Category Archives: Pra Rajendra Jgyasu JI

शव का दाह-कर्म ही होगा

शव का दाह-कर्म ही होगा

मारीशस में सरकारी नियमानुसार किसी शव का दाह-कर्म नहीं किया जा सकता था। बीसवीं शताज़्दी के आरज़्भ की घटना है कि मारीशस में एक सैनिक टुकड़ी आई। इनमें से किसी की मृत्यु हो गई। नियमानुसार उसे दबाने के लिए कहा गया। आर्यवीर सैनिकों ने ऐसा करने से इन्कार कर दिया। सरकार ने पुलिस की सहायता से शव को भूमि में गाड़ना चाहा, परन्तु ये सैनिक विद्रोह पर तुल गये। सरकार को ललकारा-देखते हैं कि हमारा शव कौन छूता है? सरकार झुक गई। आर्यों की मारीशस में यह पहली बड़ी जीत थी। मारीशस में यह प्रथम दाह-कर्म था।

यही लोग जाते-जाते सत्यार्थप्रकाश की एक प्रति दो-एक मित्रों को दे गये। आर्यसमाज का बीज बोनेवाले यही थे। आज तो- लहलहाती है खेती दयानन्द की।

निश्चय ही ये सब लोग नींव के पत्थर थे। कृतज्ञता इस बात की माँग करती है कि मैं पाठकों को यह स्मरण कराऊँ कि स्वामी स्वतन्त्रानन्दजी महाराज केवल सेनानी के रूप में ही इतिहास

बनानेवाले न थे, अपितु इतिहास के गज़्भीर विद्वान् तथा इतिहास को सुरक्षित करनेवाले भी थे। मारीशस को भारत से जोड़नेवाले, इस द्वीप के महज़्व को समझने व समझानेवाले तथा इसका इतिहास व भूगोल लिखनेवाले वे प्रथम भारतीय विद्वान् व नेता थे। उस दूरदर्शी साधु की दृष्टि ने तब मारीशस का महज़्व जाना जब भारत के सब राजनैतिक नेता गहरी नींद में सोये हुए थे। यह उपर्युक्त सब सामग्री उन्हीं की पुस्तक से ली गई है।

1मारीशस में आर्यसमाज

1मारीशस में आर्यसमाज

जब सैनिक विद्रोह पर तुल गये पूज्यपाद स्वामी स्वतन्त्रानन्दजी महाराज ने लिखा है, ‘‘मारीशस

में आर्यसमाज की स्थापना उसी भाँति हुई जैसे हवा कहीं से किसी बीज को उड़ाकर ले-जाए और किसी दूर की भूमि पर जा पटके और वह बीज वहाँ ही उग आये।’’ मारीशस में आर्यसमाज का बीज बोने और उसे अंकुरित करनेवाले महारथी थे-श्री रामशरणजी मोती, वीर खेमलालजी वकील, श्री केहरसिंह (गाँव चिदा, जिला फिरोज़पुर, पञ्जाब), श्रीरामजीलाल तथा श्री चुन्नीलाल आदि (चीमनी ज़िला हिसार, हरियाणा के) श्री लेखरामजी (आदमपुर गाँव, ज़िला हिसार, हरियाणा), श्री हरनाम सिंह (झज्झर, हरियाणा के), श्री मंसासिंहजी जालन्धर, ज़िला पञ्जाब के तथा श्री गुरप्रसाद गोपालजी आदि मारीशस-निवासी थे।

श्री रामशरणजी मोती ने पञ्जाब से कुछ पुस्तकें मँगवाई थीं। उनमें रद्दी में आर्यपत्रिका लाहौर के कुछ पन्ने थे। इन्हें पढ़कर वे प्रभावित हुए। उस दुकानदार से उन्होंने ‘आर्यपत्रिका’ का पता

लगाया। इस पत्रिका को पढ़ते-पढ़ते वे आर्यसमाजी बन गये। साहस के अङ्गारे वीर खेमलालजी के आर्य बनने की कहानी विचित्र है। एक सैनिक टोली मीराशस आई। उनमें कुछ आर्यपुरुष

भी थे। उनकी बदली हो गई। जाते-जाते वे कुछ पुस्तकें वहीं दे गये। श्री भोलानाथ हवलदार एक सत्यार्थप्रकाश की प्रति श्री खेमलाल को दे गये।

श्री जेमलाल सत्यार्थप्रकाश पढ़कर दृढ़ आर्य बन गये। श्री रामशरण मोती ने रिवरदी जाँगील में आर्यसमाज का आरज़्भ किया तो ज़ेमलालजी ने मारीशस की राजधानी पोर्ट लुइस व ज़्यूर

पाइप में वेद-ध्वजा फहरा दी। पोर्ट लुइस के आर्यपुरुष एक होटल में एकत्र होते थे। ये लोग पाखण्ड-ज़ण्डन खूब करते थे। पोप शज़्द तो सत्यार्थप्रकाश में है ही। वीतराग स्वामी स्वतन्त्रानन्दजी महाराज ने लिखा है कि इन धर्मवीरों ने पोप के अनुयायियों के लिए ‘पोपियाँ’

शज़्द और गढ़ लिया।

मेरी पाठकों से, आर्य कवियों से व लेखकों से सानुरोध प्रार्थना है कि मारीशस के उन दिलजले दीवानों की स्मृति को स्थिर बनाने के लिए पोप के चेलों के लिए ‘पोपियाँ’ शज़्द का ही प्रयोग किया करें। इस शज़्द को साहित्य में स्थायी स्थान देना चाहिए। अभी से गद्य के साथ पद्य में भी इस अद्भुत शज़्द के प्रयोग का आन्दोलन मैं ही आरज़्भ करता हूँ-

विश्व ने देखा कि पोपों के सभी गढ़ ढह गये।

पोप दल और पोपियाँ सारे बिलखते रह गये॥

वेद के सद्ज्ञान से फिर लोक आलोकित हुआ।

मस्तिष्क मन मानव का जब फिर धर्म से शोभित हुआ॥

‘आर्यसमाज के नियम’1

‘आर्यसमाज के नियम’1

1904 ई0 में आर्यसमाज टोहाना की स्थापना हुई। शीघ्र ही यह नगर वैदिक धर्मप्रचार का भारत-विज़्यात केन्द्र बन गया। नगर तथा समीपवर्ती ग्रामों में भी शास्त्रार्थ होते रहे। 1908 ई0 में टोहाना में एक भारी शास्त्रार्थ हुआ। पौराणिकों की ओर से पण्डित श्री लक्ष्मीनारायणजी बोले। आर्यसमाज की ओर से पण्डित श्री राजाराम डी0ए0वी0 कालेज, लाहौर के प्राध्यापक ने वैदिक पक्ष रखा।

शास्त्रार्थ के प्रधान थे श्री उदमीराम पटवारी। पण्डित राजारामजी ने पूछा ‘‘शास्त्रार्थ किस विषय पर होगा?’’ पं0 लक्ष्मीनारायण जी ने कहा-‘‘आर्यसमाज के नियमों पर।’’

पण्डित राजारामजी ने कहा, हमारे नियम तो आप भी मानते हैं। शास्त्रार्थ तो ऐसे विषय पर ही हो सकता है जिसपर आपका हमसे मतभेद हो। ऐसे चार विषय हैं-(1) मूर्ज़िपूजा (2) मृतक-

श्राद्ध, (3) वर्णव्यवस्था और (4) विधवा-विवाह।’’

पौराणिक पण्डित ने कहा ‘‘हम आपका एक भी नियम नहीं मानते।’’ सूझबूझ के धनी पण्डित राजारामजी ने अत्यन्त शान्ति से शास्त्रार्थ के प्रधान श्री उदमीरामजी पटवारी से कहा-‘‘ज़्यों जी!

आप हमारा कोई भी नियम नहीं मानते?’’ पटवारीजी ने भी आर्यसमाज के प्रति द्वेष के आवेश में आकर कहा-‘‘हम आर्यसमाज का एक भी सिद्धान्त नहीं मानते।’’

पण्डित राजारामजी ने कहा-‘‘लिखकर दो।’’

पटवारीजी ने अविलज़्ब लिखकर दे दिया। पण्डित राजारामजी ने उनका लिखा हुआ सभा में पढ़कर सुना दिया कि हम आर्यसमाज का एक भी सिद्धान्त नहीं मानते। तब पण्डित राजारामजी ने श्रोताओं को सज़्बोधित करते हुए कहा, आर्यसमाज का सिद्धान्त है ‘वेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।’

पौराणिकों का मत यह हुआ कि न वेद को न पढ़ना न पढ़ाना, न सुनना न सुनाना। आर्यसमाज का नियम है ‘सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए।’ पौराणिक मत का सिद्धान्त बना ‘असत्य को स्वीकार करने व सत्य के परित्याग में सदैव तत्पर रहना चाहिए।’

श्रोताओं को पण्डित राजारामजी की युक्ति ने जीत लिया। इस शास्त्रार्थ ने कई मनुष्यों के जीवन की काया पलट दी।

आर्यसमाज के अद्वितीय शास्त्रार्थ महारथी श्री मनसारामजी पर कुछ-कुछ तो पहले ही वैदिक धर्म का प्रभाव था, इस शास्त्रार्थ को सुनकर तरुण मनसाराम के जीवन में एकदम नया मोड़ आया और उसने अपना जीवन ऋषि दयानन्द के उद्देश्य की पूर्ति के लिए समर्पित कर दिया। पटवारी उदमीरामजी की सन्तान ने आगे चलकर वैदिक धर्म के प्रचार में अपने-आपको लगा दिया। आर्यसमाज नयाबाँस दिल्ली के श्री दिलीपचन्दजी उन्हीं पटवारीजी के सुपुत्र थे।

ऐसे दिलजले उपदेशक!

ऐसे दिलजले उपदेशक!

बहुत पुरानी बात है। देश का विभाजन अभी हुआ ही था। करनाल ज़िला के तंगौड़ ग्राम में आर्यसमाज का उत्सव था। पं0 शान्तिप्रकाशजी शास्त्रार्थ महारथी, पण्डित श्री मुनीश्वरदेवजी आदि

कई मूर्धन्य विद्वान् तथा पण्डित श्री तेजभानुजी भजनोपदेशक वहाँ पहुँचे। कुछ ऐसे वातावरण बन गया कि उत्सव सफल होता न दीखा। पण्डित श्री शान्तिप्रकाशजी ने अपनी दूरदर्शिता तथा अनुभव से यह भाँप लिया कि पण्डित श्री ओज़्प्रकाशजी वर्मा के आने से ही उत्सव जम सकता है अन्यथा इतने विद्वानों का आना सब व्यर्थ रहेगा।

पण्डित श्री तेजभानुजी को रातों-रात वहाँ से साईकिल पर भेजा गया। पण्डित ओज़्प्रकाशजी वर्मा शाहबाद के आस-पास ही कहीं प्रचार कर रहे थे। पण्डित तेजभानु रात को वहाँ पहुँचे।

वर्माजी को साईकल पर बिठाकर तंगौड़ पहुँचे। वर्माजी के भजनोपदेश को सुनकर वहाँ की जनता बदल गई। वातावरण अनुकूल बन गया। लोगों ने और विद्वानों को भी श्रद्धा से सुना।

प्रत्येक आर्य को अपने हृदय से यह प्रश्न पूछना चाहिए कि ज़्या ऋषि के वेदोक्त विचारों के प्रसार के लिए हममें पण्डित तेजभानुजी जैसी तड़प है? ज़्या आर्यसमाज की शोभा के लिए हम

दिन-रात एक करने को तैयार हैं। श्री ओज़्प्रकाशजी वर्मा की यह लगन हम सबके लिए अनुकरणीय है। स्मरण रहे कि पण्डित तेजभानुजी 18-19 वर्ष के थे, जब शीश तली पर धरकर हैदराबाद सत्याग्रह के लिए घर से चल पड़े थे। अपने घर से सहस्रों मील की दूरी पर धर्म तथा जाति की रक्षा के लिए जाने का साहस हर कोई नहीं बटोर सकता। देश-धर्म के लिए तड़प रखनेवाला हृदय ईश्वर हमें भी दे। तंगौड़ में कोई धूर्त उत्सव में विघ्न डालता था।

चलो यहीं रह लेते हैं

चलो यहीं रह लेते हैं

किसी कवि की एक सुन्दर रचना है-

हम मस्तों की है ज़्या हस्ती,

हम आज यहाँ कल वहाँ चले।

मस्ती का आलम साथ चला,

हम धूल उड़ाते जहाँ चले॥

धर्म-दीवाने आर्यवीरों का इतिहास भी कुछ ऐसा ही होता है। पंजाब के हकीम सन्तरामजी राजस्थान आर्यप्रतिनिधि सभा की विनती पर राजस्थान में वेदप्रचार करते हुए भ्रमण कर रहे थे। आप शाहपुरा पहुँचे। वहाँ ज्वर फैला हुआ था। घर-घर में ज्वर घुसा हुआ था। प्रजा बहुत परेशान थी। महाराजा नाहरसिंहजी को पता चला कि पं0 सन्तराम एक सुदक्ष और अनुभवी हकीम हैं। महाराजा ने उनके सामने अपनी तथा प्रजा की परेशानी रखी। वे प्रचार-यात्रा में कुछ ओषधियाँ तो रखा ही करते थे। आपने रोगियों की सेवा आरज़्भ कर दी। ईश्वरकृपा से लोगों को उनकी सेवा से बड़ा लाभ पहुँचा। ज्वर के प्रकोप से अनेक जानें बच गईं। अब महाराजा ने उनसे राज्य में ही रहने का अनुरोध किया। वे मान गये। उन्हें राज्य का हकीम बना दिया गया, फिर उन्हें दीवानी का जज नियुक्त कर दिया गया। अब वे राजस्थान के ही हो गये। वहीं बस गये और फिर वहीं चल बसे।

पाठकवृन्द! कैसा तप-त्याग था उस देवता का। वह गुरदासपुर पंजाब की हरी-भरी धरती के

निवासी थे। इधर भी कोई कम मान न था। पं0 लेखराम जी के साहित्य ने उन्हें आर्य मुसाफ़िर बना दिया। मुसाफ़िर ऐसे बने कि ऋषि मिशन के लिए घर बार ही छोड़ दिया। राजस्थान के लोग आज उनको सर्वथा भूल चुके हैं।

सचमुच वे बेधड़क थे

सचमुच वे बेधड़क थे

हरियाणा के श्री स्वामी बेधड़क आर्यसमाज के निष्ठावान् सेवक और अद्भुत प्रचारक थे। वे दलित वर्ग में जन्मे थे। शिक्षा पाने का प्रश्न ही नहीं था। आर्यसमाजी बने तो कुछ शिक्षा भी प्राप्त कर ली। कुछ समय सेना में भी रहे थे। आर्यसमाज सिरसा हरियाणा में सेवक के रूप में कार्य करते थे। ईश्वर ने बड़ा मीठा गला दे रखा था। जवानी के दिन थे। खड़तालें बजानी आती थीं। कुछ भजन कण्ठाग्र कर लिये। एक बार सिरसा में श्री स्वामी स्वतन्त्रानन्दजी महाराज का शुभ आगमन हुआ। बेधड़कजी ने कुछ भजन सुनाये। श्री यशवन्तसिंह वर्मा टोहानवी का भजन-

सुनिये दीनों की पुकार दीनानाथ कहानेवाले तथा है आर्यसमाज केवल सबकी भलाई चाहनेवाला।

बड़ी मस्ती से गाया करते थे। स्वामी स्वतन्त्रानन्दजी महाराज गुणियों के पारखी थे। आपने श्री बेधड़क के जोश को देखा, लगन को देखा, धर्मभाव को देखा और संगीत में रुचि तथा योग्यता को देखा। आपने बेधड़कजी को विस्तृत क्षेत्र में आकर धर्मप्रचार करने के लिए प्रोत्साहित किया।

बेधड़कजी उज़रप्रदेश, हरियाणा, पञ्जाब, सिंध, सीमाप्रान्त, बिलोचिस्तान, हिमाचल में प्रचारार्थ दूर-दूर तक गये। हरियाणा प्रान्त में विशेष कार्य किया। वे आठ बार देश के स्वाधीनता संग्राम

में जेल गये। आर्यसमाज के हैदराबाद सत्याग्रह तथा अन्य आन्दोलनों में भी जेल गये। संन्यासी बनकर हैदराबाद दक्षिण तक प्रचारार्थ गये। अपने प्रचार से आपने धूम मचा दी।

बड़े स्वाध्यायशील थे। अपने प्रचार की मुनादी आप ही कर दिया करते थे। किस प्रकार के ऋषिभक्त थे, इसका पता इस बात से लगता है कि एक बार पञ्जाब के मुज़्यमन्त्री प्रतापसिंह कैरों ने उन्हें कांग्रेस के टिकट पर एक सुरक्षित क्षेत्र से हरियाणा में चुनाव लड़ने को कहा। तब हरियाणा राज्य नहीं बना था। काँग्रेस की वह सीट खतरे में थी। बेधड़क ही जीत सकते थे।

स्वामी बेधड़कजी ने विधानसभा का टिकट ठुकरा दिया। आपने कहा ‘‘मैं संन्यासी हूँ। चुनाव तथा दलगत राजनीति मेरे लिए वर्जित है। ऋषि दयानन्द ने तो मुझे दलित से ब्राह्मण तथा संन्यासी तक बना दिया। आर्यसमाज ने मुझे ऊँचा मान देकर पूज्य बनाया है और आप मुझे जातिपाँति के पचड़े में फिर डालना चाहते हैं।’’ पाठकवृन्द! कैसा त्याग है? कैसी पवित्र भावना है? जब वे अपने जीवन के उत्थान की कहानी सुनाया करते थे कि वे कहाँ-से-कहाँ पहुँचे तो वे ऋषि के उपकारों का स्मरण करके भावविभोर होकर पूज्य दादा बस्तीराम का यह गीत गाया करते थे-

‘लहलहाती है खेती दयानन्द की’।

इन पंक्तियों के लेखक ने उन-जैसा दूसरा मिशनरी नहीं देखा। लगनशील, विद्वान् सेवक तो कई देखे हैं, परन्तु वे अपने ढंग के एक ही व्यक्ति थे। बड़े वीर, स्पष्टवादी वक्ता, तपस्वी, त्यागी और परम पुरुषार्थी थे। शरीर टूट गया, परन्तु उन्होंने प्रचार कार्य बन्द नहीं किया। खान-पान और पहरावे में सादा तथा राग-द्वेष से दूर थे। बस, यूँ कहिए कि ऋषि के पक्के और सच्चे शिष्य थे।

पण्डित भोजदज़जी आगरावाले आगे निकल गये

पण्डित भोजदज़जी आगरावाले आगे निकल गये

श्री पण्डित भोजदज़जी आर्यपथिक पश्चिमी पञ्जाब में तहसील कबीरवाला में पटवारी थे। आर्यसमाजी विचारों के कारण पण्डित सालिगरामजी वकील प्रधान मिण्टगुमरी समाज के निकट आ गये।

पण्डित सालिगराम कश्मीरी पण्डित थे। कश्मीरी पण्डित अत्यन्त  रूढ़िवादी होते हैं इसी कारण आप तो डूबे ही हैं साथ ही जाति का, इनकी अदूरदर्शिता तथा अनुदारता से बड़ा अहित हुआ है। आज कश्मीर में मुसलमानों ने (कश्मीरी पण्डित ही तो मुसलमान बने) इन बचे-खुचे कश्मीरी ब्राह्मणों का जीना दूभर कर दिया और अब कोई हिन्दू इस राज में-कश्मीर में रह ही नहीं सकता।

पण्डित सालिगराम बड़े खरे, लगनशील आर्यपुरुष थे। आपने बरादरी की परवाह न करते हुए अपने पौत्र का मुण्डन-संस्कार विशुद्ध वैदिक रीति से करवाया। ऐसे उत्साही आर्यपुरुष ने पण्डित

भोजदज़जी की योग्यता देखकर उन्हें आर्यसमाज के खुले क्षेत्र में आने की प्रेरणा दी। पण्डित भोजदज़ पहले पञ्जाब सभा में उपदेशक रहे फिर आगरा को केन्द्र बनाकर आपने ऐसा सुन्दर, ठोस तथा ऐतिहासिक कार्य किया कि सब देखकर दंग रह गये। आपने मुसाफिर1 पत्रिका भी निकाली। सरकारी नौकरी पर लात मार कर आपने आर्यसमाज की सेवा का कण्टकाकीर्ण मार्ग अपनाया। इस उत्साह के लिए जहाँ पण्डित भोजदज़जी वन्दनीय हैं वहाँ पण्डित सालिगरामजी को हम कैसे भुला सकते हैं जिन्होंने इस रत्न को खोज निकाला, परखा तथा उभारा।