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--CHAPTER NUMBER--
1. सृष्टि उत्पत्ति एवं धर्मोत्पत्ति विषय
2. संस्कार एवं ब्रह्मचर्याश्रम विषय
3. समावर्तन, विवाह एवं पञ्चयज्ञविधान-विधान
4. गृह्स्थान्तर्गत आजीविका एवं व्रत विषय
5. गृहस्थान्तर्गत-भक्ष्याभक्ष्य-देहशुद्धि-द्रव्यशुद्धि-स्त्रीधर्म विषय
6. वानप्रस्थ-सन्यासधर्म विषय
7. राजधर्म विषय
8. राजधर्मान्तर्गत व्यवहार-निर्णय
9. राज धर्मान्तर्गत व्यवहार निर्णय
10. चातुर्वर्ण्य धर्मान्तर्गत वैश्य शुद्र के धर्म एवं चातुर्वर्ण्य धर्म का उपसंहार
11. प्रायश्चित विषय
12. कर्मफल विधान एवं निःश्रेयस कर्मों का वर्णन
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COMMENTARY
उद्धृते दक्षिने पाणावुपवीत्युच्यते द्विजः ।सव्ये प्राचीनावीती निवीती कण्ठसज्जने ।2/63
Commentary by
: स्वामी दर्शनानंद जी
वाम (बायें) कन्धे पर जनेऊ रहने से उपवीती अर्थात् सत्य कहलाता है और दक्षिण (दाहिने) कन्धे पर रहने से प्राचीन आवीती अर्थात् अपसत्य कहलाता है और कण्ठ (गले) में रहने से निवीती कहलाता है।
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