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हदीस : प्रतिज्ञाएं और क़समें

प्रतिज्ञाएं और क़समें

बारहवीं और तेरहवीं किताबें क्रमशः प्रतिज्ञाओं (अल-नज़र) और क़समों (अल-ऐलान) पर है। यहां हम दोनों का साथ-साथ विचार करेंगे। मुहम्मद प्रतिज्ञाएं करने को नापसन्द करते हैं, क्योंकि प्रतिज्ञा “न तो (किसी काम को) जल्दी पूरा करने करने में मददगार होती और न ही (इसमें) रुकावट बनती है“ (4020)। अल्लाह को किसी आदमी की प्रतिज्ञाओं की जरूरत नहीं। एक शख़्स ने एक बाद प्रतिज्ञा की कि वह पैदल चल कर काबा जायेगा। तब मुहम्मद ने कहा-”अल्लाह इसके प्रति उदासीन है कि कोई अपने ऊपर कष्ट लाद रहा है।“ और ”उसे सवारी पर जाने का हुक्म दिया“ (4029)।

 

मुहम्मद मोमिनों को लात या उज्जा या अपने पिताओं की क़सम खाने से भी मना करते हैं। वे कहते हैं-”बुतों की क़सम मत खाओ और न अपने पिता की“ (4043)। लेकिन वे अल्लाह की क़सम खाने की अनुमति देते हैं, जिसके लिए ईसामसीह ने मना किया था। मुहम्मद कहते हैं कि ”जिसे क़सम खानी हो उसे अल्लाह की क़सम खानी चाहिए“ (4038)।

author : ram swarup

 

HADEES : A MUSLIM AND THE DEATH PENALTY

A MUSLIM AND THE DEATH PENALTY

A Muslim who �bears testimony to the fact that there is no God but Allah, and I [Muhammad] am the Messenger of Allah,� can be punished with the death penalty only if he is a married adulterer, or if he has killed someone (i.e., someone who is a Muslim, according to many jurists), or if he is a deserter from Islam (4152-4155).  The translator tells us that there is almost a consensus of opinion among the jurists that apostasy from Islam must be punished with death.  Those who think such a punishment is barbarous should read the translator�s justification and rationale for it (note 2132).

author : ram swarup

हदीस : मुहम्मद की आखि़री वसीयत

मुहम्मद की आखि़री वसीयत

एक जुमेरात को जब उनकी बीमारी भयानक हो उठी, तो मुहम्मद ने कहा-“मैं तीन बातों के बारे में वसीयत करता हूं। बहुदेववादियों को अरब के इलाक़े से निकाल बाहर करो, विदेशी प्रतिनिधियों की वैसी ही मेज़बानी करो जैसी मैं करता रहा हूं।“ तीसरी बात हदीस सुनाने वाला भूल गया (4014)।

 

मुहम्मद अपने आखि़री क्षणों में एक वसीयत भी लिखना चाहते थे। उन्होंने लिखने के उपकरण मांगते हुए कहा-“आओ, मैं तुम्हारे लिए एक दस्तावेज लिख जाता हूं। उसके बाद तुम गुमराह नहीं होंगे।“ लेकिन उमर ने, जो वहां मौजूद थे, कहा कि लोगों के पास कुरान पहले से ही है। उमर ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ”अल्लाह की किताब हमारे लिए काफ़ी है“, और मुहम्मद को उस नाजुक हालत में परेशान नहीं करना चाहिए। जब उनके बिस्तर के इर्द-गिर्द एकत्र लोग आपस में वाद-विवाद करने लगे तो मुहम्मद ने उनसे कहा-”उठो और बाहर चले जाओ“ (4016)।

 

मुमकिन है कि उमर मृतप्राय व्यक्ति के प्रति सच्ची संवेदना से भर उठे हों। लेकिन बाद में अली के समर्थकों ने दावा किया कि मुहम्मद अपनी आखिरी वसीयत में अली को अपना वारिस बनाना चाहते थे और उमर ने अबू बकर से सांठ-गांठ करके एक गंदी चाल द्वारा उन्हें ऐसा करने से रोक दिया।

author : ram swarup

 

HADEES: QISAS

QISAS

QisAs literally means �tracking the footsteps of an enemy�; but technically, in Muslim law, it is retaliatory punishment, an eye for an eye.  It is the lex talionis of the Mosaic law.

A Jew smashed the head of an ansAr girl and she died.  Muhammad commanded that his head be crushed between two stones (4138).  But in another case, which involved the sister of one of the Companions, bloodwite was allowed.  She had broken someone�s teeth.  When the case was brought to Muhammad, he told her that �QisAs [retaliation] was a command prescribed in the Book of Allah.� She made urgent pleas and was allowed to go free after paying a money compensation to the victim�s next of kin (4151).

author : ram swarup

हदीस : क़र्जे

क़र्जे

मुहम्मद मृतक के कर्जों के मामले में बहुत सतर्क थे। मृत व्यक्ति की संपत्ति में से उसके अंतिम संस्कारों के खर्च निकालने के बाद उसके कर्जों की अदायगी सबसे पहले की जाती थी। अगर उसकी संपत्ति कर्जों की अदायगी के लिए काफ़ी न हो तो चंदे से पैसा जुटाया जाता था। किन्तु लड़ाइयां जीतने के बाद मुहम्मद जब धनी हो गये तो कर्ज़ वे अपने पास से चुकता कर देते थे। उन्होंने कहा-”जब अल्लाह ने जीत के दरवाजे मेरे लिए खोल दिये तो उसने कहा कि मैं मोमिनों के अधिक नज़दीक हूं, इसलिए अगर कोई क़र्ज़ छोड़कर मर जाता है तो उसकी अदायगी मेरी ज़िम्मेदारी है और अगर कोई जायदाद छोड़ कर मरे तो वह उसके वारिसों को मिलेगी“ (3944)।

author : ram swarup

HADEES : DEATH PENALTY FOR APOSTASY REBELLION

DEATH PENALTY FOR APOSTASY REBELLION

One can accept Islam freely, but one cannot give it up with the same freedom.  The punishment for apostasy-for giving up Islam-is death, though not by burning.  �Once a group of men apostatized from Islam.  �Ali burnt them to death.  When Ibn �AbbAs heard about it, he said: If I had been in his place, I would have put them to sword for I have heard the apostle say, Kill an apostate but do not burn him for Fire is Allah�s agency for punishing the sinners� (TirmizI, vol. I, 1357).  Eight men of the tribe of �Ukl became Muslims and emigrated to Medina.  The climate of Medina did not suit them.  Muhammad allowed them �to go to the camels of sadaqa and drink their milk and urine� (urine was considered curative).  Away from the control of the Prophet, they killed the shepherds, took the camels and turned away from Islam.  The Prophet sent twenty ansArs after them with an expert tracker who could follow their footprints.  The apostates were brought back.  �He [the Holy Prophet] got their hands cut off, and their feet, and put out their eyes, and threw them on the stony ground until they died� (4130).  Another hadIs adds that while on the stony ground �they were asking for water, but they were not given water� (4132).

The translator gives us the verse from the QurAn according to which these men were punished: �The just recompense for those who wage war against Allah and His Messenger and strive to make mischief in the land is that they should be murdered, or crucified or their hands and their feet should be cut off on opposite sides, or they should be exiled� (QurAn 5:36).

author : ram swarup

हदीस : कानूनी वारिसों के लिए दो-तिहाई

कानूनी वारिसों के लिए दो-तिहाई

एक मृत व्यक्ति की जायदाद को मृतक की कई-एक अदायगियां पूरी करने के बाद बांटा जा सकता है, जैसे कि दफ़नाने का खर्च और मृतक के कर्जों की अदायगी। इस्लाम के सिवाय किसी और मज़हब को मानने वाले व्यक्ति को यह हक़ नहीं है कि वह किसी मुसलमान से कोई उत्तराधिकार पाए। इसी प्रकार कोई मुसलमान (किसी) गैर-मुस्लिम का दाय-भाग ग्रहण नहीं कर सकता“ (3928)। विरासत के एक अन्य सिद्धांत के अनुसार “एक मर्द दो औरतों द्वारा पाए जाने वाले भाग के बराबर हैं“ (3933)।

 

मुहम्मद कहते हैं कि कोई व्यक्ति अपनी जायदाद के सिर्फ़ एक-तिहाई भाग की ही वसीयत कर सकता है। बाकी दो-तिहाई कानूनी वारिसों को मिलना चाहिए। साद बिन अबी वक्कास से मुहम्मद उनकी मृत्यु-शैय्या पर मिले। साद के सिर्फ एक बेटी थी। उन्होंने जानना चाहा कि क्या वे अपनी जायदाद का दो-तिहाई अथवा आधा सदके (दान) में दे सकते हैं। पैग़म्बर ने जवाब दिया-”एक तिहाई दो और वह बहुत काफी है। अपने वारिसों को धनवान छोड़ना बेहतर है, बजाय इसके कि वे ग़रीब रहें और दूसरों से मांगते फिरें“ (3991)।

author : ram swarup

 

HADEES : QASAMAH

QASAMAH

The fourteenth book is the �Book of Oaths� (al-qasAmah).  QasAmah literally means �taking an oath,� but in the terminology of the sharI�ah, it is an oath of a particular type and taken under particular conditions.  For example, when a man is found slain, and the identity of his slayer is unknown, fifty persons from the nearest district take an oath that they neither killed the man nor knew who did it.  This establishes their innocence.

This was apparently the practice among the pre-Islamic Arabs, and Muhammad adopted it.  Once a Muslim was found slain.  His relatives accused the neighboring Jews.  Muhammad told them: �Let fifty persons among you take oath for leveling the charge of murder against a person among them, and he would be surrendered to you.� They declined to take the oath since they had not witnessed the murder.  Then Muhammad told them that �the Jews will exonerate themselves by fifty of them taking this oath.� They replied: �Allah�s Messenger, how can we accept the oath of unbelieving people?� Then Muhammad paid the bloodwite of one hundred camels for the slain man out of his own funds (4119-4125).

Another hadIs specifically tells us that Allah�s Messenger �retained the practice of QasAma as it was in the pre-Islamic days� (4127).

author : ram swarup

हदीस : वक़्फ

वक़्फ

मुहम्मद वक़्फ अर्थात् सम्पत्ति के एक संग्रह को अल्लाह के लिए समर्पित करने के पक्ष में थे। उमर ने मुहम्मद से कहा-“मुझे खै़बर में जमीन मिली है (पराजित यहूदियों की ज़मीन जो मुहम्मद के साथियों में बांट दी गयी थी)। मैंने इससे ज्यादा कीमती कोई जायदाद कभी प्राप्त नहीं की। अब इसके बारे में क्या करने का हुक्म आप देते हैं ?“ इस पर रसूल-अल्लाह बोले-“अगर तुम चाहो तो तुम इस सम्पत्ति-संग्रह को यथावत रख सकते हो और उसकी उपज को सदके के रूप में दे सकते हो। …… उमर ने उसे गरीबों के लिए, नज़दीकी रिश्तेदारों के लिए, गुलामों की मुक्ति के लिए और अल्लाह के रास्ते में तथा मेहमानों के लिए समर्पित कर दिया“ (4006)।

author : ram swarup

HADEES : Crime and Punishment (QasAmah, QisAs, HadUd)

Crime and Punishment (QasAmah, QisAs, HadUd)

The fourteenth, fifteenth, and sixteenth books all relate to the subject of crime: the forms and categories of crime, the procedure of investigating them, and the punishments resultant from having committed them.

Muslim fiqh (law) divides punishment into three heads: hadd, qisAs, and ta�zIr.  Hadd (pl. HadUd) comprises punishments that are prescribed and defined in the QurAn and the HadIs.  These include stoning to death (rajm) for adultery (zinA); one hundred lashes for fornication (QurAn 24:2-5); eighty lashes for slandering an �honorable� woman (husun), i.e., accusing her of adultery; death for apostatizing from Islam (irtidAd); eighty lashes for drinking wine (shurb); cutting off the right hand for theft (sariqah, QurAn 5:38-39); cutting off of feet and hands for highway robbery; and death by sword or crucifixion for robbery accompanied by murder.

The law also permits qisAs, or retaliation.  It is permitted only in cases where someone has deliberately and unjustly wounded, mutilated, or killed another, and only if the injured and the guilty hold the same status.  As slaves and unbelievers are inferior in status to Muslims, they are not entitled to qisAs according to most Muslim faqIhs (jurists).

In cases of murder, the right of revenge belongs to the victim�s heir.  But the heir can forgo this right and accept the blood-price (diyah) in exchange.  For the death of a woman, only half of the blood-price is due.  The same applies to the death of a Jew or a Christian, but according to one school, only one-third is permissible in such cases.  If a slave is killed, his heirs are not entitled to qisAs and indemnity; but since a slave is a piece of property, his owner must be compensated with his full value.

The Muslim law on crime and punishment is quite complicated.  Though the QurAn gives the broad outline, the HadIsalone provides a living source and image.

author : ram swarup