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मनुष्य और अनेक प्राणी योनियों में जीवात्माओं के जन्म का कारण’ -मनमोहन कुमार आर्य

ओ३म्

यदि हम अतीत की बातें छोड़कर वर्तमान संसार में विद्यमान मनुष्यादि अनेक प्राणी योनियों में जीवात्माओं के जन्म पर विचार करें तो हम देखते हैं कि सभी प्राणियों में जन्म व मृत्यु का सिद्धान्त काम कर रहा है। हमसे पहले व बाद में जन्में अनेक मनुष्य और अन्य प्राणियों को हमने समय समय पर मरते हुए देखा है। सृष्टि की आदि से वर्तमान समय तक अनेक प्राणी योनियों में अनन्त संख्या में प्राणियों के जन्म हुए हैं, सब अपना जीवन काल पूरा करते हैं और उसके बाद सभी प्राणियों की मृत्यु हो जाती है। इससे यह सिद्धान्त बना है कि जन्म लेने वाले सभी प्राणियों की कुछ समय व वर्षों के बाद मृत्यु अवश्यमेव होती है। वेद, शास्त्र और कर्म-फल विज्ञान के विशिष्ट ज्ञाता हमारे ऋषियों ने यह सिद्धान्त दिया है कि मनुष्य व अन्य प्राणियों के अपने किसी जन्म में मृत्यु से पूर्व तक किये गये शुभाशुभ कर्मों, जिनका फल भोगा नहीं गया हो, उनको भोगने के लिए नाना योनियों में जीवात्माओं के जन्म होते हैं। इस कारण से भिन्न जन्म का अन्य कोई कारण नहीं हो सकता। जो लोग इस सिद्धान्त को नहीं मानते उन्हें विचार करना चाहिये कि इस संसार में हमें सर्वत्र नियम देखने को मिलते हैं। ऋतु परिवर्तन नियमों के अनुसार होता है, ब्रह्माण्ड के सभी पिण्ड गतिशील हंै जो कि विज्ञान के नियमों के अनुसार हो रहा है। इन नियमों का आधार व आदि कारण ईश्वर व परमात्मा है। अति सूक्ष्म एक परमाणु तक में भी विज्ञान के नियमों के अनुसार गति व क्रियायें होती हैं तो फिर मनुष्य का जन्म व मरण का कारण भी अवश्य ही किसी सिद्धान्त व नियम पर आधारित है, यह ज्ञात होता है। ऋषियों ने अपनी साधना व गहन चिन्तन से कर्म-फल सिद्धान्तों पर विचार किया और वेद व अन्य ऋषियों के बनाये शास्त्रों के आधार पर यह निश्चित किया है कि किसी भी मनुष्य व प्राणी के पूर्वजन्मों के शुभ व अशुभ कर्म ही इस मनुष्यादि जन्म के कारण हैं। यह सिद्धान्त पूर्ण युक्तिसंगत एवं ज्ञान-तर्क-विज्ञान से युक्त व पोषित है। इसमें अन्धविश्वास व अज्ञान जैसी कोई बात नहीं है। जिनको यह सिद्धान्त समझ में नहीं आता व जो इसे नहीं मानते उन्हें इस सिद्धान्त का अधिक अध्ययन, विचार व चिन्तन करने की आवश्यकता है।

 

मनुष्य व सभी प्राणियों के जन्म में जीवात्मा, ईश्वर सहित प्रकृति की भी भूमिका है। ईश्वर हमें जन्म देने वाली सत्ता का नाम है। जिस प्रकार माता-पिता मनुष्य आदि के जन्म में अपनी भूमिका निभाते हैं, उसी प्रकार ईश्वर भी मृत्यु के पश्चात जीवात्मा को उसके कर्मानुसार माता-पिता का चयन कर उनसे जीवात्मा के जन्म की प्रक्रिया पूरी कराता है। यदि परमात्मा यह कार्य न करे तो कोई भी जीवात्मा जन्म न ले सके। जीवात्मा तो जन्म की इस पूरी प्रक्रिया में घटने वाली घटनाओं व क्रियाओं से पूरी तरह अपरिचित व अनभिज्ञ रहता है। ईश्वर अपने विधान के अनुसार जीवात्मा को एक शरीर से निकाल कर उसके भावी माता-पिता के शरीर में प्रविष्ट कराता व उनसे उसे जन्म दिलाता है। जन्म होने के बाद से जीवात्मा का शरीर वृद्धि को प्राप्त होता है और माता-पिता-आचार्यों व विद्वानों से ज्ञान अर्जित कर वह जीवात्मा वा मनुष्य शुभाशुभ कर्मों में प्रवृत्त रहकर अपने पूर्वजन्म के अवशिष्ट कर्म=प्रारब्ध को सुख व दुःख के रुप में भोगता है। लगभग ऐसी ही स्थिति मनुष्येतर सभी प्राणियों के साथ होती है। इससे यह निश्चित है कि मनुष्य योनि में जीवात्मा के कर्म ही उसके भावी जन्म की नींव का कार्य करते हैं और उनके भोग व नवीन कर्मों से भावी जन्म के लिए आधार बनता है।

 

मनुष्य के जन्म व मृत्यु का कारण जान लेने पर ईश्वर व जीवात्मा के स्वरूप को भी जानना चाहिये। ईश्वर के बारे में सारे संसार में नाना प्रकार की अज्ञानजनित भ्रान्तियां हैं। इन भ्रान्तियों के कारण मनुष्य अपने जीवन के उद्देश्य के यथार्थ ज्ञान से भी दूर अर्थात् भटकाव की स्थिति में रहता है। ईश्वर, जीव व प्रकृति के सत्य स्वरुप का ज्ञान हो जाने पर मनुष्य अपने कर्तव्य व अकर्तव्यों को जानकर अपने जीवन के उद्देश्य को भी समझ सकता है जिससे वह उद्देश्य के अनुरुप कर्मों को करते हुए सुखों का भोग करे और मृत्यु के पश्चात उसको उसका प्रमुख उद्देश्य वा लक्ष्य मोक्ष प्राप्त हो जाये। प्रथम ईश्वर के स्वरुप पर विचार कर लेते हैं। ईश्वर मुख्यतः इस सृष्टि की रचना करने, इसका पालन करने और अवधि पूरी होने पर इस सृष्टि की प्रलय करने वाली एकमात्र सत्ता है। सभी जीवात्माओं को जन्म देना भी ईश्वर के ही अधीन है। इसके स्वरुप पर विचार करें तो यह सच्चिदानन्दस्वरूप सिद्ध होती है। यह सत्य अर्थात् सत्तात्मक है, यह तो इस सृष्टि की उत्पत्ति व व्यवस्था से ही सिद्ध है। चेतन होना इसलिए अनिवार्य है कि बिना चेतन तत्व व सत्ता के कोई बुद्धिपूर्ण रचना अस्तित्व में नहीं आती है। संसार में हम अनेक बुद्धिपूर्वक बनाये हुए पदार्थों को देखते हैं। किसी निर्मित पदार्थ को देखकर हमें यह अनुमान नहीं होता कि यह किसी बुद्धियुक्त सत्ता द्वारा बिना विचार किये बनाये जा सकते हैं। हां, यह बात भी है कि कई बार बनाने वाला प्रत्यक्ष होता है और कई बार अप्रत्यक्ष वा दूर। अप्रत्यक्ष निमित्त कारण अर्थात् पदार्थों का निर्माता दो प्रकार का हो सकता है। एक कारण निर्माता की हमसे दूरी हो सकती है जिससे वह हमें दिखाई न दे। रचित पदार्थ का दूसरा कारण ऐसी रचनायें हो सकती हैं जो मनुष्यों व मनुष्यों के समूह से बन ही न सकें। इस श्रेणी में सूर्य, चन्द्र, ब्रह्माण्ड, अग्नि, जल, वायु आदि नाना पदार्थ आते हैं। इन्हें मनुष्यों द्वारा नहीं बनाया जा सकता परन्तु इन्हें भी बनाता कोई अवश्य है क्योंकि इनकी रचना में बुद्धि अर्थात् विचार शक्ति व ज्ञान-विज्ञान का प्रयोग दिखाई देता है। ऐसे सभी पदार्थ अपौरूषेय अर्थात् मनुष्यों से इतर अप्रत्यक्ष अदृश्य ईश्वरीय सत्ता के द्वारा बनाये गये सिद्ध होते हैं। इससे अपौरूषेय सत्ता का चेतन स्वरूपवाला होना सिद्ध होता है। ईश्वर आनन्दस्वरूप है, वह इस कारण से है कि सुख व आनन्द रहित सत्ता कोई छोटा सा भी पदार्थ नहीं बना सकती। इसके लिए उसका दुःख रहित, सुखी व आनन्दित होना आवश्यक है। अतः ईश्वर की तीन विशेषतायें विदित हैं, उसका सत्य, चेतन आनन्द से युक्त होना। उसके अन्य गुणों में उसका निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र, सृष्टिकर्ता होना और जीवात्माओं को कर्मानुसार जन्ममृत्यु प्राप्त कराकर सुख दुःख उपलब्ध कराना है। यह संक्षिप्त स्वरुप ईश्वर का वेद, शास्त्र, ज्ञान, विचार चिन्तन से सिद्ध प्राप्त होता है।

 

जीवात्मा के स्वरुप पर भी संक्षेप में विचार करते हैं। जीवात्मा भी सत्य, चित्त, आनन्द सुख से रहित, इस सुख वा आनन्द के लिए अन्यान्य प्राकृतिक पदार्थों ईश्वर के सान्निध्य का आश्रय लेने वाला, अनादि, अनुत्पन्न, नित्य, अविनाशी, एकदेशी, ससीम, आकाररहित, कर्मानुसार जन्म मृत्यु को प्राप्त होने भिन्नभिन्न प्राणी योनियों में जन्म लेने वाला और इसके साथ ही वेद, शास्त्रों विद्वान आचार्यों की संगति से ज्ञान प्राप्त कर, योगध्यान आदि साधना से ईश्वर का साक्षात्कार कर दुःखों जन्ममरण से छूटकर आनन्द को प्राप्त होने वाली सत्ता, पदार्थ तत्व है। इसका अनुभव हम अपने स्वरुप में स्थित होकर अर्थात् स्व-अस्तित्व का चिन्तन कर प्रत्यक्ष जान सकते हैं।

 

हम अपनी आंखों से संसार व सृष्टि को देखते हैं। यह सृष्टि परमाणुओं से बनी है। यह परमाणु भी सत्व, रज व तम गुणों वाली मूल प्रकृति के विकार हैं। मूल प्रकृति अनादि व नित्य है तथा परिमाण में मनुष्यों की दृष्टि में अनन्त परिमाण वाली है। इन्हीं को परमाणुरूप देकर ईश्वर ने इस जगत को बनाया है। सृष्टि यज्ञ का कर्ता ईश्वर है। इसका सम्पूर्ण विज्ञान उसी को विदित है जिस प्रकार किसी वैज्ञानिक खोज का ज्ञान उसके अन्वेषक को ही होता है। अन्य सामान्यजन तो उसका भोग व उपयोग ही करते हैं परन्तु उसके निर्माण की विधि व प्रयुक्त पदार्थों के गुणों का ज्ञान व बनाने की क्रिया को वह वैज्ञानिक व बुद्धिमान पुरुष ही मुख्यतः जानता है। इस विषय से संबंधित महर्षि दयानन्द के विचार प्रस्तुत हैं। वह लिखते हैं कि प्रकृति, जीव और परमात्मा तीनों अज अर्थात् जिन का जन्म कभी नहीं होता और न कभी ये जन्म लेते अर्थात् ये तीन सब जगत् के कारण हैं, इनका कारण कोई नहीं। उस अनादि प्रकृति का भोग अनादि जीव करता हुआ फसता है और उस में परमात्मा न फसता और न उस का भोग करता है। प्रकृति का लक्षण है, शुद्ध, मध्य, जाड्य अर्थात् जड़ता, तीन वस्तु मिलकर जो एक संघात है, उस का नाम प्रकृति है। उससे महत्तत्व बुद्धि, उससे अहंकार, उस से पांच तन्मात्रा, पांच सूक्ष्म भूत और दश इन्द्रियां तथा ग्यारहवां मन। पांच तन्मात्राओं से पृथिव्यादि पांच भूत, ये चैबीस और पच्चीसवां पुरुष अर्थात् जीव और परमेश्वर है। इनमें से प्रकृति अविकारिणी, और महत्तत्व, अहंकार तथा पांच सूक्ष्म भूत, इन्द्रियां, मन तथा स्थूल भूत, प्रकृति का कार्य और प्रकृति इनका कारण है। पुरुष किसी की प्रकृति, उपादान कारण और किसी का कार्य है। इस विषय में रूचि रखने व अधिक जानने के लिए पाठकों को सत्यार्थप्रकाश, सांख्य व वैशेषिक दर्शन तथा वेद व उपनिषदों का अध्ययन करना चाहिये।

 

इस लेख से यह निष्कर्ष विदित होता है कि मनुष्य व सभी प्राणियों के जन्म का कारण उनके पूर्वजन्म के कर्म हैं जिनका सुख-दुःख रुपी भोग करने के लिए अनेकानेक योनियों में ईश्वर जीवात्माओं को जन्म देता है। मनुष्य का जन्म पूर्व कर्मों के भोग व नये वेदविहित कर्मों को कर मोक्ष की प्राप्ति है। इन्हीं शब्दों के साथ इस लेख को विराम देते हैं।

 

मनमोहन कुमार आर्य

पताः 196 चुक्खूवाला-2

देहरादून-248001

फोनः09412985121

इनको कुछ नहीं कहा जा सकताः-राजेन्द्र जिज्ञासु

इनको कुछ नहीं कहा जा सकताः

दिल्ली के पड़ोस से श्री विजय आर्य नाम के एक युवक ने हमें ‘आर्य संदेश’ के नवबर 2015 के दूसरे अंक में ‘‘सरदार पटेल’’ पर छपे लेख को पढ़कर सत्यासत्य का निर्णय करने को कहा है। प्रश्नकर्त्ता ने कहा है कि लोकप्रिय पुस्तक ‘श्रुति सौरभ’ में पं. शिवकुमार जी ने सरदार पटेल की पुत्री मणिबेन की जो प्रेरणाप्रद घटना दी है, इसे तोड़-मरोड़ कर ‘आर्य सन्देश’ के लेखक ने दिया है। क्या यही धर्म प्रचार है? हमारा निवेदन है कि यह ठीक है कि सत्य कथन को, प्रेरक इतिहास को प्रदूषित करना पाप है, परन्तु हम इन लोगों को कुछ नहीं कह सकते। ये नहीं सुधरेंगे। ‘गुरुमुख हार गयो जग जीता’ इनको कौन रोके? उस समय सरदार के पास महावीर त्यागी बैठे थे। यह लेखक एक क्रान्तिकारी को घसीट लाया है। मणिबेन को इस लेखक ने वहीं चरखा चलाने- सूत कातने पर लगा दिया है। पं. शिवकुमार जी को इतिहास का व्यापक ज्ञान था। इन उत्साही लोगों  को तो अपनाएक इतिहास प्रदूषण महामण्डल रजिस्टर्ड करवा लेना चाहिये।

अंधविश्वास पर चुप्पी क्यों?-राजेन्द्र जिज्ञासु

अंधविश्वास पर चुप्पी क्यों?ः-

 

मन्त्रिमण्डल ने 15 सितबर 1948 को हैदराबाद में पुलिस कार्यवाही का निर्णय लिया था। सरदार पटेल ने 13 को सेना को अपना कार्य करने का आदेश दिया। उस समय का अंग्रेज सेनापति 15 को ही सेना भेजने पर अड़ा रहा। जब सरदार अपने निश्चय पर अडिग रहे तो गोरे सेनापति ने हिन्दुओं के अंधविश्वास का मिजाईल चलाकर सरदार का मनोबल गिराने की चाल चली। उसने कहा, ‘‘13 का अंक अशुभ होता है।’’ लौह पुरुष पटेल बोले, ‘‘तुहारे लिए होगा। मेरे लिए नहीं। मैं गुजराती हूँ। गुजरात में 13 का अंक शुभ माना जाता है’’। सेना ने उसी दिन हैदराबाद को चारों ओर से घेरकर अपना कार्य आरभ कर दिया। यह घटना सरदार के रियासती विभाग के सचिव श्री मेनन ने अपने ग्रन्थ में दी है।

अब प्रातः से सायं तक टी.वी. पर कई बाबे, कई तिलकधारी ज्योतिषी, काले कुत्ते व शुभ अंकों वाले अंधविश्वास परोसते रहते हैं। हिन्दू-हिन्दू की रट लगाने वाले नेता, प्रवक्ता, साक्षी महाराज  की बयान मण्डली हिन्दुओं के अंधविश्वासों पर चुप्पी साधे रहते हैं। सब दलों के नेता तन्त्र-मन्त्र में विश्वास करते हैं। ये अंधविश्वास देश को डुबोने वाले हैं।

दयानन्द बावनी और उसके रचयिता महाकवि दुलेराय जी

दयानन्द बावनी और उसके रचयिता महाकवि दुलेराय जी :-

महाकवि दुलेराय काराणी भुज-कच्छ में जन्मे एक जैनी समाज सेवी सज्जन हुए हैं। वे गुजराती तथा हिन्दी के जाने माने कवि थे। आपने गाँधी जी पर गुजराती भाषा में बावनी लिखी। आपने एक आर्यसमाजी मित्र श्री वल्लभदास की सत्प्रेरणा से दयानन्द बावनी नाम से एक उत्तम काव्य रचा, जिसे सोनगढ़ गुरुकुल से प्रकाशित किया गया। गुजरात के प्रसिद्ध आर्यसमाजी सुधारक शिवगुण बापू जी भी भुज-कच्छ में जन्मे थे। अहमदाबाद में महाकवि जी श्री शिवगुण बापू जी से मिलने उनके निवास पर प्रायः आते-जाते थे। दयानन्द बावनी का दूसरा संस्करण पाटीदार पटेल समाज ने छपवाया था। इसका प्राक्कथन कवि ने ही लिखा था। इसके विमोचन के अवसर पर आप घाटकोपर मुबई पधारे।

शिवगुण बापूजी के परिवार की तीन पीढ़ियाँ आज भी इस काव्य को सपरिवार भाव-विभोर होकर जब गाती हैं तो एक समा बँध जाता है। इस वर्ष ऋषि मेला पर शिवगुण बापूजी के पौत्र श्री दिलीप भाई तथा उनकी बहिन नीति बेन ने बावनी सुनाकर सबको मुग्ध कर दिया। इसके प्रकाशन की वड़ी जोरदार माँग उठी। श्री डॉ. राजेन्द्र विद्यालङ्कर ने यह दायित्त्व अपने ऊपर लिया है। अगले वर्ष के ऋषि मेला पर श्री शिवगुण बापू की छोटी पौत्री प्रीति बेन से जब आर्यजन बावनी सुनेंगे तो वृद्ध आर्यों को कुँवर सुखलाल जी की याद आ जायेगी।

महाकवि दुलेराय ने महर्षि के प्रति अपनी श्रद्धाञ्जलि में लिखा हैः-

वैदिक उपदेश वेश, फैलाया देश देश

क्लेश द्वेष को विशेष मार हटाया।

सत्य तत्त्व खोल खोल, अनृत को तोड़ तोड़

तेरे मन्त्रों ने महाशोर मचाया।

धन्य धन्य मात तात, तेरा अवतार

होती है भारत मात आज निहाला।

‘आंध्रभूमि’ के सपादक श्री शास्त्री जीः- इस बार ऋषि मेले से ठीक पहले कुछ दुःखद घटनायें घटीं, इस कारण सभा से जुड़े सब जन कुछ उदास थे, तथापि मेले पर दूर दक्षिण से ‘आंध्रभूमि’ के सपादक श्री म.वी.र. शास्त्री जी तथा युवा विद्वान् पं. रणवीर शास्त्री जी के तेलंगाना से अजमेर पधारने पर सब हर्षित हुए। मान्य शास्त्री जी सपादक ‘आंध्रभूमि’ एक कुशल लेखक हैं। स्वामी श्रद्धानन्द जी पर आपके ग्रन्थ ने धूम मचा दी है। अब आप राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने व नवचेतना के संचार के लिए वीर भगतसिंह पर एक ग्रन्थ लिखने में व्यस्त हैं। आर्य जनता की इच्छा है कि इसका विमोचन अगले ऋषि मेला पर हो।

ऋषि भक्त मथुरादास जीःराजेन्द्र जिज्ञासु

ऋषि भक्त मथुरादास जीः ऋषि के जिन अत्यन्त प्यारे शिष्यों व भक्तों की अवहेलना की गई या जिन्हें बिसार दिया गया, परोपकारी में उन पर थोड़ा-थोड़ा लिखा जायेगा। इससे इतिहास सुरक्षित हो जायेगा। आने वाली पीढ़ियाँ ऊर्जा प्राप्त करेंगी। आर्य अनाथालय फीरोजपुर के संस्थापक और ऋषि जी को फीरोजपुर आमन्त्रित करने वाले ला. मथुरादास एक ऐसे ही नींव के पत्थर थे। उनका फोटो अनाथालय में सन् 1977 तक था। मुझे माँगने पर भी न दिया गया। अब नष्ट हो गया है। आप मूलतः उ.प्र. के थे। आप अमृतसर आर्य समाज के भी प्रधान रहे। मियाँ मीर लाहौर छावनी में भी रहे। आपका दर्शनीय पुस्तकालय कहाँ चला गया? स्वामी सर्वानन्द जी महाराज ने इसे देखा था। आप जैनमत के  अच्छे विद्वान् थे। आप हिन्दी, उर्दू दोनों भाषाओं के कुशल लेखक थे। आपने ऋषि जी की अनुमति के बिना ही ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका का सार छपवा दिया। पंजाब में हिन्दी भाषा के प्रचार व पठन पाठन के लिए पाठ्य पुस्तकें भी तैयार कीं। इनका जैनमत विषयक बहुत-सा साहित्य अप्रकाशित ही रह गया। सेवानिवृत्त होने के बाद अपने पैतृक ग्राम सहारनपुर जनपद में रहने लगे। जिस आर्य अनाथालय की देश भर में धूम रही है, राजे-महाराजे जिसे दान भेजते थे, उसके संस्थापक महाशय मथुरादास का नाम ही आर्य समाज भूल गया। वह आरभिक युग के आर्य समाज के एक निर्माता थे।

इन्होंने ऋषि जी को अन्तिम दिनों एक सौ रुपये का मनीआर्डर भेजा था। महर्षि के अन्तिम हस्ताक्षर इसी मनीआर्डर फार्म के टुकड़े पर हैं। यह मनीआर्डर मथुरादास जी ने भेजा था, स्वामी ईश्वरानन्द जी ने नहीं। डॉ. वेदपाल जी के अथक प्रयास से इस भूल का सुधार हो गया। इसके लिए हम डॉ. वेदपाल जी तथा सभा- दोनों को बधाई देते हैं।

असहिष्णुता का मानवीय रोगःराजेन्द्र जिज्ञासु

इन दिनों भारत में असहिष्णुता के मानवीय महारोग पर बड़ा विवाद हो रहा है। अनादि ईश्वर के अनादि ज्ञान वेद के एक प्रसिद्ध मन्त्र में ईश्वर से बल, तेज, ओज, मन्यु व सहनशीलता आदि सद्गुणों की प्रार्थना की गई है। यह मन्त्र महर्षि दयानन्द ने आर्याभिविनय आदि पुस्तकों में दिया है। इससे स्पष्ट है कि असहनशीलता का महारोग मानव जाति के लिए घातक है। हिन्दू हो, मुसलमान हो या ईसाई, सबको इस मानवीय महारोग के कारण को जानकर इसका निवारण करना चाहिये।

हजरत मुहमद को तीन खलीफा हत्यारों ने मार डाला। मारने वाले काफिर नहीं थे। नमाजी मुसलमानों ने उनकी जान ले ली। क्या यह असहनशीलता नहीं थी? इस इतिहास से मुसलमानों ने क्या सीखा? वीर रामचन्द्र व वीर मेघराज की हत्या करने वाले हिन्दू ही थे। उनका दोष दलितोद्धार था। पं. लेखराम जी का वध करने वाले इस कुकृत्य पर आज भी इतराते हैं। क्या यह असहिष्णुता को बढ़ावा देने वाला कु कृत्य नहीं था? महात्मा गाँधी ने महाशय राजपाल द्वारा प्रकाशित रंगीला रसूल पर विपरीत टिप्पणी करके असहिष्णुता को उत्तेजित किया या नहीं? काशी के राजा काशी शास्त्रार्थ के अध्यक्ष थे, परन्तु सभा विसर्जित राजा ने नहीं की। सभा विसर्जित करने वालों की कृपा से हुल्लड़ मचा। इस असहिष्णुता पर किसने पश्चात्ताप किया? चलो! जनूनी राजनेताओं को इतनी समझ तो आ गई कि असहिष्णुता एक महामारी है। गुरु अर्जुनदेव जी से वीर हकीकतराय व स्वामी श्रद्धानन्द जी महाराज तक सब असहिष्णुता के शिकार हुए।

Did the Aryans really come from outside India?: Dr. Dharmveer

The leader of opposition in Loksabha (lower house of the parliament), Mallikarjun Khadge in a recent debate said that the Aryans invaded India 5000 years ago and have been exploiting the dalits ever since. He also proclaimed that the dalits would continue the struggle against the Aryans. He also declared BJP to be a party of the outsiders who is ruling India. No one can understand the gravity of this falsehood better than the Arya Samaj. MP Swami Sumedhanand deserves commendation for having contested Khadge’s claim by protesting it in writing and getting it removed from the day’s  proceedings.

 

It was not the first time that this issue was raised in the parliament. Many years ago, an Anglo Indian remember of the Rajya Sabha (Upper house of the parliament) had raised a similar issue. No one had however understood the gravity of the situation at that time. The honorable member had said that the Indians should not consider English to be a foreign language. Indians love Sanskrit which is a language of the Aryans who too had come from outside India. When they love Sanskrit why do they dislike English and consider it to be a foreign language?

 

The theory of Aryan invasion in India is the result of British creativity to divide and rule the country.  Before the British the Muslims had invaded India and enslaved it. They used force to destroy its culture, beliefs and traditions.  The British however adopted a systematic and organized intellectual approach to achieve the same objective. Malikarjun Khadge is a victim of that same conspiratorial approach. The West is still active in its efforts to break India. Religious conversions by Muslims and Christians one hand and Naxalite and Maoist violence on the other are active in creating an atmosphere of anarchy and instability in the country. In the name of spreading modern values and trade they are destroying the moral and the cultural fabric of the society. The Aryan- Dravidian conflict is also one such approach to break India. It is a systematic effort by the West and the church to divide India into a “ Christian Nation, a Muslim nation and a Dravid nation”.  However the purpose of this discourse is the “ Aryan Invasion theory” and why it should be debunked. The Aryan invasion theory should have been quashed right at the time of independence. But for over 60 years the administration was in the hands of “ Mr. Khadge”s Party” which had considered the destruction of India, its beliefs, its traditions and its language as its primary goal. It considered the British and English language the synonym of progress and encouraged the same. Till date the students in India study that the Aryans came from outside, defeated the indigenous people, the Dravidians, drove them to the South and established their rule in India. The lie is so widespread that Congress party’s MP stands as the spokesperson of the theory and believes himself to be a non Aryan.

 

Today India has the opportunity to expunge this false theory from our educational syllabus and remove the words like “ indigenous people or Adivasis (scheduled tribes) from our administration. If Khadge had been different from the Aryans, his name would not have been Mallikarjun. If he considers BJP to be a party of the Aryans the outsiders, then he should see who he represents in the parliament, Sonia Gandhi? Khadge is an Indian and I am sure he loves his motherland, he should also then understand the conspiracy behind it.

 

Before even starting discussing this theory, I would like to mention that the word Arya is qualitative and not casteist. When the Veda says “ Krinvanto Vishwam Aryam”, it means be noble and make the whole world noble. When we wish to make the whole world noble, how does Mr. Khadge plan to remain non noble or non Aryan? The world Aryan and non Aryan is used in context of good and bad people. Manu says that Aryans and dasysus( non Aryans) live in this country. The word dasyu was used for thieves and robbers. Would Mr. Khadge still like himself to be called a non Aryan, considering what the real meaning of the word is? Do thieves and robbers have a separate caste and how can Mr. Khadge want himself to be a representative of thieves and robbers.

 

According to the ancient Indian texts and literature, Aryans are the people who believe in a noble ideology and traditions, who accept Vedas and follow the Vedic tradition. Those who believe this are Aryans and those who do not are the non Aryans. On this principle any one can be an Aryan and anyone can become an Aryan. In the Aryan tradition a wife addressed her husband as “Arya Putra” (son of a noble man). The westerners created the Aryan invasion theory out of thin air with a single objective of creating a rift and dividing the Indian society. This school of thought has long been discarded of scientific factual grounds. The enemies of India however keep raising it again and again to divide the country.

 

This conspiracy was first understood by Swami Dayanand and he contested it in his various texts. He has written that there is no evidence of the Aryans having come from outside in any of our text or literature. If the Aryans had indeed come from outside, a historical event of such great significance would have been recorded somewhere in our history. It is impossible that such an event occurred and there is no trace of it in the history. It is a kind incident that people quote for centuries.  Today if some one take asylum or a there is a terrorist attack, in either case we find the incidents mentioned. In the society there are stories, folklores and traditions. Do we find Aryan traditions anywhere else in the world? Is the language of the Aryans spoken anywhere else in the world? Has there been any evidence that it was spoken in a different part of the world in the past? The answer is a resounding NO.

 

 

Such a big race or tribe such as the Aryans could not have migrated over night from their homeland to India. There should have been evidence of this migration somewhere on the route they might have taken. If they came and conquered India then did they leave all the nations in between unconquered? If they conquered these nations too, then why do we not find any evidence of the Aryan invasion in these countries? Swami Dayanand writes that Aryans were the very first people to have inhabited India. Our texts and Swami Dayanand both believe that at the time of creation of the earth it was all submerged under water. The first part too come out of the water was Tibet and because it was the highest, man first originated there. Humans first came to India from there. They made it their home and from here they spread to other parts of the world. The Aryan invasion theory is false imaginative and at best a conspiracy.

 

All the ancient texts all over the world do not have a single mention of Aryans coming to India from outside. Some of them of course do mention that their ancestors came from India. For example Avesta, the religious and historic text from Iran mentions that their ancestors came from India and settled in Iran. When one race conquers another they commemorate their victory in several ways. They write manuscripts and inscriptions about the event, they erect pillars and stupas to mark the victory. They create history in order to ensure that the event is remembered. We do not find any such evidence in India. This further discredits the Aryan invasion theory. Various Brahman text and Manusmriti mention that Aryans came to India from Tibet and were its first Inhabitants. There is however no mention of the Aryans coming from central Asia and ousting India’s original inhabitants.

 

Are the people who are today called Dalits, Shudras or Scheduled castes really that different from the Aryans? Their clan, traditions, food habits, clothes and ornaments are all the same. Their gods and goddess are also same. They all worship Ram, Hanuman, Shiv and Ganesha. Their fasts, festivals, rite and rituals are also same. Both societies are divided into rich and poor, master and servant on the basis of level of affluence. The society is overall the same. The only difference are in education, wealth, justice and injustice. This is however a feature common to all societies all over the world. The differentiating factor of this society is the evil practice of determining the caste by birth. Because of this ignorance, hypocrisy, divide of low caste and high caste and the practice of untouchability, the British were able to take advantage of this division to spread hostility and malevolence in the country and have been doing it to this date.

 

The British had sent their messenger to Pandit Bhagwadutta to write in his texts that the Jats had come from outside. But Pandit Bhagwadutta had declined this vehemently. Where some people declined to follow the British diktat, there were others who obliged them for money or perks associated with it.

 

Rishi Dayanand understood the the British conspiracy and fought against it with evidence. Manu’s shlokas determine Aryavarta boundary as “ Aasamudrata” which is interpreted as being from Vindhyas/Satpura to the Himalayas. Swami Dayanand interprets it is as being until Rameshwaram. In his chapter on the genesis of the Vedas, Swami Dayandand writes that when we recite the Sankalp path – Aryavarte Jamboo dweepe Bharat Khande” we reiterate as the Aryans being the first people ever to have to come to India and naming it Aryavarta.

 

India was given various names during different phases of history. But there is no evidence of any name being given it before Aryavarta or Brahmavarta. This again proves the Aryan invasion theory to be bogus. The fact that Aryans came to Aryavarta from outside is self contradictory.

 

The reason that Mr. Khadge still quotes this false theory is the propaganda machinery being used to peddle this lie. The reservation system given on the basis of caste is being used as the basis to keep this falsehood alive and burning. Various christian organizations in Europe and America pump large amount of money through various agencies to keep this theory alive. Two such prominent agencies active in India are the BAMCEF – Backward And Minority Communities Employees Federation and the Indigenous Affairs Group. Several universities in Australia, Eurpose and America have set up seats to research the history of the Indigenous “Adivasi” dalit people and try to establish with DNA evidence that the adivasi DNA is different from the Aryan DNA. These organizations use the name of Jyotiba Phule and Dr. Bhimrao Ambedkar to separate this group from the other Hindus. More than 200 books have been published by these organizations and distributed amongst dalits to convince them that they are different from the other Hindus. The objective is to convince the Dalits that they had nothing to do with India’s freedom movement. It was a fight of the high caste hindus for their rights. The British were their saviors who saved them from the oppression of high caste hindus who had been till then exploiting them. Rani Laxmibai of Jhansi, Shivaji or Maharani Pratap were all high caste Hindus fighting for their own rights.  These organizations do not discuss any reform movement by Swami Dayanand, Swami Shraddhanand or the Arya Samaj. They are active in instigating the dalit castes against the so called high caste Hindus. They distribute literature, show various movies to aggravate this divide. They organize seminars in different parts of the country and encouragee Dalits to participate in them. They do not allow people with an alternative view or other caste people to participate in these seminars.

BAMCEF was established in 1973 with American help by the BSP founder Kanshiram and DK Khapde. The objective of this associations to take advantage of the reservation system and increase the divide between the high caste and the low caste. Most of the people are not aware of the activities of this organization and those who are do not give it much importance. However Mr. Khadge through his speech in Loksabha proved that this idea is gaining ground. The society and the government need to be pro active in order to deal with it.

 

 

Sri Ram had said for his homeland India that “ mother and mother land are better than even the kingdom of heaven. Not only this, the Aryans have described India as a land of envy for the gods of heaven. Can a person describe any other country other than his homeland in such beautiful words as these

गायन्ति देवाः किल गितकानि

धन्यास्तु ते भारत भूमिभागे

स्वर्गापवर्गास्पद मार्गभूते

भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्

 

 

The lords of heaven laud those who are lucky to have been born in this divine country which is even better than heaven itself and whose people are better than the gods of heaven.