त्याग-यज्ञ का ग्रहण – रामनाथ विद्यालंकार

त्याग-यज्ञ का ग्रहण – रामनाथ विद्यालंकार

ऋषिः  प्रजापतिः ।  देवता  यज्ञः ।  छन्दः  निवृद् आर्षी अनुष्टुप् ।

स्वाहा यज्ञं मनसः स्वाहोरोरन्तरिक्षात् स्वाहा द्यावापृथिवीभ्यास्वाहा वातदारंभे स्वाहा॥

-यजु० ४।६

(स्वाहा यज्ञम्) त्यागरूप यज्ञ को (मनसः) मन से, (स्वाहा) त्यागरूप यज्ञ को (उरोः अन्तरिक्षात्) विस्तीर्ण अन्तरिक्ष से, (स्वाहा) त्यागरूप यज्ञ को (द्यावापृथिवीभ्यां) द्यावापृथिवी से, (स्वाहा) त्यागरूप यज्ञ को (वातात्) वायु से (आरभे) ग्रहण करता हूँ। (स्वाहा) यह लो, मैं त्याग कर रहा हूँ।

कैसा सुरम्य शब्द है ‘स्वाहा’ ! स्वाहा=सु+आ+हा। सु=सुन्दर प्रकार से, आ=आगम्य, आकर, हा=त्याग करना। स्वाहा’ में प्रथम अक्षर ‘सु’ है, जिससे सूचित होता है कि त्याग या हविर्दान सौन्दर्य के साथ होना चाहिए। खीझते हुए, किसी के भय से, रोते-धोते त्याग करना त्याग नहीं कहलाता। ‘स्वाहा’ में अन्तिम अक्षर ‘हा’ है, जो त्यागार्धक हो (ओहाक्) धातु से लिया गया है, जिसका अर्थ है त्याग या हविर्दान। एवं श्रद्धापूर्वक प्रसन्नता के साथ स्वेच्छा से किया गया त्याग या हविर्दान ही ‘स्वाहा’ कहलाता है। ‘स्वाहा’ त्याग के लिए एक महाबरा ही बन गया है-‘उसने देशहित के लिए अपने तन मन-धन को स्वाहा कर दिया। श्रद्धापूर्वक किया गया त्याग एक यज्ञ है। इस त्यागरूप यज्ञ का पाठ हम अनेक पदार्थों से पढ़ सकते हैं।

सर्वप्रथम अपने मन को देखें। मन सभी ज्ञानेन्द्रियों से मिलनेवाले ज्ञान में जीवात्मा का सहायक होता है। यदि मन प्रवृत्त न हो, तो न आँख से दर्शन हो सकता है, न कान से श्रवण हो सकता है, न जिह्वा से स्वाद का ज्ञान हो सकता है, न नासिका से गन्ध का ग्रहण हो सकता है, न त्वचा से स्पर्श का अनुभव हो सकता है। मन प्रवृत्त न हो, तो मनुष्य कानों से सुनता हुआ भी वस्तुतः नहीं सुनता-‘अन्यत्रमनी अभूवं नाश्रौषम् ।’ जीवात्मा के सङ्कल्प-विकल्प में भी मन साधन बनता है। एवं मन की सारी क्रिया जीवात्मा के लिए होती है। इस प्रकार सर्वप्रथम मन से हम त्याग का पाठ पढ़ सकते हैं।

फिर प्रकृति के विस्तीर्ण अन्तरिक्ष, द्यावापृथिवी और वायु से भी हम त्याग की शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं। विस्तीर्ण अन्तरिक्ष बादल में जो जल का संग्रह करता है, वह अपने लिए नहीं, किन्तु धरा को सरस करने के लिए करता है। सूर्य जो अपने अन्दर तीव्र ताप और प्रकाश को संजोये हुए है, वह परार्थ त्याग करने के लिए ही है। पृथिवी जो नाना ओषधि-वनस्पतियों को, जल-स्रोतों को, सोना-चाँदी आदि की खानों को, सीपियों में मोतियों को धारण करती है, वह अपने लिए नहीं, किन्तु दूसरों के लिए ही करती है। इसी प्रकार वायु के अन्दर जो अमृत की निधि रखी हुई है, उसका वह भी परार्थ हो वितरण करता है। इन सबसे शिक्षा लेकर मैं भी अपने जीवन में ‘स्वाहा’ का व्रत ग्रहण करता हूँ। यह लो, आज से मैं अपने जीवन के तिल-तिल को परार्थ स्वाहा करूंगा।

त्याग-यज्ञ का ग्रहण – रामनाथ विद्यालंकार

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