प्रभु प्रकाश को देखें

औ३म
प्रभु प्रकाश को देखें
प्रभु क प्रकश अपने ही ह्रिदय में होता है । इसे देखने के लिये अपने ही ह्रिदय को टटोलना होता है । हमारे औरस पुत्र हमे अपने आचरण से सुखि करते हुये दिर्घायु हो । इस्बात क प्रकव्ह रिग्वेद के सप्तम मन्दल के प्रथम सुक्त के अन्तर्गत २१वें मन्त्र मे इस प्रकर किया ग्या है : –
त्वमग्ने सुहवो रण्वसद्रि॒वसुदीति सूनो सहसो दिदीह ।
मा त्वे सचा तनये नित्या आ धडमा वीरो अस्मत्रर्योवि दसीत ॥ रिग्वेद ७.१.२१ ॥
हे बल पुत्र, अत्यन्त बलवान, अगेणी प्रभु ! आप को हम सुगमता से पुकार सके, एसे होइये । प्रत्येक प्राणी की सदा ही यह इच्छा रही है कि वह परमपिता की समीपता प्राप्त कर किन्तु पिता उसे सरलता से मिल जावे । इस भाव को ही इस मन्त्र में व्यक्त किया गया है । हे प्रभु आप रमणीय सन्दर्शन वाले होने के कारण आप उत्तम दीप्ति से , उत्तम प्रकाश से दीप्त होयिये । हमारी यह ही प्रार्थना है प्रभु कि हम सदा आप के उत्तम प्रकाश को अपने ह्रिदयों में देख सकें ।
हमारे सहायक होकर आप हमें हमारे औरस पुत्र के समबन्ध मे दग्ध न करें । हम इस औरस सन्तान के व्यवहर से कभी द्ग्ध न हों, दु:खी न हों , परेशान न हों तथा न ही उसके विक्रित व्यवहार से परेशान हों । हमारी यह जो औरस सन्तान है , वह सुशील, सदाचारी तथा योग्य हो तथा हमारे से यह नरहितकारी ,यह वीर सन्तान उपक्शीन मत हो जावे । यह सन्तान दीर्घ जीवी हो , अल्पायु मे ही हमारे से छिन न जावे ।
हम यग्याग्नि को दीप्त करें कभी दुर्मति न हों
इस मन्त्र मे प्रभु से प्रार्थना करते हुये कहा है कि हमें कभी भरण पोषण की कमीं न आवे, यग्यग्नि के माध्यम से देते रहे तथा हम कभी दुर्मति न हों । इस बात को मन्त्र इन शब्दों में कह रहा है : –
मा नो अग्ने दुर्भ्रितये सचैव देवेद्धेष्वग्नि प्र वोच ।
मा ते अस्मान्दुर्मतयो भ्रिमाच्चिद्देवस्यसूनो सहसो नशन्त ॥ रिग्वेद ७.१२२ ॥
यह मन्त्र उपदेश करते हुये कहता है कि हे प्रभु ! हम अपने भरण पोषण के लिये कभी कष्ट में न पडे । हमें कभी दुर्भति के अवस्था में न डालें । भाव स्पष्ट है कि हमें सदा यथावश्यक अन्न आदि प्राप्त होता रहे । इस के साथ ही मन्त्र बता रहा है , उपदेश कर रहा है कि प्रभु आप ही हमारे सहाय भूत हैं , हमारे सहायक हैं , अत: इस नाते आप हमें देवों के द्वारा जलायी गयी इस अग्नि के विष्य में हमें बतायिये, ग्यान करायिये, उपदेश किजिये ताकि हम भी उन देवों की ही भान्ति यग्य की अग्नि को जलाने वाले, प्रज्वलित करने वाले बनें ।
मन्त्र उस पिता को बल का पुन्ज मानते हुये उपदेश करता है, मन्त्र कह रहा है कि हे बल , शक्ति के प्रकाश पुन्ज प्रभु ! हम आप के प्रकाश से प्रकाशित हैं , इस लिये हमें कभी भ्रम से भी किसी प्रकार की दुर्मति न हो , बुरा न सोचें तथा न ही करें । हम सदा उत्तम मतिवाले, उत्तम बुद्धिवाले, उत्तम ग्यान वाले होते हुये यग्य आदि उत्तम कार्यों में व्यस्त रहे, लगे रहें ।

यग्य करते हुये इन्द्रियों को विश्यमुक्त कर पवित्र बनें

यग्य करते हुये इन्द्रियों को विश्यमुक्त कर पवित्र बनें
हम सदा प्रतिदिन दो काल यग्य करें। यग्य से हमारे घर का वातावाण स्वच्छ होता है, अनुशासन आता है, बडों का आग्यापालन करने की भावना बलवती होती है तथा सब इन्द्रियां वश में होती हैं । जब सब इन्द्रियों के घोडे वश में हो जाते हैं , नियन्त्रित होने से हम पवित्र होते हैं । इस प्रकार का आश्य रिग्वेद के सप्तम मण्ड्ल के सुक्त संख्या एक के मन्त्र संख्या १७ में इस प्रकार बताया गया है : –
त्वे अग्नाहवनानि भूरीशानास आ जुहुयाम नित्या ।
उभा क्रण्वन्तोवहतू मियेधे ॥ रिग्वेद .१.१ ॥
हे यग्य की अग्नि ! हम प्रतिदिन दो काल तेरे में आहुतियां देते रहें , आहुत करते रहे । यह सब हम एश्वर्यशाली होते हुये भी करें । हमारे पास धन एश्वर्य है या नहीं किन्तु हम अपने निवास पर यग्याग्नि को जलाने तथा एश्वर्य रूपि आहुतियों को देने का कार्य प्रतिदिन दो काल निरन्तर करते रहें ।
हे अग्नि देवे आप की यग्य अग्निको जलाते हुये हम प्रतिदिन यग्य काते हुये हम अपनी इन दोनों इन्द्रियों के घोडों को मार लेने वाले हों अर्थात हम अपनी इन्द्रियों को सब प्रकार की विष्य वासनाओं से अपनी इन इन्द्रियों को अलग कर लेम, दूर कर लें । इन्हें किसी प्रकार केरग आदि से कुच भी चस्का न रह जावे । इस प्रकार हमारी इन्द्रियों के यह गोडे पवित्र बन जावें ।
नियमित अग्निहोत्र से वायुमण्डल शुद्ध होता है
जब हम अपने यहां प्रतिदिन नियमित रुप से दो काल हवन करते हैं , यग्य करते हैं तो हमारे घर तथा आसपास का वायु मन्डल शुद्ध , पवित्र हो जाता है । इस बात पर इस मन्त्र में इस प्रकार विचार किया ग्या है : –
इमो अग्ने वीततमानि हव्याजस्त्रो वक्शि देवतातिमच्छ ।
प्राति न ई सुरभीणि व्यन्तु ॥ रिग्वेद ७.१.१८ ॥
हे यग्याग्नि देव ! तुं निरन्तर जलता रह, अन्वरत जलते हुये कभी न बुझे । इस प्रकार निरन्तर जलते हुये अग्नि देव तुझे जो हव्य पदार्थ दिये जाते हैं , तुझ में डाले जाते हैं , भेंट किये जाते हैं , उन सुन्दर पदार्थों को तुं ग्रहण कर तथा इन्हें वायु आदि देवों को पहुंचा , दे अथवा भेण्ट कर दे । हे यग्याग्नि देव ! आप को जो जो आहुति भेंट की गयी है , वह सब आप सीधे ही सुर्य देव को दे देते हो । इस प्रकार आप को भेट की गयी यह आहुतियां अग्नि के योग से सूक्शम कणॊं में बंट जाती हैं । इस प्रकार सूक्शम कणॊं में बंटे यह हव्य पदार्थ आकाश मण्डल में सर्वत्र , सब ओर फ़ैल कर सारे के सारे वायु मण्ड्ल का शोधन करते हैं । वायु मण्डल को शुद्ध कर देते हैं ।
हे अग्नि देव ! हम यह जो प्रतिदिन यग्य करते हैं , उससे निकलने वाले यह सूक्शम कण प्रतिदिन यग्य के द्वारा उन सब देवों के पास पहुंचे , जो इन के द्वारा वायुमण्डल के शोधन का कार्य करते हैं ,पवित्र करने का कार्य करते हैं , स्वच्छ करने का कार्य करते हैं , पर्यावरण को शुद्ध करते हैं ।
हम सुस्न्तान, वस्त्र,बुद्धि आदि दिव्य्भावों से युक्त सर्वत्र सुरक्शित हों
हम प्रतिदिन यग्य करते हुये उत्तम सन्तान वाले बनें , प्रतिदिन शुभ व पवित्र वस्त्रों को धारण करें, हमारी बुद्धि भी शुभ हो , हम सदा त्रिप्त रहें ,दिव्य्भावों को प्राप्त करें । हमारे रित की प्रभु रक्शा करें तथा हमारी सब स्थानों पर रक्शा हो। इस भाव को मन्त्र ने इस प्रकार प्रकट किया है :
मा नो अग्ने॓वीरते परा दादुर्वाससे॓मतये मा नो अस्यै ।
मा न: शुधे मा रक्शस रितावो मा नो दमे मा वना जुहूर्था:॥ रिग्वेद ७.१.१९ ॥
हे परम्पिता परमात्मा ! हम नि:सन्तान न हो , हमें अपुत्रत्व को न दें । हमें सन्तान्युक्त करें । हमें मैले कुचैले कपडों में मत डालिये, हम सदा स्वच्छ व सुन्दर कपडों क वर्ण करें, पह्नें । इअतना ही नहीं हे प्रभु हमें निर्धन्मत बनाएये, एश्वर्य से युक्त बनाइये । हमा कभी निर्बुधि न हों , प्रभो हमें उत्तम बुद्धि भीदो । इस के साथ ही साथ हमें भूख को मत देवेम , हम सदा उत्तम भोजन करें, क्भी भूखे न हों । इस के साथ ही साथ हे प्रभो हम में रक्श्सीप्रव्रितियों क प्रवेश मत करायिये , हम सदा देवत्व की ओर बधें । हे रित तथा सत्य क रक्शण करने वाले अग्ने ! हम अपने घर मेम क्भी हिसित न हों, केवल्घर में हीनहीं हम वन में भी अर्थात बाहर भी क्भी हिसक न बनें । इस प्रकार आप की उपासना करते हुये , आप की समीपता में रहते हुये हम सब स्थानों पर सर्वदा सुरक्शित रहें ।
हम प्रभु से ग्यानोपदेश ले यग्य्शील के कश्तों को दूर कर शुभ मार्ग पर चलें
प्रभु से हमें ग्यान क उपदेश मिलता रहे । हे प्रभु हम यग्य्शीलों के कश्टों को दुर कीजिये । हम अभ्युदय व निश्रेयस को सिद्ध करते हुये सदा सन्मार्ग पर, शुभ मार्ग पर चलें । इस क वर्णन इस मन्त्र मे मिलता है : –
नू मे ब्रह्माण्यग्न उच्छशाधि त्वं देव मघवद्भय: सुषूद: ।
रातॊ स्यामोभयास आ ते यूयं पात स्वस्तिभि: सदा न:॥ रिग्वेद ७.१.२० ॥
हम प्रभु से ग्यानोपदेश ले यग्य्शील के कश्तों को दूर कर शुभ मार्ग पर चलें
प्रभु से हमें ग्यान क उपदेश मिलता रहे । हे प्रभु हम यग्य्शीलों के कश्टों को दुर कीजिये । हम अभ्युदय व निश्रेयस को सिद्ध करते हुये सदा सन्मार्ग पर, शुभ मार्ग पर चलें । इस क वर्णन इस मन्त्र मे मिलता है : –
नू मे ब्रह्माण्यग्न उच्छशाधि त्वं देव मघवद्भय: सुषूद: ।
रातॊ स्यामोभयास आ ते यूयं पात स्वस्तिभि: सदा न:॥ रिग्वेद ७.१.२० ॥
हे प्रभो ! आप मेरे लिये ग्यान की जितनी भी वाणियां हैं , उनका उपदेश कीजिये । हे प्रभो ! आप पतिदिन यग्य करने वालों को उत्तम प्रेर्णा को प्राप्त कराने के लिये उन्हें उत्साहित कीजिये , उन्के दु:खों को दूर कीजिये । आप के जितने भीदान हैं , उन में अभ्युदय तथा नि:श्रेयस्दोनों को सिद्ध करने वाले हों । इन सब देवों के साथविनाशी मंगलों के माध्यम से, के द्वारा हमारा राक्श्ण किजिये , हमारि रक्शा करेम । इस प्रकार आप की क्रपा हमारे उपर बनी रहे तथा हम क्ल्याण मार्ग पर निरन्तर चलते रहें ।

हम उत्तम सन्तानों वाले तथा वीर बनें

औ३म
हम उत्तम सन्तानों वाले तथा वीर बनें
हम सब मिलकर पर्मपिता के उपासक बने , उस पिता के समीप आसन लगावें , उस के निकट बैथें । हम अपने कर्म से कुछ प्राप्त कर उसका उपभोग करं , किसी आश्रित न हों , किसी पर बोझ न बनें । अपने घरों में भी दरिद्रता न आने देम , द्रिद्रता से र्हित हो तथा इस प्रकार हम उत्तम सन्तान्को प्राप्त करें । इस घर मेम हम वीरता से युक्त होकर निवास करें । इस तथ्य को रिग्वेद के इस सप्तम मण्डल के प्रथम सूक्त में आये एकादश मन्त्र में इस प्रकार उप्देश किया गया है : –
मा शूने अग्ने नि शदाम न्रिणां माशेश्सो॓वीरता परित्वा ।
प्रजावतीशु सुर्यमु दुर्य ॥ रिग्वेद ७.१.११ ॥
हे प्रभि ! आप की उपासना करते हुये हम चाह्ते हैं कि हम सद अपने निवास पर हि आ कर विश्राम करें, अपने घर मेही रहें, अन्य लोगों के घर पर हीन बैथे रहें । जिन घरों में धन क अभाव हो , जो घर शून्य कि स्थिति में हों , जिन घरों में आर्थिक अभाव हो, एसे घरों मेम हम निवास न करें । धन वैभव की हमें कमीं न हो । हम अभाव से टूटे हुये होकर दूसरों के घरों में ही न बैथे रहेण, दूसरों पर बोझ हीन बने रहेण । हमार निवास शून्य स्से भरे घरों में , जिन्घरों में धनाभाव हो, एसे घरों मं कभी भी न हो । जो हमारे सम्पन्न घर हैं , उनमें भी हम भर पूर परिवार सहित हों , उत्तम सन्तान सहित हों । सन्तान्क हमें अभाव न हो । इतना ही नहिं अपने घरों में उत्तम सन्तान के साथ ही साथ हम वीरता से युक्त हों, भर्पूर वीरता के स्वामी हों । हमारी वीरता में कभी कमीं न आव्द ।
हमारे घरों के रक्शक हे पिता ! हम सदा आप के निकट बैथ्ने वाले हों, आप की उपासना करने वाले हों , आप की सदा स्तुति पूर्वक प्राथना करते हुये आप ही के निकत बैथें । इस प्रकार आप के पास रहते हुये भी हम उत्तम व वॊर सन्तानों वाले हों ।

हमारा घर दतक सन्तान से भी सदा व्रिद्धि को ही बधे
हम प्रशतेन्द्रिय होकर ही उस पिता की अपने घर में उपासना करें , उस पिता के पास बैथें । हमारे घर उत्तम सन्तान से युक्त हों यदि किन्ही कारण से हमें दतक सन्तान लेनी पडती है तो भी हम व्रिद्धि को उन्नति को ही प्राप्त हों । इस बात को इस मन्त्र मे इस प्रकर प्रकाशित किया गया है : –
यमश्वी नित्यमुपयाति यग्यं प्रजावन्तं स्वपत्यं क्शैये न: ।
स्वजन्मना शेशसा वाव्रिधानम ॥ रिग्वेद ७.१.१२ ॥
हे प्रभो ! हम प्रतिदिन प्रात: सायं प्रशस्त इन्द्रियाश्वोंवाला पुरुश आप की उपासना के लिये आप के चरणों में उपस्थित होते हैं । इस लिये हे प्रभु ! आप हमें एसा ग्रह दें, जो उत्तम प्रकार के पुरूशों से भरा हो, उत्तम सन्तानों से भरा हो । इस का भाव यह है कि इस घर में जो बडे लोग अर्थात माता पिता आदि निवास करते हैं ,वह उत्तम जीवन मूल्यों से भरपूर हो , उत्तम मार्ग पर चलने वाले तथा उत्तम कार्य करने वाले हों । इतना ही नहीं इस प्रकार के मुखिया से युक्त इस घर की सन्तानें भी उत्तम ही हों ।
यहां प्रभु से इस मन्त्र के माध्यम से यह भी प्रार्थना की गयी है कि हमें जो घर प्राप्त हो , वह घर अपने से उत्पन्न सन्तानों से उन्नति पावे तथा ऒरस सन्तानों से भी व्रिद्धि को , उन्नति को, सफ़लताओं को प्राप्त करे ।

बॉलीवुड इस्लामीकरण की ओर और रानी पद्मावती फिल्म की सच्चाई

बॉलीवुड  इस्लामीकरण की ओर  और रानी  पद्मावती फिल्म की सच्चाई

 

किसी भी समाज में जो जीवन में घटित होती  है उसे रुपहले परदे  पर दिखाया जाना  यही  लोगो से उम्मीद रुपहले परदे पर की जाती है  या पुरानी इतिहास को परदे पर दिखाया जाता है जो सच में घटित  हुयी हो |  यह काम पहले रुपहले  परदे  पर की जाती थी और यह  समाज  का  आयना  भी होती थी  और होती है | कई ऐसे फिल्म है जो  सच्ची  जीवन  पर घटित  कहानी को  दिखलाया  गया  है | आज वक्त बदल रहा है और  आज सच को झूठ  और झूठ को सच बतलाने की कोशिश की जा रही है और पुराने इतिहास को भी तोड़ मरोड़कर  दिखलाने की कोशिस की जा  रही है  इसी क्रम में आज  फिलहाल  हम अभी  रुपहले  परदे  पर बन रही  फिल्म  रानी पद्मावती  और  संजय लीला  भंसाली  की फिल्म  रानी पद्मावती  के बारे में चर्चा करेंगे |

रानी पद्मावती और  संजय  भंसाली  की  रानी पद्मावती  फिल्म  के बारे  में आज बहुत  चर्चा  की जा रही है | सब  बोल रहे  हैं  की संजय लीला  भंसाली  ने इतिहास  के साथ  खिलवाड़ करने  की कोशिश की है | क्या वे  इतिहास  के साथ  खिलवाड़  करने  की कोशिश की है  इस पर हम चर्चा बाद  में करेंगे  | चर्चा  करने  से पहले  हमें  यह  जानना चाहिए  की ये आखिर  रानी पद्मावती  हैं कौन ?  रानी पद्मावती  के बारे  में पहले चर्चा  की जाए पहले |

रानी पद्मिनी, चितोड़ की रानी थी। रानी पद्मिनि के साहस और बलिदान की गौरवगाथा इतिहास में अमर है। सिंहल द्वीप  के राजा गंधर्व सेन और रानी चंपावती की बेटी पद्मिनी चितोड़  के राजा रतनसिंह के साथ ब्याही गई थी। रानी पद्मिनी बहुत खूबसूरत थी और उनकी खूबसूरती पर एक दिन दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की बुरी नजर पड़ गई। अलाउद्दीन किसी भी कीमत पर रानी पद्मिनी को हासिल करना चाहता था, इसलिए उसने चित्तौड़ पर हमला कर दिया। रानी पद्मिनी ने आग में कूदकर जान दे दी, लेकिन अपनी आन-बान पर आँच नहीं आने दी। ईस्वी सन् १३०३ में चित्तौड़ के लूटने वाला अलाउद्दीन खिलजी  था जो राजसी सुंदरी रानी पद्मिनी को पाने के लिए लालयित था। श्रुति यह है कि उसने दर्पण में रानी की प्रतिबिंब देखा था और उसके सम्मोहित करने वाले सौंदर्य को देखकर अभिभूत हो गया था। लेकिन कुलीन रानी ने लज्जा को बचाने के लिए जौहर करना बेहतर समझा।

जौहर क्या होता है  अब आप यह जानना  चाहते होंगे जौहर को दुसरे शब्दों में आप सती होना  आप बोल सकते  हैं | ज्यादा  इतिहास  की ओर जाना  सही नहीं | पद्मावती जिन्हें  पद्मिनी के नाम से भी जाना जाता है के बारे में ज्यादा  चर्चा ना करके मुद्दे की बात करते हैं रानी  पद्मावती फिल्म  की ओर चर्चा  की जाए |

 

यह लेख  लिखने से पहले  मैं आपको बतलाना चाहता हु की जब मैंने भी पहली बार यह सुना की रानी पद्मावती की जीवन के इतिहास  के साथ खिलवाड़  करने जा रही है संजय लीला भंसाली  तो  मैं  भी  बहुत गुस्से में था मुझे भी लग रहा था की संजय लीला भंसाली  को करनी सेना ने जो कुछ किया सही किया  और उसका हमें भी समर्थन  करनी चाहिए | इस बारे में मैंने फिल्म इंडस्ट्री के लोगो से बात की क्यूंकि मेरी जान पहचान है उनलोगों से | मैं ये नहीं बोल रहा की बॉलीवुड के फिल्म इंडस्ट्री  से मेरा जान पहचान  है मगर  देश के दुसरे फिल्म इंडस्ट्री के लोगो से जान पहचान है  सही जानकारी नहीं  बतलाना चाहता की साउथ की फिल्म इंडस्ट्री से जान पहचान है या फिर नार्थ की फिल्म इंडस्ट्री  से जान पहचान  क्यूंकि सभी राज्य  में उनकी बोली भाषा के आधार पर फिल्म इंडस्ट्री है  चलिए मुद्दे पर लौटते हैं फिर से | जब उनसे चर्चा की गयी तो  उन्होंने  मेरे को कुछ जानकारी दी  जिसके बाद लगा की जिनसे चर्चा मैंने की है उनकी बात में सच्चाई है | सबसे पहले मेरे मित्र ने जानकारी दी की  वह भी फिल्म में काम करता है  और वह कैमरामैन जिसे फिल्म इंडस्ट्री सिनेमाटोग्राफर  या  डायरेक्टर ऑफ़ फोटोग्राफी भी कहते हैं का काम करते है साथ में फिल्म  का एडिटर भी हैं वो | उन्होंने पहला सवाल किया की फिल्म की स्क्रिप्ट  क्या है  यह बात  सिर्फ डायरेक्टर  और स्क्रिप्ट राइटर  को होता है यहाँ तक फिल्म  में जब शूटिंग होती है  तो फिल्म के स्टाफ  कैमरामैन तक को यह नहीं मालुम होता  की जो शूटिंग की जा रही है वह फिल्म में किस जगह पर ली जायेगी ? फिल्म की क्या स्क्रिप्ट है  यह कैमरामैन तक को  मालुम नहीं होता  ? फिर  इन मीडिया वालो  को और  उस जगह  के करणी सेना  को किसने  फिल्म की जानकारी दे दी | एक बात आपको जानकारी देना चाहता हु केवल  राजनीती  में ही राजनितिक पार्टी राजनीती करते हैं फिल्म इंडस्ट्री में भी राजनीति होती है और यह राजनीति का एक हिस्सा है | मैं जानता  हु क्या राजनीति है इस फिल्म को लेकर मगर यहाँ चर्चा करना सही नहीं |  हां मैं भी बोलता हु यदि  संजय लीला  भंसाली  की फिल्म में कुछ इतिहास के साथ खिलवाड़ करे तो आप उसका विरोध करे  क्यूंकि कोई भी इतिहास के खिलाफ  खिलवाड़  करे  हमें स्वीकार नहीं |  मगर जब तक किसी ने फिल्म नहीं देखि  तो जब उस बारे में कोई जानकारी  नहीं  तो  आवाज़  उठाना  सही नहीं |

अभी फिलहाल  कुछ दिन पहले  रईस फिल्म आई है सोशल मीडिया  पर बोला जा रहा है की  की  यह कहानी गुजरात के एक माफिया अब्दुल लतीफ़ जो हिन्दुओ  को कत्ले आम करता था उस पर फिल्म बनायीं है  और  उसे हीरो  बताया  गया है और यह आजकल फिल्म बहुत हिट हो रही है  पैसे कमा रही  है | इतना  ही नहीं  फिल्म फना  में एक आतंकवादी  की प्रेम कहानी दिखाई गयी है  जिसे भी लोगो ने सराहा | कुछ  साल पहले एक फिल्म आई थी हैदर  जिसमे भारतीय सेना को विल्लेन और एक आतंकवादी को सही बतलाया  गया था | आज चलो कितने फिल्म आती हैं अरे आर्य समाज की भजन की बात को छोड़ दो आप पौराणिक की भी भजन  फिल्म में नहीं आती | बस  इस्लाम की गाने  को ज्यादा  तव्वजो  दी जाती है और हम उन सब की फिल्म  को देखकर  और जो जानकार नहीं है  उनकी बातो में आ जाते हैं  | फिल्म pk को ही देख लो | आज बॉलीवुड इस्लामीकरण की ओर जा रहा है इससे हमारे संस्कृति को हानि होगी | हमें उस तरह की फिल्म का बहिस्कार  करनी चाहिए  मगर  हम लोग  उन फिल्मो को स्वीकार करते है  | आये उस तरह की फिल्म का बहिस्कार  करें शाहरुख सलमान  आमिर की फिल्म का बहिस्कार करें | और जो जो फिल्म इस्लामिकरन  की ओर बॉलीवुड को धकेल रही है उसका विरोध करें और फिर से बॉलीवुड को समाज की आयना  बनाने का प्रयास  करें |

लेख में कुछ त्रुटी लगे  तो उसके लिए क्षमाप्रार्थी हु |

धन्यवाद

आभार : विकिपीडिया

 

 

 

शुभ धन एश्वर्य की प्राप्ति जागृत को ही होती है

शुभ धन एश्वर्य की प्राप्ति जागृत को ही होती है

डा. अशोक आर्य
आज का मनुष्य जीवन में अतुल धन सम्पति की अभिलाषा रखता है | धन सम्पति की अभिलाषा ने उसका जीवन क्रम ही बादल दिया है | इस जीवन क्रम के परिवर्तन के साथ ही उसकी आवश्यकताएं भी निरंतर बढती व बदलती ही चली जा रही हैं | एक सामूहिक परिवार में जहाँ एक रसोई में केवल एक चाक़ू होता था ,वहां आज परिवारों के विभाजन के पश्चात भी एक रसोई में कम से कम बीस प्रकार के तो केवल चाक़ू ही हो गए हैं | एक छीलने वाला, एक काटने वाला , एक डबल रीती पर जैम लगाने वाला ………. इस प्रकार जहाँ केवल चाकुओं की ही इतनी संख्या बढ़ गयी है, वहां शेष सामग्री की गणना करें तो आज एक छोटे से परिवार के पास आकूत सामग्री की आवश्यकता हो गयी है | आवश्यकता की क्या कहें आज तो अनावश्यक सामग्री पर धन पानी की भाँती बहाया जा रहा है | इसी सामग्री की एक प्रतिस्पर्धा सी चल रही है | एक के पास एक कपडे धोने की मशीन है तो उसके पडौसी का प्रयास होता है कि वह ऐसी मशीन लावे, जिस में कपडे सूख भी जावे ताकि वह पडौसी को पीछे छोड़ सके | इस अवस्था में अन्य पडौसी चाहता है कि वह उसे भी पीछे छोड़ कर ऐसी मशीन लावे जो न केवल कपड़ों की धुलाई व सुखाने का कार्य करे अपितु प्रैस भी कर देवे | इस अंधी दौड़ ने धन की आवश्यकता को ओर भी बढ़ा दिया है | धन की इस अंधी दौड़ ने परिवार , पास – पडौस व रिश्तों को भी भुला दिया है | आज का मानव साम ,दाम , दंड , भेद का प्रयोग केवल धन प्राप्ति में ही करना चाहता है | धन की इस अंधी दौड़ के कारण संसार में आपसी लडाई, झगडा, कलह क्लेश में निरंतर वृद्धि हो रही है | इस से बचने का एकमेव उपाय है पवित्र धन | यदि हम ऋग्वेद व साम वेद में वर्णित विधि से शुद्ध धन को अपने उपभोग के लिए एकत्र करेंगे तो हम निश्चय ही शांत व सुखी जीवन व्यतीत कर सकेंगे | आओ हम वेद की इस भावना का अध्ययन करें | वेद मन्त्र का मूल पाठ इस प्रकार है : –
अगिर्जागार तमृच: कामयन्ते , अग्निर्जागार समु सामानी यन्ति |
अग्निर्जागार तमयं सोम आह, तवाह्मस्मी सख्ये न्योका: || ऋग्वेद ५.४४.१५ सामवेद १८२७ ||
वेद की ऋचाएं ऐसे व्यक्ति को ही पसंद करती हैं जो जागृत अवस्था में है | अग्नि जागता है तो उसके पास सामवेद कि रचाएं आती हैं | इस जागृत अग्नि को ही सोम कहता है कि मैं तेरी मित्रता में प्रसन्नचित व सुखपूर्वक निवास करूँ |
मन्त्र तथा इसके भावार्थ से एक बात स्पष्ट होती है कि वह सोम रूप परमात्मा उसके साथ ही सम्बन्ध रखना चाहता है , जो सदा जागृत रहता है | जो दिन में भी सोया रहता है , उसका कोई साथी नहीं बनना चाहता | इस का कारण भी है | जो दिन में सोया रहता है अर्थात जो पुरुषार्थ से भागता है , मेहनत से भागता है, वह कभी धन एश्वर्य नहीं पा सकता | जिसके पासा धन एश्वर्य नहीं है ,उसके मित्र कभी प्रसन्न व सुखी नहीं रह सकते | इस कारण उसकी मित्र मंडली बन ही नहीं पाती | आज के युग में तो मित्र होते ही धन के स्वामी के हैं , गरीब को कौन चाहता है ? हितोपदेश्ब में भी यही बात बतायी गयी है कि :-
उद्योगिनं पुरुशासिन्हामुपैती लक्ष्मी: | हितोपदेशे प्रस्ता.३१
इसका भाव है कि संसार में वही सफल होता है, वही उन्नत होता है, वही आगे बढ़ता है, जो उद्योग करता है, जो पुरुषार्थ करता है | पुरुषार्थ ही सुखी जीवन का आधार है | जो पुरुषार्थी नहीं उसके पास धन नहीं , जिस के पास धन नहीं उसके पास मित्र नहीं , यह बात भी संस्कृत के शलोक में स्पष्ट कही गयी है :-
आलसस्य कुतो विद्या , अविदस्य कुतो धनं |
अधनस्य कुतो मित्रं अमित्रस्य कुतो सुखं ||
श्लोक से स्पष्ट है कि आलसी कभी अच्छी विद्या नहीं पा सकता | विद्या के बिना शुद्ध धन कि प्राप्ति नहीं होती , जिसके पास धन नहीं, उसके मित्र भी नहीं बनते तथा जिस के सुख़- दु:ख में साथ देने के लिए मित्र ही नहीं हैं, वह सुखी कैसे रह सकता है ? अर्थात वह सुखी कभी नहीं हो सकता | इस लिए हे मनुष्य ,उठ ! पुरुषार्थ कर तथा आकूत धन कमा | शुद्ध धन ही तुझे सच्चा सुख़ देगा | इस तथ्य का रामचरित मानस में भी बड़े ही सुन्दर शब्दों में इस प्रकार बताया गया है :-
सकल पदार्थ हैं जग माहीं ,
करमहीन नर पावत नाहीं | रामचरित मानस
रामचरित मानस भी तो यही ही क ह रही है कि धन ऐश्वर्यों का स्वामी वही व्यक्ति बन सकता है , जो कर्म करता है | बिना कर्म के, बिना पुरुषार्थ के कोई धन ऐश्वर्यों का स्वामी नहीं बन सकता | यहाँ भी कर्म करने, मेहनत करने , पुरुषार्थ करने पर बल दिया गया है | बिना मेहनत के हम कुछ भी नहीं पा सकते | यहाँ तक कि भोजन सामने पड़ा है, जब तक पुरुषार्थ कर हम उसे अपने मुंह में नहीं रख लेते तब तक हम उस भोजन से तृप्त नहीं हो सकते |
हम जानते हैं कि मनुष्य उस परम प्रभु की सन्तान है | जिस परमात्मा की यह मानव सन्तान है, वह परमात्मा संसार के समस्त धन ऐश्वर्यों का स्वामी है , मालिक है, अधिपति है | इस आधार पर यह मानव उत्तराधिकार नियम के आधीन अपने पिता कि सर्व सम्पति को पाने का अधिकारी है | मानव केवल उतराधिकार के नियम के अधिकार को ही न समझे अपितु इस अधिकार के साथ उसका कुछ कर्तव्य भी जुड़ा है , उसे भी समझे | जब तक वह अपने कर्तव्य को नहीं समझता, तब तक उतराधिकार से प्राप्त इस सम्पति से उसका कुछ भी कल्याण नहीं होने वाला क्योंकि वह पुरुषार्थ से यदि इस सम्पति को नहीं बढाता, उस की यथोचित सुरक्षा नहीं करता तो कुछ ही समय में वह पुन: सम्पति विहीन हो जावेगा | इसलिए सम्पति देते हुए प्रभु ने मनुष्य को यह भी उपदेश दिया है कि यदि तूं ठीक ढंग से इस सम्पति का रक्षक बनेगा तथा इसे बढ़ाने के लिए परिश्रम करेगा तो तेरा व तेरे परिवार का जीवन सुखी होगा, यदि तू एसा पुरुषार्थ नहीं करेगा तो यह अतुल धन तेरे पास बहुत समय तक रहने वाला नहीं |
मन्त्र के इस भाव से जो एक तथ्य उभर कर सामने आता है वह है की मनुष्य जन्म के साथ ही अपार धन एश्वर्य का स्वामी बन जाता है | उस परमपिता परमात्मा ने जन्म के साथ ही उसे जो धन दिया है , उसकी व्रद्धि करना इस मनुष्य का परम कर्तव्य भी है | इस सम्पति को वह कैसे सुरक्षित रखे, इस का भी उपाय इस वेद मन्त्र में दिया है | मन्त्र कहता है की इस सम्पति को सुरक्षित रखने के लिए उसे शद्ध वृतियों को अपनाना होगा, क्योंकि शुभ वृतियां धन को सुरक्षित रखती हैं तथा अशुभ वृतियां इस का नाश भी कर देती हैं | हम प्रतिदिन देखते भी हैं की जिस मनुष्य के पास उतराधिकार में कुछ सम्पति है, वह शुभ वृतियों में रहते हुए उस धन की रक्षा करने में सक्षम होता है तथा पुरुषार्थ से इसे बढाने में भी सफल होता है किन्तु धन पा कर जो व्यक्ति अभिमानी हो जाता है, इस धन से किसी की सहायता नहीं करता तथा रक्षक के स्थान पर भक्षक बनाकर बुरी वृतियों में लिप्त हो जाता है, मांस शराब का सेवन, वैश्या गमन आदि दुराचारों में फंस जाता है तो न केवल उसके परिवार में कलह बढती है अपितु कुछ ही समय में धन उसका साथ छोड़ जाता है | इस लिए ही तो मन्त्र कहता है की हे मानुष ! तुझे जो आकूत धन दिया है तू उस की रक्षा करते हुए उसे बढाने के भी उपाय कर, पुरुषार्थ कर |
अत: इश्वर की इस दी सम्पति को, धन , को बचाए रखने के लिए तथा इसे बढ़ाने के लिए हमें अपने में शभ वृतियों को, अच्छी आदतों को बढ़ाना होगा , जितने भी शुभ विचार हैं , उन्हें अपने जीवन में धारण करना होगा | शुभ विचार, सत्य कर्म तथा शुभ वृतियां जहाँ हैं वहां ही लक्ष्मी अर्थात धन एश्वर्य का निवास है | पापाचरण, कुमार्ग गमन,मद्य मांस सेवन आदि अशुभ वृतियां लक्ष्मी अर्थात धन एश्वर्य के नाश का कारण होती हैं | यही कारण है की वेद हमें आदेश देता है कि हे मनुष्य ! अपने जीवन में पाप वृतियों को प्रवेश न करने देना शुभ वृतिओं को खूब फलने फूलने का अवसर देना | यदि तू अपने जीवन में एसा करेगा तो तू इश्वर से प्राप्त आकूत धन एश्वर्य से सुखी जीवन व्यतीत करेगा तथा तेरा परिवार व तुझ पर आश्रित लोग भी सुखी रहेंगे | यह धन सम्पदा पूर्णत: सुरक्षित रहेगी तथा यह निरंतर बढती ही चली जावेगी, जिससे तेरे सुख़ भी बढ़ते ही जावेंगे | यदि तू एसा नहीं कर इस के उलट पापाचरण की और बढेगा तो धीरे धीरे तू इस सम्पति से वंचित हो दु:खों के सागर में डूब जावेगा | अत: उठ शुभ विचारों को अपना, शुभ आचरण कर तथा इश्वर से प्राप्त इस सम्पति की वृद्धि के उपाय कर सुख़ का मार्ग पकड़ |

डा. अशोक आर्य,

प्रभु उपासक को पोषण को,यशस्वी बनाने को तथा वीरता बटाने वाला धन मिलता है

औ३म
प्रभु उपासक को पोषण को,यशस्वी बनाने को तथा  वीरता बटाने वाला धन मिलता है

डा अशोक आर्य
जो मानव परमपिता के समीप बैट कर उस प्रभु का स्मरण करता है , प्रभु उसे अनेक प्रकार के धनों को देता है । यह धन पोषण को बनाने वाला होता है , उसको यश दे कर यशस्वी बनाता है तथा उपासक में वीरता का संचार करता है । यह मन्त्र इस तथ्य पर ही प्रकाश डालते हुये उपदेश करता है कि : –
अग्निना रयिमश्रवत पोषमेव दिवे दिवे ।
यशसं विरत्तमम ॥ रिग्वेद १.१.३ ॥
यह मन्त्र अग्नि स्तवन पर बल देते हुये कहता है कि मनुष्य प्रभु की उपासना करने से कभी सांसारिक द्रिष्टि स्वे असफ़ल नहीं होता । प्रभु स्तवन से ही वह निरन्तर आगे बटता है । वास्तव में प्रभु स्तवन से ही लक्श्मी के दर्शन होते हैं । स्पष्ट है कि जहां प्रभु स्तवन है, वहां लक्श्मी तो है ही, तब ही तो कहा जाता है कि मानव अग्नि से धन को प्राप्त करता है अर्थात जो प्रतिदिन यग्य करता है, उसे धन एश्वर्य के नियमित रुप से दर्शन होते रहते हैं ।
सामान्यत:; लोग इस बात को जानते हैं कि जिसके पास अपार धन सम्पदा होती है , उसके लिये अवनति का मार्ग खुला रहता है । इस धन की सहायता से वह अपनी इन्दियों को सुखी बनाने का यत्न करता है ,शराब, जुआ आदि अनेक प्रकार की बुराइयां उस में आ जाती हैं किन्तु जो धन प्रभु स्मरण से मिलता है,जो धन प्रभु स्तवन से मिलता है, जो धन अग्निहोत्र से मिलता है, जो धन यग्य से मिलता है, उस धन की एक विशेषता होती है , इस प्रकार से प्राप्त धन प्रतिदिन हमारे पोषण का कारण होता है । इससे हमारा किसी प्रकारका नाश, किसी प्रकार का ह्रास नहीं होता । इस प्रकार प्राप्त धन हमें कभी विनाश की ओर , म्रित्यु की ओर नहीं ले जाता अपितु यह् तो हमें व्रिद्धि की ओर , उन्नति की ओर ले जाता है , जीवन को जीवन्त बनाने व उंचा उटाने की ओर ले जता है ।
इस प्रकार यग्यीय विधि से हमें जो धन मिलता है , यह धन हमें यश्स्वी बनाता है, यश से युक्त करता है । इस धन में परोपकार की भावना भरी होने से हम इसे दान में लगाते हैं , दूसरों की सहायता में लगाते हैं । इस कारण हम निरन्तर यशस्वी होते चले जाते हैं । हमारा यश व कीर्ति दूर दूर तक जाती है । मानव अनेक बार अपार धन सम्पदा पा कर इसके अभिमान में मस्त हो जाता है । इस मस्ती में वह अनेक बार एसे कार्य भी कर लेता है , जो उसे अपयश का कारण बनाते हैं । किन्तु यग्य आदि में धन का प्रयोग करने से उस का यश व कीर्ति बटते हैं ।
प्रभु उपासना से प्राप्त धन हमें अत्यधिक सशक्त करने वाला होता है, हमारी शक्ति बटाने वाला होता है । जब अत्यधिक धन के अभिमान में व्यक्ति अनेक नोकर – चाकरों को रख कर आलसी बन जाता है , कोइ कार्य नहीं करता, निट्ला हो जाता है तो स्वाभाविक रूप से शारीरिक कार्य वह स्वयं नहीं करता, इस कारण निर्बल हो जाता है । क्रिया अर्थात मेहनत ही सब प्रकार की शक्तियों का आधार होती है , जो व्यक्ति क्रियाशील रहता है , उसमें शक्ति की सदा व्रिद्धि होती रहती है, ह्रास नहीं होता । यह क्रिया शीलता ही शक्ति की जन्मदाता होती है । जब क्रिया का क्शय हो जाता है तो शक्ति का नाश होता है । हम अपने शरीर को ही देखे , हमारे दो हाथ हैं , एक दायां तथा दूसरा बायां । प्रत्येक व्यक्ति का बायां हाथ उसके अपने ही दायें हाथ से कमजोर होता है । एसा क्यों , क्योंकि मानव अपना सब काम दायें हाथ से ही करता है, बायें हाथ से वह बहुत कम कार्य करता है । इस कारण बायां हाथ दायें की अपेक्शा कमजोर रह जाता है । यही कारण है कि क्रियाशीलता के बिना तो प्रभु स्मरण भी नहीं होता । अत: प्रभु स्मरण हमें क्रियाशील बना कर बलवान बनाता है । क्रियाशील होने से हमारा शरीर पुष्ट होता है, पुष्टी से हम अधिक कार्य करने में सक्शम होते हैं, धनेश्वर्य के स्वामी बनते हैं। हमें यश व कीर्ति मिलतै हैं तथा हम में शक्ति का संचय होता है , जिससे हम वीर बनते हैं ।

डा. अशोक आर्य

घरों में सब लोग मिलकर यग्य कर अपनी आहुति देते हैं

ओउम्
घरों में सब लोग मिलकर यग्य कर अपनी आहुति देते हैं
डा.अशोक आर्य
प्रत्येक घर में, प्रत्येक परिवार में प्रति दिन यज्ञ होता है तथा इस घर के सब लोग, इस परिवार के सदस्य लोग इस यज्ञ में मिल कर बैठते हैं तथा इस यज्ञ में मिलकर ही अपनी आहुति देते हैं । घर की पवित्र अग्नि से यज्ञ की अग्नि को प्रदीप्त कर , उस अग्नि में यथावश्यक आहुति डालते हैं । इस प्रकर के यज्ञों के द्वारा इस घर के लोग महानˎ अग्नि का पूजन करते हैं । इस तथ्य को इस चोथे मन्त्र में इस प्रकार व्यक्त किया गया है : –
प्रतेअग्नयो॓Sग्निभ्योवरंनि:सुवीरस:शोशुचन्तद्युमन्त: ।
यत्रानर:समासतेसुजाता: ॥ रिग्वेद ७.१.४ ॥
गार्हपत्य अग्नि अर्थातˎ घर की अग्नि , सदा हम उस अग्नि को प्रणयन करते हैं, हम सदा उस अग्नि को बुलाते हैं , सदा उस अग्नि को जलाते हैं , जिस अग्नि का हमने आह्वान करना होता है । इस लिये ही कहा जाता है कि हे गार्हपत्य अग्नियों ! तुझ से ही य यज्ञ की अग्नियां जला करें । यह अग्नियां अच्छे से ज्योतित हो कर , यह अग्नियाँ तेज को धारण कर, यह अग्नियाँ तीव्र होकर अच्छी प्रकार से , ठीक से रोग के कृमियों को , रोग के कीटाणुओं को कम्पित करने वाली, भयभीत करने वाली हों, यह अग्नियाँ रोगाणुओं को मारने वाली हों । इस प्रकार यह यज्ञ की अग्नि सब प्रकार के भूत आदि को पीछे धकेल दे , भगा दे । किसी प्रकार के भय को रहने ही न दे ।
इस अग्नि अर्थात इस यज्ञ की अग्नि के पास सदा ही उत्तम प्रकृति वाले अथवा कुलीन लोग ही रहते हैं, इस यज्ञ की अग्नि के पास सदा अच्छे लोग ही निवास करते हैं । यह सब लोग बडे प्रेम से इस अग्नि के समीप अपना आसन लगा कर रहते हैं । यह लोग ,जिस प्रकार नाभि के आरे होते हैं , वैसे ही इस यज्ञाग्नि के चारों ओर मिलकर गति करते हुये , कर्म करते हुये, यज्ञ सम्बन्धी व्यवहार करते हुये यज्ञ के आसन पर आसीन होते हैं । इस प्रकार यह लोग यज्ञ की इस अग्नि का पूजन करते हैं तथा इस में यथावश्यक घी तथा सामग्री की आहुति देते हैं ।
इस मन्त्र परमपिता परमात्मा प्राणी मात्र को उपदेश करते हुए बता रहे हैं कि यज्ञ के क्या लाभ्होते है ?, यज्ञ के क्या आभ होते हैं, जिस परिवार में नित्य प्रति यज्ञ होता है, उस परिवार में सदा सुखों की वर्षा क्यों होती रहती है ? परिवार क्यों रोग रहित होकर धनधान्य से भर जाता है ? इन सब गुणों का , इन लाभों का वर्णन करने का अभिप्राय यह है कि जो परिवार सुखों की अभिलाषा करता है , जो परिवार चाहता है कि ए सब सदस्य सदा इरोग रहें , जो परिवार चाहता है कि हमारे परिवार में कभी कोई कष्ट न आवे तथा सदा उनके पास धन धान्य के भण्डार भरे रहें तो इस परिवार में प्रतिदिन दो समय यज्ञ किया जाना चाहिये |

डा. अशोक आर्य