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मन का असीमित कार्यक्षेत्र होता है

ओउम
मन का असीमित कार्यक्षेत्र होता है
डा. अशोक आर्य
मन का कार्यक्षेत्र असीमित होता है | इसे किसी सीमा में बाँधा नहीं जा सकता | मन में इतनी क्षमता है कि यह एक समय में अनेक कार्य कर सकता है | व्यापक कार्यक्षेत्र वाला यह मन जब तक सही मार्ग पर है , तब तक तो निर्माण के कार्य करता है किन्तु ज्यों ही यह मार्ग से भटकता है त्यों ही विनाश का कारण बन जाता है | इस लिए मन को सदा वश में रखने के लिए प्रेरित किया  जाता है | दू:स्वपन वाला मन सदा हानि  का कारण बनता है | इस लिए मन की अवस्था दु:स्वप्न रहित बनाए रखने का सदा प्रयास करना आवश्यक है | मन को निर्माण की और लगाए रखना ही सफलता का मार्ग है | इस लिए ऋग्वेद में पाप देवता को दूर रखने की चर्चा आती है कुछ एसा ही भाव अथर्ववेद में भी प्रकट किया गया है , जो इस प्रकार है :-
अपेहि मनसस्पतेअप काम परश्चर |
परो नि र्र्त्या आचक्ष्व , बहुधा जीवतो मन: ||
हे मन के अधिपति ! तुम दूर हटो , दूर चले जाओ , दूर ही विचरण करो ! तुम पाप देवता को दूर से ही बोल दो कि जीवित मानव का मन विवध विषयों में जाता है |
यह मंत्र  मन के व्यापक कार्यक्षेत्र पर प्रकाश डालता है | मन जाग्रत अवस्था में तो क्रियाशील रहता ही है किन्तु सुप्त अवस्था , स्वप्न कल में भी क्रियाश्हिल रहता है | अनेक बार दु:स्वप्न से हम दु:खी होते हैं | वेद मानव मात्र को सुख के साधन उपलब्ध करता है | इस लिए मन्त्र में दुस्वपन के नाश का विधान किया गया है |
स्वपन दो प्रकार का होता है : –
१) सुखद स्वप्न : –
सुखद स्वप्न उन स्वप्नों को कहते हैं जो सुख का कारण हों | जिन स्वप्नों को देख कर मानव आनंद विभोर हो उठता है , उसे सुखद स्वप्न कहा  जाता है | एसे स्वप्नों की सब मानव अभिलाषा करते हैं | कौन है संसार में एसा प्राणी जो दुखों की कामना करता हो ? दु:ख के समय तो सब उस प्रभु को याद करते हुए प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु ! जितना शीघ्र हो सके हमें इन दु:खों से दूर कर दीजिये तथा जितने उतम कर्म हैं, वह सब हमारी झोली में भर दीजिये | किन्तु मानवीय आचरण एसा नहीं होता कि उसे सुख मिले | पूरा दिन छल ,कपट , पाप करने वाले मानव को प्रभु सुख कैसे दे सकता है ? प्रभु का कार्य तो किये गए कर्मों का फल देना है | अच्छे कर्मों का अच्छा फल देता है, जब कि बुरे किये कर्मों का फल भी दुखों को बढ़ा कर देता है | जब हम जानते हैं कि कर्मों का फल तो भोगना ही पडेगा तो हम क्यों न अच्छे कर्म करें जिनके सुखद फल से हम सुखी हों | स्वप्न में भी हम सुख पूर्ण वातावरण में निवास करें सदा उतम स्वप्न ही हम देखें |
२) दु:खद स्वप्न : –
दुखद स्वप्न को ही दु:स्वप्न भी कहते हैं | इस प्रकार के स्वप्न का कारण पापाचरण , क्रोध,पाप , दुर्विचार आदि होते हैं | दिन भर जो मानव दूसरों को कष्ट देने में लगा रहता है | अनैतिक रूप से ,दूसरों को कष्ट क्लेश देकर धन एकत्र करने में लगा रहता है | दूसरों पर अकारण ही क्रोध करता रहता है | सदा पाप मार्ग का ही आचरण करता है | एसे लोगों को सदा ही इस प्रकार के दु:स्वप्न का सामना करना होता है | स्वप्न अवस्था में यह बुरे स्वप्न मानव को चिंतित करने का , भयभीत करने का , उसके दु:खों को बढ़ाने का कारण बनते हैं | जबकि जाग्रत अवस्था में मनो निग्रह से पाप आदि को निरोध होता है | इस लिए मंत्र में मनो निग्रह को दूर करने का उपाय बताया गया है तथा प्रभु से प्रार्थना कि गयी है , वह हमारे से पापदेवता को दूर भगावे | जब पाप देवता ही हमारे पास न होगा तो हमें हमारे मार्ग से कौन भटका सकता है | हम स्वयं ही सुपथगामी बन जावेंगे | कभी बुरे विचार हमारे मन में नहीं आवेंगे , कभी पाप के मार्ग पर नहीं चलेंगे , कभी किसी का बुरा नहीं सोचेंगे , कभी किसी का बुरा नहीं करेंगे , बुरे विचार मन में भी नहीं आवेंगे | इस प्रकार स्वयं भी सुखी होंगे तथा दूसरों का जीवन भी सुखों से भरने का यत्न करेंगे | अत: पाप देवता को कभी पास न आने देंगे |
प्रश्न उठता है कि पाप का देवता कौन है ? :-
मंत्र बताता है कि जो मन सुखों का कारण है , वह मन ही पाप का देवता भी है | इस कारण इसे मनस्पति कहा  है | मन ही दुर्विचार को पैदा करता है , मन ही बुरे भावों का कारण होता है , मन ही अनिष्ट चिंतन का कारण है , मन ही सब कामों का कारण होता है तथा मन ही सब प्रकार के क्रोधों का स्वामी होता है | इस प्रकार के जितने भी दुर्भाव होते हैं , उन सब का कारण भी मन ही होता है | इस प्रकार के दुर्भावों को मन में उदय न होने दिया जावे , इसके लिए मन का पवित्रीकरण आवशयक होता है | अत: मंत्र मन के पवित्रीकरण पर भी बल देता है तथा कहता है कि पाप देवता को दूर भगा दो |
मंत्र का अंतिम भाग स्पष्ट करता है कि मानवीय मन अनेक प्रकार का होता है |कभी तो मन बुराई की और जाता है तो कभी अच्छई को पकड़ता है | जब जब बुरे स्वप्न आते हैं तो मनुष्य दु:खी होता है , जबकि अच्छे स्वप्न उसके सुखों को बढाते हैं | इसलिए प्रार्थना की गयी है कि हमें बुरे स्वप्नों से बचाते हुए अच्छे स्वप्न दो ताकि हम सुखी रह सकें |
डा. अशोक आर्य
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