इस्लाम में नारी की स्थिति – २ :- कुरान में बीबियाँ बदलने का आदेश

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कुरान में बीबियाँ बदलने का आदेश

कुरान में लिखा है की-

    “अगर तुम्हारा इरादा एक बीबी को बदल कर उसकी जगह दूसरी बीबी करने का हो तो जो तुमने पहिली बीबी को बहुत सामान दे दिया हो तो भी उसमे से कुछ भी न लेना |

   क्या किसी को तौहमत लगा कर जाहिर बेजा बात करके अपना दिया हुआ वापिस लेते हो ?”

(कुरान सुरह निसा आयत २०)

तलाक देकर या बिना तलाक दिए मर्दों को इच्छानुसार आपस में अपनी बीबियाँ बदल लेने का अधिकार कुरान ने इस शर्त पर दिया है की इसे दिया हुआ माल वापिस न लिया जावे |

इस शर्त का पालन करने वाले दो दोस्त आपस में अपनी बीबियाँ ऐसे ही बदल सकते हैं जैसे लोग अपनी बकरी या गाय, भेंस आदि बदल लेते हैं |

हिन्दू समाज में पति-पत्नी का रिश्ता जीवन भर के लिए अटूट होता है, पर इस्लाम में मर्द जब चाहे तब अपनी पुरानी बीबी को अपनी पुराणी जूती की तरह नई नवेली बीबी से बदल सकता है |

इस्लाम में कोई बीबी नहीं जानती की उसका शौहर कब उसे किसी दूसरी नई बीबी से बदल लेवे | इसके लिए तलाक का आसान तरीका इस्लाम में चालु जो है |

 

मर्द सिर्फ तीन बार तलाक ! तलाक !! तलाक !!! औरत को बोल दे और तलाक जायज हो जाता है |

     देखिये:- कुरान में सूरते बकर रुकू २८ में आयत २२८ से २३७ तक तलाक का विधान मौजूद है | उस पर श्री अहमद बशीर साहब ऍम.ए. कामिल, तथा दवीर कामिल मौलवी अपने कुरान के भाष्य में पृष्ठ ५५ पर लिखते हैं की:-

तलाक का यह दस्तूर है की जब कोई मुसलमान मर्द अपनी औरत को तलाक देता है तो कम से कम दो आदमियों के सामने तलाक देता है, और एक महीनें के बाद दूसरी तलाक भी उसी तरह देता है |

    यहाँ तक तो मियाँ बीबी में सुलहनामाँ हो सकता है, परन्तु इसके एक महीने बाद तीसरी तलाक दी जाती है | इस तीसरी तलाक देने के बाद फिर मर्द उस औरत के पास नहीं जा सकता | यह औरत तीन महीना दस दिन बाद दुसरा निकाह गैर आदमी से कर सकती है |

     दुसरे पति के साथ निकाह हो जाने पर अगर दुसरा पति तलाक दे दे तो सिर्फ इस हालत में की वह दुसरे पति के साथ सम्भोग कर चुकी हो अर्थात हमबिस्तर हो चुकी हो, तो तभी अपने पूर्व पति के साथ फिर निकाह कर सकती है |

    परन्तु जब तक किसी दुसरे आदमी के साथ निकाह करके विषयभोग न कर ले (यानी हमबिस्तर न हो ले ) तब तक कदापि अपने पहले खाविन्द अर्थात पति के साथ निकाह नहीं कर सकती |

इस तलाक के विधान में हम केवल यह बात नहीं समझ सके की तीसरी तलाक के बाद औरत को गैर आदमी से निकाह व् सम्भोग कराने के बाद ही उसे तलाक देकर आने के बाद ही पूर्व पति स्वीकार करेगा, बिना गैर आदमी से सम्भोग कराये नहीं करेगा ?

दुसरा शौहर करके उससे कुकर्म कराने पर औरत में ऐसा कौन सा जायका बढ़ जाता है ? मौलवी लोग इसका खुलासा करें तथा इस अजीबोगरीब फिलासफी को ज़रा सबकी भलाई के लिए विस्तार से समझाए |

हमारी निगाह में तो इस रिवाज के मुताबिक़ औरत और भी ज्यादा बेशर्म बनेगी |

कुरान की इस आयत के समर्थन में बुखारी शरीफ में एक कथा दी है, जो हदीस न० ६९२ पृष्ठ ३३१ व् ३३२ पर लिखी है, देखिये-

हजरत आयशा फरमाती हैं की-

        “रफाअकुरती की औरत रसूलल्लाह सलालेहु वलैहिअसल्लम (मुहम्मद साहब) की खिदमत में हाजिर हुई और अर्ज किया की में रफाअ के पास (यानी उसके निकाह में) थी |

   उसने मुझे तीन तलाक दे दी उसके बाद मैंने अब्दुल रहमान बिन जबीर से निकाह कर लिया | परन्तु उसके पास (उसका लिंग) कपडे के फुन्दने की तरह है ! यानी उअसका ऐजातमासुल ढीला और नरम है |

    तब आपने फरमाया ! “क्या तू रफाअ के पास फिर जाना चाहती है ? नहीं ( तू नहीं जा सकती ) जब तक तू अब्दुल रहमान बिन जबीर का शहद न चख ले और वह तेरा शहद न चख ले” |

तिरमिजी शरीफ में भी सफा २२५ हदीस ९८१ में यही कथा दी है बस! फर्क सिर्फ इतना है की –

वहां शहद की जगह “जायका” न चख ले और तेरा शहद वह न चख ले  ये शब्द लिखे है |

आश्चर्य है इस्लाम में ऐसी शर्नाक बात को बीबी आयशा के मुहँ से कहलवाया गया है जिसे कोई भी औरत अपने मुहँ से कहना अथवा बताना पसन्द नहीं कर सकती |

 

740 thoughts on “इस्लाम में नारी की स्थिति – २ :- कुरान में बीबियाँ बदलने का आदेश”

    1. मर्दों को इच्छानुसार आपस में अपनी बीबियाँ बदल लेने का अधिकार कुरान ने इस शर्त पर दिया है की इसे दिया हुआ माल वापिस न लिया जावे |

      ye admin ya writer ka likhna hi uski kutsit mansikta ko darsata hai is par kutsit mansikta vale khush bhi honge

      1. नुजहत नाजनीन खान जी क्या आपने हदीस कुरआन सही से पढ़ी हैं यह जानकारी देना जी | हदीस कुरआन सबसे चर्चा करना शुरू कर दू तो ना जाने आप क्या कर डालो | हदीश में इतनी अश्लीलता है उसके बारे में चर्चा करना सही नहीं लगता मगर आपको इतनी जानकारी दे दू की हदीस में यह लिखा है की यदि दोस्त की बीवी पसंद आ जाए और जिसमानी सम्बन्ध के लिए तलाक दे दो और आपस में बीवी को बदल लो फिर जब मन भर जाए तो तलाक दे दो और पहली वाली बीवी से निकाह कर लो | और बहुत सी बाते हैं जो आपको यहाँ नहीं बोल सकता | इस्लाम में भोजन शराब और सेक्स ये तीन ही बातो पर तो जोर दी जाती है | ४ बीवी रख सकते हो | एक बात बताना औरत ४ शौहर क्यों नहीं रख सकती ? क्या यह औरत के साथ अन्याय नहीं किया गया है इस्लाम में | इस्लाम में औरत को तो बस उपभोग की वस्तु समझी जाती है | हदीस सब से ऐसी ऐसी बात रख सकता हु जिसे यहाँ लिखना या बोलना में शर्म आती है | यहाँ रखना सही नहीं इस कारण अब तक यहाँ उसकी जानकारी नहीं दी | कुछ और बात बोलना हो तो जरुर बतलाना जी | धन्यवाद |

        1. Jo aap me pass hai o aap ke bibi me pass kyo nhi hak to do no ka brabar hair. hdish ka flat matlb my nikalo

            1. Rishwa arya ji aap ved dharm ka prchar kijiy. Lekin Hindu Muslim ya baki dharma ke bare me galat jankari dekar burai karne se ved mahan nahi hoga. Dusre dharma KO pahchanne ki ya samajne ki kshamata apme nahi hai. Kyoki dusro ki burai karne se usme apki pahchan samaj atti hai.

              1. mere bhai sabse pahle dharam kise bolte hain kya kya lakshan hote hain use samjho… sabhi kaa dharam ek hota hai….. aur jo galat ho use galat naa bola jaaye kya yah sahi hoga…. jaise 2+2=4 hota hai koi use 5 bole to kya aap use nahi batlaaoge ??? aao saty ki maarg me aa jaao. laut chalo vedic dharam ki aor…..

          1. Yar ulti baat se baat sahi nahi ho jayegi jo galat hai woh galat hai use sweekar karne mai koi aapati nahi honi chaiye ………….ego khatam kar aur baat maan

            1. pehle sahi se khud study kero bhai bad me heme galat kehna……………or ager itni asani se apni bivi change kerne ki pratha islam me hoti to talak ki percentage islam me zaida hoti na ki hindus me…..

              1. इस्लाम में तलाक़ के नाम पर क्या अत्याचार होते हैं ये तो अब सबको पता है

        2. Bhai logo internet par islaam ke dusmano ne sab islaam ke khilaf likha he isme koi bhi baate quran se talluk nahi rakh ti.. or rahi baat net par koi bhi kuch to bhi kar sak taa he par quraan ki aayto ko nahi mota sak ta jo hafiz a qurasn ke dilo me he..ye sab islaam ke dusmano ki sajis he logo ka dhoyan bhat kane ke liye.. kiyo ki islaam puri duniya me bahut teji se fail raha he…

          1. @asim khan sahib

            aayaten to khud allah miyan mitata aur lata rahata hai
            baaki ki kasat bakari ne puri kar dee jo kuch kha gayee thee
            aur fir usman khaleefa ne jo alag alag tarh ke quran jala diye the

            Quran men ktinaee aayeten hein ye to kisee ko naheen pata Allama siyuti ko padh leejiye pata chal jayega

            usake bad Khomeni sahib ko padh leejiye wo kahte hein ki takreeban 17000 aayten thee ab batao ye kisne mitayeen

            baaki prof Rajendra ji ka ye lekh padh leejiye : allah ki registered DAK gum”

            http://aryamantavya.in/registered-post-of-allah-misplaced/

            1. Meri himmat nahi ho rahi phir bhi himmat karke likh raha hu .mere bhai badhi hi muhabbat or pyaar or izzat se aapse bata na chahta hu ki aapki jankari bilkul ghalat he .per shayad aap manenge nahi kyunki wo ghalat log jinhone islaam ko bigadne ki koshish me apni zindagi laga rakhi he or aap jese bhai bhi unki jhooti hadees ke jaal me padh gaye he .or rahi baat khumeni ya pro rajender sahab ki to me bhi kai hindu vidhwaan writer ki kitaabe aapko bata sakta hu jise padh kar aapki galatfehmi shayad door ho jaaye per aap padhenge nahi kyunki aapki aankho per nafrat ka chashma laga hua he .or rahi baat quraan ki aayaton ko mitane ki to ye bhi aapki jankaari ki kami he quraan ki aayat to door ek word bhi nahi jalaya umar farooque ne.per aap nahi manenge kyunki hum kisi ki ghalat fehmi to door kar sakte he per agar koi kisi ke dharam ko bura kehne ko hi apni aastha bana le to uska koi ilaaj nahi .per me aapse bahut impress hua hu yaqeen janiye . because aap agar islaam me burai nikaal rahe he to zaroor aapne study kiya hoga per afsos he mujhe apni Qom pe he ki aap tak sahi jankari nahi pahunchai .me tamam muslim ki taraf se aapse maafi chahta hu or allah se dua karta hu ki jese kuch ghalat logon ke bahkawe me aaker aap islaam ko bura samajh rahe he usi tarah allah kisi sahi aadmi ko aap tak pahuncha de jo aapko sahi jankari de .or aapka ye sab bolna mujhe ghalat nahi laga kyunki har insaan tak malik ka pegham pahunchana her achche insaan ki zimmedari he .or me apni zimmedari nahi nibha saka iske liye mujhe afsos he or me allah se maafi mangta hu .(apka bhai)

              1. Or ek baat me delhi se hu agar aap mujhse milna pasand kare to mujhe badhi khushi hogi me isliya ye keh raha hu ki shayad aaj ke baad is site pe aane ka moka milega ya nahi isliye mene apna no chor diya he aapka bhai aapke phone ka intezaar karega

              2. Jab aapke hisaab se allah ne hee hamen sahee rasta naheen dikhaya to isamne jimmedari to allah ki hai hamarei nahene

                allah hee doshee hua

          2. Sahi he bhai kisi par dhayan mat do ye sirf bahas kar sakte he aur karte rahenge.Sach kya he ye jankar bhi anjan banenge.Islam ka Rutwa hamesha uncha tha aur rahega InshahALLAH………

            1. इस्लाम का रूतबा अफगानिस्तान बंगलादेश सूडान लीबिया इरान ईराक में दीखता ही भाई 🙂

              1. यार रिशवा तुझे ये चार पांच मुस्लिम मुल्क ही दिखते है। इस्लामिक मुल्क 52 है कम से कम 40 मुल्क मे तो बहुत शांति है जैसे दुबई मलेशिया इंडोनेशिया बुर्नई और हिन्दुस्तानी मुस्लिम भी बहुत नरम है

                1. जनाब जो मुस्लिम बाहुल्य देश हैं वहाँ के यही हालत हैं
                  हिन्दुस्तान में भी जहाँ मुस्लिम बाहुल्य इलाके हैं कश्मीर वहाँ के हालात बयान कर ही रहे है कि आप कितने शांतिप्रिय हैं

                2. Or jitne v most dangerous country hai, itne khatarnak ki tourist ko v oha jane se roka jata hai. Ye sare muslim bahutayat des hai. Ap ise youtube par v dekh sakte hai

            2. bakwas karte ho galat afwah phela rahe ho jise theek se hindi padhna nahi aata wo arabi kya samjhega pichhe se baat karke dusron ko murkh banane waale darasal wo khudko hi murkh samjhe.dhatiya he🤗

          3. Sura 33 ayat 37 or 50 me jo likha h. Isko samjhaenge plz.
            Kya allah bahut meharban h apne nabio par ki un par dusre ki bibio ki koi tangi na rahe? Yaha nabi un striyo ko or msrdo ko 1 krna chahenge ya unki bibio se sadi?
            Hindu or bible me to ise vaybhichar kaha hai. Ap kya kahte h ise hmko samjhae plz.

            1. Pehle sahi se quran samje uske bad aakar discuss kijiye. Adhura knowledge hamesa khatarnak hota hai. Quran ek bemishal kitab hai jise padhkar bade bade scientis, astrologist and doctors ne islam accept kiya hai. Uske bad bhi aap agar bolna chahe kuch bhi to you can bad me aap par aur aapki bewakufi ki wajah se aapki family ki family par jo ajab aaye uske liye bhi ready rehna aur baki logo ko nasihat ke liye btana jarur. Aur aap log islam ke bare me discuss karenge jo un bhagvano ko pujte hai jo apni hawas puri karne ke liye hazaro sadiya karte the. Ek se puri hui to dusari dusari se puri hui to tusri and so on.. aap log aurato ki ijjat ke bare me btaoge wah kya din aa gaye 😁 Oh my goodness bhagvan tum logo ka sarjan har uski itni havas thi to aap logo ka to kya puchna.. openly kamsutra ke nam par aslil mandir bnakar logo ko rape ke liye upsana kya ye sikhata hai hindu dharam? India ma rape cases and rape karne walo ke dharam par ekbar research karo to sab pata chal jayega. Bad me yaha par aakar badi badi hakna. Bewakuf, anpad, gawar.. ek aur bat islam puri duniya me fela hai aese hi nai fela, alag alag kad alag alag color aur har tarike se alag log islam follow karte hai. Kabhi mecaa madina ka manjar dekhna tab pata chalega ke islam kya hai. Hindu dharam sirf india me hai aur india ke bahar bhi sirf indian log hi follow karte hai is religion ko. Islam ka knowlwdge batne se atchha hai ke vaid study karo aur logo ko vaid ka knolwdge do. It will better for you and others also.

              1. tanishaa ji….
                Quran ek bemishal kitab hai jise padhkar bade bade scientis, astrologist and doctors ne islam accept kiya hai. Uske bad bhi aap agar bolna chahe kuch bhi to you can ji aapne sahi bola… islaam beshak bemisaal kitaab hai tabhi to aurat ko kheti bola gaya hai…. kya aurat ko usi tarah bechaa jaa sakta hai jaise khet ko ??? magar haa islaam me bahut jagah aurat ko bech bhi di jaati hai… isis ne bhi aurat ko bechaa hai… khet ko rent par di jaati hai kya aapko yaa islaam ke aurat ko bhi rent par diyaa jaa sakta hai ??? khet ko bahut logo me share ki jaati hai kya aurat ko aapko share ki jaa sakti hai ??? aurat ko islaam me ijjajt hi kaha di gayi hai ??? ek mard == 2 auart kya ye nahi hai ??? ek mard== 4 aurat??? jab chaho talak talak bol do?? hadess bolta hai yadi koi aurat pyaar kare to aap usse jabardasti jismmani sambandh bana sakte ho??? jab chahe talak dekar apani biwi ko badal sakti ho …. fir dusari ki biwi se man bhar jaaye to talak dekar apani pahli biwi se nikaah kar lo… ek auart 4 nikaah kyu nahi kar sakti???ek mard 4 aurat se kyu nikaah kar sakta hai ??? aurat ko islaam me saman adhikaar kaha hai??? aap in sab baat ko batlana ji…. kshmaa chahta hu kuch bura bola ho to uske liye… in sabke jawab ke baad aur bhi sawal karunga… ye to bas shuru hai sawal karne ki… aur jo aap upar sawal kiye ho uska bhi jawab denge ham… magar pahle hame islaam ki jaankaari aap jaise gyaani logo se to ho jaaye… aapke jawab ki pratiksha me… dhanywaad

                1. Pehle App apna dimag thik Karo baad me kisi or ko family ki dhamki do. Islam matlab bakwas.
                  Jis dharm K log apne mulk me rehkar apne hi mulk me atankwadi ban jate ase dharm ko mane wale ya accept karne wale bewakuf hai .

                  1. kuch log atanki ho sakte hain
                    kuch logo par jhota iljam laga ho sakta hai
                    no problem…
                    but jitna aatank non muslim log bhi karte hain, usey tum dil & dimag se nahi dekhte

                    jis desh me rah kar, usi desh wasiyo pe jhoote iljam lagana & kannon ka ullanghan karna kya ye apradh-desh droh nahi? lol

                    1. jo bhi ho ji
                      sabse pahla apana naam likhe.. naam chhipane se kuch nahi ho jaata… isse lagta hai ki aapko mat majhab ko batlaane me sharm aati hai….
                      ab aap hame yah jaankaari dena jo bahut kam ko jaankaari hota hai yaha tak media neta vakil tak ko maalum nahi.. ve aise hi ho hangaama karte hain…
                      1) aatankwaad
                      2) ugrawaad
                      3) nakasal waad
                      ye kya hota hai jo upar maine sawal kiya… aur suno sabhi muslim aatankwaadi nahi hote isme koi sandeh nahi magar jo atankwaadi hote hain ve muslim hi kyu hote hain. shukra manao yaha ki dalal media aur gandi rajneta kaa jo votebank ke kaaran aatankwaad ko islam se nahi jodata.. america aur england me to kab kaa yah jaankaari de di gayi ki aatankwaad kaa majhab islam hoti hai. aur yah suno ji…. aur sab desh me kahi bhi yah aaryo aur hindu par iljaam nahi laga hai ki aatankwaad ka majhab hindu dharm hai sanatan dharm hai…
                      mere baato ko gaur se sochna aur jawab dena mere bandhu…

                  1. सनातन धरम में कोई गलत नहीं है | हां मत पंथ इत्यादि में जरुर है गलत

                2. Riswa aryaji…. ji apko quran ke bareme bahot pata hai achi bat hai…. lekin jo pata hai sab galat pata hai or ap islam ke bareme afwah faila rahe ho… yaha apko mai ek baat batana chahungi… islam me jina haram hai or isse hamare khuda ne hi manzoor nahi kiya hai na hamare nabi huzure akram sallalahu alaihi wassallam ne bhi mana kiya hai.. islam me ek se jada nikah karne ke liye isliye anumati di gayi hai taki koi besahara ko sahara mile or jina (vyabhichar) ko roka jaye…. ap ko mai batana chahungi ap jo islam ko galat or ganda dharm bata rhe ho kabhi apni bhagwano ko dekha b hai krishna ki priyasi koi or biwi koi or wo b 3. Shankar vishnu bramha kisi ne b ek hi shadi nae ki.eApke dharm me to khule aam rasleela manayi gayi gayi hai. Pandav paanch or unki ek hi biwi. Jisko b unhone daaw pr lagaya or haarne k baad puri mehfil me uska vastraharan. Indra ki sabha me apsaraye. Sadhu ko uksane wali menka… apke dharm me kaha koi aurat ko respect mili hai.. pati ke marne ke baad aurat ne sati jaane se to behtar hai shadi karke apna ghar basaye. Ap log k dharm me affair chahe jitne bhi karo shadi ek se karo .. ap logo ko islam hi mila hai badnam karne jab k islam ne hi aurat ki ijjat karna sikhaya hai…. kabhi acche or saaf dil se islam samzho galti kiski hai apko samaz ayegi.. or ek baat 14 saal vanwas agar raam ne kiya to seeta b uske saath gayi thi jab ke seeta ko nahi raam ko vanwaas hua tha or jab seeta ko raam ne waha se azaad kiya or laya to usse agni pariksha deni padi wo aisa q agar seeta paraye admi k yaha raam se alag rahi thi to raam b to seeta se alag Raha tha ye agni pariksha raam ne q nahi di…kya yaha aurat ko uska maan sanman mila…?? Muze bas itna kahna hai dusro par kichad mat uchalo cheeten apne hi upar udate hai…. ye jo yaha baatein hoti hai islam ke desho ki to waha jakr dekh lijiye jina (rape) karne walo ko sajaye maaut hoti hai na ke das saal k liye jail hoti hai jahatak dekha jaye muslim se jada non muslims country me jada rape hote hai q k yaha kanoon hi nahi hai agr hota to aj hamare desh ke mahan baba aj jail me nahi swarg seedhare hote ya fir pata nahi lekin islam me aise pakhandiyo ke liye jahannum hi hai…

                  1. Amrin ji,

                    Yadi adhik shadiyan karne se besaraharaon ko sahara mil jataa hai ye kahna theek naheen.
                    Sahara dene ke liye putri ya bahin bhee to banaya ja sakta hai chalo theek hai ho sakta hai aap apnee sanskriti ke anusar ise theek n samajhen.

                    Lekin ye bataiye ye ye 4 ki seema allah miyan ne achanak kyon laga dee .
                    aur jinhone aapne hisaab se 4 se adhik ko sahara de rakha tha unke sahare ko achanak kyon chhudwa diya gaya unko kyon alaga karawa diya gaya aur 4 se jyada ki permission Muhammad sahib ko hee kyon dee gayee.

                    Isake alawa islam men jo gulamon ko khareedane bechane ke jo legal riwaz hai uska kya ?
                    kya wo jayaz hai ?

                1. sahil ji
                  kya good tanisha ji…are unka jawab hamne diya uske baat ab tak jawab nahi aaya ..aur jo maine sawal puchha thaa…. hamare comment to parh liye hote ji aur jawab bhi… andhvishwaas aur purvaagrah ho chhodkar comment parhe…

              2. @Tanisha …chal hamare bhagwan ne kai shaidiya ki…but tere mohammad sahab ka kya….?
                Unhone to 6 saal ki aayesha se nikah kiya jab wo 60 k around the….apne bete ki biwi se nikah kiya….yahi character h tere prophet ka…
                jab islam ki foundation hi kisi characterless k uoar khadi hai…fir building to aisi hi hogi na…..
                aur rahi baat islam ki popularity ki wo isliye ki islam allow krta h ki tum aurto k sath jitni xhahe ayyashi kro..janwar ki tarah use kro n fek do….flexibility h..

              3. kia agar muslim aurat dusre se sambhog kartee hai to us ko tilak hota hai aur us ko tesre aadm se sambhog karna padta hai aur sab ko batana psdta hai saboot ke sath laikin hindu dharam mai aisa nahi ya to pati ko pata hi nahi chalta hai ya phir pati maf kar daita hai ya wo dusre ka sath bhagh jatee hai kise dusre mard se jabardasti nahi sambhogh karna padta hai aur aagmi ek se dusre aurat nahi rakh sakta char kaise yah to muslim hi rakh sakta hai chai wo ek ko bhi khush na kar sakee

              4. Jara kam Hanko……tum itni samajhdar aur padhi likhi ho tau narmai k rukh se safai do ya sahi explain karo…..bewakuf vagarah keh k auro ko babal k liye mat uksao……hum sab log shanti chahtey hai……..

            2. Biswajit Roy Chachaa!!
              Ye lo jawaab

              [al-Ahzaab 33:37]

              Shaykh ‘Abd al-Rahmaan al-Sa’di (may Allaah have mercy on him) said:

              The reason for revelation of these verses was that Allaah wanted to a prescribe a law for all believers, that adopted sons did not come under the same rulings as real sons, in any way, and that there was nothing wrong with those who had adopted them marrying their wives (after divorce).

              This was one of the regular customs which could not be changed except by means of a major incident. So Allaah wanted this law to be introduced by the words and actions of His Messenger. When Allaah wills something, He creates a cause for it. Zayd ibn Haarithah was called Zayd ibn Muhammad. The Prophet (peace and blessings of Allaah be upon him) had adopted him and he was called by that name until the verse “Call them (adopted sons) by (the names of) their fathers” [al-Ahzaab 33:5] was revealed, then he became known as Zayd ibn Haarithah.

              He was married to Zaynab bint Jahsh, the daughter of the paternal aunt of the Messenger of Allaah (peace and blessings of Allaah be upon him). It had occurred to the Messenger that if Zayd divorced her, he might marry her, and Allaah decreed that there should happen between her and Zayd that which would cause Zayd ibn Haarithah to come and ask the Prophet (peace and blessings of Allaah be upon him) for permission to divorce her.

              Allaah said “And (remember) when you said to him (Zayd bin Haarithah ÑÖì Çááå Úäå __ the freed‑slave of the Prophet Õáì Çááå Úáíå æÓáã) on whom Allaah has bestowed grace” i.e., by blessing him with Islam.

              “and you (O Muhammad Õáì Çááå Úáíå æÓáã too) have done favour” i.e., by manumitting him. When he came to you to consult you about leaving her, you told him, advising him despite what you felt in your heart towards her: “Keep your wife to yourself”, i.e., do not leave her, and bear whatever you face from her with patience. “and fear Allaah” in all your affairs in general, and with regard to your wife in particular, for fearing Allaah encourages one to be patient.

              “But you did hide in yourself that which Allaah will make manifest”. What he was hiding was that if Zayd divorced her, he (peace and blessings of Allaah be upon him) would marry her.

              “you did fear the people” when you did not disclose what you were thinking, “whereas Allaah had a better right that you should fear Him”, because fearing Him brings all goodness and wards off all evil.

              “So when Zayd had accomplished his desire from her” means, when he willingly turned away from her and separated from her, “We gave her to you in marriage” and We only did that for an important purpose, which is, “so that (in future) there may be no difficulty to the believers in respect of (the marriage of) the wives of their adopted sons” when they see that you married the (former) wife of Zayd ibn Haarithah, who had previously been named after you”

            1. marinakhaan ji
              sabse pahli baat yaha koi ladai nahi kar raha.. yaha ham charchaa karte hain… haa kuch muslim jarur fight karte hain kyunki ve gaali galauz karte hain… is kaaran laaanat to momin bandhu ko bole… raam krishn to hamare aadarsh hain…

            2. Give more….ur address no.
              Taaki dus dus launde teri g**nd maare aur mohammad bhi tujh par apne chhinte bheje

              1. कृपया इस तरह की बाते करना आप जैसे लोगो से उम्मीद नहीं की जाती | शालीनता से चर्चा करें |

                  1. in that case whats ur view on below verses of quran:

                    Quran (2:191-193) – “And kill them wherever you find them, and turn them out from where they have turned you out. And Al-Fitnah [disbelief or unrest] is worse than killing… but if they desist, then lo! Allah is forgiving and merciful. And fight them until there is no more Fitnah [disbelief and worshipping of others along with Allah] and worship is for Allah alone. But if they cease, let there be no transgression except against Az-Zalimun(the polytheists, and wrong-doers, etc.)” (Translation is from the Noble Quran) The verse prior to this (190) refers to “fighting for the cause of Allah those who fight you” leading some to claim that the entire passage refers to a defensive war in which Muslims are defending their homes and families. The historical context of this passage is not defensive warfare, however, since Muhammad and his Muslims had just relocated to Medina and were not under attack by their Meccan adversaries. In fact, the verses urge offensive warfare, in that Muslims are to drive Meccans out of their own city (which they later did). Verse 190 thus means to fight those who offer resistance to Allah’s rule (ie. Muslim conquest). The use of the word “persecution” by some Muslim translators is disingenuous – the actual Arabic words for persecution (idtihad) – and oppression are not used instead of fitna. Fitna can mean disbelief, or the disorder that results from unbelief or temptation. A strict translation is ‘sedition,’ meaning rebellion against authority (the authority being Allah). This is certainly what is meant in this context since the violence is explicitly commissioned “until religion is for Allah” – ie. unbelievers desist in their unbelief. [Editor’s note: these notes have been modified slightly after a critic misinterpreted our language. Verse 193 plainly says that ‘fighting’ is sanctioned even if the fitna ‘ceases’. This is about religious order, not real persecution.]

                    Quran (2:244) – “Then fight in the cause of Allah, and know that Allah Heareth and knoweth all things.”

                    Quran (2:216) – “Fighting is prescribed for you, and ye dislike it. But it is possible that ye dislike a thing which is good for you, and that ye love a thing which is bad for you. But Allah knoweth, and ye know not.” Not only does this verse establish that violence can be virtuous, but it also contradicts the myth that fighting is intended only in self-defense, since the audience was obviously not under attack at the time. From the Hadith, we know that this verse was narrated at a time that Muhammad was actually trying to motivate his people into raiding merchant caravans for loot.

                    Quran (3:56) – “As to those who reject faith, I will punish them with terrible agony in this world and in the Hereafter, nor will they have anyone to help.”

                    Quran (3:151) – “Soon shall We cast terror into the hearts of the Unbelievers, for that they joined companions with Allah, for which He had sent no authority”. This speaks directly of polytheists, yet it also includes Christians, since they believe in the Trinity (ie. what Muhammad incorrectly believed to be ‘joining companions to Allah’).

                    Quran (4:74) – “Let those fight in the way of Allah who sell the life of this world for the other. Whoso fighteth in the way of Allah, be he slain or be he victorious, on him We shall bestow a vast reward.” The martyrs of Islam are unlike the early Christians, who were led meekly to the slaughter. These Muslims are killed in battle as they attempt to inflict death and destruction for the cause of Allah. This is the theological basis for today’s suicide bombers.

                    Quran (4:76) – “Those who believe fight in the cause of Allah…”

                    Quran (4:89) – “They but wish that ye should reject Faith, as they do, and thus be on the same footing (as they): But take not friends from their ranks until they flee in the way of Allah (From what is forbidden). But if they turn renegades, seize them and slay them wherever ye find them; and (in any case) take no friends or helpers from their ranks.”

                    Quran (4:95) – “Not equal are those of the believers who sit (at home), except those who are disabled (by injury or are blind or lame, etc.), and those who strive hard and fight in the Cause of Allah with their wealth and their lives. Allah has preferred in grades those who strive hard and fight with their wealth and their lives above those who sit (at home).Unto each, Allah has promised good (Paradise), but Allah has preferred those who strive hard and fight, above those who sit (at home) by a huge reward ” This passage criticizes “peaceful” Muslims who do not join in the violence, letting them know that they are less worthy in Allah’s eyes. It also demolishes the modern myth that “Jihad” doesn’t mean holy war in the Quran, but rather a spiritual struggle. Not only is this Arabic word (mujahiduna) used in this passage, but it is clearly not referring to anything spiritual, since the physically disabled are given exemption. (The Hadith reveals the context of the passage to be in response to a blind man’s protest that he is unable to engage in Jihad, which would not make sense if it meant an internal struggle).

                    Quran (4:104) – “And be not weak hearted in pursuit of the enemy; if you suffer pain, then surely they (too) suffer pain as you suffer pain…” Is pursuing an injured and retreating enemy really an act of self-defense?

                    Quran (5:33) – “The punishment of those who wage war against Allah and His messenger and strive to make mischief in the land is only this, that they should be murdered or crucified or their hands and their feet should be cut off on opposite sides or they should be imprisoned; this shall be as a disgrace for them in this world, and in the hereafter they shall have a grievous chastisement”

                    Quran (8:12) – “I will cast terror into the hearts of those who disbelieve. Therefore strike off their heads and strike off every fingertip of them” No reasonable person would interpret this to mean a spiritual struggle. The targets of violence are “those who disbelieve” – further defined in the next verse (13) as “defy and disobey Allah.” Nothing is said about self-defense. In fact, the verses in sura 8 were narrated shortly after a battle provoked by Muhammad, who had been trying to attack a lightly-armed caravan to steal goods belonging to other people.

                    Quran (8:15) – “O ye who believe! When ye meet those who disbelieve in battle, turn not your backs to them. (16)Whoso on that day turneth his back to them, unless maneuvering for battle or intent to join a company, he truly hath incurred wrath from Allah, and his habitation will be hell, a hapless journey’s end.”

                    Quran (8:39) – “And fight with them until there is no more fitna (disorder, unbelief) and religion is all for Allah” Some translations interpret “fitna” as “persecution”, but the traditional understanding of this word is not supported by the historical context (See notes for 2:193). The Meccans were simply refusing Muhammad access to their city during Haj. Other Muslims were allowed to travel there – just not as an armed group, since Muhammad had declared war on Mecca prior to his eviction. The Meccans were also acting in defense of their religion, as it was Muhammad’s intention to destroy their idols and establish Islam by force (which he later did). Hence the critical part of this verse is to fight until “religion is only for Allah”, meaning that the true justification of violence was the unbelief of the opposition. According to the Sira (Ibn Ishaq/Hisham 324) Muhammad further explains that “Allah must have no rivals.”

                    Quran (8:57) – “If thou comest on them in the war, deal with them so as to strike fear in those who are behind them, that haply they may remember.”

                    Quran (8:67) – “It is not for a Prophet that he should have prisoners of war until he had made a great slaughter in the land…”

                    Quran (8:59-60) – “And let not those who disbelieve suppose that they can outstrip (Allah’s Purpose). Lo! they cannot escape. Make ready for them all thou canst of (armed) force and of horses tethered, that thereby ye may dismay the enemy of Allah and your enemy.” As Ibn Kathir puts it in his tafsir on this passage, “Allah commands Muslims to prepare for war against disbelievers, as much as possible, according to affordability and availability.”

                    Quran (8:65) – “O Prophet, exhort the believers to fight…”

                    Quran (9:5) – “So when the sacred months have passed away, then slay the idolaters wherever you find them, and take them captive and besiege them and lie in wait for them in every ambush, then if they repent and keep up prayer and pay the poor-rate, leave their way free to them.” According to this verse, the best way of staying safe from Muslim violence at the time of Muhammad was to convert to Islam: prayer (salat) and the poor tax (zakat) are among the religion’s Five Pillars. The popular claim that the Quran only inspires violence within the context of self-defense is seriously challenged by this passage as well, since the Muslims to whom it was written were obviously not under attack. Had they been, then there would have been no waiting period (earlier verses make it a duty for Muslims to fight in self-defense, even during the sacred months). The historical context is Mecca after the idolaters were subjugated by Muhammad and posed no threat. Once the Muslims had power, they violently evicted those unbelievers who would not convert.

                    [Note: The verse says to fight unbelievers “wherever you find them”. Even if the context is in a time of battle (which it was not) the reading appears to sanction attacks against those “unbelievers” who are not on the battlefield. In 2016, the Islamic State referred to this verse in urging the faithful to commit terror attacks: Allah did not only command the ‘fighting’ of disbelievers, as if to say He only wants us to conduct frontline operations against them. Rather, He has also ordered that they be slain wherever they may be – on or off the battlefield. (source)]

                    Quran (9:14) – “Fight against them so that Allah will punish them by your hands and disgrace them and give you victory over them and heal the breasts of a believing people.” Humiliating and hurting non-believers not only has the blessing of Allah, but it is ordered as a means of carrying out his punishment and even “healing” the hearts of Muslims.

                    Quran (9:20) – “Those who believe, and have left their homes and striven with their wealth and their lives in Allah’s way are of much greater worth in Allah’s sight. These are they who are triumphant.” The Arabic word interpreted as “striving” in this verse is the same root as “Jihad”. The context is obviously holy war.

                    Quran (9:29) – “Fight those who believe not in Allah nor the Last Day, nor hold that forbidden which hath been forbidden by Allah and His Messenger, nor acknowledge the religion of Truth, (even if they are) of the People of the Book, until they pay the Jizya with willing submission, and feel themselves subdued.” “People of the Book” refers to Christians and Jews. According to this verse, they are to be violently subjugated, with the sole justification being their religious status. Verse 9:33 tells Muslims that Allah has charted them to make Islam “superior over all religions.” This chapter was one of the final “revelations” from Allah and it set in motion the tenacious military expansion, in which Muhammad’s companions managed to conquer two-thirds of the Christian world in the next 100 years. Islam is intended to dominate all other people and faiths.

                    Quran (9:30) – “And the Jews say: Ezra is the son of Allah; and the Christians say: The Messiah is the son of Allah; these are the words of their mouths; they imitate the saying of those who disbelieved before; may Allah destroy them; how they are turned away!”

                    Quran (9:38-39) – “O ye who believe! what is the matter with you, that, when ye are asked to go forth in the cause of Allah, ye cling heavily to the earth? Do ye prefer the life of this world to the Hereafter? But little is the comfort of this life, as compared with the Hereafter. Unless ye go forth, He will punish you with a grievous penalty, and put others in your place.” This is a warning to those who refuse to fight, that they will be punished with Hell.

                    Quran (9:41) – “Go forth, light-armed and heavy-armed, and strive with your wealth and your lives in the way of Allah! That is best for you if ye but knew.” See also the verse that follows (9:42) – “If there had been immediate gain (in sight), and the journey easy, they would (all) without doubt have followed thee, but the distance was long, (and weighed) on them” This contradicts the myth that Muslims are to fight only in self-defense, since the wording implies that battle will be waged a long distance from home (in another country and on Christian soil, in this case, according to the historians).

                    Quran (9:73) – “O Prophet! strive hard against the unbelievers and the hypocrites and be unyielding to them; and their abode is hell, and evil is the destination.” Dehumanizing those who reject Islam, by reminding Muslims that unbelievers are merely firewood for Hell, makes it easier to justify slaughter. It explains why today’s devout Muslims generally have little regard for those outside the faith. The inclusion of “hypocrites” within this verse also contradicts the apologist’s defense that the targets of hate and hostility are wartime foes, since there was never an opposing army made up of non-religious Muslims in Muhammad’s time. (See also Games Muslims Play: Terrorists Can’t Be Muslim Because They Kill Muslims for the role this verse plays in Islam’s perpetual internal conflicts).

                    Quran (9:88) – “But the Messenger, and those who believe with him, strive and fight with their wealth and their persons: for them are (all) good things: and it is they who will prosper.”

                    Quran (9:111) – “Allah hath purchased of the believers their persons and their goods; for theirs (in return) is the garden (of Paradise): they fight in His cause, and slay and are slain: a promise binding on Him in truth, through the Law, the Gospel, and the Quran: and who is more faithful to his covenant than Allah? then rejoice in the bargain which ye have concluded: that is the achievement supreme.” How does the Quran define a true believer?

                    Quran (9:123) – “O you who believe! fight those of the unbelievers who are near to you and let them find in you hardness.”

                    Quran (17:16) – “And when We wish to destroy a town, We send Our commandment to the people of it who lead easy lives, but they transgress therein; thus the word proves true against it, so We destroy it with utter destruction.” Note that the crime is moral transgression, and the punishment is “utter destruction.” (Before ordering the 9/11 attacks, Osama bin Laden first issued Americans an invitation to Islam).

                    Quran (18:65-81) – This parable lays the theological groundwork for honor killings, in which a family member is murdered because they brought shame to the family, either through apostasy or perceived moral indiscretion. The story (which is not found in any Jewish or Christian source) tells of Moses encountering a man with “special knowledge” who does things which don’t seem to make sense on the surface, but are then justified according to later explanation. One such action is to murder a youth for no apparent reason (74). However, the wise man later explains that it was feared that the boy would “grieve” his parents by “disobedience and ingratitude.” He was killed so that Allah could provide them a ‘better’ son. [Note: This parable along with verse 58:22 is a major reason that honor killing is sanctioned by Sharia. Reliance of the Traveler (Umdat al-Saliq) says that punishment for murder is not applicable when a parent or grandparent kills their offspring (o.1.12).]

                    Quran (21:44) – “We gave the good things of this life to these men and their fathers until the period grew long for them; See they not that We gradually reduce the land (in their control) from its outlying borders? Is it then they who will win?”

                    Quran (25:52) – “Therefore listen not to the Unbelievers, but strive against them with the utmost strenuousness with it.” – The root for Jihad is used twice in this verse, although it may not have been referring to Holy War when narrated, since it was prior to the hijra at Mecca. The “it” at the end is thought to mean the Quran. Thus the verse may have originally meant a non-violent resistance to the ‘unbelievers.’ Obviously, this changed with the hijra and ‘Jihad’ after this is almost exclusively within a violent context.

                    Quran (33:60-62) – “If the hypocrites, and those in whose hearts is a disease, and the alarmists in the city do not cease, We verily shall urge thee on against them, then they will be your neighbors in it but a little while. Accursed, they will be seized wherever found and slain with a (fierce) slaughter.” This passage sanctions the slaughter (rendered “merciless” and “horrible murder” in other translations) against three groups: Hypocrites (Muslims who refuse to “fight in the way of Allah” (3:167) and hence don’t act as Muslims should), those with “diseased hearts” (which include Jews and Christians 5:51-52), and “alarmists” or “agitators who include those who merely speak out against Islam, according to Muhammad’s biographers. It is worth noting that the victims are to be sought out by Muslims, which is what today’s terrorists do. If this passage is meant merely to apply to the city of Medina, then it is unclear why it is included in Allah’s eternal word to Muslim generations.

                    Quran (47:3-4) – “Those who disbelieve follow falsehood, while those who believe follow the truth from their Lord… So, when you meet (in fight Jihad in Allah’s Cause), those who disbelieve smite at their necks till when you have killed and wounded many of them, then bind a bond firmly (on them, i.e. take them as captives)… If it had been Allah’s Will, He Himself could certainly have punished them (without you). But (He lets you fight), in order to test you, some with others. But those who are killed in the Way of Allah, He will never let their deeds be lost.” Those who reject Allah are to be killed in Jihad. The wounded are to be held captive for ransom. The only reason Allah doesn’t do the dirty work himself is to to test the faithfulness of Muslims. Those who kill pass the test.

                    Quran (47:35) – “Be not weary and faint-hearted, crying for peace, when ye should be uppermost (Shakir: “have the upper hand”) for Allah is with you,”

                    Quran (48:17) – “There is no blame for the blind, nor is there blame for the lame, nor is there blame for the sick (that they go not forth to war). And whoso obeyeth Allah and His messenger, He will make him enter Gardens underneath which rivers flow; and whoso turneth back, him will He punish with a painful doom.” Contemporary apologists sometimes claim that Jihad means ‘spiritual struggle.’ If so, then why are the blind, lame and sick exempted? This verse also says that those who do not fight will suffer torment in hell.

                    Quran (48:29) – “Muhammad is the messenger of Allah. And those with him are hard (ruthless) against the disbelievers and merciful among themselves” Islam is not about treating everyone equally. This verse tells Muslims that there are two very distinct standards that are applied based on religious status. Also the word used for ‘hard’ or ‘ruthless’ in this verse shares the same root as the word translated as ‘painful’ or severe’ to describe Hell in over 25 other verses including 65:10, 40:46 and 50:26..

                    Quran (61:4) – “Surely Allah loves those who fight in His cause” Religion of Peace, indeed! The verse explicitly refers to “rows” or “battle array,” meaning that it is speaking of physical conflict. This is followed by (61:9), which defines the “cause”: “He it is who has sent His Messenger (Mohammed) with guidance and the religion of truth (Islam) to make it victorious over all religions even though the infidels may resist.” (See next verse, below). Infidels who resist Islamic rule are to be fought.

                    Quran (61:10-12) – “O You who believe! Shall I guide you to a commerce that will save you from a painful torment. That you believe in Allah and His Messenger (Muhammad), and that you strive hard and fight in the Cause of Allah with your wealth and your lives, that will be better for you, if you but know! (If you do so) He will forgive you your sins, and admit you into Gardens under which rivers flow, and pleasant dwelling in Gardens of’Adn- Eternity [‘Adn(Edn) Paradise], that is indeed the great success.” This verse refers to physical battle in order to make Islam victorious over other religions (see verse 9). It uses the Arabic root for the word Jihad.

                    Quran (66:9) – “O Prophet! Strive against the disbelievers and the hypocrites, and be stern with them. Hell will be their home, a hapless journey’s end.” The root word of “Jihad” is used again here. The context is clearly holy war, and the scope of violence is broadened to include “hypocrites” – those who call themselves Muslims but do not act as such. Other verses calling Muslims to Jihad can be found here at

                    1. are janab link nahi praman dein reference ke saath jiske baad ham uska jawab dene ki koshish karenge …

                    2. are janab link nahi praman dein reference ke saath jiske baad ham uska jawab dene ki koshish karenge …

          1. Abe chootiye 33 hajaar devataon ko hum nahi poojate hain..साला तुम मुसलमान लोग की ना अक्कल घुटने में होती है।। अबे संस्कृत में सनातन धर्म के 33 कोटि के देवता होते हैं।।
            और कोटि का मतलब होता है प्रकार यानी types 33 टाइप्स के देवता होते हैं जो पूज्यनीय होते हैं।।
            जैसे :-सूर्य, चंद्र,अग्नि,वायु,जल, ब्रह्मा ,विष्णु,महेश,
            इत्यादि 33 प्रकार के देवता होते हैं।। जिनकी पूजा तुम सभी को भी करना चाहिए।। और हाँ अगर हमारे देवताओं से इतनी ही नफरत है तो पानी पीना छोड़ दे, धुप लेना तथा सूर्य का फायदा लेना छोड़ दे,आग का उपयोग करना छोड़ दे, हवा लेना छोड़ दे, अरे हम सनातन हिन्दू धर्म से हैं जो इन देवताओं का एहसान मानते हैं और इनकी पूजा करते हैं।। तुम साले यहाँ भी काफ़िर ही हो की सब लेते हमारे देवताओं से हो और उन्ही को गाली देते हो।। आज साबित हुआ।।।।

          1. ji ham koi mat majhab sampraday ko nahi maante … ham to bas saty sanatan vedic dharam ko maante hain… aur dharam sabhi mat majhab ka ek hi hota hai ji….

        3. Bhai Sab Islam me a bhe khagya ke right hand se khyrat do to left hand ko pta na chale.Aap sochege are a Kya bat hai,to Jnab matlab a ke Allah ke rah me kharch Kro to apne aor apne Rab ke alawa kese aor ko pta na chale,ese tarha tlak dene ke bat karna to dur sochna bhe pap hai,Islam me Jo tlak ke shart par gor kre ke tlak de kar dubara use aorat se shade karna chahe to us aorat ke dusre shade ho kar o us mard ke sat rat betai aor tlak ke bad shade karsakta hai ,matlab a ke tlak de ne se pahle mard soche ga aor tlak he nadega,Jo tlak dega mere najar me o namard hai,kuo ke koi mard apne keep ko bhe kse ke sat rat gujarne nhe dega to apne aort ko tlak de ,o sochega bhe nhe.to Jnab a hai Islam aor us ka kanun,

          1. Abdul rashed bhaijaan
            jo hamne bataya ki apni biwi ko dost ki biwi se badalne ke liye talak de do sirf sex ke liye… is tarh ki baate aapke hadees me jaankaari di gayi hai… jab hamne parhaa hai tabhi jaankaari dii.. yadi nahi parha hota to aisa naa bolta.. are hadees me yaha tak bol diya gaya hai ki apane biwi kaa doodh bhi pi sakte ho stan se… bhaijaan thoda hadees parhe…. hadees me hi hai yadi koi aurat aapko pyaar karti ho to uske man se yaa jabardasti aap usse sambandh bana sakte ho…. kripya hadees parhe… aao ved ki aor laute… dhanywaad

        4. यह मर्द को एक तरह की सजा है.. कोई मर्द पसंद नहीं करता कि उसकी बीबी किसी और से सम्भोग करे तलाक को किसी ने पसंद नहीं किया.. तलाक जब कोई मजबूरी हो जब दे वर्ना औरतों से पीछा छुड़ाने के लिए लोग. मार देते.. जैसे बहुत से करते हैं।

          1. saeed bhai jaan
            यह मर्द को एक तरह की सजा है.. कोई मर्द पसंद नहीं करता कि उसकी बीबी किसी और से सम्भोग करे तलाक को किसी ने पसंद नहीं किया.. तलाक जब कोई मजबूरी हो जब दे वर्ना औरतों से पीछा छुड़ाने के लिए लोग. मार देते.. जैसे बहुत से करते हैं।”
            bhai jaan kis tarah ki saza hai.. hadees me likha hai dost ki biwi pasand aa jaaye talak de do aur nikah kar lo fir jab man bhar jaaye talak de do aur purani biwi se nikah kar lo… dusari baat yah ki aapne bola ki yah saza hai … kaisa saza hai ye toek mard ko saza nahiaurat ko saza hai…yadi piccha chhudane ke liye talak dete hai to fir kai baar us aurat se hi nikaah dobaara kyu kar lete hain.. tab wah aurat fir se priya ho jaata hai ? aimplb ki tarah baat kar rahe ho jo usane court me bola thaa….. yah mad ko saza nahi mard ko maza dene waala baat hai halala….

            1. क्या चीजे है वह बतलाना जी | और हां धर्म किसे बोलते हैं यह भी जानकारी देना |
              धन्यवाद

        5. Acha ap log shayd usi way ki bat kr rhe ho jisme chori krna badi bat nhi h ap kisi k ghar mai jak aram se kuch bhi chura k kha skte ho kyu k apk bhagvan shri Krishna bhi ye hi Krte the right wo hi bhagvan jink pta nhi kitni lakho karodo biwiya the wo hi na jo shadi se phle rash rachate the nd wo hi na jinhone bhaag k shadi ki thi acha isi liye India mai crime jayada h bahar se aane wale atankwadi to dikhte h pr apk apne ghar k atnkwadiyo ka kya unpe bhi kbhi bat kr k dekho atnkwadi to dikha diye Kashmir ki bat kr rhe ho na to jak waha k halat dekho waha ki ldkiyo or orto k sath jo hota h wo mhsoos kro aise mai koi bhi bagavt krega to sbse phle ye khna bnd kro k atnkwadi Muslim h or muslman India ko khtm krna chahte h tumhe aynkwadi to dikhte h pr Indian Army mai kitne Muslim h kabhi koi nhi bola mere khud k gav mai 800 hate jinme se 600 gharo mai se 2-3 fozi pakke h unk bare mai kyu bat nhi krte or nari ko maa bolne se kuch nhi hota kbhi utha k check kr lena sbse jyada old age home mai Hindu maa baap milenge phle unko to sambhalo phir cow ki Bat krna or apk shi Krishna wo itni sari biwiya kyu rkhte the same havs hamare Allah k bare mai to aisa kuch nhi h k unk koi wifi thi normal insano k bare mai hi to h or ha ye glt bat mt felao islam mai likha h k insan 6 shadiya tb kr skta h jb koi problem ho jese uski biwi ko bacha nhi ho rha ya kisi vidhva se like this pr apk dharm k hisab se to shadi se phle bhi kisi ko bachha ho skta h Karna to pta hi h apko or dropati ko to nhi bhule na usk to 5 pati the waah kyu ek se mn nhi bhara or apk dhrm mai to jue mai ap apna sab har jao to koi bat nhi biwi h na use laga do use bhi har jao or bhari sabha mai uski saree kholi jaye to chup chap beth k tamasha dekho phir usk 5 pati hi kyu na ho ek bhi use nhi bacha ska right waaw ab aate h sakuntla pe to koi bat nhi dusyant ne usko use kiya or chhod diya phir usk ek bachha ho gya waah ab bat mryada prushotam ram ji ki to unhone kya kiya apni wifi k sath agr ram ji se sitaji dur rhi thi to wo bhi to utne hi time k liye usse dur rhe the na to agni priksha sirf sita ji ki kyu, kyu k wo orat h usk bad bhi santushth nhi hue or unko ghar se nikal diya ye kesi mriyada jo apni wifi k liye stand bhi nhi le sake to ap log to rhne hi do kisi k dharm k bare mai bolna isse acha h apne dharm k bare mai padho kyu k kamiya sbme h to kyu na apni kamiyo pe dhyan diya jaye aj k India ki halat Pakistan se km nhi h kyu na hum sach mai ise anekta mai ekta ka desh banane pe soche na ek dusre k bare mai bol kr ekta mai anekta banaye m bolna nhi chahti thi but apko ye bhi batana chahti thi k kami sbme h nd koi apk dhrm k bare mai bole to bura lgta h to acha hoga k ap log bhi is chiz ko samjhe or aps mai ladna bnd kre kyu k hindu Muslim ye to koi mudda h hi nhi in muddo ki aad mai politician baki asli muddo ko chhupa rhe h desh mai or bhi problem h ldna h to usk bare mai ldo k garibi kyu h desh aage kyu nhi badh rha, aarkshn, bhrstachar, or rape kyu nhi inko mudda banate plz ek dusre se ld k kuch nhi hoga ink bare mai kon sochega agr hum youngsters dharm mai uljh gye to nd im sorry Hindus m bs chahti thi k apko pta chale k dusro k dhrm k bare mai nhi bolna chahiye or ho ske to niche jo mene likha h us pe jyada dhyan de i know iske bad ap mujhe bhi 4-5 bate phir suna denge m padhlungi bs kyu k apk bolne se na m hindu banungi na mere bolne se ap Muslim or Quran ka mazak na banaye jb tk ap isko sahi se samjh na le apse request h or na Muslim geeta ka udaye plZ

          1. pls let me know meaning of following verses of quran

            Quran (2:191-193) – “And kill them wherever you find them, and turn them out from where they have turned you out. And Al-Fitnah [disbelief or unrest] is worse than killing… but if they desist, then lo! Allah is forgiving and merciful. And fight them until there is no more Fitnah [disbelief and worshipping of others along with Allah] and worship is for Allah alone. But if they cease, let there be no transgression except against Az-Zalimun(the polytheists, and wrong-doers, etc.)” (Translation is from the Noble Quran) The verse prior to this (190) refers to “fighting for the cause of Allah those who fight you” leading some to claim that the entire passage refers to a defensive war in which Muslims are defending their homes and families. The historical context of this passage is not defensive warfare, however, since Muhammad and his Muslims had just relocated to Medina and were not under attack by their Meccan adversaries. In fact, the verses urge offensive warfare, in that Muslims are to drive Meccans out of their own city (which they later did). Verse 190 thus means to fight those who offer resistance to Allah’s rule (ie. Muslim conquest). The use of the word “persecution” by some Muslim translators is disingenuous – the actual Arabic words for persecution (idtihad) – and oppression are not used instead of fitna. Fitna can mean disbelief, or the disorder that results from unbelief or temptation. A strict translation is ‘sedition,’ meaning rebellion against authority (the authority being Allah). This is certainly what is meant in this context since the violence is explicitly commissioned “until religion is for Allah” – ie. unbelievers desist in their unbelief. [Editor’s note: these notes have been modified slightly after a critic misinterpreted our language. Verse 193 plainly says that ‘fighting’ is sanctioned even if the fitna ‘ceases’. This is about religious order, not real persecution.]

            Quran (2:244) – “Then fight in the cause of Allah, and know that Allah Heareth and knoweth all things.”

            Quran (2:216) – “Fighting is prescribed for you, and ye dislike it. But it is possible that ye dislike a thing which is good for you, and that ye love a thing which is bad for you. But Allah knoweth, and ye know not.” Not only does this verse establish that violence can be virtuous, but it also contradicts the myth that fighting is intended only in self-defense, since the audience was obviously not under attack at the time. From the Hadith, we know that this verse was narrated at a time that Muhammad was actually trying to motivate his people into raiding merchant caravans for loot.

            Quran (3:56) – “As to those who reject faith, I will punish them with terrible agony in this world and in the Hereafter, nor will they have anyone to help.”

            Quran (3:151) – “Soon shall We cast terror into the hearts of the Unbelievers, for that they joined companions with Allah, for which He had sent no authority”. This speaks directly of polytheists, yet it also includes Christians, since they believe in the Trinity (ie. what Muhammad incorrectly believed to be ‘joining companions to Allah’).

            Quran (4:74) – “Let those fight in the way of Allah who sell the life of this world for the other. Whoso fighteth in the way of Allah, be he slain or be he victorious, on him We shall bestow a vast reward.” The martyrs of Islam are unlike the early Christians, who were led meekly to the slaughter. These Muslims are killed in battle as they attempt to inflict death and destruction for the cause of Allah. This is the theological basis for today’s suicide bombers.

            Quran (4:76) – “Those who believe fight in the cause of Allah…”

            Quran (4:89) – “They but wish that ye should reject Faith, as they do, and thus be on the same footing (as they): But take not friends from their ranks until they flee in the way of Allah (From what is forbidden). But if they turn renegades, seize them and slay them wherever ye find them; and (in any case) take no friends or helpers from their ranks.”

            Quran (4:95) – “Not equal are those of the believers who sit (at home), except those who are disabled (by injury or are blind or lame, etc.), and those who strive hard and fight in the Cause of Allah with their wealth and their lives. Allah has preferred in grades those who strive hard and fight with their wealth and their lives above those who sit (at home).Unto each, Allah has promised good (Paradise), but Allah has preferred those who strive hard and fight, above those who sit (at home) by a huge reward ” This passage criticizes “peaceful” Muslims who do not join in the violence, letting them know that they are less worthy in Allah’s eyes. It also demolishes the modern myth that “Jihad” doesn’t mean holy war in the Quran, but rather a spiritual struggle. Not only is this Arabic word (mujahiduna) used in this passage, but it is clearly not referring to anything spiritual, since the physically disabled are given exemption. (The Hadith reveals the context of the passage to be in response to a blind man’s protest that he is unable to engage in Jihad, which would not make sense if it meant an internal struggle).

            Quran (4:104) – “And be not weak hearted in pursuit of the enemy; if you suffer pain, then surely they (too) suffer pain as you suffer pain…” Is pursuing an injured and retreating enemy really an act of self-defense?

            Quran (5:33) – “The punishment of those who wage war against Allah and His messenger and strive to make mischief in the land is only this, that they should be murdered or crucified or their hands and their feet should be cut off on opposite sides or they should be imprisoned; this shall be as a disgrace for them in this world, and in the hereafter they shall have a grievous chastisement”

            Quran (8:12) – “I will cast terror into the hearts of those who disbelieve. Therefore strike off their heads and strike off every fingertip of them” No reasonable person would interpret this to mean a spiritual struggle. The targets of violence are “those who disbelieve” – further defined in the next verse (13) as “defy and disobey Allah.” Nothing is said about self-defense. In fact, the verses in sura 8 were narrated shortly after a battle provoked by Muhammad, who had been trying to attack a lightly-armed caravan to steal goods belonging to other people.

            Quran (8:15) – “O ye who believe! When ye meet those who disbelieve in battle, turn not your backs to them. (16)Whoso on that day turneth his back to them, unless maneuvering for battle or intent to join a company, he truly hath incurred wrath from Allah, and his habitation will be hell, a hapless journey’s end.”

            Quran (8:39) – “And fight with them until there is no more fitna (disorder, unbelief) and religion is all for Allah” Some translations interpret “fitna” as “persecution”, but the traditional understanding of this word is not supported by the historical context (See notes for 2:193). The Meccans were simply refusing Muhammad access to their city during Haj. Other Muslims were allowed to travel there – just not as an armed group, since Muhammad had declared war on Mecca prior to his eviction. The Meccans were also acting in defense of their religion, as it was Muhammad’s intention to destroy their idols and establish Islam by force (which he later did). Hence the critical part of this verse is to fight until “religion is only for Allah”, meaning that the true justification of violence was the unbelief of the opposition. According to the Sira (Ibn Ishaq/Hisham 324) Muhammad further explains that “Allah must have no rivals.”

            Quran (8:57) – “If thou comest on them in the war, deal with them so as to strike fear in those who are behind them, that haply they may remember.”

            Quran (8:67) – “It is not for a Prophet that he should have prisoners of war until he had made a great slaughter in the land…”

            Quran (8:59-60) – “And let not those who disbelieve suppose that they can outstrip (Allah’s Purpose). Lo! they cannot escape. Make ready for them all thou canst of (armed) force and of horses tethered, that thereby ye may dismay the enemy of Allah and your enemy.” As Ibn Kathir puts it in his tafsir on this passage, “Allah commands Muslims to prepare for war against disbelievers, as much as possible, according to affordability and availability.”

            Quran (8:65) – “O Prophet, exhort the believers to fight…”

            Quran (9:5) – “So when the sacred months have passed away, then slay the idolaters wherever you find them, and take them captive and besiege them and lie in wait for them in every ambush, then if they repent and keep up prayer and pay the poor-rate, leave their way free to them.” According to this verse, the best way of staying safe from Muslim violence at the time of Muhammad was to convert to Islam: prayer (salat) and the poor tax (zakat) are among the religion’s Five Pillars. The popular claim that the Quran only inspires violence within the context of self-defense is seriously challenged by this passage as well, since the Muslims to whom it was written were obviously not under attack. Had they been, then there would have been no waiting period (earlier verses make it a duty for Muslims to fight in self-defense, even during the sacred months). The historical context is Mecca after the idolaters were subjugated by Muhammad and posed no threat. Once the Muslims had power, they violently evicted those unbelievers who would not convert.

            [Note: The verse says to fight unbelievers “wherever you find them”. Even if the context is in a time of battle (which it was not) the reading appears to sanction attacks against those “unbelievers” who are not on the battlefield. In 2016, the Islamic State referred to this verse in urging the faithful to commit terror attacks: Allah did not only command the ‘fighting’ of disbelievers, as if to say He only wants us to conduct frontline operations against them. Rather, He has also ordered that they be slain wherever they may be – on or off the battlefield. (source)]

            Quran (9:14) – “Fight against them so that Allah will punish them by your hands and disgrace them and give you victory over them and heal the breasts of a believing people.” Humiliating and hurting non-believers not only has the blessing of Allah, but it is ordered as a means of carrying out his punishment and even “healing” the hearts of Muslims.

            Quran (9:20) – “Those who believe, and have left their homes and striven with their wealth and their lives in Allah’s way are of much greater worth in Allah’s sight. These are they who are triumphant.” The Arabic word interpreted as “striving” in this verse is the same root as “Jihad”. The context is obviously holy war.

            Quran (9:29) – “Fight those who believe not in Allah nor the Last Day, nor hold that forbidden which hath been forbidden by Allah and His Messenger, nor acknowledge the religion of Truth, (even if they are) of the People of the Book, until they pay the Jizya with willing submission, and feel themselves subdued.” “People of the Book” refers to Christians and Jews. According to this verse, they are to be violently subjugated, with the sole justification being their religious status. Verse 9:33 tells Muslims that Allah has charted them to make Islam “superior over all religions.” This chapter was one of the final “revelations” from Allah and it set in motion the tenacious military expansion, in which Muhammad’s companions managed to conquer two-thirds of the Christian world in the next 100 years. Islam is intended to dominate all other people and faiths.

            Quran (9:30) – “And the Jews say: Ezra is the son of Allah; and the Christians say: The Messiah is the son of Allah; these are the words of their mouths; they imitate the saying of those who disbelieved before; may Allah destroy them; how they are turned away!”

            Quran (9:38-39) – “O ye who believe! what is the matter with you, that, when ye are asked to go forth in the cause of Allah, ye cling heavily to the earth? Do ye prefer the life of this world to the Hereafter? But little is the comfort of this life, as compared with the Hereafter. Unless ye go forth, He will punish you with a grievous penalty, and put others in your place.” This is a warning to those who refuse to fight, that they will be punished with Hell.

            Quran (9:41) – “Go forth, light-armed and heavy-armed, and strive with your wealth and your lives in the way of Allah! That is best for you if ye but knew.” See also the verse that follows (9:42) – “If there had been immediate gain (in sight), and the journey easy, they would (all) without doubt have followed thee, but the distance was long, (and weighed) on them” This contradicts the myth that Muslims are to fight only in self-defense, since the wording implies that battle will be waged a long distance from home (in another country and on Christian soil, in this case, according to the historians).

            Quran (9:73) – “O Prophet! strive hard against the unbelievers and the hypocrites and be unyielding to them; and their abode is hell, and evil is the destination.” Dehumanizing those who reject Islam, by reminding Muslims that unbelievers are merely firewood for Hell, makes it easier to justify slaughter. It explains why today’s devout Muslims generally have little regard for those outside the faith. The inclusion of “hypocrites” within this verse also contradicts the apologist’s defense that the targets of hate and hostility are wartime foes, since there was never an opposing army made up of non-religious Muslims in Muhammad’s time. (See also Games Muslims Play: Terrorists Can’t Be Muslim Because They Kill Muslims for the role this verse plays in Islam’s perpetual internal conflicts).

            Quran (9:88) – “But the Messenger, and those who believe with him, strive and fight with their wealth and their persons: for them are (all) good things: and it is they who will prosper.”

            Quran (9:111) – “Allah hath purchased of the believers their persons and their goods; for theirs (in return) is the garden (of Paradise): they fight in His cause, and slay and are slain: a promise binding on Him in truth, through the Law, the Gospel, and the Quran: and who is more faithful to his covenant than Allah? then rejoice in the bargain which ye have concluded: that is the achievement supreme.” How does the Quran define a true believer?

            Quran (9:123) – “O you who believe! fight those of the unbelievers who are near to you and let them find in you hardness.”

            Quran (17:16) – “And when We wish to destroy a town, We send Our commandment to the people of it who lead easy lives, but they transgress therein; thus the word proves true against it, so We destroy it with utter destruction.” Note that the crime is moral transgression, and the punishment is “utter destruction.” (Before ordering the 9/11 attacks, Osama bin Laden first issued Americans an invitation to Islam).

            Quran (18:65-81) – This parable lays the theological groundwork for honor killings, in which a family member is murdered because they brought shame to the family, either through apostasy or perceived moral indiscretion. The story (which is not found in any Jewish or Christian source) tells of Moses encountering a man with “special knowledge” who does things which don’t seem to make sense on the surface, but are then justified according to later explanation. One such action is to murder a youth for no apparent reason (74). However, the wise man later explains that it was feared that the boy would “grieve” his parents by “disobedience and ingratitude.” He was killed so that Allah could provide them a ‘better’ son. [Note: This parable along with verse 58:22 is a major reason that honor killing is sanctioned by Sharia. Reliance of the Traveler (Umdat al-Saliq) says that punishment for murder is not applicable when a parent or grandparent kills their offspring (o.1.12).]

            Quran (21:44) – “We gave the good things of this life to these men and their fathers until the period grew long for them; See they not that We gradually reduce the land (in their control) from its outlying borders? Is it then they who will win?”

            Quran (25:52) – “Therefore listen not to the Unbelievers, but strive against them with the utmost strenuousness with it.” – The root for Jihad is used twice in this verse, although it may not have been referring to Holy War when narrated, since it was prior to the hijra at Mecca. The “it” at the end is thought to mean the Quran. Thus the verse may have originally meant a non-violent resistance to the ‘unbelievers.’ Obviously, this changed with the hijra and ‘Jihad’ after this is almost exclusively within a violent context.

            Quran (33:60-62) – “If the hypocrites, and those in whose hearts is a disease, and the alarmists in the city do not cease, We verily shall urge thee on against them, then they will be your neighbors in it but a little while. Accursed, they will be seized wherever found and slain with a (fierce) slaughter.” This passage sanctions the slaughter (rendered “merciless” and “horrible murder” in other translations) against three groups: Hypocrites (Muslims who refuse to “fight in the way of Allah” (3:167) and hence don’t act as Muslims should), those with “diseased hearts” (which include Jews and Christians 5:51-52), and “alarmists” or “agitators who include those who merely speak out against Islam, according to Muhammad’s biographers. It is worth noting that the victims are to be sought out by Muslims, which is what today’s terrorists do. If this passage is meant merely to apply to the city of Medina, then it is unclear why it is included in Allah’s eternal word to Muslim generations.

            Quran (47:3-4) – “Those who disbelieve follow falsehood, while those who believe follow the truth from their Lord… So, when you meet (in fight Jihad in Allah’s Cause), those who disbelieve smite at their necks till when you have killed and wounded many of them, then bind a bond firmly (on them, i.e. take them as captives)… If it had been Allah’s Will, He Himself could certainly have punished them (without you). But (He lets you fight), in order to test you, some with others. But those who are killed in the Way of Allah, He will never let their deeds be lost.” Those who reject Allah are to be killed in Jihad. The wounded are to be held captive for ransom. The only reason Allah doesn’t do the dirty work himself is to to test the faithfulness of Muslims. Those who kill pass the test.

            Quran (47:35) – “Be not weary and faint-hearted, crying for peace, when ye should be uppermost (Shakir: “have the upper hand”) for Allah is with you,”

            Quran (48:17) – “There is no blame for the blind, nor is there blame for the lame, nor is there blame for the sick (that they go not forth to war). And whoso obeyeth Allah and His messenger, He will make him enter Gardens underneath which rivers flow; and whoso turneth back, him will He punish with a painful doom.” Contemporary apologists sometimes claim that Jihad means ‘spiritual struggle.’ If so, then why are the blind, lame and sick exempted? This verse also says that those who do not fight will suffer torment in hell.

            Quran (48:29) – “Muhammad is the messenger of Allah. And those with him are hard (ruthless) against the disbelievers and merciful among themselves” Islam is not about treating everyone equally. This verse tells Muslims that there are two very distinct standards that are applied based on religious status. Also the word used for ‘hard’ or ‘ruthless’ in this verse shares the same root as the word translated as ‘painful’ or severe’ to describe Hell in over 25 other verses including 65:10, 40:46 and 50:26..

            Quran (61:4) – “Surely Allah loves those who fight in His cause” Religion of Peace, indeed! The verse explicitly refers to “rows” or “battle array,” meaning that it is speaking of physical conflict. This is followed by (61:9), which defines the “cause”: “He it is who has sent His Messenger (Mohammed) with guidance and the religion of truth (Islam) to make it victorious over all religions even though the infidels may resist.” (See next verse, below). Infidels who resist Islamic rule are to be fought.

            Quran (61:10-12) – “O You who believe! Shall I guide you to a commerce that will save you from a painful torment. That you believe in Allah and His Messenger (Muhammad), and that you strive hard and fight in the Cause of Allah with your wealth and your lives, that will be better for you, if you but know! (If you do so) He will forgive you your sins, and admit you into Gardens under which rivers flow, and pleasant dwelling in Gardens of’Adn- Eternity [‘Adn(Edn) Paradise], that is indeed the great success.” This verse refers to physical battle in order to make Islam victorious over other religions (see verse 9). It uses the Arabic root for the word Jihad.

            Quran (66:9) – “O Prophet! Strive against the disbelievers and the hypocrites, and be stern with them. Hell will be their home, a hapless journey’s end.” The root word of “Jihad” is used again here. The context is clearly holy war, and the scope of violence is broadened to include “hypocrites” – those who call themselves Muslims but do not act as such.

        6. Tujhe islaam ki jaankari nahi he pl.quraan ki galat vyakhya na Karen. Aur pahle Hindu Dharam ka Sahi se study kar Baad me dusre ke Dharam Ko dekhna.

          1. अरे भाई जान
            हम तो सभी मत मजहब के ग्रन्थ को पढ़ते हैं और उसी आधार पर चर्चा करते हैं | हमें यह बतलाना जो प्रमाण दिया है वह प्रमाण को गलत साबीत करे

        7. Aapne jitni batein ki hain sab jhooth hain,Pandit log aur Maulana log Ullu banate hain,aap koi bhi sawal karo islam ke bare me sahih jawab dunga wo bhi Quran se.

          1. ok pls let us know what’s your views on the below:
            Quran (2:191-193) – “And kill them wherever you find them, and turn them out from where they have turned you out. And Al-Fitnah [disbelief or unrest] is worse than killing… but if they desist, then lo! Allah is forgiving and merciful. And fight them until there is no more Fitnah [disbelief and worshipping of others along with Allah] and worship is for Allah alone. But if they cease, let there be no transgression except against Az-Zalimun(the polytheists, and wrong-doers, etc.)” (Translation is from the Noble Quran) The verse prior to this (190) refers to “fighting for the cause of Allah those who fight you” leading some to claim that the entire passage refers to a defensive war in which Muslims are defending their homes and families. The historical context of this passage is not defensive warfare, however, since Muhammad and his Muslims had just relocated to Medina and were not under attack by their Meccan adversaries. In fact, the verses urge offensive warfare, in that Muslims are to drive Meccans out of their own city (which they later did). Verse 190 thus means to fight those who offer resistance to Allah’s rule (ie. Muslim conquest). The use of the word “persecution” by some Muslim translators is disingenuous – the actual Arabic words for persecution (idtihad) – and oppression are not used instead of fitna. Fitna can mean disbelief, or the disorder that results from unbelief or temptation. A strict translation is ‘sedition,’ meaning rebellion against authority (the authority being Allah). This is certainly what is meant in this context since the violence is explicitly commissioned “until religion is for Allah” – ie. unbelievers desist in their unbelief. [Editor’s note: these notes have been modified slightly after a critic misinterpreted our language. Verse 193 plainly says that ‘fighting’ is sanctioned even if the fitna ‘ceases’. This is about religious order, not real persecution.]

            Quran (2:244) – “Then fight in the cause of Allah, and know that Allah Heareth and knoweth all things.”

            Quran (2:216) – “Fighting is prescribed for you, and ye dislike it. But it is possible that ye dislike a thing which is good for you, and that ye love a thing which is bad for you. But Allah knoweth, and ye know not.” Not only does this verse establish that violence can be virtuous, but it also contradicts the myth that fighting is intended only in self-defense, since the audience was obviously not under attack at the time. From the Hadith, we know that this verse was narrated at a time that Muhammad was actually trying to motivate his people into raiding merchant caravans for loot.

            Quran (3:56) – “As to those who reject faith, I will punish them with terrible agony in this world and in the Hereafter, nor will they have anyone to help.”

            Quran (3:151) – “Soon shall We cast terror into the hearts of the Unbelievers, for that they joined companions with Allah, for which He had sent no authority”. This speaks directly of polytheists, yet it also includes Christians, since they believe in the Trinity (ie. what Muhammad incorrectly believed to be ‘joining companions to Allah’).

            Quran (4:74) – “Let those fight in the way of Allah who sell the life of this world for the other. Whoso fighteth in the way of Allah, be he slain or be he victorious, on him We shall bestow a vast reward.” The martyrs of Islam are unlike the early Christians, who were led meekly to the slaughter. These Muslims are killed in battle as they attempt to inflict death and destruction for the cause of Allah. This is the theological basis for today’s suicide bombers.

            Quran (4:76) – “Those who believe fight in the cause of Allah…”

            Quran (4:89) – “They but wish that ye should reject Faith, as they do, and thus be on the same footing (as they): But take not friends from their ranks until they flee in the way of Allah (From what is forbidden). But if they turn renegades, seize them and slay them wherever ye find them; and (in any case) take no friends or helpers from their ranks.”

            Quran (4:95) – “Not equal are those of the believers who sit (at home), except those who are disabled (by injury or are blind or lame, etc.), and those who strive hard and fight in the Cause of Allah with their wealth and their lives. Allah has preferred in grades those who strive hard and fight with their wealth and their lives above those who sit (at home).Unto each, Allah has promised good (Paradise), but Allah has preferred those who strive hard and fight, above those who sit (at home) by a huge reward ” This passage criticizes “peaceful” Muslims who do not join in the violence, letting them know that they are less worthy in Allah’s eyes. It also demolishes the modern myth that “Jihad” doesn’t mean holy war in the Quran, but rather a spiritual struggle. Not only is this Arabic word (mujahiduna) used in this passage, but it is clearly not referring to anything spiritual, since the physically disabled are given exemption. (The Hadith reveals the context of the passage to be in response to a blind man’s protest that he is unable to engage in Jihad, which would not make sense if it meant an internal struggle).

            Quran (4:104) – “And be not weak hearted in pursuit of the enemy; if you suffer pain, then surely they (too) suffer pain as you suffer pain…” Is pursuing an injured and retreating enemy really an act of self-defense?

            Quran (5:33) – “The punishment of those who wage war against Allah and His messenger and strive to make mischief in the land is only this, that they should be murdered or crucified or their hands and their feet should be cut off on opposite sides or they should be imprisoned; this shall be as a disgrace for them in this world, and in the hereafter they shall have a grievous chastisement”

            Quran (8:12) – “I will cast terror into the hearts of those who disbelieve. Therefore strike off their heads and strike off every fingertip of them” No reasonable person would interpret this to mean a spiritual struggle. The targets of violence are “those who disbelieve” – further defined in the next verse (13) as “defy and disobey Allah.” Nothing is said about self-defense. In fact, the verses in sura 8 were narrated shortly after a battle provoked by Muhammad, who had been trying to attack a lightly-armed caravan to steal goods belonging to other people.

            Quran (8:15) – “O ye who believe! When ye meet those who disbelieve in battle, turn not your backs to them. (16)Whoso on that day turneth his back to them, unless maneuvering for battle or intent to join a company, he truly hath incurred wrath from Allah, and his habitation will be hell, a hapless journey’s end.”

            Quran (8:39) – “And fight with them until there is no more fitna (disorder, unbelief) and religion is all for Allah” Some translations interpret “fitna” as “persecution”, but the traditional understanding of this word is not supported by the historical context (See notes for 2:193). The Meccans were simply refusing Muhammad access to their city during Haj. Other Muslims were allowed to travel there – just not as an armed group, since Muhammad had declared war on Mecca prior to his eviction. The Meccans were also acting in defense of their religion, as it was Muhammad’s intention to destroy their idols and establish Islam by force (which he later did). Hence the critical part of this verse is to fight until “religion is only for Allah”, meaning that the true justification of violence was the unbelief of the opposition. According to the Sira (Ibn Ishaq/Hisham 324) Muhammad further explains that “Allah must have no rivals.”

            Quran (8:57) – “If thou comest on them in the war, deal with them so as to strike fear in those who are behind them, that haply they may remember.”

            Quran (8:67) – “It is not for a Prophet that he should have prisoners of war until he had made a great slaughter in the land…”

            Quran (8:59-60) – “And let not those who disbelieve suppose that they can outstrip (Allah’s Purpose). Lo! they cannot escape. Make ready for them all thou canst of (armed) force and of horses tethered, that thereby ye may dismay the enemy of Allah and your enemy.” As Ibn Kathir puts it in his tafsir on this passage, “Allah commands Muslims to prepare for war against disbelievers, as much as possible, according to affordability and availability.”

            Quran (8:65) – “O Prophet, exhort the believers to fight…”

            Quran (9:5) – “So when the sacred months have passed away, then slay the idolaters wherever you find them, and take them captive and besiege them and lie in wait for them in every ambush, then if they repent and keep up prayer and pay the poor-rate, leave their way free to them.” According to this verse, the best way of staying safe from Muslim violence at the time of Muhammad was to convert to Islam: prayer (salat) and the poor tax (zakat) are among the religion’s Five Pillars. The popular claim that the Quran only inspires violence within the context of self-defense is seriously challenged by this passage as well, since the Muslims to whom it was written were obviously not under attack. Had they been, then there would have been no waiting period (earlier verses make it a duty for Muslims to fight in self-defense, even during the sacred months). The historical context is Mecca after the idolaters were subjugated by Muhammad and posed no threat. Once the Muslims had power, they violently evicted those unbelievers who would not convert.

            [Note: The verse says to fight unbelievers “wherever you find them”. Even if the context is in a time of battle (which it was not) the reading appears to sanction attacks against those “unbelievers” who are not on the battlefield. In 2016, the Islamic State referred to this verse in urging the faithful to commit terror attacks: Allah did not only command the ‘fighting’ of disbelievers, as if to say He only wants us to conduct frontline operations against them. Rather, He has also ordered that they be slain wherever they may be – on or off the battlefield. (source)]

            Quran (9:14) – “Fight against them so that Allah will punish them by your hands and disgrace them and give you victory over them and heal the breasts of a believing people.” Humiliating and hurting non-believers not only has the blessing of Allah, but it is ordered as a means of carrying out his punishment and even “healing” the hearts of Muslims.

            Quran (9:20) – “Those who believe, and have left their homes and striven with their wealth and their lives in Allah’s way are of much greater worth in Allah’s sight. These are they who are triumphant.” The Arabic word interpreted as “striving” in this verse is the same root as “Jihad”. The context is obviously holy war.

            Quran (9:29) – “Fight those who believe not in Allah nor the Last Day, nor hold that forbidden which hath been forbidden by Allah and His Messenger, nor acknowledge the religion of Truth, (even if they are) of the People of the Book, until they pay the Jizya with willing submission, and feel themselves subdued.” “People of the Book” refers to Christians and Jews. According to this verse, they are to be violently subjugated, with the sole justification being their religious status. Verse 9:33 tells Muslims that Allah has charted them to make Islam “superior over all religions.” This chapter was one of the final “revelations” from Allah and it set in motion the tenacious military expansion, in which Muhammad’s companions managed to conquer two-thirds of the Christian world in the next 100 years. Islam is intended to dominate all other people and faiths.

            Quran (9:30) – “And the Jews say: Ezra is the son of Allah; and the Christians say: The Messiah is the son of Allah; these are the words of their mouths; they imitate the saying of those who disbelieved before; may Allah destroy them; how they are turned away!”

            Quran (9:38-39) – “O ye who believe! what is the matter with you, that, when ye are asked to go forth in the cause of Allah, ye cling heavily to the earth? Do ye prefer the life of this world to the Hereafter? But little is the comfort of this life, as compared with the Hereafter. Unless ye go forth, He will punish you with a grievous penalty, and put others in your place.” This is a warning to those who refuse to fight, that they will be punished with Hell.

            Quran (9:41) – “Go forth, light-armed and heavy-armed, and strive with your wealth and your lives in the way of Allah! That is best for you if ye but knew.” See also the verse that follows (9:42) – “If there had been immediate gain (in sight), and the journey easy, they would (all) without doubt have followed thee, but the distance was long, (and weighed) on them” This contradicts the myth that Muslims are to fight only in self-defense, since the wording implies that battle will be waged a long distance from home (in another country and on Christian soil, in this case, according to the historians).

            Quran (9:73) – “O Prophet! strive hard against the unbelievers and the hypocrites and be unyielding to them; and their abode is hell, and evil is the destination.” Dehumanizing those who reject Islam, by reminding Muslims that unbelievers are merely firewood for Hell, makes it easier to justify slaughter. It explains why today’s devout Muslims generally have little regard for those outside the faith. The inclusion of “hypocrites” within this verse also contradicts the apologist’s defense that the targets of hate and hostility are wartime foes, since there was never an opposing army made up of non-religious Muslims in Muhammad’s time. (See also Games Muslims Play: Terrorists Can’t Be Muslim Because They Kill Muslims for the role this verse plays in Islam’s perpetual internal conflicts).

            Quran (9:88) – “But the Messenger, and those who believe with him, strive and fight with their wealth and their persons: for them are (all) good things: and it is they who will prosper.”

            Quran (9:111) – “Allah hath purchased of the believers their persons and their goods; for theirs (in return) is the garden (of Paradise): they fight in His cause, and slay and are slain: a promise binding on Him in truth, through the Law, the Gospel, and the Quran: and who is more faithful to his covenant than Allah? then rejoice in the bargain which ye have concluded: that is the achievement supreme.” How does the Quran define a true believer?

            Quran (9:123) – “O you who believe! fight those of the unbelievers who are near to you and let them find in you hardness.”

            Quran (17:16) – “And when We wish to destroy a town, We send Our commandment to the people of it who lead easy lives, but they transgress therein; thus the word proves true against it, so We destroy it with utter destruction.” Note that the crime is moral transgression, and the punishment is “utter destruction.” (Before ordering the 9/11 attacks, Osama bin Laden first issued Americans an invitation to Islam).

            Quran (18:65-81) – This parable lays the theological groundwork for honor killings, in which a family member is murdered because they brought shame to the family, either through apostasy or perceived moral indiscretion. The story (which is not found in any Jewish or Christian source) tells of Moses encountering a man with “special knowledge” who does things which don’t seem to make sense on the surface, but are then justified according to later explanation. One such action is to murder a youth for no apparent reason (74). However, the wise man later explains that it was feared that the boy would “grieve” his parents by “disobedience and ingratitude.” He was killed so that Allah could provide them a ‘better’ son. [Note: This parable along with verse 58:22 is a major reason that honor killing is sanctioned by Sharia. Reliance of the Traveler (Umdat al-Saliq) says that punishment for murder is not applicable when a parent or grandparent kills their offspring (o.1.12).]

            Quran (21:44) – “We gave the good things of this life to these men and their fathers until the period grew long for them; See they not that We gradually reduce the land (in their control) from its outlying borders? Is it then they who will win?”

            Quran (25:52) – “Therefore listen not to the Unbelievers, but strive against them with the utmost strenuousness with it.” – The root for Jihad is used twice in this verse, although it may not have been referring to Holy War when narrated, since it was prior to the hijra at Mecca. The “it” at the end is thought to mean the Quran. Thus the verse may have originally meant a non-violent resistance to the ‘unbelievers.’ Obviously, this changed with the hijra and ‘Jihad’ after this is almost exclusively within a violent context.

            Quran (33:60-62) – “If the hypocrites, and those in whose hearts is a disease, and the alarmists in the city do not cease, We verily shall urge thee on against them, then they will be your neighbors in it but a little while. Accursed, they will be seized wherever found and slain with a (fierce) slaughter.” This passage sanctions the slaughter (rendered “merciless” and “horrible murder” in other translations) against three groups: Hypocrites (Muslims who refuse to “fight in the way of Allah” (3:167) and hence don’t act as Muslims should), those with “diseased hearts” (which include Jews and Christians 5:51-52), and “alarmists” or “agitators who include those who merely speak out against Islam, according to Muhammad’s biographers. It is worth noting that the victims are to be sought out by Muslims, which is what today’s terrorists do. If this passage is meant merely to apply to the city of Medina, then it is unclear why it is included in Allah’s eternal word to Muslim generations.

            Quran (47:3-4) – “Those who disbelieve follow falsehood, while those who believe follow the truth from their Lord… So, when you meet (in fight Jihad in Allah’s Cause), those who disbelieve smite at their necks till when you have killed and wounded many of them, then bind a bond firmly (on them, i.e. take them as captives)… If it had been Allah’s Will, He Himself could certainly have punished them (without you). But (He lets you fight), in order to test you, some with others. But those who are killed in the Way of Allah, He will never let their deeds be lost.” Those who reject Allah are to be killed in Jihad. The wounded are to be held captive for ransom. The only reason Allah doesn’t do the dirty work himself is to to test the faithfulness of Muslims. Those who kill pass the test.

            Quran (47:35) – “Be not weary and faint-hearted, crying for peace, when ye should be uppermost (Shakir: “have the upper hand”) for Allah is with you,”

            Quran (48:17) – “There is no blame for the blind, nor is there blame for the lame, nor is there blame for the sick (that they go not forth to war). And whoso obeyeth Allah and His messenger, He will make him enter Gardens underneath which rivers flow; and whoso turneth back, him will He punish with a painful doom.” Contemporary apologists sometimes claim that Jihad means ‘spiritual struggle.’ If so, then why are the blind, lame and sick exempted? This verse also says that those who do not fight will suffer torment in hell.

            Quran (48:29) – “Muhammad is the messenger of Allah. And those with him are hard (ruthless) against the disbelievers and merciful among themselves” Islam is not about treating everyone equally. This verse tells Muslims that there are two very distinct standards that are applied based on religious status. Also the word used for ‘hard’ or ‘ruthless’ in this verse shares the same root as the word translated as ‘painful’ or severe’ to describe Hell in over 25 other verses including 65:10, 40:46 and 50:26..

            Quran (61:4) – “Surely Allah loves those who fight in His cause” Religion of Peace, indeed! The verse explicitly refers to “rows” or “battle array,” meaning that it is speaking of physical conflict. This is followed by (61:9), which defines the “cause”: “He it is who has sent His Messenger (Mohammed) with guidance and the religion of truth (Islam) to make it victorious over all religions even though the infidels may resist.” (See next verse, below). Infidels who resist Islamic rule are to be fought.

            Quran (61:10-12) – “O You who believe! Shall I guide you to a commerce that will save you from a painful torment. That you believe in Allah and His Messenger (Muhammad), and that you strive hard and fight in the Cause of Allah with your wealth and your lives, that will be better for you, if you but know! (If you do so) He will forgive you your sins, and admit you into Gardens under which rivers flow, and pleasant dwelling in Gardens of’Adn- Eternity [‘Adn(Edn) Paradise], that is indeed the great success.” This verse refers to physical battle in order to make Islam victorious over other religions (see verse 9). It uses the Arabic root for the word Jihad.

            Quran (66:9) – “O Prophet! Strive against the disbelievers and the hypocrites, and be stern with them. Hell will be their home, a hapless journey’s end.” The root word of “Jihad” is used again here. The context is clearly holy war, and the scope of violence is broadened to include “hypocrites” – those who call themselves Muslims but do not act as such.

        8. दोस्त हिन्दू धर्म मे भी तो औरते शिव लिंग का जब तक जायका न लेले तब तक उसका पति उसे नही छूता ये कैसा धर्म है माँ के कहने पर पांडवों ने एक ही लड़की से शादी की बारी बारी सम्भोग भी किया और कहा बार वो नई नवेली बन जाती वो भी शिव के वरदान से ये कैसे भगवान है राम पिता दसरत उनके पिता का कोई नाम ही नही जानता सीता को राम ने छोड़ा तो एक पुत्र था जब मिले तो दो थे संकर जी महा देव है पार्वती ने अपने मैल कुचैल से गरेश को जन्मा और शिव जी ने गर्दन उड़ा दी वो सर दुबारा मिला नही बेचारे हाथी की गर्दन को लगा दिया अब बताओ गिलास में कभी जग बैठाओ तो वो बैठेगा नही न चोरी इस्लाम ने नही सिखाया कृष्णा ने बताया माखन चुरा कर लड़की छेड़ना भी उन्ही का देन है हिन्दू धर्म न तो गीता में है न कुरान में जिसकी कोई हिस्ट्री न हो सिवाय दो किताब के हम इस्लाम का सबूत आज से बाबा आदम तक दे सकते है

          1. tum baba aadam se kya kaheen se bhee naheen de sakte
            allah hamesha apani kitabon ko bdalta rahta hai
            yaan tak ki quran men bhee kitanee hee aayton ko mansukh kar diya
            🙂
            aur ye puran to dushton ne likhe hein hamare dharm granth naheen

        9. बेटा जब वक़्ते जाहिलियत में औरतों जलाया जाता था बेटी होने पर पत्थर के बूत के लिए गाड़ा जाता था तब हमारे नबी s.a.w ने उन्हें उनका दर्जा दीया ये करता कौन था तुम लोग जो पत्थर पूजते थे औरतो को क्या हक़ दिया पहला निकाह बीबी खदीजा से किया जो दो आदमियो की बेवा थी उन्हें बेटे हुए पर अल्लाह के रह में दे दिया इस लिए की दुनिया बेटियों की अजमत समझे औरतो को बे पर्दा तुम रखते थे रखते हो सायद रखते रहो गए और इस्लाम ने उन्हें पर्दा दिया बेटा ये तलाक़ इस लिए तुम्हारे औरतो की तरह कुछ इस्लाम में भी बे पर्दा गैर मर्द को देखती है उनके लिये तिन तलाक है पहला वार्निंग की तौर पर की अपनी आदत छुड़ा लो नही दूसरा तलाक दूँगा फिर भी न सुधरे तो तिन तलाक दे कर छोड़ दिया जाता है अब तुम्हारी माँ को तुम्हारे पापा किसी और के शाथ देखें तो रख सकते है पर इस्लाम में इसे बहुत बड़ा गुनाह माना जाता है इस लिए तिन तलाक है और दूसरे मर्द से शादी इस लिए है क्योंकि मर्द भी उसी मिट्टी के बने है अपनी हवस के लिए किसी औरत को तलाक़ दे और बाद में पस्तावा हो की मैंने गलत किया भाई तुमने तो अपने हवस के लिए दो जिंदगी ख़राब कर दी अब सोचते हो फिर से वही जो मैंने जैसा छोड़ा था तो इसको इस्लाम बदला है गलती सुधारने के लिए की कोई किसी को तलाक देने से पहले सोचे इसी लिए उसकी भी दूसरी शादी होती है इद्दत के बाद वो मर्द और औरत चाहे तो एक शाथ रह सकते नही फिर उसी के शाथ रहना है तो रह सकते है इससे उसे अपने किया पस्तावा रहेगा मेरी बात का बुरा मत मानना मैंने सिर्फ आप को समझाया है लिखने में कोई गलती हुई तो माफ़ करना तुम इस्लाम को समझ नहीं सकते तो बुरा भी मत कहो क्योंकि मेरी नबी ने कहा काफिर के खुदा को गाली मत दो नही वो पलट कर तुम्हारे हकीकी खुदा को गाली देगा ये है इस्लाम

          1. १. बेटा जब वक़्ते जाहिलियत में औरतों जलाया जाता था बेटी होने पर पत्थर के बूत के लिए गाड़ा जाता था – ये आपके यहाँ होता था हमारे यहाँ नहेने
            २. उन्हें बेटे हुए पर अल्लाह के रह में दे दिया – कुनसे बेटे को अल्लाह कि रह में दे दिया जो खदीजा से हुए ?
            ३. पर्दा – ये तो खुद जहालियत कि निशानी है
            ४ तलाक हलाला तो एक निकृष्ट प्रथा है

            1. बेटा सामने मिलो या नंबर दो अपना फिर बात हो तेरे पास कितनी जानकारी है और मैंने तुम्हारे देवताओं के बारे में पूछा उसका जवाब दो

              1. देवता श्रेष्ठ पुरुष को कहते हैं श्रेष्ठता ही उनका आचरण है

                देवता ईश्वर का अवतार नहीं होते और पुराण हमें मान्य नहीं किसी धूर्त ने लिखे हैं शायद आपका कोई हम इल्मी रहा होगया 🙂

            2. bhai beva se shadi krna aap-ke dharm me kyu jayaz nhi hai.. beva ko aese treat krte hai jaise bahut badha gunah krdiya ho.. aap plese shariyat ko jane ki sharyat hai kya .. islaam bahut aasan hai agr aapki niyat saaaf hai islaam ki shuruwaat paak niyat se hai .. agr aapki niyat nahi saaaf aap ache insaan nhui to aap ache musalmaan bhi nhi aaj ka musalmaan duniya ki race me apni mazhabi taleem nhi le pata hai allah unhe hidayat de..jiski wjh se unhe aadhi knowldege hoti hai or wo usko smjh nhi pate hai islaam piece hai .. shanti hai .. apne nabi ne apni kamai ka 2.5% gareebo ko baatne ka hukm diya hai ya jo jaroorat mand ho unhe .. or ye harinaan pr farz hai mtlb hukm hai .. hamare nabi ne hi jang ldne ke rukes batae.. ki bacho budho or aurto ko na maare .. biwi se mohabbat kre jinha ko harama bataya yaah tkk doosre ki biwi ko agr bd nigah se dekha to usme bhi aapki pakad hai allah ake drbaar me .. bataiye jis islaam me garrebo ko madad krna farz baataya mtlb nhi kroghe gunah pdega.. wo islaam me aesi jahiliyat kaise ho skti hai .. baat rhi prde ki,.,..abhi thoda busy hu insha allah aapse jald mulaqaat hogi please mail me ..

        10. Bewakuf admin thoda sharm kr apne upar. Tere islam ko badnam krne se kuch nhi hone wala h RSS ke chamche. Tu jitna badnam krega Islam utna hi zada phailega. Aisi behuda bate Hindu dharm me h. Islam ne is sari burai ko khatm kya h.

          1. जनाब सत्य कड़वा होता है और इसे स्वीकार करना सबके बस की बात नहीं |हमने जो जानकारी दी है आपके हदीस कुरआन से ही दी है | कृपया रिफरेन्स देखे जो हदीस कुरान से दी गयी है फिर उस पर बात करेंगे हम | धन्यवाद

        11. bhai aap mujhse contact kre insha allah aapke sari shanka door krdunga aapko islaam ki poory knowledge nhi hai ..adhooryknowledge khatarnaak hoti hai.. please contact me agr aapko islaam me koi bhi ek kharabi dikhe to .. aap mujhe bataiye insha allaah mai doory klrunga aameen

          1. ji bilkul … aap yaha par sampark kar sakte hain… aur ham jo baat karte hain kuraan hadees se hi karte hain….. jab tak koi baat ki jaankaari nahi hota us mudde par baat nahi karte… jab jaankaari hota hai tabhi charchaa karte hain… kuraan aur hadeees me kya achha hai.. islaam me kya achha hai yah jaankaari hame dena ji….. hame to islaam me kuch achhi nahi lagi … dhanywaad

        12. NICE POINT AMIT SIR!!
          “islam me bhojan , sharab or sex ke baare me hi to zor diya jaat hai??”

          mujhe to pata hi nahi tha , bhai Reference bataye kahan likha hai Qura’n me?? ye teeno cheeze
          thodha Update kare knowledge ko!!

          Mard 4 shadi kar sakta hai , or Aurat kyon nahi
          => Kyoki Saahab ! Agar bachchha Hua to aap ladki se puchhte rahna , ki iska baap kaun hai
          thodha Update kare knowledge ko!!

          agr mard kare ??
          => Duniy me Aurato ki tadaad jyada hai india ko Chhodkar , thodha Update kare knowledge ko!!

          UK , US ki report nikaale jaakr
          agr mard naa kare 4 shadi to baaki aurato ka kya hoga , maine ye nahi kahan ki VIRGIN hi hona chahiye , Divorcy bhi ho sakti hai , ye point kahan chali gayi ??
          thodha Update kare knowledge ko!!

          Agr mard 4 shadi karen to Baaap or maa dono clear hai ?
          thodha Update kare knowledge ko!!

          Hadith padhne me sharam aati hai ??
          mat padho yaar , par
          thodha Update kare knowledge ko!!

          agar maine Baki religion ki poll kholi to Aap ki haalat kharaab ho jayegi.(IS maamle me mai khamoshi ikhtiyaar karna pasand karunga , par aapne Ungali uthayi ISLAM par to mera bhi man kar rha hai , Hindunims par ungali uthaao)

          Bhai ek baat batao , Shadi karke Sex karna jyada jaruri hai (1 ho ya 4 ), ya bina Shadi kiye ?
          Hope you will support 2nd , yhi to hai

          aapne kahan — sirf 3 taalaak , or kaam khatam
          thodha Update kare knowledge ko!!
          The concept of “triple Talaq in one sitting” or “Instant Talaq” is alien to the Quran.
          http://ummat-e-nabi.com/talaaq/

          thodha Update kare knowledge ko!!
          bas chale aaye muh uthaakar comment karne , meri to hansi hi nahi ruk rhi hai aapke comment padhkar

          Prophet S.A.W. to Hazrat Ali
          “Ae!! Ali bewajah ki talaaq se bacho , Allah ko Halaal cheezo me sabse jyada na-pasand Talaaaq hai , haalki de sakte hai , jab bahoot mushkill ho jaaye , link padh liziyega detail me aankhe khul jaayegi — process of talaaq as per Quraa’n”

          NICE POINT AMIT SIR!!
          “islam me bhojan , sharab or sex ke baare me hi to zor diya jaat hai??”

          mujhe to pata hi nahi tha , bhai Reference bataye kahan likha hai Qura’n me?? ye teeno cheeze
          thodha Update kare knowledge ko!!

          Mard 4 shadi kar sakta hai , or Aurat kyon nahi
          => Kyoki Saahab ! Agar bachchha Hua to aap ladki se puchhte rahna , ki iska baap kaun hai
          thodha Update kare knowledge ko!!

          agr mard kare ??
          => Duniy me Aurato ki tadaad jyada hai india ko Chhodkar , thodha Update kare knowledge ko!!

          UK , US ki report nikaale jaakr
          agr mard naa kare 4 shadi to baaki aurato ka kya hoga , maine ye nahi kahan ki VIRGIN hi hona chahiye , Divorcy bhi ho sakti hai , ye point kahan chali gayi ??
          thodha Update kare knowledge ko!!

          Agr mard 4 shadi karen to Baaap or maa dono clear hai ?
          thodha Update kare knowledge ko!!

          Hadith padhne me sharam aati hai ??
          mat padho yaar , par
          thodha Update kare knowledge ko!!

          agar maine Baki religion ki poll kholi to Aap ki haalat kharaab ho jayegi.(IS maamle me mai khamoshi ikhtiyaar karna pasand karunga , par aapne Ungali uthayi ISLAM par to mera bhi man kar rha hai , Hindunims par ungali uthaao)

          Bhai ek baat batao , Shadi karke Sex karna jyada jaruri hai (1 ho ya 4 ), ya bina Shadi kiye ?
          Hope you will support 2nd , yhi to hai

          aapne kahan — sirf 3 taalaak , or kaam khatam
          thodha Update kare knowledge ko!!
          The concept of “triple Talaq in one sitting” or “Instant Talaq” is alien to the Quran.
          http://ummat-e-nabi.com/talaaq/

          thodha Update kare knowledge ko!!

          or zara wo hadith batana jisme Wife Exchange karne ka offer hai
          Waiting for reply!!

          1. javed Khan Siddqui भाई जान
            हमने जो बोला है वह बिलकुल सही बोला है और आपको कुरान हदीस सब में मिल जाएगा |
            कुरआन में ही बोला गया है औरत खेत होती है | इसका मतलब क्या लिया जाए | दूसरा यह की किसी की बीवी पसंद आ जाए तो तलाक देकर अपनी बीवी को उससे निकाह करवा दो और उसकी बीवी से उसका निकाह कर लो और मन भर जाए तो फिर तलाक देकर अपनी बीवी को वापस लेते आओ यह हदीस में जानकारी दी गयी है तो इसे सेक्स के रूप ना देखा जाए क्या | कई तरह की बाते हैं हदीस और कुरान से जिसका वर्णन नहीं करना चाहता फिलहाल | भोजन और शराब के बारे में भी कुरान हदीस में लिखी है थोडा पढ़े फिर अपने दिल को समझाना की मैंने जो बोला गलत नहीं बोला था सही बोला था | हदीस कुरआन पढ़ो जनाब |बहुत बड़ा लिख दिया है मौका यदि मिलेगा तो आगे आपकी सारे जवाब के बारे में चर्चा की जायेगी | छोटे छोटे कमेंट करे तो सवाल जवाब देने में सही रहता है | बिलकुल आप वेद से पोल खोल करे आपका स्वागत है हम इन्तजार करेंगे |कृपया कमेंट छोटे छोटे कमेंट कर दे जिससे जवाब देने में आसानी होगी और पाठकगन को पढ़ने में भी सुविधा होगी | आपके जवाब की इन्तार में

          1. जनाब जरुर | हम धीरे धीरे सब की जानकारी देंगे | आप हमारा साईट विजिट करते रहे |

        13. Jb tk puri bat thkik k sath pta nhi ho jb tk nhi bolna chahie …..

          Or ek bat dhyan rakhana hadish bahut pyari hoti h aml krne se pta chalta h or jo tumne hadish k matlab nikale h esa kuch bhi nhi h kyu ki agr tum hadish ko jante to yah bhi jante ki islam m ger ( yani maa bahan biwi ya fufi ko chor kr) kisi ko aakh utha kr dekhna bhi pap h

          1. Acha inke alawa kisee ko aankh uthaa ke dekhnaa paap hai to wo auraten kya lagatee hein jinhen khareeda aur becha jaata hai wo to haram hai ☺️

        14. AMit pahele islam ko sikho quraan ko jano
          Or jo tum ye bat bolre ho to koi prof bhi do
          Hadis ka naam bolo ya quraan ki aayat batao
          Allha tum ko hidayat de

      2. Jaisa dukano me likha hota hai bika hua maal wapis nahi hoga
        Tum log v likh lo apne darwze par
        Maal bina chude nhi jayegi

        1. दीपक मुखिया जी
          बहुत दुःख होता है जब आप जैसे लोग शालीनता से चर्चा नहीं करते | क्या इस तरह का भाषा का इस्तेमाल करना क्या आपके कोई ग्रन्थ में बतलाया गया है जानकारी देना मेरे भाई | हां यह बात सही है की इस्लाम में कई ऐसी अश्लील बात है | हमें अपनी मर्यादा में रहकर चर्चा करनी चाहिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल आप जैसे लोगो से उम्मीद नहीं की जा सकती | धन्यवाद

          1. Amit Mukhiya , My brother , should have manner way of talking because your expression show your way .So , please , have soft attitude during conversation .

            1. Neo Aryawarati ji
              badi dukh ki baat hai ki aapne naam sahi se nahi parhaa. unkaa naam deepak mukhiya hai …. maine unhe samjhaya hai aur aapane bhi unhe samjhaya uske liye aapko bahut aabhaar.

          2. Amit ji Islam.me koi galtiyan nahi,Islam Aman,Shanti, Insaniyat,Nyay ki baat karta hai,Galat translate ko lekar galat msg mat do.
            Agar Quraan padhoge aur samajhne ki koshish karoge to Musalmano se ladoge aur kahoge ye kitab to sabhi ke liye hai ispar hamara bhi utna hi haqq adhikar hai jitna aap logon ka hai.

            1. Islam shanti ki bat karta hai to fir islam men ye kalte aam kyon?

              shanti ki bat karta hai to khaleefaon ne khilafat ke liye itani mar kat kyon ki

              1. Kaun se khalifa ???
                zara mai bhi to jaanu??
                badha new comment hai ,
                HATS OOF to your knowledge

                1. kitnon ka murder naheen hua?
                  aapke Uthman ka murder naheen hua?

                  Karbala men huasin ko kisane mara

                  Ayesha aur ALi ke beech ke ladai kaun naheen janta aur wo kisko lekar thee ?

        2. Mr amit Roy….aap kis trh ka sandesh duniya ko dena chahte h??? Dusro m kmi dhundhna sbsa as an kaam h…,aur ek bat koi v dhrm glat baat nhi sikhlata…glati hmari use samjhne m hoti h….,achha hota ki aap agr dhramo m similarity ki trf dhayan dete bjay differences ki, mai Muslim hu lekin Ram k adarso ko v manta hu aur paigame Islam ko v….agr aap btana hi chahte h to logon ko prem btaye…..nafrat bdha kr aapko kya milega???

          1. pirzada ji
            सन्देश वही देना चाहिए जो सच हो और लोग उस सन्देश को सही समझे और उस सन्देश से लोग सुधार कर सके और अपनी गलती को स्वीकार कर सके | चलो मैं आपको एक उदाहरन देता हु बहुत पहले पौराणिक बंधुओ में सती प्रथा होती थी जिसमे पति के मरने पर पत्नी या तो खुद अग्नि में समाहित होती थी चाहे उसे दवाब देकर अग्नि में समाहित कर दिया जाता था जिसका विरोध किया गया क्यूंकि यह गलत था और विरोध करने के कारण इस तरह की परम्परा बंद हुयी जो कमी है उसकी सुधार की गयी | इसी तरह हमारा भी उद्देश्य है की जिन जिन मत संप्रदाय में जो कमी हो उसकी जानकारी दी जा सके जिससे उसका विरोध हो सके और गलत परमपरा को समाप्त की जा सके | और हम वही गलत परमपरा को समाप्त करने की कोशिश कर रहे हैं सभी मत मजहब से | क्या यह सन्देश देकर लोगो को जागरूक करना गलत है ? यदि इस तरह कमी नहीं दिखाई जाये तो क्या समाज का सुधार की जा सकती है ? फैसला आपकी सोच आपकी | और हां हमारे वैदिक सनातन धर्म में पूरा विश्व को ही कुटुंब समझा जाता है बोला जाता है मनुष्य बनो | सब मिलजुलकर रहो | मगर और सब पुराण कुरआन बाइबिल इत्यादि प्रेम नहीं सिखाती द्वेष सिखाती है जैसे एक उदाहरन दे रहा हु काफ़िरो को मारो कुरआन बोलता है | इस कारण आज isis और कई आतंकवादी संघटन है जो कुरआन का अनुसरण कर दुसरे मत मजहब का क़त्ल करते हैं ? क्यों ना उन आयत को कुरआन से हटा दिया जाए समाज की सुधार के लिए | हमारा मकसद है समाज की बुराई को मिटाना | अब आप हमारा उद्देश्य समझ गए होंगे क्यों हम कमी खोजते हैं ? इसकारण खोजते है जिससे वे अपने मत में सुधार कर सकें | आप अछे इंसान लग रहे हो तो आप भी कोशिश करें अपने मत से कमी को दूर करने की | धन्यवाद |

            1. Mr amit….andhviswaas k khilaf m v hu….aur agr aap kisi v dhrm k chal rhe adhviswas ko dhrm ki roshni m dekhnge to aap paynge, uska dhrm she koi Lena dena nhi, logon ne apne according dhrm ko bna rkha h,, aur jhaan tk ISIS ka Islam she taluk h, to unka Islam she koi taluk nhi h..Islam begunahon ko Marne ki ijajat nhi deta…mai khud ISIS ke khilaf h…kyunki ye Islam ko bdnaam kr rhe h…kuch kattar Muslim isko badhwa de rhe h…Jo ki srasr glat h….Islam m “jehad” sbd k mtlb ko glat trike se in ISIS ne liya h…..filhaal itna jaan lijiye., koi v dhrm manav se prem hi sikhlata h…..aur Jo ish sach ko jaan gya wohi Ram aur Rahim k raste pr hai

              1. Pirzada भाई जान
                मैंने पहले भी आपको बतलाया की आप मुस्लिमो में हटकर हो और इस कारण आपकी बहुत सम्मान करता हु | मगर जो सच हो उसे बतलाना हमारा मकसद है जिससे उन मत मजहब के लोगो को सत्य की जानकारी हो सके और वे अपने मजहब को सुधार कर सके | मैंने आपको एक उदाहरन दिया था सती प्रथा का इस कारण सती प्रथा का समाज से हटा दिया गया | क्या आप लोग हलाला खतना तलाक को समाज से हटा सकते हैं ?? आज मेल पर वात्सप्प पर तलाक दे दिया जाता है क्या यह प्रेम की शिक्षा देती है कुरआन ? मुशरिको को मारो क्या यह कुरआन शिक्षा नहीं देता ? ये गिलमा क्या होता है इसे बतलाने की कोशिश करेंगे ??? हमें इन बुराई को हटाना है समाज से | आज आप यह सोचो की जिसकी निकाह हुयी हो उसकी उम्र मात्र १७ साल की हो और उसे तलाक दे दिया जाना क्या यह सही होता है |आप isis ओसामा बिन लादेन के समर्थक नहीं हो मगर और सब जो है इन सब का समर्थन करते हैं आप जैसे बहुत कम ही मुस्लिम होते हैं इस कारण आप जैसे मुस्लिम का मैं सम्मान करता हु एक बात है जी आप सत्यार्थ प्रकश पढ़े और फिर वेद पढ़े इसके बाद कुरआन पढ़े हदीस पढ़े आपको खुद सत्य की जानकारी हो जायेगी | चलिए मैं कल से साईट पर नहीं आऊंगा तो कल से आपसे संवाद नहीं हो पाएगी कुछ दिनों तक | हां मेरा रोज पोस्ट साईट पर होते रहेगी | आपको जो सुझाब दिया है सत्यार्थ प्रकाश और वेद पढ़े | आप सभी मत मजहब को छोड़कर वैदिक सनातन धर्म को अपना लेंगे | आओ लौट चले वेद की ओर | धन्यवाद आपका |

                1. Amit ji Halala,Khatna,Mushrikon ko maro is jaisi koi aayat nahi hai ye mera challenge hai,sirf galat translate ki wajah se galat fahemiyan ho rahi hai.
                  Unke translate ko manna zaruri nahi ye galat hai.

                  1. ye kya hai fir

                    Quran (2:191-193) – “And kill them wherever you find them, and turn them out from where they have turned you out. And Al-Fitnah [disbelief or unrest] is worse than killing… but if they desist, then lo! Allah is forgiving and merciful. And fight them until there is no more Fitnah [disbelief and worshipping of others along with Allah] and worship is for Allah alone. But if they cease, let there be no transgression except against Az-Zalimun(the polytheists, and wrong-doers, etc.)” (Translation is from the Noble Quran) The verse prior to this (190) refers to “fighting for the cause of Allah those who fight you” leading some to claim that the entire passage refers to a defensive war in which Muslims are defending their homes and families. The historical context of this passage is not defensive warfare, however, since Muhammad and his Muslims had just relocated to Medina and were not under attack by their Meccan adversaries. In fact, the verses urge offensive warfare, in that Muslims are to drive Meccans out of their own city (which they later did). Verse 190 thus means to fight those who offer resistance to Allah’s rule (ie. Muslim conquest). The use of the word “persecution” by some Muslim translators is disingenuous – the actual Arabic words for persecution (idtihad) – and oppression are not used instead of fitna. Fitna can mean disbelief, or the disorder that results from unbelief or temptation. A strict translation is ‘sedition,’ meaning rebellion against authority (the authority being Allah). This is certainly what is meant in this context since the violence is explicitly commissioned “until religion is for Allah” – ie. unbelievers desist in their unbelief. [Editor’s note: these notes have been modified slightly after a critic misinterpreted our language. Verse 193 plainly says that ‘fighting’ is sanctioned even if the fitna ‘ceases’. This is about religious order, not real persecution.]

                    Quran (2:244) – “Then fight in the cause of Allah, and know that Allah Heareth and knoweth all things.”

                    Quran (2:216) – “Fighting is prescribed for you, and ye dislike it. But it is possible that ye dislike a thing which is good for you, and that ye love a thing which is bad for you. But Allah knoweth, and ye know not.” Not only does this verse establish that violence can be virtuous, but it also contradicts the myth that fighting is intended only in self-defense, since the audience was obviously not under attack at the time. From the Hadith, we know that this verse was narrated at a time that Muhammad was actually trying to motivate his people into raiding merchant caravans for loot.

                    Quran (3:56) – “As to those who reject faith, I will punish them with terrible agony in this world and in the Hereafter, nor will they have anyone to help.”

                    Quran (3:151) – “Soon shall We cast terror into the hearts of the Unbelievers, for that they joined companions with Allah, for which He had sent no authority”. This speaks directly of polytheists, yet it also includes Christians, since they believe in the Trinity (ie. what Muhammad incorrectly believed to be ‘joining companions to Allah’).

                    Quran (4:74) – “Let those fight in the way of Allah who sell the life of this world for the other. Whoso fighteth in the way of Allah, be he slain or be he victorious, on him We shall bestow a vast reward.” The martyrs of Islam are unlike the early Christians, who were led meekly to the slaughter. These Muslims are killed in battle as they attempt to inflict death and destruction for the cause of Allah. This is the theological basis for today’s suicide bombers.

                    Quran (4:76) – “Those who believe fight in the cause of Allah…”

                    Quran (4:89) – “They but wish that ye should reject Faith, as they do, and thus be on the same footing (as they): But take not friends from their ranks until they flee in the way of Allah (From what is forbidden). But if they turn renegades, seize them and slay them wherever ye find them; and (in any case) take no friends or helpers from their ranks.”

                    Quran (4:95) – “Not equal are those of the believers who sit (at home), except those who are disabled (by injury or are blind or lame, etc.), and those who strive hard and fight in the Cause of Allah with their wealth and their lives. Allah has preferred in grades those who strive hard and fight with their wealth and their lives above those who sit (at home).Unto each, Allah has promised good (Paradise), but Allah has preferred those who strive hard and fight, above those who sit (at home) by a huge reward ” This passage criticizes “peaceful” Muslims who do not join in the violence, letting them know that they are less worthy in Allah’s eyes. It also demolishes the modern myth that “Jihad” doesn’t mean holy war in the Quran, but rather a spiritual struggle. Not only is this Arabic word (mujahiduna) used in this passage, but it is clearly not referring to anything spiritual, since the physically disabled are given exemption. (The Hadith reveals the context of the passage to be in response to a blind man’s protest that he is unable to engage in Jihad, which would not make sense if it meant an internal struggle).

                    Quran (4:104) – “And be not weak hearted in pursuit of the enemy; if you suffer pain, then surely they (too) suffer pain as you suffer pain…” Is pursuing an injured and retreating enemy really an act of self-defense?

                    Quran (5:33) – “The punishment of those who wage war against Allah and His messenger and strive to make mischief in the land is only this, that they should be murdered or crucified or their hands and their feet should be cut off on opposite sides or they should be imprisoned; this shall be as a disgrace for them in this world, and in the hereafter they shall have a grievous chastisement”

                    Quran (8:12) – “I will cast terror into the hearts of those who disbelieve. Therefore strike off their heads and strike off every fingertip of them” No reasonable person would interpret this to mean a spiritual struggle. The targets of violence are “those who disbelieve” – further defined in the next verse (13) as “defy and disobey Allah.” Nothing is said about self-defense. In fact, the verses in sura 8 were narrated shortly after a battle provoked by Muhammad, who had been trying to attack a lightly-armed caravan to steal goods belonging to other people.

                    Quran (8:15) – “O ye who believe! When ye meet those who disbelieve in battle, turn not your backs to them. (16)Whoso on that day turneth his back to them, unless maneuvering for battle or intent to join a company, he truly hath incurred wrath from Allah, and his habitation will be hell, a hapless journey’s end.”

                    Quran (8:39) – “And fight with them until there is no more fitna (disorder, unbelief) and religion is all for Allah” Some translations interpret “fitna” as “persecution”, but the traditional understanding of this word is not supported by the historical context (See notes for 2:193). The Meccans were simply refusing Muhammad access to their city during Haj. Other Muslims were allowed to travel there – just not as an armed group, since Muhammad had declared war on Mecca prior to his eviction. The Meccans were also acting in defense of their religion, as it was Muhammad’s intention to destroy their idols and establish Islam by force (which he later did). Hence the critical part of this verse is to fight until “religion is only for Allah”, meaning that the true justification of violence was the unbelief of the opposition. According to the Sira (Ibn Ishaq/Hisham 324) Muhammad further explains that “Allah must have no rivals.”

                    Quran (8:57) – “If thou comest on them in the war, deal with them so as to strike fear in those who are behind them, that haply they may remember.”

                    Quran (8:67) – “It is not for a Prophet that he should have prisoners of war until he had made a great slaughter in the land…”

                    Quran (8:59-60) – “And let not those who disbelieve suppose that they can outstrip (Allah’s Purpose). Lo! they cannot escape. Make ready for them all thou canst of (armed) force and of horses tethered, that thereby ye may dismay the enemy of Allah and your enemy.” As Ibn Kathir puts it in his tafsir on this passage, “Allah commands Muslims to prepare for war against disbelievers, as much as possible, according to affordability and availability.”

                    Quran (8:65) – “O Prophet, exhort the believers to fight…”

                    Quran (9:5) – “So when the sacred months have passed away, then slay the idolaters wherever you find them, and take them captive and besiege them and lie in wait for them in every ambush, then if they repent and keep up prayer and pay the poor-rate, leave their way free to them.” According to this verse, the best way of staying safe from Muslim violence at the time of Muhammad was to convert to Islam: prayer (salat) and the poor tax (zakat) are among the religion’s Five Pillars. The popular claim that the Quran only inspires violence within the context of self-defense is seriously challenged by this passage as well, since the Muslims to whom it was written were obviously not under attack. Had they been, then there would have been no waiting period (earlier verses make it a duty for Muslims to fight in self-defense, even during the sacred months). The historical context is Mecca after the idolaters were subjugated by Muhammad and posed no threat. Once the Muslims had power, they violently evicted those unbelievers who would not convert.

              2. Sir salute ap mujhe bot ache insan lge scche lge mujhe musalmano se ya Islam se dikkat nhi mujhe hr dhrm ki glt chizo se dikkt h chahe wo mere dhrm ki hi Ku na ho wo ek din nasoor bn jati h unhe bdhne hi nhi Dena chahiye A buyGR possible ho to mai chahungi ki ap jaise ache aur shant log mere Frnd ho

            2. Amit bhai aap ye sahi kahe rahe hain laikin galti translater ki hai Maine quraan par study ki hai aur kar raha hoon usme kahin nahi hai ke dusron ko taklif do,agar aap log Ya koi bhi Quraan ko samajhne ki koshish karega to ye payega ki ye sirf aur sirf Insaniyat ke liye hai.

              1. If u have gone through the quran:
                let us know what does below verses stand for:
                Quran (2:191-193) – “And kill them wherever you find them, and turn them out from where they have turned you out. And Al-Fitnah [disbelief or unrest] is worse than killing… but if they desist, then lo! Allah is forgiving and merciful. And fight them until there is no more Fitnah [disbelief and worshipping of others along with Allah] and worship is for Allah alone. But if they cease, let there be no transgression except against Az-Zalimun(the polytheists, and wrong-doers, etc.)” (Translation is from the Noble Quran) The verse prior to this (190) refers to “fighting for the cause of Allah those who fight you” leading some to claim that the entire passage refers to a defensive war in which Muslims are defending their homes and families. The historical context of this passage is not defensive warfare, however, since Muhammad and his Muslims had just relocated to Medina and were not under attack by their Meccan adversaries. In fact, the verses urge offensive warfare, in that Muslims are to drive Meccans out of their own city (which they later did). Verse 190 thus means to fight those who offer resistance to Allah’s rule (ie. Muslim conquest). The use of the word “persecution” by some Muslim translators is disingenuous – the actual Arabic words for persecution (idtihad) – and oppression are not used instead of fitna. Fitna can mean disbelief, or the disorder that results from unbelief or temptation. A strict translation is ‘sedition,’ meaning rebellion against authority (the authority being Allah). This is certainly what is meant in this context since the violence is explicitly commissioned “until religion is for Allah” – ie. unbelievers desist in their unbelief. [Editor’s note: these notes have been modified slightly after a critic misinterpreted our language. Verse 193 plainly says that ‘fighting’ is sanctioned even if the fitna ‘ceases’. This is about religious order, not real persecution.]

                Quran (2:244) – “Then fight in the cause of Allah, and know that Allah Heareth and knoweth all things.”

                Quran (2:216) – “Fighting is prescribed for you, and ye dislike it. But it is possible that ye dislike a thing which is good for you, and that ye love a thing which is bad for you. But Allah knoweth, and ye know not.” Not only does this verse establish that violence can be virtuous, but it also contradicts the myth that fighting is intended only in self-defense, since the audience was obviously not under attack at the time. From the Hadith, we know that this verse was narrated at a time that Muhammad was actually trying to motivate his people into raiding merchant caravans for loot.

                Quran (3:56) – “As to those who reject faith, I will punish them with terrible agony in this world and in the Hereafter, nor will they have anyone to help.”

                Quran (3:151) – “Soon shall We cast terror into the hearts of the Unbelievers, for that they joined companions with Allah, for which He had sent no authority”. This speaks directly of polytheists, yet it also includes Christians, since they believe in the Trinity (ie. what Muhammad incorrectly believed to be ‘joining companions to Allah’).

                Quran (4:74) – “Let those fight in the way of Allah who sell the life of this world for the other. Whoso fighteth in the way of Allah, be he slain or be he victorious, on him We shall bestow a vast reward.” The martyrs of Islam are unlike the early Christians, who were led meekly to the slaughter. These Muslims are killed in battle as they attempt to inflict death and destruction for the cause of Allah. This is the theological basis for today’s suicide bombers.

                Quran (4:76) – “Those who believe fight in the cause of Allah…”

                Quran (4:89) – “They but wish that ye should reject Faith, as they do, and thus be on the same footing (as they): But take not friends from their ranks until they flee in the way of Allah (From what is forbidden). But if they turn renegades, seize them and slay them wherever ye find them; and (in any case) take no friends or helpers from their ranks.”

                Quran (4:95) – “Not equal are those of the believers who sit (at home), except those who are disabled (by injury or are blind or lame, etc.), and those who strive hard and fight in the Cause of Allah with their wealth and their lives. Allah has preferred in grades those who strive hard and fight with their wealth and their lives above those who sit (at home).Unto each, Allah has promised good (Paradise), but Allah has preferred those who strive hard and fight, above those who sit (at home) by a huge reward ” This passage criticizes “peaceful” Muslims who do not join in the violence, letting them know that they are less worthy in Allah’s eyes. It also demolishes the modern myth that “Jihad” doesn’t mean holy war in the Quran, but rather a spiritual struggle. Not only is this Arabic word (mujahiduna) used in this passage, but it is clearly not referring to anything spiritual, since the physically disabled are given exemption. (The Hadith reveals the context of the passage to be in response to a blind man’s protest that he is unable to engage in Jihad, which would not make sense if it meant an internal struggle).

                Quran (4:104) – “And be not weak hearted in pursuit of the enemy; if you suffer pain, then surely they (too) suffer pain as you suffer pain…” Is pursuing an injured and retreating enemy really an act of self-defense?

                Quran (5:33) – “The punishment of those who wage war against Allah and His messenger and strive to make mischief in the land is only this, that they should be murdered or crucified or their hands and their feet should be cut off on opposite sides or they should be imprisoned; this shall be as a disgrace for them in this world, and in the hereafter they shall have a grievous chastisement”

                Quran (8:12) – “I will cast terror into the hearts of those who disbelieve. Therefore strike off their heads and strike off every fingertip of them” No reasonable person would interpret this to mean a spiritual struggle. The targets of violence are “those who disbelieve” – further defined in the next verse (13) as “defy and disobey Allah.” Nothing is said about self-defense. In fact, the verses in sura 8 were narrated shortly after a battle provoked by Muhammad, who had been trying to attack a lightly-armed caravan to steal goods belonging to other people.

                Quran (8:15) – “O ye who believe! When ye meet those who disbelieve in battle, turn not your backs to them. (16)Whoso on that day turneth his back to them, unless maneuvering for battle or intent to join a company, he truly hath incurred wrath from Allah, and his habitation will be hell, a hapless journey’s end.”

                Quran (8:39) – “And fight with them until there is no more fitna (disorder, unbelief) and religion is all for Allah” Some translations interpret “fitna” as “persecution”, but the traditional understanding of this word is not supported by the historical context (See notes for 2:193). The Meccans were simply refusing Muhammad access to their city during Haj. Other Muslims were allowed to travel there – just not as an armed group, since Muhammad had declared war on Mecca prior to his eviction. The Meccans were also acting in defense of their religion, as it was Muhammad’s intention to destroy their idols and establish Islam by force (which he later did). Hence the critical part of this verse is to fight until “religion is only for Allah”, meaning that the true justification of violence was the unbelief of the opposition. According to the Sira (Ibn Ishaq/Hisham 324) Muhammad further explains that “Allah must have no rivals.”

                Quran (8:57) – “If thou comest on them in the war, deal with them so as to strike fear in those who are behind them, that haply they may remember.”

                Quran (8:67) – “It is not for a Prophet that he should have prisoners of war until he had made a great slaughter in the land…”

                Quran (8:59-60) – “And let not those who disbelieve suppose that they can outstrip (Allah’s Purpose). Lo! they cannot escape. Make ready for them all thou canst of (armed) force and of horses tethered, that thereby ye may dismay the enemy of Allah and your enemy.” As Ibn Kathir puts it in his tafsir on this passage, “Allah commands Muslims to prepare for war against disbelievers, as much as possible, according to affordability and availability.”

                Quran (8:65) – “O Prophet, exhort the believers to fight…”

                Quran (9:5) – “So when the sacred months have passed away, then slay the idolaters wherever you find them, and take them captive and besiege them and lie in wait for them in every ambush, then if they repent and keep up prayer and pay the poor-rate, leave their way free to them.” According to this verse, the best way of staying safe from Muslim violence at the time of Muhammad was to convert to Islam: prayer (salat) and the poor tax (zakat) are among the religion’s Five Pillars. The popular claim that the Quran only inspires violence within the context of self-defense is seriously challenged by this passage as well, since the Muslims to whom it was written were obviously not under attack. Had they been, then there would have been no waiting period (earlier verses make it a duty for Muslims to fight in self-defense, even during the sacred months). The historical context is Mecca after the idolaters were subjugated by Muhammad and posed no threat. Once the Muslims had power, they violently evicted those unbelievers who would not convert.

                [Note: The verse says to fight unbelievers “wherever you find them”. Even if the context is in a time of battle (which it was not) the reading appears to sanction attacks against those “unbelievers” who are not on the battlefield. In 2016, the Islamic State referred to this verse in urging the faithful to commit terror attacks: Allah did not only command the ‘fighting’ of disbelievers, as if to say He only wants us to conduct frontline operations against them. Rather, He has also ordered that they be slain wherever they may be – on or off the battlefield. (source)]

                Quran (9:14) – “Fight against them so that Allah will punish them by your hands and disgrace them and give you victory over them and heal the breasts of a believing people.” Humiliating and hurting non-believers not only has the blessing of Allah, but it is ordered as a means of carrying out his punishment and even “healing” the hearts of Muslims.

                Quran (9:20) – “Those who believe, and have left their homes and striven with their wealth and their lives in Allah’s way are of much greater worth in Allah’s sight. These are they who are triumphant.” The Arabic word interpreted as “striving” in this verse is the same root as “Jihad”. The context is obviously holy war.

                Quran (9:29) – “Fight those who believe not in Allah nor the Last Day, nor hold that forbidden which hath been forbidden by Allah and His Messenger, nor acknowledge the religion of Truth, (even if they are) of the People of the Book, until they pay the Jizya with willing submission, and feel themselves subdued.” “People of the Book” refers to Christians and Jews. According to this verse, they are to be violently subjugated, with the sole justification being their religious status. Verse 9:33 tells Muslims that Allah has charted them to make Islam “superior over all religions.” This chapter was one of the final “revelations” from Allah and it set in motion the tenacious military expansion, in which Muhammad’s companions managed to conquer two-thirds of the Christian world in the next 100 years. Islam is intended to dominate all other people and faiths.

                Quran (9:30) – “And the Jews say: Ezra is the son of Allah; and the Christians say: The Messiah is the son of Allah; these are the words of their mouths; they imitate the saying of those who disbelieved before; may Allah destroy them; how they are turned away!”

                Quran (9:38-39) – “O ye who believe! what is the matter with you, that, when ye are asked to go forth in the cause of Allah, ye cling heavily to the earth? Do ye prefer the life of this world to the Hereafter? But little is the comfort of this life, as compared with the Hereafter. Unless ye go forth, He will punish you with a grievous penalty, and put others in your place.” This is a warning to those who refuse to fight, that they will be punished with Hell.

                Quran (9:41) – “Go forth, light-armed and heavy-armed, and strive with your wealth and your lives in the way of Allah! That is best for you if ye but knew.” See also the verse that follows (9:42) – “If there had been immediate gain (in sight), and the journey easy, they would (all) without doubt have followed thee, but the distance was long, (and weighed) on them” This contradicts the myth that Muslims are to fight only in self-defense, since the wording implies that battle will be waged a long distance from home (in another country and on Christian soil, in this case, according to the historians).

                Quran (9:73) – “O Prophet! strive hard against the unbelievers and the hypocrites and be unyielding to them; and their abode is hell, and evil is the destination.” Dehumanizing those who reject Islam, by reminding Muslims that unbelievers are merely firewood for Hell, makes it easier to justify slaughter. It explains why today’s devout Muslims generally have little regard for those outside the faith. The inclusion of “hypocrites” within this verse also contradicts the apologist’s defense that the targets of hate and hostility are wartime foes, since there was never an opposing army made up of non-religious Muslims in Muhammad’s time. (See also Games Muslims Play: Terrorists Can’t Be Muslim Because They Kill Muslims for the role this verse plays in Islam’s perpetual internal conflicts).

                Quran (9:88) – “But the Messenger, and those who believe with him, strive and fight with their wealth and their persons: for them are (all) good things: and it is they who will prosper.”

                Quran (9:111) – “Allah hath purchased of the believers their persons and their goods; for theirs (in return) is the garden (of Paradise): they fight in His cause, and slay and are slain: a promise binding on Him in truth, through the Law, the Gospel, and the Quran: and who is more faithful to his covenant than Allah? then rejoice in the bargain which ye have concluded: that is the achievement supreme.” How does the Quran define a true believer?

                Quran (9:123) – “O you who believe! fight those of the unbelievers who are near to you and let them find in you hardness.”

                Quran (17:16) – “And when We wish to destroy a town, We send Our commandment to the people of it who lead easy lives, but they transgress therein; thus the word proves true against it, so We destroy it with utter destruction.” Note that the crime is moral transgression, and the punishment is “utter destruction.” (Before ordering the 9/11 attacks, Osama bin Laden first issued Americans an invitation to Islam).

                Quran (18:65-81) – This parable lays the theological groundwork for honor killings, in which a family member is murdered because they brought shame to the family, either through apostasy or perceived moral indiscretion. The story (which is not found in any Jewish or Christian source) tells of Moses encountering a man with “special knowledge” who does things which don’t seem to make sense on the surface, but are then justified according to later explanation. One such action is to murder a youth for no apparent reason (74). However, the wise man later explains that it was feared that the boy would “grieve” his parents by “disobedience and ingratitude.” He was killed so that Allah could provide them a ‘better’ son. [Note: This parable along with verse 58:22 is a major reason that honor killing is sanctioned by Sharia. Reliance of the Traveler (Umdat al-Saliq) says that punishment for murder is not applicable when a parent or grandparent kills their offspring (o.1.12).]

                Quran (21:44) – “We gave the good things of this life to these men and their fathers until the period grew long for them; See they not that We gradually reduce the land (in their control) from its outlying borders? Is it then they who will win?”

                Quran (25:52) – “Therefore listen not to the Unbelievers, but strive against them with the utmost strenuousness with it.” – The root for Jihad is used twice in this verse, although it may not have been referring to Holy War when narrated, since it was prior to the hijra at Mecca. The “it” at the end is thought to mean the Quran. Thus the verse may have originally meant a non-violent resistance to the ‘unbelievers.’ Obviously, this changed with the hijra and ‘Jihad’ after this is almost exclusively within a violent context.

                Quran (33:60-62) – “If the hypocrites, and those in whose hearts is a disease, and the alarmists in the city do not cease, We verily shall urge thee on against them, then they will be your neighbors in it but a little while. Accursed, they will be seized wherever found and slain with a (fierce) slaughter.” This passage sanctions the slaughter (rendered “merciless” and “horrible murder” in other translations) against three groups: Hypocrites (Muslims who refuse to “fight in the way of Allah” (3:167) and hence don’t act as Muslims should), those with “diseased hearts” (which include Jews and Christians 5:51-52), and “alarmists” or “agitators who include those who merely speak out against Islam, according to Muhammad’s biographers. It is worth noting that the victims are to be sought out by Muslims, which is what today’s terrorists do. If this passage is meant merely to apply to the city of Medina, then it is unclear why it is included in Allah’s eternal word to Muslim generations.

                Quran (47:3-4) – “Those who disbelieve follow falsehood, while those who believe follow the truth from their Lord… So, when you meet (in fight Jihad in Allah’s Cause), those who disbelieve smite at their necks till when you have killed and wounded many of them, then bind a bond firmly (on them, i.e. take them as captives)… If it had been Allah’s Will, He Himself could certainly have punished them (without you). But (He lets you fight), in order to test you, some with others. But those who are killed in the Way of Allah, He will never let their deeds be lost.” Those who reject Allah are to be killed in Jihad. The wounded are to be held captive for ransom. The only reason Allah doesn’t do the dirty work himself is to to test the faithfulness of Muslims. Those who kill pass the test.

                Quran (47:35) – “Be not weary and faint-hearted, crying for peace, when ye should be uppermost (Shakir: “have the upper hand”) for Allah is with you,”

                Quran (48:17) – “There is no blame for the blind, nor is there blame for the lame, nor is there blame for the sick (that they go not forth to war). And whoso obeyeth Allah and His messenger, He will make him enter Gardens underneath which rivers flow; and whoso turneth back, him will He punish with a painful doom.” Contemporary apologists sometimes claim that Jihad means ‘spiritual struggle.’ If so, then why are the blind, lame and sick exempted? This verse also says that those who do not fight will suffer torment in hell.

                Quran (48:29) – “Muhammad is the messenger of Allah. And those with him are hard (ruthless) against the disbelievers and merciful among themselves” Islam is not about treating everyone equally. This verse tells Muslims that there are two very distinct standards that are applied based on religious status. Also the word used for ‘hard’ or ‘ruthless’ in this verse shares the same root as the word translated as ‘painful’ or severe’ to describe Hell in over 25 other verses including 65:10, 40:46 and 50:26..

                Quran (61:4) – “Surely Allah loves those who fight in His cause” Religion of Peace, indeed! The verse explicitly refers to “rows” or “battle array,” meaning that it is speaking of physical conflict. This is followed by (61:9), which defines the “cause”: “He it is who has sent His Messenger (Mohammed) with guidance and the religion of truth (Islam) to make it victorious over all religions even though the infidels may resist.” (See next verse, below). Infidels who resist Islamic rule are to be fought.

                Quran (61:10-12) – “O You who believe! Shall I guide you to a commerce that will save you from a painful torment. That you believe in Allah and His Messenger (Muhammad), and that you strive hard and fight in the Cause of Allah with your wealth and your lives, that will be better for you, if you but know! (If you do so) He will forgive you your sins, and admit you into Gardens under which rivers flow, and pleasant dwelling in Gardens of’Adn- Eternity [‘Adn(Edn) Paradise], that is indeed the great success.” This verse refers to physical battle in order to make Islam victorious over other religions (see verse 9). It uses the Arabic root for the word Jihad.

                Quran (66:9) – “O Prophet! Strive against the disbelievers and the hypocrites, and be stern with them. Hell will be their home, a hapless journey’s end.” The root word of “Jihad” is used again here. The context is clearly holy war, and the scope of violence is broadened to include “hypocrites” – those who call themselves Muslims but do not act as such.

            3. 🎄 *हज़रत अली की अनमोल बाते * 🎄
              ______________________

              अगर इन बातो पे आप चले तो दुनिया की कोई ताक़त आपको क़ामयाब होने से नही रोक सकती।।

              🔆इन्सान का अपने दुश्मन से इन्तकाम का सबसे अच्छा तरीका ये है कि वो अपनी खूबियों में इज़ाफा कर दे !!
              – *हज़रत अली*

              🔆”रिज्क के पीछे अपना इमान कभी खराब मत करो” क्योंकि नसीब का रीज़क इन्सान को ऐसे तलाश करता है जैसे मरने वाले को मौत”
              – *हज़रत अली*

              🔆गरीब वो है जिसका कोई दोस्त न हो। – *हज़रत अली*

              🔆कभी तुम दुसरों के लिए दिल से दुवा मांग कर देखो तुम्हें अपने लिए मांगने की जरूरत नहीं पड़ेगी ..
              – *हज़रत अली*

              🔆किसी की बेबसी पे मत हंसो ये वक़्त तुम पे भी आ सकता है.
              *- हज़रत अली*

              🔆किसी की आँख तुम्हारी वजह से नम न हो क्योंकि तुम्हे उसके हर इक आंसू का क़र्ज़ चुकाना होगा.
              – *हज़रत अली*

              🔆 “जिसको तुमसे सच्ची मोहब्बत होगी, वह तुमको बेकार और नाजायज़ कामों से रोकेगा”
              *हज़रत अली*

              🔆किसी का ऐब (बुराई) तलाश करने वाले मिसाल उस मक्खी के जैसी है जो सारा खूबसूरत जिस्म छोड सिर्फ़ ज़ख्म पर बैठती है .
              – *हज़रत अली*

              🔆राज्य का खजाना और सुविधाएं मेरे और मेरे परिवार के उपभोग के लिए नहीं हैं, मै बस इनका रखवाला हूँ
              – *हज़रत अली*

              🔆अगर किसी के बारे मे जानना चाहते हो तो पता करो के वह शख्स किसके साथ उठता बैठता है ..
              – *हज़रत अली*

              🔆इल्म की वजह से दोस्तों में इज़ाफ़ा (बढ़ोतरी) होता है दौलत की वजह से दुशमनों में इज़ाफ़ा होता है ।
              – *हज़रत अली*

              🔆सब्र को ईमान से वो ही निस्बत है जो सिर को जिस्म से है.
              दौलत, हुक़ूमत और मुसीबत में आदमी के अक्ल का इम्तेहान होता है कि आदमी सब्र करता है या गलत क़दम उठता है.
              सब्र एक ऐसी सवारी है जो सवार को अभी गिरने नहीं देती।
              ऐसा बहुत कम होता है के जल्दबाज़ नुकसान न उठाये , और ऐसा हो ही नही सकता के सब्र करने वाला नाक़ाम हो.

              सब्र – इमान की बुनियाद, सखावत (दरियादिली) – इन्सान की खूबसूरती,
              सच्चाई – हक की ज़बान, नर्मी – कमियाबी की कुंजी, और मौत – एक बेखबर साथी है .
              – *हज़रत अली*

              🔆झूठ बोलकर जीतने से बेहतर है सच बोलकर हार जाओ।
              – *हज़रत अली*

              🔆खुबसुरत इंसान से मोहब्बत नहीं होती बल्कि जिस इंसान से मोहब्बत होती है वो खुबसुरत लगने लगता है.
              – *हज़रत अली*

              🔆हमेशा उस इंसान के करीब रहो जो तुम्हे खुश रखे लेकिन उस इंसान के और भी करीब रहो जो तुम्हारे बगैर खुश ना रह पाए
              – *हज़रत अली*

              🔆जिसकी अमीरी उसके लिबास में हो वो हमेशा फ़कीर रहेगा और जिसकी अमीरी उसके दिल में हो वो हमेशा सुखी रहेगा.
              – *हज़रत अली*

              🔆“जो तुम्हारी खामोशी से तुम्हारी तकलीफ का अंदाज़ा न कर सके उसके सामने ज़ुबान से इज़हार करना सिर्फ़ लफ्ज़ों को बरबाद करना है”
              – *हज़रत अली*

              🔆जहा तक हो सके लालच से बचो लालच में जिल्लत ही जिल्लत.
              – *हज़रत अली*

              🔆मुश्किलतरीन काम बेहतरीन लोगों के हिस्से में आते हैं. क्योंकि वो उसे हल करने की सलाहियत रखते हैं “
              – *हज़रत अली*

              🔆“कम खाने में सेहत है, कम बोलने में समझदारी है और कम सोना इबादत है”
              – *हज़रत अली*

              🔆“अक़्लमंद अपने आप को नीचा रखकर बुलंदी हासिल करता है और नादान अपने आप को बड़ा समझकर ज़िल्लत उठाता है।”
              – *हज़रत अली*

              🔆कभी भी अपनी जिस्मानी त़ाकत और दौलत पर भरोसा ना करना,
              कयुकि बीमारी ओर ग़रीबी आने मे देर नही लगती।
              – *हज़रत अली*

              1. आपके हज़रात अली का खुतबा नो ६०

                इसे भी पढो और बताओ क्या विचार है

                60- औरत एक बिच्छू के मानिन्द है जिसका डसना भी मज़ेदार होता है।

                1. वो अम्मा तुम्हारी बताये गी तुम नही जानोगे साले पत्थर पूजते हो तुम लोग उंगली हम पर उठाते हो अगर सेक्स के बारे में बताया न जाता तो तू पैदा भी न होता

                  1. पत्थर तो हम नहीं पूजते

                    लेकिन मजारों पर जियारत क्या है?
                    संगेअस्वद का बोसा लेना ये सब क्या है ये पत्थर पूजना ही तो है
                    और इस्लाम का अभिन्न अंग है

            4. तूम अपने आप को समझती क्या हो तेरे लिए भी पांडव के पांच भाई चाहिए तभी तेरी गर्मी उतरेगी रिक्शा ओ साॅरी रिस्वा को रिक्शा लिख दिया सुनो रे सब लोग रिस्वा है रिक्शा नहीं रिक्शा समझ कर चढ़ मत जाना ।धन्यवाद

              1. आवेशित होने से अच्छा होता तुम जवाब देते परन्तु इस्लाम में सवाल करना भी गुनाह है तो तुम्हे जानकारी का अभाव होना लाजमी है

          2. Aap btao makka me kya hai shiv ling usme saaf saaf dikhta hai tum log choomto ho. Le lo tanisha g ko aur talak do. Aur islaam ko apni marzi se apnane wale un aurto ko swaad lena chahte hai khul k sex kr sake apni maa behan ki kuran ek shaitan ki gandi soch hai. Aur kuch nhi. Kuran dharm jb start hua tb 350 log hi isse dharm ko join kr k aagai badhay jaise ek party nanayi jati hai waise agar kuran ya islaam allah k hatho bnayi gayi to kyu ye registan me paida hue aur dushro k desh me jaake rehna pda. Ye log ek animal ki tarah rehtey thay waha koi rule nhi hota jo smjh me aya wahi rule bna liya.

              1. भाषा को सौम्य बनाये रखें
                विरोधाभास सिद्धांत का हो सकता है लेकिन असभ्यता नहीं होनी चाहिए

          3. Well said sir ap jaise log ho to insan ka jnm hi safal ho Jaye ,ek zindagi hai Jio aur mine do koi atankwadi na bane Mao b hr dhrm ki respect krti hu but glt AGR apna b hai to glt khti hu

            1. इस्लाम में क्या अच्छा है नेहा जी थोडा जानकारी देना जी |

              1. बेटा इस्लाम अच्छा है इसी लिए 313 से आज 1.5 अरब है एक भी मुस्लिम को बतादो जो मन्दिर पर जाता हो पर इस्लाम की तारीफ क्या लिखु की हर मजहब के लोग झुकते है हमारे मिर्जापुर में छोटे से गावँ जहा 70 घर ठाकुरो का था उसने कभी अपने भाई के बीबी को नही देखा मारने के बाद पुरे गांव ने जलते हुए बे पर्दा देखा सब ने इस्लाम कुबूल कर लिया पता कर लो 7 साल हो गया इस्लाम में मरने के बाद भी बा अदब प्यार से फूल माला के शाथ दफन करते है तुम लोग चिता से डारेक्ट जहन्नम में जाते हो ये है इस्लाम की अच्छाई

                1. भेड़ संख्या में ज्यादा हों तो वो उत्तम नहीं हो जाती
                  कीड़ों कि संख्या ज्यादा तो हो तो वो उतं नहीं हो जाते

        3. Ham logou ka kam he hai har kese ke maal ko chodne ka, ese tarha ham jahell log Islam ko badman karate hai,accha sa nam rakhlenese koe musalman nhe ho ta Amal bhe hona chahea.

          1. abdul rashed shahab
            kya jayra vasim ko rape dhamki muslimo ne nahi di thi??? suhana saiyad ko rape karne kaa dhamki nahi di gayi gayi thi??? naahid aafrin naam hai shayad aasam ke singer kaa unpar 46 fatwe dene ki baat galat thi… aisa muslim bandhu karte hain. abhi ek video hamne apane page par post ki thi jisme hindu ladki ko chhedchaad kar rahe the aur us ladki ke pita ne virodh kiya to us pita ko jaan se maar diya gayaa. islaam yahi sab to sikhata hai ji….kaafiro ko maaro… hathyaar ke bal par namaj parhao matlab muslim banao.. thoda quran hadees parhe bhai jaan.. dhanywaad…. ho sakta hai aapke hisaab se vo muslim naa ho magar khud ko ve muslim hi bolte hain….

      3. Lack of knowledge
        Islaam ke khilaaf roz bahut sare log likhte he ye bhai unme se ek he
        women’s right 1400 saal se Islam me he
        Ye aj women right ki baat kar rahe he.
        JO NO.1 hota he sab usi ke pichche padte he. Aur use galat sabit karna chahte he.

        1. जनाब जो गलत होते हैं उसी पर बात की जाती है | औरत को खेत क्यों बोला जाता है | लौंडी क्यों बोला जाता है ? मर्द == २ औरत , मर्द == ४ औरत | फिर कैसा इन्साफ | हलाला क्या है ??? सवाल बहुत है | फिलहाल इतना का जानकारी देना| धन्यवाद

            1. हमारे यहाँ तो औरतों कि इज्जत कि जाती हिया

              उन्हें दोयम दर्जे का नहीं माना जाता
              न ही उन्हें खरीदा बेचा जाता है

      4. औरतें माल हैं जो सांस लेती हैं उस बकरे की तरह जो हरेक सुबह आकाश देखकर सोचता है आज तो बच गया ।इस्लाम कोई धर्म नहों अपराधियों के आपसी व्यवहार का कानून है

      1. hakim saahab
        sabse pahle hame yah batlana ki kyaa is tarah ki bhashaa bolne kaa aagya quraan hadees me hai kyaa??? kya gussa karna quran me sahi bolaa gaya hai??? kyaa aap quran aur islaam ko follow sahi se kar rahe ho ??? jab nahi kar rahe to sachhe muslim kaise ???? aur bhai jaan isme puri reference ke saath di gayi hai kaun saa hadees me aur kaha kaha aaya hai aisa….post parhe… refernce se check kare.. fir charchaa kare… dhanywaad…

    2. Ye galat translate kiya gaya hai,Islam wo hai jo Insaniyat aur Insaf sikhata hai chahe wo koi bhi ho.
      Koi bhi question ho to mailkar sakte ho.

      1. ok if it has been wrongly translated pls translate the below verses correctly:
        Quran (2:191-193) – “And kill them wherever you find them, and turn them out from where they have turned you out. And Al-Fitnah [disbelief or unrest] is worse than killing… but if they desist, then lo! Allah is forgiving and merciful. And fight them until there is no more Fitnah [disbelief and worshipping of others along with Allah] and worship is for Allah alone. But if they cease, let there be no transgression except against Az-Zalimun(the polytheists, and wrong-doers, etc.)” (Translation is from the Noble Quran) The verse prior to this (190) refers to “fighting for the cause of Allah those who fight you” leading some to claim that the entire passage refers to a defensive war in which Muslims are defending their homes and families. The historical context of this passage is not defensive warfare, however, since Muhammad and his Muslims had just relocated to Medina and were not under attack by their Meccan adversaries. In fact, the verses urge offensive warfare, in that Muslims are to drive Meccans out of their own city (which they later did). Verse 190 thus means to fight those who offer resistance to Allah’s rule (ie. Muslim conquest). The use of the word “persecution” by some Muslim translators is disingenuous – the actual Arabic words for persecution (idtihad) – and oppression are not used instead of fitna. Fitna can mean disbelief, or the disorder that results from unbelief or temptation. A strict translation is ‘sedition,’ meaning rebellion against authority (the authority being Allah). This is certainly what is meant in this context since the violence is explicitly commissioned “until religion is for Allah” – ie. unbelievers desist in their unbelief. [Editor’s note: these notes have been modified slightly after a critic misinterpreted our language. Verse 193 plainly says that ‘fighting’ is sanctioned even if the fitna ‘ceases’. This is about religious order, not real persecution.]

        Quran (2:244) – “Then fight in the cause of Allah, and know that Allah Heareth and knoweth all things.”

        Quran (2:216) – “Fighting is prescribed for you, and ye dislike it. But it is possible that ye dislike a thing which is good for you, and that ye love a thing which is bad for you. But Allah knoweth, and ye know not.” Not only does this verse establish that violence can be virtuous, but it also contradicts the myth that fighting is intended only in self-defense, since the audience was obviously not under attack at the time. From the Hadith, we know that this verse was narrated at a time that Muhammad was actually trying to motivate his people into raiding merchant caravans for loot.

        Quran (3:56) – “As to those who reject faith, I will punish them with terrible agony in this world and in the Hereafter, nor will they have anyone to help.”

        Quran (3:151) – “Soon shall We cast terror into the hearts of the Unbelievers, for that they joined companions with Allah, for which He had sent no authority”. This speaks directly of polytheists, yet it also includes Christians, since they believe in the Trinity (ie. what Muhammad incorrectly believed to be ‘joining companions to Allah’).

        Quran (4:74) – “Let those fight in the way of Allah who sell the life of this world for the other. Whoso fighteth in the way of Allah, be he slain or be he victorious, on him We shall bestow a vast reward.” The martyrs of Islam are unlike the early Christians, who were led meekly to the slaughter. These Muslims are killed in battle as they attempt to inflict death and destruction for the cause of Allah. This is the theological basis for today’s suicide bombers.

        Quran (4:76) – “Those who believe fight in the cause of Allah…”

        Quran (4:89) – “They but wish that ye should reject Faith, as they do, and thus be on the same footing (as they): But take not friends from their ranks until they flee in the way of Allah (From what is forbidden). But if they turn renegades, seize them and slay them wherever ye find them; and (in any case) take no friends or helpers from their ranks.”

        Quran (4:95) – “Not equal are those of the believers who sit (at home), except those who are disabled (by injury or are blind or lame, etc.), and those who strive hard and fight in the Cause of Allah with their wealth and their lives. Allah has preferred in grades those who strive hard and fight with their wealth and their lives above those who sit (at home).Unto each, Allah has promised good (Paradise), but Allah has preferred those who strive hard and fight, above those who sit (at home) by a huge reward ” This passage criticizes “peaceful” Muslims who do not join in the violence, letting them know that they are less worthy in Allah’s eyes. It also demolishes the modern myth that “Jihad” doesn’t mean holy war in the Quran, but rather a spiritual struggle. Not only is this Arabic word (mujahiduna) used in this passage, but it is clearly not referring to anything spiritual, since the physically disabled are given exemption. (The Hadith reveals the context of the passage to be in response to a blind man’s protest that he is unable to engage in Jihad, which would not make sense if it meant an internal struggle).

        Quran (4:104) – “And be not weak hearted in pursuit of the enemy; if you suffer pain, then surely they (too) suffer pain as you suffer pain…” Is pursuing an injured and retreating enemy really an act of self-defense?

        Quran (5:33) – “The punishment of those who wage war against Allah and His messenger and strive to make mischief in the land is only this, that they should be murdered or crucified or their hands and their feet should be cut off on opposite sides or they should be imprisoned; this shall be as a disgrace for them in this world, and in the hereafter they shall have a grievous chastisement”

        Quran (8:12) – “I will cast terror into the hearts of those who disbelieve. Therefore strike off their heads and strike off every fingertip of them” No reasonable person would interpret this to mean a spiritual struggle. The targets of violence are “those who disbelieve” – further defined in the next verse (13) as “defy and disobey Allah.” Nothing is said about self-defense. In fact, the verses in sura 8 were narrated shortly after a battle provoked by Muhammad, who had been trying to attack a lightly-armed caravan to steal goods belonging to other people.

        Quran (8:15) – “O ye who believe! When ye meet those who disbelieve in battle, turn not your backs to them. (16)Whoso on that day turneth his back to them, unless maneuvering for battle or intent to join a company, he truly hath incurred wrath from Allah, and his habitation will be hell, a hapless journey’s end.”

        Quran (8:39) – “And fight with them until there is no more fitna (disorder, unbelief) and religion is all for Allah” Some translations interpret “fitna” as “persecution”, but the traditional understanding of this word is not supported by the historical context (See notes for 2:193). The Meccans were simply refusing Muhammad access to their city during Haj. Other Muslims were allowed to travel there – just not as an armed group, since Muhammad had declared war on Mecca prior to his eviction. The Meccans were also acting in defense of their religion, as it was Muhammad’s intention to destroy their idols and establish Islam by force (which he later did). Hence the critical part of this verse is to fight until “religion is only for Allah”, meaning that the true justification of violence was the unbelief of the opposition. According to the Sira (Ibn Ishaq/Hisham 324) Muhammad further explains that “Allah must have no rivals.”

        Quran (8:57) – “If thou comest on them in the war, deal with them so as to strike fear in those who are behind them, that haply they may remember.”

        Quran (8:67) – “It is not for a Prophet that he should have prisoners of war until he had made a great slaughter in the land…”

        Quran (8:59-60) – “And let not those who disbelieve suppose that they can outstrip (Allah’s Purpose). Lo! they cannot escape. Make ready for them all thou canst of (armed) force and of horses tethered, that thereby ye may dismay the enemy of Allah and your enemy.” As Ibn Kathir puts it in his tafsir on this passage, “Allah commands Muslims to prepare for war against disbelievers, as much as possible, according to affordability and availability.”

        Quran (8:65) – “O Prophet, exhort the believers to fight…”

        Quran (9:5) – “So when the sacred months have passed away, then slay the idolaters wherever you find them, and take them captive and besiege them and lie in wait for them in every ambush, then if they repent and keep up prayer and pay the poor-rate, leave their way free to them.” According to this verse, the best way of staying safe from Muslim violence at the time of Muhammad was to convert to Islam: prayer (salat) and the poor tax (zakat) are among the religion’s Five Pillars. The popular claim that the Quran only inspires violence within the context of self-defense is seriously challenged by this passage as well, since the Muslims to whom it was written were obviously not under attack. Had they been, then there would have been no waiting period (earlier verses make it a duty for Muslims to fight in self-defense, even during the sacred months). The historical context is Mecca after the idolaters were subjugated by Muhammad and posed no threat. Once the Muslims had power, they violently evicted those unbelievers who would not convert.

        [Note: The verse says to fight unbelievers “wherever you find them”. Even if the context is in a time of battle (which it was not) the reading appears to sanction attacks against those “unbelievers” who are not on the battlefield. In 2016, the Islamic State referred to this verse in urging the faithful to commit terror attacks: Allah did not only command the ‘fighting’ of disbelievers, as if to say He only wants us to conduct frontline operations against them. Rather, He has also ordered that they be slain wherever they may be – on or off the battlefield. (source)]

        Quran (9:14) – “Fight against them so that Allah will punish them by your hands and disgrace them and give you victory over them and heal the breasts of a believing people.” Humiliating and hurting non-believers not only has the blessing of Allah, but it is ordered as a means of carrying out his punishment and even “healing” the hearts of Muslims.

        Quran (9:20) – “Those who believe, and have left their homes and striven with their wealth and their lives in Allah’s way are of much greater worth in Allah’s sight. These are they who are triumphant.” The Arabic word interpreted as “striving” in this verse is the same root as “Jihad”. The context is obviously holy war.

        Quran (9:29) – “Fight those who believe not in Allah nor the Last Day, nor hold that forbidden which hath been forbidden by Allah and His Messenger, nor acknowledge the religion of Truth, (even if they are) of the People of the Book, until they pay the Jizya with willing submission, and feel themselves subdued.” “People of the Book” refers to Christians and Jews. According to this verse, they are to be violently subjugated, with the sole justification being their religious status. Verse 9:33 tells Muslims that Allah has charted them to make Islam “superior over all religions.” This chapter was one of the final “revelations” from Allah and it set in motion the tenacious military expansion, in which Muhammad’s companions managed to conquer two-thirds of the Christian world in the next 100 years. Islam is intended to dominate all other people and faiths.

        Quran (9:30) – “And the Jews say: Ezra is the son of Allah; and the Christians say: The Messiah is the son of Allah; these are the words of their mouths; they imitate the saying of those who disbelieved before; may Allah destroy them; how they are turned away!”

        Quran (9:38-39) – “O ye who believe! what is the matter with you, that, when ye are asked to go forth in the cause of Allah, ye cling heavily to the earth? Do ye prefer the life of this world to the Hereafter? But little is the comfort of this life, as compared with the Hereafter. Unless ye go forth, He will punish you with a grievous penalty, and put others in your place.” This is a warning to those who refuse to fight, that they will be punished with Hell.

        Quran (9:41) – “Go forth, light-armed and heavy-armed, and strive with your wealth and your lives in the way of Allah! That is best for you if ye but knew.” See also the verse that follows (9:42) – “If there had been immediate gain (in sight), and the journey easy, they would (all) without doubt have followed thee, but the distance was long, (and weighed) on them” This contradicts the myth that Muslims are to fight only in self-defense, since the wording implies that battle will be waged a long distance from home (in another country and on Christian soil, in this case, according to the historians).

        Quran (9:73) – “O Prophet! strive hard against the unbelievers and the hypocrites and be unyielding to them; and their abode is hell, and evil is the destination.” Dehumanizing those who reject Islam, by reminding Muslims that unbelievers are merely firewood for Hell, makes it easier to justify slaughter. It explains why today’s devout Muslims generally have little regard for those outside the faith. The inclusion of “hypocrites” within this verse also contradicts the apologist’s defense that the targets of hate and hostility are wartime foes, since there was never an opposing army made up of non-religious Muslims in Muhammad’s time. (See also Games Muslims Play: Terrorists Can’t Be Muslim Because They Kill Muslims for the role this verse plays in Islam’s perpetual internal conflicts).

        Quran (9:88) – “But the Messenger, and those who believe with him, strive and fight with their wealth and their persons: for them are (all) good things: and it is they who will prosper.”

        Quran (9:111) – “Allah hath purchased of the believers their persons and their goods; for theirs (in return) is the garden (of Paradise): they fight in His cause, and slay and are slain: a promise binding on Him in truth, through the Law, the Gospel, and the Quran: and who is more faithful to his covenant than Allah? then rejoice in the bargain which ye have concluded: that is the achievement supreme.” How does the Quran define a true believer?

        Quran (9:123) – “O you who believe! fight those of the unbelievers who are near to you and let them find in you hardness.”

        Quran (17:16) – “And when We wish to destroy a town, We send Our commandment to the people of it who lead easy lives, but they transgress therein; thus the word proves true against it, so We destroy it with utter destruction.” Note that the crime is moral transgression, and the punishment is “utter destruction.” (Before ordering the 9/11 attacks, Osama bin Laden first issued Americans an invitation to Islam).

        Quran (18:65-81) – This parable lays the theological groundwork for honor killings, in which a family member is murdered because they brought shame to the family, either through apostasy or perceived moral indiscretion. The story (which is not found in any Jewish or Christian source) tells of Moses encountering a man with “special knowledge” who does things which don’t seem to make sense on the surface, but are then justified according to later explanation. One such action is to murder a youth for no apparent reason (74). However, the wise man later explains that it was feared that the boy would “grieve” his parents by “disobedience and ingratitude.” He was killed so that Allah could provide them a ‘better’ son. [Note: This parable along with verse 58:22 is a major reason that honor killing is sanctioned by Sharia. Reliance of the Traveler (Umdat al-Saliq) says that punishment for murder is not applicable when a parent or grandparent kills their offspring (o.1.12).]

        Quran (21:44) – “We gave the good things of this life to these men and their fathers until the period grew long for them; See they not that We gradually reduce the land (in their control) from its outlying borders? Is it then they who will win?”

        Quran (25:52) – “Therefore listen not to the Unbelievers, but strive against them with the utmost strenuousness with it.” – The root for Jihad is used twice in this verse, although it may not have been referring to Holy War when narrated, since it was prior to the hijra at Mecca. The “it” at the end is thought to mean the Quran. Thus the verse may have originally meant a non-violent resistance to the ‘unbelievers.’ Obviously, this changed with the hijra and ‘Jihad’ after this is almost exclusively within a violent context.

        Quran (33:60-62) – “If the hypocrites, and those in whose hearts is a disease, and the alarmists in the city do not cease, We verily shall urge thee on against them, then they will be your neighbors in it but a little while. Accursed, they will be seized wherever found and slain with a (fierce) slaughter.” This passage sanctions the slaughter (rendered “merciless” and “horrible murder” in other translations) against three groups: Hypocrites (Muslims who refuse to “fight in the way of Allah” (3:167) and hence don’t act as Muslims should), those with “diseased hearts” (which include Jews and Christians 5:51-52), and “alarmists” or “agitators who include those who merely speak out against Islam, according to Muhammad’s biographers. It is worth noting that the victims are to be sought out by Muslims, which is what today’s terrorists do. If this passage is meant merely to apply to the city of Medina, then it is unclear why it is included in Allah’s eternal word to Muslim generations.

        Quran (47:3-4) – “Those who disbelieve follow falsehood, while those who believe follow the truth from their Lord… So, when you meet (in fight Jihad in Allah’s Cause), those who disbelieve smite at their necks till when you have killed and wounded many of them, then bind a bond firmly (on them, i.e. take them as captives)… If it had been Allah’s Will, He Himself could certainly have punished them (without you). But (He lets you fight), in order to test you, some with others. But those who are killed in the Way of Allah, He will never let their deeds be lost.” Those who reject Allah are to be killed in Jihad. The wounded are to be held captive for ransom. The only reason Allah doesn’t do the dirty work himself is to to test the faithfulness of Muslims. Those who kill pass the test.

        Quran (47:35) – “Be not weary and faint-hearted, crying for peace, when ye should be uppermost (Shakir: “have the upper hand”) for Allah is with you,”

        Quran (48:17) – “There is no blame for the blind, nor is there blame for the lame, nor is there blame for the sick (that they go not forth to war). And whoso obeyeth Allah and His messenger, He will make him enter Gardens underneath which rivers flow; and whoso turneth back, him will He punish with a painful doom.” Contemporary apologists sometimes claim that Jihad means ‘spiritual struggle.’ If so, then why are the blind, lame and sick exempted? This verse also says that those who do not fight will suffer torment in hell.

        Quran (48:29) – “Muhammad is the messenger of Allah. And those with him are hard (ruthless) against the disbelievers and merciful among themselves” Islam is not about treating everyone equally. This verse tells Muslims that there are two very distinct standards that are applied based on religious status. Also the word used for ‘hard’ or ‘ruthless’ in this verse shares the same root as the word translated as ‘painful’ or severe’ to describe Hell in over 25 other verses including 65:10, 40:46 and 50:26..

        Quran (61:4) – “Surely Allah loves those who fight in His cause” Religion of Peace, indeed! The verse explicitly refers to “rows” or “battle array,” meaning that it is speaking of physical conflict. This is followed by (61:9), which defines the “cause”: “He it is who has sent His Messenger (Mohammed) with guidance and the religion of truth (Islam) to make it victorious over all religions even though the infidels may resist.” (See next verse, below). Infidels who resist Islamic rule are to be fought.

        Quran (61:10-12) – “O You who believe! Shall I guide you to a commerce that will save you from a painful torment. That you believe in Allah and His Messenger (Muhammad), and that you strive hard and fight in the Cause of Allah with your wealth and your lives, that will be better for you, if you but know! (If you do so) He will forgive you your sins, and admit you into Gardens under which rivers flow, and pleasant dwelling in Gardens of’Adn- Eternity [‘Adn(Edn) Paradise], that is indeed the great success.” This verse refers to physical battle in order to make Islam victorious over other religions (see verse 9). It uses the Arabic root for the word Jihad.

        Quran (66:9) – “O Prophet! Strive against the disbelievers and the hypocrites, and be stern with them. Hell will be their home, a hapless journey’s end.” The root word of “Jihad” is used again here. The context is clearly holy war, and the scope of violence is broadened to include “hypocrites” – those who call themselves Muslims but do not act as such.

    3. kya aap ne Quran ko para hai?? kise ke bhi bekar post se andaza mat lagao. Aaj puray duniya mein Islam fel raha hai. yeh article likhne wala chutiya hai. Agar Islam mein aurat badalna itna asaan hota to Burkha ka system nahi hota, yeh jhooto se sawdhan raho

      1. PUri duniya men islam fail raha hai 🙂

        aur puri duniya se islam mit bhee raha hai

        allah ke manane wale kaisee maut mare ja rah hien

        Afganistan, Iraq, aadi desho men samne aa rah ahia

        lekin na to allah hee aataa hai n uske farishte

      2. जुबेर जी नमस्ते

        क़ुरान को पढा भी है और समझा भी है, जरूरत यह है कि प्रत्येक मुसलमान क़ुरान को मात्र समझ ले तो यह फैलता हुआ शांति का मजहब चंद दिनों में सिमट जाएगा

        हम मोहम्मद साहब के अनुयायी नही जो मात्र हीरा पहाड़ी की बाते सुन कर किसी झूठ पर भी यकीन कर ले

        हम सत्य के अनुयायी है जो प्रत्येक बात की जांच कर ही प्रस्तुत करते है

        इस्लाम में औरत बदलना तो बहुत आसान है और उसी पर अब सरकार रोक चाहती है जिसका विरोध तथाकथित मानवता प्रेमी शांति का मजहब कर रहा है

        बुरखा का सिस्टम से औरत बदलने का क्या सम्बन्ध मेरे हिसाब से तो यह सबसे शानदार तरीके में एक होना चाहिए औरत बदलने के किसी को बीवी बना लो बुरखा पहना लो पहचान छुप जाएगी

        खैर ये फालतू बहस से उचित तो यह है मियां की आप क़ुरान को मदरसे में गर्दन आगे पीछे कर करके पढ़ने से बेहतर है किसी स्वछंद वातावरण में इसे पढ़िए इसे समझिए शंका कीजिये फिर मौलवी से जवाब मांगिये

        आपको आपकी बात का जवाब अपने आप मिल जाएगा

        1. अबे जो खुद न जाने की मेरे अशली भगवान कौन है गीता कहता है भगवान निरंकार है सालो हजारों आकर तुम्हारे में है हमने खुद देखा है शिव रात्रि में इंसान को भगवान बनाया जाता है होली पर सब बाप बेटा पिता है दीपावली पर सब जुवा खेलते है गंदे गाने बजाते है चड्डी पहना लोटा लिया मंदिर का घंटा टन बज गया पूजा हो गया हम मुसलमान पाँच वक़्त की नमाज़ रोज़ा हज़ जकात रमजान में 11 बजे रात तक तराबी फिर रोज़ा तिलावते कुरान नमाज़ के दौरान कही भटका या कोई आयात गलत हो गया तो नमाज़ फिर से पड़ो फिर भी हम रोते है अल्लाह हमारी इबादत कुबूल करे भाई साहब भक्ति के गाने बजाकर घंटा बजाकर सोचते है भगवान ने सुन लिया जब अटकता है तो दरगाह पर भागते है

          1. दरगाह पर भागते है – ये कौनसा निराकार है मुसलमानों का ?

          1. ek se adhik shadiyan karna , laundiyan rakhna, gulam auraton ko bechana kya ye aapko prathayen theek lagtee hein ?

    4. Ye jis chiz ki baat ho ri h use haq maher kahte hain…

      Jo ladki tay karegi… Or ye haq sirf or sirf ladki ko diya gya h… Agar wo maher me husband ki saari property maang le to talaq dene se pahle use maher dena hi hoga..

      Islam me aurton ka kis qadr khayal rakha gya h…. Ye aap tab smjhenge jab aap khule dimag se sochenge…

      Dil me itni nafrat pahle se hi bhari ho to aap kuchh bhi smjhne se pahle hi faisla kr lenge..

      Ek baar hi sahi lekin ap tak Sach baat ko pohchana hmara farz h..

      1. Mehar ki baten karte ho janab
        Puri property ki bhee baten karte hein sunane men acche lagtee hein

        Lekin aapke rasool ke us kathan ko kyon bhul jate hein jisamen unhone kaha hai ki jo aurat jitna kam mehar rakhe wo hee use priya hai

  1. I am afraid that this view is completely distorted. The instruction to marry more than once was given when the ratio of women increased after most of the men died in wars. This was done in order to avoid the women from roaming about the streets without any support. So the men were instructed to marry them sio that their children might get some legal social status. But the men were strictly instructed not to ignore their previous wives for the sake of new ones. Because there is temptation in the new.

    1. The instruction to marry more than once was given when the ratio of women increased after most of the men died in wars”

      Dear Mona ji

      in that case do u wanna to say that this low of Allah should not be applicable now”

      🙂

      1. respeted arya g namste
        ye eak mauli si teachr hai muslim univesity m
        do char bat esne quran ki padh li to apne ko aalim fazil mankr aapse tark kar baithi enhe pta nhi hai aapke aur arya samj k vidvano k bare mai

        1. respeted arya g namste
          ye eak mamuli si teachr hai muslim univesity m
          do char bat esne quran ki padh li to apne ko aalim fazil mankr aapse tark kar baithi enhe pta nhi hai aapke aur arya samj k vidvano k bare mai,enko simple way mai samjha dijiye

          1. Abe arya ke handwe…9009898841 le ye mera no. He choot ke la kha ka vidhwan laa rha he ….agr islam ko galat sabit kr diya to 1 cror ka inam dunga …
            Khulla challange utha la tere vidvano ko….salo ek chutiye ke piche tum sare chutiye…..

            1. islam ko galat sabhit karne ki kya aawashyakta hai

              usaka hal to aise hee kharaab ho rakha hai

              afganishatan ,
              yaman
              Iraq
              somaniya
              leebiya
              kitane hee desh aise hein

            2. Ale le le le… mera nazayaz beta internet chala rha h
              Fikr mt kr beta tre 1 crore katwe bhaiyon ko kaat ke tre aur teri ma se milne jrur aunga…Teri ma ko mera pyar dena

              1. कृपया मर्यादा में रहे या फिर आगे से आपके कमेंट को शामिल नहीं की जाएगी | शालीनता से चर्चा करें

      2. No. This law is no longer needed now. It needs to be abolished. Truth is relative to time. And with time many a laws become archaic and redundant. This is one such law which should be done away with under present circumstances. Because people now distort its utility for their personal gain. I am never in favour of this practice as it causes a lot of pain to humanity now and does more harm than good.

        1. We completely agree with your comment that Halala concept has “archaic and redundant. This is one such law which should be done away with under present circumstances”

          We congratulate you and appreciate you that u have courage to say that Aaayat 213 of Sura AL Bakara is not required now.
          Knowledge of Allah has redundant

          🙂

          YOur wisdom has judged & u possess that courage what your Maulves doen’t

    2. मोना जी,
      क्या आप हमको ये बताएंगी की ये कानून क्यों आये,
      आखिर औरते के शौहर क्यों युद्ध में मारे जाते थे,

      ये नियम क्यों बना,
      हिन्दू धर्म में भी पुनः विवाह का चलन था,
      परंतु कोई औरत विधवा ही रहना चाहती है,तो उसका भार उसके पति के परिवार और उसके बच्चों पर आता है,

  2. another thing about the talaq. It is the most condemned word in islam, but it is seen as an evil necessity. When two people cannot live in harmony, islam enjoins them to separate so that they may avoid a constant torture for themselves and their children in an unhealty atmosphere of fights. There is no instruction about wife swaping. This is a totally distorted view. The enjoinment to remarry the wife is only after the case of halala, which is when the wife is given talaq, she also has as much right to remarry as the man has. Halal means that in case a man has given talaq to his wife, and realises his mistake and wants to take her back, he can only remarry her after she has been married again to someone else and that person is ready to leave his wife of his own free will. This is another way of saying that remarrying her is impossible. You cannot play with life and emotion of a woman so easily. So this is a kind of punishment to the man for giving her talaq in the first place. And this is also something to discourage such a practice, since it entails such a strict punishment of halala. Therefore men must think and think very carefully before they give talaq, of what would be in store for them if they start playing with this permission.

    1. Dear Mona ji

      You have mentioned that :
      -Halal means that in case a man has given talaq to his wife, and realities his mistake.
      -he can only remarry her after she has been married again to someone else and that person is ready to leave his wife of his own free will.

      As per your comments it was mistake of Husband and further you have quoted that HE has realized his mistake.
      so our point is that if it is mistake of husband why penalty should be imposed on wife.
      why wife has to remarry another person and has to be in physical relationship with third guy.
      why for the mistake of earlier husband he has to live this miserable life.
      and even after for the sake of mistake of earlier husband she has made relationship again she is on the mercy of current husband that until he gives talaq she cannt join
      husband
      .
      we are in consensus with your remark that ” You cannot play with life and emotion of a woman” but punishment should be given to the guilty not to the women,

      looking forward for your views

      You cannot play with life and emotion of a woman so easily. So this is a kind of punishment to the man for giving her talaq in the first place. And this is also something to discourage such a practice, since it entails such a strict punishment of halala. Therefore men must think and think very carefully before they give talaq, of what would be in store for them if they start playing with this

      1. Bhai AGR tm sacche Hindu vote
        …to dusre k dhrm kya yun majak na bnate….phle apna dhrm shi se follow kro….dusre k dhrm m kmi nikalne ki adat chutt jayegi

        1. pirzada जी

          मेरे एक सवाल का जवाब दोगे आप ? क्या २ + २ को जो ५ बतलाते हैं या ३ बतलाते हैं उसे सही जानकारी देना की २ + २ = ४ होते हैं क्या गलत है ?? नहीं ना ?? फिर जब कोई भटका हो उसे सही मार्ग की जानकारी देना गलत है क्या ??? और यह जो जानकारी दी गयी है कुरआन हदीस से ही दी गयी है और जो सही है वही बतलाया गया है और हम सभी मत की बुराई का जानकारी देते हैं जिसमे कोई कमी हो उसकी जानकारी देना गलत नहीं सही होता है वही हम कर रहे हैं |

          1. Mere Bhai…..bhut si chizen glat lgti h jb tk use thik se smjha nhi jay…agr mai aapke religion m fault dekhne lgu, aur aap mere religion m to fir him aapas m bat kr rh jaynge….itna yad rkhiye mahan wo no Jo fasad aur jhagde krwyae….mahan to wo h Jo prem aur aman(peace) ka sandesh de…Ram ne sbri k jhute Ber prem m hi khayye the…prem hi insaan ko prmatma se jodta h

            1. Pirzada भाई जान
              बहुत सी बात गलत लगती है तो उसे कैसे स्वीकार किया जा सकता है यह बात समझ से बाहर है जी हम केवल इस्लाम की ही कमी को नहीं दिखलाते जबकि हम पौराणिक साईं मत कबीर मत मत ब्रह्मकुमारी मत इसाईं मत इत्यादि इत्यादि मत में जो गलत होता है उसे जानकारी देकर यह बतलाना चाहते हैं की आप अपनी गलती कमी को सुधारे और समाज को उन्नत करने में योगदान दें | चलिए जैसे आपने बतलाया राम ने शबरी के बेर खाए इस बात से हम भी सहमत है और इसे स्वीकार करते हैं मगर जब बात रामायण काल की हो रही है तो उसमे जो गलत लग्नेवाली बात है उसे हम अस्वीकार करते हैं जैसे हनुमान जी छलांग लगाया और सूरज को अपने मुख में बचपन में डाल लिया था जो कमी है उसे हम स्वीकार करते हैं और लोगो को बोलते हैं ऐसा नहीं हो सकता क्यूंकि सूर्य के पास कोई भी नहीं जा सकता जो जाएगा जल जाएगा | इसी तरह कुरआन की बात को देखें एक अंगुली चाँद की ओर की तो चाँद के दो टुकडे हो गए | चलो चाँद के दो तुकडे हो गए तो हमें नजर क्यों नहीं आता | भाई जान अंधविश्वास को छोडो और सत्य सनातन वैदिक धर्म की ओर लौटो | वेद की ओर लौटो | पूर्वाग्रह छोडो | हमारा मकसद है समाज में फैली अंधविश्वास को मिटाना और समाज को उन्नत करना | आपको यह जानकर बहुत आश्चर्य होगी की हम सत्य को बतलाने की कोशिश करते हैं और सत्य को बतलाने समय हमें केवल धमकी मिलती है फिर भी अच्छा वही होता है जो सत्य के मार्ग पर चले | अगर यही भगत सिंह चन्द्रसेखर आजाद जी सब धमकी से डर जाते तो आज आजादी नहीं मिलती | उसी तरह हम भी समाज को उन्नत करने के लिए प्रयासरत हैं | आप अच्छे इंसान लगते हो आप भी समाज को सुधारने में योगदान करें | धन्यवाद आपका

              1. Galti Pandit our Mauliyon ki hai,Koi dharm Insaniyat ke khilaf nahi ho sakta agar hai to wo galat dharm hai.
                Quraan is magical book.No writer no auther.

                1. what do u says abt following verses of quran

                  Quran (2:191-193) – “And kill them wherever you find them, and turn them out from where they have turned you out. And Al-Fitnah [disbelief or unrest] is worse than killing… but if they desist, then lo! Allah is forgiving and merciful. And fight them until there is no more Fitnah [disbelief and worshipping of others along with Allah] and worship is for Allah alone. But if they cease, let there be no transgression except against Az-Zalimun(the polytheists, and wrong-doers, etc.)” (Translation is from the Noble Quran) The verse prior to this (190) refers to “fighting for the cause of Allah those who fight you” leading some to claim that the entire passage refers to a defensive war in which Muslims are defending their homes and families. The historical context of this passage is not defensive warfare, however, since Muhammad and his Muslims had just relocated to Medina and were not under attack by their Meccan adversaries. In fact, the verses urge offensive warfare, in that Muslims are to drive Meccans out of their own city (which they later did). Verse 190 thus means to fight those who offer resistance to Allah’s rule (ie. Muslim conquest). The use of the word “persecution” by some Muslim translators is disingenuous – the actual Arabic words for persecution (idtihad) – and oppression are not used instead of fitna. Fitna can mean disbelief, or the disorder that results from unbelief or temptation. A strict translation is ‘sedition,’ meaning rebellion against authority (the authority being Allah). This is certainly what is meant in this context since the violence is explicitly commissioned “until religion is for Allah” – ie. unbelievers desist in their unbelief. [Editor’s note: these notes have been modified slightly after a critic misinterpreted our language. Verse 193 plainly says that ‘fighting’ is sanctioned even if the fitna ‘ceases’. This is about religious order, not real persecution.]

                  Quran (2:244) – “Then fight in the cause of Allah, and know that Allah Heareth and knoweth all things.”

                  Quran (2:216) – “Fighting is prescribed for you, and ye dislike it. But it is possible that ye dislike a thing which is good for you, and that ye love a thing which is bad for you. But Allah knoweth, and ye know not.” Not only does this verse establish that violence can be virtuous, but it also contradicts the myth that fighting is intended only in self-defense, since the audience was obviously not under attack at the time. From the Hadith, we know that this verse was narrated at a time that Muhammad was actually trying to motivate his people into raiding merchant caravans for loot.

                  Quran (3:56) – “As to those who reject faith, I will punish them with terrible agony in this world and in the Hereafter, nor will they have anyone to help.”

                  Quran (3:151) – “Soon shall We cast terror into the hearts of the Unbelievers, for that they joined companions with Allah, for which He had sent no authority”. This speaks directly of polytheists, yet it also includes Christians, since they believe in the Trinity (ie. what Muhammad incorrectly believed to be ‘joining companions to Allah’).

                  Quran (4:74) – “Let those fight in the way of Allah who sell the life of this world for the other. Whoso fighteth in the way of Allah, be he slain or be he victorious, on him We shall bestow a vast reward.” The martyrs of Islam are unlike the early Christians, who were led meekly to the slaughter. These Muslims are killed in battle as they attempt to inflict death and destruction for the cause of Allah. This is the theological basis for today’s suicide bombers.

                  Quran (4:76) – “Those who believe fight in the cause of Allah…”

                  Quran (4:89) – “They but wish that ye should reject Faith, as they do, and thus be on the same footing (as they): But take not friends from their ranks until they flee in the way of Allah (From what is forbidden). But if they turn renegades, seize them and slay them wherever ye find them; and (in any case) take no friends or helpers from their ranks.”

                  Quran (4:95) – “Not equal are those of the believers who sit (at home), except those who are disabled (by injury or are blind or lame, etc.), and those who strive hard and fight in the Cause of Allah with their wealth and their lives. Allah has preferred in grades those who strive hard and fight with their wealth and their lives above those who sit (at home).Unto each, Allah has promised good (Paradise), but Allah has preferred those who strive hard and fight, above those who sit (at home) by a huge reward ” This passage criticizes “peaceful” Muslims who do not join in the violence, letting them know that they are less worthy in Allah’s eyes. It also demolishes the modern myth that “Jihad” doesn’t mean holy war in the Quran, but rather a spiritual struggle. Not only is this Arabic word (mujahiduna) used in this passage, but it is clearly not referring to anything spiritual, since the physically disabled are given exemption. (The Hadith reveals the context of the passage to be in response to a blind man’s protest that he is unable to engage in Jihad, which would not make sense if it meant an internal struggle).

                  Quran (4:104) – “And be not weak hearted in pursuit of the enemy; if you suffer pain, then surely they (too) suffer pain as you suffer pain…” Is pursuing an injured and retreating enemy really an act of self-defense?

                  Quran (5:33) – “The punishment of those who wage war against Allah and His messenger and strive to make mischief in the land is only this, that they should be murdered or crucified or their hands and their feet should be cut off on opposite sides or they should be imprisoned; this shall be as a disgrace for them in this world, and in the hereafter they shall have a grievous chastisement”

                  Quran (8:12) – “I will cast terror into the hearts of those who disbelieve. Therefore strike off their heads and strike off every fingertip of them” No reasonable person would interpret this to mean a spiritual struggle. The targets of violence are “those who disbelieve” – further defined in the next verse (13) as “defy and disobey Allah.” Nothing is said about self-defense. In fact, the verses in sura 8 were narrated shortly after a battle provoked by Muhammad, who had been trying to attack a lightly-armed caravan to steal goods belonging to other people.

                  Quran (8:15) – “O ye who believe! When ye meet those who disbelieve in battle, turn not your backs to them. (16)Whoso on that day turneth his back to them, unless maneuvering for battle or intent to join a company, he truly hath incurred wrath from Allah, and his habitation will be hell, a hapless journey’s end.”

                  Quran (8:39) – “And fight with them until there is no more fitna (disorder, unbelief) and religion is all for Allah” Some translations interpret “fitna” as “persecution”, but the traditional understanding of this word is not supported by the historical context (See notes for 2:193). The Meccans were simply refusing Muhammad access to their city during Haj. Other Muslims were allowed to travel there – just not as an armed group, since Muhammad had declared war on Mecca prior to his eviction. The Meccans were also acting in defense of their religion, as it was Muhammad’s intention to destroy their idols and establish Islam by force (which he later did). Hence the critical part of this verse is to fight until “religion is only for Allah”, meaning that the true justification of violence was the unbelief of the opposition. According to the Sira (Ibn Ishaq/Hisham 324) Muhammad further explains that “Allah must have no rivals.”

                  Quran (8:57) – “If thou comest on them in the war, deal with them so as to strike fear in those who are behind them, that haply they may remember.”

                  Quran (8:67) – “It is not for a Prophet that he should have prisoners of war until he had made a great slaughter in the land…”

                  Quran (8:59-60) – “And let not those who disbelieve suppose that they can outstrip (Allah’s Purpose). Lo! they cannot escape. Make ready for them all thou canst of (armed) force and of horses tethered, that thereby ye may dismay the enemy of Allah and your enemy.” As Ibn Kathir puts it in his tafsir on this passage, “Allah commands Muslims to prepare for war against disbelievers, as much as possible, according to affordability and availability.”

                  Quran (8:65) – “O Prophet, exhort the believers to fight…”

                  Quran (9:5) – “So when the sacred months have passed away, then slay the idolaters wherever you find them, and take them captive and besiege them and lie in wait for them in every ambush, then if they repent and keep up prayer and pay the poor-rate, leave their way free to them.” According to this verse, the best way of staying safe from Muslim violence at the time of Muhammad was to convert to Islam: prayer (salat) and the poor tax (zakat) are among the religion’s Five Pillars. The popular claim that the Quran only inspires violence within the context of self-defense is seriously challenged by this passage as well, since the Muslims to whom it was written were obviously not under attack. Had they been, then there would have been no waiting period (earlier verses make it a duty for Muslims to fight in self-defense, even during the sacred months). The historical context is Mecca after the idolaters were subjugated by Muhammad and posed no threat. Once the Muslims had power, they violently evicted those unbelievers who would not convert.

                  [Note: The verse says to fight unbelievers “wherever you find them”. Even if the context is in a time of battle (which it was not) the reading appears to sanction attacks against those “unbelievers” who are not on the battlefield. In 2016, the Islamic State referred to this verse in urging the faithful to commit terror attacks: Allah did not only command the ‘fighting’ of disbelievers, as if to say He only wants us to conduct frontline operations against them. Rather, He has also ordered that they be slain wherever they may be – on or off the battlefield. (source)]

                  Quran (9:14) – “Fight against them so that Allah will punish them by your hands and disgrace them and give you victory over them and heal the breasts of a believing people.” Humiliating and hurting non-believers not only has the blessing of Allah, but it is ordered as a means of carrying out his punishment and even “healing” the hearts of Muslims.

                  Quran (9:20) – “Those who believe, and have left their homes and striven with their wealth and their lives in Allah’s way are of much greater worth in Allah’s sight. These are they who are triumphant.” The Arabic word interpreted as “striving” in this verse is the same root as “Jihad”. The context is obviously holy war.

                  Quran (9:29) – “Fight those who believe not in Allah nor the Last Day, nor hold that forbidden which hath been forbidden by Allah and His Messenger, nor acknowledge the religion of Truth, (even if they are) of the People of the Book, until they pay the Jizya with willing submission, and feel themselves subdued.” “People of the Book” refers to Christians and Jews. According to this verse, they are to be violently subjugated, with the sole justification being their religious status. Verse 9:33 tells Muslims that Allah has charted them to make Islam “superior over all religions.” This chapter was one of the final “revelations” from Allah and it set in motion the tenacious military expansion, in which Muhammad’s companions managed to conquer two-thirds of the Christian world in the next 100 years. Islam is intended to dominate all other people and faiths.

                  Quran (9:30) – “And the Jews say: Ezra is the son of Allah; and the Christians say: The Messiah is the son of Allah; these are the words of their mouths; they imitate the saying of those who disbelieved before; may Allah destroy them; how they are turned away!”

                  Quran (9:38-39) – “O ye who believe! what is the matter with you, that, when ye are asked to go forth in the cause of Allah, ye cling heavily to the earth? Do ye prefer the life of this world to the Hereafter? But little is the comfort of this life, as compared with the Hereafter. Unless ye go forth, He will punish you with a grievous penalty, and put others in your place.” This is a warning to those who refuse to fight, that they will be punished with Hell.

                  Quran (9:41) – “Go forth, light-armed and heavy-armed, and strive with your wealth and your lives in the way of Allah! That is best for you if ye but knew.” See also the verse that follows (9:42) – “If there had been immediate gain (in sight), and the journey easy, they would (all) without doubt have followed thee, but the distance was long, (and weighed) on them” This contradicts the myth that Muslims are to fight only in self-defense, since the wording implies that battle will be waged a long distance from home (in another country and on Christian soil, in this case, according to the historians).

                  Quran (9:73) – “O Prophet! strive hard against the unbelievers and the hypocrites and be unyielding to them; and their abode is hell, and evil is the destination.” Dehumanizing those who reject Islam, by reminding Muslims that unbelievers are merely firewood for Hell, makes it easier to justify slaughter. It explains why today’s devout Muslims generally have little regard for those outside the faith. The inclusion of “hypocrites” within this verse also contradicts the apologist’s defense that the targets of hate and hostility are wartime foes, since there was never an opposing army made up of non-religious Muslims in Muhammad’s time. (See also Games Muslims Play: Terrorists Can’t Be Muslim Because They Kill Muslims for the role this verse plays in Islam’s perpetual internal conflicts).

                  Quran (9:88) – “But the Messenger, and those who believe with him, strive and fight with their wealth and their persons: for them are (all) good things: and it is they who will prosper.”

                  Quran (9:111) – “Allah hath purchased of the believers their persons and their goods; for theirs (in return) is the garden (of Paradise): they fight in His cause, and slay and are slain: a promise binding on Him in truth, through the Law, the Gospel, and the Quran: and who is more faithful to his covenant than Allah? then rejoice in the bargain which ye have concluded: that is the achievement supreme.” How does the Quran define a true believer?

                  Quran (9:123) – “O you who believe! fight those of the unbelievers who are near to you and let them find in you hardness.”

                  Quran (17:16) – “And when We wish to destroy a town, We send Our commandment to the people of it who lead easy lives, but they transgress therein; thus the word proves true against it, so We destroy it with utter destruction.” Note that the crime is moral transgression, and the punishment is “utter destruction.” (Before ordering the 9/11 attacks, Osama bin Laden first issued Americans an invitation to Islam).

                  Quran (18:65-81) – This parable lays the theological groundwork for honor killings, in which a family member is murdered because they brought shame to the family, either through apostasy or perceived moral indiscretion. The story (which is not found in any Jewish or Christian source) tells of Moses encountering a man with “special knowledge” who does things which don’t seem to make sense on the surface, but are then justified according to later explanation. One such action is to murder a youth for no apparent reason (74). However, the wise man later explains that it was feared that the boy would “grieve” his parents by “disobedience and ingratitude.” He was killed so that Allah could provide them a ‘better’ son. [Note: This parable along with verse 58:22 is a major reason that honor killing is sanctioned by Sharia. Reliance of the Traveler (Umdat al-Saliq) says that punishment for murder is not applicable when a parent or grandparent kills their offspring (o.1.12).]

                  Quran (21:44) – “We gave the good things of this life to these men and their fathers until the period grew long for them; See they not that We gradually reduce the land (in their control) from its outlying borders? Is it then they who will win?”

                  Quran (25:52) – “Therefore listen not to the Unbelievers, but strive against them with the utmost strenuousness with it.” – The root for Jihad is used twice in this verse, although it may not have been referring to Holy War when narrated, since it was prior to the hijra at Mecca. The “it” at the end is thought to mean the Quran. Thus the verse may have originally meant a non-violent resistance to the ‘unbelievers.’ Obviously, this changed with the hijra and ‘Jihad’ after this is almost exclusively within a violent context.

                  Quran (33:60-62) – “If the hypocrites, and those in whose hearts is a disease, and the alarmists in the city do not cease, We verily shall urge thee on against them, then they will be your neighbors in it but a little while. Accursed, they will be seized wherever found and slain with a (fierce) slaughter.” This passage sanctions the slaughter (rendered “merciless” and “horrible murder” in other translations) against three groups: Hypocrites (Muslims who refuse to “fight in the way of Allah” (3:167) and hence don’t act as Muslims should), those with “diseased hearts” (which include Jews and Christians 5:51-52), and “alarmists” or “agitators who include those who merely speak out against Islam, according to Muhammad’s biographers. It is worth noting that the victims are to be sought out by Muslims, which is what today’s terrorists do. If this passage is meant merely to apply to the city of Medina, then it is unclear why it is included in Allah’s eternal word to Muslim generations.

                  Quran (47:3-4) – “Those who disbelieve follow falsehood, while those who believe follow the truth from their Lord… So, when you meet (in fight Jihad in Allah’s Cause), those who disbelieve smite at their necks till when you have killed and wounded many of them, then bind a bond firmly (on them, i.e. take them as captives)… If it had been Allah’s Will, He Himself could certainly have punished them (without you). But (He lets you fight), in order to test you, some with others. But those who are killed in the Way of Allah, He will never let their deeds be lost.” Those who reject Allah are to be killed in Jihad. The wounded are to be held captive for ransom. The only reason Allah doesn’t do the dirty work himself is to to test the faithfulness of Muslims. Those who kill pass the test.

                  Quran (47:35) – “Be not weary and faint-hearted, crying for peace, when ye should be uppermost (Shakir: “have the upper hand”) for Allah is with you,”

                  Quran (48:17) – “There is no blame for the blind, nor is there blame for the lame, nor is there blame for the sick (that they go not forth to war). And whoso obeyeth Allah and His messenger, He will make him enter Gardens underneath which rivers flow; and whoso turneth back, him will He punish with a painful doom.” Contemporary apologists sometimes claim that Jihad means ‘spiritual struggle.’ If so, then why are the blind, lame and sick exempted? This verse also says that those who do not fight will suffer torment in hell.

                  Quran (48:29) – “Muhammad is the messenger of Allah. And those with him are hard (ruthless) against the disbelievers and merciful among themselves” Islam is not about treating everyone equally. This verse tells Muslims that there are two very distinct standards that are applied based on religious status. Also the word used for ‘hard’ or ‘ruthless’ in this verse shares the same root as the word translated as ‘painful’ or severe’ to describe Hell in over 25 other verses including 65:10, 40:46 and 50:26..

                  Quran (61:4) – “Surely Allah loves those who fight in His cause” Religion of Peace, indeed! The verse explicitly refers to “rows” or “battle array,” meaning that it is speaking of physical conflict. This is followed by (61:9), which defines the “cause”: “He it is who has sent His Messenger (Mohammed) with guidance and the religion of truth (Islam) to make it victorious over all religions even though the infidels may resist.” (See next verse, below). Infidels who resist Islamic rule are to be fought.

                  Quran (61:10-12) – “O You who believe! Shall I guide you to a commerce that will save you from a painful torment. That you believe in Allah and His Messenger (Muhammad), and that you strive hard and fight in the Cause of Allah with your wealth and your lives, that will be better for you, if you but know! (If you do so) He will forgive you your sins, and admit you into Gardens under which rivers flow, and pleasant dwelling in Gardens of’Adn- Eternity [‘Adn(Edn) Paradise], that is indeed the great success.” This verse refers to physical battle in order to make Islam victorious over other religions (see verse 9). It uses the Arabic root for the word Jihad.

                  Quran (66:9) – “O Prophet! Strive against the disbelievers and the hypocrites, and be stern with them. Hell will be their home, a hapless journey’s end.” The root word of “Jihad” is used again here. The context is clearly holy war, and the scope of violence is broadened to include “hypocrites” – those who call themselves Muslims but do not act as such.

          2. Aur m Muslim bhayiyon se v yehi kahunga,aap apna islaam mane PR dusre k dhrm ko bura kehne ka hakk apko kisne diya??. Islam word ka hi mtlb peace h…ye kis trh ka peace faila rhe aap log

            1. Pirzada भाई जान
              आप अच्छे इंसान हो | आपको यह बतला दू की इस्लाम शान्ति का मार्ग नहीं दिखाता है मुझे पूरी तरह याद नहीं आ रहा की यह सुप्रीम कोर्ट था या कोई हाई कोर्ट जिसमे यह स्वीकार किया गया था की इस्लाम की आयते शान्ति नहीं मार काट करने की इजाजत देती है और कुरआन की २५ आयत हैं जिसे कोर्ट ने भी आपतिजनक बताया था शान्ति के मार्ग के लिए | क्यों ना उन आयत को कुरआन से हटा दिया जाए | आप जैसे समाज को प्रेम के मार्ग दिखाने के लिए ऐसा करने में दिक्कत क्या है ??? आप तो प्रेम की बात करते हैं तो उन आयतों को हटाने का प्रयास करे | वैसे आपके भाई बंधू यहाँ गाली गलौज ही करते हैं क्या गाली गलौज करना इस्लाम में सिखाया जाता है जैसे ३ ४ दिन पहले शिबू ने गाली दिया था | हम सत्य की मार्ग पर चल रहे हैं इस कारण इन बातो को नहीं लेते और समाज में निरंतर सुधार का प्रयास करने में लगे हैं | धन्यवाद आपका

            2. आपके ख़्यालात बहुत बेहतरीन हैं।आपका शुक्रिया।

  3. Indeed u.r right. But from how i interpret it, once the woman remarries, it is highly impossible that she will want to leave the second husband who keeps her happy for the sake of one who left her. Which means that this time SHE will refuse to marry the first scoundrel. This time SHE will get the right to decide about her life. And also, it is not likely that another man who bails her out of such a horrible situation will allow the first husband to approach his present wife, who is now HIS ghar ki izzat. So in this way, all the paths to remarry the first wife are nearly closed, no matter how much the scoundrel regrets.

  4. And another thing. The wife does not HAVE TO MARRY any other guy if she does not want to. It is purely HER wish. Talaq is supposed to happen only if there are irreconciliable differences. This rule is only to discourage such a practice in favour of working things out together. I agree that the thought is repulsive. But it is deliberately made repulsive so that people would stop to think twice before giving talaq, knowing about the repulsive consequences. It is like killing poison with poison.

    1. Thanks for being agree with the truth and right approach.

      one this is still need to be think upon- check below line out of the comment:

      “made repulsive so that people would stop to think twice before giving talaq, knowing about the repulsive consequences”

      “Halala” concept in Quran, is against the principle of justice and not punishing the culprit but punishing the women”

  5. gelchodo kbhi tum logo ne quran pdha hai kya …madarchodo sirf likhne me dhyan dete hai jisne likha usse mujhe us madarchod ko me btata hu …sale chutiyo pehle quran pdo madarchodo ..5 aadmiyo pr ek biwi rakhte ho jb shrm nhi aati ..salo jhuto

    1. भाई जान लगता है आपने कुरान पढ़ा और हमने कुरआन नहीं पढ़ा है | आप जैसे ज्ञानी से हम जरुर कुरआन पढ़ना चाहेंगे जी और साथ में हदीस भी आप जैसे ज्ञानी से पढ़ना चाहता हु | भाई जान सबसे पहले मैं आपसे यह जानना चाहता हु की क्या कुरआन में कोई आयत और सुरा है जिसमे यह लिखा गया है की आप गुस्सा करो और मीठे मीठे सब्द(गाली) का इस्तेमाल करो | थोडा हमें कुरआन से सूरा संख्या और आयत संख्या से जानकारी देना भाई जान | क्या आप कुरआन का अनुसरण सही से करते हो क्या ? यदि हां तो हमें बतलाना की मीठे मीठे सब्द का इस्तेमाल करना कहाँ लिखा है बड़ी मेहरबानी होगी जनाब | यदि आप सच्चे मुस्लिम हो तो | आप जैसे ज्ञानी से जानना चाहता हु की कुरआन में कहाँ लिखा है मीठे मीठे सब्द का इस्तेमाल करो

      1. Ye sahab quran ki product hai. 5 baar namaz adaa kartaa hai aur inke zuban kitni gandi dirty hai aur dimaag to 1000 gunaa gandaa hogaa hi. Yeh sab saabit kartaa hai ki Quran padne se aadmi paak nahin hotaa. aur gande vichaar waalaa ho jaataa hai.

      2. Are bhaiya ji itna sareef zamana nahi hai ye sale apni bahan nahi chhodte hai dusre ko updesh dete hai aur mai in chuslamiyon se sirf itna janna hu ye sale chuslami 1400 se pahle kaha the

            1. शुरूआत तो बिजेन्दर कुमार ने की उसके हिन्दु धर्म को तो बुरा नही कहा आपने यही आपका दोगलपन है

            1. यदि शालीनता से चर्चा नहीं करनी तो आप कृपया साईट पर चर्चा ना करे | आपके कमेंट को या और भी जो गाली गलौज करेंगे सभी का कमेंट शामिल नहीं की जायेगी

        1. ye kya hai ?

          Quran (2:191-193) – “And kill them wherever you find them, and turn them out from where they have turned you out. And Al-Fitnah [disbelief or unrest] is worse than killing… but if they desist, then lo! Allah is forgiving and merciful. And fight them until there is no more Fitnah [disbelief and worshipping of others along with Allah] and worship is for Allah alone. But if they cease, let there be no transgression except against Az-Zalimun(the polytheists, and wrong-doers, etc.)” (Translation is from the Noble Quran) The verse prior to this (190) refers to “fighting for the cause of Allah those who fight you” leading some to claim that the entire passage refers to a defensive war in which Muslims are defending their homes and families. The historical context of this passage is not defensive warfare, however, since Muhammad and his Muslims had just relocated to Medina and were not under attack by their Meccan adversaries. In fact, the verses urge offensive warfare, in that Muslims are to drive Meccans out of their own city (which they later did). Verse 190 thus means to fight those who offer resistance to Allah’s rule (ie. Muslim conquest). The use of the word “persecution” by some Muslim translators is disingenuous – the actual Arabic words for persecution (idtihad) – and oppression are not used instead of fitna. Fitna can mean disbelief, or the disorder that results from unbelief or temptation. A strict translation is ‘sedition,’ meaning rebellion against authority (the authority being Allah). This is certainly what is meant in this context since the violence is explicitly commissioned “until religion is for Allah” – ie. unbelievers desist in their unbelief. [Editor’s note: these notes have been modified slightly after a critic misinterpreted our language. Verse 193 plainly says that ‘fighting’ is sanctioned even if the fitna ‘ceases’. This is about religious order, not real persecution.]

          Quran (2:244) – “Then fight in the cause of Allah, and know that Allah Heareth and knoweth all things.”

          Quran (2:216) – “Fighting is prescribed for you, and ye dislike it. But it is possible that ye dislike a thing which is good for you, and that ye love a thing which is bad for you. But Allah knoweth, and ye know not.” Not only does this verse establish that violence can be virtuous, but it also contradicts the myth that fighting is intended only in self-defense, since the audience was obviously not under attack at the time. From the Hadith, we know that this verse was narrated at a time that Muhammad was actually trying to motivate his people into raiding merchant caravans for loot.

          Quran (3:56) – “As to those who reject faith, I will punish them with terrible agony in this world and in the Hereafter, nor will they have anyone to help.”

          Quran (3:151) – “Soon shall We cast terror into the hearts of the Unbelievers, for that they joined companions with Allah, for which He had sent no authority”. This speaks directly of polytheists, yet it also includes Christians, since they believe in the Trinity (ie. what Muhammad incorrectly believed to be ‘joining companions to Allah’).

          Quran (4:74) – “Let those fight in the way of Allah who sell the life of this world for the other. Whoso fighteth in the way of Allah, be he slain or be he victorious, on him We shall bestow a vast reward.” The martyrs of Islam are unlike the early Christians, who were led meekly to the slaughter. These Muslims are killed in battle as they attempt to inflict death and destruction for the cause of Allah. This is the theological basis for today’s suicide bombers.

          Quran (4:76) – “Those who believe fight in the cause of Allah…”

          Quran (4:89) – “They but wish that ye should reject Faith, as they do, and thus be on the same footing (as they): But take not friends from their ranks until they flee in the way of Allah (From what is forbidden). But if they turn renegades, seize them and slay them wherever ye find them; and (in any case) take no friends or helpers from their ranks.”

          Quran (4:95) – “Not equal are those of the believers who sit (at home), except those who are disabled (by injury or are blind or lame, etc.), and those who strive hard and fight in the Cause of Allah with their wealth and their lives. Allah has preferred in grades those who strive hard and fight with their wealth and their lives above those who sit (at home).Unto each, Allah has promised good (Paradise), but Allah has preferred those who strive hard and fight, above those who sit (at home) by a huge reward ” This passage criticizes “peaceful” Muslims who do not join in the violence, letting them know that they are less worthy in Allah’s eyes. It also demolishes the modern myth that “Jihad” doesn’t mean holy war in the Quran, but rather a spiritual struggle. Not only is this Arabic word (mujahiduna) used in this passage, but it is clearly not referring to anything spiritual, since the physically disabled are given exemption. (The Hadith reveals the context of the passage to be in response to a blind man’s protest that he is unable to engage in Jihad, which would not make sense if it meant an internal struggle).

          Quran (4:104) – “And be not weak hearted in pursuit of the enemy; if you suffer pain, then surely they (too) suffer pain as you suffer pain…” Is pursuing an injured and retreating enemy really an act of self-defense?

          Quran (5:33) – “The punishment of those who wage war against Allah and His messenger and strive to make mischief in the land is only this, that they should be murdered or crucified or their hands and their feet should be cut off on opposite sides or they should be imprisoned; this shall be as a disgrace for them in this world, and in the hereafter they shall have a grievous chastisement”

          Quran (8:12) – “I will cast terror into the hearts of those who disbelieve. Therefore strike off their heads and strike off every fingertip of them” No reasonable person would interpret this to mean a spiritual struggle. The targets of violence are “those who disbelieve” – further defined in the next verse (13) as “defy and disobey Allah.” Nothing is said about self-defense. In fact, the verses in sura 8 were narrated shortly after a battle provoked by Muhammad, who had been trying to attack a lightly-armed caravan to steal goods belonging to other people.

          Quran (8:15) – “O ye who believe! When ye meet those who disbelieve in battle, turn not your backs to them. (16)Whoso on that day turneth his back to them, unless maneuvering for battle or intent to join a company, he truly hath incurred wrath from Allah, and his habitation will be hell, a hapless journey’s end.”

          Quran (8:39) – “And fight with them until there is no more fitna (disorder, unbelief) and religion is all for Allah” Some translations interpret “fitna” as “persecution”, but the traditional understanding of this word is not supported by the historical context (See notes for 2:193). The Meccans were simply refusing Muhammad access to their city during Haj. Other Muslims were allowed to travel there – just not as an armed group, since Muhammad had declared war on Mecca prior to his eviction. The Meccans were also acting in defense of their religion, as it was Muhammad’s intention to destroy their idols and establish Islam by force (which he later did). Hence the critical part of this verse is to fight until “religion is only for Allah”, meaning that the true justification of violence was the unbelief of the opposition. According to the Sira (Ibn Ishaq/Hisham 324) Muhammad further explains that “Allah must have no rivals.”

          Quran (8:57) – “If thou comest on them in the war, deal with them so as to strike fear in those who are behind them, that haply they may remember.”

          Quran (8:67) – “It is not for a Prophet that he should have prisoners of war until he had made a great slaughter in the land…”

          Quran (8:59-60) – “And let not those who disbelieve suppose that they can outstrip (Allah’s Purpose). Lo! they cannot escape. Make ready for them all thou canst of (armed) force and of horses tethered, that thereby ye may dismay the enemy of Allah and your enemy.” As Ibn Kathir puts it in his tafsir on this passage, “Allah commands Muslims to prepare for war against disbelievers, as much as possible, according to affordability and availability.”

          Quran (8:65) – “O Prophet, exhort the believers to fight…”

          Quran (9:5) – “So when the sacred months have passed away, then slay the idolaters wherever you find them, and take them captive and besiege them and lie in wait for them in every ambush, then if they repent and keep up prayer and pay the poor-rate, leave their way free to them.” According to this verse, the best way of staying safe from Muslim violence at the time of Muhammad was to convert to Islam: prayer (salat) and the poor tax (zakat) are among the religion’s Five Pillars. The popular claim that the Quran only inspires violence within the context of self-defense is seriously challenged by this passage as well, since the Muslims to whom it was written were obviously not under attack. Had they been, then there would have been no waiting period (earlier verses make it a duty for Muslims to fight in self-defense, even during the sacred months). The historical context is Mecca after the idolaters were subjugated by Muhammad and posed no threat. Once the Muslims had power, they violently evicted those unbelievers who would not convert.

    2. भाई जान आप जैसे ज्ञानी लोग से यह जानना चाहता हु की क्या आप तौरेत इंजील जुबेर में मिलावट मानते हो या नहीं ? इस बात का हमें जवाब देना | यदि नहीं मिलावट की गयी तो कुरआन को नाजिल क्यों की गयी ? और यदि आपका जवाब होगा हाँ तो यह जान ले जब जुबेर इंजील तौरेत में मिलावट हो सकती है जो की आपके हिसाब से अल्लाह की वाणी थी या है जो आप बोलो तो फिर मानव लिखित महाभारत में मिलावट क्यों नहीं की जा सकती है और उसमे गलत जानकारी दी जा सकती है की ५ से विवाह करो यह महाभारत में मिलावट कर दी गयी है | दूसरी बात आप यह जानकारी देना की कितने औरत है जिसके 5 पति हैं इतिहास में खोजकर बतलाना या अभी भी कोई हो तो बतलाना | भाई जान हमें यह भी बतलाना की यदि इस्लाम शान्ति सिखाता है तो फिर मीठे मीठे सब्द का इस्तेमाल आप जैसे लोग कैसे कर सकते हैं थोडा हमें जानकारी देना जी || एक बात और बतलाना जैसे 1 पुरुष 4 औरत से निकाह कर सकता है तो कुरआन यह क्यों नहीं बोलता की एक औरत भी 4 पुरुष से निकाह कर सकती है | क्यूंकि औरत को इस्लाम में और कुरआन में बस उपभोग की वस्तु ही समझते हो और औरत की स्थिति जानवर से भी बद्दतर बनाकर रखा है आप लोगो ने | हम आप जैसे ज्ञानी से जरुर मार्गदर्शन की उम्मीद करते हैं |

    3. अब हमने पढ़ लिया क्या है क़ुरान में धन्यवाद भाई क़ुरानी प्रवचन के लिए

    4. Wo ek case tha aur apk cases hr 1 KO 4 biwi ajtk allowed hai aur ap dusro KO gali dete ho admi rkh skte h aurt ne rkhlia to glt pdh k aaiye Ku aisa hua tb boliye

    1. भाई जान आप अपनी असली औकात पर नज़र आ रहे हो जी | कुरआन में बोला ही गया है मार काट करो जेहाद करो वही कर रहे हो | क्या आप नबी को अनुसरण करते हो ? मुह्मद साहब को एक और रोज कूड़ा शरीर पर फेक देती थी मगर मुह्मद साहब कुछ नहीं बोलते थे कुछ दिन जब वह औरत उनके शरीर पर कूड़ा नहीं फेकी और नज़र नहीं आई तो वे खुद उसके पास गए पूछने की आपको बहुत दिन से देखा नहीं आप ठीक तो हो | मगर वहाँ देखा की वह बीमार थी तब मुहम्द साहब ने उस औरत का इलाज करवाया | ऐसा किसी मुस्लिम ने टीवी चैनल में जानकारी दी थी जिसे मैंने शेयर किया |आप तो खुद मुहम्द साहब और नबी को अनुसरण नहीं कर रहे हो तो सच्चे मुस्लिम कैसे हुए ? कुरआन बोलता है नबी का अनुसरण करो | फिर आप सच्चे मुस्लिम कैसे ? जानकारी देना जी ज्ञानी जी | आपसे मार्गदर्शन चाहूँगा जी | फिर आगे चर्चा करूँगा आपसे |

    2. भाई जान हम आप जैसे ग्यानी लोग से कुरआन जरुर पढ़ना चाहेंगे अच्छा होगा यहाँ पर हमें कुरआन पढ़ाए जिससे बहुत से लोग कुरआन के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकेंगे | भाई जान यह भी बतलाना कुरान में किस आयत और सूरा में लिखा गुस्सा करो | गाली दो | थोडा जानकारी देना आप जैसे शांति प्रिय लोग से यह जानकारी लेना चाहता हु | धन्यवाद

          1. रिशवा आर्य कुरान और मुहम्मद साहब के बारे मे इतना झूठ मत बोल नही तो मैने आज गाली नही दी है। तूझे मार तो नही सकती पर गाली जरूर दे सकता है। झूठ पे झूठ लिखकर क्या साबित करना चाहते हो तुम।
            अगर मै भी आपकी तरह झूठ लिख दू धर्म के बिरे मे तो क्या आपको गुस्सा नही आयेगा। मै लिखकर दिखाता हू
            ऋग्वेद मे लिखा है वो इंसान जब तक आर्य य सनातनी नही हो सकता जबतक अपनी मा को ना चोद ले। पृष्ट 56: मंत्र 310
            और अर्थवेद मे त ये भी लिखा है । एक सनातनी को अपनी सगी बहन को चोदना बहुत जरूरी है नही तो वो आर्य नही बन सकता।पृष्ट78:मंत्र 678 / श्लोक 71
            और भी बहुत लिख सकता हू झूठ आपकी तरह मगर आगे नही लिखूगा। क्योकि मेरा धर्म मुझे इजाजत नही देता कि किसी के धर्म को बुरा कहो। इजाजत तो आपका धर्म देता है किसी के धर्म को बुरा मत कहो मगर तुम उसका पालन नही करते।माफ करना

            1. “रिशवा आर्य कुरान और मुहम्मद साहब के बारे मे इतना झूठ मत बोल”

              क्या झूठ बोला है ये तो बताओ

              और आपका धर्म क्या इज़ाज़त देता है या नहीं ये तो आपके कमेंट से पता चल ही रहा है

        1. Nhi likha hai…?
          Lkin tere bhai log to khulle saand gadhe ki gaand jaise gussa krte h
          Ek Minute..
          .
          .
          .
          .
          Aur ha vo tere bhai hi hai na..??##!!!

          1. आप जैसे लोग से यह उम्मीद की जाती ही की शालीनता से चर्चा करें | गाली गलौज या अभद्र भाषा का प्रयोग ना करें | धन्यवाद

    3. Sare anpad hai Nasrullah g ye sab comments krne wale Hindu hmare dharm ke bare me aur hmare Mohammad shaheb k bare me kuchh nhi jante

      1. Islam men auraton ki stithee kya hai ye jag jahir hai
        kitanee bandishen hein
        ye bhee pratyaksh hai

        aapko sata ko sweekarna chahiye yadi hamen kuch galat likha hai wo ham manane ko taiyar hein praman sahit batayen

      2. Ha hum ye bi ni jante ki agar vo tujhe dekh leta to tera kya haal hota
        phir bhi shayad jyada nhi tu baby se begum ho jati

    4. Nasrullah…. chus mera lullah
      Aur ha apni auraton ko v marte ho na tum Khair ab kr hi kya skte ho
      Lund to hai nhi katwe hi rhna h
      Kuch kar nhi skte na isliye marte ho daba kar rkhte ho
      Saale NaMard katwa gaand ke Kattu

      1. अपनी मर्यादा से बाहर ना जाए | आपसे यही उम्मीद की जाती है | तर्क के आधार पर चर्चा करें

  6. अगर इस्लाम धर्म को समझना है तो हदीस और कुरान को सही तरीके से पढो ।
    गलत इल्जाम मत लगाओ ।
    अगर मैं हिंदू धर्म की हिंदी करने पे आ गया तो मनुस्मृति गीता वेद मे भरी हुई सारी गंदगी उजागर कर दूंगा ।
    मुहं छुपाते फिरोगे।

  7. जी भाई जान जरुर हम इस्लाम मजहब को हदीस से समझना चाहेंगे जी | इस्लाम में कैसे औरत को रखा गया जाता है इस बारे में कुरआन हदीस से जरुर सीखना चाहेंगे यदि आप सिखाना चाहोगे भाई जान | आप बेशक गीता वेद मनुस्मृति आदि से चर्चा करे हमें इन्तजार रहेगा जी | फिलहाल यह जानकारी दे दू की कुरआन ही है जहाँ औरत को खेती बोला गया गया है | कुरआन ही है जहाँ यह बोला गया है की औरत की पिटाई करो | कुरआन ही बोलता है 1 मर्द == 2 औरत की गवाही | 1 मर्द == ४ औरत की गवाही | ऐसा तो कई उदाहरन दे सकता हु जी कुरआन से | हदीस की बात यदि बोलना शुरू करू तो फिर आप हमें और फूलो से बारिश करना शुरू कर दोगे | हदीस बोलता है अपनी बीवी का दूध पि सकते हो (मुवत्ता हदीस ) हदीस बोलता है pubic hair साफ़ करो? क्या इस का तरह का बाते कोई भी धार्मिक ग्रन्थ में होनी चाहिए ? इसके अलावा हदीस में बताया गया है की यदि किसी मित्र की बीवी पसंद आ जाए तो तलाक देकर उससे निकाह कर लो फिर जब मन भर जाए तो तलाक देकर अपनी मित्र को उसका बीवी सौंप दो | भाई जान ऐसा कई उदाहरन दिया जा सकता है मगर यहाँ उतना जानकारी देना सही नहीं और ना हमारे पास इतना ही समय है |
    धन्यवाद

    1. अपनी खेती से इंसान बहुत प्यार करता है। इसलिए

      क्या झूठ बोलते हो आप दोस्त की बीवी पंसद कैसे आ सकती है गैर औरतो को देखना इस्लाम मे हराम है।

      भाई साहब आप अगर कुछ अक्ल रखते हो तो आपको मानने पडेगा एक औरत वो सब कुछ नही कर सकती जो एक मर्द कर सकता हो इसलिए।

      1. नफीस भाई जान
        मेरे को मजबूर ना करे वरना इस्लाम की पोल खोल कर दूंगा हदीस से | और वो भी लिंक के साथ | औरत का क्या स्थिति है इस्लाम में | फिर कमलेश तिवारी की तरह हमें भी गाली देना आरम्भ कर डोगे हम हदीस से ही प्रमाण देंगे मुहम्मद साहब सब की वो भी लिंक के साथ | पाकिस्तानी साईट के हदीस से |

        1. मै गलत हदीस को देखते ही बता सकता हू आप भेजोगे तो मेरा जवाब भी पाओगे।

          1. are mere nafees bhai jaan . galat hadees ham nahi dete hain. jise pura momin bandhu swikaar karte hain use aap aswikaar karte ho. yaha tak aapne naam yaha nahees nahi rahul likhaa hai. yahi to jhuth bolne ki shiksha islaam deta hai. al takaiya

    2. Galat baat Amit ji Quraan me ayesa nahi hai
      Islam me Aurat ko Mard ke barabar darja diya gaya hai
      Ye to transelater ki galtiyan hain,
      Aap Quran ki study karo na ke padhayi.

      1. ye dekhiye kitni samanta hai aurat aur aadmi ki

        Quran (4:11) – (Inheritance) “The male shall have the equal of the portion of two females” (see also verse 4:176). In Islam, sexism is mathematically established.
        Quran (2:282) – (Court testimony) “And call to witness, from among your men, two witnesses. And if two men be not found then a man and two women.” Muslim apologists offer creative explanations to explain why Allah felt that a man’s testimony in court should be valued twice as highly as a woman’s, but studies consistently show that women are actually less likely to tell lies than men, meaning that they make more reliable witnesses.

        Quran (2:228) – “and the men are a degree above them [women]”

        Quran (5:6) – “And if ye are unclean, purify yourselves. And if ye are sick or on a journey, or one of you cometh from the closet, or ye have had contact with women, and ye find not water, then go to clean, high ground and rub your faces and your hands with some of it” Men are to rub dirt on their hands, if there is no water to purify them, following casual contact with a woman (such as shaking hands).

        Quran (24:31) – Women are to lower their gaze around men, so they do not look them in the eye. (To be fair, men are told to do the same thing in the prior verse).

        Quran (2:223) – “Your wives are as a tilth unto you; so approach your tilth when or how ye will…” A man has dominion over his wives’ bodies as he does his land. This verse is overtly sexual. There is some dispute as to whether it is referring to the practice of anal intercourse. If this is what Muhammad meant, then it would appear to contradict what he said in Muslim (8:3365).

        Quran (4:3) – (Wife-to-husband ratio) “Marry women of your choice, Two or three or four” Inequality by numbers.

        Quran (53:27) – “Those who believe not in the Hereafter, name the angels with female names.” Angels are sublime beings, and would therefore be male.

        Quran (4:24) and Quran (33:50) – A man is permitted to take women as sex slaves outside of marriage. Note that the verse distinguishes wives from captives (those whom they right hand possesses).

  8. एक चोर को सब चोर ही नजर आते हैं।
    मेरे विचार से इंसान को पहले अपने अंदर झांक लेना चाहिए और उन दोषों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
    क्योंकि जिनके अपने घर शीशे के होते हैंं वे दूसरों के घरों में पत्थर नही मारा करते—

    बलात्कार का आविष्कार balatkar ka avishkar
    देवताओं के साथ साथ भगवान के अवतार भी अनैतिक आचरण करते थे। कई स्थलों पर तो उन का आचरण अनैतिकता की हद से भी आगे अपराधपूर्ण लगता है। इस तरह के कृत्य यदि कोई आज करे तो कानून में उसे दंड देने की व्यवस्था है। भविष्‍यपुराण में उल्लेख आता है कि ब्रह्म्रा, विष्‍णु और महेश ने क्रमशः अपनी पुत्री, माता और बहन को पत्नी बना कर श्रेष्‍ठ पद प्राप्त किया ।
    स्वकीयां च सुतां ब्रह्मा विश्णु देवो मातरम् !
    भगिनीं भगवा´छंभु गृहीत्वा श्रेश्ठतामगात् !!
    – प्रतिसर्ग खं. 4,18,27
    अर्थात ब्रह्मा अपनी लड़की को, विष्‍णु देव अपनी माता को और शंभु अपनी बहन को ग्रहण कर के श्रेष्‍ठ पद को प्राप्‍त हुए ।
    वेद में भी इस का उल्लेख हैः
    पिता दुहितुर्गर्भंमाधात्
    – अथर्व 9,10,12
    अर्थात पिता ने बेटी में गर्भ धारण किया?
    मातुर्दिधिषुमब्रवं स्वसुर्जारः
    श्रृणोतु नः भातेंद्रस्य सखा मम.
    – ऋग्वेद 6,55,5
    अर्थात मैं मां के उपपति को कहता हूं. वह बहन का जार हमारी प्रार्थना को सुने, जो इंद्र का भ्राता है और मेरे मित्र है ।
    ‘‘भागवत’’ के तीसरे स्कंध में ब्रह्मा द्वारा पुत्री को चाहने का स्पष्‍ट उल्लेख आया है इस प्रसंग का अंश इस प्रकार हैः
    वाचं दुहितरं तन्वीं स्वयंभूर्हरती मनः
    अकामा चकमे क्षत्रः सकाम इति नः
    श्रुतम् तमधरम्‍मे कृतमति विलोक्य पितरं सुताः
    मरीचि मुख्या ऋषयो विश्रंभात्प्रत्यबोधयन् नैतत्पूर्वेः
    कृतं त्पद्ये न करिष्‍यंति चापरे !
    – 3,12,28,30
    अर्थात काम से वशीभूत हो कर स्वंयभू ने वाक नाम पुत्री को चाहा, पिता की यह बुद्वि देख कर मरीचि आदि पुत्रों नें समझाया कि ऐसा कर्म न किसी ने किया है, न अब होगा न ही आगे करेंगे।
    अथर्ववेद में तो पिता द्वारा पुत्री में गर्भस्थापित करने का उल्लेख है।
    ‘पिता दुहितुर्गर्भसमाधात्’
    – 9,10,12,
    अर्थात पिता ने पुत्री में गर्भ स्थापित किया.
    धर्मग्रंथों में जिन पात्रों को आदर्श बताया गया है उन में कामुकता की पराकाष्‍ठा देखी जा सकती है। जहां भी सुंदर स्त्री दिखाई दी, उसे प्राप्त करने और भोगने के तानेबाने बुने जाने लगे. ब्रहा्रा के संबंध मे शिवपुराण में उल्लेख आता है कि पार्वती के विवाह में ब्रह्मा पुरोहित बने थे। उन्होंने पार्वती का पांव देखा और इस कदर कामातुर हो उठे कि कर्मकांड करातेकराते ही स्खलित हो गए।

    भागवत में उल्लेख आता है कि शिव की रक्षा के लिए विष्‍णु ने मोहिनी रूप धारण किया तो शिव उसी रूप पर मुग्ध हो गए और उस के पीछे दीवाने होकर भागे।
    भविष्‍यपुराण में आई एक कथा के अनुसार अत्रि ऋशि की पत्नी अनुपम सुंदरी थी। ब्रह्मा , विष्‍णु, महेश तीनों उस के पास गए। ब्रह्मा ने निर्लज्ज हो कर अनुसूया से रतिसुख मांगा और तीनों देवता अश्‍लील हरकतें करने लगे।
    गौतम के वेश में इंद्र द्वारा अहल्या से व्यभिचार की कथा रामायण और ब्रहा वैवर्त पुराण में आती है। अनैतिकता की पराकाष्‍ठा देखिए कि इस का दंड बेचारी निर्दोष अहल्या को भोगना पड़ा था।
    भागवत (9.14) और देवी भागवत में चंद्रमा द्वारा गुरू की पत्नी को अपने पास रखने की कथा आती है गुरू ने अपनी पत्नी बार-बार वापस मांगी तो भी चन्द्रमा ने उसे वापस नहीं लैटाया। लंबे अरसे तक साथ रहने के कारण चंद्रमा से तारा को एक पुत्र भी हुआ जो चन्द्रमा को ही दे दिया गया ।
    देवताओं के गुरू बृहस्पति ने स्वयं अपने भाई की गर्भवती पत्नी से बलात्कार किया देवताओं ने ममता ( बृहस्पति की भावज ) को उस समय काफी बुराभला कहा जब उसने बृहस्पति की मनमानी का प्रतिरोध करना चाहा।
    इन प्रसंगों के सही गलत होने का विवेचन करने की आवशयकता नहीं है। इन का उल्लेख इसी दृष्टि से किया जा रहा है धर्म ग्रन्थों में उल्लेखित पात्रों को किनं मानदडों पर आदर्श सिद्ध किया गया है । उन का समय दूसरों की पत्नी छीनने व व्यभिचार करने में बीतता था तो वे लोगों को नैतिकता का पाठ कब सिखाते थे और कैसे सिखाते थे ।
    इंद्र का तो सारा समय ही स्त्रियों के साथ राग रंग में बीतता था वह जब असुरों से हार जाते तो ब्रह्मा, विष्‍णु, महेश की सहायता से षड्यंत्र रच कर अपना राज्य वापस प्राप्त करते और फिर उन्ही रागरंगों में रम जाते। अप्सराओं के नाच देखना, शराब पीना, और दूसरा कोई व्यक्ति अच्छे काम करता तो उस में विध्न पैदा करना यही इंद्र की जीवनचर्या थी । इस की पुष्ठि करने वाले ढेरों प्रसंग धर्मषास्त्रों में भरे पडे़ हैं।
    महाभारत के तो हर अघ्याय में झूठ, बेईमानी और धूर्तता की ढेरों कहानियां हैं। धर्मराज युधिष्ठिर, जिन के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने जीवन में कभी पाप नही किया, जुआ खेल कर राजपाट हार गए और पत्नी को भी दाव पर लगा बैठे, युधिष्ठिर के इस कृत्य की द्रौपदी और धृतराष्‍ट के ही एक पुत्र विकर्ण ने भर्त्‍सना की थी। ‘‘महाभारत’’ की लड़ाई के लिए कोई एक घटना मूल कारण है तो वह युधिष्ठिर का जुआ खेलना और द्रौपदी को दांव पर लगाना है। इतने बड़े युद्व का कारण धार्मिक भले ही हो, पर नैतिक कहां रह जाता है ?
    दूसरे धर्मावतार भीष्‍म ने एक राजकुमारी अंबा का अपहरण किया तथा न खुद उससे विवाह किया और न ही दूसरी जगह होने दिया । अंबा को इस संताप के कारण आत्महत्या करनी पड़ी ।
    कुंती के चारों पुत्र कर्ण, युघिष्ठिर , भीम और अर्जुन परपुरूषों से उत्पन्न हुए थे । कर्ण तो विवाह से पहले ही जन्म ले चुका था.
    स्वयंवर में द्रौपदी ने अर्जुन के गले में वरमाला डाली थी। किन्तु पांचों भाइयों ने उसके साथ संयुक्त विवाह का निश्‍चय किया। पांचाल नरेश ने इसका विरोध किया तो युधिष्ठिर ने ही जिद की और अपनी बात मनवाई ।
    संपूर्ण धर्म वाड्.मय इस तरह की विसंगतियों से भरा हुआ है इसे कथित धार्मिक युग का प्रतिबिंब भी कह सकते हैं और धर्म का आदर्श भी कह सकते हैं । जिनमें नैतिक गुणों का कोई महत्व नहीं है ।
    इन प्रसंगों से यही सिद्व होता है कि अनैतिकता को तब धर्मगुरूओं की स्वीकृति मिली हुई थी। दानदक्षिणा, पूजापाठ, कर्मकांड, यज्ञ, हवन आदि धार्मिक क्रियाकृत्य करते हुए कैसा भी आचरण किया जाता तो वह सभ्य था । जरूरी इतना भर था कि ब्राह्मणों के स्वार्थ पुरे किये जाते रहें।

  9. अल्तमश जी
    एक चोर को सब चोर ही नजर आते हैं।
    मेरे विचार से इंसान को पहले अपने अंदर झांक लेना चाहिए और उन दोषों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
    क्योंकि जिनके अपने घर शीशे के होते हैंं वे दूसरों के घरों में पत्थर नही मारा करते—

    जी बिलकुल आपने सही कहा तभी तो आपने दुसरे को चोर समझ रहे हो क्यूंकि आप खुद चोर हो | भाई जान हमने जो अर्टिकल डाले हैं वह आपके हदस कुरआन सबसे प्रमाण के आधार पर दिए जबकि आपने उपर जो रखा है सब गलत जानकारी दी है जी | चलो आप कितने झूठ बोल रहे हो और दुसरे के मत मजहब को गलत बोल रहे हो उसका प्रमाण मैं आपको दे रहा हु | भाई जान हदीस में ही सिखाया गया है अल तकईया | सो आप वही अल तकईया क्र रहे हो | आपने जितने प्रमाण दिए उपर सब गलत है जिसका मैं कुछ सवाल का जवाब दे रहा हु | जवाब देने से पहले मैं यह जानना चाहता हु क्या आप कभी सत्य को स्वीकार नहीं कर सकते ? अरे कितना झूठ बोलोगे जी ? कुरआन हदीस में यही लिखा है झूठ बोलो तभी तो झूठ ऊपर आपने बोला है | चलो आपके कुछ झूठ का पोल खोल करता हु जो आगे के कमेंट में आपको करके दिखाता हु जिससे आपको यह प्रमाणित कर दूंगा की आप कितने झूठे हो और इसकी शिक्षा कुरआन हदीस ही दे सकती है

    1. और आपने कितना बडा झूठ बोला कि कुरान हदीस मे लिखा है झूठ बोलो। कहा लिखा है मुझे बतलाना मगर अपनी तरफ से हदीसे आयत नम्बर मत डालना। हदीस तो ये कहते है वो इंसान काफिर से भी बडा काफिर हो जो झूठ बोलता है। मैने तो आपको झूठा साबित कर दिया।

      1. al takaiya क्या होता है हदीस में देखो भाई जान फिर बात करना | शायद यह बुखारी हदीस या मुस्लिम हदीस में है | यदि मजबूर करोगे तो लिंक शेयर कर दूंगा | फिलहाल मैं नहीं चाहता की लिंक शेयर करू और इस्लाम का हदीस का पोल खोल करू | एक काम करो जिससे आप इस्लाम सिख रहे हो उससे आप यहाँ चर्चा करवाओ | आप खुद चर्चा ना करे | यही अच्छा होगा आपके लिए

        1. लिंक भेजने की कोई जरूरत नही है मैने आपका अल तकिया बलोक पढा हुआ है । झूठ के अलावा एक भी सच्चाई नही है

  10. अल्तमश जी
    आप कितने झूठे हो और यह इस्लाम ही ऐसा सिखाता है जिसका खंडन आपको कर रहा हु | आपने यह लिखा है
    वेद में भी इस का उल्लेख हैः
    पिता दुहितुर्गर्भंमाधात्
    – अथर्व 9,10,12
    अर्थात पिता ने बेटी में गर्भ धारण किया?
    भाई जान अब इसका मैं वेद से अथर्ववेद से जिसका रिफरेन्स दिया उससे आपको कर रहा हु | मैं अथर्ववेद 9.10.12 का लिंक दे रहा हु जिससे यह प्रमाणित हो जाएगा की आप कितने झूठे हो और इसकी सिक्षा कुरआन हदीस ही दे सकती है | चलो जी अथर्ववेद से लिंक दे रहा हु और देखो कितने झूठ बोल रहे हो |
    http://www.onlineved.com/atharva-ved/?language=2&commentrator=5&kand=9&sukt=10&mantra=12

    कृपया लिंक पर जाए और इसका अर्थ को ठीक से पढ़े |
    चलिए दुसरे कमेंट में वेद से जो गलत अर्थ कर डाला है उसका प्रमाण देता हु |

    1. Bhai kya ye bhi galat h jo vedo me diya h

      हिन्दू धर्म नियोग और हिन्दू स्त्री
      नियोग :-
      वेद में नियोग के आधार पर एक स्त्री को ग्यारह तक पति रखने और उन से दस संतान पैदा करने की छूट दी गई है. नियोग किन-किन हालतों में किया जाना चाहिए, इसके बारे में मनु ने इस प्रकार कहा है :
      विवाहिता स्त्री का विवाहित पति यदि धर्म के अर्थ परदेश गया हो तो आठ वर्ष, विद्या और कीर्ति के लिए गया हो तो छ: और धनादि कामना के लिए गया हो तो तीन वर्ष तक बाट देखने के पश्चात् नियोग करके संत्तान उत्पत्ति कर ले. जब विवाहित पति आवे तब नियुक्त छूट जावे.(१) वैसे ही पुरुष के लिए भी नियम है कि पत्नी बंध्या हो तो आठवें (विवाह से आठ वर्ष तक स्त्री को गर्भ न रहे), संतान हो कर मर जावे तो दसवें, कन्याएं ही पैदा करने वाली को ग्यारहवें वर्ष और अप्रिय बोलने वाली को तत्काल छोड़ कर दूसरी स्त्री से नियोग करके संतान पैदा करे. (मनु ९-७-८१)
      अब नियोग के बारे में आदेश देखिये :
      हे पति और देवर को दुःख न देने वाली स्त्री, तू इस गृह आश्रम में पशुओं के लिए शिव कल्याण करने हारी, अच्छे प्रकार धर्म नियम में चलने वाले रूप और सर्व शास्त्र विध्या युक्त उत्तम पुत्र-पौत्रादि से सहित शूरवीर पुत्रों को जनने देवर की कामना करने वाली और सुख देनेहारी पति व देवर को होके इस गृहस्थ-सम्बन्धी अग्निहोत्री को सेवन किया कर. (अथर्व वेद १४-२-१८)
      कुह…………सधसथ आ.(ऋग्वेद १०.१.४०). उदिश्वर…………बभूथ (ऋग्वेद १०.१८.८)हे स्त्री पुरुषो ! जैसे देवर को विधवा और विवाहित स्त्री अपने पति को समान स्थान शय्या में एकत्र हो कर संतान को सब प्रकार से उत्पन्न करती है वैसे तुम दोनों स्त्री पुरुष कहाँ रात्रि और कहाँ दिन में बसे थे कहाँ पदार्थों की प्राप्ति की ? और किस समय कहाँ वास करते थे ? तुम्हारा शयनस्थान कहाँ है ? तथा कौन व किस देश के रहने वाले हो ?इससे यह सिद्ध होता है देश-विदेश में स्त्री पुरुष संग ही में रहे और विवाहित पति के समान नियुक्त पति को ग्रहण करके विधवा स्त्री भी संतान उत्पत्ति कर ले. सोम:……………..मनुष्यज: (ऋग्वेद मं १०,सू.८५, मं ४०)अर्थात : हे स्त्री ! जो पहला विवाहित पति तुझको प्राप्त होता, उसका नाम सुकुमारादी गनयुक्त होने से सोम, जो दूसरा नियोग से प्राप्त होता वह एक स्त्री से सम्भोग करे से गन्धर्व, जो दो के पश्चात तीसरा पति होता है वह अत्युष्ण तायुक्त होने से अग्निसग्यक और जो तेरे चोथे से ले के ग्यारहवें तक नियोग से पति होते वे मनुष्य नाम से कहाते है. इमां……………………………. कृधि ( ऋग्वेद मं.१०,सू.८५ मं.४५) अर्थात : हे वीर्य सिंचन में समर्थ ऐश्वर्य युक्त पुरुष. तू इस विवाहित स्त्री व विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्युक्त कर. इस विवाहित स्त्री में दश पुत्र उतन्न कर और ग्यारहवीं स्त्री को मान. हे स्त्री ! तू भी विवाहित पुरुष से दस संतान उत्पन्न कर और ग्यारहवें पति को समझ.घी लेप कर नियोग करो :- मनु ने नियोग करने वाले के लिए यह नियम भी बनाया : विधवायां……….कथ्चन. (९-६०) अर्थात :- नियोग करने वाले पुरुष को चाहिए की सारे शरीर में घी लेपकर, रात में मौन धारण कर विधवा में एक ही पुत्र करे, दूसरा कभी न करें.
      नियोग में भी जाति-भेद : मनु ने इस सम्बन्ध में कहा है : द्विजों को चाहिए कि विधवा स्त्री का नियोग किसी अन्य जाति के पुरुष से न कराये. दूसरी जाति के पुरुष से नियोग कराने वाले उसके पतिव्रता स्वरूप को सनातन धर्म को नष्ट कर डालते है…!!!

      1. नियोग एक शाश्त्रीय विधि है
        ये किसी पैगम्बर कि पैदाइश जैसी नहीं जो फूंक मारने से अपनी माँ के गर्भ से पैदा हो गया हो

  11. अल्तमश जी
    आपकी शंका इस वेद मंत्र पर थी जिसका भाष्य को लिंक सहित दे रहा हु जिससे आप सत्य को जान सको | आपने यह बोला था जी

    मातुर्दिधिषुमब्रवं स्वसुर्जारः
    श्रृणोतु नः भातेंद्रस्य सखा मम.
    – ऋग्वेद 6,55,5
    अर्थात मैं मां के उपपति को कहता हूं. वह बहन का जार हमारी प्रार्थना को सुने, जो इंद्र का भ्राता है और मेरे मित्र है ।

    चलिए आपने जो गलत बोला है उसका प्रमाण ऋग्वेद से देता हु और देखो जी आपको कैसे इस्लाम झूठ बोलना सिखाता है इससे मैं आपको सिद्ध कर दे रहा हु जी | चलो लिंक पढ़ो जी और देखो ऋग्वेद का गलत भाष्य कैसे कर दिया ऐसा सिख इस्लाम ही दे सकता है ना की सनातन वैदिक धर्म झूठ बोलने को सिखाता है जी | देखो लिंक और सोचो कितना झूठ बोला है आपने |
    http://www.onlineved.com/rig-ved/?language=2&commentrator=5&mandal=6&sukt=55&mantra=5

    लिंक देखो जी और बोलो कितना झूठ बोलना हदीस और कुरआन सिखाता है जिसे आपने सही कर दिया जी |

    इसी तरह आपने उपर जो प्रमाण दिए है सभी गलत दिए हैं और गलत जानकारी दी है आपने | यदि थोडा सा भी शर्म हो तो उपर लिखे हुए बात के लिए माफ़ी मांग लेना जी मगर आप माफ़ी नहीं मांगोगे क्यूंकि आप सत्य स्वीकार नहीं कर सकते और ना इस्लाम अक्ल में दखल लगाने का आदेश देता है | इसका उदाहरन निचे देता हु अगले कमेंट में |

    1. Lekin Nirukta 3.16 ke anusar toh yeh bhai bahen ke sambhog ki baat hai, toh iska matlab tumlogo ka anuvaad ghalat hua. Kya Ved itni ashleel hai ki khud ke Ved ko hi itna badalna padh raha hai sirf uski ashleelta ko chupane ke liye?

      1. वेद में कोई अश्लीलता नहीं है
        वेद ज्ञान है जो मानवमात्र के लिए है
        इश्वर कि व्यवस्था है जो श्रृष्टि के आदि से चला आ रहा है उसमें कोई परिवर्तन नहीं है
        इश्वर बाकी आसमानी कही जाने वाली किताबों कि तरह नहीं है जिसके नियम मानव मात्र के लिए न होकर व्यक्ति विशेष या समुदाय विशेष के लिए हैं और जिनमें परिवर्तन होता रहता है
        वेद मानवता है

        1. क्या सही कहा ??? गलत को सही बोलना आप लोगो से ही कोई सिख सकता है | वेद में कोई भी मिलावट नहीं की जा सकती

  12. अल्तमश जी
    जैसे मैंने आपको बताया ऊपर में की कुरआन हदीस अक्ल में दखल देना नहीं सिखाता उसका प्रमाण आपको देता हु की कैसे कुरआन हदीस यह सिखाता है की अक्ल में दखल मत दो | चलो देखो जी

    कुरआन में ही लिखा है की एक अंगुली चाँद की ओर की तो चाँद के दो टुकडे हो गए | यदि दो चाँद हो गए तो हमें दिखाई क्यों नहीं देता जी ? क्या यह केवल इस्लाम वालो के लिए 2 चाँद दिखाई देता है ? या सिर्फ अरब वालो के लिए ऐसा चमत्कार है थोडा सोचना जी | अब दूसरा उदाहरन देता हु आपको चलो यह बतलाना जी की बिना स्पर्म और ओवुम मिले कोई औरत माँ बन सकती है ? बिना सेक्स किये बिना ओवुम स्पर्म मिले ? फिर मरयम कैसे माँ बन गयी जी ? चलो एक और उदाहरन देता हु कुरआन से आसमान को छत और जमीं को फर्श बनाया ? यदि छत और फर्श बनाया तो फिर घर बनाने और आदमी को छत को क्यों जरूरत पड़ती है ? चलो एक और उदाहरन देता हु कुरआन से एक डंडा पत्थर पर मारा और झरने निकल पड़े ? ये तो बस कुरआन की झलकी दिखाई जी हमने ? इसी तरह औरत को खेत बोला गया है कुरआन में ? भाई कुरआन और हदीस की पोल खोल करना शुरू कर दू वो भी सही प्रमाण देकर तो मालुम नहीं आप नज़र भी नहीं आओगे जी |

    इन सब को आँखे बंदकर मानते हो जिससे यह सिद्द होता है की इस्लाम में अक्ल में दखल देना मना है यह बतलाना की जो प्रमाण या बाते जानकारी दी वह सही है या नहीं ? फिर आगे उसपर चर्चा करेंगे

    आपके जवाब की प्रतीक्षा में |
    धन्यवाद जी

    1. कुरआन में ही लिखा है की एक अंगुली चाँद की ओर की तो चाँद के दो टुकडे हो गए | यदि दो चाँद हो गए तो हमें दिखाई क्यों नहीं देता जी

      Ved mein yeh likha hai ki Surya 7 ghode se prithvi ke chakkar lagata hai, ab yeh ghode kya sirf Aryo ko hi dikhai dete hai kya? kisi aur ko kyun nai dikhai dete?

      अब दूसरा उदाहरन देता हु आपको चलो यह बतलाना जी की बिना स्पर्म और ओवुम मिले कोई औरत माँ बन सकती है ? बिना सेक्स किये बिना ओवुम स्पर्म मिले ? फिर मरयम कैसे माँ बन गयी जी ?

      Theek waisi hi ji jaise Mitra Varuna se Agastya paida hua bina Maa 😀

      चलो एक और उदाहरन देता हु कुरआन से आसमान को छत और जमीं को फर्श बनाया ? यदि छत और फर्श बनाया तो फिर घर बनाने और आदमी को छत को क्यों जरूरत पड़ती है

      Ved mein yeh likha hai ki Prithvi ek khana pakane ki bartan ki tarah hai aur aasman ek dhakkan ki tarah. Agar aisa hai toh chhat ki zarurat kyun padthi hai ji 😀 Ved mein toh yeh bhi likha hai ki Skambh dvara aasman tika hua hai, agar aisa hai toh wo pillar kaha hai aur hume ghar ki chhat ki zarurat kyun padhti hai ji

      चलो एक और उदाहरन देता हु कुरआन से एक डंडा पत्थर पर मारा और झरने निकल पड़े ?

      Theek waise hi na jaise Ved mein Vishwamitra ke kehne par nadiya tham jati hai.

      इसी तरह औरत को खेत बोला गया है कुरआन में ?

      Lagta hai Satyarth Prakash nahi pada, jisme Dayanand ne aurat ko khet kaha hai aur Manu ne bhi.

      Pehle toh apne Ved, Satyarth Prakash vaghera theek se padh uske baad mein dusro ke granth sikhana.

      1. “Ved mein yeh likha hai ki Surya 7 ghode se prithvi ke chakkar lagata ha” – ये आपका निरर्थक अलाप है यदि वेद में ऐसा कुछ नहीं लिखा है . चाँद के टुकड़े आपके रसूल ने किये उसका जवाब न देकर ये झूठा प्रचार करना आपके हताशा को ही प्रदर्शित करता अहि

        “Mitra Varuna se Agastya paida hua bina Maa 😀” फिर झूठ ऐसा कहीं नहीं है . सृस्थी के नियमों के विरुद्ध कुछ नहीं हो सकता . आपका पुनः एक झूठ . मरियम के बिना बाप के माँ बनने के कुरान के दावे का झूठ आपके सामने है जवाब न दे पाने कि मज़बूरी में आप फिर अनर्गल आरोप लगा रहेइएन

        Ved mein yeh likha hai ki Prithvi ek khana pakane k– फिर झूठ वेद में ऐसा कहीं नहीं है आपकी मन घडन्त बाते हैं
        ed mein Vishwamitra ke kehne par nadiya tham jati hai: फिर झूठ वेद में ऐसा कहीं नहीं है आपकी मन घडन्त बाते हैं झरने फूटने कि बात का जवाब न बना तो फिर झूठ बोलना शुरू किया

        सत्य को अपनाओं

          1. प्रमोद जी
            लाहौल विलाकुवता भाई जान | आपने शायद लेख सही से नहीं पढ़ा | यदि यह लेख पढ़ा होता सही से तो इस तरह की बात ना करते |इस तरह की बातें इस्लाम में बताई गयी है जिसे जानकारी दी गयी है |

        1. बस तू ही सच बोलता है बाकी सब तू झूठ। वा रे वा रिशवा आर्य।

    2. हनुमान ने सूरज निगला उसके बारे मे क्या कहोगे।और रही बात गर्भवती बनने की तो उस अल्लाह मे इतनी शक्ति है वो कुछ भी कर सकता है मगर तुम्हारे और महेन्दर पाल जैसे बेवकूफ इस बात को नही मानते । आप के जैसे लोग तो भगवान की तुलना भी इंसान से करते हो। अरे भाई वो पूरी कायनात को बनाने वाला है। तो बिना बिना सेक्स के किसी औरत के पेट मे बच्चा पैदा करना उसके लिए छोटा सा काम । अब महेन्दर की तरह ये मत कहना कि अल्लाह तो दोषी हुआ। अक्ल मे दख्ल तो हिन्दु नही देते।

      1. नफीस भाई जान
        हम आपके इस कथन का भी खंडन करते हैं क्यूंकि हम खुद इस बात को अस्वीकार करते हैं की हनुमान ने सूरज निगला | हम पुराण सब का खुद खंडन करते हैं | और पौराणिक यह मानते हैं की हनुमान ने सूरज निगला क्यूंकि जब एक अंगुली करने से चाँद के दो तुकडे हो सकते हैं तो फिर हनुमान सूरज को क्यों नहीं निगल सकता है | जब बिना सेक्स किये कोई माँ बन सकती है तो पौराणिक हिसाब से हनुमान सूरज क्यों नहीं निगल सकता है | इसी कारण बोलता हु पुराण कुरआन छोडो और वेद की ओर लौट चलो |

  13. अल्तमश जी
    एक बात और बतला दू पुराण सब का हम खुद खंडन करते हैं क्यूंकि पुराण रामायण महाभारत सब में बहुत सी बात मिलावट कर दी गयी है | और जो मिलावट कर दी गयी है उसे हम खुद खंडन करते हैं | वैसे आपने जो पुराण सब का उदाहरन दिया वह भी गलत उदाहरन दिया जी | वैसा कुछ पुराण में भी नहीं लिखा जी जैसा आपने बताया है | वैसे पुराण की बातो का हम खुद खंडन करते हैं | एक बात और यह धयान देना जी आगे से कभी वेद पर गलत प्रमाण मत देना जी | और ना दुसरे मजहब का अपमान करना | यदि ईमान लाने वाले होगे जैसा बोला जाता है की कुरआन में की ईमान लाओ तो आगे से ईमान लाने पर आप इस तरह की गलत बात किसी को नहीं बतलाओगे |
    आ जाओ सत्य सनातन वैदिक धर्म की ओर | इस्लाम की तरह नहीं जिसमे अल तकैया की जाती हो | आओ लौट चलो वेद की ओर | और सत्य को स्वीकार कर लो |
    धन्यवाद जी

    1. अब गलती निकाल दी तो मिलावट हो गयी । होशियारी तो आपसे सीखी आर्य जी

      1. भाई जान क्या गलती निकाल दी | अरे वेद में कभी मिलावट नहीं हो सकता | पुराण कुरआन इत्यादि सब को हम नहीं मानते |

  14. DEAR ALL,

    hamne kahi jagah pada hai ki , bhagwan / allah kaha hai aaj ke din ke hisab se sirf ramayan & quran mein hi uske nishan milate hai,
    magar mein apko ek local area ka sach batata ho aur janana chahta ho ki meri is baat se kya app sehmat hai ,

    1.doctor agar hindu hai , uske pass muslim admi dawa ke liye jhatha hai , (kiya uska use dawa ne dene thik hai).
    2. muslim nai ( hair cutting ) ke pass ek hindu hair catbane jatha hai, (to kiya uske hair na kathna thik hai)
    3. school me hindu & muslim masoom bachon ko padhane ke liye hindu master class me aata hai aur muslim bachon ko bahar khada kar de ye na padhe to kya he thik hai,

    Bhagwan & Allah ko mandir yah masjid mein na dhoondo wo waha nahi milega inshan me dhoondo wahi milagha ,

    thanks & regards
    Kishan Rajput
    sorry for any default

    1. Ishwar ke liye sabhee saman hein

      ishwar ke nam par jo aapne mat ko dusare par thopane ka karya karte hein ya maryda manavata ke vipreet karya karte hein wo apradhee hein

  15. You proved that you are a true follower of Swami Dayanand who taught you to lie to propagate Vedic Dharma.

    तलाक देकर या बिना तलाक दिए मर्दों को इच्छानुसार आपस में अपनी बीबियाँ बदल लेने का अधिकार कुरान ने इस शर्त पर दिया है की इसे दिया हुआ माल वापिस न लिया जावे |

    Where does the verse says that men can exchange wives among themselves as you have stated? It says about changing wives which means divorcing wife and marrying another woman. Arya Samajis adds their own words in Vedas but since when did you guys star putting your own words in other scriptures also?

    (And if ye wish to exchange one wife for another) He says: If you wish to marry a woman and divorce one you are already married to, or marry a woman in addition to the one you are already married to (and ye have given unto one of them a sum of money (however great)) a dowry, (take nothing from it) from the dowry. (Would ye take it) the dowry (by the way of calumny) as an unlawful possession (and open wrong?) a clear transgression.

    So better luck next time

    1. Whether a believing women can marry a non believing man ?
      no she cannt untell she is in system of Islam.
      so where they will get marry? – simple within islam
      so whats wrong in the interpretation .
      Allah in his book has made women a trading commodity.
      which u can sale can transfer .
      pls go back and check ..

  16. काफीर का गंदा दिमाग होता है.और गंदे दिमाग से गंदी बाते निकलती है.

    1. ये तो पुस्तक को पढने से और आचरण से ही पता चलता है कि किसके दिमाग में गंदी बातें भरी हैं

    1. विजय जी

      सूर्य देव जी के ७ घोड़े हैं ऐसा पौराणिक ग्रंथो में लिखा है और उनके आधार पर उनका शरीर भी होता है मगर वेद के आधार पर ऐसी बात नहीं सूर्य देव का कोई शरीर नहीं होता |

    1. आप जो बोल रहे हो सूर्य देव के ७ घोड़े इन्द्रधनुष बन जाते हैं इसे आप ठीक से समझे | सात किरण को ७ घोड़े से तुलना की गयी इंग्लिश में |

  17. First off I would like to say terrific blog! I had a quick question in which I’d like to
    ask if you do not mind. I was curious to find out how you
    center yourself and clear your mind prior to writing.
    I have had a difficult time clearing my thoughts
    in getting my ideas out. I do take pleasure in writing however it just seems like the first 10 to 15 minutes are usually lost simply
    just trying to figure out how to begin. Any ideas or hints?
    Kudos!

    1. लेखक कई प्रकार के होते हैं और उनकी लिखने की शैली अलग अलग होती है फिर आप जिस शैली में लिखना चाहे उसमे लिखे शुरू में कुछ परेशानी आ सकती है आपको | कुछ लेख के बाद आप आप अपने लेख को आसानी से लिख सकेंगे और आपको उतना ज्यादा लेख लिखने में अनुभव होते जाएगा |

    1. प्रमोद जी
      लाहौल विलाकुवता भाई जान | आपने शायद लेख सही से नहीं पढ़ा | यदि यह लेख पढ़ा होता सही से तो इस तरह की बात ना करते |इस तरह की बातें इस्लाम में बताई गयी है जिसे जानकारी दी गयी है |

  18. इस्लाम को आंतकवादी बोलते हो। जापान मे तो अमेरिका ने परमाणु बम गिराया लाखो बेगुनाह मारे गये तो क्या अमेरिका आंतकवादी नही है। प्रथम विश्व युध्द मे करोडो लोग मारे गये इनको मारने मे भी कोई मुस्लिम नही था। तो क्या अब भी मुस्लिम आंतकवादी है। दूसरे विश्व युध्द मे भी लाखो करोडो निर्दोषो की जान गयी इनको मारने मे भी कोई मुस्लिम नही था। तो क्या मुस्लिम अब भी आंतकवादी हुए अगर नही तो फिर तुम इस्लाम को आंतकवादी बोलते कैसे हो। बेशक इस्लाम शान्ति का मज़हब है।और हाॅ कुछ हदीस ज़ईफ होती है।ज़ईफ हदीस उनको कहते है जो ईसाइ और यहूदियो ने गढी है। जैसे मुहम्मद साहब ने 9 साल की लडकी से निकाह किया ये ज़ईफ हदीस है। आयशा की उम्र 19 साल थी। ये उलमाओ ने साबित कर दिया है। क्योकि आयशा की बडी बहन आसमा आयशा से 10 साल बडी थी और आसमा का इंतकाल 100 वर्ष की आयु मे 73 हिज़री को हुआ। 100 मे से 73 घटाओ तो 27 साल हुए।आसमा से आयशा 10 साल छोटी थी तो 27-10=17 साल की हुई आयशा और आप सल्ललाहु अलैही वसल्लम ने आयशा से 2 हिज़री को निकाह किया।अब 17+2=19 साल हुए। इस तरह शादी के वक्त आयशा की उम्र 19 आप सल्ललाहु अलैही वसल्लम की 40 साल थी इन हिन्दुओ का इतिहास द्रोपती ने 5 पांडवो से शादी की क्या ये गलत नही है हम मुसलमान तो 11 औरते से शादी कर सकते है ऐसी औरते जो विधवा हो बेसहारा हो। लेकिन क्या द्रोपती सेक्स की भूखी थी। और शिव की पत्नी पार्वती ने एक लडके को जन्म दिया शिव की गैरमूजदगी मे। पार्वती ने फिर किसकी साथ सेक्स किया ।इसलिए शिव ने उस लडके की गर्दन काट दी क्या भगवान हत्या करता है ।श्री कृष्ण गोपियो नहाते हुए क्यो देखता था और उनके कपडे चुराता था जबकि कृष्ण तो भगवान था क्या भगवान ऐसा गंदा काम कर सकता है । महाभारत मे लिखा है कृष्ण की 16108 बीविया थी तो फिर हम मुस्लिमो एक से अधिक शादी करने पर बुरा कहा जाता । महाभारत युध्द मे जब अर्जुन हथियार डाल देता तो क्यो कृष्ण ये कहते है ऐ अर्जुन क्या तुम नपुंसक हो गये हो लडो अगर तुम लडते लडते मरे तो स्वर्ग को जाओगे और अगर जीत गये तो दुनिया का सुख मिलेगा। तो फिर हम मुस्लिमो को क्यो बुरा कहा जाता है हम जिहाद बुराई के खिलाफ लडते है अत्यचारियो और आक्रमणकारियो के विरूध वो अलग बात है कुछ मुस्लिम जिहाद के नाम पर बेगुनाहो को मारते है और जो ऐसा करते है वे मुस्लिम नही हैक्योकी आल्लाह पाक कुरान मे कहते है एक बेगुनाह का कत्ल सारी इंसानयत का कत्ल है। और सीता की बात करू तो राम तो भगवान थे क्या उनमे इतनी भी शक्ति नही कि वे सीता के अपहरण को रोक सके जब राम भगवान थे तो रावण की नाभि मे अमृत है ये उनको पहले से ही क्यो नही पता था रावण के भाई ने बताया तब पता चला। क्या तुम्हारे भगवान राम को कुछ पता ही नही कैसा भगवान है ये।और सीता को घर से बाहर निकाल दिया गया था तो लव कुश कहा से आये किससे सेक्स किया सीता ने बताओ।और इन्द्र देवता ने साधु का वेश धारण कर अपनी पुत्रवधु का बलात्कार किया फिर भी आप देवता क्यो मानते हो। खुजराहो के मन्दिर मे सेक्सी मानव मूर्तिया है क्या मन्दिर मे सेक्स की शिक्षा दी जाती है मन्दिरो मे नाच गाना डीजे आम है क्या ईश्वर की इबादत की जगह गाने हराम नही है ।राम ने हिरण का शिकार क्यो किया बहुत से हिन्दु कहते है हिरण मे राक्षस था तो क्या आपके राम भगवान मे हिरण और राक्षस को अलग करने की क्षमता नही थी ये कैसा भगवान है।हमे कहते हो जीव हत्या पाप है मै भी मानता हू कुत्ते के बेवजह मारना पाप है ।कीडी मकोडो को मारना पाप है पक्षियो को मारना पाप है। लेकिन ऐसे जानवर जिनका कुरान मे खाना का जिक्र है खा सकते है क्योकि मुर्गे कटडे बकरे नही खाऐगे तो इनकी जनसख्या इतनी हो जायेगी बाढ आ जायेगी इन जानवरो की। सारा जंगल का चारा ये खा जाया करेगे फिर इन्सान के लिए क्या बचेगा। हर घर मे कटडे बकरे होगे। बताओ अगर हर घर मे भैंसे मुर्गे होगे तो दुनिया कैसे चल पाऐगी। आए दिन सिर्फ हिन्दुस्तान मे लाखो मुर्गे और हजारो कटडे काटे जाते है । 70% लोग मांस खाकर पेट भरते है । सब को शाकाहारी भोजन दिया जाये तो महॅगाई कितनी हो जाएगी। समुद्री तट पर 90% लोग मछली खाकर पेट भरते है। समझ मे आया कुछ शाकाहारी भोजन खाने वालो मांस को गलत कहने वाले हिन्दुओ अक्ल का इस्तमाल करो

    1. Hazrat aapki jankari ke liye ” Hazrat aayesah ki Tareekhi Haisiyat”: jo aapke hee ham mazhab Farog kazmi sahab ne likhee hai neeche de raha hun
      shyad aapki Hazrat aayesh ki umra ke prati Ilm ko badhane men sahayat degi

      हज़रत अबू बकर से आप के हुज़्नों मलाल की ये कैफ़ियत देखी न गयी चुनान्चे वो अपनी पांच साला बच्ची आयशा को ले कर एक दिन आं हज़रत (स.अ.व.व) की ख़िदमत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह (स.अ.व.व) ये बच्ची हाज़िर है आप इस से दिल बहलायें ताकि आपका ग़म ग़लत हो। इस बच्ची में ख़दीजा की सलाहियत पाई जाती है। (2) अबू बकर की इस हैरत अंगेज़ तजवीज़ पर पैग़म्बर ने सुकूत इख़तियार किया यहां तक कि बच्ची को उन्होंने गोद में उठाया और वापस चले गये। उस के बाद बक़ौले मुअर्रिख़ पैग़म्बर अबू बकर के घर में आने जाने लगे। (3)

      1. हर धर्म की किताब मे लिखा हुआ है झूठ बोलना पाप है फिर भी तुम हिन्दु अपनी तरफ से हदीसे कुरआन की आयते सब झूठ क्यो लिखते है। आयत नम्बर हदीस नम्बर सब अपनी तरफ से झूठ लिख देते हो। शर्म नही आती तुम्हे। कयामत के दिन जब इंसाफ होगा तब तुम्हे झूठा इल्जाम लगाने का पता चल जायेगा । हद होती है हर चीज की। नबी पर झूठा इल्जाम लगाया आपने और आप जैसे लोगो ने काबे पर भी इल्जाम लगा दिया। वो अल्लाह का घर है। वहा पर नमाज पडी जाती है लिंग की पूजा नही होती। और क्या कहते हो तुम हमे काबे की सच्चाई सामने क्यो नही लाते हो। यूटयूब पर हजारो विडियो पडी हुयी है देख लो कोई लिंग विंग नही है वहा। बस जन्नत का एक गोल पत्थर है और हर पत्थर का मतलब लिंग नही होता। बाईचान्स मान लो वहा शिव लिंग है।तो क्या आपके शिव लिंग मे इतनी भी ताकत नही है जो वहा से आजाद हो सके। तुम्हारी गंदी नजरो मे सभी मुस्लिम अच्छे नही है इसलिए सारे मुस्लिमो को शिव मार सके। आप तो कहते हो शिव ने पूरी दुनिया बनाई तो क्या एक छोटा सा काम नही कर सकते।
        इसलिए तो इन लिंग विंग पत्थरो के बूतो मे कोई ताकत नही होती। बकवास है हिन्दु धर्म।

        1. नफीस माली भाई जान
          आप हदीस से हमें बतलाना ये al takaiya क्या होता है |हदीस ही झूठ बोलना सिखाता है भाई जान | कुरआन भी झूठ बोलना सिखाता है नहीं तो यह कैसे संभव है की सूरज दलदल में डूब जाता है | क्या बिना औरत में स्पर्म और ओवुम मिले हुए कोई औरत माँ बन सकती है ? फिर मरयम कैसे माँ बन गयी ? और रही बात आपकी तो यह जानकारी दे दू यहाँ बिना प्रमाण का हदीस कुरआन बाइबिल इत्यादि से नहीं दिया जाता | जब प्रमाण होता है तभी यहाँ लेख डाला जाता है | हमें २ चाँद क्यों नजर नहीं आते भाई जान | झूठ कौन बोल रहा है यह सबको मालुम है | आपको मालुम होना चाहिए हम वेद को मानने वाले हैं और वेद में कहीं मूर्ति पूजा नहीं है फिर शिव लिंग को हम कैसे मानेंगे भाई जान | और हां यह पौराणिक मानते हैं मगर चलो आपको पौराणिक हिसाब से जवाब देने का कोशिश करता हु जवाब देने से पहले आपके कमेंट से ही कुछ सवाल पुछ रहा हु यूटयूब पर हजारो विडियो पडी हुयी है देख लो कोई लिंग विंग नही है वहा। बस जन्नत का एक गोल पत्थर है और हर पत्थर का मतलब लिंग नही होता। जन्नत का पत्थर कैसे आया भाई जान ? जन्नत कहा पर है और अब तक विज्ञान ने या मनुष्य ने क्यों नहीं खोज पाया यह बतलाना मेरे बंधू ? जैसे चाँद मंगल इत्यादि की खोज हो गयी वैसे ही जन्नत की खोज क्यों नहीं हो पायी ? और चलो मान लिया की यह जन्नत का पत्थर है तो कुरआन में कहीं भी बुत पूजा करना नहीं लिखा है फिर आप लोग इस पत्थर को क्यों चुमते हो ? क्या यह एक तरह की बुत पूजा नहीं है जैसे पौराणिक मूर्ति पूजा करते हैं आप उसे चुमते हो वो भी एक तरह की पूजा है | शैतान को भी पत्थर से मारते हो वो भी एक प्रकार की पूजा है जिसे आप स्वीकार नहीं करते हो ? फिलहाल इन सब बात का जवाब देना जी फिर आपको पौराणिक हिसाब से जवाब देने की कोशिश करूँगा वैसे हम खुद पुराण को खंडन करते हैं | अंधविश्वास को छोडो | आपकी जवाब की प्रतीक्षा में | आओ सत्य सनातन वैदिक धर्म की ओर लौटो | वेद की ओर लौटो | धन्यवाद|

          1. हदीस मे लिखा है इन्सान को सिर्फ वहा झूठ बोलना चाहिए जहा अगर दो इन्सानो मे दुश्मनी हो। उनके बीच मे ताकि वे दोस्त बन सके। और अल्लाह पाक कुरान मे कहते है आप सब इन्सान मिलकर भी कुरान के जैसी कोई एक
            आयत नही बना सकते । और सूरज के बारे मे ये नही लिखा कि डूब ही जाता है । दल दल मे डूब जाने का मतलब अंधेरा रात होने से। ये कुरान मे एक किस्सा(वाक्य) है। इसका मतलब ये नही कि ये आप इसे साइंस मे जोड देगे। आपने अधूरी तालीम की है और उसमे से छोटे छोटे शब्द उठा के बदनाम करना चाहते हो जबकि ये बेवकूफी है पूरा पढो समझो और सोचो तब कुछ कहो। मिसाल के तौर पर अगर कुरान या वेद या पुराण मे सेक्स शब्द आता है तो आप लोग क्या करते हो उसी शब्द को उठा लेते हो बदनाम कर देते हो । पूरा श्लोक या आयत नही पडते हो। मतलब ये नही सोचते कि ये कुरान कहना क्या चाह रही है। और रही बात जन्नत खोजनी की तो किसी भी इन्सान इतनी ताकत नही जो जन्नत को खोज निकाल सके।

            1. लगता है बंधू आपको कुरान की भी पूरी समझ नहीं शायद आप भूल गए की रसूल ने पहले कितनी आयतेन लाने को कहा और फिर कैसे बदल दिया

              और क्या कुरान में क्या शैतान का कलाम नहीं है ?
              फरिश्तों के कलाम नहीं हैं
              जब वो हिएँ तो वो भी तो उसके बराबर ही हुए

          1. sana ji

            kya Keep it up nafees each page aaone ??? jise kuch nahi jaankaari use aap bol rahe ho Keep it up nafees each page aaone. dhanya ho ji aap..

  19. हिन्दु धर्म मे शिव भगवान ही नसेडी है तो उसके कावडिया भी नसेडी। जितने त्योहार है हिन्दुओ के सब बकवास।होली को लेलो मानते है भाईचारे का त्योहार होली पर शराब पिलाकर एक दुसरे से दुश्मनी निकाली जाती है।होली से अगले दिन अखबार कम से कम 100 लोगो के मरने की पुष्टि करता है ।अब दीपावली को देखलो कितना प्रदुषण बुड्डे बीमार बुजुर्गो की मोत होती है। पटाखो के प्रदुषण से नयी नयी बीमारिया ऊतपन होती है। गणेशचतुर्थी के दिन पलास्टर ऑफ पेरिस नामक जहरीले मिट्टी से बनी करोडो मूर्तिया गंगा नदियो मे बह दी जाती है। पानी दूषित हो जाता है साथ ही साथ करोडो मछलिया मरती है तब कहा चली जाती है इनकी अक्ल जीव हत्या तो पाप हैहम मुस्लिमो को बोलते है चचेरी मुमेरी फुफेरी मुसेरी बहन से शादी कर लेते हो। इन चूतियाओ से पूछो बहन की परिभाषा क्या होती है मै बताता हू साइंस के अनुसार एक योनि से निकले इन्सान ही भाई बहन हो सकते है और कोई नही। तुम भाई बहन के चक्कर मे रह जाओ इसलिए हिन्दु लडको की शादिया भी नही होती अक्सर । हमारे बनत नाम के गाव मे 300 जाट के लडके रण्डवे है शादी नही होती फिर उनका सेक्स का मन करता है वे फिर लडकियो महिलाओ की साथ बलात्कार करते है ये है हिन्दु धर्म । और सबूत हिन्दुस्तान मे अमेरिका के बाद सबसे ज्यादा रेप होते है । किसी मुस्लिम मुल्क का नाम दिखा दो या बता दो बता ही नही सकते। तुम्हारे हिन्दुओ लडकियो को कपडे पहनने की तमीज नही फिटिंग के कपडे छोटे कपडे जीन्स टीशर्ट आदि पहननती है ।भाई बाप के सामने भी शर्म नही आती तुमको ऐसे कपडो मे थू ऐसे कपडो मे को देखकर तो सभी इन्सानो की ऑटोमेटिकली नीयत खराब हो जाती है इसलिए हिन्दु और अंग्रेजी लडकियो की साथ बलात्कार होते हे इसके लिए ये लडकिया खुद जिम्मेदार है।।और हिन्दु लडकियो के हाथ मे सरे आम इंटरनेट वाला मोबाइल उसमे इतनी गंदी चीजे थू और लडकियो को पढाते इतने ज्यादा है जो उसकी शादी भी ना हो पढी लिखी को स्वीकार कौन करता है जल्दी से पढने का तो नाम है घरवालो के पैसे बरबाद करती है और लडको की साथ अय्याशी करती है उन बेचारो का टाइम वेस्ट। इन चूतियाओ से पूछो लडकि इतना ज्यादा पढकर क्या करेगी।मर्द उनके जनखे हो जो औरत कमाऐगी मर्द बैठकर खाऐगे।सही कहू तो मर्दो की नौकरिया खराब करती है जहा मर्द 20000 हजार रूपये महीने की माॅग करे वहा लडकिया 2000 मे ही तैय्यार हो जाती हैबहुत हिन्दु गर्व के साथ कहते है कि हमारी गीता मे लिखा है कि ईश्वर कण कण मे विध्मान है ।सब चीजे मे है इसलिए हम पत्थरो को पूजते है और भी बहुत सारी चीजो को पूजते है etc. लेकिन मै कहूगा इनकी ये सोच बिल्कुल गलत है क्योकि अगर कण कण मे भगवान है तो क्या गू गोबर मे भी है आपका भगवान। जबकि भगवान या खुदा तो पाक साफ है तो कण कण मे कहा से विध्मान हुआ भगवान। इसलिए मै आपसे कहना चाहता हू भगवान हर चीज मै नही है बल्कि हर चीज उसकी है और वो एक है इसलिए पूजा पाठ मूर्ति चित्र सब गलत है कुरान अल्लाह की किताब है इसके बताये गये रास्ते पर चलो। सबूत भी है क्योकि कुरान की आयते पढकर हम भूत प्रेत बुरी आत्माओ राक्षसो से छुटकारा पाते है।हमारी मस्जिद मे बहुत हिन्दु आते है ईलाज करवाने के लिए । और मौलवी कुरान की आयते पढकर ही सभी को ठीक करते है । इसलिए कुरान अल्लाह की किताब है । जबकि आप वेदो मंत्रो से दसरो को नुकसान पहुचा सकते है अच्छाई नही कर सकते किसी की और सभी भगत पंडित जादू टोना टोटके के अलावा करते ही क्या है। जबकि कुरान से अच्छाई के अलावा आप किसी के साथ बुरा कर ही नही सकते। इसलिए गैर मुस्लिमो कुरान पर ईमान लाओ।

    1. e sab kalpanik hai

      “सलिए पूजा पाठ मूर्ति चित्र सब गलत है ” ये आपकी बात सत्य है आर्यों का तो धर्म ही तौहीद है आपको भे इसे अपनाना चाहिए और जितनी भी मजारे हैं तोड़ देनी चाहिए .
      साथ ही साथ जो सबसे बड़ी मूर्ति पूजा तो मुहम्मद साहब करते थे ” काबा को चूमना ” वो भी बंद कर देना चाहिए
      और सत्य तौहीद को अपनाना चाहिए
      साथ ही साथ कलमे में से भी मुहम्मद साहब का नाम हटा दें क्योंकि अल्लाह किसी के साथ शरीक नहीं होता

      1. काबे को चूमना का मतलब ये नही कि हमने उसे खुदा समझ के उसी से मांगना शुरू कर दिया। जिस तरह तुम हिन्दु पत्थरो को भगवान समझकर उन्ही से मांगते हो। काबे को चूमना अल्लाह के साथ मुहम्मद साहब का नाम ये तो मोहब्बत का प्रतीक है। और रही बात मजारो की अल्लाह के रसूल ने कहा है कब्रो के पास इसलिए जाया करो ताकि तुम ये सोचो हमे भी एक दिन यहा आना है। इसलिए तुम गुनाह करने बचोगे।और मै मानता हू कुछ मुस्लिम चादर चढाते है। ऐसा करने से मुहम्मद साहब ने खुद मना किया है

        1. नफीस माली भाई जान
          काबे को चूमने का मतलब भी वही होता है भाई जान जो मूर्ति पूजा करने का होता है मगर फर्क इतना है की आप इसे स्वीकार नहीं करते हो की आप बुत पूजा करते हो |जिस तरह से आपको लगता है काबे को चूमना अल्लाह के साथ मुहम्मद साहब का नाम ये तो मोहब्बत का प्रतीक है। उसी प्रकार पौराणिक को भी लगता है की मूर्ति एक प्रतिक है आप जैसे मक्का की ओर नमाज पढ़ते हो उसी तरह वे मूर्ति को प्रतिक समझ कर पूजा करते हैं | फिर आप में और उनमे क्या अंतर है दोनों तो बुत की ही पूजा करते हो मगर आप सत्य को स्वीकार नहीं करोगे क्यूंकि इस्लाम यह नहीं बोलता की अपनी अकल का इस्तेमाल करो यदि अक्ल का इस्तेमाल करते तो कब का आप इस्लाम छोड़कर वैदिक धर्म को अपना लिए होते | आपका अब दूसरा कमेंट का जवाब और रही बात मजारो की अल्लाह के रसूल ने कहा है कब्रो के पास इसलिए जाया करो ताकि तुम ये सोचो हमे भी एक दिन यहा आना है। इसलिए तुम गुनाह करने बचोगे।और मै मानता हू कुछ मुस्लिम चादर चढाते है। ऐसा करने से मुहम्मद साहब ने खुद मना किया है | भाई कहा मुहमद साहब ने मना किया है? इसका प्रमाण देना आप | हां कुरआन में यह मना किया गया है बुत पूजा मत करो फिर भी जैसे मुस्लिम बुत पूजा करते हैं चादर चढ़ाते हैं उसी तरह वेद में मूर्ति पूजा मना है मगर भटके हुए लोग मूर्ति पूजा करते हैं जैसे मुस्लिम लोग चादर चढ़ाते हैं | आओ सत्य की मार्ग पर आओ | वेद की ओर लौटो | सत्य सनातन धर्म को अपनाओ | अंधविश्वास को छोडो | धन्यवाद |

      2. क्या बोलते हो तुम कि ये काल्पनिक है। बेटा ये बाते वर्तमान समय मे वास्तविक है हकीकत है और सच भी है।

        1. नफीस माली भाई जान
          अब आ गए अपनी सही में इस्लाम की रास्ते पर | यही तो इस्लाम सिखाता है | हम प्यार से जवाब देते हैं और आप गाली गलौज करने पर उतर जाते हो ? हमें यह बतलाना की कुरान के किस आयत और सुरा में यह लिखा है की बदतमीजी करो जो आप कर रहे हो ? जब आपको यह नहीं मालुम की आप बड़े हो या मैं फिर आप बेटा कैसे बोल सकते हो ? और यह बेटा दुसरे अर्थ में हैं जी | इस तरह की बदतमीजी करना इस्लाम ही सिखला सकता है | और क्या वर्तमान समय में वास्तविक है हकीकत है और सच है यह भी तो बताओ जिससे की चर्चा की जा सके उस बारे में | सत्य सनातन वैदिक धर्म की ओर लौटो |

        2. कमाल है आप इस्लाम धर्म पर झूठे इल्जाम लगा सकते है । तो क्या मै आपको बेटा भी नही कह सकता। क्योकि हर धर्म की किताब मे लिखा है किसी के धर्म को बुरा ना कहो । मैने तो मजबूर होकर जब हिन्दुओ के गंदे कमेंट पढे तब हिन्दुओ के वर्तमान हालात पर कमेंट किये है। और आप जैसे सभी हिन्दुओ ने तो 1400 साल पहले इस्लाम मे बेबुनियाद कमी निकाली है । इसको बोलते है धर्म के बारे मे कुछ गलत कहना। अगर कुछ लिखने की हिम्मत है तो मुस्लिमो की वर्तमान स्थिति के बारे मे लिखो ताकि हम सुधरो। वैसे मुझे लगता नही इस्लाम मे फिलहाल कुछ भी गलत है। क्योकि इस्लाम तो शुरू से ही शान्ति अमन का सन्देश देता है। क्योकि इस्लाम का दूसरा नाम तो इन्सानियत है

          1. इस्लाम शांति का मज़हब है तो फिर गैर मुस्लिमों को मारने की बात क्यों कही जाती है
            मुहम्मद साहब के ये कार्य किस तरह शांति का सन्देश देते हैं :
            http://aryamantavya.in/islam-shanti-ka-mazhab/

    2. Ohh pls in bato me kuch nahi h ham dharm ke chakkar me ye hi bhul gaye hai ki ham pehle insaan hai jise bhagwan ne khud banaya hai taki ham duniya me pyar se rahe aur apne karmo ko achha rakhe bhagwan god allah kahi nahi hai sirf apne andar hai isliye khud achhe banna sikho aur fir bhagwan krishna ne bhi prem ko hi dharm jaat sab batya hai dwarika dheesh ke jo kapde hai na wo muslman vyakti hi silta hai wo to fark nahi karte fir ham kyu sabse pehle hame khud ki aatma ko saaf aur pavitra rakhna chahiye agar ham khud sahi hai to bhagwan hamare andar hai
      Radhey radhey jii

      1. मोनिका चौहान जी
        यदि आपको यह मालुम होता की धर्म किसे बोलते हैं तो यह आप नहीं बोलती की इंसान बनो | खुद वेद बोलता है मनुर्भव | मनुष्य बनो | और सब जो मत मजहब हैं वे यह बोलते हैं मुस्लिम बनो काफिर को मारो | इसाई बनो | बौध बनो इत्यादि | अरे सनातन धर्म तो यह बोलता है मोनिका जी की पूरा विश्व ही कुटुंब के सामान है फिर जब कुटुंब के समान है तो वे आपस में प्यार करेंगे ही | मगर मत मजहब संप्रदाय ऐसा शिक्षा नहीं देता | आपने बोला की इश्वर अल्लाह और god इत्यादि ये सभी आपको जानकारी दे दू सभी अलग अलग हैं |चलो आप पौराणिक हो तो आपको पौराणिक हिसाब से ही जवाब देने का कोशिश करता हु पुराण में मलेक्ष शब्द क्यों आया है ? मलेक्ष कौन हैं यह आप बतलाना जी | और आपको मालुम होना चाहिए जो पौराणिक हैं वे केवल द्वारकाधीश के कपडे केवल मुसलमानों से नहीं सिलवाते छठ पूजा होता है उसमे भी मुसलमान लोग की सहायता ले लेते हैं | चलो कुछ बात बतलाना जी आप आप पौराणिक हो इस कारण पौराणीक हिसाब से सवाल कर रहा हु आपने कई बार सूना होगा मंदिर में नमाज मुस्लिमो को पढ़ने दिया गया मगर क्या यही मस्जिद में वेद पढ़ने दिया जाता है ? अरे वेद छोड़ दो गीता रामायण इत्यादि पढ़ने दिया जाता है क्या ??? अरे आप पौराणिक हो तो भी सभी से प्रेम करती हो मत मजहब वालो से | मगर दुसरे मत मजहब वाले ऐसे नहीं करते | वेद के आधार पर सभी इश्वर के संतान है चाहे वह मुसलमान हो या इसाई हो या और मत संप्रदाय के हो | सनातन धर्म तो सभी को प्यार से जीना सिखाता है | वे तो सभी को पूरा विश्व को अपना कुटुंब समझते हैं | आपके लिए राधे राधे | धन्यवाद | ॐ |

    3. Inko samjhna ka koi matlb nhi hai .inke dil or dimag siyah kar diye gye hai.quraan ko or muhammed sahab ko kisi k respect ki zarurat nhi . Allah kareem hai quraan ki hifazat Allah khud karte hai .islam padhne or samjhne ki dawat deti hu.

      1. sana ji
        allah ko baar baar khud ki aayat kyu badlana padta hai?? kya allah agyani hai yaa bhulkar hai jo baar baar aayat badal deta hai. aur yah bhi badlana paigambar sahab ki maut kaise huyi ???

  20. अमिति राॅय जी आपने इस्लाम धर्म के नाम पर जो बाते कही है वो असल इस्लाम धर्म की है क्या नही ये देखिये आप जिन बातो को जोर दे कर बोल रहे है औरत के बारेमे इस्लाम क्या कहता है आगर आपको सच मुच समज ना है तो असल किताबोका हावाला दीजिये और एक बात तुम्हे लगता है वौसा मतलब मत निकालीये
    आप जो बात कर रहे है वो सिया लोगे की है सिया लोगो मे मुताबिक कि मुताबिक एक औरत और मर्द जितनी चाहिये लोगोसे हां बिस्तरों कर सकता है लेकिन इस बात को इस्लाम मना करता है
    तकिया कि बात इस्लाम को मजूर नही वो बात भी सिया लोगो की है और किरण कि आयतो को हादिस कि बातो को तोड मरोड कर लिखने कि साजिश आज कल की नही बहोत सालो से इस्लाम को बदनाम करणे के लिये इस्लाम जिहादी है इस्लाम औरतो का हाक नही देता औरतो को बदिस्त बनाकर रखता है चार चार शादियां करता है बच्चे जादा पैदा करता है औरतो को रखेल बनाता है लौडी बनाकर खरीदता है बेचता है यौसी बहुत सारी बाते गलत किताबोका हवाला दे कर बताई जाती है और एक कुराण कि असल रिवायत का हावाला दिया जाता है जो इस वक्त मे इस दौर मे कही गयी बाद के रिवायत का हवाला नही दिया जाता
    लोगो को गुमराह करनेके लिये कभी कभार बुखारी शरीफ सही मुस्लिम शरीफ का हावाला दिया जाता है आपने तरीकेसे तो अगर बहस करनी ही है तो एक एक बात बर बहस हो कभी इधर कभी उधर करने से कुछ समझने नही आता आगर लोगो को गुमराह करना ही मकसद है तो फिर कोइ बात नही लेकिन अगर इस्लाम के अंदर लिखी हुवी बाते यौसा क्यू लिखा है कहा गया है सचमुच समझना है तो एक एक बात पर बहस करे हो सकता है कुछ हमे नही समझा होगा और कुछ तुम्हे नही समझा होगा तो बहस करना है तो एक एक बात पर बहस करेगे फिरसे सुरवात कर सकते है मै आपसे बहस कर सकता हु जीस बात पर आपको येतराज है या शंक है उसे दुर करने की कोशिस करेगे मै कोई सलीम या मौलाना नही एक सोशलवर्कर हु अगर कुछ गलत है तो मै इस बात को मानने वाला हू तो आगर आप चाहते है तो बहस कर सकते है मुझे भी इस्लाम के बारे मे सब कुछ मालूम है या सब कुछ जानता हु यौसा नही पर आपके साथ बात करके मुझे जितनी जानकारी है उसने इजाफा जरूर होगा तो हां दोनो को इस्लाम के बाते मे साही समज मिले और हम इस्लाम को सही तरीकेसे समझे यौसी अल्ला से दीवार मागता हु अल्ला हां दोनो को सही समज सत्ता फरमा आमिन

    1. आसिफ बाबा भाई जान
      सबसे पहले हमें यह बतलाये की धर्म किसे बोलते हैं इस्लाम मजहब क्या है ? थोडा हमें बतलाना | इस्लाम में खुद और के बारे में वैसा बोला गया है जिस कारण हमने प्रमाण दिया है | इस्लाम बोलता है जात पात नहीं फिर ये सिया सुन्नी अहमदिया इत्यादि ये सब क्या है ? क्या सिया खुद को इस्लाम के नहीं मानते ? क्या सुन्नी खुद को इस्लाम के नहीं मानते ? ७२ फिरके क्या है ? फिर इस्लाम क्या है ? सच्चा इस्लाम कौन सा है ? यह हमें बतलाना जी | खुद कुरआन सब में इसकी जानकारी दी गयी है | आप जब चाहे चर्चा करें हम तैयार हैं चर्चा करने को | जब आप चाहे कुरआन हदीस सब से चर्चा करे | और हम तो चाहते हैं कोई ऐसा हो जो हमें इस्लाम के बारे में सही जानकारी दे सके | यहाँ तक आपके इस्लाम के प्रकांड विद्वान् जाकिर तक कुरआन हदीस को मानते हैं और मुस्लिम मौलाना तक कुरआन हदीस को सही मानते हैं | और जो हमने प्रमाण दिया है उन्ही सब से पढ़कर दिया है | आप बोलोगे तो उन साईट से लिंक भी पेश कर दूंगा मगर लिंक पेश करूँगा तो बहुत लोगो को लगेगा की हमने गलत पेश कर दी | अल तकैया कर दोगे आप | चलो आप जिस से चर्चा करना चाहो चर्चा करो हम तैयार है | मुझ जैसे अज्ञानी को इस्लाम के बारे में सही जानकारी देने की कृपा करे | आपके जवाब की प्रतीक्षा मे | धन्यवाद |

    2. आसिफ बाबा भाई जान
      सबसे पहले हमें यह बतलाये की धर्म किसे बोलते हैं इस्लाम मजहब क्या है ? थोडा हमें बतलाना | इस्लाम में खुद और के बारे में वैसा बोला गया है जिस कारण हमने प्रमाण दिया है | इस्लाम बोलता है जात पात नहीं फिर ये सिया सुन्नी अहमदिया इत्यादि ये सब क्या है ? क्या सिया खुद को इस्लाम के नहीं मानते ? क्या सुन्नी खुद को इस्लाम के नहीं मानते ? ७२ फिरके क्या है ? फिर इस्लाम क्या है ? सच्चा इस्लाम कौन सा है ? यह हमें बतलाना जी | खुद कुरआन सब में इसकी जानकारी दी गयी है | आप जब चाहे चर्चा करें हम तैयार हैं चर्चा करने को | जब आप चाहे कुरआन हदीस सब से चर्चा करे | और हम तो चाहते हैं कोई ऐसा हो जो हमें इस्लाम के बारे में सही जानकारी दे सके | यहाँ तक आपके इस्लाम के प्रकांड विद्वान् जाकिर तक कुरआन हदीस को मानते हैं और मुस्लिम मौलाना तक कुरआन हदीस को सही मानते हैं | और जो हमने प्रमाण दिया है उन्ही सब से पढ़कर दिया है | आप बोलोगे तो उन साईट से लिंक भी पेश कर दूंगा मगर लिंक पेश करूँगा तो बहुत लोगो को लगेगा की हमने गलत पेश कर दी | अल तकैया कर दोगे आप | चलो आप जिस से चर्चा करना चाहो चर्चा करो हम तैयार है | मुझ जैसे अज्ञानी को इस्लाम के बारे में सही जानकारी देने की कृपा करे | आपके जवाब की प्रतीक्षा मे |

  21. अमिति राॅय जी आपने इस्लाम धर्म के नाम पर जो बाते कही है वो असल इस्लाम धर्म की है क्या नही ये देखिये आप जिन बातो को जोर दे कर बोल रहे है औरत के बारेमे इस्लाम क्या कहता है आगर आपको सच मुच समज ना है तो असल किताबोका हावाला दीजिये और एक बात तुम्हे लगता है वौसा मतलब मत निकालीये
    आप जो बात कर रहे है वो सिया लोगे की है सिया लोगो मे मुताबिक कि मुताबिक एक औरत और मर्द जितनी चाहिये लोगोसे हां बिस्तरों कर सकता है लेकिन इस बात को इस्लाम मना करता है
    तकिया कि बात इस्लाम को मजूर नही वो बात भी सिया लोगो की है और किरण कि आयतो को हादिस कि बातो को तोड मरोड कर लिखने कि साजिश आज कल की नही बहोत सालो से इस्लाम को बदनाम करणे के लिये इस्लाम जिहादी है इस्लाम औरतो का हाक नही देता औरतो को बदिस्त बनाकर रखता है चार चार शादियां करता है बच्चे जादा पैदा करता है औरतो को रखेल बनाता है लौडी बनाकर खरीदता है बेचता है यौसी बहुत सारी बाते गलत किताबोका हवाला दे कर बताई जाती है और एक कुराण कि असल रिवायत का हावाला दिया जाता है जो इस वक्त मे इस दौर मे कही गयी बाद के रिवायत का हवाला नही दिया जाता
    लोगो को गुमराह करनेके लिये कभी कभार बुखारी शरीफ सही मुस्लिम शरीफ का हावाला दिया जाता है आपने तरीकेसे तो अगर बहस करनी ही है तो एक एक बात बर बहस हो कभी इधर कभी उधर करने से कुछ समझने नही आता आगर लोगो को गुमराह करना ही मकसद है तो फिर कोइ बात नही लेकिन अगर इस्लाम के अंदर लिखी हुवी बाते यौसा क्यू लिखा है कहा गया है सचमुच समझना है तो एक एक बात पर बहस करे हो सकता है कुछ हमे नही समझा होगा और कुछ तुम्हे नही समझा होगा तो बहस करना है तो एक एक बात पर बहस करेगे फिरसे सुरवात कर सकते है मै आपसे बहस कर सकता हु जीस बात पर आपको येतराज है या शंक है उसे दुर करने की कोशिस करेगे मै कोई आलीम या मौलाना नही एक सोशलवर्कर हु अगर कुछ गलत है तो मै इस बात को मानने वाला हू तो आगर आप चाहते है तो बहस कर सकते है मुझे भी इस्लाम के बारे मे सब कुछ मालूम है या सब कुछ जानता हु यौसा नही पर आपके साथ बात करके मुझे जितनी जानकारी है उसने इजाफा जरूर होगा तो हां दोनो को इस्लाम के बाते मे साही समज मिले और हम इस्लाम को सही तरीकेसे समझे यौसी अल्ला से दुवा मागता हु अल्ला हां दोनो को सही समज अत्ता फरमा आमिन

    1. आसिफ बाबा भाई जान
      सबसे पहले हमें यह बतलाये की धर्म किसे बोलते हैं इस्लाम मजहब क्या है ? थोडा हमें बतलाना | इस्लाम में खुद और के बारे में वैसा बोला गया है जिस कारण हमने प्रमाण दिया है | इस्लाम बोलता है जात पात नहीं फिर ये सिया सुन्नी अहमदिया इत्यादि ये सब क्या है ? क्या सिया खुद को इस्लाम के नहीं मानते ? क्या सुन्नी खुद को इस्लाम के नहीं मानते ? ७२ फिरके क्या है ? फिर इस्लाम क्या है ? सच्चा इस्लाम कौन सा है ? यह हमें बतलाना जी | खुद कुरआन सब में इसकी जानकारी दी गयी है | आप जब चाहे चर्चा करें हम तैयार हैं चर्चा करने को | जब आप चाहे कुरआन हदीस सब से चर्चा करे | और हम तो चाहते हैं कोई ऐसा हो जो हमें इस्लाम के बारे में सही जानकारी दे सके | यहाँ तक आपके इस्लाम के प्रकांड विद्वान् जाकिर तक कुरआन हदीस को मानते हैं और मुस्लिम मौलाना तक कुरआन हदीस को सही मानते हैं | और जो हमने प्रमाण दिया है उन्ही सब से पढ़कर दिया है | आप बोलोगे तो उन साईट से लिंक भी पेश कर दूंगा मगर लिंक पेश करूँगा तो बहुत लोगो को लगेगा की हमने गलत पेश कर दी | अल तकैया कर दोगे आप | चलो आप जिस से चर्चा करना चाहो चर्चा करो हम तैयार है | मुझ जैसे अज्ञानी को इस्लाम के बारे में सही जानकारी देने की कृपा करे | आपके जवाब की प्रतीक्षा मे | धन्यवाद |

      1. Amit ji jis tarah aap puran,ramayan se palla jhad rahe ho usi tarah mai hadis se ajr Translater se palla jhadra hoon aur Aasmani kitab Quraan par I.aan lane ko dawat deta hoon.
        Allah ek hi Khuda hai kisne na ke musalman balke Sabhi ko banaya hai jab usne fark nahi kiya to hum kaiae karein?
        Aur Prophet sorf Quraan ko follow karte the kuchh haramkhoron ne unke character par ungli uthakar apni haowaniyat ka saboot diya hai.

        1. बहुत सही बात है कि आप सत्य को सही मानते हो

          क्या आप संगे अवसद के चूमने को गलत मानते हैं या सही ?

  22. राम या हनुमान ने राम सेतु पुल बनाया था सीता को बचा के लाने के लीए । जब भगवान थे तो पुल बनाने की क्या जरुरत थी उड की नही जा सकते थे। ये एक किस्म की चूतियापंती है और हिन्दु क्या बोलते है कि सारे भगवान मनुष्य के रुप मे थे इसलिए उड के जाने की ताकत नही थी। ये हिन्दु अपनी ही चट करते है और अपनी ही पट। जब मनुष्य के रुप मे भगवान थे। इसका मतलब ये हुआ वे मनुष्य ही भगवान थे । और भगवान उसे कहते है जो कुछ भी कर सकते है तो फिर वे मनुष्य उड क्यो नही सकते थे क्योकि आप लोग तो उनको एक तरीके से भगवान ही मानते है और ब्रहम्मा ने अपनी पुत्री से सेक्स किया था इसलिए हिन्दु ब्रहम्मा को भगवान मानते हो । ब्रहम्मा भी तो आपके भगवान थे भगवान बल्तकार करता है क्या। ये सब आपकी किताबो मे लिखा है। और राम ने अपनी पत्नी सीता को घर से बाहर निकाला था। तो क्या औरत को यूही कही भी धक्के दिये जा सकते है। कहने को राम भगवान थे औरत की इज्जत आती नही थी। एक बात और फिर ये लव कुस कहा से आये

    1. नफीस माली भाई जान
      कितना झूठ बोलते हो भाई जान कोई भी पौराणिक भी सुनेगा तो बोलेगा की आप कितने झूठे हो और झूठ बोलना शायद इस्लाम ही सिखाता हो | चलो पहले पौराणिक हिसाब से आपको जवाब देने की कोशिश करता हु पौराणिक हिसाब से जावब यह है की राम ने या हनुमान ने सेतु पुल का निर्माण नहीं किया बल्कि नल नील ने सेतु पुल का निर्माण किया | और दूसरी बात राम मनुष्य रूप में थे तो वे इस कारण वह उड़ नहीं सकते थे | उन्हें मनुष्य के रूप में समाज में मानव को मर्यादा के रूप में रहने का जो समाज में आदर्श स्थापित करना जो था | अब आपका दूसरा कमेंट आपने बताया की ब्रह्मा ने अपनी पुत्री से सेक्स किया यह कौन से पुराण में है पौराणिक के ग्रन्थ में यह प्रमाण भी देना | कितना झूठ बोलोगे मेरे भाई जान | इस तरह की झूठ बोलना तो केवल इस्लाम ही सिखलाता है आपके सारे सवाल का जवाब आपको फेसबुक पर हमारे पेज पर राहुल झा आपको जानकारी देंगे आप प्रमाण बताना वे आपको सभी से प्रमाण के साथ जवाब देंगे या फिर और दुसरे सदस्य आपको जवाब देंगे | जिस तरह से कुरआन में एक अंगुली से चाँद के दो तुकडे हो सकते हैं एक डंडा पत्थर पर मारने पर झरने निकल सकते हैं तो यह पौराणिक हिसाब से ऐसा क्यों नहीं हो सकता जी | वैसे हम खुद पुराण इत्यादि का खंडन करते हैं क्यूंकि उसमे बहुत मिलावट कर दी गयी है | जैसे कुरआन में अंधविश्वास है उसी तरह पुराण सब में भी है | आओ अंधविश्वास को त्यागो और वेड की ओर लौटो | सत्य सनातन वैदिक धर्म की ओर लौटो | धन्यवाद |

      1. एक बात बताऊ अमित भाई मैने ये राम के पुल वाली बात अपने हिन्दु दोस्तो से ही सुनी है। मैने आपकी तरह कुछ भी अपनी तरफ से झूठ नही लिखा है। और आपने क्या लिखा कि इस्लाम झूठ बोलना सिखाता है। मै बताता हू इस्लाम क्या सिखाता है।अल्लाह के रसूल ने फरमाया जिस शख्स के अन्दर ये चार चीजे होगी वो मुनाफिक है। मुनाफिक एक तरह से काफिर को बोलते है। नम्बर 1 झूठ बोलने वाला। 2 गाली देना वाला 3 वादा खिलाफी करने वाला 4 अमानत मे खयानत करने वाला। तो फिर अमित जी तुमने ये कैसे कह दिया कि इस्लाम झूठ सिखाता है। लगता है आपने इस्लाम की स्टीडीज अधूरी पडी है। आप इस्लाम की तालीम नफरतो को मजहबी दुश्मनी को पीछे छोडकर तब पडो इन्सानियत की दृष्टि से। और प्लीज request ये है आधे अधूरी आयते( श्लोक) पड कर बाकी हिन्दुओ की तरह गलत मतलब ना निकाले। और अब आप अपनी सफाई मे अपनी बात बडी करने के लिए हक और सही चीज को ना देखते हुए लिखेगे कि मुस्लमान ही झूठ बोलते है गाली देते है। मगर मेरे भाई बेबुनियाद इल्जाम लगाने से कुछ नही होता।

        1. और रही बात चांद के दो टुकडे करने की इसके बारे मुझे मालूम नही पूछ कर बतलाऊगा।
          हनुमान ने सूरज निगला था। अगर मै भी कहू कि हनुमान क्या सूरज निगल सकता है। क्योकि आप तो सभी भगवाने को मनुष्य का रूप कहते हो। मतलब आदमी। तो बताओ आदमी कैसे सूरज निगल सकता है। अब ये मत कहना उन्होने भगवान का रूप धारण कर लिया था। और अगर ऐसा कहोगे तो फिर इस सवाल का भी जवाब चाहिए सीता को लाने के लिए पुल बनाने की क्या जरूरत थी। उड के नही ला सकते थे। हिम्मत है तो जवाब दो।

          1. बंधुवर आपको लगता है वैदक धर्म की समझ नहीं है आपके निम्नलिखत वाक्य इसे प्रदर्शित करंता है :
            “आप तो सभी भगवाने को मनुष्य का रूप कहते हो। मतलब आदमी। तो बताओ आदमी कैसे सूरज निगल सकता है। ”

            वैदिक धर्म न तो अवतारवाद में विश्वास रखता है न ही चमक्त्कारों में
            प्रकृति के नियम अटल हैं उनमें कोई परिवर्तन नहीं होता

            वैदिक धर्म तौहीद को मानता है

        2. बंधू इस्लाम शांति का मजहब है या नहीं ये इतिहास से ही सिध्ध होता है मुहम्मद साहब और उनके अनुयायिओं के व्यवहार इसको प्रदर्शित करते हैं
          उदहारण के लिए :
          नास से रिवायत है कि मुहम्मद साहब ने एक अभियान खैबर की तरफ रवाना किया. हमने सुबह की नमाज अदा की . मुहम्मद साहब और अबु ताल्हा घोड़े पर सवार हो गए. मैं ( अनास ) अबू ताल्हा के पीछे बैठा था. हम खैबर की तंग गलियों में घुस गए .जैसे ही वो निवास स्थान पर पहुंचे जो अल्लाह हु अबकर जोर बोला. खैबर तबाह हो चूका था .हम लोगों के मध्य में थे जिनको पहले सचेत किया जा चूका था. लोग जब दैनिक कर्म के लिए बाहर निकले तो पता चला कि मुहम्मद साहब ने अपनी सेना के साथ कब्ज़ा कर लिया है .मुहम्मद साहब ने कहा की खैबर की भूमि अब हमारे स्वामित्व में है हमने बलपूर्वक इसे ले लिया है . लोग अब युद्ध बंदी थे . हदीस आगे कहती है कि दिह्या मुहम्मद साहब के पास आकर बोला कि अल्लाह के रसूल मुझे बंदियों की लड़कियों में से एक लड़की दे दीजिये. मुहम्मद साहब ने कहा कि जाओ और किसी को भी ले लो . उसने हुयायाय की लड़की साफिया को पसंद किया . एक व्यक्ति ने मुहम्मद साहब के पास आकर कहा की आपने दिह्या को दे दिया वो केवल आपके लिए है . मुहम्मद साहब ने कहा की साफिया को दिह्या के साथ बुलाया जाए . मुहम्मद साहब के साफिया को देखकर कहा कि दिह्या कोई दूसरी लड़की ले लो और मुहम्मद साहब ने साफिया को मुक्त कर उससे निकाह कर कर लिया .

          Read more at Aryamantavya: इस्लाम शान्ति का मज़हब! http://wp.me/p6VtLM-24I

          अब इसे क्या कहा जाये

  23. OUM..
    NAMASTE…
    NAFEES CHAACHAA, SABSE PAHALE TO AAP EK MANUSHYA BANO…MANUSHYA KE MAANE KYAA HOTI HAI THODI PADH LENAA JI… AUR ACHHE BHAARATIYA BANO, BHAARAT KO PYAAR KARO NAAKI MAKKAA-MADINE KI…APNAA NAAM BHI BHAARATIYA JAISAA RAKHO…APNI POSHAAK BHI BHAARATIYA JAISI PAHNAA KARO…
    PAIDAA HUE BHARAT ME, PALE BADHE PADHE BHARAT ME KHAATE HO BHARAT KI ROTI AUR GUNGAAN KARTE HO ARAB KI ?!!! AAP KO PATAA BHI HAI KI ARAB KI MAANE KYAA HAI? ISLAAM KI SHABD BHI SANSKRIT SE BANAA HAI…
    AAJAAO APNI MOOL VAIDIK RAASTE ME…AAP KI PURKHON KO KIS TARAHA MUSALMAAN BANAAYAA GAYAA JARAA SAMJHO….ACHCHHAA…JI…
    MNAMASTE…

    1. @ इस्लामिक बंधुओं से निवेदन है कि कृपया भाषा का संयम बनाये रखें
      स्वस्थ चर्चा के लिए यह आवश्यक है

        1. जिन्होंने अपशब्दों का प्रयोग किया उनके लिए ही लिखा

        1. किसी एक गलत इंसान की वजह से आप इस्लाम को गलत नही कह सकते । अगर आप ऐसा कहेगे तो आप दुनिया के सबसे बडे बेवकूफ हो

          1. अफगानिस्तान, लीबिया सीरीय , इराक इरान में जो हो रहा है वो प्रत्यक्ष उदारहण हैं जो हो रहा है उसका

          1. sana ji
            hamare liye pura vishwa hi pariwaar ke saman hai. aur ham apane bhatke huye pariwaar ko saty ki aor le jaana chahte hain. example 2+2=5 aisa bahut bolte hain aur ham jaankaari dete hain 2+2=4 hote hain. fir bhi koi ise swikaar kare yaa naa kare. ham apana kartavya kaa paaln kar rahe hain jaankaari dekar. ab jise saty lage ve apanye apani maarg ko nahi to ve soch aapki vichaar aapki.. dhanywaad

  24. आप सभी गैर मुस्लिमो से निवेदन है कि आप (गैर मुस्लिमो मे गलतफैमिया) ये लिंक पढे

      1. अमित जी मैने आपसे पहले भी कहा है और अब भी कहूगा कि अधूरा ज्ञान हानिकारक होता है। ये आपकी काट छाट के ली गयी अधूरी आयते है। जो अपने आप मे बेवकूफी का प्रमाण है। मै बताता हू जिस तरीके से कुरान मे लिखा है कि (नमाज मत पढो ,जब तुम नशे की हालत मे हो।) अब अगर तुम इसमे से सिर्फ ये लाइन उठा लो (नमाज मत पढो) और मुस्लिमो को बदनाम करो। तो इसका मतलब कुरान मे कमी नही आप मे कमी है। और मेरे भाई आप बहुत गलत कर रहे हो कुरान पर आधी अधूरी बाते पढकर इल्जाम लगाये ही जा रहे हो। आप मुस्लिमो को कुछ भी कह सकते हो। मगर कुरान को नही। इसमे आपका ही फायदा है। नही तो अल्लाह के घर मे देर है अंधेर नही। फिर वो दिन भी दूर नही जब तुम पर बहुत सख्त अजाब आयेगा। तुम सोच भी नही सकते। भाई तौबा करो अल्लाह पाक से अभी भी वक्त है। बेसक अल्लाह माफ करने वाले है।

        1. जनाब लगता है यहाँ भी आपका ज्ञान अधुरा है
          कुरान कि आयतें किस तरह शराब बंदी को लेके नाजिल हुयी हैं वो अल्लाह कि कम समझ को ही दर्शाती हैं
          शायद आपको इसका पता नहीं है

            1. में आपसे वही कह रहा हूँ समयानुसार और परिस्तिथि अनुसार अल्लाह मियां/रसूल अपने नियम और कायदे बदलते रहे
              पहले शराब पूरी तरह बंद नहीं थी , फिर नमाज़ के समय बंद हुयी उसके बाद शराब कि कुछ किस्म को बंद करने का पैगाम रसूल ने दिया कि ये अल्लाह ने कहा है
              यदि शराब गलत थी तो पहले ही आदेश दे देना चाहिये था कि पूरी तरह बंद है
              🙂

  25. इस्लाम आ चुका है आपके जीवन में
    एक हिंदू भाई ने घोषित कर दिया कि इस्लाम हिंदू धर्म की छाया प्रति है।
    आज कहना सबके लिए आसान हो गया है। इसीलिए कोई कुछ भी कह सकता है।
    अगर कुछ साधारण सी बातों पर भी विचार कर लिया जाए तो उन्हें अपनी ग़लती आसानी से समझ में आ सकती है और अगर वे न समझें तब भी कम से कम दूसरों की समझ में तो आ ही जाएगी।
    1. हिंदू धर्म की कोई एक सर्वमान्य परिभाषा आज तक तय नहीं है जबकि इस्लाम की परिभाषा तय है।
    2. हिंदू भाई बहनों के लिए कर्तव्य और अकर्तव्य कुछ भी निश्चित नहीं है। एक आदमी अंडा तक नहीं छूता और अघोरी इंसान की लाश खाते हैं जबकि दोनों ही हिंदू हैं।
    जबकि एक मुसलमान के लिए भोजन में हलाल हराम निश्चित है।3. हिंदू मर्द औरत के लिए यह निश्चित नहीं है कि वे अपने शरीर को कितना ढकें ?, एक अपना शरीर ढकता है और दूसरा पूरा नंगा ही घूमता है।
    जबकि मुस्लिम मर्द औरत के लिए यह निश्चित है कि वे अपने शरीर का कितना अंग ढकें ?
    4. हिंदू के लिए उपासना करना अनिवार्य नहीं है बल्कि ईश्वर के अस्तित्व को नकारने के बाद भी लोग हिंदू कहलाते हैं।
    जबकि मुसलमान के लिए इबादत करना अनिवार्य है और ईश्वर का इन्कार करने के बाद उसे वह मुस्लिम नहीं रह जाता।
    5. केरल के हिंदू मंदिरों में आज भी देवदासियां रखी जाती हैं और औरतों द्वारा नाच गाना तो ख़ैर देश भर के हिंदू मंदिरों में होता है। इसे ईश्वर का समीप पहुंचने का माध्यम माना जाता है।
    जबकि मस्जिदों में औरतों का तो क्या मर्दों का भी नाचना गाना गुनाह और हराम है और इसे ईश्वर से दूर करने वाला माना जाता है।6. हिंदू धर्म ब्याज लेने से नहीं रोकता जिसकी वजह से आज ग़रीब किसान मज़दूर लाखों की तादाद में मर रहे हैं।
    जबकि इस्लाम में ब्याज लेना हराम है।
    7. हिंदू धर्म में दान देना अनिवार्य नहीं है। जो देना चाहे, दे और जो न देना चाहे तो वह न दे और कोई चाहे तो दान में विश्वास ही न रखे।
    जबकि इस्लाम में धनवान पर अनिवार्य है कि वह हर साल ज़रूरतमंद ग़रीबों को अपने माल में से 2.5 प्रतिशत ज़कात अनिवार्य रूप से दे। इसके अलावा फ़ितरा आदि देने के लिए भी इस्लाम में व्यवस्था की गई है।
    8. हिंदू धर्म में ‘ब्राह्मणों को दान‘ देने की ज़बर्दस्त प्रेरणा दी गई है।
    जबकि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह व्यवस्था दी है कि हमारी नस्ल में से किसी को भी सदक़ा-ज़कात मत देना। दूसरे ग़रीबों को देना। हमारे लिए सदक़ा-ज़कात लेना हराम है।9. सनातनी हिंदू हों या आर्य समाजी, दोनों ही मानते हैं कि वेद के अनुसार पति की मौत के बाद विधवा अपना दूसरा विवाह नहीं कर सकती।
    जबकि इस्लाम में विधवा को अपना दूसरा विवाह करने का अधिकार है बल्कि इसे अच्छा समझा गया है कि वह दोबारा विवाह कर ले।
    10. सनातनी हिंदू हों या आर्य समाजी, दोनों ही यज्ञ करने को बहुत बड़ा पुण्य मानते हैं।
    जबकि इस्लाम में यह पाप माना गया है कि आग में खाने पीने की चीज़ें जला दी जाएं। खाने पीने की चीज़ें या तो ख़ुद खाओ या फिर दूसरे ज़रूरतमंदों को दे दो। ऐसा कहा गया है।
    11. सनातनी हिंदू और आर्य समाजी, दोनों ही वर्ण व्यवस्था को मानते हैं और वर्णों की ऊंच नीच और छूत छात को भी मानते हैं।
    जबकि इस्लाम में न वर्ण व्यवस्था है और न ही छूत छात। इस्लाम सब इंसानों को बराबर मानता है और आजकल हिंदुस्तानी क़ानून भी यही कहता है और हिंदू भाई भी इसी इस्लामी विचार को अपनाने की कोशिश कर रहे हैं।12. सनातनी हिंदू और आर्य समाजी, दोनों ही वैदिक धर्म की परंपरा का पालन करते हुए चोटी रखते हैं और जनेऊ पहनते हैं।
    जबकि इस्लाम में न तो चोटी है और न ही जनेऊ
    13. सनातनी हिंदू और आर्य समाजी, दोनों ही वेद के अनुसार 16 संस्कार को मानते हैं, जिनमें एक विवाह भी है। इस संस्कार के अनुसार पत्नी अपने पति के मरने के बाद भी उसी की पत्नी रहती है और उससे बंधी रहती है। पति तो पत्नी का परित्याग कर सकता है लेकिन पत्नी उसे त्याग नहीं सकती।
    जबकि इस्लाम में निकाह एक क़रार है जो पति की मौत से या तलाक़ से टूट जाता है और इसके बाद औरत उस मर्द की पत्नी नहीं रह जाती। वह अपनी मर्ज़ी से अपना विवाह फिर से कर सकती है। इस्लाम में पति तलाक़ दे सकता है तो पत्नी के लिए भी पति से मुक्ति के लिए ख़ुलअ की व्यवस्था की गई है।
    अब हो यह रहा है कि सनातनी और आर्य समाजी, दोनों ही ख़ुद वेद की व्यवस्था से हटकर इस्लामी व्यवस्था को फ़ोलो कर रहे हैं। विधवाओं के पुनर्विवाह वे धड़ल्ले से कर रहे हैं। जब मुसलमानों ने अपने निकाह को विवाह की तरह संस्कार नहीं बनाया तो फिर हिंदू भाई अपने संस्कार को इस्लामी निकाह की तरह क़रार क्यों और किस आधार पर बना रहे हैं ?
    जिस व्यवस्था पर विश्वास है, उस पर चलने के बजाय वे इस्लामी व्यवस्था का अनुकरण क्यों कर रहे हैं ?14. विवाह को संस्कार मानने का नतीजा यह हुआ कि विधवा औरतों को हज़ारों साल तक बड़ी बेरहमी से जलाया जाता रहा। यहां तक कि इस देश में मुसलमान और ईसाई आए और उनके प्रभाव और हस्तक्षेप से हिंदुओं की चेतना जागी कि सती प्रथा के नाम पर विधवा को जलाना धर्म नहीं बल्कि अधर्म है और तब उन्होंने अपने धर्म को उनकी छाया प्रति बना लिया और लगातार बनाते जा रहे हैं।
    15. विवाह की तरह ही गर्भाधान भी एक हिंदू संस्कार है। जब किसी पति को गर्भाधान करना होता है या अपनी पत्नि से किसी अन्य पुरूष का नियोग करवाना होता है तो वह 4 पंडितों को बुलवाता है और वे चारों पंडित पूरे दिन बैठकर वेदमंत्र पढ़ते हैं। उसके घर में खाते पीते हैं। उसके घर में यज्ञ करते हैं। उस यज्ञ से बचे हुए घी को मलकर औरत नहाती है और फिर पूरी बस्ती में घूम घूम कर बड़े बूढ़ों को बताती है कि आज उसके साथ क्या होने वाला है ?
    बड़े बूढ़े अपनी अनुमति और आशीर्वाद देते हैं, तब जाकर पति महाशय या कोई अन्य पुरूष उस औरत के साथ वेद के अनुसार सहवास करता है।

  26. जबकि इस्लाम में गर्भाधान संस्कार ही नहीं है और पत्नि को किसी ग़ैर मर्द के साथ सोने के लिए बाध्य करना बहुत बड़ा जुर्म और गुनाह है।
    मुसलमान पति पत्नी जब चाहे सहवास कर सकते हैं। शोर पुकार मचाकर लोगों को इसकी इत्तिला देना इस्लाम में असभ्यता और पाप है।
    आजकल हिंदू भाई भी इसी रीति से अपनी पत्नियों को गर्भवती कर रहे हैं क्योंकि यही रीति नेचुरल और आसान है।
    धर्म सदा ही नेचुरल और आसान होता है।
    मुश्किल में डालने वाली चीज़ें ख़ुद ही फ़ेल हो जाती हैं। लोग उनका पालन करना चाहें तो भी नहीं कर पाते। शायद ही आजकल कोई गर्भाधान संस्कार करता हो। इस्लामी रीति से पैदा होने के बावजूद इस्लाम पर नुक्ताचीनी करना केवल अहसानफ़रामोशी है। जिसका कारण अज्ञानता है।
    16. सनातनी हिंदू और आर्य समाजी, दोनों के नज़्दीक धर्म यह है कि पत्नि से संभोग तब किया जाए जबकि उससे संतान पैदा करने की इच्छा हो। इसके बिना संभोग करने वाला वासनाजीवी और पतित-पापी माना जाता है।जबकि इस्लाम में इस तरह की कोई पाबंदी नहीं है। इस्लामी व्यवस्था यही है कि पति पत्नी जब चाहें तब आनंद मनाएं। उन्हें आनंदित देखकर ईश्वर प्रसन्न होता है। आजकल हिंदू भाई भी इसी इस्लामी व्यवस्था पर चल रहे हैं।
    18. शंकराचार्य जी के अनुसार हरेक वर्ण और लिंग के लिए वेद को पढ़ने और पढ़ाने की आज़ादी नहीं है।
    जबकि क़ुरआन सबके लिए है। किसी भी रंगो-नस्ल के नर नारी इसे जब चाहें तब पढ़ सकते हैं।
    19. आर्यसमाजी और सनातनी महिलाओं को मासिक धर्म में शास्तों के अनुसार अपवित्र समझते थे,,, इस्‍लाम की शिक्षाओं से प्रेरित होकर उन्‍हें अब उतना अपवित्र नहीं मानते, बल्कि आगे बढकर उनके साथ स्‍कूल आफिस आदि में साथ खाना पीना हाथ मिलाने में कोई बुराई नहीं समझते
    इस्‍लामकि व्‍यवस्‍था में आदम की ब‍ेटियों को इन दिनों सेक्‍स की तकलीफ से बचाने के साथ ही नमाज एवं रोजे में छूट भी मिली है,,, हमें मार्ग दर्शन के लिए उनके साथ उठने बैठने चुमने की हदीसें मौजूद हैं20. इसी के साथ हिंदू धर्म अर्थात वैदिक धर्म में चार आश्रम भी पाए जाते हैं।
    ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम, सन्यास आश्रम
    अति संक्षेप में 8वें वर्ष बच्चे का उपनयन संस्कार करके उसे वेद पढ़ने के लिए गुरूकुल भेज दिया जाए और बच्चा 25 वर्ष तक वीर्य की रक्षा करे। इसे ब्रह्मचर्य आश्रम कहते हैं। लेकिन हमारे शहर का संस्कृत महाविद्यालय ख़ाली पड़ा है। शहर के हिंदू उसमें अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजते ही नहीं जबकि शहर के कॉन्वेंट स्कूल हिंदू बच्चों से भरे हुए हैं। जहां सह शिक्षा होती है और जहां वीर्य रक्षा संभव ही नहीं है, जहां वेद पढ़ाए ही नहीं जाते,
    जहां धर्म नष्ट होता है, हिंदू भाई अपने बच्चों को वहां क्यों भेजते हैं ?
    ख़ैर हमारा कहना यह है कि आजकल हिंदू भाई ब्रह्मचर्य आश्रम का पालन नहीं करते और न ही वे 50 वर्ष का होने पर वानप्रस्थ आश्रम का पालन करते हुए जंगल जाते हैं और सन्यास आश्रम भी नष्ट हो चुका है।आज हिंदू धर्म के चारों आश्रम नष्ट हो चुके हैं और हिंदू भाई अब अपने घरों में आश्रम विहीन वैसे ही रहते हैं जैसे कि मुसलमान रहते हैं क्योंकि इस्लाम में तो ये चारों आश्रम होते ही नहीं।
    ज़रा सोचिए कि अगर इस्लाम हिंदू धर्म की छाया प्रति होता तो उसमें भी वही सब होता जो कि हिंदू धर्म में हज़ारों साल से चला आ रहा है और उन बातों से आज तक हिंदू जनमानस पूरी तरह मुक्ति न पा सका।
    चार आश्रम, 16 संस्कार, विधवा विवाह निषेध, नियोग, वर्ण-व्यवस्था, छूत छात, ब्याज, शूद्र तिरस्कार, देवदासी प्रथा, ईश्वर के मंदिर में नाच गाना, चोटी, जनेऊ और ब्राह्मण को दान आदि जैसी बातें जो कि हिंदू धर्म अर्थात वैदिक धर्म में पाई जाती हैं, उन सबसे इस्लाम आखि़र कैसे बच गया ?
    इन बातों के बिना इस्लाम को हिंदू धर्म की छाया प्रति कैसे कहा जा सकता है ?हक़ीक़त यह है कि इस्लाम किसी अन्य धर्म की छाया प्रति नहीं है बल्कि ख़ुद ही मूल धर्म है और पहले से मौजूद ग्रंथों में धर्म के नाम पर जो भी अच्छी बातें मिलती हैं वे उसके अवषेश और यादगार हैं, जिन्हें देखकर लोग यह पहचान सकते हैं कि इस्लाम सनातन काल है, हमेशा से यही मानव जाति का धर्म है।
    ईश्वर के बहुत से नाम हैं। हरेक ज़बान में उसके नाम बहुत से हैं। उसके बहुत से नामों में से एक नाम ‘अल्लाह‘ है। यह नाम क़ुरआन में भी है और बाइबिल में भी और संस्कृत ग्रंथों में भी।ईश्वर का निज नाम यही है लेकिन उसके निज नाम को ही भुला दिया गया। ईष्वर के नाम को ही नहीं बल्कि यह भी भुला दिया गया कि सब एक ही पिता की संतान हैं। सब बराबर हैं। जन्म से कोई नीच और अछूत है ही नहीं। ऐसा तब हुआ जब आदम और नूह (अ.) को भुला दिया गया जिनका नाम संस्कृत ग्रंथों में जगह जगह आया है। इन्हें यहूदी, ईसाई और मुसलमान सभी पहचानते हैं। हिंदू भाई इन्हें ऋषि कहते हैं और मुसलमान इन्हें नबी कहते हैं। इनके अलावा भी हज़ारों ऋषि-नबी आए और हर ज़माने में आए और हर क़ौम में आए। सबने लोगों को यही बताया कि जिसने तुम्हें पैदा किया है तुम्हारा भला बुरा बस उसी एक के हाथ में है, तुम सब उसी की आज्ञा का पालन करो। ऋषियों और नबियों ने मानव जाति को हरेक काल में एक ही धर्म की शिक्षा दी। । वे सिखाते रहे और लोग भूलते रहे। आखि़रकार पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस दुनिया में आए और फिर उसी भूले हुए धर्म को याद दिलाया और ऐसे याद दिलाया कि अब किसी के लिए भूलना मुमकिन ही न रहा।
    जब दबंग लोगों ने कमज़ोरों का शोषण करने के लिए धर्म में बहुत सी अन्यायपूर्ण बातें निकाल लीं, तब ईश्वर ने क़ुरआन के रूप में अपनी वाणी का अवतरण पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अन्तःकरण पर किया और पैग़म्बर साहब ने धर्म को उसके वास्तविक रूप में स्थापित कर दिया। जिसे देखकर लोगों ने ऊंच नीच, छूतछात और सती प्रथा जैसी रूढ़ियों को छोड़ दिया। बहुतों ने इस्लाम कहकर इस्लाम का पालन करना आरंभ कर दिया और उनसे भी ज़्यादा वे लोग हैं जिन्होंने इस्लाम के रीति रिवाज तो अपना लिए लेकिन इस्लाम का नाम लिए बग़ैर। इन्होंने इस्लामी उसूलों को अपनाने का एक और तरीक़ा निकाला। इन्होंने यह किया कि इस्लामी उसूलों को इन्होंने अपने ग्रंथों में ढूंढना शुरू किया जो कि मिलने ही थे। अब इन्होंने उन्हें मानना शुरू कर दिया और दिल को समझाया कि हम तो अपने ही धर्म पर चल रहे हैं।
    ये लोग हिंदू धर्म के प्रवक्ता बनकर घूमते हैं। ऐसे लोगों को आप आराम से पहचान सकते हैं। ये वे लोग हैं जिनके सिरों पर आपको न तो चोटी नज़र आएगी और न ही इनके बदन पर जनेऊ और धोती। न तो ये बचपन में ये गुरूकुल गए थे और न ही 50 वर्ष का होने पर ये जंगल जाते हैं। हरेक जाति के आदमी से ये हाथ मिलाते हैं। फिर भी ये ख़ुद को वैदिक धर्म का पालनकर्ता बताते हैं।
    ख़ुद मुसलमान की छाया प्रति बनने की कोशिश कर रहे हैं और कोई इनकी चालाकी को न भांप ले, इसके लिए ये एक इल्ज़ाम इस्लाम पर ही लगा देते हैं कि ‘इस्लाम तो हिंदू धर्म की छायाप्रति है‘
    ये लोग समय के साथ अपने संस्कार और अपने सिद्धांत बदलने लगातार बदलते जा रहे हैं और वह समय अब क़रीब ही है जब ये लोग इस्लाम को मानेंगे और तब उसे इस्लाम कहकर ही मानेंगे।
    तब तक ये लोग यह भी जान चुके होंगे कि ईश्वर का धर्म सदा से एक ही रहा है। ‘
    एक ईश्वर की आज्ञा का पालन करना‘ ही मनुष्य का सनातन धर्म है। अरबी में इसी को इस्लाम कहते हैं। इस्लाम का अर्थ है ‘ईश्वर का आज्ञापालन।‘
    इसके अलावा मनुष्य का धर्म कुछ और हो भी कैसे सकता है ?
    वर्ण व्यवस्था जा चुकी है और इस्लाम आ चुका है।
    जिसे जानना हो, वह जान ले !

  27. बेशक इस्लाम औरत को हुक्म देता है कि वह पर्दे में रहे। दुनिया के सामने अपने जिस्म और खूबसूरती की नुमाइश (प्रदर्शन) न करें सिवाय उसके शौहर (पति) के। क्यों इस्लाम ने सिर्फ औरतों को ही पर्दे में रहने का हुक्म दिया? क्यों सारी पाबंदियां सिर्फ औरतों के लिए ही हैं? क्यों मर्दों के लिए इस्लाम पर्दे का हुक्म नहीं देता? क्यों इस्लाम में मर्दों पर किसी भी तरह की पाबंदी नहीं हैं? लगता हैं इस्लाम एक पुराना और रूढ़िवादी धर्म हैं।कुछ अज्ञानी लोग बिना इस्लाम को पढ़े और समझें इस्लाम पर इस तरह के बेहूदा इल्जाम लगाने से नहीं चूकते। हालांकि इससे इस्लाम को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि इस्लाम का प्रत्येक कानून प्रत्येक कसौटी (criterion) पर खरा उतरता हैं चाहे वो सामाजिक कसौटी (Social criterion) हो, तार्किक कसौटी (logical criterion) हो या फिर वैज्ञानिक कसौटी (Scientific criterion) हो। फिर भी इन बेतुके सवालों के जवाब देने जरूरी हैं ताकि सच्चाई सबके सामने आ सकें।इस्लाम में पर्दे का हुक्म सिर्फ औरतों के लिए ही नहीं बल्कि मर्दों के लिए भी हैं। जैसा कि कुरान ए पाक में लिखा है; “ऐ नबी (मुहम्मद साहब स.अ.व.) कह दो मोमिन (मुसलमान) मर्दों से की अपनी नजरें नीची रखे और अपनी शर्मगाहो (शरीर के खास अंगों) की हिफाजत करें, ये उनके लिए बेहतर हैं” कुरान (24 :30)कुरान की इस आयत के जरिये अल्लाह (ईश्वर) मुसलमान मर्दों को यह हुक्म दे रहा है कि वे अपनी नजरें नीची रखे और अपनी शर्मगाहो (शरीर के खास अंगों) की हिफाजत करें क्योंकि इसी में उनकी भलाई हैं। यहाँ नजरें नीची रखने का सम्बन्ध पर्दे से ही हैं पर कुछ लोगों के मन में यह सवाल उठ सकता हैं कि नजरें नीची रखने से पर्दा कैसे हुआ? तो आइये इस सवाल का जवाब हम विज्ञान से ही पूछ लेते हैं क्योंकि हो सकता हैं कि इस्लाम के तर्क (logics) को कुछ लोग कुबुल ना करे।अमेरिका की एक मशहूर Anthropologist (मानव विज्ञानी) जिसका नाम Helen Fisher हैं पिछले 30 सालों से Rutger University, America में Anthropology (मानव विज्ञान) की professor हैं और Human Behaviour (मानव व्यवहार) पर रिसर्च कर रही हैं और इसी विषय पर कई किताबें भी लिख चुकी हैं। उसने अपने रिसर्च से बताया कि इन्सान के शरीर में कुछ हार्मोन (hormones) होते हैं जैसे Testosterone और Estrogens और दिमाग में कुछ neurotransmitters (रसायन) होते हैं जैसे Dopamine और Serotonin और ये औरतों

    और वह कहती हैं कि जब भी किसी मर्द की नजर किसी औरत पर पड़ती हैं तो ये हार्मोन और रसायन active (सक्रिय) हो जाते हैं और फिर मर्द उस औरत को देखकर उत्तेजित हो जाता हैं। और ऐसा तब होता हैं जब या तो औरत बहुत खूबसूरत (Charming) हो या उसका जिस्म का उभार (Figure) दिखाई देता हो। और ऐसा सिर्फ इन्सानो में ही नहीं बल्कि पक्षियों और जानवरों में भी होता हैं। आपने सुना भी होगा और देखा भी होगा कि जब कोई हाथी पागल हो जाता है तो वह तबाही मचाने लग जाता हैं। लेकिन विज्ञान कहता है कि वह हाथी पागल नहीं होता है वह तो ऐसा इसलिए करता है क्योंकि उसमें Testosterone की मात्रा बहुत बढ़ जाती हैं। (Kohraam.com)

    इसी तरह एक शेर दूसरे शेरों के बच्चों को मार देता है ताकि शेरनी उसकी तरफ (Mating) के लिए आकर्षित हो जाए। और सभी प्रकार के नर जानवर मादा को पाने के लिए एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं। John Hopkins University के वैज्ञानिकों ने पक्षियों के व्यवहार पर रिसर्च किया और मालूम किया कि नर पक्षी गाना गाते हैं मतलब अलग अलग तरह की आवाजें निकालते हैं ताकि वे मादा पक्षियों को आकर्षित कर सकें।
    तो विज्ञान के मुताबिक औरतों (मादाओं) के जिस्म और खूबसूरती को देखकर मर्द (नर) उत्तेजित हो जाते हैं। अगर मर्दों को औरतों की तरफ आकर्षित होने से रोकना है तो औरतें अपनी खूबसूरती व जिस्म को पर्दे में रखें और मर्द भी औरतों को न घुरे तो समाज बहुत सी बुराइयों से बच जाएगा। सामाज के मान मरयादा की रक्षा और उसे बिखरने से बचाने के लिए इस्लाम ने हुक्म दिया है कि महिलाएं अपने आप को पर्दे में रखे और मर्द अपनी नजरें नीची रखे मतलब औरतों को न घुरें। तो यह साबित हो गया कि इस्लाम ने सिर्फ औरतों को ही नहीं बल्कि मर्दों को भी पर्दा करने का हुक्म दिया हैं और इसी में इन्सानो और समाज की भलाई हैं।

  28. इस्लाम की तीन बुनियादी आस्थाएं हैं-
    १. एकेश्वरवाद ( तौहिद )
    इस्लाम की बुनियादी आस्थाओ में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है एक ईश्वर में आस्था ।
    २. ईशदूत वाद ( रिसालत )
    इन्सानो के व्यवहारिक मार्गदर्शन के लिए ईश्वर हर युग में आवश्यकतानुसार संदेशवाहक भेजता रहा जो ईश्वर प्रदत्त ज्ञान की ज्योति द्वारा अपने कार्यक्षेत्र मे मनुष्यो का मार्गदर्शन करते रहे ।
    ३. परलोकवाद ( आख़िरत )
    संसार में मनुष्य अनुत्तरदायी बनाकर नहीं छोड़ा गया है । वह ईश्वर के सामने जवाबदेह है । एक दिन होगा जब मनुष्य के कर्मो की जाँच पड़ताल होगी ।’इस्लाम’ अरबी भाषा का एक शब्द है, जिसका अर्थ है आज्ञापालन, शांति और सुव्यवस्था । पारिभाषिक रूप से इस्लाम एक ईश्वर के आज्ञापालन को कहते है, जिससे शांति और सुव्यवस्था उत्तपन्न होती है
    इस्लाम, कुरआन और हज़रत मुहम्मद ( सल्ल.) के बारे में हमारे समाज में तरह-तरह की गलतफहियां पाई जाती है । कहा जाता है कि इस्लाम की शुरुआत मुहम्मद (सल्ल.) से हुई और कुरआन आपकी वाणी है। सत्य ये है कि इस्लाम ईश्वरीय धर्म है, जो आदम ( मनु ) से पर्ारंभ हुआ ।यह सभी धर्मगुरूओ का धर्म रहा है। मुहम्मद (सल्ल.) पर तो आकर यह धर्म पूर्ण हुआ और हर देश, हर जाति, हर वर्ग और हर समय और हर समाज के लिए यही अंतिम और सम्पूर्ण विधि-व्यवस्था और जीवन-व्यवस्था और जीवन-व्यवस्था हैइस्लाम देश में हिंसा (फसाद) करने की इजाज़त नहीं देता । देखिये अल्लाह का यह आदेश :
    “लोगो को उनकी चीजें कम न दिया करो और मुल्क में फ़साद न करते फिरो ।”
    (क़ुरआन, सूरह -26, आयत -183)”दीने-इस्लाम (इस्लाम धर्म) में ज़बरदस्ती नहीं है ।”
    (क़ुरआन, सूरह -2, आयत – 256)”तुम मोमिन नहीं हो सकते जब तक कि एक दूसरे पर दया न करो” । सहबियों ने कहा कि हममें से प्रत्येक दयाशील है । नबी (सल्ल.) ने कहा, “मेरा आशय यह नहीं है कि तुममे से कोई अपने साथी पर दया करे बल्कि मेरा अभिप्राय सार्वजनिक दयालुता से है।”
    कथन हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) हदीस : तबरानी

    हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) का कथन है कि “सम्पूर्ण सृष्टि अल्लाह का परिवार है, और अल्लाह को सबसे अधिक प्रिय वह व्यक्ति है जो उसके परिवार के साथ अच्छा व्यवहार करे”

  29. Assalamu a’laikum

    ☆ इस्लाम आतंक या आदर्श –
    स्वामी लक्ष्मीशंकराचार्य
    » NonMuslim View About Islam:
    स्वामी लक्ष्मीशंकराचार्य
    #_इस्लाम_आतंक_या_आदर्श –
    यह पुस्तक कानपुर के स्वामी लक्ष्मीशंकराचार्य जी ने लिखी है।
    – इस पुस्तक में स्वामी लक्ष्मी शंकराचार्य ने इस्लाम के अपने अध्ययन को बखूबी पेश किया है। स्वामी लक्ष्मी शंकराचार्य के साथ दिलचस्प वाकिया जुड़ा हुआ है।
    * वे अपनी इस पुस्तक की भूमिका में लिखते हैं- मेरे मन में यह गलत धारणा बन गई थी कि इतिहास में हिन्दु राजाओं और मुस्लिम बादशाहों के बीच जंग में हुई मारकाट तथा आज के दंगों और आतंकवाद का कारण इस्लाम है। मेरा दिमाग भ्रमित हो चुका था।* इस भ्रमित दिमाग से हर आतंकवादी घटना मुझे इस्लाम से जुड़ती दिखाई देने लगी। इस्लाम, इतिहास और आज की घटनाओं को जोड़ते हुए मैंने एक पुस्तक लिख डाली-‘इस्लामिक आंतकवाद का इतिहास’ जिसका अंग्रेजी में भी अनुवाद हुआ।
    *पुस्तक में स्वामी लक्ष्मीशंकराचार्य आगे लिखते हैं –
    जब दुबारा से मैंने सबसे पहले मुहम्मद (सल्ललाहु आलैही वसल्लम) की जीवनी पढ़ी।
    – जीवनी पढऩे के बाद इसी नजरिए से जब मन की शुद्धता के साथ कुरआन मजीद शुरू से अंत तक पढ़ी, तो मुझे कुरआन मजीद के आयतों का सही मतलब और मकसद समझने में आने लगा।
    – सत्य सामने आने के बाद मुझ अपनी भूल का अहसास हुआ कि मैं अनजाने में भ्रमित था और इस कारण ही मैंने अपनी उक्त किताब-‘इस्लामिक आतंकवाद का इतिहास’ में आतंकवाद को इस्लाम से जोड़ा है जिसका मुझे खेद है# लक्ष्मी शंकराचार्य अपनी पुस्तक की भूमिका के अंत में लिखते हैं –
    मैं अल्लाह से,पैगम्बर मुहम्मद (सल्ललल्लाहु अलेह वसल्लम) से और सभी मुस्लिम भाइयों से सार्वजनिक रूप से माफी मांगता हूं तथा अज्ञानता में लिखे व बोले शब्दों को वापस लेता हूं। सभी जनता से मेरी अपील है कि ‘इस्लामिक आतंकवाद का इतिहास’ पुस्तक में जो लिखा है उसे शून्य समझे।
    – एक सौ दस पेजों की इस पुस्तक-इस्लाम आतंक? या आदर्श में शंकराचार्य ने खास तौर पर कुरआन की उन चौबीस आयतों का जिक्र किया है जिनके गलत मायने निकालकर इन्हें आतंकवाद से जोड़ा जाता है।
    – उन्होंने इन चौबीस आयतों का अच्छा खुलासा करके यह साबित किया है कि किस साजिश के तहत इन आयतों को हिंसा के रूप में दुष्प्रचारित किया जा रहा है।*स्वामी लक्ष्मी शंकराचार्य ने अपनी पुस्तक में मौलाना को लेकर इस तरह के विचार व्यक्त किए हैं:
    – इस्लाम को नजदीक से ना जानने वाले भ्रमित लोगों को लगता है कि मुस्लिम मौलाना, गैर मुस्लिमों से घृणा करने वाले अत्यन्त कठोर लोग होते हैं। लेकिन बाद में जैसा कि मैंने देखा, जाना और उनके बारे में सुना, उससे मुझे इस सच्चाई का पता चला कि मौलाना कहे जाने वाले मुसलमान व्यवहार में सदाचारी होते हैं, अन्य धर्मों के धर्माचार्यों के लिए अपने मन में सम्मान रखते हैं।
    – साथ ही वह मानवता के प्रति दयालु और सवेंदनशील होते हैं। उनमें सन्तों के सभी गुण मैंने देखे। इस्लाम के यह पण्डित आदर के योग्य हैं जो इस्लाम के सिद्धान्तों और नियमों का कठोरता से पालन करते हैं, गुणों का सम्मान करते हैं। वे अति सभ्य और मृदुभाषी होते हैं।ऐसे मुस्लिम धर्माचार्यों के लिए भ्रमवश मैंने भी गलत धारणा बना रखी थी।
    – उन्होंने किताब में ना केवल इस्लाम से जुड़ी गलतफहमियों दूर करने की बेहतर कोशिश की है बल्कि इस्लाम को अच्छे अंदाज में पेश किया है।
    – अब तो स्वामी लक्ष्मीशंकराचार्य देश भर में घूम रहे हैं और लोगों की इस्लाम से जुड़ी गलतफहमियां दूर कर इस्लाम की सही तस्वीर लोगों के सामने पेश कर रहे हैं।
    # स्वामी लक्ष्मीशंकराचार्य जी की विडियो के लिए इन लिंक्स पर जाये –Khurram
    Talib e dua’a

  30. मुस्लमान क़ाबा की पूजा करते है।
    सवाल : —– ज़ब इस्लाम मूर्ती पूजा के विरुद्ध है, तो फिर इसका क्या कारण है, कि मुसलमान अपनी नमाज़ में क़ाबा की और झुकते है, और क़ाबा की पूजा करते है ?
    जवाब : —– ” काबा ” क़िबला है, अर्थात वह दिशा जिधर मुसलमान नमाज़ के समय अपने चेहरे का रुख करते है। यह बात सामने रहनी चाहिए कि यधपि मुसलमान अपनी नमाजो में क़ाबा की और अपना रुख करते है, लेकिन काबा की पूजा नही करते है। मुसलमान एक अल्लाह के सिवा किसी की पूजा (इबादत) नही करते और न ही किसी के सामने झुकते है।
    पवित्र कुरआन में कहा गया है —
    ” हम तुम्हारे चेहरो को आसमान की और उलटते – पलटते देखते है, तो क्या हम तुम्हारे चेहरो को एक क़िब्ले की तरफ न मोड़ दे, जो तुम्हे प्रसन्न कर दे। तुम्हे चाहिए कि तुम जहां कही भी रहो अपने चेहरो को उस पवित्र मस्जिद की तरफ मोड़ लिया करो। ” ( कुरआन 2 : 144 )1 : —– इस्लाम एकता क़ी बुनियादों को मजबूत करने में विश्वास करता है।
    उदहारण के रूप में यदि मुसलमान चाहते है, कि वे नमाज़ पढ़े तो उनके लिए यह भी सम्भव था की उत्तर की और अपना रुख करे और कुछ दक्षिण की ओर। एक मात्र वास्तविक स्वामी की इबादत में मुसलमानो को संघठित करने के लिए यह आदेश दिया की चाहे वे जहा कही भी हो, वे अपने चेहरे एक ही दिशा की और करे अर्थात काबा की और। यदि कुछ मुसलमान काबा के पश्चिम में रहते है, तो उन्हें पूर्व की और रुख करना होगा। इसी प्रकार अगर वे क़ाबा के पूर्व में रह रहे हो तो उन्हें पश्चिम की दिशा में अपने चेहरे का रुख करना होगा।2 : —– ” काबा ” विश्व मानचित्र के ठीक बीच में है।
    सबसे पहले मुसलमानो ने ही दुनिया का भौगोलिक मानचित्र बनाया था। उन्होंने मानचित्र इस प्रकार बनाया कि दक्षिण ऊपर की ओर था और उत्तर नीचे की ओर। ‘काबा’ बीच में था। आगे चलकर पाश्चात्य के मानचित्र रचयिताओं ने दुनिया का जो मानचित्र तैयार किया वह इस प्रकार था कि पहले मानचित्र के मुकाबले में इसका ऊपरी हिस्सा बिलकुल नीचे कि ओर था, अर्थात उत्तर की दिशा ऊपर की ओर, और दक्षिण कि दिशा नीचे कि ओर। इसके बावजूद अल्लाह का शुक्र है, कि क़ाबा दुनिया के मानचित्र में केंद्रीय स्थान में ही रहा।3 : —– ” काबा ” का तवाफ़ ( परिक्रमा ) ईश्वर के एकत्व का प्रतीक है।
    मुसलमान जब मक्का में स्थित मस्जिद – हरम ( प्रतिष्टित मस्जिद ) जाते है, तो वे काबा का तवाफ़ करते है। यह कार्य एक ईश्वर में विश्वास रखने और एक ही ईश्वर की उपासना, इबादत करने का प्रतीकात्मक प्रदर्शन है। क्यूकि जिस तरह हर गोल दायरे का एक केंद्रीय बिंदु होता है, उसी तरह ईश्वर एक ही है, जो पूजनीय है।
    4 : —– हजरत उमर (रजि०) का बयान।
    काबा में लगे हुए ‘ हजरे-अस्वद ‘ (काले पत्थर) से सम्बंधित दूसरे इस्लामी शासक हजरत उमर (रजि०) का एक कथन उल्लेखित है, हदीस की प्रसिद्ध पुस्तक ‘सही बुखारी’ भाग दो, अध्याय हज, पाठ-56, हदीस संख्या – 675 के अनुसार हज़रत उमर (रजि०) ने फ़रमाया —— मुझे मालूम है, कि (हजरे-अस्वद) तुम एक पत्थर हो। न तुम किसी को फायदा पंहुचा सकते हो और न ही नुकसान और मैंने अल्लाह के पैगम्बर ( सल्लल्लाहु अलेह वसल्लम ) को तुम्हे छूते, और चूमते न देखा होता तो में कभी न तो तुम्हे छूता न और न ही चूमता। ”
    5 : —– लोग ‘ काबा ‘ पर चढ़कर अज़ान देते थे।
    अल्लाह के पैगम्बर के ज़माने में तो लोग ‘ काबा ‘ पर चढ़कर अज़ान देते थे। यह बात इतिहास में प्रसिद्ध। अब जो लोग यह आरोप लगते है, कि मुसलमान काबा की उपासना (इबादत) करते है, उनसे पूछना चाहिए की भला बताइये तो सही कि कोन मूर्ती पूजा करने वाला मूर्ती पर चढ़कर खड़ा होता है।

  31. और हमने इसराईलियों को समुद्र पार करा दिया। फिर फ़िरऔन और उसकी सेनाओं ने सरकशी और ज़्यादती के साथ उनका पीछा किया, यहाँ तक कि जब वह डूबने लगा तो पुकार उठा, “मैं ईमान ले आया कि उसके सिव कोई पूज्य-प्रभु नही, जिस पर इसराईल की सन्तान ईमान लाई। अब मैं आज्ञाकारी हूँ।” (90)
    “क्या अब? हालाँकि इससे पहले तुने अवज्ञा की और बिगाड़ पैदा करनेवालों में से था (91)
    “अतः आज हम तेरे शरीर को बचा लेगें, ताकि तू अपने बादवालों के लिए एक निशानी हो जाए। निश्चय ही, बहुत-से लोग हमारी निशानियों के प्रति असावधान ही रहते है।” (92)
    Quran Surah Yunus [10:90-92]
    http://www.quranandscience.com/index.php/quran-science/historical/333-the-preservation-of-pharaoh-s-body
    http://www.arabnews.com/news/443500
    http://en.wikipedia.org/wiki/Maurice_Bucaille

    डॉ मौरिस बुकाय फ्रांस के सबसे बड़े डाक्टर थे, और उनका धर्म ईसाई था ॥
    1898 मे जब मिस्र मे लाल सागर के पास एक कब्रगाह मे एक अति प्राचीन मानव शरीर मिला जो आश्चर्यजनक रूप से हज़ारों साल गुजर जाने के बाद भी सुरक्षित था, सभी को इस मृत शरीर का रहस्य जानने की उत्सुकता रहती थी इसीलिए इस शरीर को 1981 मे चिकित्सकीय खोज के लिए फ्रांस मंगवाया गया और इस शरीर पर डाक्टर मौरिस ने परीक्षण किए
    परीक्षणों से डाक्टर मौरिस ने निष्कर्ष निकाले कि जिस व्यक्ति की ये मृत देह है उसकी मौत समुद्र मे डूबने के कारण हुई थी क्योंकि डाक्टर मौरिस को उस मृत शरीर मे समुद्री नमक का कुछ भाग मिला था, साथ ही ये भी पता चला कि इस व्यक्ति को डूबने के कुछ ही समय बाद पानी से बाहर निकाल लिया गया था …. लेकिन ये बात डाक्टर मौरिस के समक्ष अब भी एक पहेली थी कि आखिर ये शरीर अपनी मौत के हजारो साल बाद भी सड़ गल कर नष्ट क्यों नहीं हुआ ….
    तभी उन्हें अपने एक सहकर्मी से पता चला कि मुस्लिम लोग बिना जांच रिपोर्ट के सामने आए ही ये कह रहे हैं कि ये व्यक्ति समुद्र मे डूब कर मरा था, और ये मृत देह उस फिरऔन की है जिसने अल्लाह के नबी हजरत मूसा अ.स. और उनके अनुयायियों का कत्ले आम कराना चाहा था, क्योंकि फिरऔन की लाश के सदा सुरक्षित रहने और उसके समुद्र मे डूब कर मरने की बात उनकी पवित्र पुस्तक कुरान मे लिखी है जिसपर वो विश्वास करते हैं
    मौरिस को ये सोचकर बहुत हैरत हुई कि इस मृत देह के समुद्र मे डूब कर मरने की जिस बात का पता मैंने बड़ी बड़ी अत्याधुनिक मशीनों की सहायता से लगाया।वो बात मुस्लिमों को पहले से कैसे मालूम चल गई ? और जबकि इस लाश के अपनी मृत्यु के हजारों साल बाद भी नष्ट न होने का पता 1981से महज़ 83 साल पहले चला है, तो उनकी कुरान मे ये बात 1400 साल पहले कैसे लिख ली गई ??
    इस शरीर की मौत के हजारों साल बाद भी इस शरीर के बचे रह जाने का कोई वैज्ञानिक कारण डाक्टर मौरिस या अन्य वैज्ञानिक जब पता न लगा सके तो इसे ईश्वर के चमत्कार के अतिरिक्त और क्या माना जा सकता था ??
    बाइबल के आधार पर भी मृत देह के मिलने की लोकेशन और चिकित्सकीय परीक्षण के आधार पर उस मृत शरीर की लगभग 3000 वर्ष की उम्र होने के कारण मौरिस को ये विश्वास तो हो रहा था कि ये शरीर फिरऔन का ही है, अत: डाक्टर ने फिरऔन के विषय मे अधिक जानने के लिए तौरात शरीफ (बाइबल : ओल्ड टेस्टामेण्ट) का अध्ययन करने का निर्णय किया, इस आयत का डाक्टर मौरिस बुकाय पर कुछ ऐसा असर पड़ा कि उसी वक्त खड़े होकर उन्होने ये ऐलान कर दिया कि- “मैने आज से इस्लाम कुबूल कर लिया, और इस पवित्र कुरान पर विश्वास कर लिया ”
    इसके बाद अपने वतन फ्रान्स वापस जाकर कई साल तक डाक्टर मौरिस कुरान और साइंस पर रिसर्च करते रहे, और फिर उसके बाद कुरआन के साइंसी चमत्कारों के विषय मे ऐसी ऐसी किताबें लिखी जिन्होंने दुनियाभर मे धूम मचा दी थी

  32. अपने आप को एक मुसलमान होने पर गर्व कीजिये.
    बहुत सारे गैर मुस्लिम भाइयो के मुंह से सुनता हु की…ये दिन भर में 5 बार जोर जोर लाऊड स्पीकर में अल्लाह हु अकबर अल्लाह हु अकबर क्यों चिल्लाते हो,क्या अल्लाह को सुनाई नही देता?
    नौजबिल्लाह,अस्तग़फिरुल्लाह…अल्लाह इनकी कमअक्ली के लिए माफ़ करे और हमे भी माफ़ करे क्योंकि हमने ही इन्हें सच बताने की जहमत नही की।
    मेरे प्यारे हिन्दू भाइयो,अज़ान अल्लाह के लिए नही बल्कि अल्लाह के बन्दों के लिए होती है,ताकि बन्दे अज़ान की पुकार सुन के मस्जिदों में आकर नमाज पढ़ सके।
    अल्लाह सुब्हान व तआला तो वो भी जानता है जो तुम्हारे दिलो में है।और रही बात लाऊड स्पीकर की…तो भाइयो पुराने ज़माने में जब लाऊड स्पीकर नही था तो अज़ान ऐसे ही बिना लाऊड स्पीकर से दी जाती थी तो दूर दूर तक अजान की आवाज पहुँच जाती थी कयुकी उस ज़माने में ट्रैफिक की इतनी शोर गुल नही थी,आज अगर बिना लाऊड स्पीकर के अज़ान दी जाये तो अज़ान की आवाज मस्जिद के बाहर भी सुनाई नही देगी…….।
    उम्मीद है आप समझ गए होंगे।
    अब मेरे मुस्लमान भाइयो से दरख्वास्त है की वो ईस पोस्ट को चाहे कॉपी करके,शेयर करके ज्यादा से जयाद हिन्दू भाइयो तक पंहुचा दे ताकि वो इस बड़ी गलतफहमी से निकल सके…..ये हमारी जिम्मेदारी है।
    आपका अपना Tiger Khan /अफज़ल खान
    लाइक &शेयर अपने आप को एक मुसलमान होने पर गर्व कीजिये.
    अपने आप को एक मुसलमान होने पर गर्व कीजिये

  33. कुछ लोग बेकार का एक भ्रम फैलाते रहते हैं कि भारत पर जब मुस्लिमों का शासन था, तो उन्होंने गैर मुस्लिम जनता को बड़े कष्ट दिए, उन की धर्म और संस्क्रति को नष्ट किया, निर्दोष लोगों के कत्ल किए, स्त्रियों की मर्यादा भंग की और भी जाने क्या क्या…..
    लेकिन सच्चाई इसके उलट है ॥ …… एक उदाहरण से समझाता हूँ ॥

    1857 की क्रांति मे एक बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि ये क्रांति भारत की किसान, मजदूर पेशा और आम जनता के अंग्रेजो के प्रति असंतोष से जन्मी , ये जनता अधिकांश हिन्दू थीलेकिन इस हिन्दू जनता के सामने जब स्वतंत्रता संग्राम मे अपना नेता चुनने का प्रश्न आया तो इस जनता ने किसी हिंदू नायक को नही चुना बल्कि मुगल बादशाह को ही अपना नायक बनने के लिए मनाया । इसका सीधा सा अर्थ निकलता है कि वो हिन्दू जनता ब्रिटिश सरकार को हटाकर उसके स्थान पर अपने शासक के रूप मे मुगल राजा को पसंद करती थी

    अगर इस हिन्दू जनता ने मुगलो को हिन्दुओं पर अत्याचार करते देखा होता, या अपने दादा परदादा के मुंह से मुगलो के अत्याचार की कहानी सुनी होती तो ये जनता मुगल बादशाह की बजाय किसी हिन्दू को ही अपना नायक बनाती ।
    अवध के नवाब वाजिद अली शाह से तो उनकी जनता इतना प्यार करती थी, कि जब अंग्रेजो ने नवाब को अपदस्थ कर के कलकत्ता भेजा तो अवध की बहुत सारी हिन्दू मुसलमान जनता कानपुर तक रोते रोते उनके पीछे गई थी1857 की क्रांति मे शामिल अन्य नायको यथा मराठा सरदार नाना साहब और रुहेला सरदार खान बहादुर ने भी मुगल बादशाह को अपना नायक मानते हुए अंग्रेजो से युद्ध लड़े थे

    तो ये मुसलमान शासक जनता पर जुल्म नही करते थे बल्कि जनता के हमदर्द थे, और जनता की हमदर्दी मे इन्होंने अंग्रेजो से लोहा भी लिया था । अब जरा ये भी देख लेते हैं कि अपनी जनता से हमदर्दी और वतन से मुहब्बत का उन मुस्लिम शासकों को क्या ईनाम मिला है

    1857 की क्रांति मे अंग्रेजो के खिलाफ कई मुस्लिम राजाओ और नवाबो ने भारत की जनता के अनुरोध पर बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था, जबकि इसके बरअक्स कई बड़े गैर मुस्लिम शासकों जैसे ग्वालियर, पटियाला और जिन्द आदि के शासकों ने इस क्रांति को कुचलने मे अंग्रेजो का साथ दिया और अपने ही देशवासियो पर गोलियाँ चलवाई थीं

    इससे खुश होकर अंग्रेजो ने गैर मुस्लिम शासकों को बड़ा ईनाम इकराम और ओहदे दिए ….. जबकि मुस्लिम शासकों से सज़ा के तौर पर उनकी सारी जायदाद छीन कर उन को कत्ल कर के उन को दर ब दर कर दिया …….

    आज वतन परस्त बादशाह बहादुर शाह जफर का वन्शज कोलकाता मे चाय बेच करतो रुहेला सरदार खान बहादुर का वन्शज बरेली मे साएकिल के पन्चर जोड़ कर अपना पेट पाल रहा है और अवध नवाब के वन्शज दिल्ली के एक खण्डहर मे सदमाग्रस्त जीवन काट रहे हैं
    जबकि अंग्रेजो की जी हुजूरी करने वालो, और अपने ही वतन की गरीब जनता पर गोलियाँ चलवाने वालों मे से अधिकांश के वन्शज आज भी राजा कहलाते है, ठाठ बाठ की जिन्दगी बिता रहे हैं ।

  34. भारत मे गौ हत्या का कारण :—–

    1 >>> मुस्लिमो द्वारा गयो मॉस खाना ! जो कि सही नही है, क्यूकी भारत मे मुस्लिम भैस का मॉस खाते है. दुनिया मे सब से ज्यादा गायो का मॉस अमेरिकन. यूरोपियन लोग खाते है. क्यूकी वहा भैस नही होती और उनका मुख्य भोजन गायो का मास है.

    2 >>> भारत मे मॉस का निर्यात होता है. जो की गौ हत्या का मुख्य कारण है.

    3 >>> गाये के चमड़े से कई वस्तुए बनती है, इस कारण भी गौ हत्या होती है. और इस चमड़े और हड्डियों के व्यापार मे अधिकतर गैर मुस्लिम लोग है.4 >>> पर गौ हत्या के लिए केवल मुस्लिमो को ही दोष दिया जाता है. क्यूकी कुछ राजनेता लोगो मे नफरत फ़ैलाने के लिए और वोट बैंक के लिए लोगो को आपस मे लड़वाते है.

    गौ हत्या रोकने के उपाए ( निवारण ) …………

    1 >>> भारत मे 99% गाये गैर मुस्लिम लोग पालते है. यह लोग जब गाये बूढी हो जाती है दूध देना बंद कर देती है तो गायो को मॉस कारोबारियों को बेच देते है. इनको ऐसा नही करना चाहिए अगर यह गैर मुस्लिम लोग गायो को कसाइयो, मॉस कारोबारियों को ना बेचे तो गौ हत्या 100% बंद हो जाएगी.2 >>> भारत इस समय एशिया का सबसे बड़ा मॉस निर्यातक देश हो रहा है, सरकार को मॉस निर्यात बंद कर देना चाहिए. इस उपाए से गौ हत्या 100% बंद हो जाएगी.

    3 >>> सरकार को गौ हत्या करने वाले को ही नही बल्कि गायो को कसाइयो, मॉस कारोबारियों को बेचने वालो को दुगनी सजा देनी चाहिए. क्योकि पैसो के लालच मे गैर मुस्लिम लोग गायो को कसाइयो, मॉस कारोबारियों को बेच देते है. और पैसो के लालच मे मुस्लिम और गैर मुस्लिम लोग गायो को मारकर उनके मॉस, हड्डियों, चमड़े का व्यापार करते है. निर्यात करते है. 4 >>> केवल उस गाए को ही मॉस कारोबारियो को बेचा जाता है, जो बूढी हो जाती है, दूध देना बंद कर देती है। और बैलो तथा बछड़ो को मॉस कारोबारियो को बेचा जाता है। गो पालने वाले हिन्दू भाइयो को ऐसा नही करना चाहिए। जब तक गाए दूध देती है तब तक तो वो माता होती है पर दूध देना बंद करते ही वो बोझ बन जाती है, गो पालने वाले हिन्दू भाइयो को ऐसा नही करना चाहिए। और गौ माता की सेवा करनी चाहिए।

    5 >>> हर मुस्लिम गौ रक्षा के लिए हिन्दू भाइयो के साथ है, आप गौ हत्या करने वाले को फासी दो लेकिन गौ माता को चंद पैसो की खातिर कसाइयो, मॉस कारोबारियों को बेचने वालो को भी फासी दो, चाहे वो हिन्दू हो या मुस्लिम

  35. प्रश्न : इस्लाम को शान्ति का धर्म कैसे कहा जा सकता है, जबकि यह तलवार से फैला है?

    उत्तर : कुछ गै़र-मुस्लिम भाइयों की यह आम शिकायत है कि संसार भर में इस्लाम के मानने वालों की संख्या लाखों में भी नहीं होती यदि इस धर्म को बलपूर्वक नहीं फैलाया गया होता। निम्न बिन्दु इस तथ्य को स्पष्ट कर देंगे कि इस्लाम की सत्यता, दर्शन और तर्क ही है जिसके कारण वह पूरे विश्व में तीव्र गति से फैला, न कि तलवार से।

    1. इस्लाम का अर्थ शान्ति है
    इस्लाम मूल शब्द ‘सलाम’ से निकला है जिसका अर्थ है ‘शान्ति’। इसका दूसरा अर्थ है अपनी इच्छाओं को अपने पालनहार ख़ुदा के हवाले कर देना। अतः इस्लाम शान्ति का धर्म है जो सर्वोच्च स्रष्टा अल्लाह के सामने अपनी इच्छाओं को हवाले करने से प्राप्त होती है।2. शान्ति को स्थापित करने के लिए कभी-कभी बल-प्रयोग किया जाता है
    इस संसार का हर इंसान शान्ति एवं सद्भाव के पक्ष में नहीं है। बहुत से इंसान अपने तुच्छ स्वार्थों के लिए शान्ति को भंग करने का प्रयास करते हैं। शान्ति बनाए रखने के लिए कभी-कभी बल-प्रयोग किया जाता है। इसी कारण हम पुलिस रखते हैं जो अपराधियों और असामाजिक तत्वों के विरुद्ध बल का प्रयोग करती है ताकि समाज में शान्ति स्थापित हो सके। इस्लाम शान्ति को बढ़ावा देता है और साथ ही जहाँ कहीं भी अत्याचार और जु़ल्म होते हैं, वह अपने अनुयायियों को इसके विरुद्ध संघर्ष हेतु प्रोत्साहित करता है। अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष में कभी-कभी बल-प्रयोग आवश्यक हो जाता है। इस्लाम में बल का प्रयोग केवल शान्ति और न्याय की स्थापना के लिए ही प्रयोग किया जा सकता है। धर्म-परिवर्तन के लिए तो बल का प्रयोग इस्लाम में निषिद्ध है और कई-कई सदियों के मुस्लिम-शासन का इतिहास कुछ संभावित नगण्य अपवादों (Exceptions) को छोड़कर, बलपूर्वक धर्म-परिवर्तन कराने से ख़ाली है।3. इतिहासकार डीलेसी ओ-लेरी (Delacy O’Leary) के विचार
    इस्लाम तलवार से फैला इस ग़लत विचार का सबसे अच्छा उत्तर प्रसिद्ध इतिहासकार डीलेसी ओ-लेरी के द्वारा दिया गया जिसका वर्णन उन्होंने अपनी पुस्तक ‘इस्लाम ऐट दी क्रोस रोड’ (Islam at the cross road) में किया है—
    ‘‘यह कहना कि कुछ जुनूनी मुसलमानों ने विश्व में फैलकर तलवार द्वारा पराजित क़ौम को मुसलमान बनाया, इतिहास इसे स्पष्ट कर देता है कि यह कोरी बकवास है और उन काल्पनिक कथाओं में से है जिसे इतिहासकारों ने कभी दोहराया है।’’(पृष्ठ-8)4. मुसलमानों ने स्पेन पर 800 वर्ष शासन किया
    मुसलमानों ने स्पेन पर लगभग 800 वर्ष शासन किया और वहाँ उन्होंने कभी किसी को इस्लाम स्वीकार करने के लिए मज़बूर नहीं किया। बाद में ईसाई धार्मिक योद्धा स्पेन आए और उन्होंने मुसलमानों का सफाया कर दिया (सिर्फ़ उन्हें जीवित रहने दिया जो बलपूर्वक ईसाई बनाए जाने पर राज़ी हो गए, यद्यपि ऐसे विधर्मी कम ही हुए।

    5. एक करोड़ चालीस लाख अरब आबादी नसली ईसाई (Coptic Christian) हैं
    अरब में कुछ वर्षों तक ब्रिटिश राज्य रहा और कुछ वर्षों तक फ्रांसीसियों ने शासन किया। बाक़ी लगभग 1300 वर्ष तक मुसलमानों ने शासन किया। आज भी वहाँ एक करोड़ चालीस लाख अरब नसली ईसाई हैं। यदि मुसलमानों ने तलवार का प्रयोग किया होता तो वहाँ एक भी अरब मूल का ईसाई बाक़ी नहीं रहता।6. भारत में 80 प्रतिशत से अधिक गै़र-मुस्लिम
    मुसलमानों ने भारत पर लगभग 1000 वर्ष शासन किया। यदि वे चाहते तो भारत के एक-एक ग़ैर-मुस्लिम को इस्लाम स्वीकार करने पर मज़बूर कर देते क्योंकि इसके लिए उनके पास शक्ति थी। आज 80 प्रतिशत ग़ैर-मुस्लिम भारत में हैं जो इस तथ्य के गवाह हैं कि इस्लाम तलवार से नहीं फैलाया गया।

    7. इन्डोनेशिया और मलेशिया
    इन्डोनेशिया (Indonesia) एक ऐसा देश है जहाँ संसार में सबसे अधिक मुसलमान हैं। मलेशिया (Malaysia) में मुसलमान बहुसंख्यक हैं। यहाँ प्रश्न उठता है कि आखि़र कौन-सी मुसलमान सेना इन्डोनेशिया और मलेशिया र्गईं। इन दोनों देशों में, मध्यवर्तीकाल में मुस्लिम-शासन रहा ही नहीं।8. अफ्ऱीक़ा का पूर्वी तट
    इसी प्रकार इस्लाम तीव्र गति से अफ्रीक़ा के पूर्वी तट पर फैला। फिर कोई यह प्रश्न कर सकता है कि यदि इस्लाम तलवार से फैला तो कौन-सी मुस्लिम सेना अफ्रीक़ा के पूर्वी तट की ओर गई थी?

    9. थॉमस कारलायल
    प्रसिद्ध इतिहासकार ‘थॉमस कारलायल’ (Thomas Carlyle) ने अपनी पुस्तक Heroes and Hero Worship (हीरोज़ एंड हीरो वरशिप) में इस्लाम के प्रसार से संबंधित ग़लत विचार की तरफ़ संकेत करते हुए कहा है—
    ‘‘तलवार!! और ऐसी तलवार तुम कहाँ पाओगे? 3. अमेरिका और यूरोप में इस्लाम सबसे अधिक फैल रहा है
    आज अमेरिका में तीव्र गति से फैलने वाला धर्म इस्लाम है और यूरोप में भी यही धर्म सबसे तेज़ी से फैल रहा है। कौन-सी तलवार पश्चिम को इतनी बड़ी संख्या में इस्लाम स्वीकार करने पर मज़बूर कर रही है?वास्तविकता यह है कि हर नया विचार अपनी प्रारम्भिक स्थिति में सिर्फ़ एक की अल्पसंख्या में होता है अर्थात् केवल एक व्यक्ति के मस्तिष्क में। जहाँ यह अब तक है। पूरे संसार का मात्र एक व्यक्ति इस विचार पर विश्वास करता है अर्थात् केवल एक मनुष्य सारे मनुष्यों के मुक़ाबले में होता है। वह व्यक्ति तलवार लेता है और उसके साथ प्रचार करने का प्रयास करता है, यह उसके लिए कुछ भी प्रभावशाली साबित नहीं होगा। सारे लोगों के विरुद्ध आप अपनी तलवार उठाकर देख लीजिए। कोई वस्तु स्वयं फैलती है जितनी वह फैलने की क्षमता रखती है।’’

    10. ‘धर्म में कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं’
    किस तलवार से इस्लाम फैला? यदि यह तलवार मुसलमान के पास होती तब भी वे इसका प्रयोग इस्लाम के प्रचार के लिए नहीं कर सकते थे। क्योंकि पवित्र क़ुरआन में कहा गया है—
    ‘‘धर्म में कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं है, सत्य, असत्य से साफ़ भिन्न करके प्रस्तुत हो चुका है।’’ (क़ुरआन, 2:256)11. बुद्धि की ‘‘तलवार’’
    यह बुद्धि और मस्तिष्क की तलवार है। यह वह तलवार है जो हृदयों और मस्तिष्कों पर विजय प्राप्त करती है। पवित्र क़ुरआन में है—
    ‘‘लोगों को अल्लाह के मार्ग की तरफ़ बुलाओ, बुद्धिमत्ता और सदुपदेश के साथ, और उनसे वाद-विवाद करो उस तरीके़ से जो सबसे अच्छा और निर्मल हो।’’
    (क़ुरआन, 16:125)

    12. 1934 से 1984 ई॰ तक में संसार के धर्मों में वृद्धि
    रीडर्स डाइजेस्ट के एक लेख अलमेनेक, वार्षिक पुस्तक 1986 ई॰ में संसार के सभी बड़े धर्मों में लगभग पचास वर्षों 1934 से 1984 ई॰ की अवधि में हुई प्रतिशत वृद्धि का आंकलन किया गया था। यह लेख ‘प्लेन ट्रुथ’(Plain Truth) नाम की पत्रिका में भी प्रकाशित हुआ था जिसमें इस्लाम को सर्वश्रेष्ठ स्थान दिया गया जिसकी वृद्धि 235 प्रतिशत थी और ईसाइयत में मात्र 47 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। यहाँ प्रश्न उठता है कि इस सदी में कौन-सा युद्ध हुआ जिसने, या कौन-कौन से क्रूर मुस्लिम शासक थे जिन्होंने लाखों लोगों का धर्म परिवर्तन करके उन्हें ज़बरदस्ती इस्लाम में दाखि़ल किया।3. अमेरिका और यूरोप में इस्लाम सबसे अधिक फैल रहा है
    आज अमेरिका में तीव्र गति से फैलने वाला धर्म इस्लाम है और यूरोप में भी यही धर्म सबसे तेज़ी से फैल रहा है। कौन-सी तलवार पश्चिम को इतनी बड़ी संख्या में इस्लाम स्वीकार करने पर मज़बूर कर रही है?

  36. इस्लामी धर्मग्रंथों की वे अवधारणाएं जिनकी सबसे ज्यादा गलत व्याख्या की गई.

    किसी भी विचार की व्याख्या देश-काल और परिस्थिति के तहत भिन्न-भिन्न तरीकों से की जा सकती है. धर्म से जुड़े प्रावधानों की व्याख्या तो शायद अनगिनत तरीकों से मनुष्य ने अपने आरंभिक काल से ही की है.

    इस्लामी धर्मग्रंथों में कुछ ऐसी अवधारणाएं हैं जिनकी गलत व्याख्याओं ने इस्लाम के मूल स्वरूप को विकृत किया है. गैरमुसलमानों ने यह काम अपने निहित स्वार्थों को सिद्ध करने के लिए किया तो कुछ मुसलमानों ने अपने गलत कामों को सही ठहराने के लिए इनका सहारा लिया. परिणामस्वरूप इस्लाम को एक हिंसक और कट्टर धर्म के रूप में जाना जाने लगा. इन गलत व्याख्याओं पर विचार करने से पहले इस्लाम शब्द की उत्पत्ति पर एक नजर डालते हैं.इस्लाम शब्द अरबी भाषा के ‘स’ ‘ल’ ‘म’ धातु से बना है और जिसका अकेला और सीधा अर्थ है शांति. ‘स’ ‘ल’ ‘म’ धातु से जिन अन्य शब्दों का निर्माण हुआ है वे हैं इस्लाम, मुस्लिम, सलाम और इसी तरह के और कई शब्द. इस्लाम वह धर्म, वह पद्धति है जो शांति सिखाए, जो तस्लीम (समर्पित) होना सिखाए. शांति के धर्म को मानने वाला यानी मुसलमान. मुसलमान जब भी आपसे मिलेगा तो कहेगा सलामुनअलैकुम यानी ईश्वर आपको शांति प्रदान करे. तो इस्लाम के बारे में एक कुप्रचार तो यहीं खत्म हो जाता है कि इस्लाम तलवार का धर्म है, खूनरेजी है. क्या कोई धर्म जो इस तरह से शांति और सुलह की वकालत करे वह खूनरेजी को जायज ठहरा सकता है? तार्किक तौर पर तो यह परस्परिक विरोधी ही प्रतीत होता है.समस्त धर्मों का मूल एक ही है, यह हर धर्म मानता है. सब धर्म उस मूल की ही आराधना करते हैं. मुसलमान उस मूल स्रोत को अल्लाह या रब्बेल आलमीन के नाम से पूजते हैं. रब्बेल आलमीन के मानी हैं समस्त ब्रह्मांडों और लोकों का स्वामी.

    जब भी इस्लाम की मान्यताओं पर सवाल उठाए जाते हैं तो उनके केंद्र में दो चीजें हुआ करती हैं. एक है जेहाद और दूसरा काफिर, जिनकी गलत व्याख्याओं के परिणामस्वरूप इस्लाम को एक ऐसे धर्म के रूप में चित्रित किया जाता है जो अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णु न हो. कुरान पर एक निगाह डालने पर हम यह पाते हैं कि जेहाद का मूल विचार इसके प्रचलित स्वरूप से बहुत भिन्न है. जेहाद: अरबी भाषा का शब्द जेहाद ‘जुह्द’ धातु से बना है जिसका अकेला अर्थ ‘संघर्ष करना’ है. इस धातु से जो शब्द बने हैं वे हैं जेहाद यानी संघर्ष और मुजाहिद यानी संघर्ष करने वाला. माना कि किसी व्यक्ति को तंबाकू, पान मसाला या शराब पीने की आदत है तो उसे समझाने वाला व्यक्ति मुजाहिद यानी संघर्ष करने वाला हुआ. कोई बच्चा यदि कुत्ते, बिल्ली या किसी अन्य प्राणी को अकारण ही मार रहा है और कोई आकर उसे ऐसा करने से रोकता है तो उस व्यक्ति का यह कार्य जेहाद हुआ.दुर्भाग्यवश मीडिया एवं पश्चिमी देशों के इतिहासकारों की अनभिज्ञता या शायद अपने निहित स्वार्थों के तहत जेहाद का अर्थ धर्मयुद्ध बताया गया है. कुरान में युद्ध शुरू करना या युद्ध भड़काना – धर्म नहीं, बल्कि अधर्म है. इसलिए कोई भी युद्ध यदि शुरू किया जाए तो वह धर्मयुद्ध नहीं बल्कि अधार्मिक कार्य है. लेकिन क्या कुरान में युद्ध करने की संपूर्ण मनाही है? ऐसा नहीं है.

    कुरान मात्र इन संदर्भों में ही युद्ध की इजाज़त देता है :
    1. जब मनुष्यों पर अत्याचार हो रहे हों
    2. न्याय के लिए
    3. आत्मरक्षा के लिए
    4. जब शत्रु की ओर से शांति समझौता भंग कर दिया जाएउदाहरणार्थ कुरान के अध्याय 4, आयत 74-75 में उद्धृत है- …क्यों नहीं तुम युद्ध करते जब असहाय पुरुष, महिलाएं और बच्चे ईश्वर से याचना करते हुए कह रहे हों ‘ हे ईश्वर, हमें समाज के अत्याचारियों से निजात दिला. हे ईश्वर, तू ही हमारा स्वामी है.’

    कुरान की इस आयत पर ध्यान देने पर पता चलता है कि अत्याचार चाहे किसी पर भी हो रहा हो, चाहे वे किसी भी धर्म एवं संप्रदाय के हों, यह बात बिल्कुल भी मायने नहीं रखती, बस इंसान होना काफी है. चाहे वे दलित हों या गरीब, असहाय, कमजोर, पुरुष, महिलाएं या बच्चे. वे हिंदू हों, मुसलमान हों, सिख हों, ईसाई हों या यहूदी या बौद्ध. वह बोस्निया का मुसलमान हो या अमेरिका की ढहती हुई इमारत का ईसाई. हिटलर के जहरीले गैस कक्ष में यहूदी हो या कश्मीर का निर्दोष हिंदू या मुसलमान. गुजरात में आठ महीने की गर्भवती मुस्लिम मां हो जिसके अजन्मे बच्चे को आग में भूना जा रहा हो या साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 और एस-7 डिब्बे में कोई हिंदू बिटिया या बेटा. दंगों में जलता हुआ एक सिख बूढ़ा या उड़ीसा में जीप के अंदर जलता हुआ मसीही पादरी क्यों न हो – इनका आर्तनाद सुनकर इनके न्याय के लिए पवित्र कुरान संघर्ष करने की इजाजत देती है. लेकिन युद्ध मात्र आततायी से, किसी अन्य से नहीं. कुरान के अध्याय 2, आयत 190 में कहा गया है :
    तुम सिर्फ ईश्वर की राह पर युद्ध कर सकते हो और सिर्फ उनके खिलाफ जिन्होंने तुम पर आक्रमण किया हो लेकिन मानवीय सीमाओं के भीतर. ईश्वर आततायियों को अप्रिय मानता है.

  37. इस आयत से स्पष्ट है कि युद्ध सिर्फ उनसे किया जाए जिन्होंने तुम पर आक्रमण किया है. उदाहरण के लिए, यदि ‘अ’ ने तुम पर आक्रमण किया है तो ‘अ’ से ही युद्ध किया जाए, न कि उसकी पत्नी, बेटी, बेटा या माता-पिता से. युद्ध सिर्फ़ आक्रमणकारी से.

    जिहाद के ही संदर्भ में कुरान की कुछ आयतें जो कि दुष्प्रचार का माध्यम बनी हैं उनमें कुरान के नौवें अध्याय ‘तौबा’ की 5वीं आयत है जिसे बगैर किसी संदर्भ के प्रस्तुत किया जाता है.

    यह आयत है: जब हराम (वर्जित) महीने बीत जाएं तो मुशरिकों (एक ईश्वर की सत्ता में अन्य को हिस्सेदार बताने वाला) के साथ युद्ध करो, उन्हें पकड़ो, घेरो और उनका वध करो.कुरान में युद्ध शुरू करना या युद्ध भड़काना – धर्म नहीं, बल्कि अधर्म है. इसलिए कोई भी युद्ध यदि शुरू किया जाए तो वह धर्मयुद्ध नहीं बल्कि अधार्मिक कार्य है

    इस आयत को पढ़कर तो सचमुच ऐसा आभास होता है कि कुरान मुसलमानों को युद्ध के लिए उकसाती है. इस आयत पर टिप्पणी करने से पहले यदि कहा जाए कि हिंदुओं के सर्वमान्य ग्रंथ गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने ही गुरुओं, सगे संबंधियों और चचेरे भाइयों का वध करने के लिए प्रेरित करते हैं, तो क्या हमारे मन में इस तरह की शंका नहीं उठेगी कि भगवान का यह वचन जायज नहीं है क्योंकि यह श्लोक हिंसा को प्रोत्साहित करता हुआ प्रतीत होता है. बिना संदर्भों के किसी विचार को बढ़ावा देने वाला अर्ध सत्य किसी भी बड़े झूठ से खतरनाक होता है.इस आयत को उसके संपूर्ण संदर्भ में समझने से पहले हमें इसी अध्याय की चौथी आयत को समझना होगा.

    अध्याय 9 की चौथी आयत उस संदर्भ में कही गई है जब मुस्लिमों के साथ गैरमुस्लिमों का शांति समझौता था. लेकिन गैर मुस्लिमों ने वह समझौता तोड़ दिया और मुस्लिमों के विरुद्ध युद्ध घोषित कर दिया.

    अध्याय 9 आयत 4:
    इल्लालज़ीना आहत्तुम मिनल मुशरिकीन सुम्मा लम यन क़ुसूकुम शैयं व लम यु ज़ाहिरू अलैकुम अहदन् फअतिमू इलैहिम आ़हदाहुम इला मुद्दतिहिम पददं संसीं यु हिब्बुल मुत्तक़ीन.
    इस आयत में पैगंबर को सख्त हिदायत दी गई है कि उन मुशरिकों के साथ शांति से रहना जो तुम्हारे साथ शांति से रहते हैं. और अपने बचाव के लिए उन्हीं के साथ युद्ध करना जिन्होंने तुम्हारे साथ शांति समझौता तोड़ दिया है और अब युद्ध पर आमादा हैं. फिर भी 5वीं आयत में कुछ संयम बरतने के लिए इशारा है, जब वह युद्ध का जवाब वर्जित महीनों के बीत जाने के बाद ही देने की बात करती है. हो सकता है इस दौरान युद्ध पर आमादा शत्रु शायद सदबुद्धि प्राप्त कर लें और शांति फिर से स्थापित हो जाए. लेकिन यदि वह तुम पर फिर भी आक्रमण करे तो तुम अपने बचाव में उस आक्रमण का प्रत्युत्तर दो. यह तो हर धर्म में कहा गया है कि आक्रमणकारी, आततायी के आगे हथियार डाल देना कायरता की निशानी है.श्रीकृष्ण जब अर्जुन को युद्ध पर आमादा कौरवों की सेना दिखाते हैं तो अर्जुन करुणा से वशीभूत होकर हथियार डालने की बात कहता है. जिस पर श्रीकृष्ण उन्हें उपदेश देते हैं कि हे अर्जुन, आततायियों के आगे, आक्रमणकारियों के समक्ष घुटने टेक देने पर इस लोक में तुम्हे अपयश और पाप लगेगा एवं तुम्हें मोक्ष नहीं मिलेगा. (गीता: अध्याय 2 श्लोक 33-34)

    अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित करने के अनेकों श्लोक गीता में. यदि महाभारत युद्ध के दौरान भी कौरव दल पांडवों के अधिकार उन्हें लौटा देते और शांति स्थापित कर लेते एवं पश्चाताप कर लेते तब कृष्ण अर्जुन को शांति का ही मार्ग चुनने के लिए कहते. कुरान की आयत 5 अध्याय 9 में भी यही कहा गया है कि यदि वे तौबा कर लें, ईश्वर भक्ति करें, दान (जकात) दें तो उनका मार्ग छोड़ दें यानी युद्ध न करें.इस्लाम की एक और संकल्पना जिसे संदर्भहीन तरीके से व्यक्त किया जाता है वह है काफिर. इस शब्द के बारे में इतना कुप्रचार हुआ कि यकायक काफिर और गैरमुस्लिम समानार्थी लगने लगे हैं. काफिर शब्द का मूल अर्थ समझने से पहले इसका शाब्दिक अर्थ समझना जरूरी है.

    काफिर: यह ‘शब्द अरबी के ‘क’ ‘फ’ ‘र’ शब्दों से बना है जिसका सीधे-सीधे अर्थ है, ‘सत्य को छिपाना’. उदाहरणार्थ, यदि मैं अपने हाथ में एक सिक्का लूं और मुट्ठी बंद कर लूं और कहूं कि सिक्का नहीं है तो उस समय मैं सिक्के की सत्यता को छिपाने के लिए ‘काफिर’ हुआ.

    एक उदाहरण कुरान से- ईश्वर के समक्ष मनुष्यों के लिए सबसे अच्छा पेशा किसानी यानी खेतीबाड़ी का है और एक सच्चा किसान उसे बहुत प्यारा है. कुरान में ईश्वर ने कहा कि किसान बीज को धरती में छुपा देता है तो इस संदर्भ में ईश्वर ने किसान को काफिर कहा . क्या ईश्वर अपने ‘प्रिय’ किसान को ‘काफिर’ कहकर दुत्कारेगा! नहीं. किसान ने बीज को धरती में छिपाया इसलिए वह बीज की सत्यता को छिपाने के कारण काफिर कहा गया. इस तरह काफिर का सीधा-सीधा अर्थ हुआ ‘सत्य को छिपाने वाला’ या असत्य को सत्य कहने वाला .

    यह हर हिंदू तथा हिंदू धर्म के जिज्ञासु को अच्छी तरह से मालूम है कि पांडव सत्य के साथ थे और कौरव असत्य के. श्रीकृष्ण सारथी के रूप में सत्य के योद्धा अर्जुन को महाभारत युद्ध में उपदेश देते हैं कि अपने तयेरे (ताऊ का लड़का) भाई दुर्योधन की सेना जो कि असत्य मार्ग पर है उसे नष्ट कर दो. असत्य को सत्य बतलाने वाले यानी ‘काफिर’ – कौरव और उनका साथ देने वाले तुम्हारे दुश्मन हैं.तो कुरान में यदि यह आयत है कि निस्संदेह ‘काफिर’(सत्य को असत्य घोषित करने वाले) तुम्हारे खुले दुश्मन हैं तो यह बुरी बात कैसे है !

    इस्लाम पर एक और लांछन यह लगाया जाता है कि वह दूसरे धर्मों के प्रति सहिष्णु नहीं है. जबकि यह वही धर्म है जो अन्य सभी धर्मों के प्रति समभाव रखने की हिदायत देता है.

    क्या इस्लाम अन्य धर्मों के प्रति असहिष्णु है: कुरान के दूसरे अध्याय की 213वीं आयत कहती है कि ईश्वर ने हर समाज और कौम को पैगंबर व ईश्वरीय किताब दी है. कुरान ईसाइयों और यहूदियों को ‘ अहले किताब’ का खिताब देती है. यानी वे धर्म जिनकी ईश्वरीय किताब है.कुरान के 60 वें अध्याय की 8-9 वीं आयत कहती है कि मुसलमानों को यह आदेश दिया जाता है कि उन गैरमुसलमानों के साथ सज्जनता के साथ और न्यायोचित बर्ताव करें जो उनके साथ मात्र मान्यताओं और आस्थाओं की खातिर बैर न रखते हों. लेकिन जो लोग मुसलमानों की आस्था की खातिर उनसे बैर रखते हों वे मित्रता के काबिल नहीं हैं.
    इस्लाम का मूल संदेश कुरान की इन दो आयतों से अभिव्यक्त होता है:

    1. ला इकराह फिद्दीन (धर्म पर किसी भी तरह जोर जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए)

    2. लकुम दीनकुम वली दीन ( तेरा धर्म तेरे लिए सही, मेरा धर्म मेरे लिए सही. और हम आपस में शांतिपूर्ण बर्ताव करें)

    1. अल्लाह को ईश्वर कहना बंद करें।

      और यदि बहस ही करनी है तो काॅपी पेस्ट न करें।

      1. Mujhe pta lag gaya ki tum such me bewkof ho.kyunki dunya ke 99% log allah iswar khuda god permatma ko ek hi khte hai. Baki ke 1% aapki trah kam dimag ke hai.

        1. mere bhai allah ishwar god yahova me bahut kaa antar hai ji. aur yah koi galat nahi kaha abhishek ji ne. aap yadi sahi se parhoge kuraan bible ved to sab ka arth aapko maalum ho jaayega.

    2. nafees mali -इस्लामी जन्नत v/s औरतेँ
      इस्लाम मेँ जहाँ एक आदमी को मरने के बाद 72
      हूर्रे मिलेगी वहीँ औरतो को क्या मिलेगा ??
      (A)
      “इब्ने उम्र ने कहा कि रसूल ने कहा कि औरतें
      दुनिया की सबसे
      घटिया मखलूक हैं .और्हर तरह से जहन्नम में जाने के
      योग्य हैं “
      बुखारी-जिल्द7 किताब62 हदीस31
      बुखारी-जिल्द7 किताब62 हदीस6
      (B)
      सईदुल खुदरी ने कहा कि ,रसूल ने
      कहा कि सारी औरतें एक बार
      नहीं तीन तीन बार जहन्नम में भेजने के योग्य हैं.
      सही मुस्लिम-किताब3 हदीस826 ,
      सुंनं मसाई-जिल्द2 हदीस1578 पेज342
      (C)
      “इब्ने अब्बास ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि औरतें
      तो जहन्नम
      का ईंधन हैं ,जिन से जहन्नम की आग को तेज
      किया जाएगा .”
      बुखारी-जिल्द7 किताब62 हदीस124
      मुस्लिम-किताब36 हदीस6596
      (D)
      “इमरान बिन हुसैन ने कहा कि रसूल ने
      कहा कि ,जहन्नम को औरतों से
      भर दिया जाएगा .यहां तक कि दूसरों के लिए
      कोई जगह नहीं रहेगी “
      बुखारी-जिल्द4 किताब54 हदीस464
      (E)
      “अब्दुला इब्ने अब्बास ने कहा कि ,रसूल ने
      कहा कि ,अल्लाह
      बिना किसी भेदभाव के
      सारी औरतों को जहन्नम में दाखिल कर
      देगा .जाहे वे कितनी ही नमाजी और परहेजदार
      क्यों न हों “
      बुखारी-जिल्द1 किताब2 हदीस28
      बुखारी-जिल्द2 किताब2 हदीस161
      (F)
      “इब्ने अब्बास ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि मैं
      जहन्नम को औरतों से
      ठसाठस भरवा दूंगा .और देखूंगा कि कोई
      खाली जगह न रहे “
      बुखारी-जिल्द7 किताब62 हदीस125,
      बुखारी-जिल्द6 किताब1 हदीस301,
      मिश्कात-जिल्द4 किताब42 हदीस24
      (G)
      “सईदुल खुदरी ने कहा कि ,रसूल ने
      कहा कि ,अल्लाह ने यह पाहिले से
      ही तय कर लिया है कि ,वह जितनी भी औरतें है
      उन सबको जहन्नम
      की आग में झोंक देगा .ओर इस में किसी भी तरह
      कि शंका नहीं है .”
      बुखारी–जिल्द7 किताब62 हदीस124,
      तिरमिजी-हदीस568 1,
      मिश्कात-जिल्द4 किताब42 हदीस24
      (H)
      “सैईदुल खुदरी ने कहाकि ,रसूल ने कहा कि ,जहन्नम
      में अधिकाँश औरतें
      ही होंगी .और उनको दर्दनाक सजाएं
      दी जायेंगी .सबसे पाहिले छोटे
      छोटे पत्थरों को गर्म किया जाएगा .फिर उन
      पत्थरों को औरतों की छातियों पर रख
      दिया जाएगा .जिस से
      उनकी छातियाँ जल जायेगी .फिर उन गर्म
      पत्थरों को औरतों के आगे
      और पीछे के छेदों (vagina और anus )में
      घुसा दिया जाएगा ,जिस
      से उनको दर्द होगा ,और यह सब मेरे सामने होगा ।
      बुखारी-जिल्द1 किताब22 हदीस28
      (I)
      “रसूल ने कहा कि जहन्नम के चौकीदार होंगे ,और
      अगर कोई औरर
      बाहर निकलनेकी कोशिश करेगी तो उसे वापिस
      जहन्नम में डाल
      दिया जाएगा“
      इब्ने माजा-किताब१ हदीस113
      –अब तो सारी औरतो और लडकियों को इस्लाम छोड़ देना चाहिए-

      1. nafees mali -इस्लामी जन्नत v/s औरतेँ
        इस्लाम मेँ जहाँ एक आदमी को मरने के बाद 72
        हूर्रे मिलेगी वहीँ औरतो को क्या मिलेगा ??
        (A)
        “इब्ने उम्र ने कहा कि रसूल ने कहा कि औरतें
        दुनिया की सबसे
        घटिया मखलूक हैं .और्हर तरह से जहन्नम में जाने के
        योग्य हैं “
        बुखारी-जिल्द7 किताब62 हदीस31
        बुखारी-जिल्द7 किताब62 हदीस6
        (B)
        सईदुल खुदरी ने कहा कि ,रसूल ने
        कहा कि सारी औरतें एक बार
        नहीं तीन तीन बार जहन्नम में भेजने के योग्य हैं.
        सही मुस्लिम-किताब3 हदीस826 ,
        सुंनं मसाई-जिल्द2 हदीस1578 पेज342
        (C)
        “इब्ने अब्बास ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि औरतें
        तो जहन्नम
        का ईंधन हैं ,जिन से जहन्नम की आग को तेज
        किया जाएगा .”
        बुखारी-जिल्द7 किताब62 हदीस124
        मुस्लिम-किताब36 हदीस6596
        (D)
        “इमरान बिन हुसैन ने कहा कि रसूल ने
        कहा कि ,जहन्नम को औरतों से
        भर दिया जाएगा .यहां तक कि दूसरों के लिए
        कोई जगह नहीं रहेगी “
        बुखारी-जिल्द4 किताब54 हदीस464
        (E)
        “अब्दुला इब्ने अब्बास ने कहा कि ,रसूल ने
        कहा कि ,अल्लाह
        बिना किसी भेदभाव के
        सारी औरतों को जहन्नम में दाखिल कर
        देगा .जाहे वे कितनी ही नमाजी और परहेजदार
        क्यों न हों “
        बुखारी-जिल्द1 किताब2 हदीस28
        बुखारी-जिल्द2 किताब2 हदीस161
        (F)
        “इब्ने अब्बास ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि मैं
        जहन्नम को औरतों से
        ठसाठस भरवा दूंगा .और देखूंगा कि कोई
        खाली जगह न रहे “
        बुखारी-जिल्द7 किताब62 हदीस125,
        बुखारी-जिल्द6 किताब1 हदीस301,
        मिश्कात-जिल्द4 किताब42 हदीस24
        (G)
        “सईदुल खुदरी ने कहा कि ,रसूल ने
        कहा कि ,अल्लाह ने यह पाहिले से
        ही तय कर लिया है कि ,वह जितनी भी औरतें है
        उन सबको जहन्नम
        की आग में झोंक देगा .ओर इस में किसी भी तरह
        कि शंका नहीं है .”
        बुखारी–जिल्द7 किताब62 हदीस124,
        तिरमिजी-हदीस568 1,
        मिश्कात-जिल्द4 किताब42 हदीस24
        (H)
        “सैईदुल खुदरी ने कहाकि ,रसूल ने कहा कि ,जहन्नम
        में अधिकाँश औरतें
        ही होंगी .और उनको दर्दनाक सजाएं
        दी जायेंगी .सबसे पाहिले छोटे
        छोटे पत्थरों को गर्म किया जाएगा .फिर उन
        पत्थरों को औरतों की छातियों पर रख
        दिया जाएगा .जिस से
        उनकी छातियाँ जल जायेगी .फिर उन गर्म
        पत्थरों को औरतों के आगे
        और पीछे के छेदों (vagina और anus )में
        घुसा दिया जाएगा ,जिस
        से उनको दर्द होगा ,और यह सब मेरे सामने होगा ।
        बुखारी-जिल्द1 किताब22 हदीस28
        (I)
        “रसूल ने कहा कि जहन्नम के चौकीदार होंगे ,और
        अगर कोई औरर
        बाहर निकलनेकी कोशिश करेगी तो उसे वापिस
        जहन्नम में डाल
        दिया जाएगा“
        इब्ने माजा-किताब१ हदीस113
        –अब तो सारी औरतो और लडकियों को इस्लाम छोड़ देना चाहिए-
        ——-
        हदीस का कामसूत्र
        १ औरत संभोग के पहले अपने नीचे के बाल साफ करें
        बुखारी जिल्द ७ कि ६२हदीस १७५
        २ सदा संभोग के लिये औरत तैयार रहे.जेहादी उनसे कभी भी संभोग कर सकता है.सही मुसलिम किताब ८ ह ३२४०
        ३संभोग जरूरी है .औरत चाहे या नहीं…..सही मु*८हदीस ३२४०
        ४ पत्नी की छाती से दूध चूसना हलाल है….मुवत्ता