Category Archives: हिन्दी

कार्य करने का निराला ढंग

कार्य करने का निराला ढंग

ऋषि दयानन्द जी महाराज के पश्चात् वैदिक धर्म की वेदी पर सर्वप्रथम अपना बलिदान देनेवाले वीर चिरञ्जीलालजी एक बार कहीं प्रचार करने गये। वहाँ आर्यसमाज की बात सुनने को भी कोई

तैयार न था। आर्यसमाज के आरज़्भिक काल के इस प्राणवीर ने प्रचार की एक युक्ति निकाली।

गाँव के कुछ बच्चे वहाँ खेल रहे थे। उन्हें आपने कहा-देखो आप यह मत कहना-‘‘अहो! चिरञ्जी मर गया’’। बच्चों को जिस बात से रोका जाए वे वही कुछ करते हैं। वे ऊँचा-ऊँचा यही शोर मचाने लगे। वीर चिरञ्जीलाल कहते ऐसा मत कहो। वे और ज़ोर से यही वाज़्य कहते। तमाशा-सा था और बच्चे साथ जुड़ते गये। फिर कहा अच्छा मुझे ‘नमस्ते’ मत कहो। तब नमस्ते का

प्रचार भी बलिदान माँगता था। बच्चों ने सारा ग्राम ‘नमस्ते’ से गुँजा दिया।

थोड़ी देर बालक चुप करते तो चिरञ्जीलाल अपनी ओजस्वी व मधुरवाणी से अपने गीत गाते। उनका कण्ठ बड़ा मधुर था। वे एक उच्चकोटि के गायक थे। उनकी सुरीली आवाज लोगों को

खींच लेती। भजन गाते, भाषण देते। इस प्रकार अपनी सूझ से वीर चिरञ्जीलालजी ने वहाँ वैदिक धर्म के प्रचार का निराला ढंग निकाला।

स्मरण रहे कि यही चिरञ्जीलाल आर्यसमाज का पहला योद्धा था जिसको अपनी धार्मिक मान्यताओं के लिए कारावास का कठोर दण्ड भोगना पड़ा। तब मुंशीरामजी (स्वामी श्रद्धानन्दजी महाराज) ने इनका केस बड़े साहस से लड़ा था।

ईद के दौरान सड़कों पर नमाज अदा करने को नहीं रोक सकते तो उन्हें थानों में मनाई जाने वाली जन्माष्टमी को रोकने का भी अधिकार नहीं

योगी बोले, कावड़ यात्रा में डीजे नहीं बजेगा तो क्‍या शव यात्रा में बजेगा

योगी ने कहा कि प्रार्थना और कीर्तन से पुलिस सिस्टम में सुधार हो सकता है. सीएम ने सालाना कांवड़ यात्रा के दौरान बजने वाले डीजे और लाउडस्पीकर पर कहा कि कांवड़ यात्रा के दौरान डीजे और लाउडस्पीकर पर रोक नहीं लगेगी, तो क्‍या शव यात्रा में बजेगा. योगी ने कहा कि मैंने प्रशासन से कहा, मेरे सामने एक आदेश पारित करिए कि माइक हर जगह के लिए प्रतिबंधित होना चाहिए.

   
योगी बोले, कावड़ यात्रा में डीजे नहीं बजेगा तो क्‍या शव यात्रा में बजेगा
यूपी के सीएम योगी आदित्‍यनाथ ने कहा कि लाउडस्‍पीकर को हर किसी के लिए बैन करना चाहिए. (फाइल फोटो)

लखनऊ : उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बुधवार को कहा कि यदि वो ईद के दौरान सड़कों पर नमाज अदा करने को नहीं रोक सकते तो उन्हें थानों में मनाई जाने वाली जन्माष्टमी को रोकने का भी अधिकार नहीं है. लखनऊ में प्रेरणा जनसंचार एवं सिद्ध संस्थान के कार्यक्रम में योगी ने कहा, ‘अगर मैं सड़क पर ईद के दिन नमाज पढ़ने पर रोक नहीं लगा सकता, तो मुझे कोई अधिकार नहीं है कि मैं थानों में जन्माष्टमी के पर्व को रोकूं…कोई अधिकार नहीं है.’ सूबे की समाजवादी पार्टी पर बरसते हुए योगी ने कहा कि वे लोग जो खुद को यदुवंशी कहते हैं उन्होंने थानों और पुलिस लाइन्स में जन्माष्टमी मनाने पर रोक लगा दी थी.

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, योगी ने इस मौके पर कहा कि उनका मानना है कि प्रार्थना और कीर्तन से पुलिस सिस्टम में सुधार हो सकता है. सीएम ने सालाना कांवड़ यात्रा के दौरान बजने वाले डीजे और लाउडस्पीकर पर कहा कि कांवड़ यात्रा के दौरान डीजे और लाउडस्पीकर पर रोक नहीं लगेगी, तो क्‍या शव यात्रा में बजेगा. योगी ने कहा कि मैंने प्रशासन से कहा, मेरे सामने एक आदेश पारित करिए कि माइक हर जगह के लिए प्रतिबंधित होना चाहिए और ये तय करो कि किसी भी धर्मस्थल की चहारदीवारी से बाहर लाउडस्पीकर की आवाज नहीं आनी चाहिए, क्या इसको लागू कर पाएंगे? अगर लागू नहीं कर सकते हैं तो फिर इसको भी हम लागू नहीं होने देंगे, यात्रा चलेगी.’

योगी ने कहा कि पहले अधिकारियों ने कांवड़ यात्रा के दौरान डीजे और म्यूजिक सिस्टम पर रोक लगाने की बात कही. अधिकारियों के इस सुझाव पर योगी ने कहा कि बिना संगीत के ये कांवड़ यात्रा होगी या शव यात्रा. सीएम ने अधिकारियों को बताया कि मैंने कहा कि ये कांवड़ यात्रा है या शव यात्रा? अरे वो कांवड़ यात्रा में बाजे नहीं बजेंगे, डमरू नहीं बजेगा, ढोल नहीं बजेगा, चिमटे नहीं बजेंगे, लोग नाचेंगे गाएंगे नहीं, माइक नहीं बजेगा तो वो यात्रा कांवड़ यात्रा कैसे होगी.’

आरएसएस विचारक दीनदयाल उपाध्याय के बयानों का जिक्र करते हुए सीएम योगी आदित्‍यनाथ ने कहा कि गांव हो या शहर गणेश उत्सव मनाने पर भी किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि देश में सबको पर्व त्योहार मनाने का अधिकार है. योगी ने कहा, ‘ हम सबके लिए कहेंगे, आप क्रिसमस भी मनाइए, कौन रोक रहा है, भारत के अंदर कभी नहीं रोका गया, आप नमाज भी पढ़िए, आराम से पढ़िए, कानून के दायरे में रहकर पढ़िए, कोई रोकेगा नहीं. लेकिन कानून का उल्लंघन कोई करेगा तो उस पर कहीं ना कहीं फिर टकराव पैदा होगा और इसलिए इन मुद्दों को दीनदयाल उपाध्याय ने प्रखरता ने उठाया.’

source : http://zeenews.india.com/hindi/india/yogi-adityanath-says-on-dg-play-in-kavad-yatra/337356

हदीस : तस्तहिद्दा

तस्तहिद्दा

मुहम्मद ने उन शब्दों का भी असरदार इस्तेमाल किया है जिन्हें साहित्य समीक्षा में अश्लील अभिव्यक्तियां कहते हैं। एक बार पैगम्बर और उनका दल, एक चढ़ाई से कुछ देर में वापस आये। उनके साथी तुरन्त अपने घरों को जाना चाहते थे। लेकिन पैगम्बर ने उनसे तब तक इन्तज़ार करने को कहा, जब तक कि ”औरत अपने बिखरे बालों को कंघी से संवाल ले और जिसका मर्द बाहर गया था वह अपने को साफ कर ले, ताकि जब तुम भीतर पहुंचो, तो तुम मज़ा ले सको“ (2462)

 

अनुवादक हमें समझाते हैं कि ”अपने को साफ करने“ के अर्थ में एक अरबी शब्द है ”तस्तहिद्दा,“ जिसका अक्षरशः अर्थ होता है ”गुप्तांगों के बाल साफ करना।“ लेकिन यहा उस शब्द को पति के साथ समागम के लिए तैयार हो जाने के लाक्षणिक अर्थ में प्रयुक्त किया गया है (टि0 1926)।

author : ram swarup

तुज़्हें याद हो कि न याद हो

तुज़्हें याद हो कि न याद हो

ज़िला बिजनौर के नगीना ग्राम से सब आर्य भाई परिचित हैं। यहाँ के एक ब्राह्मणकुल में जन्मा एक युवक 1908 ई0 में अकेले ही देशभर की तीर्थ-यात्रा पर चल पड़ा। रामेश्वरम् से लौटते हुए

मदुराई नगर पहुँचा। यहाँ मीनाक्षीपुरम् का प्रसिद्ध मन्दिर है। इस पौराणिक युवक ने ज़्या देखा कि यहाँ मन्दिर के निकट चौक-चौराहों में ईसाई पादरी व मुसलमान मौलवी सोत्साह प्रचार में लगे हैं। हिन्दुओं की भीड़ इन्हें सुनती है। ये हिन्दुओं की मान्यताओं का खण्डन करते हैं। यदा-कदा हिन्दू विधर्मी बनते रहते हैं।

यह दृश्य देखकर इसका हृदय हिल गया। यह युवक वहीं डट गया। वैद्यक का उसे ज्ञान था। ओषधियाँ देकर निर्वाह करने लगा, परन्तु धर्मरक्षा के कार्य में तनिक भी सफलता न मिली। अब ज़्या किया जाए? बिजनौर जिला से गया था, अतः ऋषि के नाम व काम से परिचित था। अब सत्यार्थप्रकाश मँगवाया। स्वामी दर्शनानन्द, पण्डित लेखराम आदि का साहित्य पढ़ा और आर्यसमाज का झण्डा तमिलनाडु में गाड़ दिया। वहीं एक दलित वर्ग की देवी से विवाह करके वैदिक धर्म की सेवा में जुटा रहा। 1914 ई0 में लाहौर से एक आर्य महाशय हरभगवानजी दक्षिण भारत की यात्रा पर गये।

उनके कार्य को देखकर स्वामी श्रद्धानन्द व महात्मा हंसराजजी को इनका परिचय दिया। यह युवक कुछ समय सार्वदेशिक सभा की ओर से वहाँ कार्य करता रहा। स्वामी श्रद्धानन्दजी के बलिदान के पश्चात् उनकी सहायता उक्त सभा ने बन्द कर दी। सात-आठ वर्ष तक प्रादेशिक सभा ने सहयोग किया।

इस वीर पुरुष ने स्वामी दर्शनानन्द जी व उपाध्यायजी के ट्रैज़्ट अनूदित किये। अपने पैसे से तमिल में 35-40 ट्रैज़्ट छपवाये।

हिन्दी पाठशालाएँ खोलीं। धर्मार्थ ओषधालय चलाया। आर्यसमाज के नियमित सत्संग वहाँ पर होते रहे। विशेष उत्सवों पर सहस्रों की उपस्थिति होती थी।

अज़्टूबर 1937 में आप उज़रप्रदेश सभा की जयन्ती देखने अपने प्रदेश में आये। स्वामी सत्यप्रकाश जी ने भी जयन्ती पर इन्हें देखा था। नगीना भी गये। वहीं विशूचिका रोग के कारण उनका निधन हो गया। यह मई 1938 की दुःखद घटना है। ज़्या आप जानते हैं कि इस साहसी आर्यपुरुष का ज़्या नाम था? यह एम0जी0 शर्मा के नाम से विज़्यात थे। आइए, इनके जीवन से कुछ प्रेरणा ग्रहण करें।

65 साल की वृद्धा खुद ही चलने में लाचार है .. उसको तलाक़ ये कह कर दे रहा 73 साल का शौहर कि वो उसकी सेवा नहीं करती

65 साल की वृद्धा खुद ही चलने में लाचार है .. उसको तलाक़ ये कह कर दे रहा 73 साल का शौहर कि वो उसकी सेवा नहीं करती

65 साल की वृद्धा खुद ही चलने में लाचार है .. उसको तलाक़ ये कह कर दे रहा 73 साल का शौहर कि वो उसकी सेवा नहीं करती

तलाक को खिलौना समझ रखा है शायद कुछ लोगों ने .. उनके लिए ये केवल समय बिताने का साधन हो पर असल में तलाक क्या होता है ये जानने के लिए उन्हें रिश्तों की पवित्रता को समझना होगा जो शायद उनके बस की बात नहीं . यहाँ गाजियाबाद की अदालत में तलाक का एक अनोखा मामला सामने आया है। जहां 73 साल के एक बुजुर्ग ने 65 साल की अपनी पत्नी से तलाक की गुहार लगाई है। तलाक की अर्जी लगाने वाले बुजुर्ग मुरादनगर में रहते हैं। उनका कहना है कि अपने बेटों को बिजनस में सेटल करवाया, लेकिन अब कोई भी उनकी देखभाल नहीं करता। मकान के ग्राउंड फ्लोर पर बने एक कमरे में वह अकेले पड़े रहता हुं।

पत्नी उनका ख्याल नहीं रखतीं और सिर्फ अपने पोते-पोतियों में व्यस्त रहती हैं। वह उनके खाने-पीने पर भी कोई ध्यान नहीं देतीं। वह उनके कमरे में आती तक नहीं। ऐसे में अकेले टाइम काटना मुश्किल हो जाता है। ऐसी स्थित में परिवार के साथ रह पाना मुश्किल हो गया है। बुजुर्ग ने बताया कि संपत्ति का अधिकांश हिस्सा पत्नी के नाम है, एक यह भी कारण है पत्नी बातचीत करने को तैयार नहीं है। अब बुजुर्ग ने अपने वकील के माध्यम से कोर्ट में अर्जी दाखिल करके पत्नी के नाम की सारी संपत्ति वापस उनके नाम कर देने की गुहार लगाई है।

साथ ही उन्होंने पत्नी से तलाक की भी कोर्ट से मांग की है। वहीं, उधर बुजुर्ग की पत्नी का कहना है कि उनके पति की दिमागी हालत ठीक नहीं है। पत्नी के कहा कि मैं पोते-पोतियों में को खिलाती रहती हूं, लेकिन वह चाहते हैं कि हमेशा मैं उन्हीं के कमरे में रहूं, ऐसा करना संभव नहीं है। क्या उम्र के अंतिम पड़ाव पर ऐसा जघन्य कार्य करना जरूरी है ? आखिर एक नारी के सम्मान को किस हद तक और कितनी ठेस पहुचायी जायेगी .. बार बार , हर बार ..

source : http://www.sudarshannews.com/category/state/they-are-in-last-stage-of-his-age-but-seeking-for-divorce–4881

हदीस : कुंवारी से ब्याह

कुंवारी से ब्याह

अन्य अहादीस में पैगम्बर कुंवारी से ब्याह करने की विशेषताएं बतलाते हैं (3458-3464) जाबिर के अनुसार रसूल-अल्लाह ने कहा-”जाबिर ! क्या तुमने शादी की है। मैं बोला हां। उन्होंने कहा-कुंवारी से या पहले की शादीशुदा से ? मैं बोला-पहले की शादीशुदा से। इस पर वे बोले-तुमने एक कुंवारी से ब्याह क्यों नहीं किया, जिसके साथ तुम क्रीड़ा कर सकते थे ?“ (3458) अथवा “जो तुम्हारा मन बहला सकती थी और जिसका मन तुम बहला सकते थे“ (3464)।

author : ram swarup

प्रभात से रात हो गई

प्रभात से रात हो गई

मैंने अपने द्वारा लिखित ‘रक्तसाक्षी पण्डित लेखराम’ पुस्तक में पण्डित लेखराम जी की एक घटना दी है जो मुझे अत्यन्त प्ररेणाप्रद लगती है। वीरवर लेखराम के बलिदान से एक वर्ष पूर्व की बात है। पण्डितजी करनाल पधारे। वहाँ से दिल्ली गये। उनके साथ एक आर्य सज्जन भी गये। साथ जानेवाले महाशय का नाम श्रीमान् लाला बनवारी लालजी आर्य था। वे पण्डितजी के बड़े भक्त थे।

पण्डितजी दिल्ली में एक दुकान से दूसरी और दूसरी से तीसरी पर जाते। एक बाज़ार से दूसरे में जाते। एक पुस्तक की खोज में प्रातःकाल से वे लगे हुए थे। उन दिनों रिज़्शा, स्कूटर, टैज़्सियाँ तो थीं नहीं। वह युग पैदल चलनेवालों का युग था।

पण्डित लेखराम सारा दिन पैदल ही इस कार्य में घूमते रहे। कहाँ खाना और कहाँ पीना, सब-कुछ भूल गये।

साथी ने कहा-‘‘पण्डितजी ऐसी कौन-सी आवश्यक पुस्तक है, जिसके लिए आप इतने परेशान हो रहे हैं? प्रभात से रात होने को है।’’

पण्डितजी ने कहा-‘‘मिर्ज़ा गुलाम अहमद कादियानी ने आर्यजाति पर एक वार किया है। उनके उज़र में मैंने एक पुस्तक लिखी है। उसमें इस पुस्तक का प्रमाण देना है। यह पुस्तक मुसलमानी

मत की एक प्रामाणिक पुस्तक है। प्रमाण तो मुझे कण्ठस्त है फिर भी इसका मेरे पास होना आवश्यक है। इसमें इस्लाम के मसला ‘लफ़ हरीरी’ का विस्तार से वर्णन है। यह मसला शिया मुलसमानों के ‘मुता’ से भी कुछ आगे है।

अन्त में पण्डितजी को एक बड़ी दुकान से वह पुस्तक मिल गई। कुछ और पुस्तकें भी पसन्द आईं। वे भी ले-लीं। इन सब पुस्तकों का मूल्य पन्द्रह रुपये बनता था। पण्डितजी जब यह राशि

देने लगे तो दुकानदार को यह विचार आया कि ऐसी पुस्तकें कोई साधारण व्यक्ति तो क्रय नहीं करता। यह ग्राहक कोई नामी स्कालर ही हो सकता है।

दुकानदार संयोग से एक आर्यपुरुष था। उसने पैसों की ओर हाथ बढ़ाने की बजाए ग्राहक से यह प्रश्न कर दिया कि आपका शुभ नाम ज़्या है? आप कौन हैं?

इससे पूर्व कि रक्तसाक्षी वीरवर लेखराम बोलते, उनके साथी ने एकदम कहा-‘‘आप हैं धर्मरक्षक, जातिरक्षक आर्यपथिक पण्डित लेखरामजी।’’

यह सुनते ही दुकानदार ने पण्डितजी को नमस्ते की। उसने प्रथम बार ही वीरजी के दर्शन किये थे। पैसे लेने से इन्कार कर दिया।

इस घटना के दो पहलू हैं। पण्डितजी की लगन देखिए कि धर्म-रक्षा के लिए पैदल चलते-चलते प्रभात से रात कर दी और उस प्रतिष्ठित आर्य चरणानुरागी महाशय बनवारी लालजी की धुन का भी मूल्यांकन कीजिए जो अपने धर्माचार्य के साथ दीवाना बनकर घूम रहा है। इस घटना का एक दूसरा पहलू भी है। पण्डितजी को 25-30 रुपया मासिक दक्षिणा मिलती थी। अपनी मासिक आय का आधा या आधे से भी अधिक धर्मरक्षा में लगा देना कितना बड़ा त्याग है। कहना सरल है, परन्तु करना अति कठिन है। पाठकवृन्द उस दुकानदार के धर्मानुराग को भी हम भूल नहीं सकते जिसने पण्डितजी से अपनी प्रथम भेंट में ही यह कह दिया कि मैं पन्द्रह रुपये नहीं

लूँगा। आप कौन-सा किसी निजी धन्धे में लगे हैं। यह आर्यधर्म की रक्षा का प्रश्न है, यह हिन्दूजाति की रक्षा का प्रश्न है।

ज़्या आप जानते हैं कि वह दुकानदार कौन था? उसका नाम था श्री बाबू दुर्गाप्रसादजी। आर्यों! आइए! अपने अतीत को वर्तमान करके दिखा दें। तब के रुपये का मूल्य ज़्या था?