प्रभु हमारे पालक हैं तथा हमें सब कुछ देते हैं

प्रभु हमारे पालक हैं तथा हमें सब कुछ देते हैं
(सम्पूर्ण सूक्त)
डा. अशोक आर्य
ऋग्वेद के प्रथम मण्ड्ल के इस सप्तम सूक्त में बताया गया है कि सूर्य तथा मेघादि उस पिता की ही विभूतियां हैं । पिता ही हमें विजय़ी करते हैं , वेद ज्ञान का ओढना देता हैं, अनन्त दान करते हैं,हम प्रभु की ( उस गोपाल की ) गोएं हैं , जो हमारा पालन करने वाले हैं तथा हमें आवश्यक धन प्राप्त करते हैं ।
प्रभु गुणगान से मन शान्त,बुद्धि तीव्र व यज्ञात्मक
कर्म से शक्ति मिलती है
डा. अशोक आर्य
प्रभु के गुणगान करने वाले मानव का मन शान्त होता है । उसकी बुद्धि दीप्त हो जाती है , तेज हो जाती है। उसके हाथ यज्ञ जैसे उत्तम कर्म करते हैं , जिससे उसके अन्दर शक्ति का उदय होता है । इस मन्त्र में यह बात इस प्रकार प्रकट की गई है : –
इन्द्रमिद्गाथिनोबृहदिन्द्रमर्केभिरर्किणः।
इन्द्रंवाणीरनूषत॥ ऋ01.7.1
इस मन्त्र में तीन बातों पर बल देते हुए बताया गया है कि :-
१. साम गायन से शांति कि प्राप्ति
उत्तम स्वर में गाए जाने योग्य जो वेद है , उसका नाम साम वेद है । एसे वेद के मन्त्रों से , जो गायन करने के योग्य है , के मन्त्रों को गायन करते हुए उस पिता के उदगाता , उस प्रभु के भक्त , उस पिता के गुणों का गायन करने वाले लोग, निश्चित रुप से ही शत्रुओं को नष्ट करने वाले , उनका विदारण करने वाले , उन्हें क्लेष देने वाले , शत्रुओं को रुलाने वाले ,सब प्रकार के एश्वर्यों के स्वामी होने के कारण सब प्रकार के एश्वर्यों से सम्पन्न उस परम पिता परमात्मा का भरपूरर स्तवन करते हैं , उसका अत्यधिक मन से कीर्तन करते हैं तथा उसके गुणों का , उसके यश का गुणगान करते हैं ।
यह भक्त उस पिता का गुण गान सामवेद के मन्त्रों से गायन ही हुए करते हैं अथवा साम गायन करते हैं , क्योंकि साम कहते हैं शान्ति को । इसलिए साम के मन्त्रों का गायन करने से वह भी साम से युक्त हो जाते हैं अर्थात शान्ति से युक्त हो जाते हैं । उन के सब क्लेष दूर होने से उन का मन सब प्रकार के क्लेषों से छूट कर शान्त हो जाता है । साम गायन वास्तव में शान्त करने वाला ही होता है ।
२. ऋग्वेद ऋग = विज्ञान का साधक
इतना ही नहीं हम ऋग्वेद के मन्त्रों से भी उस पिता के गुणों का गायन करते हैं । हमारा वह प्रभु ऋग्वेद के मन्त्रों में भी बसा हुआ है । इस कारण उसे ऋग्वेद रुप भी कहा जाता है । एसे ऋग्वेद रुप मन्त्रों से अर्थात ऋग्वेद के मन्त्रों से युक्त प्रभु के भक्त , प्रभु के होता, प्रभु के यश का गायन करने वाले , उसका स्तवन , उसका कीर्तन करने वाले , ऋग्वेद के ही मन्त्रों से उस ज्ञान रुप , उस ज्ञान के भण्डार तथा परम एश्वर्यों के स्वामी उस इन्द्र का , उस पिता का , उस पूज्य प्रभु का अत्यधिक स्तवन करते हैं , उसके निकट जाकर उसका गायन करते हैं ।
जब यह भक्तगण ऋग्वेद की इन ऋचाओं के द्वारा परम पिता का स्तवन करते हैं , प्रभु के गुणों का गायन करते हैं तो इन ऋचाओं का भाव भी उन के अन्दर आ जाता है । इन ऋचाओं का भाव क्या है ? इन ऋचाओं के मन्त्रों में ऋक का विज्ञान भरा रहता है । इस कारण प्रभु के एसे भक्त के मस्तिष्क में भी ऋग – विज्ञान भरने वाले यह मन्त्र बनते हैं । भाव यह कि इन के गायन से ऋग – विज्ञान इन के मस्तिष्क में आकर इन्हें प्रकशित करता है तथा यह लोग इस ज्ञान से प्रकाशित हो जाते हैं ।
३. यजुर्वेद के स्वाध्याय से सबल
उन्नति की ओर उठने वालों को , उपर उठने वालों को अर्ध्व्यु कहा जाता है । एसे अर्ध्व्यु लोग , सब प्रकार से बल से युक्त कर्मों को करने वाले , वह सब कर्म जो बल से होते हैं , उन्हें करने के प्रणेता प्रभु की ही त्रितीय अर्थ की वाणी अर्थात यजुर्वेद के मन्त्रों से उस पिता की स्तुति करते हैं , उसकी निकटता प्राप्त करते हैं , उसके गुणों का गायन करते हैं ।
यजुर्वेद के मन्त्रों रुपि वाणियों से , यजुर्वेद के मन्त्रों के गायन से उस पिता का गुणगान ,यशोगान , कीर्तन , भजन व स्तवन करते हुए पिता के यह भक्तजन अधर्वु , उपर उठने वाले लोग , उन्नति पथ पर बढने वाले लोग अपने हाथों से यज्ञ आदि , परोपकार से युक्त उत्तम कर्म करते हैं । यह सदा ही एसे उत्तम कर्म करते है , जिससे दूसरों का भी हित हो । इस प्रकार के कर्म इन भक्तों को सबल करते हैं , सब प्रकार के बलों से युक्त कर , इन्हें बलवान बनाते हैं ।

डा. अशोक आर्य

एक महान् कर्मयोगी का महाप्रयाण

एक महान् कर्मयोगी का महाप्रयाण

– डॉ. रामप्रकाश वर्णी

युगपुरुष महर्षि स्वा. दयानन्द की उस दिव्यैषणा जो कि उन्होंने तदानीन्तन महाराणा जी के अनुरोध पर फाल्गुन कृष्णा 7/1939 वि.सं. को चित्तौड़गढ़ पहुँचकर, वहाँ की रानी पद्मिनी के जौहर और महाराणाओं के त्याग और शौर्य से सभृत स्वमातृभूमि के प्रति विहित आत्मोत्सर्ग के इतिवृत्त को सुनकर, भावविह्वल होकर सजल नयनों से अपने प्रिय शिष्य स्वा. आत्मानन्द सरस्वती के समक्ष प्रकट की थी, ‘‘चित्तौड़गढ़ वह पुण्यभूमि है जिसको देखकर प्रत्येक मनुष्य अपने कर्त्तव्यपालन के लिए प्रोत्साहित होता है, अतः निस्सन्देह यह अत्यन्त कल्याणात्मक बात होगी, यदि चित्तौड़गढ़ में गुरुकुल स्थापित हो जावेगा। हमारे देश के नवयुवक अपने जीवन की उन्नति के लिए सर्वोत्तम शिक्षा इसी स्थान पर प्राप्त कर सकेंगे।’’ महर्षि का हार्द-अभिलाष उनके असामयिक निधन के कारण तब तो पूर्ण नहीं हो सका, किन्तु उसको प्रो. ताराचन्द्र गाजरा द्वारा लिखित ञ्जद्धद्ग रुद्बद्घद्ग शद्घ स्ख्ड्डद्वद्ब ष्ठड्डब्ड्डठ्ठड्डठ्ठस्र में पढ़कर तच्छिष्यानुशिष्य ‘‘गुरुकुल काँगड़ी-हरिद्वार’’ विद्यातपोयां नितान्त निर्मल स्वान्त आदित्य ब्रह्मचारी युधिष्ठिर विद्यालङ्कार ने संन्यस्त होकर ‘वर्णिन् व्रतमेव धनन्ते’ सदृश श्रुतिसुखद-मुखर-मधुर आराव को हृदयङ्गम कर ‘व्रतानन्द’ बनकर ‘उदयपुरनगर’ में आश्विन शुक्ला नवमी वि.सं. 1984 में 08 ब्रह्मचारियों को लेकर एक गुरुकुल का समारभ करके पूर्ण किया। नाना अन्तराय सपात के भीमावर्तों में आघूर्णित होते हुए यही गुरुकुल माघ पूर्णिमा वि.सं. 1986 में ‘चित्तौड़नगर’ में स्थानान्तरित होकर कुछ काल तक चित्तौड़-दुर्ग की अधित्यका में अधिष्ठित भाड़े के भवनों में सञ्चालित होते हुए वि.सं. 1987 सन् 1931 ई. में ‘चित्तौड़गढ़-रेलवे स्थान’ के सन्निकट अपने वर्तमान सुरय प्राङ्गण में आ गया। यहाँ पर पू. स्वा. व्रतानन्द जी महाराज ने सतत् सावहित साधनारत रहकर देश के तात्कालिक विद्वत्तल्लजों को आचार्योपाचार्य के रूप में प्रतिष्ठित करके आर्ष पद्धति से ब्रह्मचारियों को वैदिक-लौकिक उभयविध वाङ्मय और उत्तम चारित्र्य की शिक्षा प्रदान करना आरभ किया। शुक्ल पक्षीय द्वितीया की चन्द्रचन्द्रिका की भाँति निरन्तर उपचीयमान यह भव्य और दिव्यधाम रूप गुरुकुल अपनी यशःसुरभि को दिग्दिगन्त में विकीर्ण करते हुए जग-गण-मन को प्रसह्य अपनी ओर समाकृष्ट करने में समर्थ होता चला गया। इसी यशः सौरभ का आघ्राण करके अजमेर जनपद के ‘यावर’ नगर के प्रसिद्ध नागर श्री मूलचन्द जी के पुत्र श्री महादेव जी ने ई. सन् 1942 में आत्म-प्रेरित होकर अपने पुत्र ‘यज्ञदेव’ को इस गुरुकुल में प्रवेश दिलाया।

शुचि-रुचि रोचिष्णु श्रद्धा-सुमेधा सपन्न इस दृढ़व्रती वर्णी ने श्रवण-मनन-निदिध्यासन पूर्वक अधीति-बोध-आचरण और प्रचारण से अपने अर्च्य आचार्यों और समानधर्मा सतीर्थ्यों को प्रसह्य अपनी ओर आकृष्ट किया तथा पुष्टि-तुष्टि, रति-धृति के द्वारा शक्ति-स्वस्ति का निष्कलुष लाभ लेकर स्व और स्वकुल को धन्य-धन्य कर दिया।

चारु-चारित्र्यचित्रित सारस्वत सत्र रूप अनन्ताध्वन के अथक अध्वा इस विचित्र यज्वा ने स्वल्पकाल में अपनी अशेष शेमुषी का समुचित सदुपयोग करते हुए वेद-वेदाङ्गों का तलस्पृक्-वैदुष्य अर्जित कर अपना कीर्तिकेतु दिग्दिगन्त में फहरा दिया। तत्कालीन ‘वाराणसेय सं. विश्ववि. वाराणसी, (उ.प्र.) से ‘वेद एवं नैरुक्तप्रक्रिया’ विषय में ‘आचार्य’ परीक्षा सर्वोच्च अङ्कों से उत्तीर्ण कर आगरा वि.वि. आगरा, (उ.प्र.) से संस्कृत विषय में ‘एम.ए.’ परीक्षा ‘स्वर्ण पदक’ प्राप्त करके उत्तीर्ण की। इसके अनन्तर ‘गुरुकुल-चित्तौड़गढ़ (रा.प्र.)’ की ‘वेदवागीश’ परीक्षा जो कि इस गुरुकुल की सर्वोच्च और अन्त्य परीक्षा थी, भी ‘शुक्लयजुर्वेद माध्यन्दिनवाजसनेयिसंहिता’ को विषय बनाकर 93 प्रतिशत अङ्कों से उत्तीर्ण कर अपने परीक्षकों को चमत्कृत कर दिया। अब वे ब्र. यज्ञदेव से आचार्य यज्ञदेव वेदवागीश ‘वेदायन’ जी बन गये थे।

इसके बाद वे समभवतः एक वर्ष तक उत्तरप्रदेशस्थ ‘मेरठ कॉ.मेरठ’ में संस्कृत-विभाग में यशस्वी प्राध्यापक के रूप में रहे, किन्तु उनके परमशिवैषी आचार्य स्वा. व्रतानन्द जी को तो उनसे कुछ और ही कराना अभिप्रेत था, अतः उन्होंने बलपूर्वक अपने कठोर और स्नेहिल आदेश से उन्हें उक्त कॉलिज से त्यागपत्र देकर पुनः गुरुकुल में आने को विवश कर दिया। इस प्रकार यहाँ आकर इनके जीवन की द्वितीय पाली प्रारमभ हुई। अब वे गुरुकुल के ‘मुयाधिष्ठाता’ पद पर अधिष्ठित कर दिये गये। उस समय गुरुकुल के चारों ओर भयङ्कर वन और उसमें हिंसक वन्यप्राणियों की विभीषिका भरी आवाजें तथा विषमविषज्वालभरति सरीसृपों की सणत्कारके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था। भवनों, भूमि और संसाधनों का अत्यन्ताभाव पदे-पदे मार्ग में अवरोध बनकर खड़ा था। साथ ही सांसारिक छलछद्म से कोशों दूर रहने वाले दुग्ध-धवल-अमल-कुल्येव भास्वर भाल मुग्धमना स्वामी व्रतानन्द जी ने गुरुकुल के सञ्चालन हेतु इतस्ततः प्रभूत धन राशि ऋण के रूप में धनिकों से ले रखी थी। परिणामतः यह गुरुकुल कर्ज के दल-दल में आकण्ठ विमग्न हो चुका था। इस प्रकार मुयअधिष्ठाता श्री ‘वेदायन’ जी के सामने एक ओर समस्त संसाधनों को जुटाकर गुरुकुल के सफल सञ्चालन की अतिविकट संकटाकीर्ण समस्या थी तो दूसरी ओर गुरुकुल को ऋणमुक्त और आत्मनिर्भर बनाने की दुर्घर्ष चुनौती भी थी। इसके लिए उन्होंने ‘मत्तेभकुभदलने भुवि सन्तिशूराः…..कन्दर्पदर्पदलनेविरला मनुष्याः’ को जानते हुए भी यावज्जीवंब्रह्मचारी रहने की भीष्म प्रतिज्ञा की और यह निहत्था ही महारथी संसार समर में दिग्विजय हेतु कूद पड़ा, जबकि कुछ साथी ‘ऊढ’ होते हुए भी ‘अनूढ’ रहने के लिए रक्ताक्त हस्ताक्षर करके प्रतिज्ञात होने के बाद भी पुनः ‘ऊढ’ हो चुके थे। इन्होंने अहर्निश कठोर परिश्रम करके ‘रायपुरिया’ में स्थित विशाल कृषिक्षेत्र को ‘मानसिंह ग्रुप’ से दान के रूप में प्राप्त करके मरणान्तक कष्ट झेलते हुए उस पर गुरुकुल का कबजा कराया तथा कृषि कार्य हेतु एक ‘मैसी-ट्रैक्टर’ जो कि आज भी है, दान में प्राप्त करके असमभव को भी समभव बनाकर दिखा दिया। गुरुकुल में नव्य-भव्य-भवन भी बने, जिनमें ‘गोविन्द भवन’ प्रमुख है। तब सन् 1980 ई. में स्वा. व्रतानन्द जी यशः शेष हुए तो उन्हीं के कुछ स्नातकों ने दुराभिसन्धिपूर्वक स्वामी जी के मिथ्या हस्ताक्षरों से एक ‘झूंठी वसीयत’ तैयार कराकर गुरुकुल पर अपना दावा ठोक दिया। महाभारत के अभिमन्यु की भाँति एक ओर सात-सात सशस्त्र महारथी दूसरी ओर निहत्था अभिमन्यु रूप यह एकाकी अरथी। उभयपक्ष में तुमुल संग्राम हुआ। महाभारत का अभिमन्यु तो छलपूर्वक मार डाला गया, किन्तु यह अभिमन्यु उन सभी को पराजित कर अतिविषम तद्रचित चक्रव्यूह को तोड़कर विजय पताका फहराते हुए बाहर निकल आया। अब ये इतने अनुभवी और नीतिनिपुण हो चुके थे कि थोड़े से ही समय में लगकर कार्य करके भारतवर्षीय यज्ञशालाओं में अद्वितीय ‘आर्षगुरुकुल’ एटा उ.प्र. की ‘यज्ञशाला’ को भी मात देने वाली सर्वथा सर्वात्मना अनुपम यज्ञशाला के निर्माणता बने। इसके साथ ही सपूर्ण गुरुकुल परिसर और रायपुरियास्थ ‘कृषिक्षेत्र की 7-10 फु ट ऊँची चारदीवारी बनाकर सभी प्रकार की क्षतियों से उसे विक्षत बना दिया। गोशाला, विद्यालय और छात्रावास एवं कई अतिथिशालाओं को सुसज्जित बनाकर एक सुतुच्छ बीज को ‘विशाल-वटवृक्ष’ का रूप देकर वे अपने कीर्तिशेष गुरुवर्य स्वा. व्रतानन्द जी की आशा-प्रत्याशाओं के साधु संवाहक बने।

अभी मैं जब 22 से 24 जुलाई 2016 तक उनके सान्निध्य में अध्युषित रहा तो उन्होंने ‘गुरुकुल परिसर’ से लेकर ‘रायपुरिया-कृषिक्षेत्र’ तक का सूक्ष्मवीक्षण कराया और अन्त में ‘गोविन्दभवन’ में बनाये गये उस विशाल ‘अन्न भण्डार’ को भी दिखाया जो गोधूम आदि अन्नों से परिपूर्ण था। उन्होंने बताया कि वर्ष में दो बार हमको पाँच-पाँच सौ बोरियों से भी अधिक अन्न कृषिक्षेत्र से प्राप्त हो जाता है तथा हमने ‘गभीरी नदी’ के तट पर स्थित खेत को बेचकर समभवतः चार करोड़ रु. की एक ‘स्थिरनिधि’ बना दी है, जिससे हमें लाखों रु. प्रतिमास सूद के रूप में प्राप्त हो जाता है। अब हम गुरुकुल के लिए किसी से दान नहीं लेते हैं। यदि कोई भूल से दान देता भी है तो हम विनम्रता पूर्वक वापिस कर देते हैं। इस प्रकार अब हमारा यह गुरुकुल सब भाँति आत्मनिर्भर हो गया है। फिर भी मुझे विगत कु छ वर्षों के घटनाक्रम और अब भी कुछ-कुछ गुरुकुल विरोधी तत्त्वों की दुश्चिकीर्षाओं को याद करके और सोच-सोचकर बहुत दुःख होता है और मेरा ‘रक्तचाप’ बढ़ जाता है। इस पर मैंने उन्हें सर्वविध तनावमुक्त रहने का व चिकित्सक की तरह ही परामर्श दिया तो वे गम्भीर होकर थोड़ी देर बाद मुस्कराये और बोले ‘तनाव किया नहीं जाता है, हो जाता है।’ उन्होंने चलते समय 24/8/2016 ई. को अपनी एक लेखमाला मुझे दी और कहा ‘इसको ग्रन्थ का रूप देना है।’ मेरे लिए उनका अन्तिम सन्देश था-‘‘तूफानों से कश्ती को लाये हैं निकाल के,

मेरे बच्चो, तुम रखना इसको सम्भाल के’’

मैं खुशी-खुशी गुरुकुल चि. से एटा लौट आया मुझे तनिक भी कहीं सेाी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि आचार्य जी इतनी जल्दी चले जायेंगे। लगता है उन्हें इससे भी कहीं ज्यादा कोई और कार्य करना था, इसलिए वे देश के स्वतन्त्रता दिवस पर गुरुकुल से भी स्वतन्त्र हो गये। इस धरती पर उनका कीर्तिकलाधर यावच्चप्रद्रिवाकारीं चमके गा भले वे यहाँ सशरीर न रहें।

मैं उनके समग्र कर्त्तृव्य को सश्रद्ध प्रणाम करता हूँ।

 

प्रभु भक्त का शरीर दृढ,बुद्धि उज्ज्वल तथा ह्रदय प्रेम से पूर्ण

प्रभु भक्त का शरीर दृढ,बुद्धि उज्ज्वल तथा ह्रदय प्रेम से पूर्ण
डा. अशोक आर्य
जो लोग ईश्वर के भक्त होते हैं , उनका शरीर मजबूत होता है , उनका मस्तिष्क ज्ञान से उज्ज्वल होता है तथा उनका ह्रदय प्रेम की स्निग्ध भावना के कारण पूर्णतया परिपूर्ण होता है । इस बात को मन्त्र इस प्रकार कह रहा है ।:-
इतोवासातिमीमहेदिवोवापार्थिवादधि।
इन्द्रंमहोवारजसः॥ ऋ01.6.10
इस मन्त्र में तीन बातों की ओर संकेत किया गया है :-
१ धन एश्वर्य का स्वामी
प्रभु भक्त तीनों लोकों में अपने उस पिता का निवास अनुभव करता है , उसे देखता है , सर्वत्र उसे प्रभु की महिमा दिखाई देती है । । इसे देखते हुए वह कह उठता है कि हमारा वह प्रभु परम एश्वर्यशाली है । वह दाता है , वह महादेव है । वह प्रभु ही देने वाला है । उससे ही हम याचना करते हैं , प्रार्थना करते हैं , धनेश्वर्य मांगते हैं । क्यों ? क्योंकि वह प्रभु ही धन आदि देने में सक्षम है । वह सक्षम कैसे है ? क्योंकि वह धन आदि का स्वामी है ।
स्पष्ट है कि मांगा उस से जाता है जिस के पास कुछ हो । जिसके पास स्वयं के पास ही कुछ नहीं है , वह दूसरों को क्या दे सकता है ? अर्थात कुछ भी नहीं । जब उसके पास कुछ है ही नहीं , वह स्वयं ही अपनी आवश्यकताएं पूर्ण करने के लिए दूसरों के आगे हाथ फ़ैलाए हुए है तो एसे याचक के आगे अपना हाथ फ़ैला कर कौन याचना करेगा । हम जानते हैं कि प्रभु के पास सब की याचना पूर्ण करने की शक्ति है , साधन है , इसलिए ही इस पार्थिव जगत मे अपने हितों की पूर्ति के लिए सब लोग याचक बन कर उसके आगे हाथ फ़ैलाते हैं ताकि वह हमें धन आदि देकर उपकृत करे । वह पिता ही इस पार्थिव जगत में धन आदि देने वाले हैं ।
पार्थिव जगत या पार्थिव लोक वास्तव में पृथ्वी ही है । जब तक पृथ्वी सुदृढ नहीं होगी तब तक इस पर न तो कुछ वनस्पतियां ही पैदा होती हैं तथा न ही इस पर कोई जीव ही रह सकता है । अत: इस धन आदि का स्वामी पृथ्वी का सुदृढ होना आवश्यक होता है । उपर हम ने जो सुदृढता के लिए याचना की है , वह वास्तव में इस पृथ्वी के लिए ही की है । हमारा शरीर भी तो पृथ्वी रूप ही है , इसका निर्माण भी तो पंचतत्वों का ही परिणाम है । इसलिए ही हम अपने शरीर को पृथ्वी के समान दृढ , मजबूत देखना चाहते हैं । इस लिए ही हम अपने उपर प्रभु कृपा चाहते हैं , आशीर्वादों से भरा उस पिता का हाथ अपने सर पर देखना चाहते हैं ताकि वह हमारे शरीर को वज्र के समान कठोर अथवा मजबूत बना दे । यह शरीर पत्थर के समान दृढ हो जावे तथा हम निरन्तर आसन , व्यायाम ,प्राणायाम करते हुए अपने इस शरीर को वज्र के समान बनाएं । यह ही हमारी प्रभु से कामना है , याचना है ।
२ प्रभु दीप्ती दो ,प्रकाश दो
हम सदा धनवान व साधन सम्पन्न बनना चाहते हैं । हम चाहते हैं कि हमारे पास इतना धन हो कि हम अपनी आवश्यकताएं स्वयं पूर्ण करने में सक्षम हों , किसी के आगे हाथ न फ़ैलाना पडे । इस लिए हम उस पिता से वह धन मांगते हैं जो देवलोक में होता है । हम उससे द्युलोक का एश्वर्य मांगते हैं । अब प्रश्न उठता है कि द्युलोक का धन कौन सा होता है ? मन्त्र कहता है कि द्युलोक का धन होता है दीप्ति , तेज , प्रकाश । हम उस पिता से दीप्ति मांगते है , ज्ञान का प्रकाश मांगते हैं , तेज मांगते हैं । जिस प्रकार द्युलोक में सूर्य चमकता है , उसका प्रकाश समग्र विश्व में फ़ैल जाता है , सब दिशाएं प्रकाशित हो जाती हैं । एसा ही ज्ञान रुपी प्रकाश हम अपने अन्दर देने की कामना उस पिता से करते हैं । ताकि हम भी सब दिशाओं को ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित कर पाने में सशक्त हो सकें ।
३ शीतल ज्योत्स्ना से परिपूर्ण हों
हमारा यह द्युलोक , हमारा यह अन्तरिक्षलोक महान है । इस महान अन्तरिक्ष से हम एसा धन , एसा एश्वर्य मांगते हैं , जो चन्द्र की शीतल , ठंडी किरणों के कारण शीतल ज्योत्स्ना से परिपूर्ण हो ज्योत्स्नामय ही हो रहा है । हम चाहते हैं कि चन्द्र की शीतल चांदनी के ही समान हमारा ह्रदय रुपि अन्तरिक्ष (जो अब तक रिक्त पडा है , खाली पडा है ) भी प्रेम से भरपूर , स्निगधता की भावना से अत्यंत शीतलता को, ठण्डक को प्रभावित करने वाला हो । यह सब में शीतलता भरने में , बांटने में सश्क्त हो , सक्षम हो ।
डा. अशोक आर्य

कुर्बानी कुरान के विरुद्ध?

कुर्बानी कुरान के विरुद्ध?

(इस्लाम के मतावलबी कुर्बानी करने के लिए प्रायः बड़े आग्रही एवं उत्साही बने रहते हैं। इसके लिए उनका दावा रहता है कि पशु की कुर्बानी करना उनका धार्मिक कर्त्तव्य है और इसके लिए उनकी धर्मपुस्तक कुरान शरीफ में आदेश है। हम श्री एस.पी. शुक्ला, विद्वान् मुंसिफ मजिस्ट्रेट लखनऊ द्वारा दिया गया एक फैसला  पाठकों के लाभार्थ यहाँ दे रहे हैं, जिसमें यह कहा गया है कि ‘‘गाय, बैल, भैंस आदि जानवरों की कुर्बानी धार्मिक दृष्टि से अनिवार्य नहीं।’’ इस पूरे वाद का विवरण पुस्तिका के रूप में वर्ष 1983 में नगर आर्य समाज, गंगा प्रसाद रोड (रकाबगंज) लखनऊ द्वारा प्रकाशित किया गया था। विद्वान् मुंसिफ मजिस्ट्रेट द्वारा घोषित निर्णय सार्वजनिक महत्त्व का है-एक तर्कपूर्ण मीमांसा, एक विधि विशेषज्ञ द्वारा की गयी विवेचना से सभी को अवगत होना चाहिए-एतदर्थ इस निर्णय का ज्यों का त्यों प्रकाशन बिना किसी टिप्पणी के आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत है। -समपादक)

पिछले अंक का शेष भाग…..

जहाँ तक भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25-26 का प्रश्न है उनमें प्रारमभ में ही ‘‘स्ह्वड्ढद्भद्गष्ह्ल ह्लश श्चह्वड्ढद्यद्बष् शह्म्स्रद्गह्म् द्वशह्म्ड्डद्यद्बह्लब् × द्धद्गड्डद्यह्लद्ध’’ शबद जुड़े हुए हैं, जो इस बात का प्रतीक हैं कि धार्मिक कृत्य कोई भी पबलिक आर्डर, नैतिकता एवं स्वास्थ्य के विपरीत नहीं किया जायेगा। उदाहरण के लिए हिन्दू धर्म भी सती प्रथा अथवा आत्मदाह किसी पाप के प्रायश्चित करने के प्रकार बताये गये हैं, परन्तु चूँकि वह उपरोक्त तीन शबदों के प्रतिकूल होने के कारण न्यायालय उन्हें इजाजत नहीं दे सकती।

इस बात को भी स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है कि दीवानी अधिकार (सिविल राइट) यदि मौलिक अधिकारों के समक्ष चुनौती उत्पन्न करते हैं तो मौलिक अधिकारों को वरीयता दी जायेगी और दीवानी अधिकार उस हद तक संशोधित एवं निरस्त समझे जायेंगे। यदि वादीगण को प्रतिवादीगण के विरुद्ध केवल दीवानी अधिकार ही प्रदत्त हैं, जबकि भैसें की कुर्बानी करना प्रतिवादीगण का मौलिक अधिकार है, तो निश्चय ही वह प्रतिवादीगण का मौलिक अधिकार माना जायेगा और वादीगण के दीवानी अधिकार निरस्त समझे जायेंगे। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने दुर्गा कमेटी अजमेर आदि बनाम सैयद हुसैन अली आदि ए.आइ.आर. 1964 पेज 1402 के अनुच्छेद 33 में यह स्पष्ट किया है कि बड़ी सफलतापूर्वक यह ध्यान देने योग्य है कि प्रचलित धर्म की रीति धर्म का आवश्यक एवं अभिन्न अंग है अथवा वह चली रीति धर्म का अभिन्न एवं आवश्यक अंग नहीं है और इस तथ्य को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 26 के आवरण में दिखाना होगा। उसी प्रकार प्रचलित धर्म रीति केवल अन्धविश्वास है अथवा अनावश्यक एवं स्वयं में धर्म का अंग न हो,    जब तक धार्मिक प्रचलित रीति आवश्यक एवं अभिन्न धर्म का अंग न हो। अनुच्छेद 26 के तहत सुरक्षा प्रदान नहीं की जा सकती तो उसका बड़ी सावधानीपूर्वक निरीक्षण करना होगा। दूसरे शबदों में संवैधानिक सुरक्षा उन्हीं धार्मिक रीतियों को देता है जो धर्म का आवश्यक एवं अभिन्न अंग हैं। पाक कुरान शरीफ की सन्दर्भित आयतों को देखकर एवं विद्वान् अधिवक्तागण के द्वारा प्रस्तुत किये गये तर्कों का सिंहावलोकन कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि भैंस-भैसे की कुर्बानी एक अन्ध विश्वास की देन है। पाक कुरान शरीफ अथवा इस्लाम का आदेश न होने के कारण इस्लाम धर्म का आवश्यक व अभिन्न अंग नहीं है। इस्लाम धर्म में बहुतेरे पैगबर, सिद्धहस्त फकीर एवं महान् मुसलमान आत्माओं को जन्म दिया है, जिन्होंने कोई कुर्बानी नहीं दी। इसका यह मतलब नहीं हुआ कि कुर्बानी के बिना बहिस्त प्राप्त नहीं हो सकता। वर्तमान वाद में प्रतिवादीगण भैंसे की कुर्बानी को इस्लाम का आवश्यक अंग सिद्ध करने में सर्वथा असमर्थ रहे हैं।

यहाँ पर मैं यहा भी कहना उचित समझता हूँ कि विभिन्न धर्मों के लोग महिला मऊ गाँव में रहते हैं, जहाँ अब तक भैंस-भैंसे की कुर्बानी नहीं हुई और यदि वे इसे बुरा मानते हैं और अहिंसा में विश्वास करते हैं, तो उनकी धार्मिक भावनाओं को भैंसे की कुर्बानी की इजाजत देकर ठेस पहुँचाना कहाँ तक उचित होगा, जबकि वे इतने सहिष्णु हो चुके हैं कि बकरे, भेड़, भेड़ा की कुर्बानी करने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं है।

मेरे समक्ष यह तर्क दिया गया है कि एक बड़े जानवर में सात व्यक्ति शरीक हो सकते हैं, इसलिये भैंस-भैंसे की कुर्बानी एक गरीब व्यक्ति के लिये लाजमी है, जबकि वह व्यक्ति इतना गरीब है कि एक बकरी खरीद कर कुर्बानी नहीं दे सकता तो क्या वह पबलिक आर्डर, नैतिकता की सुरक्षा, मलमूत्र, रक्त आदि विसर्जित करके ठीक से निर्वसन कर सकेंगे, इसमें सन्देह है और निश्चय ही गन्दगी को बढ़ावा मिलेगा। सरकार ने इसलिए बड़े जानवर को काटने के लिए बूचड़खानों का प्रबन्ध किया है।

यदि पाक कुरान शरीफ की गहराइयों में झाँका जाए और बारीकियों को परखा जाए तो व्यक्ति को काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह एवं अहं की कुर्बानी करनी चाहिये न कि बेचारे चौपायों की, जिन्हें चाँदी के कुछ सिक्कों में खरीदा जा सकता है। मनुष्य को इन्द्रियजित, मनोवृत्तिजित् होना चाहिये। किसी भी धर्म के आधारभूत सिद्धान्त हिंसा में विश्वास नहीं करते और मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि पाक कुरान शरीफ में भैंस-भैंसे की कुर्बानी का सन्दर्भ कहीं पर नहीं आया है अन्यथा मेरे समक्ष इस प्रकरण एवं तथ्यों पर हुई गवाही में अवश्य आता। इस साक्षी को अपने उलेमाओं से भी मदद लेने का अवसर था, परन्तु फिर भी यह साक्षी मेरे समक्ष इस प्रकार का कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका, जिससे अनुमान लगाया जायेगा कि पाक कुरान शरीफ अथवा इस्लाम में कुर्बानी करना फर्ज नहीं है और कुर्बानी भैंस या भैंसे की नहीं हो सकती।

साक्षी सं. 1 हाजी सैयद अली ने और साथ ही साक्षी सं. 5 मो. रफीकुद्दीन ने यह स्वीकार किया है कि कुर्बानी के अलावा भी अन्य तरीकों से भी बहिस्त प्राप्त हो सकती है, गरीब आदमी  इबादत के द्वारा बहिस्त प्राप्त कर सकता है। यदि कुर्बानी द्वारा ही एक मात्र बहिस्त प्राप्त किया गया होता तो निश्चय ही इस्लाम धर्म के सभी राजा-महाराजाओं सेठ-साहूकारों ने बहिस्त प्राप्त कर लिया होता और गरीब फकीर उधर लालयित होकर देखते रहते, जबकि सत्यता इसके प्रतिकूल है।

इसके विपरीत वादीगण की ओर से श्रीराम आर्य को परीक्षित किया गया, जिन्होंने करीब 80 किताबें धार्मिक विचारों पर लिखी हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि पाक कुरान शरीफ से समबन्धित आठ-दस किताबें उन्होंने लिखी हैं। कुरान शरीफ की छानबीन, कुरान शरीफ का प्रकाश व पुनर्जन्म, कुरान शरीफ में बुद्धि विज्ञान आदि कई किताबें लिखीं। इस साक्षी ने अपने मुखय कथन में स्पष्ट स्वीकार किया है कि केवल एक ही आदेश हज के समय ऊँट की कुर्बानी का है अन्य किसी जानवर की कुर्बानी का नहीं है। किसी दूसरे जानवर यानी भैंसे की कुर्बानी का आदेश पाक कुरान शरीफ में नहीं है। जो व्यक्ति भैंस-भैंसे को काटता है, उसकी कुर्बानी इस्लाम के खिलाफ है। इस साक्षी ने अपने मुखय कथन में यहा भी कहा कि उसने धार्मिक किताबें हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं में प्रकाशित की हैं। पृच्छा में इस साक्षी ने यह भी स्वीकार किया कि पाक कुरान शरीफ में कुर्बानी का जिक्र सूरे हज्ज में है, सूरे वक्र में नहीं। सूरे हज्ज में ही केवल कुर्बानी का आदेश है, अन्य कहीं नहीं। पारा बिना किताब देखे नहीं बता सकता। इस साक्षी ने यहा भी स्पष्ट इन्कार किया कि उसने कुरान शरीफ अथवा मुस्लिम कल्चर का पूर्ण अध्ययन नहीं किया है। इस साक्षी ने स्पष्ट स्वीकार किया कि कुरान शरीफ अरबी में उसने नहीं पढ़ा है, परन्तु कुरान शरीफ उसने कई बार पढ़ा। उसका ट्रान्सलेशन अहमद वसीर, काबिल तवीर, काबिल मौलवी लखनऊ, शाह अबदुल कादिर के तर्जुमें पढ़े हैं। इस साक्षी ने भी स्वीकार किया कि ये लोग आलिम हैं या नहीं, परन्तु इनका अनुवाद मान्य है। मैं इस स्वतन्त्र साक्षी के साक्ष्य को ग्राह्य करने का कोई औचित्य नहीं समझता, जबकि इस साक्षी की साक्ष्य का संपुष्टन सफाई साक्षी  नं. 5 मो. रफीकुद्दीन ने भी किया है और कुरान शरीफ में कुर्बानी फर्ज है, नहीं ढूँढ सका और अन्त में उसने विवश होकर यह स्वीकार किया कि हिंसा करना कुरान शरीफ में पाप है और सभी वस्तुएँ अल्लाह की बनाई हुई हैं, किसी को चोट पहुँचाना पाप है। ऐसी दशा में निःसंकोच कहा जा सकता है कि जब प्रतिवादीगण भैंस-भैंसे की बलि इस्लाम में सिद्ध नहीं कर पाये हैं तो उन्हें अनुच्छेद 25 व 26 भारतीय संविधान का लाभ नहीं मिल सकता और वे किस हद तक प्रतिवाद पत्र की धारा 10में वर्णित आधार पर लाभ पा सकते हैं, उत्तर नकारात्मक होगा।

उपरोक्त व्याखया के अनुसार विवाद्यक नं. 2,3 व 5 वादीगण के अनुकूल एवं प्रतिवादी गण के प्रतिकूल निर्णीत किये गये।

विवाद्यक सं. 7

इस विवाद्यक को सिद्ध करने का भार वादीगण पर है। इस समबन्ध में वादी साक्षी नं. 2 महन्त विद्याधर दास ने अपने मुखय कथन में अभिकथित किया कि कुर्बानी का प्रभाव जनता पर पड़ेगा। भैसों की कुर्बानी से हिन्दुओं में उत्तेजना फैलेगी, सामप्रदायिकता बढ़ेगी। इस गाँव में कोई पशुवधशाला नहीं है और न ही पशुवधशाला का अलग स्थान है। इस गाँव में कोई नाली आदि नहीं है जिससे भैंसों का खून आदि रास्ते में बहेगा। इस साक्षी से पृच्छा में जन स्वास्थ्य के बारे में एक भी शबद नहीं पूछा गया, केवल अन्तिम सुझाव दिया गया कि घर के अन्दर कुर्बानी करने से खुन आदि बहने का प्रश्न नहीं उठता, जिसे इस साक्षी ने इन्कार किया। इसके अतिरिक्त प्रतिवादी साक्षी नं. 6 डाक्टर मेहरोत्रा ने प्रथम प्रदर्शक-6 सिद्ध किया और बताया कि मेरे पूर्व डाक्टर श्री शर्मा ने यह प्रपत्र जारी किया था। पृच्छा में इस साक्षी ने स्वीकार किया कि जानवरों की बलि देने से बावत प्रमाणपत्र जारी करने के लिए पशु चिकित्सक अधिकृत नहीं है और न ही पशु चिकित्सक पशुबलि के लिए कोई आदेश अथवा स्वीकृति देना भी निश्चित नियमों के तहत है, जिसमें पशुओं का वध बूचड़खाना में ही हो सकता है, खुले स्थान में नहीं। खुले स्थान में पशुवध करना प्रतिबन्धित है। विवादित गाँव सहिलामऊ में कोई बूचड़खाना नहीं है। बड़े जानवरों को बूचड़खाने के अतिरिक्त अन्य किसी जगह पर काटना प्रतिबन्धित है। ऐसी दशा में यदि खुले स्थान में जानवर काटा जाता है तो निश्चय ही सामप्रदायिकता भड़केगी एवं समाज में घृणा फैलेगी, उनके खून के बहाव एवं हाड़ आदि की दुर्गंध से बीमारियाँ भी फैलने का अंदेशा रहेगा। यही नहीं, इस तथ्य को ध्यान में रखकर ही समभवतः प्रदर्श क-1 आदेश परगनाधिकारी कुमारी लोरेशन, दिगोजा एवं क्षेत्राधिकारी सुभाष जोशी ने जारी किया है।

उपरोक्त व्याखया के आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि विवाद्यक नं.-7 वादीगण के अनुकूल एवं प्रतिवादीगण के प्रतिकूल निर्णीत किया जाता है।

शेष भाग अगले अंक में……

 

हम प्रभु स्तवन करते हुए अपने जीवन को गुणों से अलंकृत करें

हम प्रभु स्तवन करते हुए अपने जीवन को गुणों से अलंकृत करें
डा.अशोक आर्य
प्रभु सर्व व्यापक है । उसकी महिमा को हम प्रत्येक लोक में देखें । हम सदा स्वयं को प्रभु में ही स्थित रखते हुए उस प्रभु का स्तवन करें, गुणगान करें । इस प्रकार हम अपने जीवन को गुणों रुपी अलंकारों से अलंकृत करते हैं । इस बात को ही मन्त्र में इस प्रकार कहा गया है । :-
अतःपरिज्मन्नागहिदिवोवारोचनादधि।
समस्मिन्नृञ्जतेगिरः॥ ऋ01.6.9
१. प्रभु के प्रकाश की ज्योति को प्राप्त कर
उस परमपिता परमात्मा का भक्त उस की आराधना करते हुए उस से प्रार्थना करता है कि हे चारों दिशाओं में सर्वव्यापक प्रभो ! आप हमें प्राप्त होइये । मानव जन्म में प्रभु को पाने की अभिलाषा रखता है । इस अभिलाषा की पूर्ति ही इस मानव का लक्ष्य है । इसलिए वह पिता से प्रार्थना करता है की हे पिता ! आप मुझे शीघ्रातिशीघ्र प्राप्त होइये, मिलिए, दर्शन दीजिए । आप हमें पृथ्वी लोक से , प्राप्त होवें चाहे आप हमें द्युलोक से प्राप्त होवें अथवा अन्तरिक्ष लोक से ( जो केन्द्र व विद्युत् की दीप्ती वाला है, जो केन्द्र व बिजली के प्रकाश से चमकने वाला है ) हमें प्राप्त होवें ।
पृथ्वी में जो अग्नि आदि देव हैं , जो आपके तेज को और भी तेजस्वी करने वाले देव हैं , मैं उन सब देवों का चिन्तन करता हुआ, स्मरण करता हुआ , उन सब देवों में आपसे स्थापित किये गए देवता का दर्शन करूं, उस देवता का दर्शन करुं, जिसे आपने अपने में स्थान दे दिया है । इतना ही नहीं मैं अंतरिक्ष लोक में भी, अंतरिक्ष के देवों के माध्यम से सदा आप ही की महिमा को देखूं , आप ही के दर्शन करुं । द्युलोक को प्रकाशित लोक कहते हैं, इस लोक में भी मैं सदा आप ही के प्रकाश को पाऊं, आप ही के प्रकाश को देखूं ।, आप ही का प्रकाश मुझे मिले । इस प्रकार तीनों लोकों में सर्वत्र मुझे आप ही के प्रकाश के दर्शन हों , आप ही का प्रकाश मुझे दिखाई दे तथा आप ही के प्रकाश की ज्योति को प्राप्त करुं ।
हे प्रभु मैं सर्वत्र आप ही की महिमा के दर्शन करुं । पृथिवी लोक हो चाहे अन्तरिक्ष लोक हो अथवा द्युलोक हो , जहां भी जाऊं सर्वत्र अपनी महिमा के द्वारा आप ही आप दिखाई दें , आप ही की महिमा सर्वत्र कार्यरत ,सर्वत्र गतिमान , सर्वत्र कर्मशील दिखाई दे तथा उस महिमा को देख कर , उस महिमा के दर्शन कर मैं अपने आप को उज्जवल करुं , धन्य करुं ।
२. परमात्मा में जीवन सुभाषित
इस प्रकार जो लोग सब स्थानों पर उस पिता की महिमा को देखते हैं , इस प्रभु स्मरण करने वाले लोग , प्रभु स्तवन करने वाले लोग, प्रभु का कीर्तन करने वाले लोग , प्रभु की निकटता पाने वाले प्रभु भक्त लोग इस परमात्मा में ही अपने जीवन को सुभाषित करते हैं , सजा लेते हैं । इस प्रकार इसे प्रभु की स्तुति करते हुए , इस प्रभु की आराधना करे हुए , इसे प्रभु का कीर्तन करते हुए , इसे प्रभु की समीपता पाने का यत्न करते हुए , यह प्रभु भक्त अपने जीवन को प्रभु के अनुरुप बनाने का यत्न करते हैं , जो गुण प्रभु में हैं , वैसे गुण स्वयं में धारण करने का निर्णय करते हैं । यह लोग स्वयं को भी उस पिता के सामान बनाने का निर्णय लेकर वैसा ही बनने का प्रयास करते हैं । जब यह लोग एसा यत्न ,प्रयास करते हैं तो उनके जीवन में सुन्दरता निरंतर बढ़ने लगती है तथा वह निरंतर सुन्दर तथा और सुन्दर बनते चले जाते हैं ।
डा. अशोक आर्य

आत्मा का स्थान-3

आत्मा का स्थान-3

–  स्वामी आत्मानन्द

चरक सुश्रुत आदि आयुर्वेद के सिद्धान्त ग्रन्थों में आत्मा का तथा  उस के निवास स्थान का वर्णन नहीं किया गया। उन्हें उस के वर्णन की आवश्यकता भी न थी, क्योंकि आत्मा की चिकित्सा उन के शास्त्रों का विषय नहीं। आत्मा की चिकित्सा तो अध्यात्म शास्त्रों का विषय है। इन शास्त्रकारों ने चेतना का वर्णन अवश्य किया है। क्योंकि चेतना की वृद्धि तथा रक्षा के उपाय बतलाना और उस के विकृत हो जाने पर उस से उत्पन्न हुए प्रमाद आदि रोगों की चिकित्सा करना उनके शास्त्रों का  विषय है।

अपनी अयुगत इस चेतना की सत्ता वे सारे ही शरीर में मानते हैं। क्योंकि शरीर में जितने आयन्तर अथवा बाह्य कार्य हो रहे हैं वे सब चेतना के प्रताप से ही हो रहे हैं ऐसा वे मानते हैं।

परन्तु हृदय का वर्णन करते समय इन आचायरें ने भी लिखा है ‘‘चेतना स्थानमुत्तमम्’’ (यह चेतना का उत्तम स्थान है)। यद्यपि ये आचार्य सारे शरीर को ही चेतना का स्थान मानते हैं परन्तु फिर भी इन का हृदय को चेतना का मुय स्थान मानना एक विशेष लक्ष्य की ओर ध्यान को आकर्षित करता है। इस से यह ध्वनित होता है कि चेतना का प्रधान आधार आत्मा है, और मुखय रूप से चेतना का स्थान वह ही होना चाहिये जहाँ आत्मा रहता हो। इसप्रकार इन ग्रन्थकारों ने हृदय को चेतना का मुखय स्थान कह कर प्रकारान्तर से हृदय को आत्मा का स्थान मान लिया है।

आयुर्वेद के एक संहिताकार आचार्य भेल ने चेतना का मुखय स्थान मस्तिष्क को माना है। उन का मन्तव्य है कि प्रमाद रोग मस्तिष्क का रोग है। इस रोग में चेतना ही दूषित होती है। यदि चेतना मुखय रूप से मस्तिष्क में न रहती हो तो मस्तिष्क के तन्तुओं में होने वाला प्रमाद चेतना को दूषित कर मनुष्य को पागल नहीं बना सकता।

उन के इस मन्तव्य की और आचार्यों के साथ इस प्रकार सङ्गति लग सकती है कि चेतना के एक साधन बुद्धि का निवास स्थान हमारा मस्तिष्क  है। बुद्धि के विकार का नाम ही प्रमाद रोग है। क्योंकि मनुष्य के सब ही निर्णयों में बुद्धि का प्रधान भाग रहता है। और पागल हो जाने पर उस का कोई निर्णय भी व्यवस्थित नहीं रहता। अतः समभव है उन्होंने चेतना के मुखय साधन बुद्धि के मस्तिष्क में निवास को ही वहाँ चेतना का मुखय निवास कहा है और साधारणतया वे भी हृदय को ही चेतना का मुखय स्थान मानते हों।

हम पहिले लिख आये हैं कि उपनिषद्कार ऋषियों ने आत्मा का स्थान हृदय कहा है ‘‘वह हृदय हमारे शरीर में कहाँ है’’ इस विषय का स्पष्टीकरण हम आगे के प्रसङ्ग में उपनिषदों के आधार पर ही करेंगे उपनिषदों में हृदय शबद बहुधा शरीर के किसी विशेष स्थान के अर्थ में ही आता है। परन्तु उपनिषदों में ही कतिपय स्थानों में यह शबद, मन और चित्त के अर्थों में भी प्रयुक्त हुआ है।

उपनिषदों के उन प्रसङ्गों का हम पहिले उल्लेख करेंगे जहाँ यह शबद मन के अर्थों में आया है।

यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः।

अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते।।

कठ 6/14

(जब ये कामनाएँ छूट जाती हैं जो इसके हृदय में वर्तमान हैं, उस समय मनुष्य अमर हो जाता है, और यहाँ ही ब्रह्मानन्द का उपयोग करने लग जाता है, जीवनमुक्त हो जाता है।)

यहाँ हृदय शबद मन का वाचक है, आत्मा अथवा मन के आश्रय, किसी स्थान विशेष का वाचक नहीं क्योंकि कामनाओं का आश्रय मन है न कि कोई स्थान विशेष। इसी प्रकार

यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः।

अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम््।।

कठ. 6/15

(जब वे सब गांठे खुल जाती हैं जो इस के हृदय में हैं, फिर मनुष्य अमर हो जाता है, यह इतना ही उपदेश है।)

यहाँ संस्कारों तथा अविद्या की गांठे मन के ही एक भाग चित्त में हैं, शरीर के किसी स्थान विशेष मे नहीं अतः यहाँ हृदय शबद चित्त का वाचक है। बृहदारण्यक के निम्न प्रसङ्ग से यह विषय और भी स्पष्ट हो जाता है।

कामः सङ्कल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धाधृतिरधृति र्हेर्धी र्भीरित्ये तत्सर्वं मन एव।

(कामनाएँ, सङ्कल्प, सँशय, श्रद्धा, अश्रद्धा, धैर्य, अधीरता, लज्जा, बुद्धि, भय यह सब मन ही है)

यहाँ कामनाएँ और सशंय आदि अविद्या की ग्रन्थियाँ सब मन के ही धर्म कहे हैं। किसी हृदय नामक स्थान विशेष को इन का आधार नहीं माना।

इसी प्रकार कोषकार अमरसिंह ने भी हृदय को मन का वाचक स्वीकार किया है।

‘‘चित्तन्तु चेतो हृदयं स्वान्त हृन्मानसं मनः’’

(चित्त, चेतस् हृदय, स्वान्त, हृत् मानस और मन ये सब एकार्थक हैं)

इन प्रसङ्गों से स्पष्ट है कि हृदय शबद मन के अर्थों में भी आता है इस के अतिरिक्त उपनिषदों में हृदय शबद शरीर के एक प्रदेश अर्थ में भी आता है। और वह प्रदेश ही आत्मा का निवास स्थान माना जाता है। हमारे शरीर में वे प्रदेश दो हैं । उन में से एक हमारी छाती के बाएं भागों में स्तन के नीचे है। और दूसरा शिर में ब्रह्मरन्ध्र में । इन दोनों हृदयों का परिचय हम पाठकों को उपनिषत्कार महर्षियों की समतियों के आधार पर ही देंगे। पहिले हम छाती के वाम वाले हृदय का साधक प्रमाण उपस्थित करते हैं।

‘‘अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशद्वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशदादित्यश्चक्षुर्भूत्वाऽक्षिणी प्राविद्दिशः श्रोतं भूत्वा कर्णौ प्राविशन्नोषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशंश्चन्दमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशन्मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशदापो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन्’’।

ऐतरेय 1/2/4

(अग्नि वाणी बन कर मुख में प्रविष्ट हो गया। वायु प्राण बन नासिका में प्रविष्ट हो गया। आदित्य चक्षु बन कर नेत्रों में प्रविष्ट हो गया। दिशाएँ श्रोत्र बन कर कानों में प्रविष्ट हो गई। औषधि वनस्पतियाँ रोम बन कर त्वचा में प्रविष्ट हो गई। चन्द्रमा मन बन कर हृदय में प्रविष्ट हो गया। मृत्यु अपान बन कर नाभि में प्रविष्ट हो गया। जल वीर्य बन कर जननेन्द्रिय में प्रविष्ट हो गया)

यहाँ इस प्रसङ्ग में शरीर-रचना की प्रक्रिया चल रही है। शरीर में इन्द्रियों के प्रवेश तथा उन के उपादान कारणों का उल्लेख किया जा रहा। आरमभ में वाणी का मुख में, प्राण का नासिका में, चक्षु का नेत्रों में श्रोत्र का कानों में रोम अथवा त्वच इन्द्रिय का त्वचा में प्रवेश दिखला कर फिर मन हृदय में प्रवेश दिखलाया गया है। और इस के अनन्तर फिर अपान का नाभि में और वीर्य का जननेन्द्रिय में प्रवेश कहा गया है। इस प्रकार यहाँ ऊपर मुख से लेकर नीचे के क्रमिक स्थानों में इन्द्रियों के प्रवेश का वर्णन है । इस प्रसङ्ग में अपान के नाभि में प्रवेश से प्रथम मन के हृदय में प्रवेश का उल्लेख है। हमारी नाभि से ऊपर के भाग में वह ही स्थान है जो हमारे स्तन के नीचे वाम भाग में है। इसलिये मन के प्रवेश के लिए यहाँ इसी शरीर के भाग को हृदय नाम से कहा गया है। अतः यह सिद्ध है कि मन का निवास इस हृदय में है। कभी इन्द्रियों का अधिष्ठाता यक्षमन इस हृदय में रहता है इस का विस्तार से वर्णन ‘‘मनो विज्ञान तथा शिव संङ्कल्प’’ में पढ़िये।

हमारा हृदय हमारे शिर में है उस के लिये भी हम उपनिषद् से ही प्रमाण उद्धृत करते हैं।

क्रमश…….

१ जनवरी विशेष : खतना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

जैसे की आप सब लोगो को विदित है कि नया साल अर्थात ईसाई नववर्ष आने वाला है और ईसाई इसे बड़ी धूमधाम से अपने अपने देशों में मनाते हैं। लेकिन भारत देश में ईसाइयों की आबादी लगभग २.५% है, फिर भी यहाँ इस देश में इस नववर्ष को ईसाई तो मनाते हैं लेकिन अधिकतर हिन्दू भी इस नववर्ष को बड़ी ही धूम धाम से मनाते हैं। भले ये वो हिन्दू हैं जिन्हें दीपावली, होली आदि में आतिशबाजी और रंग बिरंगे गुलालों से परहेज हो, मगर ईसाइयों के नववर्ष में ऐसे जोश में होते हैं कि आतिशबाजी भी करते हैं और मद्य आदि पेय तथा मांसाहार से परहेज नहीं करते। इन लोगों को क्या कहें ज्यादातर समस्या तथाकथित स्वघोषित धार्मिक गुरुओं ने ही प्रारम्भ की है। सांता के सफ़ेद दाढ़ी मूछ में कृष्ण को रंगना और धर्म की शिक्षा न देकर ईसाइयों के नये साल के बारे में न समझाकर मौन रहना, इन्हीं कारणों से हिन्दू समाज ईसाई और मुस्लिम त्योहारों में झूलता रहता है और अपने धार्मिक, ऐतिहासिक तथा वैज्ञानिक त्योहारों के प्रति उदासीन रवैया धारण करता है।
खैर आज हम चर्चा कर रहे हैं कि ये नया साल जो प्रत्येक १ जनवरी को मनाया जाता है वह क्या है? आइये देखे :

नया साल अर्थात् प्रत्येक १ जनवरी को ख़ुशी और जोश से मनाया जाने वाल दिन नया साल है क्योंकि क्रिसमस के दिन ईसा साहब पैदा हुए और इस क्रिसमस के आठवें दिन जो ईसा साहब का “खतना” (लिंग की रक्षार्थ चमड़ा ‘खिलड़ी’ काटना) हुआ था। ये खतना मुस्लिम समुदाय में भी किया जाता है। अतः ये तो सिद्ध हुआ कि ये दोनों संस्कृति कुछ भेद से एक हैं। अतः ईसा साहब के पैदा होने से आठवें दिन जो “लिंगचर्म छेदन संस्कार” अर्थात् खतना हुआ वह नया साल है

On the eighth day, when it was time to circumcise the child, he was named Jesus, the name the angel had given him before he was conceived.

[ Luke 2:21 ]

और जब बालक के खतने का आठवाँ दिन आया तो उसका नाम यीशु रखा गया। उसे यह नाम उसके गर्भ में आने से पूर्व भी पहले स्वर्गदूत द्वारा दे दिया गया था।

[ लूका २ | २१ ]

अब ये खतना तो हुआ ईसा साहब का और मनाते हिन्दू समाज के लोग हैं। वो भी पुरे जोशो खरोश से, ये बात समझ से बाहर है।

तो जो भी हिन्दू ये नया साल मनाते हैं, उन्हें जान लेना चाहिए कि खतना की परंपरा मूसा का नियम है। मूसा ईसाइयों और मुस्लिमो के बड़े पैगम्बर हुए हैं। खैर ये जान लीजिये की इसी मूसा के नियमानुसार ईसा का “लिंगचर्म छेदन संस्कार” खतना हुआ था।

And every male among you who is eight days old shall be circumcised throughout your generations, a servant who is born in the house or who is bought with money from any foreigner, who is not of your descendants.

[ Genesis 17:12 ]

जब बच्चा आठ दिन का हो जाए, तब उसका खतना करना। हर एक लड़का जो तुम्हारे लोगों में पैदा हो या कोई लड़का जो तुम्हारे लोगों का दास हो, उसका खतना अवश्य होगा।

[ उत्पत्ति १७ | १२ ]

On the eighth day the flesh of his foreskin shall be circumcised.

[ Leviticus 12:3 ]

आठवें दिन बच्चे का खतना होना चाहिए।

[ लैव्यव्यवस्था १२ | ३ ]

इसपर यदि कोई ईसाई कहे कि ये तो पुराना नियम है और इसे नहीं मानता। तो ये देखें यीशु ने स्वयं कहा:

Think not that I am come to destroy the law, or the prophets: I am not come to destroy, but to fulfil.

For verily I say unto you, Till heaven and earth pass, one jot or one tittle shall in no wise pass from the law, till all be fulfilled.

[ Matthew 5:17-18 ]

यह न समझो, कि मैं मूसा के धर्म नियम और भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकों को लोप करने आया हूँ।लोप करने नहीं, परन्तु पूरा करने आया हूँ।

मैं तुम से सच कहता हूँ कि जब तक आकाश और पृथ्वी समाप्त नो जाएँ, तब तक मूसा की व्यवस्था का एक एक शब्द और एक एक अक्षर बना रहेगा। वह तब तक बना रहेगा जब तक वह पूरा नहीं हो लेता।

[ मत्ती ५ | १७-१८ ]

उपरोक्त प्रमाणों से सिद्ध होता है कि ईसा का खतना  यानी “लिंगचर्म छेदन संस्कार” जन्म के आठवें दिन हुआ था जो ग्रैगोरियन कैलेंडर के अनुसार १ जनवरी होता है। यीशु के इसी “लिंगचर्म छेदन संस्कार” की खुशी में हर वर्ष नया साल के रूप में मनाया जाता है। वास्तव में तो ये खतना दिवस ही है, भले ही कोई इसे नया साल के रूप में मनाये।
आज तो कोई ईसाई शायद ही खतना कराता है। जबकि यीशु ने तो स्वयं खतना कराया। साथ ही साथ सभी को मूसा के नियमानुसार खतना कराने का आदेश भी दिया। क्या ये ईसाइयों द्वारा बाइबिल और यीशु के आदेश का उल्लंघन नहीं?

ग्रीक आॅर्थोडाॅक्स चर्च तो आज भी १ जनवरी को नया साल नहीं बल्कि खतना दिवस के रूप में ही मनाते हैं।
प्रमाण स्वरूप उनके 2017 के कैलेंडर को नीचे क्लिक करके देख सकते हैं –

On Sunday, January 1, 2017 we celebrate

खैर जो भी है। सबसे बड़ी बात है कि खतना करना, करवाना, ईसाई और मुस्लिम संस्कार है। हिन्दू समुदाय में ये घृणित कार्य माना जाता है क्योंकि यदि ईश्वर की रचना में कोई कमी होती तो ये खाल नहीं होती। लेकिन ईश्वर अपनी रचना में कभी कोई कमी नहीं करता, न ही किसी को इस शरीर में कांट छांट करने का अधिकार ही प्रदान करता है। अतः आप सबसे हाथ जोड़कर विनती है कि अपने अपने संस्कार सबको मानने चाहिए।

मगर हिन्दू समाज यदि १ जनवरी को “लिंगचर्म छेदन संस्कार” अर्थात खतना दिवस को सामूहिक रूप से अपने परिवार सहित मनाना ही चाहता है तो कृपया ईसा, मूसा और यहोवा की आज्ञा पालन करते हुए अपना भी खतना अर्थात “लिंगचर्म छेदन संस्कार” स्वयं करवा लेवे तभी इस संस्कार को ख़ुशी से मनाये।

हालाँकि वो हिन्दू जो इस “लिंगचर्म छेदन संस्कार” खतना दिवस को जोशो खरोश से मनाते हैं उनके लिए :

“बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना”

थोड़ा विचार कीजिए कि किसी आठ दिवसीय बालक के लिंगचर्म छेदन संस्कार के अवसर पर हर वर्ष पटाखे फोड़ेना, शायरियाँ भेजना, तरह तरह के पकवान खाना, मौज मस्ती करना क्या ये सब काम भले मानव के हो सकते हैं भला?
जो बोले हाँ! तो उनसे अनुरोध है कि अपने भी बच्चों के खतना दिवस पर हर वर्ष पार्टी का आयोजन करें, पटाखे जलाएँ, लोगों को ग्रिटिंग्स कार्ड बाँटेंऔर मौज मस्ती करें। साथ में अपने खतने किये हुए पुत्र को अवश्य बताएँ कि सुन आज ही के दिन तेरा खतना हुआ था। सो इस खुशी में हर वर्ष पार्टी चलती है। तू भी अपने आगे के बाल बच्चों का ऐसे ही करीयो।

अपने धर्म से प्रेम करने वाले हिन्दुओं से अनुरोध है कि अब से सेक्युलर हिन्दुओं को १ जनवरी पर “Happy Circumcision Day‘ या ‘खतना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ‘ अवश्य भेजें।

बहरहाल इतने सब प्रमाणों के बाद भी यदि कोई हिन्दू १ जनवरी को मनाना चाहता है। तो पंडित लेखराम वैदिक मिशन की ओर से उन सभी हिन्दुओं को Happy Circumcision Day। खतना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

हाँ अपने परिवार वालों, विशेषकर बच्चों को भी अवश्य बताएँ कि आप १ जनवरी क्यों मनाते हैं।

नमस्ते।

[रजनीश बंसल की भूमिका को मेरे द्वारा संपादित किया गया है।]