न तू मेरी हिंसा कर, न मैं तेरी हिंसा करूं – रामनाथ विद्यालंकार

न तू मेरी हिंसा कर, न मैं तेरी हिंसा करूं – रामनाथ विद्यालंकार

ऋषिः  वत्सः ।  देवता  दम्पती ।  छन्दः  आस्तारपङ्किः।

समख्ये देव्या धिया से दक्षिणयोरुचक्षसा मा मुऽआयुः प्रमोषीर्मोऽअहं तवं वीरं विदेय तवे देवि सन्दृशिं॥

-यजु० ४।२३ |

हे पत्नी ! मैं (देव्या धिया) देदीप्यमान बुद्धि के साथ (समख्ये) कह रहा हूँ, (उरुचक्षसा) विशाल दृष्टिवाली (दक्षिणया) बलवती इच्छा के साथ (सम् अख्ये) कह रहा हूँ कि (मा मे आयुः प्रमोषी:४) न तू मेरी आयु की हिंसा कर (मो अहं तवे) न मैं तेरी आयु की हिंसा करूँ। (देवि) हे देवी! (तवे संदृशि) तेरे संदर्शन में, मार्गदर्शन में मैं (वीरं विदेय) वीर सन्तान को प्राप्त करूं।

वेदादि शास्त्रों ने और सन्त-महात्माओं ने ब्रह्मचर्य की बहुत महिमा वर्णित की है। अथर्ववेद के ब्रह्मचर्यसूक्त में कहा है कि ‘ब्रह्मचर्य के ही तप से राजा राष्ट्र की रक्षा करता है। आचार्य स्वयं ब्रह्मचर्य का ही पालन करके शिक्षा देने के लिए ब्रह्मचारी को चाहता है। ब्रह्मचर्य का पालन करने के पश्चात् ही कन्या युवा पति को प्राप्त करती है। ब्रह्मचर्य के ही तप से विद्वान् लोग मृत्यु को दूर भगाते हैं।’ चार आश्रमों में से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास इन तीन आश्रमों में पूर्णत: ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक है। केवल गृहस्थ आश्रम में कुछ मर्यादाओं के साथ ब्रह्मचर्यव्रत-भङ्ग की छूट है। इसका मुख्य उद्देश्य राष्ट्र को उत्कृष्ट सन्तान प्रदान करना है। राष्ट्र के उत्कृष्ट ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ब्रह्मचारिणी रही हुई अपनी पत्नियों से जो पुत्र-पुत्रियाँ उत्पन्न करते हैं, वे राष्ट्र की अमूल्य सम्पदा होती हैं। कोई भी राष्ट्र अपने अपरा और परा विद्याओं के धार्मिक विद्वानों, रक्षक क्षत्रियों और धनी वैश्यों पर गर्व कर सकता है।

कोई दम्पती अध्यात्मवेत्ता हैं, कोई दार्शनिक हैं, कोई भूगर्भशास्त्री हैं, कोई खगोलवित् हैं, कोई वैज्ञानिक हैं, कोई रणचातुरी में दक्ष हैं, कोई व्यापारकला में निष्णात हैं, कोई कृषिकर्म के भूषण हैं, कोई पशुपालन में सिद्धि प्राप्त हैं, सबकी राष्ट्र को आवश्यकता होती है। और इनसे प्राप्त होनेवाली प्रत्येक क्षेत्र की गुणवती सन्तति की भी प्रत्येक देश को उत्कट चाह होती है। इस चाह को पूरा करता है गृहस्थाश्रम । परन्तु अति विषयासक्ति, अति भोगविलास नर और नारी दोनों की ही बर्बादी, हिंसा और विनाश का कारण बनता है। जीवन भर वे रोग और अशक्ति के शिकार रहते हैं। अब्रह्मचर्य के ही कारण वे जीवित होते हुए भी मृततुल्य होते हैं। इसीलिए मन्त्र में पुरुष पत्नी को कह रहा है कि गृहाश्रम में रहते हुए न तू मेरी आयु की हिंसा कर, न मैं तेरी आयु की हिंसा करूं। हम अति भोगविलास में पड़कर अपनी आयु को ही क्षीण न कर बैठे। पति पत्नी का मार्गदर्शन प्राप्त करे और पत्नी पति का मार्गदर्शन प्राप्त करे। दोनों मिलकर संयम से रहते हुए, गृहस्थाश्रम के नियमों का पालन करते हुए, प्रेम-भरे मधुर व्यवहार से एक-दूसरे की आयु बढ़ाते हुए वीर पुत्र और वीरङ्गना पुत्री को जन्म दें, जिनसे उनका घर भी महके और राष्ट्र भी सौरभ-सम्पन्न हो।

न तू मेरी हिंसा कर, न मैं तेरी हिंसा करूं – रामनाथ विद्यालंकार

पादटिप्पणियाँ

१. (देव्या) देदीप्यमानया (धिया) प्रज्ञया कर्मणा वा-द० ।

२. ( सम्) सम्यगर्थे (अख्ये) प्रकथयानि। अत्र व्यत्ययेनात्मनेपदं लडर्थे | लुङ् च-द०। ख्या प्रकथने, अदादिः ।।

३. उरु विशालं दीर्घ चक्षः दृष्टि: यस्यां तया दक्षिणया बलवत्या इच्छाशक्त्या।

४. प्र-मुष स्तेये। स्तेय से यहाँ खण्डन, हिंसा अभिप्रेत है।

५. विदेय=विन्देय । विदलु लाभे। ‘अत्र वा छन्दसि सर्वे विधयो भवन्तीति नुमभावः-२० ।’

न तू मेरी हिंसा कर, न मैं तेरी हिंसा करूं – रामनाथ विद्यालंकार

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