DARSHAN
दर्शन शास्त्र : न्याय दर्शन
 
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Darshan

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सूत्र :बुद्ध्या विवेचनात्तु भावानां याथात्म्यानुप-लब्धिस्तन्त्वपकर्षणे पटसद्भावानुपलब्धिवत्तदनुपलब्धिः II4/2/26
सूत्र संख्या :26

व्याख्याकार : स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती

अर्थ : यदि कपड़े में से एक-एक तार अलग करके देखें तो कपड़ा सिवाय तारों के औश्र कोई वस्तु ही नहीं ठहराता। अतएव कपड़ा केवल बुद्धि का विषय हैं, वास्तव में कुछ नहीं। प्रत्येक वस्तु की यही दशा है कि वह वस्तु तो कुछ नहीं, पर उसका ज्ञान होता है। इसलिए प्रत्येक वस्तु का जो ज्ञान है, वह मिथ्या ज्ञान है। या यूं समझो कि ज्ञान के सिवाय और किसी प्रदार्थ की सत्ता वास्तविक नहीं। क्योंकि जो कुछ मालूम होता है वह ज्ञान ही से है और ज्ञान ही है। इसलिए विज्ञान ही एक पदार्थ है और कुछ नही।

व्याख्या :
प्रश्न- हम तो ज्ञान के अतिरिक्त ज्ञेय की सत्ता प्रत्यक्ष देखते हैं, यदि ज्ञेय न हो तो किसका ज्ञान हो? जैसे हमारे सामने यह गाड़ी खड़ी है, इसका प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। उत्तर- गाड़ी कोई पदार्थ नहीं, उसकी रचना केवल ज्ञान ने की है। पहिया, धुरा और बम्ब आदि का नाम गाड़ी रख लिया है। इसी प्रकार पहिये आदि भी कोई वस्तु नही। एक गोल चत्र और कई डण्डों का नाम पहिया रख लिया है। इसलिए सब पदार्थों की रचना ज्ञान करता है। अब इसका उत्तर देते हैं-

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