प्रार्थना: – नाथूराम शर्मा ‘शङ्कर’

।।१।।

द्विज वेद पढ़ें, सुविचार बढ़ें, बल पाय चढें़, सब ऊपर को,

अविरुद्ध रहें, ऋजु पन्थ गहें, परिवार कहें, वसुधा-भर को,

धु्रव धर्म धरें, पर दु:ख हरें, तन त्याग तरें, भव-सागर को,

दिन फेर पिता, वरदे सविता, करदे कविता, कवि शंकर को।

।।२।।

विदुषी उपजें, क्षमता न तजें, व्रत धार भजें, सुकृती वर को,

सधवा सुधरें, विधवा उबरें, सकलंक करें, न किसी घर को,

दुहिता न बिकें, कुटनी न टिकें, कुलबोर छिकें, तरसें दर को,

दिन फेर पिता, वरदे सविता, करदे कविता, कवि शंकर को।

।।३।।

नृपनीति जगे, न अनीति ठगे, भ्रम-भूत लगे, न प्रजाधर को,

झगड़े न मचें, खल-खर्ब लचें, मद से न रचें, भट संगर को,

सुरभी न कटें, न अनाज घटें, सुख-भोग डटें, डपटें डर को,

दिन फेर पिता, वरदे सविता, करदे कविता, कवि शंकर को।

।।४।।

महिमा उमड़े, लघुता न लड़े, जड़ता जकड़े, न चराचर को,

शठता सटके, मुदिता मटके, प्रतिभा भटके न समादर को,

विकसे विमला, शुभ कर्म-कला, पकड़े कमला, श्रम के कर को,

दिन फेर पिता, वरदे सविता, करदे कविता, कवि शंकर को।

।।५।।

मत-जाल जलें, छलिया न छलें, कुल फूल फलें, तज मत्सर को,

अघ दम्भ दबें, न प्रपंच फबें, गुरु मान नबें, न निरक्षर को,

सुमरें जप से, निखरें तप से, सुर-पादप से, तुझ अक्षर को,

दिन फेर पिता, वरदे सविता, करदे कविता, कवि शंकर को।

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