्म ( ईश्वरीय ज्ञान ) नहीं बदलता . ये स्वस्थ चिंतन सत्यार्थ प्रकाश की समीक्षाओं का स्पष्ट व ठोस प्रभाव है . अब तक जो कुरान की भाषा व शैली लालित्य को उसके ईश्वरीय ज्ञान होने का प्रमाण माना जाता रहा था . उसे तो सर सैयद अहमद खां व मौलाना शिबली आदि कई मुसलिम विचारकों ने ही नकार दिया . महर्षि दयानन्द जी ने ही फैजी के बेनुक्त ( बिना बिंदु के ) कुरान की अनुपमता का उदहारण दे कर मुसलमानों के इस कथन कोई चुनौती दी थी . प्रत्येक भाषा में ऐसे ग्रन्थ मिलते हैं जिनकी अपनी अपनी विशिष्ठता होती है .

मुसलमान कुरान से पहले मध्य एशिया के सभी ग्रंथों यथा बाइबल आदि को निरस्त हो चुकी बताते रहे हैं . अल्लाह ने एक के पश्चात् अपनी दूसरी पुस्तक को निरस्त करते हुए अन्त में कुरान प्रदान किया . यह अल्लाह का अंतिम ज्ञान ग्रन्थ है और मुहम्मद अंतिम नबी है . पहले के ग्रंथों में हटावत मिलावट हुयी यह कहा जाता है . पहली पुस्तकों में यदि परिवर्तन हुआ है तो इसके लिए दोषी कौन ? पण्डित चमूपति का कथन यथार्थ है कि दोषी मनुष्यों अथवा अल्लाह मियां को मानना पड़ेगा.

वे ग्रन्थ अल्लाह की ही देन थे. पण्डित चमूपति जी ने प्रश्न उठाया है कि यदि पहले के ग्रंथों में गड़बड़ हो गई तो कुरान कैसे बचा रहा या बचा रहेगा ? अल्लाह भी वही है और मनुष्य भी वही हैं . समय पाकर किसका स्वभाव बदल गया ? या तो अल्लाह मियां के ज्ञान में दोष मानना पड़ेगा अथवा उसकी भावना सदाशय समय पाकर दोषयुक्त सिद्ध हुयी ?

शिया मित्रों की मान्यता है की जो कुरान हजरत मुहम्मद पर नाजिल हुआ था उसकी आयतों की संख्या १७००० थी और वर्तमान कुरान की आयतों की संख्या के बारे भी भिन्न भिन्न मत हैं . मुख्य रूप से कुछ विद्वान ६३५६ आयतें मानते हैं और कुछ भाई ६२३६ आयतें बताते हैं . इसका तो सीधा सीधा अर्थ यही हुआ कि कुरान का २/३ भाग गुम कर दिया गया है .

दो तिहाई कुरान गुम

केवल एक तिहाई कुरान बच पाया . अल्लाह ने इसकी रक्षा का दायित्व लिया था . अच्छा दायित्व निभाया ! कुरान में इतनी गड़बड़ हो गई और मुसलमान चुप बैठे हैं . हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं . सत्यार्थ प्रकाश की समीक्षाओं के विरुद्ध इनकी लेखनी व वाणी दोनों चलती रहती हैं , परन्तु दो तिहाई कुरान देखते देखते उड़ा दिया गया .

“हक प्रकाश “ में तो यह दावा किया गया कि कुरान शरीफ रजिस्टर्ड डाक समान सुरक्षित व व्यवस्थित हो गया है . नई नई युक्तियाँ व नये नये दृष्टान्त घड़ने में तो मौलवियों ने प्रशंसनीय पुरुषार्थ किया है . पुरुषार्थ में क्या कमी छोडी ? परन्तु रजिस्टर्ड डाक की क्या दुर्दशा हुयी यह मौलाना मुहम्मद मंजूर जी की पुस्तक का प्रमाण देकर हमने ऊपर बता दिया है .

स्वरसवाही विदुषोऽपि तथा रूढोऽभिनिवेशः-९ – स्वामी विष्वङ्

 

क्लेशों के पाँच विभागों में से चार विभागों (अविद्या, अस्मिता, राग और द्वेष) की परिभाषाएँ बताकर महर्षि पतञ्जलि अन्तिम पाँचवें विभाग की चर्चा प्रस्तुत सूत्र में कर रहे हैं। महर्षि कहते हैं- प्रवाह (परम्परा) से चला आ रहा, यह मृत्यु का डर सर्वसाधारण मनुष्यों में तो रहता ही है, परन्तु विद्वानों में भी निरन्तर बना रहता है। इस मृत्युभय को ही अभिनिवेश नाम से कहा जाता है। यहाँ महर्षि ने ‘स्वरसवाही’ शब्द का प्रयोग किया है। स्वरस का अभिप्राय है- स्वभाव और वाही का अभिप्राय बनाये रखना, इस प्रकार स्वभाव को बनाया रखना अर्थ प्रकट होता है। स्वभाव दो प्रकार का होता है- एक नित्य स्वभाव और दूसरा अनित्य स्वभाव। यहाँ अनित्य स्वभाव को लिया गया है और यह अनित्य स्वभाव परम्परा से निरन्तर चला आ रहा है। इस कारण इसे प्रवाह से अनादि कहते हैं। यह मृत्युभय प्रवाह से-अनादि काल से निरन्तर चला आ रहा है और यह भय प्राणिमात्र को होता है। चाहे वह भय पशु, पक्षी, कीट-पतंगादि को होता हो, चाहे साधारण-से-साधारण मनुष्य को होता हो। मनुष्येतर प्राणियों को मृत्यु का भय होना और साधारण मनुष्यों को भी होना कोई विशेष आश्चर्य की बात नहीं है, परन्तु जो पण्डित-विद्वान् हैं, शास्त्रों को आदि से अन्त तक जानने वाले हैं, उन्हें बोध रहता है कि जो जन्म लेता है, वह मरता (शरीर त्याग करता) भी है। इतना सब कुछ जानने के पश्चात् भी अज्ञानियों के समान मृत्यु से घबराते-डरते हैं। इसी डर-भय को महर्षि ने अभिनिवेश नाम से कथन किया है।

प्रस्तुत सूत्र की व्याख्या करते हुए महर्षि वेदव्यास लिखते हैं-

सर्वस्य प्राणिन इयमात्माशीर्नित्या भवति,

मा न भूवं भूयासमिति।

अर्थात् प्रत्येक प्राणि को अपनी आत्मा के विषय में अभिलाषा होती है कि ‘मैं सदा ऐसा ही बना रहूँ, ऐसा कभी न हो कि मैं न रहूँ।’ ऐसी अभिलाषा नित्य होती है अर्थात् जब-जब आत्मा शरीर धारण करता है तब-तब आत्मा को ऐसा ही अनुभव होता है, इसलिए इसे सदा रहने वाली अभिलाषा कहा जाता है। इस कारण मनुष्य मृत्युभय को लेकर सदा सतर्क और सावधान रहता है। मनुष्य में एक स्वभाव है कि वह किसी भी व्यक्ति या वस्तु के प्रति आकर्षण रखता है या विकर्षण (अलगाव) रखता है। यह तब होता है, जब उसने, उस व्यक्ति या वस्तु का पहले अनुभव किया हो। यदि ऐसा नहीं है, अर्थात् पहले अनुभव नहीं किया, परन्तु आकर्षण या विकर्षण हो रहा है, ऐसा कभी सम्भव नहीं हो सकता, इसलिए महर्षि ने कहा है-

न चाननुभूतमरणधर्मकस्यैषा भवत्यात्माशीः।

अर्थात् जिस मनुष्य ने पूर्व जन्म में मृत्यु क्रिया का अनुभव न किया हो, उसकी यह आत्मा-सम्बन्धी अभिलाषा नहीं हो सकती। किसी भी आत्मा ने मरने के कष्ट का अनुभव कभी किया ही न हो, तो भला वह मरने से निरन्तर क्यों डरेगा? इससे यह स्पष्ट होता है कि-

एतया च पूर्वजन्मानुभवः प्रतीयते।

अर्थात् इसी अभिलाषा के कारण से पूर्व जन्म में अनुभव किये मरण दुःख का अनुभव इस वर्तमान जन्म में भी हो रहा है, ऐसी स्पष्ट प्रतीति होती है। वही यह मृत्युभय अपने संस्कारों के रूप में मन में विद्यमान होकर सदा मनुष्य को भयभीत करता रहता है। इस भयभीत करने वाले मृत्युभय को महर्षि ने अभिनिवेश नाम से पाँचवें क्लेश के रूप में प्रस्तुत किया है।

यद्यपि मनुष्य को इस संसार में नाना प्रकार के भय प्राप्त होते रहते हैं, जैसे अन्न न मिलने का भय, वस्त्र न मिलने का भय, घर न मिलने का भय अर्थात् रोटी, कपड़ा और मकान के प्रति सदा भय बना रहता है। यह भय सामान्य रूप से प्रत्येक मनुष्य को होता है, परन्तु कुछ विशेष साधनों के अभाव में विशेष मनुष्यों को ही भय सताता रहता है, ऐसा भय सबको नहीं होता। चाहे जड़ वस्तुओं से सम्बन्धित भय हो या चेतन वस्तुओं से सम्बन्धित भय हो, यह अलग-अलग व्यक्तियों की अलग-अलग योग्यताओं के कारण हो सकता है, परन्तु अभिनिवेश नामक भय, ऐसा भय है जिससे कोई भी मनुष्य अछूता नहीं रह सकता। न केवल मनुष्य, मनुष्येतर समस्त प्राणियों को भी यह भय आतंकित करता है, इसलिए महर्षि वेदव्यास कहते हैं-

स चायमभिनिवेशः क्लेशः स्वरसवाही कृमेरपि जातमात्रस्य प्रत्यक्षनुमानागमैरसम्भावितो मरणत्रास उच्छेददृष्ट्यात्मकः पूर्वजन्मानुभूतं मरणदुःखमनुमापयति।

अर्थात् और वह यह अपने संस्कारों के रूप में वर्तमान मरणभय रूप अभिनिवेश नामक क्लेश अभी-अभी उत्पन्नमात्र कृमि रूप क्षुद्रजन्तुओं को भी, जिनको इस वर्तमान जन्म में प्रत्यक्ष, अनुमान तथा शब्द प्रमाण से जानकारी नहीं मिली है, ऐसा उच्छेद-विनाश रूप मृत्यु का भय पूर्व जन्मों में अनुभव किये मरण दुःख का अनुमान कराता है।

यहाँ पर महर्षि वेदव्यास ने क्षुद्रजन्तु-कृमि का उदाहरण रूप में ग्रहण किया है, जिसने अभी-अभी जन्म लिया है, जिसे मृत्यु के विषय में किसी भी प्रकार की जानकारी नहीं है और न ही उसने किसी और को मरते हुए प्रत्यक्ष किया है, जिसको मृत्यु क्या होती है? इसका कोई पता तक नहीं है। ऐसी स्थिति में उसे अनुमान भी नहीं हो सकता, अर्थात् मृत्यु का प्रत्यक्ष न तो स्वयं को हुआ है और न ही अन्यों को मरते हुए प्रत्यक्ष किया है। बिना प्रत्यक्ष के उसे अनुमान भी नहीं होगा। जब कोई मनुष्य या अन्य प्राणि उस कृमि को मारने की चेष्टा करते हैं, तब वह कृमि पूर्व प्रत्यक्ष के अनुसार अनुमान नहीं कर सकता, क्योंकि उसे इस जन्म में कभी मृत्यु का प्रत्यक्ष ही नहीं हुआ है। न प्रत्यक्ष हुआ है और न ही अनुमान हो सकता है। कोई यह न समझे कि श         द प्रमाण से पता लग जायेगा? ऐसा भी नहीं हो सकता, क्योंकि शब्द प्रमाण का प्रयोग जिस प्रकार से मनुष्यों में होता है, उस प्रकार अन्यों (कृमि आदि योनियों) में नहीं होता है। मनुष्यों को उपदेशादि के द्वारा जानकारी दी जाती है, इसलिए मनुष्य श   द प्रमाण का प्रयोग करते हैं, परन्तु कृमि आदि ऐसा नहीं कर पाते हैं। मनुष्यों जैसी विकसित बुद्धि अन्य योनियों में नहीं होती है। इस कारण महर्षि वेदव्यास ने तीनों (प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द ) प्रमाणों से असम्भावित बताया है, फिर भी कृमि को मृत्यु का भय हो रहा होता है और वह भय अनायास पूर्व जन्म को सिद्ध करता है।

महर्षि वेदव्यास के इस उपरोक्त मन्तव्य से यह बात सिद्ध होती है कि पूर्व जन्म होता है और अगला जन्म भी होता है। जो कोई यह कहता है कि पूर्व जन्म को किसने देखा या अगले जन्म को किसने देखा? ये बातें निराधार हैं अर्थात् बिना प्रमाण के ऐसी-ऐसी बातें किया करते हैं, जिनके पीछे किसी भी प्रकार का आधार नहीं होता। यह अभिनिवेश नामक क्लेश निराधार वाली बातों को पूर्ण विराम दे देता है। अभिनिवेश नामक क्लेश से पूर्व जन्म, अगला जन्म, आत्म-नित्यत्व आदि अनेक सिद्धान्त खुलते हैं- स्पष्ट होते हैं और इनके माध्यम से आत्मा को यथार्थ रूप से समझने का यत्न किया जाता है। ऐसा जो करता है, वह तत्व ज्ञानी बन जाता है। तत्व ज्ञानी बन कर वह जन्म-मरण रूपी शृंखला को तोड़ देता है। इस सम्बन्ध में महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती लिखते हैं- ‘………इस क्लेश की निवृत्ति उस समय होगी कि जब जीव, परमेश्वर और प्रकृति अर्थात् जगत् के कारण को वह नित्य और कार्यद्रव्य के संयोग को अनित्य जान लेगा। इन क्लेशों की शान्ति से जीव को मोक्ष सुख की प्राप्ति होती है।’ (ऋग्वेदादिभाष्य-भूमिका मुक्तिविषय) यहाँ पर महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अभिनिवेश नामक क्लेश की व्याख्या करते हुए पूर्व जन्म और अगले जन्म की सिद्धि से आत्म-नित्यत्व की सिद्धि की है, जिससे योगाभ्यासी अपने आप (आत्मा) को जाने व समझे और अपने प्रयोजन को पूर्ण करने के लिए क्रियायोग को दृढ़ करे, जिससे तत्व ज्ञान हो सके और प्रयोजन को पूर्ण कर सके।

महर्षि वेदव्यास अभिनिवेश की व्यापकता को बताते हुए कहते हैं-

यथा चायमत्यन्तमूढेषु दृश्यते क्लेशस्तथा

विदुषोऽपि विज्ञातपूर्वपरान्तस्य रूढः।

अर्थात् यह अभिनिवेश नामक क्लेश अत्यन्त मूढ़ यानि सब प्रकार के विज्ञान से रहित महामूर्ख, जिसे सामान्य जानकारी भी नहीं है, जो घनघोर जंगलों में रह रहा हो, ऐसे व्यक्ति को सताता रहता है- इसमें कोई विशेष बात नहीं है, परन्तु जो विद्वान् है, जिसने सब शास्त्रों का अध्ययन किया है, जिसे जन्म और मृत्यु का बोध है, जिसे बन्धन का कारण और मोक्ष का भी कारण पता है, इतना ही नहीं उसे यह भी पता है कि जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु अवश्य होगी और जिसकी मृत्यु होगी, उसका पुनः जन्म भी होगा, इससे आत्मा का नाश नहीं होता, आत्मा तो नित्य है- इत्यादि सभी विषयों का यथावत् बोध रखता है, फिर भी मृत्यु से डरता रहता है। इस प्रकार साधारण से साधारण मनुष्य, पशु-पक्षी आदि और विद्वान् सभी मृत्यु से डरते हैं। मृत्यु का आतंक प्राणिमात्र को है, इसका निराकरण नहीं हो सकता। इस सम्बन्ध में महर्षि वेदव्यास कहते हैं-

‘कस्मात्? समाना हि तयोः कुशलाकुशलयोर्मरणदुःखानुभवादियं वासनेति।’

अर्थात् प्राणिमात्र को एक समान मृत्यु का भय क्यों होता है? इसका समाधान यह है कि पूर्व जन्म में कुशल=विद्वान् और अकुशल=साधारण अनपढ़ मनुष्य, दोनों ने एक समान मृत्यु का दुःख भोगा है। उस दुःखानुभव की वासना (संस्कार) दोनों में एक समान है, इसलिए वर्तमान जन्म में भी दोनों को पुनः मृत्यु का भय हो रहा है। इससे पूर्व जन्म की सिद्धि होती है।

संसार में कोई भी व्यक्ति इस बात का खण्डन नहीं कर सकता कि पूर्व जन्म नहीं होता या अगला जन्म नहीं होता। इतना ही नहीं, आत्मा नहीं मरता है-आत्मा का नाश नहीं होता है, यह जीवन ही अन्तिम जीवन नहीं है- इत्यादि अनेक विषय तर्क और प्रमाणों से सही सिद्ध होते हैं।

– ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर

 

नेपाल त्रासदी और हमारा कर्तव्य

दुर्घटनाएँ संसार में घटती रहती हैं। कभी ये मनुष्यकृत होती हैं तो कभी प्राकृतिक रूप में आती हैं। पिछले दिनों भारत में २७ मार्च को दोपहर के समय भूकम्प के झटकों का अनुभव किया गया। इसका केन्द्र नेपाल में था, अतः इसका प्रभाव नेपाल में अधिक हुआ। एक तो नेपाल में केन्द्र था, दूसरा भूकम्प की तीव्रता का नाप ७.८ था, जो बहुत अधिक था, इसी अनुपात से दुर्घटना का प्रभाव भी उतना ही तीव्र का हुआ। जहाँ हजारों मकान ध्वस्त हो गये, वहाँ अभी तक दस हजार से अधिक लोगों के मरने का अनुमान है। हताहत होने वालों की संख्या कई गुना अधिक है।

इस समय दुर्घटना तो प्राकृतिक थी, परन्तु मनुष्यों द्वारा की जाने वाली क्रिया भी आज चर्चा का विषय है। इस दुर्घटना को जिन्होंने भोगा, अनुभव किया, उनका दुःख अवर्णनीय है। उसे तो वे ही अनुभव कर सकते हैं परन्तु समाज में दूसरे लोग जो इस दुःख का अनुभव कर सकते हैं, वे ही इस कार्य में सहायता के लिये आगे बढ़ते हैं। यह प्रसन्नता और गर्व की बात है कि प्रधानमन्त्री मोदी और उनकी सरकार ने इस मानवीय संवेदना का परिचय दिया, उससे विश्व में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है। इससे संवेदनशीलता, तत्परता एवं बुद्धिमत्ता का परिचय मिलता है। हमारे ऋषियों ने मनुष्य जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान किया है। समस्या के समाधान को धर्म कहा गया है। जहाँ कहीं समस्या है, वहाँ उसके समाधान के रूप में धर्म उपस्थित होता है। हमारी संस्कृति में सेवा कार्य को धर्म कहा गया है। इससे पता लगता है कि सेवा एक अनिवार्य कार्य है और समस्या का समाधान भी।

इस बात को हम ऐसे समझ सकते हैं। जब मनुष्य समर्थ होता है, युवा होता है, सम्पन्न होता है तो वह समझता है कि मुझे किसी से क्या लेना है, मैं अपने पुरुषार्थ से जो अर्थोपार्जन करता हूँ, वह मेरा है, मैं उसका अपने लिये उपयोग करता हूँ। जैसे मैं अपने उपार्जित धन से अपना काम करता हूँ, उसी प्रकार सबको अपने धन से अपना काम चलाना चाहिए। मैं किसी के लिये कैसे उत्तरदायी हूँ? यह एक बुद्धिमान् व्यक्ति का विचार नहीं हो सकता। मनुष्य जीवन में सदा समर्थ और सम्पन्न नहीं रहता। पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय जी ने अपनी आत्मकथा में एक प्रसंग लिखा है कि – मैं पचहत्तर वर्ष की आयु में रोगी हो गया। रोग का आक्रमण लम्बा रहा, शरीर अत्यन्त निर्बल हो गया, परिणामस्वरूप खाना-पीना भी मेरे लिए स्वयं करना सम्भव नहीं रहा। जब मेरे परिवार के लोगों ने मुझे चम्मच से खिलाया, तब मुझे लगा कि केवल बच्चों को ही चम्मच से नहीं खिलाया जाता, बुढ़ापे में भी चम्मच से खिलाना पड़ता है। मनुष्य स्वस्थ, समर्थ एवं सम्पन्न होता है तब उसे किसी की आवश्यकता नहीं लगती परन्तु प्रत्येक मनुष्य के जीवन में शैशवावस्था, रुग्णावस्था, रोग और वृद्धावस्था आती है। इन तीनों के अतिरिक्त दुर्घटना कब, किसके जीवन में आये? नहीं कहा जा सकता। समाज में इन परिस्थितियों में मनुष्य को दूसरों की सहायता की आवश्यकता होती है। शैशव में मनुष्य के बालक का उत्पन्न होने के पश्चात् अकेले जीवित रहना असम्भव है। उसको बचाने के लिए माता-पिता, पालक की आवश्यकता होती है।

हम बचपन से किन-किन की सहायता से जीवित बचे हैं, इसकी हम कल्पना नहीं कर सकते। खाना-पीना, उठना-बैठना, चलना-बोलना, वस्त्र पहनना आदि समस्त जीवन व्यापार दूसरों के आधीन ही होता है। दूसरों की सहायता के बिना हमारा जीवित रहना सम्भव नहीं है। इस प्रकार वृद्धावस्था में हम कितने भी सम्पन्न हों, अशक्त होने की दशा में हमें दूसरों की सहायता की आवश्यकता पड़ती है। जब कभी रोग, शोक, भय आदि से आक्रान्त हो जाते हैं, तब हमारे जीवन में दुर्घटना कब, कहाँ घटित हो जाये, यह निश्चित नहीं। आज समुद्र में तूफान आते हैं, आँधियाँ आती हैं, बाढ़ आती है, सूखा पड़ता है, भूकम्प आता है, वायुयान, रेल, बस आदि की दुर्घटनाएँ होती हैं, आग लग जाती है। ये सब हमारे सामर्थ्य को एक क्षण में व्यर्थ कर देते हैं। हमारी संपत्ति हमारे लिए निरर्थक हो जाती है। हमारी संपत्ति से एक घूँट पानी हम नहीं प्राप्त कर सकते, जेब और बैंक में रखा हुआ धन हमारी असहाय स्थिति को दूर करने का सामर्थ्य खो देता है। इस परिस्थिति में हमारे बचने का क्या उपाय शेष रहता है- वह उपाय है दूसरों के द्वारा दी जाने वाली सहायता, जिसे हम सेवा के रूप में जानते हैं।

सेवा की अनिवार्यता तब समझ में आती है, जब व्यक्ति विवश होता है। मनुष्य किसी स्थान या व्यक्ति से परिचित न हो, भाषा भी न आती हो और जेब में पैसे भी न हों, तब व्यक्ति कैसे जीवित रहेगा? एक विकल्प तो यह है कि ऐसा व्यक्ति मर जाये तो हमारा क्या दोष है? इसके उत्तर में विचार करना चाहिए कि क्या यह परिस्थिति किसी के साथ ही आती है या यह परिस्थिति सबके साथ आ सकती है? तो इसका उत्तर है, यह परिस्थिति किसी के भी जीवन में कभी भी आ सकती है। तो इसका उपाय क्या है? इसका उपाय यह है कि जो भी व्यक्ति वहाँ उपस्थित है, वही हमारी सहायता करे, परन्तु कोई व्यक्ति आपकी सहायता क्यों करे? यहीं उत्तर है कि सेवा करना धर्म है, अतः उस व्यक्ति की सहायता की जानी चाहिए। सामान्य रूप में सभी व्यक्ति एक दूसरे की सहायता या आवश्यकता की पूर्ति करते हैं। यह पूर्ति का प्रकार दो प्रकार का हो सकता है। हम रेल में यात्रा कर रहे हैं। हमें प्यास लगती है, हम जेब से पैसे निकालते हैं, पानी वाले को देते हैं, वह हमें पानी दे देता है। उसने भी हमारी आवश्यकता की पूर्ति की है। इस कार्य के बदल में कोई कह सकता है कि मैं सेवा कर रहा हूँ, परन्तु यह सेवा नहीं है। सेवा में धन होने की अनिवार्यता नहीं है।

जब हम किसी कार्य को धर्म समझकर करते हैं तो उसमें व्यक्ति की पात्रता, उसकी आवश्यकता पर निर्भर करती है, जबकि व्यवसाय में पात्रता उसकी आवश्यकता पर नहीं, अपितु उसकी आर्थिक सामर्थ्य पर टिकी है। सेवा करने वाला व्यक्ति केवल आवश्यकता को, उसकी पीड़ा को देखता है, जबकि व्यवसाय करने वाला व्यक्ति उसकी आर्थिक क्षमता को देखता है, उसका उसकी पीड़ा या आवश्यकता से कोई सम्बन्ध नहीं होता। सेवा का उत्कृष्ट स्वरूप होता है जब हम प्राणि मात्र को उसकी पीड़ा से पहचानते हैं, न कि जाति, लिंग, आकृति या हानि-लाभ से। भगवान् बुद्ध ने अपने शिष्यों को शिक्षा देकर प्रचार के लिए भेजा। एक शिष्य ने एक शराबी को देखकर उसे उपदेश देने का प्रयास किया, शराबी ने बोतल से उसका सिर तोड़ दिया। शिष्य ने गुरु जी के पास जाकर अपना हाल सुनाया, गुरु जी ने सुन लिया। उस समय कुछ न कहा फिर एक बार उसी शिष्य को लेकर उसी गाँव में गये, जहाँ वही शराबी रोग से दुःखी अकेला पड़ा था। भगवान् बुद्ध उसे उपेदश नहीं दिया, उसकी सेवा की, उसे साफ किया, उसको औषध दी, उसको भोजन-पानी दिया, वह शराबी भगवान् बुद्ध का शिष्य बन गया।

जिस क्षण हम सेवा के बदले में कुछ चाहते हैं, तो वह सौदा हो जाता है। नेपाल के प्रसंग में यह घटना याद करने योग्य है। चर्च ने भूकम्प के समय बाइबिल की एक लाख प्रतियाँ नेपाल में भेजी, यह किसी भी प्रकार से सेवा की श्रेणी में नहीं आता। यह तो मौके का फायदा उठाना है, यह व्यापार है, सौदा है। चर्च कहीं भी सेवा नहीं करता, इस प्रसंग में एक घटना का उल्लेख करना उचित होगा। ईसाई प्रचारक फादर लेसर अब स्वर्गीय हो गये, उन्होंने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए कहा था- हमने भारत में चार सौ वर्षों से सेवा का कार्य किया, परन्तु भारतीय समाज अभी तक हम पर विश्वास नहीं करता। इसके उत्तर में मैंने निवेदन किया कि फादर, ईसाई चर्च कभी भी सेवा कार्य नहीं करता, वह सदा सौदा करता है, वह बदले में ईमान माँगता है। उसके हर सेवा कार्य के पीछे ईसाई बनने की शर्त रहती है। जब कभी हम अपने कार्य के बदले में दूसरे से कुछ चाहते हैं तो वह सेवा न होकर सौदा, व्यापार हो जाता है। हमारे ऋषियों ने सेवा को धर्म कहा है। धर्म स्थान एवं व्यक्ति की योग्यता नहीं देखता, उसकी पात्रता केवल उसकी पीड़ा है और उसका निराकरण का प्रयास सेवा है।

संसार दुःखमय है, इसमें जन्म के साथ ही दुःखों का प्रारम्भ हो जाता है। हमारे मित्र, सहयोगी, सम्बन्धी मिलकर एक-दूसरे के दुःख को दूर करने का प्रयास करते हैं, परन्तु जिनको जीवन में ये साधन नहीं मिले, उनका भी उपाय होना चाहिए, यह उनका अधिकार है। जब हम सेवा करते हैं, तब हम उस पर उपकार नहीं कर रहे होते। हमें उपकार का अवसर मिला है, हम आज पीड़ित नहीं, सेवक हैं। भारतीय संस्कृति में कोई भी कार्य निष्फल नहीं होता, सेवा कार्य भी नहीं। जैसे व्यापार का लाभ तत्काल होता है तो हम कर्म के लिए प्रेरित होते हैं, परन्तु हम भूल जाते हैं कि यदि व्यापार में किया गया कर्म निष्फल नहीं गया तो धर्म में किया गया कर्म कैसे निष्फल हो सकता है? धर्म कार्य में भी कार्य तो हुआ है, हमने इच्छा नहीं की कि हमें कोई पैसा मिले, कोई लाभ मिले, इस परिस्थिति में हमारे दो कार्य होते हैं और उसके दो फल मिलते हैं। एक फल हमारी बदले की इच्छा न होने से सन्तोष की प्राप्ति और अनासक्ति का सुख मिलता है तथा जो हमारे दूसरे की सहायता का कार्य किया है, उसका लाभ हमें तब सहज ही प्राप्त होता है, जब कभी हम किसी संकट या विपत्ति में फँस जाते हैं और कहीं से अज्ञात हाथ आकर हमारी रक्षा करते हैं, हमें बचा लेते हैं। व्यापार के फल को हम जानते हैं कि वह कब मिलेगा, कहाँ मिलेगा, कितना मिलेगा? परन्तु धर्म का फल कहाँ किसको कब मिलेगा हमें पता नहीं चलता। सबको धार्मिक होने की इसीलिये आवश्यकता है कि सभी धार्मिक होंगे, सेवा भावी होंगे तो कोई भी कहीं भी कष्ट में क्यों न हो, जो व्यक्ति जहाँ उपस्थित है, उसके मन में सेवा भाव होगा वह तत्काल सेवा कार्य में जुट जायेगा।

हमें स्मरण रखना चाहिए कि जब हम दुःख में होते हैं, तब परमेश्वर से सहायता की याचना करते हैं। हमें स्मरण रखना होगा कि हर प्राणी उस परमेश्वर की ही सन्तान है, किसी पीड़ित प्राणी की सेवा करना परमेश्वर को प्रसन्न करने का उपाय है। आज कोई व्यक्ति दुःखी को लूटता है, हिंसा करता है, उसकी उपेक्षा करता है तो वह पापी बन जाता है, लोग अपनी पापवृत्ति के कारण बेहोश, मरे, पीड़ित व्यक्ति की सम्पत्ति लूटते हैं, चुराते हैं तो वे किस प्रकार अपने लिए दूसरे की सहायता मिलने की अपेक्षा कर सकते हैं? बहुत सारे लोग इन आपदाओं के लिए परमेश्वर को उत्तरदायी मानते हैं। परमेश्वर उत्तरदायी इसलिये नहीं है कि संसार उसकी व्यवस्था में चल रहा है। जहाँ भी, जब भी व्यवस्था में व्यतिक्रम होता है तो संकट आता है, बहुत बार यह अव्यवस्था के कारण का हमें पता चलता है और बहुत बार हमें पता नहीं चलता। अधिकांश रूप में हम अपनी आवश्यकता और स्वार्थ की पूर्ति के लिए नियमों को तोड़ते हैं, व्यवस्था को भंग करते हैं।

हम वृक्षों को तोड़कर, जलधाराओं को मोड़कर पर्यावरण के सन्तुलन को बिगाड़ देते हैं। स्वार्थ के लिये बड़ी मात्रा में हिंसा करते हैं। जहाँ जड़ पदार्थों के उचित क्रम और व्यवस्था को बिगाड़ना हिंसा है, वहीं प्राणियों का निरन्तर वध करना हिंसा है। उसका हमारे जीवन और पर्यावरण पर प्रभाव पड़े बिना नहीं रह सकता। नेपाल में धर्म के नाम पर जितनी जीव हत्या होती है, क्या उसके दण्ड से आप बच सकते हैं? आप पीड़ा नहीं चाहते, आप पीड़ा देने वाले को अपराधी मानते हैं, उसे दण्डित करना चहाते हैं तो क्या निरीह पशुओं को अकारण धर्म के नाम से क्रूरता से संहार करके आप सुरक्षित रह सकते हैं? आज वैज्ञानिकों ने प्रमाणित किया कि प्राणियों की निरन्तर बढ़ती हुई हिंसा वातावरण में भारी उथल-पुथल का कारण है। इसी कारण भूकम्प और प्राकृतिक आपदाएँ आती हैं। पशु प्राणी सृष्टि-संरचना में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। उसके न रहने पर या क्षतिग्रस्त होने पर समस्त पर्यावरण प्रभावित होता है। हिंसा से मनुष्य में तमोगुण, बढ़कर क्रोध, तनाव, भय, आतंक आदि उत्पन्न करता है। इससे मनुष्य का मन-मस्तिष्क विकृत होकर उसे रोगी, अस्थिरचित्त एवं दुर्बल बना देती है।

केदारनाथ, नेपाल आदि की घटनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन करके उनके कारणों का हमें पता लगाना चाहिए। अहिंसा, सत्य, अस्तेय आदि के पालन से आत्मा में शान्ति, मन में स्थिरता व बुद्धि में सतोगुण बढ़ता है। हिंसा से स्वार्थ एवं परहानि की प्रवृत्ति बढ़ती है। नेपाल में पशुपतिनाथ के नाम पर हम भैसों-बकरों की बलि चढ़ा कर शान्ति से रहना चाहेंगे, यह सम्भव नहीं होगा। जीवन में से किसी भी प्रकार की हिंसा को दूर किये बिना मनुष्य का सुखी होना सम्भव नहीं है। परोपकार सेवा ही पुण्य है और हिंसा तथा स्वार्थ के लिए परहानि करना ही पाप है। प्रकृति की प्राणियों की हिंसा जबतक बढ़ती रहेगी, समाज का सन्ताप, कष्ट, आपत्तियां भी बढ़ती रहेंगी, अतः कहा गया है- पुण्य से सुख मिलता है और पाप से दुःख परोपकार पुण्य है और परपीड़न पाप है-

परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।।

– धर्मवीर

 

दुःखानुशयी द्वेषः-८ – स्वामी विष्वङ्

क्लेशों के पाँच विभागों में से तीन विभागों (अविद्या, अस्मिता, राग) की परिभाषाएँ बताकर महर्षि पतञ्जलि चौथे विभाग की चर्चा प्रस्तुत सूत्र में कर रहे हैं। महर्षि कहते हैं- दुःख के पीछे-पीछे चलने वाले क्लेश को द्वेष कहते हैं। अभिप्राय यह है कि मनुष्य जिस दुःख का अनुभव करता है, उस दुःख के अनुभव के पीछे मन में दुःख के प्रति प्रतिशोध बना रहता है, विरोध- आवेश बना रहता है। उस प्रतिशोध को, उस विरोध-आवेश को यहाँ द्वेष शब्द से कहा जा रहा है। मनुष्य को जहाँ कहीं भी दुःख का अनुभव होता है, वहाँ उसे द्वेष हो जाता है। मिथ्याज्ञान से युक्त मनुष्य को जहाँ-जहाँ दुःख की अनुभूति होती है, वहाँ-वहाँ द्वेष अवश्य होता है। ऐसा कभी नहीं हो सकता कि मिथ्याज्ञान से युक्त होकर दुःख तो भोगे, पर द्वेष न हो, इसलिए महर्षि पतञ्जलि कहते हैं- दुःख अनुभव के पीछे-पीछे चलने वाला प्रतिशोध रूपी, विरोध-आवेशरूपी क्लेश ही द्वेष है।

महर्षि वेदव्यास प्रस्तुत सूत्र की व्याख्या करते हुए लिखते हैं-

दुःखाभिज्ञस्य दुःखानुस्मृतिपूर्वो दुःखे तत्साधने

वा यः प्रतिघो मन्युर्जिघांसा क्रोधः स द्वेष इति।

अर्थात् दुःख का अनुभव करने वाले मनुष्य को दुःख के साधनों को दूर करने की भावना होती है, उसे दुबारा न प्राप्त करने की मनसा होती है या यूँ कहें, उसे बार-बार न अपनाने का विरोध होता है। उस प्रतिघ रूपी प्रतिकार को, उस मन्यु रूपी विरोध को, उस जिघांसा रूपी मार-काट करने की भावना को या क्रोध रूपी आवेश को द्वेष नाम से कहा जाता है। यहाँ महर्षि वेदव्यास ने द्वेष को समझाने के लिए चार श  दों का प्रयोग (प्रतिघः, मन्युः, जिघांसा, क्रोधः) किया है। ये चारों शब्द  द्वेष को ही स्पष्ट कहते हैं। संसार में द्वेष के लिए क्रोध, गुस्सा, वैर, प्रतिशोध, आवेश आदि श       शब्दों  का प्रयोग होता रहता है।

मनुष्य को रूप, रस, गन्ध, स्पर्श एवं शब्द वाली वस्तुओं से जो दुःख प्राप्त होता है, उसकी छाप मन में पड़ती है। दुःख की उस छाप को संस्कार कहते हैं। इस प्रकार दुःख अनुभव के जितने भी संस्कार मन में एकत्रित होते हैं, उनकी स्मृतियाँ मनुष्य को आती रहती हैं। उन स्मृतियों के अनुरूप मनुष्य उस-उस दुःख के प्रति या उस-उस दुःख के साधन के प्रति प्रतिशोध करता रहता है और उसे दूर करने का पुरुषार्थ करता रहता है। जब तक दुःख या दुःख के साधन दूर नहीं होते हैं, तब तक मनुष्य उद्यम करता ही रहता है। उस दुःख और दुःख के साधनों के पुरुषार्थ के पीछे द्वेष कारण बना हुआ होता है।

यहाँ व्यासभाष्य में महर्षि वेदव्यास ने मन्युः और क्रोधः इन दोनों शब्दों  को ग्रहण करके यह स्पष्ट किया है कि मन्यु और क्रोध दोनों द्वेष के पर्यायवाची शब्द हैं। केवल अन्तर इतना है कि मन्यु आन्तरिक द्वेष होता है और क्रोध बाह्य द्वेष होता है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने यजुर्वेद के ३०वें अध्याय के १४वें मन्त्र में आये मन्यु शब्द का अर्थ आन्तरिक क्रोध किया है- मन्यवे= आन्तर्यक्रोधाय और क्रोध शब्द का अर्थ बाह्य कोप किया है- क्रोधाय= बाह्यकोपाय। इस प्रकार मन्यु और क्रोध एक अर्थ को कहने वाले होते हुए भी कुछ अन्तर रखते हैं और वह अन्तर बाह्य और आन्तरिक है। मनुष्य कभी-कभी अन्दर ही अन्दर द्वेष कर रहा होता है, उसे मन्यु कह सकते हैं। ऐसी स्थिति में वह अपने द्वेष को बाहर प्रकट होने नहीं देता है। उस आन्तरिक मन्यु के कारण अन्दर-ही-अन्दर दुःखी होता रहता है। जब मनुष्य बाह्य रूप से वाणी या शरीर द्वारा द्वेष कर रहा होता है, तब अन्य मनुष्यों को स्पष्ट पता चलता है कि यह व्यक्ति द्वेष कर रहा है। चाहे द्वेष अन्दर से करे या बाहर से करे, दोनों ही स्थितियों में हानिकारक है, क्योंकि द्वेष मनुष्य के प्रयोजन में बाधक है।

यद्यपि द्वेष की परिभाषा एक ही है, परन्तु मनुष्य अलग-अलग हैं, पशु-पक्षी आदि अलग-अलग हैं, इसलिए द्वेष भी अलग-अलग प्रकार से होता है। चेतन प्राणि-मनुष्य, पशु, पक्षी आदि का द्वेष अलग प्रकार का है और जड़ पदार्थ- विष, गहरा पानी, अग्नि आदि का द्वेष अलग प्रकार का है। व्यक्ति-व्यक्ति का द्वेष भी अलग-अलग होता है। रूप का द्वेष भी अलग-अलग होता है, कोई काले रूप से, कोई हरे रूप से तो कोई किसी रूप से द्वेष करता है। इसी प्रकार रसों का द्वेष अलग-अलग है, गन्धों का द्वेष अलग-अलग है, ऐसे ही स्पर्शों का और शब्दों  का द्वेष भी अलग-अलग है। इस प्रकार समस्त रूपों, रसों, गन्धों, स्पर्शों और शब्दों  के विभिन्न प्रकार के भेद हैं। असंख्य प्रकार की वस्तुएँ और असंख्य प्रकार के द्वेष और ऐसे ही असंख्य प्रकार के प्राणि तथा असंख्य प्रकार के द्वेष। इस प्रकार व्यक्ति भेद से द्वेष भेद असंख्य हो जाते हैं। व्यक्ति भेद से द्वेष भले ही असंख्य हो जाते हों, परन्तु द्वेषत्व सब में व्यापक होने से जाति के रूप में द्वेष को एक ही कहा जाता है।

मनुष्य जिन पर द्वेष करता है, वे दो प्रकार के पदार्थ हैं- एक जड़ और दूसरे चेतन। इन दोनों में द्वेष होता है। जड़ पदार्थ अनेक प्रकार के हैं। अलग-अलग जड़ पदार्थों के द्वेष एक-दूसरे से अलग-अलग होते हुए भी द्वेषत्व की दृष्टि से वे एक ही होते हैं। जब उन अलग-अलग जड़ पदार्थों से दुःख प्राप्त करता है, तब उन अलग-अलग दुःखों की छाप मन में पड़ती है। उस छाप रूपी संस्कारों से प्रेरित होकर उस व्यक्ति के मन में जो प्रतिकार की भावना, आवेश की भावना उत्पन्न होती है, उसे ही यहाँ द्वेष कहा जा रहा है। उसी प्रकार चेतन प्राणि भी अनेक प्रकार के हैं, अलग-अलग प्राणियों के द्वेष अलग-अलग होते हुए भी द्वेषत्व सब में एक ही है। इस प्रकार अनेक जड़ पदार्थों के अनेक द्वेष और अनेक चेतन पदार्थों के अनेक द्वेष मनुष्य को संतप्त करते हैं। इतने प्रकार के द्वेष मन में विद्यमान हों, तो मनुष्य कैसे परमेश्वर के प्रति आकर्षित होकर एकाग्र हो पायेगा?

मनुष्य ने जड़ और चेतन से सम्बन्धित जितने दुःख भोगे हैं, उन सबके प्रति पुनः दूर करने के लिए जो प्रतिकार की भावना होती है, वह तो द्वेष है ही, उसके साथ-साथ जिन जड़ और चेतनों से अब तक मनुष्य ने दुःख भोगा ही नहीं है, परन्तु उनके विषय में सुना है, पढ़ा है और उन पर प्रमाणों द्वारा विचार किया है, वह भी द्वेष है। सुनने से, पढ़ने से, विचार करने मात्र से भी मन में उनकी छाप पड़ती है। उस छाप रूपी संस्कार से स्मृति उत्पन्न होती है और उस स्मृति के अनुरूप प्रतिकार, आवेश उत्पन्न होता है, उसे भी द्वेष कहते हैं।

यह आवश्यक नहीं है कि जिस दुःख के या दुःख के साधनों के अनुभव से जो संस्कार मन में पड़ता है, उसकी स्मृति से पुनः उस दुःख को दूर करने की प्रतिशोध रूपी भावना को ही द्वेष कहा जाये, बल्कि दुःख प्राप्त नहीं हुआ या दुःख के साधनों को प्राप्त भी नहीं किया, फिर भी उस दुःख और दुःख के साधनों के प्रति द्वेष उत्पन्न होता है। यदि बिना दुःख और दुःख के साधनों को प्राप्त किये भी द्वेष होता हो, तो क्या यह महर्षि पतञ्जलि और महर्षि वेदव्यास के विपरीत तो नहीं माना जायेगा? इसका समाधन यह है कि वह ऋषियों के विपरीत नहीं जायेगा, क्योंकि दुःखों व दुःख के साधनों को चाहे प्राप्त नहीं किया हो, परन्तु उनके विषय में सुनते, पढ़ते और विचार करते समय दुःख अनुभव होता है- भले ही वह दुःख अनुभव श्रवण से होने वाला दुःख हो, पढ़ने से होने वाला दुःख हो या विचार से होने वाला दुःख हो। दुःख अनुभव तो हुआ है, उसी दुःख अनुभव के पीछे-पीछे चलने वाला प्रतिशोध ही द्वेष कहलाता है, चाहे वह दुःख जड़ वस्तु या चेतन वस्तु से प्राप्त होने वाला हो अथवा श्रवण, पठित और विचारित दुःख हो। दुःख तो दुःख ही है, चाहे किसी से सम्बन्धित हो। इस प्रकार द्वेष मात्र, ऋषियों की परिभाषाओं के अनुरूप होना चाहिए।

असंख्य प्रकार के जड़ पदार्थों और असंख्य प्रकार के चेतन पदार्थों का द्वेष मनुष्य के जीवन में कार्य करता रहता है। वह द्वेष कभी वर्तमान (उदार अवस्था) में रहता है, कभी विच्छिन्न (दबा) रहता है, तो कभी-कभी तनू (कमजोर) होकर बहुत सूक्ष्मता से रहता है। यदि इन तीनों स्थितियों में नहीं है, तो प्रसुप्त (सोया हुआ) रहता है। इसलिए मनुष्य को यह नहीं समझना चाहिए कि मुझमें अमुक-अमुक जड़ व चेतन वस्तु के प्रति द्वेष नहीं है। हाँ, द्वेष तो है, परन्तु वर्तमान अवस्था में नहीं है, पर दबा हुआ है या बहुत सूक्ष्म होकर रह रहा है अथवा सोया हुआ है, इसलिए ऐसा लगता है कि द्वेष नहीं है, परन्तु द्वेष तो है। जो योगाभ्यासी ऐसी स्थिति को अनुभव कर लेता है, वही योगाभ्यासी द्वेष को दूर करने का उद्यम कर सकता है और जो व्यक्ति अविद्या के कारण यह समझ बैठता है कि मुझ में द्वेष नहीं है, वह व्यक्ति द्वेष को दूर करने का उद्यम कभी नहीं कर पाता है। मनुष्य को चाहिए कि वह प्रमाणों से युक्त होकर पूर्वापर का विचार करते हुए अपने जीवन के उद्देश्य को आत्म समक्ष रखते हुए देखे, तो निश्चित रूप में द्वेष समझ में आयेगा। जब मनुष्य ऋषियों के अुनरूप अपनी बुद्धि को बनाते हैं, तो निश्चित रूप से ऋषियों के समान अपने को भी कृतकृत्य कर सकते हैं और तभी ऋषियों का पुरुषार्थ सार्थक हो सकता है।

द्वेष का विवेक द्वेष को समाप्त करने वाला होता है,

द्वेष का अविवेक द्वेष को बढ़ाने वाला होता है।

– ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर