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कब और किसने इस मनुस्मृति को पुस्तकाकार में बनाया ? पण्डित भीमसेन शर्मा

मनु कौन है इसका प्रतिपादन करके अब द्वितीय प्रकरण का विचार किया जाता है कि किस समय, किसलिये, किस पुरुष ने यह धर्मशास्त्र बनाया ? लोक में मनुस्मृति वा मानव धर्मशास्त्र नाम से यह पुस्तक प्रचरित है। इसका अभिप्राय यह है कि मनु अर्थात् ब्रह्मा ने सृष्टि के आरम्भ में सब वेदों का अनुसन्धान- पूर्वापर विचार करके संसार के व्यवहार की व्यवस्था करने और अच्छे आचरणों का प्रचार करने के लिये सूत्रादि रूप वाक्यों में धर्म का उपदेश किया, किन्तु उस समय कुछ भी विषय पुस्तकाकार से लिखा नहीं गया था। उस उपदेश को शास्त्र करके मानना वा कहना विरुद्ध इसलिये नहीं है कि शास्त्रशब्द का व्यवहार लेखनक्रिया की अपेक्षा नहीं रखता। महर्षि वात्स्यायन जी ने न्याय सूत्र के भाष्य में शास्त्र का लक्षण भी यही किया है कि ‘परस्पर सम्बन्ध रखने वाले अर्थसमूह का उपदेश शास्त्र है।’१ इससे लिखे वा छपे पुस्तक का नाम शास्त्र नहीं आता। मनु नाम ब्रह्मा जी ने वेद के अर्थ का अनुसन्धान करके वेद को मूल मानकर व्यवहार की व्यवस्था करने के लिये जो विचार किया वह मनुस्मृति कहाती है। और मनु नाम ब्रह्मा जी ने सृष्टि के आरम्भ में कहा मानव धर्म उसका उपदेश जिसमें है, वह पद और वाक्यादि रूप मानवधर्म शास्त्र कहाता है। अथवा मनु जी के अनुभव से सिद्ध हुआ मानवधर्म, वह जिसमें कहा गया, वह मानवधर्मशास्त्र कहाता है। प्रोक्तार्थ में प्रत्यय करने से प्रतीत होता है कि मानवधर्म का मूल वेद है। क्योंकि किसी सनातन धर्मशास्त्र का आश्रय लेकर शास्त्र बनाया जाय, उसी में प्रोक्त प्रत्यय होता है। इसी कारण प्रोक्ताधिकार२ के पीछे ‘कृते ग्रन्थे3 प्रकरण पाणिनि ने रखा है। और प्र उपसर्ग पूर्वक वचधातु४ से सिद्ध हुए प्रयोगों की पढ़ाने, प्रचार करने, विशेष लुप्त हुए शास्त्रों को निकाल कर चलाने और प्रकारान्तर से व्याख्यान कर सबको जताने, अर्थ में यथासम्भव प्रवृत्ति होती है। यह महाभाष्यकार पतञ्जलि महर्षि का आशय५ प्रोक्ताधिकार के व्याख्यान से प्रतीत होता है। ऐसा मानने से ही वेदों की संहिता के माध्यन्दिनीय और वाजसनेयी आदि नाम निर्दोष बन सकते हैं। अर्थात् माध्यन्दिन, वाजसनेय आदि ऋषियों के नाम से वेद की संहिताएं प्रसिद्ध हैं। इसका अभिप्राय यही है कि जिन-जिन ऋषि जनों ने उन-उन संहिताओं का विशेषकर अध्यापन वा उपदेश आदि द्वारा प्रचार कराया उन-उन के नाम से वे-वे पुस्तक प्रचरित हो गये। किन्तु उन पुस्तकों को ऋषियों ने बनाया नहीं। यदि प्रोक्त अधिकार को नवीन कृत्य माना जावे तो ‘कृते ग्रन्थे’ प्रकरण पुनरुक्त होने से व्यर्थ हो जावे, इस कारण प्रोक्त का वही अर्थ ठीक है कि जो ऊपर लिखा गया है।

पहले सृष्टि के आरम्भ में गुरु-शिष्य की निरन्तर चलने वाली परम्परा के साथ वाक्य, पद और मन्त्ररूप से ही वेदों के उपदेश का प्रचार चलता था। एक ने अपने गुरु से यथावत् सुनकर अन्य अपने शिष्यों को किया। इस प्रकार वेद और धर्मशास्त्र सम्बन्धी सूत्रादि रूप वाक्य सब पढ़ने-पढ़ाने वालों को कण्ठस्थ रहते थे। और शास्त्र के कण्ठस्थ होने से पढ़ने-पढ़ाने वालों को विद्या का जैसा ह्ल ल होना सम्भव है वैसा पुस्तकस्थ पाठ से नहीं हो सकता। इस पर किसी विचारशील पुरुष ने कहा है कि- ‘पुस्तक में पड़ी विद्या और पराये हाथ में गया धन, ये दोनों ही समय पर उपयोगी नहीं होते।’1 इससे विचारशीलों को जान लेना चाहिये कि कण्ठस्थ करना सर्वोत्तम है। ऐसा विचार के ही उस समय के लोगों ने लिखने की प्रवृत्ति नहीं चलाई थी। क्योंकि यदि पुस्तकें लिखी जावें तो विद्यार्थी ‘पुस्तकस्थ अपने पाठ को यथावकाश हम देख सकते हैं’, ऐसा मानकर शास्त्र को कण्ठस्थ न करेंगे, ऐसा विचार के लेखन प्रक्रिया का चलाना हानिकारक समझते थे। और यह कदापि कहना ठीक नहीं बनता कि उस समय के लोगों को लिखने का सामान नहीं मिला अथवा उनको लेखन क्रिया ज्ञात नहीं थी। क्योंकि वेद द्वारा परमेश्वर ने सब क्रियाओं का उपदेश पहले ही किया है।२ जैसी लिखने की परिपाटी इस समय है वैसी पहले न हो, यह हो सकता है, तो भी अभाव नहीं कह सकते। क्योंकि अभाव से भाव नहीं होता। किन्तु संसार के कार्यों का प्रकार बदलता रहता है। इसी के अनुसार पूर्वकाल में अन्य प्रकार का लिखना था। अर्थात् पुस्तकें नहीं लिखी जाती थीं, तो भी भित्ति आदि पर प्रतिबिम्ब रखना, वस्त्रों पर अनेक चित्र काढ़ना या छापना वा किसी में मोहर लगाना वा किसी को अटित करना इत्यादि सब काम लिखने के अन्तर्गत ही समझे जाते हैं। और जब पूर्वकाल सृष्टि के आरम्भ में ही अकारादि वर्णों की आकृति विद्वान् लोगों ने बनाई, तो ह्लि र लेखन- क्रिया नहीं थी, यह कहना ठीक नहीं, किन्तु अपने ही कथन को काटना है। अब यह प्रकरणान्तर है इसलिये इस पर विशेष न लिखकर मुख्य प्रकरण की बात करनी चाहिये। अर्थात् पहले सृष्टि के आरम्भ में शास्त्रों को पुस्तकाकार में लिखने की प्रवृत्ति नहीं थी, यह बहुत कारणों से प्रतीत होता है।

सृष्टि के आरम्भ में शास्त्र भी बहुत नहीं थे, किन्तु वेद से भिन्न कोई ही शास्त्र बना था, उन थोड़ों का कण्ठस्थ करना भी सहज ही था। और जो वेद से भिन्न धर्मसूत्रादि रूप से शास्त्र बने थे, वे छोटे-छोटे थे, इस कारण उनका कण्ठस्थ करना सुलभ था। पीछे जब धीरे-धीरे समय के अनुसार व्यवहार चलाने और वेद के आशय का विशेष प्रचार कराने के लिए आवश्यकता के अनुसार विद्वान् लोगों ने अन्य शास्त्र बनाये तब अनेक शास्त्रों के बढ़ जाने से कण्ठस्थ करना दुस्तर था, इस कारण क्रमशः विद्याधर्मादि का न्यून सेवन हो सकने की शटा से आगे होने वाले शक्तिहीन पुरुषों के उपकार के लिए बने हुए शास्त्र पुस्तकाकार किये गये।१ पहले समय में सत्त्व गुण के प्रचार की अधिकता से रजोगुणी पुरुष बहुत नहीं थे।२ और सत्त्वगुणी पुरुषों का यह स्वाभाविक धर्म है कि वे अपना नाम प्रसिद्ध करने के लिए विशेष प्रयत्न न करके अन्य प्रथमोपदेष्टा पुरुषों के नाम से ही अपने निमित्तमात्र कामों को भी प्रचरित करते थे। वैसे ही यह मनुस्मृति सृष्टि के आरम्भ में सूत्रादिस्थ वाक्यरूपों से मनु जी ने उपदेश की, उसके पीछे भृग जी ने अपने शिष्यों को उपदिष्ट की और भृगु जी ने ही पद्यरूप से क्रमबद्ध आकार में बनायी।

कोई लोग कहते हैं कि भृगु के किसी शिष्य ने यह पुस्तक बनाया और ऐसा मानने पर ही ‘स्वयम्भुवे0’ [अमित तेज वाले स्यम्भू ब्रह्मा जी को नमस्कार करके, मनु के द्वारा प्रणीत विविध शाश्वत धर्मों को कहूँगा।] यह प्रारम्भ में धरा गया किन्हीं-किन्हीं पुस्तकों में प्राप्त होने वाला श्लोक सार्थक हो सकता है। सो यदि इस पक्ष को सत्य माना जावे कि भृगु के किसी शिष्य का बनाया यह मनुस्मृति पुस्तक है, तो जिनका मत है कि भृगुप्रोक्त यह संहिता है, वह विरुद्ध पड़ेगा। और यह श्लोक भी सब पुस्तकों में नहीं मिलता। इससे इसका एकदेशी होना सिद्ध ही है। तथा व्यूलर ने भी यही कहा है कि कहीं-कहीं मिलने वाला यह श्लोक पीछे किन्हीं लोगों ने मिलाया है। यदि यह श्लोक पहले से होता तो सब पुस्तकों में मिलना चाहिए था। इससे अधिकांश सम्मति के अनुसार मेरी भी सम्मति यही है कि यह पुस्तक भृगु का बनाया है और ‘स्वयम्भुवे0’ यह श्लोक किन्हीं का पीछे से मिलाया हुआ है। भृगु के द्वारा बनाया होने पर भी सृष्टि के आरम्भ में मनु ही इस धर्म के आशय के प्रवर्त्तक हैं, कि जिसको मैंने श्लोकबद्ध किया। मेरा कुछ इनमें नवीन कृत्य नहीं, ऐसा मन में विचार के उन्होंने मनु के नाम से ही प्रचरित की, और यह बात सत्य भी है। क्योंकि ऐसा होने पर ही वेदों को ईश्वर का वाक्य कह सकते हैं अर्थात् ईश्वर का ज्ञान मात्र वेद हैं, उसने पुस्तकाकार वेद नहीं बनाये। किन्तु महर्षि लोगों ने पुस्तकाकार किये हैं। तो भी परमात्मा से वेद उत्पन्न हुए, ऐसा कहा वा माना जाता है। किन्तु किसी महर्षि ने वेद बनाये, ऐसा प्रसिद्ध नहीं। इसी प्रकार मनु नामक ब्रह्मा ने इसका स्मरण किया और भृगु ने विशेषदशा में पद्यरूपाकार से बनाया। तो भी जैसा मनु ने स्मरण किया था, वही आशय पुस्तकाकार में लाया गया, इसलिये इस पुस्तक को मनुस्मृति कहना वा मानना ठीक ही है, किन्तु निरर्थक नहीं। तथा अन्य स्मृतियों का पीछे बनना, आधुनिक होना, उन-उन के आशयों और उनमें इसी का अनुवाद दीख पड़ने से प्रतीत होता है। और यह मनुस्मृति पुरानी है, तो भी जहां-तहां बीच-बीच में इतिहासादि सम्बन्धी अनेक श्लोक किन्हीं मतवादियों ने मिला दिये हैं, इससे अत्यन्त नवीन प्रतीत होती है। ऐसी ही बातों को देखकर व्यूलर साहब को भी भ्रान्ति हो गई, जिससे उन्होंने इसको अतिनवीन ठहराया है। उनको भ्रान्ति होने में अनुमान से यह भी कारण जान पड़ता है कि जैसे ईसाई मत अतिनवीन है, इससे थोड़ा इधर-उधर तक का समाचार उन्होंने लगा पाया है। जैसे दो-तीन सहस्र वर्ष से पूर्व हमारे मत या कुटुम्ब के नाम तक का पता नहीं, वैसे ही अन्य भी कोई मत पहले नहीं था। इन लोगों के मत वा सिद्धान्त से चार, पांच वा छह सहस्र वर्षों के पूर्व सृष्टि भी नहीं थी और न कोई शास्त्र था। परन्तु यह उन लोगों का विचार ठीक नहीं, क्योंकि इस आर्यावर्त्त देश में सूर्यसिद्धान्त नामक एक पुस्तक है जो वर्तमान इस चतुर्युगी के त्रेतायुग में बनाया गया। उसमें स्पष्ट लिखा है कि इस अट्ठाईसवीं चतुर्युगी में से अब तक केवल सद्युग बीत गया। उस पुस्तक को बने कई लाख वर्ष बीत गये। इसी प्रकार उससे भी अत्यन्त प्राचीन पुस्तकें इस देश में हैं। तथा काल का परिमाण, काल के अवयवों का वर्णन और कल्प तथा प्रलयादि का वर्णन सूर्यसिद्धान्तादि आर्यों के पुस्तकों में मिलता है। उससे सिद्ध है कि इस सृष्टि को उत्पन्न हुए अरब से ऊपर-ऊपर वर्ष बीत चुके हैं। तब से लेकर क्या मनुष्य विद्या, धर्म आदि से रहित ही थे, और ऐसा कथन कोई बुद्धिमान् मान सकता है ? कदापि नहीं। यदि कोई सनातन ईश्वर माना जावे, तो उसने सृष्टि के आरम्भ में ही मनुष्यों को कुछ ज्ञान दिया, ऐसा मानना चाहिये। अन्यथा परमेश्वर में दोष आवेगा। और परमेश्वर के किसी काम में भूल है नहीं। इससे सिद्ध हुआ कि मनुस्मृति भी सृष्टि के आरम्भ से ही रूपान्तर में थी, वह कुछ काल पीछे भृगु ने पद्यरूप में बनायी। तब मनु जी के अभिप्रायानुकूल होने से मनुस्मृति नाम रखा गया। इस आर्यावर्त्त देश में पहले श्लोक बनाने की परिपाटी वा ज्ञान नहीं था यह भी किसी का मानना वा कहना सम्भव नहीं। क्योंकि वेद में सब प्रकार की छन्दरचना प्रत्यक्ष दीखती है। जब वेद में परमेश्वर ने श्लोक बनाने की प्रक्रिया पहले ही दिखा दी है, तो उन्हीं वेदों के पढ़ने-पढ़ाने-जानने और प्रचार करने वाले ब्रह्मादि लोग श्लोक-रचना की रीति न जानते हों, यह कदापि सम्भव नहीं। परन्तु यह सत्य है कि प्रायः उस समय के लोग आजकल के तुल्य श्लोक-रचना नहीं करते थे। उसका अभिप्राय यह था कि बहुत अर्थ जिसमें से निकले ऐसा छोटा शास्त्र बने, ऐसी लाघवबुद्वि से थोड़े अक्षरों तथा गम्भीर वा बहुत अर्थ वाले सूत्ररूप ग्रन्थों को प्रायः रचते थे। जिससे विद्यार्थी लोग ब्रह्मचर्य आश्रम के समय में ही सब शास्त्रों को पढ़ सकें। पर तो भी सर्वथा पद्यरचना का अभाव नहीं था, अर्थात् कोई-कोई श्लोकबद्ध भी शास्त्र बनाते थे। जैसे भृगु जी ने यह स्मृति बनायी वा जैसे त्रेतायुग में सूर्यसिद्धान्त पद्यरूप से बनाया गया। अब यह सिद्ध हो गया कि सृष्टि के आरम्भ में वेद के आश्रय से सांसारिक व्यवहार को ठीक व्यवस्था चलाने के लिये सूत्रादि वाक्यरूपों से मनु जी ने इस स्मृति का उपदेश किया, उसके पीछे भृगु ने श्लोकरूप से बनाया। जैसे इस समय बनने वाले पुस्तकों में संवत्सर का नाम रखा जाता है कि अमुक संवत् में अमुक पुरुष ने यह पुस्तक बनाया, वैसी परिपाटी पहले नहीं थी और कदापि हो तो भी किन्हीं लोगों ने पीछे नष्ट कर दी। इसी से किस संवत् में यह पुस्तक बना, यह कहना नहीं बन सकता। तो भी अनुमान से हम जान सकते हैं कि इस कल्प में संसार की उत्पत्ति होने के पश्चात् परमेश्वर से वेद का उपदेश पाकर अन्य शास्त्र बनने से पूर्व ही मनु जी ने पहले इस धर्मशास्त्र का उपदेश किया। उस समय यह धर्मशास्त्र पुस्तकाकार से नहीं लिखा था। पीछे अनुमान से दो सौ वर्ष के भीतर भृगु जी ने श्लोक रूप से बनाया। उसके पीछे कुछ काल बीतने पर किन्हीं अन्य ऋषि लोगों ने पुस्तकाकार किया। उससे पूर्व श्लोकरूप का ही निरन्तर चलने वाली गुरु-शिष्य की पठन-पाठन प्रणाली से प्रचार था। और प्रचार के अनुसार ही पहले लिखी गयी। पीछे कहीं-कहीं बीच में किन्हीं लोगों ने कुछ-कुछ मिला दिया यही इस प्रसग् में मुख्य और दृढ़ सिद्धान्त है।

और यदि किसी प्रकार व्यूलर साहब आदि के कहने के अनुसार किसी ने दो सहस्र वर्ष के भीतर ही इस धर्मशास्त्र को बनाया, ऐसा सिद्धान्त ठीक हो तो भी हमारा मत यह है कि यदि इस पुस्तक में अन्य स्मृतियों की अपेक्षा गम्भीराशय के साथ पक्षपात को छोड़ के वेदानुकूल वर्णाश्रमादि धर्म का वर्णन किया गया है और अन्य-अन्य प्राप्त होने वाली स्मृतियों में वैसा धर्म का उपदेश नहीं प्राप्त होता है तो वेद के अनुकूल होना ही इस मानवधर्मशास्त्र की उत्तमता में हेतु होगा। यह सब सज्जनों का मत है कि जो वेदानुकूल है, वही श्रेष्ठ है। और यदि किसी प्रकार इसका नवीन बनना सिद्ध हो जावे, तो भी मनुस्मृति नाम रखना विरुद्ध नहीं है। क्योंकि कारण के बिना जब कोई कार्य नहीं होता तो मनु जी ने उपदेश किया सूत्रादि वाक्याकार पुरातन धर्म गुरु-शिष्य की परम्परा से प्रचरित चला आता था, उसी के आश्रय से किसी विद्वान् ने श्लोकरूप से बनाया उसमें भी आदि कर्त्ता मनु की प्रधानता से मनुस्मृति कहना सम्भव है। और इसको आधुनिक मानना हमारा पक्ष नहीं है किन्तु अन्य लोगों के समयानुसार किसी प्रकार कोई इसको आधुनिक मान लें तो भी समूलक वा वेदमूलक होने से प्रशंसा के योग्य अवश्य माननी चाहिये, यह अभिप्राय है। और मैंने तो अपनी सम्मति पूर्व ही लिख दी है।

वे मनु कौन थे जिन्होंने इस धर्मशास्त्र का उपदेश किया ? पण्डित भीमसेन शर्मा

वे मनु कौन थे, जिन्होंने सबसे पहले धर्मशास्त्र का उपदेश मनुष्यों को दिया ? इस विषय में- मनु नामक कोई निज (खास) मनुष्य थे जो वेद की अनेक शाखाओं के पढ़ने, जानने और उनमें लिखे अनुसार आचरण करने में तत्पर और स्मृतियों की परम्परा से प्रसिद्ध हैं, यह मेधातिथि का लेख है। कुल्लूक भट्ट कहते हैं कि सम्पूर्ण वेदों के अर्थ आदि का मनन, विचार करने से उनका नाम मनु हुआ। नन्दन कहते हैं कि स्वायम्भुव का नाम मनु है। और गोविन्दराज ने लिखा है कि सम्पूर्ण वेद के अर्थ आदि को जानने से मनु संज्ञा को प्राप्त हुए, शास्त्रों की परम्परा से सब विद्वान् जिनके नाम को बराबर सुनते, जानते आये और परमेश्वर ने संसार की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करने के लिए जिनको नियत किया, ऐसे महर्षि का नाम मनु था। और व्यूलर साहब (इंग्लेण्ड देश निवासी जिन्होंने अंग्रेजी में मनुस्मृति पर भाष्य किया है) लिखते हैं कि कहीं तो ब्रह्मा का पौत्र मनु लिखा, कहीं मनु को प्रजापति माना गया, तथा कहीं (७.४२) मनु नाम राजा था ऐसा लिखा है, और कहीं (१२.१२३) मनु को साक्षात् ब्रह्म करके लिखा है, इसी मनुस्मृति में, ऐसे परस्पर विरुद्ध अनेक प्रकार के लेख हैं, जिससे यह निश्चय हो सकना कठिन है कि इस धर्मशास्त्र का बनाने वाला मनु कौन था। परन्तु व्यूलर साहब ने आगे यह भी लिखा है कि इस देश में सर्वोपरि धर्म का जानने वाला कोई मनु पहले हुआ जिसके नाम से ही धर्म की प्रशंसा चली आती है।

इस प्रसग् में इत्यादि प्रकार के लेख अलग-अलग लोगों के मिलते हैं, जिनमें सबकी एक सम्मति नहीं जान पड़ती। इस विषय में मैं अपनी सम्मति से निश्चय सिद्धान्त लिखता हूं, उसको सुनना चाहिये। सृष्टि के प्रारम्भ में पहले कल्प के अच्छे संस्कारों से जिनका आत्मा शुद्ध था, पहले जन्मों में अभ्यास की हुई विद्या से वेदार्थ के जानने में जिनकी बुद्धि तीव्र थी, पहले कल्प में सेवन किये पुण्य के समुदाय से जिनका अन्तःकरण शुद्ध था, इसी कारण तेजधारी चारों वेदों के ज्ञाता, सब संसार और परमार्थ के कर्त्तव्य को ठीक-ठीक जानने वाले मनुष्यों में सूर्य के तुल्य तेजस्वी तपस्या और योगाभ्यास करने में तत्पर विचारशील मनु नामक महर्षि हुए, उन्हीं का दूसरा नाम ब्रह्मा भी था, यह बात अनेक प्रमाणों वा कारणों से निश्चित सिद्ध है। इसी कारण उन मनु का स्वायम्भुव नाम भी विशेष कर घटता है, क्योंकि स्वयम्भू नाम परमेश्वर का इसलिए माना जाता है कि वह सृष्टि रचने के अर्थ स्वयमेव प्रकट होता है, अर्थात् सृष्टि के लिए उसको कोई प्रेरणा वा उद्यत नहीं करता। प्रलयदशा में रचना के सम्बन्धी कार्यों के न रहने से रचने से पहले रचना के आरम्भ का उद्योग करना ही उसका प्रकट होना कहाता है। इसी से उसको स्वयम्भू कहते हैं। चारों वेदों के जानने वाले देहधारी मनुष्य का तो स्वयम्भू नाम नहीं हो सकता, क्योंकि उस ब्रह्मा की उत्पत्ति परमेश्वर से अनेक ग्रन्थों में दिखाई गई है। यदि उन ब्रह्मा की स्वयमेव उत्पत्ति होती, तो परमात्मा के बिना अन्य मनुष्यादि की भी उत्पत्ति हो सकना सम्भव है (इस प्रसग् में अनेक लोगों का ऐसा मत है कि परमात्मा ने स्वयमेव ब्रह्मरूप बनकर संसार को उत्पन्न किया। इस अंश पर यहां विशेष विचार इसलिए नहीं लिखता कि यह प्रकरणान्तर है, और प्रकरणान्तर पर विचार चल जाने से मुख्य प्रकरण छूट जाता है, परन्तु इतना अवश्य कहता हूं कि परमेश्वर परस्पर विरुद्ध दो धर्मों को धारण कभी नहीं करता, वह सदा निराकार है, साकार कभी नहीं होता। वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वभाव है, कभी शरीरादि में बद्ध नहीं होता, इसीलिये वेद में उसको अकाय१ लिखा है। तथा योगभाष्य में व्यास जी ने लिखा है कि- ‘वह सदैव मुक्त और सदा अनन्तशक्ति रहता है’२, शरीर धारण करे तो मनुष्यों के तुल्य शरीर में बद्ध और अल्पशक्ति अवश्य हो जावे, क्योंकि शरीर के परिच्छिन्न वा अन्तवाला होने से शरीर कदापि अमर्यादशक्ति वाला नहीं हो सकता। इत्यादि कारणों से स्वयम्भू का वैसा अर्थ करना ठीक नहीं हो सकता। किन्तु वही अर्थ ठीक है जो पूर्व लिखा गया) और परमेश्वर के बिना यदि अन्य मनुष्यादि की उत्पत्ति हो जावे, तो निरीश्वरवाद भी आ सकता है, क्योंकि फिर किसी ईश्वर की आवश्यकता नहीं रहेगी। और ब्रह्मा को मनु मानने से ही प्रथमाध्याय के इक्यावनवें (५१) श्लोक पर पं॰ नन्दन का किया व्याख्यान अच्छा प्रतीत होता है। क्योंकि वहां अचिन्त्यपराक्रम शब्द से नन्दन ने परमेश्वर का ग्रहण किया है तथा अन्य भाष्यकारों की सम्मति से ब्रह्म का ग्रहण होना प्रतीत होता है। परन्तु परमेश्वर का ग्रहण होना ही अति उचित है, इसी से मनु नाम ब्रह्मा का रचने वाला परमेश्वर हो सकता है। और यदि किन्हीं लोगों के मतानुसार चार वेदों के जानने वाले देहधारी ब्रह्मा का पौत्र मनु माना जावे तो परमेश्वर ने मनु को उत्पन्न किया, यह कहना व्यर्थ हो जायगा। क्योंकि मनु ब्रह्मा के पौत्र हुए तो उनके उत्पादक पिता विराट् हुए। यदि कहा जावे कि परमेश्वर ही सबको जन्म-मरण देता है, इस कारण ब्रह्मा का पौत्र होने पर भी परमेश्वर ने उत्पन्न किया, कह सकते हैं और पिता निमित्तमात्र है तो ठीक है, परन्तु मनु को ही परमेश्वर ने उत्पन्न किया, यह कैसे ? क्या अन्यों को नहीं किया और उस श्लोक का यह तात्पर्य नहीं हो सकता, क्योंकि वहां मैथुनी सृष्टि का प्रसग् नहीं है, किन्तु ईश्वर ने जैसे सबको रचा वैसे ही मुझको भी बनाया, यह कथन है। इसलिए ब्रह्मा का ही नाम मनु रखना उचित है, क्योंकि उस पक्ष में यह कोई विवाद नहीं उठता। और अचिन्त्यपराक्रम शब्द से जो भाष्यकार लोग ब्रह्मा का ग्रहण करना चाहते हैं, उनके मत में देहधारी ब्रह्मा से परमात्मा में कुछ विशेषता सिद्ध नहीं हो सकती, क्योंकि जब ब्रह्मा ही अनन्तशक्तिधारी हो गये तो उनके उत्पादक पिता में क्या अधिकता रही, और शरीरधारी का अनन्तशक्ति होना ठीक भी नहीं अर्थात् असम्भव है। तथा भाष्यकारों के सम्पूर्ण वेद को जाने से वा मनन करने से मनु नाम हुआ इत्यादि वचन ब्रह्मा को ही मनु मानने पर सार्थक हो सकते हैं। क्योंकि सृष्टि के आरम्भ में ही एक साथ सम्पूर्ण वेदार्थ को जानने, समझने वाले दो पुरुष नहीं हो सकते।

तथा प्रजापति शब्द भी ब्रह्मा का विशेषण प्रायः दीख पड़ता है, सो ब्रह्मा को मनु मानने पर मनु का विशेषण प्रजापति सहज में हो सकेगा। अन्यथा सन्देह पड़ना सम्भव है कि दोनों का नाम प्रजापति क्यों रखा गया ? ब्रह्मा को प्रजापति इसलिए कहा गया कि वे विद्या और धर्म की व्यवस्था चलाकर प्रजा की रक्षा करते थे। वेद के अर्थ की वृद्धि अर्थात् प्रचार बढ़ाने से ब्रह्मा और वेद के आशयों का अन्तःकरण में मनन करने से एक ही पुरुष का मनु नाम जगत् में विख्याति को प्राप्त हुआ। एक वस्तु के अनेक नाम होना लोक में भी प्रसिद्ध ही है। अर्थात् यह शटा नहीं हो सकती कि एक के दो नाम क्यों रखे गये ? एक वस्तु के अनेक नाम अनेक गुणों के होने से रखे जाते तथा उन एक-एक नामों से उस-उस प्रकार के गुण लोकव्यवहार में जताये जाते हैं। इसी धर्मशास्त्र में जो वचन इस सिद्धान्त से विरुद्ध जान पड़ेंगे उनका समाधान यथावसर किया जायगा।

एक शब्द एक ही वस्तु का वाचक हो यह भी नियम नहीं दीखता। जैसे देवदत्त संज्ञा बहुत मनुष्यों की एक समय वा समयान्तर में हुई, होती और होगी। इसी प्रकार मनु यह नाम अन्य वाच्य पुरुषों का भी हुआ है और होगा। वाच्य वस्तुओं के उत्पत्ति-विनाश धर्मयुक्त होने से नाम भी पहिये के तुल्य लौट-पौट होते रहते हैं। मनु नामक कोई राजा भी हुआ। जिसका नाम इसी पुस्तक के सप्तमाध्याय१ में आया है। यदि वेद में मनु नाम राजा का आवे तो वहां मनु नामक परमेश्वर ही राजा माना जाएगा। क्योंकि इसी पुस्तक के अध्याय बारह में मनु नाम परमेश्वर का आया है कि उसी एक सर्वनियन्ता के मनु, अग्नि और प्रजापति आदि नाम हैं।२ सब चराचर जगत् को तात्त्विक रूप से जानता है इसलिए उसका नाम मनु है। ऐसा मानकर ही मनु शब्द से मनुष्य और मानुष शब्द बने हैं “मनोर्जातावञ्यतौ षुक् च”3 इस पाणिनिकृत सूत्र में अपत्य अर्थ अपेक्षित नहीं है, किन्तु जाति होने से सिद्ध शब्द रुढ़ि माने जावेंगे। उनमें स्वरादि का ज्ञान कराने के लिए जिस किसी प्रकार सिद्धि दिखाई है। उस सिद्धि करने का अभिप्राय यह है कि मनु नामक परमेश्वर ने विचार करने की सामग्री से धर्म-अधर्म का विवेक करने के लिए रचा समुदाय मनुष्य वा मानुष जाति कहाती है।४ अपत्य अर्थ की यहां अपेक्षा नहीं, यह काशिकाकार जयादित्य5 आदि का भी सम्मत है। यदि आदि पुरुष देहधारी मनु से मनुष्य अर्थ में प्रत्यय है, ऐसा किसी का मत हो तो अपत्य अर्थ में प्रत्यय की उत्पत्ति अवश्य माननी चाहिए। सो यह सृष्टि के आरम्भ में परमेश्वर की ओर से यदि एक ही कोई पुरुष उत्पन्न किया गया माना जावे तो उसी के सन्तान सब आगे होने वाले प्राणी हों। इस प्रकार मानने से मनुष्य और मानुष शब्द जातिवाचक मनु के सन्तान सार्थक हो सकते हैं। परन्तु यह वेद से विरुद्ध है। अथर्ववेद6 में लिखा है कि पितृ, देव, मनुष्य, पशु आदि अनेक-अनेक प्राणी परमेश्वर से प्रथम उत्पन्न हुए। इसी प्रकार अन्य वेदों7 में भी सैकड़ों प्रमाण मिलते हैं, कि जिनमें परमेश्वर से बहुत मनुष्यादि की उत्पत्ति स्पष्ट दिखायी गयी है। और उपनिषदों8 में भी स्पष्ट लिखा है कि उस परमेश्वर से अनेक प्रकार के सूर्य, चन्द्रमादि देव अनेक मनुष्य, पशु और पक्षी आदि उत्पन्न हुए। इससे यह सिद्ध और सत्य है कि सृष्टि के आरम्भ में बहुत से मनुष्यादिकों की एक साथ उत्पत्ति हुई। और विचारपूर्वक ध्यान देने से भी यही प्रतीत होता है कि परमेश्वर ने प्रत्येक वस्तु आरम्भ में अनेक बनाये। यदि एक वस्तु वा मनुष्य को बनाता तो इतनी बड़ी पृथिवी पहले शून्य ही होती और एक मनुष्य से इतनी वृद्धि भी लाखों वर्षों में नहीं हो सकती। जैसे एक मनुष्य से कुछ सृष्टि बढ़ेगी वैसे जन्म के साथ मरण भी लगा है, ह्लि र ऐसी दशा में सप्तद्वीपा वसुमती१ पर एक मनुष्य के सन्तानों का इतना फैलाव होना दुस्तर है। इसलिए अनेक मनुष्यों की उत्पत्ति प्रारम्भ में मानना ठीक सिद्ध है। और जब यह सिद्ध हो चुका कि सृष्टि के आरम्भ में बहुत मनुष्य रचे गये तो मनु नामक पुरुष के सन्तानों की ही मनुष्य संज्ञा हो, अन्य के सन्तानों की न होनी चाहिये सो यह कदापि ठीक नहीं हो सकता कि किसी गोत्र के पुरुष ही मनुष्य कहावें और सबका नाम मनुष्य न पड़े। इसलिए सृष्टि के आरम्भ में एक साथ बहुत मनुष्यादिकों की उत्पत्ति हुई, यह वेदोक्त सिद्धान्त ही ठीक है और परमेश्वर के वाची मनु शब्द से ही मनुष्य, मानुष शब्दों का बनना ठीक है। और जहां पुरुष वाचक मनु शब्द से अपत्य अर्थ में प्रत्यय होता है तब “तस्यापत्यम्”2 इस पाणिनीय सूत्र से अण् प्रत्यय होकर मनु के सन्तानों का नाम मानना पड़ता है। ऐसा होने पर जो लोग मनुष्य का पर्यायवाची मानकर मानव शब्द का प्रयोग करते हैं, वहां अज्ञान ही कारण जान पड़ता है। क्योंकि मनुष्य शब्द के तुल्य मानव शब्द जातिवाचक नहीं है। किन्तु सृष्टि के आरम्भ में वा पीछे हुए मनु नामक पुरुष के कुल में उत्पन्न हुए पुत्र-पौत्रादि का नाम मानव हो सकता है। कोशकारों3 ने भी अपने-अपने पुस्तकों में मानव शब्द को मनुष्य पर्याय बुद्धि से रखा है, इसलिए वहां भी भ्रान्ति ही जाननी चाहिये। जाति अर्थ में अण् और यत् प्रत्यय के ही विधान करने से मानव शब्द में अजाति में अण् प्रत्यय का होना अर्थापत्ति से ही सिद्ध है। और जो मानव शब्द धर्म या धर्मशास्त्रादि का विशेषण है, वहां “तस्येदम्”4 सूत्र से सामान्य सम्बन्धार्थ में अण् प्रत्यय जानना चाहिए। मनु शब्द साधारण मनुष्य का भी नाम हो सकता है, यह लिख भी चुके हैं। अधिकांश में इसी पक्ष का आश्रय लेकर महाभाष्कार ने यह कारिका पढ़ी है कि-

अपत्ये कुत्सिते मूढे मनोरौत्सर्गिकः स्मृतः।

नकारस्य च मूर्द्धन्यस्तेन सिध्यति माणवः।।5

‘मनु शब्द से निन्दित अपत्य अर्थ में अण् प्रत्यय और नकार को मूर्द्धन्य णकारादेश हो जाता है। जिससे माणव शब्द बनता है।’ इससे मनु नामक पुरुष के निन्दित सन्तान की माणव संज्ञा है। मानव शब्द किसी प्रकार गोत्र जाति के तुल्य अवान्तर जाति का वाचक हो जावे तो कभी एक प्रकार की उत्पत्ति वाले एक जाति कहाते हैं, जैसे मनुष्य, पशु, पक्षी आदि इस जातिलक्षण को मानकर सिद्ध किये मनुष्य, मानुष शब्दों की अपेक्षा मानव शब्द का जातिवाचक नहीं होना ही कह सकते हैं।

और यदि माणव शब्द में परमेश्वरवाची मनु शब्द से ही निन्दित अपत्य अर्थ में अण् प्रत्यय हो तो भी कोई दोष नहीं। इसी प्रकार मनुष्य, मानुष शब्दों से भी अपत्य अर्थ मानने पर भी दोष नहीं। क्योंकि हम सब उसी सर्वशक्तिमान् परमात्मा के सन्तान ही हैं। वह हमारा पिता है, सृष्टि के आरम्भ में हम सबको उसी ने उत्पन्न कर रक्षा की, उस समय वही हमारा माता-पिता था, इस कारण उत्पादक और रक्षक होने से वह सबका पिता है। ऋग्वेद के प्रथम मण्डल1 के अस्सीवें सूक्त के सोलहवें मन्त्र में ‘मनुष्पिता’ इत्यादि शब्दों से सब चराचर जगत् का पिता मनु है, ऐसा स्पष्ट कहा है। इसी प्रकार अन्य शाखा ब्राह्मणों2 में भी सैकड़ों प्रमाण ऐसे मिलते हैं, जिनसे सबका उत्पादक मनु नामक परमात्मा ही सिद्ध होता है।

उस परमेश्वर की सृष्टि में सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म आदि का सामान्य प्रकार से मनन करने वाले स्त्री-पुरुष मनुष्य और अपने कर्त्तव्य से पतित हुए, निन्दित मनुष्य माणव कहाते हैं। ऐसा होने पर कोशकर्त्ताओं3 ने माणव शब्द को बालक का पर्याय वाचक कहा है सो उनका लेख प्रामादिक प्रतीत होता है, क्योंकि बालकों को निन्दित इसलिये नहीं ठहरा सकते कि जो उस काम के करने में समर्थ होकर न करे, वह निन्दित कहाता है परन्तु बालक लोग धर्म-अधर्म का विवेक करने का सामर्थ्य ही नहीं रखते, इसलिये माणव शब्द का प्रयोग धर्महीन पशुओं के समान वर्त्ताव करने वाले निन्दित मनुष्यों में करना चाहिए। कोई कहे कि बालक भी अज्ञानी का नाम है, वैसे माणव भी मान लिया जाय तो यह किसी प्रकार बन सकता है, परन्तु बालक शब्द अज्ञानी का वाचक वास्तव में नहीं, किन्तु गौण प्रयोग है कि बालक भी अज्ञानी होता है। इसलिये जवान होकर भी अज्ञानी रहे, तो बालक के तुल्य अज्ञानी वा अनधिकारी माना जाता है।४ इस प्रकार यहां माणव शब्द बालक के साथ गौणार्थ में भी नहीं लिया जा सकता, क्योंकि बालकों का निन्दित होना स्थिर नहीं और कोई बाल्यावस्था में निन्दित होकर भी आगे सम्हल जाते हैं, इस कारण निन्दित कहना ठीक नहीं और वही पूर्वोक्त पक्ष ठीक है। इस उक्त प्रकार से समय और अवसर के अनुसार बहुतों का नाम मनु आता है। परन्तु जो धर्म की व्यवस्था करने वालों में सबका गुरु धर्म के उपदेशकों में मुख्य मनु हुआ उसी का नाम ब्रह्मा भी था। मैत्रायणीय ब्राह्मणोपनिषद्5 और तैत्तिरीय कृष्णयजुःसंहिता1 में मनु और ब्रह्म एक ही के नाम हैं, यह स्पष्टता से दिखाया गया है। इसलिये विद्वान् लोगों को विचारना चाहिये कि पहले हुए शिष्ट लोगों के अनुकूल यह सिद्धान्त है। किन्तु मैंने नवीन कल्पित नहीं मान लिया है। यदि कोई कहे कि यहां स्मृति के प्रसग् मे भी ब्रह्मा नाम से ही व्यवहार क्यों नहीं किया गया, जिससे सन्देह ही न होता ? इसका उत्तर यह है कि उस पुरुष ने वेद के अर्थ का मनन, स्मरण किया, इससे मनु नाम रखा गया। शटा के भय से कोई काम रोके नहीं जाते। जिस-जिस का सेवन किया जाता वा शास्त्र बनाया जाता है उन सबमें थोड़ी बुद्धि वालों को सन्देह हुआ करते हैं, विद्वान् लोग ओषधि से रोग के तुल्य सिद्धान्तरूप वचनों से सन्देहों को निवृत्त कर देते हैं। और मनुस्मृति का ब्रह्मस्मृति नाम भी है, परन्तु उसका विशेष प्रचार उस नाम से नहीं है। अब यह सिद्ध हो गया कि मनु नाम से प्रसिद्ध ब्रह्मा है, उसी ने इस धर्मशास्त्र का उपदेश सृष्टि के आरम्भ में किया। इसलिए यह विषय समाप्त हो जाता है।

कुरान समीक्षा : कुरान को मुहम्मद ने खुद बनाना मान लिया

कुरान को मुहम्मद ने खुद बनाना मान लिया

क्या मुहम्मद साहब का यह बयान मजबूर होकर सत्य को स्वीकार करता नहीं है?

देखिये कुरान में कहा गया है कि-

अम् यकूलून फ्तराहु कुल् इनिफ्………….।।

(कुरान मजीद पारा २६ सूरा अह्काफ रूकू १ आयत ८)

क्या यह कहते हैं कि इसको इसने (अपने दिल से) बना लिया है, तू कह कि अगर मैंने इसको अपने दिल से बनाया होगा तो तुम खुदा के मुकाबिले में मेरा कुछ नहीं कर सकते।

समीक्षा

आखिरकार मुहम्मद साहब ने कुरान को खुद बनाना मान ही लिया जिसके लिए वह बधाई के पात्र हैं।

मानवधर्म शास्त्र का सार: पण्डित भीमसेन

विद्या यस्य सनातनी सुविमला, दुःखौघविध्वंसिनी।

वेदाख्या प्रथितार्थधर्मसुगमा, कामस्य विज्ञापिका।

मुक्तानामुपकारिणी सुगतिदा, निर्बाधमानन्ददा।

तस्यैवानुदिनं वयं सुखमयं भर्गः परं धीमहि।।1।।

यस्माज्जातमिदं विश्वं यस्मिंश्च प्रतिलीयते।

यत्रेदं चेष्टते नित्यं   तमानन्दमुपास्महे।।2।।

यदेव वेदाः पदमामनन्ति तपांसि यस्यानुगतास्तपन्ति।

शास्त्रं यदाप्तुं मुनयः पठन्ति, तस्यैव तेजः सुधियानुचिन्त्यम्।।3।।

दिक्कालाकाशभेदेषु परिच्छेदो न विद्यते।

यस्य चिन्मात्ररूपस्य नमस्तस्मै महात्मने।।4।।

सर्वासां सत्यविद्यानां मूलं वेदो निरुच्यते।

तस्यापि कारणं ब्रह्म तेन सृष्टौ प्रचारितः।।5।।

तस्य वेदस्य तत्त्वं हि मनुना परमर्षिणा।

तपः परं समास्थाय योगाभ्यासगतात्मना।।6।।

सारांशमखिलं बुद्ध्वा लोकानां हितकाम्यया।

धर्मः सनातनः स्मृत आपद्धधर्मश्च कालिकः।।7।।

प्रचाराधिक्यमापन्नः पुरा धर्मः सनातनः।

आसीदास्थाय सत्यां तां गुरुशिष्यपरम्पराम्।।8।।

या पश्चाज्छललोभाभ्यां मोहेन कलहेन वा।

अविद्योपासनेनापि   ब्रह्मचर्यादिवर्जनात्।।9।।

स्वार्थसाधनरागेण धर्मस्य परिवर्जनात्।

अधर्मसेवनेनापि नष्टा सत्या परम्परा।।10।।

तदा नानामतान्यासन् मनुष्याणामितरेतरम्।

श्रौतस्मार्त्तस्य धर्मस्य नाशस्तेनाभवत्पुनः।।11।।

स्वस्य स्वस्य मतस्यैव प्रचाराय पुनस्तदा।

विरुद्धपक्षसंसक्तैर्ग्रन्थानां निर्मितिः कृता।।12।।

ये च वेदानुगा ग्रन्थाः शुद्धा दृष्टा मतानुगैः।

तत्रापि सज्जितं वाक्यं स्वमतस्यैव पोषकम्।।13।।

तस्माच्च शुद्धग्रन्थानामार्षाणां श्रौतधर्मिणाम्।

धृतवर्णाश्रमतत्त्वानामद्य प्राप्तिः सुदुर्लभा।।14।।

यादृशाश्चोपलभ्यन्ते ग्रन्थाः परमर्षिनामतः।

तत्रापि निर्मितं भाष्यं तैरेव स्वमतानुगम्।।15।।

धर्मस्य वर्णनं तत्र सम्यङ् नैवोपलभ्यते।

मतवादं पुरस्कृत्य पक्षपातश्च वर्णितः।।16।।

तर्केणानुसन्धानं   मनूक्तं   नोपलभ्यते।

श्रौतस्मार्त्तस्य धर्मस्य तेषु भाष्येषु पश्यतः।।17।।

अतोऽहं बहुभिराज्ञप्तः सज्जनैर्धर्मवेदिभिः।

स्वयं चाप्यनुसन्धाय दृष्ट्वा च धर्मविप्लवम्।।18।।

मानवस्यास्य शास्त्रस्य वेदानामनुगामिनः।

भाष्यारम्भं करोम्यद्य लोकानां हितमाचरन्।।19।।

भियःषुग्वे1त्यपादाने2 निष्पन्ना षुगभावतः।

तादृशी यस्य सेनास्ति तन्नाम्नेदं वितायते।।20।।

यद्यप्येतादृशी शक्तिर्मयि मन्दे न विद्यते।

तथापि तर्त्तुमिच्छामि सत्यप्लवेन सागरम्।।21।।

सत्यो हि जगदाधारस्तस्य चैवानुचिन्तनात्।

सत्यधर्मप्रचाराय बुद्धिं मे प्रेरयिष्यति।।22।।

नराणामल्पशक्तित्वात्सर्वज्ञो नास्ति कश्चन।

विद्याब्धिवेदमूलेन विना चिन्मात्रमूर्त्तिना।।23।।

तस्मात्क्वापि विरुद्धं चेत्प्रमादादिसुदूषितम्।

गुणानुरागिभिस्त्याज्यं ज्ञात्वा नीचैरुपासितम्।।24।।

अब प्रस्तावना लिखने के पश्चात् मानव धर्मशास्त्र की मुख्य भूमिका का प्रारम्भ किया जाता है। इसलिये शिष्ट लोगों की परिपाटी अर्थात् ऋषि-महर्षि लोगों की आज्ञानुसार कि सब शुभ कार्यों के प्रारम्भ में सबके स्वामी परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना वा ध्यान करना चाहिये कि जिससे उसकी कृपा होकर बुद्धि निर्मल वा शुद्ध हो सकती है। इसी कारण उस कार्य का अच्छा बन जाना सम्भव है। इसलिये हमको भी प्रथम परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना करनी चाहिये, इस कारण पहले मग्लाचरण किया है।

सब दुःखों के समुदाय का ध्वंस- नाश करने वाली, जिसके होने से धनादि पदार्थ और सुगम रीति से धर्म प्राप्त हो सकता है, जिसमें धर्मानुकूल स्त्री सम्बन्ध रूप काम की आज्ञा है। जो ठीक-ठीक तत्त्वज्ञान होने से मुक्तों का उपकार करने वाली उसके अनुकूल चलने वाले संसारी जनों को जन्मान्तर में अच्छी गति देने वाली और सब बाधाओं से रहित आनन्द की दाता निर्मल शुद्ध सनातन वेद नामक जिसकी विद्या संसार में प्रकट हुई है, उसके सुखस्वरूप सर्वोत्तम ज्ञानमय तेज का हम लोग प्रतिदिन ध्यान वा धारणा करें।।१।। जिस सर्वनियन्ता परमेश्वर से यह प्रत्यक्ष चित्र-विचित्र अनेक प्रकार की शिल्पविद्या का दिखाने वाला जगत् उत्पन्न हुआ, जिसमें नियमपूर्वक स्थित होकर चेष्टा करता और जिसमें सब लय हो जाता है, उस आनन्द स्वरूप ब्रह्म की हम लोग उपासना करें।।२।। जिसके अधिकार या महत्त्व का सब वेद वर्णन करते अर्थात् कहीं साक्षात् और कहीं परम्परा से सब वेदों में जिसका वर्णन है, और जिसको प्राप्त होने की इच्छा से जिज्ञासु लोग तप करते तथा जिसको प्राप्त होने के लिए ऋषि-मुनि जन वेदाादि शास्त्रों को पढ़ते हैं, विचारशील पुरुषों को उसी के तेज का चिन्तन करना चाहिये।।३।। दिशा, काल और आकाश के भेदों में जिसका परिच्छेद नहीं अर्थात् किसी निज पूर्वादि दिशा, किसी निज क्षणादि काल और किसी निज अवकाश में जो नहीं रहता, किन्तु सब दिशा, काल और अवकाशों में विद्यमान है, उस चेतनमात्र स्वरूप सर्वव्याप्त परमेश्वर को हमारा नमस्कार प्राप्त हो।।४।। सब सत्य विद्याओं का मूल वेद माना जाता है, उस वेद का भी मूल कारण ब्रह्म है क्योंकि उसी परमेश्वर ने संसार में वेदों का प्रचार कराया।।५।। योगाभ्यास में तत्पर महर्षि मनु महाराज ने प्रबल उत्कृष्ट तप का आशय लेकर और उस वेद का मुख्य सारांश अभिप्राय जानकर संसार के उपकार की कामना से सनातन धर्म का तथा समयानुकूल आपत्काल में सेवने योग्य आपद्धर्म का स्मरण अर्थात् वेद से विचारकर प्रकट किया है।।६,७।। वह सनातन धर्म पूर्वकाल में गुरु-शिष्य की उस सत्य परम्परा के आश्रय से   अधिक कर प्रचरित था। अर्थात् पूर्वकाल में सृष्टि के आरम्भ से पुस्तकों के बिना ही वेदादिस्थ विद्या और धर्म के उपदेश में सृष्टि की निरन्तर चलने वाली प्रणाली से चलते थे।।८।। जो परम्परा पीछे छल, कपट, लोभ, मोह, कलह, अविद्या के सेवन, ब्रह्मचर्यादि के छोड़ने, स्वार्थ साधन में तत्पर होने, धर्म के छोड़ देने और अधर्म का सेवन करने से वह सत्य परम्परा नष्ट हो गई।।९,१०।। उस समय परस्पर मनुष्यों में नाना प्रकार के मत चले उससे वैदिक और स्मार्त्त धर्म का और भी नाश हुआ।।११।। उस समय परस्पर विरुद्ध मतों में आसक्त लोगों ने अपने-अपने मत का प्रचार करने के लिए अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार ग्रन्थों का निर्माण किया।।१२।। और मतवादी लोगों ने जो वेदानुकूल शुद्ध ग्रन्थ देखे, उनमें भी अपने-अपने मत के पोषक वाक्य मिला दिये।।१३।। इसी कारण से जिनमें वर्णाश्रम धर्म का स्पष्ट आशय धरा गया था, ऐसे वैदिक धर्म के ऋषिप्रणीत शुद्ध ग्रन्थों का मिलना अब दुर्लभ हो गया।।१४।। शुद्ध ग्रन्थों में मतवादियों ने इसलिए अपने-अपने मत के पोषक वचन मिलाये कि जिससे हमारा मत निर्मूल न समझा जावे, किन्तु प्रतिष्ठित वेदमूलक ग्रन्थों में मिल जाने से सनातन माना जावे और हमको कोई न पकड़ सके। अब जैसे कुछ ग्रन्थ ऋषियों के नाम से मिलते हैं, उन पर भी उन्हीं लोगों ने अपने-अपने मत की पुष्टिपरक व्याख्या बनाई। यद्यपि व्याख्या करने वालों का भीतरी अभिप्राय यह नहीं था कि हम इस शास्त्र में अपना मत घुसेड़ें, तो भी उन-उन का अन्तःकरण उस-उस मत के रंग से रंगा होने के कारण वैसे ही भाष्य भी बनाये गये।।१५।। उन भाष्यों में ठीक-ठीक धर्म का वर्णन जैसा होना चाहिये, प्राप्त नहीं होता। और कहीं-कहीं अपने-अपने मत के आश्रय से पक्षपात भी वर्णन किया गया है।।१६।। इस मानवधर्मशास्त्र में तर्कपूर्वक धर्म का निर्णय करने के लिए “यस्तर्केणानुसन्धत्ते0”1 इत्यादि वचनों में स्पष्ट आज्ञा लिखी है, उसके अनुसार वेद सम्बन्धी और धर्मशास्त्र सम्बन्धी धर्म का वर्णन उन भाष्यों में देखने वाले को प्राप्त नहीं होता, जिससे आजकल के धर्म का निर्णय चाहने वाले मनुष्यों को सन्तोष हो।।१७।। इसी से अनेक धर्मज्ञ और सज्जन लोगों ने मुझको आज्ञा वा सम्मति दी तथा मैंने भी विचार किया कि वास्तव में ऐसी दशा होने से मुझको इस पर यथाशक्ति विचार करना चाहिये और मैंने यह भी विचारा कि ऐसा न करने से अब दिन-दिन धर्म की हानि होती जाती है। धर्मशास्त्र में आज्ञा है कि- ‘धर्म की हानि होती हो तो ब्राह्मण भी शस्त्र को ग्रहण करें।’२ और ‘विद्वानों का शस्त्र वाणी वा विद्या ही है कि जिससे अधर्म का ध्वंस हो सकता है।’३

इत्यादि प्रकार के विचार से लोक का उपकार होना मानकर मैं अब वेदों के अनुयायी इस मानव धर्मशास्त्र के भाष्य का प्रारम्भ करता हूं।।१८,१९।। बीसवें श्लोक में मेरा नाम (भीमसेन शर्मा) व्याकरण के अनुसार दिखाया गया है।।२०।। यद्यपि मुझ मन्दबुद्धि में ऐसी शक्ति नहीं है जो वेदानुकूल धर्म का ठीक-ठीक निर्णय कर सकूं, तो भी सत्यरूप नौका के आश्रय से इस मानव धर्मशास्त्र रूप समुद्र के पार होना चाहता हूं।।२१।। और वही सब जगत् का आधार सर्वान्तर्यामी परमेश्वर ही मुख्य कर सत्य है, उसका स्मरण, ध्यान, स्तुति, प्रार्थनादि करने से सत्य धर्म का प्रचार होने के लिए वह परमेश्वर मेरी बुद्धि को अवश्य प्ररेणा करेगा।।२२।। सब विद्याओं का सागर जो वेद उसके कर्त्ता चेतनमात्र स्वरूप एक परमेश्वर को छोड़कर अन्य कोई भी सर्वज्ञ नहीं है, किन्तु सभी मनुष्य अल्पज्ञ हैं। इस कारण मेरे भाष्य में प्रमादादि से कहीं विरुद्ध वा दूषित लेख किन्हीं महाशयों वा विद्वानों को जान पड़े तो गुणानुरागी लोगों को वह दोष छोड़ देना चाहिये, क्योंकि अच्छे लोगों का स्वाभाविक धर्म यही है कि वे दूसरे के गुणों को अच्छा समझ के उसके सहकारी बनते हैं। और कोई दोष जान पड़ता है तो छोड़ देते हैं, क्योंकि दोषों का ग्रहण करना नीच पुरुषों का काम है। और यह भी हो सकता है कि जैसे प्रमादाादि से मेरा लेख कहीं दूषित हो जाये, वैसे प्रमादादि के होने से मेरे निर्दोष लेख को भी कोई विरुद्ध मान सकता है, इसलिये विचारशीलों को उचित है कि यदि कहीं विरुद्ध जान पड़े तो प्रथम मुझसे ही पूछ देखें, यदि भूल होगी तो मैं स्वयं मान लूंगा। और वह ठीक हो जायगा।।२३,२४।।

कुरान समीक्षा : खुदा का दफ्तर भी है

खुदा का दफ्तर भी है

खुदा का दफ्तर, मुहाफिजखाला, कचहरी किस स्थान पर है? पता लगाकर यह भी बतावें कि वह कहीं रूसी अमरीकी राकेटों से बिस्मार अर्थात् नष्ट तो नहीं हो गये?

देखिये कुरान में कहा गया है कि-

हाजा किताबुना यन्तिकु अलैकुम्…………।।

(कुरान मजीद पारा २५ सूरा जासिया रूकू ४ आयत २९)

यह हमारे दफ्तर की किताब है जो तुम्हारे काम ठीक-ठीक बतलाता है। जो कुछ तुम करते थे हम उनको लिखवाते जाते थे।

समीक्षा

खुदा के यहाँ दफ्तर भी हैं, उनमें क्लर्क रहते हैं, जो हिसाब किताब ठीक रखते हैं। शायद दफ्तरों (मुहाफिज खानों) की रक्षा के के लिए दरोगा सिपाही भी तैनात रहते होंगे। खुदा उनको सरकारी वर्दियाँ भी देता होगा। रक्षा के लिए ३०३ नं० की लम्बी मार की राइफल भी उनको दी जाती होगी। खुदा भी एक तहसीलदार साहब से किसी बात में कम नहीं था।

कुरान समीक्षा : खुदा ने गुमराह किया

खुदा ने गुमराह किया

बतावें कि गुमराह करने वाला खुदा मुल्जिम क्यों नहीं है और जिसे उसने गुमराह किया उसें दोषी मानना अन्याय क्यों नहीं है?

देखिये कुरान में कहा गया है कि-

अ-फ-रऐ-त-मनित्त-ख-ज इलाहहू…………।।

(कुरान मजीद पारा २५ सूरा जासिया रूकू ३ आयज २३)

ऐ पैगम्बर! भला देखो तो जिसने अपनी ख्वाहिशों को अपना पूजित ठहराया और इल्म होते हुए भी अल्लह ने उसें गुमराह कर दिया और उसके कानों पर और उसके दिल पर मुहर लगा दीं और उसकी आंखों पर पर्दा डाल दिया तो खुदा के (गुमराह किये) पीछे कौन उसको हिदायत दे? क्या तुम नहीं सोचते।

समीक्षा

अगर कोई आदमी अपनी पसन्द के अनुसार किसी की उपासना करे तो अरबी खुदा जल भुन कर उसके दिलो दिमाग पर मोहर कर देता है कि वह सही रास्ता न अपना सके। ऐसे बुरे खुदा को मानने वाले दया के पात्र हैं।

कुरान समीक्षा : हर आदमी का हाल दो-दो फरिश्ते लिखते रहते हैं

हर आदमी का हाल दो-दो फरिश्ते लिखते रहते हैं

इन दो फरिश्तो के हर व्यक्ति का हाल लिखते रहने ही मिथ्या कल्पना को सत्य साबित करें?

देखिये कुरान में कहा गया है कि-

अम् यह-सबू-न अन्ना ला नस्मअु ………..।।

(कुरान मजीद पारा २५ सूरा जुरूरूफ रूकू ७ आयत ८०)

क्या ये लोग यह ख्याल करते हैं कि हम इनके भेद और मशविरें नहीं जानते, हां-हां हम सब जानते है और हमारे फरिश्ते उनके पास सब बातों को लिख लेते हैं ।

समीक्षा

खुदा ने हर आदमी पर दो-दो फरिश्ते लगा रखे हैं जो उसके हर काम को लिखते रहते हैं और उसकी रिपोर्ट खुदा को देते रहते हैं ऐसा कुरान व इस्लाम मानता है