धर्म व नैतिक शिक्षा की आवश्यकता

ओउम
धर्म व नैतिक शिक्षा की आवश्यकता
डा. अशोक आर्य
आज शिक्षा में नैतिक शिक्षा , धार्मिक शिक्षा तथा आध्यात्मिक शिक्षा का संचय होना चाहिए अथवा नहीं और यदि होना चाहिए तो वह कितना और किस प्रकार होना चाहिए , यह आज की शिक्षा के लिए एक जटिल समस्या का रूप ले चूका है | विद्वान लोग तथा देश व प्रांत की सरकारें इस विषय पर वर्षों से मंथन,चिन्तन मनन कर रही हैं किन्तु इस का कोई समाधान सामने नहीं आ रहा ||
आज हमारे संविधान में इस राज्य के लिए धर्म निरपेक्ष शब्द डाल दिया गया है | इस शब्द ने हमारी शिक्षा की इस जटिलता को और भी अधिक जटिल कर दिया है | इतना ही नहीं आज के अनेक लोग इस का अर्थ धर्म विहीन राज्य अथवा अधार्मिक राज्य के रूप में अनुवाद करने लगे हैं | इस सम्बन्ध में हमारे अनेक राजनेताओं ने तथा हमारे पूर्व राष्ट्रपतियों ने यह स्पष्ट भी किया है कि धर्मं निरपेक्ष का अर्थ धर्म विहीन नहीं अपितु असाम्प्रदायिक है इसलिए प्रत्येक धार्मिक आचरण तथा क्रिया कलाप के लिए सब नागरिक स्वतन्त्र हैं | यह सब स्पष्टीकरण आने पर भी हमारे विद्यालयों में इस प्रकार की शिक्षा का कोई प्रबंध नहीं किया गया | इसके साथ ही यह विचार भी चल निकला है कि शिक्षा प्रसार के लिए सरकार से यदि किसी प्रकार की सहायता पानी है तो धर्म निरपेक्ष की छवि बनाते हुए धार्मिक शिक्षा को नहीं अपनाना होगा
इस सब का क्या परिणाम हम देख रहे हैं | वह यह कि आज का छात्र उच्छ्रिन्खल , अनुशासनहीन ,सदा नैतिक पतन की और बढ़ने वाला , देश के उच्च आदर्श से सदा दूर रहने वाला बनता जा रहा है | इस कारण न केवल उसके गुरुजन सब शिक्षा शास्त्री ही नहीं , उसका अपना परिवार भी परेशान है , खिन्न

है | उन्हें समझ ही नहीं आ रहा कि आज के विद्यार्थी को सुमार्ग पर लाने के लिए वह क्या करें ? उन्हें कोई उपाय सूझ ही नहीं रहा कि वह क्या करें इसलिए वह किंकर्तव्य विमूढ़ से ही बन गए हैं |
इस समस्या के समाधान के लिए हमें निश्चित ही वेद की शरण में जाना होगा क्योंकि वेद ही सब समस्याओं का समाधान अपने में समेटे हुए हैं | वेद एक इस प्रकार का सच्चा मार्गदर्शक ग्रन्थ है , जिसमें नीति , धर्म और आध्यात्मिकता का सब से अधिक प्रतिपादन किया है | वेद में न केवल भूमि को ही धारण करने वाले गुणों का वर्णन मिलता है बल्कि अन्य वस्तुओं का भी वर्णन मिलता है | इस अन्य में ब्रह्म तथा वेद को भी समाहित किया गया है | इस प्रकार हमारी समस्या का समाधान वेद की शरण के बिना संभव ही नहीं हो पाता इस सम्बन्ध में अथर्ववेद का एक मन्त्र दर्शनीय है | मन्त्र कह रहा है कि :-
सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो पृथिवीं धारयन्ति || अथर्ववेद १३.१.१.||
इस मन्त्र में इस बात को स्पष्ट किया गया है कि पृथिवी को धारण करने वाले कौन हैं ? मन्त्र कहता है कि पृथिवी को धारण करने वालों में सत्य , विस्तृत शिक्षा , तेजस्विता , ब्रह्मचर्य आदि की दीक्षा , शीतोष्ण , सुख दुःख , हानि लाभादि द्वंद्व , सहिष्णुता , वेद का ब्रह्म ज्ञान तथा यग्य , यह सब तत्व इस प्रकार के हैं , जो हमारी भूमि को धारण करते हैं | इस सब से एक तथ्य जो सामने आता है वह यह कि हमारी इस पृथिवी को धारण करने के लिए सत्य पर आधारित उच्च शिक्षा से प्राप्त तेजस्विता , जो वेद की शिक्षा से ही मिलती है , यह सब ही इस पृथिवी को धारण करते हैं अर्थात पृथिवी के बाहर और अन्दर
जो क्लुछ भी ओषध, वनस्पतियाँ , खनिज आदि है , वह सेब वेद की इस शिक्षा

के आधार पर हमें मिल जाते हैं |
इस विचार को जब हम ध्यान से देखते हैं कि इस पृथिवी के अस्तित्व के लिए यह सब पदार्थ ही कारण हैं | यदि यह वेदोक्त कारण नहीं प्राप्त होते तो पृथिवी की कुछ भी उपयोगिता न रह पाती | |इसलिए पृथ्वी के धारण में यह सब पदार्थ अपना अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं | जिससे यह पृथिवी पृथिवी कहलाने के योग्य बन पाती है | अत: वेद ज्ञान के बिना पृथिवी के धारण का प्रशन ही नहीं उठता यह एक असंभव प्रश्न है , जिसे कभी हल नहीं किया जा सकता अथवा जिसका कभी उत्तर ही नहीं दिया जा सकता | हमारे जितने भी शास्त्रकार हुए हैं सब ने एक स्वर से धर्म का मूल वेद को स्वीकार किया है |

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