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कुरान समीक्षा : पिछली जिन्दगी का विश्वास करो

पिछली जिन्दगी का विश्वास करो

जब सबका पहली ही बार जन्म हुआ है तो पिछली जिन्दगी की बात कहना क्या खुदा का धोखा देना नहीं है? जबकि कुरान पुनर्जन्म कमो नहीं मानता है।

देखिये कुरान में कहा गया है कि-

इलाहुकुम् इलाहु व्वाहिदुन्……….।।

(कुराना मजीद पारा १४ सूरा नहल रूकू ३ आयत २२)

लोगो! तुम्हारा एक खुदा है सो जो लोग पिछली जिन्दगी’’ का विश्वास नहीं करते उनके दिल इन्कारी हैं और वह घमण्डी हैं।

समीक्षा

जब खुदा ने पहली बार ही लोगों को पैदा किया है तो उनको पिछली जिन्दगी का विश्वास न करने पर घमण्डी बताना बेवकूफी की बात साबित होती है। हां! हिन्दुओं के उसूल से जीवों का सदैव पुनर्जन्म होता रहता है पुनर्जन्म की बात मानने से ही पिछली जिन्दगी की बात का हल निकल सकता है। सारे विचार से कुरानकार पुनर्जन्म के सिद्धान्त को ही यहां प्रकट कर रहा है।

नोट- यहाँ पर कुरान के भाष्यकार मौलाना फतेह मुहम्मद खाँ साहब ने अपने तर्जूमे में ‘‘पिछली जिन्दगी’’ की जगह ‘‘आखिरत’’ कर दिया है।

‘‘लाजपज राय अग्रवाल’’

स्तुता मया वरदा वेदमाता

स्तुता मया वरदा वेदमाता-38

त्रायन्तामिह देवास्त्रायतां मरुतां गणः।

त्रायन्तां विश्वा भूतानि यथायमरपा असत्।।

– ऋक्. 10/137/5

प्रसंग रोग से संरक्षण का है। देवता रोगी की रक्षा करें, मरुत्गण रोगी की रक्षा करें। समस्त भूत रोगी की रक्षा करें, जिससे यह व्यक्ति रोग रहित हो सके।

प्रश्न उठता है- यहाँ चेतन की बात भी जा रही है या जड़ की। यहाँ प्रसंग जो भी हो, शदार्थ दोनों हो सकते हैं। देव शद चेतन और जड़ दोनों का वाचक है। देव में परमेश्वर, मनुष्य, प्राणी तक सबका ग्रहण हो सकता है। मरुद् भी जड़-चेतन दोनों का वाचक है। चेतन में योद्धा या सैनिक के अर्थ में इसका प्रयोग बहुधा वेद में आता है। भूत भी जड़ और चेतन हैं। रोगी को चेतन तो ठीक कर ही सकते हैं, परन्तु ऊपर से प्रसंग रोग और औषध का चल रहा है। तब देव मरुत्, भूत, चेतन के वाचक नहीं होंगे।

यहाँ पर रोग निवारक जड़ पदार्थों की चर्चा चल रही है। मनुष्य को सबसे आवश्यक जीवनीय पदार्थों की चर्चा है। जो वस्तुएँ मनुष्य को जीवित रखने में उपयोगी है, वही स्वास्थ्य की उन्नति और सुरक्षा में भी आवश्यक हैं। गत मन्त्रों में जीवनीय तत्त्वों के रूप में जलवायु की अनेकशः चर्चा हुई हैं। उसी प्रसंग में देवता कौन हैं जो रोगी को रोगरहित करने में प्रमुखता से उपयोगी हैं। मन्त्र का अर्थ करते हुए स्वामी ब्रह्म मुनि कहते हैं- देवाः रश्मयः। यहाँ देवता का अर्थ सूर्य की रश्मियाँ हैं। यह बात सर्वविदित है कि संसार में सूर्य ही जीवन का आधार है। जहाँ सूर्य ऊर्जा देता है, वहाँ सूर्य रोगाणुओं को समाप्त करने वाला प्रथम अस्त्र है। वेद कहता है- उघट रश्मिर्भिः कृमीणहन्ति। उदय होता हुआ सूर्य रोग कृमियों को नष्ट करता है। स्वस्थ दशा में भी सूर्य रश्मियों का सेवन करने का विधान है। आजकल सूर्य के प्रकाश में रहने की प्रेरणा की जाती है। चिकित्सकों का विचार है कि प्रत्येक मनुष्य को दिन के कुछ घण्टे सूर्य के प्रकाश में व्यतीत करने चाहिए, इससे शरीर के रोगाणु नष्ट होकर, जीवनीय शक्ति बढती है। कहा जाता है कि सूर्य के प्रकाश में विटामिन डी की प्राप्ति होती है। इससे हमारे शरीर में दृढता आती है।

वेद कहता है- मनुष्य को घर भी ऐसा बनाना चाहिए जिसमें सूर्य की किरणें प्रचुरता से प्रवेश कर सकें। मन्त्र है- यत्र गावोाूरिशृंगा अयासः। घर के अन्दर सूर्य की किरणें बहुत मात्रा में आयें। वेद में गो शद किरणों का वाचक है, भूरि शृंगा बहुत प्रकार से गहराई तक घर में प्रवेश करें। जिस घर में सूर्य की किरणें प्रवेश करती हैं, उस घर में रोग के कृमि नष्ट हो जाते हैं। इसलिए मन्त्र में कहा गया है कि सूर्य की किरणें रोगी की रोग से रक्षा करें। जहाँ अंधेरा, सीलन होता है, प्रकाश की कमी होती है, वहाँ दमा, खांसी आदि रोग बढते हैं।

मन्त्र में आगे कहा गया है- त्रायतां मरुतां गणः। मरुतों के गण रोगी की रक्षा करें। यहाँ मरुत् का सैनिक अर्थ घटित नहीं होता, यहाँ सूर्य के प्रकाश के साथ-साथ शुद्ध वायु की संगति बैठती है। अतः रोगी को प्रकाश के साथ शुद्ध वायु की प्राप्ति होनी आवश्यक है। रोगी के कमरे में स्वच्छ हवा का आवागमन सदा बना रहे तो रोगी को स्वास्थ्य लाभ शीघ्र होता है। आज और पुराने समय में भी रोगी को स्वास्थ्य लाभ के लिये पर्वतीय स्थानों पर जाने का परामर्श दिया जाता है। पहले यक्ष्मा के रोगी को चिकित्सा के लिये पर्वत क्षेत्रों में चिकित्सालय बनाये गये थे। आज भी उत्तम जलवायु से स्वास्थ्य लाा प्राप्त करने के लिये शुद्ध वायु और सूर्य के प्रकाश की अधिकाधिक प्राप्ति हो, वहाँ जाना चाहिए या अपने घर में ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए। यहाँ पर मरुतों से प्रार्थना की गई है, वे रोगी की रक्षा करें। तीसरे चरण में कहा गया- त्रायन्तां विश्वा भूतानि। विशेषरू प से सूर्य के प्रकाश का शुद्ध वायु के रूप में उल्लेख किया गया है। सामान्य रूप से सभी पदार्थ या वस्तुएँ, चाहे वे औषध के रूप में हों अथवा वातावरण या प्रयोग में आने वाली वस्तु के रूप में हों। सभी रोगी के अनुकूल और उसके स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिये उपयोगी होनी चाहिए। विश्वा का अर्थ विश्वानि अर्थात् सब भूत, जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी आदि में प्राप्त होने वाले सभी पदार्थ रोगी को रोग से बचाने वाले हों। कभी कभी रोगी समझता है- केवल औषध खाने मात्र से वह स्वस्थ हो जायेगा, उतना पर्याप्त नहीं है। चिकित्सा में कहा जाता है कि जितना महत्त्व औषध का है, उतना ही महत्त्व पथ्य का है। यदि पथ्य नहीं है तो औषध व्यर्थ हो जाती है तथा पथ्य हो तो रोगी को कम औषध से भी स्वस्थ किया जा सकता है। वास्तव में रोग को शरीर स्वयं दूर करता है और वस्तुएँ तो सहायक मात्र है। अतः चिकित्सक रोगी को परामर्श देते हैं- स्वास्थ्यवर्धक अन्नपान सेवन के साथ पूर्ण विश्राम करना चाहिए। मूलभूत बात है- प्रत्येक वह कार्य और वस्तु उपयोग में आती है, जिससे रोगी रोग से मुक्त हो, इसीलिए कहा गया है- यथा यमरपा असत्। कैसे भी हो, रोगी को रोग मुक्त करना, चिकित्सा का उद्देश्य है।

 

कुरान समीक्षा : शैतान की बनाई आयतों के चन्द नमूने

शैतान की बनाई आयतों के चन्द नमूने

कुरान का यह दावा कि ‘‘कुरान जैसी आयतें कोई नहीं बना सकता है’’ क्या इस बात से गलत नहीं हो जाता है कि कुरान में शैतान ने ही अनेक आयतें बोलकर इस दावे को गलत साबित कर दिया है?

देखिये कुरान में कहा गया है कि-

का-ल लम् अ-कुल्लि-अस्जु-द………।।

(कुरान मजीद पारा १४ सूरा हिज्र रूकू ३ आयत ३३)

शैतान बोला- मैं ऐसे शख्स को सिजदा नहीं करूंगा जिसे तूने खनखनाते सड़े हुए गारे से पैदा किया, जिसकी मिट्टी तूने मुझसे ही मगंवाई थी।

का-ल रब्बि बिमा अरवैतनी……..।।

(कुरान मजीद पारा १४ सूरा हिज्र रूकू ३ आयत ३९)

शैतान ने कहा-ऐ मेरे परवर्दिगार जैसे तूने मेरी राह मारी वैसे ही मैं भी दुनिया इन सबको बहारें दिखाऊँगा और उन सबको राह से बहाऊँगा।

इल्ला अिबाद-क मिन्-हुमुल्……..।।

(कुरान मजीद पारा १४ सूरा हिज्र रूकू ३ आयत ४०)

…….सिवाय उनके जा तेरे चुने हुए बन्दे हैं।

समीक्षा

कुरान का दावा है कि कोई भी मनुष्य या जिन्न या फरिश्ता कुरान के जैसी एक भी सूरत नहीं बना सकता है, चाहे सब मिलकर भी बनाने की कोशिश करें। देखो-

कुल-ल अनिज्-त-म-अतिल्…………।।

(कुरान मजीद पारा १५ सूरा बनीइस्त्राईल रूकू १० आयत ८८)

पर अकेले शैतान ने कितनी ही आयतें बनाकर दिखा दीं जो कुरान में दी हुई हैं। इस प्रकार कुरान का दावा गलत साबित हो गया।

पुस्तक परिचय पुस्तक का नाम- आनन्द रस धारा

पुस्तक परिचय

पुस्तक का नामआनन्द रस धारा

लेखक प्रा. राजेन्द्र ‘जिज्ञासु’

प्रकाशक  विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द,

नई सड़क, दिल्ली।

पृष्ठ 144        मूल्य- 90 रु. मात्र

महर्षि दयानन्द के विचारों से देशी विदेशी बहुत से प्रबुद्ध जन प्रभावित होकर आर्यसमाज से जुड़ें। जुड़कर मानव जाति के लिए कार्य किया। महर्षि के जीवन काल व उनके परलोक गमन के बाद भी ऐसे अनेक ों महान् पुण्यात्मा जन ऋषि मिशन से जुड़े कि उन पुण्यात्माओं ने वेद व देश राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने में अपने को धन्य समझा। धर्मध्वजी श्रीयुत् पण्डित लेखराम, महात्मा मुन्शीराम (स्वामी श्रद्धानन्द), पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, पं चमुपति जी, लाला लाजपत राय, भाई परमानन्द आदि ऐसे अनोखे रत्न महर्षि के विचारों से आर्य समाज को मिले जिन्होंने विश्वभर में आर्य समाज का नाम प्रकाशित किया।

आर्य समाज ने विद्वान् अध्यापक, योग्य लेखक, सपादक, प्रबुद्ध प्रचारक, वक्ता, पुरोहित, सामाजिक कार्यकर्त्ता इस देश को दिये हैं, केवल इन्हीं लोगों को ही नहीं अपितु योग्य साधु संन्यासी भी आर्य समाज ने दिये हैं। स्वामी श्रद्धानन्द, स्वामी दर्शनानन्द, स्वामी स्वतन्त्रानन्द, महात्मा नारायण स्वामी, महात्मा आनन्द स्वामी जैसे योग्य संन्यासी हुए जिन्होंने अपनी वाणी व पुरुषार्थ से आर्यों में नई उमंग भरी।

इन सभी महापुरुषों की जीवनियाँ-लेखन के धनी, आर्यसमाज के ऊपर प्रहार कर्त्ताओं के लिए सदा अपनी लेखनी उत्तर देने में उद्यत आर्यसमाज के इतिहास की सर्वाधिक जानकारी रखने वाले, विश्व के सर्वाधिक जीवन चरित लिखने वाले मान्यवर प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी हैं। इन जीवनियों में महात्मा आनन्द स्वामी की जीवनी नहीं लिखी गई थी, अब वह काम भी मान्य जिज्ञासु जी ने ‘‘आनन्द रसधारा’’ पुस्तक लिखकर पूरा कर दिया है।

इस पुस्तक का प्रकाशन सबसे अधिक आर्य साहित्य देने वाला, लगभग नबे (90)वर्षों से आर्य साहित्य का प्रकाशन कर समाज को दिशा देने वाले प्रकाशक ‘‘विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द’’ ने किया है। पुस्तक के प्रकाशक मान्य अजयकुमार जी ने प्रकाशकीय बड़े भाव से लिखा है। इस जीवन चरित के विषय में अपने भाव व्यक्त करते हुए लिखा-‘‘देर से आर्य जनता आपके एक सुन्दर प्रेरक जीवन चरित की माँग करती चली आ रही थी। हर्ष का विषय है कि विश्व में सर्वाधिक जीवनियाँ लिखने का कीर्तिमान् बना चुके हमारे लेखक श्री राजन्द्र जिज्ञासु ने इस चुभते अभाव की कमी पूरी करते हुए ‘आनन्द रसधारा’ नाम से उनका एक पठनीय जीवन चरित आपके हाथों में पहुँचा दिया है। यह पुस्तक आपने एक अलग शैली से लिखी है।’’

महात्मा आनन्द स्वामी जी के जीवन चरित को लिखने का विचार लेखकके मन में स्वामी जी के जीवन काल से ही था, किन्तु यह कार्य लेखक के जीवन की साँझ में हुआ। इस विषय में लेखक अपने प्राक्कथन में लिखते हैं-‘‘जीवन की साँझ का विचार करके मैं कई महीनों से महात्मा जी पर एक पठनीय पुस्तक लिखने का निर्णय ले चुका था…….।’’ महात्मा जी की विशेषता को बताते हुए लेखक लिखते हैं-‘‘महात्मा आनन्द स्वामी वेदभक्त, ऋषिभक्त, प्राुाक्त, देशभक्त, जातिभक्त और लोकसेवक पहले थे और नेता बाद में थे। नेता कोई भी हो उसके जीवन के साथ छोटा-मोटा कोई न कोई विवाद जुड़ जाता है। ‘आनन्द रस धारा’ में विवादों से बचकर ऐसी सामग्री दी है जिससे अपने पराये सबको ऊर्जा प्राप्त होगी। पाठकों में नवजीवन का संचार होगा। मनु महाराज ने धर्म के दश लक्षण बताए हैं। ऋषि दयानन्द की धर्म की परिभाषा पढ़िये। योगदर्शन में वर्णित यम-नियमों व आठ अंगों पर विचार करके-इन्हें सामने रखकर ‘आनन्द रस धारा’ को कसौटी पर कसिये फिर आपको पूरा लाभ मिलेगा।’’

इस पुस्तक को लेखक ने आठ भागों में विभक्त किया है। पहला भाग-बाल्यकाल से यौवन की चौखट तक जीवन झाँकी। दूसरा भाग-अष्टांग योग की कसौटी पर। तीसरा भाग-जीवन के कुछ विशेष प्रसंग। चौथा भाग-हैदराबाद सत्याग्रह के नर नायक। पाँचवाँ भाग-संन्यास दीक्षा। छठा भाग-हैदराबाद में एक बड़ा ऑपरेशन। सातवाँ भाग-एक निराधार कथन-मिथ्या सोच। आठवाँ भाग-महाप्रयाण-वे चलते-चलते चल बसे।

आठ भागों में विभक्त यह पुस्तक अपने अन्दर महात्मा जी के अनेक जीवन प्रसंगों को संजोये है। पाठक इस आनन्द रस धारा को पढ़कर अवश्य ही आनन्द में सराबोर होंगे। सुन्दर आवरण से सुसज्जित, उत्तम कागज व छपाई से युक्त यह पुस्तक पाठकों को बहुत प्रेरणा देने वाली सिद्ध होगी। ऐसी आशा है।

– आचार्य सोमदेव, ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर।

 

कुरान समीक्षा : जमीन में पहाड़ गाड़े गये

जमीन में पहाड़ गाड़े गये

पहाड़ों को जमीन से प्रथक बनाकर उन्हें (कीलों की जगह) जमीन में गाढ़ा गया, यह साबित करें?

देखिये कुरान में कहा गया है कि-

वल् अर-ज म-दद्नाहा व अल्कैना………..।।

(कुरान मजीद पारा १४ सूरा हिज्र रूकू २ आयत १९)

और हमने जमीन को फैलाया और हमने उसमें पहाड़ गाढ़ दिये।

व अल्का फिल्अर्जि रवासि-य……………।।

(कुरान मजीद पारा १४ सूरा नहल रूकू २ आयत १५)

और उसी ने जमीन पर पहाड़ गाड़ दिये, ताकि जमीन झुकने न पावे।

समीक्षा

गाढ़ी जाने वाली वस्तु जिसमें गाढ़ी जाती है उससे पृथक होती है तभी उसे गाढ़ा जा सकता है किन्तु पहाड़ों का विकास जमरी के अन्दर से ऊपर को होता है।

अतः उनका गाढ़ना बताना अज्ञानता की बात है और गलत है। अरबी खुदा इतना भी नहीं जानता था यह आश्चर्य की बात है।

महर्षि दयानन्द जी उनके पूर्व के ऋषियों से भी अधिक महान् थे क्या? कपिल, जैमिनि, गौतम आदि ऋषियों ने दर्शन प्रस्तुत किये हैं। ऋषि दयानन्द जी ने तो ऋग्वेद के छः मण्डल पूर्ण और सातवें मण्डल के कुछ मन्त्र तक और यजुर्वेद का पूर्ण भाष्य किया है तो हम ऋषियों से भी अधिक ज्ञान में सामर्थ्य में महर्षि दयानन्द जी को महान् मान सकते हैं क्या?

महर्षि दयानन्द जी उनके पूर्व के ऋषियों से भी अधिक महान् थे क्या? कपिल, जैमिनि, गौतम आदि ऋषियों ने दर्शन प्रस्तुत किये हैं। ऋषि दयानन्द जी ने तो ऋग्वेद के छः मण्डल पूर्ण और सातवें मण्डल के कुछ मन्त्र तक और यजुर्वेद का पूर्ण भाष्य किया है तो हम ऋषियों से भी अधिक ज्ञान में सामर्थ्य में महर्षि दयानन्द जी को महान् मान सकते हैं क्या?

समाधानः-

ऋषियों में ऐसे तुलना करना ठीक नहीं। अभी हमने पूर्व में कहा कि सभी ऋषियों का ऋषित्व तो एक ही होता है। उसका कार्य क्षेत्र भिन्न-भिन्न हो सकता है। महर्षि कपिल, कणाद आदि ने दर्शन शास्त्रों की रचना कर वेद का ही कार्य किया था। ऐसे महर्षि दयानन्द ने वेद भाष्य कर वेद का कार्य किया। ऐसा कदापि नहीं है कि महर्षि कपिल, कणाद आदि में वेद का भाष्य करने की योग्यता नहीं थी ओर यह योग्यता ऋषि दयानन्द में ही थी। सभी ऋषि लोग वेद भाष्य करने में समर्थ होते थे क्योंकि ऋषि कहते ही मन्त्रार्थदृष्टा को हैं। जब महर्षि दयानन्द से पूर्व के ऋषि भी वेद भाष्य की योग्यता रखते थे और महर्षि दयानन्द भी रखते थे तो इनमें कौन महान् और कौन हीन ऐसा नहीं कह सकते। महर्षि दयानन्द भी महान् थे और अन्य ऋषि भी महान् थे। ऋषियों में तुलना करके हमें एक को महान् और दूसरे को हीन सिद्ध करने का कोई अधिकार नहीं है। अस्तु।

 

कुरान समीक्षा : तारे टूटना शैतान को मारना है

तारे टूटना शैतान को मारना है

तारे भी टूटते हैं, यह भी विज्ञान से साबित करें?

देखिये कुरान में कहा गया है कि-

व हफिनाहा मिन कुल्लि शैतानिर……….।।

(कुरान मजीद पारा १४ सूरा हिज्र रूकू २ आयत १७)

औरहर निकाले हुए शैतान से उसकी रक्षा की।

इल्ल मनिस्त-र-कस्सम-अ………।।

(कुरान मजीद पारा १४ सूरा हिज्र रूकू २ आयत १८)

मगर चोरी छिपा कोई बात सुन भागो तो दहकता हुआ अंगारा एक तारा इसे खदेड़ने को उसके पीछे होता है।

समीक्षा

उल्कापात को शैतान को मारने के लिए तारे टूटना बताना कुरानी खुदा की खगोल विद्या से अज्ञानता प्रगत करता है।