हम ज्ञान के सर्वश्रेष्ठ गुणों से संपन्न हों

ओउम
हम ज्ञान के सर्वश्रेष्ठ गुणों से संपन्न हों
डॉ.अशोक आर्य
ज्ञान , तेजा , बल और वीर्य , यह कुछ शक्तियां हैं जी किसी भी कार्य को संपन्न करने के लिए आवश्यक होती हैं | ज्ञान मानव को कुपथ से निकाल कर सुपथ पर ले जाता है | तेज से मानव तेजस्वी होता है . बल से मानव अपने पराक्रम दिखा कर सर्वत्र विजयी होता है तथा वीर्य भी मानव को विजयी बनाने का एक सुन्दर साधन है | जहाँ यह चारों ही हों तो सोने पर सुहागा हो जाता है | जिस के पास यह सब शक्तियां होती हैं ,उसे किसी अन्य प्रकार की सहायता की आवश्यकता ही नहीं होती | यजुर्वेद तथा अथर्ववेद में हमें इस प्रकार की ही शिक्षा देते हुए कहा है कि : –
यथा मक्षा इदं मधु ,न्यन्जन्ति मधावधि |
एवा में अश्विना वर्च्स्तेजो बलामोजश्च ध्रियाताम || ,अथर्व .९.१.१७ ||
यह मन्त्र हमें अच्छे गुणों का संग्रह करने का उपदेश देता है | मधुमखियाँ समय समय पर मधु एकत्र करती रहती हैं | जब जब वह मधु लेकर आती हैं , तब तब ही वह उस का अलग से संग्रह करने की व्यवस्था नहीं करती अपितु जो मधु का संग्रह उनहोंने पहले से हीजिन थैलियों में एकत्र कर रखा होता है , उसमें ही वह मिला देती हैं | इस प्रकार वह अपने भण्डार को निरंतर बढ़ाती ही चली जाती हैं | ठीक इस प्रकार ही मनुष्य भी अपने बल, ओज ,तेज व ज्ञान को निरंतर बढ़ाता रहता है | इन बढ़ी हुयी शक्तियों के संकलन के लिए उसे हर बार अलग से व्यवस्था नहीं करनी होती बल्कि पहले से ही एकत्र भण्डार में ही इन सब का समावेश करता चला जाता है |
इस मन्त्र की व्याख्या करते हुए हम पाते हैं कि मधुमखियाँ जिस मधु को एकत्र करती हैं , वह इस मधु के निर्माण में दो तत्वों को मिलाती हैं , इन का समावेश करती हैं , यह दो तत्व हैं : –
(१) पराग : –
(२) मकरंद अथवा अमृत : –
मधुमखियाँ अपने निवास से उड़कर फूलों पर जा बैठती हैं | मखियों का फूलों पर बैठने का उद्देश्य न तो विश्राम करना होता है तथा न ही आनंद लेने का | यह तो उनका नित्य का व्यापार होता है , उनका नित्य का व्यवसाय होता है , जिसे वह करती हैं | आप चकित होंगे की मधुमखियाँ भी मानव की भाँती व्यापार करती हैं | जी हाँ ! मधुमक्खियाँ भी व्यापार करती हैं | मधुमक्खियाँ ही नहीं इस सृष्टि का प्रत्येक जीव जीवन व्यापार करता है | व्यापार क्या है ? वह साधन जिससे आजीविका , पेट की तृप्ति के साधन मिल सकें | बस पेट की तृप्ति के साधन ही मधुमखियाँ फूलों पर बैठकर प्राप्त करती हैं | इस लिए ही इस कार्य को व्यापार अथवा आजीविका प्राप्त करने के अर्थ में लिया गया है |हाँ तो मधु मखियाँ इन फूलों पर जा कर बैठती हैं | फूलों में जो पराग भरा रहता है , उसे वह धीरे धीरे एकत्र कर अपनी छोटी – छोटी थैलियों में भरती चली जाती हैं | इस प्रकार पराग का वह संकलन करती हैं |
जिस प्रकार मधुमखियाँ फूलों के पराग को एकत्र कर थैलियों में भरती हैं , उस प्रकार ही वह मकरंद जिसे अमृत भी कहा जाता है , को भी फूलों में से चूसने लगती हैं | इसे चूस चूस कर वह अपने मुंह में भर लेती हैं | यह दोनों तत्व लेकर मधुमक्खियाँ अपने उस स्थान पर चली जाती हैं , जहाँ शहद अथवा मधु बना कर संकलन करना होता है | इस स्थान का नाम छाता होता है | अत: वह यह दोनों पदार्थ लेकर अपने शहद के छत्ते में चली जाती हैं | यहाँ वह एक निश्चित अनुपात में इन दोनों तत्वों को मिला कर मधु का , शहद का निर्माण करती हैं | इस प्रकार पराग व मकरंद को मिला कर वह मधु के रूप में परिवर्तित कर देती हैं | इस से स्पष्ट होता है कि इन दो पदार्थों के मिश्रण का नाम ही मधु होता है | इस मधु को संभालने के लिए मधुमखियाँ छोटे छोटे कोष्ठक बनाती हैं | इन कोष्ठकों में अपने बनाए मधु को वह भर देती हैं | ज्योंही कोष्ठक मधू से भर जाते हैं त्यों ही इस की संरक्षा के लिए वह इन कोष्ठकों को ऊपर से बंद कर देती हैं | जब जब इन्हें और कोष्ठकों की आवश्यकता होती है तब तब वह यथावश्यकता छोटे अथवा बड़े आकार के यह कोष्ठक भी निर्माण करती चली जाती हैं | इसप्रकार उनका यह संकलन , यह संग्रह निरंतर बढ़ता व संरक्षित होता चला जाता है | मानव मस्तिष्क भी इस प्रकार के विभिन्न कोष्ठकों का ही केंद्र होता है, भण्डार होता है | इन कोष्ठकों में विभिन्न प्रकार के गुणों का द्रव्य संचित होता है , संग्रह किया हुआ होता है , रखा हुआ होता है | सद्गुण इन द्रव्यों में स्निग्धता पैदा करते व बढ़ाते व विक्सित करते रहते हैं | जब कि दुर्गुणों से इन द्रव्यों कि स्निग्धता निरंतर कम होती चली जाती है | ज्यों ज्यों स्निग्धता कम होती चली जाती है त्यों त्यों इन में रुक्षता आती जाती है |
हमारा यह मन्त्र हमें ज्ञान , बल ,तेज आदि गुणों के संकलन करने के लिए निरंतर प्रयत्न करने का उपदेश देता है | मन्त्र कहता है कि हम एसा व्यवसाय करें , एसा यत्न करें , इसे क्रियाकलाप करें कि जिस से हमारे मस्तिष्क के इस संकलन में ज्ञान , तेज, बल, वीर्य आदि उत्तम तत्वों की निरंतर वृद्धि होती चली जावे |
हम जानते हैं कि परम पिता परमात्मा जब कुछ जोड़ने का कम करता है तो हम, उसे अश्विनी के नाम से पुकारते हैं | अश्विनी का अर्थ होता है जोड़ने वाला | अत: जब हम निरंतर एसे यत्न करते हैं , जिससे हमारे ज्ञान , तेज,बल तथा वीर्य आदि अच्छे तत्वों की हमारे मस्तिष्क में वृद्धि होती चली जाती है , अच्छे तत्व निरंतर बढ़ते ही चले जाते हैं , इसलिए हम इस कार्य के लिए अश्विनी देव की शरण में जाते हैं | जब निरंतर गुण संग्रह का यत्न किया जाता है तो हमारे अन्दर ज्ञान आदि तत्व विक्सित होते चले जाते हैं | इससे ही हमारे अन्दर तेजस्विता, वर्चाविता आदि दिव्य गुणों का निरंतर विस्तार होता चला जाता है |
यह मन्त्र एक अन्य भाव के रूप में भी हमें उपदेश देता है | मन्त्र उपदेश करता है कि हमारा जीवन मधुमय बने , मधु के सामान ही मिठास हमारे जीवन से टपके , जीवन मधुर हो , यह आनंद से युक्त हो, आनंदमय हो | जब हमारा जीवन आनंदमय होगा, मधुरता से भरपूर होगा , मिठास से भरपूर होगा तो हमारे अन्दर से जो माधुर्य टपकेगा , उससे समाज पर भी मधुरता की वर्षा होगी | इस मधुरता से समाज में भी मधुरता ही आवेगी | इस का ही पाठ शतपथ ब्राहमण में करते हुए इस प्रकार उपदेश किया गया है : –
सर्वं वा इदं मधु, यदिदं किन च || शतपथ ब्रा. ३.७.१.११ ||
जो कुछ भी है सब मधु है | इस आशय से स्पष्ट होता है कि मधुरता पूर्ण व्यवहार मनुष्य की सब कामनाओं को पूर्ण करने में सहयोगी होता है , कारण होता है किन्तु दुष्टतापूर्ण व्यवहार से बने हुए काम भी बिगड़ जाते हैं | इस लिए जीवन में निरंतर मधुरता भरते चले जाना चाहिए | जीवन मधुर होगा तो हमारे प्रत्येक कार्य का परिणाम भी
मधुर ही होगा |………………
डा. अशोक आर्य
१०४ – शिप्रा अपार्टमेन्ट , कोशाम्बी, गाजियाबाद
चलावार्ता ०९७१८५२८०६८
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प्रमाण मिलान की परम्परा अखण्ड रखियेः राजेन्द्र जिज्ञासु

प्रमाण मिलान की परम्परा अखण्ड रखियेः-
अन्य मत पंथों के विद्वानों ने महर्षि दयानन्द जी से लेकर पं. शान्तिप्रकाश जी तक जब कभी आर्यों के दिये किसी प्रमाण को चुनौती दी तो मुँह की खाई। अन्य-अन्य मतावलम्बी भी अपने मत के प्रमाणों का अता- पता हमारे शास्त्रार्थ महारथियों से पूछ कर स्वयं को धन्य-धन्य मानते थे। ऐसा क्यों? यह इसलिये कि प्रमाण कण्ठाग्र होने पर भी श्री पं. लेखराम जी स्वामी वेदानन्द जी आदि पुस्तक सामने रखकर मिलान किये बिना प्रमाण नहीं दिया करते थे। ऐसी अनेक घटनायें लेखक को स्मरण हैं। अब तो आपाधापी मची हुई है। अपनी रिसर्च की दुहाई देने वाले पं. धर्मदेव जी, स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी, श्री पं. भगवद्दत्त जी की पुस्तकों को सामने रख कुछ लिख देते हैं। उनका नामोल्लेख भी नहीं करते। प्रमाण मिलान का तो प्रश्न ही नहीं। स्वामी वेदानन्द जी ने प्रमाण कण्ठाग्र होने पर भी एक अलभ्य ग्रन्थ उपलब्ध करवाने की इस सेवक को आज्ञा दी थी। यह रहा अपना इतिहास।
एक ग्रन्थ के मुद्रण दोष दूर करने बैठा। प्रायः सब महत्त्वपूर्ण प्रमाणों के पते फिर से मिलाये। बाइबिल के एक प्रमाण के अता-पता पर मुझे शंका हुई। मिलान किया तो मेरी शंका ठीक निकली। घण्टों लगाकर मैंने प्रमाण का ठीक अता-पता खोज निकाला। बात यह पता चली कि ग्रन्थ के पहले संस्करण का प्रूफ़ पढ़ने वाले अधकचरे व्यक्ति ने अता-पता ठीक न समझकर गड़बड़ कर दी। आर्य विद्वानों व लेखकों को पं. लेखराम जी, स्वामी दर्शनानन्द जी, आचार्य उदयवीर और पं. गंगाप्रसाद जी उपाध्याय की लाज रखनी चाहिये। मुद्रण दोष उपाध्याय जी के साहित्य में भी होते रहे। उनकी व्यस्तता इसका एक कारण रही।

मन को चेतना बुद्धि से मिलती है

ओउम
मन को चेतना बुद्धि से मिलती है
डा.अशोक आर्य
मानवीय मन अपार शक्तियों का भंडार है | मानव जो भी कार्य करता है मन के ही आदेश से करता है | मन से ही आदेशित कर्मेन्द्रियाँ गतिशील होकर सब कार्यों को संपन्न कराती है | मन के बिना संसार में किसी का कोई भी कार्य संपन्न नहीं हो सकता | मन प्रतिक्षण अनेक प्रकार का विचार विमर्श करता ही रहता है | इस के परिणाम स्वरूप जो भी निष्कर्ष उसे मिलता है ,उस कार्य को करने का नर्देश वह अपनी इन्द्रियों को देता है तथा इन्द्रियां अपने कौशल से उस बनाई गयी योजना को संपन्न करने का कार्य करती है | मन यदि उतम है तो कार्य का परिणाम भी उतम होता है तथा मन के कलुषित होने से कार्य भी बुरे ही होते हैं | अत: मन में चेतना का होना आवश्यक है | मन की चेतना का स्रोत बुधि होती है | बुद्धि ही मन को चेतना देती है | इस तथ्य को ऋग्वेद के मन्त्र में इस प्रकार स्पष्ट किया गया है :-
इंद्र यस्ते नवीयसीं , गिरं मंद्रामजीजनत |
चिकित्विन्मनसं धियं,प्रतनामृतस्य पिप्युइषम || ऋग्वेद ८.९५.५ ||
हे सर्वश्क्तियों व एश्वर्य से युक्त परमात्मन ! जो व्यक्ति तेरे लिए अति नवीन व मनोरम विधि से स्तुति करता है , उसको प्राचीन व सत्य से परिपुष्ट तथा मन को चेतना देने वाली बुद्धि दो |
इस मन्त्र के आधार पर बुद्धि के दो गुण होते हैं :-
१ बुद्धि से मन प्रेरित होता है : –
२) बुद्धि ऋत से पुष्ट होती है :-
मानवीय मन किसी भी समय खाली नहीं बैठता | यह प्रतिक्षण कुछ नया खोजने के लिए अपने चारों और चक्र लगाता रहता है , सब और घूमता रहता है | दिन के प्रकाश में तो मन घूमता ही है , सब दृश्य देखता ही है , रात्रि के अँधेरे में भी यह मन बहुत कुछ देखने की शक्ति से सम्पन्न है | यहाँ तक कि जब हम सौ रहे होते हैं तब भी मन अपने कार्य में लगा रहता है तथा दूर दूर तक धूमता रहता है , भ्रमण करता रहता है | इस भ्रमण से, घूमने से मन अनेक अवधारणायें कुछ करने के लिए एकत्र कर लेता है | फिर मनन व चिंतन से जो वह निष्कर्ष निकालता है ,जो वह निर्णय लेता है ,उसे करने का आदेश अपनी इन्द्रियों को देता है | मन से आदेशित व प्रेरित इन्द्रियां मन के वश में रहती हुयी निरंतर मन से दिशा निर्देश लेते हुए उस कार्य को संपन्न करने के लिए अग्रसर हो जाती हैं ,क्रियाशील हो जाती हैं , प्रयास आरम्भ कर देती हैं, पुरुषार्थ करने लगती है तथा तब तक कार्य में व्यस्त रहती हैं जब तक उस कार्य को संपन्न नहीं कर लेती | इस सब से यह निष्कर्ष निकलता है कि सब प्रकार के संकल्प विकल्प करने का कार्य मन ही करता है |
मन सदा संकल्प विकल्प करता रहता है | यह मन का मुख्य कार्य है | संकल्प से ही मानव में विवेक से परिपूर्ण क्रियाशीलता आती है | विवेकपूर्ण क्रियाशीलता से ही कर्तव्य तथा अकर्तव्य का बोध होता है | अत: ग्राह्य तथा अग्राह्यता की विवेचना संकल्प का कार्य है | इस के विपरीत अवस्था में संकल्प अनिच्छा की स्थिति में ले जाता है | विकल्प ही है जो मन को अपने तर्क वितर्क में फंसा लेता है | यदि मन को बुद्धि प्रेरित न करे तो मन कुछ भी निर्णय नहीं कर सकता | मन जब अनिश्चय में होगा तो किसी कार्य के संपन्न होने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता | मन का निर्णय ही तो कार्य को सम्पन्नता की और ले जाता है | जब मन कोई निर्णय लेने की स्थिति में ही नहीं है तो कार्य आरम्भ ही नहीं हो पावेगा, उसकी सम्पन्नता तो बहुत दूर की बात है | अत: किसी भी कार्य के सम्बन्ध में फंसे मन को किसी निश्चय तक पहुँचाने का कार्य, संपन्न करने की और ले जाने का कार्य तथा निर्णयात्मक ज्ञान से प्रबुद्ध करने का कार्य बुद्धि का होता है | इस कारण बुद्धि को मन का नियंता भी कहा गया है | मन की सब प्रेरणाओं का आधार बुद्धि को ही स्वीकार किया गया है | जब तक मन बुद्धि का सहारा नहीं लेता, तब तक वह विचार विमर्श, तर्क वितर्क में फंसे हुए कोई भी निर्णय नहीं ले पाता, इस उलझन में ही उलझा रहता है , किन्तु बुद्धि का सहयोग, सहारा मिलते ही मन कुछ भी निर्णय लेने में सक्षम हो जाता है तथा वह तत्काल निर्णय ले कर अपनी इन्द्रयों को गतिशील कर कर्म में लगा देता है ,जिसके परिणाम स्वरूप वांछित कार्य सफलता पूर्वक संपन्न होता है | इस सब से यह बात स्पष्ट होती है, यह तथ्य सामने आता है की मन कि प्रेरणा का आधार बुद्धि ही है |
बुद्धि के भी यह मन्त्र दी तत्व बताता है : –
१) वर्धक
२) नाशक: –
बुद्धि के वर्धक तत्व को ऋत कहते हैं तथा अनरत को नाशक कहते हैं | ऋत तत्व के अंतर्गत सत्य , सदाचार,सुशीलता आदि आते है | इससे भी स्पष्ट होता है कि अच्छाई व सत्य के प्रचार व प्रसार का कार्य ऋत तत्व करता है | यह सत्य का प्रचारक है | सदाचार का सर्वत्र प्रसारक भी ऋत ही है तथा संसार में जितने भी सुशीलता युक्त कार्य दिखाई देते हैं वह भी ऋत तत्व के कारण ही होते हैं | इस तत्व से बुद्धि को पुष्टि मिलती है | पुष्ट बुद्धि बड़े बड़े अच्छे कार्यों को सम्पन्न करने की प्रेरणा मन को देती है | बुद्धि से प्रेरित यह मन इन कार्यों को संपन्न कर हर्षित होता है | इस के उल्ट जितने भी पापाचार हैं, जितने भी क्रोध हैं , जितने प्रकार के भी मोह हैं तथा जितने प्रकार के भी मादक पदार्थ अथवा द्रव्य आदि हैं , यह सब इसके अर्थात बुद्धि के नाशक तत्व हैं | अत: मन्त्र निर्देश देता है कि हम अनृत को छोड़ कर अछे कार्यों में लगें | ऋत का परिणाम भी ऋत के अनुसार उतम ही निकलेगा | यदि हम उत्तमता को पाना चाहते है, यदि हम अच्छे कार्य कर अपना यश व कीर्ति को बढ़ा केर उतम धन एश्वर्य के स्वामी बनना चाहते है तो सदा ऋत के अनुकूल ही कर्म करने चाहियें |
डा. अशोक आर्य
१०४ – शिप्रा अपार्टमेंट , कौशाम्बी , गाजियाबाद चलावार्ता : ०९७१८५२८०६८, ०९०१७३२३९४३ e mail ashokarya1944@rediffmail.com

सलामतराय कौन थे: राजेन्द्र जिज्ञासु

सलामतराय कौन थे?ः-

परोपकारी में इस सेवक ने महाशय सलामतराय जी की चर्चा की तो माँग आई है कि उन पर कुछ प्रेरक सामग्री दी जाये। श्री ओमप्रकाश वर्मा जी अधिक बता सकते हैं। स्वामी श्रद्धानन्द जी की कोठी के सामने जो पहली बार जालंधर में उनके दर्शन किये, वह आज तक नहीं भूल पाया। भूमण्डल प्रचारक मेहता जैमिनि जी के व्याख्यान में कादियाँ में यह प्रेरक प्रसंग सुना था कि कन्या महाविद्यालय की स्थापना पर केवल पाँच कन्यायें प्रविष्ट हुई थीं। उनमें एक श्री सलामतराय जी की बेटी भी थी। महात्मा मुंशीराम जी की पुत्री वेदकुमारी तो थी ही। शेष तीन के नाम मैं भूल गया हूँ। इस पर नगर में पोपों ने मुनादी करवाई कि बेटियों को मत पढ़ाओ। पढ़-लिख कर गृहस्थी बनकर पति को पत्र लिखा करेंगी। यह कार्य (पत्र लिखना) लज्जाहीनता है। ऐसी-ऐसी गंदी बातें मुनादी करवाकर कन्या विद्यालय के कर्णधारों के बारे में अश्लील कुवचन कहे जाते थे।
मेहता जी ने यह भी बताया था कि ऋषि भक्त दीवानों द्वारा यह मुनादी करवाई जाती थी कि विद्यालय में प्रवेश पानेवाली प्रत्येक कन्या को चार आने (१/४ रु०) प्रतिमास छात्रवृत्ति तथा एक पोछन (दोपट्टा) मिला करेगा। वे भी क्या दिन थे! कुरीतियों से भिड़ने वालों को पग-पग पर अपमानित होना पड़ता था। महाशय सलामतराय जी अग्नि-परीक्षा देने वाले एक तपे हुये आर्य यौद्धा थे।
जो प्रेरक प्रसंग एक बार सुन लिया, वह प्रायः मेरे हृदय पर अंकित हो जाता है। महात्मा हंसराज के नाती श्री अमृत भूषण बहुत सज्जन प्रेमी थे। महात्माजी पर मेरी पाण्डुलिपि पढ़कर एक घटना के बारे में पूछा, ‘‘यह हमारे घर की बात आपको किसने बता दी?’’ मैंने कहा, क्या सत्य नहीं है? उन्होंने कहा, ‘‘एकदम सच्ची घटना है, परन्तु मेरे कहने पर आप इसे पुस्तक में न देवें।’’ वह अठारह वर्ष तक अपने नाना के घर पर रहे। उन्हें इस बात पर आश्चर्य हुआ करता था कि इस लेखक को पुराने आर्य पुरुषों के मुख से सुने असंख्य प्रसंग ठीक-ठीक याद हैं।

परिवार को स्वर्गिक आनंद देने के उपाय

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परिवार को स्वर्गिक आनंद देने के उपाय
डा. अशोक आर्य
जहाँ पर सब व्यक्ति स्वस्थ रहते हुए एक दूसरे से प्रेम पूर्वक आनंद से रहते हैं , वहां स्वर्ग का वास होता है | लडाई – झगड़ा, कलह – क्लेश आदि की विद्यमानता में सदैव कष्ट ही कष्ट होता है , रोगों का सर्वत्र निवास होता है | इस लिए वेद आदेश देता है कि हे मानव ! सुखी जीवन पाने के लिए तुम सब मिलकर रहो | प्रतिदिन के नित्य कर्मों को नियम से करो, प्रभु स्मरण करो तथा प्रात: – सायं यग्य करो | इस प्रकार के कर्म करने से तुम्हें उत्तम स्वास्थ्य , यश व कीर्ति मिलेगी | इस पर अथर्ववेद इस प्रकार प्रकाश डाल रहा है : –

इमे गृहा मयोभुव उर्जस्वंत: पयास्व्न्त: |
पुरना वामें तिष्ठन्त:, ते नो जानान्त्वायत: || अथर्व. ७.६०.२ ||

इस घर में सब सुख हैं, अन्न व दूधादी से संपन्न है | यह सब अभीष्ट पदार्थों से भरपूर होते हुए प्रवास आदि से लौटते हुए हमें मिले |
यह मन्त्र एक आदर्श परिवार की अत्यंत ही सुन्दर रूप रेखा का दिग्दर्शन प्रस्तुत करते हुए कहता है कि एक आदर्श परिवार में इन गुणों का होना आवश्यक होता है :-

(१) परिवार में सुख हो  : –

परिवार किस प्रकार सुखी रह सकता है ? परिवार किस प्रकार संपन्न रह सकता है ? परिवार में किस प्रकार समृद्धि आ सकती है ? परिवार में किस प्रकार उत्कृष्टता आ सकती है ? , इस सब पर विचार करते हुए मन्त्र कहता है कि यदि हम परिवार में ये सब कुछ पाना चाहते है तो सर्व प्रथम यह आवश्यक है कि एसे परिवार का निवास एसे स्थान पर हो, जहाँ धूप व खुली वायु सरलता से प्रवेश कर सके | एसे परिवार के निवास स्थान के भवन की शिल्प इस प्रकार से की जावे कि भवन में बनाए गए कमरे न तो बहुत छोटे ही हों कि उन कमरों में रहना दूभर लगे तथा अधिक छोटे कमरों में धूप अथवा सूर्य का प्रकाश प्रवेश ही न कर पावे , वायु को भी घुमने में , चलने में परेशानी न हो तथा न ही कमरे इतने अधिक बड़े हों कि पूरा कमरा खाली सा ही पड़ा दिखाई दे | बाहर सूर्य की प्रथम किरण निकलते ही कमरे के अन्दर इतनी धूप आ जावे कि बैठना ही दूभर हो जावे | वायु का एक हलका सा झोंका कमरे के अन्दर के सब सामान को इधर उधर बिखेर दे | सर्दी के समय तो एसे कमरों में निवास ही कठिन हो जाता है | इसलिए कमरों का क्षेत्र सीमित व मर्यादित होगा तो परिवार प्राकृतिक सुविधाओ को ठीक स्वरूप में पा सकेगा | अत: यह मन्त्र मर्यादित भवन निर्माण करने का यह मन्त्र आदेश दे रहा है |
इतना ही नहीं मन्त्र परिवार के निवास स्थान की रूपरेखा बताते हुए आगे प्रकाश इस प्रकार डालता है कि इस भवन कि ऊँचाई भी मर्यादित हो | यह इतना उंचा हो कि इस में गर्मी के समय खुली वायु मिल सके किन्तु इतना अधिक उंचा भी न हो कि इसमें अत्यधिक वायु आने से ठंडी के दिनों में सिकुडन का अनुभव हो तथा इस के रख  रखाव , साफ़  सफाई में भी परेशानी आवे | इस प्रकार भवन की ऊँचाई को भी मर्यादित रखने  का आदेश यह मन्त्र देता है | मन्त्र आगे उपदेश करता है कि इस भवन के दरवाजे व खिड़कियाँ भी इस प्रकार से बनायी जावें कि जिन के कारण उस कमरे में निवास करने पर आनंद का अनुभव हो | सुख का अनुभव हो | परिवार को खुली वायु मिले | परिवार को समुचित प्रकाश दे सकें | इस कमरे में निवास करने वाले व्यक्ति को सुन्दर सुगंध देवें | इस प्रकार की खिड़कियाँ इस में निवास करने वाले व्यक्ति को सदा आनंदित रखती हैं , सदा हर्षित रखती हैं | इस में निवास करने वाले व्यक्ति को सदा सुरुचि पूर्ण लगती हैं | एसे कमरे से उसे बाहर जाने को मन ही नहीं मानता | किन्तु यदि खिडकियों का मुख किसी बाग – बगीचे के स्थान पर गंदगी के केंद्र पर होगा तो इस कमरे में निवास करना दूभर हो जावेगा | इस कमरे में पूरा दिन दुर्गन्ध ही दुर्गन्ध मिलेगी | इस कमरे के निवासियों पर रोग आक्रमण करने लगेंगे | इस कमरे के निवासी की आयु भी कम हो जावेगी | इस लिए मन्त्र का स्पष्ट आदेश है कि कमरे की खिड़कियाँ सुरुचिपूर्ण हों |
मन्त्र आगे बताता है कि भवन निर्माण इस प्रकार किया जावे कि स्थान कम होने पर भी यह भवन अधिक सुख सुविधायें देने में सक्षम हो सके | आज तो देश दुनिया में स्थान के आभाव में छोटे व बहु मंजिला भवन बन रहे हैं | इन अत्यंत छोटे भवनों में भी निर्माण कला एसी हो रही है कि इन में हम अत्यधिक सामान रख  सकते हैं | मन्त्र भी यही प्रेरणा दे रहा है | मन्त्र कह रहा है कि इस की भवन निर्माण में इन बातों का ध्यान रखा जावे की इस में समुचित सामान रखा जा सके | जहाँ पर परिवार का सामान ही न आवे , उस भवन का क्या लाभ तथा जहाँ पूरे के पूरे कमरे ही खाली पड़े रहे , सफाई के लिए भी अत्यधिक समय नष्ट करना पड़े, एसे भवन का भी क्या लाभ | अत: भवन मर्यादित आकार में बनाया जावे, जिस में सामान रखने  में कठिनाई न हो तथा न ही अत्यधिक क्षेत्र बेकार ही रहे | इस भवन में शयन कक्ष , स्वाध्याय कक्ष , पठन कक्ष ,भोजन कक्ष आदि विभिन्न कक्षों की भी अलग अलग व्यवस्था मिले तो परिवार में कोई परेशानी न होगी | यदि सोने का कमरा तथा पढने का कमरा एक होगा तो इस कमरे में पढ़ने वाले को उस समय परेशानी आवेगी, जब कोई अन्य इस में सो रहा हो तथा सोने वाले को परेशानी होगी , जब कोई अन्य प्रकाश करते हुए पढ़ रहा हो | अत: विभिनं कार्यों के लिए कमरे भी विभिन्न ही होने चाहियें |

(२) परिवार में सब प्रकार की सुख सुविधायें उपलब्ध हों : –

परिवार सब सुख सुविधाओं से संपन्न हो , यह इस बात पर प्रकाश डाल रहा है कि इस भवन में निवास करने वाले लोगों के पास अन्न, वस्त्र आदि सब प्रकार की सुविधायें उपलब्ध हों | इस में निवास करने वाले लोगों के पास अच्छा व स्वास्थ्य वर्धक अन्न हो तथा इस को सुरक्षित रखने  की समुचित व्यवस्था भी इस भवन के निर्माण के समय की गयी हो | यदि भवन बनाते समय यह ध्यान ही नहीं दिया गया कि परिवार की आवश्यक वस्तुएं यथा अन्नादि भी इस भवन में आना है तो भवन बनाने के पश्चात इस परिवार के भरण पोषण के लिए अन्न आदि कहाँ रखेंगे ? यदि इसे खुले में रखा गया तो यह खाराब हो जावेगा तथा यदि इसे किसी बंद स्थान पर रखा गया तो भी यह ख़राब हो जावगा | ख़राब अन्न का प्रयोग स्वास्थ्य की दृष्टि से हानि कर होता है | अत: इस के प्रयोग से परिवार रोग व कष्ट से भर जावेगा अत:एसे भवन में परजनों का जीना ही दूभर हो जावेगा | अन्न ही शरीर को शक्ति देता है | अन्न ही शरीर की ऊर्जा का कारण होता है | यदि घर में अन्न ही सुरक्षित न होगा तो परिजनों का स्वास्थ्य ठीक न रहेगा तथा न ही शरीर में संतुलित ऊर्जा का ही प्रवाह होगा |
मन्त्र इस बात परा भी प्रकाश डालता है कि परिवार में दूध , घी , जलादि का ठीक से प्रबंध हो , व्यवस्था हो | इससे भाव है कि इस भवन में दुधारू पशु रखने की अलग से समुचित व्यवस्था की गयी हो ताकि इस परिवार में सुरक्षित व स्वस्थ पशु धन रखा जा सके,जो परिवार की सम्पन्नता को प्रकट करे तथा परिजनों को दूध व घी देकर उन्हें पुष्ट करे व स्वस्थ रख सके | इस परिवार में जल का भण्डारण करने की भी क्षमता होनी आवश्यक है | यदि भवन निर्माण के समय जल भंडारण व संरक्षण का ध्यान नहीं रखा जाता तो भवन बेकार हो जाता है | जल ही जीवन होता है | जल के बिना मानव एक पल भी जीवित नहीं रह सकता | जल हो किन्तु दूषित हो तो इस का स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव निश्चित है | इस लिए भवन निर्माण के समय जल भंडारण का समुचित ध्यान रखना आवश्यक है तथा जल इस प्रकार से रखने की व्यवस्था हो , जहाँ से जल सरलता से उपलब्ध हो किन्तु नष्ट न हो |

3 इस प्रकार यह मन्त्र हमें उपदेश देता है , आदेश देता है कि यदि हम सुखों की चाहना रखते हैं ,सुखों की इच्छा रखते है, स्वस्थ रहना चाहते हैं , रोग शोक से बचना चाहते हैं , परिवार में कलह क्लेश न हो तो हमें अपने घर के निर्माण के समय अनेक बातों का ध्यान रखना होगा, जिससे हमें शुद्ध वायु व सुचारू प्रकाश मिल सके | हमें सब परिजनों को अलग अलग कार्यों के लिए अलग से किन्तु हवादार कमरे उपलब्ध हों | हमारी रसोई अलग हो, भोजन कक्ष अलग हो तथा खिड़कियाँ भी एसे स्थान पर हों जो मनोहारी दृश्य दिखावें | घर में अन्न आदि का भंडारण व पशु आदि का स्थान भी हो तथा जलादि का भण्डारण भी ठीक से किया जा सके | यदि हमारे घर इस योजना से बनेंगे तो हमारा स्वास्थ्य उतम होगा, हम खुश रहेंगे तथा हमारी आयु भी दीर्घ होगी |
डा. अशोक आर्य
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श्री शत्रुघन सिन्हा का ज्ञान घोटालाः- राजेन्द्र जिज्ञासु

श्री शत्रुघन सिन्हा का ज्ञान घोटालाः- राजनेता संसद में अथवा विधान सभा में पहुँचते ही सर्वज्ञ बन जाते हैं। उन्हें किसी भी विषय पर बोलना व लिखना हो तो स्वयं को उस विषय का अधिकारी विद्वान् मानकर अपनी अनाप-शनाप व्यवस्था देते हैं। वीर भगतसिंह जी के बलिदान पर्व पर विख्यात् अभिनेता शत्रुघन हुतात्मा भगतसिंह जी पर टी. वी. में उनके केश कटवाने पर किसी कल्पित व्यक्ति से उनका संवाद सुना रहे थे। उनकी जानकारी का स्रोत वही जानें। हम तो इसे ज्ञान-घोटाला ही मानते हैं।
वह संसद में जाकर कुछ न मिलने पर भाजपा से तो खीजे-खीजे कुछ न कुछ बोलते ही रहते हैं। इतिहास का गला घोंटते हुए अभिनेता जी ने वीर भगतसिंह के परिवार को कट्टर सिख बताया। अभिनेता ने भगतसिंह जी की भतीजी लिखित ग्रन्थ पढ़ा होता, उनके पितामह तथा पिताजी की वैदिक धर्म पर लिखी पुस्तकें पढ़ी होतीं तो उनको पता होता कि यह परिवार दृढ़ आर्यसमाजी था। श्री धमेन्द्र जिज्ञासु जी ने तथा इस लेखक ने भी वीर भगतसिंह की जीवनी लिखी है।
राजनीति में आकर भगतसिंह जी के विचारों में भले ही कुछ परिवर्तन आया, परन्तु उनका आर्यसमाज से यथापूर्व सम्बन्ध बना रहा। उनको हिन्दू-सिख सबसे प्रेम था, परन्तु उनको कट्टर पंथी सिख बताना तो इतिहास को विकृत करना है। उनके बलिदान पर ‘प्रकाश’ आर्य मुसाफिर आदि पत्रों में महाशय कृष्ण जी, प्रेम जी ने उनके वैदिक रीति से संस्कार न करवाने पर सरकार की नीति का घोर विरोध किया। तब किसी ने यह न कहा और न लिखा कि उनका परिवार सिख है। उस समय के आर्य पत्र मेरे पास हैं। तब किसी ने यह न लिखा कि वह आर्य परिवार से नहीं था। उनके अभियोग में पहला अभियुक्त महाशय कृष्ण का बेटा आर्य नेता वीरेन्द्र था। श्री सुखदेव, प्रेमदत्त व मेहता नन्दकिशोर आदि कई आर्य क्रान्तिकारी तब उनके साथ थे। पं. लोकनाथ स्वतन्त्रता सेनानी आर्य विद्वान् ने उनका यज्ञोपवीत संस्कार करवाया। महान् आर्य दार्शनिक आचार्य उदयवीर उनके नैशनल कॅालेज के गुरु ने अन्त समय तक भगतसिंह के लिए जान जोखिम में डाली। शत्रुघन जी की आर्यसमाज से व इतिहास से ऐसी क्या शत्रुता हो गई है कि आपने आर्यसमाज को नीचा दिखाने के लिए सारा इतिहास ही तोड़ मरोड़ डाला है?

सत्यार्थ प्रकाश की अनमोल वचन

एक धन, दूसरे बन्धु कुटुम्ब कुल, तीसरी अवस्था, चौथा उत्तम कर्म और पांचवीं श्रेष्ठ विद्या ये पांच मान्य के स्थान हैं। परन्तु धन से उत्तम बन्धु, बन्धु से अधिक अवस्था, अवस्था से श्रेष्ठ कर्म और कर्म से पवित्र विद्या वाले उत्तरोत्तर अधिक माननीय हैं॥

क्योंकि चाहै सौ वर्ष का भी हो परन्तु जो विद्या विज्ञानरहित है वह बालक और जो विद्या विज्ञान का दाता है उस बालक को भी वृद्ध मानना चाहिये। क्योंकि सब शास्त्र आप्त विद्वान् अज्ञानी को बालक और ज्ञानी को पिता कहते हैं॥

अधिक वर्षों के बीतने, श्वेत बाल के होने, अधिक धन से और बड़े कुटुम्ब के होने से वृद्ध नहीं होता। किन्तु ऋषि महात्माओं का यही निश्चय है कि जो हमारे बीच में विद्या विज्ञान में अधिक है वही वृद्ध पुरुष कहाता है॥

ब्राह्मण ज्ञान से, क्षत्रिय बल से, वैश्य धनधान्य से और शूद्र जन्म अर्थात् अधिक आयु से वृद्ध होता है॥

शिर के बाल श्वेत होने से बुढ्ढा नहीं होता किन्तु जो युवा विद्या पढ़ा हुआ है उसी को विद्वान् लोग बड़ा जानते हैं॥

और जो विद्या नहीं पढ़ा है वह जैसा काष्ठ का हाथी; चमड़े का मृग होता है वैसा अविद्वान् मनुष्य जगत् में नाममात्र मनुष्य कहाता है॥

इसलिये विद्या पढ़, विद्वान् धर्मात्मा होकर निर्वैरता से सब प्राणियों के कल्याण का उपदेश करे। और उपदेश में वाणी मधुर और कोमल बोले। जो सत्योपदेश से धर्म की वृद्धि और अधर्म का नाश करते हैं वे पुरुष धन्य हैं॥

-सत्यार्थ प्रकाश