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योग

योग

– डॉ. जगदेव विद्यालंकार

‘योगश्चित्तवृत्ति निरोधः’ योग दर्शन के अनुसार चित्त की वृत्तियों को रोकना ही योग कहलाता है। आयन्तर इन्द्रिय अर्थात् बुद्धि की उस स्थिरता को योग कहते हैं, जिसमें वह चेष्टा नहीं करती, उस अवस्था में परमात्मा में स्थिति होती है, इसलिए अगले सूत्र में कहा- ‘तदा द्रष्टुःस्वरूपेऽवस्थानम्’जब सर्ववृत्तियों का निरोध होकर चित्त अपनी कारण प्रकृति में लीन हो जाता है, उस अवस्था में वह अपने चेतन-स्वरूप से परमात्मा के आनन्द को भोगता हुआ उसी में स्थिर होता है। यही जीव का अन्तिम और चरम लक्ष्य है, इसी को मोक्ष कहते हैं।

प्रयत्न करना जीव का स्वभाव है। जब तक मोक्ष प्राप्त नहीं होता, तब तक मनुष्य प्रयत्नशील रहता है। प्रयत्न भी शुभ कर्मों के लिये होना चाहिए। मनुष्य अशुभ कर्मों को छोड़कर शुभ कर्मों में जब-जब और जितना-जितना प्रवृत्त होता है, उतना ही वह मोक्ष-मार्ग पर आगे बढ़ता है अर्थात् सकाम-कर्म को छोड़कर निष्काम कर्म में मनुष्य जितना प्रवृत्त होता है, उतना ही वह मोक्ष प्राप्ति के निकट पहुँचता है।

मानव की आध्यात्मिक उन्नति तो पूर्ण रूप से योगसाधना पर आधारित है ही, भौतिक उन्नति में भी योगसाधना की आवश्यकता है। भौतिक-जीवन में भी योगायास से शान्ति मिलती है। योग के द्वारा मनुष्य भौतिकता और आध्यात्मिकता में सामंजस्य स्थापित कर सकता है।

महर्षि पतञ्जलि ने योग में सफलता प्राप्त करने के लिए योग के आठ अंगों का विधान किया है, जो निम्न प्रकार से हैं-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।

यम पाँच प्रकार के होते हैं

  1. अहिंसा-मन, वाणी और शरीर से कभी भी किसी को भी दुःख न देने का नाम अहिंसा है।
  2. सत्य-यथार्थ भाषण अर्थात् जैसा देखा वा अनुमान किया अथवा सुना, उसको वैसा ही कथन करने का नाम सत्य है।
  3. अस्तेय-चोरी न करना अर्थात् छल, कपट, ताड़नादि किसी प्रकार से भी अन्य पुरुष के धन को ग्रहण न करने का नाम अस्तेय है।
  4. ब्रह्मचर्य-सर्व इन्द्रियों के निरोधपूर्वक उपस्थ इन्द्रिय के निरोध का नाम ब्रह्मचर्य है।
  5. अपरिग्रह-दोष-दृष्टि से विषयों के परित्याग का नाम अपरिग्रह है।

नियम भी पांच प्रकार के होते हैं

  1. शौच- यह दो प्रकार का है-

– बाह्य-शौच-जल अथवा मिट्टी आदि से शरीर के और हित, मित तथा मेध्य अर्थात् पवित्र भोजन आदि से उदर के प्रक्षालन का नाम बाह्य शौच है।

– आयन्तर-शौच-मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा आदि भावनाओं से ईर्ष्या-द्वेष आदि चित्त के मलों के प्रक्षालन का नाम आयन्तर शौच है।

  1. सन्तोष-जो भोग के उपयोगी साधन अपने पास विद्यमान हैं, उनसे अधिक उपयोगी साधनों की लालसा न करना सन्तोष है।
  2. तप-सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी, लाभ-हानि, मान-अपमान आदि द्वन्द्वों को सहने और हितकर तथा परिमित आहार करना ही तप कहलाता है।
  3. स्वाध्याय-ओंकारादि ईश्वर के पवित्र नामों का जप और वेद, उपनिषद्, वेदांग, उपांग, आदि शास्त्रों के अध्ययन का नाम स्वाध्याय है।
  4. ईश्वर-प्रणिधान-फल की इच्छा छोड़कर केवल ईश्वर की प्रसन्नता के लिए वेदविहित कर्मों के करने को ईश्वर-प्रणिधान कहते हैं।
  5. आसन- ‘स्थिरसुखमासनम्’स्थिर तथा सुखदाई स्थिति का नाम आसन है। योगी सिद्धासन, पद्मासन, वीरासन, भद्रासन, स्वस्तिकासन आदि जिस आसन में सुख से बैठकर ईश्वर का ध्यान लगा सके, वही आसन उचित है। आसन के सिद्ध हो जाने पर योगी को सर्दी-गर्मी आदि द्वन्द्व नहीं सताते।
  6. प्राणायाम- महर्षि मनु ने अपनी ‘मनुस्मृति’ में प्राणायाम की महिमा का वर्णन करते हुए लिखा है-

‘‘दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनांहि यथा मलाः।

तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात्?’’

– 6.71

अर्थात् जैसे अग्नि में तपाने और गलाने से धातुओं के मल नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही प्राणों के निग्रह से मन आदि इन्द्रियों के दोष भस्मीभूत हो जाते हैं। पतञ्जलि मुनि ने प्राणायाम का लक्षण बताते हुए लिखा है ‘तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः’ अर्थात् आसन की सिद्धि होने पर श्वास-प्रश्वास की गति के  अभाव का नाम प्राणायाम है। उन्होंने प्राणायाम के चार प्रकार बतलाये।

  1. बाह्यवृत्ति- जिस प्राणायाम में प्रश्वासपूर्वक प्राणगति का अभाव होता है, उसका नाम बाह्यवृत्ति है, इसे रेचका भी कहते हैं, क्योंकि इसमें प्राणवायु को बाहर ही रोका जाता है।
  2. आयन्तरवृत्ति- जिस प्राणायाम में श्वासपूर्वक प्राणगति का अभाव होता है, उसका नाम आयन्तरवृत्ति है, इसे पूरक भी कहते हैं, क्योंकि उसमें प्राणवायु को भीतर ही रोका जाता है।
  3. स्तभवृत्ति- जिस प्राणायाम में श्वासप्रश्वासपूर्वक प्राणगति का अभाव होता है उसका नाम स्तभवृत्ति है, इसे कुभक भी कहते हैं, क्योंकि इसमें कुभस्थ जल की भांति देह के भीतर निश्चलतापूर्वक प्राण की स्थिति होती है। इसमें जहाँ का तहाँ प्राण को रोका जाता है।
  4. बाह्यायन्तर विषयाक्षेपी- इसमें प्राण की स्वाभाविक गति को विपरीत दिशा में बलपूर्वक धकेला जाता है। अर्थात् यदि प्राण बाहर आ रहा है तो भीतर की ओर तथा भीतर जा रहा है तो बाहर की ओर धकेला जाता है।

प्राणायाम के लाभ

1– प्राणायाम से आयु की वृद्धि होती है।

2– प्राणायाम से शारीरिक और मानसिक उन्नति होती है।

3– प्राणायाम से रोग दूर होते हैं।

4– प्राणायाम से कुत्सित मनोवृत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं।

5– प्राणायाम से चित्त का मल दूर होकर ज्ञान बढ़ता है।

6– प्राणायाम से प्राण वश में होने से इन्द्रियाँ और मन भी वश में हो जाते हैं।

7– प्राणायाम से धातुओं की पुष्टि होती है।

8– प्राणायाम से हृदय पर पड़े तम के आवरण का नाश होता है।

  1. प्रत्याहार- ‘स्वविषयासंप्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः’।

अर्थात् अपने-अपने विषयों के साथ समबन्ध न होने के कारण इन्द्रियों की चित्तस्थिति के समान स्थिति का नाम प्रत्याहार है। इन्द्रियों का बाह्य विषयों में जाना सहज स्वभाव है, उस सहज स्वभाव के विपरीत अन्तर्मुख होने को प्रत्याहार कहते हैं।

  1. धारणा- ‘देशबन्धश्चित्तस्य धारणा’।

अर्थात् चित्त का देश-विशेष (शरीर के नासिकाग्र, जिह्वाग्र, हृदयकमल आदि अंग-विशेष) में स्थिर करना धारणा कहलाता है।

  1. ध्यान- ‘तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्’।

अर्थात् धारणा के अनन्तर ध्येय पदार्थ में होने वाली चित्तवृत्ति की एकतानता को ध्यान कहते हैं।

  1. समाधि- ‘तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशुन्यमिव समाधिः।

अर्थात् अपने ध्यानात्मक रूप से रहित केवल ध्येय रूप से प्रतीत होने वाले उक्त ध्यान का ही नाम समाधि है। चित्त की जिस एकाग्र अवस्था में ध्याता, ध्यान, ध्येयरूप त्रिपुटि का भान होता है, उसको ध्यान और केवल ध्येय के भान को समाधि कहते हैं।

उपर्युक्त अष्टांगयोग से योगियों की तो उन्नति होती ही है, सांसारिक मनुष्यों को भी इससे जीवन में बहुत लाभ होता है।

स्वामी रामदेव जी नौ प्राणायाम, भस्रिका, कपालभाति, अनुलोम-विलोम आदि बताते हैं। लेकिन स्वामी दयानन्द जी ने न तो इनका वर्णन सत्यार्थ प्रकाश में किया है, न ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में। उन्होंने रेचक, पूरक व कुभक का वर्णन किया है कि इनको कम से कम तीन बार व अधिक से अधिक 21 बार या जितनी अपनी क्षमता हो उतनी बार करें। इनमें कोन सी विधि ठीक है,

जिज्ञासामाननीय, स्वामी रामदेव जी नौ प्राणायाम, भस्रिका, कपालभाति, अनुलोम-विलोम आदि बताते हैं। लेकिन स्वामी दयानन्द जी ने न तो इनका वर्णन सत्यार्थ प्रकाश में किया है, न ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में। उन्होंने रेचक, पूरक व कुभक का वर्णन किया है कि इनको कम से कम तीन बार व अधिक से अधिक 21 बार या जितनी अपनी क्षमता हो उतनी बार करें। इनमें कोन सी विधि ठीक है, स्वामी रामदेवजी वाली या स्वामी दयानन्दजी वाली। कृपया हमारा मार्गदर्शन करें। धन्यवाद

– तेजवीर सिंह, ए-1, जैन पार्क, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059

 

समाधानप्राणायाम परमेश्वर प्राप्ति के साधन अष्टाङ्ग योग का चौथा अङ्ग हैं। योग अंगों में सभी अंग महत्त्वपूर्ण है, सभी अंगों की महत्ता है। प्राणायाम की भी अपनी महत्ता है। प्राणायाम का महत्त्व प्रकट करते हुए महर्षि पतञ्जलि योग-दर्शन में लिखते हैं ‘‘ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्’’ अर्थात् विधिपूर्वक योग-दर्शन में बताए प्राणायाम का निरन्तर अनुष्ठान करने से आत्मा-परमात्मा के ज्ञान को ढकने वाला आवरण जो अविद्या है वह नित्यप्रति नष्ट होता जाता है, और ज्ञान का प्रकाश बढ़ता जाता है। और भी योग-दर्शन में मन को प्रसन्न रखने वाले उपायों में प्राणायाम को भी महत्त्वपूर्ण कहा है। महर्षि ने सूत्र लिखा ‘‘प्रच्छर्दनविधारणायां वा प्राणस्य’’ (यो. 1.34) ‘‘जैसे भोजन के पीछे किसी प्रकार का वमन हो जाता है, वैसे ही भीतर के वायु को बाहर निकाल के सुखपूर्वक जितना बन सके उतना बाहर ही रोक दे। पुनः धीरे-धीरे लेके पुनरपि ऐसे ही करें। इसी प्रकार बारबार अभयास करने से प्राण उपासक के वश में हो जाता है और प्राण के स्थिर होने से मन, मन के स्थिर होने से आत्मा भी स्थिर हो जाता है। इन तीनों के स्थिर होने के समय अपने आत्मा के बीच में जो आनन्दस्वरूप अन्तर्यामी व्यापक परमेश्वर है, उसके स्वरूप में स्थिर हो जाना चाहिए।’’ (ऋ.भा.भू.)

इन ऋषि-वचनों से ज्ञात हो रहा है कि प्राणायाम हमारे मन को स्थिर व प्रसन्न करने में अति सहायक है। महर्षि दयानन्द व योग-शास्त्र के प्रणेता महर्षि पतञ्जलि ने योग में सहायक चार प्राणायामों को ही स्वीकार किया है। महर्षि दयानन्द ने इन चारों प्राणायामों की चर्चा सत्यार्थप्रकाश के तीसरे समुल्लास व ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका की उपासना विषय में विस्तार से की है।

प्राणायाम का अर्थ क्या है, प्राणायाम-प्राण+आयाम इन दो शबदों से मिलकर बना है। प्राण की लमबाई, विस्तार, फैलाव, नियमन का नाम प्राणायाम है। प्राणायाम में प्राण का विस्तार किया जाता है, लमबे समय तक प्राण को रोका जाता है, ऐसी क्रिया जिसमें हो उसे प्राणायाम कहते हैं। ऐसी स्थिति में इन चार प्राणायाम में ही जो कि ऋषि प्रणीत है, प्राणायाम सिद्ध होते हैं। और भी-‘बाह्यस्य वायोराचमनं श्वासः’– बाह्य वायु का आचमन करना अर्थात् भीतर लेना ‘श्वास’ तथा ‘कौष्ठस्य वायोः निस्सारणं प्रश्वासः’-कोष्ठ के भीतर की वायु को बाहर निकालना ‘प्रश्वास’ है। इन दोनों की स्वाभाविक गति में विच्छेद-रुकावट डाल देना प्राणायाम कहाता है। श्वास-प्रश्वास नियमित रूप में बिना व्यवधान के चलते रहते हैं। प्राण अर्थात् श्वास-प्रश्वास की क्रिया की समाप्ति तो जीवन की समाप्ति है, अतः श्वास-प्रश्वास की गति को सर्वथा नहीं रोका जा सकता, उसमें अन्तर डाला जा सकता है। इस क्रिया से श्वास-प्रश्वास (प्राण) बन्द न होकर उसका आयाम-विस्तार होता है।

महर्षि दयानन्द सत्यार्थप्रकाश में योग के चार प्राणायामों की विधि व उसके लाभ लिखते हैं-‘‘जैसे अत्यन्त वेग से वमन होकर अन्न जल बाहर निकल जाता है, वैसे प्राण से को बल से बाहर फेंक के बाहर ही यथाशक्ति रोक देवे। जब बाहर निकालना चाहे, तब मूलेन्द्रिय को ऊपर खींच के वायु को बाहर फेंक दे। तब तक मूलेन्द्रिय को खींचे रक्खे, जब तक प्राण बाहर ही रहता है। इस प्रकार प्राण बाहर अधिक ठहर सकता है। जब घबराहट हो तब धीरे-धीरे वायु भीतर को ले के फिर वैसा ही करते जायें। जितना सामर्थ्य और इच्छा हो। और मन (ओ3म) इसका जप करता जाय। इस प्रकार करने से आत्मा और मन की पवित्रता और स्थिरता होती है। एक ‘बाह्य’ अर्थात् बाहर ही अधिक रोकना। दूसरा ‘आयन्तर’ अर्थात् भीतर जीतना प्राण रोका जाय, उतना रोके। तीसरा ‘स्तभवृत्ति’ अर्थात् एक ही बार जहां का तहां प्राण को यथाशक्ति रोक देना। चौथा ‘बाह्यायन्तराक्षेपी’ अर्थात् जब प्राण भीतर से बाहर निकलने लगे तब उसके विरुद्ध उसको न निकलने देने के लिए बाहर से भीतर ले और बाहर से भीतर आने लगे तब भीतर से बाहर की ओर प्राण को धक्का देकर रोकता जाय। ऐसे एक दूसरे के विरुद्ध क्रिया करें तो दोनों की गति रुक कर प्राण अपने वश में होने से मन और इन्द्रियां भी स्वाधीन होते हैं। बल, पुरुषार्थ बढ़कर बुद्धि तीव्र, सूक्ष्मरूप हो जाती है कि जो बहुत कठिन और सूक्ष्म विषय को भी शीघ्र ग्रहण करती है। इससे मनुष्य शरीर में वीर्य-वृद्धि को प्राप्त होकर स्थिर बल, पराक्रम, जितेन्द्रियता, सब शास्त्रों को थोड़े ही काल में समझकर उपस्थित कर लेगा।’’ (स.प्र.3)

यहाँ महर्षि ने मानसिक व शारीरिक जो लाभ लिखे हैं वे इन चार प्राणायामों से ही माने हैं। ऋषियों द्वारा बनाई व बताई गई प्रत्येक क्रिया व बातें मनुष्य के लिए कल्याणकारी ही सिद्ध होती हैं।

योग-सिद्धि के लिए तो योगदर्शन में वर्णित प्राणायाम का विधान ऋषि ने किया है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए स्वामी रामदेव जी द्वारा बताई गई विधि भी कर सकते हैं।

प्राणोपासना-2

प्राणोपासना-2

– तपेन्द्र कुमार

महर्षि दयानन्द जी महाराज ने स्पष्ट उल्लेख किया है कि मुनष्य प्राण द्वार से प्राण को परमात्मा में युक्त करके तथा योगाभयास द्वारा प्राण नाड़ियों में ध्यान करके परमानन्द मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं। महर्षि यह भी घोषणा करते हैं कि हृदय देश के अतिरिक्त दूसरा परमेश्वर के मिलने का कोई उत्तम स्थान व मार्ग नहीं है। पूर्व उल्लेख अनुसार प्राण अचेतन भौतिक तत्त्व है, शुद्ध ऊर्जा है तथा हृदय प्राण का केन्द्र है। यह हृदय स्थूल इन्द्रिय नहीं है। प्राणों में जीवात्मा प्रतिष्ठित है तथा परमात्मा हृदयाकाश में रहने वाले जीवात्मा के मध्य रहता है।

  1. श्वास-प्रश्वास एवं प्राण- जो वायु बाहर से भीतर को जाता है, उसको श्वास और जो भीतर से बाहर आता है, उसको प्रश्वास कहते हैं। परन्तु श्वास के द्वारा जो वायु शरीर में जाती है तथा जो वायु बाहर आती है, वह प्राण नहीं है। सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास प्राणाऽपान-निमेषजीवन………चात्मनो लिङ्गानि। (वैशेषिक) की व्याखया करते हुए महर्षि लिखते हैं, ‘‘(प्राण) जो भीतर से वायु को बाहर निकालना, (अपान) बाहर से वायु को भीतर लेना…….।’’ सत्यार्थ प्रकाश के नवम समुल्लास में प्राणमय कोश के समबन्ध में लिखा है, ‘‘दूसरा’’ ‘प्राणमय’ जिसमें ‘प्राण’ अर्थात् जो भीतर से बाहर आता, ‘अपान’ जो बाहर से भीतर आता……प्रच्छर्दनविधारणायां वा प्राणस्य। योग के भाषार्थ में भी भीतर के वायु को बहार निकालकर सुखपूर्वक रोकने का अभयास बार-बार करने से प्राण उपासक के वश में होने जाने का उल्लेख महर्षि ने किया है। स्वामी सत्यबोध सरस्वती जी के अनुसार ये (श्वास-प्रश्वास की) क्रियाएँ शरीर में प्राणों का कथित ऊपर व नीचे की गति कराने का एक मात्र साधन है। जब प्राणी श्वास लेता है तो वायु शरीर में जाती है तथा शरीर की प्राण नाड़ियों में प्राण की गति नीचे की ओर हो जाती है- यह अपानन क्रिया है। जब प्राणी प्रश्वास लेता है, अर्थात् दूषित वायु बाहर निकालता है तो शरीर की प्राण नाड़ियों में प्राण की गति उर्ध्व गति होती है-यह प्राणन क्रिया है। इस प्रकार श्वास-प्रश्वास प्राण क्रियाओं का साधन है। श्वास-प्रश्वास में शरीर के भीतर जाने वाली वायु तथा बहार आने वाली वायु प्राण नहीं है, वह आक्सीजन आदि गैसों का मिश्रण है। प्राण किन्हीं गैसों आदि का मिश्रण नहीं है बल्कि शुद्ध ऊर्जा है।
  2. प्राण के पाँच भेद-एषोऽणुरात्मा चेतसा विदितव्यो यस्मिन्प्राणः पञ्चधा संविवेश। मुण्डकोपनिषद् 3.1.9 के भाषार्थ में पण्डित भीमसेन शर्मा लिखते हैं, ‘‘(यस्मिन्) जिस शरीर में (प्राणः) प्राण (पञ्चधा) प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान नाम पाँच प्रकार के भेदों से (संविवेश) अच्छे प्रकार प्रविष्ट हो रहा है…..।’’

यथा सम्राद्रेवाधिकृ तन्विनियुङ्क्ते एतान्ग्रामानेतान्ग्रामानधितिष्ठस्वेष्मेवैष प्राण इतरान्प्राणान्पृथक्पृथगेव संनिधत्ते। (प्रश्न 3.4) का अर्थ करते हुए डॉ. सत्यव्रत सिद्धान्तालंकार लिखते हैं, ‘‘जैसे सम्राट् अपने अधीन कर्मचारियों को अपने-अपने काम में नियुक्त करता है, किसी को इस तथा किसी को उस ग्राम में अधिष्ठाता बनाता है, इसी प्रकार यह प्राण अन्यप्राणों को पृथक्-पृथक् अपने-अपने काम में नियुक्त करता है।’’ स्वामी सत्यबोध सरस्वती जी के अनुसार जीवों के शरीरों में प्राणतत्त्व तो एक ही है, कार्य भेद से उसके अनेक नाम हो जाते हैं। -प्र+अन=प्राण, उप+अन=अपान, सम+आ+अन =समान, उद+आ+अन= उदान, वि+आ+अन= व्यान। इस प्रकार प्र, अप आदि उपसर्गों को ‘अन’ के साथ जोड़ने से प्राण, अपान, समान,उदान और व्यान शबद सिद्ध हो जाते हैं।

वृहदारण्यक उपनिषद् 1.5.3………प्राणोऽपानोव्यान उदानः समानोऽन इत्येत्सर्व प्राण एव…… का अर्थ करते हुए महात्मा नारायण स्वामी जी महाराज लिखते हैं, ‘‘(प्राणः अपानः व्यानः उदानः) प्राण, अपान, व्यान, उदान, (समानः अनः इति) और समान ‘अन’- प्राण है। (एतत् सर्वं प्राणः एव) ये सब (पाँचों) प्राण ही हैं।’’ इस प्रकार स्पष्ट है कि प्राणतत्त्व एक ही है जो शरीर में अपने को पाँच भागों में विभक्त कर पाँच प्रकार के कार्यों को समपादित करता है। प्राण का शास्त्रीय नाम ‘अन’ ही है।

  1. प्राणों की स्थिति एवं कार्य- प्रश्नोपनिषद् त्रितीय प्रश्न में ‘‘पायूपस्थेऽपानं चक्षुः श्रोत्रेमुखनासिकायां प्राणः स्वयं प्रतिष्ठते मध्ये तु समानः। …….अत्रैतदेकशातं नाडीनां…… भवन्त्यासु व्यानश्चरति। अथैकयोर्ध्वम् उदानः पुण्येन पुण्यंलोकं नयति पापेन पापयुभायामेव मनुष्यलोकम्।।शांकरभाष्यार्थ में उक्त की व्याखया इस प्रकार है- यह प्राण अपने भेद अपान को पायूपस्थ में – पायु (गुदा) और उपस्थ (मूत्रेन्द्रिय) में मूत्र और पुरीष (मल) आदि को निकालते हुए स्थित यानी नियुक्त करता है तथा मुख नासिका इन दोनों से निकलता हुआ सम्राट् स्थानीय प्राणचक्षुः श्रोत्रे – चक्षु और श्रोत्र में स्थित रहता है। प्राण और अपान के स्थानों के मध्य नाभि देश में समान रहता है। ……..इस हृदय देश में एक शत यानी एक ऊपर सौ (एक सौ एक) प्रधान नाड़ियाँ हैं। उनमें से प्रत्येक प्रधान नाड़ी के उन सौ-सौ भेदों में से प्रत्येक से बहत्तर बहत्तर सहस्र अर्थात् दो ऊपर सत्तर सहस्र प्रतिशाखा नाड़ियाँ हैं। …..इन सब नाड़ियों में व्यान वायु संचार करता है तथा उन एक सौ एक नाड़ियों में से जो सुषुमणा नाम्नी एक उर्ध्वगामिनी नाड़ी है, उस एक के द्वारा ही ऊपर की ओर जाने वाला तथा चरण से मस्तक पर्यन्त सञ्चार करनेवाला उदान वायु (जीवात्मा को) पुण्य कर्म यानी शास्त्रोक्त कर्म से देवादि-स्थान रूप पुण्य लोक को प्राप्त करा देता है……।’’

महर्षि सत्यार्थ प्रकाश के नवम समुल्लास में प्राणमय कोश के समबन्ध में लिखते हैं, ‘‘दूसरा ‘प्राणमय’ जिसमें ‘प्राण’ अर्थात् जो भीतर से बाहर जाता, ‘अपान’ जो बाहर से भीतर आता, ‘समान’ जो नाभिस्थ होकर सर्वत्र शरीर में रस पहुँचाता, ‘उदान’ जिससे कण्ठस्थ अन्न-पान खैंचा जाता और बल पराक्रम होता, ‘व्यान’ जिससे सब शरीर में चेष्ठा आदि कर्म जीव करता है।’’ महात्मा नारायण स्वामी जी अनुसार अपान नामक प्राण मल और मूत्रेन्द्रिय विभाग में रहकर अपना काम करता है। मुख, नासिका, आँख और कान के क्षेत्र में प्राण स्वयं रहकर उनके कार्यों का साधन बनता है। शरीर के मध्य नाभि क्षेत्रादि में समान नामक प्राण रहता है और खाये हुए अन्न को पचाता है। हृदय की प्राण नाड़ियों में व्यान नामक प्राण परिभ्रमण करता है तथा हृदय की एक सौ एक नाड़ियों में से एक के द्वारा ऊपर जानेवाले प्राण का नाम उदान है, जो मृत्यु समय जीव को कर्मानुसार भिन्न-भिन्न स्थानों को पहुँचाया करता है।

स्वामी सत्यबोध सरस्वती जी के शबदों में, ‘‘मुखय प्राण हृदय (यह हृदय रक्त प्रेषण करने वाले अवयव से भिन्न है) में स्थित होकर मुख नासिका पर्यन्त प्राण नाड़ियों में ऊर्ध्व गति करता है। ‘अपान’ पायु तथा उपस्थ इन्द्रियों में स्थित होकर नासिका, मुख, कण्ठ, हृदय, नाभि से लेकर पायु इन्द्रिय तक प्राण नाड़ियों में नीचे की ओर संचरण करता है। ‘नाभि जो प्राण और अपान का सन्धि स्थल है, में स्थित होकर भुक्त आहार के रस आदि धातुओं को शरीर के समस्त अवयवों में पहुँचाने का काम करता है। ‘उदान’ पाद तल से लेकर शिर के शीर्ष पर्यन्त नाड़ियों में उर्ध्व गति का हेतु है। ‘व्यान’ समस्त शरीर में नाड़ियों में व्याप्त पवन को कहते हैं।’’ उपरोक्त उद्धरणों से शरीर में प्राणों की स्थिति तथा कार्य स्पष्ट है। उदान प्राण के द्वारा, उदान वृत्ति होने पर आत्मा/परमात्मा का साक्षात्कार संभव है, अतः उदान प्राण के बारे में पृथक् से विचार किया जावेगा।

  1. प्राण की उत्पत्ति –

स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीमिन्द्रियम्।

मनोऽन्नमन्नाद्वीर्यं तपोमन्त्राः कर्मलोका लोकेषु च नाम च।।

– प्रश्न.6.4

परमेश्वर ने प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी, इन्द्रियाँ, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्मलोक और नाम-इन सोलह कलाओं की रचना की।

एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वोन्द्रियाणि च।

खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीविश्वस्य धारिणी।।

– मुण्डक 2.13

द्वितीय मुण्डक प्रथम खण्ड में चेतन सत्ता रूप विराट पुरुष की व्याखया करते हुए कहा गया है कि

 

प्राण, मन, सब इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, ज्योति, जल, विश्व को धारण करने वाली पृथिवी उसी से उत्पन्न होती है।

 

ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रपगस्यति।

मध्ये वामनासीनं विश्वे देवा उपासते।।कठो. 2.2.3

जो प्राण को ऊपर की ओर ले जाता है और अपान को नीचे की ओर ढकेलता है, हृदय के मध्य में हरने वाले उस वामन-भजनीय की सब देव उपासना करते हैं।

यः प्राणे तिष्ठन्प्राणादन्तरो यं प्राणो न वेदयस्य प्राणः शरीरं।

यः प्राणमन्तरोय मयत्येष स आत्मान्तर्यायमृतः।

– वृहद्. 3.7.16

जो प्राण में रहता हुआ भी प्राण से अलग है, जिसको प्राण नहीं जानता, परन्तु प्राण ही जिसका शरीर है, जो प्राण के भीतर रहता हुआ उसका नियमन कर रहा है, वही सर्वान्तर्यामी परमात्मा है।

इस प्रकार प्राण चेतन सत्ता नहीं है, अपितु भौतिक तत्त्व है जो परमात्मा से उत्पन्न होता है तथा परमात्मा ही जिसका नियमन करता है। परमात्मा प्राण में रहता हुआ भी प्राण से अलग है तथा प्राण उसको नहीं जानता है। प्राण पाँच प्रकार से विभाजित हो जिन क्रियाओं को करता है, उनका कराने वाला परमात्मा है। बाह्य प्राण जीवों को सूर्य रश्मियों के माध्यम से नेत्रों द्वारा प्राप्त होता है तथा सर्वत्र व्याप्त है । इसको विद्वान् आधिदैविक प्राण के नाम से कहते हैं। दूसरा- जीवों के शरीर में स्थित परमात्मा वैश्वानराग्नि रूप से अन्नपानादि आहार को पचाता है, जैसा कि वृहदारण्यक उपनिषद् 5.11 में कहा गया है-

अयमग्निवैश्वानरो योऽयमन्तः पुरुषेयेनेदमन्नं पच्यते सदिदमद्यते।।

परम पिता परमात्मा ही अन्न, जल और घृतादि तैजस् आहार के अणुतम भाग से मन, प्राण और वाग् बलों को उत्पन्न करता है।

अन्नमयं हि सोमय मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति।

– छान्दोग्य.6.5.4

अन्न से मन की शक्ति के अतिरिक्त स्थूल बल की भी प्राप्ति होती है जो प्राणबल का अधिष्ठान है-

प्राणः स्थूणाऽन्नं दाम। वृहद.2.2.1

इस प्राण को आध्यात्मिक प्राण भी कहा जाता है, यह प्राण ऊपर उठकर हृदय में आधिदैविक प्राण से मिल जाता है-

अपां सौमय पीयमानानां योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदिशति स प्राणो भवति।

इस प्रकार प्राण परमात्मा से ही उत्पन्न होता है तथा परमात्मा से ही इसका नियमन होता है।

– 53/203, वी.टी.रोड, मानसरोवर, जयपुर, राज.

योग रहस्य

                       योग रहस्य

– स्वामी वेदानन्द सरस्वती

यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूत् विजानतः।

तत्र कः मोह कः शोकः एकत्वमनुपश्यतः।।

– यजु. 40.7।।

शदार्थः (यस्मिन्) जिस (विजानतः) ज्ञानी के ज्ञान में (सर्वाणि भूतानि)सभी प्राणी (आत्मा) परमात्मा (एवं) ही (अभूत्) हो गए, ऐसे (एकत्वमनुपश्यतः) एकत्व दर्शी व्यक्ति को (तत्र) वहाँ (कः मोह) किस का मोह और (कः शोकः) किस का शोक रहेगा, अर्थात् वहाँ न मोह रहता है, न ही शोक रहता है |

यह असमप्रज्ञात समाधि अवस्था का चित्रण खींचा गया है, जहाँ योग युक्त आत्मा को सर्वत्र एक ब्रह्म ही नजर आता है। असमप्रज्ञात समाधि में आत्मा रूप को भी विस्मृत कर सर्वत्र एक विभु आत्मा का ही दर्शन करता है। इस अवस्था को पाने के लिये जिज्ञासु जनों के लिये हम एक क्रम का दिग्दर्शन कराते हैं।

  1. योग परिभाषा- ‘योगश्चित्त वृत्ति निरोधः। योगः समाधि।’अर्थात् चित्तवृत्तियों का निरोध कहें या समाधि कहें, वह योग ही है।
  2. समाधि प्राप्ति का फल- (क) इससे साधक का मन पूर्णतया निर्मल और स्थितप्रज्ञता को प्राप्त होता है। (ख) सब कषायों का क्षय हो जाता है। (ग) व्यक्तित्व का पूर्ण विकास होता है। (घ) व्यक्ति को अपार आनंद की अनुभूति होती है। (ङ) मन और इन्द्रियों पर पूर्ण संयम हो जाता है। (च) सुन्दर स्वास्थ्य और कुशाग्र बुद्धि प्राप्त होती है। (छ) प्रसुप्त शक्तियाँ जाग्रत होती हैं। (ज) आत्म साक्षात्कार और प्रभु दर्शन होता है। (झ) मृत्यु विजय की उपलबधि होती है।

समाधि प्राप्ति के लिये प्रक्रियाः

  1. 1. वर्तमान में जीना सीखें। अतीत की स्मृतियों में और भविष्य की कल्पनाओं में समय न खोवें।
  2. 2. जो भी कर्म करें, पूरे मनोयोग से करें। सब काम धर्मानुसार ही करें।
  3. 3. सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने के लिये सदैव तैयार रहें। प्रमादी न बनें।
  4. 4. शुद्ध सात्विक आहार और मित भाषण करें।
  5. 5. सज्जनों से मैत्री और दुर्जनों से उपेक्षा का भाव रखें।
  6. 6. यम-नियमों का नियमित पालन करें। उससे मन स्वच्छ और स्वस्थ होगा।
  7. 7. योगासनों का नित्य अभयास करें। इससे शरीर स्वस्थ निरोग बनेगा। ध्यान के समय किसी स्थिर आसन पर बैठें जिस आसन पर दो घंटे तक स्थिरता पूर्वक बैठ सकें।
  8. प्राणायाम- स्थिर आसन पर बैठ कर प्राणायाम का अभयास करें। लमबे और गहरे श्वास-प्रश्वास का अभयास करें। प्राणायाम से मन को एकाग्रता मिलती है। शरीर को आरोग्यता प्राप्त होती है।
  9. प्रणव ध्वनि- लमबा गहराश्वास अन्दर लेकर ऊँचे स्वर से ओङ्कार का नाद करें। इस क्रिया को 9 से 11 बार दोहराएँ।

प्रणव ध्वनि के लाभ– 1. आस्तिक भावना की दृढ़ता होती है। 2. इष्ट की स्मृति होती है। 3. तनावों से मुक्ति मिलती है। 4. रोगों का शमन होता है। 5. आनन्द की अनुभूति होती है। 6. मन की एकाग्रता बढ़ती है। 7. बुद्धि की शुद्धि होती है। 8. प्राणशक्ति प्राप्त होती है। 9. स्मरण शक्ति की वृद्धि होती है। 10. नाद से उत्पन्न प्रकपनों से भीतरी अवयवों की मालिश होकर वे स्वास्थ्य लाभ करते हैं। 11. सूक्ष्म उत्तकों तक भी रक्त का संचार सहज गति से होने लगता है।

प्रणव ध्वनि करते समय अपने अन्दर-बाहर शुक्ल वर्ण के परिचक्र की भावना करें।

  1. 10. मन की एकाग्रता को पाने के उपाय-
  2. 1. मन की स्थिरता या एकाग्रता के लिये शरीर की स्थिरता अनिवार्य है। शरीर से जैसे वस्त्र को निकाल अलग कर देते हैं, वैसे ही मन से शरीर को पृथक्देखें। शरीर के थकान रहित, शान्त, स्वस्थ होने की भावना करें।
  3. 2. फिर शरीर के नाड़ीतन्त्र पर ध्यान लगायें। सुषुम्ना के निचले छोर से लेकर ऊर्ध्वगमन करते हुए सहस्रसारचक्र तक ध्यान करें। इससे शरीर की प्राण ऊर्जा ऊर्ध्वगमन करने लगती है, जिसे कुछ लोग कुण्डलिनी जागरण का नाम देते हैं।
  4. 3. प्राणायाम मन की एकाग्रता का एक प्रधान साधन है। विधिवत् रूप से नियमित प्राणायाम का अभयास करें। इस विषय पर विस्तार से जानने के लिये हमारी ‘संध्या से समाधि’ पुस्तक पढ़ें।
  5. 4. शरीर की कोशिकाओं में होने वाले सूक्ष्म प्रकमपनों की भी अनुभूति करें। पैर से लेकर सिर तक ध्यानपूर्वकदेखेंगे तो यह प्रत्यक्ष अनुभव होने लगता है। फिर ब्रह्मरन्ध्र में ध्यान लगाने पर सारे शरीर का स्पंदन एक साथ देखा जा सकता है। इस प्रकार के अभयास से शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है।
  6. 5. इससे अगले क्रम में शरीर के अन्दर अन्तःस्रावी और बहिस्रावी ग्रंथियों का भी अवलोकन करें। इन ग्रंथियों में रसायनों का निर्माण होता है। नाड़ीतन्त्र में उन रसायनों का प्रभाव देखा जाता है। इन रसायनों के बदलने से व्यक्ति का स्वभावभी बदल जाता है। हृदयदेश में तथा आज्ञाचक्र में ध्यान केन्द्रित करने से रसायनों के स्राव बदल जाते हैं।
  7. 6. रंगों का ध्यान-मानसिक विचारों के भी अपने रंग होते हैं। जैसे सूरज की रष्मियों के सात रंग इन्द्रधनुष में देखे जाते हैं, वैसे ही मानसिक भावों के कृष्ण, नील, जामुनी, लाल, गुलाबी, शुक्ल और हरा रंग भेद होते हैं। शुभ भावों के रंग पृथक् होते हैं। अशुभ भावों के रंग पृथक्होते हैं। अपने-अपने रंगों के साथ मन के भाव व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं। उज्जवल व्यक्तित्व के निर्माण के अभिलाषी व्यक्ति को शुभ विचारों के शुक्ल रंग का ध्यान करना चाहिए। ओङ्कार के जाप के साथ भी शुक्ल रंग का ध्यान करें।
  8. 7. क्लेशों से मुक्ति-मानसिक भावों के साथ जब राग-द्वेष पैदा हो जाते हैं तो वे ही क्लेशों को जन्म देते हैं। राग-द्वेष पैदा ही न हो इसके लिये आत्मा-परमात्मा का ध्यान करें। चेतन की भावना से राग-द्वेष पैदा नहीं होते।
  9. 8. श्रद्धा- व्यक्ति को अपनी श्रद्धा के अनुसार ही फल मिलता है। ईश्वर की भक्ति श्रद्धापूर्वक ही करें। वेद शास्त्रों, ऋषिमुनियों और गुरुजनों के प्रति की गयी श्रद्धा व्यक्ति को उसके लक्ष्य तक पहुँचा देती है।
  10. आत्म-संयम- आत्मा में परमेश्वर ने अद्भुत शक्तियाँ रखी हैं, किन्तु जनसामान्य उनसे अनभिज्ञ बना रहता है। शक्तियों का जागरण योगाङ्गों के अनुष्ठान से हो जाता है। शक्ति प्राप्त करके भी साधक व्यक्ति मन की धाराओं में नहीं बहता। आत्म-संयम के द्वारा शक्तियों का सदुपयोग ही करता है। शक्तियों का सदुपयोग लक्ष्य-प्राप्ति के लिये ही होना चाहिए।
  11. आत्म-दर्शन- आत्मा ही द्रष्टा, श्रोता, वक्ता, मन्ता और सभी भावों का साक्षी होता है। जब आत्मा स्वयं को भावों से अलग देखने लगता है तो वह उस अभयास से अपने आत्म-स्वरूप में अवस्थित हो जाता है। ‘द्रष्टा शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः।’आत्मा अपने स्वरूप में शुद्ध होते हुए भी बुद्धि के ज्ञान का साक्षी मात्र होता है।
  12. असमप्रज्ञात समाधि- योगाङ्गों के अनुष्ठान से जब बुद्धि में सत्त्व गुण की प्रबलता हो जाती है तो वह राग-द्वेष से ऊपर उठ कर आनन्द की अनुभूति करने लगती है। उसमें स्थैर्य उत्पन्न होता है, जो आत्मा की कैवल्य प्राप्ति में सहायक बनता है। समप्रज्ञात समाधि की अवस्था में आत्मा अपने को मन, बुद्धि, आदि से पृथक् देखने लगता है, किन्तु असमप्रज्ञात् समाधि में अपने स्वरूप को पृथक् नहीं देखता, उसे सर्वत्र एक विभु परमपिता परमेश्वर के ही दर्शन होते हैं। उस अवस्था में द्रष्टा और दृश्य का भेद भी समाप्त हो जाता है। इसी अवस्था का उल्लेख यजु. 40.7 मन्त्र कर रहा है। उस अवस्था में द्वैत कुछ देखने या सुनने के लिये शेष नहीं रह जाता। जिस स्थिति में एकमात्र ब्रह्म रह जाये वहाँ भय, शोक, मोह कैसा?
  13. मुक्तावस्था- जब मन में कोई कामना शेष नहीं रहती, तब सभी राग-द्वेष, मोह, आदि क्लेश समाप्त हो जाते हैं। अन्तःकरण में ज्ञान का प्रकाश हो जाता है। सभी विषयों से पूर्णतया वैराग्य हो जाता है, उस अवस्था में योगी पुरुष जीवन मुक्त होकर जीने लगता है। प्रारबध अभी शेष हैं, उसके अनुसार जीवन की गाड़ी चल रही होती है, किन्तु अपने जीवन से दूसरों को कोई कष्ट न हो तथा दूसरे भी अपनी साधना में बाधक न बन सकें, इसलिये योगी पुरुष घर परिवार से दूर एकान्त स्थान में जाकर रहने लगता है। प्रारबध समाप्ति पर वह आत्मा मुक्त अवस्था को प्राप्त होकर मुक्ति का आनन्द लेती है। यही योग मार्ग की अंतिम मंजिल है। – उत्तरकाशी

जिज्ञासा समाधान: आचार्य सोमदेव

जिज्ञासा 1- योग के आठ अंगों में जिनका ‘साधन पाद’ में उल्लेख है, छठा अंग ‘धारणा’ है। उसमें मन को शरीर के किसी एक अंग- जैसे नासिका, मस्तक आदि पर स्थिर करने की बात कही है। इसी स्थान पर आगे ध्यान, समाधि लगती है, परन्तु ‘समाधि पाद’ में सप्रज्ञात समाधि के अन्तर्गत जब वितर्क रूपी स्थिति, जिसमें पृथिवी आदि स्थूल भूतों का साक्षात्कार होता है, उसमें मन को नासिका, जिह्वा आदि अलग-अलग स्थानों पर लगाने का उल्लेख है। मेरी शंका यही है कि धारणा के समय जब एक स्थान चुन लिया है तो फिर वितर्क समाधि में अलग-अलग स्थान क्यों?

आशा है, मैं अपनी जिज्ञासा को ठीक प्रकार प्रकट कर पाया हूँ। आपसे निवेदन है कि इसका समाधान देने की कृपा करें।

– ज्ञानप्रकाश कुकरेजा, 786/8, अर्बन स्टेट, करनाल, हरियाणा-132001

समाधानयोग के आठ अंगों में धारणा छठा अंग है। धारणा की परिभाषा करते हुए महर्षि पतञ्जलि ने लिखा- ‘‘देशबन्धश्चित्तस्य धारणा।’’ इस सूत्र की व्याया करते हुए महर्षि दयानन्द ने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के उपासना प्रकरण में लिखा- ‘‘जब उपासना योग के पूर्वोक्त पाँचों अंग सिद्ध हो जाते हैं, तब उसका छठा अंग धारणा भी यथावत् प्राप्त होती है। धारणा उसको कहते हैं कि मन को चञ्चलता से छुड़ाके नाभि, हृदय, मस्तक, नासिका और जीभ के अग्रभाग आदि देशों में स्थिर करके ओंकार का जप और उसका अर्थ जो परमेश्वर है, उसका विचार करना।’’ धारणा के लिए मुय बात अपने मन को एक स्थान पर टिका लेना, स्थिर कर लेना है। टिके हुए स्थान पर ही ध्यान करना और वहीं पर समाधि का लगना होता है। इसके लिए महर्षि पतञ्जलि ने लिखा- ‘‘त्रयमेकत्र संयमः’’ अर्थात् धारणा, ध्यान, समाधि तीनों का एक विषय हो जाना संयम कहलाता है। इस सूत्र पर महर्षि दयानन्द ने लिखा- ‘‘जिस देश में धारणा की जाये, उसी में ध्यान और उसी में समाधि, अर्थात् ध्यान करने योग्य परमेश्वर में मग्न हो जाने को संयम कहते हैं, जो एक ही काल में तीनों का मेल होना, अर्थात् धारणा से संयुक्त ध्यान और ध्यान से संयुक्त समाधि होती है। उसमें बहुत सूक्ष्म काल का भेद रहता है, परन्तु जब समाधि होती है, तब आनन्द के बीच में तीनों का फल एक ही हो जाता है।’’ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका

धारणा+ध्यान+समाधि= संयम।

अब आपकी बात पर आते हैं, आपने जो कहा कि ‘‘……सप्रज्ञात समाधि के अन्तर्गत जब वितर्क रूपी स्थिति जिसमें पृथिवी आदि स्थूल भूतों का साक्षात्कार होता है, उसमें मन को नासिका, जिह्वा आदि अलग-अलग स्थानों पर लगाने का उल्लेख है।’’ आपकी यह बात ‘‘वितर्कविचारानन्दास्मिता…..।’’ योगदर्शन 1.17 इस सूत्र में नहीं कही गई, हाँ ‘‘विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धनी।’’ योगदर्शन 1.35 इसमें कही है। इसमें वितर्क समाधि की बात नहीं, यहाँ तो मन की स्थिरता का कारण बताया है। यहाँ कहा है- नासिकाग्र आदि स्थानों पर चित्त को स्थिर करने से उत्पन्न दिव्यगन्धादि विषयों वाली प्रवृत्ति मन की स्थिति का कारण होती है।

इस सूत्र से पहले प्राणायाम का वर्णन किया हुआ है। ऋषि ने प्राणायाम को चित्त की स्थिरता का प्रमुख उपाय कहा है, अर्थात् प्राणायाम मन स्थिर करने का प्रमुख उपाय है। अब इसके आगे मन को स्थिर करने के अन्य गौण उपाय कहे हैं, उनमें यह उपाय भी है। जब योगायासी जिह्वाग्र, नासिकाग्र आदि स्थानों पर मन को स्थिर करता है, तब दिव्यरसादि की अनुभूति होती है। यह अनुभूति रूप व्यापार सामान्य न होकर उत्कृष्ट होता है। यह प्रवृत्ति मन को एकाग्र करने में सहायक होती है और साधक का अतीन्द्रिय पदार्थों को जानने में विश्वास पैदा होता है और श्रद्धा पैदा होती है। तात्पर्य यह हुआ कि स्थान विशेष पर धारणा कर मन को स्थिर (एकाग्र) करना है।

वितर्क आदि समाधि सालब हैं। वहाँ स्थूल का आलबन करते हैं, अर्थात् नासिकाग्रादि का आलबन करना वितर्क कहलाता है। वितर्क समाधि एक-एक स्थान का आलबन करने से होती है। आपने जो पूछा- ‘धारणा के समय जब एक स्थान चुन लिया है तो फिर वितर्क समाधि में अलग-अलग स्थान क्यों?’ आप इस वितर्क समाधि के स्वरूप को समझेंगे तो आपको यह शंका नहीं होगी। वितर्क समाधि सालब समाधि है और वे आलबन स्थूल हैं, अलग-अलग हैं। अलग-अलग होने पर अलग-अलग स्थान धारणा के लिए चुने हैं।

धारणा के लिए भी ऋषि ने केवल एक ही स्थान निश्चित नहीं किया, वहाँ भी अनेक स्थान कहें हैं। अनेक में से कोई एक तो है, पर केवल एक नहीं है। जब दिव्य गन्ध की अनुभूति करनी है तो धारणा स्थल एक नासिकाग्र ही होता है, वहाँ स्थान बदले नहीं जाते। ऐसे ही अन्य विषयों में भी है। इसलिए जो अलग-अलग स्थान आप देख रहे हैं, वे अनेक विषयों को लेकर देख रहे हैं, जब एक ही विषय को लेकर देखेंगे तो अलग-अलग धारणा स्थल न देखकर एक ही स्थान देख पायेंगे।

क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः-स्वामी विष्वङ्

प्रस्तुत सूत्र में ‘कर्माशयः’ शद आया है, इसका अभिप्राय है – कर्मों का संस्कार, जिन्हें धर्माधर्म अथवा पुण्यापुण्य शदों से कथन किया जाता है और इसे अदृष्ट शद से भी बोला जाता है। कर्माशय शद में ‘कर्म’ का अभिप्राय हम जानते ही हैं और ‘आशय’ का अभिप्राय संस्कार है। कर्माशय अर्थात् कर्मसंस्कार। इसका तात्पर्य यह है कि मनुष्य कर्म करता है, वह कर्म क्रिया होने से कर्म करने के उपरान्त समाप्त होता है। यह सर्वविदित है कि क्रिया,क्रिया काल में ही विद्यमान रहती है और क्रिया के बाद समाप्त होती है, इसलिए क्रिया के काल में क्रिया की छाप मन में पड़ती है, उस छाप को संस्कार कहते हैं। वह संस्कार धर्म-पुण्य अथवा अधर्म-अपुण्य के रूप में दो प्रकार का होता है। इसी धर्माधर्म-पुण्यापुण्य रूपी संस्कार को कर्माशय शद से सूत्रकार ने स्पष्ट किया है। इस कर्माशय के आधार पर ही परमेश्वर मनुष्य को सुख-दुःा रूपी फल प्रदान करता है। सूत्र में ‘क्लेशमूलः’ पद आया है, इसका अभिप्राय है- अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश मूल= कारण वाले कर्माशय, अर्थात् अविद्या आदि पाँचों क्लेशों के कारण ही मनुष्य कर्म करता है, इसलिए कर्माशय क्लेशमूल= क्लेशकारण वाले हैं। सूत्र में तीसरा पद आया है- ‘दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः’। इस शद को अलग-अलग करने पर ‘दृष्टजन्मवेदनीय’ और ‘अदृष्टजन्मवेदनीय’ दो शद बनते हैं। दृष्ट का अभिप्राय वर्तमान काल से है और अदृष्ट का अभिप्राय भविष्यत काल से है। जन्म शद से हम परिचित हैं। वेदनीय शद का अभिप्राय है- अनुभवनीय, अर्थात् अनुभव करने योग्य। इस प्रकार दृष्टजन्मवेदनीय का अर्थ हुआ वर्तमान जन्म में अनुभव करने योग्य सुख-दुःख रूपी फल और अदृष्टजन्मवेदनीय का अर्थ हुआ भविष्यतकाल में अनुभव करने योग्य सुख-दुःख रूपी फल।

प्रस्तुत सूत्र का अर्थ इस प्रकार समझना चाहिए कि क्लेशमूल- क्लेश आधार- क्लेशकारण वाले कर्माशय के फल वर्तमान जन्म में और आगे भविष्य में मिलने वाले जन्मों में अनुाव किये जाते हैं। मनुष्य प्रवाह (परपर) से, अनादि काल से धर्मयुक्त और अधर्मयुक्त कर्मों को करता हुआ आ रहा है और उनके फलों को काल के अनुसार, अर्थात् इस वर्तमान जन्म में और आगे आने वाले भविष्य के जन्मों में भोगता हुआ आ रहा है और भोगेगा। इस प्रकार फल देने वाले कर्मों को करने की योग्यता और सामर्थ्य केवल मनुष्य में ही संभव है, अर्थात् मनुष्य से इतर योनियों में सभव नहीं है। वेदादि शास्त्रों में विधि या निषेध केवल मनुष्य जाति के लिए ही किये हैं। परमात्मा ने मनुष्य को ऐसी बुद्धि दी है, जिसका प्रयोग करके वह प्रवाह (परपरा) से चले आ रहे क्लेशों और कर्मों को जानकर और अपनी बुद्धि में बिठाकर इस संसार में आने के प्रयोजन को पूर्ण करना चाहता है।

सूत्र की व्याया करते हुए महर्षि वेदव्यास लिखते हैं-

तत्र पुण्यापुण्यकर्माशयः कामलोभमोहक्रोधप्रभवः।

अर्थात् पुण्य-धर्मयुक्त संस्कार और अपुण्य-अधर्मयुक्त कर्म संस्कार काम, लोभ, मोह और क्रोध से उत्पन्न होते हैं, इसका तात्पर्य इस प्रकार समझना चाहिए कि अविद्या आदि पाँचों क्लेशों के कारण मनुष्य में काम कीाावना, लोा की भावना, मोह की भावना और क्रोध कीाावना उत्पन्न होती है। इन्हीं काम आदि की भावनाओं से मनुष्य पुण्य कर्म और पाप कर्म करने में तत्पर होता रहता है। मनुष्य क्लेशों से युक्त होकर जहाँ अधर्म करता है, वहाँ धर्म भी करता है। देश, काल और परिस्थिति के अनुसार मनुष्य जहाँ काम भावना से बड़े-बड़े सोम याग आदि करके स्वर्ग की कामना करता है, वहाँ काम भावना से अधर्म करने में तनिक विचार न करते हुए ऐसे-ऐसे निकृष्ट कर्म भी करता है, जिनकी सपूर्ण समाज निन्दा करता है। मनुष्य लोभ की भावना से जहाँ विद्या, धन, नौकरी आदि को पाने के लिए धर्मयुक्त कर्मों को करता है, वहाँ उन्हीं को पाने के लिए अधर्म युक्त कार्यों को भी कर लेता है। मनुष्य मोह की भावना से जहाँ दान, सेवा आदि पुण्य कर्म कर लेता है, वहाँ घोर हिंसा (मनुष्य बलि, पशु बलि आदि) करने में तनिक विचार भी नहीं करता है। क्र ोध की भावना से बड़े-बड़े अनर्थ करता हुआ देखा जाता है। जहाँ मनुष्य क्रोध से अनर्थ करता है, वहाँ क्रोध से पुण्य भी क रता है, जैसे अन्य लेखकों से द्वेष करता हुआ स्वयं उत्तम लेख या पुस्तक लिखना। इसी प्रकार दानी से, प्रवक्ता से, बलवान से द्वेष करते हुए स्वयं भी दान देना, प्रवचन करना, बल का संपादन करना रूपी पुण्य कर्म करते हुए देखे जाते हैं। इस प्रकार मनुष्य काम, लोभ, मोह और क्रोध पूर्वक उत्तम कर्म और निकृष्ट कर्म करते रहते हैं।

‘स दृष्टजन्मवेदनीयश्चादृष्टजन्मवेदनीयश्च।’

अर्थात् वह पुण्य और अपुण्य कर्माशय दृष्टजन्म= वर्तमान जन्म में फल देने वाला और अदृष्टजन्म= भविष्य में- आने वाले जन्मों में फल देने वाला होता है। चाहे पुण्य कर्माशय हो या अपुण्य कर्माशय हो, दोनों में से कोई भी कर्माशय वर्तमान जन्म में फल दे सकता है। यदि वर्तमान जन्म में फल नहीं दे रहा हो, तो आगे आने वाले किसी भी जन्म में फल दे सकता है। कौन-सा पुण्य-अपुण्य कर्माशय वर्तमान जन्म में फल देने वाला है और कौन-सा पुण्य अपुण्य कर्माशय अगले जन्मों में फल देने वाला है, इसका मापदण्ड क्या है? कैसे पता लग सकता है? इसका समाधान करते हुए महर्षि वेदव्यास कहते हैं-

तत्र तीव्रसंवेगेन मन्त्रतपः समाधिभिर्निवर्तितः ईश्वरदेवतामहर्षिमहानुभावानामाराधनाद्वा यः परिनिष्पन्नः स सद्यः परिपच्यते पुण्यकर्माशय इति।

अर्थात् उन पुण्य-अपुण्य कर्माशयों में से जो पुण्य कर्माशय है, वह शीघ्र फल देने वाला कैसे बनता है? इसका उपाय बताते हुए महर्षि वेदव्यास कहते हैं-‘तीव्र संवेग’ से योगायासी पुरुषार्थ करता है, अर्थात् वह पूर्ण रूप से अहिंसा, सत्य आदि का पालन निष्ठा-श्रद्धा आदि से करता जाता है। किसी प्रकार की त्रुटि न रखते हुए सावधानीपूर्वक उत्तम पवित्र कर्म करता जाता है। ‘मन्त्र’ का अभिप्राय है- वेद-अध्ययन के द्वारा वेदों में स्थित रहस्य का बोध होता है, जिससे विभिन्न प्रकार के जनोपयोगी यन्त्रों का निर्माण करके जन कल्याण के उत्तम कर्म किये जाते हैं और गायत्री आदि मन्त्रों के जप से परमेश्वर के निकट जाया जाता है। ‘तप’ से योगसाधक अपने शरीर वाणी और मन को तपाता है, अर्थात् मन, वाणी और शरीर को संयम में रखता हुआ सभी द्वन्द्वों (भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी आदि) को सहन करता हुआ उत्तम कर्म करता जाता है।

वह ‘समाधि’ लगा-लगा कर अपने कुसंस्कारों को कमजोर और नष्ट करता हुआ निष्काम कर्मों को करता जाता है। ईश्वर की उपासना, देवता= विद्वानों की सेवा और ऋषि-महर्षियों के ग्रन्थों के स्वाध्याय से उनकी आज्ञा का पालन करता हुआ योग साधक अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है। इस प्रकार तीव्र संवेग के द्वारा मन्त्र, तप, समाधि आदि को व्यवहार में उतारने से ईश्वरोपासना, विद्वानों की सेवा और ऋषि-महर्षियों के ग्रन्थों के स्वाध्याय से उत्पन्न पुण्य कर्माशय शीघ्र फल प्रदान करता है।

इसी प्रकार अपुण्य कर्माशय के सबन्ध में ऋषि कहते हैं-

तथा तीव्रक्लेशेन भीतव्याधितकृपणेषु विश्वासोपगतेषु वा महानुभावेषु वा तपस्विषु कृतः पुनः पुनरपकारः स चापि पापकर्माशयः सद्य एव परिपच्यते।

अर्थात् योगायास न करने वाला लौकिक व्यक्ति तीव्रता से= अत्यधिक पाप में (डूबा हुआ) संलग्न होकर अविद्या में आकण्ठ डूब कर पाप कर्म करने में लगा रहता है। वह किनके प्रति पाप कार्य करता है? इसका समाधान करते हुए ऋषि लिखते हैं- जो ‘भीत’ -डरे हुए हैं, उन डरे हुए लोगों को वह अन्याय, अत्याचार आदि के माध्यम से दुःख पहुँचाता है। एक बार नहीं, बार-बार दुःा देने का कर्म करता रहता है। ‘व्याधित’ जो रोगों से ग्रस्त हैं, दुःाी हैं, उन रोग ग्रस्त लोगों को और दुःा पहुँचाता रहता है। ‘कृपण’ जो दीन-हीन हैं अर्थात् बुद्धि से, धन से, रोटी, कपड़ा और मकान से और अन्य-अन्य साधनों से रहित हैं, ऐसे-ऐसे दीन-हीन लोगों को और अधिक दुःख पहुँचाता रहता है। जो लोग विश्वास करके चलते हैं, ऐसे विश्वास करने वालों को अन्याय, अत्याचार करके दुःख पहुँचाता रहता है। जो लोग महान हैं, तपस्वी हैं, श्रेष्ठ हैं, परोपकारी हैं, ऐसे-ऐसे उत्तम पवित्र लोगों का जो बार-बार अपकार करता है, उसे भी शीघ्र फल प्राप्त होता है।

महर्षि वेदव्यास शीघ्र फल देने वाले पाप और पुण्य कर्माशयों का  वर्णन करके उन दोनों के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं-

यथा नन्दीश्वरः कुमारो मनुष्यपरिणामं हित्वा देवत्वेन परिणतः।

अर्थात् जिस प्रकार से नन्दीश्वर कुमार तीव्रता से मन्त्र, तप समाधि आदि के द्वारा उत्तम कर्म करके  मनुष्यत्व से देवत्व को प्राप्त हुआ है, ठीक इसी प्रकार

‘तथा नहुषोऽपि देवानामिन्द्रः स्वकं परिणामं हित्वा तिर्यक्त्वेन पिरणत इति।’

अर्थात् नहुष नामक राजा, जो देवों का भी देव राजा था, उसने अपने पद-प्रतिष्ठा के अहंकार(अविद्या) से युक्त होकर प्रजा पर अन्याय, अत्याचार किया था, जिसके कारण उसे अपने राज-पाट से हाथ धोना पड़ा, अर्थात् राजगद्दी से च्युत होकर नीचत्व को प्राप्त होना पड़ा । ये दोनों उदाहरण वर्तमान जन्म में फल देने से सबन्धित हैं। इसका अभिप्राय यह है कि जिन कर्मों का फल वर्तमान जन्म में मिलता है, वे दो प्रकार के होते हैं। वह फल आयु और भोग के रूप में प्राप्त होता है, इसलिए यहाँ पर नन्दीश्वर कुमार और नहुष वर्तमान जन्म में, अर्थात् उसी शरीर में रहते हुए, मनुष्य न होकर देव कहलाये। यहाँ पर कोई यह न समझे कि वे दोनों वर्तमान शरीरों को छोड़ कर नये शरीरों को प्राप्त हुए। ऐसा सभव नहीं होगा। यदि सभव होता तो महर्षि वेदव्यास यह नहीं लिखते कि-

‘दृष्टजन्मवेदनीयस्त्वेकविपाकारभी भोगहेतुत्वात् द्विविपाकारभी वा आयुर्भोगहेतुत्वान्नन्दीश्वरवन्नहुषवद्वेति।’

(योग. 2.13 व्यासभाष्य)

अर्थात् वर्तमान जन्म में फल देने वाला कर्माशय या तो एक फल को देता है, केवल भोग का कारण होने से अथवा दो फल को देने वाला होता है, केवल भोग और आयु का कारण होने से। जैसे नन्दीश्वर कुमार और राजा नहुष को प्राप्त हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि वर्तमान जन्म में भोग या आयु के रूप में फल तो मिलता है, परन्तु जाति- मनुष्य, पशु, पक्षी आदि के रूप में फल नहीं मिलता है। जाति रूप फल तो नये जन्म के साथ मिलता है, ऐसा समझना चाहिए।

महर्षि वेदव्यास एक और विशेष बात को लेकर स्पष्टता करते हैं कि जो मनुष्य अत्यन्त निकृष्ट कर्म मात्रा की दृष्टि से व गुणवत्ता की दृष्टि से बहुत अधिक करता है, उसके लिए वर्तमान जन्म में फल देने वाला कर्माशय नहीं होता है, बल्कि आगे के जन्मों में फल देने वाला अदृष्टजन्मवेदनीय कर्माशय होता है- तत्र नारकाणां नास्ति दृष्टजन्मवेदनीयः कर्माशयः।

और ऋषि यह भी कहते हैं कि जो योगायासी अपने क्लेशों (अविद्या अस्मिता आदि) को दग्धबीज (जले हुए-भुने हुए चने के समान) कर लेता है, ऐसे योगायासी का अदृष्टजन्मवेदनीय (अगले जन्म का) कर्माशय  नहीं होता, अर्थात् उसका पुनर्जन्म नहीं होता, बल्कि वह मुक्ति में जाता है-

क्षीणक्लेशानामपि नास्त्यदृष्टजन्मवेदनीयः कर्माशय इति।

– ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर

 

ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः – १० – स्वामी विष्वङ्

महर्षि पतञ्जलि ने पाँचवें सूत्र से लेकर नौवें सूत्र तक पाँचों क्लेशों की परिभाषाएँ दीं और चौथे सूत्र (अविद्या क्षेत्रमु ारेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्) में क्लेशों की चार अवस्थाएँ बतायीं। उन्हीं चार (सोये हुए, कमजोर हुए, दबे हुए और वर्तमान में रहने वाले की) अवस्थाओं को दो विभागों में बाँटकर महर्षि ने प्रस्तुत सूत्र की चर्चा की है। वे दो भाग स्थूल रूप में और सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहते हैं। क्लेशों के स्थूल रूप को हटाने-समाप्त करने के लिए क्रियायोग है। तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान के माध्यम से क्लेशों के स्थूल-उग्ररूप को नष्ट किया जाता है। क्लेशों के सूक्ष्मरूपों-कमजोर रूपों को नष्ट करने के लिए जिस प्रसंख्यान रूपी त वज्ञान को अपनाते हुए उन्हें दग्धबीज के समान बनाकर कारण प्रकृति में पहुँचाया जाता है, उसे बताने के लिए प्रस्तुत सूत्र प्रवृ ा हुआ है। सूत्र का अर्थ इस प्रकार है- वे अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश जब क्रियायोग के माध्यम से सूक्ष्म हो जाते हैं, तब उन क्लेशों को जले हुए-भुने हुए बीजों के समान बनाकर कारण प्रकृति-स व, रज और तम में विलीन (प्रलय) कर देना चाहिए, जिससे आत्मा और दृश्य का संयोग न हो। उनके संयोग का न होना ही मोक्ष कहलाता है।
महर्षि वेदव्यास प्रस्तुत सूत्र की व्याख्या करते हुए कहते हैं-
ते पञ्च क्लेशा दग्धबीजकल्पा योगिनश्चरिताधिकारे चेतसि प्रलीने सह तेनैवास्तं गच्छन्ति।
अर्थात् योगाभ्यासी तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान रूपी क्रियायोग को अत्यन्त पुरुषार्थ के साथ अपने जीवन में लाता हुआ, उन पाँचों क्लेशों को तनू-कमजोर बना देता है। योग के यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा और ध्यान को अपनाता हुआ लम्बे काल तक, निरन्तर-बिना व्यवधान के ब्रह्मचर्य पूर्वक, विद्यापूर्वक और श्रद्धापूर्वक जीवन में उतारता हुआ घोर पुरुषार्थ से कमजोर हुए क्लेशों को दग्धबीजभाव की ओर ले चलता है। अभिप्राय यह है कि उन क्लेशों को जले हुए-भुने हुए चने के बीजों के समान बना देता है। जिस प्रकार भुने हुए चने अंकुरित होने में असमर्थ होते हैं, उसी प्रकार क्लेश भी पुनः उद्बुद्ध नहीं होते हैं, अर्थात् व्यवहार में नहीं आते हैं। जब पाँचों क्लेश दग्धबीज वाले बन जाते हैं, तब मन समाप्त अधिकार वाला बन जाता है। मन के दो प्रयोजन हैं- एक संसार का भोग कराना और दूसरा अपवर्ग-मोक्ष दिलाना। इन दोनों प्रयोजनों को पूरा करना ही मन का अधिकार-कर् ाव्य है। जैसे ही इन कर् ाव्यों को मन पूरा करता है, तो मन समाप्त कर् ाव्यों वाला बनता है, इस समाप्त कर् ाव्य वाले मन को ही चरिताधिकार मन कहते हैं।
जिस योगी के मन के कर् ाव्य पूर्ण हो चुके हों, ऐसे मन का इस संसार में रहने का कोई औचित्य नहीं रह जाता, इसलिए क्लेशों को दग्धबीज अवस्थाओं में पहुँचाने वाले योगी का मन योगी से अलग होता है। यहाँ मन मुख्य होने से मन को लेकर चर्चा की जा रही है। यद्यपि मन के साथ-साथ सभी इन्द्रियाँ, सभी तन्मात्राएँ, अहंकार, मह ा व रूपी बुद्धि सहित अठारह त वों का समुदाय रूपी सूक्ष्म शरीर अपने कारण रूपी स व, रज, तम में विलीन हो जाता है। इन अठारह त वों में मन की भूमिका मह वपूर्ण होने से ऋषि ने मन को लेकर कथन किया है कि चरिताधिकार वाला मन अपने कारण रूपी प्रकृति (स व, रज, तम) में विलीन होता है। जब मन अपने कारण में विलीन होता है, तब दग्धबीज वाले क्लेशों की क्या स्थिति होती है? इसका समाधान ऋषि करते हैं- ‘तेनैव सह अस्तं गच्छन्ति।’ अर्थात् उसी मन के साथ-साथ दग्धबीज वाले पाँचों क्लेश भी स व, रज, तम में मिल जाते हैं। यहाँ पर महर्षि वेदव्यास ने दग्धबीज अवस्था वाले क्लेशों (अविद्या) को स व, रज, तम में मिलने की बात की है, अर्थात् अविद्या कारण रूप में प्रकृति में रहती है।
अविद्या कार्य रूप में रहती है, तो मन में रहती है, इस बात को महर्षि वेदव्यास ने स्पष्ट श दों में अनेकत्र कहा है। जैसे ‘ते च मनसि वर्तमानाः पुरुषे व्यपदिश्यन्ते, स हि तत्फलस्य भोक्तेति।’ (योगदर्शन १.२४) ‘तावेतौ भोगापवगौ बुद्धिकृतौ बुद्धावेव वर्तमानौ कथं पुरुषे व्यपदिश्येते….अभिनिवेशा बुद्धौ वर् ामाना पुरुषेऽध्यारोपित सद्भावाः स हि तत्फलस्य भोक्तेति।’ (योगदर्शन २.१८) ‘प्रत्ययं बौद्धमनुपश्यति तमनुपश्यन्नतदात्माऽपि तदात्मक इव प्रत्यवभासते।’ (योगदर्शन २.२०) इन सभी प्रमाणों का एक ही तात्पर्य है कि उत्पन्न होने वाली अविद्या और विद्या- दोनों ही मन में रहती हैं। कोई यह न समझे कि ज्ञान जड़ में कैसे रह सकता है? ज्ञान के जड़ में रहने से कोई भी आप िा नहीं आती है। हाँ, यदि वह जड़ उस ज्ञान को अनुभव करने लगे, तो आप िा आ सकती है, परन्तु जड़ वस्तु अनुभव नहीं कर सकती। क्यों? चेतन न होने से। इसलिए उत्पन्न मात्र पदार्थ चाहे वे द्रव्य के रूप में हों या गुण के रूप में हों, जड़ में ही रहते हैं। आत्मा तो अप्रतिसंक्रमा- न घुलने-मिलने वाला है, इसलिए उत्पन्न मात्र पदार्थ व गुण घुलने-मिलने वाले जड़ पदार्थों में ही रह सकते हैं। विद्या और अविद्या के निवास स्थान जड़ पदार्थ हैं, इसी कारण महर्षि वेदव्यास कहते हैं- कार्यकाल में ये दोनों मन में रहते हैं और कार्यकाल समाप्त होने पर अपने कारण प्रकृति में मिल जाते हैं।
यहाँ पर विद्या और अविद्या का निवास स्थान जड़ को कहने से यह नहीं समझना चाहिए कि विद्या के निवास स्थान चेतन नहीं हो सकते। हाँ, विद्या के निवास स्थान चेतन भी होते हैं, परन्तु वहाँ विद्या उत्पन्न होने वाली नहीं है। परमात्मा में विद्या सदा रहती है और नित्य होने से वह कभी न्यून या अधिक नहीं होती है। ईश्वर का ज्ञान (विद्या) नित्य है, इसलिए घटता और बढ़ता नहीं है। जीवात्मा का अपना स्वाभाविक ज्ञान (विद्या) है और वह भी घटता और बढ़ता नहीं है। हाँ, जो उत्पन्न होने वाली विद्या और अविद्या हैं, वे घटती और बढ़ती हैं, परन्तु यह घटना और बढ़ना मन में होता रहता है, आत्मा में नहीं। इसलिए इस बात को अच्छी प्रकार समझ लेना चाहिए कि उत्पन्न मात्र पदार्थ और गुणों का आश्रय स्थान जड़ पदार्थ ही होते हैं। इस कारण विद्या और अविद्या और उसके संस्कार जड़ मन में रहते हैं, इस बात को स्वीकार करने में कोई आप िा नहीं होनी चाहिए। यहाँ पर केवल आश्रय के रूप में बताया जा रहा है, इस निवास के कारण जड़, चेतन नहीं बन जाता। अनुभव करने वाला ही चेतन होता है, यही सत्य है।
महर्षि वेदव्यास ने दग्धबीजभाव को प्राप्त हुए क्लेशों को मन के साथ प्रकृति में विलीन होने की बात कही है। क्लेश दग्धबीज अवस्था को कैसे प्राप्त होते हैं, इसकी चर्चा महर्षि ने समाधि पाद में विस्तार से की है, वहीं पर समझने का प्रयास करना चािहए। फिर भी यहाँ संक्षेप से कह देता हूँ- विषय भोगों की यथार्थता को जानने से योगाभ्यासी को विवेक हो जाता है और उस विवेक से वैराग्य उत्पन्न होता है, अर्थात् विषय भोगों से तृष्णा हट जाती है, जिससे योगाभ्यासी का मन पूर्ण एकाग्र हो जाता है, मन की एकाग्रता से समाधि लगती है और उस समाधि से जड़ और चेतन आत्मा का साक्षात्कार होता है। आत्म साक्षात्कार से गुणों के प्रति पूर्ण तृष्णा रहित हो जाने से प्रभु दर्शन हो जाता है। प्रभु दर्शन का अभ्यास क्लेशों को दग्धबीज बना देता है। दग्धबीज हुए क्लेश आत्मा को दुःख नहीं दे सकते, इसलिए आत्मा का प्रयोजन पूरा हो जाता है, प्रयोजन के पूर्ण होने से मन का कार्य समाप्त हो जाता है। फिर चरितार्थ मन अपने कारण में विलीन होता है, तो क्लेश भी मन के साथ-साथ प्रकृति में विलीन हो जाते हैं।
– ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर

स्वरसवाही विदुषोऽपि तथा रूढोऽभिनिवेशः-९ – स्वामी विष्वङ्

 

क्लेशों के पाँच विभागों में से चार विभागों (अविद्या, अस्मिता, राग और द्वेष) की परिभाषाएँ बताकर महर्षि पतञ्जलि अन्तिम पाँचवें विभाग की चर्चा प्रस्तुत सूत्र में कर रहे हैं। महर्षि कहते हैं- प्रवाह (परम्परा) से चला आ रहा, यह मृत्यु का डर सर्वसाधारण मनुष्यों में तो रहता ही है, परन्तु विद्वानों में भी निरन्तर बना रहता है। इस मृत्युभय को ही अभिनिवेश नाम से कहा जाता है। यहाँ महर्षि ने ‘स्वरसवाही’ शब्द का प्रयोग किया है। स्वरस का अभिप्राय है- स्वभाव और वाही का अभिप्राय बनाये रखना, इस प्रकार स्वभाव को बनाया रखना अर्थ प्रकट होता है। स्वभाव दो प्रकार का होता है- एक नित्य स्वभाव और दूसरा अनित्य स्वभाव। यहाँ अनित्य स्वभाव को लिया गया है और यह अनित्य स्वभाव परम्परा से निरन्तर चला आ रहा है। इस कारण इसे प्रवाह से अनादि कहते हैं। यह मृत्युभय प्रवाह से-अनादि काल से निरन्तर चला आ रहा है और यह भय प्राणिमात्र को होता है। चाहे वह भय पशु, पक्षी, कीट-पतंगादि को होता हो, चाहे साधारण-से-साधारण मनुष्य को होता हो। मनुष्येतर प्राणियों को मृत्यु का भय होना और साधारण मनुष्यों को भी होना कोई विशेष आश्चर्य की बात नहीं है, परन्तु जो पण्डित-विद्वान् हैं, शास्त्रों को आदि से अन्त तक जानने वाले हैं, उन्हें बोध रहता है कि जो जन्म लेता है, वह मरता (शरीर त्याग करता) भी है। इतना सब कुछ जानने के पश्चात् भी अज्ञानियों के समान मृत्यु से घबराते-डरते हैं। इसी डर-भय को महर्षि ने अभिनिवेश नाम से कथन किया है।

प्रस्तुत सूत्र की व्याख्या करते हुए महर्षि वेदव्यास लिखते हैं-

सर्वस्य प्राणिन इयमात्माशीर्नित्या भवति,

मा न भूवं भूयासमिति।

अर्थात् प्रत्येक प्राणि को अपनी आत्मा के विषय में अभिलाषा होती है कि ‘मैं सदा ऐसा ही बना रहूँ, ऐसा कभी न हो कि मैं न रहूँ।’ ऐसी अभिलाषा नित्य होती है अर्थात् जब-जब आत्मा शरीर धारण करता है तब-तब आत्मा को ऐसा ही अनुभव होता है, इसलिए इसे सदा रहने वाली अभिलाषा कहा जाता है। इस कारण मनुष्य मृत्युभय को लेकर सदा सतर्क और सावधान रहता है। मनुष्य में एक स्वभाव है कि वह किसी भी व्यक्ति या वस्तु के प्रति आकर्षण रखता है या विकर्षण (अलगाव) रखता है। यह तब होता है, जब उसने, उस व्यक्ति या वस्तु का पहले अनुभव किया हो। यदि ऐसा नहीं है, अर्थात् पहले अनुभव नहीं किया, परन्तु आकर्षण या विकर्षण हो रहा है, ऐसा कभी सम्भव नहीं हो सकता, इसलिए महर्षि ने कहा है-

न चाननुभूतमरणधर्मकस्यैषा भवत्यात्माशीः।

अर्थात् जिस मनुष्य ने पूर्व जन्म में मृत्यु क्रिया का अनुभव न किया हो, उसकी यह आत्मा-सम्बन्धी अभिलाषा नहीं हो सकती। किसी भी आत्मा ने मरने के कष्ट का अनुभव कभी किया ही न हो, तो भला वह मरने से निरन्तर क्यों डरेगा? इससे यह स्पष्ट होता है कि-

एतया च पूर्वजन्मानुभवः प्रतीयते।

अर्थात् इसी अभिलाषा के कारण से पूर्व जन्म में अनुभव किये मरण दुःख का अनुभव इस वर्तमान जन्म में भी हो रहा है, ऐसी स्पष्ट प्रतीति होती है। वही यह मृत्युभय अपने संस्कारों के रूप में मन में विद्यमान होकर सदा मनुष्य को भयभीत करता रहता है। इस भयभीत करने वाले मृत्युभय को महर्षि ने अभिनिवेश नाम से पाँचवें क्लेश के रूप में प्रस्तुत किया है।

यद्यपि मनुष्य को इस संसार में नाना प्रकार के भय प्राप्त होते रहते हैं, जैसे अन्न न मिलने का भय, वस्त्र न मिलने का भय, घर न मिलने का भय अर्थात् रोटी, कपड़ा और मकान के प्रति सदा भय बना रहता है। यह भय सामान्य रूप से प्रत्येक मनुष्य को होता है, परन्तु कुछ विशेष साधनों के अभाव में विशेष मनुष्यों को ही भय सताता रहता है, ऐसा भय सबको नहीं होता। चाहे जड़ वस्तुओं से सम्बन्धित भय हो या चेतन वस्तुओं से सम्बन्धित भय हो, यह अलग-अलग व्यक्तियों की अलग-अलग योग्यताओं के कारण हो सकता है, परन्तु अभिनिवेश नामक भय, ऐसा भय है जिससे कोई भी मनुष्य अछूता नहीं रह सकता। न केवल मनुष्य, मनुष्येतर समस्त प्राणियों को भी यह भय आतंकित करता है, इसलिए महर्षि वेदव्यास कहते हैं-

स चायमभिनिवेशः क्लेशः स्वरसवाही कृमेरपि जातमात्रस्य प्रत्यक्षनुमानागमैरसम्भावितो मरणत्रास उच्छेददृष्ट्यात्मकः पूर्वजन्मानुभूतं मरणदुःखमनुमापयति।

अर्थात् और वह यह अपने संस्कारों के रूप में वर्तमान मरणभय रूप अभिनिवेश नामक क्लेश अभी-अभी उत्पन्नमात्र कृमि रूप क्षुद्रजन्तुओं को भी, जिनको इस वर्तमान जन्म में प्रत्यक्ष, अनुमान तथा शब्द प्रमाण से जानकारी नहीं मिली है, ऐसा उच्छेद-विनाश रूप मृत्यु का भय पूर्व जन्मों में अनुभव किये मरण दुःख का अनुमान कराता है।

यहाँ पर महर्षि वेदव्यास ने क्षुद्रजन्तु-कृमि का उदाहरण रूप में ग्रहण किया है, जिसने अभी-अभी जन्म लिया है, जिसे मृत्यु के विषय में किसी भी प्रकार की जानकारी नहीं है और न ही उसने किसी और को मरते हुए प्रत्यक्ष किया है, जिसको मृत्यु क्या होती है? इसका कोई पता तक नहीं है। ऐसी स्थिति में उसे अनुमान भी नहीं हो सकता, अर्थात् मृत्यु का प्रत्यक्ष न तो स्वयं को हुआ है और न ही अन्यों को मरते हुए प्रत्यक्ष किया है। बिना प्रत्यक्ष के उसे अनुमान भी नहीं होगा। जब कोई मनुष्य या अन्य प्राणि उस कृमि को मारने की चेष्टा करते हैं, तब वह कृमि पूर्व प्रत्यक्ष के अनुसार अनुमान नहीं कर सकता, क्योंकि उसे इस जन्म में कभी मृत्यु का प्रत्यक्ष ही नहीं हुआ है। न प्रत्यक्ष हुआ है और न ही अनुमान हो सकता है। कोई यह न समझे कि श         द प्रमाण से पता लग जायेगा? ऐसा भी नहीं हो सकता, क्योंकि शब्द प्रमाण का प्रयोग जिस प्रकार से मनुष्यों में होता है, उस प्रकार अन्यों (कृमि आदि योनियों) में नहीं होता है। मनुष्यों को उपदेशादि के द्वारा जानकारी दी जाती है, इसलिए मनुष्य श   द प्रमाण का प्रयोग करते हैं, परन्तु कृमि आदि ऐसा नहीं कर पाते हैं। मनुष्यों जैसी विकसित बुद्धि अन्य योनियों में नहीं होती है। इस कारण महर्षि वेदव्यास ने तीनों (प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द ) प्रमाणों से असम्भावित बताया है, फिर भी कृमि को मृत्यु का भय हो रहा होता है और वह भय अनायास पूर्व जन्म को सिद्ध करता है।

महर्षि वेदव्यास के इस उपरोक्त मन्तव्य से यह बात सिद्ध होती है कि पूर्व जन्म होता है और अगला जन्म भी होता है। जो कोई यह कहता है कि पूर्व जन्म को किसने देखा या अगले जन्म को किसने देखा? ये बातें निराधार हैं अर्थात् बिना प्रमाण के ऐसी-ऐसी बातें किया करते हैं, जिनके पीछे किसी भी प्रकार का आधार नहीं होता। यह अभिनिवेश नामक क्लेश निराधार वाली बातों को पूर्ण विराम दे देता है। अभिनिवेश नामक क्लेश से पूर्व जन्म, अगला जन्म, आत्म-नित्यत्व आदि अनेक सिद्धान्त खुलते हैं- स्पष्ट होते हैं और इनके माध्यम से आत्मा को यथार्थ रूप से समझने का यत्न किया जाता है। ऐसा जो करता है, वह तत्व ज्ञानी बन जाता है। तत्व ज्ञानी बन कर वह जन्म-मरण रूपी शृंखला को तोड़ देता है। इस सम्बन्ध में महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती लिखते हैं- ‘………इस क्लेश की निवृत्ति उस समय होगी कि जब जीव, परमेश्वर और प्रकृति अर्थात् जगत् के कारण को वह नित्य और कार्यद्रव्य के संयोग को अनित्य जान लेगा। इन क्लेशों की शान्ति से जीव को मोक्ष सुख की प्राप्ति होती है।’ (ऋग्वेदादिभाष्य-भूमिका मुक्तिविषय) यहाँ पर महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अभिनिवेश नामक क्लेश की व्याख्या करते हुए पूर्व जन्म और अगले जन्म की सिद्धि से आत्म-नित्यत्व की सिद्धि की है, जिससे योगाभ्यासी अपने आप (आत्मा) को जाने व समझे और अपने प्रयोजन को पूर्ण करने के लिए क्रियायोग को दृढ़ करे, जिससे तत्व ज्ञान हो सके और प्रयोजन को पूर्ण कर सके।

महर्षि वेदव्यास अभिनिवेश की व्यापकता को बताते हुए कहते हैं-

यथा चायमत्यन्तमूढेषु दृश्यते क्लेशस्तथा

विदुषोऽपि विज्ञातपूर्वपरान्तस्य रूढः।

अर्थात् यह अभिनिवेश नामक क्लेश अत्यन्त मूढ़ यानि सब प्रकार के विज्ञान से रहित महामूर्ख, जिसे सामान्य जानकारी भी नहीं है, जो घनघोर जंगलों में रह रहा हो, ऐसे व्यक्ति को सताता रहता है- इसमें कोई विशेष बात नहीं है, परन्तु जो विद्वान् है, जिसने सब शास्त्रों का अध्ययन किया है, जिसे जन्म और मृत्यु का बोध है, जिसे बन्धन का कारण और मोक्ष का भी कारण पता है, इतना ही नहीं उसे यह भी पता है कि जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु अवश्य होगी और जिसकी मृत्यु होगी, उसका पुनः जन्म भी होगा, इससे आत्मा का नाश नहीं होता, आत्मा तो नित्य है- इत्यादि सभी विषयों का यथावत् बोध रखता है, फिर भी मृत्यु से डरता रहता है। इस प्रकार साधारण से साधारण मनुष्य, पशु-पक्षी आदि और विद्वान् सभी मृत्यु से डरते हैं। मृत्यु का आतंक प्राणिमात्र को है, इसका निराकरण नहीं हो सकता। इस सम्बन्ध में महर्षि वेदव्यास कहते हैं-

‘कस्मात्? समाना हि तयोः कुशलाकुशलयोर्मरणदुःखानुभवादियं वासनेति।’

अर्थात् प्राणिमात्र को एक समान मृत्यु का भय क्यों होता है? इसका समाधान यह है कि पूर्व जन्म में कुशल=विद्वान् और अकुशल=साधारण अनपढ़ मनुष्य, दोनों ने एक समान मृत्यु का दुःख भोगा है। उस दुःखानुभव की वासना (संस्कार) दोनों में एक समान है, इसलिए वर्तमान जन्म में भी दोनों को पुनः मृत्यु का भय हो रहा है। इससे पूर्व जन्म की सिद्धि होती है।

संसार में कोई भी व्यक्ति इस बात का खण्डन नहीं कर सकता कि पूर्व जन्म नहीं होता या अगला जन्म नहीं होता। इतना ही नहीं, आत्मा नहीं मरता है-आत्मा का नाश नहीं होता है, यह जीवन ही अन्तिम जीवन नहीं है- इत्यादि अनेक विषय तर्क और प्रमाणों से सही सिद्ध होते हैं।

– ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर

 

दुःखानुशयी द्वेषः-८ – स्वामी विष्वङ्

क्लेशों के पाँच विभागों में से तीन विभागों (अविद्या, अस्मिता, राग) की परिभाषाएँ बताकर महर्षि पतञ्जलि चौथे विभाग की चर्चा प्रस्तुत सूत्र में कर रहे हैं। महर्षि कहते हैं- दुःख के पीछे-पीछे चलने वाले क्लेश को द्वेष कहते हैं। अभिप्राय यह है कि मनुष्य जिस दुःख का अनुभव करता है, उस दुःख के अनुभव के पीछे मन में दुःख के प्रति प्रतिशोध बना रहता है, विरोध- आवेश बना रहता है। उस प्रतिशोध को, उस विरोध-आवेश को यहाँ द्वेष शब्द से कहा जा रहा है। मनुष्य को जहाँ कहीं भी दुःख का अनुभव होता है, वहाँ उसे द्वेष हो जाता है। मिथ्याज्ञान से युक्त मनुष्य को जहाँ-जहाँ दुःख की अनुभूति होती है, वहाँ-वहाँ द्वेष अवश्य होता है। ऐसा कभी नहीं हो सकता कि मिथ्याज्ञान से युक्त होकर दुःख तो भोगे, पर द्वेष न हो, इसलिए महर्षि पतञ्जलि कहते हैं- दुःख अनुभव के पीछे-पीछे चलने वाला प्रतिशोध रूपी, विरोध-आवेशरूपी क्लेश ही द्वेष है।

महर्षि वेदव्यास प्रस्तुत सूत्र की व्याख्या करते हुए लिखते हैं-

दुःखाभिज्ञस्य दुःखानुस्मृतिपूर्वो दुःखे तत्साधने

वा यः प्रतिघो मन्युर्जिघांसा क्रोधः स द्वेष इति।

अर्थात् दुःख का अनुभव करने वाले मनुष्य को दुःख के साधनों को दूर करने की भावना होती है, उसे दुबारा न प्राप्त करने की मनसा होती है या यूँ कहें, उसे बार-बार न अपनाने का विरोध होता है। उस प्रतिघ रूपी प्रतिकार को, उस मन्यु रूपी विरोध को, उस जिघांसा रूपी मार-काट करने की भावना को या क्रोध रूपी आवेश को द्वेष नाम से कहा जाता है। यहाँ महर्षि वेदव्यास ने द्वेष को समझाने के लिए चार श  दों का प्रयोग (प्रतिघः, मन्युः, जिघांसा, क्रोधः) किया है। ये चारों शब्द  द्वेष को ही स्पष्ट कहते हैं। संसार में द्वेष के लिए क्रोध, गुस्सा, वैर, प्रतिशोध, आवेश आदि श       शब्दों  का प्रयोग होता रहता है।

मनुष्य को रूप, रस, गन्ध, स्पर्श एवं शब्द वाली वस्तुओं से जो दुःख प्राप्त होता है, उसकी छाप मन में पड़ती है। दुःख की उस छाप को संस्कार कहते हैं। इस प्रकार दुःख अनुभव के जितने भी संस्कार मन में एकत्रित होते हैं, उनकी स्मृतियाँ मनुष्य को आती रहती हैं। उन स्मृतियों के अनुरूप मनुष्य उस-उस दुःख के प्रति या उस-उस दुःख के साधन के प्रति प्रतिशोध करता रहता है और उसे दूर करने का पुरुषार्थ करता रहता है। जब तक दुःख या दुःख के साधन दूर नहीं होते हैं, तब तक मनुष्य उद्यम करता ही रहता है। उस दुःख और दुःख के साधनों के पुरुषार्थ के पीछे द्वेष कारण बना हुआ होता है।

यहाँ व्यासभाष्य में महर्षि वेदव्यास ने मन्युः और क्रोधः इन दोनों शब्दों  को ग्रहण करके यह स्पष्ट किया है कि मन्यु और क्रोध दोनों द्वेष के पर्यायवाची शब्द हैं। केवल अन्तर इतना है कि मन्यु आन्तरिक द्वेष होता है और क्रोध बाह्य द्वेष होता है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने यजुर्वेद के ३०वें अध्याय के १४वें मन्त्र में आये मन्यु शब्द का अर्थ आन्तरिक क्रोध किया है- मन्यवे= आन्तर्यक्रोधाय और क्रोध शब्द का अर्थ बाह्य कोप किया है- क्रोधाय= बाह्यकोपाय। इस प्रकार मन्यु और क्रोध एक अर्थ को कहने वाले होते हुए भी कुछ अन्तर रखते हैं और वह अन्तर बाह्य और आन्तरिक है। मनुष्य कभी-कभी अन्दर ही अन्दर द्वेष कर रहा होता है, उसे मन्यु कह सकते हैं। ऐसी स्थिति में वह अपने द्वेष को बाहर प्रकट होने नहीं देता है। उस आन्तरिक मन्यु के कारण अन्दर-ही-अन्दर दुःखी होता रहता है। जब मनुष्य बाह्य रूप से वाणी या शरीर द्वारा द्वेष कर रहा होता है, तब अन्य मनुष्यों को स्पष्ट पता चलता है कि यह व्यक्ति द्वेष कर रहा है। चाहे द्वेष अन्दर से करे या बाहर से करे, दोनों ही स्थितियों में हानिकारक है, क्योंकि द्वेष मनुष्य के प्रयोजन में बाधक है।

यद्यपि द्वेष की परिभाषा एक ही है, परन्तु मनुष्य अलग-अलग हैं, पशु-पक्षी आदि अलग-अलग हैं, इसलिए द्वेष भी अलग-अलग प्रकार से होता है। चेतन प्राणि-मनुष्य, पशु, पक्षी आदि का द्वेष अलग प्रकार का है और जड़ पदार्थ- विष, गहरा पानी, अग्नि आदि का द्वेष अलग प्रकार का है। व्यक्ति-व्यक्ति का द्वेष भी अलग-अलग होता है। रूप का द्वेष भी अलग-अलग होता है, कोई काले रूप से, कोई हरे रूप से तो कोई किसी रूप से द्वेष करता है। इसी प्रकार रसों का द्वेष अलग-अलग है, गन्धों का द्वेष अलग-अलग है, ऐसे ही स्पर्शों का और शब्दों  का द्वेष भी अलग-अलग है। इस प्रकार समस्त रूपों, रसों, गन्धों, स्पर्शों और शब्दों  के विभिन्न प्रकार के भेद हैं। असंख्य प्रकार की वस्तुएँ और असंख्य प्रकार के द्वेष और ऐसे ही असंख्य प्रकार के प्राणि तथा असंख्य प्रकार के द्वेष। इस प्रकार व्यक्ति भेद से द्वेष भेद असंख्य हो जाते हैं। व्यक्ति भेद से द्वेष भले ही असंख्य हो जाते हों, परन्तु द्वेषत्व सब में व्यापक होने से जाति के रूप में द्वेष को एक ही कहा जाता है।

मनुष्य जिन पर द्वेष करता है, वे दो प्रकार के पदार्थ हैं- एक जड़ और दूसरे चेतन। इन दोनों में द्वेष होता है। जड़ पदार्थ अनेक प्रकार के हैं। अलग-अलग जड़ पदार्थों के द्वेष एक-दूसरे से अलग-अलग होते हुए भी द्वेषत्व की दृष्टि से वे एक ही होते हैं। जब उन अलग-अलग जड़ पदार्थों से दुःख प्राप्त करता है, तब उन अलग-अलग दुःखों की छाप मन में पड़ती है। उस छाप रूपी संस्कारों से प्रेरित होकर उस व्यक्ति के मन में जो प्रतिकार की भावना, आवेश की भावना उत्पन्न होती है, उसे ही यहाँ द्वेष कहा जा रहा है। उसी प्रकार चेतन प्राणि भी अनेक प्रकार के हैं, अलग-अलग प्राणियों के द्वेष अलग-अलग होते हुए भी द्वेषत्व सब में एक ही है। इस प्रकार अनेक जड़ पदार्थों के अनेक द्वेष और अनेक चेतन पदार्थों के अनेक द्वेष मनुष्य को संतप्त करते हैं। इतने प्रकार के द्वेष मन में विद्यमान हों, तो मनुष्य कैसे परमेश्वर के प्रति आकर्षित होकर एकाग्र हो पायेगा?

मनुष्य ने जड़ और चेतन से सम्बन्धित जितने दुःख भोगे हैं, उन सबके प्रति पुनः दूर करने के लिए जो प्रतिकार की भावना होती है, वह तो द्वेष है ही, उसके साथ-साथ जिन जड़ और चेतनों से अब तक मनुष्य ने दुःख भोगा ही नहीं है, परन्तु उनके विषय में सुना है, पढ़ा है और उन पर प्रमाणों द्वारा विचार किया है, वह भी द्वेष है। सुनने से, पढ़ने से, विचार करने मात्र से भी मन में उनकी छाप पड़ती है। उस छाप रूपी संस्कार से स्मृति उत्पन्न होती है और उस स्मृति के अनुरूप प्रतिकार, आवेश उत्पन्न होता है, उसे भी द्वेष कहते हैं।

यह आवश्यक नहीं है कि जिस दुःख के या दुःख के साधनों के अनुभव से जो संस्कार मन में पड़ता है, उसकी स्मृति से पुनः उस दुःख को दूर करने की प्रतिशोध रूपी भावना को ही द्वेष कहा जाये, बल्कि दुःख प्राप्त नहीं हुआ या दुःख के साधनों को प्राप्त भी नहीं किया, फिर भी उस दुःख और दुःख के साधनों के प्रति द्वेष उत्पन्न होता है। यदि बिना दुःख और दुःख के साधनों को प्राप्त किये भी द्वेष होता हो, तो क्या यह महर्षि पतञ्जलि और महर्षि वेदव्यास के विपरीत तो नहीं माना जायेगा? इसका समाधन यह है कि वह ऋषियों के विपरीत नहीं जायेगा, क्योंकि दुःखों व दुःख के साधनों को चाहे प्राप्त नहीं किया हो, परन्तु उनके विषय में सुनते, पढ़ते और विचार करते समय दुःख अनुभव होता है- भले ही वह दुःख अनुभव श्रवण से होने वाला दुःख हो, पढ़ने से होने वाला दुःख हो या विचार से होने वाला दुःख हो। दुःख अनुभव तो हुआ है, उसी दुःख अनुभव के पीछे-पीछे चलने वाला प्रतिशोध ही द्वेष कहलाता है, चाहे वह दुःख जड़ वस्तु या चेतन वस्तु से प्राप्त होने वाला हो अथवा श्रवण, पठित और विचारित दुःख हो। दुःख तो दुःख ही है, चाहे किसी से सम्बन्धित हो। इस प्रकार द्वेष मात्र, ऋषियों की परिभाषाओं के अनुरूप होना चाहिए।

असंख्य प्रकार के जड़ पदार्थों और असंख्य प्रकार के चेतन पदार्थों का द्वेष मनुष्य के जीवन में कार्य करता रहता है। वह द्वेष कभी वर्तमान (उदार अवस्था) में रहता है, कभी विच्छिन्न (दबा) रहता है, तो कभी-कभी तनू (कमजोर) होकर बहुत सूक्ष्मता से रहता है। यदि इन तीनों स्थितियों में नहीं है, तो प्रसुप्त (सोया हुआ) रहता है। इसलिए मनुष्य को यह नहीं समझना चाहिए कि मुझमें अमुक-अमुक जड़ व चेतन वस्तु के प्रति द्वेष नहीं है। हाँ, द्वेष तो है, परन्तु वर्तमान अवस्था में नहीं है, पर दबा हुआ है या बहुत सूक्ष्म होकर रह रहा है अथवा सोया हुआ है, इसलिए ऐसा लगता है कि द्वेष नहीं है, परन्तु द्वेष तो है। जो योगाभ्यासी ऐसी स्थिति को अनुभव कर लेता है, वही योगाभ्यासी द्वेष को दूर करने का उद्यम कर सकता है और जो व्यक्ति अविद्या के कारण यह समझ बैठता है कि मुझ में द्वेष नहीं है, वह व्यक्ति द्वेष को दूर करने का उद्यम कभी नहीं कर पाता है। मनुष्य को चाहिए कि वह प्रमाणों से युक्त होकर पूर्वापर का विचार करते हुए अपने जीवन के उद्देश्य को आत्म समक्ष रखते हुए देखे, तो निश्चित रूप में द्वेष समझ में आयेगा। जब मनुष्य ऋषियों के अुनरूप अपनी बुद्धि को बनाते हैं, तो निश्चित रूप से ऋषियों के समान अपने को भी कृतकृत्य कर सकते हैं और तभी ऋषियों का पुरुषार्थ सार्थक हो सकता है।

द्वेष का विवेक द्वेष को समाप्त करने वाला होता है,

द्वेष का अविवेक द्वेष को बढ़ाने वाला होता है।

– ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर

आध्यात्मिक चिन्तन के क्षण……….- स्वामी विष्वङ्

अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या-५

– स्वामी विष्वङ्

पिछले अंक का शेष भाग…..

इस सम्बन्ध में महर्षि मनु महाराज कहते हैं-

सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्।

योऽर्थे शुचिर्हि स शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः।।

-मनुस्मृति ५.१०६

अर्थात् संसार में बहुत प्रकार की शुद्धियाँ हैं परन्तु उन सभी प्रकार की शुद्धियों में से धन-संम्पति  की शुद्धि सबसे बड़ी शुद्धि है। जो-जो मनुष्य धन के विषय में शुद्ध हैं, वही-वही शुद्ध कहलाता है। बाकी मिट्टी से, जल से जो शुद्ध होने का दिखावा करते हैं, वह केवल दिखावा मात्र है। यथार्थता में अन्दर की पवित्रता से ही बाहर की वस्तुएँ पवित्र होती हैं, अन्यथा नहीं। यहाँ पर महर्षि मनु ने धनार्जन पर विशेष ध्यान दिया है। आजकल मनुष्य धनार्जन जिस किसी भी रीति से प्राप्त करने में जुटे हुए हैं अर्थात् धन पाने के लिए कैसी भी हिंसा कर सकते हैं। चाहे मनुष्य की चाहे पशु-पक्षियों की। धन के लालच से पूरे देश को डुबो सकते हैं। धन पाने के लिए किसी भी प्रकार का झूठ बोल सकते हैं। धनार्जन के लिए किसी भी प्रकार की चोरी कर सकते हैं। धन के लिए व्यभिचार कर सकते हैं। धन को बढ़ाने के लिए अनेक प्रकार के पदार्थों का संग्रह कर सकते हैं। धन प्राप्त करने के लिए मन को अत्यन्त मलिन कर सकते हैं। अधिक से अधिक धन बनाने के लिए जीवन को असन्तोष में ढ़केलते हैं। धन के लिए तप का त्याग कर देते हैं और स्वाध्याय करना बन्द कर देते हैं। केवल धन के पीछे चलने वाले व्यक्ति ईश्वर आज्ञा का पालन कभी नहीं कर सकते। इस प्रकार यम और नियम का उल्लंघन करते हुए धनार्जन किया जाता है, तो ऐसे धन को अशुद्ध कहते हैं। इसलिए महर्षि वेदव्यास ने अनर्थ को अर्थ मानने वालों को अविद्या ग्रस्त माना है। इसीप्रकार अर्थ शब्द  से और भी अभिप्राय ले सकते हैं- जैसे भोजन आदि पदार्थ, वेदाज्ञा से विरुद्ध भोजन अपने आप में शुद्ध होने पर भी अशुद्ध माना जाता है। इसप्रकार अनेक उदाहरण हो सकते हैं।

‘तथा दुःखे सुखव्यातिं वक्ष्यति- ‘‘परिणामताप-संस्कार दुःखैर्गुणवृ   वृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः’’ (योग. २.१५) इति। तत्र सुखख्यातिरविद्या

अर्थात् उसीप्रकार दुःख में सुख बुद्धि रखना अविद्या है, इस बात को लेकर स्वयं सूत्रकार महर्षि पतञ्जलि आगे इसी साधन पाद के पन्द्रहवें सूत्र में वर्णन करेंगे। मनुष्य के सुख में, शान्ति में, तृप्ति में, निर्भयता में और स्वतन्त्रता में दुःख अत्यन्त बाधक है। यदि जीवन में दुःख है तो न सुख, न शान्ति, न तृप्ति, न निर्भयता और न ही स्वतन्त्रता रहेगी। इसलिए महर्षि पतञ्जलि ने दुःख को अलग से परिभाषित करने के लिए अलग सूत्र बनाया और महर्षि वेदव्यास ने उस सूत्र की विस्तृत व्याख्या की है। उसकी व्याख्या उसी सूत्र पर देखलेंगे इसलिए यहाँ पर उसकी चर्चा नहीं करते हैं।

महर्षि वेदव्यास अविद्या के चौथे भाग की व्याख्या करते हुए लिखते हैं-

तथानात्मन्यात्मख्यातिर्बाह्योपकरणेषु चेतनाचेतनेषु भोगाधिष्ठाने वा शरीरे, पुरुषोपकरणे वा मनस्यनात्मन्यात्मख्यातिरिति।

अर्थात् जो अनात्मा= जड़ पदार्थ में आत्म=चेतन बुद्धि रखना अविद्या है। मनुष्य जड़ वस्तु को चेतन वस्तु मानकर व्यवहार करता है। यह बहुत बड़ी अविद्या है। मनुष्य के प्रयोजन को पूर्ण करने के लिए बहुत कुछ साधनों की अपेक्षा रहती है। मनुष्य अपने से अलग बाहर के साधनों का प्रयोग करता है उन बाहर के साधनों को महर्षि ने बाह्य-उपकरण शब्द  से कथन किया है। बाह्य-उपकरण दो प्रकार के हैं- चेतन के रूप में और जड़ के रूप में। यहाँ जो साधन जड़ के रूप में हैं वे- धन, भूमि, मकान, गाड़ी आदि हैं और जो साधन चेतन के रूप में हैं वे- माता, पिता, पति, पत्नी, भाई, बहन, सम्बन्धी, समाजी, देशवासी, विश्ववासी मनुष्य और इनके अतिरिक्त मनुष्येतर प्राणी- पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि। ये सब (अर्थात् चेतन और अचेतन) मनुष्य के प्रयोजन को सिद्ध करने वाले हैं। उनके बिना मनुष्य का प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता। इसलिए महर्षि ने उन्हें बाह्य-उपकरण कहा है। यहाँ पर बाह्य-उपकरण जड़ भी हैं और चेतन भी हैं। जड़ को चेतन माना जा रहा है अर्थात् धन, भूमि, मकान, गाड़ी आदि को मनुष्य चेतन मानकर दुःखी होता रहता है। यद्यपि शब्दों  से मनुष्य को समझ में नहीं आता कि ‘मैं धन को कैसे चेतन मानता हूँ, मैं तो धन को जड़ ही मानता हूँ इत्यादि।’ परन्तु व्यवहार करते समय व्यक्ति धन को चेतन ही मानता हुआ दुःखी होता है। इसका उदाहरण महर्षि स्वयं आगे की व्याख्या में करेंगे।

बाह्य-उपकरण में जड़ वस्तुओं को चेतन मानना तो अविद्या है परन्तु महर्षि ने चेतन को भी बाह्य-उपकरण माना है। फिर चेतन को चेतन मानने में अविद्या कैसे हो सकती है? इसका समाधान है कि यहाँ पर चेतन शब्द  का प्रयोग आत्मा के लिए नहीं आया बल्कि चेतन शब्द  शरीर के लिए आया है। इसलिए यहाँ पर शरीरों को ही लेना चाहिए। मनुष्य शरीर को भी चेतन मानता है। इस कारण यह अविद्या है न कि चेतन को चेतन मानना अविद्या है। मनुष्य जहाँ अन्य लोगों के शरीरों को चेतन मान लेता है वहाँ स्वयं के शरीर को भी चेतन मानता है। इसलिए महर्षि ने कहा- ‘भोगाधिष्ठाने वा शरीरे’ अर्थात् मनुष्य जो भी रूप, रस, गन्ध, स्पर्श व शब्द  वाले पदार्थों का भोग (=सुख रूप में या दुःख रूप में) करता है, वह भोग जिस आश्रय से करता है उसे शरीर कहते हैं। ऐसे साधन रूप (स्वयं के) शरीर को चेतन मानता है। शरीर जड़ है फिर भी मनुष्य अपने शरीर को चेतन मानकर व्यवहार करता है। इसे अविद्या ही कहा जाता है। महर्षि ने जहाँ बाह्य-उपकरणों को लेकर कहा है वहाँ आन्तरिक उपकरण के सन्दर्भ में भी कहा है कि-

पुरुषोपकरणे वा मनस्यनात्मन्यात्मख्यातिरिति।

अर्थात् आत्मा का अत्यन्त निकट उपकरण=साधन मन को आत्मा समझना अविद्या है। मनुष्य मन को ही आत्मा समझ कर सम्पूर्ण व्यवहार करता है। यह बोलता हुआ देखा जाता है कि मेरा मन ऐसा करता है, मेरा मन नहीं मानता, मेरा मन चला गया इत्यादि। यद्यपि मनुष्य शब्दों  से मन को स्थूल बुद्धि से जड़ तो मानता है परन्तु आन्तरिक सूक्ष्म बुद्धि से मन को चेतन ही मानता है। मनुष्य जब तक समाधि लगा कर अनुभव नहीं करता तब तक सूक्ष्मता से मन को चेतन मानता है। हाँ, यह अलग बात है कि वाणी से नहीं बोलता, परन्तु उसका व्यवहार चेतन मान कर ही होता रहता है।

मनुष्य जड़ वस्तु (= धन, भूमि, मकान, गाड़ी आदि) को चेतन कैसे मानता है- कौन भला धन को या भूमि को या मकान को चेतन मानेगा? यह कैसे हो सकता है? हाँ, हो सकता है इसीकारण महर्षि ने कहा जड़ को चेतन मानता है। कैसे?

तथैतदत्रोक्तम् व्यक्तमव्यक्तं वा स वमात्मत्वेनाभिप्रतीत्य

तस्य सम्पदमनुनन्दत्यात्मसम्पदं मन्वानस्तस्य व्यापद-मनुशोचत्यात्मव्यापदं मन्वानः स सर्वोऽप्रतिबुद्ध इति।

अर्थात् इस अविद्या के चौथे प्रकार को जो कि जड़ को चेतन किसप्रकार माना जाता है इस सम्बन्ध में अन्य ऋषि कहते हैं कि व्यक्त (जिन में चेतन आत्मा रहता है वह शरीर) चेतन पदार्थ- जैसे- पुत्र-पुत्री, पति-पत्नी आदि और पशु, पक्षी आदि अन्य प्राणि। अव्यक्त (धन, भूमि, मकान, गाड़ी आदि) पदार्थ को आत्मा मानकर उन चेतन अचेतन रूप जड़ पदार्थों की समृद्धि-उन्नति-बढ़ोत्तरी  को देखकर अपनी समृद्धि- बढ़ोत्तरी  मानता हुआ व्यक्ति अति प्रसन्न होता रहता है। उसीप्रकार उन जड़ चेतन पदार्थों की विपत्ति -हानि-ह्रास-न्यूनता-विनाश को देखकर अपनी  विपत्ति -हानि-ह्रास-विनाश मानता हुआ शोकग्रस्त होता है- दुःखी होता है। इसप्रकार मानने वाले वे सभी मनुष्य नितान्त अज्ञानी-मूर्ख हैं, ऐसा समझना चाहिए। यह अविद्या की पराकाष्ठा का उदाहरण है।

यहाँ पर धन, भूमि आदि की वृद्धि होने पर मनुष्य यह मानता और बोलता भी है कि ‘मैं बढ़ रहा हूँ, मैं उन्नत हो रहा हूँ, मेरी बढ़ोत्तरी  हो रही है इत्यादि।’ यहाँ मैं से आत्मा लिया जाता है। व्यक्ति आत्मा में वृद्धि मानता है। जबकि आत्मा नित्य पदार्थ है जिस रूप में है उसी रूप में सदा रहेगा। नित्य पदार्थ में न वृद्धि होती है, न न्यूनता आती है, फिर यह कैसे स्वीकार किया जा रहा है कि ‘मैं बढ़ रहा हूँ’ इत्यादि। इसीप्रकार पुत्र व पुत्री के शरीरों में वृद्धि होने पर माता-पिता यह मानते हैं कि ‘हम बढ़ रहे हैं, हमारे अंश बढ़ रहे हैं या हम ही बढ़ रहे हैं इत्यादि।’ जिसप्रकार जड़ व चेतन पदार्थों की वृद्धि से आत्मा की वृद्धि स्वीकार किया जा रहा है उसी प्रकार जड़ पदार्थों में न्यूनता-कमी या विनाश होने पर व्यक्ति अपनी न्यूनता-कमी या विनाश मानता है। उदाहरण के लिए धन कम हो जाये या डूब जाये अथवा कोई हड़प लेवें, तो मनुष्य यह कहता है कि ‘हाय! मैं डूब गया, मैं कम हो गया, मैं लुट-पिट गया, मेरा नाश हो गया इत्यादि।’ यदि पुत्र व पुत्री में न्यूनता आ जाये तो माता-पिता अपनी न्यूनता-कमी मानते हैं। अपना अंश कम हो गया, ऐसा मानते हैं और यदि कोई अपना मृत्यु को प्राप्त हो जाये, तो और अधिक अपना नाश-अपनी हानि समझ कर अत्यन्त दुःखी होते हैं। यहाँ पर वे आत्मा का नाश अनुभव करते हैं। यह इस बात का द्योतक है कि वे जड़ को चेतन मान कर व्यवहार में अत्यन्त दुःखी होते हैं। इसलिए यह अविद्या है।

महर्षि वेदव्यास उपसंहार करते हुए लिखते हैं-

एषा चतुष्पदा भवत्यविद्या मूलमस्य क्लेशसन्तानस्य कर्माशयस्य च सविपाकस्येति।

अर्थात् यह अविद्या चार विभागों वाली है, इसके साथ-साथ यह अस्मिता, राग, द्वेष व अभिनिवेश नाम वाले क्लेशों का मूल कारण है। इतना ही नहीं आत्मा को सुख और दुःख रूप फलों को देने वाले कर्म समुदाय का भी कारण है। यहाँ पर मूल का अभिप्राय है बीज। बीज से ही उस जैसी सन्तान उत्पन्न होती है। इसकारण अस्मिता आदि उसकी सन्तान होने के कारण क्लेशों में अविद्यापन विद्यमान रहता है। कर्माशय भी तब बनता है जब क्लेश विद्यमान हो। इसलिए यहाँ महर्षि ने अविद्या को कर्मसमुदाय का कारण भी बताया है।

अभी तक जिस अविद्या को लेकर जो चर्चा की गई है क्या वह अविद्या स ाात्मक है या विद्या का अभाव मात्र है? कभी कोई ऐसा न समझ बैठे कि अविद्या का अभिप्राय विद्या का अभाव मात्र है। ऐसा बिल्कुल नहीं है फिर क्या है? यहाँ अविद्या का अभिप्राय सत्तात्मक  विरोधी ज्ञान (मिथ्या ज्ञान) है जिसको अविद्या शब्द  से कथन किया जाता है। इसी बात को लेकर महर्षि वेदव्यास स्पष्ट करते हैं-

तस्याश्चामित्रागोष्पदवद्वस्तुसतवं विज्ञेयम्।

अर्थात् उस अविद्या को ‘अमित्र’ और ‘अगोष्पद’ शब्दों के अर्थों के समान वास्तविक-यथार्थ भावात्मक सत्ता है, ऐसा समझना चाहिए। अमित्र और अगोष्पद शब्दों  का अर्थ स्वयं ऋषि आगे लिखते हैं। परन्तु यहाँ पहले ‘अविद्या’ शब्दों में जो समास है उस पर विचार करते हैं। अविद्या शब्द में ‘नञ्’ त     पुरुष समास है न विद्या अविद्या इति। जो विद्या नहीं है अर्थात् विद्या से विरोधी अविद्या है जिसे मिथ्याज्ञान-विपरीतज्ञान-उल्टाज्ञान शब्दों से कहा जाता है। महर्षि अमित्र व अगोष्पद शब्दों के अर्थों को बताते हुए कहते हैं-

यथा नामित्रो मित्राभावः न मित्रमात्रं किन्तु तद्विरुद्धः सपत्नः।

अर्थात् जिसप्रकार से अमित्र श द का अर्थ मित्र का अभाव नहीं है और न तो मित्र ही है बल्कि उस मित्र का विरोधी भावात्मक-सत्तात्मक  शत्रु है।

यथा चागोष्पदं न गोष्पदाभावो न गोष्पदमात्रं किन्तु देश एव ताभ्यामन्यद्वस्त्वन्तरम्।

अर्थात् जिसप्रकार अगोष्पद श द का अर्थ गाय के पैर का अभाव नहीं है और न तो गाय का पैर ही है किन्तु भावात्मक- सत्तात्मक  एक देश विशेष है- स्थान विशेष है। गाय के पैर और उसके अभाव से भिन्न अलग वस्तु है। इसप्रकार अमित्र का अर्थ शत्रु और अगोष्पद का अर्थ स्थान विशेष है। यहाँ ‘नञ्’ समास से मित्र के विरोधी अर्थ और गाय के पैर से विरोधी अर्थ को बताना मुख्य था।

इसी प्रकार

एवमविद्या न प्रमाणं न प्रमाणाभावः किन्तु विद्याविपरीतं ज्ञानान्तरमविद्येति।

अर्थात् यह जो अविद्या नाम वाला क्लेश है वह न तो किसी भी प्रकार के प्रमाणों के अन्तर्गत आता है अर्थात् वह ज्ञान या विद्या है और न ही वह विज्ञान या विद्या का अभाव मात्र है। बल्कि वह विद्या का विरोधी भिन्न ज्ञान है जिसे मिथ्याज्ञान नाम से कथन किया जाता है। इसलिए कोई भी यहाँ अविद्या का अर्थ अभाव के रूप में न समझें। यहाँ पर एक और भी बात समझ लेना चाहिए कि जब अविद्या के चार भेदों का वर्णन किया जा रहा है और अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश का बीज बताया जा रहा है तब यह कैसे समझ सकते हैं कि अविद्या का अभिप्राय अभाव मात्र है। ऐसा बिल्कुल नहीं। फिर भी कोई समझ सकता हो, तो उसके लिए उपरोक्त समाधान है, ऐसा समझना चाहिए। ऋषियों का बहुत बड़ा उपकार हम सब पर रहता है कि वे अपनी ओर से किसी भी प्रकार की भ्रान्ति या संशय को अवसर नहीं देते हैं। फिर भी हम साधारण बुद्धि वाले भ्रम या संशय उत्पन्न करके ऋषियों पर दोष मड़ते हैं। यह हम सब की उन्नति में बाधक है, ऐसा हमें समझना चाहिए।

– ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर