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एक ऐतिहासिक ईश्वर-प्रार्थना

एक ऐतिहासिक ईश्वर-प्रार्थना

(यह भजन एक लबे समय तक समाजों में भक्तिभाव से गाया जाता था। इसके रचयिता धर्मवीर महाशय रौनकराम जी ‘शाद’ भदौड़ (बरनाला) निवासी थे जिन्होंने बड़े तप, त्याग व कष्ट सहन करके आर्य समाज में एक नया इतिहास रचा था। काल कोठरी में भी वह नित्य प्रति अपना यह गीत मस्ती से गाया करते थे। उनकी मस्ती, चित्त की शान्ति से जेल रूप नर्क-स्वर्ग बन गया। राजेन्द्र ‘जिज्ञासु’)

हे जगत् पिता, हे जगत् प्रभु

मुझे अपना प्रेम और प्यार दे।

तेरी भक्ति में लगे मन मेरा,

विषय वासना को विसार दे।।

मुझे ज्ञान और विवेक दे,

मुझे वेदवाणी में दे श्रद्धा।

मुझे मेधा दे, मुझे विद्या दे,

मुझे बल दे और आरोग्यता।

मुझे आयु दे, मुझे पुष्टि दे,

मुझे शोभा लोक के मध्य दे।।

मुझे धर्म कर्म से प्रेम दे,

तजूँ सत्य को न कभी मैं।

कोई चाहे सुख मुझे दे घना,

कोई चाहे कष्ट हजार दे।।

कभी दीन होऊँ न जगत् में मैं,

मुझे दीजे सच्ची स्वतन्त्रता।

मेरे फंद पाप के काट दे,

मुझे दुःख से पार उतार दे।।

रहूँ मैं अभय न हो मुझको भय,

किसी मित्र और अमित्र से।

तेरी रक्षा पर मुझे निश्चय हो,

मेरे वह रूपन को तू टार दे।।

मुझे दुश्चरित से परे हटा,

सतचरित का भागी बना मुझे।

मेरे मन को वाणी को शुद्ध कर,

मेरे सकल कर्म सुधार दे।।

मेरा हृदय कष्ट भय रहित हो,

नित्य मिले मुझे शान्ति हर जगह।

मेरे शत्रुगण सुमति गहें,

कुमति को उनकी निवार दे।।

तेरी आज्ञा में मैं चलूँ सदा,

तेरी इच्छा में मैं झुका रहूँ।

कभी डूबे ‘शाद’ अधीरता में,

तो तू उसको भी उबार दे।।

ऐसी कृपा करो कि हम सब धर्मवीर हों

ऐसी कृपा करो कि हम सब धर्मवीर हों

– राजेन्द्र ‘जिज्ञासु’

हम में से किसी ने कभी सोचा ही नहीं कि माननीय डॉ. धर्मवीर जी हम से इतनी शीघ्र बिछड़ जायेंगे। मौत ने एक झपटा मार कर उन्हें हमसे छीन लिया। 6 अक्टूबर 2016 को प्रातः वह चल बसे। यह कहना तो ठीक नहीं कि वह मर गये। अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए आपने कर्त्तव्य-पथ पर प्राण त्याग दिये। हम कहेंगे कि श्री धर्मवीर जी मरे नहीं, प्रत्युत् आपने इस लोक में जीना बन्द कर दिया। मृत्यु के समय किसी से कोई संवाद नहीं किया।

डॉक्टरों को हाथ से संकेत करते हुए धैर्य रखने की प्रेरणा देते रहे। जो कुछ उन्होंने कण्ठाग्र कर रखा था, उसका चलते-फिरते यात्रा में भी पारायण करते रहते थे। देह-त्याग के समय भी कुछ बड़बड़ाते रहे। हॉस्पिटल जाते समय भी कह रहे थे ‘‘चले हम दयानन्द के स्थान पर’’ स्टेशन से लाते समय भी सेवकों को यही का ‘‘मुझे ऋषि उद्यान नहीं, श्मशान ले चलो।’’ उनका दाह कर्म वहीं किया गया, जहाँ महर्षि दयानन्द जी का अन्तिम संस्कार किया गया।

कर्मण्यता की मूर्त्ति, पुरुषार्थ-परमार्थ के पुतले डॉ. धर्मवीर जी का जीवन अत्यन्त घटनापूर्ण रहा है। वह इस विनीत को 60 वर्ष से जानते थे और मेरा उनसे गत 50 वर्ष से घनिष्ठ सामाजिक नाता था। मेरे नयनों के सामने उनके क्रियाशील, संघर्षमय जीवन की फिल्म घूम रही है। मुझे लिखने को कहा जाये तो मैं एक दम बिना किसी तैयारी के उनके जीवन के 250-300 प्रेरक प्रसंग लिख सकता हूँ। परोपकारी के विशेषाङ्क के लिए क्या लिखूँ और क्या छोडूँ?

वह ईश्वर से कोई ऐसा वरदान लेकर आये कि वह निरन्तर नया-नया इतिहास रचते रहे। जहाँ भी हाथ लगाया, एक सृष्टि रच दी। धर्मवीर जी किसी व्यक्ति की चाकरी नहीं करना चाहते थे, ध्येयनिष्ठ थे। इतिहास में ऐसे दृढ़ निश्चय वाले व्यक्ति ही स्थान पाते हैं।

गृहस्थी बने तो अपनी तीन मेधावी पुत्रियों की भाषा संस्कृत बनाई। इसे मातृभाषा तो कह नहीं सकते। उनकी पितृभाषा में उनके संवाद, वार्त्तालाप और व्याखयान सुनकर श्रोता झूम उठते थे। क्या धर्मवीर जी की निष्ठा, संस्कृत व संस्कृति प्रेम का यह कोई साधारण चमत्कार है?

धर्मवीर जी परोपकारिणी सभा के जब न्यासी बने, तब सभा का अस्तित्व रिकॉर्ड में तो था, परन्तु इतिहास में सभा को कौन जानता था? स्वामी सर्वानन्द जी महाराज, श्रीमान् गजानन्द जी आर्य तथा धर्मवीर जी ने इतिहास में इस सभा की पहचान बना दी। मैं लगभग आधी शताबदी से ऋषि मेले पर आ रहा हूँ। वर्षों पर्यन्त बिना बुलाए आया करता था। यहाँ चाय का कप पिलाने वाला, अल्पाहार पूछने-करवाने वाला कोई नहीं होता था। अब धर्मवीर युग में पूरा वर्ष अतिथियों को दूध, भोजन, सब कुछ मिलता है। इसका श्रेय हमारी इसी त्रिमूर्ति को जाता है।

स्नानागार यहाँ नहीं था। स्वामी सर्वानन्द जी की कोटि का संन्यासी गैलरी में ठहरते हमने देखा। बिस्तर, खाट, ततपोश की व्यवस्था नहीं थी। परोपकारिणी सभा को एक धर्मवीर मिला, तो करोड़ों-अरबों रुपये के भवन बनते गये। पुराने जीर्ण भवनों की नियमित मरमत होती रहती है। यह भिक्षा का भोजन करने वाले सर्वानन्द संन्यासी के आशीर्वाद, सेठ गजानन्द आर्य की सरलता, निर्मलता, संगठन, बुद्धि तथा धर्मवीर लेखराम के धर्मानुरागी योद्धा डॉ. धर्मवीर की आग, पुरुषार्थ, कर्मण्यता व ऊहा का चमत्कार है।

सर्वानन्द महाराज के चरण कमल यहाँ पड़े तो इन दोनों धर्मवीरों (गजानन्द आर्य व धर्मवीर आर्य) के पुण्य प्रताप से यहाँ गुरुकुल की वाटिका लहलहाने लगी। यहाँ महाशय चून्नीलाल चन्ननदेवी गोशाला की स्थापना से अतिथियों की, यात्रियों की, यतियों की, ब्रह्मचारियों की, सबकी दुग्धामृत, लस्सी, दही से सेवा होने लगी।

‘परोपकारी’ पत्रिका की प्रसार संखया जानते हो क्या थी? मात्र 400-500, बस। धर्मवीर समपादक बनते गये, तो वही परोपकारी देश-विदेश में फैलता जा रहा है। आज विरोधी, विधर्मी, अपने-बेगाने सब इसे चाव से पढ़ते हैं। परोपकारी मासिक से पाक्षिक हो गया। देश-विदेश में कोई भी वेद पर, ऋषि दयानन्द व आर्यसमाज पर, आर्य संस्कृति पर वार-प्रहार हो, परोपकारी बहुत सजगता से उत्तर देने को सजग रहता है। एक भी अंक ऐसा नहीं, जिसमें विरोधियों के आक्षेपों व आक्रमणों का युक्ति, तर्क व प्रमाण से हमारे विद्वान् अपनी ज्ञान प्रसूता धारदार लेखनी से उत्तर न देते हों।

यह सब डॉ. धर्मवीर आर्य की श्रद्धा, मेधा बुद्धि व ऋषि मिशन के लिए अखण्ड निष्ठा का चमत्कार है। धर्मवीर जी की इस नीति-रीति ने प्राणवीर पं. लेखराम, पं. गणपति शर्मा, पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय के स्वर्णिम अतीत को वर्तमान कर दिखाया है। उनकी इस सेवा को हमारे विरोधी तो जानते हैं, मानते हैं, आर्यसमाज भी जानता ही होगा।

परोपकारी ने ऋषि मिशन को ऐसे-ऐसे रत्न दिये हैं, जिनके सुदृढ़ कंधों पर आर्यसमाज के उज्जवल भविष्य का भार छोड़कर हमारे धर्मवीर जी ने हमसे विदाई ली है। मैं ऐसे किस-किस रत्न का नाम यहाँ गिनाऊँ। परोपकारिणी सभा के भक्त उदार दानी श्री पीताबर कमल जी-रामगढ़, श्री पंकज शाह-विदर्भ वाले, श्री अनिल आर्य-चामधेड़ा, हरियाण की सेना, राजस्थान से एक अनुभवी साहित्यकार श्री वेदप्रकाश आर्य और दूर दक्षिण से श्री रणवीर आर्य-तेलंगाना वाले समर्पित सेवक परोपकारी की ही देन हैं।

धर्मवीर जी की नीतिमत्ता का लोहा कौन नहीं मानेगा? परोपकारी धर्मरक्षा में सब विरोधी शक्तियों से टक्कर लेता ही रहता है। विरोधी हमारे किसी भी लेख पर केस करके हमें कोर्ट में नहीं घसीट सके। भले ही कुछ अपने घने सयानों ने अपना बुद्धि कौशल दिखाकर धर्मवीर जी व उनके सहयोगी आर्य पुरुषों पर अभियोग चलाकर यह कमी भी पूरी कर दी है।

हमारे धर्मवीर जी की लेखनी व वाणी पर आर्यसमाज के बाहर के बड़े-बड़े धर्माचार्य, शंकराचार्य भी मुग्ध होते देखे गये। इस धर्मवीर ने स्वामी श्रद्धानन्द, पूज्य महात्मा नारायण स्वामी, लौह-पुरुष स्वामी स्वतन्त्रानन्द का इतिहास दोहराते हुए, वेद-प्रचार करते हुए रणभूमि में ही प्राण त्यागे हैं। यह हमारे लिए अत्यन्त गौरव की बात है। अन्तिम श्वास लेने से पूर्व सेवा करने वाले ब्रह्मचारी योगेन्द्र आर्य जी से आग्रहपूर्वक रात्रि समय में कहा, ‘‘आप मेरी चिन्ता न करें। आप सो जायें। आप विश्राम करें।’’

धर्मवीर जी ने घर नहीं बनाया। अपने लिए कभी कुछ नहीं माँगा। न दक्षिणा माँगते हुए उन्हें देखा गया और न ही मार्ग व्यय की कहीं माँग की। घर घाट बनाने, धन कमाने की कतई चिन्ता नहीं की। जो कुछ कहीं से मिला, चुपचाप सभा को भेंट करते रहे। क्या-क्या घटना यहाँ दें?

श्रोता एक हों अथवा दो-तीन या सहस्रों, उन्हें इसकी कतई चिन्ता नहीं थी। गुरुवर स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी का यह नाम लेवा प्रतिवर्ष कुछ समय के लिए बिन बुलाये दूरस्थ प्रदेशों में, ग्रामों में, नगरों में, जहाँ आर्यसमाजें नहीं हैं या शिथिल हो चुकी हैं, मर चुकी हैं, जहाँ कोई विद्वान् नहीं जाता, वहाँ प्रचारार्थ पहुँच जाते। अपनी पत्नी को भी प्रचार यात्राओं पर लेकर निकलते रहे। कभी इस यात्री को और ओम् मुनि जी जैसे साथी को लेकर दूर-दूर निकले जाते थे। अब भी वर्ष 2017 में दो यात्राओं को निकालने की मुझे स्वीकृति चलभाष पर देकर कहा, ‘‘अजमेर आकर हम सब साथी बैठकर इनकी रूपरेखा बनायेंगे। आप यात्राओं की घोषणा कर दें।’’ मैंने कहा, ‘‘घोषणा तो आप या मुनि जी को ही करनी है। कौन-कौन साथ होगा, यह मिलकर निर्णय कर लेंगे।’’ इन यात्राओं के निकालने से पहले ही वह अन्तिम यात्रा पर निकल गये।

वैदिक पुस्तकालय के श्री गुप्ता जी ने कहा कि ‘मैंने तो ऐसा प्रधान कभी नहीं देखा, यदि वैदिक पुस्तकालय से साहित्य मँगवाने के लिये कोई पत्र उनको मिलता तो वह सेवक के हाथ मेरे पास नहीं पहुँचाते थे। मुझे भी अपने कार्यालय बुलवाकर ऐसे पत्र नहीं सौंपते थे। स्वयं मेरे टेबल पर आकर पत्र मुझे दिया करते थे।’ यह प्रसंग सुनाते हुए उनके नयन सजल हो गये।

आर्यसमाज की नाड़ी पर सदा इस वैद्य, विद्वान् व नेता का हाथ रहता था। उनको देशभर के समर्पित समाज सेवियों का अता-पता रहता था। वह सबकी चिन्ता करते थे। संन्यासी का, वानप्रस्थी का, ब्रह्मचारी का, विद्वान् का, सबका उन्हें ध्यान रहता था। आर्यसमाज में कौन जानता है कि डॉ. हरिश्चन्द्र जी की कोटि का वैज्ञानिक व विद्वान् मिशनरी अब तक 85 देशों में धर्म प्रचार कर चुका है। भूमण्डल प्रचारक मेहता जैमिनि जी के पश्चात् यह भी एक कीर्तिमान है। अपनी अमेरिका यात्रा से लौटकर धर्मवीर जी ने भाव-विभोर होकर मुझे यह जानकारी सविस्तार दी।

आन्ध्र से लौटकर मुझे बताया कि श्रीयुत् शत्रुञ्जय जी व डॉ. बाबूराव जी ने आई.आई.टी. में आर्यसमाज का अच्छा संगठन करके सुयोग्य युवक-युवतियों का निर्माण करके उन्हें सक्रिय किया है। इसी प्रकार देश-विदेश के कार्यकर्त्ताओं का वह पूरा पता रखते थे।

उनके व्यक्तित्व का एक अनुकरणीय पहलु यह था कि उन्होंने तीनों पुत्रियों का जाति बन्धन तोड़कर विवाह किया। कहना सरल है, परन्तु करना कठिन है। वह जातिवाद, प्रान्तवाद की सोच से बहुत ऊपर थे। निडरता, ऋषि भक्ति के गुण उनको बपौती से प्राप्त हुए। उनके पिता श्री पं. भीमसेन जी की सत्यवादिता व धर्मनिष्ठा को मराठवाड़ा के सब आर्य जानते-मानते थे। यही गुण हमने श्री धर्मवीर जी में देखे।

धर्म-प्रचार उनकी दुर्बलता बन चुका था। ट्रेन में यात्रा करते हुए वह सह यात्रियों में वेद की विचारधारा का सन्देश देने का अवसर हाथ से जाने नहीं देते थे। उठते-बैठते, सोते-जागते वह ऋषि मिशन के लिए ही सोचते थे।

उनके निधन से जो क्षति हुई है, वह अपूरणीय है। आओ! ईश्वर से यह प्रार्थना करेंः-

हे प्रेममय प्रभु! तुहीं सबके आधार हो।

तुम को परमपिता प्रणाम बार-बार हो।।

ऐसी कृपा करो कि हम सब धर्मवीर हो।

वैदिक पवित्र धर्म का जग में प्रचार हो।।

– वेद सदन, अबोहर, पंजाब-152116

 

परोपकारिणी सभा का शोध व प्रकाशन: राजेन्द्र जिज्ञासु

राजेन्द्र जिज्ञासु
परोपकारिणी सभा का शोध व प्रकाशन :- परोपकारिणी सभा अपने कर्त्तव्य पालन में निरन्तर आगे बढ़ रही है। जितनी आशायें मिशन का भविष्य लगाये हुए है, उसमें न्यूनता का रह जाना स्वाभाविक ही है। यह तथ्य तो इस घड़ी सबके सामने है कि जितने ऊँचे, कर्मठ व लोकप्रिय विद्वान् व सहयोगी युवक ब्रह्मचारी महात्मा इस सभा के पास हैं, इतने इस समय किसी भी संस्था के पास नहीं है। बारह मास और पूरा वर्ष प्रचार के लिए देश भर से माँग बनी रहती है।
वैदिक धर्म पर कहीं भी वार हो झट से आर्य जनता सभा प्रधान डॉ. धर्मवीर जी को पुकारने लगती है। विधर्मी जब वार-प्रहार करते हैं, तब हर मोर्चे पर परोपकारी ने विरोधियों से टक्कर ली। भारत सरकार ने पं. श्रद्धाराम पर पुस्तक छपवा कर ऋषि पर निराधार घृणित वार किये। पं. रामचन्द्र जी आर्य के झकझोरने पर भी कोई शोध प्रेमी और संस्था उत्तर देने को आगे न निकली। परोपकारिणी सभा ने ‘इतिहास की साक्षी’ पुस्तक छपवाकर नकद उत्तर दे दिया।
श्री लक्ष्मीचन्द्र जी आर्य मेरठ जैसे अनुभवी वृद्ध ने पूछा, ‘‘पं. श्रद्धाराम का ऋषि के नाम लिखा पत्र कहाँ है? मिला कहाँ से और कैसे मिला?’’
उन्हें बताया गया कि अजमेर आकर मूल देख लें। उसका फोटो छपवा दिया है। श्रीमान् विरजानन्द जी व डॉ. धर्मवीर जी के पुरुषार्थ से यह पत्र मिला है। इतिहास की साक्षी के अकाट्य प्रमाणों का कोई प्रतिवाद नहीं कर सका।
अब उ.प्र. की राजधानी से सभा को सूचना मिली है कि मिर्जाई अपने चैनल से पं. लेखराम व आर्यसमाज के विरुद्ध विष वमन कर रहे हैं। सभा उनकी भी बोलती बन्द करे। इस सेवक से भी सपर्क किया गया है। आर्य समाज क्या करता है? यह भी देखें। कौन आगे आता है? कोई नहीं बोलेगा, तो सभा अवश्य युक्ति, तर्क व प्रमाणों से उत्तर देगी। वैसे एक ग्रन्थ इसी विषय में छपने को तैयार है। प्रतीक्षा करें।

लक्ष्मीनारायण जी बैरिस्टर : – राजेन्द्र जिज्ञासु

लक्ष्मीनारायण जी बैरिस्टर :- ऋषि के पत्र-व्यवहार में एक ऋषिभक्त युवक लक्ष्मीनारायण का भी पत्र है। आप कौन थे? आपका परिवार मूलतः उ.प्र. से था। लाहौर पढ़ते थे। इनके पिता श्री आँगनलाल जी साँपला जिला रोहतक में तहसीलदार थे। आपके चाचा श्रीरामनारायण भी विद्वान् उत्साही आर्य युवक थे। लन्दन के आर्य समाज के संस्थापक मन्त्री श्री लक्ष्मीनारायण जी ही थे। इंग्लैण्ड में शवदाह की अनुमति नहीं थी। वहाँ चबा के राजा का एक नौकर (चन्दसिंह नाम था) मर गया। राजा तब फ्राँस में मौज मस्ती करने गया था। सरकार ने शव को लावारिस घोषित करके दबाने का निर्णय ले लिया।
श्री लक्ष्मीनारायण जी ने दावा ठोक दिया कि आर्यसमाज इस भारतीय का वारिस है। हम अपनी धर्म मर्यादाके अनुसार शव का दाह-कर्म करेंगे। वह शव लेने में सफल हुए। मुट्ठी भर आर्यों ने शव की शोभा यात्रा निकाली। अरथी पर ‘भारतीय नौकर की शव दाह यात्रा’ लिखा गया। सड़कों पर सहस्रों लोग यह दृश्य देखने निकले। प्रेस में आर्य समाज की धूममच गई। महर्षि के बलिदान के थोड़ा समय बाद की ही यह घटना है।
आर्यसमाज के सात खण्डी इतिहास के प्रत्येक खण्ड में इन्हें मुबई के श्री प्रकाशचन्द्र जी मूना का चाचा बताया गया है। यह एक निराधार कथन है। इसे विशुद्ध इतिहास प्रदूषण ही कहा जायेगा।
लक्ष्मीनारायण ऋषि के वेद भाष्य के अंकों के ग्राहक बने। आप पं. लेखराम जी के दीवाने थे। उनके लिखे ऋषि-जीवन के भी अग्रिम सदस्य बने थे। आप एक सच्चे, पक्के, स्वदेशी वस्तु प्रेमी देशभक्त थे। इंग्लैण्ड में आपके कार्यकाल में आर्य समाज की गतिविधियों के समाचार आर्य पत्रों में बड़े चाव से पढ़े जाते थे। ये सब समाचार मेरे पास सुरक्षित हैं। आपने मैक्समूलर को भी समाज में निमन्त्रण दिया, परन्तु वह आ न सका। और पठनीय सामग्री फिर दी जायेगी।

मिशनरियों के प्रहार व प्रश्नः- राजेन्द्र जिज्ञासु

मिशनरियों के प्रहार व प्रश्नः- पश्चिम से दो खण्डों में श्री राबर्ट ई. स्पीर नाम के एक ईसाई विद्वान् का एक ग्रन्थ छपा था। इसने महर्षि की भाषा को तीखा बताते हुए यह लिखा है कि आर्य विद्वानों की भाषा में तीखेपन का दोष लगाया है। ऋषि के तर्कों की मौलिकता व सूक्ष्मता को भी लेखक स्वीकार करता है। लेखक के पक्षपात को देखिये, उसने अन्य मत-पंथों के लेखकों व वक्ताओं के लेखों व पुस्तकों में आर्य जाति व आर्य पूर्वजों के प्रति अन्य मत-पंथों की अभद्र भाषा का संकेत तक कहीं नहीं दिया। ऋषि ने और आर्य विद्वानों ने कभी असंसदीय भाषा का प्रयोग नहीं किया। कठोर भाषा का प्रयोग किया तो क्यों?
विधर्मियों की भाषा के कितने दिल दुखाने वाले उदाहरण दिये जायें?
‘सीता का छनाला’ पुस्तक इस पादरी को भूल गई। मिर्जा गुलाम अहमद के ग्रन्थों में वर्णमाला के क्रम से कई लेखकों ने गालियों की सूचियाँ बनाई है। एक सिख विद्वान् ने उसकी एक पुस्तक को ‘गालियों का शदकोश’ लिखा है। पढ़िये मिर्जा की पंक्तियाँः-
लेखू मरा था कटकर जिसकी दुआ से आखिर
घर-घर पड़ा था मातम वाहे मीर्जा यही है
हमारे शहीद शिरोमणि को ‘लेखू’ लिखकर जिस घटिया भाषा का प्रयोग किया है, वह सबके सामने हैं। एक पादरी के बारे लिखा हैः-
इक सगे दीवाना लुधियाना में है
आजकल वह खर शुतर खाना में है
अर्थात् लुधियाना में एक पागल कुत्ता है। वह आजकल गधों व ऊँटों के बाड़े में है। कहिये कैसी सुन्दर भाषा है। ‘वल्द-उलजना’ यह अश्लील गाली उसने किस को नहीं दी। आश्चर्य है कि पादरी जी को ये सब बातें भूल गई। ऋषि पर दोष तो लगा दिया, उदाहरण एक भी नहीं दिया। ईसाई पादरियों ने क्या कमी छोड़ी? इनके ऐसे साहित्य की सूची भी बड़ी लबी है। कभी फिर चर्चा करेंगे।
दुर्भाग्य से आर्यसमाज में नये-नये शोध प्रेमी तो बढ़-चढ़ कर बातें बनाने वाले दिखाई देते हैं, परन्तु मिर्जाइयों के चैनल का नोटिस लेने से यह शोध प्रेमी क्यों डरते हैं? यह पता नहीं। कोई बात नहीं। हमारी हुँकार सुन लीजियेः-
रंगा लहू से लेखराम के रस्ता वही हमारा है।
परमेश्वर का ज्ञान अनादि वैदिक धर्म हमारा है।।
इनको जान प्यारी है। ये लोग नीतिमान हैं।

ऋषि-जीवन पर विचारः- राजेन्द्र जिज्ञासु

ऋषि-जीवन पर विचारः-
परोपकारी में तो समय-समय पर ऋषि-जीवन की विशेष महत्त्वपूर्ण शिक्षाप्रद घटनाओं को हम मुखरित करते ही रहते हैं, सभा द्वारा ऐसी कई पुस्तकें भी प्रकाशित प्रचारित हो रही हैं। ऋषि-जीवन का पाठ करिये। चिन्तन करिये। ‘‘इसे पुस्तक मानकर मत पढ़ा करें। यह यति योगी, ऋषि, महर्षि का जीवन है।’’ यह पूज्य स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी का उपदेश है। क्या कभी जन-जन को सुनाया बतायाः-
1. ऋषि के सबसे पहले और सबसे बड़े भक्त, जो अन्त तक सेवा करते रहे, वे छलेसर के ठाकुर मुकन्दसिंह, ठा. मुन्नासिंह व ठाकुर भोपालसिंह जी थे।
2. अन्तिम वेला में सबसे अधिक सेवा ठाकुर भोपालसिंह जी ने की। ला. दीवानचन्द जी ने लिखा है कि जोधपुर में जसवन्तसिंह, प्रतापसिंह और तेजसिंह एक बार भी पता करने नहीं पहुँचे थे।
3. ऋषि जीवन चरित्र में जिस परिवार के सर्वाधिक सदस्यों की बार-बार चर्चा आती है, वह छलेसर का यही कुल था। स्वदेशी का बिगुल ऋषि ने छलेसर से ही फूँका था। आर्यो! जानते हो कि ऊधा ठाकुर भोपाल सिंह जी का पुत्र था।
4. ऋषि के पत्र-व्यवहार में इसी परिवार की-इसी त्रिमूर्ति की बार-बार चर्चा है, दूसरा ऐसा परिवार मुंशी केवलकृष्ण जी का हो सकता है, परन्तु उनके नाम हैं, प्रसंग थोड़े हैं।
5. आर्यो! जानते हो दिल्ली दरबार में ऋषि के डेरे की व्यवस्था छलेसर वालों ने ही की थी। ठा. मुकन्दसिंह आदि सब दिल्ली में महाराज के साथ आये थे।
6. हमारे मन्त्री ओम्मुनि जी की उत्कट इच्छा थी। हम यत्नशील थे। लो देखो! कूप ही प्यासे के पास आ गया। ठाकुर मुन्नासिंह जी की वंशज डॉ. अर्चना जी इस समय ऋषि उद्यान में पधारी हैं। आप गुरुकुल में दर्शन पढ़ रही हैं। सपूर्ण आर्यजगत् के लिए डॉ. अर्चना की यह ऋषि भक्ति व धर्म भाव गौरव का विषय है।

पादरियों की शंका या आपत्ति- राजेन्द्र जिज्ञासु

पादरियों की शंका या आपत्ति :-

तीनों पदार्थों को अनादि माना जावे तो फिर ईश्वर का जीवन व प्रकृति पर नियन्त्रण कैसे हो सकता है? इस आपत्ति का कई बार उत्तर दिया जा चुका है। आयु के बड़ा-छोटा होने से नियन्त्रण नहीं होता। अध्यापक का शिष्यों पर, बड़े अधिकारी का अपने अधीनस्थ कर्मचारियों पर नियन्त्रण अपने गुणों व सामर्थ्य से होता है। प्रधानमन्त्री युवक हो तो क्या आयु में बड़े नागरिकों से बड़ा नहीं माना जाता? उसका आदेश सबके लिये मान्य होता है, अतः यह कथन या आपत्ति निरथर्क है।

इसी प्रकार जीव की कर्म करने की स्वतन्त्रता के आक्षेप को समझना चाहिये। विकासवाद की दुहाई देने वालों का यह आक्षेप भी व्यर्थ है। जब जड़ प्रकृति में प्राकृतिक निर्वाचन का नियम कार्य करता है, तो निर्वाचन की स्वतन्त्रता तो आपने मान ली। निर्वाचन वही करेगा, जो स्वतन्त्र है। मनोविज्ञान का सिद्धान्त कहता है घोड़े को आप जल के पास तो ले जा सकते हैं, परन्तु जल पीने के लिए वह बाधित नहीं किया जा सकता। इसमें वह स्वतंत्र है। जीव की स्वतन्त्रता तो व्यवहार में पूरा विश्व मान रहा है। वे दिन गये जब सब अल्लाह की इच्छा चलती थी या शैतान दुष्कर्म करवाता था, फिर तो कोई मनुष्य न पापी माना जा सकता है और न ही महात्मा।