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ओ3म् जय जगदीश हरे… यह भजन पौराणिक जगत् में आरती के नाम से प्रचलित है। इसके रचनाकार महर्षि के घोरविरोधी पं. श्रद्धाराम फिलौरी हैं, किन्तु आर्य समाज की पुस्तकों में भी यह विद्यमान है। क्या भजन के रूप में इसे आर्य परिवारों में भी बोला जा सकता है? कृपया, समाधान करें।

आचार्य सोमदेव

जिज्ञासाआदरणीय सपादक जी,

सादर नमस्ते।

ओ3म् जय जगदीश हरे… यह भजन पौराणिक जगत् में आरती के नाम से प्रचलित है। इसके रचनाकार महर्षि के घोरविरोधी पं. श्रद्धाराम फिलौरी हैं, किन्तु आर्य समाज की पुस्तकों में भी यह विद्यमान है। क्या भजन के रूप में इसे आर्य परिवारों में भी बोला जा सकता है? कृपया, समाधान करें।

– विश्वेन्द्रार्य, आगरा

समाधान – (क) महर्षि दयानन्द ने अपने जीवन काल में वेद की मान्यता के प्रचार को सर्वोपरि रखा। जो भी महर्षि को वेद विरुद्ध दिखता था, उसका प्रतिकार अवश्य करते थे। कभी महर्षि ने अपने जीवन में वेद विरुद्ध मत के साथ समझौता नहीं किया। जब कभी उनको लगता कि कुछ उनसे गलत हुआ है तो तत्काल अपनी गलती स्वीकार कर तथा उसे छोड़कर आगे बढ़ जाते थे।

जिस समय जयपुर में महर्षि पधारे तो उस समय वैष्णवों का मत अधिक प्रचलित था, उस मत को दबाने के लिए महर्षि दयानन्द ने शैव मत का प्रचार किया और इतना प्रचार किया कि वहाँ के मनुष्यों के गले में रुद्राक्ष तो आये ही आये, ऊँट-घोड़े-हाथी तक को भी रुद्राक्ष पहनाए जाने लगे थे। कालान्तर में महर्षि से किसी ने इस विषय में पूछा तो ऋषिवर ने बड़ी विनम्रता से कहा कि वह हमारी भूल थी, हमें ऐसा नहीं करना चाहिए था। महर्षि दयानन्द तो इस समाज की भूलों को दूर करने में लगे रहे और हम हैं कि इस महर्षि के  भूल रहित आर्य समाज में भूल डालते जा रहे हैं। आर्य समाज के वे तथा कथित उदारवादी सिद्धान्तों से समझौता करने में आगे बढ़-चढ़ कर भाग लेते दिखाई देते हैं। यज्ञ में गणेश पूजा हो रही है कोई बात नहीं, होने देते हैं। किसी की श्रद्धा है तो हम क्यों किसी की श्रद्धा को ठेस पहुँचावे? ये सोच उदारवादियों की है और तिलक लगाना, हाथ पर धागा बाँधना, यज्ञ के बाद प्रसाद के बहाने धन हरण करना आदि। इनके साथ पूर्णाहुति से पहले इस मन्त्र का पाठ किया जाता है-

पूर्णमदः पूर्णमिदम् पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।

इसका भाव तो बहुत अच्छा है कि- वह भी पूर्ण है, यह भी पूर्ण है, पूर्ण से पूर्ण निकलता है। पूर्ण में से समपूर्ण निकाल लें तब भी पूरा रहे, पूरे में पूरा जोड़ दें तब भी पूरा रहे। यह विलक्षण बात परमेश्वर को पूर्ण दिखाने के लिए कहीं गई है, किन्तु यज्ञ की पूर्ण आहुति के समय इसको बोलना, पुरोहितों की स्वच्छन्दता है। वहाँ तो महर्षि दयानन्द ने ‘‘सर्वं वै पूर्णं स्वाहा’’ इस वाक्य से तीन बार पूर्ण आहुति का विधान किया है।

इसी प्रकार पूर्णाहुति के बाद बचे हुए घी को शतधार रूप बनाकर डालने के लिए भी मन्त्र खोज लिया है-

वसोः पवित्रमसि शतधारं वसोः पवित्रमसि सहस्रधारम्।

देवस्त्वा सविता पुनातु वसोः पवित्रेण शतधारेण सुप्वा कामधुक्षः।।

– य. 1.3

इस मन्त्र में ‘‘शतधारम्’’ और ‘‘सहस्रधारम्’’ शबदों को देखकर यज्ञ की समाप्ति पर यज्ञ कुण्ड के ऊपर छेदों वाली छलनी बाँध देते हैं और उसमें घी डालकर शत सहस्र धार बनाते हैं, जो कि इस प्रकार का विधान यज्ञ कर्म में कर्मकाण्ड से जुड़ें ग्रन्थों में नहीं लिखा हुआ है। यहाँ इस मन्त्र में आये ‘शतधारम्’ और ‘सहस्रधारम्’ का अर्थ धारा न होकर दूसरा ही है। इन दोनों का महर्षि दयानन्द अर्थ करते हैं- (धारम्) असंखयात संसार का धारण करने वाला (परमेश्वर)। (सहस्रधारम्) अनेक प्रकार के ब्रह्माण्ड को धारण करने वाला (ईश्वर)। इन दोनों शबदों का अर्थ महर्षि ने इस ब्रह्माण्ड व समस्त चराचर जगत् को धारण करने वाला परमात्मा किया है और ये यज्ञ में घी की धारा लगाने वाले सौ धारा, हजार धारा को लेकर करते हैं जो कि उचित नहीं है।

उपरोक्त यज्ञ में महर्षि की बात को छोड़ स्वेच्छा से किये कर्मों के साथ यह ‘आरती ’ भी ऐसा ही कर्म है। इस ‘आरती’  गाने का निषेध हम इसलिए नहीं कर रहे कि यह ‘आरती’ महर्षि दयानन्द के विरोधी श्रद्धाराम फिलौरी ने लिखी है, निषेध तो इसलिए कर रहे हैं कि इसमें अयुक्त बातें लिखी हुई हैं।

‘जो ध्यावे फल पावे’- इस वाक्य को यदि वैदिक दृष्टि से देखेंगे तो युक्त नहीं हो पायेगा, क्योंकि वैदिक सिद्धान्त में ध्यान मात्र से फल नहीं मिलता, फल के लिए पुरुषार्थ (कर्म) करना पड़ता है। हाँ, यदि ध्यान सत्य परमेश्वर का विधिवत् किया गया है तो मन के शान्ति रूपी फल अवश्य मिलेगा, किन्तु यहाँ तो मूर्ति के सामने आरती गाई जा रही है, उसका फल क्या होगा, आप स्वयं निर्णय करें। आरती में आता है- ‘‘मैं मूरख खल कामी।’’ अब इस वाक्य को बोलने वाले क्या सब कोई मुर्ख, खल और कामी हैं? यहाँ तो इसको बड़े-बड़े सन्त गाते हैं। या तो संत इस बात पर ध्यान नहीं देते अथवा अपने को खल, कामी मानते होंगे। और भी ‘‘ठाकुर तुम मेरे’’ में ठाकुर शबद विष्णु के लिए प्रयोग में आता है, इसका एक अर्थ प्रतिमा भी है। विष्णु जो पौराणिक परमपरा में ब्रह्मा, विष्णु, महेश में से एक हैं। अब यदि ऐसा है तो यज्ञ के बाद वैदिक मान्यता वाले को यह आरती नहीं गानी चाहिए।

यज्ञ के बाद संस्कारों में महर्षि दयानन्द ने वामदेव गान करने को कहा है। यदि हम ऐसा करते हैं तो अति उत्तम है और यदि नहीं कर पा रहे तो उसके स्थान पर वैदिक सिद्धान्त युक्त यज्ञ प्रार्थना आदि भजन गा लेते हैं तो भी ठीक ही है। ‘यज्ञ प्रार्थना’ जैसे उत्तम गीत को छोड़ या उसके साथ-साथ यह अवैदिक आरती गाना युक्त नहीं है, इसलिए आर्य लोग इसको यज्ञ के बाद न अपनावें और न ही अपनी दैनिक नित्य कर्म आदि पुस्तकों में छापें।

पं. श्रद्धाराम फिलौरी जो कि इस आरती के लेखक हैं, के विषय में आर्य जगत् के इतिहास के मर्मज्ञ प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी ने ‘इतिहास की साक्षी’ पुस्तक में विस्तार से बताया है। इनके पत्रों को भी उस पुस्तक में दिया हुआ है, जिससे कि पाठकों को इनकी स्वाभाविक मनोवृत्ति का पता लगे।

वेद उपनिषदों के विषय में इनकी क्या मान्यता रही है, उसे हम यहाँ लिखते हैं- ‘‘संवत् 1932 में मुझे चारों वेदों को पढ़ने और विचारने का संयोग मिला तो यह बात निश्चित हुई कि ऋग्वेदादि चारों वेद भी यथार्थ सत्य विद्या का उपदेश नहीं करते, किन्तु अपरा विद्या को ही लोगों के मन में भरते हैं। हाँ, वेद के उपनिषद् भाग में कुछ-कुछ सत्यविद्या अर्थात् पराविद्या अवश्य चमकती है, परन्तु ऐसी नहीं कि जिसको सब स्पष्ट समझ लेवें। चारों वेद और उपनिषद् का लिखने वाला सत्यविद्या को जानता तो अवश्य था, परन्तु उसने सत्य विद्या को वेद में न लिखना व छिपा के लिखना इस हेतु से योग्य समझा दिखाई देता है कि उस समय के लोगों के लिए वही उपदेश लिखना श्रेष्ठ था।’’ (पुस्तक ‘इतिहास की साक्षी’ से उद्धृत)। इसमें स्पष्ट रूप से फिलौरी जी का वेद के प्रति मन्तव्य आ गया। उनकी मान्यता रही कि वेद सत्य उपदेश नहीं करता। जिसका वेद पर विश्वास नहीं, उसका ईश्वर पर कैसे हो सकता है और वह सिद्धान्त को कैसे ठीक-ठीक प्रतिपादित कर सकता है, जैसा कि उनकी आरती से ज्ञात हो रहा है। अस्तु।

– ऋषि उद्यान, पुष्कर रोड, अजमेर।   

दिल्ली के वे दीवाने धर्मवीरः- प्रा राजेन्द्र जिज्ञासु

दिल्ली के वे दीवाने धर्मवीरः

कुछ पाठकों की प्रेरणा से छोटे-छोटे दो-तीन प्रेरक प्रसंग दिल्ली के इतिहास से देता हूँ। याद रखिये, सिलाई स्कूल, बारात घर, होयोपैथी डिस्पैन्सरी-यह आर्य समाज का इतिहास नहीं। यह कार्य तो रोटरी क्लब भी करते हैं। स्वामी चिदानन्द जी पर दिल्ली में शुद्धि के लिए अभियोग चला। वे जेल गये। यातनायें सहीं। मौत की धमकियाँ मिलती रहीं। कभी दिल्ली में किसी ने उनकी चर्चा की?

दिल्ली में दो स्वामी धर्मानन्द हुए हैं। मेरा उपहास उड़ाया गया कि कौन था धर्मानन्द स्वामी? अरे भाई दिल्ली वालों! आप नहीं जानते तो लड़ते क्यों हो? पं. ओ3म् प्रकाश जी वर्मा, डॉ. वेदपाल जी, श्री विरजानन्द से पूछ लो कि करोल बाग समाज वाले कर्मवीर संन्यासी धर्मानन्द कौन थे। दिल्ली के पहले मुयमंत्री चौ. ब्रह्मप्रकाश ने दिग्विजय जी वाला काम कर दिया। बुढ़ापे में शादी रचा ली। सब लीडर बधाइयाँ दे रहे थे। हमारे स्वामी धर्मानन्द जी पुराने स्वतन्त्रता सेनानी थे। यह उनके घर जाकर लताड़ लगा आये कि यह क्या सूझा?

दिल्ली के पहले आर्य पुस्तक विक्रेता का नाम दिल्ली में कौन जानता है? वह थे श्री दुर्गाप्रसाद जी। पं. लेखराम ला. बनवारीलाल करनाल वालों के संग एक ग्रन्थ की खोज करने निकले। प्रातः से रात तक सारी दिल्ली की दुकानें छान मारीं। आर्य जाति की रक्षा के लिए एक पुस्तक में उसका प्रमाण देना था। अँधेरा होते-होते उन्हें वह ग्रन्थ मिल गया। कुछ और ग्रन्थ भी क्रय कर लिये। पुस्तक विक्रेता थे श्री दुर्गाप्रसाद जी आर्य। वह ताड़ गये कि यह ग्रन्थ तो कोई गवेषक स्कालर ही लेता है। यह ग्राहक कौन है?

पं. लेखराम जी भी दुकानदार को कभी मिले नहीं थे। पन्द्रह रुपये माँग तो लिए फिर पूछा, ‘‘अरे भाई आप हो कौन?’’ साथी ला. बनवारी लाल बोले, ‘‘आप नहीं जानते? यह हैं जातिरक्षक आर्य पथिक पं. लेखराम जी।’’ अब दुर्गाप्रसादजी ने कहा, ‘‘इनसे मैं इनका मूल्य नहीं लूँगा।’’ पं. लेखराम अड़ गये कि ‘‘मैं यह राशि दूँगा और अवश्य दूँगा।’’ मित्रों! तब रुपया हाथी के पैर जितना बड़ा होता था। पण्डित जी की मासिक दक्षिणा मात्र 30-35 रुपये थे। धर्मवीर पं. लेखराम तो धन्य थे ही, कर्मवीर दुर्गाप्रसाद के धर्मानुराग कााी तो कोई मूल्याङ्कन करे।

वीरो! अपना देश बचाओ

वीरो! अपना देश बचाओ

-पं. नन्दलाल निर्भय भजनोपदेशक पत्रकार

आर्यवर्त्त के वीर सपूतो, मिलजुल करके कदम बढ़ाओ।

महानाश की ज्वालाओं से, अपना प्यारा देश बचाओ।।

 

ऋषियों-मुनियों के भारत में, पापाचार गया बढ़ भारी।

डाकू , गुण्डे, चोर सुखी हैं, मस्ती में हैं मांसाहारी।।

शासक दल बन गया शराबी, आज दुःखी हैं वेदाचारी।

रक्षक हैं भारत में भक्षक, जागो! भारत के बलधारी।।

मानवता का पाठ पढ़ाओ, पावन वैदिक धर्म निभाओ।

महानाश की ज्वालाओं से, अपना प्यारा देश बचाओ।।

 

काट-काट बिरवे गुलाब के, यहाँ नागफन सींचा जाता।

डाल-डाल पर बैठे उल्लू, देख-देख माली हर्षाता।।

खाओ-पीओ, मौज उड़ाओ, युवा वर्ग है निश-दिन गाता।

अपमानित हैं यहाँ देवियाँ, सिसक रही है भारत माता।।

राम, भरत के वीर सपूतो! दुःखी जनों के कष्ट मिटाओ।

महानाश की ज्वालाओं से, अपना प्यारा देश बचाओ।।

 

उग्रवाद, आतंकवाद ने, देश हमारा घेर लिया है।

नेता हैं कुर्सी केाूखे, पाप जिन्होंने बढ़ा दिया है।।

देश-धर्म का ध्यान नहीं है, जिनका पत्थर बना हिया है।

वैदिक पथ तज दिया खलों ने, भारत को बर्बाद किया है।।

स्वामी दयानन्द बन जाओ, जग में नाम अमर कर जाओ।

महानाश की ज्वालाओं से, अपना प्यारा देश बचाओ।।

 

गो ब्राह्मण की सेवा करना, ऋषियों ने है धर्म बताया।

गो माता है खान गुणों की, वेद शास्त्रों में दर्शाया।।

लेकिन उनकी शिक्षाओं को, दभी लोगों ने बिसराया।

नकल विदेशों की कर-करके, अपना जीवन नरक बनाया।।

गो हत्या को बन्द कराओ, वीरो! कृष्ण स्वयं बन जाओ।

महानाश की ज्वालाओं से, अपना प्यारा देश बचाओ।।

 

याद रखो! जो देश-धर्म की, श्रद्धा से करते हैं सेवा।

वही भाग्यशाली पाते हैं, कीर्ति सुयश की पावन मेवा।।

डूब रही है नाव धर्म की, पार लगाओ बनकर खेवा।

अगर न जागे नहीं मिलेगा, नाम तुमहारा जग में लेवा।।

‘‘नन्दलाल’’ है भला इसी में, जितना हो शुभ कर्म कमाओ।

महानाश की ज्वालाओं से, अपना प्यारा देश बचाओ।।

– ग्राम व पो. वहीन जनपद पलवल (हरियाणा)  चलभाष – 9813845774

ऋषि की ऊँचाईः-प्रा राजेन्द्र जिज्ञासु

ऋषि की  ऊँचाईः

हमें पहले ही पता था कि इतिहास प्रदूषण का उत्तर तो किसी से बन नहीं पड़ेगा। एक-एक बात का उसमें प्रमाण दिया गया है। विरोधी विरोध के लिए मेरे साहित्य में से इतिहास की कोई चूक खोज कर उछालेंगे। मैं तो वैसे ही भूल-चूक सुझाने पर उसके सुधार करने का साहस रखता हूँ। इसमें विवाद व झगड़े का प्रश्न ही क्या है। पता चला कि कुछ भाई ऋषि की ॥द्गद्बद्दद्धह्ल ऊँचाई का प्रश्न उठायेंगे। फिर पता नहीं, पीछे क्यों हट गये। मैंने निश्चय ही ऋषि को एक लबा व्यक्ति लिखा है। ग्रन्थ में यत्र-तत्र इसके प्रमाण भी दिये हैं। आक्षेप करने वाले ऋषि की खड़ाऊँ के आधार पर उनका कद बहुत बड़ा नहीं मानते। प्रश्न जब पहुँच ही गया है, तो एक प्रमाण यहाँ दे देता हूँ।

लाहौर में एक पादरी फोरमैन थे। वह लाहौर में बहुत ऊँचे व्यक्ति माने जाते थे। एक दिन डॉ. रहीम खाँ जी की कोठी से ऋषि जी समाज में व्यायान देने जा रहे थे। उनका ध्यान सामने से आ रहे पादरी फोरमेन पर नहीं गया। पादरी ने ऋषि का अभिवादन किया तो साथ वालों ने उन्हें कहा कि सामने देखो, पादरी जी आपका अभिवादन करते आ रहे हैं। जब पादरी जी पास आये तो मेहता राधाकिशन (ऋषि के जीवनी लेखक) ने देखा कि पादरी जी ऋषि के कंधों तक थे। अब विरोधी का जी चाहे तो मुझे कोस लें। मैं इतिहास को, तथ्यों को और सच्चाई को बदलने वाला कौन? मैं हटावट, मिलावट, बनावट करके मनगढ़न्त हदीसें नहीं गढ़ सकता। ऋषि जी ने स्वयं एक बार अपनी ऊँचाई की चर्चा की थी। वह प्रमाण हमारे विद्वानों की पकड़ में नहीं आया। ऋषि-जीवन की चर्चा करने वालों को वह भी बता दूँगा। प्रमाण बहुत हैं। चिन्ता मत करें।

ईश्वर अवतार नहीं लेता

ईश्वर अवतार नहीं लेता

– डॉ. ब्रजेन्द्रपाल सिंह

ईश्वर सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, अनादि व अनन्त अजन्मा आदि गुणों वाला है, ऐसा वेद में वर्णन है, परन्तु पौराणिक भाई मानते हैं कि ईश्वर जन्म लेता है, जिसे अवतारवाद कहते हैं। राम को ईश्वर का अवतार मानते हैं, कृष्ण को भी ईश्वर का अवतार मानते हैं। यह भी मानते हैं कि किसी भी रूप में ईश्वर धरती पर जन्म लेकर आता जाता है।

अवतारवाद पूर्णतः वेद विरुद्ध है। वेद में ईश्वर के जन्म लेने व अवतार का कहीं वर्णन नहीं, अपितु वह अजन्मा है, जन्म नहीं लेता, अनादि है। उसका न आदि है, न अन्त है। वह एक स्थान पर नहीं रहता, सर्वव्यापक है, कण-कण में समाया है। हमारे अन्दर बाहर है, आकाश- जल- थल- पृथ्वी- चन्द्रमा- सूर्य और उससे आगे तक भी है, जहाँ हमारा मन नही पहुँचता, वहाँ भी है। पहले से है, सृष्टि की उत्पत्ति से पहले भी रहता है, प्रलय के बाद भी रहता है, सर्वशक्तिमान् है, अपनी शक्ति से ग्रह, तारों को घुमा रहा है। यह सब जगत् उसी का है, उसने ही तो बनाया है, नियम से चला रहा है-

ईशावास्यमिदं सर्वयत्किञ्च जगत्यां जगत्।

तेन व्यक्तेन भुञ्जीथा मा ग्रधः कस्यस्विद्धनम्।।

ईशोपनिषद्

अर्थात् इस संसार में जो भी यह जगत् है, सब ईश्वर से आच्छादित है, अर्थात् ईश्वर सृष्टि के कण-कण में बसा है, सर्वव्यापक है। यह सब धनादि जिसका हम उपयोग कर रहे हैं, सब उसका ही है। हम यह सोच कर प्रयोग करें कि यह हमारा नहीं है। जो कुछ हमें उस प्रभु ने दिया है, उस सबका त्याग के भाव से प्रयोग करें।

सृष्टि में जो कुछ भी है, उसी का है। ग्रह, उपग्रह, पृथ्वी व चन्द्रमा आदि निश्चित वेग से घूम रहे हैं, एक नियम से चक्कर काट रहे हैं, गति कर रहे हैं। समय पर ऋतुएँ आती है, जाती हैं। वह जगत् को नियम में चला रहा है।

वह बिना जन्म लिए ही सब काम कर रहा है। उसे जन्म लेने की क्या आवश्यकता है? कहते हैं, रावण को मारने के लिए राम के रूप में ईश्वर ने अवतार लिया या जन्म लिया- ये सब बातें काल्पनिक हैं, मन गढ़न्त हैं। पूरी सृष्टि को चलाने वाला बिना जन्म लिये ही सब कार्य कर रहा है, सब पर उसकी दृष्टि है, सब देख रहा है। ब्रह्माण्ड में ग्रह तारे सब गति कर रहे हैं, कभी किसी से टकराते नहीं, जैसे कि चौराहे पर ट्रैफिक कण्ट्रोलर यातायात को कण्ट्रोल करता रहता है। यदि यातायात को नियन्त्रण न किया जाय तो यातायात अवरुद्ध हो जाएगा, गाड़ियाँ आपस में टकराएँगी, परन्तु यातायात नियंत्रक के कारण सब ओर की गाड़ियाँ बिना अवरोध के ही आती-जाती रहती हैं। यही प्रक्रिया सृष्टि को चलाने वाले उस परमात्मा की है, वह सबको देखने वाला है, कर्मों के अनुसार फल देने वाला है, जो हम सोचते हैं वह सब जानता है, परन्तु वह भोक्ता नहीं, वह सत्य चेतन आनन्द स्वरूप है। यहाँ जन्म तो वही लेगा, जिसे कर्मों का फल भोगना है। जीव बार-बार जन्म लेता है, मोह माया में बँधा हुआ है। ईश्वर मोह माया में बँधा नहीं, वह तो जगत् नियन्ता है, जगत् को चला रहा है, सबको देख रहा है, अनादि है, अनन्त है। तीन तत्त्व अनादि अनन्त है- परमात्मा, जीवात्मा और प्रकृति –

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते

तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नवन्यो अभिचाक शीतिः।

– ऋग्वेद 1/164/20

यहाँ यही बताया है कि एक वृक्ष पर दो पक्षी बैठे हैं, उनमें एक उस वृक्ष के खट्टे-मीठे फलों का स्वाद चख रहा है, दूसरा उस पक्षी को देख रहा है, स्वाद नहीं चख रहा। आलंकारिक भाषा में यहाँ त्रिविध अनादि तत्त्व ईश्वर, जीव व प्रकृति का वर्णन है। वृक्ष प्रकृति के रूप में दर्शाया है, देखने वाले पक्षी का संकेत ईश्वर के लिए तथा फल खाने वाला पक्षी का जीव की ओर संकेत है। ईश्वर इस प्रकृति में जीव के कर्मों को देख रहा है। वह कर्मों का भोक्ता नहीं है। जब भोक्ता नहीं तो जन्म किसलिए? वह तो सर्वव्यापक विभु है, सर्व शक्तिमान् है, अपनी शक्ति से सृष्टि को चला रहा है। रावण हो या दुर्योधन, सबने अपने कर्मों को भोगा। ईश्वर के अवतार से राम का कोई समबन्ध नहीं। वे कौशल्या के गर्भ से पैदा हुए, संसार में आए और उन्होंने अपने कर्म किए। उनका कर्म उनके साथ था। वे दशरथ के पुत्र थे। ईश्वर किसी का पुत्र नहीं, अपितु सबका पिता है। कर्मफल भोक्ता तो गर्भ में भी रहेगा, जन्म भी लेगा, दुःख भी सहेगा, क्लेश भी सहेगा, माया-मोह के बन्धन में भी रहेगा, मृत्यु भी होगी। यह गुण कर्मफल भोक्ता जीव के तो हैं, ईश्वर के नहीं, अतः राम को ईश्वर बताना न तर्कसंगत है, न युक्ति युक्त। राम दशरथ नन्दन थे, राजा मर्यादा पुरुषोत्तम थे। वेदानुसार चलने वाले थे। उनका जीवन हमारे लिए प्रेरणा प्रदान करता है।

एक ओर हम महापुरुषों को अवतार बताते हैं, दूसरी ओर उनके चरित्र पर लांछन लगाते हैं। जिन राम का हम सुबह-शाम, उठते-बैठते जागते-सोते समय नाम लेते हैं, उनके आचरणों का पालन नहीं करते, उनके जीवन से शिक्षा नहीं लेते। मुँह में पान, तबाकू, बीड़ी, सिगरेट, हुक्का लगा रहता है और राम का नाम लेते हैं। उससे क्या लाभ? राम तो धूम्रपान नहीं करते थे, मद्य नहीं पीते थे, हुक्का, तमबाकृ नहीं लेते थे, फिर हम क्यों करते हैं? हमें इन मादक द्रव्यों को त्याग कर जैसा आचरण राम का भाइयों के साथ माताओं के साथ प्रजा के साथ था, वैसा करना चाहिए। राम मनुष्य थे, राजा थे, कर्त्तव्य परायण थे, माता पिता के आज्ञाकारी थे, धर्म व मर्यादा पालक थे, निराभीमानी थे, प्रजा वत्सल थे, जन-जन के प्यारे थे, वह ईश्वर नहीं थे, अवतार नहीं थे।

हमें सत्यासत्य का विवेकपूर्ण निर्णय लेना चाहिए और अपने सत्याचारी वेदानुयायी महापुरुषों को जैसे थे वैसा ही मानकर उनके सद्गुणों को जीवन में उतारने का प्रयत्न करना चाहिए।

– चन्द्रलोक कॉलोनी खुर्जा (बुलन्दशहर)

मो. 8979794715

ऋषि जीवन-विचारः- प्रा राजेन्द्र जिज्ञासु

ऋषि जीवन-विचारः-

आर्य समाज के संगठन की तो गत कई वर्षों में बहुत हानि हुई है-इसमें कुछ भी सन्देह नहीं हैं। कहीं भी चार-छः व्यक्ति अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिये मिलकर एक प्रान्तीय सभा या नई सार्वदेशिक सभा बनाने की घोषणा करके विनाश लीला आरभ कर देते हैं। इसके विपरीत ऋषि मिशन के प्रेमियों ने करवट बदलकर समाज के लिए एक शुभ लक्षण का संकेत दिया है। वैदिक धर्म पर कहीं भी वार हो, देश-विदेश केााई-बहिन झट से परोपकारिणी सभा से सपर्क करके उत्तर देने की माँग करते हैं। सभा ने कभी किसी आर्य बन्धु को निराश नहीं किया। पिछले 15-20 वर्षों के परोपकारी के अंकों का अवलोकन करने से यह पता लग जाता है कि परोपकारी एक धर्मयोद्धा के रूप में प्रत्येक वार-प्रहार का निरन्तर उत्तर देता आ रहा है।

नंगल टाउनशिप से डॉ. सरदाना जी ने, जंडयाला गुरु आर्यसमाज के मन्त्री जी ने सभा से सपर्क करके फिर इस सेवक को सूचना दी कि एक व्यक्ति ने फेसबुक पर ज्ञानी दित्तसिंह  के ऋषि दयानन्द से दो शास्त्रार्थों का ढोल पीटा है। जब सभा के विद्वानों ने पंजाब की यात्रा की थी, तब जालंधर मॉडल टाऊन समाज में भी डॉ. धर्मवीर जी के सामने ज्ञानी दित्तसिंह के एक ट्रैक्ट में ऋषि से तीन शास्त्रार्थों का उत्तर देने की माँग की थी। मैं साथ ही था। मैंने तत्काल कहा कि परोपकारी में उस पुस्तक का प्रतिवाद दो-तीन बार किया जा चुका है। लक्ष्मण जी वाले जीवन चरित्र के पृष्ठ 268,269 को देखें। यह दित्तसिंह की पुस्तक का छाया चित्र है। इसमें वह स्वयं को वेदान्ती लिखता है। वह सिख नहीं था। उस ट्रैक्ट में किसी सिख गुरु का नाम तक नहीं, न कोई गुरु ग्रन्थ का वचन है।

ऋषि से शास्त्रार्थ की सारी कहानी ही कल्पित है। तत्कालीन किसी ऋषि विरोधी ने भी दित्तसिंह से ऋषि के शास्त्रार्थ की किसी पुस्तक व पत्रिका में चर्चा नहीं की। भाई जवाहरसिंह ने ऋषि के बलिदान के पश्चात् आर्य समाज को छोड़ा । उसने भी दित्तसिंह ज्ञानी के शास्त्रार्थ का कभी कहीं उल्लेख नहीं किया। शेष आमने-सामने बैठकर जो पूछना चाहेंगे उनको और बता देंगे।

ठाकुर मुकन्दसिंह जी की कविताः-प्रा राजेन्द्र जिज्ञासु

ठाकुर मुकन्दसिंह जी की कविताः

ठाकुर मुकन्द सिंह जी ऋषिवर के सबसे पहले शिष्यों में से एक थे और सबसे लबे समय तक ऋषि के सपर्क में रहे। वे एक विनम्र सेवक थे। राहुल जी के पुरुषार्थ से यह तथ्य सामने आया है कि आप एक गभीर विद्वान् व कवि भी थे। आपकी पुस्तक ‘तहकीक उलहक’ के पृष्ठ 317 पर पद्य की ये पाँच पंक्तियाँ छपी हैं। इन्हें ऋषि के प्रति उनकी श्रद्धाञ्जलि समझें।

दयानन्द स्वामी का फैजान1 है, जो लिखी है मैंने यह नादिर2 किताब। मगर क्या करूँ छह बरस हो गये, कि त्यागा उन्होंने जहाने सराब3। दयानन्दी संवत हुए यह नये, इसी में मैं लिखता हूँ साले किताब4 सरे हर बरक से अयाँ साल है, दयानन्दी संवत का है यह हिसाब। सरे वाह गुरुदेव कर दीजिये, तो है दूसरा साल भी लाजवाब।

ऋषि के सबसे पहले शिष्यों में से रचित ऋषि जी पर यह पहली कविता हमारे हाथ लगी है।

जाति पाँति का विषः जातिवाद के विरुद्ध दहाड़ने वाले, दलितों के लिये घड़ियाली आँसू बहाने किसी भी दल व संस्था ने आज पर्यन्त दलितोद्धार के लिए प्राण देने वाले वीर रामचन्द्र, वीर मेघराज, भक्त फूलसिंह आदि का स्मारक बनवाया? उन्हें किसी ने कभी श्रद्धाञ्जलि दी? उनके नाम पर डाक टिकट जारी किया? किसी और संस्था ने दलितों के लिए कोई बलिदान दिया? आज दलित-दलित का शोर मचाने वाले कभी दलितों के लिये पिटे या घायल हुए? राहुल केजरीवाल आज कहीं भी  पहुँच जाते हैं। जब फीरोजपुर के कारागार में नेहरू युग में सुमेर सिंह आर्य सत्याग्रही को पीट-पीट कर मारा गया, तब इन टर्राने वालों के दल व इनके पुरखा कहाँ थे? सज्जनो! देशवासियो!:-

नेहरूशाही ने दण्डा गुदा में दिया,

आप बीती यह कैसे सुनाऊँ तुहें?

आत्म हत्या व जातिवादःआत्महत्याएँ व जातिवाद की महामारियाँ फैल रही हैं। नेता लोग भाषण परोस रहे हैं। सामूहिक बलात्कार की घटनायें नित्य घटती हैं। दलों को, नेताओं को लज्जा आनी चाहिये। हिन्दू धर्म व संस्कृति के नये-नये व्यायाकार महाराष्ट्र में मन्दिर प्रवेश के लिये महिला सत्याग्रह पर आज भी वैसे ही मौन हैं, जैसे साठ वर्ष पूर्व काशी विश्वनाथ मन्दिर में दलितों के साथ प्रवेश करने पर विनोबा जी की पिटाई पर इनके बड़ों ने चुप्पी साघ ली थी। तब केवल आर्यसमाज ने भेदभाव व उस कुकृत्य की निन्दा की थी।

नारी की, कन्याओं की, संस्कृत की व संस्कृति की दुहाई देनेवाले नेता काशी जाते रहते हैं। काशी में कन्याओं के वेदाध्ययन के अधिकार की ध्वजा फहराने वाले और जाति-पाँति का विध्वंस करनेवाले पाणिनि गुरुकुल काशी की इनमें से किसने यात्रा की? इन्हें विवेकानन्द स्वामी तो याद रहते हैं, भेदभाव का दुर्ग ढहाने वाले काशी का यह गुरुकुल दिखाई ही नहीं देता। केजरीवाल भी तो गंगा स्नान का कर्मकाण्ड करके  काशी यात्रा कर आया।

पाद टिप्पणी

  1. उपकार 2. उत्तम, अद्भुत 3. नाशवान, अनित्य 4. पुस्तक लेखन का वर्ष