पवित्रता की पुकार – रामनाथ विद्यालंकार

पवित्रता की पुकार

ऋषिः  प्रजापतिः ।  देवता  परमात्मा।  छन्दः  निवृद् ब्राह्मी पङ्किः।।

चित्पतिर्मा पुनातु वाक्पर्तिर्मा पुनातु देवो मा सविता पुनात्वच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः । तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम्॥

-यजु० ४।४

(चित्पतिः१) विज्ञान का पालक परमात्मा (मा पुनातु) मुझे पवित्र करे। (वाक्पतिः) वाणी का पालक परमात्मा (मा पुनातु) मुझे पवित्र करे। (सविता देवः) सन्मार्गप्रेरक परमात्मा (मा पुनातु) मुझे पवित्र करे (अच्छिद्रेण पवित्रेण) त्रुटिरहित पवित्र वेदमन्त्र से, और (सूर्यस्य रश्मिभिः) सूर्य की रश्मियों से। (तस्य ते) उस तेरे (पवित्रपूतस्य) वेदमन्त्रों से पवित्र हुए मेरा (पवित्रपते) हे पवित्र कर्म के अधिपति जगदीश्वर [कल्याण हो] (यत्कामः) जिस कामनावाला मैं (पुने) स्वयं को पवित्र करता हूँ (तत्) उस अपनी कामना को (शकेयम्) पूर्ण कर सकें।

मैंने पवित्रात्मा ऋषि, मुनि, संन्यासी प्रभुभक्तों के दर्शन किये हैं और उनकी पवित्रता से प्रभावित हुआ हूँ। उनके सम्पर्क में आने से ऐसा प्रतीत होता है कि पवित्रता की उज्ज्वल रश्मियाँ हमारे अन्दर भी प्रवेश कर रही हैं। जब प्रभु के भक्तों में यह पवित्र करने की शक्ति है, तब पवित्रता के स्रोत प्रभु के अन्दर तो इससे कोटिगुणा पवित्र करने की तथा अपवित्रता को छूमन्तर करने की असीम शक्ति विद्यमान होनी चाहिए। मैं पवित्रता की लालसा लिये हुए आज सविता परमेश्वर की शरण में आया हूँ। ‘सविता’ प्रेरणा का देव है, वह जिस गुण की तीव्र प्रेरणा मनुष्य के अन्दर कर देता है, वह गुण उसके जीवन का स्थायी अङ्ग बन जाता है । मन्त्र में परमेश्वर को ‘चित्पति’ और ‘वाक्पति’ विशेषणों से भी स्मरण किया गया है। चित्पति है विज्ञान का अधिष्ठाता परमेश्वर। वह मेरे अन्दर विज्ञान की धारा बहा कर मुझे पवित्र करे।

जब तक हमारा विज्ञान दूषित होता है, तब तक हमारे कर्म भी दूषित रहते हैं। इसलिए हम प्रार्थना करते हैं कि विज्ञान का अधिपति प्रभु हमें विज्ञान की पवित्र तरनतारिणी गङ्गा में स्नान करा कर पवित्र कर दे । वाक्पति है पवित्र वाणी का अधिपति परमेश्वर। अपवित्र, कटु और कलुष वाणी कलहों और युद्धों को जन्म देती है तथा पवित्र, मधुर और शान्त वाणी प्रीति और शान्ति को लाती है । अतः वाक्पति पवित्र प्रभु से हम प्रार्थना करते हैं कि वह हमें भी वाणी की उज्ज्वल पवित्रता प्रदान करे। चित्पति, वाक्पति सविता परमेश्वर हमें किस प्रकार पवित्र करेगा ? वह पवित्र करेगा अच्छिद्र पवित्र वेदमन्त्रों से। वेद के अनेक प्रेरणाप्रद मन्त्र प्रस्तुत मन्त्र के समान पवित्रता का सन्देश दे रहे हैं। उनका अध्ययन और मनन-चिन्तन हमारे कालुष्य को धोकर हमें पवित्र कर सकता है। पवित्र होने का दूसरा साधन प्रस्तुत मन्त्र में बताया गया है सूर्य-रश्मियाँ। ये हमारी भौतिक मलिनता को दग्ध करके या धोकर हमें भौतिक रूप से सबल, नीरोग, प्राणवान् और पवित्र कर सकती हैं।

सविता प्रभु जैसे पवित्र विज्ञान और वाणी के पति हैं, वैसे ही पवित्र कर्म के भी अधिपति हैं। हे पवित्र कर्म के अधिपति ! आपकी पवित्र कर्म-प्रेरणा से पवित्र हुए मेरा कल्याण हो। जिस कामना से आज मैं आपके सम्मुख पवित्रता की पुकार मचा रही हूँ और अपने तन-मन-धन को पवित्र कर रहा हूँ, हे देव! वह मेरी कामना पूर्ण हो। पवित्रता के पुजारी को सुख, शान्ति, महत्त्व, सत्य, शिव, सौन्दर्य प्राप्त होता है, वह मुझे भी प्राप्त हो।

पाद टिप्पणियाँ

१. (चित्पतिः) चेतयति येन विज्ञानेन तस्य पति: पालयिता ऽधिष्ठाता ईश्वर:-द० ।

२. सविता-यः सुवति प्रेरयति, सन्मार्गे सः । षु प्रेरणे तुदादिः ।

३. मन्त्र: पवित्रमुच्यते । निरु० ५.३४

पवित्रता की पुकार

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