hadees : PILGRIMAGE

PILGRIMAGE

The book on hajj (�setting out�) is full of ceremonial details which have little interest for non-Muslims.  Its ninety-two chapters contain minute instructions on the rites and rituals of the pilgrimage, providing useful guidance to a hajji (pilgrim) but of dubious value to a traveler of the Spirit.

author : ram swarup

हदीस : ज़कात मुहम्मद के परिवार के लिए नहीं

ज़कात मुहम्मद के परिवार के लिए नहीं

ज़कात का मकसद था मिल्लत के जरूरतमन्दों की मदद। पर मुहम्मद के परिवार को उसे स्वीकार करना मना था। परिवार में अली, जाफ़र, अकील, अब्बास और हरिस बिन अब्द अल-मुतालिब तथा उनकी संतानें शामिल थीं। पैगम्बर ने कहा था-”हमारे लिए सदका निषिद्ध है“ (2340)। दान लेना दूसरों के लिए बहुत अच्छा था, पर मुहम्मद के गौरवमंडित वंशजों के लिए नहीं। यों भी दान लेने की जरूरत उन लोगों के लिए तो कम से कमतर ही होती जा रही थी, क्योंकि वे विस्तार पा रहे अरब साम्राज्यवाद के वारिस थे।

 

यद्यपि सदका लेने की अनुमति नहीं थी, तथापि भेंट-नजरानों का स्वागत था। मुहम्मद की बीवी द्वारा मुक्त की गई एक बांदी, बरीरा, ने मुहम्मद को मांस का एक टुकड़ा दिया, जोकि उनकी बीवी ने ही उसे सदके में दिया था। मुहम्मद ने यह कहते हुए उसे ले लिया-”उसके वास्ते यह सदका है और हम लोगों के वास्ते भेंट“ (2351)।

author : ram swarup

मेरा बेटा कहाँ से आता?

मेरा बेटा कहाँ से आता?

श्रद्धानन्द-काल की घटना है। मुस्लिम लीगी मुसलमानों ने दिल्ली में जाटों के मुहल्ले से वध करने के लिए गाय का जलूस निकालना चाहा। वीर लोटनसिंह आदि इसके विरोध में डट गये।

लीगी गुण्डों ने मुहल्ले में घुस-घुसकर लूटमार मचा दी। वे एक मन्दिर में भी घुस गये और जितनी भी मूर्ज़ियाँ वहाँ रखी थीं, सब तोड़ डालीं। भगीरथ पुजारी एक कोने में एक चटाई में छुप गया।

किसी की दृष्टि उस पर न पड़ी। वह बच गया।

पण्डित श्री रामचन्द्रजी ने उससे पूछा कि तू दंगे के समय कहाँ था? उसने कहा-‘‘मन्दिर में था।’’

पण्डितजी ने पूछा-‘‘फिर तू बच कैसे गया?’’ उसने बताया कि मैं चटाई में छुप गया था।’’

पण्डितजी ने पूछा-‘‘तुज़्हें उस समय सर्वाधिक किसकी चिन्ता थी?’’

पुजारी ने कहा-‘‘अपने बेटे की थी। पता नहीं वह कहाँ है?’’

पण्डितजी ने पूछा-‘‘तुज़्हें देवताओं के टूटने-फूटने की कोई चिन्ता नहीं थी?’’

उसने स्पष्ट कहा-‘‘अजी वे तो फिर जयपुर से आ जाएँगे कोई दो रुपये का, कोई चार रुपये का, कोई आठ का, परन्तु मेरा बेटा कहाँ से आता?’’

hadees : OTHER FASTS

OTHER FASTS

Several other fasts are mentioned.  One is the Ashura fast, observed on the tenth day of Muharram.  The Ashur day �was one which the Jews respected and they treated it as �Id� (2522), and in the pre-Islamic days, �Quraish used to fast on this day� (2499); but after Muhammad migrated to Medina he made it optional for his followers.  Other voluntary fasts are mentioned, but we need not go into them here.

One interesting thing about these fasts is that one could declare one�s intention of observing them in the morning but break them without reason in the evening.  One day, Muhammad asked �Aisha for some food, but nothing was available.  Thereupon Muhammad said: �I am observing fast.� After some time, some food came as gift, and �Aisha offered it to Muhammad.  He asked: �What is it?� �Aisha said: �It is hais [a compound of dates and clarified butter].� He said: �Bring that.� �Aisha further narrates: �So I brought it to him and he ate it�; and then he said: �This observing of voluntary fasts is like a person who sets apart Sadaqa out of his wealth.  He may spend it if he likes, or he may retain it if he so likes� (2573).

author : ram swarup

हदीस : दान और भेदभाव

दान और भेदभाव

एक हदीस है जो यह सिखाती नज़र आती है कि दान बिना किसी भेद-भाव के दिया जाना चाहिए। कोई मनुष्य अल्लाह की स्तुति करते हुए पहले एक परगामिनी को, फिर एक धनी को और फिर एक चोर को दान देता है। फरिश्ता उसके पास आया और बोला-”तुम्हारा दान मंजूर कर लिया गया है।“ क्योंकि यह दान एक ऐसा साधन बन सकता है ”जिसके द्वारा परगामिनी व्यभिचार से स्वयं को विरत कर सकती है, धनी व्यक्ति शायद सबक सीख सकता है और अल्लाह ने उसे जो दिया है उसे खर्च कर सकता है, और चोर उसके कारण आगे चोरी करने से विमुख हो सकता है।“ यह अनुमान किया जा सकता है कि उस व्यक्ति द्वारा किए गए दान के ये आश्चर्यजनक परिणाम इसलिए सम्भव हुए कि ये दान ”अल्लाह की स्तुति“ के साथ दिये गये थे (2230)।

author : ram swarup

 

सालिग्राम ने तो कुछ नहीं कहा

सालिग्राम ने तो कुछ नहीं कहा

कविरत्न ‘प्रकाश’ जी तथा उनके भाई बाल्यकाल में अपने पौराणिक पिताजी के साथ मन्दिर गये। इनके भाई ने एक गोलमटोल पत्थर का सालिग्राम खेलने के लिए अण्टी में बाँध लिया। कविजी ने पिता जी को बता दिया कि पन्ना भैया ने गोली खेलने के लिए सालिग्राम उठाया है। पिताजी ने दो-तीन थह्रश्वपड़ दे मारे और डाँटडपट भी की। पन्नाजी बोले, ‘‘सालिग्राम ने तो मुझे कुछ नहीं कहा और आप वैसे ही मुझे डाँट रहे हैं।’’ पिता यह उज़र पाकर चुप हो गये।

hadees : THE MERITS OF FASTING

THE MERITS OF FASTING

There are many merits in observing the fasts.  �The breath of the observer of fast is sweeter to Allah than the fragrance of musk,� Muhammad tells us.  On the Day of Resurrection, there will be a gate called RayyAn in Paradise, through which only those who have fasted will be allowed to enter-and when the last of them has entered, �it would be closed and no one would enter it� (2569).

The recompense of one who combines fasting with jihad will be immense.  �Every servant of Allah who observes fast for a day in the way of Allah, Allah would remove, because of this day, his face from the Fire of Hell to the extent of seventy years� distance� (2570).

author : ram swarup