ईसाई पैगम्बरों का चरित्र चित्र

लेखक –श्री राम आर्य

ईसाई मजहब व बाइबल का पोलखाता अर्थात ईसाई पैगम्बरों के चरित्रो का कच्चा चिट्ठा –

सारे संसार में बुद्धिमान लोगो ने मनुष्यों के उत्थान के लिए शुभ आचरण करने पर जोर दिया है |मनुष्य यदि उत्तम विचार रखे,परोपकारी वृति रखे ,दीन ,दुखियो निर्बलो,असहायों पर दया दृष्टि रखे ,प्राणिमात्र को अपने अपने कर्मो से किसी भी प्रकार का कष्ट न पंहुचाये,सबके हित में अपना हित समझे,नेत्रों से उत्तम चीजों को देखे,वाणी से श्रेष्ट बातें करे,कानो से शुभ कथाये वार्ता सुने,मन में सदा शुभ विचार व श्रेष्ट संकल्प धारण करे, निराकार सर्वव्यापक जगतकर्ता प्रभु में प्रीती रखे,उसकी भक्ति में मन को लगाये,सदाचार व संयम का जीवन व्यतीत करे मन,बुद्धि व आत्मा को पतित करने वाले मॉस ,मदिरा आदि विष्टा तुल्य गंदे पदार्थो के सेवन से बचे,सत्य ज्ञान प्राप्त करे व महापुरुषों का सत्संग करे तो उसके लिए इस लोक में सुख व म्रत्यु के अनन्तर उत्तम जन्म जन्मान्तर के शुभ कर्मो के परिणाम स्वरूप आत्मा के निर्मल होने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है| यह भारत के आर्यों का वैदिक सिधान्त है|

किन्तु चंद लोगो ने अपना बडप्प्न दिखाने के लिए स्वयं को खुदा का बेटा या खुदा का एक मात्र पैगम्बर अथवा स्वयं को सक्षात्त खुदा बताकर संसार के भोले भाले लोगो को बेवकूफ बनाया है ओर अपने चेलो की संख्या बढ़ाने के लिए यह घोषित किया है कि परमसुख अथवा मोक्ष के हम ही ठेकेदार है,खुदा की तरफ से हम पर ही मोक्ष की सोल एजेंसी है| बिना हमारे ऊपर ईमान लाये मुक्ति किसी को भी नही मिलेगी |हम इंसान को अथवा अपने चेले को मोक्ष ,स्वर्ग,अथवा बहिश्त में घुसने का पासपोर्ट या टिकिट देगे |

जो हमारे चेलो में नाम नही लिखायेगा,आँखे बंद करके हमारे ऊपर ईमान नही लायेगा,हम उसे नर्क या दोजक में ठूस देगे| फिर चाहे उसके कर्म कितने ही अच्छे क्यूँ न हो|

(युहन्ना पर्व १४ का भावार्थ व कुरान शरीफ का सारांश )

इस प्रकार की बातें आपको ईसाई व इस्लाम मजहब में बहुत कुछ मिलेगी| इन दोनों मजहबो के संस्थापको ने बहिश्त के वह नजारे अपने चेलो को फांसने के लिए अपने ग्रंथो या उपदेशो में पेश किये है कि अज्ञानी लोग उनके लालच में फंस कर उनके मजहबो में फंसते रहे है|

इस्लाम का बहिश्त में बहिश्ती शराबे ७०-७० हूरे (अछूत सुन्दरी औरते ) व ७२-७२ गिलमो अर्थात बड़ी बड़ी आँखों वाले खुबसूरत लडको) का लालच अरब के वहशी लोगो को मुसलमान बनाने का प्रधान आकर्षण रहा है ,तो यूरोप के अज्ञानी जन समुदाय को ईसाईयत के बहिश्त व ईसा के फर्जी करिश्मे व खुदा के बेटे पर ईमान लाना एक मुख्य कारण ईसाइयत में प्रवेश कराने का रहा है|

हजरत ईसा मशीह ने खुदा का इकलोता बेटा अपने आप को बताया तो हजरत मुहम्मद साहब ने अपने आप को खुदा का आखरी पैगम्बर बताकर अपने मजहब का प्रचार किया था| हम इस लेख में इस्लाम पर न लिख कर केवल ईसाई मजहब में जनता को कुछ परिचय करवाएंगे |

ईसाई मजहब के धर्मग्रन्थ बाइबिल का यह कहना है की ईसा मसीह खुदा के इकलोते बेटे थे,एक बड़ी बेतुक्की बात है | हजरत खुदा के बेटे है तो उसके बहु,साले,सास,ससुर,सालिया व सलेज वगैरा सभी रिश्तेदार अवश्य होंगे| ईसाई लोग इनके नाम पते बतावे ताकि खुदा की ससुराल का हाल मालुम हो सके |

हजरत खुदा के सिर्फ एक ही बीटा मसीह पैदा हुआ आगे उसने कोई भी औलाद पैदा नही की ,इसका क्या कारण है? क्या वजह हुई कि खुदा की गर्भवती बीवी ने खुदा को छोड़ कर जल्दी युसूफ नाम के बढई को पसंद कर लिया ओर शादी कर ली?

खुदा को अपने क्वारेपन की पहली औलाद ईसा को अपने पिता के घर में जन्म न देकर गैर आदमी से शादी करके उसके घर उसके घर जाकर जन्म देने की श्रीमती आदरणीय मरियम महोदय को क्यों आवश्कता पड़ी ? क्या इस रहस्य को इसाई विद्वान पादरीगण खोल सकेंगे?

जब खुदा के बेटे मसीह को इंसान ने फांसी दे कर मारा तो वह सूली पर चिल्लाता रहा कि –

“ है मेरे बाप! मुझे बचा लो “(मती २७/४६)”

तो खुदा अपनी एक मात्र औलाद को बचाने क्यों नही आया? ईसा ने बड़े जोर से चिल्ला चिल्लाकर फांसी के तख्ते पर प्राण छोड़ा| (मती २७/५०)

इससे सिद्ध हुआ है की ईसा मौत से बेहद डरता था| उससे भारत के लाल भगत सिंह जैसे लोग ज्यादा बहादुर थे जिन्होंने हँसते हुए अपने हाथो से फांसी का फंदा गले में पहिना था| वीर जोरावर की मिसाइल ईसा से कही ज्यादा ऊँची है जो हँसते हसते हुए धर्म के लिए दीवार में चुने गये उस पर ईसा खुद को साक्षात खुदा का बेटा मानते थे तो बाप का धर्म था बेटे की मदद करता|

बेटे तीन तरह के होते है,(१) पूत(२)सपूत ओर (३)कपूत |पूत वह जो बाप के जैसा हो| सपूत वह जो बाप से बढ़ कर काम करे| कपूत वह जो बाप का नाम डुबो दे|

हो सकता है कि ईसामसीह खुदा के भी पूत व सपूत न होकर तीसरे नंबर के बेटे हो ओर शायद इसी के लिए खुदा ने उनको त्याग दिया हो| बहुत सम्भव है कि जैसे दुनिया को पैदा करके खुदा बाईबिल में पछताया (उत्पत्ति)

वैसे ही एक औलाद ईसा को पैदा कर पछताया हो ओर दुखी हो कर आगे को ब्रह्मचर्य धारण कर बेठा हो|

ईसाइयों का मजहब क्या है? एक तमाशा है| ईसाई खुदा के यहा बेटा है बीवी है बेठने के लिए तख़्त है, रहने को मकान है,रक्षा के लिए फोज है,खिदमत के लिए फरिस्ते है|अपने मकान से उतर कर अदन के बाग़ में ठंडी ठंडी हवाओं में सैर करता है ओर आदम से बातें करता है| (उत्त्पति)

शेतान से डरता है| गुंडा शेतान जिन गरीब लोगो पर हावी हो जावे उन्हें दंड देता है,शेतान को सजा देने की उसमे शक्ति नही है|

“खुदा याकूब से रात भर कुश्ती लड़ता है ओर न वह याकूब को पछाड़ पाता है,न याकूब को गिरा पाता है|(उत्पति ३२)”

“इंसान को आदमी के पाखाने से रोटी पका कर खाने की आज्ञा देता है|”(जेह्केल पर्व ४)

“बाप को अपनी बेटी से व्यभिचार व शादी करने की आज्ञा देता है तथा उसे अच्छा काम बताता है|(करन्थियो ३६-३७-३८)”

“उसका बेटा मसीह शराब पीता है|(मती११/११)”

“वह गधो की चोरी कराता है|(युहन्ना१२/१४ तथा लूका १९/३०)”

“ईसा खुदा का सोल एजेंट होने का दावा करता है(युहन्ना १४/६)”

“यहोवा परमेश्वर औरतो को नंगा करता है|(याशाशाह३/१६-१७)”

“ईसाई पैगम्बर अत्यंत चरितहीन थे|यहूदा ने अपने बेटे की बहु से व्यभिचार किया|(उत्पत्ति ३८/१२-२०)”

“पैगम्बर लूत ने अपनी खास बेटियों से शराब पी करके उन्हें गर्भवती बनाया|(उत्पत्ति १९/३३-३८)”

“हजरत अविराहम ने अपनी बहन से व्यभिचार किया व झूठ-मुठ की शादी की|(उत्पत्ति १२/११-१३)”

“याकूब ने अपनी दासियों के साथ व्यभिचार किया व उसके बेटी दीन ने हमुर के बेटे सिकम के साथ व्यभिचार किया|(उत्पत्ति ३४२४-३०)”

“पैगम्बर दाउद ने उरियाह की खुबसूरत बीवी से व्यभिचार किया,उरियाह को मरवा डाला व उसकी बीवी को अपने घर में डाल लिया|(सैमुएल२ पर्व ११/२-२५)”

“दाउद के बेटे आमुनुन ने अपनी सगी बहिन तामार के साथ जबरदस्ती काला मुह (व्यभिचार) किया |(सैमुएल२/१३/१-२०)”

“ईसा की माँ मरियम क्वारेपन में ही बाप के घर से गर्भवती होकर आई थी ओर उसी से ईसामसीह पैदा हुए |(इंजील १/१८-९)”

“ईसा ने गधा चुरवाया|(मती २१/१-७)”

“इसराइल में रुबेन ने अपने पिता की बीवी के साथ व्यभिचार किया|

मूसा ने फोज की क्वारी अछूती कन्याओ से खुले में व्यभिचार की आज्ञा दी (गिनती नामक पुस्तक ३१/१४-१८)”

ईसाई खुदा अत्यंत बहरम बी जाहिल है|वह मर्द,औरतो,नन्हे मासूम बच्चे,भेड़,ऊंट,गधे आदि निर्दोषों को अत्यंत बेरहमी से क़त्ल करने की आज्ञा देता है|(१ सेमुएल १५/२)

“बाइबिल ईसाई मजहब को धोखे व मक्कारी से फ़ैलाने की आज्ञा देता है|(चोलास का फिलोपियो को ख़त १/१८)”

बाइबल मंदिरों व मूर्तियों को तोड़ डालने की आज्ञा देती है|(व्यवस्था विवरण१३/९)

बाइबल इतवार के दिन काम करने वालो को मार डालने का आदेश देती है|(निर्गमन३५/२)

“इसाई तालीम औरतो को व्यभिचार के लिए लुटने का हुक्म देती है|(न्यायियों को २१/२१)”

“ईसाई तालीम पर स्त्री,माल व बाल बच्चो को लुटने की व्यवस्था देती है|(विव्रन२०/१४)”

“ईसा ने लोगो को लड़ने के लिए शस्त्र खरीदने का आदेश दिया है| उसने कहा की मै दुनिया में झगड़े फसाद पैदा कराने आया हू| मत समझो कि मै मुहब्बत पैदा कराने आया हू|(मती१०/३४-३६)”

“ईसा ने कहा जितने भी पैगम्बर मुझसे पहले आये सब चोर डाकू थे(योहन रचित सुसमाचार पर्व १०/९)”

इससे सिद्ध होता है कि ईसाई पैगम्बर चोर ओर डाकू थे| उनके चरित भी ख़राब थे| ऐसे ख़राब चरित्रों के लोगो को केवल इसाई लोग ही भला भला आदमी व पैगम्बर मान सकते है| दुनिया के लोग ऐसो के नाम से भी घृणा करंगे|

जब पैगम्बर का यह हाल है तो उसके अनुगामी लोगो के चरित्र क्यूँ कर न भ्रष्ट होंगे,जैसे गुरु वैसा चेले होने चाहिए|

ईसाई मजहब एक गलत मजहब है| वह लोगो को गुमराह करता है| इसीलिए कोई समझदार आदमी इस मजहब में प्रवेश नही करता है| ईसाई लोग धोखे,मक्कारी व लोभ लालच से भोले बेपढ़े गरीब मेहतरो को बहका कर ईसाई बना लेते है| किसी पढ़े लिखे आदमी से यह कभी बात करने की हिम्मत नही करते है|

ये भारत में पैदा हुए भारतीय अन्न जल से पले,भारतीय इसाई आज स्वतंत्र देश के नागरिक होते हुए अपने भारतीय पूर्वज राम कृष्ण को भूल कर विदेशी ईसा को अपना दिल व दिमाग बेच कर उसकी उपासना करते है| उसकी गुलामी में फंसे है| कितनी शर्म की बात है कि जिनके रक्त से पैदा है उन्ही को भूल बेठे है|

मेरे इसाई बंधुओ तुम्हारा ओर हम भारतीयों का खून का रिश्ता है,विदेशी ईसा से तुम्हारा पानी का रिश्ता है| खून का रिश्ता पानी के रिश्ते से वजनी होता है|जब देश स्वतंत्र हो गया तो हमारे देश के लिये| भारतीय आर्य रक्त वालो के लिए यह कलंक की बात है कि अपने देश के महापुरुषों को त्याग कर विदेशियों की गुलामी में अपने दिमाग को ख़राब करे| अत: मै भारतीय इसाई बंधुओ से अपील करता हु कि वै आर्य समाज में शुद्धि करा कर अपने पूर्वजो के सत्य वेद धर्म को स्वीकार करे,ओर मानव जीवन को सफल करे|

ईसा के अंध भक्त विदेशीय पादरियों से भी मुझे दो शब्द कहने हैं कि तुम लोग अपने घर योरोप व अमेरिका में जाकर पाहिले उसे ठीक करो जहा चोरी,जिनाखोरी,शराब,गोश्तखोरी बदकार आम रिवाजे है|सारा ईसाई संसार एक दुसरे के खून का प्यासा है| गत दो महायुद्ध इसका सबूत है|

तुम भारत में बदमाशिया करना बंद करो| भारत के लोग धर्म के बारे में तुमसे ज्यादा जानते है|तुम अभी धर्म ज्ञान के बारे में बच्चे हो| अपनी शुद्धि करा कर हम आर्यों से अभी तुम धर्म के बारे में शिक्षा प्राप्त करो|

तुम्हारे धर्म में दुनिया की सारी बुराइया भरी हुई है| एक भी ऐसी ज्ञान विज्ञानं की बात ईसाई मजहब या बाइबल में नही है जिस पर तुम गर्व कर सको, जिस थोथे धर्म को धोखे,मक्कारी व लालच से तुम भारत के गरीबो में फ़ैलाने चले हो उसका खंडन तो भारत का बच्चा बच्चा कर सकता है| इसलिए नौकरियों व लम्बी लम्बी तनख्वाहो के कारण तुम लोगो को गुमराह करने की कोशिश करने से बाज आओ| वरना दम हो तो शाश्त्रथो द्वारा अपने धर्म की सत्यता सिद्ध करने के लिए मैदान में उतरो| यह हमारे सारे ईसाई जगत को निमंत्रण है|

जिन विदेशिय पादरियों का ऐसा ख्याल है कि वे भारत निवासियों को ईसाई बना कर (योरोप अमरीका वालो के हम मजहब बना कर) पुन: भारत को विदेशियों का गुलाम बना सकेंगे वे मुर्ख की दुनिया में रहते है | ऐसे देश द्रोही पादरियों को भारत से तुरंत बाहर निकाल देना भारत सरकार का कर्तव्य है|

…………………………………………………समाप्त……………………………………………………………………..

women in Vedas and in Islam

rani

देखिये वेद में कहा गया है की-

सम्राज्ञेधि श्वसुरेषु सम्राज्ञयुत देवृषु |

ननान्दुः सम्राज्ञेधि सम्राज्ञयुत श्वश्रवाः ||४४||

                     (अथर्ववेद ४-१-४४)

   अर्थात- हे देवि ! अपने श्वसुर आदि के बीच तथा देवरों के बीच व ननन्द के साथ ससुराल में महारानी बन कर रह |

    वैदिक धर्म के अन्दर नारी की स्थिति पतिगृह में महरानी की है | वह सभी की आदरणीय होती है | सारे घर व परिवार का संचालन उसी के हाथ में रहता है घर की सारी सम्पति, धन, आभूषण सभी उसके अधिकार में रहते है |

   पति तथा परिवार के सभी लोग प्रत्येक महत्वपूर्ण काम में उसकी सलाह लेते हैं तथा उसकी इच्छानुसार ही सारे कार्य सम्पन्न होते हैं |

   इस्लाम मत के अनुसार नारी को पैर की जूती के समान बुरी निगाह से नहीं देखा जाता है, अपितु पति के कुल में  वह पति एवं पुत्र की दृष्टि में सर्वप्रमुख स्थान रखती है |

    हिन्दू धर्म में एक पुरुष के लिए एक ही नारी से विवाह करने का विधान है न की इस्लाम की तरह चार-चार औरतों से निकाह करने व रखेलें रख कर उनके जीवन को कलेशमय बनाने का आदेश है | एक बार शादी होने के बाद हिन्दू पति को प्रत्येक अवस्था में अपनी पत्नी को जिन्दगी भर धर्मपत्नी के रूप में निबाहने की आज्ञा है और सारे हिन्दू इसका पालन करते हैं | हिन्दू समाज में नारी बुर्के में कैद नहीं रखी जाती है | वह बहुत हद तक स्वतंत्र है और हर काम में पति की सहचरी है | नारी का जो पवित्र आदरणीय स्थान हिन्दू धर्म में है वह संसार के किसी भी मजहब में नहीं है | माँ,पुत्री,बहिन एवं पत्नी के रूप में वह सदैव पूज्या एवं आदरणीया है |

    इसीलिए अन्य मजहबों की समझदार सेकड़ों स्त्रियाँ हिन्दू धर्म में आना पसंद करती है जहाँ तलाक जायज नहीं है |

शरियः (इस्लामी कानून) में औरतों की दुर्दशा

१.       मुस्लिम महिलाओं की स्थिति मुस्लिम समाज में बन्धुआ मजदूरों जैसी है, क्योंकि उनको वहाँ कोई स्वतंत्रता अथवा समता प्राप्त नहीं है | वे अपने पति की दासी (गुलाम) हैं और मुस्लिम पति की अन्य अनेक अधिकारों के साथ अपनी पत्नी की मारने पीटने, सौतिया डाह देने एवं अकारण विवाह विच्छेद (तलाक) के स्वेच्छाचारी अधिकार प्राप्त हैं | मुस्लिम पत्नी की किसी दशा में विवाह विच्छेद तक का अधिकार नहीं है |

                                                              (आइ० एल० आर० ३३ मद्रास २२)

२.       उपरोक्त अधिकार मुस्लिम पत्नियों को पवित्र कुरान में कही नहीं दिए गए हैं |

                                            (ए० आई० आर० १९७१ केरल २६१ एवं १९७३ केरल १७६)

परन्तु फिर भी उनका उपभोग किया जा रहा है, और उपरोक्त भय एवं डर के कारण मुस्लिम पत्नियाँ कुछ नहीं कह पाती है | अभी कुछ दिन पहले मुस्लिम महिलाओं द्वारा अपने परिवार के साथ भी सिनेमा देखने पर उनकी मारपीट की गई और कहीं-कहीं उनके अंग भंग टेक के समाचार मिले हैं | अर्थात उन्हें अपने समाज में भी बराबरी के अधिकार प्राप्त नहीं हैं | यह अत्याचार “शरियत के नाम पर उसकी दुहाई देते हुए ही किये जाते हैं |

३.       मुस्लिम पतियों के नाम इन अप्रतिबंधित अधिकारों में से मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान एवं बंगलादेश ने पतियों के विवाह विच्छेद के अधिकार पर अंकुश लगा दिया है |

१.       मुसलामानों पर शरियत कानून उनके अपने धर्म के प्रति अधिक सजग रहने के कारण लागू नहीं होता है, बल्कि शासन द्वारा बनाए गए सन १९३७ ई० के शरियत लागू करने के कानून से लागू है, और इसी आधार पर ब्रिटिश काल में अंग्रेज सरकार ने शरियत कानून में संशोधन कर मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम सन १९३९ ई० से लागू कर मुस्लिम पतियों द्वारा अपनी पत्नियों पर किये जा रहे अमानुषिक अत्याचार रोकने की दशा में पग उठाया था |

         इस कानून को पारित होने के पूर्व तक मुस्लिम पत्नी को अपने पति द्वारा अपनी पत्नी धर्म का पालन न करने देने, व्यभिचार तक को बाध्य करने का प्रयत्न करने पर भी उनके भरण पोषण का प्रबंध करने, अथवा स्वयं पति के नपुंसक, पागल, कोढ़ी, उपदंश आदि भयंकर रोगों से पीड़ित होने पर अथवा व्यभिचारी होने पर भी, अथवा अपनी पत्नी से भी मारपीट करने एवं अन्य निर्दयी व्यवहार करने पर भी अपने ऐसे पति से भी विवाह विच्छेद प्राप्त करने की अधिकारिणी नहीं थी |

२.       विवाह एक सामाजिक संस्था है और उसमें समय एवं परिस्थिति के कारण परिवर्तन एवं संशोधन आवश्यक होता है, और इस सम्बन्ध में राज नियम भी बनाये जा सकते है, और यदि धर्म भी आड़े आवे तो शासन उसमें संशोधन कर सकता है |

                     (संविधान अनुच्छेद २६)

  हिन्दुओं में विवाह धार्मिक संस्कार होते हुए भी समय की मांग के अनुसार उसमें संशोधन किये गए है |

३.       अपना पवित्र संविधान १५ (३) के अंतर्गत महिलाओं की सुरक्षा आदि के लिए विशेष राज नियम बनाने का अधिकार देता हैं | मुस्लिम महिलाओं की स्थिति दयनीय है उनकी सुरक्षा एवं उन्नति के लिए बंधुआ मजदुर उन्मूलन अधिनियम सन १९७६ ई० के अनुरूप कानून बनाया जाना आवश्यक है |

          देवदासी प्रथा उन्मूलन के सम्बन्ध में भी कानून बनाये जाने की मांग उठा रही है | अपने राष्ट्र के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश एवं वर्तमान में उपराष्ट्रपति माननीय मोहम्मद हिदायततुल्ला महोदय एवं अन्य अनेक उच्च न्यायालय प्रमुख विधिवेता एवं विचारकों नेब भी मुस्लिम महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए कानून बनाये जाने की आवश्यकता बताई हैं |

अतः निवेदन है की मुस्लिम महिलाओं की उन्नति एवं उन्हें बराबर के अधिकार दिलाये जाने के लिए विशेष कानून का निर्माण किया जाना अतिआवश्यक है

साभार-समाचार पात्र से प्रकाशित उद्घृत

  इस प्रकार हमने इस लघु-पुस्तिका के माध्यम से नारी की स्थिति का दिग्दर्शन कराया है 

आप लोग स्वयं विचारें और गंभीरता से सोचें, क्योंकि यह एक सामाजिक ही नहीं अपितु राष्ट्रीय प्रश्न है, हमारा किसी के प्रति कोई भेदभाव या ईर्ष्या-द्वेष नहीं है, बल्कि हम चाहते है की- “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया” अर्थात संसार के सभी प्राणी सुखी व प्रसन्न रहते हुए ही जीवनयापन करें |

Niyog in Bible and in Quran : Aacharya Shir Ram Sharma

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इसी प्रकार की व्यवस्था तौरेत में लिखी हुई मिलती है जिसका निम्न प्रमाण दृष्टव्य है, देखिये वहां लिखा है की-

    “जब कई भाई संग (एक साथ) रहते हों और उनमें से एक निपुत्र मर जाए तो उसकी स्त्री का विवाह परगोत्री से न किया जाए, बल्कि उसके पति का भाई उसके पास जाकर उसे अपनी पत्नी कबूले और उससे पति के भाई का धर्म पालन करे” ||५||

    “और जो पहिला बेटा उस स्त्री से उत्पन्न हो वह मरे हुवे भाई के नाम का ठहरे जिससे की उसका नाम इस्त्राएल में से न मिट जाए” ||६||

    “यदि उस स्त्री के पति के भाई को उसे ब्याहना न भाए तो वह स्त्री नगर के मुख्य फाटक पर वृद्ध लोगों से जाकर कहे की मेरे पति के भाई ने अपने भाई का इस्त्राएल में बनाए रखने से नकार दिया है और मुझसे पति के भाई का धर्म पालन करना नहीं चाहता” ||७||

    “तब उस नगर के वृद्ध लोग उस पुरुष को बुलवा कर उसको समझायें, और यदि वह अपनी बात पर अड़ा रहे और कहे की मुझको इसे ब्याहना नहीं भाता” ||८||

    तो उसके भाई की पत्नी उन वृद्ध लोगों के सामने उसके पास जाकर अपने पाँव से जूती उतार कर उसे मारे और उसके मुँह पर थूक दे, और कहे-

…………………………“जो पुरुष अपने भाई के वंश को चलाना न चाहे उससे इसी प्रकार व्यवहार किया जाएगा” ||९||

   तब इस्त्राएल (इजरायल) में उस पुरुष का यह नाम पडेगा—

……………………………………………………………………………………………………”जुती उतारे हुए पुरुष का घराना” |

                                                                 (देखिये तौरेत व्यवस्था विवरण २५)

दुसरा प्रमाण बाइबिल (पुराना धर्म नियम) का भी देखें

बोअज ने कहा ………. फिर मह्लोंन की स्त्री रुतमोआबिन को भी में अपनी पत्नी करने के लिए इस मंशा से मोल लेता हूँ की मरे हुए का नाम उसके निज भाग पर स्थिर करूँ |

     कहीं ऐसा न हो की मरे हुए का नाम उसके भाइयों में से और उसके स्थान के फाटक से मिट जाए | तुम लोग आज साक्षी ठहरे हो |

                                                                                       (लूत-४)

 भाइयों ! उपरोक्त प्रमाण-

     “संतानोच्छुक विधवा के साथ सम्बन्ध करके संतान पैदा न करने पर औरत जुते मारती है और मुँह पर थूकती है” |

  वंश संचालनार्थ नियोग की तौरेत में यह व्यवस्था उचित ही थी जो यहूदी समाज में प्रचालित थी, हाँ ! तरीके में भेद अवश्य रहा है |

   वीर्य तत्व का हिन्दुओं की दृष्टि में अत्यंत महत्व है, उसे नष्ट करना, अय्याशी के चक्कर में मुसलमानों की तरह बर्बाद करना हिन्दू लोग पाप समझते हैं त्तथा सभी हिन्दू लोग- “उसे धारण करना जीवन और उसे बर्बाद करना मृत्यु समझते हैं” | बल बुधि का विकास दीर्घ स्वस्थ प्रसन्नतापूर्ण जीवन की प्राप्ति वीर्य धारण करने से ही संभव होती है |

    वीर्य धातु का उयोग केवल संतान उत्पादनार्थ ही हमारे धर्म में निहित है | इसलिए यह विधान किया गया है की उसका उपयोग व् प्रयोग केवल प्रजा वृद्धि में ही किया जावे |

    यदि कोई गलत आहार व्यवहार से अपने ब्रह्माचर्य को स्थिर रखने में समर्थ पावे तो वह गृहस्थाश्रम में जाकर उसका सदुपयोग करे | अथवा समाज के सम्मुख अपनी विवशता प्रकट करे और स्वीकृति से किसी ऐसे क्षेत्र में उसका उपयोग करे जिसे संतान की इच्छा है |

   यदि उसका पति नपुंसक हो व स्त्री विधवा हो और उसे वंश संचलनार्थ संतान की इच्छा हो | “इसे ही नियोग की आपातकालिक व्यवस्था कहा जाता है” |

 तौरेत में नियोग की एक व्यवस्था और भी देखिये-

यहूदा ने ओनान से कहा की—

    “अपनी (विधवा) भौजाई के पास जा और उसके साथ देवर का धर्म पूरा करके अपने भाई के लिए संतान उत्पन्न कर” ||९||

   ओनान तो जानता था की संतान तो मेरी न ठहरेगी, सो ऐसा हुआ की जब वह अपनी भौजाई के पास गया तब उसने भूमि पर वीर्य गिरा कर नाश किया जिससे ऐसा न हो की उसके भाई के नाम से वंश चले ||१०||

……………………..यह काम जो उसने किया उससे यहोवा खुदा अप्रसन्न हसा और उसने उसको भी मार डाला ||११||

                                                                              (तौरेत उत्पति ३८)

   कुरान की मान्य खुदाई पुस्तक तौरेत की यह धटना उसके मान्य खुदा यहोवा की ओर से साक्षात नियोग प्रथा ही थी जो वंश चलाने के लिए उस समय समाज में स्वीकृत व चालु थी |

 चार-चार औरतों से शादियाँ व अनेक रखेलें रखने से विर्यनाश का इस्लाम में दरवाजा खुला हुआ है, मरने पर जन्नत में ५०० हूरें, चार हजार क्वारी औरतें व आठ हजार विवाहिता औरतें हर मिंया को मिलेंगी उनसे खुदा उनकी शादी कराएगा, गिल्में (लौंडे) भी खुदा प्रदान करेगा यह सब बताता है की-

   “इस्लाम में पुरुष जीवन का मुख्य उद्देश्य ही विषयभोग करना व वीर्यत्व का विनाश मनोरंजन के लिए करना है” |

  और खुदा इससे सहमत है की शराबें पीकर विषयेच्छायें जन्नत में १२,५०० औरतें मिलने वाली बात को मिर्जा हैरत देहलवी ने अपनी किताब मुकद्द्माये तफसीरुलकुरान में पृष्ठ ८३ पर लिखी हैं |

  क्योंकि कुरान में लिखा है की-

………………………………………………….आदमी के सो जाने पर उसकी रूह को खुदा अपने पास बुला लेता है ||४२||

                                                        (कुरान पारा २४ सुरह जुमर रुकू ५ आयत ४२)

मिर्जा हैरत देहलवी भी खुदा के पास जाकर जन्नत का सारा तमाशा खुद ही देख कर आये थे | कोई भी मौलवी उनकी चश्मदीद बात को गलत साबित कैसे कर सकता है ?

   आगे देखिये कुरान क्या कहता है ?-

……….“और जो अपने परवरदिगार के सामने खड़े होने से डरा और इन्द्रियों (नफस-विषयभोग) की इच्छाओं को रोकता रहा” ||४०||

……………………………………………………………………………………………………तो उसका ठिकाना बहिश्त है ||४१||

                                                        (कुरान पारा ३० सुरह जुमर आयत ४० व ४१)

इसमें विषय भोग से बचने वालों को “बहिश्त” मिलने का उपदेश दिया गया है किन्तु स्वयं ही हजरत मौहम्मद साहब ने ही इसका पालन कभी नहीं किया जैसा की कुरान से स्पष्ट है, देखिये वहां लिखा है की-

   “ऐ पैगम्बर ! हमने तेरी वह बीबियाँ तुझ पर हलाल की जिनकी मेहर तू दे चुका है और लौंडिया जिन्हें अल्लाह तेरी तरफ लाया और तेरे चचा की बेटियाँ और तेरी बुआ की बेटियाँ और तेरे मामा की बेटियाँ और तेरी मौसियों की बेटियाँ जो तेरे साथ देश त्याग कर आई है” |
   …………………………………………………..और वह मुसलमान औरतें जिन्होनें अपने को पैगंबर को दे दिया बशर्ते की पैगंबर भी उनके साथ निकाह करना चाहे | यह हुक्म ख़ास तेरे ही लिए है सब मुसलामानों के लिए नहीं ||५०||

    ऐ पैगम्बर ! इस वक्त के बाद से ….. दूसरी औरतें तुमको दुरुस्त नहीं और न यह की उनको बदल कर दूसरी बीबी कर लो | अगर्चे उनकी खूबसूरती तुमको अच्छी ही क्यों न लगे | मगर बांदियां (और भी आ सकती हैं) और अल्लाह हर चीज को देखने वाला है ||५२||

                                                      (कुरान पारा २२ सुरह अह्जाब रुकू ६ आयत ५२)

(बंदियों से जिना (सम्भोग) करना कुरान में जायज है | रामनगर, बनारस के एक मौलवी अबूमुहम्मद ने हजरत साहब की बीबियों की संख्या बारह लिखी है (यह उनकी निकाही औरतें थी) जो इस प्रकार है देखिये—

१:- खदीजा……….पुत्री खवैलद,

२:- सौदह………….पुत्री जमअः,

३:- आयशा………पुत्री अबूबकर,

४:- ह्फजा…………..पुत्री उमर,

५:- जैनब………..पुत्री खजीमा,

६:- उम्मेसलमा…….पुत्री अबूउमय्या,

७:- जैनब…………………..पुत्री जह्श,

८:- जुवेरिया……………….पुत्री हारिस,

९:- रेहाना………………….पुत्री मजीद,

१०:- उम्मे हबीबा….पुत्री अबूसुफ़यान,

११:- सफीया…………………पुत्री लम,

१२:- मैमून:………..पुत्री……………?

   निकाही इन एक दर्जन बीबियों के अतिरिक्त बिना निकाही औरतें व दासियों के रूप में उनके पास कितनी स्त्रियाँ और रहती थी ? उनकी संख्या व नामावली हमको नहीं मिल सकी है | किन्तु उनकी संख्या भी यथेष्ट ही रही होगी क्योंकि खुदा ने वे उनको भेंट की थी |

    ब्रह्माचर्य व संयम का उपदेश दूसरों को देने वालों के लिए उस पर स्वयं आचरण करना अधिक आवश्यक होता है तभी अनुगामी लोगों पर उसका असर पड़ता है, देखिये—

   “खुद चालीस साल की उम्र में हजरत मुहम्मद साहब ने केवल सात साल की बच्ची आयशा से अपनी शादी की थी- इस मिसाल को पेश करके उन्होंने अपना कौन सा गौरव बढ़ाया था” ?

    पाठक स्वयं सोचें | दूसरों के लिए कुरान में एक-एक, दो-दो, तीन-तीन, चार-चार औरतों से शादी की मर्यादा बांधना व स्वयं एक दर्जन शादियाँ करना “दीगर नसीहत व खुदरा फजीहत” वाली बात है | आप ज़रा गौर फरमाएं—

   “आज जिस मामाजात-मौसीजात व बूआजात तथा चचाजात लड़की को बहिन कहना व दुसरे दिन उसे ही जोरू बना लेना क्या यही धार्मिक मर्यादा इस्लाम में औरत की इज्जत है” ??

   इस्लाम में जो आज भाई है वही कल शौहर बन जाता है | देखिये जो आज गोद लिए हुवे बेटे की बहु है वही दुसरे दिन अपनी बीबी बना ली जाती है जैसा की-

    “जैद की बीबी जैनब के लिए खुदा की इजाजत लेकर हजरत मौहम्मद साहब ने अपनी बीबी बना कर एक जुर्रत से ज्यादा हिम्मत वाला दृष्टान्त प्रस्तुत किया था” |

   इस तरह तो जो बाप की रखेल के रूप में आज माँ है कल वही आपके बेटे की बीबी भी बन सकेगी |

क्या इसी अरबी बेहूदी सभ्यता को इस्लाम संसार में फैलाकर, नैतिकता और सभ्य संसार की सभी आदर्श वैज्ञानिक मर्यादाओं का विनाश करने पर तुला हुआ नहीं है ? क्या अरबी खुदा इतना भी नहीं जानता था की निकट के विवाह संबंधों से आगे की नस्ल बिगड़ कर अनेक रोगों की शिकार बन जाती है |

   और तो और दुनिया में कुते पालने वाले भी यह जानते हैं की अच्छी नस्ल बनाने के लिए दूर की नस्ल से मिलान कराके अच्छे कुते पैदा कराते हैं | परन्तु अरबी कुरान लेखक खुदा को इतनी सी साधारण बात भी समझ नहीं आती थी , ताज्जुब है ?

   क्या इससे यह साबित नहीं होता की मुस्लिम समाज में बहिन-बेटी माँ आदि के सभी रिश्ते कोरे दिखावटी मात्र हैं, असली रिश्ता तो हर औरत से लुत्फ़ का ही इस्लाम में माना जाता है |

    देखिये इमाम अबू हनीफा तो यही मानते थे की-

  “मौहर्रम्मात आब्दिय:” अर्थात सभी माँ, बहिन व बेटी से जिना (सम्भोग) करना पाप नहीं है |

 

यह आदर्श तो केवल हिन्दू समाज में ही कायम है, की जिसको माँ-बहिन या बेटी एक बार अपनी जुबान से कह दिया तो उससे जीवन भर उसी रूप में हिन्दू समाज रिश्ता निबाहता है और हर स्त्री अपनी इज्जत के लिए वहाँ आश्वस्त रहती है |

   जिससे जिसका एक बार विवाह हो गया वह दोनों जीवन भर हर स्थिति में पति-पत्नी के रूप में उसे पालन करते हैं | इस्लाम की तरह ऐसा नहीं है की-

    इस्लाम की तरह उसे जब भी चाहे तलाक दे दे अथवा औरत मर्द को या मर्द औरत को पुरानी जूती की तरह जैसा की इस्लाम में नारी बदलने की कुरान में समर्थित रिवाज है |

   नारी की प्रतिष्ठा इस्लाम में केवल “विषयभोग” के लिए पशु धन के रूप में क्रीत दासी के समान है |

  जबकि हिन्दू धर्म में वह माता-पुत्री पत्नी व देवी के रूप में उपासनीय व आदरणीय स्थान पाती है | पता नहीं मुस्लिम नारी अपनी वर्तमान स्थिति को कैसे व कब तक बर्दाश्त करती रहेगी ?

  हमको कुरान की इस विचित्र व्यवस्था पर भी आपति है, देखिये जिसमें कहा गया है की-

 फिर जिन औरतों से तुमने लुत्फ़ अर्थात मजा उठाया हो तो उनसे जो (धन या फीस) ठहरी थी उनके हवाले करो, ठहराए पीछे आपस में राजी होकर जो और ठहरा लो तो तुम पर इसमें कुछ गुनाह नहीं | अल्लाह जानकार और हिकमत वाला है |

                                 (सुरह निसा आयत २४)

यह व्यवस्था समाज के लिए बहुत आपतिजनक है | “औरतों के सतीत्व की कीमत कुछ पैसे ?” कुरान मानता है जो वेश्याओं की फीस की तरह उनसे पहिले ठहरा लियी जाने चाहिए और उसके बाद उनसे अय्याशी की जानी चाहिए

    यदि निकाह कर लियी हो और उनसे फीस (मेहर) ठहरा की गयी हो तो मर्द जब भी चाहे अपना शौक पूरा करने पर वह फीस या मेहर उनको वापिस देकर तलाक दे सकता है, उन्हें घर से निकाल सकता है, उनसे छुटी पाकर नई बीबी कर सकता है |

   इस प्रकार नारी की स्थिति मर्द का शौक पूरा करना उस दशा में बन जाती है जबकि वह उसे पकड़ लावे-लुट लावे या वह किसी प्रकार भी उसके कब्जे में आ जावे |

   यदि स्त्री एक बार मर्द की ख्वाहिश (इच्छा) पूरी करने की फीस ठहराने के बाद आगे भी उसके कब्जे में फंसी रहे तो मर्द उससे आगे की फीस भी तय कर ले यही तो इस आयत के शब्दों का अर्थ है और यह सब अरबी खुदा की आज्ञा के अनुसार होता है |

   शादी के वक्त जो रकम मर्द द्वारा पत्नी को तलाक देने की एवज अर्थात दशा में देनी तय होती है उसे ही “मेहर” कहते हैं | औरत की इज्जत (अस्मत) का मूल्य बस केवल यह “मेहर” ही तो होती है | मर्द चाहे जितनी औरतों से निकाह करता जावे, बस ! उससे तय की हुई मेहर (पारिश्रमिक) उसे देकर तलाक देता हुआ रोज नित औरतों से निकाह करने का उसको पूरा अधिकार है | उस पर जिम्मेवारी केवल मेहर देने मात्र तक की ही रहती है | और इससे ज्यादा वह कुछ भी उससे नहीं ले सकती है |

  इस्लाम में नारी की दशा का यह सही चित्रण पेश किया गया है जो मुस्लिम नारियों व समझदार मुसलामानों की सेवा में विचारणीय है की पैसे के बल पर तथा पशु बल से, मर्द औरत के सतीत्व व उसके शरीर की कितनी दुर्दशा कर सकता है ? और यह सब इस्लाम मजहब में जायज है |

अधिक पत्नियां रखने पर जहाँ पुरुष का जीवन कलेशमय हो जाता है, घर का वातावरण भी अत्यन्त कलहपूर्ण अर्थात जी का जंजाल बन जाता है, संतान भी बाप की देखा देखि विषयभोग प्रिय व दुराचारी बन जाती है, वहां सौतियां डाह (ईर्ष्या द्वेष) से नारियों का जीवन भी दोजखी अर्थात नरकमय और दुःखी व दुराचारपूर्ण बन जाता है |

   चाहे मर्द कितना ही सम्पन्न व औषधि सेवन करके पत्नियों को सम्भोग से संतुष्ट रखने का यत्न करने वाला ही क्यों न हो ? इस विषय में हजरत मौहम्मद साहब के परिवार की स्थिति भी बहुत खराब थी, जैसा की कुरान से ही स्पष्ट है | देखिये कुरान में खुदा कहता है की-

   “ऐ पैगम्बर की बीबियों ! तुम में से जो कोई जाहिरा बदकारी करेगी उसके लिए दोहरी सजा दी जायेगी और अल्लाह के नजदीक यह मामूली बात है” |

                                                           (कुरान पारा २२, सुरह अहजाब आयत ३०)

देखिये आगे भी खुदाई आदेश क्या कहता है ?:-

     “अगर तुम दोनों (ह्फजा और आयशा) अल्लाह की तरफ तौबा करो, क्योंकि तुम दोनों के दिल टेढ़े हो गए हैं और जो तुम दोनों पैगम्बर पर चढ़ाई करोगी तो अल्लाह और जिब्रील और नेक ईमान वाले दोस्त हैं और उसके बाद फ़रिश्ते उसके मददगार हैं” ||४||

     “अगर पैगम्बर तुम सबको तलाक दे दे तो इसमें अजब (ताज्जुब) नहीं की उसका परवरदिर्गार तुम्हारे बदले उसको तुमसे भी अच्छी बीबियाँ दे-दे जो ……ब्याही हुई और क्वारी हों” ||५||

                                                            (कुरान पारा २८ सुरह तहरिम आयत ४,५)

यह प्रमाण कुरान के हैं जो सभी मुसलमानों को मान्य हैं | इससे प्रकट होता है की-

   “हजरत मुहम्मद की बीबियों में भारी असन्तोष रहता था वे बदकार भी हो गई थी, वे मौहम्मद से लड़ाई झगडा किया करती थी | कोई औरत बदकार तभी होती है जब मर्द उसे संतुष्ट न रख सके |

    गृह कलह यहीं तक नहीं थी वरन एक बार खैबर में मुहम्मद की यहूदी बीबी जैनब ने उनको जहर भी भुने हुए गोश्त में मिला कर दे दिया था जिसे यद्यपि उन्होंने मुँह में चबा कर तभी थूक दिया था तथा उनका एक साथी बशर बिनबरा ने एक निवाला खाया तो वह मर गया था” |

                    (हफवातुल मुसलमीन पृष्ठ २१५)

आगे बुखारी शरीफ में लिखा है की-

  “बीबी आयशा ने कहा की हजरत मुहम्मद ने अपनी मृत्यु-शय्या पर लेते हुए कहा की-हे आयशा ! में हर समय उस खाने से दुःख पाता हूँ जो मैंने खैबर में बीबी जैनब के हाथों खाया था और इस समय उस जहर के असर से मेरी जान टूटती हुई सी मालुम होती है” |

               (मिश्कातुल अनवार बाब ३ सफा ५८)

  भाइयों ! अधिक विवाह करने के शौकीनों की यही दुर्दशा होती है, बीबियाँ आपस में लडती हैं व उस खाविन्द पर हमले करती हैं, वे अपने खाविन्द को जहर देकर मारने में भी नहीं चुकती हैं तथा कुछ औरतें तो बदकार होकर गैरों के साथ भाग कर शौहर का नाम भी डुबो देती हैं |

   अंत समय में मनुष्य अपनी भूलों पर पछताता व रोता है किन्तु तब क्या होता है ? जब समय हाथ से निकल चुका होता है |

   इस्लाम में केवल बहु विवाह की प्रथा ही जायज नहीं रही है वरन व्यभिचारियों को व्यभिचार के लिए बाँदियाँ (सेविकायें) चाहे जितनी रखने व उनसे जिना (सम्भोग) करने की भी खुली छुट रही है जैसा की कुरान में आदेश है, देखिये-

……………………………………………………………“मगर अपनी बीबियों और बांदियों के बारे में इल्जाम नहीं है” ||६||

                                                            (कुरान पारा १२ सुरह मोमिनून आयत ६)

   इस प्रकार कुरान व उसकी समर्थक विभिन्न मान्य इस्लामी पुस्तकों से प्रमाणित है की-

     “इस्लाम में नारी की स्थिति पुरुष की काम पिपासा की पूर्ति करना मात्र ही है” |

   वह विवाहित-अविवाहित वा दासी के रूप में जितनी चाहे स्त्रियाँ रखने में स्वतंत्र है पर शर्त केवल यह कुरान में लगाईं गई है की-

    “वह निकाह की गई औरतों से हर बात में एक जैसा व्यवहार रखकर उन सबको संतुष्ट रख सके” |

   इस्लाम की नारी सम्बन्धी व्यवस्था के विपरीत हिन्दू धर्म में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत आदरणीय है | महर्षि मनु ने अपनी मनुस्मृति (धार्मिक न्याय शास्त्र) में लिखा है की-

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: |

यत्रेतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राsला क्रिया:” ||५६||

                          (मनुस्मृति ३:५६)

जिस घर में नारी जाति की पूजा, आदर और सत्कार होता है वहां देवता निवास करते हैं, और वहां धर्मात्मा पुरुष व आनन्द का वास रहता है, और जहाँ उनका अपमान होता है वहां सभी निष्फल हो जाते हैं और वहां केवल क्लेश का निवास होता है |

Muta in Islam (इस्लाम में “मुता” की विचित्र प्रथा)

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 इस्लाम में “मुता” नाम से एक प्रथा चालू है | किसी भी स्त्री को थोड़े समय के लिए कुछ घंटों या दिनों के लिए बीबी बना लेना और उससे विषयभोग करना तथा फिर सम्बन्ध विच्छेद करके त्याग देना “मुता” कहलाता है |

    यह इस्लाम का मजहबी रिवाज है | अय्याशी के लिए मुता करने पर औरत उस मर्द से अपनी मेहर (विवाह की ठहरौनी की रकम) या (फीस) मांगने की भी हकदार नहीं होती है |

   यदि मुता के दिनों वा घंटों में विषयभोग करने से उस स्त्री को गर्भ रह जावे तो उसकी उस मर्द पर कोई जिम्मेवारी नहीं होती है | कोई भी औरत कितने ही मर्दों से मुता करा सकती है या एक मर्द कितनी ही औरतों से मुता कर सकता है, उसकी कोई हद (सीमा) इस्लाम में निश्चित नहीं है | इससे स्पष्ट है की-

………………………………..“इस्लाम में नारी का महत्व केवल पुरुष की पाशविक वासनाओं की पूर्ति करना मात्र है” |

   आश्चर्य है की जिस इस्लाम मजहब में मुता जैसी गन्दी प्रथा चालु है | उस पर भी वह संयम-सदाचार तथा नारी के सम्मान की इस्लाम में दुहाई देने का दुःसाहस करता है ?

   इस्लामी साहित्य में कुछ विचित्र सी बातें लिखी हुई मिलती हैं जिन्हें देखकर यह प्रकट होता है की-

………………………………………………………………………….”संयम नाम की चीज इस्लाम में कभी भी नहीं रही है”|

एक स्थान पर लिखा है की-

…….“रसूलअल्लाह (हजरत मुहम्मद साहब) अपनी सभी औरतों से मैथुन कर चुकने के बाद स्नान किया करते थे” |

 

                                                         (इब्ने मआजा फिबाब छापा निजामी, दिल्ली)

    हजरत आयशा ने कहा-

   “जब दो खतने मिल जावें तो स्नान फर्ज हो जाता है | मैंने और हजरत ने ऐसा करने के बाद ही स्नान किया है” |                                                            (इब्ने मआजा फीबाब गुस्ले सफा ४५)

   हजरत आयशा ने कहा की-

“रसूलअल्लाह रोजा रख कर मेरा मुँह चुमते और मेरे साथ मैथुन करते थे परन्तु वह अपनी गुप्तेन्द्रिय पर तुमसे ज्यादा काबू रखते थे” |

                                                                                 (बुखारी शरीफ)

उपरोक्त बातें इस्लाम में विषय भोग की अत्याधिकता की धोतक हैं | पर आश्चर्य यह है की एक नारी के मुँह से यह बातें कही हुई इस्लामी साहित्य में लिखी हुई मिलती हैं |

   नारी स्वभावतः लज्जाशील होती है ऐसी संकोच की बातों को आयशा बेगम ने कहा होगा, यह विशवास के योग्य नहीं लगती | और यह सत्य है तो यह एक नारी के लिए भारतीय दृष्टि से निर्लज्जता की पराकाष्ठा ही कही जायेगी |

   कोई भी संसार की नारी चाहे वह किसी भी स्थिति की क्यों न हो परन्तु वह ऐसी बातें कह ही नहीं सकती है |

   हाँ ! इस्लाम की बात दूसरी है, आप आगे दो एक प्रमाण और भी देखिये-

      “आयशा रजीउल्लाह से रवायत है की नबी सलेअल्लाहु वलैहि- असल्लम (हजरत मौहम्मद साहब) के साथ आपकी किसी बीबी ने एतकाफ किया और वह बहालत इस्तहाजा (मासिक धर्म) से थी, खून देखती थी तो कभी खून की वजह से वह नीचे तश्तरी रख लेती थी” |

                                                          (बुखारी शरीफ भाग १ सफा ७७ हदीस २११)

आयशा रजीउल्लाहू से रवायत है-

    में और नबी सलेल्लाहू वलैहि असल्लम (मौहम्मद साहब) एक बर्तन में वजू करते थे, दोनों नापाक होते थे, और आप मुझे हुक्म देते थे पस ! में इजार पहिनती (महीने से) थी, और आप मुझसे मुवाशिरत करते थे और में हैजवाली (महीने से) होती थी और आप अपना सर मेरी तरफ कर देते थे, में बहालत एतकाफ और में उसको धोती थी, हालांकि में बहालत हैज (मासिक धर्म) से होती थी |

                                                            (बुखारी शरीफ न० २०८ भाग १ सफा ७६)

   यह प्रमाण इस्लाम में नारी की स्थिति का सही दिग्दर्शन कराते हैं | यह बातें मुस्लिम नारियों को अपनी स्थिति के बारे में विचार करने योग्य हैं |

इस्लाम में नारी को बहिन मानने वाला तथा रिश्ते में भाई ही जब उसे अपनी बीबी बना लेता है तो फिर नारी की वहां क्या प्रतिष्ठा है ? आज जो तुम्हारी बहिन है कल वही तुम्हारी बीबी बन जायेगी |

   जो आज तुम्हारा भाई है कल वह तुम्हारा दूल्हा भाई बन जावेगा, बहिन की लड़की बुआ की लड़की भाई की बेटी चचा की बेटी अपने ही घर में अपने ही घर के भाई की बीबी बना दी जाती है |

   इस्लाम में औरत को गुलाम से भी बदतर  समझा जाता हैं | वह घर में कैदी की तरह रहती है | बुरके में बंद रहते हुए खुली हवा को भी तरसती रहती है |

   मुस्लिम औरतों के इस काले घूँघट का नाम भी ऊटपटांग ही है |  भाइयों ! यह कपड़ा है तो “सर का” ! नाम रखा है “बुर का” !! इस विचित्र भाषा को बोलने में भी शर्म महसूस होती है | (बिहार बंगाल या पूर्वी उतर प्रदेश के निवासी इस भाषा का अर्थ अधिक अच्छी तरह जानते है)
        आजीवन साथी के रूप में वस्तुतः नर और नारी का पवित्र सम्बन्ध क्षेत्र व बीज का है | नारी क्षेत्र है तो नर बीजाधानकर्ता है |

   संतानोत्पति का कर्तव्य दोनों पर आयद (लागू) होता है | गृहस्थ जीवन से आनन्द में रहते हुए वंश परम्परा को जारी रखना, अपने भावी जीवन व वृधावस्था के लिए सुख का आधार संतान को जन्म देना, उसे अपना उतराधिकारी बनाना उसे सुशिक्षा द्वारा देश व समाज के लिए योग्य नाग्तिक बनाना यह सभी गृहस्थों के उतरदायित्व होते हैं |

  इसीलिए प्रत्येक माता-पिटा अपनी संतान की इच्छा रखते हैं | बालक को गोद में खिलाने, उसे प्यार करने, उसे सुखी कर स्वयं सुख अनुभव करने की इच्छा सभी की होती है |

    जिनके संतान नहीं होती है वह उसके अभाव को अत्याधिक अनुभव करते व जीवन भर परेशान रहते हैं | उनके निधन के पश्चात उनकी सम्पति की दुर्दशा होती है तथा वृधावस्था में वे सेवा सहायता के लिए दुःखी पाए जाते हैं यह सब लोक में प्रायः नित्य देखा जाता है |

   लोक में विचारकों व समाज के लिए उन्नतिकारक नियम बनाने वालों के द्वारा अपने अपने समाजों के लिए सभी प्रकार की हालतों पर विचार करके शुभकालिक व आपतिकालिक अवस्थाओं के लिए अपने अपने देश की परिस्थितियों के अनुसार व्यवस्थाएं बनाई गई हैं जो उनके धर्म ग्रंथों में संग्रहित हैं और उनके समाज उनके द्वारा बनाए गए नियमों के द्वारा संचालित होते रहे हैं |

 आपतिकालिक परिस्थितियों में वे स्थितियां भी है जिनमें पति में दोष होने के कारण संतान पैदा नहीं होती है | पति वृद्ध होने से संतानोत्पति में शक्तिहीन हो, पुरुष में इन्द्रिय सम्बन्धी ऐसे दोष हों की वह इस विषय में असमर्थ हो उसमें वीर्याणु ही न हों या पति की मृत्यु हो जावे और संतान न हो, पति अपनी पत्नी को छोड़ कर परदेस चला जावे और लौट कर ही न आवे |

  पत्नी ही बाँझ ही, उसके शारीर में रोग या प्राकर्तिक बनावट का दैवी दिश जन्मना हो ऐसी विषम परिस्थितियों में यदि पति दूसरी शादी करे ओ गृहकलह को आमंत्रित करना होगा |

   यदि किसी को गोद लेंगे तो उनका उस बालक में तथा बालक का उनमें उतना ममत्व नहीं होगा जितना अपने अंश के साथ होता है |

    ऐसी दशा में भारत के अन्दर नियोजित संतान की व्यवस्था मिलती है उसमें परिवार की सम्पति भी अन्य कुलों में नहीं जाती है, वंश परम्परा भी सुरक्षित रहती है और संतानहीन पुरुष वा संतानहीन स्त्री का जीवन भी संतान मिलने से सदा आनन्दित बना रहता है |

   विधवा पत्नी के दूसरी शादी दूसरी जगह कर लेने पर पूर्व पति की सम्पति दुसरे कुल में चले जाने का भय  बना रहता है तथा पुरुष के वृद्ध माता पिता उस अवस्था में सेवा आदि से भी वंचित हो जाते हैं व् कुल का विनाश हो जाता है |

   कुरान ने भी स्त्री को “खेती” (क्षेत्र) की संज्ञा दी है किन्तु उसमें अप्राकर्तिक (गुदा मैथुन) व्यभिचार का पूत लगा देने से उसे भ्रष्ट कर दिया है, देखिये जैसा की लिखा भी है की-

……………………………………………………………..“तुम्हारी बीबियाँ तुम्हारी खेती हैं जाओ जहाँ से चाहो उनके पास”

  देखिये लखनऊ का छपा कुराने मजीद, शाह अब्दुल कादरी का तजुर्मा

                                                       (कुरान पारा २ सुरह बकर रुकू २८ आयत २२३)

 

Women in Islam (लौंडी (रखैल) औरत) Aacharya Shri Ram Sharma

 

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लौंडियों के बारे में पुस्तक रियाजुस्सालिहीन के पृष्ठ १४१ पर लिखा हैं की- अबूहुरैरा (हजरत) से रवायत है की-

  “रसूलल्लाह सलाल्लेहू वलैहीअसल्लम हजुरे पाक से रवायत है की जब लौंडी बदकारी करे और उसके उस फेल की तहकीकात हो जावे तो उसको हद (बंदिश) लगाईं जावे और डांट फटकार न की जावे फिर अगर दुबारा उससे यह फेल सरजद हो तो उसकी हद लगाईं जावे और जज (डांट फटकार) व तौफिख (झिडकना) न की जावे | अगर तीसरी बार फिर अमल करे तो उसे बेच डाले | ख्वाह बाल की रस्सी के मुआवजे में” |

    कलामे पाक अर्थात कुरान में जो हम पीछे दे चुके हैं उसमें खुलासा लिखा है की-

  …………………………………………………………..“लौंडी से जबर्दस्ती व्यभिचार करने पर खुदा माफ़ कर देता है” ||

                                                          (कुरान पारा १८ सुरह नूर रुकू ४ आयत ३३)

दर्जनों औरतों को लौंडी बना कर रखना उनसे राजी या गैरराजी व्यभिचार करना, इस्लाम में नाजायज नहीं है | मगर यदि वह किसी अन्य से कुछ करा बैठे तो बालों की रस्सी के बदले भी उसे बेच डालने का आदेश है |

 

नोट:- भाइयों ! यह है इस्लाम और कुरान व अरबी खुदा की नजर में  “औरत जात की कदर ?” !

लौंडी (रखेल) को गिरवी रखना

“अगर कोई शख्स अपनी लौंडी (रखेल) को किसी के पास गिरवी रख दे और गिरवी रखने वाला उससे जिना व्यभिचार करे तो उस पर कोई शरायत (शर्त) लागू नहीं, अगर्चे वह जानता भी हो की यह लौंडी मुझ पर हराम है” |

                                                (हिदायह्मुतरज्जिम फ़ारसी जिल्द १ हदीस ३०२ व ३०३)

………………………………………………………………………………………………………..लौंडी का दूध बेचना दुरुस्त है |

                                                                       (फिताबी गरायब पृष्ठ २४८)

………………………………………………….. अपनी लौंडी को जिना की बिना पर (जहर देकर) मार डालना दुरुस्त है |

                                                            (फताबी खजानतह अलरवायत पृष्ठ ४१७)

नोट:- नारी की इस्लाम में कितनी इज्जत की जाती है ? यह ऊपर के प्रमाणों से बिलकुल स्पष्ट हो गया है | अतः शिक्षित मुस्लिम औरतों को इस पर विचार करना चाहिए |

 

Women in Islam: Aacharya Shri Ram Sharma

 

हूदी और कुरानी खुदाओ के आदेश   

यहूदी धर्म की पुस्तक तौरेत जिसे कुरानी खुदा ने खुदाई किताब का दर्जा दिया है, तथा कुरान में कई जगहों पर खुदाई घोषित किया हैं उसमें व्यवस्था विवरण वाले प्रकरण के न० २४ में लिखा है की-

(१)     यदि कोई पुरुष किसी स्त्री को ब्याह ले और उसके बाद उसमें कुछ लज्जा की बात पाकर उससे अप्रसन्न हो, तो वह उसके लिए त्यागपत्र लिख कर और उस त्याग पत्र को उसके हाथ में देकर उसको अपने घर से निकाल दे |

(२)     और जब वह उसके घर से निकल जाए तो तभी वह औरत किसी दुसरे पुरुष की हो सकती है |

(३)     परन्तु यदि वह औरत उस दुसरे पुरुष को भी अप्रिय लगे, और वह उसके लिए त्याग पत्र लिख कर उसके हाथ में देकर उसे अपने घर से निकाल दे या वह दुसरा पुरुष जिसने उसको अपनी स्त्री कर लिया था, वह मर जाए |

(४)     तो उसका पहिला पति जिसने उसको निकाल दिया था उसके अशुद्ध होने के बाद भी उसे अपनी पत्नी न बनाए, क्योंकि यह यहोवा (खुदा) के सम्मुख घृणित बात है |

  इस प्रकार तू उस देश को जिसे तेरा परमेश्वर यहोवा तेरा भाग (हिस्सा) करके तुझे देता है उसे पापी न बनाना |

यहूदी खुदा की इस पहिली खुदाई किताब में लिखा है की-

   “गैर से सम्भोग करा लेने पर पहिला पति उस स्त्री को कदापि स्वीकार न करे”|

यह आदेश है परन्तु कुरानी अरबी खुदा की पहली शर्त ये है की—

  “पूर्व पति द्वारा तलाकशुदा पत्नी को पुन: लेने की शर्त ही यह है की वह किसी दुसरे पुरुष से निकाह करने के बाद सम्भोग कराकर आने के बाद ही उसे वापिस ले सकता है”|

  भाइयों ! यह समझ में नहीं आता की दोनों खुदाओ के हुक्मों में से कौन सा हुक्म ठीक हैं ? मुस्लिम विद्वानों को विचार करके स्पष्टीकरण प्रस्तुत करना चाहिए की इस विषय में दोनों खुदाई आदेशों में विरोध होने का वैज्ञानिक रहस्य क्या है ?

   कुरान की एक व्यवस्था व्यभिचार के समर्थन में और भी देखने लायक है, ज़रा गौर फरमायें—

  ……. और तुम्हारी लोंडिया (रखैल) जो पाक रहना चाहती हैं उनको दुनिया की जिन्दगी के फायदे की गरज से हरामकारी पर मजबूर न करो, और जो उनको मजबूर करेगा तो अल्लाह उनके मजबूर किये जाने के पीछे सबको क्षमा करने वाला मेहरबान और दयावान है |

                                                         (कुरान पारा १२ सुरह नूर रुकू ४१ आयत ३३)

   लोंडियों को जब मजबूर करने पर और व्यभिचार कर लेने पर अरबी खुदा व्यभिचारी मुसलमान को माफ़ कर देगा तो फिर व्यभिचार जुर्म कहाँ रहा ? इसका अर्थ है की खुदा और उसकी अरबी किताब व्यभिचार के खुले समर्थक हैं |

   इस्लाम (सुन्नी सम्प्रदाय) की मान्य अन्य पुस्तकों में तो व्यभिचार का बहुत ही खुला समर्थन किया हुआ मिलता है, देखिये-

   “अगर कोई रोजादार ने किसी दीवानी औरत से सम्भोग कर डाला हो तो दोनों पर कोई पाप या प्रायश्चित लागू नहीं है|”

                                                          (फताबी काजीखां जिल्द अव्वल हदीस १०१)

   “अगर कोई रोजादार शख्स चौपाये या ठण्डी (बिना आसक्ति वाली) औरत या छोटी बच्ची से बदफैली (सम्भोग) करे और उसका इंजाल (वीर्यपात) न हुआ हो तो उसका रोजा नहीं टूटता, और उस पर गुसल भी वाजिब अर्थात लागू नहीं होता” |

                                                               (फताबी काजीखां जिल्द १ सफा १००)

अत: मुसलमानों का इस्लाम में ब्रह्माचर्य की बात कहना उसकी हंसी उडाना है, और लोगों को संयम के नाम पर गुमराह करना है |

  इस्लाम के अन्दर कुरान का निम्न आदेश भी देखने के काबिल है-

“ऐ ईमान वालो (मुसलमानों) जो लोग मारे जावें, उनमे तुमको (जाने के) बदले जान का हुक्म दिया जाता है | आजाद के बदले आजाद और गुलाम के बदले गुलाम तथा औरत के बदले औरत …………….. का हुक्म दिया जाता है” |

                                                             (कुरान सुरह बकर रुकू २२ आयत १७८)

इसमें खुदा ने हुक्म दिया है की-

  “अगर कोई गुंडा किसी भले आदमी की औरत से जीना बिलजब्र (बलात्कार) कर डाले तो उस शरीफ आदमी को भी चाहिए की वह भी उस गुंडे की शरीफ औरत से बलात्कार करे”|

    क्या यही खुदाई इन्साफ है ? की बुराई करने वाले को दंड न देकर उसकी निर्दोष बीबी पर वैसा गुण्डापन करे ? क्या बुराई का बदला बुराई दुनिया में कोई शराफत का कानून है ?

   औरतो की गुंडों से रक्षा क्या ऐसे ही इस्लाम में होती है ? क्या शरीफ औरतों की यही इज्जत अर्थात अस्मत इस्लाम में कायम है ?

  कुरान का एक आदेश और भी देखने योग्य है देखिये कुरान में खुदा का आदेश है की-

  “तुम्हारी बीबियाँ तुम्हारी खेतियाँ हैं अपनी खेती में जिस तरह चाहो जाओ और अपने लिए आइन्दा का भी बन्दोबस्त रखो |

  और अल्लाह से डरो और जाने रहो की (तुम्हे) उसके सामने हाजिर होना है | ऐ पैगम्बर ! सभी ईमान वालों को यह खुशखबरी सूना दो” |

                                                       (कुरान पारा २ सुरह बकर रुकू २८ आयत २२३)

इसमें औरत से चाहे जिस तरह चाहे जिस और से चित या पट्ट वाली स्थिति में सम्भोग करने को खुशखबरी बताया गया है |

  इस आयत पर कुरान के मशहूर तजुर्माकार शाहअब्दुल कादरी साहब देहलवी ने हाशिये पर हदीस दी है की यह आयत क्यों बनी है ? (देखो दिल्ली का छपा कुरान) वहां लिखा है की- 

“यहूदी लोग कहते थे की यदि कोई शख्स औरत से इस तरह जमाव (सम्भोग) करे की औरत की पुष्ट (पीठ) मर्द के मुहँ की जानिब (तरफ) हो तो बच्चा जौल यानी भेंगा पैदा होता है | एक बार हजरत ऊमर राजी उल्लाह अन्स से ऐसा हुआ तो उन्होंने हजरत सलाल्लेहू वलैही असल्लम (मौहम्मद साहब) से अर्ज किया तो यह आयत नाजिल हुई की-“यानी अपनी बीबी से हर तरह जमाअ (सम्भोग) दुरुस्त है”|

   कुरान की इस आयत के सम्बन्ध में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “हफवातुल मुसलमीन” में मौलाना शहजादा मिर्जा अहमद सुलतान साहब मुस्वफवी चिश्ती “खाबर गुडगांवा निवासी” ने सफा ४० व् ४१ पर निम्न प्रकार लिखा है-

    एक दिन जनाब उमर फारुख रसुलल्लाह के पास हाजिर हुवे, और अर्ज किया की- या रसूलअल्लाह ! में हलाक हो गया |

  हुजुर ने फरमाया की- तुम्हे किस चीज ने हलाक किया ?

  उसने (मुहम्मद साहब से) अर्ज किया की- “रात मेने अपनी सवारी को औंधा कर लिया था”|

इब्नअब्बास कहते है की-

  रसूलअल्लाह यह सुन कर चुप रह गए | बस ! अल्लाह ताला ने “वही” भेज दी रसूलअल्लाह की तरफ |

   नोट:- यहाँ वही अर्थात- उसी आयत का जिकर है जो ऊपर कुरान पारा २ सूरते बकर की आयत न० २२३ पर लिखी है की-

   “तुम्हारी बीबियाँ तुम्हारी खेतियाँ हैं वास्ते तुम्हारे जाओ अपने खेत में और जिधर से चाहो और नफस का चाहना करो | बस! अल्लाह से डरो और उसकी सुनो”|

   इसमें औरत से गुदा मैथुन की बात बिलकुल स्पष्ट रूप से खरी साबित हो गई जो कोई भी औरत अपने मुह से ऐसी बात कह नहीं सकती है |

   आगे देखिये कुरान का फरमान-

    “तुम्हारे लिए रोजों की रात में भी अपनी औरत से हम बिस्तरी (सम्भोग) करना हलाल है”|

                                       (कुरान पारा २ सुरह बकर रुकू २३ आयत १८७)

एक रवायत में हजरत इब्नअब्बास फरमाते हैं की—

……………………………………………..“चौपाये के साथ बुरा फ़ैल (कर्म) करे तो उस पर अहद (जुर्म) लागू नहीं होता”|

                                                    (तिरमिजी शरीफ सफा २९० हिस्सा १ हदीस १२९४)

हमारे विचार से यह रवायत कुछ ज्यादा ही सही हैं क्योंकि इसमें कुछ जुर्रत से ज्यादा ही हिम्मत से काम लिया गया है |

आगे देखिये-

   “हजरत आयशा रजीउल्लाह अंस से रवायत है की नबीसलालेहु वलैही अस्लम (हजरत मौहम्मद साहब) ने मुझसे उस वक्त निकाह किया की जब मेरी उम्र सिर्फ ६ साल की थी”|

                                                    (बुखारी शरीफ हिस्सा दूसरा सफा १७८ हदीस ४११)

आगे देखिये कुरान के आदेश-

…………………………………………………………………..और वह लोग जो अपनी शर्मगाहो की हिफाजत करते हैं ||५||

……………………………………………………………….मगर अपनी बीबियों और बंदियों के बारे में इल्जाम नहीं है ||६||

                                                         (कुरान पारा २ सुरह मोमिनून आयत ५ व् ६)

इससे प्रकट है की-

  “इस्लाम में नारी जाती को माता-पुत्री के रूप में नहीं वरन केवल विषयभोग के लिए पत्नी के ही रूप में (मर्दों की अय्याशी के साधन के रूप में) देखा व् व्यवहार में लाया जाता है |

  इस्लाम में उसकी इसके आलावा अन्य कोई स्थिति नहीं है | मर्द जब भी चाहे उसे तलाक दे देवे या बदल ले अथवा उससे जैसा चाहे वैसा व्यवहार करे, इस्लामी कानून या मान्यताएं औरत को कोई हक़ प्रदान नहीं करती, सिवाय इसके की वह जिन्दगी भर मर्द की गुलामी करती रहे | और उसे खुश रखे”

     भाइयो ! यह तो इस दुनियां का हाल रहा, अब जरा खुदा के घर “जन्नत” में भी औरतों की दशा को देख लेवें- कुरान में जन्न्र का हाल बयान करते हुए जन्नती मुसलमानों के लिए लिखा है की-

    “उसके पास नीची नजर वाली हरें होंगी और हमउम्र होंगी”|  (कुरान पारा २३, सुरह साद, आयत ५२)

…………………………………………………………उनके पास नीची नजर वाली बड़ी-बड़ी आँखों वाली औरतें होंगी ||४८||

……………………………………………………………………………………………………..गोया वहां छिपे अंडे रखे हैं ||४९||

                                                             (कुरान सुरह साफ़फात आयत ४८ व् ४९)

…………………………………………………….“ऐसा ही होगा बड़ी-बड़ी आँखों वाली हूरो से हम उनका विवाह कर देंगे” |

                                                                    (कुरान सुरह दुखान आयत ५४)

इनमे पाक हूरें होंगी जो आँख उठा कर भी नहीं देखेंगी और जन्नतवासियों से पहिले न तो किसी आदमी ने उन पर हाथ डाला होगा और न जिन्न ने” ||५६||

“………………………………………………………………………………वह हूरें पेश की जायेंगी जो खीमें में बन्द हैं” ||७२||

                                                                            (कुरान सुरह रहमाना)

………………………………………………………………जन्न्तियों के लिए हमने हूरों की एक ख़ास सृष्टि बनाई है ||३५||

…………………………………………………………………………………………………….फिर इनकी क्वारी बनाया है ||३६||

                                                                            (कुरान सुरह वाकिया)

…………………………………………………………………………………………………………..नौजवान औरतें हमउम्र ||३३||

……………………………………………………………………………………………अछूती हूरें और छलकते हुए प्याले ||३४||

                                                          (कुरान सुरह नहल आयत ३५,३६,३७,३३,३४)

      कुरानी खुदा के उक्त वर्णन के समर्थन में “मिर्जा हैरत देहलवी” ने अपनी किताब मुकद्द्माये तफसीरुल्कुरान में पृष्ठ ८३ पर इस्लामी बहिश्त का हाल लिखा है (जिसे शायद वे वहां जाकर देख भी आये हैं) वे लिखते हैं की हजरत अब्दुल्ला बिन उमर ने फरमाया है की-

      “जन्नत अर्थात स्वर्ग में रहने वालों में सबसे छोटे दर्जे का वह आदमी होगा की उसके पास ६०,००० सेवक होंगे और हर सेवक का काम अलग-अलग होगा | हजरत ने फरमाया की हर व्यक्ति (मुसलमान) ५०० हूरों, ४,००० क्वारी औरतों और ८,००० शादीशुदा औरतों से ब्याह करेगा”|

नोट- जब छोटे दर्जे के लोगों का यह हाल है तो फिर हम जानना चाहेंगे की बड़े दर्जे के लोगों का भी खुलासा कर देते तो अच्छा रहता |

          (इतनी अय्याशी के अलावा भी) स्वर्ग में एक बाजार है जहाँ पुरुषों और औरतों के हुश्न का व्यापार होता है | बस! जब कोई व्यक्ति किसी सुन्दर स्त्री की ख्वाहिश करेगा तो वह उस बाजार में आवेगा जहाँ बड़ी बड़ी आँखों वाली हूरें जमा है और वे हूरें व्यक्ति से कहेंगी की-

 “मुबारक है वह शख्स जो हमारा हो और हम उसकी हों |

इसी मजमून पर हजरत अंस ने फरमाया की-

   “हूरें कहती हैं की हम सुन्दर दासियाँ हैं, हम प्रतिष्ठित पुरुषों के लिए ही सुरक्षित हैं” |

इससे तो यहीं मालुम होता है की-

    “जन्नत में भी रंडियों के चकले चलते है”

यह यहाँ पर इन उपरोक्त वाक्यों से बिलकुल स्पष्ट है |

 भाइयों ! ये है जन्नत के नज़ारे ! इस लोक में भी औरतों से ब्याभिचार और मरने के बाद अल्लाह मियाँ के पास बहिश्त में भी हजारो औरतों से जिना (सम्भोग) होगा |

   क्या इससे यह साबित नहीं हैं की इस्लाम में जिनाखोरी ही जीवन का मुख्य व अंतिम उद्देश्य है ?  यहाँ भी और अरबी खुदा के घर जन्नत में भी | कुरानी जन्नत में औलाद चाहने पर कुरान हमल रह जावेगा और फ़ौरन औलाद होकर जवान बन जावेगी | यह सब कुछ सिर्फ एक घंटे में ही हो जावेगा |

    खुदा की जादूगरी का यह करिश्मा सिर्फ वहीँ जन्नत में देखने को मिलेगा | न औरतों को नौ महीनों तक तकलीफ भोगनी पड़ेगी न वहाँ पैदा शुदा औलाद को पालना पड़ेगा |

                                                          (तिरमिजी शरीफ, हदीस ७२९ जिल्द दोयम)

  इस्लामी जन्नत में सिवाय औरतों से अय्याशी करने और शराब… पीने के अलावा मुसलामानों को और कोई काम धंधा नहीं होगा, कुरान में जन्नत का हाल ब्यान करते हुए लिखा गया है की –

   “यही लोग है जिनके रहने के लिए (जन्नत में) बाग़ हैं | इनके मकानों के नीचे नहरें बह रही होंगी | वहां सोने के कंकन पहिनाए जायेंगे और वह महीन और मोटे रेशमी हरे कपडे पहिनेंगे, वह तख्तों पर तकिया लगाए हुए बैठेंगे | अच्छा बदला है क्या खूब आराम है खुदाई जन्नत में ?”

                               (कुरान पारा १६ सुरह कहफ़ ४ आयत ३१)

………………………………………….यहाँ तुमको (जन्नत में) ऐसा आराम है की न तो तुम भूखे रहोगे न नंगे ||११८||

…………………………………………………………….और यहाँ न तुम प्यासे ही होवोगे और न ही धुप में रहोगे ||११९||

                                                        (कुरान पारा १६ सुरह ताहाल आयत ११८-११९)

……….……………………………………………………………………..……सफ़ेद रंग (शराब) पीने वालों को मजा देगी ||46||

…………………………………………………………………………………………...न उससे सर घूमते हैं और न उससे बकते हैं ||४७||

………………………………………………………उनके पास नीची निगाह वाली बड़ी आँखों वाली औरतें (हुरें) होंगी ||४८||

                                                              (कुरान पारा २३ सुरह साफ़फात रुकू २)

…………………………………………………………….वहां जन्नत में नौकरों से बहुत से मेवे और शराब मंगवाएंगे ||५१||

………………………………………………..इनके पास नीची नजर वाली हूरें (बीबियाँ) होंगी और जो हमउम्र होंगी ||५२||

                                                                       (कुरान पारा १८ सुरह साद)

आगे देखिये कुरान में खुदा ने कहा है की-

………………………………………………..“ऐसा ही होगा बड़ी-बड़ी आँखों वाली हूरों से हम उनका ब्याह कर देंगे” ||४७||

                                                                    (कुरान सुरह दुखान आयत ५४)

……………………………………………………………………………उनके पास लौंडे हैं जो हमेशा लौंडे ही बने रहेंगे ||१८||

                                                                     (कुरान पारा २७ सुरह वाकिया)

……………………………..उन पर चांदी के गिलास और बर्तनों का दौर चलता होगा की वह शीशे की तरह होंगे ||१५||

………………………………………………………….और वहां उनको प्याले पिलाए जायेंगे जिनमें सौंठ मिली होगी ||१७||

                                                                       (कुरान पारा २९ सुरह दहर)

……………………………………………………………………………………..उनके नजदीक नौजवान लड़के फिरते हैं ||१९||

………………………………………………………………………………उनका परवरदिगार उन्हें पाक शराब पिलावेगा ||२१||

                                                                    (कुरान पारा ३० सुरह ततफीफ)

……………………………………………………………………………………………………उनमें कपूर की मिलावट होगी ||५||

                                                                       (कुरान सुरह दहर आयत ५)

…………………………………………………………………………………….”जन्नत में इगलामबाजी लौंडे बाजी होगी” ||६||

                                                                    (दरमुख्तार जिल्द ३ सफा १७१)

…………………………………………क्या खुबसूरत गिलमों (लौंडों) का जन्नत में इसी प्रकार इस्तेमाल किया जाएगा ?

  “लाइलाहइल्लिल्लाह……..”- कहने वाला चोरी और जिना (व्यभिचार) भी करे तो भी जन्नत में ही दाखिल होगा” |

                                            (मिश्कात किताबुलईमान जिल्द १ सफा १२,१३ हदीस न० २४)

हजरत तलक बिन अली फरमाते हैं की नबी करीम सलेअल्लाहु वलैहि असल्लम ने फरमाया की-

   “जब मर्द अपनी बीबी को अपनी हाजत (सम्भोग) के लिए बुलाये तो औरत उसके पास चली जावे ख्वाह्तनूर पर ही क्यों न हो” |

                                                   (तिरमिजी शरीफ हिस्सा १ सफा २३२ (१०२२ हदीस))

मतलब तो यह है की ख्वाह वह किसी भी काम में मशगुल हो उसका छोड़ कर चली आये और उसकी ख्वाहिश को पामाल न करे अर्थात ठुकरावे नहीं |

बाईबिल मे अन्तर्विरोध भाग2

पिछली पोस्ट बाईबिल मे अंतर्विरोध से आगे-

5परमात्मा थक जाता है और विश्राम करता है-

17 वह मेरे और इस्त्राएलियों के बीच सदा एक चिन्ह रहेगा, क्योंकि छ: दिन में यहोवा ने आकाश और पृथ्वी को बनाया, और सातवें दिन विश्राम करके अपना जी ठण्डा किया॥

(निर्गमन 31:17)

6 यहोवा की यह वाणी है कि तू मुझ को त्यागकर पीछे हट गई है, इसलिये मैं तुझ पर हाथ बढ़ाकर तेरा नाश करूंगा; क्योंकि, मैं तरस खाते खाते उकता गया हूँ।(यिर्मयाह 15:6)

24 तू मेरे लिये सुगन्धित नरकट रूपऐ से मोल नहीं लाया और न मेलबलियों की चर्बी से मुझे तृप्त किया। परन्तु तू ने अपने पापों के कारण मुझ पर बोझ लाट दिया है, और अपने अधर्म के कामों से मुझे थका दिया है॥( यशायाह 40:26)

परमात्मा न थकता न विश्राम करता-

28 क्या तुम नहीं जानते? क्या तुम ने नहीं सुना? यहोवा जो सनातन परमेश्वर और पृथ्वी भर का सिरजनहार है, वह न थकता, न श्रमित होता है, उसकी बुद्धि अगम है।

(यशायाह 40:28)

6 ईश्वर सर्व व्यापक है और सब वस्तुओ को देखता ओर जानता है-

9 यदि मैं भोर की किरणों पर चढ़ कर समुद्र के पार जा बसूं,
10 तो वहां भी तू अपने हाथ से मेरी अगुवाई करेगा, और अपने दाहिने हाथ से मुझे पकड़े रहेगा। (भजन संहिता 139:9,10)

21 क्योंकि ईश्वर की आंखें मनुष्य की चालचलन पर लगी रहती हैं, और वह उसकी सारी चाल को देखता रहता है। (अयुब 34:21)

ईश्वर सर्व व्यापक नही है ओर न तमाम वस्तुओ को देखता है और न जानता है-

5 जब लोग नगर और गुम्मट बनाने लगे; तब इन्हें देखने के लिये यहोवा उतर आया। (उत्पत्ति 11:5)

21 इसलिये मैं उतरकर देखूंगा, कि उसकी जैसी चिल्लाहट मेरे कान तक पहुंची है, उन्होंने ठीक वैसा ही काम किया है कि नहीं: और न किया हो तो मैं उसे जान लूंगा। (उत्पत्ति 18:21)

8 तब यहोवा परमेश्वर जो दिन के ठंडे समय बाटिका में फिरता था उसका शब्द उन को सुनाई दिया। तब आदम और उसकी पत्नी बाटिका के वृक्षों के बीच यहोवा परमेश्वर से छिप गए। (उत्पत्ति 3:8)

7ईश्वर मनुष्यो के हृदय को जानता है-

24 और यह कहकर प्रार्थना की; कि हे प्रभु, तू जो सब के मन जानता है, यह प्रगट कर कि इन दानों में से तू ने किस को चुना है। (प्रेरितो के काम 1:15)

21 तो क्या परमेश्वर इसका विचार न करता? क्योंकि वह तो मन की गुप्त बातों को जानता है। (भजन संहिता 44:21)wpid-Jesus-Rifle.jpg

2 तू मेरा उठना बैठना जानता है; और मेरे विचारों को दूर ही से समझ लेता है।
3 मेरे चलने और लेटने की तू भली भांति छानबीन करता है, और मेरी पूरी चालचलन का भेद जानता है। (भजन संहिता 139:2,3)

ईश्वर लोगो के दिल की बात जानने के लिये उनकी जाच करता है-

3 तब तुम उस भविष्यद्वक्ता वा स्वप्न देखने वाले के वचन पर कभी कान न धरना; क्योंकि तुम्हारा परमेश्वर यहोवा तुम्हारी परीक्षा लेगा, जिस से यह जान ले, कि ये मुझ से अपने सारे मन और सारे प्राण के साथ प्रेम रखते हैं वा नहीं? (व्यवस्थाविवरण 13:3)

2 और स्मरण रख कि तेरा परमेश्वर यहोवा उन चालीस वर्षों में तुझे सारे जंगल के मार्ग में से इसलिये ले आया है, कि वह तुझे नम्र बनाए, और तेरी परीक्षा करके यह जान ले कि तेरे मन में क्या क्या है, और कि तू उसकी आज्ञाओं का पालन करेगा वा नहीं। (व्यवस्थाविवरण 8:2)

8ईश्वर सर्व शक्तिमान है-

27 क्या मेरे लिये कोई भी काम कठिन है?(यिर्मयाह 32:27)

26 यीशु ने उन की ओर देखकर कहा, मनुष्यों से तो यह नहीं हो सकता, परन्तु परमेश्वर से सब कुछ हो सकता है। (मत्ति 19:26)

ईश्वर सर्व शक्तिमान नही है-

19 और यहोवा यहूदा के साथ रहा, इसलिये उसने पहाड़ी देश के निवासियों निकाल दिया; परन्तु तराई के निवासियों के पास लोहे के रथ थे, इसलिये वह उन्हें न निकाल सका।(न्यायियो 1:19)

                                                       क्रमश्…………………………………………………………………………।