पुनः हमें मन, आयु, प्राण आदि प्राप्त हो – रामनाथ विद्यालंकार

पुनः हमें मन, आयु, प्राण आदि प्राप्त हो – रामनाथ विद्यालंकार

ऋषयः  अङ्गिरसः ।  देवता  अग्निः ।  छन्दः  भुरिग् ब्राह्मी बृहती।

पुनर्मनः पुनरायुर्मऽआगन्पुनः प्राणः पुनरात्मा मऽआगन्पुनश्चक्षुः पुनः क्षोत्रे मूऽआर्गन् वैश्वारोऽअदब्धस्तनूपाऽअग्निर्नः पातु दुरितार्दवद्यात् ॥

–यजु० ४। १५ |

(पुनः मनः) फिर मन, (पुनः आयुः) फिर आयु (मे आगन्) मुझे प्राप्त हो । (पुनः प्राणः) फिर प्राण, (पुनः आत्मा) फिर आत्मा (मे आगन्) मुझे प्राप्त हो। (पुनः चक्षुः) फिर चक्षु, (पुनः श्रोत्रम्) पुनः कान (मे आगन्) मुझे प्राप्त हो । (वैश्वानरः२) सब नरों का हितकर्ता, (अदब्धः) अपराजित, (तनूपा:) शरीर और आत्मा का रक्षक (अग्निः) अग्रनायक परमात्मा (नः पातु) हमें बचाये (दुरिताद्) पापजन्य दुःख से तथा दुष्कर्म से और (अवद्यात्) पापाचरण से तथा निन्दा से ।।

कोई समय था जब मेरे अन्दर मनोबल कूट-कूट कर भरा हुआ था, मेरी सङ्कल्प-शक्ति अदम्य थी। असम्भव से असम्भव प्रतीत होनेवाले कार्य हाथ में लेने में मुझे आनन्द आता था। गुरुजनों का आदेश होने पर मैं आकाश के तारे भी तोड़कर ला सकता था। मुझे आयु का बल भी प्राप्त था। पचास वर्ष का होने पर भी तीस वर्ष का युवक प्रतीत होता था। साथ ही पचास वर्ष का होने पर भी अनुभव में अस्सी वर्ष के वृद्ध को भी मात देता था। मेरे अन्दर प्राण-बल भी भरपूर था, जो शरीर के सब अङ्ग-प्रत्यङ्गों को निखारे हुए था। मेरा आत्मबल भी ऐसा था कि प्रत्येक मनुष्य मुझसे प्रभावित होता था। काम, क्रोध आदि रिपु मेरे आत्मबल से कुचले जाने के भय से मुझसे दूर ही रहते थे। मेरी आँखें पवित्र थीं, दृष्टिशक्ति तीव्र थी। मेरे श्रोत्र पवित्र थे, श्रवणशक्ति तीव्र थी। शरीर की सब ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ सबल थीं।।

परन्तु अब मुझे यह क्या हो गया है? मेरा मन सामान्य कार्यों में भी नहीं लगता है। आयु में साठ वर्ष का होने पर भी नव्वे वर्ष का जर्जर बूढ़ा लगता हूँ। प्राण, अपान आदि की शक्ति भी लुप्त हो गयी है, जिससे शरीर के अङ्गों में परस्पर सामञ्जस्य नहीं रहा है। आत्मबल से तो मानो खाली ही हो गया हूँ। आँखें मन्द हो गयी हैं, श्रोत्र शक्तिहीन हो गये हैं। ऐसी हीन अवस्था में जहाँ भी जाता हूँ, दुत्कारा जाता हूँ। सम्मान और प्रतिष्ठा मुझसे कोसों दूर चले गये हैं। दुरित ने मेरे अन्दर डेरा डाल लिया है, जिससे मैं सर्वत्र निन्दा का ही पात्र बन रहा हूँ।

ऐसी स्थिति में मैं चाहता हूँ कि पुन: मेरे अन्दर पहले जैसा मनोबल जागृत हो जाए, पुनः मुझे स्वस्थ आयु प्राप्त हो जाए, पुनः मेरे अन्दर प्राणसञ्चार हो जाए, पुनः मेरे अन्दर आत्मबल आ जाए, पुनः मुझे खोये हुए चक्षु, श्रोत्र आदि प्राप्त हो जाएँ। सब नरों का हितकर्ता, अपराजेय, शरीर और आत्मा का रक्षक अग्रणी परमेश्वर मेरे पाप-जन्य दु:खों और दुष्कर्मों का विध्वंस कर दे, जिससे मैं पापाचरण तथा गर्हणीय स्थिति से उद्धार पाकर पुनः पूर्व के समान, बल्कि उससे भी अधिक मनस्वी, आयुष्मान्, यशस्वी बनें।

पुनः हमें मन, आयु, प्राण आदि प्राप्त हो – रामनाथ विद्यालंकार

पादटिप्पणियाँ

१. आ-अगन्, आङ्ग म्, लिङर्थ में लुङ्।

२. विश्वेषां नृणां हितः वैश्वानरः ।।

३. (तनूपाः) यः शरीरम् आत्मानं च रक्षति-द० ।

४. (दुरितात्) पापजन्यात् प्राप्तव्याद् दु:खाद् दुष्कर्मणो वा-द० ।।

५. (अवद्यात्) पापाचरणात्-द० । अवद्य=निन्दनीय कर्म, पा० ३.१.१०१ से  निपातित गर्छ अर्थ में ।

पुनः हमें मन, आयु, प्राण आदि प्राप्त हो – रामनाथ विद्यालंकार

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