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आत्मा का स्थान-२

आत्मा का स्थान-२

–  स्वामी आत्मानन्द

आत्मा का परिमाण :-आत्मा का निवास स्थान सारा शरीर मान लेने पर और आत्मा को मध्यम परिमाण वाला मान लेने पर कई प्रश्न ऐसे सामने आ जाते हैं जिनका उत्तर देने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

शरीरों के परिमाण भिन्न-भिन्न हैं। चींटी से लेकर हाथी तक और हाथी से भी बहुत बड़े सामुद्रिक जन्तु संसार में विद्यमान् हैं। आत्माओं को भी अपने अपने कर्मभोग के अनुसार भिन्न-भिन्न शरीरों में जाना ही पड़ता है। जब वह चींटी जैसे किसी छोटे शरीर में था तब उसका आत्मा अपने शरीर के परिमाण वाला चींटी जितना ही बड़ा होगा। और जब वह किसी छोटे शरीर को छोड़ कर हाथी जैसे बड़े शरीर  में जावेगा तो उस आत्मा को भी वहाँ हाथी जितने बड़े परिमाण वाला ही मानना पड़ेगा। आत्मा बड़े से छोटा और छोटे से बड़ा घटे बढ़े बिना हो नहीं सकता, और घटना बढ़ना अनित्यपदार्थ का काम है। परन्तु आत्मा को तथा पुनर्जन्म को मानने वाले दार्शनिक कोई भी आत्मा को अनित्य मानते नहीं। अतः आत्मा यदि शरीर के परिमाण वाला है, तो बढ़ने और घटने वाला होने के कारण अनित्य क्यों नहीं। यह प्रश्न सामने उपस्थित होता है जिसका कि समाधान कठिन है।

संसार में तीन प्रकार के परिमाण देखने में आते हैं, अणु मध्यम और परम महत् । अणु परिमाण उस पदार्थ का माना जाता है जो टूटते-टूटते इतना सूक्ष्म हो गया है जिसके अब टुकड़े नहीं हो सकते। दार्शनिक परिभाषा में उसे परमाणु कहते हैं। इस परमाणु का परिमाण अणु है और नित्य है। क्योंकि जिस पदार्थ के अवयवों का हम विभाग करने लगेंगे, वह छोटा होता-होता इसी परमाणु की अवस्था में पहुँचेगा, यह इससे छोटा न हो सकेगा, अब उसके वे सब टुकड़े भी परमाणु कहलाएंगे, और उन सब का परिमाण अणु ही होगा। परमाणु से छोटा दुनिया में कोई टुकड़ा न मिलेगा और इसीलिये अणु से छोटा कोई परिमाण न मिलेगा। यह ही कारण है कि इस परिमाण को नित्य मानना पड़ता है, क्योंकि न इसके आधार के टुकड़े होंगे, और न इसका नाश होगा।

दूसरा परिमाण परम महत् परिमाण है। परम महत् परिमाण उन पदार्थों का माना जाता है जो व्यापक हों और नित्य हों, जिनकी न उत्पत्ति होती हो और न विनाश। ऐसे पदार्थ हैं, ईश्वर आकाश आदि।

तीसरा मध्यम परिमाण है। इन परमाणुओं और व्यापक पदार्थों को छोड़ कर शेष जितने पदार्थ हैं वे सब अनित्य हैं उनकी उत्पत्ति भी होती है और विनाश भी, और उन सबका परिमाण मध्यम परिमाण माना जाता है। इस परिमाण के आश्रय जितने पदार्थ हैं उन सबके अनित्य होने से उनका परिमाण मध्यम परिमाण भी अनित्य है। अब यह प्रश्न सामने आता है कि आत्मा का परिमाण यदि मध्यम परिमाण है तो वह विनाशी ही होगा, फिर आत्मा को नित्य कैसे सिद्ध करोगे? यह प्रश्न भी ऐसा ही है जिसका उत्तर देना कठिन होगा।

आत्मा को सारे शरीर में व्यापक मानने के लिये और उसे विनाश से बचाने के लिये उसका परिमाण परम महत् परिमाण माना जा सकता है। परन्तु उसका यह परिमाण मान लेने पर उसे ईश्वर की भाँति ही सर्वव्यापक मानना पड़ जावेगा और इस प्रकार उसके अनन्त हो जाने पर उसका ज्ञान भी अनन्त होगा, अतः अब तो उसे सर्वज्ञ ही मानना पड़ जावेगा अल्पज्ञ नहीं। परन्तु व्यवहार में ऐसा देखने में नहीं आता।

यदि यह समाधान करें कि आत्मा है तो व्यापक ही और अतएव है भी सर्वज्ञ, परन्तु अविद्या आदि किसी उपाधि के कारण वह अल्पज्ञ प्रतीत होने लगता है, और उसी प्रकार का व्यवहार करने लग जाता है। तो यह समाधान युक्ति-युक्ति न होगा।

इस सिद्धान्त पर विचार करने के लिये निम्न विकल्प खड़े हो जाते हैं-जिस उपाधि ने आत्मा को अल्पज्ञ बना दिया है वह आत्मा का अपना ही अंग है या उससे भिन्न। आत्मा का अंग तो उसे कहा नहीं जा सकता-क्योंकि आत्मा निरवयव पदार्थ है अतः निरवयव का कोई अंग या अवयव नहीं हो सकता। यदि कहें कि यहाँ अंग का अर्थ स्वरूप है। तब तो अविद्या आत्म स्वरूप ही हुई। और यदि वह आत्म स्वरूप ही है तो इसके गुण कर्म स्वभाव आत्मा से भिन्न होने चाहिये। यदि आत्मा का गुण ज्ञान है तो इसका भी गुण ज्ञान ही होना चाहिये, और ज्ञानवान् यह पदार्थ अब आत्मा को अज्ञानी न बना सकेगा। यदि कहें कि इस का धर्म अज्ञान है तब फिर आत्मा का भी धर्म अज्ञान ही होगा, और इसका स्वभाव अज्ञान होने से इसे अब कोई ज्ञान न बना सकेगा। यदि कहें कि अविद्या ने इसे अज्ञानी बना दिया था और अविद्या के हट जाने से यह ज्ञानी ही रह जावेगा यह सङ्गत नहीं, क्योंकि अविद्या जब आत्मा का स्वरूप ही है तो वह उससे दूर हो ही न सकेगी, किसी के स्वरूप को कोई उससे पृथक् नहीं कर सकता। अतः आत्मा सदा अज्ञानी ही बना रहेगा। यदि कहें कि अविद्या आत्म स्वरूप नहीं आत्मा से भिन्न ही तत्त्व है, और आत्मा पर छा जाने से वह उसे अज्ञानी बना देती है। इस अवस्था में हम यह जानना चाहेंगे कि अविद्या आत्मा के किसी एक भाग को आच्छादित करती है या सम्पूर्ण को। यदि एक भाग को तो आत्मा का कोई भाग ज्ञानी और कोई भाग अज्ञानी है ऐसा मानना पड़ेगा। परन्तु नित्य निरवयव एक आत्मा में ऐसा होना असम्भव है । वह तो एक अखण्ड हाने से या तो सारा ज्ञानी ही रहेगा या अज्ञानी ही। और यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि सहस्रों मेघों से आच्छादित कर देने पर भी सूर्य के प्रकाश को हम से तो छिपाया जा सकता है परन्तु सूर्य से सूर्य के प्रकाश को कोई नहीं छिपा सकता। इसी प्रकार अविद्या से आच्छादित कर आत्मा के ज्ञान को किसी और से तो कोई छिपा सकता है आत्मा से उसके ज्ञान को कोई नहीं छिपा सकता। हरे शीशे से ढकी हुई सूर्य की किरणें हमें तो हरी दिखाई देने लग जाती हैं परन्तु यदि सूर्य चेतन हो तो उसे अपनी किरणें वैसी ही दिखाई देंगी जैसी कि वे हैं। क्योंकि आवरण सूर्य के बाहर है अन्दर नहीं। इसी प्रकार आत्मा भी अपने आपको अज्ञानी मान न सकेगा क्योंकि अविद्या का पर्दा उस के बाहर है अन्दर नहीं। अतः अल्पज्ञ होने के कारण आत्मा को व्यापक नहीं माना जा सकता।

अब शेष रह जाता है अणु परिमाण अतः अब विवश आत्मा का यह ही परिमाण मानना पड़ेगा।

यह प्रश्न किया जा सकता है कि यदि आत्मा का परिमाण अणु है तो वह शरीर के एक भाग में ही रहेगा। और यदि ऐसा है तो चैतन्य से होने वाली अनेक क्रियाऐं शरीर के सब भागों में किस प्रकार सम्पन्न हो रही है?

इस प्रश्न के उत्तर में निवेदन है कि जिस प्रकार राजा साम्राज्य के एक भाग राजधानी में ही बैठा रहता है परन्तु सारे साम्राज्य के सब विभागों के कार्य उसकी प्रेरणा मात्र से उसके अधिकारीवर्ग  के द्वारा सम्पन्न होते रहते हैं। ठीक इसी प्रकार आत्मा एक भाग में ही बैठा हुआ अपनी प्रेरणा मात्र से मन, इन्द्रिय, ज्ञान तन्तु और प्राणतन्तुओं आदि साधनों द्वारा सारे शीरर में होने वाली क्रियाओं को सम्पादित करता रहता है।

अतः आत्मा के शरीर के किसी एक देश में रहने पर भी कोई चेतन जन्य कार्य रुक नहीं सकता। अतः वह अणु है और नित्य है। युक्ति सिद्ध इस विषय का उपपादन उपनिषद् भी करते हैं-

एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन् प्राणः पञ्चधा संविवावेश।

प्राणैश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन् विशुद्धे विभवत्येष आत्मा।।

मुण्डक ३/१/९

यह अणु आत्मा मन से ही जानना चाहिये। पाँचों प्राणों का निवास इसी के पास है। प्राण एक सर्वत्र विद्यमान् तत्त्व है जिसका सारी प्रजाओं के चित्त के साथ सम्बन्ध है। चित्त के विशुद्ध हो जाने पर आत्मा ईश्वरीय वैभव से अपने आपको सम्पन्न कर लेता है।

उपनिषद् के इस प्रसङ्ग में आत्मा का स्पष्ट ही अणु परिमाण माना है।

आत्मा का परिमाण अणु सिद्ध हो जाने पर स्वभावतः यह जिज्ञासा होती है कि हमारे शरीर में आत्मा का निवास कहाँ होना चाहिये। उपनिषद्कार महर्षि आत्मा का निवास स्थान हृदय में मानते हैं।                                       क्रमश…..

कुरान समीक्षा : सूरज चाँद को नहीं पकड़ सकता है

सूरज चाँद को नहीं पकड़ सकता है

साबित करें कि सूरज चांद एक-दूसरें को पकड़ने के लिए दौड़ लगा रहे हैं?

देखिये कुरान में कहा गया है कि-

लश्शम्सु यम्बगी लगा अन् तुद्रिकल्………..।।

(कुरान मजीद पारा २२ सूरा यासीन रूकू ३ आयत ४०)

न तो सूरज से ही बन पड़ता है चाँद को जा पकड़े और न रात ही दिन से आगे आ सकती है और हर कोई एक-एक घेरे में फिरते हैं।

समीक्षा

सूरज जमीन से नौ करोड़ मील पर है है जब कि चाँद दो लाख छत्तीस हजार मील के फांसले पर है है सूरज अपनी ही कीली पर घूमता है जबकि चाँद जमीन के चारों ओर घूमता हुआ स्वंय भी घुमता है। तो सूरज चांद को नहीं पकड़ सकता यह कहना बड़ी बेतुकी सी बात है कुरान को समझदारी की बात कहनी चाहिये थी।

यदि सूरज और चाँद दोनों एक ही दूरी पर होते और दोनों घूमतें भी होते तब तो यह बात कहना बन भी सकता था। शायद अरबी खुदा को इस मामले की जानकारी नहीं थी।

स्तुता मया वरदा वेदमाता

स्तुता मया वरदा वेदमाता-40

हस्तायां दशशाखायां जिह्वा वाचः पुरोगवी।

अनामयित्नुयां त्वा तायां त्वोप स्पृशामसि।।

– ऋग्. 10/137/7

संस्कृत भाषा में वैद्य को पीयूष-पाणि कहा जाता है। पीयूष का अर्थ है-अमृत और पाणि का अर्थ होता है-हाथ। जिसके हाथ में अमृत हैं, ऐसे वैद्य की चर्चा इस मन्त्र में की गई है, वैद्य के दोनों हाथ ही नहीं, हाथ के पोर-पोर में, अंगुलियों में अमृत भरा है। वह हाथ जिस भी रोगी का स्पर्श करते हैं, उसे निरोग करते हैं। वैसे सभी लोग जो भी कार्य करते हैं, हाथ से ही करते हैं, सारे कला-कौशल के कार्य हाथ से ही किये जाते हैं। लेखन, निर्माण, कृषि सभी कुछ तो हाथों से ही होता है। इन सभी में जो उत्कर्ष आता है, वह हाथों से ही आता है।

वैद्य का हाथ दो प्रकार से उत्कर्ष को देने वाला होता है। रोगी की नाड़ी देखकर, त्वचा का स्पर्श देखकर रोगी की चिकित्सा की जाती है तथा हस्ताभिमर्श चिकित्सा में रोगी के शरीर में जहाँ-जहाँ पीड़ा होती है, वहाँ हाथ का स्पर्श कर अथवा रोगयुक्त अंग के पास ले जाकर हाथ से रोग दूर किया जाता है।

वेद में अन्यत्र भी हस्ताभिमर्श चिकित्सा का वर्णन आया है। वहाँ मनुष्य द्वारा अपने हाथ के सामर्थ्य का वर्णन करते हुये कहा गया है, मेरा हाथ भगवान् है, ऐश्वर्यवान् है, ऐश्वर्य से महत् है। यह मेरा हाथ विश्व-भेषज है। वहाँ ‘अयं मे विश्व भेषजः’ कहा है। हाथ में समस्त समस्याओं के समाधान करने का सामर्थ्य है। इसलिये यहाँ ‘भेषज’ शबद का प्रयोग किया गया है। संस्कृत में ‘भिषक’ वैद्य के लिये है। परमेश्वर को ‘भिषकतम’ कहकर पुकारा गया है। वह परमेश्वर सब वैद्यों से भी बड़ा वैद्य है। ‘भिषकतमं त्वा भिषजां शृणोमि’-मैं भली प्रकार जानता हूँ, तु संसार के समस्त रोगों की दवा है। मनुष्य भी अपने हाथ को कहता है- यह हाथ विश्व-भेषज है। यह हाथ अभिमर्श चिकित्सा का सूत्र है, यह हाथ समस्त कल्याण को देने वाला और अकल्याण को दूर करने वाला है। हम यदि वाणी से न भी बोलें, तो भी हमारे शरीर के अंगों के स्पर्श से हमारे भाव दूसरे तक पहुँचते हैं, दूसरे को प्रभावित करते हैं। भारतीय शिष्टाचार में आशीर्वाद के रूप में अपने से छोटे के सिर पर हाथ रखा जाता है। बड़ा व्यक्ति प्रणाम करने वाले व्यक्ति के सिर पर हाथ रखकर ही प्रणाम के उत्तर में आशीर्वचन कहता है। माता-पिता, गुरुजन सिर पर हाथ रखते हैं। देवता भी सिर पर हाथ रखकर वरदान या अभय दान देते हैं। इसीलिये लोक में भी किसी व्यक्ति के निर्भय होने पर उसके बड़े का या परमेश्वर का हाथ उसके सिर पर होने की बात की जाती है। बालकों की पीठ पर हाथ रखकर उसका उत्साह बढ़ाया जाता है। किसी सफलता पर शाबासी दी जाती है। साथी के पीठ पर हाथ रखकर समर्थन जताया जाता है। तुम आगे बढ़ो, तुमहारी पीठ पर हमारा हाथ है।

इस मन्त्र में हाथ की विशेषता बताते हुए कहा गया है- ‘हस्तायां दश शाखायां’ दश शाखाओं वाले दोनों हाथों से। हाथ की योग्यता में आगे कहा है- ‘अनामयित्नुयां’ आमय रोग को कहा जाता है। ये हाथ रोग को दूर करने का सामर्थ्य लिये हुये हैं। इन रोगों को दूर करने वाले हाथों से मैं तेरा स्पर्श करता हूँ। मेरे हाथ का स्पर्श तुझे निरोग करने का सामर्थ्य रखता है। हाथ निरोग करने में समर्थ है, यह वाणी का कथन है- मैं तो रोगी को स्वस्थ करने की घोषणा करता ही हूँ। इसके अतिरिक्त जिन्होंने भी  मेरी इस योग्यता का लाभ उठाया है, उनकी वाणी भी मेरी योग्यता का बखान करती है। मेरी चिकित्सा से स्वस्थ हुये व्यक्ति सदा मेरी प्रशंसा करते हैं।

इस पूरे सूक्त में मनुष्य को किस प्रकार स्वस्थ रखा जा सकता है, यह कथन किया है। वायु चिकित्सा, जल चिकित्सा, आश्वासन चिकित्सा, स्पर्श चिकित्सा के सूत्र इन मन्त्रों में बताये गये हैं। सामान्य बात है कि शरीर जिन पंच महाभूतों से बना है, उनके कम अधिक होने पर मनुष्य रोगी होता है। इन भौतिक तत्त्वों का सामान्य रूप ही शरीर को स्वस्थ रख सकता है। अतः चिकित्सा में केवल एक ही विचार सपूर्ण नहीं होता। इसको वैद्यक पथ्यापथ्य कहते हैं। औषध का उपयोग करने पर भी यदि पथ्य न किया जाये तो औषध से पूर्ण लाभ प्राप्त नहीं हो पाता। पथ्य के महत्त्व को बताते हुए कहा गया है- यदि मनुष्य पथ्य करता है, तो बिना औषध के मनुष्य स्वस्थ हो जाता है। वैद्य को पता होना चाहिए कि रोगी के शरीर में कौन से तत्त्व की कमी है और कौन सा पदार्थ उस तत्व को पूरा कर सकता है। यही इन मन्त्रों का सन्देश है।

कुरान समीक्षा : खुदा ने हर बात लिख रखी है।

खुदा ने हर बात लिख रखी है।

खुदा खुद लिखता है या कोई उसने कलर्क या पेशकार इस काम के लिए नियत कर रखा है, हर बात लिखते रहने का उद्देश्य क्या है?

देखिये कुरान में कहा गया है कि-

इन्ना नह्नु नुह्यिल्-मौता व नक्तुबु………….।।

(कुरान मजीद पारा २२ सूरा यासीन रूकू १ आयत १२)

और हमने हर चीज खुली असल किताब यानी लौहे महफूज में लिख रखी है।

समीक्षा

डायरी में जैसे वकील व मुनीम जी हर बात को नोट करके रखते हैं, वैसे ही याद्दाश्त के लिए अरबी खुदा भी अपनी खुली किताब नाम की डायरी में लिख लेता था। वह असल किताब ही सीधी खुदा ने क्यों नहीं भेजी? यह क्या गारन्टी है कि मौजूदा कुरान ही असल किताब की वास्तविक नकल है?

कुर्बानी कुरान के विरुद्ध? -1

                 कुर्बानी कुरान के विरुद्ध?

(इस्लाम के मतावलमबी कुर्बानी करने के लिए प्रायः बड़े आग्रही एवं उत्साही बने रहते हैं। इसके लिए उनका दावा रहता है कि पशु की कुर्बानी करना उनका धार्मिक कर्त्तव्य है और इसके लिए उनकी धर्मपुस्तक कुरान शरीफ में आदेश है। हम श्री एस.पी. शुक्ला, विद्वान् मुंसिफ मजिस्ट्रेट लखनऊ द्वारा दिया गया एक फैसला  पाठकों के लाभार्थ यहाँ दे रहे हैं, जिसमें यह कहा गया है कि ‘‘गाय, बैल, भैंस आदि जानवरों की कुर्बानी धार्मिक दृष्टि से अनिवार्य नहीं।’’ इस पूरे वाद का विवरण पुस्तिका के रूप में वर्ष 1983 में नगर आर्य समाज, गंगा प्रसाद रोड (रकाबगंज) लखनऊ द्वारा प्रकाशित किया गया था। विद्वान् मुंसिफ मजिस्ट्रेट द्वारा घोषित निर्णय सार्वजनिक महत्त्व का है-एक तर्कपूर्ण मीमांसा, एक विधि विशेषज्ञ द्वारा की गयी विवेचना से सभी को अवगत होना चाहिए-एतदर्थ इस निर्णय का ज्यों का त्यों प्रकाशन बिना किसी टिप्पणी के आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत है। -समपादक)

न्यायालय श्रीमान् षष्ट्म अतिरिक्त मुन्सिफ मजिस्ट्रेट, लखनऊ

उपस्थितः- श्री एस.पी. शुक्ल, पी.सी.एस. (जे)

मूलवाद संखया-292/79

संस्थित दिनांक 30 अक्टूबर 1979

  1. श्री रामआसरे ग्राम प्रधान आयु लगभग 55 वर्ष पुत्र बिन्दा प्रसाद।
  2. श्री सुदधालाल आयु लगभग 50 वर्ष पुत्र श्री उधो लाल।
  3. श्री मदारू आयु लगभग 52 वर्ष पुत्र श्री भिलई।
  4. श्री राम भरोसे आयु लगभग 50 वर्ष पुत्र सरजू प्रसाद।
  5. श्री काली चरन आयु लगभग 40 वर्ष पुत्र श्री परमेश्वरदीन।
  6. श्री राम रतन आयु लगभग 51 वर्ष पुत्र श्री अयोध्या।
  7. श्री ब्रज मोहन आयु लगभग 36 वर्ष पुत्र श्री गुर प्रसाद।
  8. श्री मुन्ना लाल आयु लगभग 32 वर्ष श्री मैकू ।
  9. श्री बसुदेव आयु लगभग 56 वर्ष पुत्र श्री ललइ।

निवासी ग्राम सहिलामऊ, परगना व तहसील मलिहाबाद जिला लखनऊ

वादीगण

बनाम

  1. श्री शमशाद हुसैन आयु लगभग 36 वर्ष पुत्र श्री शाकिर अली।
  2. श्री फारुख आयु लगभग 32 वर्ष पुत्र श्री अन्वार अली।
  3. श्री मोहमद जान आयु लगभग 45 वर्ष पुत्र श्री नवाब अली।
  4. श्री यूसुफ आयु लगभग 32 वर्ष पुत्र श्री मोहमद जान।
  5. श्री अतहर अली आयु लगभग 40 वर्ष पुत्र श्री अबास।
  6. श्री अबास आयु 60 वर्ष पुत्र श्री मुराद इलाही।
  7. श्री सैयद अली आयु लगभग 70 वर्ष पुत्र श्री इलाही।
  8. उत्तरप्रदेश राज्य द्वारा डिप्टी कमिश्नर, लखनऊ।
  9. श्री योगेन्द्र नारायन जी डिप्टी कमिश्नर, लखनऊ।
  10. श्री परगना अधिकारी महोदय, मलिहाबाद, लखनऊ।
  11. सर्किल आफिसर, पुलिस सर्किल मलिहाबाद, लखनऊ।
  12. इन्चार्ज पुलिस थाना मलिहाबाद, लखनऊ।

निवासी 1 ता 7 तक निवासी ग्राम सहिलामऊ थाना, परगना व तहसील मलिहाबाद, जिला लखनऊ।

प्रतिवादीगण

वाद स्थाई व्यादेश

नकल निर्णय

वर्तमान वाद वादी ने प्रतिवादीगण द्वारा की जाने वाली कुर्बानी को प्रतिबन्धित करने के लिए दायर किया है। एन.पी. वादीगण के कथनानुसार वादीगण ग्राम-सहिलामऊ, परगना-मलिहाबाद जिला-लखनऊ के स्थाई निवासी हैं। उक्त ग्राम में कभी भी ईद-बकरीद के अवसर पर मुसलमानों द्वारा गाय-भैसों की कुर्बानी नहीं दी जाती रही है, परन्तु कुछ मुसलमानों ने हिन्दुओं की भावना को कष्ट पहुँचाने के लिए तथा सामप्रदायिक तनाव बढ़ाने के लिए और दंगाफसाद करने की नियत से दिनांक 1-11-79 को भैसों की कुर्बानी करनी चाही और इसके लिए इन लोगों ने रविवार को वादीगण को बुलाकर आपस में भैसों की कुर्बानी के बाबत बात-चीत की, तब उन्हें वादीगण ने समझाया कि इस गाँव में कभी भी भैसों की कुर्बानी नहीं हुई और उन्हें ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे परस्पर वैमनस्य और विद्वेष की भावना बढ़े। इस पर प्रतिवादीगण ने बताया कि उन्होंने प्रतिवादी नं. 10,11 व 12 से कुर्बानी करने की अनुमति ले ली है और प्रतिवादी नं.-1 के स्थान पर कुर्बानी अवश्य करेंगे। प्रतिवादी गण नं. 1 से 7 के इस प्रकार कुर्बानी करने से ग्राम सहिलामऊ में लोक व्यवस्था तथा लोकशान्ति भंग हो सकती है और सामप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है। प्रतिवादीगण का यह कार्य (भैसों की कुर्बानी करना) नैतिकता एवं जन स्वास्थ्य के विपरीत है, क्योंकि इससे गंदगी एवं न्यूसेन्स उत्पन्न होगी, साथ ही पशुवध नियमों का उल्लंघन भी होगा। यह कुर्बानी धार्मिक दृष्टि से अनिवार्य नहीं है और न धर्म की परिधि में आती है। दिनांक 3-2-79 को भैसों की कुर्बानी न करने की एवज में प्रतिवादीगण ने वादीगण के कथन को अन्शतः स्वीकार कर लिया। वाद का कारण दिनांक 28-10-79 को उत्पन्न हुआ और वर्तमान न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के अन्तर्गत है। वादीगण को ग्राम सहिलामऊ में प्रतिवादीगण द्वारा दी जाने वाली नई व अभूतपूर्व कुर्बानियों को रोकने का अधिकार है और उक्त अधिकार का बाजार मूल्य नहीं आंका जा सकता।

प्रतिवादी नं. 1 ता 7 ने अपने जवाब दावा में यह स्वीकार किया कि वादीगण उन्हीं के गाँव के निवासी हैं। शेष सभी अभिकथनों को अस्वीकार किया। अपने अतिरिक्त कथन में प्रतिवादीगण ने अभिकथित किया कि गाँव सहिलामऊ में करीब 400 मुसलमान मतदाता है और 394 अन्य धर्म के मतदाता हैं। मुसलमानों को भारतीय संविधान के अनुच्छेद-25 व 26 में कुर्बानी को करने का अधिकार है और उन्हें प्रदत्त धार्मिक स्वतन्त्रता के कारण इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। वर्तमान दावा चलने योग्य नहीं है। क्योंकि वादीगण के इस कृत्य से प्रतिवादीगण के मौलिक अधिकारों पर, साथ ही साथ भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 व 26 पर कुठाराघात हो रहा है। वर्तमान दावा गलत तथ्यों पर आधारित, दोषपूर्ण एवं परि-सीमा अधिनियम के बाधित होने के कारण चलने योग्य नहीं है।

प्रतिवादीगण की ओर से अतिरिक्त जवाब दावा में यह अभिकथित किया गया कि धारा-3 वादपत्र असत्य, निराधार एवं भ्रामक है। मुसलमानों को बकरीद व ईद के अवसर पर बकरी, भेढ़ा, भैंसा काटने का अधिकार है, क्योंकि इससे किसी की धार्मिक भावना को क्षति नहीं पहुँचती है। भैंसे की कुर्बानी नैतिकता के विपरीत नहीं है और न ही इससे आम जनता के स्वास्थ्य पर ही कोई विपरीत प्रभाव पड़ेगा। वादीगण यह बताने में असमर्थ रहे हैं कि यह कृत्य किस प्रकार जनता के लिए अस्वास्थप्रद होगा और न ही इससे न्यूसेन्स पैदा होगा। यह असत्य है कि जानवरों को काटने के नियमों का हनन होगा। बलि देना मुसलमानों का धार्मिक अधिकार है और उसके तहत बकरी, भेड़ा, ऊँट, भैंसा आदि की बलि अपनी सामाजिक स्थिति के अनुरूप दिया करते हैं और उन्हें उनके इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

प्रतिवादी गण की ओर से यह भी अभिकथित किया गया है कि जानवरों की कीमत रू. 1900/- ले लेने से उन्होंने वादीगण के अभिकथनों को स्वीकार नहीं कर लिया है और इससे मुकद्दमे के गुणावगुण पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा और यही कहकर प्रतिवादी गण ने पैसा वसूल किया जैसा कि आदेश दिनांक 3-11-79 के आदेश से स्पष्ट है। उपरोक्त आधार पर वादीगण का वाद चलने योग्य नहीं है।

उभय पक्ष को सुनकर एवं पत्रावली पर उपलबध अभिकथनों का अवलोक न कर निम्नांकित विवाद्यक मेरे पूर्व पीठासीन अधिकारी ने दिनांक 25-7-80 व 20-8-81 को बनायेः-

  1. क्या ग्राम सहिलामऊ थाना परगना तहसील मलिहाबाद लखनऊ में ईद-बकरीद के अवसर पर मुसलमानों द्वारा गाय, भैंस अथवा भैसों की कुर्बानी नहीं दी जाती रही है, जैसा कि वाद पत्र की धारा-2 में कहा गया है?
  2. क्या वादीगण को प्रतिवादीगण द्वारा दी जाने वाली कुर्बानी रोकने का अधिकार प्राप्त है, जैसा कि वाद पत्र धारा-4 में कहा गया है?
  3. क्या प्रतिवादी गण को कुर्बानी देने का भारतीय संविधान की धारा 25 व 26 में मूलभूत अधिकार प्राप्त है एवं वादीगण उसका हनन नहीं कर सकते, जैसा कि वादोत्तर में कहा गया है?
  4. क्या वाद का मूल्यांकन कम किया गया है एवं न्यायशुल्क कम अदा किया गया है यदि हाँ तो इसका प्रभाव?
  5. क्या वादीगण प्रतिवादीगण को रोकने से स्टोपिड होते हैं, जैसा कि वादोत्तर के धारा 10 में कहा गया है यदि हाँ तो इसका प्रभाव?
  6. क्या वादी किसी अनुतोष को पाने का अधिकारी है?
  7. क्या प्रतिवादीगण द्वारा भैसों की कुर्बानी नैतिकता के विपरीत है तथा जन-स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है तथा इससे न्यूसेन्स होगा व पशुवध के नियमों का उल्लंघन होगा, जैसा कि वादपत्र के पैरा-4 में उल्लिखित है?
  8. क्या प्रतिवादीगण कुर्बानी की एवज में धनराशि ग्रहण करके विवन्धित हैं, जैसा कि वादपत्र में धारा-6 में उल्लिखित है?

निष्कर्ष

विवाद्यक सं.-4

इस विवाद्यक को सिद्ध करने का भार प्रतिवादीगण पर है। इस विवाद्यक को प्रारमभिक विवाद्यक बनाना चाहिए था, परन्तु समभवतः साक्ष्य के अभाव के कारण इस विवाद्यक को प्रारमभिक विवाद्यक नहीं बनाया गया । प्रतिवादीगण की ओर से प्रमुख तौर पर यह तर्क दिया गया कि उक्त ग्राम में मुसलमानों की आबादी 400 है। सात व्यक्ति मिलकर एक भैंसे या बैल की कुर्बानी दे सकते हैं। इस प्रकार 400 को 7 से भाग देने पर 57 भैंसे आते हैं। यदि एक भैंस की कीमत रू. 300/- भी आंक ली जाए तो कुल कीमत रू. 17,100.00 होती है, जो वर्तमान न्यायालय के क्षेत्राधिकार से परे हैं। देखने में विद्वान अधिवक्ता का यह तर्क अत्यन्त सशक्त प्रतीत होता है, परन्तु प्रश्न यह उठता है कि क्या प्रत्येक मुसलमान बकरीद के दिन कुर्बानी करता है। विवादित बकरीद के अवसर पर केवल दो भैंसों के कुर्बानी करने की अनुमति प्रदान की गई। ऐसी दशा में इस प्रकार के उपशम का सांखयकीय मूल्याकंन कर पाना सम्भव नहीं है और अनुमानित मूल्यांकन ही अपेक्षित है।

वादी ने अपनी बहस के दौरान यह तर्क दिया कि रु. 1900/- प्रतिवादीगण को वादीगण द्वारा न्यायालय में दिये गये थे, वहाी वादीगण पाने के अधिकारी हैं, किन्तु जब  रु. 1900/- के बाबत उपशम की ओर ध्यान दिलाया गया तो उसने कहा कि उपशम ‘‘स’’ में यह तथ्य भी आ जाता है कि यदि वादीगण रु. 1900/- भी प्रतिवादीगण से वापस चाहते हैं तो निसंदेह ही उन्हें 1900/- पर न्याय शुल्क अदा करना होगा और इस प्रकार सपूर्ण वाद का मूल्यांकन रु. 1000+1900=2900 होगा।

उपरोक्त व्याखया के आधार पर विवाद्यक सं. 4 तदनुसार निर्णीत किया गया।

शेष भाग अगले अंक में……

 

कुरान समीक्षा : फरिश्तों के पंख भी हैं

फरिश्तों के पंख भी हैं

फरिश्तों की शक्ल कबूतर, ऊंट या कुत्ते जैसी है या आदमी जैसी है? स्पष्ट करें कि ये विलक्षण जीव कहां रहते है। तथा उनके होने में सबूत क्या है। उन्हें काल्पनिक क्यों न माना जावे?

देखिये कुरान में कहा गया है कि-

अल-हम्दु लिल्लाहि फाति…………।।

(कुरान मजीद पारा २२ सूरा फातिर रूकू १ आयत १)

उसी ने फरिश्तों को दूत बनाया जिनके दो-दो, तीन-तीन और चार-चार पर अर्थात् पंख हैं।

समीक्षा

पर यह नहीं बताया गया कि उनकी शक्ल गधे-सुअर बकरी या कौए की जैसी है या सर्प जैसी है?

अगर एक फरिश्ता कभी पकड़ में आ जावे तो किसी अजायब घर में देखने को दुनियाँ को मिल सकेगा। कुरान की फरिश्तों वाली कल्पना भी बड़ी ही मनोरंजक है।

फलित-योग

फलित-योग

– डॉ. सत्यप्रकाश

(प्रसिद्ध वैज्ञानिक, उच्चकोटि के आर्य विद्वान्, लेखक ओर वक्ता श्री स्वामी डॉ. सत्यप्रकाश जी सरस्वती की पुस्तक ‘योग सिद्धान्त और साधना’ से यह लेख पाठकों के अवलोकनार्थ प्रस्तुत किया गया है। – समपादक)

महर्षि पतञ्जलि का योगदर्शन हमारे षड्-दर्शनों में एक विशेष स्थान रखता है। भारतीय तत्त्वज्ञान के ये दर्शन उपांग कहलाते हैं, साधारण भाषा में इन्हें शास्त्र भी कह सकते हैं। इन सभी दर्शनों में विषयों का विवेचन सूत्रों के माध्यम से हुआ है, अतः इन्हें सूत्र-ग्रन्थ भी कहा जाता है। योगशास्त्र, योगदर्शन और योगसूत्र शबदों का जैसे ही हम प्रयोग करते हैं, हमारा ध्यान महर्षि पतञ्जलि के योग-सूत्रों की ओर जाता है।

भारतीय तत्त्वज्ञान के 6 सूत्र ग्रन्थों को (उपांगों को) तीन कोटियों में भी बहुधा वर्गीकृत किया जाता है- (1) सांय और योग, (2) न्याय और वैशेषिक, (3) पूर्वमीमांसा और उत्तर मीमांसा। उत्तर मीमांसा का नाम वेदान्त दर्शन भी है। इन्हें कभी-कभी शारीरिक सूत्र भी कहते हैं, क्योंकि शरीर के भीतर व्यापक या स्थित पुरुष या आत्मा इसकी विवेचना का विषय है। इस महान् आत्मा का नाम ब्रह्म भी है, अतः उत्तर मीमांसा नामक सूत्र-ग्रन्थ वेदान्त दर्शन, शारीरिक सूृत्र और ब्रह्म सूत्र नामों से भी विखयात है। पतञ्जलि महामुनि के योग दर्शन का जो पाठ हमें आज उपलबध है, उसमें चार पाद हैं-समाधिपाद (सूत्र संखया 51) साधनपाद (सूत्र संखया 55), विभूतिपाद (सूत्र संया 55) और कैवल्य पाद (सूत्र संखया 34)। समस्त योगदर्शन में इस प्रकार 51+55+55+34 अर्थात् 195 सूत्र हैं। महर्षि पतञ्जलि के योग दर्शन पर व्यासमुनि रचित एक प्रामाणिक और प्राचीन भाष्य भी मिलता है, जिस पर कई टीकायें और वृत्तियाँ भी हैं।

हमारे लिए यह कहना कठिन है, कि पतञ्जलि योगदर्शन जिस रूप में हमें आज मिलता है, वह उसका मूलरूप भी था, या उसमें किसी समय कुछ परिवर्तन भी हुए। प्राचीन हस्तलिखित प्रतियों से इस विषय पर कोई विश्वसनीय प्रकाश नहीं पड़ता। मेरी अपनी धारणा यह है कि इसके विभूतिपाद में जो विवरण है, वह कालान्तर में बाद को जोड़ा गया है। योगदर्शन को फलित बनाने के लिए और लोकप्रचलित करने के उद्देश्य से इस प्रकार के सूत्रों का किसी ने योगदर्शन में अपमिश्रण किया।

योग के आठ अंगों का उल्लेख साधनपाद में इस प्रकार है-

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहार-धारणाध्यानसमाधयोऽष्टावंगानि।

– योग 2।29

योग के आठ अंग हैं-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। समाधि योग का अन्तिम/चरम अंग है, फिर भी योगदर्शन का प्रथम पाद समाधिपाद नाम से विखयात है। योग के तीसरे पाद (विभूतिपाद) में धारणा, ध्यान और समाधि का उल्लेख किया गया और साधनपाद में अष्टांग योग के  प्रथम पाँच अंग ही लिए गए-यम-नियम-आसन-प्राणायाम और प्रत्याहार। शेष तीन अंग धारणा-ध्यान और समाधि (संयमत्रिक) विभूतिपाद के लिए छोड़े गए-क्यों? यह कुछ अस्वाभाविक-सा लगता है। धारणा विषय का अच्छा खासा उल्लेख योगदर्शन के प्रथम पाद (समाधिपाद) में भी आ जाता है। इस प्रकार कतिपय विषमतायें अध्येता को कठिनाई में डाल देती हैं। विभूतिपाद के प्रथम पन्द्रह सूत्रों की क्रमबद्धता स्वीकार की जा सकती है पर सोलहवें सूत्र से फलित-योग आरमभ हो जाता है, जो काल्पनिक ही नहीं, मिथ्या भी है-

परिणामत्रयसंयमादतीताऽनागतज्ञानम् – (3। 16)

परिणाम-त्रय के संयम से भूत और भविष्यत् (अतीत और अनागत) का ज्ञान होने लगता है।

इसी प्रकार सूत्र 17 में एक फल इंगित है-

शबदार्थप्रत्ययानामितरतेराध्यासात्

संकरस्तत्प्रविभागसंयमात्सर्वभूतरुतज्ञानम्।

– (3। 17)

शबद, अर्थ और प्रत्यय इनमें परस्पर अध्यास हो जाया करता है, तीनों में मिलावट या संकरता आ जाती है। संयम करने से तीनों अलग-अलग स्पष्ट होने लगेंगे, और तब साधक सभी प्राणियों की बोलियों को स्पष्ट समझने लगेगा।

अभिप्राय यह है कि योगी संयम-सिद्धि के अनन्तर ऐसी प्रतिभा प्राप्त कर लेगा कि पशुओं, पक्षियों, कीट-पतंगों की बोलियों को समझ सकेगा। हमारे प्राचीन भाषा शास्त्रियों ने शबद-अर्थ और प्रत्यय के सहज स्वाभाविक समबन्ध की यथार्थता पर विशेष बल दिया है। यदि यह स्वाभाविक समबन्ध पता चल जाय, तो हम किसी भी प्राणी की बोली को समझ सकते हैं। मैं इसे केवल फलित-योग कहूँगा, जो फलित ज्योतिष के समान अयथार्थ और अविश्वसनीय है।

फलित योग की गप्पों का क्रम आगे के सूत्र में भी स्पष्ट है-

संस्कारसाक्षात्करणात्पूर्वजातिज्ञानम्। (3। 18)

संस्कारों के साक्षात्करण से (अर्थात् उनमें संयम करने से) योगी को अपने पूर्व-जन्मों की बातों का ज्ञान होने लगता है।

फलित योग का क्रम आगे बढ़ता है-

प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम्। (3। 19)

प्रत्यय पर संयम करने से दूसरे के चित्त में क्या विचार उठ रहे हैं, इसका योगी को ज्ञान हो जाता है।

इसी प्रकार की अविश्वसनीय बातें विभूतिपाद के लगाग अन्तिम सूत्रों तक गयी हैं-योगी का अन्तर्धान हो जाना (21) मृत्यु के समय का पहले से ही आभास हो जाना (22) मैत्र्यादि पर संयम करने से अभूतपूर्व बल की उपलबधि (23) शरीर में हाथी और बलवान् पशुओं का बल आ जाना (24) सूक्ष्म, छिपी हुई और दूरस्थ वस्तुओं का ज्ञान हो जाना (25) सूर्य में संयम करने से सब लोकों का ज्ञान हो जाना (26) चन्द्र में संयम करने से ताराव्यूह (तारों की स्थिति और गति) का ज्ञान हो जाना (27) ध्रुव तारे में संयम करने से सप्तर्षि तारों की गति का ज्ञान हो जाना (28) नाभिचक्र में संयम करने से काया-तंत्र का ज्ञान हो जाना (29) कण्ठकू प में संयम करने से भूख-प्यास की निवृत्ति (30) कूर्मनाड़ी में संयम करने से शरीर की स्थिरता की सिद्धि (31) मूर्धज्योति में संयम करने से सिद्ध-पुरुषों के दर्शन (32) इत्यादि अनेक फलित बातें कही हैं और दूसरे के शरीर में प्रवेश करने की बात भी कही है (38)।

जिस किसी व्यक्ति ने (व्यष्टि या समष्टि ने) योग के इस फलित रूप का प्रचार किया, उसने योग के रहस्य को नहीं समझा और योग-तत्त्वज्ञान को बदनाम ही किया। योग कोई चमत्कार या सिद्धि का शास्त्र नहीं है। योगी ईश्वर का प्रतिद्वन्द्वी भी नहीं है, योगी जीवन के रहस्य को समझता है। योग मानव की अन्तर्निहित प्रतिभा को प्रस्फुटित करना चाहता है, पर ये प्रतिभायें शरीर को छोटा कर लेना (अणिमा) या महाकाय कर लेना नहीं है। योगी शरीर को भूमि से उठाकर अधर में प्राकृतिक नियमों के प्रतिकूल लटका नहीं सकता, योगी अपने शरीर को छोड़कर बाहर भी निकल नहीं सकता, बाहर निकल जाने पर अपने शरीर में पुनः प्रविष्ट होने की बात करना (किसी मृत शरीर में या जीव से प्रतिष्ठित शरीर में)नितान्त मूर्खता है। परमात्मा का दिया हुआ यह शरीर केवल तुमहारे लिए है, इसे तुम किसी को उधार नहीं दे सकते। तुमको इसमें से निकालकर कोई भी व्यक्ति बाहर कर सकता है, पर तुमहारे निकल जाने पर कोई अन्य इसमें प्रवेश करके बस नहीं सकता। इस अर्थ में हममें से प्रत्येक का शरीर अयोध्या-पुरी है, अर्थात् कोई भी विजेता इस शरीर में आकर बस नहीं सकता। एक बार तुम इसमें से निकले (अर्थात् तुहारी यदि मृत्यु हुई), तुम इसमें वापस नहीं आ सकते। तुमहारा अगला जन्म नये शरीर में ही होगा।

फलित योग की एक छोटी-सी झलक आपको यम-नियमों के समबन्ध में भी मिलेगी। यह पाँच हैं-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। अहिंसा महाव्रत के पालन करने से वैर-त्याग होता है।

अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्संन्निधौ वैरत्यागः (2। 35)

अर्थात् जो पूर्णरूप से अहिंसक है, उससे हिंसक पशु भी वैरभाव त्याग देते हैं, यह बात तो समझ में आती है। किन्तु

सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम्् (2। 36)

सत्य की पूर्ण प्रतिष्ठा होने पर योगी कर्मों के फल का दाता बन जाता है (या जिसकी वह कामना करता है, वह उसे प्राप्त हो जाता है) यह बात पूरी तरह संगत नहीं होती-‘‘क्रिया फलाश्रयत्व’’ क्या है, और सत्य-महाव्रत से इसका क्या समबन्ध है, यह निश्चयपूर्वक कहना कठिन है। सत्यनिष्ठ व्यक्ति का वचन पूरा होकर ही रहेगा, यह तथ्य कुछ सीमा के भीतर ही स्वीकारा जा सकता है। सत्यनिष्ठ होना और बात है और प्रतिज्ञाओं का पूरा होना दूसरी बात है।

अस्तेय (चोरी न करना, अपहरण न करना, जो अपने पुरुषार्थ से मिला है, उसी को पर्याप्त समझना) की परम-प्रतिष्ठा से क्या होता है? सूत्रकार का इस समबन्ध में वचन है-

अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् (2। 37)

अर्थात् जो अस्तेय का महाव्रती है, उसे सब रत्न सहज सुलभ हो जाते हैं। इस सूत्र में फलित योग की हलकी-सी झलक है। अस्तेय-प्रतिज्ञ व्यक्ति को दूसरे के धन की आकांक्षा नहीं होती, उसे धन का अभाव नहीं खटकता, वह परमपुरुषार्थी और अर्जित समपत्ति में ही सन्तुष्ट रहने वाला व्यक्ति है और वह पुरुषार्थ से प्राप्त धन का सदा सर्वलोक हिताय व्यय करता है। उसका कोई जनसेवी कार्य धन के अभाव में अपूर्ण नहीं होता, ऐसे उदार व्यक्ति में अर्थ शुचिता होती है, वह अपने स्वार्थ के लिए या अपनी संस्था के लिए धन की हेरा-फेरी नहीं करता, यह सब तो समझा जा सकता है, किन्तु यदि ‘‘सर्व रत्नोपस्थानम्’’ शबदों के तद्रूप अर्थ किए जायें तो कोई बात बनती प्रतीत नहीं होती। इसीलिए मैंने कहा कि इस सूत्र के शाबदिक अर्थ लिए जायँ, तो इसकी आड़ में धोखा देने का व्यवसाय प्रारा हो सकता है। फलित ज्योतिष के समान फलित-योग भी भयावह है।

अपरिग्रह के समबन्ध में जो फलित वार्ता जोड़ी गयी है, वह भयावह ही नहीं असंगत भी है-

अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोधः (2। 39)

अर्थात् जिसने अपिरग्रह महाव्रत का पूर्णतया पालन किया है, उस योगी को यह ज्ञान हो जाता है कि उसके पिछले जन्म कहाँ और कैसे थे। इसको मैं फलितयोग की श्रेणी में डालना चाहूँगा। इस भावना का आश्रय पाकर यमों का दृढ़व्रती संसार को छलने लगेगा। पूर्व जन्मों की कथा को न कोई जानता है, न जान सकता है, और न जानने से कोई लाभ ही है। अपरिग्रह का यमों की सूची में बहुत उच्च स्थान है, इसका अपना निजी महत्त्व है, किन्तु पिछले जन्मों की कथाओं से इसका कोई समबन्ध नहीं है।

यमों के समान पाँच नियमों के समबन्ध में योग सूत्रों में कुछ बहुत अच्छी बातें कही गयी हैं।

(1) शौच-नियम के पालन से अपने शरीरांगों में जुगुप्सा (हल्की-सी घृणा, नफरत या उपेक्षा) और दूसरों के स्पर्श में अरुचि की बात कही गयी है। योगी को दूसरों के संस्पर्श से उत्पन्न काम-रति से विरक्त बताया गया है-

शौचात्स्वांगजुगुप्सापरैरसंसर्गः (2। 40)

इससे अगला जो सूत्र है वह और भी अधिक स्पष्ट और सर्वथा उपयुक्त है-

सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्रयेन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च

– (2। 41)

अर्थात् शौच-नियम के व्रती की बुद्धि (सत्त्व) शुद्ध हो जाती है, उसमें सौमनस्य की भावना सबके प्रति उत्पन्न होती है, (अथवा उसके विचार सुस्पष्ट, संशय-हीन हो जाते हैं), चित्त की एकाग्रता प्राप्त होती है, उसे इन्द्रियों की लिप्सा पर विजय प्राप्त होती है, और उसमें आत्मदर्शन की पात्रता उत्पन्न होती है।

(सन्तोषादनुत्तमः सुखलाभः 2। 42)

सन्तोष से अनुत्तम या सर्वोत्कृष्ट सुख की प्राप्ति होती है।

इसमें सन्देह नहीं। तप से अशुद्धियों का क्षय हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप शरीर और शरीर की इन्द्रियों को पूर्णता प्राप्त होती है।

कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात् तपसः (2। 43)

स्वाध्याय-नियम के सफल अभयास से इष्टदेवता के साथ मिलन हो जाता है, अथवा इष्ट देवता और योगी के बीच में जो पार्थक्य है, वह दूर हो जाता है।

स्वाध्यायादिइष्टदेवतासप्रयोगः (2। 44)

कदाचित् इसका अभिप्राय है कि जिस-जिस विषय का स्वाध्याय किया जायेगा, उसमें अभिन्न रुचि उत्पन्न होगी, उस विषय के साथ एकात्य की स्थापना होगी। योगी का अध्ययन किया गया विषय समझा सा बन जायगा। स्वाध्याय शबद के दो-तीन अर्थ हैं-(1) वेदादि वाङ्मय का अर्थ सहित अध्ययन, (2) ओंकार या प्रणव का अर्थ भावना के अर्थात् पूर्ण निष्ठा और स्नेह के साथ कीर-वत् (तोते की तरह) नहीं, भावों को समझते हुए जप। एक तीसरा भी अर्थ है, स्वयं अपने का मूल्यांकन-हमारा उत्थान हो रहा है या पतन; हमारी विद्या, हमारी चरित्र समबन्धी नैतिकता और उनसे उपलबध आनन्द की राशि हममें बढ़ रही है या कम हो रही है इसकी स्पष्ट प्रतीति होते रहना भी स्वाध्याय है अर्थात् स्व का अध्ययन या मूल्यांकन।

अन्तिम नियम-प्रणिधान है-समस्त प्यार और स्नेहपूर्वक ईश्वर के प्रति अपना समर्पण, एकमात्र उसके आलबन या अवलब में रहना-

एतदालबनं श्रेष्ठम्, एतदालबनं परम्

एतदालबनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते।

– (कठ. 1। 2। 17)

समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात्। 2। 45

इसके परम अनुष्ठान से समाधि सुगम और सहज हो जाती है।

पाँचों यम और पाँचों नियमों के अनुष्ठान से क्या-क्या उपलबधियाँ होती हैं,उनका संक्षेप में वर्णन यहाँ इस स्थल पर हमने कर दिया। कुछ यमों के समबन्घ में फलित-योग का आभास-सा प्रतीत होता है, जो विषय की अनुरूपता के अनुकूल नहीं प्रतीत होता। इनकी अनुकूलता समझने में समभवतया क्लिष्ट भाष्य की सहायता लेनी पड़ेगी।

विभूतिपाद में फलित योग अवश्य है और उन सूत्रों की उपादेयता और विश्वसनीयता सदा सन्दिग्ध रहेगी। योगी और योग के जिज्ञासु से मेरा आग्रह है, कि उनसे बच कर रहे और उनको स्वीकार करने का हठाग्रह न करे। योग के इन फलित चमत्कारों ने योग विद्या को निन्दित किया है।