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भारतीय वर्णव्यवस्था

भारतीय वर्णव्यवस्था

प्रो. ज्ञानचन्द्र रावल, यज्ञदेव…..

मैकाइबर और कूल आदि समाजशास्त्रियों ने अपने अध्ययन के आधर पर बताया है कि सामाजिक वर्ग विश्व के सभी समाज में किसी न किसी रूप में अवश्य पाये जाते हैं। कहीं पर सामाजिक वर्गों का निर्माण जन्म के आधार पर तो कहीं पर धन के आधर पर। इतना निश्चत है कि सामाजिक वर्ग प्रत्येक समाज में अवश्यमेव पाया जाता है। मनुष्य की प्रवृत्तियों तथा व्यवसायों के आधार पर समाज का विभाजन संसार के सभी देशों

में पाया जाता है। इग्लैण्ड के प्रसिद्ध् विद्वान् एच० जी० वैल्स के अनुसार-‘‘मनोवैज्ञानिक प्रवृतियों के आधार पर समाज-विभाजन से समाज का श्रेष्ठ विकास होता है तथा उसकी शक्ति बढ़ती है।’’ किग्सले डविस और मूर के अनुसार-‘‘ समाज अपनी स्थिरता एवं उन्नति के लिए अपने व्यक्तित्व को उनकी योग्यता एवं प्रशिक्षण को ध्यान में रखते हुए विभिन्न वर्गों में बॉट देता है।’’

प्राचीन भारतीय सामाजिक विचारकों ने भी मनुष्य की मनोवैज्ञानिक प्रवृतियों को ध्यान में रखते हुए सामाजिक स्तरीकरण को एक सुनियोजित नीति को अपनाया तथा कार्यात्मक दृष्टि से समाज को चार वर्गों में विभाजित किया। जिन्हें-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के नाम से जाना जाता है। वर्ण-व्यवस्था भारतीय सामाजिक संगठन के मौलिक तत्व के रूप में पायी जाती है। भारतीय संस्कृति में समाज में प्रत्येक व्यक्ति का स्थान तथा उससे सम्बंधित कार्य उसकी मूलभूत प्रवृत्तियों यानी गुणों के आधार पर निश्चित होता था।

. वैविध्य के आधार पर वर्ण व्यवस्थाः

सब मनुष्यों में सब बातें एक समान नहीं हैं। फिर भी जो बातें सभी में समान भाव से पाई जाती हैं उनकी मात्रा समान नहीं है।हितोपदेश कार का कथन है- ‘‘आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्’’ अर्थात् भोजन, निद्रा, भय, और नर-मादा का सहवास-ये पशु और मनुष्यों में समान हैं।प्राणी-मात्र में जो सामान्य बातें पाई जाती हैं उनका यह अच्छा परिगणन है। किन्तु आहार तथा निद्रा आदि भी सब समान मात्रा में नहीं पाये

जाते। जहाँ प्रकार भेद नहीं होता वहाँ मात्रा-भेद अवश्य है। इस प्रकार भारतीय मनीषियों ने मानव समाज के

संगठन के लिए जो संविधान तैयार किया था उसमें इस बात का विशेषध्यान दिया था। गणित शास्त्र में यह बात स्वयंसिद्ध् मानी गई है, कि विषम में सम जोड़ने से विषम उत्पन्न होता है। यथा- ७, ९,११ आदि विषम संख्याएं हैं।इस में २,२ जोड़ने से ७+२:९, ९+२:११, ११+२:१३ होते हैं। इसी तरह यदि विषम को सम बनाना हो तो उसमें विषम अंक तोड़ना पडेगा। जैसे- ७+३: १०, ७+९: १६, ११+५: १६;। आश्चर्य है कि समाजशास्त्रा के आधुनिक पंडित सामाजिक संगठन के समय पर इस स्वयं सिद्ध को भूल जाते हैं।

. पॅूजीवाद, साम्यवाद और वर्णव्यवस्थाः

बस, अब हम पूँजीवाद, साम्यवाद और वर्णव्यवस्था का भेद भली प्रकार समझ सकेंगे। (१) भूखों का हक छीनकर भूखरहितों के पास जमा कर देना पॅूजीवाद कहलाता है।(२) सबको समान भाग देना साम्यवाद कहलाता है। (३)सबको भूख के अनुसार भोजन देना वर्णव्यवस्था है।

साम्यवाद अन्याय का विरोध करते हुए ईर्ष्या को बीच में मिला देता है। और कहता है कि बड़ा-छोटा कोई नहीं। सब समान हैं। वर्ण व्यवस्था इस बात को स्पष्टतया स्वीकार करती है, कि योग्यता और भूख में भेद होने के कारण अधिकारों में भेद का होना आवश्यक है, परन्तु इसका आधार योग्यता ही होना चाहिए, जन्म नहीं।

३. वर्ण का अर्थः वर्ण शब्द ‘वृज’ वरणे से निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ है वरण अथवा चुनाव करना। आप्टे संस्कृत-हिन्दी कोश के अनुसार-‘‘-रंग, रोगन, -रंग,रूप, सौन्दर्य, -मनुष्यश्रेणी, जनजातिया कबीला, जाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, तथा शूद्र वर्ण के लोग )’’ इस प्रकार, व्यक्ति अपने कर्म तथा स्वभाव के आधार पर जिस व्यवस्था का चुनाव करता है, वही वर्ण कहलाता है।कुछ लोगों की मान्यता है कि वर्ण शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग ऋगवेद में रंग अर्थात् काले और गौरे रंग की जनता के लिए किया गया है और प्रारम्भ में आर्य तथा दास इन वर्णों का ही उल्लेख है। डॉ० घुरिये ने ऐसा ही लिखा है कि-‘‘ आर्य लोगों ने यहाँ के आदिवासियों को

पराजित करके उन्हें दास या दस्यु नाम दिया और अपने तथा उनके बीच अन्तर प्रकट करने के लिए वर्ण शब्द का प्रयोग किया जिसका अर्थ रंग-भेद से है।’’ वर्ण के इससे ऐसा आभास होता है कि इस शब्द का प्रयोग आर्यो तथा दस्युओं के बीच पाये जाने वाले प्रजातीय अन्तर को स्पष्ट करने के लिए ही किया गया है। लेकिन यथार्थ में डॉ० घुरिये आदि की यह मान्यता अमान्य एवं दोषपूर्ण है।

इसी तरह पाण्डुरंग वामन काणे की मान्यता है कि-‘‘प्रारम्भ में गौर वर्ण का प्रयोग आर्यों के लिए तथा कृष्ण वर्ण का दासों या दस्युओं के लिए किया गया जाता था। धीरे धीरे वर्ण शब्द का प्रयोग गुण तथा कर्मों के आधार पर बने हुए चार बड़े वर्गों के लिए किया जाने लगा। वास्तव में वर्ण शब्द का अर्थ शाब्दिक दृष्टि से नहीं समझा जा सकता। वर्ण का सम्बन्ध व्यक्ति के गुण तथा कर्म से पाया जाता है। जिन व्यक्तियों के गुण तथा कर्म एक से थे यानी जिनमें स्वभाव की दृष्टि से समानता थी, वे एक वर्ण के माने जाते थे। इस बात का पुष्ट प्रमाण श्रीमद्गीता में समुपलब्ध् होता है- ‘‘चातुवर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः’’ अर्थात् मैने ही गुण और कर्म के आधर पर चारों वर्णों की रचना की है। इससे स्पष्ट होता है कि वर्ण-व्यवस्था सामाजिक

स्तरीकरण की एक ऐसी व्यवस्था है जो व्यक्ति के गुण तथा कर्म पर आधरित है, जिसके अन्तर्गत समाज का चार वर्णों के रूप में कार्यात्मक विभाजन हुआ है।

४-वर्ण-व्यवस्था की उत्पत्तिः वर्ण-व्यवस्था की उत्पत्ति के सम्बन्ध् में भिन्न-भिन्न विचार व्यक्त किये गये

हैं। वेद, उपनिषद्, महाभारत, गीता, मनुस्मृति तथा अन्य धर्म-ग्रन्थों में इस व्यवस्था पर विस्तृत चर्चा की

गई है। यहां इन्हीं ग्रन्थों में विद्वानों द्वारा प्रकट किए गए विचारों के आधर पर हम वर्णों की उत्पत्ति को

प्रस्तुत कर रहे हैं।

यजुर्वेद के ३१वें अध्याय में वर्णों की उत्पत्ति के संबन्ध् में कहा गया है कि-‘‘ब्राह्मण वर्ण विराट पुरुष अर्थात् परमात्मा के मुख के समान हैं, क्षत्रिय उसकी भुजाये हैं, वैश्य उसकी जंघाएं अथवा उदर हैं और शूद्र उसके पांव हैं।’’ इसी तरह ऋगवेद मंडल-१०, सूक्त-९०, मंत्र-१२ लिखा है कि-‘‘ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् बाहूराजन्यः कृतः। ‘‘ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत।।’’ यहाँ ब्राह्मण की उत्पत्ति विराट् पुरुष के मुख से हुई

है ऐसा कहने का अभिप्राय ब्राह्मण शरीर में मुखवत् सर्वश्रेष्ठ है। अतएव ब्राह्मणों का कार्य समाज में बोलना तथा अध्यापकों और गुरुओं की तरह अन्य वर्णस्थ स्त्री-पुरुषों को शिक्षित करना है। इसी प्रकार भुजाएं शक्ति की प्रतीक हैं, इसलिए क्षत्रियों का कार्य शासन-संचालन एवं शस्त्र धारण करके समाज से अन्याय को मिटाकर लोगों की रक्षा करना है। इसीलिए श्रीराम ने वनवासी तपस्वियों के सम्मुख प्रतिज्ञा की थी कि-‘‘निशिरहीन करूं मही भुज उठाय प्रण कीन्ह’ ’वाल्मीकि ने लिखा है-‘‘क्षत्रियाः धनुर्संध् त्ते क्वचित् आर्त्तनादो न भवेदिति’’ अर्थात् क्षत्रिय लोग अपने हाथ में इसीलिए धनुष धारण करते हैं कि कहीं पर किसी का भी दुःखी स्वर न सुनाई दे।जघांएं बलिष्ठता एवं पुष्टता की प्रतीक मानी जाती हैं, अतएव समाज में वैश्यों का कार्य कृषि तथा

व्यापार आदि के द्वारा धन संग्रह करके लोगों की उदर पूर्ति करना और समाज से पूरी तरह अभाव को मिटा

देना है। शूद्र की उत्पत्ति उस विराट् पुरुष के पैरों से मानी गयी है अर्थात् पैरों की तरह तीनों वर्णों के सेवा का भार अपने कंधे पर वहन करना है। विराट् पुरुष के शरीर के विभिन्न अंगों से चारों वर्णों की उत्पत्ति का भाव यह है कि चारों वर्णों में यद्यपि स्वभावगत भिन्न-भिन्न विशेषताएं पायी जाती हैं, तथापि एक ही शरीर के

अलग-अलग भाग होने के कारण उनमें पारस्परिक अन्तर्निर्भरता पायी जाती है। स्पष्ट है कि पुरुष सूक्त के इन मंत्रों के आधार पर विभिन्न वर्गों के गुण, कर्म एवं स्वभाव कितनी सहजता तथा उत्तमता से समझाये गये हैं।

उत्तर वैदिक काल में रचित उपनिषदों में विशेषकर बृहदारण्यक तथा छान्दोग्य उपनिषद् में चारों वर्णों की उत्पत्ति पर विशेष प्रकाश डाला गया है। वहां ब्रह्मा के द्वारा सबसे पहले ब्राह्मण वर्ण पुनः क्षत्रिय, वैश्य तथा सबसे अन्त में शूद्र वर्ण की उत्पत्ति का वर्णन मिलता है।

इसी तरह महाभारत के शान्ति-पर्व में चारों वर्णों की उत्पत्ति के विषय में अपने शिष्य भारद्वाज को सम्बोधित करते हुए महर्षि भृगु कहते हैं कि-‘‘प्रारम्भ में केवल एक ही वर्ण ब्राह्मण था।यही वर्णवाद में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के रूप में विभक्त हो गया। ब्राह्मणों का वर्ण श्वेत था जो पवित्रता-सतोगुण

का परिचायक था। क्षत्रियों का रंग लाल जो क्रोध् तथा राजस गुण का सूचक था, वैश्यों का पीला रंग था जो रजो गुण एवं तमो गुण के मिश्रण का सूचक था और शूद्रों का रंग काला था जो अपवित्रता एवं तमो गुण की प्रधानता का प्रतीक था। ’’इससे सुविदित होता है कि महाभारत काल तक वर्ण-व्यवस्था गुण, कर्म एवं स्वभाव के ही आधार पर थी। अन्यथा ब्राह्मण कुलोत्पन्न परशुराम क्षत्रिय,क्षत्रिय कुलोत्पन्न विश्वामित्र ब्रह्मर्षि, शूद्र कुलोत्पन्न पराशर एवं व्यास आदि को आज संसार ब्राह्मण न मानता।

. वर्ण-व्यवस्था का आधार जन्म या कर्मः वर्तमान समय में वर्ण-व्यवस्था के विषय में मूलभूत प्रश्न यह हे कि यह जन्म पर आधरित हो या गुण, कर्म एवं स्वभाव के आधर पर? साधरणत वर्ण सदस्यता का आधार

जन्म के न मानकर गुण एवं कर्म का माना जाने लगा है, लेकिन इस विषय में विद्वानों में भी एकरूपता नहीं है। आधुनिक युग में वोटों की राजनीति ने इसे और अधिक बढावा दिया है। इस विषय में डॉ० राधकृष्णन् शब्द के हैं-‘‘ इस व्यवस्था में वंशानुक्रमणीय क्षमताओं का महत्व अवश्य था, परन्तु मुख्यतया यह व्यवस्था गुण तथा कर्म पर आधारित थी।’’

इन्होंने महाभारत कालीन एवं उससे प्राचीन के विश्वामित्र, राजा जनक, महामुनि व्यास, वाल्मीकि, अजमीड और पुरामीड आदि के अनेकों उदाहरणों से अपनी बात को प्रामाणित किया है।

डॉ० जी एस घुरिय ने भी वर्ण-व्यवस्था को गुण एवं कर्म के आधार को स्वीकार करते हुए लिखा है कि-‘‘प्रारम्भ में भारत में दो ही वर्ण थे-आर्य और दास अथवा दस्यु। आर्य भारत में विजेता के रूप में आया था उन्होंने अपने को श्रेष्ठ और यहां के मूल निवासियों द्रविडों को निम्न समझा, स्वयं को द्विज और द्रविडों को दास या दस्यु कहा। समय के साथ-साथ जैसे-आर्यों की संख्या में वृदि्ध् हुई- उनके कर्मों में विभिन्नता आती गई और द्विज वर्णों के आधार पर ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य वर्णों में विभक्त हो गया।’’

के.एम. पणिक्कर की मान्यतानुसार- ‘‘यदि जन्म ही वर्ण सदस्यता का आधार होता तो विभिन्न वर्णो के पेशों में किसी प्रकार का कोई परिवर्तन सम्भव नहीं था। परन्तु प्राचीन साहित्य से उपलब्ध् प्रमाण यह प्रकट करते हें कि ब्राह्मण न केवल धर्म कार्य का सम्पादन एवं अघ्ययन ही करते थे बल्कि वे साथ ही औषध्,शस्त्र

निर्माण एवं प्रशासन सम्बन्धी कार्य में भी लगे हुए थे।……….वैदिक साहित्य में कहीं ऐसा वर्णन नहीं मिलता जिससे प्रकट हो कि लोगों के लिए जन्म के आधार पर व्यवसाय का चुनना अनिवार्य था। पवित्र ग्रन्थ‘ऐतरय ब्राह्मण’ की रचना एक ब्राह्मण ऋषि एवं उसकी दस्यु पत्नी से उत्पन्न और सपुत्र ने की थी। इस कथन से स्पष्ट है कि वर्ण की सदस्यता कर्म के आधर पर प्राप्त होती थी न कि जन्म के आधर पर’’

इस उपर्युक्त विवेचना से सुस्पष्ट हो जाता है कि प्राचीनकालीन वर्ण-व्यवस्था गुण, कर्म एवं स्वभाव के ही अनुसार थी। परन्तु महाभारत युद्ध के बाद योग्य राजा एवं योग्य विद्वानों के अभाव में सारी सामाजिक व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई। यदि भारत को वह पुराना विश्वगुरु वाला गौरव पुनः प्राप्त करना है तो वही प्राचीन वर्ण-व्यवस्था दुबारा से लागू करनी होगी।

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वर्णमीमांसा

वर्णमीमांसा

ब्र. यशदेव आर्य…..

इस आर्यावर्त्त देवभूमि में रहने वाले सहृदय- नागरिकों एवं विभिन्न धर्मावलम्बियों को यहाँ की प्राचीनतम संस्कृति धार्मिक भावना एवं कर्तव्यों को जान लेना अत्यन्तावश्यक है। क्योंकि प्राचीन समय में वर्णों एवं आश्रमों का वर्गीकरण जिस प्रकार से यथास्थिति को जानकर किया जाता था वैसा आज देखने को नहीं

मिलता। अब तो केवल जन्मना वर्णवाद एवं धर्मान्धता का कुप्रचार अधिक दिखाई व सुनाई देता है। वर्तमान

काल में आश्रमी जीवन की दुर्गति वर्णव्यवस्था के नाम पर पापाचार सर्वत्र विस्तृत हुआ है, क्योंकि अब की वर्ण व्यवस्था प्राचीन वर्णव्यवस्था से एकदम भिन्न है। इसके सुस्पष्ट प्रमाण धर्मशास्त्रों एवं विभिन्न स्मृतियों में प्रत्यक्ष देखने को मिलते हैं यथा आपस्तम्ब धर्मसूत्र में

धर्मचर्य्यया जघन्यो वर्णः पूर्वं पूर्वं वर्णमापद्यते जातिपरिवृतौ ।१.५.१०

धर्म के सदाचारण से निम्न से निम्न वर्ण भी उत्तम वर्ण को प्राप्त होता है उसे उसी वर्ण में गिनना चाहिए।

क्योंकि सदाचार शून्य उच्च वर्गस्थ भी शूद्र के समान है एवं सदाचारी निम्न जातीय भी ब्राहमणत्व को प्राप्त करता है।

अधर्मचर्य्यापूर्वो वर्णो जघन्यं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तौ। आपस्तम्ब-१.५.११

अर्थात् अधर्माचरण से युक्त उच्च वर्णस्थ शूद्रत्व को प्राप्त हो जाता है। वर्ण शब्द से ही यह सिद्ध हो जाता है कि धर्मानुसार वर्ण कहते किसे है यह जन्मना हो अथवा कर्मणा तब निघण्टु भाष्य निरुक्त में निरुक्तकार वर्ण शब्द की व्युत्पत्ति ‘वर्णो वृणोतेः’ इस वचन से करते हैं अर्थात् कर्मों के आधार पर जिसका वरण किया जाए वही वर्ण है। इस तथ्य पर प्रकाश डालते हुए महर्षि ने ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका के वर्णाश्रम धर्म विषय में स्पष्ट किया है कि-

वर्णो वृणोतेरिति निरुक्तप्रामाण्यादपरणीया वरीतुमर्हाः। गुणकर्माणिच दृष्ट्वा यथायोग्यं व्रियन्ते ये ते वर्णाः।।

वर्ण कर्मानुसार ही हो जन्मना नहीं इसकी पुष्टि ब्राहमण क्षत्रादि शब्दों की रचना व्युत्पत्ति एवं व्याकरणानुसार

हो जाती है। यथा-ब्रहमणा वेदेन परमेश्वरस्य उपासनेन च सह वर्तमानो विद्यादि उत्तम गुणयुक्तः पुरुषः।

विद्यादि आदि श्रेष्ठ गुणों का धारण करने वाला एवं परमात्मा एवं वेदोपासना में चित्त को रमा लेने वाला

ही ब्राहमण होता है। महर्षि मनु ने भी ब्राहमण के इन्हीं प्रमुख कर्तव्यों का उल्लेख मनुस्मृति में किया है। ‘आग्नेयो हि ब्रा२णः(काठ.२९.९०) यज्ञादि कर्मों से सम्बन्ध रखने वाला ही ब्राहमण होता है। यदि जन्मना वर्ण व्यवस्था को सत्य माना जाए तो समाज कुंठाग्रस्त होकर ही मर जाएगा। वृद्धि का कहीं भी कोई भी चिहन

अथवा संकेत प्रकट नहीं होगा। वृद्धि होगी भी तो उच्च वर्णस्थ लोगों की होगी अथवा यूँ कहें कि वृद्धि होगी ही नहीं क्योंकि जन्मना वर्ण व्यवस्था के आधार पर ब्राहमण ही रहेगा और शूद्र भी शूद्र। किसी को अपनी प्रोन्नति करने का कोई अवसर ही प्राप्त न होगा। ब्राहमण नीच कर्मों में प्रवृत्त भी ब्राहमण ही होकर रहेगा और शूद्र धर्माचरण करता हुआ भी शूद्र। अतः मनुस्मृति में –

शूद्रो ब्राहमणतामेति ब्राहमणश्चैति शुद्रताम्।

क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यास्तथैव च।।(१०/६५)

गुण कर्मों के आधार पर शूद्र भी ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य हो सकता है। इसी प्रकार अन्य वर्णों को भी समझना चाहिये।

लोकानां तु वृह्यर्थं मुखबाहूरुपादतः।

ब्राहमणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं च निरवर्तयत्।।(१/३१)

लोक की वृद्धि के लिए मुख, भुजा, जंघा और पाद रूप इन चतुवर्ण-व्यवस्था का आरम्भ हुआ। इसी प्रकार कर्मणा वर्णव्यवस्था के आधारभूत अन्य शास्त्रों, ग्रन्थों एवं वेदों मे भी चतुर्वर्ण का उल्लेख मिलता है।

ऊर्जादः उत यज्ञियासः पञचजनाः मम होत्रं जुषध्वम्। ऋग. (१० .५३.४)

पाँचवे वर्ण का विधान निरुक्त में किया है चत्वारो वर्णा निषादः पंचम इति औपमन्यवः।(निरुक्त.-३.८) अर्थात् चार वर्णों के पश्चात् निषाद को पाँचवा पुरुष मानना चाहिए, यह वेद सम्मत है।

इन चारों वर्णों का अपना-अपना महत्व है और वेद में इसकी तुलना मनुष्य शरीर से उनके कार्यानुरूप की गई है यथा शरीर में मुख प्रधान है उसी प्रकार समाज में ब्राहमण। भुजाओं का कार्य शरीर रक्षा व अन्य, इसलिए

क्षत्रिय भुजा रूप है। जंघा शरीर का भार सम्भालने वाली होती हैं, इसलिए वैश्य व्यापारादि कार्य से समाज आदि का भार सम्भालने वाला होता है। पैरों से संज्ञा शूद्र की की गई है। अर्थात् जो इन तीनों के कर्मों को करने में असमर्थ हो वह शूद्र।

ब्राहमणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।

ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत।।(यजु.-.३१/११)

इसी प्रकार

अस्य सर्वस्य ब्राहमणो मुखम्; शतपथ-(३.९.१.४ )

क्षत्रिय– क्षत्रं राजन्यः (एत.८.२, ३.४)

एवं क्षत्रस्य वा एतद रुपं यद् राजन्यः

(शतपथ.१३.१.५.३) अर्थात् क्षत्रिय क्षत्र का ही एक रूप है, जो दुष्ट शत्रुओं से हमारी रक्षा करता है, इसी प्रकार

वैश्य के संदर्भ में ग्रन्थों में अनेकशः प्रमाण मिलते हैं। यथा एतद्वै वैश्यस्य समृह्येत् पशवः (तां.-१८.४.६)

पशुपालन से वैश्य की समृद्धि होती है। इसका सीधा एवं स्पष्ट तात्पर्य वैश्य के कर्म से है अर्थात् जो

व्यक्ति पशुपालन, व्यापार आदि कार्यों में संलग्न है, वही वैश्य है।

महर्षि मनु ने शूद्र को कहीं पर भी अपवित्र, अछुत एवं हीन की संज्ञा नहीं दी है। उनके मतानुसार जो व्यक्ति सबकी सेवा करने वाला हो, वह अपवित्र कैसे हो सकता है। उत्कृष्टः शुश्रूषुः (मनु.९/३३५) शूद्र को शूद्र की संज्ञा केवल मात्र इसलिए दी गई क्योंकि अन्य वर्णों की तुलना में वह अल्पज्ञानी होता है और इस अज्ञानता

के कारण उसका दूसरा जन्म गुरु के कुल में न होने से वह शूद्र संज्ञा से सम्बोधित किया जाता है। द्विर्जायते इति द्विजः।

ब्राहमण, क्षत्रिय एवं वैश्य को द्विज इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इनका दूसरा जन्म गुरु के गर्भ से वेदारम्भ

के काल में होता है। महर्षि मनु ने इस विषय में स्पष्ट किया है –

ब्राहमणक्षत्रियो वैश्यस्त्रयो वर्णाः द्विजातयः।

चतुर्थ एकजातिस्तु शूद्रः नास्ति तु पंचमः।।

गुणकर्मानुसार वर्णव्यवस्था के स्पष्ट संकेत ब्राहमणग्रन्थों में मिलते हैं। ब्राहमण व्यक्ति भी कर्मों के आधार पर क्षत्रिय वैश्य अथवा शूद्र बन सकता है। यथा- ऐतरेय में उदाहरण आता है स ह दीक्षमाणः एव

ब्राहमणतामभ्युपैति (ऐत. ७.२३) अर्थात् क्षत्रिय दीक्षित होकर ब्राहमणतत्त्व को प्राप्त हो जाता है। तस्मात् अपि

(दीक्षितम्) राज्यन्यं वा वैश्यं वा ब्राहमण इत्येव ब्रूयात्। ब्राहमणो हि जायते यो यज्ञात् जायते।(शत. ३.२.१.४०)

अर्थात् क्षत्रिय वैश्य भी यज्ञ दीक्षा ग्रहण करके ब्राहमण वर्ग में दीक्षित हो सकता है। यहाँ पर यज्ञ में दीक्षित होने से तात्पर्य ब्रहमचर्याश्रम में वेदाध्ययन के समय से है। उसके बाद वह ब्राहमण भी कर्मानुसार क्षत्रियत्व,

वैश्यत्व अथवा शूद्रत्व को प्राप्त होते हैं। उपरोक्त विवेचना एवं विभिन्न प्रामाणिक ग्रन्थों के स्पष्ट एवं मजबूत प्रमाणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि वर्णव्यवस्था जन्मना न होकर कर्मणा ही श्रेयस्कर एवं न्यायपूर्ण है। इसी के आधार पर हमें अपने वर्ण का चयन करना चाहिए, तभी एक सुव्यवस्थित समाज एवं राष्ट का विकासपूर्ण ढाँचा तैयार होगा।

-गुरुकुल पौन्धा, देहरादून (उ.ख.)

जाति बनाम वर्ण व्यवस्था

जाति बनाम वर्ण व्यवस्था

श्री यदुनाथ आर्य…..

वर्तमान हिन्दू समाज अपनी जाति-भेद की प्रथा के कारण बहुत बदनाम है। कोई समय था जब यह प्रथा बुद्धि संगत सिद्धान्तों पर आश्रित थी, और वर्ण व्यवस्था कही जाती थी। इस समय ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। अब तो इसका ढांचा मात्र शेष रह गया है। आज का हिन्दू समाज बहुसंख्यक जातियों और उपजातियों में बंटा हुआ है। जिनको वेदों का तनिक भी समर्थन प्राप्त नहीं है। आज इस प्रकार के मनमाने ढंग से विभाजन का

परिणाम अशान्ति के सिवा और कुछ नहीं हुआ करता।वेद में मनुष्य के चार प्रकार के वर्गीकरण का प्रतिपादन

किया गया है।

यत् पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्।

मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरू पादा उच्येते

ब्राहमणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यःकृतः।

ऊरु तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ||

इस वर्गीकरण के अनुसार समाज का मुख ब्राहमण, भुजाएँ क्षत्रिय, जंघाएँ वैश्य और पैर शूद्र माने जाते हैं। वर्ण-व्यवस्था के वर्ण शब्द के अर्थ से बड़ा भ्रम फैला है। साधारणतः वर्ण का अर्थ रंग होता है। इस अर्थ

के आधार पर कुछ लोगों ने वर्ण-व्यवस्था के रूप में समाज के वर्गीकरण को रंगभेद पर आश्रित माना है।

उन्होंने अपनी इस मान्यता के समर्थन में कहा है कि मूलनिवासी श्याम वर्ण के थे इसलिए उन्हें हेय दृष्टि से देखा गया था और दास बना लिए गये थे। यदि इस मान्यता को स्वीकार कर लिया जाये तो समाज के श्याम और गौर ये दो विभाग होने चाहिएँ। मुख भुजाओं, जंघाओं, और पैरों के रूप रंग में शरीर का विभाजन किसी प्रकार भी रंग पर अवलम्बित नहीं हो सकता। तुम सिर से लेकर पैरों तक देख जाओ। शरीर के सब अवयवों का रंग एक जैसी ही दिखाई देगा। इससे स्पष्ट है कि रंग का सिद्धान्त रंग-भेद के पक्षपातियों की झूठी कल्पना है। वर्णों के गुण-कर्म-वर्णन-प्रसंग कई वेद-मन्त्रों द्वारा बताया गया है कि वेद के समस्त मन्त्र गुण और कर्म की योग्यता पर वर्ण निर्णय करते हैं। इन में एक भी शब्द ऐसा नहीं है जो बिना योग्यता के केवल किसी का पुत्र होने के कारण वर्ण की उपाधि देने का संकेत करता हो। आप जन्म से वर्ण मानने वालों की युक्तियों को तौलिये और प्रमाणों पर चिन्तन करिए। सबसे प्रथम परमात्मा के रचनाओं पर चिन्तन कीजिए- वृक्षों में आम, पीपल, अमरुद, अनार आदि पशुओं में गौ, गधा, घोड़ा आदि पक्षियों में तोता, मैना, मयूर आदि इसी प्रकार मनुष्यों में ब्राहमण क्षत्रियादि भेद हैं। ऐसा कहने वाले वर्ण और जाति एक वस्तु मानकर भारी भूल करते हैं अथवा स्वयं वास्तविकता को जानते हुए भी स्वार्थवश साधारण जनता को भ्रम में डालते हैं। जाति का

लक्षण न्यायदर्शनकार गौतम मुनि जी लिखते हैं, ‘‘आकृतिरितिलिाख्या’’ (न्याय.२.२६८) इस पर वात्स्यायन मुनि भाष्य में कहते हैं। ‘यथा जाति जाति लिन्गानि च प्रत्याख्यायन्ते तामाकृतिं विद्यात् जिससे जाति और जाति के चिह्न बताये जाते हैं उसे आकृति कहते हैं। अब स्वभाविक रुप से प्रश्न उठता है कि जाति किसे कहते हैं? तो उत्तर में कहा गया है- समानप्रसवात्मिका जातिः(न्या. २/२/१९) इस पर भी वात्स्यायन मुनि भाष्य में कहते हैं- या समानां बुद्धिम प्रसूते भिन्नेष्वधिकरणेषु,यया बहूनीतरेतरतो न व्यावर्तन्ते, योऽर्थोऽनेकत्र प्रत्ययानुवृत्तिनिमित्तं तत् सामान्यम्। यच्च केषाघिद भेदं कुतश्चिद्भेदं करोति तत् सामान्य विशषा जातिरिति।’’

अर्थात् भिन्न-भिन्न वस्तुओं में समानता उत्पन्न करने वाली जाति है। इस जाति के आधार पर अनेक वस्तुएँ आपस में पृथक् पृथक’ नहीं होतीं अर्थात्-एक ही नाम से बोली जाती हैं। जैसे गौएँ पृथक् कितनी भी हो तो भी सबको गौ कहते हैं। यह एकता जाति के कारण ही उत्पन्न हुई जाति भी दो प्रकार की होती है-एक सामान्य दूसरी सामान्य-विशेष जो अनेक वस्तुओं में एक आकार की प्रतीत होती है वह सामान्य जाति है, जैसे पशु जाति सामान्य है।

यह पशुत्व गौ, भैंस, घोड़े आदि में सामान्य (एक जैसा) है। जो किसी से भेद और किसी से अभेद कराती है वह सामान्य विशेष जाति है जैसे गौ। गौ की प्रतीति सब गौओं में एक-जैसी होती है, यह तो हुआ अभेद पर घोड़े को गौ नहीं समझ सकते यह हुआ भेद, तो इसका नाम सामान्य विशेष जाति है। उक्त दोनों जातियों

में से मनुष्य सामान्य जाति है। मनुष्यत्व की दृष्टि से सभी वर्ण मनुष्य हैं, न उनमें कोई ज्येष्ठ है और न कनिष्ठ। ज्येष्ठता और कनिष्ठता वाले तो गुण होते हैं। मनुष्य योनि क्योंकि कर्म और भोग दोनों योनि हैं, अतः इसमें गुणों के साथ कर्म पर भी ध्यान देना अनिवार्य है। अतः ब्राहमणादि वर्णों का निर्णय गुणों और कर्मों के आधार पर होने के कारण ही वर्णों का नाम वर्ण पड़ा, क्योंकि वर्ण शब्द का अर्थ गुण और कर्म हैं-

वरणीया वरितुमर्हा गुणकर्माणि च दृष्ट्वा यथायोग्यं व्रियन्ते ये ते वर्णाः। गुण और कर्म देखकर जो किसी

समुदाय-विशेष के स्वीकार किये जावें, वे वर्ण कहलाते हैं। निरुक्त को वर्ण का अर्थ कर्म भी कहा गया है-वृतमिति कर्मनाम वृणोतीति सतःयहाँ ‘‘वृज’’ धातु से बनने वाले वृत् शब्द का अर्थ स्पष्ट ही कर्म लिया है, और साथ ही हेतु दिया है– वृणोतीति सतः – क्योंकि शुभकर्म मनुष्य को ढक लेते हैं, अतः व्रत का अर्थ कर्म है। इसी प्रकार इसी धातु से निष्पन्न हुए वर्ण शब्द का अर्थ‘‘वर्णो वृणोते….’’ के आधार पर गुण और कर्म है। अतः सामान्य जाति का सामान्य विशेष जाति के साथ मिलान करना भारी भूल है। हाँ, जिस प्रकार आम्र में खट्टे-मीठे आदि गुणों का भेद होता है, वैसे तोते तोते में पढ़ने या न पढ़ने के गुण का भेद होता है। गौ-गौ में न्यून और अधिक दूध आदि देने के गुण का भेद होता है। इसी प्रकार मनुष्यों में अच्छे और बुरे गुणों और कर्मों के आधार पर भेद है। इसी को शास्त्र ने वर्ण कहा है। यदि सामान्य विशेष जाति पशु, वृक्ष, पक्षियों का-सा मनुष्य में भी भेद होता तो जिस प्रकार भिन्न-भिन्न पशुओं के झुण्ड में से गौ, भैंस आदि को पृथक्-पृथक् पहचान लेते हैं, वृक्षों और पक्षियों को पृथक्-पृथक् जानते हैं, इसी प्रकार मनुष्यों के समूह में से ब्राहमण, क्षत्रियादि को अलग से पहचान लेते, किन्तु कोई भी नहीं पहचान सकता। चार वर्ण हैं- ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।आजकल समाज में लोग जहाँ जन्म के अनुसार वर्ण मानते हैं वहाँ आर्यों का मत है गुण-कर्म-स्वभाव और जीविका के साधन के अनुसार वर्ण को स्वीकार करता है।जन्मपरक वर्ण व्यवस्था के नाम पर अतीतकाल में हिन्दू समाज में शूद्रों पर जो अत्याचार किये गए, उनकी कथा अत्यन्त हृदय-द्रावक है।शूद्रों को छूने तक में पाप समझा जाता था, फिर उनके साथ समानता के व्यवहार की आशा ही क्या की जाती?शूद्रों को विद्या और वेद पढ़ने के अधिकार से वंचित रखा गया और पराय के जैसा उनसे व्यवहार करते थे, तथा जबर्दस्ती उनसे सेवा वसूल करना अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझते थे।किन्तु आर्य समाज का दृष्टिकोण इसके विपरीत

है।आर्य समाज चारों वर्णों को समाज का अवश्य अंग मानता है और जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की प्राप्ति की दृष्टि से सबको समानता के स्तर पर रखता है, अर्थात् जहाँ तक रोटी-कपड़ा और मकान का सम्बन्ध है, वे ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी के लिए समान रूप से आवश्यक हैं और इनकी प्राप्ति में किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।परन्तु जहाँ तक सामाजिक प्रतिष्ठा का सम्बन्ध है, वह सबसे अधिक मात्रा में उनलोगों को उपलब्ध होगी जो अपना सारा जीवन ज्ञान की उपसना में लगाएँगे, जितने भी कलाकार लेखक, अध्यापक, वैज्ञानिक और सरस्वती के साधक हैं और जो समाज के अज्ञान का निराकरण करते हैं वे सबके सब ब्राहमण कहलाएँगे, फिर चाहे उनका जन्म किसी कुल में क्यों न हो।सामाजिक प्रतिष्ठा में दूसरा स्थान होगा उन क्षत्रियों का जो बल की उपासना करते हैं और अन्याय का प्रतीकार अपने जीवन

का लक्ष्य बनाते हैं। सैनिक, योद्धा और राजकीय प्रशासनिक सेवाओं के कर्मचारी इस कोटि में आते हैं। सामाजिक प्रतिष्ठा में तीसरा स्थान होगा धन की उपासना करने वाले और उसी में रत रहने वाले वैश्यों का। व्यापारी उद्योगपति, दुकानदार और अधिकांश नौकरी पेशा लोग भी इसी कोटि में आएँगे।वे सब समाज के भौतिक अभावों की पूर्ति का प्रयत्न करते हैं।ज्ञान, बल और धन की उपासना करने वाले उक्त तीनों वर्णों में भी मूल प्रेरणा स्वार्थ की नहीं प्रत्युत परार्थ की ही है।सार रूप में यों कहा जा सकता है कि जो व्यक्ति राष्ट की अविद्या को दूर करने का प्रयत्न करेंगे वे ‘‘ब्राहमण’’ जो अन्याय को दूर करने का प्रयत्न करेंगे वे ‘‘क्षत्रिय’’ और जो व्यक्ति राष्ट में प्रसृत अभाव की समस्या को हल करने का व्रत लेंगे वे ‘‘वैश्य’’ कहलाएँगें। जो व्यक्ति राष्ट में अविद्यादि अभाव की समस्या को हल करने में विशिष्ट योगदान नहीं दे सकता है वह शूद्र कहलायेगा। समाज के लिए ये चारों समान रूप से उपयोगी है, एक भी अंग अलग हो जाने पर समाज-व्यवस्था अस्त व्यस्त हो जाएगी।

जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् द्विज उच्यते।

प्रत्येक व्यक्ति जन्म से शूद्र होता है, उसके पश्चात् संस्कारों के आधान से प्राप्त गुण-कर्म के द्वारा वह द्विजत्व को प्राप्त होता है। जिस तरह वकील का बेटा जन्म से वकील नहीं और डॉक्टर का बेटा जन्म से डॉक्टर नहीं होता उन्हें क्रमशः वकालात और डॉक्टरी पास करने पर ही वकील और डॉक्टर कहा जा सकता है, उसी प्रकार ब्राहमणत्व के गुण-कर्म से ही न ब्राहमण का बेटा भी ब्राहमण नहीं हो सकता। उसे विद्याध्ययन, तपस्या और सदाचार के द्वारा ब्राहमणत्व अर्जित करना होगा। जन्म परक जाति की मान्यता सामाजिक विकास का जितना उत्तम उपास है, उतना और कोई उपाय नहीं हो सकता।

-स्नातक,

गुरुकुल पौन्धा, देहरादून

आदर्श समाजवाद वैदिक साहित्य के परिपेक्ष में

आदर्श समाजवाद वैदिक साहित्य के परिपेक्ष में

प्रो. ज्ञानचन्द रावल , ललित चौहान…..

इस संसार में प्रारम्भ से लेकर आज तक अनेकों संस्कृति या समय-समय पर पैदा हुईं तथा विनष्ट हो गयीं परन्तु उन सभी संस्कृतियों में भारतीय संस्कृति आज भी अत्यन्त समृद्ध एवं समुन्नत है जिसके विषय में

कविवर इकबाल ने कभी कहा था कि-

‘‘है बात क्या कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।

सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमा हमारे।।

यूनान मिस्र रोम सब मिट गये जहा से।

बाकी मगर है अब तक नामोनिशा हमारा।।’’

भारतीय संस्कृति और सभ्यता उतनी ही प्राचीन है जितनी कि यह सृष्टि अर्थात् यह भारतीय संस्कृति

जगत् के प्रारम्भ से ही विद्यमान है उस समय देश अनेक जातियों एंव उपजातियों में विभक्त न होकर एक ही मानव जाति में बिना किसी रूप में संगठित था समस्त मानवजाति बिना किसी भेद-भाव के शांतिपूर्वक फली-फूली इसके मूल में वैदिक शिक्षा का पावन संदेश ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ की पवित्र भावना काम कर रही थी। यह थी उदात्त कल्पना वैदिक संस्कृति की जिसमें एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति की रक्षा की बात

कही गई है।’’ आज समाज को उस प्राचीन रूप में प्रतिष्ठित करने के लिये निम्नलिखित मुख्य उपायों को

व्यवहार में लाना होगा।

  • परस्पर भ्रातृभाव

अग्नि ऋषि प्रणीत ऋगवेद के मण्डल पाच सूक्त संख्या साठ के मंत्र संख्या पाच में निम्नलिखित ह्रदयग्राही

सदुपदेश प्राप्त होता है-

‘‘अज्येष्ठासो अकनिष्ठासो ते सभ्रातरो वावृधुः सौभगाय।

युवा पिता व्वया रुद्र एषां सुधुधामं  पृथिवीं सुदिनामरुभ्यः।।’’

अर्थात् मनुष्य (जाति रूप रंग तथा नस्ल से रहित) आपस में भाई-भाई उनमें कोई छोटा या बड़ा नहीं है ये सभी मिलकर सौभाग्य की वृद्धि के लिये समुन्नत हो, उन सबका पिता शक्ति सम्पन्न सर्वरक्षक और सबको

मर्यादा में रखने वाला परमेश्वर है और अनेक प्रकार के धन धान्य देने वाली पृथिवी उनकी माता है। इसका भाव यह हुआ है। जिसमें ना कोई बड़ा है न कोई छोटा बल्कि सभी परस्पर भाई-भाई हैं।यह भ्रातृ भाव तभी स्थायी रूप से सुदृढ़ हो पायेगा जब यहा के लोग यह अच्छी तरह से समझ लें कि हम सभी के माता-पिता एक हैं।अस्तित्ववाद की अनिवार्य आवश्यकताओं में से एक आवश्यकता यही है कि उसके द्वारा सबको एक

पिता का पुत्र समझ कर भाई-भाई के पारस्परिक सम्बंध की स्थापना होती है। वेदों में यह उच्च भाव अनेकशः मिलते है। अथर्ववेद के तीसरे काण्ड में इसी तरह का एक और सुंदर प्रसंग प्राप्त होता है यथा-

‘‘करशफस्य विशफस्य द्यौः पिता पृथिवी माता।

यथाभिचक्रः देवास्तथा पकणुता पुनः।।’’

अर्थात् करशफः निर्बल और विशफ प्रबल प्रकाशपुंज (परमात्मा) पिता और यह पृथिवी (उनकी) माता है ऐसा समझते हुए विद्वान् ने (पुरूषार्थ करने का)  जैसा चल चलाया है उसे फिर-फिर काम में लाओ।

– सर्वत्र एक ज्योति का दर्शन-

आदर्श समाज के नवनिर्माण का दूसरा सूत्र सर्वत्र एक प्रभु की निर्मल ज्योति का दर्शन है जिसके पारस्परिक प्रेम की समृद्धि से समस्त समाज सुखमय बन सकता है यथा-

‘‘यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति।

सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते।।’’

अर्थात् जो कोई सम्पूर्ण चराचर जगत् को परमात्मा ही में देखता है यह निंदित नहीं होता। यह शिक्षा कितनी महत्वपूर्ण है तब प्रत्येक प्राणी का शरीर ही उसे ईश्वर का मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर एंव गुरुद्वारा आदि

के रूप में दिखाई देने लगेगा।

ऐसी दशा में कौन मंदमति ऐसा होगा जो उसे तोड़ने की कल्पना भी कर सकता है। इस शिक्षा से मनुष्यों में यह भावना पैदा होती है कि किसी भी प्राणी को तकलीफ नहीं देनी चाहिए। ऋषिवर देवदयानंद के गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति के पुनरुद्धारक स्वामी श्रद्धानंद जी के जीवन में एक ऐसी ही घटना घटित हुई थी एक स्थान से एक समूह आया हुआ था। आवश्यक गोष्ठी (सभा) हो जाने पर सांयकाल जब उनके नमाज अदा करने का समय हुआ तो उनके मुखिया ने पूछा स्वामीजी हमारे नमाज अदा करने का समय हो गया है हमलोग नमाज कहा अदा करे ? तब स्वामी जी ने बड़े सहज भाव से उत्तर दिया इसी यज्ञशाला में आपस भी नमाज अदा कर लें। उन मुस्लिम भाईयों को बड़ा ही आश्चर्य हुआ, उन्होंने कहा स्वामी जी यहां पर तो आप लोग अभी

अपना हवन संध्या कर रहे थे, स्वामी जी ने उसी सहजता एंव सौम्यता के साथ उत्तर दिया तो फिर क्या हुआ ?हमने अपनी विधि से अपनी पूजा कर ली अब आप लोग अपनी विधि से अपनी पूजा कर लें आखिर में वह ईश्वर और अल्लाताला एक ही है। इस उदारता का उन पर बड़ा प्रभाव पड़ा इसी के प्रतिफल स्वरूप दिल्ली के जामा मस्जिद में स्वामी श्रद्धानंदजी का उन्होनें उपदेश बड़ी श्रद्धा से करवाया था। यह सम्मान दूसरे किसी हिन्दू नेता या विद्वान् को आज तक नहीं प्राप्त हुआ। यहा तक कि महात्मा गाधी को भी ऐसा सौभाग्य नहीं मिला इस तरह यह सुस्पष्ट हो जाता है कि एक निर्मल ज्योति के सर्वत्र दर्शन से हिंदु, मुस्लिम, सिक्ख तथा ईसाई आदियों के आपसी भेद-भाव मिटाकर परस्पर प्रेम भाव का संचार होने लगता है इसी प्रेमतत्व को लक्ष्य करके किसी अमेरिकन विद्वान् ने लिखा है कि-

‘‘बड़ी चर्चा सतियों को कुचल देने और वर्निल तथा टोक्यों कि ओर चलने और बिना किसी शर्त के आत्मसम्पर्ण की बात कहलाती है। हम पाश्चात्यों में इसका अभाव ही है बल, हिंसा, बदला लेने की इच्छा, अहंमन्यता, घमण्ड और अधिकार इससे हम खूब परिचित हैं और इसको हमने औरों में भी रोग की तरह फैलाया है, जो उनके हमारे अनुकरण, प्रेम, नम्रता, आत्म त्याग और शान्ति उन्हें हम बहुत थोड़ा जानते हैं। पहले और यह अन्तिम सिद्धांत ही संसार को मौत से बचा सकते हैं। कौन (इस बात से) दुखी हो सकता है कि अब तुला दण्ड पश्चिम से पूर्वकी और झुक रहा है। पश्चिम राज्य अपने पापों से नष्ट भ्रष्ट होंगे और चीन तथा हिंदुस्तान मनुष्यों के अन्तिम ध्येय प्राप्त करने का भार अपने ऊपर लेने की तैयारी करते है।’’

इन उदाहरणों से यह सिद्ध होता है कि भारतीय सभ्यता के मौलिक नियमों को पश्चिमी विद्वान् वर्तमान युद्ध, हिंसा, बर्बरता, उग्रवाद आदि समस्त समस्याओं से मुक्ति पाने का एक सरल एंव सुलभ साधन के रूप मे

मानने को तैयार हो रहे हैं। सार्वदेशिक प्रेम और भ्रातृभाव के अपना ये बिना दुनिया में शान्ति की स्थापना असम्भव है। अतएव वर्तमान समय में विश्व बन्धुत्व की भावना दुनिया में सुख शांति एवं आनन्द के लिये अत्यावश्यक है।

-मतभेद स्वभाविक प्रक्रिया है-

पृथिवी के इस विशाल समाज में मतभेद का होना स्वभाविक है। वेद में इस नियम को इस प्रकार से वर्णित किया गया है यथा-

‘‘समौ चिह्स्तौ न समं विविष्ट, समातरा चिन्न समं दुहाते।

यमयौश्चिन्न समा वीर्याणि, ज्ञातो चित्सन्तौ न सम प्रणीत।।’’

अर्थात मनुष्य के दोनों हाथ बराबर शक्तिवाले नहीं होतें एक गाय की दो पुत्रिया (बछड़िया) बराबर दूध नहीं देती, एक माता के दो सहोदर पुत्र जो एक समाज के एक ही स्टेटस के दो व्यक्ति समाज में बराबर दान नहीं देते। इस विषय पर गम्भीरता से विचार करने पर विदित होता है कि यह जगत् बना ही विषमता के सिद्धांत से है। अर्थात् जब तक सत्व, रजस्, तमस् समान अवस्था में रहते है तब तक यह अवस्था रहती है। जब इन

तीनों गुणों में विषमता आ जाती है तभी सृष्टि का निर्माण प्रारम्भ हो जाता है इस प्रकार संसार के अंदर विषमता का होना स्वभाविक है। संसार में प्रचलित विभिन्न मत विचार भी इसी बात की पुष्टि कर रहे हैं अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि ऐसी स्थिति में हम क्या करें इस सम्बंध में वेद का स्पष्ट संदेश है कि-

‘‘जनं विभ्रती बहुधा विवाचसे’’

अर्थात् पृथ्वी मनुष्यों की रक्षा करती है (जब वे) अनेक भाषाओं और अनेक धर्मों के होने पर भी (इस पृथिवी पर इस प्रकार से मिलकर रहा करते हैं जैसे) एक घर में घरवाले मिल जुलकर रहा करते है उस समय पृथिवी धन की सहस्त्रों धारा उसी प्रकार से दिया करती हैं जैसे- गाय निश्चित रीति से दूध की अनेक धाराए दिया करती है।

वैसे तो संसार में विभिन्नता के अनेक प्रकार हो सकते हैं परन्तु मुख्य रूप से भाषा और धर्मो-कर्तव्यों के

भेद ही हुआ करते हैं यहा पर विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि धर्म शब्द वेद में मजहब या रिलीजन के अर्थ में नहीं आया है यहा पर भी कर्तव्य अर्थ में ही प्रयुक्त हुआ संसार का इतिहास भी इसी ओर इंगित करता है कि जब भी मनुष्य आपस मे मिलकर नहीं रहते तभी देश का पतन और समाज में अशांति का वातावरण बनता है। इतिहास में हुए राम-रावण, कृष्ण-कंस, कौरव-पांडव, पृथ्वीराज-जयचंद, अलाउलहसन-जहासोज और गजनी आदि के युद्ध इसी बात के पुष्ट परिणाम हैं। अमेरिका में गोरो तथा निग्रो में अशांति का मुख्य हेतु भी मिलकर न रहने की भावना ही है।

अतएव इसका समाधान भी यही है कि एक परिवार की तरह परस्पर मित्रवत् वैर भुलाकर रहे तभी सम्पूर्ण मानव समाज इस संसार में सुखी सम्पन्न एवं आनंदित रह सकता है इसी में सभी का कल्याण निहित है। आज संसार के प्रमुख चिंतक मनीषी इसी बात को लेकर चिन्तित है भारत की सबसे बड़ी विशेषता यही है

कि यहा विभिन्न भाषा-भाषी, खान-पान, रीति रिवाज, मत, मजहब, के लोग परस्पर प्रेम भाव से रहते हैं अनेकता में एकता ही भारत की सदा से विशेषता रही है। यह भूमि अपने दुश्मनों को भी मित्र की भांति गले लगाने को तैयार रहती है इसीलिये भारत कभी विश्व का सिरमौर गुरु रहा है हम सभी को अपनी इस धरोहर को संभालकर रखना हो

स्वप्नवासवदत्तम् में वर्णित वर्णव्यवस्था

स्वप्नवासवदत्तम् में वर्णित वर्णव्यवस्था

कु.सुनीता ठक्कर…..

धर्मशास्त्रों के अनुसार सामाजिक जीवन व्यवस्था के दो प्रमुख अंश हैं।

१. वर्णव्यवस्था और २. आश्रमव्यवस्था।

समाज की समस्त संस्थाओं, ईकाइयों एवं समूह समुदाय आदि के स्वरुप तथा व्यक्ति की भूमिका और

कार्य के निर्धारण में वर्णव्यवस्था और आश्रम व्यवस्था इन दोनों का सबसे महत्वपूर्ण स्थान हैं। इस प्रकार

सामाजिक जीवन में वर्णव्यवस्था की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। सम्पूर्ण मानवजीवन का समान रुप से कार्य सम्पादन का जो उद्देश्य मानकर प्राचीनकाल के ऋषि-मुनियों ने वर्ण-व्यवस्था का आधार रखा तथा

स्मृतियों एवं अनेक धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों में सभी वर्णों के अलग-अलग कार्य करने का मार्गदर्शन भी कराया।

मार्गदर्शन कराने के साथ-साथ सभी वर्णों के लिये यह भी प्रतिबन्ध लगा दिया कि ‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः

परधर्मो भयावहः। यदि प्राचीन ऋषि-मुनियों ने कार्य के अनुसार यह वर्णव्यवस्था न की होती तो इस सम्पूर्ण

मानव-समाज का संचालन ठीक ढ़ंग से नही हो पाता। सभी व्यक्ति सभी कार्यों में संलग्न होकर किसी भी कार्य का सम्पादन अच्छी तरह नहीं कर पातें, जिससे सामाजिक जीवन-व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाती। इस वर्तमान समय में ऋषि-मुनियों के द्वारा की गई वर्ण-व्यवस्था का उल्लंघन कर संसार सम्पूर्ण मानव समाज ने अपने आपकों गड्ढ़े में ढकेल लिया। वर्ण व्यवस्था का उल्लंघन कर संसार का प्रत्येक व्यक्ति अपनी आवश्यकता पूर्ति का दावा करता है, किन्तु उसका कोई भी कार्य अच्छी तरहपूर्ण नहीं हो सकता।

सामाजिक वर्णव्यवस्था में वर्णविभाजन के आधार में गुणों को महत्त्व दिया है तथा दूसरी ओर कर्म को भी स्वीकार किया गया है।धर्म ग्रन्थों में ऐसा देखने को मिलता है कि लोग विद्या, शिक्षा, तप, यज्ञआदि में अधिक रुचि रखते थे वे ब्राहमण कहलाते थे। वर्ण शासन-संचालन और समाज व्यवस्था में अधिक रुचि लेते थे तथा जिसका प्रधान कार्य देश की रक्षा करना था, वे क्षत्रिय हुए। पशुपालन, कृषि और व्यापार आदि जिनका

प्रधान कर्म था, वे वैश्यवर्ण से प्रसिद्ध हुए तथा समाज में तीनों वर्णों की सेवा का कार्य करनेवाले शूद्र वर्ण माने गए। इन्हीं कर्मो के आधार पर वर्ण को चार विभागों में विभक्त किया गया। इस प्रकार हमारे धर्मग्रन्थों में भी वर्णों के चार विभागों का ही वर्णन सुन्दर ढंग से किया गया है।

१.ब्राह्मण वर्ण:- वर्ण विभाजन के क्रम में धर्मशास्त्रकारों ने ब्राहमण को सर्वोपरि स्थान प्रदान किया है, क्योंकि मनु के अनुसार इसे ब्राहमण का दर्जा देने के कारण सम्पूर्ण सृष्टि का स्वामी माना गया है।गौतम के अनुसार द्विज जातियों का कर्म है- अध्ययन, यज्ञ एवं दान करना। आपस्त्म्ब में भी ब्राहमणों के लिए इन्हीं कर्मो का विधान है। इन्हीं मतों का समर्थन करते हुए याज्ञवल्क्य, विष्णु, अत्रि एवं मार्कण्डेय पुराण में भी अपने-अपने

मतों का सम्यक् रुपेण परिचय दिया है।

इस प्रकार धर्मशास्त्रकारों के मतों के अध्ययन के पश्चात् यह निष्कर्ष निकलता है कि ब्राहमण वर्ण का प्रमुख

कर्म अध्ययन अध्यापन, यजन, याजन, दान एवं प्रतिग्रह है।कहा जाता है कि ब्राहमण के मन, वचन एवं कर्म की शुद्धता तथा संयम से देवराज इन्द्र भी अपने आपको पराधीन मानते थे।

संक्षेप में इन मन्त्रद्रष्टा ब्राहमणों का जीवन ऐसा था कि सूर्य के प्रकाश की भांति सारे संसार को ज्ञान और

विद्या के द्वारा सुयोग्य नागरिक बनाकर उनका गृहस्थ में प्रवेश कराकर आश्रम व्यवस्था को जीवित रखना ब्राहमण वर्ण का मुख्य कर्तव्य था। ब्राहमणों के कर्तव्य का विवेचन गीता एवं श्रीमद्भागवत में भी विस्तार पूर्वक देखने को मिलता है।

. क्षत्रिय वर्णः- ब्राहमण वर्ण के बाद क्षत्रिय वर्ण का स्थान आता है। अर्थात् वर्णों में इसका दूसरा स्थान है।

धर्मशास्त्रकारेां ने वेदाध्ययन, यज्ञ सम्पादन एवं दान इन तीन कार्यों में ब्राहमणों के समान ही क्षत्रियों को भी

अधिकार प्राप्त कराया है, किन्तु क्षत्रिय का विशेष अधिकार समस्त प्रजाओं की रक्षा करना बताया है।

बौधाध्यन धर्मसूत्र में क्षत्रिय के वर्णधर्म की व्यवस्था को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि क्षत्रिय को जहाँ

अध्ययन, यज्ञ, दान एवं प्रजा की रक्षा है वहीं उसे शस्त्र धारण एवं धन की रक्षादि कर्तव्यों के पालन की भी

आज्ञा दी गया है। इस प्रकार धर्म शास्त्रीय ग्रन्थों में क्षत्रिय वर्ण का मुख्यतः अध्ययन, यज्ञ, दान एवं शस्त्रधारण तथा विषयों से विरक्त होकर प्रजा का पालन करना ही माना है।

. वैश्य वर्णः- समाज में वैश्य वर्ण का तीसरा स्थान है। प्रायः सभी धर्मशास्त्रकारों ने वैश्य वर्ण के कार्यों के

विभाजन के प्रति पूर्णतः सतर्कता का परिचय दिया है। मनु की व्यवस्था के अनुसार पशुपालन, दान देना, यज्ञ

करना, वेद पढ़ना, व्यापार करना, कृषि आदि सामाजिक कार्यों का अधिकार वैश्यों को ही प्राप्त है। बौद्धायन

धर्मसूत्र भी उपरोक्त व्यवस्था का पथ प्रदर्शक है।इस प्रकार शास्त्रकारों ने वैश्य वर्ण के कर्त्तव्यों का प्रतिपादन

किया हे।

. शूद्र वर्णः-वर्णों के विभाजन में शूद्र को समाज में चौथा स्थान प्रदान किया गया है। प्रायः सभी धर्मशास्त्रकारों के मत में वर्णव्यवस्था के अन्तर्गत शूद्र को एकमात्र कर्म का अधिकारी माना गया है और वह है- ब्राहमण, क्षत्रिय एवं वैश्य वर्णों की सेवा करना तथा उस सेवा से प्राप्त धन ही शूद्र वर्ण की आजीविका का साधन है। गौतम ने भी उपर्युक्त मनु एवं याज्ञवाल्क्य के मत का समर्थन किया है।आपस्तम्ब, बौद्धायन, अत्रि तथा मार्कण्डेय पुराण आदि धर्मशास्त्रकारों ने भी वर्ण धर्म विवेचन क्रम में शूद्र वर्ण के लिए एकमात्र कार्य द्विज सुश्रूषा का ही विधान किया है।

हमारे समाज में प्राचीनकाल से ही वर्ण-व्यवस्था की परम्परा चली आ रही है। इन वर्णव्यवस्था के अनुसार

ही मानव अपने कर्मो को भी करता आ रहा है। धर्मशास्त्रों में मुख्य रुप से चार वर्णों की विवेचना की गई है-

ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। इन चार वर्णों में सर्वप्रथम स्थान ब्राहमण वर्ण का आता है। महा कवि भास ब्राहमण वर्ण से पूर्णरुपेण परिचित थे। अतः उन्होनें स्वप्नवासवदत्तम् में ब्राहमण वर्ण का उल्लेख सम्यक् रुप में किया है। पात्र विवेचन के क्रम में भी कंचुकी नामक दो पात्रों को ब्राहमण वर्ण के अन्तर्गत रखा है। ब्राहमण वर्ण का क्या कर्तव्य है। उसके कर्तव्य पर भी महाकवि भास ने स्वप्नवासवदत्तम् के प्रथम अंक में कंचुकीय के माध्यम से यह प्रतिपादित किया है कि कौन सा स्नातक है जो अध्ययन समाप्त करने के पश्चात् गुरु को दक्षिणा देने के लिए द्रव्यादि चाहता है। इससे यह ज्ञात होता है कि महाकवि के समय में ब्राहमण वर्ण अध्ययन एवं अध्यापन रुप कर्म में सर्वदा संलग्न रहते थे तथा ब्राहमण वर्ण के लोग छात्रों को सम्यगरुपेण अध्यापन कराते थे तथा अध्ययन समाप्ति के पश्चात् छात्रों से द्रव्यादि ग्रहण करते थे, जिससे उनकी जीविका चलती थी। महाकवि भास के स्वप्नवासवदत्तम् के अध्ययन से यह भी ज्ञात होता है कि उस समय के

राजघराने की स्त्रियाँ ब्राहमण वर्ण के लोगों को स्वेच्छा से दान देती थी, जिससे ब्राहमण उस दान में प्राप्तकर

उस वस्तु से ही अपना जीवन-यापन करते थे। इस विषय में स्वयं महाकवि का पात्र कंचुकी कहता है कि कौन व्यक्ति कौन सी वस्तु चाहता है, उसके अनुसार राजकुमारी कलश धनादि देगी।इससे ज्ञात होता है कि ब्राहमण वर्ण के लोग अपने कर्म में सर्वदा व्यावृत रहते थे तथा दान दी गयी वस्तु से ही अपना जीवन-यापन करते थे। साथ ही साथ उनका अध्ययन-अध्यापन भी अपना कर्म था।

इस प्रकार महाकवि भास के नाटक में ब्राहमण वर्ण के सम्यकरुप से प्रतिपादन किया गया है कि उस समय के ब्राहमण लोग अध्ययन-अध्ययापन, यजन-याजन, दान तथा प्रतिग्रह रोहि अपनी जीविका चलाते थे। साथ

ही साथ नाटक में यह भी प्रतिपादित किया गया है कि ब्राहमण वर्ण के लोगों को अपने कर्मानुकूल वृत्ति से परिवार का भरण-पोषण नहीं होता था, तो क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र वर्ण के लोगों के कर्मों का अनुसरण करते थे। इसका उदाहरण स्वयं विदूषक है। विदूषक ब्राहमण होकर भी राजा उदयन के शृंगार सहायक का काम करता है। जब विदूषक राजा की बातों से अप्रसन्न हो जाता है तो स्वयं राजा कहते हैं कि महाब्राहमण प्रसन्न हो! प्रसन्नहो! इच्छानुसार ही कहिए। इससे प्रतित होता है कि महाकवि के समय में ब्राहमण वर्ण के लोग हास्य विनोदादि का भी कार्य करते थे।साथ ही साथ ब्राहमण वर्ण के लोग सेवा भाव का भी कार्य करते थे। उदाहरण के रूप में नाटक के दोनों कंचुकी पात्रों को लिया जा सकता है।

इस प्रकार महाकवि भास ने स्वप्नवासवदत्तम् में ब्राहमण वर्णव्यवस्था का प्रतिपादन किया है साथ ही साथ ब्राहमणवर्ण के लोग आपत्तिकाल में अपने कर्मो को छोड़कर अन्य वर्ण के कर्मो को किया करते थे, जो

नाटक के अध्ययन से प्रतीत होता है।

जिस प्रकार धर्मशास्त्रों में क्षत्रिय वर्णव्यवस्था का प्रतिपादन किया गया है उस प्रकार महाकवि भास ने

स्वप्नवासवदत्तम् में क्षत्रिय वर्ण का उल्लेख नहीं किया है। नाटक का कोई भी पात्र क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए नहीं दिखाई देता है। राजाओं के लिए अथवा क्षत्रियों के लिए प्रजापालन में तत्परता, शास्त्रों में निपुणता, शस्त्रों को धारण करना, दान, यज्ञआदि करना आवश्यक है। इस नाटक का कोई भी पात्र उपर्युक्त लक्षण से युक्त नहीं है। किन्तु हम यह भी नहीं कह सकते कि महाकवि के समय में क्षत्रिय धर्म का पालन नहीं होता था।महाकवि भास क्षत्रिय वर्णव्यवस्था से सुपरिचित अवश्य होंगे, परन्तु क्षत्रिय वर्ण साक्षात् उल्लेख कभी भी नहीं किया है।

संस्कृत साहित्य के मूर्धन्य कलाकार एवं नाटककार महाकवि भास अपने नाटक स्वप्नवासदत्तम् में धर्मशास्त्रकारों के सभी नियमों से परिचित प्रतीत होता हैं। किन्तु नाटक का पूर्वापर अध्ययन करने के पश्चात्

यह ज्ञात होता है कि वैश्यवर्ण के वर्णन के क्रम में उनकी लेखनी की गति धीमी थी। अथवा उस समय वैश्य

वर्ण-व्यवस्था का प्रचलन नहीं हो गाया महाकवि भास को वैश्य-व्यवस्था का वर्णन करना अभीष्ट नहीं होगा।

अतः नाटक में सूक्ष्म रुप में भी किसी स्थान पर वैश्य वर्ण-व्यवस्था का संकेत नहीं किया है।

महाकवि भास ने स्वप्नवासवदत्तम् में अस्पष्ट रुप से शूद्र का वर्णन किया है। धर्मशास्त्रों में जो कहा गया है कि वर्णव्यवस्था के अन्तर्गत शूद्रों का एकमात्र धर्म सेवा है। उस सेवा रुपी धर्म का पालन करता हुआ नाटक का पात्र सम्भषक भट्ट (जो मगध राज्य का भृत्य है ) दिखाई देता है। वह मगधराज की सेवा में सदा तत्पर

दिखाई देता है। किन्तु महाकवि भास ने सम्भषक भट्ट के भृत्य रुप चारित्रिक विशेषता को नहीं उभारा है तथापि नाटक में दिया हुआ पात्र परिचय के अन्तर्गत कवि ने सम्भषक का स्थान दिया है। जिससे ज्ञात होता है सम्भषक मगध राज्य की सेवा करके ही अपने परिवार का भरण-पोषण करता है। जिस प्रकार सम्भषक भट्ट पात्र के रुप में आया है, उसी प्रकार नाटक की दो पात्राएँ वसुन्धरा तथा विजया भी शूद्र वर्ण के अन्तर्गत आती है। उन दोनों की चारित्रिक विशेषता से ज्ञात होता है कि वे दोनों ही राजघराने की सेविका थी तथा शूद्र वर्ण के

अन्तर्गत आनेवाले कर्मों को किया करती थी।

इस प्रकार कवि भास ने अपने नाटक स्वप्नवासवदत्तम् में प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप में चारों वर्णों के ऊँपर प्रकाश डाला है! इस प्रकार ज्ञात होता है कि महाकवि भास धर्मशास्त्रकारों के वर्णव्यवस्था सम्बन्धी नियमों के

उपासक थे। -आसि. प्रोफेसर

डी. एन. पी. आर्ट्स कॉमर्स कॉलेज डीसा,

स्नातिकाः– आर्य कन्या गुरुकुल शिवगंज (राज.)

वैदिक समाज व्यवस्था

वैदिक समाज व्यवस्था

प्रो. वन्दना सी. सिसोदीया….

विश्व की समस्त प्राची सभ्यताओं से सहस्रों वर्ष पूर्व, इस पावन भारतभूति पर मन्त्रद्रष्टा ऋषियों ने वैदिक

ज्ञान का साक्षात्कार किया। प्राणिमात्र के कल्याण का सन्देश देने वाली यह वैदिक संस्कृति साक्षात्कार ऋषियों की धरोहर है।वे ऋषि इनके अधिक निर्मल अन्तःकरण वाले थे कि किसी स्थान या जाति विशेष के प्रति उनका कोई पक्षपात अथवा पूर्वाग्रह नहीं था। इस कारण उनके द्वारा प्रत्यक्ष किया गया कि सत्य युगीन न होकर शाश्वत है। वे मित्र और ‘शत्रु दानों से अभय की अपेक्षा रखते थे। किसी भी सुखद स्थिति के

निर्माण के लिये भय का अभाव आवश्यक है। भार न होने पर ही हम मित्र हो सकते हैं और सभी को मित्र की

दृष्टि से देख सकते हैं तथा कल्याण की भावना से ओतप्रोत हो सकते हैं। यही कल्याण की भावना हमें एक दूसरे से जोडती है।

वैदिक वर्णाश्रम व्यवस्था

व्यष्टि एवं समष्टि की उन्नति का उपाय

वस्तुतः आज के पूंजीवाद, समाजवाद और साम्यवाद में कोइ मौलिक अन्तर नहीं है। ये एक ही भौतिकवादी व्यवस्था के चट्टे बट्टे हैं। तीनों का उद्देश्य पैसा और अधिकार है। तीनों मनुष्य की असली समस्या को पैसे से सम्बद्ध समझते है। इसके विपरीत वैदिक संस्कृति द्वारा प्रतिपादित वर्णाश्रम की पद्धति पर आधारित समाज व्यवस्था व्यक्ति और समाज की भौतिक व आत्मिक दोनों प्रकार की भूख प्यास शान्त करती है। हम जब तक भौतिकतावादी बने रहेंगे तब तक विश्व शान्ति और विश्व प्रेम का नाम भर लेते रहेंगे, इन्हें प्राप्त नहीं कर पाएँगे। वैदिक संस्कृति का आध्यात्मवाद यह नहीं कहता कि हमें शरीर को भूल जाना है। या हमें मनुष्य की आर्थिक समस्या को हल नहीं करना है। सौ वर्ष तक जीने की इच्छा रखने वाले व्षि शरीर को घृणा की दृष्टि से कैसे देख सकते थे? वैदिक संस्कृति भौतिकवाद का तिरस्कार नहीं करती, उसे विकास की माँग में अपना साधन समझती है, क्योंकि इस संस्कृति के दृष्टिकोण में शरीर आत्मा की तरफ ले जाने का साधन है, प्रकृति परमात्मा की तरफ ले जाने का साधन है। हम शरीर से चलें परन्तु रुक न जाएँ। यही आज के युग को

वैदिक संस्कृति का सन्देश है। इसी अभ्युदय के लिए, व्यष्टि और समष्टि के पूर्ण विकास के लिए वैदिक ऋषियों नें वर्णाश्रम व्यवस्था प्रारम्भ की थी। वेद सब मनुष्यों को उसी परम पिता परमेश्वर की सन्तान मान कर सब में सम दृष्टि रखने का उपदेश देता है। ऋगवेद में स्पष्ट रुप से कहा गया है कि सब मनुष्य भाई हैं। इनमें से कोई जन्म से बड़ा नहीं और कोई छोटा नहीं, समानता के भाव को धारण करते हुए सब ऐश्वर्य या उन्नति के लिए मिलकर आगे बढ़ते हैं। वेद के अनुसार व्यक्ति समाज का एक अंग है और इसलिए समाज की उन्नति के लिए अपनी सम्पूर्ण शक्तियों को लगा देना सबका प्रधान धर्म है। वेद में मनुष्य के लिए ‘व्रात’ शब्द का अनेक स्थानों पर प्रयोग किया गया है, जिसका अर्थ समुदाय अथवा संघप्रिया है। इससे मनुष्य

सामाजिक प्राणी है इस प्रसिद्ध उक्ति का ही समर्थन होता है। ऋगवेद के दशम मण्डल के अन्तिम सूक्त में संगतिकरण अथवा संघ बनाकर उन्नति करने का अत्युत्तम उपदेश किया गया है, जिनमें मिलकर जाने अर्थात् उद्देश्य की पूर्ति करने के लिए सामूहिक यत्न करने, परस्पर मधुर वाणी बोलने और मन को उत्तम

शिक्षा के द्वारा सुसंस्कृत करने व ज्ञान सम्पन्न बनाने का भाव पाया जाता है। वैदिक समाज व्यवस्था का दूसरा आधार है त्यागपूर्वक उपभोग। संसार के उपभोग के दो प्रकार है, एक तो उसमें लिप्त हो कर और दूसरा उससे अलिप्त रहकर उपभोग करो। इस उद्देश्य की सिद्धि के लिए वैदिक ऋषियों ने मानव जीवन को चार आश्रमों तथा मानव समाज को चार वर्णों में विभक्त किया था तथा इन आश्रमों और वर्णों के कर्तव्य निश्चित किये थे। यही वैदिक वर्णाश्रम व्यवस्था सब प्रकार के वर्ग भेदों को समाप्त कर लोकसंग्रह और व्यष्टि की सर्वविध उन्नति के मार्ग खोलती है।

समाज अपने आप में व्यवस्था सापेक्ष है। व्यवस्था रहित जन समूह ऐसा समूह है, जिसमें न विवेक है और न

विचार करने की शक्ति। इसी कारण व्यवस्था रहित पशु समूह को ‘समाज’ कहा जाता है। ‘समाज’ से ऊँपर उठकर व्यवस्थित होने की प्रक्रीया ही ‘समाज’ का आधार है। वेद में ऋषियों ने मानव समूह को व्यवस्थित

करने के लिये तीन प्रकार के प्रयास किये हैं, प्रथम गुण और कर्म आधार पर, द्वितीय राजनीति के आधार पर तथा तृतीय आयु के आधार पर। इनका क्रमशः निम्न नामकरण किया गया है

१. वर्णव्यवस्था, २. शासन व्यवस्था, ३. आश्रम व्यवस्था

ये तीनों व्यवस्था एक दूसरे की विरोधी न होकर पूरक हैं। इनमें से वर्णव्यवस्था शासन व्यवस्था का तथा शासन व्यवस्था आश्रम व्यवस्था का आधार बनती है। उक्त तीनों का आधार अभ्युदय मूलक धर्म है, उसका

प्रयोजन मोक्ष है तथा अर्थ और काम इस यात्रा के पड़ाव हैं, जहाँ रुक कर मानव आगे बढ़ने के लिये शक्ति का सन्जय तथा अपनी गन्तव्य दिशा को पहचानने का प्रयास करता है। दूसरे शब्दों में पुरुषार्थ चतुष्टय की उपलब्धि ही वैदिक समाज व्यवस्था का मूल है।

वर्णव्यवस्था

इस वर्णव्यवस्था के सम्बन्ध में दो प्रकार के मत देखने को मिलते हैं। एक पक्ष वर्णव्यवस्था को जन्मना और दूसरा गुणतः और कर्मतः मानने के पक्ष में है। उक्त दोनों बातों के समर्थन में पर्याप्त प्रमाण मिल जाते हैं। वेद में पुरुष सूक्त तथा एक स्थान पर अथर्ववेद को छोडकर किसी अन्य स्थल पर चारों वर्णों का एक साथ उल्लेख नहीं मिलता है। वेद तथा ब्राहमणग्रन्थों में बहुलता से ब्रहम और क्षत्र का एक साथ उल्लेख प्राप्त नहीं होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि वैदिक ऋषि की दृष्टि में ब्राहम और क्षात्र धर्म का समन्वय अधिक महत्वपूर्ण है। कहीं ब्राहमण के द्वारा तीनों वर्णों को नियन्त्रित किया गया है और कहीं क्षत्रिय के द्वारा। पुरुष सूक्त के ‘ब्राहमणोऽस्य मुखमासीद्’ मन्त्र के आधार पर स्वामी दयानन्द सरस्वती ने वर्ण व्यवस्था को गुणतः और कर्मतः माना है। विराट् पुरुष के मुख, बाहू, उरु, और पाद का अर्थ वे दल अड्गों के गुण कर्म लेते हैं अर्थात् जो मुख के समान विद्यादि गुणों से युक्त होता है, वह ब्राहमण है। भुजा के समान जो बल, वीर्य से सम्पन्न होता है, वह ‘क्षत्रिय’ है। उरु के समान जो कृषि आदि कार्यों को करता है, वह ‘वैश्य’ है और जो पैरों के समान जडता आदि से युक्त होता है, वह ‘शूद्र’ है। आचार्य यास्क ‘वर्ण’ शब्द का निर्वचन करते हैः ‘वर्णो वृणोतेःइसका नाम वर्ण इसलिये है कि जैसे जिनके गुण कर्म हों, वैसा ही उसको अधिकार देना चाहिये।

उपर्युक्त श्रुति और स्मृति के विवेचन के आधार पर बिना किसी सन्देह के यह कहा जा सकता है कि वेद में प्रतिपादित वर्णव्यवस्था का आधार गुण और कर्म है। वैदिक काल में गुणवत्ता के आधार पर वर्ण का निर्धारण

तथा कर्मशीलता के आधार पर उस वर्ण में बना रहना सम्भव था।उपर्युक्त विवेचन के प्रसन्ग यह स्पष्ट कर

देना आवश्यक है कि वैदिक काल के पश्चात् ब्राह्मणग्रन्थों के काल से ही वर्णव्यवस्था को जन्म से माना जाना प्रारम्भ हो गया था, परन्तु फिर भी, इस काल तक यह व्यवस्था जन्मना बहुत अधिक रुढ़ नहीं हो पायी थी। स्मृतिकाल में, जहाँ कि वेद के प्रति प्रतिबद्धता बहुत अधिक थी, एक ओर व्रत, यज्ञ, स्वाध्याय और तीनों वेदों का अध्ययन करने से मनुष्य ब्राहमण बनता है, का प्रतिपादन किया गया है। दूसरी ओर जन्म लेते ही ब्राहमण देवताओं का देवता तथा जाति के नाम पर जीनेवाला नाममात्र का ब्राहमण भी धर्म प्रवक्ता हो सकता है, का विधान किया गया। ये दोनों घोषणायें एकदम विरोधी हैं। यदि मनु के शब्दों में कहा जाये तो द्वितीय विधान श्रुति के अनुकूल होने से अप्रामाणिक है, लेकिन इस प्रकार अप्रमाणिक कह देने से स्मृति के लोकसत्य को निराकृत नहीं किया किया जा सकता।ऐसा प्रतीत होता है कि जहाँ स्मृतिकार का चिन्तन वैदिक विचारधारा से प्रभावित है, वहाँ वह सभी पूर्वाग्रहों से निरपेक्ष होकर गुण और कर्म के आधार पर वर्णव्यवस्था का प्रतिपादन करता है, जहाँ वह लोक के पूर्वाग्रहों से ग्रसित है, वहाँ वह लोक के अनुसार व्यवस्था देता है।

सम्भवतः, इसी लोकसत्य से प्रभावित होकर महर्षि पाणिनी जैसा व्यक्तित्व भी निरवसित (जिनके खालेने पर पात्र संस्कार से भी शुद्ध नहीं होता ) तथा अनिरवित शूद्र के भाषा सम्बन्धी विधान का उल्लेख करता है। इस प्रकार निष्कर्ष रुप में कहा जा सकता है कि वैदिककाल में वर्णव्यवस्था ने आकार लेना प्रारम्भ कर दिया था। इस परिवर्तन के पीछे, सम्भवतः उच्च वर्णों का अपने अयोग्य पुत्रों के अन्धकारमय भविष्य को सुरक्षित एवं महत्वपूर्ण स्थान पर बनाये रखना की भावना निहित थी।

शासनव्यवस्था

शासनव्यवस्था के सम्बन्ध में वैदिक ऋषियों की अपनी एक सत्र्कल्पना है। उनकी दृष्टि में स्वराज्यमूलक शासन प्रजा को मिलना चाहिए। ऐसा कोई भी राज्य जिस में स्वत्व का भाव न हो, स्वीकार्य नहीं हो सकता। यह स्वत्व का भाव तभी आ सकता है, जब शासन का चयन प्रजा के द्वारा हो।

‘त्रीणि राजाना विदथे पुरणि’ इस मन्त्र के आधार पर महर्षि दयानन्द सरस्वती कहते हैं कि तीन प्रकार की सभा को ही राजा मानना चाहिये एक मनुष्य को कभी नहीं। इस कथन के मूल में ऋषि का यह आशय प्रतीत होता है कि प्रजा निरपेक्ष राजा स्वेच्छाचारी हो जाता है। शतपथ ब्राहमण कहता है कि स्वेच्छाचारी राजा प्रजा का नाश करने वाला होता है तथा वह प्रजा को खा जाता है और किसी को अपने से अधिक नहीं होने देता। मन्त्र में आये ‘त्रीणि सदांसि’ का आशय है कि शासन तीन सदनों वाला होना चाहिये; 1. राजसभा, 2.धर्मसभा, 3. विधान सभा इनमें से प्रथम ‘राजसभा’ में विशेष रुप से राजकार्य, विधान सभा में विशेष रुप से अध्ययन की उन्नति से सम्बन्धित कार्य तथा ‘धर्मसभा’ में धर्म की उननति और अधर्म की हानि के कार्य किये जाने चाहिये। जहाँ ये तीनों सभायें मिलकर प्रजा के कार्यों को विचार करके करती हैं, वहाँ प्रजा निश्चित रुप से

सुखी होती है। अथर्ववेद का ऋषि कहता है कि उपर्युक्त तीनों सभायें तथा सत्र्ग्राम की व्यवस्था करने वाली समीति और सेना मिलकर शासन व्यवस्था का सनचालन करें। इसके अतिरिक्त राजा सभा के सदस्यों का तथा सभा के सदस्य राज्यव्यवस्था का पालन करें। इस प्रकार राजा तथा सभा के सभासद अन्योन्याश्रित रहें अर्थात् राजा के अधीन सभा और सभा के अधीन राजा को रहना चाहिये। जिसप्रकार राजा प्रजा की रक्षा करे, उसी प्रकार राजा के घर, शरीर तथा राज्य की रक्षा प्रजा को करनी चाहिये। राजा कहीं स्वेच्छाचारी न हो जाये, इसलिये दस सदस्यों वाली समीति राज्य कार्यों को सम्पन्न करें, ऐसा मनु मानते हैं। ऋगवेद के ऋषि के अनुसार राजा और प्रजा का परस्पर सम्बन्ध गुरु शिष्य अथवा पिता पुत्र के समान होना चाहिये। गुणों से सम्पन्न व्यक्ति का राजा के रुप में चयन प्रजा करती है, इसलिये राजा और प्रजा में परस्पर सख्यभाव रहना चाहिये। (ऋषि कहीं गुरु शिष्य, कहीं पिता पुत्र के सख्यभाव की ओर इन्गित करके यह स्पष्ट कर देना चाहता है कि राजा और प्रजा के सम्बन्ध मधुर नहीं रह सकते। यह विश्वास ही किसी राज्य का आधार हो सकता है। इस प्रकार के शासन तन्त्र का वेद में उपदेश किया गया है। इस मार्ग पर चलने से चक्रवर्ती राज्य और पुरुषार्थ चतुष्टय की प्राप्ति होती है। उपर्युक्त शासन तन्त्र का पालन सत्य, नियम, तेज, तपस्या, क्षात्र धर्म और व्रत के द्वारा किया जाता है। प्रजातन्त्र ही प्रजा का राज्य होता है, इसलिये प्रजा सर्वगुण सम्पन्न व्यक्ति को राज्यकर्म सम्पन्न करने के लिये चुनती है।दूसरे देश के अधीनस्थ राजा, सचिव, सूत, ग्राम प्रधान उस चुने हुए राजा का अभिषेक करते हैं। वह राजा सर्वदा संसद में प्रजा के प्रतिनिधियों के मत के अनुरुप प्रजा को ऐश्वर्यवान् बनाने का प्रयास करे।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि वैदिक शासन व्यवस्था में जो बुद्धिमान, बलिष्ठ, धार्मिक एवं न्यायप्रिय है, वही राजा हो सकता है और प्रजा की रक्षा करने में असमर्थ राजा राजपद पर आसीन नहीं रह

सकता। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि वैदिक शासन व्यवस्था प्रजा सापेक्ष है, प्रजा ही राजा का चयन

करती है और वही संसद के सदस्यों का भी। राजा सदस्यों के मत के अनुरुप प्रजा को सुख पहुँचाने वाले कार्य

करता है। जहाँ राज्य के स्थायित्व और समृद्धि के लिये ब्राहमण और क्षत्रिय वर्ग का उचित समन्वय आवश्यक है, वहीं पूँजीपति और श्रमजीवी वर्ग के मध्य मधुर सम्बन्ध बने रहना भी अनिवार्य है। ब्राहमण, क्षत्रिय आदि का अस्तित्व प्रजा पर आश्रित है। इस प्रकार प्रजा सर्वोपरि है, परन्तु प्रजा की उचित और अनुचित इच्छा का नियमन धर्म से होता है, इसलिये किसी भी राज्य का सुदृढ आधार धर्म ही हो सकता है। भगवान् सत्यराजन् की जत्र्घा और पादों को धर्म बताने का उद्देश्य यही है कि शरीर को गतिमान् और स्थिर रखने के लिये जिस प्रकार जत्र्घा और पाद आवश्यक हैं, उसी प्रकार राज्य की उन्नति और स्थिरता के लिये धर्म आवश्यक है जिस राज्य के आधार धर्म और सत्य होते हैं वहाँ सुख, शान्ति और समृद्धि विराजती है।

आश्रम व्यवस्था

विभिन्न आयु वर्गों के आधार पर ‘श्रम’ का उचित विभाजन आश्रम व्यवस्था का मूल है। वैदिक कालीन आश्रम व्यवस्था उपनिषद्कालीन आश्रम व्यवस्था से भिन्न है । वैदिककालीन आश्रम व्यवस्था चतुर्धा न होकर द्विधा है। वेद में मात्र दो आश्रमों का उल्लेख प्राप्त होता है ब्रहमचर्य और गृहस्थ। इन दो आश्रमों में भी ब्रहमचारी और ब्रहमचर्य का वर्णन अथर्ववेद में हुआ है। इससे यह निष्कर्ष सरलता से ग्रहण किया जा सकता है। कि गृहस्थाश्रम सभी आश्रमों का मूल है। इस आश्रम के सम्यक् रुप से स्थिर हो जाने के पश्चात् ही अन्य आश्रमों

की परिकल्पना की गयी।

जहाँ तक वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम के पूर्वापर का प्रश्न है, निःसंदिग्ध रुप से यह कहा जा सकता है कि वानप्रस्थाश्रम से पूर्व सन्यासाश्रम अस्तित्व में आ चुका था। ब्राहमणग्रन्थों से पूर्व वैदिक ऋषि भी इस प्रकार की भाषा बोलने लग गये थे, जिससे इस तृतीय स्थिति का आभास मिलना प्रारम्भ हो गया था, परन्तु इस काल तक उक्त स्थिति का नामकरण नही हो पाया था।ऐतरेय एवं तैत्तिरीय आरण्यकों में सर्वप्रथम संन्यासाश्रम के सत्र्केत मिलते हैं। उसके बाद उपनिषद्काल में सन्यासाश्रम, उसका समय धर्म, लक्षण, विघ्न, विधि, अधिकारी तथा सन्यास के सम्बधित अन्य विषयों का विशद प्रतिपादन किया गया।इसलिये संन्यासाश्रम की पूर्ण प्रतिष्ठा उपनिशद्काल में हुई, यह माना जा सकता है। वेद और ब्राहमणग्रन्थों के कर्मकाण्ड प्रधान युग के पश्चात् परवर्ती पीढ़ी में होना स्वाभाविक है। वेद और ब्राहमण ग्रन्थों के कर्मकाण्ड प्रधान युग के पश्चात् परवर्ती चिन्तक का अन्तर्मुखी होना अधिक स्वाभाविक है। उनसे सभी प्रकार के बाह्य कर्मकाण्ड का परित्याग करके, यहाँ तक कि बाह्य संसार का भी परित्याग करके वन में जाकर वानप्रस्थी बनना स्वीकार किया।वेद का ऋषि जहाँ परमात्मा को अनेक नामों और नामों के अनुरुप उनकी कर्मशक्ति की परिकल्पना में अधिक संलग्न था, वहीं उपनिषद्काल का ऋषि ईश्वर के सभी नामों के मूल अभिधेय, सृष्टि के मौलिकतत्त्व के चिन्तन में अधिक निमग्न है। कहने का आशय यह है कि ब्राहमण काल के पश्चात् अन्तर्मुखी होने की प्रक्रीया वानप्रस्थ और सन्यासाश्रम के अस्तित्व में आने का प्रमुख कारण प्रतीत होती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि वानप्रस्थाश्रम के अस्तित्व में आने से, जहाँ पारिवारिक जीवनसुखी हुआ, वहीं आध्यात्मिक चिन्तन को एक नई दिशा मिली और तत्कालीन ऋषियों की बुद्धिमत्ता ने दोनों पीढ़ियों को कुण्ठित होने से बचा लिया। निष्कर्ष रुप में यह कहा जा सकता है कि वैदिक ऋषियों की समाज व्यवस्था का मूल गुण और कर्म के आधार पर वर्ण का वरण करना है। कर्मक्षेत्र का वरण करने के उपरान्त व्यक्ति अपनी भूमिका के अनुरुप शासन व्यवस्था में सहयोग प्रदान करता है।एक आयु विशेष और वैराग्य की प्रबलता के आधार पर,

कर्मक्षेत्र से निवृत्ति पाकर व्यक्ति, पूर्ण निवृत्ति (वैराग्य) के मार्गपर अग्रसर होता है। प्रवृति सायास होती है,

जबकि  आयास का अभाव ही निवृत्ति है। स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर अथवा बर्हिमुख से अन्तर्मुख की ओर

अथवा प्रवृति से निवृत्ति की ओर ले जाना वैदिक समाज व्यवस्था का प्रयोजन है। धर्म को आधार मानकर चली, इस समाजव्यवस्था की सुखद परिणति पुरुषार्थ चतुष्टय की उपलब्धि के साथ पूर्णता प्राप्त करती है।

– प्रोफेसर,

डी.एन.पी. आर्टस् कामर्स कॉलेज,

डीसा, (गुजरात)

वर्ण-विचार

वर्ण-विचार

श्री गणेश कुमार पेटकर…..

भारतीय संस्कृति और समाज में आर्यों की वर्ण व्यवस्था सामाजिक और राष्टीय एकता के लिए थी, विभाजन के लिए नहीं। वेद में कहा गया है चारो वर्ण एक ही शरीर के अंग है। उनके अनुसार अल्पज्ञ व्यक्ति इसका

अर्थ और स्वरुप ठीक से न समझने के कारण भ्रांति उत्पन्न करते हैं। ‘‘ऊँच नीच का भाव सम्पूर्ण मिथ्या’’ ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चारों आर्य जाति के अभिन्न अंग है यदि आर्यजाति श्रेष्ठ है तो ये चारों वर्ण भी श्रेष्ठ है।किसी भी श्रेष्ठ और पूज्य पुरुष के किसी अंग अपूजनीयता का भाव नहीं रहता।व्यवहारिक सत्य तो यह है कि सर ही चरणों पर नवाया (झुकाया) जाता है। आज चारों वर्णों के लोग समान रुप से सभी कार्यों में लगे हुए है। ऐसा कोई भी कार्य नहीं जहाँ ये चारों न हो इसलिये यह कहना सर्वथा मिथ्या है कि एक वर्ण ऊँचा है और दुसरा नीच। महर्षि चाणक्य के अनुसार आर्यजाति के प्राण स्वरुप किसी शूद्र को यदि कोई दास बनाता है तो उसे मृत्युदण्ड दिया जाना चाहिए।हिन्दू धर्म में वर्णव्यवस्था मूलतः कर्म और गुण के आधार पर ही स्वीकार की गई थी ना कि जन्म के आधार पर। यही कारण है कि शास्त्रों में कई स्थानों पर उल्लेख

आता है कि आचारहीन ब्राहमण से राजा को शूद्र का कर्म करवाना चाहिए। आज न तो साम, दाम, विद्या, तपआदि से युक्त ब्राहमण ही दिखाई देते है, न ही धृति शौर्य आदि और कमजोरों के लिए प्राण अर्पित करने वाले क्षत्रियों का ही कहीं पता है, और न उदर के समान सम्पूर्ण शरीर का पोषण करनेवाले वे वैश्य ही नजर आते हैं कि समाज के प्रत्येक वर्ग अथवा वर्ण का पालन करने के लिए उदारता से धन व्यय करें। ऐसी

परिस्थिति में अन्य वर्णों द्वारा शूद्रों को अपने से नीचा मानने का विचार, दम्भ एवं आत्मश्लाघा से अधिक कुछ भी नहीं है। हिन्दू धर्म की यह भी मान्यता रही है कि विभिन्न देश काल में समाज के युग धर्म के

अनुरुप ही वर्णाश्रम धर्म के नियम भी बदल जाते हैं। यही कारण था कि मध्ययुग धर्म के अनुरुप ही वर्णाश्रम धर्म के नियम भी बदल जाते हैं। यही कारण था कि मध्य युग के सन्तों ने यह क्रान्तिकारी सन्देश दिया कि ‘‘जाति पाँति पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई’’ बदलते युग-धर्म के आधार पर ही हिन्दू समाज में समानता और एकता का सिद्धान्त मानव मात्र के कल्याण हेतु प्रतिपादित किया गया है।

राज्य द्वारा समान अधिकार

हिन्दू समाज में यह भारी भ्रम व्याप्त है कि शूद्र को शासन एवं सामाजिक कार्यों में कभी समान अधिकार

नहीं दिया गया था। सत्य तो इसके विपरीत है।महाभारत के शान्तिपर्व में मन्त्रि परिषद के गठन की व्यवस्था बड़े स्पष्ट रुप से दी गयी है। उसमें पितामह भीष्म के अनुसार मन्त्रियों की संख्या ३७ होनी चाहिए जिसमें ४ ब्राह्मण, ४ शूद्र, ८ क्षत्रिय, २१ वैश्य होने चाहिए। वैश्यों की इतनी अधिक संख्या सम्भवतः इसलिए थी कि उस समय कृषि, उद्योग एवं व्यापार काफी उन्नत अवस्था में थे।ध्यान देने योग्य बात तो यह है कि ब्राहमण और शूद्रों की संख्या एक समान रखी गई थी।

आध्यात्म के क्षेत्र में समानताः

आध्यात्म के क्षेत्र में तो हिन्दू धर्म में वर्णव्यवस्था की बात तो दूर रही, कुल, जाति, धन, रूप, विद्याआदि की श्रेष्ठता के अभिमान को भी परमार्थ सिद्धि में बाधक माना गया है। परमार्थ सिद्धि के प्रसंग में वर्ण, कुल, जाति की कल्पना आकाश गमनागमन के लिए सड़को और फुटपाथों की भाँति ही हास्यास्पद लगती है। जैसे आकाश में निश्चित संकेतो पर निर्भर रहकर ही सही रूप से दिशा और लक्ष्य का ज्ञान होता है उसी प्रकार

हिन्दू धर्म में परमात्मा की ओर बढ़ने के लिए ये नियम तो केवल चित्त शुद्धि के आधार है, वास्तविक प्रगति के लिए तो ईश्वर और गुरु की कृपामार्ग का कार्य करते हैं। यही कारण था कि अपने समय के सबसे महान वंश की कुलवधु मीरवाई ने सन्त रैदास जी के चरणों में बैठकर ज्ञान प्राप्त किया।

मध्यकालीन युग, जिसे भक्ति युग भी कहते हैं, जब सारा देश विदेशी आक्रमणकारी मुस्लिम शक्तियों से

आक्रान्त था, उस समय सन्तों एवं भक्तों ने ही मुख्यतः देश के दलित एवं पीड़ित समाज की रक्षा की थी और इन सन्तों में से लगभगं ८० प्रतिशत संत गैर ब्राहमण वर्ण के थे। ये सभी संत देश की समस्त जनता के

लिए श्रद्धा और भक्ति के पात्र थे और आज भी हैं। आध्यात्म के क्षेत्र में एसी समानता का उदाहरण विश्व के इतिहास में कहीं भी नहीं मिलेगा। उपर्युक्त चिंतन से यह स्पष्ट है कि हिन्दू समाज का गठन गुणों और कर्मों के आधार पर हुआ था और प्राशासनिक एवं सामाजिक कार्यों में सभी वर्णों का समान रुप से योगदान रहा है। राष्ट के विपत्ति काल के समय शूद्र एवं वैश्य वर्णों का जो अभूतपूर्व योगदान रहा है उसके उदाहरणों से भारत का इतिहास भरा पड़ा है। मैं यहाँ पर पाठकों का ध्यान शास्त्रों एवं पुराने इतिहास से हटाकर पिछले ३०० वर्षों में हुई ऐसी दो महान घटनाओं की ओर आकर्षित करना चाहूँगा जिन्होने हिन्दू धर्म में दो महान क्षत्रिय जातियों को जन्म दिया और देश की रक्षा की। पहली घटना के प्रवर्तक क्षत्रपति शिवाजी थे जिन्होने

१७ वीं शताब्दी में महाराष्ट के अन्दर अपने अदम्य शौर्य रणकौशल, त्याग एवं बलिदान के बल पर वहाँ की

साधारण हिन्दू जनता को एक शस्त्र जीवी क्षत्रिय के रुप में परिवर्तित कर दिया। इस प्रबल शक्ति ने अपने समय के विश्व के सबसे अन्यायी विदेशी मुगल साम्राज्य को उखाड़ फेंका। दूसरी ऐसी ही महान ऐतिहासिक घटना कुछ ही वर्षों बाद १८ वीं शताब्दी के शुरु में पंजाब में हुई। इसके जन्मदाता थे गुरु गोविन्द सिंह जी, जिन्होनें जान हथेली पर रखकर आये हुए पाँच शिष्यों को लेकर महान खालसा की स्थापना की थी जिसके अन्तर्गत आज शौर्य सम्पन्न सिख समाज विश्व के सामने प्रस्तुत है।

ईश्वरीय व्यवस्था

वर्णव्यवस्था वैदिक धर्म की अपनी रचना नहीं अपितु ईश्वरीय रचना है। इस रचना के बिना किसी राष्ट का स्वरुप, सुखी सम्पन्न तथा प्रगतिशील होना सर्वथा असम्भव है और संसार का कोई राष्ट ऐसा नहीं है जिसमें

वह व्यवस्था न पाई जाती हो। भले ही अन्य राष्ट इस व्यवस्था को वर्णव्यवस्था और इसके अंगो को ब्राहमण,

क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के नाम से न पकार रहे हो अपितु उन्हें शिक्षक, सैनिक, व्यापारी तथा मजदूर नाम से पुकारते हैं। परन्तु यह बात सत्य है। कि इन चारों वर्णों के अतिरिक्त किसी भी समाज में अन्य कोई वर्ग नहीं है। वर्ण-व्यवस्था ईश्वरीय व्यवस्था कैसे हो? इसका पहला प्रमाण तो यही है कि सृष्टि के आदि में मानव जाति के कल्याणार्थ किये गए उपदेश वेद में इसका उल्लेख इस प्रकार है-

ब्राहमणोऽस्य मुखमासीत् बाहु राजन्यः कृताः।

उरु तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शुद्रोऽजायत्।।

वेद को न मानने वाले यह कहते हैं कि वे वेद की बात स्वीकार करने को तैयार नहीं है।परन्तु इस तथ्य को तो सभी धर्मावलम्भी स्वीकार करते हैं कि वेद इतिहास में पुरानी ईश्वरीय रचना है।वास्तव में मान वही राष्ट का छोटा स्वरुप है। ईश्वर ने स्वयं मानव तथा मानव समाज को कल्याणार्थ वेद के रुप में अपना ज्ञान दिया है, वहाँ अपनी रचना द्वारा अपने इस उपदेश को क्रीयात्मक रुप में उपस्थित कर दिया है। मानव अपनी

समस्त समस्याओं का समाधान ईश्वरीय रचना अथवा अपने अन्दर दी गई शक्ति के द्वारा प्राप्त कर सकता है। योग-साधना से सभी कुछ साध्य हो जाता है। मानव शरीर में शरीर के चारों अंश सिर, भुजा, उदर तथा जंघाये अपने कर्तव्य के कारण ही अपना-अपना अलग महत्व रखते हैं। परन्तु आपसी सम्बन्ध में सब समान हैं। इनके अन्दर भेद उत्पन्न करना या किसी को छोटा-बड़ा या छूत-अछूत समझना मूर्खता है। सब अंग मिलकर ही राष्ट बनाते हैं। किसी एक की भी उपेक्षा करना घातक है। दुर्भाग्यवश वर्तमान समय में भारत में यह वर्ग-भेद व्यक्तियों के गुण-कर्म और स्वभाव पर आधारित न होकर जन्म पर आधारित हो गया है। और इसके जन्मगत् जात पात अवैदिक तथा ईश्वरीय विधान के विपरीत है, इसलिए समाज के लिए घातक तथा विनाशकारी हैं। इसे किसी भी रुप में मान्यता देना ईश्वर के आदेश के विपरीत आचरण करना है। वैदिक धर्म का मन्तव्य यह है है कि जन्म से सभी शूद्र होते है। परन्तु बाद में माता पिता गुरु आदि की कृपा से पढ़ने-

लिखने के पश्चात् ही व्यक्ति अपना वर्ण ग्रहण करता है। उससे पूर्व नहीं।

ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र वर्ण के कर्तव्य संक्षिप्त में इस प्रकार हैं-

ब्रा२णचरित्रवान्, धर्मात्मा तथा ज्ञानी व्यक्ति, जो समाज में अविद्या के नाश और विद्या की वृद्धि करने का व्रत लेते हैं वह ब्राहमण कहलाता है।

क्षत्रियजो व्यक्ति चरित्रवान्, ज्ञानी, राष्ट की स्वतन्त्रता की रक्षा करने का व्रत लेते हैं वे क्षत्रिय कहलाते है देश का शासन करने का भी ऐसे ही व्यक्तियों को अधिकार है।

वैश्यआर्थिक दृष्टि से देश को समृद्ध बनाने की प्रतिक्षा कर मुख्यतया कृषि, व्यापार आदि कार्य करने वाले

व्यक्तियों को वैश्य कहा जाता है

शूद्रजो व्यक्ति मानव समाज की सुख-शान्ति के प्रमुख शत्रु अज्ञान अन्याय, अभाव से लड़ने में अपने को असमर्थ पाते हैं और कला कोशल, दस्तकारी आदि शारीरिक परिश्रम से राष्ट की सेवा करते हैं उन्हें शूद्र नाम से पुकारा जाता है।

यहाँ पर बात याद रखने योग्य है कि चारों वर्णों का नाम साझा है अर्थात् चारों वर्ण सेवक के नाम से पुकारे जायें तो अत्युक्ति नहीं रहेगी। चारों वर्ण अपनी योग्यता व क्षमतानुसार राष्ट के सेवक पुकारे जाते हैं। सेवक

होने के नाते राष्ट की दृष्टि में सभी समान हैं। अतः व्यक्ति विशेष से अलग-अलग न बुलाकर उसके कार्य

के अनुसार कह सकते हैं।

जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् द्विज उच्यते

प्रत्येक व्यक्ति जन्म से शूद्र होता है उसके पश्चात् संस्कारों के आधान से गुण-कर्म के द्वारा वह द्विजत्व को

प्राप्त होता है।

-हेड. एन सहायक प्रोफेसर

संस्कृत विभाग संजीवनि महाविद्यालय चापोलि

लातूर (महाराष्ट)