Category Archives: हिन्दी

हदीस : माफ़ी और मुनाफ़ा

माफ़ी और मुनाफ़ा

ज़कात से माफी देने की एक निचली मर्यादा-रेखा थी। ”खजूर या अनाज के पांच वस्कों (1 वस्क = लगभग 425 पौंड) तक, पांच से कम ऊंटों तक और 5 उकिया से कम चांदी तक (1 उकिया = लगभग 10 तोला या 1/4 पौंड) कोई सद़का (ज़कात) देय नहीं है“ (2134)। साथ ही, ”एक मुसलमान से उसके गुलाम या घोड़े पर कोई सद़का नहीं लिया जाता“ (2184)। जिहाद के लिए इस्तेमाल होने वाले घोड़ों पर कोई ज़कात नहीं थी। ”जिहाद में सवारी के काम आने वाला घोड़ा ज़कात के भुगतान से मुक्त होता है“ (टि0 1313)।

author : ram swarup

मैं दुःखी क्यों हूँ?

मैं दुःखी क्यों हूँ?

प्रस्तुत समपादकीय प्रो. धर्मवीर जी के द्वारा उनके निधन से पूर्व लिखा गया था। ये लेख अधूरा है, अगर पूरा होता तो स्वयं एक जीवन-शास्त्र होता। पर जितना भी है, उतना ही उपयोगी है, सारगर्भित है। इस लेख में आचार्य जी ने जीवन जीने की आदर्श शैली की ओर संकेत किया है। इससे पाठकों को अवश्य लाभ मिलेगा।

-समपादक

मुझे लगता है कि संसार में सबसे दुःखी व्यक्ति मैं ही हूँ। सब मुझे सदा दुःख ही देते रहते हैं। भगवान् भी मुझे दुःख ही देता है। मैं अपने माता-पिता से दुःखी हूँ, मुझे लगता है कि घर में मुझसे पक्षपात् होता है और सबकी सुनी जाती है, सबकी इच्छाएँ पूरी होती हैं। मुझे इच्छा करना ही अपराध लगने लगा है। मैं अच्छा करता हूँ, पूरा करने का प्रयत्न भी करता हूँ, पर पूरा न होने पर एक दुःख और अपने दुःख में जोड़ लेता हूँ। इच्छा पूरी न होने का एक दुःख था, उसमें असफलता का दुःख और जोड़ लिया। क्या संसार में मैं दुःख पाने के लिये ही आया हूँ?

मुझे लगता है कि संसार में मेरे चारों ओर मुझे दुःख देने वाले एकत्र हो गये हैं। मुझे लगता है ये लोग गलत हैं, ठीक नहीं हैं। ये सुधर जायें तो सब ठीक हो सकता है। ये बच्चे सुधर जाते तो सब ठीक हो जाता, परन्तु इनको मेरी बात समझ में ही नहीं आती। समझा-समझा कर दुःखी हो गया हूँ। पत्नी है कि सुनती नहीं है, बच्चों को बिगाड़ दिया है। मैं जो कहता हूँ उसका उल्टा करती है, बच्चों को उल्टा सिखाती है। मेरा पड़ौसी नालायक है, गन्दा है, कोई अच्छी आदत ही उसमें नहीं है। गन्दा रहता है, गन्दगी करता है, शराब पीता, गालियाँ देता है, समझाने पर भी समझता नहीं है। मेरे कार्यालय में मेरे साथी चापलूस और कामचोर हैं, अधिकारी रिश्वतखोर, पक्षपाती हैं। संसार में जिधर देखता हूँ, सब बिगाड़-ही-बिगाड़ है। उससे मैं बहुत दुःखी हो गया हूँ।

मुझे लगता है कि लोग मन्दिर जाते हैं, सत्संग करते हैं, प्रवचन सुनते हैं, क्या इनसे दुःख दूर होता है? यदि ऐसा करने से दुःख दूर होता है तो सारे मन्दिर जाने वाले सुखी हो जाते। सारे प्रवचन करने वाले क्या सुखी हैं? सत्संग में सुख होता तो सभी सत्संग करके सुखी हो चुके होते, परन्तु ऐसा लगता नहीं। फिर सोचता हूँ कि यदि इन सबसे सुख नहीं मिलता, तो इतने लोग सुख प्राप्त करने के लिये यहाँ की ओर क्यों दौड़ रहे हैं? सुनने में आता है कि सत्संग सुनकर डाकू सय मनुष्य बन गया, अंगुलीमाल डाकू भगवान् बुद्ध का भक्त बन गया। ये ठीक है, सब तो नहीं सुखी होते, परन्तु कुछ तो सुखी होते देखे जाते हैं। जैसे खेत में डाले गये सारे बीज नहीं उगते। कोई पत्थर पर गिरकर पड़ा सड़ जाता है। किसी को पक्षी खा लेता है, तो कोई कीड़े से नष्ट कर दिया जाता है, कोई उगकर पशु-पक्षियों द्वारा खा लिया जाता है, फिर भी खेती की जाती है और उसी से भूखे मनुष्यों को भोजन मिलता है। लगता है सत्संग की खेती का भी यही हाल है, जो बीज उर्वरा भूमि में गिर जाता है, उसमें बीज पौधा बनकर फल देने लगता है। प्रवचनकर्त्ता सभवतः यही उपदेश कर रहे थे कि दुःख दूर करने का सत्संग ही एक उपाय है।

संसार में दुःख है, लोग इसे दूर भी करना चाहते हैं तो इसका उपाय भी निश्चित होगा। सत्संग में दुःख दूर करने का उपाय बताते हुए यही तो कहा जा रहा था। दुःखी हम इसलिये हैं कि हम अपने से बाहर की वस्तुओं को दुःख का कारण समझ रहे हैं। जब तक मैं दूसरों को दुःख का कारण समझूँगा, तब तक मेरे दुःखों से मुझे छुटकारा नहीं मिलेगा, क्योंकि दुःख का कारण मेरे अन्दर  है। जिन बातों से, जिन वस्तुओं से, जिन व्यक्तियों से मैं दुःखी हूँ, उसका कारण है कि मैं उनसे असन्तुष्ट हूँ। मेरे असन्तोष का मूल मेरी उनसे अपेक्षा है, मैंने सबसे अपेक्षा पाल रखी है। जब मेरी इच्छा पूरी नहीं होती तो मेरे अन्दर असन्तोष जन्म लेने लगता है। यह असन्तोष ही मेरे दुःख का कारण है।

मेरे दुःख का दूसरा कारण है कि मैं सब व्यक्तियों को सुधारना चाहता हूँ। सभी वस्तुओं को अपने अनुकूल बनाना चाहता हूँ। ऐसा करना मेरे सामर्थ्य से परे है। मेरे लिये समभव नहीं है। मैं जिसे सुधारने का यत्न करता हूँ और जिसे मैं सुधार नहीं सकता, उन दोनों में अन्तर होता है। जिसे मैं पहले से सुधारने योग्य नहीं मानता, उनसे मैं दुःखी नहीं होता, उन्हें वैसा ही मानकर व्यवहार करता हूँ, जिनको सुधारने की इच्छा करता हूँ, उनके लिये प्रयत्न करता हूँ, फिर असफल होने पर दुःखी होता हूँ। सुधार का प्रयत्न करना अच्छी बात है, परन्तु असफलता पर दुःखी होना बुरी बात है, जब कोई नहीं सुधरता तो उसको भी उपेक्षा की कोटि में डाल दिया जाए, तो मेरा दुःख दूर हो सकता है।

मैंने दुःखों के नाम रख दिये हैं। ये सास है, ये बहू है, ये देवरानी या जेठानी है, इन नामों से दुःख लगने लगता है, यथार्थ तो यह है कि दुःख व्यवहार में है, संज्ञा में नहीं। दुःख तो बेटे-बेटी से भी होता है। माता-पिता, भाई से भी होता है। संसार में रक्त-समबन्ध को सुख का कारण तथा दूर को दुःख का कारण मानते हैं, परन्तु यथार्थ में जितना दुःख समबन्धियों में, सगे भाइयों में होता है, उतना दुःख किसी और से नहीं मिलता। जितने झगड़े, लड़ाई, मुकद्दमें भाइयों में परस्पर होते हैं, उतने दूसरों से तो नहीं होते। फिर दुःख का कारण व्यक्ति नहीं, विचार है। विचार ठीक न होने की दशा में कोई भी दुःख का कारण बन सकता है, परन्तु मैंने मान लिया कि सास दुःख ही देगी, बहु विरोध ही करेगी।

जिनको मैं बदल नहीं सकता, जिन्हें मैं छोड़ भी नहीं सकता, क्या उनसे लड़ाई, झगड़ा, तनाव करके मैं सुखी रह सकता हूँ? कदापि नहीं। फिर मैं क्या करूँ, जिससे मेरा दुःख दूर हो? इसलिये उनसे मेरा व्यवहार निष्पक्षता का हो, उदासीनता का हो। ………

– धर्मवीर

 

यहां ‘तहर्रुश गेमिया’ खेल के नाम पर लड़कियों से किया जाता है गैंग रेप

यहां ‘तहर्रुश गेमिया’ खेल के नाम पर लड़कियों से किया जाता है गैंग रेप

अरब देशों में ‘तहर्रुश गेमिया’ नाम का एक खेल खेला जाता है। इस खेल का नाम सुनते ही यह सामान्य बच्चों के खेल की तरह ही लगता है लेकिन इस खेल की पीछे की हकीकत हैरान करने वाली है।

यहां 'तहर्रुश गेमिया' खेल के नाम पर लड़कियों से किया जाता है गैंग रेप - India TV

परंपरा के नाम पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न सदियों से चला आ रहा है। आज के मॉडर्न समाज में भी कुछ ऐसे देश हैं जहां धर्म और परंपरा के नाम पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीडन हो रहा है। अरब जैसे कुछ देश ऐसे हैं जहां आज भी यह सब कुछ होता है। अरब देशों में ‘तहर्रुश गेमिया’ नाम का एक खेल खेला जाता है। इस खेल का नाम सुनते ही यह सामान्य बच्चों के खेल की तरह ही लगता है लेकिन इस खेल की पीछे की हकीकत हैरान करने वाली है। सार्वजनिक स्थलों पर खेले जाने वाले इस खेल में एक अकेली लड़की के साथ बाक़ायदा सामूहिक बलात्कार किया जाता है। ये एक ऐसी घिनौना परंपरा है जो अरब देशों से निकलर यूरोप में भी पैर पसार रही है।

क्या है ‘तहर्रुश गेमिया’?
‘तहर्रुश गेमिया’ अरबी शब्द है जिसका मतलब होता है ‘संयुक्त रुप से छेड़छाड़’। इस खेल में युवा सार्वजनिक स्थान पर अकेली लड़की को निशाना बनाते हैं। झुंड में ये लड़के या तो लड़की के साथ शारीरिक रुप से छेड़छाड़ करते हैं या फिर उसका बलात्कार करते हैं।

कैसे खेला जाता है ‘तहर्रुश गेमिया’?
सबसे पहले लड़के एक घेरा बनाकर अकेली लड़की को घेर लेते हैं फिर अंदर वाले घेरे में मौजूद लड़के लड़की का यौन शोषण करते हैं जबकि बाहरी घेरे वाले लड़के भीड़ को दूर रखते हैं।

ख़ौफ़नाक ‘तहर्रुश गेमिया’,की रिपोर्टर भी हुई थी शिकार

2011 में मिस्र में पहली बार ये घिनौना खेल देखा गया था। साउथ अफ़्रीका की रिपोर्टर लारा लोगन काहिरा के तहरीर स्क्वैयर से रिपोर्टिंग कर रही थी तभी लड़को के एक झुंड ने उन्हें घेर लिया और उनसे छेड़छाड़ की। लारा ने इस घटना के काफी बाद बताया हुए कहा था , “अचानक इसके पहले कि मुझे कुछ समझ में आए कुछ लोगों ने मुझे घेर लिया और मेरे शरीर पर जगह जगह छूने लगे। वो एक-दो नही की सारे थे। ये ऐसा सिलसिला था जो लगातार चल रहा था।

‘तहर्रुश गेमिया’ चला अरब से यूरोप की ओर
ये अमानवीय केल अब यूरोप में जड़े जमाने लगा है। नये साल पर जर्मनी में कई जगह ऐसी घटनाओं के होनी की ख़बर मिली है। बताया जाता है कि ये लोग जर्मनी के नहीं किसी अन्य देश के थे। पुलिस को अंदेशा है कि ये ‘तहर्रुश गेमिया’ ही था जो अब यहां भी शुरु होगया है। ये एक धटना कोलोन की है जहां भीड़ पर पहले पटाखे छोड़े गये फिर नशे में धुत्त अरब या उत्तरी अफ़्रीकी लोगों ने महिलाओं के साथ बदतमीज़ी की। आश्चर्य की हात ये है कि पुलिस मूकदर्शक बनकर तमाशा देखती रही। उसका कहना है कि भीड़ को संभालने के लिये पुलिस बल नाकाफी था। देखें किस तरह खेला जाता है ये खेल

source :  http://www.khabarindiatv.com/world/around-the-world-gang-rape-is-done-by-girls-in-the-name-of-taharrush-gamea-game-520425

नोट : यह खेल  भारत में भी धीरे धीरे अपनी पैर  जमा  रहा है | कर्णाटक के बंगलोर में यह एक बार खेली जा चुकी है | हो सकता  है कहीं  और भी भारत  में खेली गयी हो जिस बारे में हमें  ना मालुम हो |

हदीस : ज़कात-कोष का उपयोग

ज़कात-कोष का उपयोग

कुरान के अनुसार ज़कात-कोष उन लोगों के लिए है जो ”गरीब और मोहताज“ (फुकरा और मसकीन) हों, जो बँधुआ और कर्जदार हो, और जो राह चलते मुसाफिर हों।“ ये सब दान के परम्परागत पात्र हैं। इस कोष का उपयोग ”अल्लाह की सेवा“ (फीसबी लिल्लाह) और इस्लाम के वास्ते ”दिल जीतने (या अनुकूल बनाने अथवा झुकाव बढ़ाने) के लिए (मुअल्लफा कुलूबुहुम)“ भी किया जाता है (कुरान 960)।

 

इस्लाम की मज़हबी शब्दावली में, पहले मुहावरे अर्थात ”अल्लाह के रास्ते में या सेवा में“ का अर्थ है मज़हबी युद्ध या जिहाद। ज़कात-कोष को हथियार, सैनिक उपकरण और घोड़े खरीदने में खर्च किया जाता है। दूसरे मुहावरे अर्थात् ”दिल जीतने अथवा अपनी तरफ झुकाने“ का अलंकार-रहित अर्थ है ”घूस देना“। मतान्तरित नये लोगों के ईमान को उदार ”भेंटों“ की मदद से पक्का करना चाहिए और विरोधियों के ईमान को इसी माध्यम से उखाड़ना चाहिए। पैगम्बर के मज़हबी अभियान और उनकी कूटनीति का यह एक महत्त्वपूर्ण अंग था और, जैसा कि कुरान की आयतें बतलाती हैं, इसके लिए पैगम्बर को वह दैवी स्वीकृति प्राप्त थी, जिसका दावा उनके अनुयायी आज भी करते हैं।

author : ram swarup

 

योग

योग

– डॉ. जगदेव विद्यालंकार

‘योगश्चित्तवृत्ति निरोधः’ योग दर्शन के अनुसार चित्त की वृत्तियों को रोकना ही योग कहलाता है। आयन्तर इन्द्रिय अर्थात् बुद्धि की उस स्थिरता को योग कहते हैं, जिसमें वह चेष्टा नहीं करती, उस अवस्था में परमात्मा में स्थिति होती है, इसलिए अगले सूत्र में कहा- ‘तदा द्रष्टुःस्वरूपेऽवस्थानम्’जब सर्ववृत्तियों का निरोध होकर चित्त अपनी कारण प्रकृति में लीन हो जाता है, उस अवस्था में वह अपने चेतन-स्वरूप से परमात्मा के आनन्द को भोगता हुआ उसी में स्थिर होता है। यही जीव का अन्तिम और चरम लक्ष्य है, इसी को मोक्ष कहते हैं।

प्रयत्न करना जीव का स्वभाव है। जब तक मोक्ष प्राप्त नहीं होता, तब तक मनुष्य प्रयत्नशील रहता है। प्रयत्न भी शुभ कर्मों के लिये होना चाहिए। मनुष्य अशुभ कर्मों को छोड़कर शुभ कर्मों में जब-जब और जितना-जितना प्रवृत्त होता है, उतना ही वह मोक्ष-मार्ग पर आगे बढ़ता है अर्थात् सकाम-कर्म को छोड़कर निष्काम कर्म में मनुष्य जितना प्रवृत्त होता है, उतना ही वह मोक्ष प्राप्ति के निकट पहुँचता है।

मानव की आध्यात्मिक उन्नति तो पूर्ण रूप से योगसाधना पर आधारित है ही, भौतिक उन्नति में भी योगसाधना की आवश्यकता है। भौतिक-जीवन में भी योगायास से शान्ति मिलती है। योग के द्वारा मनुष्य भौतिकता और आध्यात्मिकता में सामंजस्य स्थापित कर सकता है।

महर्षि पतञ्जलि ने योग में सफलता प्राप्त करने के लिए योग के आठ अंगों का विधान किया है, जो निम्न प्रकार से हैं-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।

यम पाँच प्रकार के होते हैं

  1. अहिंसा-मन, वाणी और शरीर से कभी भी किसी को भी दुःख न देने का नाम अहिंसा है।
  2. सत्य-यथार्थ भाषण अर्थात् जैसा देखा वा अनुमान किया अथवा सुना, उसको वैसा ही कथन करने का नाम सत्य है।
  3. अस्तेय-चोरी न करना अर्थात् छल, कपट, ताड़नादि किसी प्रकार से भी अन्य पुरुष के धन को ग्रहण न करने का नाम अस्तेय है।
  4. ब्रह्मचर्य-सर्व इन्द्रियों के निरोधपूर्वक उपस्थ इन्द्रिय के निरोध का नाम ब्रह्मचर्य है।
  5. अपरिग्रह-दोष-दृष्टि से विषयों के परित्याग का नाम अपरिग्रह है।

नियम भी पांच प्रकार के होते हैं

  1. शौच- यह दो प्रकार का है-

– बाह्य-शौच-जल अथवा मिट्टी आदि से शरीर के और हित, मित तथा मेध्य अर्थात् पवित्र भोजन आदि से उदर के प्रक्षालन का नाम बाह्य शौच है।

– आयन्तर-शौच-मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा आदि भावनाओं से ईर्ष्या-द्वेष आदि चित्त के मलों के प्रक्षालन का नाम आयन्तर शौच है।

  1. सन्तोष-जो भोग के उपयोगी साधन अपने पास विद्यमान हैं, उनसे अधिक उपयोगी साधनों की लालसा न करना सन्तोष है।
  2. तप-सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी, लाभ-हानि, मान-अपमान आदि द्वन्द्वों को सहने और हितकर तथा परिमित आहार करना ही तप कहलाता है।
  3. स्वाध्याय-ओंकारादि ईश्वर के पवित्र नामों का जप और वेद, उपनिषद्, वेदांग, उपांग, आदि शास्त्रों के अध्ययन का नाम स्वाध्याय है।
  4. ईश्वर-प्रणिधान-फल की इच्छा छोड़कर केवल ईश्वर की प्रसन्नता के लिए वेदविहित कर्मों के करने को ईश्वर-प्रणिधान कहते हैं।
  5. आसन- ‘स्थिरसुखमासनम्’स्थिर तथा सुखदाई स्थिति का नाम आसन है। योगी सिद्धासन, पद्मासन, वीरासन, भद्रासन, स्वस्तिकासन आदि जिस आसन में सुख से बैठकर ईश्वर का ध्यान लगा सके, वही आसन उचित है। आसन के सिद्ध हो जाने पर योगी को सर्दी-गर्मी आदि द्वन्द्व नहीं सताते।
  6. प्राणायाम- महर्षि मनु ने अपनी ‘मनुस्मृति’ में प्राणायाम की महिमा का वर्णन करते हुए लिखा है-

‘‘दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनांहि यथा मलाः।

तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात्?’’

– 6.71

अर्थात् जैसे अग्नि में तपाने और गलाने से धातुओं के मल नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही प्राणों के निग्रह से मन आदि इन्द्रियों के दोष भस्मीभूत हो जाते हैं। पतञ्जलि मुनि ने प्राणायाम का लक्षण बताते हुए लिखा है ‘तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः’ अर्थात् आसन की सिद्धि होने पर श्वास-प्रश्वास की गति के  अभाव का नाम प्राणायाम है। उन्होंने प्राणायाम के चार प्रकार बतलाये।

  1. बाह्यवृत्ति- जिस प्राणायाम में प्रश्वासपूर्वक प्राणगति का अभाव होता है, उसका नाम बाह्यवृत्ति है, इसे रेचका भी कहते हैं, क्योंकि इसमें प्राणवायु को बाहर ही रोका जाता है।
  2. आयन्तरवृत्ति- जिस प्राणायाम में श्वासपूर्वक प्राणगति का अभाव होता है, उसका नाम आयन्तरवृत्ति है, इसे पूरक भी कहते हैं, क्योंकि उसमें प्राणवायु को भीतर ही रोका जाता है।
  3. स्तभवृत्ति- जिस प्राणायाम में श्वासप्रश्वासपूर्वक प्राणगति का अभाव होता है उसका नाम स्तभवृत्ति है, इसे कुभक भी कहते हैं, क्योंकि इसमें कुभस्थ जल की भांति देह के भीतर निश्चलतापूर्वक प्राण की स्थिति होती है। इसमें जहाँ का तहाँ प्राण को रोका जाता है।
  4. बाह्यायन्तर विषयाक्षेपी- इसमें प्राण की स्वाभाविक गति को विपरीत दिशा में बलपूर्वक धकेला जाता है। अर्थात् यदि प्राण बाहर आ रहा है तो भीतर की ओर तथा भीतर जा रहा है तो बाहर की ओर धकेला जाता है।

प्राणायाम के लाभ

1– प्राणायाम से आयु की वृद्धि होती है।

2– प्राणायाम से शारीरिक और मानसिक उन्नति होती है।

3– प्राणायाम से रोग दूर होते हैं।

4– प्राणायाम से कुत्सित मनोवृत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं।

5– प्राणायाम से चित्त का मल दूर होकर ज्ञान बढ़ता है।

6– प्राणायाम से प्राण वश में होने से इन्द्रियाँ और मन भी वश में हो जाते हैं।

7– प्राणायाम से धातुओं की पुष्टि होती है।

8– प्राणायाम से हृदय पर पड़े तम के आवरण का नाश होता है।

  1. प्रत्याहार- ‘स्वविषयासंप्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः’।

अर्थात् अपने-अपने विषयों के साथ समबन्ध न होने के कारण इन्द्रियों की चित्तस्थिति के समान स्थिति का नाम प्रत्याहार है। इन्द्रियों का बाह्य विषयों में जाना सहज स्वभाव है, उस सहज स्वभाव के विपरीत अन्तर्मुख होने को प्रत्याहार कहते हैं।

  1. धारणा- ‘देशबन्धश्चित्तस्य धारणा’।

अर्थात् चित्त का देश-विशेष (शरीर के नासिकाग्र, जिह्वाग्र, हृदयकमल आदि अंग-विशेष) में स्थिर करना धारणा कहलाता है।

  1. ध्यान- ‘तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्’।

अर्थात् धारणा के अनन्तर ध्येय पदार्थ में होने वाली चित्तवृत्ति की एकतानता को ध्यान कहते हैं।

  1. समाधि- ‘तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशुन्यमिव समाधिः।

अर्थात् अपने ध्यानात्मक रूप से रहित केवल ध्येय रूप से प्रतीत होने वाले उक्त ध्यान का ही नाम समाधि है। चित्त की जिस एकाग्र अवस्था में ध्याता, ध्यान, ध्येयरूप त्रिपुटि का भान होता है, उसको ध्यान और केवल ध्येय के भान को समाधि कहते हैं।

उपर्युक्त अष्टांगयोग से योगियों की तो उन्नति होती ही है, सांसारिक मनुष्यों को भी इससे जीवन में बहुत लाभ होता है।

हदीस : दानार्थ कर (ज़कात)

दानार्थ कर (ज़कात)

पांचवी किताब ”अल-जकात“ (दान अथवा दानार्थ कर) के विषय में है। प्रत्येक समाज अपने दीन-हीन भाइयों के प्रति दयाभाव का उपदेश देता है और कुछ हद तक वैसा व्यवहार भी करता है। दान अथवा ज़कात एक पुरानी अरब परम्परा थी। किन्तु मुहम्म्द ने उस को एक ऐसे कर का रूप दे दिया जो उदीयमान मुस्लिम राज्य को देना मुसलमानों के लिए अनिवार्य बन गया। उस कर को राजकीय प्रतिनिधि ही खर्च कर सकते थे। इस रूप में ज़कात दाताओं के लिए एक भार बन गया। इसके सिवाय राजकीय प्रतिनिधि इस का उपयोग अपनी सत्ता और महत्ता के लिए करने लगे।

 

”जकात की किताब“ का बहुलांश सत्ता के मुद्दे से सम्बन्धित है। शुरू में मुहम्मद के साथियों में अनेक ऐसे थे जो जरूरतमन्द थे। उनमें से अधिकतर अपने घर छोड़ कर आए थे और मदीना-निवासियों के सद्भाव और दानशीलता पर निर्भर थे। दान के विषय में जो वाग्मिता मिलती है, वह इसी स्थिति से निष्पन्न हुई थी। अभी तक इस दीन-दुःखी लोगों को लेकर किसी व्यापक और सार्वभौम भाईचारे की भावना नहीं पनपी थी। किसी विशाल-तर मानवीय भाईचारे का भाव भी नहीं था। ज़कात केवल अपने हम-मजहब भाइयों के लिए विहित थी। अन्य सब लोगों को इसकी परिधि से परे रक्खा गया। तब से लेकर अब तक ज़कात का रूप यही रहा है।

author : ram swarup

स्वामी रामदेव जी नौ प्राणायाम, भस्रिका, कपालभाति, अनुलोम-विलोम आदि बताते हैं। लेकिन स्वामी दयानन्द जी ने न तो इनका वर्णन सत्यार्थ प्रकाश में किया है, न ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में। उन्होंने रेचक, पूरक व कुभक का वर्णन किया है कि इनको कम से कम तीन बार व अधिक से अधिक 21 बार या जितनी अपनी क्षमता हो उतनी बार करें। इनमें कोन सी विधि ठीक है,

जिज्ञासामाननीय, स्वामी रामदेव जी नौ प्राणायाम, भस्रिका, कपालभाति, अनुलोम-विलोम आदि बताते हैं। लेकिन स्वामी दयानन्द जी ने न तो इनका वर्णन सत्यार्थ प्रकाश में किया है, न ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में। उन्होंने रेचक, पूरक व कुभक का वर्णन किया है कि इनको कम से कम तीन बार व अधिक से अधिक 21 बार या जितनी अपनी क्षमता हो उतनी बार करें। इनमें कोन सी विधि ठीक है, स्वामी रामदेवजी वाली या स्वामी दयानन्दजी वाली। कृपया हमारा मार्गदर्शन करें। धन्यवाद

– तेजवीर सिंह, ए-1, जैन पार्क, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059

 

समाधानप्राणायाम परमेश्वर प्राप्ति के साधन अष्टाङ्ग योग का चौथा अङ्ग हैं। योग अंगों में सभी अंग महत्त्वपूर्ण है, सभी अंगों की महत्ता है। प्राणायाम की भी अपनी महत्ता है। प्राणायाम का महत्त्व प्रकट करते हुए महर्षि पतञ्जलि योग-दर्शन में लिखते हैं ‘‘ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्’’ अर्थात् विधिपूर्वक योग-दर्शन में बताए प्राणायाम का निरन्तर अनुष्ठान करने से आत्मा-परमात्मा के ज्ञान को ढकने वाला आवरण जो अविद्या है वह नित्यप्रति नष्ट होता जाता है, और ज्ञान का प्रकाश बढ़ता जाता है। और भी योग-दर्शन में मन को प्रसन्न रखने वाले उपायों में प्राणायाम को भी महत्त्वपूर्ण कहा है। महर्षि ने सूत्र लिखा ‘‘प्रच्छर्दनविधारणायां वा प्राणस्य’’ (यो. 1.34) ‘‘जैसे भोजन के पीछे किसी प्रकार का वमन हो जाता है, वैसे ही भीतर के वायु को बाहर निकाल के सुखपूर्वक जितना बन सके उतना बाहर ही रोक दे। पुनः धीरे-धीरे लेके पुनरपि ऐसे ही करें। इसी प्रकार बारबार अभयास करने से प्राण उपासक के वश में हो जाता है और प्राण के स्थिर होने से मन, मन के स्थिर होने से आत्मा भी स्थिर हो जाता है। इन तीनों के स्थिर होने के समय अपने आत्मा के बीच में जो आनन्दस्वरूप अन्तर्यामी व्यापक परमेश्वर है, उसके स्वरूप में स्थिर हो जाना चाहिए।’’ (ऋ.भा.भू.)

इन ऋषि-वचनों से ज्ञात हो रहा है कि प्राणायाम हमारे मन को स्थिर व प्रसन्न करने में अति सहायक है। महर्षि दयानन्द व योग-शास्त्र के प्रणेता महर्षि पतञ्जलि ने योग में सहायक चार प्राणायामों को ही स्वीकार किया है। महर्षि दयानन्द ने इन चारों प्राणायामों की चर्चा सत्यार्थप्रकाश के तीसरे समुल्लास व ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका की उपासना विषय में विस्तार से की है।

प्राणायाम का अर्थ क्या है, प्राणायाम-प्राण+आयाम इन दो शबदों से मिलकर बना है। प्राण की लमबाई, विस्तार, फैलाव, नियमन का नाम प्राणायाम है। प्राणायाम में प्राण का विस्तार किया जाता है, लमबे समय तक प्राण को रोका जाता है, ऐसी क्रिया जिसमें हो उसे प्राणायाम कहते हैं। ऐसी स्थिति में इन चार प्राणायाम में ही जो कि ऋषि प्रणीत है, प्राणायाम सिद्ध होते हैं। और भी-‘बाह्यस्य वायोराचमनं श्वासः’– बाह्य वायु का आचमन करना अर्थात् भीतर लेना ‘श्वास’ तथा ‘कौष्ठस्य वायोः निस्सारणं प्रश्वासः’-कोष्ठ के भीतर की वायु को बाहर निकालना ‘प्रश्वास’ है। इन दोनों की स्वाभाविक गति में विच्छेद-रुकावट डाल देना प्राणायाम कहाता है। श्वास-प्रश्वास नियमित रूप में बिना व्यवधान के चलते रहते हैं। प्राण अर्थात् श्वास-प्रश्वास की क्रिया की समाप्ति तो जीवन की समाप्ति है, अतः श्वास-प्रश्वास की गति को सर्वथा नहीं रोका जा सकता, उसमें अन्तर डाला जा सकता है। इस क्रिया से श्वास-प्रश्वास (प्राण) बन्द न होकर उसका आयाम-विस्तार होता है।

महर्षि दयानन्द सत्यार्थप्रकाश में योग के चार प्राणायामों की विधि व उसके लाभ लिखते हैं-‘‘जैसे अत्यन्त वेग से वमन होकर अन्न जल बाहर निकल जाता है, वैसे प्राण से को बल से बाहर फेंक के बाहर ही यथाशक्ति रोक देवे। जब बाहर निकालना चाहे, तब मूलेन्द्रिय को ऊपर खींच के वायु को बाहर फेंक दे। तब तक मूलेन्द्रिय को खींचे रक्खे, जब तक प्राण बाहर ही रहता है। इस प्रकार प्राण बाहर अधिक ठहर सकता है। जब घबराहट हो तब धीरे-धीरे वायु भीतर को ले के फिर वैसा ही करते जायें। जितना सामर्थ्य और इच्छा हो। और मन (ओ3म) इसका जप करता जाय। इस प्रकार करने से आत्मा और मन की पवित्रता और स्थिरता होती है। एक ‘बाह्य’ अर्थात् बाहर ही अधिक रोकना। दूसरा ‘आयन्तर’ अर्थात् भीतर जीतना प्राण रोका जाय, उतना रोके। तीसरा ‘स्तभवृत्ति’ अर्थात् एक ही बार जहां का तहां प्राण को यथाशक्ति रोक देना। चौथा ‘बाह्यायन्तराक्षेपी’ अर्थात् जब प्राण भीतर से बाहर निकलने लगे तब उसके विरुद्ध उसको न निकलने देने के लिए बाहर से भीतर ले और बाहर से भीतर आने लगे तब भीतर से बाहर की ओर प्राण को धक्का देकर रोकता जाय। ऐसे एक दूसरे के विरुद्ध क्रिया करें तो दोनों की गति रुक कर प्राण अपने वश में होने से मन और इन्द्रियां भी स्वाधीन होते हैं। बल, पुरुषार्थ बढ़कर बुद्धि तीव्र, सूक्ष्मरूप हो जाती है कि जो बहुत कठिन और सूक्ष्म विषय को भी शीघ्र ग्रहण करती है। इससे मनुष्य शरीर में वीर्य-वृद्धि को प्राप्त होकर स्थिर बल, पराक्रम, जितेन्द्रियता, सब शास्त्रों को थोड़े ही काल में समझकर उपस्थित कर लेगा।’’ (स.प्र.3)

यहाँ महर्षि ने मानसिक व शारीरिक जो लाभ लिखे हैं वे इन चार प्राणायामों से ही माने हैं। ऋषियों द्वारा बनाई व बताई गई प्रत्येक क्रिया व बातें मनुष्य के लिए कल्याणकारी ही सिद्ध होती हैं।

योग-सिद्धि के लिए तो योगदर्शन में वर्णित प्राणायाम का विधान ऋषि ने किया है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए स्वामी रामदेव जी द्वारा बताई गई विधि भी कर सकते हैं।