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वेद प्रचारार्थ मेरी केरल यात्रा

 वेद प्रचारार्थ मेरी केरल यात्रा

– आचार्य सत्येन्द्रार्य

मनुष्य एक ऐसा चिन्तनशील प्राणी है, जिसे अपने हिताहित के समबन्ध में विचार करने की वैचारिक स्वतन्त्रता स्वस्फूर्त है। इस वैचारिक स्वतन्त्रता के प्रवाह को कोई भी शासक या कानून भले ही कुछ समय के लिए बाह्यरूप से दबा दे या अवरुद्ध कर दे, यह हो सकता है और ऐसा हुआ है कि बाहरी दृष्टि से स्वतन्त्र विचार करने वालों पर रोक लगाई गई, पुनरपि आन्तरिक चिन्तन-मनन की इस नैसर्गिक स्वतन्त्रता को बाहरी बाधाएँ छीन नहीं सकती। इसी प्रकार यात्रा भी मनुष्य के स्वतन्त्र चिन्तन का ही एक अनिवार्य उपक्रम है। मानव जीवन अपने-आप में एक यात्रा ही है, जिसमें कर्त्तव्य पालन करते हुए हमें कई पड़ावों को पार करना पड़ता है। अपनी ऐसी एक यात्रा का प्रारमभ मैंने अजमेर ऋषि उद्यान से किया और लक्ष्य था केरल के हरे-भरे प्रदेश। आचार्य वामदेवजी, जो ऋषि उद्यान के योग्य स्नातकों में से एक हैं, उनमें वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार में अहर्निश लग्न देखकर लगा कि मुझे भी विश्व कल्याण के इस महायज्ञ में कुछ आहुतियाँ समर्पित करनी चाहिए। आमन्त्रण था वामदेवजी का जो मुझे कुछ मास पूर्व ही मिल गया था, वह आमन्त्रण भी विशेषरूप से इस बात को ध्यान में रखकर दिया गया था कि केरल में महर्षि दयानन्द जी की विचार धारा का बीज वपन हो और ऋषि मिशन का काम गति पकड़े।

18 दिसबर 2015 को प्रातःकाल अजमेर से आरमभ होने से लेकर यह यात्रा शोरनूर जो केरल के अन्तर्गत है, तक लगभग दो दिन में पूरी हुई। यात्रा लमबी किन्तु उबाऊ न थी, क्योंकि अपने अगल-बगल की सीटों पर बैठे लोगों से स्नेहपूर्वक वार्ता करने से आनन्द का अनुभव हो रहा था। यात्रा करते-करते 20 तारीख की रात्रि को लगभग डेढ़ बजे शोरनूर पहुँचे और वहाँ से वामदेवजी के साथ कारलमन्ना, जहाँ कार्यक्रम रखा गया था, वहीं मेरे ठहरने आदि की व्यवस्था भी की गई थी- लगभग एक घण्टे में पहुँच गया था। 20 दिनांक की प्रातःकाल उपनयन संस्कार का कार्यक्रम रखा गया था, जो पूर्व निर्धारित था। उपनयन संस्कार कराने वालों के मन में संस्कार के प्रति अत्यन्त श्रद्धा व निष्ठा को दृढ़ता से बिठा दिया गया, इसके कारण ही वे सभी लोग जो संस्कार कराने के इच्छुक थे, उन्होंने एक दिन केवल दूध पर ही निकाल दिया था। इसी से उनकी संस्कार के प्रति श्रद्धा व दृढ़ निष्ठा का पता लगता है। यज्ञोपवीत संस्कार के समय जो लोग दर्शक के रूप में वहाँ उपस्थित थे, वे भी बड़ी प्रसन्नता से इस संस्कार का आनन्द ले रहे थे। विधि पूर्वक यह कार्यक्रम सपन्न हुआ।

23 दिसमबर 2015 से शिविर का प्रारमभ और गुरुदत्त भवन तथा उपदेशक विद्यालय का उद्घाटन- उपरोक्त कार्यक्रम के लिए 23 दिसमबर का दिन चुना गया। आर्य जगत् में यह बात सब आर्यजनों को विदित है कि 23 दिसमबर 1926 को श्रद्धेय श्री स्वामी श्रद्धानन्दजी की एक धर्मान्ध मुस्लिम द्वारा, जिसका नाम अबदुल रशीद था, गोलियाँ चला कर उस अवस्था में जब वे रुग्ण शय्या पर पड़े थे, हत्या कर दी गई थी। देश धर्म पर अपना सब कुछ वार देने वाले स्वामी श्रद्धानन्द के इस अभूत पूर्व बलिदान को आर्यजन विस्मृत न कर दें, इसलिए उपरोक्त कार्यक्रम के आरमभ व उद्घाटन का 23 दिसमबर दिन निश्चित किया गया था। लगभग 10 बजे ध्वजारोहण ‘वन्दे मातरम् और जयति ओम्ध्वज…’ के गीतों से बड़े उल्लास पूर्ण वातावरण में किया गया। ध्वजारोहण के समय वहाँ अनेक गणमान्य लोगों की उपस्थिति से कार्यक्रम भव्य रूप में मनाया गया। उपदेशक विद्यालय के साथ-साथ त्रिदिवसीय शिविर की भी उद्घोषणा कर दी गई थी, कुछ ही देर बार शिविर की कक्षाएँ भी प्रारमभ कर दी गईं।

शिविर समापन समारोह के अवसर पर श्री एम.के. राजनजी जो बहुत ही उत्साही और लग्नशील व्यक्तियों में से एक हैं, ने विद्यालय का उद्देश्य और उद्देश्य की पूर्ति के लिए कई प्रकार की योजनाएँ रखीं, उन योजनाओं में गौशाला और यज्ञशाला निर्माण भी है। इनके निर्माण की ओर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित किया गया। इसका सभी ने समर्थन किया। अनेक लोग इस संस्था से जुड़ गए हैं, जुड़ रहे हैं, समभावना है कि शीघ्र ही यह विद्यालय आर्य समाज के प्रचार-प्रसार का एक अच्छा-खासा केन्द्र बनेगा। केरल की देवभूमि में आर्य समाज का बीज तो बो दिया है, अब इस बीज की सुरक्षा हम सभी आर्यों को करनी चाहिए। इसे किसी मनुष्य का कार्य न मान कर वेद भगवान का कार्य है, ऐसा ध्यान में रखकर उसे वृक्ष का रूप प्रदान करना हम सब आर्यों का नैतिक कर्त्तव्य है।

इस प्रकार केरल की यह धर्म प्रचार यात्रा अजमेर से आरमभ होकर अजमेर आकर समाप्त हुई।

– ऋषिउद्यान, पुष्करमार्ग, अजमेर।

परोपकारिणी सभा द्वारा किये जा रहे अनुसन्धान कार्य में एक और कीर्तिमान

परोपकारिणी सभा द्वारा किये जा रहे अनुसन्धान कार्य में एक और कीर्तिमान

-सत्येन्द्र सिंह आर्य

परोपकारी पाक्षिक के वर्ष 2015 के जून द्वितीय अंक में मैंने एक लेख में परोकारिणी सभा द्वारा किये जा रहे अनुसन्धान विषयक कार्य की चर्चा की थी। अनुसन्धान का कार्य सभा द्वारा निरन्तर किया जा रहा है, उसमें समय लगता है, परन्तु देर-सबेर सफलताएँ मिलती रहती हैं।

सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी जी ने ईसाई मत की भी समीक्षा तेरहवें समुल्लास में की है। इस्लाम मतावलमबियों की भाँति ईसाई विद्वान् भी कभी-कभी कहते रहते हैं कि स्वामी जी ने सत्यार्थ प्रकाश में बाइबिल के जिन-जिन स्थलों की समीक्षा की है, वह बातें बाइबिल में ज्यों की त्यों नहीं है। सत्यार्थ प्रकाश के प्रभाव से बाइबिल में भी धीरे-धीरे विभिन्न संस्करणों में बहुत परिवर्तन हुए हैं और वर्तमान संस्करणों में शबद वैसे नहीं हैं, जैसे स्वामी जी ने आयत, पर्व और क्रमांक लिखकर पता दर्शाते हुए लिखे हैं। मेरे मित्र प्रा. कुशलदेव जी बाईबिल के उस पुराने संस्करण की खोज में जीवन भर लगे रहे, परन्तु 19 वीं शताबदी का संस्करण उन्हें नहीं मिल सका। प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी ने कुरान का पुराना भाष्य खोज कर परोपकारिणी सभा को सौंपकर आर्य जगत् को निश्चिन्त कर दिया, परन्तु बाइबिल का पुराना संस्करण उन्हें भी नहीं मिला। उस पुराने संस्करण की एक प्रति पूज्य श्री अमरस्वामी जी (पूर्व नाम ठा. अमर सिंह आर्य पथिक) के पास थी। उनके निधन के पश्चात् प्रो. रतन सिंह जी ने जिज्ञासु जी को अपने यहाँ बुलाया था और बाइबिल की वह प्रति वे जिज्ञासु जी को सौंपना चाहते थे, परन्तु जब जिज्ञासु जी उन्हें मिलने गए तो जिस व्यक्ति के पास उस पुस्तकालय की चाबी थी, वह उस दिन वहाँ नहीं था। जिज्ञासु जी अबोहर वापस आ गए। बात आई-गई हो गयी। प्रो. रतन सिंह जी दिवंगत हो गए। वह कार्य अपूर्ण ही रहा।

बाईबिल की उस पुराने संस्करण की प्रति प्राप्त करने का प्रयत्न मैंने भी किया, परन्तु मुझे भी बाईबिल का लन्दन से वर्ष 1948 में Bible Society of Great Britain द्वारा प्रकाशित संस्करण मिल सका था। वर्तमान समय में वह प्रति प्रियवर श्री राजवीर आर्य जी के पुस्तकालय में है।

पुराने प्रामाणिक ग्रन्थों के महत्त्व को जो लोग समझते हैं, प्रिय राजवीर जी उन्हीं ऋषि भक्तों में से एक हैं। बाइबिल के पुराने संस्करण की वे भी खोज में थे और निरन्तर प्रयासरत रहे। आर्य जगत के लिए यह प्रसन्नता की बात है कि 19 वीं शताबदी के अन्तिम चतुर्थांश (क्वार्टर) में इलाहाबाद से मुद्रित बाइबिल के उस संस्करण की प्रति श्रीराजवीर जी को प्राप्त हो गयी है, जिसकी भाषा शबदशः उन सन्दर्भों से पूर्णतः मिलती है, जो महर्षि जी ने सत्यार्थ प्रकाश में उद्धृत किए हैं। यह अमूल्य प्रति भी अब परोपकारिणी सभा की समपत्ति होगी। विरोधियों द्वारा किये जा रहे वार-प्रहार का उत्तर देने के लिए ऐसे ग्रन्थों की आवश्यकता पड़ती है। इस दृष्टि से यह एक कीर्तिमान है।

कुछ वर्षों पूर्व आर्य समाज की शिरोमणि सभा के एक स्वयंभू प्रधान सिख नेताओं की सभा में जाकर यह आश्वासन दे आये थे कि सत्यार्थ प्रकाश में उस स्थल पर भाषा में परिवर्तन कर दिया जाएगा, जिस पर उनका कहना है कि गुरु ग्रन्थ साहब में वैसा नहीं लिखा है- यथा- ‘‘वेद पढ़े ब्रह्मा मुए सारे वेद कहानी’’, परन्तु वास्तव में इस प्रकार का भाव वहाँ है। इस प्रकरण का उत्तर पूज्य स्वामी स्वतंत्रानन्द जी महाराज ने अपने ग्रन्थ वैदिक धर्म और सिख गुरु में पहले ही दिया हुआ है। गुरु ग्रन्थ साहब में ऐसे कई प्रकरण हिन्दू धर्म के समबन्ध में हैं, जो हिन्दुओं के ग्रन्थों में है ही नहीं, परन्तु सिख नेता और विद्वान् उन स्थानों पर गुरु ग्रन्थ साहब में भाषा-परिवर्तन के लिए सहमत नहीं होंगे। अनुसन्धान का यह कार्य उस समय परोपकारिणी सभा ने ही किया था। वेद, आर्य समाज एवं ऋषि दयानन्द पर वार-प्रहार का उत्तर देने में परोपकारिणी सभा सदैव अग्रणी रही है।

प्रियवर राहुल जी जो पुरानी सामग्री महर्षि के समबन्ध में खोज-खोज कर सभा को दे रहे हैं, उस पर प्रा. जिज्ञासु जी कार्य कर रहे हैं। उस शोध-कार्य का सुफल भी आर्य जनों को देखने को मिलेगा।   – जागृति विहार, मेरठ

हत्यारा मनुष्य था फ़रिश्ता नहीं :- प्रा राजेन्द्र जिज्ञासु

हत्यारा मनुष्य था फ़रिश्ता नहीं :- प्रा राजेन्द्र जिज्ञासु

१. मिर्ज़ा तथा मिर्जाई  पण्डित जी के हत्यारे को खुदा का भेजा फ़रिश्ता बताते व लिखते  चले आ रहे हैं .
कितना भी झूठ गढ़ते  जाओ , सच्चाई सौ पर्दे फाड़ कर बाहर  आ जाती है . मिर्जा  ने स्वयं  स्वीकार किया है . वह उसे एक शख्स ( मनुष्य ) लिखता है . उसने पण्डित लेखराम के पेट में तीखी छुरी मारी . छुरी मार कर वह मनुष्य लुप्त हो गया  पकड़ा नहीं गया

२. वह हत्यारा मनुष्य बहुत समय पण्डित लेखराम के साथ रहा . यहाँ बार बार उसे मनुष्य लिखा गया है . फ़रिश्ता नहीं . झूठ की पोल अपने आप खुल गयी
– दृष्टव्य – तजकरा पृष्ठ – २३९ प्रथम संस्करण

हत्यारा मनुष्य ही था :- मिर्जा पुनः लिखता है ” मैं उस मकान की ओर चला जा रहा हूँ . मेने एक व्यक्ति को आते हुए देखा जो कि एक सिख सरीखा प्रतीत होता था ” कुछ ऐसा दिखाई देता था जिस प्रकार मेने लेखराम के समय एक मनुष्य को स्वप्न में देखता था .
– दृष्टव्य – तजकरा पृष्ठ – ४४०  प्रथम संस्करण

यहाँ  फ़रिश्ते को सिख, अकालिया, सरीखा आदि तथा डरावना बताकर सीखो को तिरस्कृत किया साथ ही वह भी बता दिया की कादियानी अल्लाह के फ़रिश्ते शांति दूत नहीं क्रूर डरावने व हत्यारे  होते हैं . झूठ की फिर पोल खुल गयी .

अल्लाह का फ़ारसी पद्य पढ़िए :-

मिर्जा ने अपने एक लम्बी फ़ारसी कविता में पण्डित जी को हत्या की धमकी दते हुए अल्लाह मियां रचित निम्न पद्य दिया है :-

अला अय दुश्मने नादानों बेराह

बतरस अज तेगे बुर्राने मुहम्मद

– दृष्टव्य – हकीकत उल वही  पृष्ठ – २८८   तृतीय  संस्करण

अर्थात अय मुर्ख भटके हुए शत्रु तू मुहम्मद की तेज काटने वाले तलवार से डर

प्रबुद्ध, सत्यान्वेषी और निष्पक्ष पाठक ध्यान दें की अल्लाह ने तलवार से काटने की धमकी दी थी परन्तु मिर्जा ने स्वयं स्वीकार किया है की पण्डित लेखराम जी की हत्या तीखी छुरी से की गयी . मिर्ज़ा झूठा नहीं सच्चा होगा परन्तु मिर्ज़ा का कादियानी अलाल्ह जनाब मिर्ज़ा की साक्षी से झूठा सिद्ध हो गया . इसमें हमारा क्या दोष

न छुरी , न तलवार प्रत्युत नेजा ( भाला )

मिर्ज़ा लिखता है ” एक बार मेने इसी लेखराम के बारे में देखा कि एक नेजा ( भाला ) हा ई . उसका फल बड़ा चमकता है और लेखराम का सर पड़ा हुआ है उसे नेजे से पिरो दिया है और खा है की फिर यह कादियां में न आवेगा . उन दिनों लेखराम कादियां में था और उसकी हत्या से एक मॉस पहले की घटना है

 

– दृष्टव्य – तजकरा पृष्ठ – २८७   प्रथम संस्करण

 

यह इलहाम एक शुद्ध झूठ सिद्ध हुआ . पण्डित लेखराम जी का सर कभी भाले पर पिरोया गया हो इसकी पुष्टि आज तक किसी ने नहीं की .मिर्ज़ा ने स्वयं पण्डित जी के देह त्याग के समय का उनका चित्र छापा है मिर्जा के उपरोक्त कथन की पोल वह चित्र तथा मिर्जाई लेखकों के सैकड़ों लेख खोल रहे हैं

अपने बलिदान से पूर्व पण्डित जी ने कादियां पर तीसरी बार चढाई की मिर्ज़ा को  पण्डित जी का सामना करने की हिम्मत न हो सकी . मिर्जा को सपने में भी पण्डित लेखराम का भय सततता था उनकी मन स्तिथि का ज्वलंत प्रमाण उनका यह इलहामी कथन है :

झूठ ही झूठ :- मिर्जा का यह कथन भी तो एक शुध्ध झूठ है की पण्डित जी अपनी हत्या से एक मॉस पूर्व कादियां पधारे थे . यह घटना जनवरी की मास  की है जब पण्डित जी भागोवाल आये थे . स्वामी श्रद्धानन्द  जी ने तथा  इस विनीत ने अपने ग्रंथो में भागोवाल की घटना दी है . न जाने झूठ बोलने में मिर्जा को क्या स्वाद आता है .

तत्कालीन पत्रों में भी यही प्रमाणित होता है की पूज्य पण्डित जी १७-१८ जनवरी को भागोवाल पधारे सो कादियां `१९-२० जनवरी को आये होंगे . उनका बलिदान ६ मार्च को हुआ . विचारशील पाठक आप निर्णय कर लें की यह डेढ़ मास  पहले की घटना है अथवा एक मास पहले की . अल्पज्ञ जेव तो विस्मृति का शिकार हो सकता है . क्या सर्वज्ञ अल्लाह को भी विस्मृति रोग सताता है ?

अल्लाह का डाकिया कादियानी  नबी :-

मिर्जा ने मौलवियों का, पादरियों का , सिखों का , हिन्दुओं का सबका अपमान किया . सबके लिए अपशब्दों का प्रयोग किया तभी तो “खालसा ” अखबार के सम्पादक सरदार राजेन्द्र सिंह जी ने मिर्जा की पुस्तक को ” गलियों की लुगात ” ( अपशब्दों का शब्दकोष ) लिखा है . दुःख तो इस बात का है की मिर्ज़ा बात बार पर अल्लाह का निरादर व अवमूल्यन करने से नहीं चूका . मिर्जा ने लिखा है मेने एक डरावने व्यक्ति को देखा . इसको भी फ़रिश्ता ही बताया है – ” उसने मुझसे पूछा कि लेखराम कहाँ है ? और एक और व्यक्ति का नाम लिया की वह कहा है ?

– दृष्टव्य – तजकरा पृष्ठ – २२५   प्रथम संस्करण

पाठकवृन्द ! क्या  यह सर्वज्ञ अल्लाह का घोर अपमान नहीं की वह कादियां फ़रिश्ते को भेजकर अपने पोस्टमैन मिर्ज़ा गुलाम अहमद से पण्डित लेखराम तथा एक दूसरे व्यक्ति ( स्वामी श्रद्धानन्द ) का अता पता पूछता है . खुदा के पास फरिश्तों की क्या कमी पड़  गयी है ? खुदा तो मिर्ज़ा पर पूरा पूरा निर्भर हो गया . उसकी सर्वज्ञता पर मिर्जा ने प्रश्न चिन्ह लगा दिया .

एक और झूठ गढ़ा गया : – ऐसा लगता है कि कादियां में नबी ने झूठ गढ़ने की फैक्ट्री लगा दी . यह फैक्ट्री ने झूठ गढ़ गढ़ कर सप्लाई करती थी पाठक पीछे नबी के भिन्न भिन्न प्रमाणों से यह पढ़ चुके हैं कि पण्डित जी की हत्या :
१. छुरी से की गयी

२. हत्या तलवार से की गए

३. हाथ भाले से की गयी

नबी के पुत्र और दूसरे खलीफा बशीर महमूद यह लिखते हैं :-

४. घातक ने पण्डित जी पर खंजर से वर किया
देखिये – “दावतुल अमीर ” लेखक मिर्जा महमूद पृष्ठ – २२०

अब पाठक इन चरों कथनों के मिलान कर देख लें की इनमें सच कितना है और झूठ कितना . म्यू हस्पताल के सर्जन डॉ. पेरी को प्रमाण मानते ही प्रत्येक बुद्धिमानi यह कहेगा कि बाप बेटे के कथनों में ७५ % झूठ है .

 

‘होली और उसके पूर्व महाभारतकालीन स्वरुप पर विचार’

ओ३म्

होली और उसके पूर्व महाभारतकालीन स्वरुप पर विचार

मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

भारत और भारत से इतर देशों में जहां भारतीय मूल के लोग रहते हैं, प्रत्येक वर्ष फाल्गुन माह की पूर्णिमा के दिन रंगों का पर्व होली हर्षोल्लास पूर्वक मनाया जाता है। होली के अगले दिन लोग नाना रंगों को एक दूसरे के चेहरे पर लगाते हैं, मिठाई व पकवानों का वितरण आदि करते हैं और कुछ हुड़दंग भी करते हैं। क्या होली का प्राचीन स्वरुप भी वर्तमान जैसा था? इससे कुछ भिन्न था वा यह वर्तमान स्वरूप पूर्व की विकृति वा रूपान्तर है?

 

विचार करने पर ज्ञात होता है कि भारत की धर्म व संस्कृति 1.96 अरब पुरानी है। महाभारत काल, आज से लगभग 5000 वर्ष पूर्व, तक वैदिक संस्कृति अपने मूल स्वरूप में देश देशान्तर में विद्यमान रही। इसका प्रमाण है कि भारत में वेदों के साक्षात ज्ञानी, ऋषि, मुनि व योगी महाभारत काल तक बहुतायत में रहे हैं। दूसरा प्रमाण यह है कि न भारत में और न हि विश्व के किसी अन्य देश में आज से पांच हजार वर्ष पूर्व की किसी अन्य धर्म, संस्कृति का कोई प्रमाण मिलता है। महाभारत ग्रन्थ में ऐसे अनेक प्रमाण है कि प्राचीन काल में भारत के लोग विश्व वा यूरोप के प्रायः सभी देशों में आते जाते थे। मनुस्मृति ग्रन्थ सृष्टि के आदि में रचा गया जिसमें वर्णन है कि यह आर्यावर्त्त देश ही संसार का अग्रजन्मा देश है। संसार के सभी देशों के लोग यहां विद्यार्जन करने आते थे और अपने योग्य चरित्र आदि की शिक्षा लेते थे। यहां से वेदों आदि व सभी विद्याओं का ज्ञान प्राप्त कर अपने देश में उसका प्रचार व उपयोग करते कराते थे।

 

वेद मनुष्य के जीवन को सुखमय बनाने के लिए ईश्वरोपासना सहित पंचमहायज्ञों का विधान करते हैं। इन पंच महायज्ञों में मनुष्यों के अनेक व अधिकांश कर्तव्य आ जाते हैं। वैदिक धर्म व संस्कृति वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को मानने वाली संस्कृति है। यहां सभी लोग सृष्टि के आदि काल से सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।। की प्रार्थना करते आ रहे हैं। अतः आज जैसी होली महाभारतकाल तक भारत व विश्व में कहीं होने की कोई सम्भावना नहीं है। अनुमान है कि वर्तमान जैसी होली का प्रचलन मध्यकाल में पुराणों की रचना से कुछ समय पूर्व व रचना होने से प्रचलित हुआ। प्राचीन काल में तो प्रत्येक माह पूर्णमास पर बड़े-बड़े यज्ञों का प्रचलन होने का अनुमान होता है। वृहत यज्ञों के उस प्राचीन स्वरूप का अनुसरण ही मध्यकाल से प्रचलित होकर वर्तमान काल तक फाल्गुन की पूर्णिमा के दिन रात्रि को होली जलाकर किया जा रहा है। यज्ञ से वायुमण्डल शुद्ध, पवित्र, सुगन्धित व स्वास्थ्यवर्धक होता है। यज्ञ से बादल बनते हैं, समय पर आवश्यकतानुसार वर्षा होती है, अतिवृष्टि वा अनावृष्टि नहीं होती, शुद्ध, पवित्र व स्वास्थ्यवर्धक अन्न उत्पन्न होता है व यज्ञ में देवपूजा, संगतिकरण व दान करने से ऐसे अनेक लाभों सहित हमारे अन्दर पाप की प्रवृत्ति का भी शमन होता है। इसके साथ अदृष्ट धर्म लाभ भी होता है जिससे हमारा वर्तमान, भविष्य, परजन्म सुधरता है व अच्छे कर्मों के सग्रंह से मोक्ष की प्राप्ति की ओर जीवात्मा प्रवृत्त होता है।

 

फाल्गुन की पूर्णिमा को मनाये जाने का एक कारण यह भी है कि भारत में सृष्टि के आदि काल से प्रचलित चैत्र, बैसाख, ज्येष्ठ, आषाण आदि बारह हिन्दी महीने जो चैत्र से आरम्भ होकर फाल्गुन की पूर्णिमा को समाप्त होते हैं, उनमें फाल्गुन पूर्णिमा वर्ष का अन्तिम दिन होता है। आज हिन्दी के बारह महीनों का अन्तिम महिना फाल्गुन का अन्तिम दिन है। एक प्रकार से वर्ष का अन्त हो रहा है। कल से चैत्र का महीना आरम्भ होगा। यह वर्ष का पहला महीना होता है। अतः वर्ष के अन्त पर वृहत्त यज्ञ का आयोजन कर उसे विदाई दी जाती थी और हो सकता है कि नये वर्ष के प्रथम महीने चैत्र के प्रथम दिन को नये वर्ष के रूप में हर्षोल्लास पूर्वक मनाया जाता रहा हो। इसका इतना अभिप्राय हो सकता है कि यदि किसी का किसी के प्रति कोई द्वेष भाव होता रहा होगा तो इस दिन उसे छोड़ने का संकल्प लिया जाता होगा व ऐसे लोग परस्पर मिलकर आपस में प्रेम व मैत्री पूर्ण संबंध पुनः स्थापित करने की प्रतिज्ञा करते होंगे। उसी का कुछ विकृत रूप आज एक दूसरे पर रंग लगाकर, गले मिलकर, स्वादिष्ट पदार्थों का परस्पर वितरण करके व रंग डालकर मनाने की परम्परा मध्यकाल व उसके बाद से चल पड़ी है।  ऐसा देखा जाता है कि इस दिन लोग हुड़दंग करते हैं, कुछ नशा करके गलत उदाहरण भी प्रस्तुत करते हैं तथा कहीं कहीं परस्पर लड़ाई झगड़े आदि भी हो जाते हैं। वर्तमान का समय शिक्षा व आधुनिकता का युग है अतः सभी को सभ्यता का अच्छा उदाहरण इस दिन प्रस्तुत करना चाहिये।

 

यह भी विचारणीय है कि होली से पूर्व शीत के महीने होते हैं। शीत ऋतु वृद्ध लोगों के लिए तो कष्टकर होती ही है परन्तु साथ हि युवा व बच्चों सहित निर्धन लोगों के लिए भी अति कष्टदायक होती है। अतः ऋतु परिवर्तन से शीत की निवृत्ति व सबके लिए सुखद ऋतु वसन्त के होने पर सबका हर्षित व प्रसन्न होना स्वाभाविक ही है। देश के कृषक लोग भी इस अवसर पर प्रसन्नता व सुख का अनुभव करते हैं क्योंकि उनकी गेहूं व अन्य फसलें पक कर तैयार होती हैं। सारा वातावरण नये नये फूलों की सुगन्ध से सुवासित होता है। सभी वृक्ष अपने पुराने पत्ते-पत्तियों का त्याग कर नये हरे पत्ते धारण करते हैं जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को छोड़कर नये वस्त्र धारण करता है। इससे सारा वातावरण व उसका परिदृश्य मनमोहक व लुभावना बन जाता है। ऐसे में सामान्य मनुष्य का मन कुछ आमोद प्रमोद की बातों में लगना स्वाभाविक होता है जिसकी अभिव्यक्ति होली के चैत्र कृष्ण प्रथमा के पर्व से होती है। इतना ही निवेदन है कि मनुष्य को जोश के साथ होश भी रखना चाहिये। कहीं किसी के द्वारा इस पर्व पर कोई अमर्यादित बात व कार्य नहीं होना चाहिये। वैदिक साहित्य का अध्ययन कर हमें लगता है कि सभी परिवारों में पूर्णिमा व अगले दिन प्रथमा को अनिवार्य रूप से अग्निहोत्र व हवन का प्रचलन होना चाहिये जिसमें किसान अपनी नई फसल वा गेहूं की बालियों की आहुतियां भी दे सकते हैं जिससे यह पर्व मनाना सार्थक होता है। इस प्रकार यज्ञ पूर्वक होली को मनाना होली का मुख्य प्रतीक बनना चाहिये। इससे लाभ ही लाभ होगा। समाज, पर्यावरण व देश सभी उन्नत होंगे और ईश्वर प्रदत्त प्राचीन वैदिक धर्म व संस्कृति उन्नति को प्राप्त होगी।

 

होली के दिन प्रायः सभी घरों में स्वादिष्ट भोजन व नाना प्रकार के पकवान बनते हैं और लोग परस्पर अपने पड़ेसियों व मित्रों में इसका वितरण व सेवन आदि करते हैं। यह अच्छी प्रथा है। लेख को विराम देने से पूर्व इतना और निवेदन है कि इस दिन सभी समर्थ व सम्पन्न लोगों को समाज क निर्धन व साधनहीन लोगों तक अपनी ओर से उनके उपयोग की कुछ वस्तुयें वितरित करने का प्रयास करना चाहिये और उनको आगे बढ़ाने का कुछ सहयोग किया जा सके तो इसका विचार करना चाहिए। आज होली के दिन हमने कुछ क्षण जो चिन्तन किया है, उसे आपको सादर भेंट करते हैं और सभी बन्धुओं व मित्रों को हमारी होली के पर्व की बहुत बहुत शुभकामनायें हैं।

मनमोहन कुमार आर्य

पताः 196 चुक्खूवाला-2

देहरादून-248001

फोनः09412985121

जिनके हम ऋणी हैं

 जिनके हम ऋणी हैं

रघुनाथ प्रसाद कोतवाल

आर्य समाज के इतिहास में हम अपना परिचय ऋषि दयानन्द के साथ करते हैं। ऋषि के साथ परिचय करते हुए हम जिन लोगों से परिचित होते हैं, उनमें उनके गुरु दण्डी स्वामी विरजानन्द से परिचित होते हैं, जिनके बिना स्वामी दयानन्द ऋषि दयानन्द नहीं बन सकते थे। दण्डी स्वामी विरजानन्द ने ऋषि दयानन्द को वह दृष्टि दी, जिससे उन्होंने संसार को देखा और सत्य-असत्य का विवेक किया। जिस विवेक ने धर्म और पाखण्ड के अन्तर को स्पष्ट किया और ऋषि दयानन्द वैदिक धर्म का प्रचार करने में सफल हुए तथा पाखण्ड पर आक्रामक प्रहार कर सके। बौद्धिक दृष्टि से गुरुजी ने स्वामी दयानन्द को प्रखर बनाया, वहीं पर कुछ लोग हैं, जिन्होंने यदि सहयोग और सुरक्षा स्वामी दयानन्द को न दी होती तो समभव था, इतिहास न बन पाता या कुछ और प्रकार से बनता।

ऋषि दयानन्द के विद्याध्ययन में गुरुजी के अतिरिक्त अनेक सहयोगी हुए हैं। किसी ने दूध का प्रबन्ध किया, किसी ने दीपक के तेल का। मुखय सहयोग भोजन का था, जो मथुरा निवासी अमरलाल जोशी ने किया, जिनके पौत्र मथुरा शताबदी के समय थे। उसके बाद वे एक बार अजमेर भी पधारे थे। अब मथुरा के उस घर में सम्भवतः कोई नहीं रहता, सब इधर-उधर चले गये हैं।

प्रचार के समय में जिन्होंने सहयोग किया, वे अनेक महानुभाव है, परन्तु मंगलवार 16 नवबर 1869 में काशी शास्त्रार्थ के समय जिन्होंने ऋषि दयानन्द की प्राण रक्षा की, वे थे रघुनाथ प्रसाद कोतवाल। जो बनारस के गुण्डों से बचाकर स्वामी जी को आनन्दबाग के दूसरे सिरे पर जहाँ नगरपालिका भवन है, उसके एक कमरे में ले गये तथा राजा को भी कहा कि आपकी उपस्थिति में एक अकेले संन्यासी के और काशी के सैकड़ों गुण्डे ईंट-पत्थर फेंकें और जान से मारने की चेष्टा करें, यह उचित नहीं, तब राजा ने कोतवाल रघुनाथ प्रसाद से कहा था- धर्म रक्षा के लिये कभी-कभी अनुचित का भी आश्रय लेना पड़ता है। इससे अधिक हम रघुनाथ प्रसाद कोतवाल के विषय में नहीं जानते। यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि जो परिवार ऋषि के समय से काशी में रह रहा है, जिनके पौत्र अभी जीवित हैं, उनकी चर्चा आर्य समाज के इतिहास में उस महत्त्व के साथ उल्लिखित नहीं हुई।

गत दिनों काशी के आर्य समाज के कार्यकर्त्ता श्री अशोक कुमार त्रिपाठी जी से भेंट हुई और उन्होंने मुझे बताया कि उनके पास रघुनाथ प्रसाद कोतवाल का चित्र और उनके जीवन पर लिखी सामग्री सुरक्षित है। मैंने माँगी तो उन्होंने सहर्ष स्वीकृति देते हुए कहा कि मैंने यह सामग्री परोपकारी के लिये ही रखी है, अतः किसी और को नहीं दी। मैं बनारस जाकर वह चित्र और सामग्री आपके पास भेज दूँगा। अपने वचन के अनुसार त्रिपाठी जी ने स्वनाम धन्य रघुनाथ प्रसाद कोतवाल जी तथा उनके पौत्र मेवालाल पाण्डे जो वर्तमान स्वामी ओमानन्द जी से संन्यास दीक्षा लेकर केवलानन्द बन गये हैं। इन दोनों का चित्र परोपकारी को भेजा, जो इस अंक में प्रकाशित किया जा रहा है। यह परोपकारी पत्र एवं परोपकारिणी सभा के लिये गौरव की बात है।

श्री अशोक कुमार त्रिपाठी जी ने जो रघुनाथ प्रसाद कोतवाल का परिचय भेजा है। वह परिचय आर्य हरीश कौशल पुरी द्वारा 18 जुलाई 2008 का लिखा है। संयोग से इस लेख पर उनका पता और दूरभाष संखया भी अंकित है। मैंने लेखन की प्रामाणिकता  के लिये उनसे सपर्क किया तो उन्होंने केवल इतना स्वीकार किया कि इसकी प्रामाणिकता बस इतनी है कि श्री रघुनाथ प्रसाद कोतवाल के पौत्र स्वामी केवलानन्दजी ने अपनी स्मृति और परिवार में चली आ रही बातों के आधार पर जो बोला, मैंने उसे लिख दिया, इससे अधिक मेरी कोई प्रामाणिकता नहीं है। मैंने स्वामी जी से समपर्क कर इसकी प्रामाणिकता को पुष्ट करने का प्रयास किया, परन्तु आयु अधिक होने के कारण वे प्रश्नों के उत्तर के स्थान पर अपनी बात को ही दोहराते रहे। यह बात कराने में इनके डॉ. पुत्र का योगदान रहा।

जो परिचय अशोक त्रिपाठी जी ने भेजा है। उसमें योगी का आत्मचरित वाली शैली है, जिसको प्रमाणित नहीं किया जा सकता। इस लेख में समय और स्थान में समन्वय नहीं है, अतः उस लेख को यथावत् प्रकाशित न करके उस सामग्री का उपयोग करते हुए ये पंक्तियाँ लिखी हैं। रघुनाथ प्रसाद कोतवाल का जन्म 28 जनवरी 1826 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के मेहनगर गाँव में हुआ था। आपके पिता का नाम श्रीमहावीर प्रसाद तथा माता का नाम श्रीमती वसुन्धरा पाण्डेय था। ये भारद्वाज गोत्रीय सरयू पारी ब्राह्मण थे। रघुनाथ पाण्डेय ने 12वीं की शिक्षा लखनऊ से पूरी की। इनको तत्काल ही पुलिस विभाग में नौकरी मिल गई। सर्व प्रथम इनकी नियुक्ति देहरादून में हुई फिर उनको सी.आई.डी. इंस्पेक्टर बना कर कानपुर भेजा गया। ये सरकार के विश्वासपात्र कर्मचारी थे। आगे चल कर इनका कार्य क्षेत्र कानपुर से लेकर बुन्देलखण्ड तक बढ़ा दिया गया। इनकी सेवा से प्रसन्न होकर अंग्रेज सरकार ने रघुनाथ प्रसाद कोतवाल को राय की उपाधि से सममानित किया, परन्तु रघुनाथ प्रसाद कोतवाल ने इस उपाधि का नाम के साथ कभी प्रयोग नहीं किया, क्योंकि ऐसा करने में उन्हें गर्व के स्थान पर अपमान का अनुभव होता था।

ऋषि दयानन्द रघुनाथ प्रसाद कोतवाल से बहुत प्रेम करते थे। एक दिन वे अपने धर्मपत्नी रामप्यारी पाण्डेय के साथ महर्षि से मिले, तब स्वामी जी ने दोनों को वेदोपदेश देकर वेदानुसार जीवन जीने की प्रेरणा दी। उसी के अनुसार उनके परिवार में आर्य परमपरा का निर्वाह किया जा रहा है, कोतवाल जी के पुत्र श्री मिश्रीलाल जी तथा उनके पुत्र मेवालाल जी आजतक श्रद्धापूर्वक परिवार में वैदिक धर्म का पालन कर रहे हैं।

कहा जाता है कि स्वतन्त्रता संग्राम के समय इनकी नियुक्ति झाँसी के कोतवाल के रूप में थी, उन्होंने परोक्ष रूप से रानी लक्ष्मीबाई को युद्ध में सहायता भी पहुँचाई थी। इसका कारण था, रघुनाथ प्रसाद के चाचा रघुवीर पाण्डेय झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के सलाहकार थे और रानी के विधवा होने पर रानी को ओजपूर्ण कवितायें और कहानियाँ सुनाकर प्रोत्साहित किया करते थे। महिला सेना के निर्माण में भी इनका योगदान था। इसी प्रकार परिवार के अन्य सदस्य भी स्वतन्त्रता संग्राम में भाग ले रहे थे। रघुनाथ प्रसाद कोतवाल के छोटे चाचा शिवनन्दन, श्रवण कुमार, कुँवर सिंह के साथ लड़ाई में शामिल हुये और कंधरापुर के पास तमसा के किनारे वीरगति को प्राप्त हुए। कुँवर सिंह युद्ध करते हुए आगे बढ़ते रहे, वे आजमगढ़ के सिधारी पुल पर तमसा नदी के किनारे पहुँचे थे कि उनके हाथ में एक अंग्रेज सिपाही की बन्दूक की गोली लगी, कुँवर सिंह ने तत्काल तलवार से गोली लगा अपना हाथ काट दिया और नदी में प्रवाहित कर दिया। एक हाथ से युद्ध करते हुए बक्सर होते हुये, अपने गाँव जगदीशपुर पहुँचे। 85 वर्ष की अवस्था में उनका स्वर्गवास हुआ। बाद में उनके सुपुत्र जगदीश सिंह ने मोर्चा समभाला और अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध करते रहे।

इस प्रकार रघुनाथ प्रसाद कोतवाल एवं उनके परिवार का जीवन देश की स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिये अर्पित हुआ।

रघुनाथ प्रसाद कोतवाल को उनके चाचा ने ही प्रेरणा देकर पुलिस विभाग में भर्ती कराया था और निर्देश दिया था कि तुमहें अंग्रेजों को प्रसन्न रखते हुए, भारत माता की दासता की जंजीरों को काटना है, जिससे साँप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे। रघुनाथ प्रसाद कोतवाल ने और कितने भी कार्य देशहित में किये होंगे, परन्तु काशी में उस दिन काशी के गुण्डों से महर्षि के प्राणों की रक्षा करके जो महान् कार्य किया, उससे बड़ा और कोई कार्य नहीं हो सकता। यह उनकी देश और समाज की सबसे बड़ी सेवा है।

इसके लिये यह देश और समाज उनका सदा ऋणी रहेगा।

– धर्मवीर

मुंशी इन्द्रमणि और इतिहास प्रदुषण: प्रा राजेन्द्र जिज्ञासु

मुंशी इन्द्रमणि और इतिहास प्रदुषण

क्या  बालक से ऋषि ने ऐसी चर्चा की?

श्री भारतीय जी ने अपनी पुस्तक में लिखा है-‘‘मुरादाबाद

से मुंशी इन्द्रमणि भी महर्षि से भेंट हेतु अलीगढ़ आये तथा

जीव के अनादित्व पर चर्चा करते रहे।’’1 यह दिसम्बर  1873

के अन्तिम सप्ताह की घटना है। प्रश्न यह उठता है कि सन् 1865

में जन्मा केवल आठ वर्षीय बालक क्या  मुरादाबाद से अकेले ऋषि

को मिलने आया? आप ही ने मुंशी जी का जन्म का वर्ष सन्

1865 माना है।

दूसरा प्रश्न यहाँ यह उठता है कि स्वामी अच्युतानन्द जी जीव

ब्रह्म के भेद विषय पर ऋषि से शंका समाधान करते हैं तो एक पूरक

प्रश्न पूछने पर महर्षि जी स्वामी अच्युतानन्द जी से कहते हैं कि

तुम अभी बालक हो। आगे चलकर इसे समझ सकोगे। ‘आर्य

मित्र’ के महर्षि जन्म शताब्दी  विशेषाङ्क में स्वयं स्वामी अच्युतानन्द

जी ने अपने एक लेख में यह घटना लिखी है।

स्वामी अच्युतानन्द जी तो सन् 1853 में जन्में थे। आप तो

तब यौवन की चौखट पर पाँव धर चुके थे। मुंशी इन्द्रमणि आठ वर्ष

का बालक जीव के अनादित्व विषय पर चर्चा करने निकला है।

यहाँ ऋषि जी शिशु इन्द्रमणि से दार्शनिक चर्चा का आनन्द लेते हैं।

इस पर हम क्या  कहें? उर्दू में एक लोकोज़्ति हैं-‘‘अकल बड़ी

या भैंस’’।

ऋषि ने एक बार मुंशी जी को ‘बुज़र्ग’ भी कहा था। वह

ऋषि जी से कोई बीस वर्ष बड़े थे। स्वयं अकेले अलीगढ़ आये थे।

यह घटना हम सत्य ही मानते हैं।

मुंशी जी का लेखन कार्य

अपवाद रूप में संसार में कई बालक बहुत छोटी आयु में

बहुत अच्छे साहित्यकार बनकर चमके। हमारे देश में ही श्री ज्ञानेश्वर

महाराज, पं0 गुरुदज़ जी विद्यार्थी, पं0 चमूपति तथा वीर सावरकर

ने बहुत छोटी आयु में गद्य व पद्य सृजन करके यश पाया, परन्तु

पाठक हम से सहमत होंगे कि जन्म लेने से पूर्व ही कोई पुस्तक

लिख भी दे और छपवा भी दे-यह तो सज़्भव ही नहीं। जन्म लेते

ही कोई पुस्तक लिखकर छपवा दे यह भी नहीं माना जा सकता।

तीन और चार वर्ष की आयु में ही कोई सिद्धहस्त लेखक विद्वान्

बनकर ग्रन्थ पर ग्रन्थ लिखकर छपवा दे-यह भी तो सज़्भव नहीं

दीखता।

परन्तु महान् व्यज़्ति असज़्भव को सज़्भव कर दिखाने की

क्षमता रखते हैं। भारतीय जी ने सन् 1858 (जन्म से पूर्व),

सन् 1865 जन्म के समय, सन् 1868, तीन वर्ष की आयु में

और सन् 1869 चार वर्ष की आयु में भी इन्द्रमणि जी से ग्रन्थ

लिखवाये व छपवाये।1

स्वामी सत्यप्रकाश जी ने बिना पढ़े, बिने विचारे इन दोनों

पुस्तकों के प्राक्कथन  लिख डाले। विहंगम दृष्टि से पढ़ने पर तो

ऐसी पुस्तकों की गड़बड़ पकड़ में कहाँ आती है। इस लेखक की

समीक्षा पढ़कर स्वामी जी ने भारतीय जी से कहा था कि अपने

ग्रन्थ के साथ एक शुद्धि-अशुद्धि पत्र लगायें। इसके बिना

बिक्री नहीं होनी चाहिए, परन्तु भारतीय जी के अहं ने उनका

आदेश स्वीकार नहीं किया। तभी मैंने एक लेख में स्वामी जी के

इस कथन का उल्लेख कर दिया।

मरणोपरान्त मुंशी जी से लेखन कार्य करवाया

भारतीय जी की लगन, परिश्रम व उत्साह प्रशंसा योग्य है।

सृष्टि-नियम तो यह है कि जीते जी ही किसी व्यज़्ति से कोई पुस्तक

लिखवाई जा सकती है। मरणोपरान्त कोई आपके लिए एक

पृष्ठ लिखकर नहीं दे सकता। सृष्टि-नियम की चिन्ता न करके

भारतीय जी ने मुंशी इन्द्रमणि जी से एक सहस्र पृष्ठों से ऊपर

का ग्रन्थ लिखवा भी लिया और छपवा भी दिया। इस पुस्तक

का नाम है ‘आमादे हिन्द’ इसी को ‘इन्द्रवज्र’ नाम से प्रसिद्धि प्राप्त

हुई। भारतीय जी ने पं लेखराम जी के ग्रन्थ के हिन्दी अनुवाद का

सज़्पादन करते हुए इसका नाम ‘आमदे हिन्द’ कर दिया है।1

किसी से पूछ लेते तो इस अनर्थ से बचा जा सकता था। हमने

ऋषि जीवन में इसका शुद्ध नाम ‘आमादे हिन्द’ देकर यह कुचक्र

रोका है। ध्यान देने योग्य तथ्य तो यह है कि पं0 लेखराम जी का

बलिदान सन् 1897 में हुआ। वह ऋषि जीवन में1 तथा अपने

साहित्य में इन्द्र वज्र की चर्चा करते हैं। पण्डित जी लिखित ऋषि

जीवन सन् 1897 में ही प्रकाशित हो गया यह भारतीय जी मानते

हैं। इस मूल उर्दू ग्रन्थ में भी ‘इन्द्र वज्र’ की मुंशी इन्द्रमणि स्वयं

चर्चा करते हैं।2 इससे भी प्रमाणित हो गया कि यह ग्रन्थ मुंशी

जी ने जीते जी लिख दिया और छप भी गया।

परन्तु भारतीय जी दृढ़तापूर्वक लिखते हैं कि मुंशी जी ने सन्

1901 में इन्द्र वज्र लिखा व छपवाया।3 अब समझदार सज्जन

ही हमें सुझावें कि हम उनके इस कथन पर ‘सत्य वचन महाराज’

कैसे कह सकते हैं?

गुणी विद्वान् इन तथ्यों पर विचार करें और नीर क्षीर विवेक से

काम लेकर जो सत्य हो उसे स्वीकार कर इतिहास प्रदूषण को कुछ

तो रोकें।

 

  1. द्रष्टव्य, नवजागरण के पुरोधा, भाग पहला, पृष्ठ 401
  2. द्रष्टव्य, महर्षि दयानन्द के भज़्त, प्रशंसक और सत्संगी, पृष्ठ 17

46 इतिहास-प्रदूषण इतिहास-प्रदूषण 47

  1. द्रष्टव्य, पं0 लेखरामकृत हिन्दी जीवन चरित्र, सन् 2007, पृष्ठ 312
  2. द्रष्टव्य, उर्दू जीवनचरित्र महर्षि स्वामी दयानन्द, लेखक पं0 लेखराम, पृष्ठ 293
  3. द्रष्टव्य, ‘आर्य लेखक कोश’ पृष्ठ 23

 

पुनरुत्थान युग का द्रष्टा-4

पुनरुत्थान युग का द्रष्टा

– स्व. डॉ. रघुवंश

कीर्तिशेष डॉ. रघुवंश हिन्दी-जगत् के जाने-माने विद्वान् थे। वे हिन्दी-संस्कृत-अंग्रेजी के परिपक्व ज्ञाता तो थे ही, भारत की शास्त्रीयता और उसके इतिहास के अनुशीलन में भी उनकी विपुल रुचि और गति थी। उन्होंने साहित्य के विभिन्न पक्षों पर साहित्य-सर्जन कर अपनी मौलिक प्रतिभा का परिचय दिया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष और समर्थ लेखक के रूप में वे सर्वमान्य रहे। अपने अग्रज श्रीमान् यदुवंश सहाय द्वारा रचित ‘महर्षि दयानन्द’ नामक ग्रन्थ की भूमिका-रूप में लिखे गए उनके इस लेख से हमारे ऋषि भक्त पाठक लाभान्वित हों, अतः इसे हम उक्त ग्रन्थ से साभार उद्धृत कर रहे हैं।    – समपादक

पिछले अंक का शेषभाग…..

वस्तुतः वैदिक संस्कृति में स्वस्थ और स्वच्छन्द जीवन के ऐसे मूल्यों की प्रतिष्ठा रही है, जो व्यक्ति और समाज, व्यक्ति और परिवार, परिवार और समाज, व्यक्ति और राष्ट्र, व्यवहार और अध्यात्म, आत्मा और ब्रह्म के उचित सन्तुलन पर प्रतिष्ठित हैं। व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास की पूरी संभावनाएँ समाज की व्यवस्था में समाहित रही हैं और समाज की गति तथा सर्जन शीलता को सुरक्षित रखने के लिए व्यक्ति दायित्व-बोध तथा आत्मानुशासन की प्रक्रिया से अपनी रचनात्मक क्षमता को समृद्ध बनाता रहा है। निश्चय ही संस्कृति की यह परिकल्पना भारतीय जीवन की नये स्तर पर संघटना तथा संरचना के लिए आकर्षक थी और इस भूमि पर भारतीय व्यक्तित्व को नये सन्दर्र्भों से जोड़ पाना अधिक उचित था। स्वामी दयानन्द के सामने यही संकल्प था कि भारतीय समाज अपनी तत्कालीन अधोगति से मुक्त होकर किसी प्रकार स्वस्थ होकर नई रचनात्मक क्षमता से गतिशील हो सके। उन्होंने स्पष्टतः इस समाज के पतन तथा ह्रास के कारणों को समझा और विवेचन किया। जैसा कहा गया कि मध्ययुगीन ब्राह्मणवाद, पुरोहितों-महन्तों का निहित स्वार्थ, पुराण-पंथ, धर्म और दर्शन की एकांगिता तथा आध्यात्मिक साधनाओं की व्यक्तिनिष्ठा आदि कारणों का विवेचन करके दयानन्द ने इनका घोर विरोध किया। परन्तु भारतीय समाज के प्रचलित अन्ध्विश्वासों, अन्यायों, रूढ़ियों, कुरीतियों तथा जड़ताओं के कारण पश्चिमी संस्कृति से आकर्षित नेताओं के समान उन्होंने समस्त भारतीयता अथवा भारतीय संस्कृति को उपेक्षणीय तथा अविकसित नहीं मान लिया। उन्होंने भारतीय संस्कृति के आदिस्रोत तक जाकर उसकी आन्तरिक शक्ति और ऊर्जा का अन्वेषण किया और फिर उन तत्त्वों के संयोजन के आधार पर भारतीय व्यक्तित्व को पुनः प्रतिष्ठित करने का अथक प्रयत्न किया। वस्तुतः दयानन्द आधुनिक भारत की समस्त अपेक्षाओं से भली भाँति परिचित थे और उनमें से प्रत्येक को सामने रखकर भारतीय समाज के पुनर्गठन का कार्य उन्होंने शुरू किया था।

भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के नेताओं ने, मुखयतः गाँधी ने देश का आह्वान करते समय अपने समाज की जिन समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित किया है और समाज के जिन क्षेत्रों में रचनात्मक कार्य के द्वारा गति प्रदान करने की चेष्टा की है, उन सभी समस्याओं को स्वामी दयानन्द ने बहुत बल देकर सामने रखा था और सभी क्षेत्रों में कार्य करना शुरू किया था। एक भी ऐसी समस्या नहीं है, जिसकी ओर उन्होंने संकेत न किया हो और कोई ऐसा क्षेत्र नहीं, जिसे उन्होंने छोड़ा हो। समाज के वर्ण-भेद, उनकी असमानता, उनमें छुआछूत, जन्म से वर्णों के विभाजन आदि के बारे में दयानन्द ने अपने प्रखर विचार रखे थे। उन्होंने इस प्रकार की असमानता को, छुआछूत को, जन्म से वर्ण के निर्धारण को धर्म-विरुद्ध और असत्य प्रतिपादित किया, परन्तु उन्होंने कर्म पर आश्रित वैदिक वर्ण-व्यवस्था की स्वीकृति दी है। हम आधुनिकता के समर्थक यह कह सकते हैं कि कर्म पर आश्रित वर्ण-व्यवस्था को स्वीकार कर लेना एक प्रकार का समझौता है, क्योंकि इस प्रकार हम दूसरे मार्ग से पर परम्परित वर्ण-व्यवस्था का समर्थन करते हैं, परन्तु स्थिति का यथार्थ-विवेचन करने से पता चलता है कि जिन्होंने वर्ण-व्यवस्था को पूरी तरह अस्वीकार करने की घोषणा की है, उन्होंने अपने जीवन में अभी तक जातिवाद को बहुत महत्त्व दे रखा है। भारतीय राजनीति के विभिन्न स्तरों पर जातिवाद का कितना प्रभाव है, इससे यह प्रमाणित होता है। गाँधी ने सन्त भाव से निम्न जातियों को ‘हरिजन’ कहा, पर ‘हरिजन’ शबद ‘अछूत’ के समान एक पर्याय मात्र बन कर रह गया। इसकी तुलना में दयानन्द की दृष्टि अधिक स्पष्ट थी। पहले तो उन्होंनें कहा कि समाज के विविध अंग रूप उसके वर्णों में ऊँच-नीच का भाव ही अधर्म है, क्योंकि अंगों का ऊँचा-नीचा स्थान उनकी श्रेष्ठता का निर्धारक नहीं हो सकता। यह कहना नितान्त मूर्खता है कि पैरों से हाथ इसलिए श्रेष्ठ हैं, क्योंकि प्राणी के खड़े होने पर वे ऊपर स्थित होते हैं। समाज की व्यवस्था और सन्तुलन के लिए कार्यों का विभाजन किसी न किसी रूप में अनिवार्य है, पर कार्य के समपादन की क्षमता जन्मतः सिद्ध नहीं हो सकती, अतः वर्ण का जन्म से कोई समबन्ध नहीं है। इस प्रकार के तर्क और व्यवस्था में कितना बल है, यह स्पष्ट है। साथ ही दयानन्द ने वर्ण-व्यवस्था के नाम पर जो सामाजिक अन्याय हो रहा था, उसका बड़ा विरोध किया था और इस विद्रोह भाव को समाज की नई रचना में समाहित करने का प्रयत्न भी किया था। बाद के समन्वयवादियों के दृष्टिकोण से उनका विचार कहीं अधिक क्रान्तिकारी रहा है। यह अलग बात है कि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के प्रयोग से जिस प्रकार की औद्योगिक और यांत्रिक प्रगति हो रही है, उसमें समाज-रचना का स्वरूप ऐसा बदल रहा है, जिसमें पिछली कर्माश्रित वर्ण-व्यवस्था असंगत हो गई है।

स्वामी दयानन्द ने सत्य धर्म एक ही माना है और उनकी दृष्टि में वह धर्म वही हो सकता है जो श्रेष्ठ मानव मूल्यों की रचनात्मक प्रक्रिया को गतिशील रखने में सक्षम हो सके। बाद  के समन्वयवादियों और अन्तर्राष्ट्रीयतावादियों ने दयानन्द को कट्टर पंथी और खण्डन-मण्डन करने वाले सुधारक के रूप में प्रस्तुत करने की चेष्टा की है, परन्तु वस्तु स्थिति यह है कि उनके जैसा उदार मानवतावादी नेता दूसरा नहीं रहा है। उन्होंने धर्म की सदा भारतीय व्यापक परिकल्पना सामने रखी है। वे धार्मिक समप्रदायों को अस्वीकार कर शुद्ध मानव मूल्यों पर प्रतिष्ठित धर्म को स्वीकार करने के पक्ष में रहे हैं। सन्तों का दृष्टिकोण मुखयतः आध्यात्मिक जीवन तक सीमित था, जब कि दयानन्द के सामने भारतीय जन-समाज के सर्वांगीण विकास का लक्ष्य था।उन्होंने धर्म के निरर्थक कर्मकाण्डों के नाम पर चलाई गई कुरीतियों, अन्धविश्वासों, जड़-पूजाओं और मान्यताओं का घोर विरोध किया है। उन्होंने वस्तुतः जब कभी हिन्दू, मुसलमान या ईसाई धर्म का खण्डन किया है तो स्पष्टतः उन्होंने असत्य, अन्धविश्वास और जड़मान्यताओं का उल्लेख किया है और यह भी उन्होंने बार-बार घोषित किया है कि सभी धर्मों के मूल में शुद्ध मानव धर्म के तत्त्व विद्यमान हैं। यहाँ तक कि उन्होंने कई अन्य धर्म के नेताओं से प्रस्ताव भी किया कि सममिलित रूप से धर्म के मूलतत्त्वों पर विचार करके उन्हें निर्धारित कर लिया जाय और फिर सभी धर्म के नेता उन्हें स्वीकार करके उनका प्रचार-प्रसार करें। उनके मन में धर्म को लेकर कभी कोई दुराग्रह या पक्षपात नहीं रहा, उन्होंने सदा धर्म के श्रेष्ठ तत्त्वों पर ही बल दिया है। एक तथ्य की ओर ध्यान देना आवश्यक है। दयानन्द की प्रमुख चिन्ता भारतीय समाज के पुनरुद्धार की थी। उनके मन में उस समाज की अवस्था से अत्यन्त व्यथा थी। वे उसमें प्रचलित अन्धविश्वास, अन्याय, शोषण तथा नृशंसताओं से मर्माहत हो गये थे। क्रमशः उनको बोध हुआ था कि इस समाज की सदा से ऐसी अवस्था नहीं रही है। एक समय यह समाज मानव मूल्यों का वाहक रहा है, अतः उनका पहला संकल्प भारतीय व्यापक हिन्दू जन-समाज के उद्धार का था और उसके लिए उन्होंने हिन्दू धर्म की जड़ताओं पर सर्वाधिक प्रहार किया है। उनका विश्वास था कि इस आघात के बिना असत्य के मार्ग पर चलने वाले हिन्दू समाज के उद्धार का कोई उपायन हीं है। उनका सबसे बड़ा विरोध पौराणिकों, ब्राह्मण-पुरोहितों और आडमबर फैलाकर जनता को गुमराह करने वाले संन्यासियों से था और दयानन्द के विरुद्ध यह निहित स्वार्थों का वर्ग ही सदा रहा। वस्तुतः इस्लाम और ईसाई धर्म की आलोचना उन्होंने प्रासंगिक रूप में की है, क्योंकि हिन्दू धर्म के अन्धविश्वास आदि की आलोचना करके ये धर्मावलबी हिन्दुओं को मत-परिवर्तन के लिए प्रेरित करते थे, इस कारण दयानन्द ने यह प्रतिपादित किया है कि इन सभी धर्मों में हिन्दू-धर्म के समान अन्धविश्वास और जड़ताएँ प्रचलित हैं।

उनका धार्मिक उद्देश्य बहुत ऊँचा था। वस्तुतः उन्होंने संसार के सामने दो महत्त्वपूर्ण बातें रखी थीं। एक तो उन्होंने प्रतिपादित किया कि मूल सत्य तथा मानवीय मूल्यों की सर्जनशीलता से प्रेरित एक ही धर्म है। यह धर्म तत्त्व (अथवा ये तत्त्व) संसार के सभी श्रेष्ठ धर्मों के मूल में निहित है। यह धर्मों की सामप्रदायिकता है जो उन्हें अलग रूपों में प्रकट करती है। इसके साथ अनेक निहित स्वार्थ जुट जाते हैं और धर्म में अन्धविश्वासों तथा जड़ताओं का आश्रय लेकर असत्य का प्रवेश होता है। उन्होंने इसीलिए बार-बार प्रस्ताव किया कि सभी धर्म के लोग शुद्ध मानवीय धर्म का पालन कर सकते हैं, क्योंकि किसी धर्म का इससे विरोध नहीं हो सकता है और स्थान-स्थान पर यह स्वीकार किया है कि कोई भी धर्मावलमबी आर्य-धर्म अर्थात् श्रेष्ठ मानव धर्म का पालन कर सकता है। वस्तुतः उनके लिए ‘आर्य’ शबद किसी सामप्रदायिक धर्म का पर्याय कभी नहीं बना, यह उनके द्वारा ‘आर्य समाज’ की स्थापना से भी सिद्ध है। ‘आर्य समाज’ कभी किसी धर्म का रूप नहीं ले सका, यह उनकी इच्छा और विश्वास का ही परिणाम था। आज कल भारतीय राजनीति में धर्मनिरपेक्षता की चर्चा काफी होती है, परन्तु उसकी विडमबना भी स्पष्ट है। स्वामी दयानन्द ने मानव मूल्यों पर प्रतिष्ठित धर्म की जो व्यापक तथा सर्जनशील व्याखया की थी, वह आज के भारत में अनेक धर्मो के स्वस्थ, सहज और रचनात्मक समन्वय की उचित भूमिका है।

स्वामी दयानन्द ने समाज में स्त्री के स्थान पर विशेष ध्यान दिया था। वे पुरुष के साथ नारी की समानता का पूर्ण समर्थन करते हैं। भारतीय समाज की हीनावस्था का एक महत्त्वपूर्ण कारण उनके अनुसार यह भी है कि इस समाज में नारी का सममानपूर्ण स्थान नहीं रह गया है। वे नारी और पुरुष के अधिकारों की पूर्ण समानता स्वीकार करते हैं, पर दोनों के कार्य-क्षेत्र का विभाजन मानते हैं। आज के बदलते हुए समाज में स्त्री-पुरुष के कार्य-क्षेत्रों का अलगाव संभव नहीं रह गया है, परन्तु इससे दयानन्द के विचारों को संकुचित नहीं माना जा सकता और न उनकी क्रान्तिकारिता पर प्रश्न किया जा सकता है, क्योंकि इस प्रकार जो समाज आज बनता जा रहा है, वह अपने आप में परिस्थिति की उपज है, उसे आदर्श समाज कहना विवादास्पद है। स्त्री-शिक्षा, बाल-विवाह, विधवा-विवाह, वेश्या-उद्धार आदि अनेक समस्याओं को दयानन्द ने अपने युग के सर्न्दभ में उठाया था और उनका उचित समाधान प्रस्तुत किया था। आज ये प्रश्न हमारे लिए अमहत्त्वपूर्ण हो गये हैं, परन्तु जिस साहस और दृढ़ता के साथ उन्होंने इन समस्याओं का समाधान समाज के सामने रखा था, उससे उनके व्यक्तित्व की क्रान्तिकारिता लक्षित होती है और उनका द्रष्टा रूप भी सामने आता है।

एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष है जो स्वामी दयानन्द के व्यक्तित्व को सूक्ष्मता से उद्घाटित करता है। उन्होंने धर्म को मूल्य के स्तर पर ग्रहण किया है, उससे सामप्रदायिक व्यवस्था और कर्मकाण्डी पक्ष को बिल्कुल अलग कर दिया है, अतः धर्म संस्कृति के उच्चतम मूल्यों के स्तर को स्थापित करता है। जिस प्रकार संस्कृति के अन्तर्गत सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक स्तरों के मूल्यों का संचरण होता है, उसी प्रकार सूक्ष्म स्तर पर धार्मिक, कलात्मक तथा आध्यात्मिक मूल्यों की उपलबधि का क्षेत्र भी संस्कृति है। इस प्रकार संस्कृति मानवीय मूल्यों की सर्जनशीलता की दृष्टि से अधिक व्यापक है। दयानन्द का सारा प्रयत्न इस प्रकार सांस्कृतिक पुनरुत्थान से सबन्धित है। उनके लिए धर्म उसी सीमा तक महत्त्वपूर्ण है, जहाँ तक वह सांस्कृतिक मूल्यों के क्षेत्र में एक भूमिका प्रस्तुत करता है। यही कारण हे कि उनके दृष्टिकोण में संस्कृति के सभी स्तरों का समाहार है और उन्होंने भारतीय जीवन के सभी पक्षों तथा स्तरों के मूल्यों का इस प्रकार निरूपण किया है, जिससे उसका एक व्यापक तथा संश्लिष्ट सांस्कृतिक स्वरूप लक्षित होता है। इसके अन्तर्गत सामाजिक आचार, नैतिक आदर्श, व्यक्तित्व की स्वाधीनता और प्रतिष्ठा, लोकजीवन में समत्व, राजनीतिक आदर्श व्यवस्था, राजतंत्र की लोकसत्तात्मक तथा समत्वमूलक परिभाषा, लोकोन्मुखी तथा सामयवादी अर्थतंत्र आदि के समस्त मूल्यों का प्रतिष्ठान वेदों को अवश्य माना तथा प्रमाणित किया है, परन्तु इनकी व्याखया आधुनिक जीवन के अनुरूप की गई है। साथ ही द्रष्टा के रूप में दयानन्द ने इन समस्त मूल्यों को संस्कृति के मर्म तथा अध्यात्म समबन्धी उच्च भूमियों पर प्रतिष्ठित कर तत्समबन्धी उच्च मूल्यों में उनका संक्रमण किया है। गाँधी ने अपने सत्य और अहिंसा जैसे मूल्यों में व्यावहारिक तथा पारमार्थिक मूल्य-दृष्टियों का समाहार किया है और भौतिकतावादी तथा अध्यात्मवादी एकांगी संस्कृतियों की तुलना में गाँधी के सांस्कृतिक संतुलन को बहुत महत्त्व मिला है, पर यहाँ ध्यान देने की बात है कि दयानन्द ने लौकिक तथा आध्यात्मिक जीवन के मूल्यों के पारस्परिक अन्तःसमबन्ध को जितनी स्पष्टता के साथ प्रतिपादित और विवेचित किया है, वह अन्यत्र नहीं मिलता। वस्तुतः जीवन्त, सप्राण, गतिशील तथा सर्जनात्मक संस्कृति में इन दोनों पक्षों का समाहार और उनके मूल्यों का अन्तः संक्रमण अनिवार्य है। स्वामी दयानन्द ने संस्कृति के इसी रूप की परिकल्पना की है और उनकी दृष्टि में यही भारतीय संस्कृति का सच्चा स्वरूप है। उनकी संस्कृति समबन्धी अवधारणा के आधार पर समाज के भारतीयकरण के प्रश्न का समुचित उत्तर दिया जा सकता है।

स्वामी दयानन्द आधुनिक युग में ऋषि और द्रष्टा माने जायँगे। उनमें जितनी गहरी यथार्थ की पकड़ थी, उतनी ही व्यापक इतिहास और परमपरा को ग्रहण करने की क्षमता भी। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने समाज की प्रक्रिया को तथा उसके भविष्य की संभावनाओें को पहचाना और फिर उसको एक स्वस्थ और सर्जनशील समाज-रचना की ओर उन्मुख करने का प्रयत्न किया। कोई भी परिकल्पना युग के साथ, परिस्थितियों के सन्दर्भ में परिवर्तित होती है। इस दृष्टि से स्वामी दयानन्द की भारतीय समाज की नयी रचना की परिकल्पना में भी आज अन्तर पड़ जाना स्वाभाविक है, पर उनका भारतीय समाज की वर्तमान स्थिति का निदान आज भी उतना ही सटीक है। उनकी समाज-रचना की परिकल्पना भी बहुत कुछ आज स्वीकार की जा सकती है, क्योंकि उनकी सांस्कृतिक मूल्यों की अवधारणा मानव धर्म की व्यापक प्रतिष्ठा तथा सर्जन शीलता से समबन्धित है। परन्तु इन से भी अधिक महत्त्व की बात है उनके व्यक्तित्व की क्रान्तिकारिता, जो असत्य और अन्याय के सममुख अडिग खड़े होने की क्षमता प्रदान करती है और जिसके कारण उन्होंने कभी विश्व में समझौता नहीं किया। आज यह स्पष्ट हो गया है कि समस्त देशी-विदेशी पुराण-पंथ के विरुद्ध सतत विद्रोह करने के लिए ऐसे क्रान्तिकारी व्यक्तित्व की देश को सर्वाधिक आवश्यकता है। इसके बिना देश का कोई भविष्य नहीं है।

-इलाहाबाद विश्वविद्यालय