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छः वैदिक दर्शनों का मतैक्य है

छः वैदिक दर्शनों का मतैक्य है

– आचार्य वैद्यनाथ शास्त्री

पिछले अंक का शेष भागं…..

एक झगड़ा पूर्वपक्षी लोग यहाँ पर उत्पत्ति की प्रक्रिया पर खड़ा करते हैं। उनका कथन है कि वेदान्त में विवर्त्तवाद सांख्य में परिणामवाद और न्याय-वैशेषिक में आरम्भकवाद है, परन्तु यह झगड़ा व्यर्थ का है और नवीनों द्वारा कल्पित किया गया है। विवर्त्तवाद सृष्टि रचना का कोई प्रकार ही नहीं है। जगत् के मिथ्यात्व को सिद्ध करने के लिए यह वाद खड़ा किया गया है, जिस प्रकार रस्सी में सर्प का विवर्त्त है, परन्तु इस वाद वालों को ज्ञात होना चाहिए कि इस वाद में कार्य-कारण का नियम बनता ही नहीं। कार्य-कारण का नियम यह है कि कारण-गुणपूर्वक कार्यगुण होते हैं और कार्य का अपने कारण में लय होता है। सर्वत्र उपादान की प्रक्रिया में ऐसा ही पाया जावेगा, परन्तु विवर्त्त में यह नहीं बनता। रस्सी के स्थान में सर्प बैठा देना अथवा किसी दूसरी वस्तु के स्थान में अन्य वस्तु बैठाना-यह सृष्टि की रचना नहीं है। जगत् के जिस मिथ्यात्व को सिद्ध करने के लिए यह वाद खड़ा किया गया है,वह भी इससे सिद्ध नहीं होता। न तो रस्सी भ्रम एवं मिथ्या है और न उसमें जो प्रतीत हो रहा है, वह मिथ्या। जब ब्रह्म के ज्ञान में इनका अस्तित्व बना है और हर कल्प में ये ऐसे ही प्रकट होते हैं तो मिथ्या किस प्रकार हैं?

रह जाते हैं आरम्भक और परिणामवाद। इनमें वस्तुतः कोई भेद नहीं है। दही जब जमता है, तब चाहे हम यह कह दें कि दूध में दही का परिणाम हुआ अथवा यह कह दें कि विकार प्राप्त दुग्धगत परमाणुओं में से दही का आरम्भ हुआ। दोनों एक ही बात है। घी के पिघलने और जमने में भी चाहें हम आरम्भ मानें या परिणाम, बात दोनों एक-सी ही हैं। रबड़ के टुकड़े को खींचने पर वह बड़ा हो जाता है। हम यह भी कह सक ते हैं कि रबड़ के परमाणुओं ने इतने बड़े रबड़ का आरम्भ कर दिया अथवा यह भी कह सकते हैं कि रबड़ के टुकड़े में छिपे हुए इस बड़े आकार का उसने परिणाम कर दिया। वस्तुतः दोनों में एक ही बात पायी जाती है। कोई भेद नहीं। इस दृष्टि से भी दर्शनों में समन्वय ही है।

तीसरे प्रकार से समन्वय की सरणि यह है कि दर्शनशास्त्र के कुछ मुख्य प्रतिपाद्य विषय हैं। उन विषयों में छः दर्शनों का परस्पर कोई विरोध है ही नहीं। नीचे की तालिका इस विषय पर अच्छा प्रकाश डालती है-

१- वेद की स्वतः प्रमाणता और उससे ही दर्शन विज्ञान की प्रेरणा का होना स्वयं सिद्ध है।

२- वेदों के अध्यात्मिक और धर्म सम्बंधी विचारों पर तार्किक गवेषणा सब में पायी जाती है।

३- सभी दर्शन संशयवाद और भ्रमवाद तथा अभाव का निराकरण करके तत्त्वात्मक अस्तित्व को स्वीकार करते हैं तथा सृष्टि में एक सामंजस्य मानते हैं एवं इसका अन्तिम उद्देश्य भी स्वीकार करते हैं।

४- मीमांसा में प्रत्यक्ष इसका वर्णन नहीं है, परन्तु शेष सभी दर्शन जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय और सृष्टि प्रवाह की अनादिता को स्वीकार करते हैं।

५- निःश्रेयस एवं मोक्ष को सभी मानते हैं।

६- भाव से भाव की उत्पत्ति तथा प्रकृति एवं परमाणु के रूप में जगत् के उपादान कारण को स्वीकार करते हैं।

७- आत्मा और परमात्मा के अस्तित्व को सभी ने माना है।

८- संख्या में अन्तर भले ही हो, परन्तु प्रमाण को सभी स्वीकार करते हैं।

९- जीवात्मा अपने कर्मानुसार फल को भोगता है, भिन्न-भिन्न जन्मों को धारण करता है-आदि में सभी का ऐकमत्य है।

१०- इन्द्रियों के विषय में सभी एक-सा विचार रखते हैं।

११- जीव और ईश्वर का भेद तथा जीव अनेक हैं-यह लगभग सभी को स्वीकार है।

१२- पाप और पुण्य के विषय के विचार परस्पर एक-दूसरे से मिलते-जुलते हैं।

इस प्रकार छः दर्शनों का परस्पर समन्वय पाया जाता है। चतुर्थ सरणि जो आचार्य दयानन्द के अनुसार दर्शनों के परस्पर समन्वय की है, वह है-सृष्टि रचना के छः कारणों को लेकर। यह वस्तुतः सर्वोत्तम सरणि है। सृष्टि की रचना में कर्म का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है, बिना कर्म के सृष्टि का बनना ही सम्भव नहीं। मीमांसा में ऋषि का कथन है कि ऋग्वेद के दसवें मण्डल १३० वें सूक्त में वस्त्र के द्वारा सृष्टि प्रक्रिया का वर्णन है। वहाँ पर सृष्टि रूपी वस्त्र को १०१ कर्मों से बनाया गया वर्णित किया है, साथ ही एक मन्त्र में यह स्पष्ट किया गया है कि इस सृष्टि रूपी यज्ञ के साथ देव ऋषि=सप्त दिव्य तत्त्व अपने जानने के योग्य तद्रूप प्रतिष्ठित ज्ञान से युक्त, छांदन एवं विस्तारक शक्ति से युक्त, और प्रमा=मान यथार्थ वस्तु रूप, जाति, आकृति, विशेष आदि भावों से युक्त हुए प्रकट होते हैं और पूर्व कल्प में बर्ते गये सृष्टि रचना के मार्ग पर चलते हुए आगे सृष्टि के कार्यों को अपने में परिणत हुआ प्राप्त करते१६ हैं। मन्त्र का यह सारा भाव यज्ञ में भी अर्थांन्तर करने पर घटेगा। यहाँ पर इनके दिखलाने का इतना ही तात्पर्य है कि यज्ञ विस्तार के द्वारा सृष्टि रचना के विस्तार का भी परिज्ञान होता है, अतः मीमांसा में जो यज्ञों की व्याख्या की गई है, उससे सृष्टिरूपी यज्ञ की प्रक्रिया का भी निष्कर्ष निकाला जा सकता है। मीमांसा दर्शन में धर्म का प्रतिपादन है। वेद का सृष्टिगत पदार्थों के साथ औत्पत्तिक सम्बन्ध१७ है, अतः वेद ही इस धर्म के विषय में स्वतः प्रमाण है। धर्म दो प्रकार का होता है- पदार्थ धर्म एवं कर्ममय धर्म। पदार्थ धर्म का विशेष रूप से प्रतिपादन वैशेषिक आदि शास्त्रों में पाया जाता है, परन्तु कर्ममय धर्म का प्रतिपादन विशेषतया मीमांसा में किया गया है। कर्म का स्वेच्छापूर्व होना और अनिच्छापूर्व होना भी पाया जाता है। अनिच्छा-पूर्वक होने वाले कर्म केवल शरीर आदि की रक्षा के लिए हैं, अतः उन्हें करने की आवश्यकता नहीं। मीमांसा में इसका वर्णन नहीं किया गया है। स्वेच्छापूर्वक होने वाले कर्म इच्छा के साथ किये जाते हैं। इनमें विधि-निषेध होता है, साथ ही कर्त्ता, कर्म और क्रिया इस तीनों के समन्वय से होता है। मनुष्य द्वारा जिन यज्ञों के  करने का विधान है, वे यज्ञ सृष्टि में एक अन्य ही प्रकार से चल रहे हैं। समस्त सृष्टि भी एक यज्ञ है। मनुष्य परमात्मा की सृष्टि में चलने वाले यज्ञों की अनुकृति कर अपने यज्ञों का विस्तार करता  है, उसके यजति=यज्ञ, कर्म का सम्बन्ध, देवता, द्रव्य, त्याग, क्रिया और उद्देश्य से युक्त है, साथ ही इसमें राग लगा है, अतः उससे संस्कार एवं अदृष्ट उत्पन्न होते हैं और उनका फल होता है। अदृष्ट की स्थिति दो प्रकार की है, एक प्रकार यह है कि कर्म से उत्पन्न संस्कारों से वासना बनती है, जो अदृष्ट कहलाती है। उसी के अनुसार फल होता है। दूसरा  प्रकार अदृष्ट का वह है जो निमित्त कारण की प्रक्रिया से पदार्थों में क्रिया-प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है अथवा पदार्थ का अपना स्वाभाविक कर्म है। सूई को जब चुम्बक आकृष्ट करता है, तब इस आकर्षण को अदृष्ट कहा जाता। जल का अधोगमन और अग्नि का ऊर्ध्वगमन कर्म है। यह पदार्थ धर्म का कर्म, अतः कभी ये कर्म दिखलाई पड़ते हैं और कभी नहीं दिखलाई पड़ते हैं। विधिनिषेधात्मक यज्ञ कर्म से उत्पन्न अदृष्ट का फल होता है, परन्तु सृष्टि के निमित्त कारण परमेश्वर के द्वारा किये गये सृष्टि यज्ञ के कर्म सृष्टिगत पदार्थों में क्रिया-प्रतिक्रिया रूप अदृष्ट को उत्पन्न करते हुए भी पुरुष कर्म के अदृष्ट से होने वाले फल को नहीं लेते, क्योंकि उसमें राग नहीं है और कर्त्ता स्वयं आप्तकाम है। सृष्टि-यज्ञ में होने वाले इस कर्म से क्रिया-प्रतिक्रिया, संयोग-विभाग, विश्लेषण-संश्लेषण आदि होते हैं। इससे जगत् सदा गतिमान् रहता है। इसका नाम भी जगत् है, जो चलने वाला है। यह गति कर्त्ता की है और उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के कर्म करती हुई प्रवाहित हो रही है। मीमांसा के यज्ञों के सम्बन्धी कर्म के अध्ययन से इस कर्म का संकेत मिलता है, अतः ऋषि का यह कहना कि मीमांसा सृष्टि के कर्म रूप कारण की व्याख्या करता है, सुतराम ठीक है। मीमांसा के प्रतिपाद्य विषय धर्म का वेद से प्रतिपादित होना और वेद के पदों का सृष्टि के पदार्थों के साथ औत्पत्तिक सम्बन्ध स्थापित करना इस उद्देश्य की ही पूर्ति करते हैं।

महर्षि ने वैशेषिक में सृष्टि के दूसरे कारण काल की व्याख्या का होना लिखा है। वैशेषिक को देखने पर उसमें छः पदार्थों का प्रतिपादन मिलता है। फिर यह काल मुख्य प्रतिपादन का विषय है-यह कैसे सिद्ध हुआ? वैशेषिक की आन्तरिक परीक्षा करने पर महर्षि का यह कथन सर्वथा ही सिद्ध कोटि में आवेगा। महर्षि के अतिरिक्त भी लोग वैशेषिक को कालवादी मानते थे। जैनियों के ग्रन्थ सुन्दर विलास के आत्मानुभव के १७ वें अंग में भी ऐसा वर्णन पाया जाता है कि वैशेषिक कालवादी१८ है।

वैशेषिक कर्मवादी दर्शन है। यह पदार्थ धर्म और कर्त्तव्य-धर्म दोनों का ही वर्णन करता है, परन्तु पदार्थ धर्म का इसमें विशेष वर्णन है। द्रव्य, गुण, कर्मं, सामान्य, विशेष, समवाय में द्रव्य, गुण और कर्म सत्तात्मक पदार्थों से सम्बन्ध रखते हैं, ये तत्त्वात्मक हैं, परन्तु सामान्य, विशेष और समवाय केवल सम्बन्ध  हैं। ये सम्बधातिरिक्त कोई वस्तु नहीं है, परन्तु सम्बन्ध का प्रतिपादन बिना वस्तु सत्ता के सम्भव नहीं, अतः वस्तु के साथ इसका प्रमाणीकरण वैशेषिक में किया गया है। द्रव्यों का वर्णन करते हुए भी पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा और मन को परिगणित किया गया है। यहाँ भी काल और दिशा को द्रव्य मानकर वैशेषिक ने अपनी विशेषता का प्रतिपादन किया है। वैशेषिक नाम ही विशेष को पदार्थ मानने से हुआ, अतः विशेष उसका मुख्य विषय है। ये सामान्य, विशेष और समवाय बुद्धि की अपेक्षा रखते१९हैं। जब तक अपेक्षा बुद्धि न पायी जावे, इनकी प्रतीति होती नहीं। यह अपेक्षा बुद्धि भी तभी पायी जा सकती है और इनका परिज्ञान हो सकता है, तब दिशा और काल का खेल वस्तु पर अपना प्रभाव रखता हो। दिशा केवल मूर्त्त पदार्थों पर अपना प्रभाव रखती है, किन्तु काल अमूर्त्त अर्थात् बौद्ध प्रत्ययों पर भी अपना प्रभाव रखता है। दिशा का प्रभाव मूर्त्तता से मालूम हो जाता है और काल का प्रभाव पदार्थ की जन्यता से ज्ञात होता है, क्योंकि यह जन्य पदार्थों का जनक है। द्रव्य, गुण, कर्म और सामान्य आदि सम्बन्ध जब एक क्रम विशेष (एक आर्डर) में होते हैं, तभी इनको हम जान सकते हैं। यह स्थिति और क्रम विशेषकाल के अन्दर होता है, अतः काल एक मुख्य कारण है वैशेषिक प्रक्रिया का। विशेष प्रतीति भी कार्य द्रव में होती है और वह भी काल की अपेक्षा रखती है। वैशेषिक की काल सम्बन्धी यह परिभाषा ‘‘नित्यों में न हो२० और अनित्यों में पाया जावे अतः काल कारण है’’ इस विषय पर पर्याप्त प्रकाश डालती है। काल जन्य मात्र का कारण है और विशैषिक प्रक्रिया में इसका मुख्य स्थान है।

महर्षि सृष्टि के महत्त्वपूर्ण कारण उपादान कारण की व्याख्या न्याय में मानते हैं। न्याय दर्शन में वस्तुतः १६ पदार्थों का वर्णन है, परन्तु विश्लेषण करने पर ये सभी प्रमाण और प्रमेय में ही संगृहीत हो जाते हैं। तर्क-विद्या के वर्णन की दृष्टि से इनका पृथक् -पृथक् वर्णन है। प्रमाण का विषय प्रमेय है जो प्रमाणों से सिद्ध होता है। शरीर, इन्द्रिय, अर्थ, बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव, फल, दुःख और अपवर्ग प्रमेय है। इनमें से कुछ वास्तविक तत्त्व हैं और कुछ संयोगी अथवा क्रियाजन्य धर्म हैं। आत्मा, शरीर, इन्द्रिय, अर्थ, बुद्धि और मन आदि भूतात्मक हैं। मन उसी प्रकार भूतात्मक नहीं, जिस प्रकार इन्द्रिय आदि हैं। इन भूतात्मकों का मूल कारण परमाणु है। वैशेषिक की भाँति न्याय शास्त्र के अनुसार अवयवी एक पदार्थ, जो कि प्रत्येक कार्य द्रव्य में विद्यमान है। एकत्व प्रतीति और आकर्षण, धारण आदि उसकी वजह से है। यही प्रतीति का भी विषय है। कार्य द्रव्य केवल परमाणु समूह ही नहीं है। परमाणुओं के समूह में अवयवी एक विशेष पदार्थ जो कारण के बहुत्व और कारण के महत्त्व के प्रचय विशेष से उत्पन्न है। यह अवयवी न अभाव है और न मिथ्या ही है। अवयवी पदार्थ का अत्यन्त अपवर्ग=विभाग करते समय जहाँ पर अवयव धारा की समाप्ति होती है, वही परमाणु है। परमाणु अवयव तो हैं, परन्तु वे अवयवी नहीं। फिर यह अवयव कार्यद्रव्यों में किस प्रकार आता है, न्याय में इसका विशेष विचार है। अवयवी परमाणुओं का प्रारम्भ होने से कार्य वस्तुओं में होता है। इसका कारण उपादानता का नियम है। निमित्त कारण कार्य को बनाता तो है, परन्तु उसकी सत्ता, गुण आदि कार्य में नहीं आते हैं। उपादान का यह नियम है कि उसके गुण कार्य में आते हैं, अतः कार्यगत अवयवी उपादान-नियम के  कारण से कार्य में आता है। यही कारण है कि बिना उपादान के कोई भी कार्य बन नहीं सकता है। न्याय दर्शन में परमाणु की सिद्धि में अवयवी का अपकर्षण करते हुए अन्तिम अपकृष्ट अवयव को परमाणु कहते हैं-यह वर्णन उपादान के नियम का प्रत्यायक है। वस्तुतः यह उसका एक प्रधान विषय है।

योग में पुरुषार्थ की व्याख्या है। पुरुष का प्रयोजन ही पुरुषार्थ है। वह लौकिक और कैवल्य भेद से दो प्रकार का है। यह पुरुषार्थ ज्ञान, विद्या और विचार के बिना नहीं सिद्ध होता है। संसार में प्रकृति के तीनों गुण परमात्मा की निमित्तता से प्रवृत्त होकर विविध दृश्यों को उत्पन्न करते हैं, परन्तु प्रकृति के गुणों का इस प्रकार दृश्य में प्रवृत्त होने का कारण क्या है? इसका उत्तर है कि पुरुषों के प्रयोजन ही कारण हैं। सृष्टि रचना के उद्देश्य में पुरुष का प्रयोजन छिपा है। जब यह प्रयोजन पूरा हो जाएगा, तब प्रधान की प्रवृत्ति पुरुष के लिए नहीं होती है। सृष्टि करने का प्रयोजन पुरुष के कर्मों का फल देना और कैवल्य की प्राप्ति२१ है। परम पुरुष परमेश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव की सफलता का प्रकाश भी इसी से होता है। इस प्रकार पुरुषार्थ सृष्टि का प्रयोजन है और योगशास्त्र में मुख्य रूप से इसका व्याख्यान है।

सांख्य शास्त्र तत्त्वों के परिगणन और मेल की व्याख्या करता है। रचना का कार्य संयोग और विभाग के बिना नहीं हो सकता है। कहीं पर तत्त्वों का संयोग करना पड़ता है, कहीं पर वियोग। विश्लेषण और संश्लेषण की प्रक्रिया रचना का एक मुख्य अंग है। कोई भी विश्लेषण तब तक ठीक नहीं माना जा सकता, जब तक यह संश्लेषण पर ठीक न उतर जावे। इस प्रक्रिया में तत्त्वों के मेल के अतिरिक्त अनुक्रम  को कारण से प्रारम्भ करके अन्तिम कार्य तक क्रमशः विचार किया जाता है और कार्य से कारण की ओर चलते हुए विचार किया जाता है। सांख्य में तत्त्वों का अनुक्रम परिगणन करते हुए यही प्रक्रिया वर्ती गई है। सांख्य में सबसे बड़ा विस्तार गुणों का है। सत्व, रजस् और तमस् के विचित्र सम्मिलन से सृष्टि की सारी विचित्रता है। गुणों का सम्मिलन एक मात्र प्रधान विषय है जो सांख्य में प्रतिपादित किया गया है। राग गुणों और विराग पुरुष के योग का नाम सृष्टि है। इस प्रकार यह सुतराम् ठीक ही है कि सांख्य में तत्त्वों के मेल का ही मुख्यता प्रतिपादन है।

वेदान्त में जगत् के मुख्य निमित्तकारण जगत्कर्त्ता ब्रह्य का प्रतिपादन है। यह बहुत ही स्पष्ट बात है। वेदान्त के प्रथम चार सूत्र ही इस तथ्य को प्रतिज्ञा रूप में प्रकट करते हैं। वेदान्तदर्शन में यह स्पष्ट प्रतिपादित है कि ब्रह्म के बिना जगत् की उत्पत्ति नहीं हो सकती है। वेदान्त जहाँ ब्रह्म को जगत् का कर्त्ता, धर्त्ता और हर्त्ता बतलाता है, वहाँ ज्ञान का भी कारण उसी को बतलाना है। कोई भी उपादान कारण जो स्वभावतः जड़ है, उसमें निमित्त कारण चेतन ब्रह्म के बिना क्रिया नहीं उत्पन्न हो सकती। बिना क्रिया और ज्ञान के प्रकृति, परमाणु आदि उपादान कारण जगत् का उत्पादन नहीं कर सकते। स्वभाव की भी कारणता का वेदान्त में खण्डन है, क्योंकि जड़ वस्तु में बनने और बिगड़ने का दो विरोधी स्वभाव अपने आप नहीं हो सकता है। यदि स्वभाव नियन्त्रित रहे तो फिर जिसके नियन्त्रण में है, उसे निमित्त कारण ब्रह्म कहा जाता है। यदि नियन्त्रित नहीं है तो सदा बनना अथवा बिगड़ना बना ही रहेगा और साथ ही दो विरोधी स्वभावों का संघर्ष होने से कुछ भी बनना-बिगड़ना असम्भव हो जावेगा। ब्रह्म की ज्ञानमयी क्रिया से प्रकृति का सृष्टि रूप में परिणाम होता है। इस प्रकार वेदान्त ब्रह्म की व्याख्या करता है।

छः दर्शनों में सृष्टि के छः कारणों की व्याख्या की गई है। इसी आधार पर छः दर्शनों का परस्पर समन्वय है। यही महर्षि का दृष्टिकोण है।

संदर्भ

१. लघ्वादिधर्मेः साधर्म्यं च गुणानाम्। सां-१/१२८

२. सहिसर्ववित् सर्वकर्त्ता

३. समाधिसुषुप्तिमोक्षेषु ब्रह्मरूपता। सां. ५/११६

४. प्रधानशक्ति योगाच्चेत् संगापत्ति सत्ता मात्राच्चेत् सर्वैश्वार्यम्, प्रमाणाभावान्न तत्सिद्धि। सम्बन्धाभावान्नानुमानम् श्रुतिरपि प्रधानकार्यत्वस्य सां. ५/८

५. संख्यैकान्तासिद्धिः कारणानुपपत्युपपत्तिभ्याम्। न्या. ४/१/४१

६. आद्यहेतुता तद्द्वारा पारम्पर्येप्यणुवत्। सां १/७४। पारम्पर्येऽपि प्रधानानुवृत्तिरणुवत् गतियोगेप्याद्यकारण ताहानिरणुवत्। सां. ६/३५,३७

७. द्वयी चेयं नित्यता कृटस्थनित्यता  परिणामिनित्यता च तत्र कूटस्थनित्यता पुरुषस्य परिणामिनित्यता गुणानाम्। यस्मिन् परिणम्यमाने तत्त्वं न विहन्यते तन्नित्यम् यो. भा. ४/३३। ऐसा ही महाभाष्य में भी है।

८. न चालिंगात्परं सूक्ष्ममस्ति नन्वस्ति पुरुषः सूक्ष्म इति, सत्यं यथा लिंगात् परम लिंगस्य सौक्ष्म्यं न चैंव पुरुषस्य किन्तु लिंगस्य अन्वयिशयं व्यारख्यातम्। यो. १/४५

९. अन्तर्वहिश्च कार्यद्रव्यस्ये त्यादि। न्या. ४/२/२०

१०. न भूतप्रकृतित्वमिन्द्रयाणा माहेकारिकत्व श्रुतेः। सां. ५/८४

११. ईक्षतेर्नाशब्दम् ११ वें. १/१/५/ रचनानुपयत्तेश्चनानुमानम्। वे. २२/१/ महद्दीर्घवद्वा ह्रस्वपरिमण्डलाभ्याम् ११वें २/२/११,१३,१४

१२. एतेन योगः प्रत्युक्तः। वे. २/१/३

१३. एतेन शिष्टाः परिग्रहा अपि व्याख्याताः। वे. २/१/१२

१४. सांख्य ०१/६१

१५. त्रयाणामेव चैवमुपन्यासः प्रश्नश्च। वे. ३१/६

१६.यो यज्ञो विश्वतन्तुभिस्ततः एकशतं देवकर्मेभिरायतः। सहस्तोमाः सहछन्दस आवृताः सहप्रभा ऋषयः सप्तदैव्याः। पूर्वेषां पन्थामनुदृश्य धीरा अन्वालेभिरे रथ्यो न रश्मीन्।। ऋ. १०/१३०/१

१७. ओत्पत्तिकवस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धस्तस्यज्ञानमुपदेशोऽद्रव्यतिरेक श्चार्थेऽनुपलब्धे तत्प्रमाणं वादरायणस्यानपेक्षत्वात्। मी. ११५

१८. वैशेषिक प्रतिकालवादी है। प्रसिद्ध सुन्दरविलास आत्मानुभव, अंग-१७

१९. सामान्य इति बुद्ध्यपेक्ष्यम्। वे. १/२/३

२०. नित्येष्वभावादनित्येषु भावात् कारणे कालाख्येति। वै. २/२/९

२१. भोगापवर्गार्थ दृश्यम्। यो. १/१८। पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यम्। यो. २/९