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सेवाधन के धनी आर्य नेता वैद्य रविदत्त जीः- राजेन्द्र जिज्ञासु

सेवाधन के धनी आर्य नेता वैद्य रविदत्त जीः-

ब्यावर के आर्य मन्दिर में एक रोगी, वयोवृद्ध महात्मा की दो आर्य पुरुष अत्यन्त भक्तिभाव से सेवा किया करते थे। उसे स्नान आदि सब कुछ ये ही करवाते थे। एक जैनी ने इनको सुधबुध खोकर सेवा करते कई बार देखा। एक दिन उसने आर्य सेवक वैद्य रविदत्त जी से कहा, ‘‘क्या मेरी अन्तिम वेला में भी ऐसी सेवा हो सकती है?’’ वैद्य जी ने कहा, ‘‘भाई, आपने इच्छा व्यक्ति की है तो आपकी भी अवश्य करेंगे।’’

उसने अपनी सपत्ति की वसीयत आर्य समाज के नाम कर दी। समय आया, वह रुग्ण हो गया। सभवतः शरीर में ….. पड़ गये। वैद्यजी अपने सैनिक ओमप्रकाश झँवर को साथ लेकर समाज मन्दिर में उसका औषधि उपचार तो करते ही थे, मल-मूत्र तक सब उठाते। मल-मल कर स्नान करवाते। संक्षेप से यह जो घटना दी है, यही तो स्वर्णिम इतिहास है। कहाँ किसी ने यह इतिहास लिखा है? स्कूलों, संस्थाओं व सपदा के वृत्तान्त का नाम इतिहास नहीं, इतिहास वही है, जो ऊर्जा का स्रोत है।

ठाकुर शिवरत्न जी पातूर: राजेन्द्र जिज्ञासु

ठाकुर शिवरत्न जी पातूरः-

विदर्भ में परतवाड़ा कस्बा में पंकज शाह नाम का एक सुशिक्षित युवक दूर-दूर तक के ग्रामों में प्रचार करवाता रहता है। इसी धुन का एक धनी युवक ठाकुर शिवरत्न इस क्षेत्र में ओम् पताका लेकर ग्राम-ग्राम घूमकर प्रचार करता व करवाता था। महर्षि दयानन्द के सिद्धान्तों को उसने जीवन में भी उतारा। वाणी से तो वह प्रचार करता ही था। वह एक प्रतिष्ठित सपन्न परिवार का रत्न था।
उसकी पुत्री विवाह योग्य हुई। उसने महात्मा मुंशीराम जी को अपना आदर्श मानकर जाति बंधन, प्रान्त बंधन तोड़कर अपनी पुत्री का विवाह करने की ठान ली। महात्मा मुंशीराम का ही एक चेला, कश्मीरी आर्य युवक पं. विष्णुदत्त विवाह के लिये तैयार हो गया। विष्णुदत्त सुयोग्य वकील, लेखक व देशभक्त स्वतन्त्रता सैनिक था। महाशय कृष्ण जी का सहपाठी था। ठाकुर जी को यह युवक जँच गया। आपने कन्या का विवाह कर दिया। ऐसा गुण सपन्न चरित्रवान् पति प्रत्येक कन्या को थोड़ा मिल सकता है!
हिन्दू समाज हाथ धोकर ठाकुर जी के पीछे पड़ गया। श्री ठाकुर शिवरत्न का ऐसा प्रचण्ड सामाजिक बहिष्कार किया गया कि उन्हें महाराष्ट्र छोड़कर पंजाब आना पड़ा। कई वर्ष पंजाब में बिताये, फिर महाराष्ट्र लौट गये। पातूर का कस्बा नागपुर के समीप है। संघ की राजधानी नागपुर है। हिन्दू समाज के कैंसर के इस महारोग जातिवाद से टक्कर लेने वाले पहले धर्म योद्धा ठाकुर शिवरत्न का इतिहास क्या संघ ने कभी सुनाया है? इतिहास प्रदूषण अभियान वालों ने ठाकुर शिवरत्न के कष्ट सहन व सामाजिक प्रताड़नाओं का प्रेरक इतिहास हटावट की सूली पर चढ़ा दिया है। मैं जीते जी ठाकुर शिवरत्न के नाम की माला फेरता रहूँगा।
– वेद सदन, अबोहर, पंजाब

जिगर का खून दे देकर ये पौधे हमने पाले हैंःराजेन्द्र जिज्ञासु

जिगर का खून दे देकर ये पौधे हमने पाले हैंः- एक बार माननीय डॉ. धर्मवीर जी ने आज पर्यन्त आर्यों पर चलाये गये अभियोगों का इतिहास क्रमशः प्रकाशित करने की घोषणा की थी। मैंने कई आर्य विद्वानों पर चलाये गये अभियोगों पर कई अंकों में लिखा था। किसी समाज ने, किसी सज्जन ने परोपकारी को कोई जानकारी न ोजी। मैंने भी लिाना बन्द कर दिया। आर्यों पर सर्वाधिक अभियोग मिर्जाइयों ने चलाये। किस-किस की चर्चा करूँ? मैंने दसवीं की परीक्षा दी थी या कॉलेज में प्रवेश पाया ही था कि रबे कादियाँ जी (इन्द्रजीत जी के कुल के एक निडर अद्भुत वक्ता) ने गुरुद्वारा गोबिन्दगढ़ (मन्दिर के साथ) कादियाँ में मिर्जाइयों का उत्तर देने के लिए एक जलसा किया था। रब जी का और मेरा भाषण हुआ। श्री राम शरण प्रेमी आर्य कवि की पुरजोश कवितायें हुईं। मिर्जाइयों ने धर्म निरपेक्षता की आड़ में हम तीनों को जेल भिजवाना चाहा। रब जी ने सूझबूझ से डी.सी. के सामने हम तीनों का पक्ष रखा। हमारा कुछ न बिगाड़ा जा सका। मेरे पिता जी को पता ही न चला कि मेरे ऊपर केस बनने वाला है।
कादियाँ में ऐसी घटनायें प्रायः घटती रही हैं। सन् 1996 में स्वामी सपूर्णानन्द जी ने पं. लेखराम जी के बलिदान पर मेरा खोजपूर्ण ओजस्वी भाषण करवाया। तब पुलिस सक्रिय हो गई। मुझे कम से कम दो वर्ष तक जेल में भिजवाने पर मिर्जाई तुले बैठे थे। स्वामी सपूर्णानन्द जी मेरे साथ जेल जाने को तैयार बैठे थे। हम फिर बच गये।
पं. निरञ्जनदेव जी पर और रब जी पर इसी विषय का कांग्रेस ने तुष्टीकरण व वोट बैंक के लिये लबा केस चलाकर दोनों को बहुत यातनायें दीं। हमने वे भी हँसते-हँसते सहीं। पं. शान्तिप्रकाश जी पर पं. लेखराम जी के बलिदान विषयक इल्हामों की शव परीक्षा पर ऐतिहासिक केस चला था। श्री महाशय कृष्ण सरीखे नेता पण्डित जी की पेशी पर लाहौर से गुरदासपुर आते रहे। स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी और दीवान बद्रीदास के कुशल नेतृत्व में आर्य समाज एक बार फिर अग्नि परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ। पं. शान्तिप्रकाश भट्टी से कुन्दन बनकर निकले। हाईकोर्ट से पण्डित जी बड़ी शान से केस जीत गये।
हाथों में हथकड़ियाँ, पाँवों में बेड़ियाँ डाली गईं। टाँगों में घावों के कारण लहू बह रहा था, तब जेल से बाहर आने पर झंग (पश्चिमी पंजाब) में रामचन्द्र जी (स्वामी सर्वानन्द जी) ने आपकी पट्टी की। किस-किस केस व अग्नि-परीक्षा का उल्लेख किया जावे? हमने लहू देकर वाटिका को सींचा है। रक्तरंजित इतिहास रचा है।
अब इतिहास प्रदूषणकार एक उठता है, वह मिर्जाइयों की बोली बोलकर लिखता है कि मिर्जाई मत का खण्डन पं. लेखराम का उद्देश्य था, जबकि पं. लेखराम जी ने सदा आत्म रक्षा में ही लिखा। यह कोर्टों व सरकार ने माना। ईद के दिन पण्डित जी की हत्या कतई नहीं हुई। यह मिर्जाई प्रचार सर्वथा मिथ्या है। एक मिर्जाई चैनल भी सुना है कि विदेश से यही प्रचार करता चला आ रहा है। उ.प्र. के कई युवकों ने उनके दुष्प्रचार का परोपकारी में उत्तर देने के लिए उनकी सामग्री भेजी है। उनके स्वर में स्वर मिलाकर ‘आर्य सन्देश’ के 28 मार्च के अंक में ईद के दिन पण्डित जी की हत्या होना लिखा है।
पं. देवप्रकाश जी, पं. शान्तिप्रकाशजी से लेकर राजेन्द्र जिज्ञासु तक हमारे विद्वानों ने इस विषय पर सहस्र्रों पृष्ठ लिखे हैं। आर्य सन्देश ने तो यह अनर्गल लेख देकर हम सबकी हत्या करके रख दी है। हम अपनी व्यथा किसे सुनावें? हम जानते हैं, ये लोग आर्य समाज पर दया नहीं करेंगे। हम फिर भी यही कहेंगे कि कोई इन्हें समझावे। जिगर का खून दे दे कर ये पौधे हमने पाले हैं।
रही उत्तर देने की बात। इस विषय पर मेरा छः सौ पृष्ठों का ग्रन्थ आर्यवीरों ने छपने को दे दिया है। इसमें उद्धृत पुस्तकों, पत्रिकाओं के सैंकड़ों प्रमाण पढ़कर विरोधी भी दंग रह जायेंगे। इस ग्रन्थ के प्रसार में पं. लेखराम जी विषयक सब मिथ्या विषैले लेखों का उत्तर मिल जायेगा। यह अपने विषय से सबन्धित अब तक का सबसे बड़ा और प्रमाणों से परिपूर्ण ग्रन्थ है।

‘‘मेरे लिये सन्ध्योपासना करिये?: राजेन्द्र जिज्ञासु

‘‘मेरे लिये सन्ध्योपासना करिये?

एक विचित्र प्रश्न उ.प्र. से किसी ने किया है-‘‘यदि मैं किसी से अपने लिये सन्ध्योपासना गायत्री जप या यज्ञ कराऊँ तो इसका पुण्य लाभ मुझे क्यों न मिलेगा?’’
ऐसे भाई यह बतायें कि आपके लिये व्यायाम कोई करे तो लाभ किसको मिलेगा? रोगी की बजाय उसका कोई भाई बन्धु औषधि का सेवन करे तो क्या रोगी रोगमुक्त होगा? एक पौराणिक ने हैदराबाद सत्याग्रह में जाने वाले एक आर्य को बड़ी श्रद्धा से कहा, ‘‘भाई! आप जेल में मेरे लिए गायत्री जप करते रहना। मैं चाररुपये सैंकड़ा के दर से तेरे घर पर भुगतान करता रहूँगा। मुझे तू यह सूचना पहुँचा देना कि कितना जप मेरे लिये किया है? यह घटना श्री मेहता जैमिनि जी को स्वयं उस आर्य ने अबाला में सुनाई। श्री ओमप्रकाश वर्मा जी को भी इसका ज्ञान होगा। उस आर्य ने सत्याग्रह में भाग लेकर यश पाया और गायत्री जप से कमाई भी कर ली। उसे पता था कि जप से गायत्री क्रय करने वाले को कोई लाभ नहीं होगा। अब उदूसरों के लिए यज्ञ करने वाले संगठन भी मैदान में आ गए हैं और लुभावनी घोषणाएँ कर रहे हैं। पाप पुण्य, धर्म-कर्म के लेन-देन का व्यापार तो याज्ञिकों पाठियों के लिए बहुत अच्छा है, परन्तु है तो वेद विरुद्ध।’’
वेद का आदेश उपदेश हैः-‘‘स्वयं यजस्व स्वयं जुषस्व।’’
स्वयं कर्म कर और स्वयं फल चख। यही कल्याणी शिक्षा है।

बड़ों की सेवा के प्रेरक प्रसंगः- राजेन्द्र जिज्ञासु

बड़ों की सेवा के प्रेरक प्रसंगः-

एक जन्मजात दुःखिया के दुष्प्रचार के प्रतिवाद के लिए हमने पूज्य विद्वान् महात्माओं की आर्यों द्वारा सेवा के कई दृष्टान्त देकर लिखा था कि आर्य समाज ने महात्मा आनन्द स्वामी जी आदि को अन्तिम वेला में फेंक दिया, ये सब घृणित व मिथ्या प्रचार हैं। ऐसे प्रचारकों ने आप तो जीवन भर कभी किसी की सेवा की नहीं, सस्ते उपदेश देते हैं।

महात्मा आनन्द भिक्षु जी के पुत्र जैमिनि जी ने भक्तों से घिरे अपने पिताजी को अन्तिम दिनों में सेवा का अवसर देने का अनुरोध किया। मेरे सामने महात्मा जी पर दबाव बनाया। सेवा उनकी हो ही रही थी। मैंने ऐसे किसी व्यक्ति को पूज्य मीमांसक जी और आचार्य उदयवीर जी के अन्तिम दिनों में उनके पास फटकते नहीं देखा था। कुछ लोग पं. युधिष्ठिर जी मीमांसक से श्री धर्मवीर जी, विरजानन्द जी आदि विद्वानों के मतभेद को उछालते रहे। मीमांसक जी ने अपनी अमूल्य बौद्धिक सपदा तो धर्मवीर जी को ही सौंपी। क्यों? मीमांसक जी के निधन पर केवल परोपकारिणी सभा से जुड़े विद्वान् ही रेवली पहुँचे। और सभायें भी पहुँचती तो अच्छा होता। मान्य विरजानन्द जी, श्रीमती ज्योत्स्ना ने पहुँचकर आर्य समाज की शोभा बढ़ाई। आचार्य सत्यानन्द जी वेदवागीश तथा यह सेवक भी वहाँ था। पहलेाी पता करने कई बार गये। पूज्यों को छोड़ने व फेंकने का प्रचार कोरी शरारत है।

जीव कर्म करने में स्वतन्त्र-विश्व ने मानाः-राजेन्द्र जिज्ञासु

इन्हीं दिनों एक लोकप्रिय हिन्दी दैनिक में एक विचारक का इस विषय पर लेख प्रकाशित हुआ। विनीत केवल शीर्षक ही पढ़ सका। लेख कहीं रखकर खो बैठा। उस लेखक के लेख के शीर्षक का तो भाव यह था कि सृष्टि में मनुष्य को ही कर्म करने या निर्णय लेने की स्वतन्त्रता है। देखा जाये तो यह कथन एक आंशिक सत्य है। वर्षों पूर्व लेखक ने मनोविज्ञान की पुस्तकों में पढ़ा था, आप घोड़े को जल के पास तो ले जा सकते हैं, परन्तु उसे धक्के से पानी नहीं पिला सकते। प्यास होगी तो वह अपनी इच्छा से जल पियेगा। इससे सिद्ध हुआ कि जीव मात्र को निर्णय लेने की-कर्म करने की स्वतन्त्रता है।
एक समय था, जब आर्यसमाजी विद्वानों को इस विषय पर शास्त्रार्थ करने पड़ते थे। मत-पंथों के ग्रन्थों में तो सब कुछ ईश्वरेच्छा अथवा अल्लाह की मर्जी का सिद्धान्त मिलता है। रही सही कमी शैतान द्वारा पाप करवाने की मान्यता से पूरी हो जाती है।
महर्षि दयानन्द ने धार्मिक जगत् में जीव की कर्म करने की स्वतन्त्रता का सिद्धान्त रखकर इस विषय में कई शास्त्रार्थ किये। इससे पूरे विश्व में हलचल मच गई। उसी युग में ‘विकासवाद’ का भौतिक दर्शन पूरे विश्व में चर्चित हुआ। इस मत नेाी परोक्ष रूप में जीव की कर्म करने की स्वतन्त्रता को स्वीकार किया। प्राकृतिक निर्वाचन का नियम विकासवाद का एक आधारभूत सिद्धान्त है। चुनाव करना कर्त्ता की स्वतन्त्रता को मानना है। जड़ प्रकृति तो विचार शून्य, इच्छा शून्य व क्रिया शून्य है। चेतन सत्ता ही चुनाव कर सकती है।
विश्व प्रसिद्ध लेखक श्री अनवर शेख ने यजदान (भगवान्) व शैतान के संवाद को काव्य में अत्युत्तम शैली में प्रस्तुत करते हुए महर्षि दयानन्द के एतद्विषयक दर्शन का डंका बजाया है। परोपकारी में इससे पहले भी लिखा जा चुका है कि पूरे विश्व की न्यायपालिका महर्षि के घोष ‘स्वतन्त्र कर्त्ता’ को स्वीकार कर रही है। अब शैतान व भगवान् को पाप (शर) व पुण्य (खैर) के लिये उत्तरदायी नहीं माना जाता। वैदिक दर्शन के विश्वव्यापी प्रभाव को समझकर आर्य समाज वेद प्रचार में पूरे दल बल से लगेगा तो यश मिलेगा। यह कार्य स्कूलों के बस का नहीं है। स्कूलों-कॅालेजों में वैदिक दर्शन को कौन जानता-मानता है?

सेवा कर्म कमाते रहेः- राजेन्द्र जिज्ञासु

सेवा कर्म कमाते रहेः- आर्य समाज के इतिहास से सेवा करने की कुछ स्वर्णिम घटनायें दी गईं। पाठकों ने कुछ ऐसे प्रेरक प्रसंग और देने का अनुरोध किया है। दिल्ली क्षेत्र के अथक व सफल प्रचारक स्वामी धर्मानन्द जी (करोलबाग वाले) जीवन की अन्तिम वेला में बहुत रुग्ण व असमर्थ हो गये। आर्य समाज शतादी महोत्सव पर मैंने श्री आचार्य विरजानन्द जी झज्जर को अपने एक दो साथियों सहित उनकी सेवा करते देखा। गर्म जल के लोटे भर-भर कर उन पर डालते जाते थे। वे हाथ हिलाने में असमर्थ थे। श्री विरजानन्द उनके शरीर को मल-मलकर स्नान करवाते मैंने देखे। कौन कहता है कि आर्य समाज अपने सपूतों व सेवकों को असमर्थ होने पर पूछता नहीं? जिन्होंने आप कभी किसी की सेवा नहीं की, वे आर्य समाज के अपयश के लिए ऐसा दुष्प्रचार करते हैं।
कुँवर सुखलाल जी आर्य समाज श्रद्धानन्द बाजार अमृतसर पधारे। तब श्री पं. सत्यपाल जी पथिक उस समाज के पुरोहित थे। ग्रीष्म ऋतु थी। मैं पूज्य कुँवर जी से मिलने व उन्हें सुनने कादियाँ से वहाँ पहुँचा। आर्य मन्दिर में प्रवेश करते ही एक हैण्ड पप हुआ करता था। कुँवर साहब हड्डियों का ढाँचा-सा थे, पर उनके कण्ठ में वही पहले-सा जादू था।
पथिक जी नल को चलाकर जल की बाल्टी भर कर बड़ी, श्रद्धा से कुँवर जी को ऐसे स्नान करवा रहे थे, जैसे कोई संस्कारी पोता दादा को मल-मल कर स्नान करवाता है। मैंने कहा, ‘‘पथिक जी, आप जल निकालें, अब मैं स्नान करवाता हूँ।’’ आपने कहा, ‘‘नहीं! आपके वस्त्र भीगेंगे। आप जल निकालकर देते जायें। स्नान मैं ही करवाऊँगा।’’ कुँवर जी के शरीर पर बर्छी, भालों व लाठियों के किये गये एक-एक घाव के निशान के बारे में पथिक जी पूछते जाते थे-यह निशान कब का है? कैसे घाव हुआ? कुँवर जी बताते जाते और हम सुन-सुनकर आनन्द रस का पान करते गये। मित्रो! सेवा करना सीखो। आपने कभी किसी पूज्य पुरुष की सेवा नहीं की तो आप यह विषैला प्रचार न किया करें कि सब आप जैसे ही हैं।