अथ सृष्टि उत्पत्ति व्याखयास्याम्

अथ सृष्टि उत्पत्ति व्याखयास्याम्

– शिवनारायण उपाध्याय

वैदिक वाङ्मय में इस विषय पर कई स्थानों पर विचार किया गया है। ऋग्वेद, मुण्डकउपनिषद्, तैत्तिरीयउपनिषद्, प्रश्नोपनिषद्, छान्दोग्यउपनिषद् तथा बृहदारण्यकउपनिषद् में इस विषय पर विस्तार से विचार किया गया है। इन्हीं ग्रन्थों के आधार पर मैं भी इस विषय पर पूर्व में छः लेख लिख चुका हूँ। एक बार पुनः इसी विषय को लिखने का उपक्रम इसलिए करना पड़ रहा है कि आर्य समाज के ही प्रसिद्ध संन्यासी स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती आन्ध्रप्रदेश ने माह जून 2015 में ‘वैदिकपथ’ पत्रिका में एक लेख प्रकाशित करवाया है, जिसमें सृष्टि की आयु के स्वामी दयानन्द सरस्वती के निर्णय का विरोध किया है।

सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में विज्ञान का मानना तो यह है कि सृष्टि की उत्पत्ति Big Bang (भयंकर विस्फोट) के साथ ही प्रारमभ हुई और परिवर्तन के कई चरणों से गुजरती हुई वर्तमान स्थिति में पहुँची है। Big Bang के साथ ही आकाश और समय का कार्य प्रारमभ हुआ। सृष्टि उत्पत्ति का क्रम इस प्रकार रहा- आकाश, ज्वलनशील वायु, अग्नि, जल और निहारिका का मण्डल। निहारिका मण्डल में ही सौर मण्डलों ने स्थान पाया। पृथ्वी की उत्पत्ति सूर्य से छिटक कर अलग होने के बाद धीरे-धीरे परिवर्तित होकर वर्तमान रूप में हुई। श्वास लेने योग्य वायु के बनने, पानी के पीने योग्य होने पर पानी के अन्दर सर्वप्रथम जलचरों को जीवन मिला। फिर क्रमशः जल-स्थलचर, स्थलचर और आकाशचर प्राणियों की उत्पत्ति हुई। सृष्टि उत्पत्ति के पूर्व क्या था? इस विषय में विज्ञान का कहना है कि Big Bang के बाद ही सृष्टि नियम विकसित हुए हैं और उनके आधार पर हम घोषित कर सकते हैं कि भविष्य में कब क्या होगा और वे घोषणाएँ सब सत्य सिद्ध हो रही हैं, अतः हमें Big Bang के पूर्व की स्थिति को जानने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके अज्ञान से हमारे वैज्ञानिक कार्य पर कोई भी प्रभाव पड़ने वाला नहीं है। अस्तु।

वैज्ञानिक विचार धारा पर संक्षेप में वर्णन कर देने के उपरान्त अब हम इस विषय पर वैदिक वाङ्मय के विचार पाठकों के सामने रखने का प्रयास कर रहे हैं। वैदिक वाङ्मय में सृष्टि उत्पत्ति के पूर्व की स्थिति का वर्णन भी किया गया है। पाठकों के लिए नासदीय सूक्त के मन्त्र दिये जा रहे हैं-

नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमाऽपरोयत्।

किमावरीवः कुहकस्य शर्मन्नभः किमासीद्गहनं गभीरम्।।

-ऋग्वेद 10.129.1

अर्थ- (नासदासीत्) जब यह कार्य सृष्टि उत्पन्न नहीं हुई थी, तब एक सर्वशक्तिमान् परमेश्वर और दूसरा जगत् का कारण विद्यमान था। असत् शून्य नाम आकाश भी उस समय नहीं था क्योंकि उस समय उसका व्यवहार नहीं था। (ना सदासीत्तदानीम्) उस काल में सत् अर्थात् सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण मिलाकर जो प्रधान कहाता है, वह भी नहीं था। (नासीद्रजः) उस समय परमाणु भी नहीं थे तथा (नो व्योमाऽपरोयत्) विराट अर्थात् जो सब स्थूल जगत् के निवास का स्थान है, वह (आकाश) भी नहीं था। (किमावरीव…….गभीरम्) जो यह वर्तमान जगत् है, वह भी अत्यन्त शुद्ध ब्रह्म को नहीं ढँक सकता है और उससे अधिक वा अथाह भी नहीं हो सकता है, जैसे कोहरे का जल पृथ्वी को नहीं ढँक सकता है तथा उस जल से नदी में प्रवाह नहीं आ सकता है और न वह कभी गहरा अथवा उथला हो सकता है।

                        तम आसीत्तमसा गुलमग्रेऽप्रकेतं सलितं सर्वमा इदम्।

                        तुच्छ्येनावपिहितं यवासीत्तपसस्तन्माहिना जायतैकम्।।

– ऋ. 10.129.3

अर्थ- उस समय यह जगत् अन्धकार से आवृत, रात्रिरूप में जानने के अयोग्य, आकाशरूप सब जगत् तथा तुच्छ अर्थात् अनन्त परमेश्वर के सममुख एकदेशी आच्छादित तथा पश्चात् परमेश्वर ने अपने सामर्थ्य से कारण रूप से कार्य रूप में कर दिया।

न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः।

                       आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किं चनास।।

– ऋ. 10.129.2

सृष्टि के पूर्व प्रलयकाल में मृत्यु नहीं थी, मृत्यु के अभाव में अमरता भी नहीं थी। न मारक शक्ति के विपरीत अमृत अथवा सब जीव मुक्तावस्था में थे, ऐसा भी नहीं कह सकते। रात्रि एवं दिन का प्रज्ञान भी नहीं था। उस समय केवल वायु की अपेक्षा न रखने वाला सदा जाग्रत ब्रह्म ही था। उस समय उससे भिन्न, उसके समान अथवा उससे अधिक कुछ भी नहीं था। प्रकृति ऊर्जारूप में परिवर्तित होकर अव्यक्त थी।

फिर सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई, इस पर तैत्तिरीय उपनिषद् का कहना है-

‘सो कामयत। बहुस्यां प्रजायेयेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा इदं सर्वमसृजत। यदिद किञ्च। तत सृष्टावा तदेवानु प्राविशत्। तदनुप्रविश्य। सच्चत्यच्यामवत्। निरुक्तं चानिरुक्तं च। निलयन चानिलयन च। विज्ञानं चापिज्ञानं च। सत्यं चानृतं च। सत्यमभवत। यदिद किञ्च। तत्सत्यमित्या चक्षते।

-तै.उप. ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवाक 6

अर्थ- उसने कामना की कि मैं एक से अनेक हो जाऊँ, तब उसने तप किया। क्रिया का प्रारमभ हो गया। जब यह क्रिया बढ़ते-बढ़ते उग्र रूप में पहुँची, तब उसे तप कहा गया। तप के प्रभाव से यह सब विश्व सृजा गया। सबकी सृष्टि करके वह ब्रह्म सृष्टि में अनुप्रविष्ट हो गया। आगे विपरीत कणों का वर्णन भी किया गया है-

सत्व रजस्तमसा सामयावस्था प्रकृतिः प्रकृतेर्महान् महतोऽहंकारोऽहंकारात् पञ्चतन्मात्राण्युभयमिन्द्रियं पञ्चतन्मात्रेयः स्थूल भूतानि पुरुष इति पञ्च विंशतिर्गण।।

अर्थ- सत्व, रज और तम रूप शक्तियाँ हैं। इन शक्ति रूपों की समावस्था, निश्चेष्ठावस्था प्रकट रूपावस्था को प्रकृति कहते हैं। प्रकृति से अहंकार, अहंकार से पाँच तन्मात्राएँ तथा पञ्चतन्मात्राओं से पाँच स्थूलभूत, स्थूलभूतों से पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा मन उत्पन्न होता है। पुरुष (चेतन सत्ता) इनसे भिन्न हैं। इन 25 पदार्थों को जानना, समझना विवेक में आवश्यक है।

ऋग्वेद में सृष्टि उत्पत्ति परमेश्वर ने इस प्रकार की है-

ब्रह्मणस्पतिरेता सं कर्मारइवाधमत्।

देवानां पूर्व्ये युगेऽसतः सद जायत।।

– ऋ. 10.72.2

प्रकृति और ब्रह्माण्ड के स्वामी परमेश्वर ने दिव्य पदार्थों के परमाणुओं को लोहार के समान धोंका, अर्थात ताप से तप्त किया है। वास्तव में इसी को वैज्ञानिकों ने भयंकर विस्फोट Big Bang कहा है। इन दिव्य पदार्थों के पूर्व युग, अर्थात् सृष्टि के प्रारमभ में अव्यक्त (असत्) प्रकृति से (सत्) व्यक्त जगत् उत्पन्न किया गया है। तैत्तिरीयोपनिषद् ब्रह्मानन्दवल्ली के प्रथम अनुवाक में सृष्टि उत्पत्ति का क्रम भी बताया गया है-

तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः समभूतः। आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी।      पृथिव्या ओषधय। ओषधीयोऽन्नम् अन्नाद् रेतः। रेतसः पुरुषः। स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः।।

अर्थात् परम पुरुष परमात्मा से पहले आकाश, फिर वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी उत्पन्न हुई है। पृथ्वी से ओषधियाँ, (अन्न व फल फूल) ओषधियों से वीर्य और वीर्य से पुरुष उत्पन्न हुए, इसलिए पुरुष अन्न रसमय है।

पृथ्वी की उत्पत्ति सूर्य में से छिटक कर हुई है, इस पर कहा गया है-

                           भूर्जज्ञ उत्तानपदो भूव आशा अजायन्त |

अदितेर्दक्षो अजायत दक्षाद्वदितिः परि।।

– ऋ. 10.72.4

अर्थ- पृथ्वी सूर्य से उत्पन्न होती है। पृथ्वी से पृथ्वी की दशा को बताने वाले भेद उत्पन्न होते हैं। प्रातःकालीन उषा से आदित्य उत्पन्न होता है, अर्थात् दृष्टि गोचर होता है और सांय कालीन उषा आदित्य से उत्पन्न होती है।

सृष्टि उत्पत्ति पर विचार कर लेने पर अब सृष्टि की वर्तमान आयु पर विचार करते हैं। वर्तमान में सृष्टि का वर्णन Friedmann Model के अनुसार किया जाता है। इसमें Big Bang के साथ ही आकाश-समय निरन्तरता का जन्म हो जाता है, अर्थात् समय की गणना Big Bang के प्रारमभ होने के साथ ही शुरू हो जाती है। एक अमेरिकन वैज्ञानिक Edwin Hubble ने 9 विभिन्न आकाश गंगाओं (Galaxies) की दूरी जानने का प्रयत्न किया। उसने बताया कि हमारी आकाश गंगा तो अत्यन्त छोटी है, ऐसी तो करोड़ों आकाश गंगाएँ हैं। साथ ही उसने यह भी बताया कि जो (Galaxy) हमसे जितना अधिक दूर है, उतनी ही अधिक तेजी से वह हम से दूर भागती जा रही है। उसने उनकी हमसे दूर होने की चाल की गति भी ज्ञात कर ली। फिर इस सिद्धान्त पर भी Big Bang के समय तो सब एक ही स्थान पर थे। उन्हें इतना दूर जाने में कितना समय लगा, उसका एक नियम भी खोज लिया।

नियम है- V=HR. यहाँ V आकाश गंगा की हमसे दूर भागने की गति है,  R आकाश गंगा की हमसे दूरी है और H Constant है। Edwin Hubble ने यह भी ज्ञात किया कि कोई भी आकाश गंगा जो हमसे d दश लाख प्रकाश वर्ष की दूरी पर है, उसकी दूर हटने की गति 19d मील प्रति सैकण्ड है। अतः अब समय R=106 d प्रकाश वर्ष, T =106×365×24×3600×186000d वर्ष

19d×3600×24×365

=186×109=9.7×109वर्ष

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Saint Augustine ने अपनी पुस्तक The City of God में बताया कि उत्पत्ति की पुस्तक के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति ईसा से 500 वर्ष पूर्व हुई है।

बिशप उशर का मानना है कि सृष्टि की उत्पत्ति ईसा से 4004 वर्ष पूर्व हुई है और केब्रीज विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. लाइटफुट ने सृष्टि उत्पत्ति का समय 23 अक्टूबर 4004 ईसा पूर्व प्रातः 9 बजे बताया है जो हास्यास्पद है। अब हम वैदिक वाङ्मय के आधार पर सृष्टि की आयु पर विचार करते हैं। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के दूसरे अध्याय अथ वेदोत्पत्ति विषय में इस पर विचार किया है कि वेद की उत्पत्ति कब हुई? इससे यह मानना चाहिए कि सृष्टि में मानव की उत्पत्ति कब हुई, क्योंकि मानव के उत्पन्न होने पर ही तो वेद का ज्ञान उसे प्राप्त हुआ है। इससे पूर्व की स्थिति अर्थात् सृष्टि उत्पन्न होने के प्रारमभ से मानव के उत्पन्न होने के समय पर उन्होंने अपने विचार देना उचित नहीं समझा। वास्तव में मनुष्य ने तो अपने उत्पन्न होने के बाद ही समय की गणना प्रारमभ की है। सृष्टि के उस समय की गणना वह कैसे करता, जब बन ही रही थी? वह कैसे जानता कि सृष्टि उत्पन्न होने की क्रिया के प्रारमभ होने से उसके पूर्ण होने तक सृष्टि निर्माण में कितना समय व्यतीत हुआ है? इस पर फिर चर्चा करेंगे। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपनी गणना में मनुस्मृति के श्लोकों को ही मुखय रूप से काम में लिया है-

अत्वार्याहुः सहस्त्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम्।

तस्य यावच्छतो सन्ध्या सन्ध्यांशश्च तथा विधः।।

-मनु. 1.69

उन दैवीयुग में (जिनमें दिन-रात का वर्णन है) चार हजार दिव्य वर्ष का एक सतयुग कहा है। इस सतयुग की जितने दिव्य वर्ष की अर्थात् 400 वर्ष की सन्ध्या होती है और उतने ही वर्षों की अर्थात् 400 वर्षों का सन्ध्यांश का समय होता है।

इतंरेषु ससन्ध्येषु ससध्यांशेषु च त्रिषु।

एकापायेन वर्त्तन्ते सहस्त्राणि शतानि च।।

-मनु. 1.70

और अन्य तीन-त्रेता, द्वापर और कलियुग में सन्ध्या नामक कालों में तथा सन्ध्यांश नामक कालों में क्रमशः एक-एक हजार और एक-एक सौ कम कर ले तो उनका अपना-अपना काल परिणाम आ जाता है।

इस गणना के आधार पर सतयुग 4800 देव वर्ष, त्रेतायुग 3600 देव वर्ष, द्वापर 2400 वर्ष तथा कलियुग 1200 देव वर्ष के होते हैं। इस चारों का योग अर्थात् एक चतुर्युगी 12000 देव वर्ष का होता है।

दैविकानाम युगानां तु सहस्त्रं परि संखयया।

ब्राह्ममेकमहर्ज्ञेयं तावतीं रात्रिमेव च।। – मनु. 1.72

देव युगों को 1000 से गुण करने पर जो काल परिणाम निकलता है, वह ब्रह्म का एक दिन और उतने ही वर्षों की एक रात समझना चाहिए। यह ध्यान रहे कि एक देव वर्ष 360 मानव वर्षों के बराबर होता है।

तद्वै युग सहस्रान्तं ब्राह्मं पुण्यमहर्विदुः।

रात्रिं च तावतीमेव तेऽहोरात्रविदोजनाः।।मनु. 1.73

जो लोग उस एक हजार दिव्य युगों के परमात्मा के पवित्र दिन को और उतने की युगों की परमात्मा की रात्रि समझते हैं, वे ही वास्तव में दिन-रात = सृष्टि उत्पत्ति और प्रलय काल के विज्ञान के वेत्ता लोग  हैं।

इस आधार की सृष्टि की आयु = 12000×1000 देव वर्ष = 12000000 देव वर्ष

12000000×360 = 4320000000 देव वर्ष

12000000 देव वर्ष = 4320000000 मानव वर्ष

यत् प्राग्द्वादशसाहस्त्रमुदितं दैविक युगम्।

तदेक सप्ततिगुणं मन्वन्तरमिहोच्यते।।   -मनु. 1.79

पहले श्लोकों में जो बारह हजार दिव्य वर्षों का एक दैव युग कहा है, इससे 71 (इकहत्तर) गुना समय अर्थात् 12000×71 = 852000 दिव्य वर्षों का अथवा 852000×360= 306720000 वर्षों का एक मन्वन्तर का काल परिणाम गिना गया है।

फिर अगले श्लोक में कहा गया है कि वह महान् परमात्मा असंखय मन्वन्तरों को, सृष्टि उत्पत्ति और प्रलय को बार-बार करता रहता है, अर्थात् सृष्टी  प्रवाह से अनादि है।

फिर स्वामी दयानन्द सरस्वती संकल्प मन्त्र के आधार पर वेद का उत्पत्ति काल बताते हैं।

3म् तत्सत् श्री  ब्रह्मणः द्वितीये प्रहरोत्तरार्द्धे वैवस्वते मन्वन्तरेऽअष्टाविंशतितमे कलियुगे कलियुग प्रथम चरणेऽमुकसंवत्सरायमनर्तु मास पक्ष दिन नक्षत्र लग्न मुहूर्तेऽवेदं कृतं क्रियते च।

यह जो वर्तमान सृष्टि है, इसमें सातवें वैवस्वत मनु का वर्तमान है। इससे पूर्व छः मन्वन्तर हो चुके हैं और सात मन्वन्तर आगे होवेंगे। ये सब मिलकर चौदह मन्वन्तर होते हैं।

इस आधार पर वेदोत्पत्ति की काल गणना इस प्रकार होगी-

छः मन्वन्तरों का समय = 4320000×71×6= 1840320000 वर्ष

वर्तमान मन्वन्तर की 27 चतुर्युगी का काल= 4320000×27= 116640000 वर्ष

अट्ठाइसवीं चतुर्युगी के गत तीन युगों का काल= 3888000 वर्ष

कलियुग के प्रारभ से विक्रम सं. 2072 तक का काल= 3043 + 2072 वर्ष

= 5115 वर्ष

कुल योग = 1840320000 +116640000 + 3888000 +5115 वर्ष

= 1960853115 वर्ष। चूंकि विक्रम संवत् के प्रारमभ तक कलियुग के 3043 वर्ष व्यतीत हो चुके थे और 3044 वाँ वर्ष चल रहा था, इसलिए वर्तमान में 1960853116वाँ वर्ष चल रहा है।

अब कुछ विद्वान् कहते हैं कि सृष्टि की आयु जब मनु 1000 चतुर्युगी मानते हैं और दूसरी तरफ इसी आयु को 14 मन्वन्तर अर्थात् 994 चतुर्युगी कहा जाता है, तो दोनों के अन्तर 6 चतुर्युगों का समन्वय कैसे होगा? इसका उत्तर यह है कि 994 चतुर्युग तो मानव भोग काल है और 6 चतुर्युगों का समय सृष्टि उत्पत्ति के प्रारमभ से लेकर मानव अथवा वेदों की उत्पत्ति तक का है। सृष्टि उत्पत्ति में जो समय लगा है, वह सृष्टि की आयु में माना जावेगा। इसी प्रकार भोग काल 994 चतुर्युगों के अन्त में प्रलय काल प्रारमभ होगा और वह प्रलय की आयु में जोड़ा जायेगा।

ऋग्वेद में स्पष्ट कहा गया है कि काल लगे बिना कोई कार्य नहीं होता-

त्वेषं रूपं कृणुत उत्तरं यत्संपृञ्चानः सदने गोभिरद्भि।

                        कविबुध्नं परि मर्मृज्यते धीः सा देवताता समिति र्बभूवः।।

– ऋ. 1.95.8

अर्थ- मनुष्य को चाहिए कि (यत्) जो (संपृञ्चानः) अच्छा परिचय करता कराता हुआ (कविः) जिसका क्रम से दर्शन होता है, वह समय (सादने) सदन में (गोभिः) सूर्य की किरणों वा (अद्भिः) प्राण आदि पवनों से (उत्तरम्) उत्पन्न होने वाले (त्वेषम्) मनोहर (बुध्नम्) प्राण और बल सबन्धी विज्ञान और (रूपम्) स्वरूप को (कृणुते) करता है तथा जो (धीः) उत्पन्न बुद्धि वा क्रिया (परि) (मर्मृज्यते) सब प्रकार से शुद्ध होती है (सा) वह (देवताता) ईश्वर और विद्वानों के साथ (समितिः) विशेष ज्ञान की मर्यादा (बभूव) होती है, इस समस्त उक्त व्यवहार को जानकर बुद्धि को उत्पन्न करें।

भावार्थ- मनुष्यों को जानना चाहिये कि काल के बिना कार्य स्वरूप उत्पन्न होकर और नष्ट हो जाये- यह होता ही नहीं है और न ब्रह्मचर्य आदि उत्तम समय के सेवन के बिना शास्त्र बोध कराने वाली बुद्धि होती है, इस कारण काल के परम सूक्ष्म स्वरूप को जानकर थोड़ा-सा भी समय व्यर्थ न खोवें, किन्तु आलस्य छोड़कर समय के अनुसार व्यवहार और परमार्थ के कामों का सदा अनुष्ठान करें।

यह भी ध्यान रखें कि जिस क्रिया में जो समय लगे, वह उसी का होगा। स्वामी जी ने इस प्रकरण में वेद का उत्पत्ति काल बताया है, सृष्टि की आयु नहीं बताई है। यदि सृष्टि की आयु जानना चाहें तो इसमें सृष्टि का उत्पत्ति काल जोड़ दें, तब सृष्टि की आयु होगी-

= 1960853116+25920000= 1986773116 वर्ष

साथ ही सृष्टि की शेष आयु होगी= 4320000000-1986773116= 2333226884 वर्ष सन्धि और सन्ध्यांश काल तो युगों की आयु में पहिले ही जोड़ लिए हैं, फिर मन्वन्तर के प्रारमभ और अन्त में एक सतयुग का जोड़ना व्यर्थ है। स्वामी जी ने ही नहीं, मनु ने भी इसका उल्लेख नहीं किया है। ज्ञान के अभाव में सृष्टि उत्पत्ति काल को न समझ कर 25920000 वर्षों को 15 भागों में व्यर्थ विभाजित कर क्षति पूर्ति करने का प्रयत्न किया गया है। इससे तो यहूदी ही अच्छे हैं, जो सृष्टि की उत्पत्ति 6 दिनों में स्वीकार करते हैं। यदि उनके दिन का मान एक चतुर्युगी मान लें तो उनकी सृष्टि उत्पत्ति की गणना ठीक वेदों के अनुरूप हो जाती है। इति।

 

– 73, शास्त्रीनगर, दादाबाड़ी, कोटा-324009 (राजस्थान)

9 thoughts on “अथ सृष्टि उत्पत्ति व्याखयास्याम्”

  1. सही है समयनुसार जिसको जिस प्रकार शब्दोंका ज्ञान होरहा है वह उसीप्रकारसे ज्ञानका उजागर करता है भगवान कहते है यहजो मायामय सृष्टि रची गयी है यह समस्त सृष्टि कालके अधीन है जोकालको समझलेता है वह मायामोहसे छुटकारा पालेता है देखों ना ब्रह्माके एक दिनमें जो 14 विभाग होते है उस एक विभागमें मनुष्य गणनाके हिसाबसे 4320000 वर्ष होता है और देवतों के हिसाब से 12 हजार दिव्य वर्ष
    मनुष्यों के गिनती के अनुसार 4320000 वर्ष में 1577917828 दिन-रात होते है इतने दिन रात में सूर्य के हिसाब से जोरने पर 51840000 महीना होता है 4320000 वर्ष में सूर्य 4320000 बार, चन्द्रमा 57753336 बार, मंगल 2296832 बार, बुध 17937060 बार, वृहस्पति 364220 बार, शुक्र 7022376 बार, शनि 146568 बार घूमता है
    इस 4320000 वर्ष में 71 चतुर्युग आते/जाते है सत्ययुग+त्रैता+द्वापर+कलियुग बितने पर एक चतुर्युग कहलाता है इस प्रकार 4320000 वर्ष में 71-71 बार सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलिनाम वाले युग आते-जाते है इस समय ब्रह्माके 14 विभाग के सातवे विभाग वाला काल चलरहा है जिसमे अभी 28वा चतुर्युग के कलिनामवाला युग चलरहा है
    10वे चतुर्युग के त्रेता में समुंद्रमंथन हुआ था
    24वे चतुर्युग के त्रेता में श्रीरामचन्द्रजी का लीला हुआ था
    28वे चतुर्युग के द्वापर में श्रीकृष्णजी का लीला हुआ था
    32वे चतुर्युग के कली में श्रीकलिक के नाम से अवतार ग्रहण करूंगा
    प्रत्येक युग की समाप्ति पर जल-प्रलय आता है जिसमे उस युग की समस्त ज्ञान-विज्ञान को बहा लेजाती है फिर नयायुग अपने ज्ञानवान से युक्त होता है जिसप्रकार पिताके ज्ञान से आगेकी ज्ञान पुत्र नहीं प्राप्तकर सकता उसीप्रकार प्रत्येकयुग अपना जीवन शून्य से प्रारम्भ करता है

  2. श्रवण झा जी यह ब्रह्मा पुराण कि ब्रह्मा नहीं हैं जी इस लेख में सही से समझाया गया है जी आप इसे फिर से पढ़े जी | दूसरी बात आपके हिसाब से 10वे चतुर्युग के त्रेता में समुंद्रमंथन हुआ था
    24वे चतुर्युग के त्रेता में श्रीरामचन्द्रजी का लीला हुआ था
    28वे चतुर्युग के द्वापर में श्रीकृष्णजी का लीला हुआ था
    32वे चतुर्युग के कली में श्रीकलिक के नाम से अवतार ग्रहण करूंगा
    यह आप कैसे बोल रहे हैं | ब्रह्मा कौन हैं | ये अवतार कैसे होता है | इन सबकी आप जानकारी देने कि कोशिश करे |

  3. आदरणीय आर्य महोदय,

    विश्व के अधिकांश वैज्ञानिक Big-bang सिद्धांत को सही नहीं मानते और आधुनिक विज्ञान में यह एक विवादास्पद विषय है. लेकिन Thermodynamics के सिद्धांत (जिसके अनुसार उर्जा की ना तो उत्पत्ति होती है और ना विनाश, उसमें केवल परिवर्तन होता है) के सिद्धांत को विश्व के सभी जगहों में ना केवल मान्यता मिली है बल्कि इसे सारे धर्म ग्रंथों, वेदों, शास्त्रों आदि में भी स्वीकारा गया है और आज तक कोई इसे ग़लत सिद्ध नहीं कर पाया. उर्जा के अविनाशता के सिद्धांत और Big-bang के सिद्धांत में भारी विरोधाभास है, जैसा की इस वीडियो में बताया गया है. इसके अनुसार दोनों में से एक सिद्धांत सरासर ग़लत है, तो आप किसे ग़लत कहना चाहेंगे. कृपया इस गुत्थी को सुलझाएँ और इसमें ईश्वरीय ज्ञान को शामिल ना करें क्योंकि सभी धर्मों , पंथों, संप्रदायों आदि के अपने अपने अलग विचार होते हैं. इसे केवल वैज्ञानिक तरीके से सुलझाएँ, जिससे किसी को कोई आपत्ति ना हो.

    https://www.youtube.com/watch?v=7pamPkT8sc8&feature=em-upload_owner

    1. गोपाल प्रसाद पटेल जी विज्ञानं खुद बहुत सी कही हुयी बात को बाद में अस्वीकार कर देता है जो कि उसे तथ्य और प्रयोग के आधार पर बाद में खोज करने पर जो परिणाम आता है उस आधार पर कि जाती है | चलिए आपको एक उदाहरन देकर समझाने कि कोशिश करता हु जी | विज्ञान पहले बोलता था कि सबसे छोटा अनु और परमाणु होता है | फिर बहुत समय बाद खोज और प्रयोग के बाद विज्ञान ने यह जानकारी दी कि इलेक्ट्रान प्रोटोन और न्यूट्रॉन ये सबसे छोटे हैं | फिर कुछ समय पहले यह खोज कि गयी कि बोसॉन पार्टिकल उससे भी छोटा है | इस कारण जब तक पूरी सच्चाई सामने नहीं आ जाती तब तक कोई सही परिणाम बतलाना संभव नहीं है जी | चलिए एक और उदाहरन देता हु जी विज्ञान में जैसे डॉक्टर हैं मान लो मुझे बुखार हो गया जी तो मैं डॉक्टर के पास गया तो वहा डॉक्टर ने बोला कि बुखार में नहाना सही नहीं है आप ना नहाए | दुसरे डॉक्टर के पास गया उसने बोला कि आप बुखार में नहाया करो | अब बताओ दोनों डॉक्टर विज्ञानं के आधार पर बोल रहा है किसकी बात को सही माना जाए जी | एक और उदाहरन आपको देता हु जी बोला जाता है कि जो रात को जल्दी सो जाते हैं और जल्दी सुबह उठते हैं उनकी याददास्त अछि रहती है | अभी कुछ दिन में एक आर्टिकल पढ़ा था जिसमे यह बोला गया था जो रात को देर से सोते हैं और देर से जागते हैं उनकी याददास्त रखने कि क्षमता अछि होती है |जब खुद वैज्ञानिक अपने अपने बात को सही बोल रहे हैं कुछ वैज्ञानिक के आधार पर वह सही है दूसरी के आधार पर गलत यह तो विरोधाभास रहेगा | ऊपर के लेख में वेद के आधार पर जो जानकारी दी गयी है और उपनिषद के आधार पर वह पूरी तरह सही है और उस आधार यह जो सृस्ती कि रचना कि गयी है उसकी जानकारी दी गयी है |
      धन्यवाद जी आपका

      1. आदरणीय, आपका प्रयास सराहनीय है, किंतु मेरा सवाल अभी भी वहीं पर है. वैज्ञानिकों के बीच मतभेद Big-bang सिद्धांत को लेकर है, ना की उर्जा के अविनाशिता के सिद्धांत को लेकर. जहाँ तक मेरा मानना है आप खुद ही इस बात को बिल्कुल नहीं झुठला सकते कि उर्जा अविनाशी होता है. और दूसरी तरफ आप Big-bang सिद्धांत को भी सही कह रहे है, जबकि दोनों में भारी विरोधाभास है. कृपया स्पष्ट करें.

  4. गोपाल जी मेरे हिसाब से big bang और उर्जा नाशवान नहीं है दोनों ही सही है जिसे मैं आपको अपने हिसाब से जानकारी देने कि कोशिश कर रहा हु जिससे आप सहमत हो सकते हो और नहीं भी मगर जो मैंने अनुभव किया है उस हिसाब से विचार आपके सामने प्रकट कर रहा हु | हो सकता है अपनी बात को प्रकट और समझाने के लिए मैं 3 कमेंट करू क्यूंकि १ ही कमेंट में करूँगा तो यह बहुत बड़ा हो जाएगा और एक आर्टिकल कि तरह हो जाएगा | चलिए आगे के कमेंट में आपको समझाने कि कोशिश करता हु जो मैंने अनुभव किया है उस आधार पर | यह मेरी खुद कि विचार हैं और खुद के अनुभव के आधार पर जानकारी देने कि कोशिश कर रहा हु |

  5. गोपाल जी चलिए आपको अपना अनुभव बतलाता हु | जहाँ तक यह बात आती है कि उर्जा नाशवान नहीं वह एक रूप से दुसरे रूप में परिवर्तित होती है यह सत्य है और उसका कुछ उदाहरन के साथ आपको जवाब देने कि कोशिश कर रहा हु | आपने देखा होगा जब हम लकड़ी (इंधन ) को जलाते हैं तब वह अग्नि में प्रकट होती है अग्नि से वह उष्मा ऊर्जा में प्रकट होता है और साथ में प्रकाश उर्जा में भी प्रकट होता है मतलब एक साथ कई उर्जा में रूपांतरित होना | चलिए हम आपको एक और उदाहरन देते है जैसे हम बैठते है उठते हैं सोते हैं सब में भी उर्जा लगती है और वह उर्जा दुसरे रूप में परिवर्तित भी होती है | अब मान लो कुछ लोग बहुत गुस्सा हो जाते हैं और उस गुस्सा में उनका शारीर से बहुत ज्यादा उष्मा निकलती है जिस कारण वह पसीने पसीने हो जाता है वह पसीना फिर वास्प बनकर वातारण से मिलकर दुसरे उर्जा में रूपांतरित हो जाती है | अब एक और उदाहरन देता हु जी जब आप खाना बना रहे होते हो तो कभी देखते हो कि प्रेशर कुकर से जब सिटी नहीं बजती और वह उर्जा बाहर आना चाहती है तो वह प्रेशर कुकर के ढक्कन को उड़ा कर बाहर आ जाती है इससे एक तो धवनी ऊर्जा भी उत्पन्न होती है और कुछ दुसरे उर्जा भी उत्पन्न होती है | मतलब एक उर्जा से दुसरे उर्जा के रूप में रूपांतरित होना | इन सब उदाहरण को आप याद रखे | इन उदाहरन को देने का कारण आपको बाद में मिलेगी | चलिए आपको अब दुसरे कमेंट में ऊपर के कुछ आर्टिकल का कुछ प्रमाण आपको रखता हु जिसे आप पढ़े फिर उसपर आपको दुसरे कमेंट में अपना अनुभव से जवाब देने कि कोशिश करूँगा |

  6. फिर सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई, इस पर तैत्तिरीय उपनिषद् का कहना है-

    ‘सो कामयत। बहुस्यां प्रजायेयेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा इदं सर्वमसृजत। यदिद किञ्च। तत सृष्टावा तदेवानु प्राविशत्। तदनुप्रविश्य। सच्चत्यच्यामवत्। निरुक्तं चानिरुक्तं च। निलयन चानिलयन च। विज्ञानं चापिज्ञानं च। सत्यं चानृतं च। सत्यमभवत। यदिद किञ्च। तत्सत्यमित्या चक्षते।

    -तै.उप. ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवाक 6

    अर्थ- उसने कामना की कि मैं एक से अनेक हो जाऊँ, तब उसने तप किया। क्रिया का प्रारमभ हो गया। जब यह क्रिया बढ़ते-बढ़ते उग्र रूप में पहुँची, तब उसे तप कहा गया। तप के प्रभाव से यह सब विश्व सृजा गया। सबकी सृष्टि करके वह ब्रह्म सृष्टि में अनुप्रविष्ट हो गया। आगे विपरीत कणों का वर्णन भी किया गया है-

    सत्व रजस्तमसा सामयावस्था प्रकृतिः प्रकृतेर्महान् महतोऽहंकारोऽहंकारात् पञ्चतन्मात्राण्युभयमिन्द्रियं पञ्चतन्मात्रेयः स्थूल भूतानि पुरुष इति पञ्च विंशतिर्गण।।

    अर्थ- सत्व, रज और तम रूप शक्तियाँ हैं। इन शक्ति रूपों की समावस्था, निश्चेष्ठावस्था प्रकट रूपावस्था को प्रकृति कहते हैं। प्रकृति से अहंकार, अहंकार से पाँच तन्मात्राएँ तथा पञ्चतन्मात्राओं से पाँच स्थूलभूत, स्थूलभूतों से पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा मन उत्पन्न होता है। पुरुष (चेतन सत्ता) इनसे भिन्न हैं। इन 25 पदार्थों को जानना, समझना विवेक में आवश्यक है।

    ऋग्वेद में सृष्टि उत्पत्ति परमेश्वर ने इस प्रकार की है-

    ब्रह्मणस्पतिरेता सं कर्मारइवाधमत्।

    देवानां पूर्व्ये युगेऽसतः सद जायत।।

    – ऋ. 10.72.2

    प्रकृति और ब्रह्माण्ड के स्वामी परमेश्वर ने दिव्य पदार्थों के परमाणुओं को लोहार के समान धोंका, अर्थात ताप से तप्त किया है। वास्तव में इसी को वैज्ञानिकों ने भयंकर विस्फोट Big Bang कहा है। इन दिव्य पदार्थों के पूर्व युग, अर्थात् सृष्टि के प्रारमभ में अव्यक्त (असत्) प्रकृति से (सत्) व्यक्त जगत् उत्पन्न किया गया है।

  7. गोपाल जी अब आप ऊपर के दिए हुए इस बात को ध्यान दे
    अर्थ- उसने कामना की कि मैं एक से अनेक हो जाऊँ, तब उसने तप किया। क्रिया का प्रारमभ हो गया। जब यह क्रिया बढ़ते-बढ़ते उग्र रूप में पहुँची, तब उसे तप कहा गया। तप के प्रभाव से यह सब विश्व सृजा गया। सबकी सृष्टि करके वह ब्रह्म सृष्टि में अनुप्रविष्ट हो गया।
    अब मेरे द्वारा मनुष्य के द्वारा कि गयी गुस्सा और उससे पसीना होना उग्र होने के कारण फिर पसीना से वास्प बनना और इस तरह कई प्रकार में उर्जा का रूपांतरण मनुष्य के द्वारा किये गए उग्र रूप से हुवा | अब आप दूसरा उदाहरन को लें प्रेशर कुकर का जिसमे अपनी बहुत ज्यादा उष्मा होने के कारण वह वह बाहर आने के लिए विस्फोट करता है | अब आप मेरे उदाहरन से समझ सकते हैं कि यह big bang वाली बात भी सही होगी | और दूसरी जो उर्जा का जो नाश नहीं होता वह एक रूप से दुसरे रूप में परिवर्तित होती है वह भी सही होगी |
    हो सकता है आप मेरे विचार से सहमत हो और आप सहमत ना भी हो | आपका बहुत बहुत धन्यवाद

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