Category Archives: Pra Rajendra Jgyasu JI

वे ऐसे व्यक्ति थे

वे ऐसे व्यक्ति थे

1908 की घटना होगी। पंजाब विश्वविद्यालय सेनिट के चुनाव हुए। डी0ए0वी0 कॉलेज लाहौर के प्राचार्य महात्मा हंसराजजी को भी प्रबन्ध समिति ने चुनाव के अखाड़े में उतरने के लिए कहा।

वे पहले भी सेनिट के सदस्य थे। उन्होंने चुनाव लड़ा, परन्तु सेनिट के चुनाव में हार गये।

उन दिनों डी0ए0वी0 कॉलेज की एक पत्रिका निकला करती थी। उसमें कॉलेज के समाचार भी छपा करते थे। एक समाचार यह भी छपा कि कॉलेज के प्राचार्य हंसराज चुनाव हार गये हैं।

पाठकवृन्द! ज़्या आज कोई छोटा-बड़ा व्यक्ति चुनाव हार जाने पर अपनी ही पत्रिका में ऐसा समाचार देने का नैतिक साहस दिखा सकता है? आज तो शिक्षा-व्यापार जगत् के इन लोगों से ऐसी आशा नहीं की जा सकती।

महापुरुषों की रीति

महापुरुषों की रीति

सार्वदेशिक सभा की बैठक थी। महात्मा नारायण स्वामीजी प्रधान थे। पण्डित चमूपति जी महाराज उठकर कुछ बोले। महात्माजी आवेश में थे। बोले-‘‘बैठ जाओ, तुज़्हें कुछ पता नहीं।’’

आचार्य प्रवर पण्डित चमूपति चुपचाप बैठ गये। बैठक समाप्त हुई। महात्माजी एक ऊँचे साधक थे। उनके मन में विचार आया कि उनसे कितनी भयङ्कर भूल हुई है। आचार्य चमूपति सरीखे

अद्वितीय मेधावी विद्वान् को यह ज़्या कह दिया?

महात्माजी आचार्यजी के पास गये। नम्रता से कहा- ‘‘पण्डितजी मुझसे बड़ी भूल हुई। मैं आवेश में था। सभा-सञ्चालन में कई बार ऐसा हो ही जाता है। मैंने आवेश में आकर कह दिया-

‘‘तुज़्हें कुछ पता नहीं या तुज़्हें ज़्या आता है।’’

आचार्य प्रवर चमूपति बोले, ‘‘ऐसी कोई बात नहीं, आपने ठीक ही कहा। आपको कहने का अधिकार है। आप हमारे ज्ञानवृद्ध, वयोवृद्ध, महात्मा व त्यागी-तपस्वी नेता हैं।’’

दोनों महापुरुषों में इस प्रकार की बातचीत हुई। पाठकगण! इस घटना पर गज़्भीरता से विचार करें। दोनों महापुरुषों की बड़ह्रश्वपन व नम्रता से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। सङ्गठन की सुदृढ़ता के लिए ऐसे सद्भावों का होना आवश्यक है। आचार्य चमूपतिजी ने ही ‘सोम-सरोवर’ ग्रन्थरत्न में लिखा है कि संशय में बिखेरने की शक्ति तो है, जोड़ने व पिरोने की नहीं। आज अहं के कारण, पदलालसा व सन्देह के कारण कितने व्यक्ति हमारे सङ्गठन को बिखेरने

में लगे हुए हैं। आइए, जोड़ने की कला सीखें।

गृहस्थ ने मुझे छोड़ दिया

गृहस्थ ने मुझे छोड़ दिया

मुझे अच्छी प्रकार से याद है कि 1949 ई0 में मैंने पूज्य महात्मा नारायण स्वामीजी की जीवनी (आत्मकथा) में यह पढ़ा था कि महात्माजी को अपनी विधवा माता के आग्रह पर बचपन में

विवाह की स्वीकृति देनी पड़ी। पन्द्रह वर्ष की आयु में नारायणप्रसाद (नारायण स्वामीजी का पूर्व नाम) गृहस्थी बन गये, परन्तु पत्नी को पाँच वर्ष तक मायके में ही रज़्खा। बीस वर्ष के हो गये तो पत्नी उनके पास आ गई।

महात्माजी ने आत्म-चिन्तन करते हुए निश्चय किया कि पाँच वर्ष पहले गृहस्थी बना हूँ तो दस वर्ष पूर्व अर्थात् चालीस वर्ष की अवस्था में गृहस्थ छोड़ दूँगा। जब नारायणप्रसाद चालीस वर्ष के

हुए तो उनकी पत्नी का देहान्त हो गया। आपने स्वेच्छा से गृहस्थ को अभी छोड़ा नहीं था।

महात्माजी ने स्वयं आत्मकथा में लिखा है कि मैंने गृहस्थ को नहीं छोड़ा, गृहस्थ ने स्वयं मुझे छोड़ दिया। इस प्रकार मेरा पुराना संकल्प अपने-आप पूरा हो गया। शज़्द चाहे कुछ भी लिखे हों,

परन्तु भाव यही है।

कितने सत्यनिष्ठ थे वे लोग! कैसी सरलता से अपनी मनःस्थिति का वर्णन किया है। अपने इसी शुद्ध धर्मज़ाव से वे ऊँचे उठते गये।

एक आपबीती

एक आपबीती

मैं स्कूल का अध्यापक था। मेरे लेखों के कारण तथा सामाजिक गतिविधियों के कारण आर्यजगत् के बहुत लोग मुझे जानते थे। हिन्दी सत्याग्रह के पश्चात् मैं स्कूल छोड़कर दयानन्द कॉलेज हिसार की एम0ए0 कक्षा में प्रविष्ट हो गया। कॉलेज के प्राचार्य थे

प्रिं0 ज्ञानचन्द्रजी (स्वामी मुनीश्वरानन्दजी) हिसारवाले। वे यदा-कदा मुझे व्याज़्यान तथा प्रचार के लिए भी, कभी कहीं जाने को कह देते। कॉलेज में प्रविष्ट हुए एक-दो सप्ताह ही बीते कि उन्होंने आर्यसमाज, माडल टाउन के साप्ताहिक सत्संग में मेरा व्याज़्यान रख दिया। वे स्वयं माडल टाऊन में ही रहते थे।

व्याज़्यान से वे प्रभावित हुए। सत्संग के पश्चात् मुझे अपने घर पर भोजन के लिए कहा। मैं उनके साथ चला गया।

वे स्वयं मुझे भोजन करवाने लगे। मैंने कहा कि आप भी बैठिए। मेरे बहुत कहने पर भी प्रिंसिपल साहब न माने। घर पर सेवक भी था। उसे भी भोजन न लाने दिया। स्वयं ही परोसने लगे।

मुझे प्रतिष्ठित अतिथि बनाकर एक ओर बैठकर आर्यसमाज विषयक चर्चाएँ करते रहे। मैं इस दृश्य को कभी नहीं भूल पाता।

अरे यह कुली महात्मा

अरे यह कुली महात्मा

बहुत पुरानी बात है। आर्यसमाज के विज़्यात और शूरवीर संन्यासी, शास्त्रार्थ महारथी स्वामी श्री रुद्रानन्दजी टोबाटेकसिंह (पश्चिमी पंजाब) गये। टोबाटेकसिंह वही क्षेत्र है, जहाँ आर्यसमाज के एक मूर्धन्य विद्वान् आचार्य भद्रसेनजी अजमेरवालों का जन्म हुआ। स्टेशन से उतरते ही स्वामीजी ने अपने भारी सामान के लिए कुली, कुली पुकारना आरज़्भ किया।

उनके पास बहुत सारी पुस्तकें थीं। पुराने आर्य विद्वान् पुस्तकों का बोझा लेकर ही चला करते थे। ज़्या पता कहाँ शास्त्रार्थ करना पड़ जाए।

टोबाटेकसिंह स्टेशन पर कोई कुली न था। कुली-कुली की पुकार एक भाई ने सुनी। वह आर्य संन्यासी के पास आया और कहा-‘‘चलिए महाराज! मैं आपका सामान उठाता हूँ।’’ ‘‘चलो

आर्यसमाज मन्दिर ले-चलो।’’ ऐसा स्वामी रुद्रानन्द जी ने कहा।

साधु इस कुली के साथ आर्य मन्दिर पहुँचा तो जो सज्जन वहाँ थे, सबने जहाँ स्वामीजी को ‘नमस्ते’ की, वहाँ कुलीजी को ‘नमस्ते महात्मा जी, नमस्ते महात्माजी’ कहने लगे। स्वामीजी यह देख कर चकित हुए कि यह ज़्या हुआ! यह कौन महात्मा है जो मेरा सामान उठाकर लाये।

पाठकवृन्द! यह कुली महात्मा आर्यजाति के प्रसिद्ध सेवक महात्मा प्रभुआश्रितजी महाराज थे, जिन्हें स्वामी रुद्रानन्दजी ने प्रथम बार ही वहाँ देखा। इनकी नम्रता व सेवाभाव से स्वामीजी पर

विशेष प्रभाव पड़ा।

न जान, न पहचान-फिर भी

न जान, न पहचान-फिर भी

एक बार पूज्य स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी महाराज अपने भज़्त वैद्य तिलकराम जी ब्रह्मचारी के औषधालय उन्हें मिलने गये। तब वैद्य जी भीतर रोगियों को देखने में व्यस्त थे। कुछ रोगी बाहर के कमरे में अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे। वहीं एक बैंच पर लेटा हुआ एक रोगी शिर दर्द से हाय हाय कर रहा था। दर्द के मारे आँखें भी नहीं खोल सकता था। स्वामी जी उसके पास ही बैठे थे।

उसकी व्याकुलता देखकर आपने उसका सिर दबाना आरज़्भ कर दिया। कुछ ही मिनटों में उसे कुछ चैन आया। उसने आँखें खोलीं।

एक प्रतापी साधु को सिर दबाते देखकर बोला, महात्मन! यह ज़्या कर रहे हैं? मुझ साधारण व्यज़्ति का सिर……। महाराज बोले, ‘‘जो बड़े छोटों की सेवा नहीं करेंगे तो छोटों को सेवा करना कैसे आएगा?’’

वे हँसी में भी कभी झूठ नहीं बोलते थे

वे हँसी में भी कभी झूठ नहीं बोलते थे

पण्डित श्री चमूपतिजी की धर्मपत्नी ने अपनी एक सखी व घरवालों से कह दिया कि अमुक दिन पण्डित चमूपतिजी मुझे लेने आएँगे, मेरा शरीर छूट जाएगा। वे ठीक-ठाक थीं। कोई रोग नहीं

था, परन्तु मृत्यु के स्वागत के लिए वे तैयार होकर बैठ गईं।

वह दिन आ गया। दस बजे, ग्यारह बजे और बारह बज गये। सबने कहा कि ज़्यों मौत की सोचती हो? आपको कुछ नहीं होता।

आप ठीक-ठाक हैं। आप नहीं मरेंगी, परन्तु पण्डित चमूपतिजी की पत्नी की एक ही रट थी कि मुझे स्वप्न में पण्डितजी ने कहा है कि तैयार रहना, मैं अमुक दिन तुज़्हें लेने आऊँगा। पण्डितजी तो भी हँसी-विनोद में भी कभी झूठ नहीं बोलते थे, अतः उनकी बात टल नहीं सकती।

और ऐसा ही हुआ। सायंकाल तक पण्डितजी की धर्मपत्नी की मृत्यु हो गई।

मैंने स्वामी सर्वानन्दजी महाराज से इस घटना के सैद्धान्तिक विवेचन के लिए कहा तो आपने कहा कि पण्डितजी लेने आएँगे या वे लेने आये इसका कोई दार्शनिक आधार नहीं है। सर्वव्यापक

सर्वशक्तिमान् परमेश्वर किसी की सहायता नहीं लेता। स्वप्न को इस रूप में लेना ठीक नहीं है। इस घटना का कारण मनोवैज्ञानिक है। पण्डितजी की पत्नी के मन में यह पक्का विश्वास था कि उनके पति सदा सत्य ही बोलते हैं। इसी विश्वास के कारण वह मर गईं।

हम प्रायः देखते हैं कि कई बार डाज़्टरों, वैद्यों के मुख से अपनी मौत की सज़्भावना की बात कान में पड़ते ही रोगी मर जाते हैं।

यह तो हुआ इस घटना का सिद्धान्तपक्ष, परन्तु इस घटना का दूसरा पक्ष यह है कि उस महापुरुष का जीवन कितना निर्मल था कि उनकी पत्नी डंके की चोट से कहती हैं कि वे तो कभी हँसी में भी झूठ नहीं बोलते थे। उनकी सत्यवादिता की ऐसी गहरी छाप!